रजिस्ट्री सं० डी०-221
REGISTERED NO . D- 221
भारत का राजपत्र The Gazette ofIndia
असाधारण
EXTRAORDINARY
भाग 2- अनुभाग 1क
PART II- SECTION 1A
प्राधिकार से प्रकाशित
PUBLISHED BY AUTHORITY
सं० 1
No. 1
नई दिल्ली, शुक्रवार, 29 जनवरी , 2016/9 माघ, 1937 ( शक) NEW DELHI, FRIDAY, 29 JANUARY , 2016/9 MAGHA, 1937 (SAKA)
]
[ खंड LII Vol. LII
इस भाग में भिन्न पृष्ठ संख्या दी जाती है जिससे कि यह अलग संकलन के रूप में रखा जा सके।
Separate paging is given to this Part in order that it may be filed as a separate compilation.
विधि और न्याय मंत्रालय
(विधायी विभाग)
नई दिल्ली, 29 जनवरी , 2016/9 माघ , 1937 ( शक )
दि नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन ऐक्ट, 2014; ( 2 ) दि इंडियन इंस्टीट्यूट आफ इनफार्मेशन टेक्नोलाजी ऐक्ट, 2014; ( 3 ) दि मर्चेंट शिपिंग ( सेकेंड अमेंडमेंट ) ऐक्ट, 2014; ( 4 ) दि पब्लिक प्रिमिसेस ( इविक्शन आफ अनआथोराइज्ड ओकुपेंट्स ) अमेंडमेंट ऐक्ट, 2015; ( 5 ) दिकान्स्टिट्यूशन ( शेडयूल्ड कास्ट्स ) आर्डर्स ( अमेंडमेंट) ऐक्ट, 2015; ( 6 ) दि माइन्स एंड मिनरल्स ( डेवलपमेंट एंड रेग्यूलेशन ) अमेंडमेंट ऐक्ट, 2015; ( 7 ) दि रीजनल रूरल बैंक्स ( अमेंडमेंट ) ऐक्ट, 2015 ; ( 8 ) दि वेयरहाऊसिंग कारपोरेशंस ( अमेंडमेंट ) ऐक्ट, 2015; (9 ) दि रिपीलिंग एंड अमेंडिंग ऐक्ट, 2015; ( 10 ) दि पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स ( अमेंडमेंट ) ऐक्ट, 2015 ; (11) दिफाइनेंस ऐक्ट, 2015 ; और ( 12 ) दि दिल्ली हाई कोर्ट ( अमेंडमेंट ) ऐक्ट, 2015 के निम्नलिखित हिन्दी अनुवाद राष्ट्रपति के प्राधिकार से प्रकाशित किए जाते हैं और ये राजभाषा अधिनियम, 1963 ( 1963 का 19 ) की धारा 5 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( क ) के अधीन उनके हिन्दी में प्राधिकृत पाठ समझे जाएंगे :-
MINISTRY OF LAW AND JUSTICE
(LEGISLATIVE DEPARTMENT)
NewDelhi, 29 January, 2016/9 Magha , 1937 (Saka)
The translation in Hindi of the following, namely: The National Institute ofDesign Act, 2014; (2 ) The Indian Institute of Information Technology Act , 2014; (3 ) The Merchant Shipping (SecondAmendment) Act, 2014; (4) The Public Premises (Eviction ofUnauthorised Occupants) Amendment Act, 2015 ; ( 5 ) The Constitution ( Scheduled Castes ) Orders (Amendment) Act, 2015 ; (6) The Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2015 ; (7 ) The Regional Rural Banks (Amendment) Act , 2015 ; (8) The Warehousing Corporations (Amendment) Act, 2015; (9) The Repealing and Amending Act, 2015; ( 10) The Payment and Settlement Systems (Amendment) Act , 2015 ; (11) The Finance Act, 2015 ; and ( 12) The Delhi High Court (Amendment) Act, 2015 are hereby published under the authority of the President and shall be deemed to be the authoritative texts thereof inHindi under clause ( a) ofsub - section (1) ofsection 5 of the Official Languages Act, 1963 (19 of 1963) :-
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भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2-
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राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान अधिनियम, 2014 ( 2014 का अधिनियम संख्यांक 18 ) 3 The National Institute of Design Act, 2014
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2014 (2014 का अधिनियम संख्यांक 30 ) 17 The Indian Institute of Information Technology Act, 2014
39 वाणिज्य पोत परिवहन ( दूसरा संशोधन ) अधिनियम, 2014 ( 2014 का अधिनियम संख्यांक 32 )
The Merchant Shipping (Second Amendment) Act, 2014
सरकारी स्थान ( अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली ) संशोधन अधिनियम, 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 2 ) 45 The Public Premises (Eviction of Unauthorised Occupants) Amendment Act, 2015
49 संविधान ( अनुसूचित जातियां ) आदेश ( संशोधन) अधिनियम, 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 4)
The Constitution (Scheduled Castes ) Orders (Amendment) Act, 2015
खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम , 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 10 ) ... 51 The Mines and Minerals ( Development and Regulation ) Amendment Act, 2015
प्रादेशिक ग्रामीण बैंक ( संशोधन ) अधिनियम, 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 14) 63 The Regional Rural Banks ( Amendment) Act , 2015
67 भाण्डागारण निगम ( संशोधन ) अधिनियम, 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 16 ) TheWarehousing Corporations (Amendment) Act, 2015
69 निरसन और संशोधन अधिनियम, 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 17) The Repealing and Amending Act , 2015
73 संदाय और निपटान प्रणाली ( संशोधन ) अधिनियम, 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 18 )
The Payment and Settlement Systems (Amendment) Act, 2015
77 वित्त अधिनियम, 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 20)
The Finance Act , 2015
171 दिल्ली उच्च न्यायालय ( संशोधन ) अधिनियम, 2015 ( 2015 का अधिनियम संख्यांक 23 ) . The Delhi High Court (Amendment )Act , 2015 भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
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राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान अधिनियम, 2014
(2014 का अधिनियम संख्यांक 18 )
[17जुलाई, 2014]
राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, अहमदाबाद नामक संस्था को डिजाइन से संबंधित सभी शाखाओं में शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण में क्वालिटी और उत्कर्ष की अभिवृद्धि के लिए राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने तथा उससे संबद्ध या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पैंसठवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. ( 1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान अधिनियम, 2014 है ।
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , नियत करे और इस
अधिनियम के भिन्न- भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न - भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
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2. राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, अहमदाबाद के नाम से ज्ञात संस्था के उद्देश्य चूंकि ऐसे हैं जो उसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था बनाते हैं, अतः राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान , अहमदाबाद को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया जाता है ।
राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, अहमदाबाद को एक राष्ट्रीय महत्व कीसंस्था घोषित करना ।
परिभाषाएं ।
3. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) " अध्यक्ष " से धारा 11 के खंड ( क ) के अधीन नामनिर्दिष्ट शासी परिषद् का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ख ) " संकायाध्यक्ष " से , किसी भी संस्थान निवेश, के संबंध में ऐसे संस्थान निवेश का संकायाध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ग) " डिजाइन " से विकास क्षम उत्पादों और सेवाओं को संस्कृति अंतरण करने के प्रयोजन के लिए और उत्पादों और सेवाओं को प्रतियोगी तीक्ष्णता देने के लिए एक युक्तिसंगत, तर्कसम्मत और आनुक्रमिक नवीन प्रक्रिया अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत औद्योगिक डिजाइन, संचार डिजाइन , वस्त्र और परिधान डिजाइन, जीवनशैली डिजाइन, अनुभवात्मक डिजाइन , प्रदर्शनी डिजाइन, शिल्प और पारम्परिक सेक्टर डिजाइन भी आते हैं;
(घ) " निदेशक " से धारा 18 के अधीन नियुक्त किया गया संस्थान का निदेशक अभिप्रेत है;
(ङ) " निधि " से धारा 23 के अधीन अनुरक्षित संस्थान की निधि अभिप्रेत है;
(च ) " शासी परिषद्" से धारा 11 के अधीन यथा गठित संस्थान की शासी परिषद् अभिप्रेत है;
(छ) " संस्थान " से धारा 4 के अधीन निगमित राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, अहमदाबाद अभिप्रेत है;
(ज) " संस्थान निवेश " से कर्नाटक राज्य के बेंगलूरू और गुजरात राज्य के गांधीनगर में अवस्थित संस्थान का निवेश अन्यथा ऐसा निवेश अभिप्रेत है, जो संस्थान द्वारा भारत के भीतर या भारत के बाहर किसी स्थान में स्थापित किया जाए;
(झ) " अधिसूचना " से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ञ) " विहित " से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ट) " रजिस्ट्रार " से संस्थान का रजिस्ट्रार अभिप्रेत है;
(ठ) " सिनेट" से संस्थान की सिनेट अभिप्रेत है;
1860 का 21 (ड) " सोसाइटी " से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 के अधीन सोसाइटी के रूप में रजिस्ट्रीकृत राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान , अहमदाबाद अभिप्रेत है;
(ढ) " परिनियमों " और " अध्यादेशों " से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए संस्थान के परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं ।
अध्याय 2
संस्थान
संस्थानका निगमन।
4. ( 1) राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान , अहमदाबाद पूर्वोक्त नाम का एक निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और जिसे संपत्ति का अर्जन , धारण और व्ययन करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी और उस नाम से वह वाद लाएगा तथा उसके विरुद्ध वाद लाया जाएगा ।
(2) संस्थान का गठन करने वाले निगमित निकाय में संस्थान की तत्समय शासी परिषद् का एक अध्यक्ष, एक निदेशक और अन्य सदस्य होंगे ।
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5 अनुभाग 1क]
(3) संस्थान का मुख्यालय गुजरात राज्य के अहमदाबाद जिले में होगा ।
(4) संस्थान, किसी संस्थान निवेश की स्थापना भारत के भीतर या भारत के बाहर ऐसे अन्य स्थान पर कर सकेगा जो वह ठीक समझेः
परंतु इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, अहमदाबाद के कर्नाटक राज्य के बेंगलुरू और गुजरात राज्य के गांधीनगर में स्थापित किए गए प्रत्येक निवेश को, संस्थान निवेश समझा जाएगा ।
5. इस अधिनियम के प्रारंभ से ही,-
संस्थान के निगमन काप्रभाव ।
(क) किसी विधि ( इस अधिनियम से भिन्न ) में या किसी संविदा या अन्य लिखत में सोसाइटी के प्रतिकिसी निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम के अधीन निगमित संस्थान के प्रति निर्देश है;
(ख ) सोसाइटी की या उससे संबंधित सभी संपत्ति , स्थावर या जंगम, संस्थान में निहित होगी;
(ग ) सोसाइटी के सभी अधिकार और दायित्व संस्थान को अंतरित हो जाएंगे और उसके अधिकार और दायित्व होंगे;
(घ) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व संस्थान के किसी निवेश के प्रति किसी निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह उस संस्थान निवेश के प्रति निर्देश है ;
(ङ) ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व, सोसाइटी द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति, संस्थान में, जिसके अंतर्गत कर्नाटक राज्य में बेंगलुरू और गुजरात राज्य के गांधीनगर में अवस्थित संस्थान निवेश भी हैं, अपना पद या सेवा उसी अवधि तक, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर तथा पेंशन , छुट्टी, उपदान, भविष्य निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों सहित धारण करेगा जो वह अधिनियम के अधिनियमित न किए जाने की और जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक ऐसी सेवा अवधि, पारिश्रमिक, निबंधनों और शर्तों को परिनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दिया जाता है, तब तक ऐसा करता रहेगा:
परंतु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसका नियोजन संस्थान द्वारा कर्मचारी के साथ की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार या यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया गया है तो संस्थान द्वारा स्थायी कर्मचारी की दशा में उसे तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारी की दशा में , एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर का संदाय करके समाप्त किया जा सकेगा ।
संस्थान की शक्तियां ।
6. ( 1 ) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संस्थान निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग और निम्नलिखित कर्तव्यों का पालन करेगा , अर्थात्ः
( क ) डिजाइन से संबंधित क्षेत्रों और विद्या शाखाओं में शिक्षण, अनुसंधान और प्रशिक्षण का उपबंध करना और ऐसे क्षेत्रों या विद्या शाखाओं में उसकी क्वालिटी और उत्कर्षता का विकास करना और उसकीअभिवृद्धि करना;
(ख ) डिजाइन से संबंधित सभी क्षेत्रों या विद्या शाखाओं में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्रियों डाक्टरेट और पश्च डाक्टरेट उपाधियों और अनुसंधान तक के पाठ्यक्रम विकसित करना;
( ग ) डिजाइन से संबंधित क्षेत्रों या विद्या शाखाओं में परीक्षाएं आयोजित करना और डिग्रियां, डिप्लोमे और अन्य विद्या संबंधी उपाधियां या पदवियां प्रदान करना;
(घ) डिजाइन से संबंधित क्षेत्रों या विद्या शाखाओं में सम्मानित डिग्रियां , पुरस्कार या अन्य उपाधियां प्रदान करना;
(ङ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायता वृत्तियां , पुरस्कार और पदक संस्थित करना और प्रदान करना;
(च) फीस और अन्य प्रभार नियत करना, उनकी मांग करना और उन्हें प्राप्त करना;
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करना; (छ) छात्रों के निवास के लिए छात्र- निवासों और छात्रावासों की स्थापना, अनुरक्षण और प्रबंध
(ज) संस्थान के निवास का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करना तथा छात्रों के अनुशासन को विनियमित करना तथा उनके स्वास्थ्य, सामान्य कल्याण और सांस्कृतिक तथा सामूहिक जीवन के संवर्धन की व्यवस्थाएं करना;
(झ ) शैक्षणिक और अन्य पदों को ( निदेशक की दशा के सिवाय) संस्थित करना और उन पर नियुक्तियांकरना;
(ञ) परिनियम और अध्यादेश बनाना और उन्हें परिवर्तित, उपांतरित या विखंडित करना;
(ट) विश्व के किसी भी भाग में की ऐसी शिक्षा या अन्य संस्थाओं के साथ , जिनके उद्देश्य पूर्णतः या भागतः संस्थान के उद्देश्यों के समान हैं, संकाय सदस्यों और विद्वानों के आदान- प्रदान द्वारा और साधारणतया ऐसी रीति से सहयोग करना जो उनके समान उद्देश्यों के लिए सहायक हों;
(ठ) संस्थान और उद्योग के बीच डिजाइनरों और अन्य तकनीकी कर्मचारिवृंद के आदान-प्रदान कोप्रोत्साहित करके और संस्थान द्वारा प्रायोजित और वित्तपोषित अनुसंधान के साथ- साथ परामर्शकारी परियोजनाओं को आरंभ करके शिक्षा जगत और उद्योग के बीच पारस्परिक क्रिया के लिए केंद्रक के रूप मेंकार्य करना;
(ड) माल के उत्पादन और सेवाओं के लिए अच्छे डिजाइनों के सृजन के लिए वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी अनुसंधान करने के लिए कार्यशालाओं या प्रयोगशालाओं या स्टुडियो को आधुनिक मशीनों और उपस्करों सहित स्थापित, सज्जित और अनुरक्षित करना और ऐसे संकर्मों के लिए और ऐसी कार्यशाला या प्रयोगशाला या स्टुडियो में सेवा, प्रशिक्षण और अनुसंधान कार्य में लगे किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को संदाय करने के लिए निधियों का उपबंध करना;
(ढ) साधारण या विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए ऐसे आविष्कार, सुधार या डिजाइन या मानकीकरण चिह्नों से संबंधित कोई पेटेंट या अनुज्ञप्ति अर्जित करना;
( ण ) डिजाइन से संबंधित क्षेत्रों और विद्या शाखाओं में परामर्शकारी कार्य आरंभ करना;
(त ) संस्थान के उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए संस्थान की या उसमें निहित किसी संपत्ति के संबंध में ऐसी रीति में जो संस्थान उचित समझे, संव्यवहार करना;
(थ ) सरकार से दान, अनुदान, संदान या उपकृतियां प्राप्त करना और, यथास्थिति, वसीयतकर्ताओं, दाताओं या अंतरकों से स्थावर या जंगम संपत्तियों की वसीयत, संदान और अंतरण प्राप्त करना ;
(द ) ऐसे व्यक्तियों की, जो सेवा , प्रशिक्षण या अनुसंधान कार्यकलापों में लगे हैं, या जिनके उनमें लगने की संभावना है को ऋण , छात्रवृत्तियां या अन्य धनीय सहायता प्रदान करके या अन्यथा शिक्षा को बढ़ावा देना और उसमें सुधार करना;
(ध) औद्योगिक डिजाइन और सहबद्ध क्षेत्रों के विषय से संबंधित या उससे संबद्ध पुस्तकों, कागजपत्रों, नियतकालिक पत्रिकाओं, प्रदर्शों , फिल्मों, स्लाइडों, गैजटों, परिपत्रों और अन्य साहित्यिक वचन बंधों को तैयार करना , मुद्रित करना, प्रकाशित करना, जारी करना, अर्जित करना और परिचालित करना;
(न ) डिजाइन और संबद्ध विषयों से संबंधित साहित्य और फिल्मों, स्लाइडों, फोयेचित्रों, आदिप्ररूपों और अन्य सूचना के लिए संग्रहालयों , पुस्तकालयों और संग्रहणों को स्थापित करना, बनाना और अनुरक्षित करना;
(प ) ऐसे क्षेत्रों में , जो संस्थान ठीक समझे , सेवा , प्रशिक्षण और अनुसंधान के बारे में भारत में या भारत के बाहर अध्ययन करने के लिए डिजाइनरों, इंजीनियरों ( यांत्रिक या विद्युत या सिविल ) वास्तुविदों , शिल्पकारों, तकनीकीजनों या अन्वेषकों को नामनिर्देशित करना;
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(फ) संस्थान के उद्देश्यों के संबंध में कुशल व्यवसायिक, तकनीकी सलाहकारों, परामर्शदाताओं, कर्मकारों या शिल्पकारों को रखना या नियोजित करना;
(ब) कारीगरों, तकनीकीजनों और अन्य निर्माण कुशल व्यक्तियों को पुरस्कार, वित्तीय या तकनीकी सहायता देकर प्रक्रियाओं, साधनों और गैजटों के ब्यौरे और विनिर्देश तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करना;
(भ) भवनों का सन्निर्माण और उनमें परिवर्तन, विस्तार, सुधार, मरम्मत, अभिवृद्धि या उपांतरण करना और उनमें प्रकाश , जल, जल- निकास , फर्नीचर, फिटिंगों और अन्य उपसाधनों की व्यवस्था करना और उन्हें सज्जित करना;
(म) धनराशि, प्रतिभूति सहित या प्रतिभूति के बिना या संस्थान से संबंधित किसी भी जंगम या स्थावर संपत्तियों के बंधक, भार या आडमान या गिरवी के रूप में प्रतिभूति पर किसी अन्य रीति से उधार लेना और जुटाना;
(य) ऐसी अन्य सभी बातें करना जो संस्थान के सभी या किन्हीं भी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।
( 2 ) उपधारा ( 1 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, संस्थान, कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन के बिना किसी भी स्थावर संपत्ति का किसी भी रीति से व्ययन नहीं करेगा ।
7. ( 1 ) संस्थान सभी स्त्रियों और पुरुषों के लिए चाहे वे किसी भी मूल - वंश, पंथ, जाति या वर्ग के हों, खुला होगा और सदस्यों, छात्रों, शिक्षकों या कर्मकारों को प्रवेश देने या उनकी नियुक्ति करने में या किसी अन्य के संबंध में किसी भी प्रकार से धार्मिक विश्वास या वृत्ति के बारे में कोई मापदंड या शर्त अधिरोपित नहीं की जाएगी ।
संस्थान का सभी मूल-वंशों, पंथों और वर्गों के लिए खुलाहोना ।
(2) संस्थान, किसी ऐसी संपत्ति की कोई ऐसी वसीयत, संदान या अंतरण स्वीकार नहीं करेगा जिसमें शासी परिषद् की राय में संस्थान की भावना और उद्देश्यों के विरुद्ध कोई शर्तें या बाध्यताएं अंतर्वलित हैं ।
8. संस्थान और संस्थान निवेशों में सभी शिक्षण कार्य संस्थान द्वारा या उसके नाम से इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार किए जाएंगे ।
संस्थान में शिक्षण कार्य ।
9. ( 1 ) भारत का राष्ट्रपति संस्थान का कुलाध्यक्ष होगा ।
कुलाध्यक्ष ।
(2 ) कुलाध्यक्ष संस्थान या किसी संस्थान निवेश के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए और उसके कार्यकलापों की जांच करने के लिए और उन पर रिपोर्ट ऐसी रीति से देने के लिए, जैसे कुलाध्यक्ष निदेश दे, एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा ।
(3 ) किसी ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, कुलाध्यक्ष ऐसी कार्यवाही कर सकेगा और ऐसे निदेश जारी कर सकेगा, जो वह रिपोर्ट में विमर्शित किन्हीं विषयों के संबंध में आवश्यक समझे और संस्थान ऐसे निदेशों का अनुपालन करने के लिए आबद्धकर होगा ।
10. संस्थान के निम्नलिखित प्राधिकारी होंगे-
संस्थानके प्राधिकारी ।
(क ) शासी परिषद्
(ख) सिनेट; और
(ग) ऐसे अन्य प्राधिकारी जो परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकारी घोषित किए जाएं ।
शासी परिषद्।
11. शासी परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी , अर्थात्ः-
(क) एक अध्यक्ष, जो कोई विख्यात शिक्षाविद्, वैज्ञानिक या प्रौद्योगिकीविद् या वृत्तिक या उद्योगपति होगा जिसे कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(ख) निदेशक, पदेन;
(ग ) भारत सरकार के राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान से संबद्ध मंत्रालय या विभाग में वित्तीय सलाहकार,
पदेन;
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पदेन; (घ ) भारत सरकार के राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान से संबद्ध मंत्रालय या विभाग में संयुक्त सचिव,
(ङ) भारत सरकार के उच्चतर शिक्षा से संबद्ध मंत्रालय या विभाग में संयुक्त सचिव से अनिम्न पंक्तिका एक प्रतिनिधि जिसे उस मंत्रालय या विभाग के सचिव द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, पदेन;
(च ) भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी से संबद्ध मंत्रालय या विभाग में संयुक्त सचिव से अनिम्न पंक्तिका एक प्रतिनिधि जिसे उस मंत्रालय या विभाग के सचिव द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, पदेन;
( छ) उस राज्य से एक प्रतिनिधि, जिसमें संस्थान निवेश अवस्थित है, जिसे राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(ज) पांच वृत्तिक, वास्तुविद्, इंजीनियरी, ललित कला, जन संपर्क माध्यम और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रत्येक से एक- एक जिन्हें केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
जाएगा; (झ) एक उत्कृष्ट डिजाइनर, जिसे कुलाध्यक्ष द्वारा केन्द्रीय सरकार के परामर्श से नामनिर्दिष्टकिया
(ञ) एक प्रबंध विशेषज्ञ, जिसे अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(ट) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का एक प्रतिनिधि, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(ठ) तीन व्यक्ति, जिन्हें ऐसी कंपनियों, फर्मों या व्यष्टियों द्वारा, जिन्होंने संस्थान को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई है या उसमें अंशदान किया है, सिफारिश किए गए व्यक्तियों में से सिनेट द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा:
परंतु ऐसे नामनिर्देशन के लिए अर्हक होने के लिए वित्तीय सहायता या अंशदान और अन्य अपेक्षाओं की अवसीमा ऐसी होगी जो परिनियमों में उपबंधित की जाए; और
(ड) प्रत्येक संस्थान निवेश का संकायाध्यक्ष, पदेन ।
12. ( 1 ) शासी परिषद् के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य ( पदेन सदस्य से भिन्न ) की पदावधि उसके नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की होगी ।
(2 ) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय किसी पदेन सदस्य की पदावधि तब तक जारी रहेगी जब तक वह उस पद को धारण करता है जिसके आधार पर वह सदस्य है ।
शासी परिषद्के अध्यक्ष और अन्य सदस्योंकी पदावधि, रिक्तियांऔर उनकोसंदेय भत्ते ।
(3 ) किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए शासी परिषद् के नामनिर्दिष्ट किसी सदस्य की पदावधि उस सदस्य की शेष अवधि तक जारी रहेगी जिसके स्थान पर उसे नामनिर्दिष्ट किया गया है ।
(4) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, बाहर जाने वाला सदस्य जब तक कि शासी परिषद् अन्यथा निदेश न दे या तब तक पद पर बना रहेगा, जब तक कि किसी अन्य व्यक्ति को उसके स्थान पर सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता ।
( 5 ) शासी परिषद् के सदस्य संस्थान से, ऐसे भत्तों के यदि कोई हों, हकदार होंगे , जो परिनियमों में उपबंधित किए जाएं, किंतु धारा 11 के खंड (ख ) और खंड ( ड) में निर्दिष्ट व्यक्तियों से भिन्न कोई भी सदस्य इस उपधारा के कारण किसी वेतन का हकदार नहीं होगा ।
शासी परिषद्की बैठक ।
13. शासी परिषद् वर्ष में कम से कम चार बार ऐसे स्थान और समय पर बैठकें करेगी और अपनी बैठकों में वह कार्य संचालन के संबंध में ऐसी प्रक्रिया नियमों का पालन करेगी जो शासी परिषद् द्वारा अवधारित किए जाएं।
शासी परिषद्की शक्तियांऔर कृत्य।
14. ( 1 ) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, शासी परिषद्, संस्थान के कार्यकलापों के साधारण अधीक्षण , निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगी और संस्थान की उन सभी शक्तियों का प्रयोग करेगी , जिनका इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा अन्यथा उपबंध नहीं किया गया है और उसको भारत का राजपत्र असाधारण
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सिनेट के कार्यों का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ।
(2 ) उपधारा ( 1 ) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, शासी परिषद्,-
(क) संस्थान के प्रशासन और कार्यकरण से संबंधित नीति विषयक प्रश्नों का विनिश्चय करेगी;
(ख) भारत में या भारत के बाहर किसी भी स्थान में नए संस्थान निवेश की स्थापना पर विनिश्चय
करेगी;
(ग) संस्थान में अध्ययन - पाठ्यक्रम संस्थित करेगी;
(घ ) शैक्षणिक और अन्य पद संस्थित करेगी और उन पर नियुक्तियां करेगी;
(ङ) परिनियम बनाएगी;
( च ) अध्यादेशों पर विचार करेगी और उन्हें उपांतरित या रद्द करेगी;
(छ) अगले वित्तीय वर्ष के लिए संस्थान , जिसके अंतर्गत प्रत्येक संस्थान निवेश भी है, की वार्षिक रिपोर्ट, उसके वार्षिक लेखाओं और बजट प्राक्कलनों पर, जैसे वह ठीक समझे, विचार करेगी और संकल्प पारित करेगी और उन्हें अपनी विकास योजनाओं के विवरण सहित केन्द्रीय सरकार को भेजेगी;
( ज ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगी और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे प्रदत्त या उस पर अधिरोपित किए जाएं ।
(3 ) शासी परिषद् को ऐसी समितियां नियुक्त करने की शक्ति होगी जो वह इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए तथा अपने कर्तव्यों का अनुपालन करने के लिए आवश्यक समझे ।
(4) शासी परिषद्को , केंद्रीय सरकार, राज्य सरकारों और भारत में या भारत के बाहर अन्य लोक या निजी संगठनों या व्यष्टियों के साथ, संस्थान के लिए पारस्परिक रूप से करार पाए गए निबंधनों और शर्तों पर विन्यास, अनुदान, संदान या दान सुनिश्चित करने और प्रतिगृहीत करने के लिए ठहराव करने की शक्ति होगी:
परंतु अनुदान , संदान या दान की शर्तें यदि कोई हों, संस्थान की प्रकृति या उद्देश्यों और इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत या विरोध में नहीं होंगी ।
( 5 ) शासी परिषद् को, सरकार ऐसे और अन्य लोक निकायों या प्राइवेट व्यष्टियों से, जो अंतरण के इच्छुक हैं, जंगम और स्थावर संपत्तियों , विन्यासों या अन्य निधियों को ऐसी किन्हीं तत्संबद्ध बाध्यताओं और वचनबंधों सहित, जो अधिनियम के उपबंध से असंगत न हों, क्रय द्वारा दान द्वारा , या ग्रहण करने अन्यथा ग्रहण करने या अर्जित करने की शक्ति होगी ।
(6 ) शासी परिषद्, इस प्रभाव के विनिर्दिष्ट संकल्प द्वारा अध्यक्ष को, कारबार के संचालन के लिए, अपनी उतनी शक्तियां प्रत्यायोजित कर सकेगी जितनी वह आवश्यक समझे ।
सिनेट ।
15. संस्थान की सिनेट निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर बनेगी, अर्थात्ः-
(क) निदेशक, पदेन, जो सिनेट का अध्यक्ष होगा;
(ख) प्रत्येक संस्थान निवेश का संकायाध्यक्ष , पदेन;
(ग) संस्थान और संस्थान निवेशों के ज्येष्ठ आचार्य;
(घ ) विज्ञान, इंजीनियरी और मानविकी क्षेत्रों में से प्रत्येक क्षेत्र के विख्यात शिक्षाविदों में से एक - एक व्यक्ति यथा तीन व्यक्ति , जो संस्थान के कर्मचारी न हों, अध्यक्ष द्वारा , निदेशक के परामर्श से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और उनमें से कम से कम एक महिला होगी;
(ङ) संस्थान का एक पूर्व छात्र, जिसे अध्यक्ष द्वारा निदेशक के परामर्श से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा; और
(च) कर्मचारिवृंद के उतने अन्य सदस्य जितने परिनियमों में अधिकथित किए जाएं ।
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भारत का राजपत्र असाधारण
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सिनेटके कृत्य ।
16. इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संस्थान की सिनेट के पास नियंत्रण और साधारण विनियमन होगा और वह संस्थान में, शिक्षण , शिक्षा और परीक्षा के मानकों के अनुरक्षण के लिए उत्तरदायी होगी और वह ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगी और ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करेगी जो परिनियमों द्वारा उसको प्रदत्त या उस पर अधिरोपित किए जाएं ।
17. ( 1 ) अध्यक्ष साधारणतया शासी परिषद् की बैठकों और संस्थान के दीक्षांत समारोहों की अध्यक्षता
करेगा ।
अध्यक्ष के कृत्य, शक्तियांऔर कर्तव्य ।
(2 ) अध्यक्ष का यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य होगा कि शासी परिषद् द्वारा किए गए विनिश्चयों को कार्यान्वित किया जाए ।
(3 ) अध्यक्ष ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे अन्य कृत्यों का अनुपालन करेगा जो उसे इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा सौंपे जाएं ।
निदेशक ।
18. ( 1 ) संस्थान के निदेशक की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा पांच वर्ष की अवधि के लिए ऐसी रीति में और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी जो विहित की जाएं ।
(2 ) निदेशक की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित चयन समिति की सिफारिशों पर की जाएगी।
(3 ) निदेशक संस्थान का प्रधान कार्यपालक अधिकारी होगा और-
(क) संस्थान के समुचित प्रशासन और शिक्षा देने तथा उसमें अनुशासन बनाए रखने;
(ख) सभी संस्थान निवेशों के कार्यकलापों का समन्वय करने;
(ग ) संस्थान और प्रत्येक संस्थान निवेश की विकास योजनाओं की जांच करने और उनमें से उन्हें अनुमोदित करने जो आवश्यक समझे जाएं और ऐसी अनुमोदित योजनाओं की वित्तीय विवक्षाओं को व्यापक रूप से उपदर्शित भी करने; और
(घ) संस्थान और प्रत्येक संस्थान निवेश वार्षिक बजट प्राक्कलनों की जांच करने और केन्द्रीय सरकार को उस प्रयोजन के लिए निधियां आबंटित करने की सिफारिश करने , के लिए उत्तरदायी होगा ।
(4 ) निदेशक ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा सौंपे जाएं ।
(5 ) निदेशक , शासी परिषद् को वार्षिक रिपोर्ट और लेखे प्रस्तुत करेगा ।
(6) केन्द्रीय सरकार को निदेशक को उसकी पदावधि के अवसान के पूर्व हटाने की यदि वह ऐसा करना समुचित समझे , शक्ति होगी ।
संकायाध्यक्ष ।
19. ( 1 ) प्रत्येक संस्थान निवेश के संकायाध्यक्ष की नियुक्ति ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी जो परिनियमों द्वारा अधिकथित की जाएं और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा अथवा निदेशक द्वारा सौंपे जाएं ।
(2 ) उपधारा ( 1 ) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रत्येक संस्थान निवेश का संकायाध्यक्ष निदेशक के परामर्श से संस्थान निवेश की सभी शैक्षणिक, प्रशासनिक, अनुसंधान संबंधी और अन्य क्रियाकलापों कोदेखेगा ।
कुलसचिव ।
20. ( 1 ) संस्थान के कुलसचिव की नियुक्ति ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी जो परिनियमों द्वारा अधिकथित की जाएं और वह संस्थान के अभिलेखों, सामान्य मुद्रा, निधियों और संस्थान की ऐसी अन्य संपत्ति का, जो शासी परिषद् उसके भारसाधन में सुपुर्द करे, अभिरक्षक होगा ।
(2 ) कुलसचिव शासी परिषद्, सिनेट और ऐसी समितियों के सचिव के रूप में कार्य करेगा जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
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(3 ) कुल सचिव अपने कृत्यों के समुचित निर्वहन के लिए निदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।
(4) कुल सचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा अथवा निदेशक द्वारा सौंपे जाएं ।
21. ऐसे प्राधिकारियों और अधिकारियों की उनसे भिन्न जिनका इसमें इसके पूर्व वर्णन किया गया है, शक्तियां और कर्तव्य परिनियमों द्वारा अवधारित किए जाएंगे ।
अन्य प्राधिकारियों औरअधिकारियोंकी शक्तियां और कर्तव्य ।
केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान ।
22. इस अधिनियम के अधीन संस्थान को अपने कर्तव्यों का दक्षतापूर्वक निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा , विधि द्वारा इस निमित्त किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, संस्थान को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशियों का और ऐसी रीति में संदाय करेगी, जो वह उचित समझे ।
संस्थान की निधि ।
23. ( 1 ) संस्थान एक निधि बनाए रखेगा जिसमें निम्नलिखित जमा किया जाएगा,
(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा दी गई सभी धनराशियां;
(ख ) संस्थान द्वारा प्राप्त सभी फीसें और अन्य प्रभार;
(ग) संस्थान द्वारा अनुदानों, दानों , संदानों, उपकृतियों , वसीयतों या अंतरणों द्वारा प्राप्त सभी धनराशियां; और
(घ) संस्थान द्वारा किसी अन्य रीति में या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त सभी धनराशियां ।
(2) निधि में जमा की गई सभी धनराशियों को ऐसे बैंकों में जमा किया जाएगा या उनका ऐसी रीति में विनिधान किया जाएगा जो संस्थान केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, विनिश्चित करे ।
(3) निधि का उपयोजन संस्थान के व्ययों को जिनके अन्तर्गत इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग और उसके कृत्यों के निर्वहन में उपगत व्यय भी हैं, चुकाने के लिए किया जाएगा ।
24. धारा 23 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार संस्थान को-
विन्यास निधि की स्थापना।
(क) एक विन्यास निधि और विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए किसी अन्य निधि की स्थापना करने का; और
(ख) अपनी निधि में से धन को विन्यास निधि में या किसी अन्य निधि में अंतरित करने का,
निदेश दे सकेगी ।
लेखे और संपरीक्षा ।
25. ( 1 ) संस्थान उचित लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का वार्षिक विवरण , जिसके अंतर्गत तुलनपत्र भी है, ऐसे साधारण निदेशों के अनुसार, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत के नियंत्रक - महालेखापरीक्षक से परामर्श करके जारी किए जाएं, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा , जैसा विहित किया जाए ।
(2) संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा, भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और उस संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3 ) भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक और संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के उस संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे , जो साधारणतया नियंत्रक महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और उसे विशिष्टतया बहियां, लेखे , संबंधित वाउचर और अन्य दस्तावेज तथा कागजपत्र पेश किए जाने की मांग करने और संस्थान के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक- महालेखापरीक्षक द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्तिद्वारा यथाप्रमाणित संस्थान के लेखे , उनकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
पेंशन और भविष्य
निधि।
26. ( 1 ) संस्थान अपने कर्मचारियों के , जिनके अंतर्गत निदेशक भी है, फायदे के लिए ऐसी पेंशन , बीमा , भविष्य निधियां, जो वह ठीक समझे, ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों में अधिकथित कीजाएं, गठित करेगा ।
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[भाग 2- 12
1925 का 19 (2 ) जहां उपधारा ( 1 ) के अधीन किसी भविष्य निधि का गठन किया गया है, वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह कोई सरकारी भविष्य निधि है ।
कर्मचारिवृंदकी नियुक्ति।
27. संस्थान के कर्मचारिवृंद की सभी नियुक्तियां, निदेशक की नियुक्ति के सिवाय , परिनियमों में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार निम्नलिखित द्वारा की जाएंगी-
(क) शासी परिषद्, यदि नियुक्ति शैक्षणिक कर्मचारिवृंद में ज्येष्ठ डिजाइनर या आचार्य के या उससेऊपर के पद पर की जानी है या यदि नियुक्ति गैर शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के किसी काडर में की जानी हैतो जिसका अधिकतम वेतनमान वही या उससे अधिक है जो कि ज्येष्ठ डिजाइनर या आचार्य का है; और
(ख) निदेशक, किसी अन्य मामले में ।
परिनियम ।
28. इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-
(क) सम्मानिक उपाधियों का प्रदान किया जाना;
(ख) अध्यापन विभागों का बनाया जाना, कार्यशालाओं, प्रयोगशालाओं और स्टुडियो की स्थापना;
(ग) संस्थान, जिसमें संस्थान निवेश भी है, में पाठ्यक्रमों के लिए और संस्थान की डिग्रियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्र परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीसें;
जाना; (घ) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र- सहायता वृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थित किया
(ङ) संस्थान के शिक्षकों की अर्हताएं;
(च) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद का वर्गीकरण, उनकी नियुक्तिकी पद्धति और सेवा के निबंधनों और शर्तों का अवधारण;
(छ ) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के व्यक्तियों के लिए पदों का आरक्षण , जैसे केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित किया जाए;
(ज) संस्थान के अधिकारियों , शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद के फायदे के लिए पेंशन, बीमा और भविष्य निधियों का गठन;
(झ ) संस्थान और संस्थान निवेशों के प्राधिकारियों का गठन, उनकी शक्तियां और कर्तव्य;
(ञ) छात्र निवासों और छात्रावासों की स्थापना और अनुरक्षण;
(ट) संस्थान के छात्रों के निवास की शर्तें तथा छात्र निवासों और छात्रावासों में निवास के लिए फीस और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण;
(ठ) शासी परिषद् के सदस्यों में की रिक्तियों को भरने की रीति;
(ड) शासी परिषद् के अध्यक्ष और सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;
(ढ ) शासी परिषद् के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन;
( ण ) शासी परिषद्, सिनेट या किसी समिति की बैठकें , ऐसी बैठकों में गणपूर्ति और उनके कारबार केसंचालन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(त) कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम के द्वारा परिनियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
अनुभाग 1 क]
भारत का राजपत्र असाधारण
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29. ( 1 ) संस्थान के प्रथम परिनियमों की विरचना शासी परिषद् द्वारा कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से की जाएगी और उसकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे ।
(2) शासी परिषद् समय- समय पर नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगी या परिनियमों को इस धारा में इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति में संशोधित या निरसित कर सकेगी ।
( 3) प्रत्येक नए परिनियम या परिनियमों में परिवर्धन या किसी परिनियम के संशोधन या निरसन के लिए कुलाध्यक्ष का पूर्व अनुमोदन अपेक्षित होगा जो उस पर अनुमति दे सकेगा या अनुमति को विधारित कर सकेगा या उसे परिषद् को विचार करने के लिए वापस भेज सकेगा ।
(4) कोई नया परिनियम या विद्यमान परिनियम का संशोधन या निरसन करने वाला परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि उस पर कुलाध्यक्ष द्वारा अनुमति न दे दी गई हो ।
अध्यादेश।
30. इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संस्थान के अध्यादेशों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-
(क ) संस्थान, जिसके अंतर्गत संस्थान निवेश भी है, में छात्रों का प्रवेश;
(ख) संस्थान के विभिन्न पाठ्यक्रमों या कार्यक्रमों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण ;
(ग) संस्थान की सभी उपाधियों , डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;
(घ) वे शर्तें जिनके अधीन छात्रों को संस्थान की उपाधि, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों तथा परीक्षाओं में प्रवेश दिया जाएगा तथा उपाधियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों का प्रदान किया जाना;
शर्तें; (ङ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायतावृत्तियां , पदक और पुरस्कार प्रदान किए जाने की
(च) परीक्षा निकाय , परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और रीति तथा कर्तव्य;
(छ) परीक्षाओं का संचालन;
(ज) संस्थान के छात्रों के बीच अनुशासन बनाए रखना; और
(झ) कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम या परिनियमों के द्वारा अध्यादेशों द्वारा उपबंधित किया जाना है या उपबंधित किया जाए ।
31. ( 1 ) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, अध्यादेश सिनेट द्वारा बनाए जाएंगे । अध्यादेशकिस प्रकार बनाए जाएंगे ।
( 2 ) सिनेट द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश उस तारीख से प्रभावी होंगे जो वह निर्दिष्ट करे किन्तु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश यथाशीघ्र शासी परिषद् को प्रस्तुत किया जाएगा और शासी परिषद् द्वारा उस पर उसकी अगली बैठक में विचार किया जाएगा ।
( 3) शासी परिषद् को संकल्प द्वारा ऐसे किसी अध्यादेश को उपांतरित या रद्द करने की शक्ति होगी और ऐसा अध्यादेश ऐसे संकल्प की तारीख से तदनुसार, यथास्थिति, उपांतरित या रद्द किया गया समझा जाएगा ।
माध्यस्थम् अधिकरण ।
32. ( 1 ) संस्थान और उसके किसी कर्मचारी के बीच किसी संविदा से उद्भूत होने वाले किसी विवाद को संबंधित कर्मचारी के अनुरोध पर या संस्थान के आग्रह पर माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा जो संस्थान द्वारा नियुक्त एक सदस्य और कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य तथा कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक से मिलकर बनेगा ।
जाएगा । (2) माध्यस्थम् अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और उसे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 14
(3 ) ऐसे किसी मामले की बाबत जिसे उपधारा ( 1 ) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किए जाने की अपेक्षा है किसीन्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं होगी ।
(4) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(5 ) माध्यस्थम् से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में की कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थम् को लागूनहीं होगी ।
अध्याय 3
प्रकीर्ण
33. संस्थान या शासी परिषद् या सिनेट या इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन गठित किसी अन्य प्राधिकारी का कोई कार्य केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि-
(क) उसमें कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या
रिक्तियों, आदि द्वारा कार्यों और कार्यवाहियोंका अविधिमान्य न होना ।
(ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के चयन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या
है। (ग) उसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणावगुण पर प्रभाव नहीं डालती
प्रत्योजितस्कीमें ।
34. इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को जब कभी सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या किसी अन्य अभिकरण से जिसके अंतर्गत ऐसा उद्योग भी है जो संस्थान द्वारा निष्पादित या विन्यासित की जाने वाली किसी अनुसंधान स्कीम या किसी परामर्शकारी कार्यक्रम या किसी शिक्षण कार्यक्रम या किसी पीठासीन आचार्य पद या किसी छात्रवृत्ति आदि को प्रायोजित करता है, निधियां प्राप्त होती हैं तो-
(क) प्राप्त रकम को संस्थान द्वारा संस्थान की निधि से पृथक् रखा जाएगा और उसका उपयोग केवल उसी प्रयोजन के लिए किया जाएगा ; और
(ख) उसको निष्पादित करने के लिए अपेक्षित कर्मचारिवृंद की भर्ती प्रायोजक संगठनों द्वारा नियत निबंधनों और शर्तों के अनुसार की जाएगीः
परंतु यह कि अनुपयोजित किसी धन को इस अधिनियम की धारा 24 के अधीन स्थापित विन्यास निधि में अंतरित कर दिया जाएगा ।
डिग्रियां आदि प्रदान करनेकी संस्थान की शक्ति।
35. संस्थान को इस अधिनियम के अधीन डिग्रियां, डिप्लोमे, प्रमाणपत्र और विद्या संबंधी अन्य विशेष उपाधियां प्रदान करने की शक्ति होगी, जो कि तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन स्थापित या निगमित किसी विश्वविद्यालय या संस्थान द्वारा प्रदान की गई ऐसी तत्स्थानी डिग्रियों, डिप्लोमाओं, प्रमाणपत्रों और विद्या संबंधी अन्य विशेष उपाधियों के समतुल्य होंगी ।
36. केन्द्रीय सरकार, संस्थान को इस अधिनियम के प्रभावी प्रशासन के लिए निदेश जारी कर सकेगी और संस्थान ऐसे निदेशों का पालन करेगा ।
निदेश देनेकी केंद्रीय सरकार की शक्ति।
2005 का 22 37. सूचना का अधिकार अधिनियम , 2005 के उपबंध संस्थान को उसी रूप में लागू होंगे मानो वह सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2 के खंड ( ज ) के अधीन परिभाषित लोक प्राधिकारी हो ।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अधीन संस्थान कालोक प्राधिकारी होना।
38. ( 1 ) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम अधिसूचना द्वारा , बना सकेगी ।
नियमबनाने की केन्द्रीय सरकार कीशक्ति।
भारत का राजपत्र असाधारण
15 अनुभाग 1 क]
(2 ) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा,-
(क) धारा 18 की उपधारा ( 1 ) के अधीन निदेशक की नियुक्ति की रीति और उसकी सेवा के निबंधन और शर्तें;
(ख) वह प्ररूप और रीति जिसमें धारा 25 की उपधारा ( 1 ) के अधीन संस्थान की लेखा पुस्तकें रखी जाएंगी;
( ग ) ऐसा कोई अन्य विषय , जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।
(3 ) केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र , संसद् के प्रत्येक सदनके समक्ष , जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
39. इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी-
संक्रमणकालीन उपबंध।
(क ) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व संस्थान के रूप में कार्य कर रही शासी परिषद्तब तक इस प्रकार कार्य करना जारी रखेगी जब तक कि इस अधिनियम के अधीन संस्थान के लिए नई शासी परिषद्का गठन नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नई शासी परिषद् के गठन पर ऐसे गठन के पूर्व पद धारण करने वाले शासी परिषद् के सदस्य, पद पर नहीं रह जाएंगे;
(ख) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व उस रूप में कार्य कर रही नीति और योजना समिति को इस अधिनियम के अधीन गठित सिनेट समझा जाएगा और वह तब तक इस प्रकार कार्य करती रहेगी जब तक इस अधिनियम के अधीन संस्थान के लिए नई सिनेट का गठन नहीं कर दिया जाता;
(ग ) जब तक इस अधिनियम के अधीन प्रथम परिनियम या अध्यादेश नहीं बनाए जाते तब तक इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त सोसाइटी के नियम और विनियम , अनुदेश, मार्गदर्शक सिद्धांत और उपविधियां संस्थान को और, यथास्थिति , बेंगलूरू या गांधीनगर स्थित संस्थान निवेशों को, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं, लागू बनी रहेंगी ।
40. ( 1 ) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम या अध्यादेश राजपत्र में प्रकाशित किया
जाएगा ।
परिनियमों और अध्यादेशोंका राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और संसद् के समक्ष रखा जाना ।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम या अध्यादेश , बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र , संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो , कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस परिनियम या अध्यादेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो , तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह परिनियम या अध्यादेश नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु परिनियम या अध्यादेश के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
( 3) परिनियम या अध्यादेश बनाने की शक्ति में , उस तारीख से, जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्वतर की न हो , परिनियमों या अध्यादेशों या उनमें से किसी को भूतलक्षी रूप से प्रभावी करने की शक्ति भी है किन्तु ऐसे किसी परिनियम या अध्यादेश को भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा जिससे ऐसे किसी व्यक्ति के, जिसे ऐसे परिनियम या अध्यादेश लागू हो, हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
16
कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति।
41. ( 1 ) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी या ऐसे निदेश दे सकेगी जो इस अधिनियम के प्रयोजनों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक और समीचीन प्रतीत हों:
परंतु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2 ) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
17
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान
अधिनियम, 2014
(2014 का अधिनियम संख्यांक 30)
[8 दिसम्बर , 2014]
कतिपय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थाओं को, सूचना प्रौद्योगिकी में नई जानकारी का विकास करने की दृष्टि से राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने और सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए विश्व स्तर की जन शक्ति का उपबंध करने और ऐसी संस्थाओं से संबद्ध या उसके आनुषंगिक कतिपय अन्य विषयों का उपबंध करने के लिए अधिनियम
भारत गणराज्य के पैंसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
अध्याय 1
प्रारंभिक
प्रारंभ ।
1. ( 1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान संक्षिप्त नाम और अधिनियम, 2014 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार , राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , नियत करे ।
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 18
2. अनुसूची में वर्णित संस्थाओं के उद्देश्य ऐसे हैं, जो उन्हें राष्ट्रीय महत्व की संस्थाएं बनाते हैं, अतः यह घोषित किया जाता है कि प्रत्येक ऐसी संस्था, राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।
कतिपय संस्थाओं की राष्ट्रीय महत्व की संस्थाओं के रूप में घोषणा ।
परिभाषाएं ।
3. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) किसी संस्थान के संबंध में "बोर्ड" से धारा 13 की उपधारा (1 ) में निर्दिष्ट शासक बोर्ड अभिप्रेत है;
(ख) "अध्यक्ष" से धारा 13 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त शासक बोर्ड का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ग) "परिषद्" से धारा 40 की उपधारा (1 ) के अधीन स्थापित परिषद् अभिप्रेत है;
(घ) "निदेशक " से संस्थान का निदेशक अभिप्रेत है;
(ङ) "विद्यमान संस्थान " से अनुसूची के स्तंभ (3 ) में वर्णित संस्थान अभिप्रेत है;
(च) "संस्थान" से अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित कोई संस्थान अभिप्रेत हैं;
(छ) "विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ज) "अनुसूची" से इस अधिनियम की अनुसूची अभिप्रेत है;
(झ) किसी संस्थान के संबंध में "सिनेट " से उसकी सिनेट अभिप्रेत है;
(ञ) किसी संस्थान के संबंध में "परिनियम" और "अध्यादेश " से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए उस संस्थान के परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं ।
अध्याय 2
संस्थान
संस्थानों का निगमन ।
4. (1 ) अधिनियम के प्रारंभ से ही प्रत्येक विद्यमान संस्थान अनुसूची के स्तंभ (5) में यथावर्णित उसी नाम से एक निगमित निकाय होगा ।
(2) अनुसूची के स्तम्भ (5 ) में निर्दिष्ट प्रत्येक विद्यमान संस्थान का शाश्वत् उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी , जिसको इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए , जंगम और स्थावर, दोनों ही प्रकार की संपत्ति का अर्जन , धारण तथा व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
5. इस अधिनियम के प्रारंभ से ही,-
संस्थानों के निगमन का प्रभाव।
(क) किसी संविदा या किसी अन्य लिखत में किसी सोसाइटी के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान के प्रति निर्देश है;
(ख) प्रत्येक विद्यमान संस्थान की या उसके स्वामित्व में की सभी संपत्तियां, चाहे जंगम हों या स्थावर, अनुसूची के स्तंभ (5 ) में वर्णित तत्समान संस्थान में निहित होंगी;
(ग) अनुसूची के स्तंभ (3 ) में वर्णित प्रत्येक विद्यमान संस्थान के सभी अधिकार और ऋण तथा अन्य दायित्व , अनुसूची के स्तंभ (5 ) में वर्णित तत्समान संस्थान को अंतरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार तथा दायित्व होंगे;
(घ) अनुसूची के स्तंभ (3 ) में वर्णित प्रत्येक विद्यमान संस्थान द्वारा ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा, अनुसूची के स्तंभ (5 ) में वर्णित तत्समान भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
19
संस्थान में उसी सेवाधृति पर उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर तथा पेंशन, छुट्टी, उपदान , भविष्य निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों तथा विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसा कि वह उस दशा में उसको धारण करता जिसमें यह अधिनियम, अधिनियमित नहीं किया जाता और तब तक उसी प्रकार धारण करता रहेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसकी सेवा की अवधि, पारिश्रमिक और निबंधन तथा शर्तें परिनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं :
परन्तु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन, ऐसे कर्मचारी को स्वीकार नहीं है तो उसका नियोजन, संस्थान द्वारा कर्मचारी के साथ की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार समाप्त किया जा सकेगा या यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया गया है तो स्थायी कर्मचारियों की दशा में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारियों की दशा में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर का संस्थान द्वारा उसको संदाय करके समाप्त किया जा सकेगा :
परन्तु यह और कि अनुसूची के स्तम्भ (3) में वर्णित किसी भी विद्यमान संस्थान के निदेशक, रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारी के प्रति तत्समय प्रवृत्त किसी विधि या किसी लिखत या अन्य दस्तावेज में किसी निर्देश का, चाहे शब्दों के किसी भी रूप में हो, अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह अनुसूची के स्तम्भ (5) में वर्णित तत्स्थानी संस्थान के निदेशक, रजिस्ट्रार और अधिकारी के प्रतिनिर्देश है;
(ङ) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अनुसूची के स्तंभ (3 ) में वर्णित प्रत्येक विद्यमान संस्थान में किसी विद्या या अनुसंधान पाठ्यक्रम का अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उक्त अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान में , ऐसे संस्थान से, जिससे ऐसे व्यक्ति ने प्रवास किया है, पाठ्यक्रम के समान स्तर पर, प्रवासित और रजिस्ट्रीकृत किया गया समझा जाएगा;
(च) इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व स्तंभ (3) में वर्णित विद्यमान संस्थान द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित या जो संस्थित किए जा सकते थे, सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान द्वारा या उसके विरुद्ध जारी या संस्थित रह सकेंगी।
6. प्रत्येक संस्थान के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे , अर्थात्ः-
संस्थान के उद्देश्य ।
(क) सूचना प्रौद्योगिकी और ज्ञान के सहबद्ध क्षेत्रों में प्रमुख संस्थाओं में से उभर कर आना;
(ख ) विश्व के पटल पर राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी और सहबद्ध क्षेत्रों में नए ज्ञान और नवप्रवर्तन में अभिवृद्धि करना;
(ग) देश की ज्ञान संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने और सूचना प्रौद्योगिकी और सहबद्ध क्षेत्रों में विश्वव्यापी नेतृत्व प्रदान करने के लिए सामाजिक और पर्यावरणीय अभिविन्यास के साथ
नवप्रवर्तन और उद्यमशीलता की भावना से ओत-प्रोत सक्षम और योग्य युवाओं का विकास करना; (घ) प्रवेश, विभिन्न पदों पर नियुक्ति, शैक्षणिक मूल्यांकन, प्रशासन और वित्त से संबंधित
विषयों में उच्चतम श्रेणी की पारदर्शिता का संवर्धन और प्रबंध करना ।
7. (1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक संस्थान, निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग और निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात्:-
संस्थान की शक्तियां और कृत्य ।
(क) शिक्षा में अभिवृद्धि और ज्ञान के प्रसार के लिए सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित ज्ञान के ऐसे क्षेत्रों और उससे सहबद्ध ऐसे क्षेत्रों में, जो ऐसा संस्थान ठीक समझे, शिक्षण के लिए व्यवस्था करना;
(ख) सूचना प्रौद्योगिकी और ज्ञान के सहबद्ध क्षेत्रों में अनुसंधान और नवीकरण का, ऐसी रीति से जो संस्थान ठीक समझे मार्गदर्शन करना , उनका आयोजन और संचालन करना, जिसके भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 20
अन्तर्गत किसी अन्य संस्थान , शिक्षण संस्था, अनुसंधान संगठन या निगमित निकाय के साथ सहयोग या सहयोजन भी है:
(ग) परीक्षाएं आयोजित करना और डिग्रियां , डिप्लोमा तथा अन्य शिक्षा संबंधी उपाधियां या पदवियां प्रदान करना और मानद् डिग्रियां प्रदान करना;
(घ) संस्थान द्वारा अपेक्षित ऐसे पदनामों के साथ, जो वह ठीक समझे, शिक्षण, अनुसंधान या अन्य शैक्षणिक पदों की स्थापना करना और निदेशक के पद से भिन्न ऐसे पदों पर सेवाधृति, अवधि पर या अन्यथा व्यक्तियों को परिषद् द्वारा अधिकथित नीति के अनुसार नियुक्त करना;
(ङ) ऐसे व्यक्तियों की, जो किसी अन्य संस्थान या शिक्षण संस्था में कार्यरत हैं या किसी उद्योग में संस्थान के अनुबद्ध , अतिथि या अभ्यागत संकाय सदस्यों के रूप में महत्वपूर्ण अनुसंधान में लगे हुए हैं, ऐसे निबंधनों पर और ऐसी अवधि के लिए जो संस्थान द्वारा विनिश्चित की जाए , नियुक्ति करना;
(च) प्रशासनिक और अन्य पद सृजित करना तथा उन पर परिषद् द्वारा अधिकथित नीति के अनुसार नियुक्तियां करना;
(छ) अनुसंधान से प्राप्त ज्ञान के प्रसार के लिए व्यवस्था करना और उस प्रयोजन के लिए ऐसे ठहराव करना जिनमें ऐसे अन्य संस्थान, उद्योग , सिविल सोसाइटी या अन्य संगठनों के साथ परामर्श और सलाहकारी सेवाएं भी सम्मिलित हैं, जो संस्थान आवश्यक समझे;
(ज) वेबसाइट सृजित करना, ऐसी सूचना पर बल देना, जो छात्रों, प्रवेश, फीस , प्रशासनिक ढांचा, नीतियां, जिसके अन्तर्गत भर्ती नियम , संकाय और गैर संकाय पद, वार्षिक रिपोर्ट तथा संस्थान के लेखा विवरण सहित वित्तीय ब्यौरे भी हैं, से संबंधित होने तक निर्बन्धित नहीं है;
(झ) व्यक्ति, संस्था या निगमित निकाय से सेवाओं के लिए, जिनमें संस्थान द्वारा प्रदान किया गया प्रशिक्षण, परामर्श तथा सलाहकारी सेवाएं सम्मिलित हैं, ऐसे प्रभार, जो संस्थान ठीक समझे अवधारित करना, विनिर्दिष्ट करना तथा उनके संदाय प्राप्त करना;
(ञ) संस्थान की या उसमें निहित किसी संपत्ति का ऐसी रीति से व्यवहार करना जो संस्थान , संस्थान उद्देश्यों की अभिवृद्धि करने के लिए ठीक समझे:
परन्तु जहां संस्थान को कोई भूमि, राज्य सरकार द्वारा निःशुल्क प्रदान की गई है वहां ऐसी भूमि केवल, ऐसी राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से ही व्ययनित की जा सकेगी;
(ट) सरकार से दान, अनुदान, संदान या उपकृति प्राप्त करना तथा, यथास्थिति, वसीयतकर्ताओं, संदानकर्ताओं या अंतरकों से जंगम या स्थावर संपत्तियों की वसीयत, संदान और अंतरण प्राप्त करना;
(ठ) विश्व के किसी भाग में संस्थान के पूर्णतः या भागतः समरूप उद्देश्य रखने वाले शैक्षणिक या अन्य संस्थाओं के शिक्षकों और विद्वानों के आदान-प्रदान द्वारा और साधारणतः ऐसी रीति में सहयोग करना जो सामान्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सहायक हो;
(ड) ऐसी अवसंरचना स्थापित करना और उसको बनाए रखना, जो संस्थान के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हो;
(ढ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायता वृत्तियां, पुरस्कार और पदक संस्थित करना और प्रदान करना;
(ण) तकनीकी शिक्षा संस्थाओं की सहायता करके राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों की प्रोद्यौगिक आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करना; और
(त) ऐसी अन्य सभी बातें करना जो संस्थान के सभी या किन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।
भारत का राजपत्र असाधारण
21 अनुभाग 1 क]
(2) खंड (ञ) में किसी बात के होते हुए भी कोई संस्थान, कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन के बिना किसी स्थावर संपत्ति का किसी भी रीति से व्ययन नहीं करेगा ।
8. (1 ) प्रत्येक संस्थान सभी व्यक्तियों के लिए खुला होगा चाहे वे किसी भी लिंग , जाति , पंथ, निःशक्तता, अधिवास; नस्ल, सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि के हों ।
संस्थानों का सभी मूलवंशों, पंथों और वर्गों के लिए खुला होना ।
(2) किसी भी संस्थान द्वारा किसी ऐसी संपत्ति की वसीयत , संदान या अंतरण स्वीकार नहीं किया जाएगा जो परिषद् की राय में ऐसी शर्तों या बाध्यताओं को अन्तर्वलित करता है जो इस धारा के भाव और उद्देश्य के प्रतिकूल हैं ।
(3) प्रत्येक संस्थान में अध्ययन के प्रत्येक कार्यक्रम में प्रवेश , ऐसे संस्थान द्वारा प्रवेश की प्रक्रिया के प्रारंभ से पूर्व उसके प्रोस्पेक्टस के माध्यम से प्रकट पारदर्शी और युक्तियुक्त मानदंड के माध्यम से निर्धारित योग्यता पर आधारित होगा:
2007 का 5
परंतु प्रत्येक ऐसा संस्थान, केन्द्रीय शिक्षा संस्था (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006 के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय शिक्षा संस्था होगी ।
संस्थान में
शिक्षण ।
9. प्रत्येक संस्थान में सभी प्रकार के शिक्षण , इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार संस्थान के नाम से संचालित किए जाएंगे ।
संस्थान का 10. प्रत्येक संस्थान गैर लाभकारी विधिक अस्तित्व होगा और ऐसे संस्थान में इस अधिनियम के अधीन उसके प्रचालनों के संबंध में सभी व्ययों की पूर्ति के पश्चात् राजस्व के अधिशेष का भाग , यदि कोई है, ऐसे संस्थान की वृद्धि और विकास से या उसमें अनुसंधान संचालित करने से भिन्न किसी अन्य प्रयोजन के लिए विनिहित नहीं किया जाएगा ।
सुभिन्न गैर लाभकारी विधिक अस्तित्व होना ।
11. (1 ) भारत के राष्ट्रपति प्रत्येक संस्थान के कुलाध्यक्ष होंगे ।
कुलाध्यक्ष ।
(2) कुलाध्यक्ष, किसी संस्थान के कामकाज और प्रगति के पुनर्विलोकन के लिए और उनके कार्यों की जांच करने और उन पर ऐसी रीति में रिपोर्ट देने के लिए , जैसा कुलाध्यक्ष निदेश दे, एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा ।
(3) ऐसी किसी रिपोर्ट के प्राप्त होने पर , कुलाध्यक्ष ऐसी कार्रवाई कर सकेगा और ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह रिपोर्ट में चर्चित मामलों में से किसी के संबंध में आवश्यक समझे और संस्थान ऐसे निदेशों का युक्तियुक्त समय के भीतर पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
अध्याय 3
केंद्र द्वारा वित्तपोषित भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के प्राधिकरण
12. संस्थान के निम्नलिखित प्राधिकरण होंगे , अर्थात्ः-
संस्थान के प्राधिकरण ।
(क) शासक बोर्ड;
(ख) सिनेट;
(ग) वित्त समिति;
(घ) भवन और संकर्म समिति;
(ङ) अनुसंधान परिषद्ः
जाए । (च) ऐसे अन्य प्राधिकरण जिनको परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकरण होना घोषित किया [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
22
शासक बोर्ड ।
13. (1 ) प्रत्येक संस्थान का शासक बोर्ड, संस्थान का प्रधान कार्यकारी निकाय होगा ।
(2) प्रत्येक संस्थान के शासक बोर्ड में निम्नलिखित सदस्य होंगे , अर्थात्ः-
(क) एक अध्यक्ष, जो केंद्रीय सरकार द्वारा सिफारिश किए गए तीन नामों के पैनल में से कुलाध्यक्ष द्वारा किसी एक विख्यात प्रौद्योगिकीविद् या उद्योगपति या शिक्षाविद् को नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(ख) उस राज्य का, जिसमें संस्थान अवस्थित है, सूचना प्रौद्योगिकी या उच्चतर शिक्षा का भारसाधक सचिव- पदेन;
(ग) भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान से संबंधित भारत सरकार के उच्चतर शिक्षा विभाग का एक प्रतिनिधि- पदेन;
(घ) संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय , भारत सरकार का एक प्रतिनिधि- पदेन;
(ङ) केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का निदेशक;
(च) केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट, भारतीय प्रबंध संस्थान का निदेशक;
(छ) सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरी या विज्ञान या सहबद्ध क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले चार व्यक्ति, जिनको परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(ज) सिनेट द्वारा नामनिर्दिष्ट संस्थान के दो आचार्य;
(झ) संस्थान का निदेशक, पदेन;
(ञ) रजिस्ट्रार, पदेन सचिव ।
14. (1 ) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय बोर्ड के अध्यक्ष या पदेन सदस्यों से भिन्न अन्य सदस्यों की पदावधि उनके नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की कालावधि के लिए होगी ।
(2) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को जिसके आधार पर वह सदस्य है, धारण करता है ।
बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, रिक्तियां और उनको संदेय भत्ते।
(3) धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्य की पदावधि, उसके नामनिर्देशन की तारीख से दो वर्ष के लिए होगी ।
(4) पदेन सदस्य से भिन्न, बोर्ड का कोई सदस्य , जो बोर्ड की लगातार तीन बैठकों में उपस्थित होने में असफल रहता है, बोर्ड का सदस्य नहीं रहेगा ।
(5) इस धारा में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी सेवा छोड़ने वाला कोई सदस्य , जब तक परिषद् ऐसा निदेश न दे, तब तक पद पर बना रहेगा जब तक उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति को सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता ।
(6) बोर्ड के सदस्य , बोर्ड की या जो संस्थान द्वारा आयोजित की जाएं, बैठकों में उपस्थित होने के लिए ऐसे भत्तों के हकदार होंगे जो परिनियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
शासक बोर्ड की शक्तियांऔर कृत्य ।
15. (1 ) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए , प्रत्येक संस्थान का बोर्ड, संस्थान के कार्यकलापों के साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगा और उसको धारा 6 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संस्थान के कार्यकलापों को शासित करने वाले परिनियमों या अध्यादेशों को विरचित करने, संशोधित करने , उपांतरित करने या विखंडित करने की शक्ति होगी ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
23
(2) उपधारा (1 ) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड को निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्:-
करना; (क) संस्थान की प्रशासन और कार्यकरण से संबंधित नीति के प्रश्नों का विनिश्चय
(ख) संस्थान में विभागों , संकायों या अध्ययन विद्यापीठों की स्थापना करना और कार्यक्रमों या अध्ययन पाठ्यक्रमों को आरंभ करना;
(ग) ऐसे संस्थान के वार्षिक बजट प्राक्कलनों की परीक्षा और अनुमोदन करना;
(घ) ऐसे संस्थान के विकास के लिए योजना की परीक्षा और अनुमोदन करना और योजना के क्रियान्वयन के लिए वित्त के स्रोतों की पहचान करना;
(ङ) शिक्षण और अन्य शैक्षणिक पदों को सृजित करना , ऐसे पदों की संख्या और उनकी उपलब्धियां परिनियमों द्वारा अवधारित करना और शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के कर्तव्यों और उनकी सेवा शर्तों को परिभाषित करना:
परंतु बोर्ड, सिनेट की सिफारिशों पर विचार करने से भिन्न कोई कार्रवाई नहीं करेगा;
(च) ऐसे संस्थान में शैक्षिक और अन्य पदों पर नियुक्ति की अर्हताएं, मानदंड और प्रक्रियाएं परिनियमों द्वारा उपबंधित करना;
(छ) संस्थान में अध्ययन करने के लिए मांगी जाने वाली फीसें और अन्य प्रभार परिनियमों द्वारा नियत करना;
बनाना; (ज) संस्थान के प्रशासन, प्रबंधन और प्रचालनों को शासित करने के लिए परिनियम
(झ) इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसको प्रदत्त या उस पर अधिरोपित अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और अन्य कर्तव्यों का पालन करना ।
(3) बोर्ड को, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए ऐसी समितियां नियुक्त करने की शक्ति होगी, जो वह आवश्यक समझे ।
(4) बोर्ड, संस्थान के उद्देश्यों की प्राप्ति के संदर्भ में निदेशक के नेतृत्व के विनिर्दिष्ट संदर्भ में उसके कार्यों का वार्षिक पुनर्विलोकन करेगा ।
(5) जहां निदेशक या अध्यक्ष की राय में स्थिति इस प्रकार आपातिक है कि संस्थान के हित में तत्काल कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है, वहां अध्यक्ष, निदेशक के परामर्श से उसकी राय के लिए कारण को अभिलिखित करने के पश्चात् ऐसे आदेश जारी कर सकेगा, जो आवश्यक हों:
परंतु ऐसे आदेश बोर्ड की आगामी बैठक में अनुसमर्थन के लिए रखे जाएंगे ।
सिनेट ।
16. (1 ) प्रत्येक संस्थान के सिनेट में निम्नलिखित व्यक्ति के होंगे , अर्थात्:-
(क) संस्थान का निदेशक , पदेन अध्यक्ष;
(ख) उप निदेशक, पदेन;
(ग) संकायाध्यक्ष, पदेन;
(घ) संस्थान के विभागाध्यक्ष, पदेन;
(ङ) संकायाध्यक्षों और विभागाध्यक्षों से भिन्न सभी आचार्य;
(च) ख्यातिप्राप्त शिक्षाविदों या संस्थान के क्रियाकलापों से संबंधित अन्य क्षेत्रों के व्यक्तियों में से तीन व्यक्ति जो संस्थान की सेवा में नहीं हैं, जो कि शासक बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे;
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[भाग 2 24
(छ) ऐसे तीन व्यक्ति जो शैक्षिक कर्मचारिवृंद के सदस्य नहीं हैं जिन्हें उनके विशेषीकृत ज्ञान के लिए सिनेट द्वारा सहयोजित किया जाए;
(ज) संस्थान का रजिस्ट्रार, पदेन सचिव ।
(2) पदेन सदस्यों से भिन्न सदस्यों की पदावधि उनके नामनिर्देशन की तारीख से दो वर्ष होगी ।
(3) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को, जिसके आधार पर वह सदस्य है , धारण करता है ।
सिनेट की शक्तियां और कृत्य ।
17. (1 ) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सिनेट, संस्थान का प्रधान शैक्षणिक निकाय होगा और उसको शैक्षणिक विषयों तथा संस्थान के छात्रों के कार्यकलाप और कल्याण को शासित करने वाले अध्यादेशों को अधिनियमित , संशोधित या उपांतरित करने की शक्ति होगी।
(2) उपधारा (1 ) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना सिनेट के पास निम्नलिखित शक्तियां होंगी , अर्थात्ः-
(क) संस्थान द्वारा प्रस्थापित अध्ययन के पाठ्यक्रमों या कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए मानदंड और प्रक्रिया विनिर्दिष्ट करना;
(ख) शिक्षण और अन्य शैक्षणिक पदों को सृजित करने के लिए बोर्ड को सिफारिश करना, ऐसे पदों की संख्या और उपलब्धियों का अवधारण करना और अध्यापकों और अन्य शैक्षणिक पदों के कर्तव्य तथा सेवा की शर्तें परिभाषित करना;
करना; (ग) नए कार्यक्रमों या अध्ययन के पाठ्यक्रमों के प्रारंभ के बारे में बोर्ड को सिफारिश
(घ) कार्यक्रमों और अध्ययन के पाठ्यक्रमों की विस्तृत शैक्षणिक अंतर्वस्तु को विनिर्दिष्ट करना और उसमें उपांतरणों का जिम्मा लेना;
(ङ) शैक्षणिक कलैन्डर विनिर्दिष्ट करना और डिग्रियों, डिप्लोमाओं और अन्य शैक्षणिक उपाधियों और पदवियों को दिए जाने का अनुमोदन करना;
(च) विभिन्न परीक्षाओं के लिए परीक्षकों, अनुसीमकों, सारणीकारों और ऐसे अन्य कार्मिकों कोनियुक्तकरना;
(छ) डिप्लोमाओं और डिग्रियों या विश्वविद्यालयों या अन्य संस्थानों को मान्यता प्रदान करना और संस्थान के डिप्लोमाओं या डिग्रियों की समतुल्यता अवधारित करना;
(ज) विभागीय समन्वय के उपाय सुझाना;
(झ) शासक बोर्ड को निम्नलिखित पर मुख्य सिफारिशें करना
(क) शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान के स्तर में सुधार के उपाय;
(ख) पदों, अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, अध्ययनवृत्तियों, निःशुल्कवृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थान और अन्य संबंधित विषय;
(ग) विभागों या केन्द्रों का स्थापन या उत्सादन; और
(घ) संस्थान के शैक्षणिक कृत्य, अनुशासन, निवास , प्रवेश, परीक्षाएं , अध्येतावृत्तियों और अध्ययनवृत्तियों, निःशुल्कवृत्तियों, छूटों के दिए जाने, उपस्थिति और अन्य संबंधित विषयों को समाविष्ट करने वाली उपविधियां;
अनुभाग 1 क]
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25
(ञ) ऐसे विनिर्दिष्ट विषयों पर, जो शासक बोर्ड द्वारा या स्वयं द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं, सलाह देने के लिए उप समितियां नियुक्त करना;
(ट) उप समितियों की सिफारिशों पर विचार करना और ऐसी कार्रवाई करना, जो अपेक्षित हो, जिसके अंतर्गत शासक बोर्ड को सिफारिशें करना भी है;
(ठ) विभागों और केन्द्रों के क्रियाकलापों का कालिक पुनर्विलोकन करना और समुचित कार्रवाई करना , जिसके अंतर्गत संस्थान में शिक्षण के स्तर को बनाए रखने और उसमें सुधार करने के दृष्टिकोण से शासक बोर्ड को सिफारिशें करना भी है; और
(ड) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करना, जो उसको परिनियमों द्वारा या अन्यथा बोर्ड द्वारा सौंपे जाएं ।
वित्त समिति ।
18. ( 1 ) प्रत्येक संस्थान की वित्त समिति में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे , अर्थात्ः-
(क) अध्यक्ष, शासक बोर्ड , पदेन जो समिति का अध्यक्ष होगा;
(ख) भारत सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग का एक प्रतिनिधि, जो भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान से संबंधित मामलों का संचालन करता हो, पदेन;
(ग) भारत सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग का एक प्रतिनिधि, जो वित्त से संबंधित मामलों का संचालन करता हो, पदेन;
(घ) बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट दो व्यक्ति;
(ङ) निदेशक, पदेन;
(च) संस्थान के वित्त और लेखाओं का प्रभारी अधिकारी , पदेन सचिव ।
करेंगे । (2) पदेन सदस्यों से भिन्न , वित्त समिति के सदस्य तीन वर्ष की कालावधि के लिए पद धारण
वित्त समिति की शक्तियां और कृत्य ।
19. वित्त समिति, संस्थान के लेखाओं की परीक्षा, व्यय के लिए प्रस्तावों और वित्तीय प्राक्कलनों की संवीक्षा करेगी और उसके पश्चात् उसे अनुमोदन के लिए अपनी टिप्पणियों के साथ शासक बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करेगी।
20. प्रत्येक संस्थान की भवन और संकर्म समिति में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे , अर्थात्:-- भवन और संकर्म समिति ।
(क) निदेशक, पदेन, जो समिति का अध्यक्ष होगा;
(ख) उस राज्य में, जिसमें संस्थान अवस्थित है , स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा नामनिर्दिष्ट एक व्यक्ति;
(ग) बोर्ड द्वारा इसके सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट एक व्यक्तिः
(घ) संकायाध्यक्ष, योजना निर्माण और विकास;
(ङ) बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट, सरकार या सरकारी अभिकरण में अधीक्षण इंजीनियर से अनिम्न पंक्तिका एक सिविल इंजीनियर;
:
(च) बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट, सरकार या सरकारी अभिकरण में अधीक्षण इंजीनियर से अनिम्न पंक्तिका एक विद्युत इंजीनियर;
(छ) संस्थान की संपदा का प्रभारी अधिकारी, पदेन सचिव ।
भवन और
संकर्म समिति 21. भवन और संकर्म समिति, निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करेगी , अर्थात्:-
की शक्तियां और कृत्य ।
(क ) समिति का, बोर्ड से आवश्यक प्रशासनिक अनुमोदन और वित्तीय मंजूरी को सुनिश्चित करने के पश्चात् सभी मुख्य बड़े संकर्मों के सन्निर्माण का उत्तरदायित्व होगा;
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(ख) इसकी, सभी सन्निर्माण कार्यों और रखरखाव तथा मरम्मत से संबंधित कार्य हेतु उस प्रयोजन के लिए संस्थान के निस्तारण पर दिए गए अनुदान के भीतर आवश्यक प्रशासनिक अनुमोदन और वित्तीय मंजूरी देने की शक्ति होगी;
(ग) यह भवन और अन्य बड़े कार्यों, छोटे संकर्मों, मरम्मत , रखरखाव और इसी प्रकार के अन्य कार्यों की लागत के प्राक्कलन तैयार कराएगी;
(घ) यह ऐसे प्रत्येक कार्य की, जो यह आवश्यक समझे, तकनीकी संवीक्षा करने के लिए उत्तरदायी होगी;
(ङ) यह उपयुक्त ठेकेदारों की सूची बनाने और निविदाओं की स्वीकृति के लिए उत्तरदायी होगी और इसे , जहां कहीं आवश्यक हो, विभागीय संकर्मों के लिए निदेश की शक्ति होगी।
अनुसंधान परिषद् ।
22. (1 ) प्रत्येक संस्थान, निदेशक और ऐसे अन्य सदस्यों से, जो बोर्ड द्वारा , परिनियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं , मिलकर बनने वाली अनुसंधान परिषद् की स्थापना करेगा ।
(2) प्रत्येक संस्थान की अनुसंधान परिषद्-
(क) अनुसंधान संबंधी वित्तपोषण करने वाले संगठनों, उद्योग और सिविल सोसाइटी के साथ अनुसंधान के संभाव्य क्षेत्रों की पहचान के लिए मध्यस्थता करेगी;
(ख) ऐसे संस्थान में या उच्चतर शिक्षा की किसी संस्था या अनुसंधान प्रयोगशालाओं के सहयोग से अनुसंधान का आयोजन और संवर्धन करेगी;
(ग) अध्यापकों द्वारा तैयार की गई अनुसंधान परियोजनाओं के लिए बाह्य स्रोतों से वित्तपोषण अभिप्राप्त करने में उनकी सहायता करेगी;
(घ) बोर्ड द्वारा, उसके नियंत्रण में रखी गई निधियों में से अनुसंधान स्रोत प्रदान करेगी और ऐसे संस्थान में अध्यापकों द्वारा की जाने वाली प्रस्तावित अनुसंधान परियोजनाओं के लिए सहायता प्रदान करेगी;
(ङ) अनुसंधान से प्रकट प्रौद्योगिकी उपयोजनों के उद्भवन के लिए उपबंध करेगी और संस्थानों में अनुसंधान से अभिप्राप्त बौद्धिक संपदा का संरक्षण और उपयोग करेगी;
(च) अनुसंधान और सलाहकारी सेवाओं के लिए उपबंध करेगी और उस प्रयोजन के लिए अन्य संस्थाओं, उद्योग , सिविल सोसाइटी या अन्य संगठनों से ऐसे ठहराव करेगी और ऐसे ठहरावों के माध्यम से उद्योग और समाज में प्रसार किए जाने के लिए अनुसंधान के परिणामों को समर्थकारी बनाएगी;
(छ ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगी और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी, जो परिनियमों द्वारा उसको समनुदेशित किए जाएं ।
अधिवेशन ।
23. (1 ) अध्यक्ष, संस्थान के बोर्ड, वित्त समिति के अधिवेशनों और दीक्षांत समारोहों की सामान्यतः अध्यक्षता करेगा ।
(2) अध्यक्ष का यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य होगा कि बोर्ड द्वारा लिए गए विनिश्चयों को कार्यान्वित किया जाए ।
(3) अध्यक्ष, ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे सौंपे जाएं ।
निदेशक ।
24. (1 ) किसी संस्थान का निदेशक, केंद्रीय सरकार द्वारा , कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से खोजबीन- सह- चयन समिति द्वारा योग्यता के क्रम में सिफारिश किए गए नामों के पैनल में से नियुक्त किया जाएगा।
अनुभाग 1 क]
भारत का राजपत्र असाधारण
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(2) खोजबीन-सह- चयन समिति में निम्नलिखित होंगे , अर्थात्ः-
(क) भारत सरकार के मानव संसाधन और विकास के प्रभारी मंत्री द्वारा नामनिर्दिष्ट एक विख्यात व्यक्ति, जो समिति का अध्यक्ष होगा;
(ख) संबद्ध भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के शासक बोर्ड का अध्यक्ष– सदस्य, पदेन;
(ग) भारत सरकार में उच्चतर शिक्षा का प्रभारी सचिव सदस्य, पदेन;
(घ) मानव संसाधन विकास के प्रभारी मंत्री द्वारा नामनिर्देशित किया जाने वाला भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों का निदेशक;
(ङ) मानव संसाधन विकास के प्रभारी मंत्री द्वारा नामनिर्देशित किया जाने वाला सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विख्यात व्यक्तिः
(च) भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों से संबंधित मानव संसाधन विकास मंत्रालय का ब्यूरो प्रमुख सदस्य सचिव, पदेन । गैर
(3) निदेशक, सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं, नियुक्त किया जाएगा ।
(4) निदेशक, संस्थान का मुख्य शैक्षणिक और कार्यपालक अधिकारी होगा तथा बोर्ड और सिनेट के विनिश्चयों के क्रियान्वयन तथा संस्थान के दिन - प्रतिदिन प्रशासन के लिए उत्तरदायी होगा ।
(5) निदेशक, ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसको सौंपे जाएं अथवा बोर्ड या सिनेट या अध्यादेशों द्वारा प्रत्यायोजित किए जाएं ।
(6) निदेशक , बोर्ड को वार्षिक रिपोर्ट और संपरीक्षित लेखा प्रस्तुत करेगा ।
(7) निदेशक, मुख्यालय से उसकी अनुपस्थिति के दौरान उपस्थित उप निदेशक या एक संकायाध्यक्ष या ज्येष्ठतम आचार्य को कर्मचारिवृंद के यात्रा भत्तों, आकस्मिक व्ययों और चिकित्सीय उपचार के लिए अग्रिमों को मंजूर करने के लिए और उसकी ओर से बिलों को हस्ताक्षरित तथा प्रतिहस्ताक्षरित करने के लिए उसके द्वारा लिखित में प्राधिकृत किया जा सकेगा तथा उपस्थित उप निदेशक या एक संकायाध्यक्ष या ज्येष्ठतम आचार्य को प्राधिकृत कर सकेगा ।
कुलसचिव ।
25. (1 ) प्रत्येक संस्थान का कुलसचिव ऐसी शर्तों और निबंधनों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा अधिकथित किए जाएं और वह संस्थान के अभिलेख , उसकी सामान्य मुद्रा, निधि और ऐसी अन्य संपत्ति का अभिरक्षक होगा जो बोर्ड उसके भारसाधन में सौंपे ।
जाएं । (2) कुलसचिव बोर्ड, सिनेट और ऐसी समितियों का सचिव होगा जो परिनियमों द्वारा विहित की
(3) कुलसचिव अपने कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए निदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।
(4) कुलसचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे अधिनियम या परिनियमों या निदेशक द्वारा सौंपे जाएं ।
औरअधिकारी ।
26. (1 ) बोर्ड, परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकरणों के रूप में ऐसे अन्य पदों की घोषणा और अन्य प्राधिकरण ऐसे प्रत्येक प्राधिकरण के कर्तव्यों और कृत्यों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
(2) बोर्ड ऐसे प्राधिकरणों का गठन कर सकेगा जो वह संस्थान के कार्यकलाप के उचित प्रबंध के लिए ठीक समझे ।
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 28
संस्थान के कार्यों का पुनर्विलोकन ।
27. (1 ) प्रत्येक संस्थान, इस अधिनियम के अधीन ऐसे संस्थान की स्थापना और निगमन से पांच वर्ष के भीतर और उसके पश्चात् प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर, केन्द्रीय सरकार के पूर्वअनुमोदन से उक्त अवधि में संस्थान के उद्देश्यों को प्राप्त करने में उसके कार्य का मूल्यांकन और पुनर्विलोकन करने के लिए एक समिति का गठन करेगा ।
(2) उपधारा (1 ) के अधीन समिति, ऐसे संस्थान में शिक्षण , विद्या और अनुसंधान के जो उससे सुसंगत होने वाले ज्ञान के ऐसे क्षेत्रों से बनाई गई है, शैक्षिक या उद्योग के अभिस्वीकृत ख्यातिप्राप्त सदस्यों से मिलकर बनेगी ।
करेगी (3) समिति, संस्थान के कार्यों का निर्धारण करेगी और निम्नलिखित के लिए सिफारिशें
(क) शैक्षणिक, विद्या तथा अनुसंधान की दशा से यथा प्रदर्शितं धारा 6 में निर्दिष्ट संस्थान के उद्देश्यों को पूरा करने का विस्तार और समाज को उसका योगदान;
(ख) रूपांतरणात्मक अनुसंधान का संवर्धन और उसका उद्योग और समाज पर समाघात;
(ग) ज्ञान की वर्तमान सीमाओं से परे मूलभूत अनुसंधान का अभिवर्धन;
(घ) सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणियों के बीच संस्थान की स्थापना;
(ङ) ऐसे अन्य विषय जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(4) बोर्ड, उपधारा (3 ) में निर्दिष्ट सिफारिशों पर विचार करेगा और उस पर ऐसी कार्रवाई, जो वह ठीक समझे, करेगा:
परंतु की गई कार्रवाई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई पर स्पष्टीकारक ज्ञापन के साथ समिति की सिफारिशें उनके कारणों को विनिर्दिष्ट करते हुए, केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत कीजाएंगी ।
अध्याय 4
लेखा और संपरीक्षा
केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान।
28. (1 ) संस्थानों को इस अधिनियम के अधीन उनके दक्ष कृत्यों का निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजनों के लिए इस निमित्त विधि द्वारा संसद् द्वारा सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात्, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में प्रत्येक संस्थान को ऐसी धनराशियों का, ऐसी रीति से, जो वह ठीक समझे, संदाय कर सकेगी।
(2) केन्द्रीय सरकार प्रत्येक संस्थान को, धन की ऐसी राशियों का अनुदान देगी जो उसके द्वारा स्थापित छात्रवृत्तियों या अध्येतावृत्तियों पर, जिनमें ऐसे संस्थान में नागरिकों के सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के अभ्यावेशित छात्रों के लिए छात्रवृत्तियां या अध्येतावृत्तियां सम्मिलित हैं, व्यय को पूरा करने के लिए अपेक्षित हैं ।
संस्थान की निधि।
29. (1 ) प्रत्येक संस्थान एक निधि रखेगा, जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे- (क) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा दिए गए सभी धन;
(ख) संस्थान द्वारा छात्रों से प्राप्त सभी फीसें और अन्य प्रभार;
(ग) संस्थान द्वारा अनुदानों, दानों, संदानों, उपकृतियों, वसीयतों या अंतरणों के रूप में प्राप्त सभी धन;
(घ) संस्थान द्वारा संचालित अनुसंधान या उसके द्वारा सलाहकारी या परामर्श सेवाओं के प्रदान से उद्भूत बौद्धिक संपदा के उपयोग से प्राप्त सभी धन;
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अनुभाग 1क]
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(ङ) संस्थान द्वारा किसी अन्य रीति या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त सभी धन।
(2) प्रत्येक संस्थान की निधि का उपयोग संस्थान के व्यय को पूरा करने के लिए किया जाएगा जिनमें इस अधिनियम के अधीन संस्थान में अनुसंधान को अग्रसर करने में उसकी शक्तियों के प्रयोग और उसके कर्तव्यों के निर्वहन में , या अन्य शैक्षणिक संस्थानों अथवा उद्योगों के सहयोग से और संस्थान की वृद्धि और विकास पर लक्ष्यित पूंजी विनिधान के लिए उपगत व्यय सम्मिलित हैं ।
लेखा और लेखापरीक्षा ।
30. (1 ) प्रत्येक संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलन- पत्र भी है, ऐसे प्ररूप और लेखा मानक में , जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से अधूिसचना द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं , तैयार करेगा।
(2) जहां संस्थान का आय और व्यय का विवरण और तुलन -पत्र लेखा मानकों का अनुपालन नहीं करता है , वहां संस्थान, अपने आय और व्यय के विवरण तथा तुलन - पत्र में निम्नलिखित का प्रकटन करेगा , अर्थात्ः-
(क) लेखा मानकों से विचलन;
(ख) ऐसे विचलन के कारण; और
(ग) ऐसे विचलन के कारण उद्भूत वित्तीय प्रभाव, यदि कोई हो ।
(3) प्रत्येक संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक- महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में संपरीक्षा दल द्वारा उपगत कोई व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक- महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के तथा संस्थान के लेखाओं की परीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के , ऐसी संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक -महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियों, लेखाओं , संबद्ध वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागजपत्र को पेश किए जाने की मांग करने और संस्थान के कार्यालयों का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(5) भारत के नियंत्रक- महालेखापरीक्षक या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रत्येक संस्थान के यथाप्रमाणित लेखे, उस पर संपरीक्षा- रिपोर्ट सहित ऐसी प्रक्रिया के अनुसार , जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिकथित की जाए केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
पेंशन और भविष्य निधि।
31. (1 ) प्रत्येक संस्थान, अपने कर्मचारियों के फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए , जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए , ऐसी भविष्य या पेंशन निधि स्थापित कर सकेगा या ऐसी बीमा स्कीम का उपबंध कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
1925 का 19
(2) जहां ऐसी कोई भविष्य निधि या पेंशन निधि इस प्रकार स्थापित की गई है वहां, केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि हैं ।
नियुक्तियां ।
32. प्रत्येक संस्थान के कर्मचारिवृंद की सभी नियुक्तियां, निदेशक की नियुक्ति को छोड़कर , परिनियमों द्वारा अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार, निम्नलिखित के द्वारा की जाएंगी,-
(क) यदि नियुक्ति शैक्षणिक कर्मचारिवृंद में सहायक आचार्य के पद पर की जाती है या यदि नियुक्ति शैक्षणिक कर्मचारिवृंद से भिन्न प्रत्येक काडर में की जाती है, जिसका अधिकतम वेतनमान समूह क अधिकारियों के लिए विद्यमान ग्रेड वेतनमान से अधिक है तो बोर्ड द्वारा;
(ख) किसी अन्य दशा में निदेशक द्वारा ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
30
परिनियम ।
33. इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए , परिनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे , अर्थात्:-
(क) मानद् डिग्री का प्रदान किया जाना;
(ख) शिक्षण विभागों का बनाया जाना;
(ग) संस्थान में पाठ्यक्रमों के लिए और संस्थान की डिग्रियों और डिप्लोमाओं की परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीसें;
(घ) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों , छात्र- सहायता वृत्तियों , पदकों और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना;
(ङ) संस्थान के अधिकारियों की पदावधि और उनकी नियुक्ति की पद्धति;
(च) संस्थान के शिक्षकों की अर्हताएं ;
(छ) संस्थान के शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद का वर्गीकरण, नियुक्ति की पद्धति और उनकी सेवा के निबंधनों और शर्तों का अवधारण;
(ज) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद के फायदे के लिए पेंशन, बीमा और भविष्य निधियों की स्थापना;
(झ) संस्थान के प्राधिकरणों का गठन, उनकी शक्तियां और कर्तव्य;
(ञ) छात्र- निवासों और छात्रावासों की स्थापना और उनका अनुरक्षण;
(ट) संस्थान के छात्रों के आवास की शर्तें और छात्र- निवासों तथा छात्रावासों में निवास के लिए फीसों और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण;
(ठ) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;
(ड) बोर्ड के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन; और
(ढ) बोर्ड, सिनेट या किसी समिति के अधिवेशन , ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति और उनके कामकाज के संचालन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया।
34. (1 ) प्रत्येक संस्थान के प्रथम परिनियम, कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से बोर्ड द्वारा बनाए जाएंगे और उनकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे ।
(2) बोर्ड समय- समय पर , इस धारा में उपबंधित रीति से नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या परिनियमों को संशोधित या निरसित कर सकेगा ।
(3) प्रत्येक नए परिनियम या परिनियमों में परिवर्धन या परिनियमों में किसी संशोधन या निरसन के ऐसे कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन की अपेक्षा होगी जो अनुमति प्रदान या विधारित कर सकेगा या उसको बोर्ड के पास विचारार्थ भेज सकेगा ।
(4) किसी नए परिनियम या विद्यमान परिनियम को संशोधित या निरसित करने वाला परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कुलाध्यक्ष उसके लिए अनुमति नहीं दे देता है:
परंतु केन्द्रीय सरकार, कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से संस्थान के परिनियमों को बना या संशोधित कर सकेगी यदि वह समानता के लिए अपेक्षित है और उसकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
अध्यादेश ।
35. इस अधिनियम के उपबंधों और परिनियमों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक संस्थान के अध्यादेश निम्नलिखित सभी या किन्हीं मामलों के लिए उपबंध कर सकेंगे , अर्थात्:-
(क) संस्थान में छात्रों का प्रवेश;
(ख) संस्थान की सभी डिग्रियों और डिप्लोमाओं के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;
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अनुभाग 1 क]
31
(ग) वे शर्तें , जिनके अधीन छात्रों को संस्थान की डिग्री या डिप्लोमा पाठ्यक्रमों और उसकी परीक्षाओं में प्रवेश दिया जाएगा और वे डिग्रियों तथा डिप्लोमाओं के लिए पात्र होंगे ;
(घ) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों , छात्र - सहायता वृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों को प्रदान करने की शर्तें;
(ङ) परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और ढंग तथा उनके कर्तव्य;
(च) परीक्षाओं का संचालन;
(छ) संस्थान के छात्रों में अनुशासन बनाए रखना; और
(ज) ऐसा कोई अन्य विषय जिसका इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा अध्यादेशों द्वारा उपबंध किया जाना है या उपबंध किया जा सकेगा ।
36. (1 ) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, अध्यादेश सिनेट द्वारा बनाए जाएंगे । अध्यादेश कैसे बनाए जाएंगे ।
(2) सिनेट द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश उस तारीख से प्रभावी होंगे जो वह निदेश दे, किन्तु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश , बोर्ड को यथाशीघ्र प्रस्तुत किया जाएगा और उस पर बोर्ड द्वारा उसके अगले अधिवेशन में विचार किया जाएगा ।
(3) बोर्ड को किसी ऐसे अध्यादेश को संकल्प द्वारा उपांतरित करने या रद्द करने की शक्ति होगी और ऐसा अध्यादेश ऐसे संकल्प की तारीख से तद्नुसार, यथास्थिति, उपांतरित या रद्द हो जाएगा ।
माध्यस्थम् अधिकरण ।
37. (1 )(क) किसी संस्थान और उसके कर्मचारी के बीच संविदा से उद्भूत होने वाला विवाद , संबद्ध कर्मचारी के अनुरोध पर या संस्थान की प्रेरणा पर, माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसमें संस्थान द्वारा नियुक्त एक सदस्य, कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य और कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक होगा ।
(ख) अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और किसी भी न्यायालय में उस पर कोई आक्षेप नहीं किया जा सकेगा ।
(ग) उपधारा (1 ) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किए जाने के लिए अपेक्षित किसी मामले की बाबत किसी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं होगी ।
(घ) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी:
परंतु अधिकरण ऐसी प्रक्रिया बनाते समय नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का ध्यान रखेगा ।
(ङ) माध्यस्थम् से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।
(2) किसी परीक्षा के लिए ऐसा कोई छात्र या अभ्यर्थी, जिसका नाम संस्थान के निदेशक के आदेशों या संकल्प द्वारा संस्थान की नामावलियों से हटा दिया गया है और जो संस्थान की परीक्षाओं में उपस्थित होने से एक वर्ष से अधिक के लिए विवर्जित किया गया है, उसके द्वारा ऐसे संकल्प की प्राप्ति की तारीख से दस दिन के भीतर शासक बोर्ड को अपील कर सकेगा , जो निदेशक के विनिश्चय को पुष्ट, उपांतरित कर सकेगा या उसको उलट सकेगा ।
(3) किसी छात्र के विरुद्ध संस्थान द्वारा की गई किसी अनुशासनिक कार्रवाई से उद्भूत किसी विवाद को, ऐसे छात्र के अनुरोध पर माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा और उपधारा (1 ) के उपबंध इस उपधारा के अधीन किए गए निर्देश को यथासंभव लागू होंगे ।
(4) संस्थान के प्रत्येक कर्मचारी या छात्र को, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी , संस्थान के, यथास्थिति, किसी अधिकारी या प्राधिकारी के विनिश्चय के विरुद्ध शासक बोर्ड को ऐसे समय के भीतर, जो परिनियमों द्वारा विहित किया जाए , अपील करने का अधिकार होगा और उस पर शासक बोर्ड ऐसे [भाग 2--
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विनिश्चय को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है , पुष्ट या उपांतरित कर सकेगा या उसको उलट सकेगा ।
38. (1 ) प्रत्येक संस्थान के बोर्ड के समक्ष रखे गए लेखाओं के प्रत्येक विवरण के साथ निम्नलिखित के संबंध में उसके निदेशक द्वारा एक रिपोर्ट संलग्न की जाएगी-
निदेशक की वार्षिक रिपोर्ट ।
(क) ऐसे संस्थान के कार्यकलाप की स्थिति;
(ख) ऐसी रकमें, यदि कोई हों, जिनका उसने अपने तुलन-पत्र में अधिशेष आरक्षितियों को आगे ले जाने का प्रस्ताव किया है;
(ग) वह सीमा, जिसके संबंध में संपरीक्षक की रिपोर्ट में व्यय पर आय के किसी अधिशेष या आय पर व्यय की किसी कमी की न्यूनोक्ति या अत्युक्ति को उपदर्शित किया गया है और ऐसी न्यूनोक्ति या अत्युक्ति के कारण;
(घ) संस्थान द्वारा की गई अनुसंधान परियोजनाओं की उत्पादकता जो ऐसे सन्नियमों के अनुसार मापी गई हैं, जो किसी कानूनी विनियामक प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं;
(ङ) संस्थान के अधिकारियों और शिक्षकों की नियुक्तियां;
(च) संस्थान द्वारा स्थापित संदर्भिका और आंतरिक मानक जिनके अतंर्गत शिक्षण , अनुसंधान और ज्ञान के उपयोजन में नवप्रवर्तनों की प्रकृति भी है ।
(2) निदेशक, संपरीक्षक की रिपोर्ट में अंतर्विष्ट प्रत्येक आरक्षण, अर्हता या प्रतिकूल टिप्पणी पर अपनी पूर्वोक्त रिपोर्ट में संपूर्ण जानकारी और स्पष्टीकरण देने के लिए आबद्ध होगा ।
प्रत्येक संस्थान कीवार्षिक रिपोर्ट ।
39. (1 ) प्रत्येक संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट, बोर्ड के निदेशाधीन तैयार की जाएगी जिसके अंतर्गत, अन्य विषयों के साथ, संस्थान द्वारा उसके उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किए गए उपाय और ऐसे संस्थान में किए जा रहे अनुसंधान के परिणाम आधारित निर्धारण भी होंगे और बोर्ड को , ऐसी तारीख , जो विनिर्दिष्ट की जाए , को या उससे पूर्व प्रस्तुत की जाएगी और बोर्ड, अपने वार्षिक अधिवेशन में रिपोर्ट पर विचार करेगा ।
जाएगी। (2) वार्षिक रिपोर्ट, बोर्ड द्वारा उसके अनुमोदन पर संस्थान की वेबसाइट पर प्रकाशित की
(3) प्रत्येक संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत की जाएगी जो उसको, यथाशीघ्र, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 5
परिषद्
संस्थानों की परिषद्।
40. (1 ) संस्थानों में बेहतर समन्वय किए जाने के लिए केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए , परिषद् के नाम से ज्ञात एक केन्द्रीय निकाय , अनुसूची के स्तंभ (5) में विनिर्दिष्ट सभी संस्थानों के लिए स्थापित किया जाएगा ।
(2) परिषद्, निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्:-
(i ) तकनीकी शिक्षा का प्रभारी, केन्द्रीय सरकार का मंत्री जो परिषद् का अध्यक्ष होगा, पदेन;
(ii ) भारत की संसद् के दो सदस्य (लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाला एक सदस्य और राज्य सभा के सभापति द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला एक सदस्य) , पदेन;
(iii) सचिव, भारत सरकार, मानव संसाधन मंत्रालय , उच्चतर शिक्षा विभाग;
(iv) प्रत्येक संस्थान के अध्यक्ष, पदेन;
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
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(v) प्रत्येक संस्थान के निदेशक, पदेन;
(vi ) महानिदेशक , वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद्, पदेन;
(vii ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले तीन व्यक्ति , जिनमें प्रत्येक से एक वित्त , विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी से संबद्ध मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करेगा;
(viii) कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले तीन व्यक्ति , जो प्रत्येक संस्थान द्वारा सिफारिश किए गए दो नामों से मिलकर बनने वाले किसी पैनल से परिषद् द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले, उद्योग , शिक्षा, इंजीनियरी, पूर्वछात्र और सामाजिक विज्ञानों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति होंगे ;
(ix) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का एक प्रतिनिधिः
(x) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् का एक प्रतिनिधिः और
(xi ) अध्यक्ष, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ।
(3) तकनीकी शिक्षा से संबद्ध उच्चतर शिक्षा विभाग, भारत सरकार का एक अधिकारी , जो परिषद् के सचिव के रूप में कार्य करने के लिए उस सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ।
(4) परिषद्, स्वविवेकानुसार, अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों के निर्वहन में , परिषद् की सहायता करने के लिए भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान परिषद् की स्थायी समिति गठित कर सकेगी ।
(5) परिषद् के संबंध में व्यय की पूर्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी ।
41. (1 ) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, पदेन सदस्य से भिन्न परिषद् के सदस्य की पदावधि नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए होगी ।
परिषद् के सदस्योंकी पदावधि और उनको संदेय भत्ते ।
(2) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को धारण करता है जिसके आधार पर वह सदस्य है ।
(3) धारा 40 की उपधारा (2 ) के खंड ( ii ) के अधीन निर्वाचित सदस्य की पदावधि, जैसे ही वह उस सदन का, जिसमें वह निर्वाचित हुआ था, सदस्य नहीं रहता है, समाप्त हो जाएगी ।
(4) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, पद छोड़ने वाला सदस्य, जब तक परिषद् निदेश न दे , तब तक पद पर बना रहेगा , जब तक कोई अन्य व्यक्ति उसके स्थान पर सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता है ।
(5) परिषद् के सदस्य, परिषद् या उसकी समितियों के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए यात्रा तथा ऐसे अन्य भत्तों के लिए हकदार होंगे, जो विहित किए जाएं ।
42. (1 ) परिषद्, सभी संस्थानों के क्रियाकलापों का समन्वय करने का कार्य करेगी । परिषद्के कृत्य और कर्तव्य ।
(2) उपधारा (1 ) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना , परिषद् निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगी, अर्थात्: -
(क) पाठ्यक्रमों की अवधि, संस्थानों द्वारा प्रदान की जाने वाली डिग्रियों और अन्य विद्या संबंधी विशिष्ट उपाधियों, प्रवेश स्तर और अन्य शैक्षिक विषयों से संबंधित बातों पर सलाह देना;
(ख) कर्मचारियों के काडर, उनकी भर्ती की पद्धति और सेवा की शर्तें, छात्रवृत्तियां देने और
फीस माफ करने, फीस के उद्ग्रहण और सामान्य हित के अन्य मामलों के बारे में नीति अधिकथित करना;
(ग) प्रत्येक संस्थान की विकास योजनाओं की जांच करना और उनमें से ऐसी योजनाओं का अनुमोदन करना, जो आवश्यक समझी जाएं और ऐसी अनुमोदित योजनाओं के वित्तीय परिणामों को भी मोटे तौर से उपदर्शित करना;
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(घ) प्रत्येक संस्थान के वार्षिक बजट प्राक्कलनों की जांच करना और केन्द्रीय सरकार से इस प्रयोजन के लिए निधि आबंटन करने की सिफारिश करना;
(ङ) केन्द्रीय सरकार को छात्रवृत्तियों के संस्थापन की सिफारिश करना जिनके अंतर्गत अनुसंधान और अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के छात्रों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के नागरिकों के लिए फायदे भी हैं;
(च) नए सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थापना के लिए प्रस्तावों की केन्द्रीय सरकार को सिफारिश करना;
(छ) कुलाध्यक्ष को इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा किए जाने वाले किसी कृत्य के संबंध में उस दशा में सलाह देना जिसमें ऐसी अपेक्षा की जाए ; और
जाएं : (ज) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसको निर्दिष्ट किए
परंतु इस धारा की कोई बात, प्रत्येक संस्थान के बोर्ड या सिनेट या अन्य प्राधिकरणों में विधि द्वारा निहित शक्तियों और कृत्यों को अल्पीकृत नहीं करेगी।
(3) परिषद् का अध्यक्ष, साधारणतया, परिषद् के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा और उसकी अनुपस्थिति में अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा उनमें से चुना गया कोई अन्य सदस्य, अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।
(4) परिषद्, प्रत्येक वर्ष में एक बार अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशनों में ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगी, जो विहित की जाए ।
43. (1) केन्द्रीय सरकार, इस अध्याय के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए पूर्व प्रकाशन के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।
इस अध्याय में विषयों के बारे में नियम बनाने की शक्ति।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबंध कर सकेंगे , अर्थात्ः-
(क) धारा 41 की उपधारा (5 ) के अधीन परिषद् के सदस्यों को संदेय यात्रा और अन्य भत्ते;
प्रक्रिया । (ख) धारा 42 की उपधारा (4) के अधीन परिषद् के अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली
अध्याय 6
प्रकीर्ण
44. इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन गठित परिषद्, या किसी संस्थान या बोर्ड या सिनेट या किसी अन्य निकाय का कोई कार्य , केवल इस कारण अविधिमान्य न होगा कि-
(क) उसमें कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या
रिक्तियों, आदि से कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना ।
(ख) इसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणावगुण पर प्रभाव नहीं डालती है; या
(ग) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के चयन , नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है ।
45. प्रत्येक संस्थान, केन्द्रीय सरकार को अपनी नीतियों या क्रियाकलापों के संबंध में ऐसी विवरणियां या अन्य सूचना, जो केन्द्रीय सरकार, संसद् को रिपोर्ट करने के प्रयोजन के लिए या नीति बनाने के लिए समय- समय पर अपेक्षा करे, देगा ।
केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को विवरणियां औरसूचनादिया जाना ।
अनुभाग 1 क]
भारत का राजपत्र असाधारण
35
46. संस्थान, ऐसे निदेशों का पालन करेगा, जो इस अधिनियम के दक्ष प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा उसको समय - समय पर जारी किए जाएं ।
केन्द्रीय सरकार कीनिदेश जारी करने की शक्ति।
2005 का 22
संस्थान का
सूचना का 47. सूचना का अधिकार अधिनियम , 2005, के उपबंध सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2 के खंड ( ज) में परिभाषित प्रत्येक संस्थान को, लागू होंगे ।
अधिकार
अधिनियम के
अधीन लोक
प्राधिकारी होना ।
48. (1 ) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी-
संक्रमणकालीन उपबंध ।
(क) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले संस्थान का शासक बोर्ड उसी रूप में तब तक इस प्रकार कार्य करता रहेगा जब तक इस अधिनियम के अधीन उस संस्थान के लिए कोई नया बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए बोर्ड के गठन पर बोर्ड के ऐसे सदस्य, जो इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व पद धारण कर रहे हैं, पद धारण नहीं करेंगे;
(ख) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व , प्रत्येक संस्थान के संबंध में गठित प्रत्येक सिनेट को, इस अधिनियम के अधीन गठित सिनेट का होना तब तक समझा जाएगा जब तक संस्थान के लिए इस अधिनियम के अधीन सिनेट गठित नहीं की जाती है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नई सिनेट के गठन पर इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व पद धारण करने वाले सिनेट के सदस्य पद धारण नहीं करेंगे;
(ग) जब तक इस अधिनियम के अधीन प्रथम परिनियम और अध्यादेश नहीं बनाए जाते हैं, तब तक इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त प्रत्येक संस्थान के परिनियम, अध्यादेश, नियम, विनियम और उपविधियां, तत्स्थानी संस्थान को वहां तक लागू होती रहेंगी जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं ;
(घ) किसी ऐसे छात्र के बारे में, जिसने शैक्षणिक सत्र 2007-2008 के प्रारंभ को या उसके पश्चात्विद्यमान संस्थान की कक्षाओं में जाना प्रारंभ कर दिया है या शैक्षणिक सत्र 2010-2011 को या उसके पश्चात् पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है, धारा 7 की उपधारा (1 ) के खंड ( ग) के प्रयोजन के लिए यह समझा जाएगा कि उसने कांचीपुरम में अवस्थित विद्यमान संस्थान में पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन किया है यह केवल तब, जबकि ऐसे छात्र को पहले से ही ऐसे ही पाठ्यक्रम के लिए कोई डिग्री या डिप्लोमा प्रदान नहीं किया गया हो ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1 ) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यदि वह ऐसा करना आवश्यक और समीचीन समझती है, तो अधिसूचना द्वारा , ऐसे उपाय कर सकेगी जो अनुसूची के स्तंभ (5 ) में उल्लिखित तत्समान संस्थान को अनुसूची के स्तम्भ (3) में वर्णित विद्यमान संस्थान के अन्तरण के लिए आवश्यक हों ।
क़ठिनाइयों को दूर करने की शक्ति।
49. (1 ) यदि, इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, और जो उसे कठिनाई दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत होते हों :
परंतु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश इसके किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र , संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
[भाग 2
भारत का राजपत्र असाधारण
36
नियमों और रखा जाना । अधिसूचनाओं का
50. केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा/रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा/होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए या अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा/ जाएगी , किन्तु नियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तन या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
37
अनुसूची
[ धारा 4(1 ) देखिए ]
क्रम राज्य का विद्यमान संस्थान का नाम
सं० नाम
(1) (2)
(3)
1. उत्तर प्रदेश भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान
इलाहाबाद
2. मध्य प्रदेश भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान ग्वालियर
3. मध्य प्रदेश
अवस्थान इस अधिनियम के अधीन संस्थान का नाम
(4)
(5)
इलाहाबाद भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, इलाहाबाद ।
ग्वालियर अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और प्रबंध संस्थान, ग्वालियर ।
जबलपुर
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजाइन और
विनिर्माण संस्थान,
4. तमिलनाडु
पंडित द्वारका प्रसाद मिश्रा भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजाइन और विनिर्माण संस्थान, जबलपुर ।
कांचीपुरम
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजाइन और
विनिर्माण संस्थान
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजाइन और विनिर्माण संस्थान, कांचीपुरम ।
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 38 भारत का राजपत्र असाधारण
39 अनुभाग 1क]
वाणिज्य पोत परिवहन ( दूसरा संशोधन )
अधिनियम, 2014
(2014 का अधिनियम संख्यांक 32)
[9 दिसम्बर, 2014]
वाणिज्यपोत परिवहन अधिनियम, 1958
का और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पैंसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-
1. ( 1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वाणिज्य पोत परिवहन ( दूसरा संशोधन ) अधिनियम, 2014 है । संक्षिप्त नाम और प्रारंभ ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , नियत करे ।
1958का 44
2. वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम , 1958 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम कहा गया है ) के भाग 7 में, शीर्षक के अधीन उपशीर्षक के स्थान पर निम्नलिखित उपशीर्षक रखा जाएगाः-
भाग 7 में उपशीर्षक का प्रतिस्थापन ।
" नाविकों, समुद्रयात्रा वृत्तिक का वर्गीकरण, समुद्रीय श्रम मानक और न्यूनतम कर्मीदल मापमान काविहित किया जाना । " ।
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 40
3. मूल अधिनियम में , धारा 88 के पश्चात् निम्नलिखित धाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः-
नई धारा 88क और धारा 88 ख का अंतःस्थापन ।
परिभाषाएं ।
'88क. इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) " समुद्रीय श्रम अनुपालन की घोषणा " से किसी पोत के संबंध में, परिवहन महानिदेशक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत कोई अधिकारी , प्राधिकारी या संगठन द्वारा जारी ऐसी घोषणा अभिप्रेत है कि वह समुद्रीय श्रम अभिसमय के उपबंधों में वर्णित अपेक्षाओं और मानकों को पूरा करता है;
(ख) " समुद्रीय श्रम प्रमाणपत्र " से समुद्रीय श्रम अभिसमय के उपबंधों के अनुसार, परिवहन महानिदेशक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी , प्राधिकारी या संगठन द्वारा जारी प्रमाणपत्र अभिप्रेत है;
(ग) " समुद्रीय श्रम अभिसमय " से 23 फरवरी , 2006 को जिनेवा में हस्ताक्षरित समुद्रीय श्रम मानक पर समुद्रीय श्रम संगठन अंतरराष्ट्रीय अभिसमय अभिप्रेत है;
(घ) " समुद्रयात्रा वृत्तिक " से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो समुद्रगामी पोत के फलक पर किसी हैसियत में नियोजित है या लगा हुआ है या कार्य करता है किंतु उसमें निम्नलिखित सम्मिलित नहीं हैं,-
(i) किसी युद्धपोत में किसी व्यक्तिका, किसी हैसियत में फलक पर नियोजन या उसका लगा होना या कार्य करना; या
(ii) सैन्यया वाणिज्येतर प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त कोई सरकारी पोत ।
88ख. ( 1 ) समुद्रीय श्रम अभिसमय में यथा अंतर्विष्ट समुद्रीय श्रम मानकों से संबंधित उपबंध, वाणिज्यिक क्रियाकलाप में लगे सभी समुद्रयात्रा वृत्तिकों और पोतों को लागू होंगे, किंतु उनमें निम्नलिखित सम्मिलित नहीं हैं:-
समुद्रयात्रा वृत्तिकों और पोतों को समुद्रीय श्रम मानकोंकालागू होना।
(क) ऐसे पोत जो अनन्य रूप से अंतर्देशीय जलमार्ग या ऐसे परिरक्षित जलमार्गों या क्षेत्रों के भीतर या , उनके निकटवर्ती जलमार्गों में दिकचालित होते हैं, जहां पत्तनों से संबंधित तत्समय प्रवृत्तकोई विधिलागू होती है;
(ख) मत्स्य क्रियाकलाप में लगे पोत;
(ग) परंपरागत रूप से निर्मित पोत जैसे डॉऊ और जंक;
(घ) युद्धपोत और सहायक नौसेनाएं ।
(2) उपधारा ( 1 ) के उपबंधों के अधीन रहते हुए केन्द्रीय सरकार, पोत परिवहन के महानिदेशक कीसिफारिश पर, आदेश द्वारा उक्त उपधारा के उपबंधों को, वाणिज्यिक क्रियाकलाप में नहीं लगे हुए पोतों पर, ऐसी छूटों और उपांतरों के साथ, जो वह आवश्यक समझे, विस्तारित कर सकेगी। ' ।
धारा 91 का संशोधन ।
4. मूल अधिनियम की धारा 91 में , " पंद्रह वर्ष से अन्यून आयु के लड़कों को" शब्दों के स्थान पर " सोलह वर्ष से अन्यून आयु के अल्पवय व्यक्तियों को " शब्द रखे जाएंगे ।
5. मूल अधिनियम की धारा 92 में,-
धारा 92 का संशोधन ।
(क) उपधारा ( 1 ) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 1 ) समुद्री सेवा के लिए किसी व्यक्ति की शिक्षुता , शिक्षु या यदि वह कोई अल्पवय व्यक्ति है तो उसकी ओर से उसके संरक्षक तथा शिक्षु की अपेक्षा करने वाले पोत के मास्टर या स्वामी के बीच लिखित संविदा द्वारा होगी । ";
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
41
(ख) उपधारा ( 3 ) में, -
(i) खंड ( क) के उपखंड (iii ) में " पंद्रह वर्ष " शब्दों के स्थान पर " सोलह वर्ष " शब्द रखे
जाएंगे;
(ii) खंड ( ख ) में " अवयस्क " शब्द के स्थान पर " अल्पवय व्यक्ति " शब्द रखे जाएंगे ।
6. मूल अधिनियम की धारा 95 के स्पष्टीकरण के खंड ( ख ) का लोप किया जाएगा ।
धारा 95 का संशोधन।
7. मूल अधिनियम की धारा 99 क में उसके स्पष्टीकरण का लोप किया जाएगा ।
धारा 99क का संशोधन ।
8. मूल अधिनियम की धारा 101 की उपधारा ( 2 ) में,-
धारा 101 का संशोधन ।
(i) खंड ( ग ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" ( गग ) सप्ताह में कार्य के घंटे और विश्राम जो विहित किए जाएं ;";
(ii) खंड ( च ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" ( चच) छुट्टी के लिए हकदारी जो विहित की जाए; " ; और
(iii) खंड ( ञ ) में " नियोजन से और उसके अनुक्रम में " शब्दों के स्थान पर " नियोजन से या नियोजन के अनुक्रम में " शब्द रखे जाएंगे;
(iv) खंड ( ट) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" ( टट) कर्मीदल के साथ करार के निबंधन, भारत में ऐसे संगठनों से, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा , नाविकों के नियोजकों का और नाविकों का सर्वाधिक प्रतिनिधित्व करने वाला अधिसूचित करे, परामर्श करने के पश्चात् अवधारित किए जाएंगे । " ।
9. मूल अधिनियम की धारा 109 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी , अर्थात्ः-
धारा 109 के स्थान परनई धारा का प्रतिस्थापन ।
" 109. ( 1 ) किसी पोत पर सोलह वर्ष की आयु से कम का कोई व्यक्ति किसी भी हैसियत में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा या समुद्रयात्रा पर नहीं ले जाया जाएगा ।
( 2 ) ( क ) कोई अल्पवय व्यक्ति, रात्रि में कार्य पर नियुक्त नहीं किया जाएगा;
कतिपय दशाओं में अल्पवय व्यक्तियों कीनियुक्तिका प्रतिषेध ।
(ख ) रात्रि में कार्य की अवधि, ऐसी होगी , जो विहित की जाए:
परंतु पोत परिवहन का महानिदेशक, रात्रि में, -
(i) प्रभावी प्रशिक्षण देने के लिए; या
(ii ) विनिर्दिष्ट प्रकृति के कर्तव्य का पालन करने के लिए,
रात्रि में ऐसे कार्य पर जो ऐसे अल्पवय व्यक्ति के स्वास्थ्य या कल्याण के लिए अहितकर नहीं होगी, आदेश द्वारा , किसी अल्पवय व्यक्ति को लगाने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा । " ।
धारा 110 कालोप ।
10. मूल अधिनियम की धारा 110 का लोप किया जाएगा ।
11. मूल अधिनियम की धारा 113 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी, अर्थात्ः-
धारा 113 के स्थान
पर नई धारा का प्रतिस्थापन ।
" 113. केन्द्रीय सरकार, अल्पवय व्यक्तियों के नियोजन के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित विषयों कोविहित करने के लिए नियम बना सकेगी,-
अल्पवय व्यक्तियों के नियोजन के संबंध में नियम बनाने की शक्ति।
(क ) वे प्राधिकारी , जिनके दिए गए शारीरिक समर्थता के प्रमाणपत्र धारा 111 के प्रयोजनों के लिए स्वीकार किए जाएंगे;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
42
(ख ) उस पोत पर, जिस पर कर्मीदल के साथ कोई करार नहीं किया गया है, रखे जाने वाला अल्पवय व्यक्तियों के रजिस्टर का प्ररूप । " ।
धारा 132 का संशोधन ।
12. मूल अधिनियम की धारा 132 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( क ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" ( क ) जहां विवाद की रकम, पांच लाख रुपए तक या दस लाख रुपए से अनधिक की ऐसी उच्चतर रकम तक है जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, विवाद के पक्षकारों में से किसी के अनुरोध पर;" ।
धारा 168 का संशोधन ।
13. मूल अधिनियम की धारा 168 की उपधारा ( 6 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी , अर्थात्ः-
" (7) पोत का मास्टर या पोत का भारसाधक कोई व्यक्ति, पोत पर नाविकों को प्रदान किए गए
खाद्य और पेय जल की मात्रा तथा गुणवत्ता के लिए समुद्रीय श्रम अभिसमय के उपबंधों के अनुसार ऐसे मानकों को और खाद्य को लागू ऐसे खानपान मानक, जो विहित किए जाएं, बनाए रखेगा ।
(8 ) पोत का मास्टर या पोत का भारसाधक कोई व्यक्ति, जानकारी का अभिवर्धन और उपधारा ( 7 ) में निर्दिष्ट मानकों का क्रियान्वयन करने के लिए शैक्षणिक क्रियाकलाप कराएगा । " ।
धारा 173 का संशोधन ।
14. मूल अधिनियम की धारा 173 की उपधारा ( 1 ) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 1 ) प्रत्येक विदेशगामी पोत,-
(क) विहित संख्या से अधिक व्यक्तियों का ( जिसमें कर्मीदल सम्मिलित हैं ) वहन करने वाला, अपने कर्मीदल के भाग के रूप में ऐसी अर्हताओं वाला एक चिकित्सा अधिकारी; और
(ख) विहित संख्या से कम व्यक्तियों का वहन करने वाला, ऐसी चिकित्सीय सुविधाएं, जो समुद्रीय श्रम अभिसमय के उपबंधों के अनुसार विहित की जाएं, रखेगा । " ।
15. मूल अधिनियम की धारा 176 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
नई धारा 176क का अंतःस्थापन ।
" 176क. ( 1 ) किसी अन्य देश में, पांच हजार टन कुल या अधिक के और अंतरराष्ट्रीय समुद्रयात्रा मेंलगे या किसी पत्तन या पत्तनों के बीच प्रचालित समस्त पोत, समुद्रीय श्रम प्रमाणपत्र और समुद्रीय श्रम अनुपालन की घोषणा को रखेंगे ।
(2) उपधारा ( 1 ) के अधीन नहीं आने वाले पोत , जब तक उनको केन्द्रीय सरकार से छूट प्रदान
पोतों का, समुद्रीय श्रम प्रमाणपत्र और समुद्रीय अनुपालन श्रम की घोषणा का रखा जाना ।
नहीं की जाए, ऐसा प्रमाणपत्र, ऐसी रीति और प्ररूप में, जो विहित किया जाए, रखेंगे ।
(3) पोत परिवहन मास्टर, सर्वेक्षक, नाविक कल्याण अधिकारी , पत्तन स्वास्थ्य अधिकारी, भारतीय काँसलीय आफिसर या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी पत्तन पर कोई अन्य अधिकारी , किसी पोत का, ऐसी रीति से , जो विहित की जाए, निरीक्षण कर सकेगा और पोत का मास्टर या पोत का भारसाधक कोई व्यक्ति, ऐसे निरीक्षण अधिकारी को, समुद्रीय श्रम प्रमाणपत्र और समुद्रीय श्रम अनुपालन की घोषणा उपलब्ध कराएगा । " ।
16. मूल अधिनियम की धारा 218 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
नई धारा 218कका अंतःस्थापन ।
" 218 क. ( 1 ) केन्द्रीय सरकार, समुद्रीय श्रम अभिसमय के उपबंधों का ध्यान रखते हुए और भारत में ऐसे संगठनों से जिन्हें केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा नाविकों के नियोजकों का और नाविकों का सर्वाधिक प्रतिनिधित्व करने वाला अधिसूचित करे, परामर्श करने के पश्चात्, इस भाग के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
श्रम समुद्रीय अभिसमय के प्रयोजनों के लिए नियम बनाने की शक्ति ।
(2 ) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना , ऐसे नियम, निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-
(i ) धारा 101 की उपधारा ( 2 ) के खंड ( गग ) के अधीन सप्ताह में कार्य घंटे और विश्राम; (ii) धारा 101 की उपधारा ( 2 ) के खंड ( चच ) के अधीन छुट्टी की हकदारी;
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
43
(iii) धारा 109 की उपधारा ( 2 ) के खंड ( ख ) के अधीन रात्रि में कार्य की अवधि;
(iv) धारा 168 की उपधारा ( 7 ) के अधीन पोतों पर नाविकों को प्रदत्त खाद्य को लागू खानपान मानकों सहित खाद्य और पेय जल की मात्रा और गुणवत्ता के लिए मानक;
(v) धारा 173 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( क) के अधीन चिकित्सा अधिकारी की अर्हताएं
और खंड ( ख ) के अधीन चिकित्सीय सुविधाएं;
(vi) धारा 176क की उपधारा ( 2 ) के अधीन पोतों को प्रदान किए जाने वाले प्रमाणपत्र की रीति और प्ररूप;
(vii) धारा 176क की उपधारा ( 3 ) के अधीन सामुद्रिक श्रम प्रमाणपत्र और सामुद्रिक श्रम अनुपालन की घोषणा के कब्जे का सत्यापन करने के लिए पोत में निरीक्षण करने की रीति;
(viii ) कोई अन्य विषय , जो सामुद्रिक श्रम अभिसमय से संबंधित विहित किया जाए या विहित किया जाना है ।" ।
17. मूल अधिनियम की धारा 436 की उपधारा ( 2 ) की सारणी के क्रम संख्यांक 25 के सामने,-
धारा 436 का संशोधन।
(क) स्तंभ (2 ) में " या धारा 110 " तथा " , धारा 110 " शब्दों और अंकों का लोप किया
जाएगा; और
(ख) स्तंभ (3 ) में" 110 " अंकों का लोप किया जाएगा ।
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 44 भारत का राजपत्र असाधारण
45 अनुभाग 1क]
सरकारी स्थान ( अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) संशोधन अधिनियम , 2015
(2015 का अधिनियम संख्यांक 2)
[31 मार्च , 2015]
सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम , 1971
का और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित
1. (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिभोगियों की संक्षिप्त नाम और बेदखली ) संशोधन अधिनियम, 2015 है । प्रारंभ ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , नियत करे ।
1971 का 40
धारा 2 का 2. सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 (जिसे इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम कहा गया है) की धारा 2 के खंड (ङ) के उपखंड (2) में,- संशोधन ।
1956 का 1
2013 का 18
(अ) मद (i ) में, " कंपनी अधिनियम, 1956 " शब्दों और अंकों के स्थान पर, " कंपनी अधिनियम, 2013 " शब्द और अंक रखे जाएंगे ;
1956 का 1
(आ) मद ( ii) में, " कंपनी अधिनियम, 1956" शब्दों और अंकों के स्थान पर,
2013 का 18
" कंपनी अधिनियम, 2013 " शब्द और अंक रखे जाएंगे ;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
46
(इ) मद (iii) के स्थान पर, निम्नलिखित मदें रखी जाएंगी, अर्थात्ः-
2013 का 18 '(iii) कंपनी अधिनियम , 2013 की धारा 2 के खंड (20) में यथापरिभाषित कोई ऐसी कंपनी , जिसमें समादत्त शेयर पूंजी का इक्यावन प्रतिशत से अन्यून भाग भागतः केन्द्रीय सरकार द्वारा धारित हो और भागतः एक या अधिक राज्य सरकारों द्वारा धारित हो और इसमें ऐसी कंपनी भी सम्मिलित है, जो (उस अधिनियम के अर्थ में) प्रथम वर्णित कंपनी की समनुषंगी हो और जो सार्वजनिक परिवहन का, जिसके अंतर्गत मेट्रो रेल भी है, कारबार करती है ।
2002 का 60 स्पष्टीकरण- इस मद के प्रयोजनों के लिए , " मेट्रो रेल " का वही अर्थ होगा जो मेट्रो रेल (प्रचालन और अनुरक्षण ) अधिनियम, 2002 की धारा 2 की उपधारा (1 ) के खंड (i ) में उसका है ;
(iiiक) किसी केंद्रीय अधिनियम द्वारा स्थापित या निगमित कोई विश्वविद्यालय; ' ;
(ई) मद (v) के स्थान पर, निम्नलिखित मद रखी जाएगी , अर्थात्ः-
1963 का 38 " (v) महापत्तन न्यास अधिनियम, 1963 के अधीन गठित या उसमें निर्दिष्ट कोई न्यासी बोर्ड या कोई उत्तरवर्ती कंपनी ; " ;
(उ) उपखंड (3) में, -
1994 का 44
1957 का 66 (क) मद (i) में , " दिल्ली नगर निगम " शब्दों के स्थान पर, " नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् अधिनियम , 1994 की धारा 2 के खंड (9 ) में यथापरिभाषित परिषद् या दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 3 की उपधारा (1 ) के अधीन अधिसूचित किया गया निगम या किए गए निगम " शब्द, कोष्ठक और अंक रखे जाएंगे ;
(ख) मद (iii) के पश्चात्, निम्नलिखित मद अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
2013 का 18
' (iv) कंपनी अधिनियम , 2013 की धारा 2 के खंड (45) में यथापरिभाषित किसी सरकारी कंपनी का या उसके द्वारा अथवा उसकी ओर से पट्टे पर लिया गया कोई स्थान ।
स्पष्टीकरण इस खंड के प्रयोजनों के लिए, उक्त धारा के खंड (45) में आने वाले " राज्य सरकार " पद से " दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन " अभिप्रेत है । ' ;
(ऊ) खंड (चक) में, -
(क) उपखंड ( ii) में, " उपखंड (2) की मद (i ) में " शब्दों, कोष्ठकों और अंकों के पश्चात् " और उपखंड (3 ) की मद ( iv) में " शब्द, कोष्ठक और अंक अन्तःस्थापित किए जाएंगे ;
(ख) उपखंड (v) में " निगम " शब्द के स्थान पर " परिषद्, निगम (कारपोरेशन) या निगम (कारपोरेशन्स ) " शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 4 का
3. मूल अधिनियम की धारा 4 में,-
संशोधन ।
(क) उपधारा (1 ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधाराएं रखी जाएंगी, अर्थात्: -
" (1 ) यदि संपदा अधिकारी के पास इस बात की सूचना है कि कोई व्यक्ति किसी सरकारी स्थान का अप्राधिकृत अधिभोग कर रहा है और उसे बेदखल किया जाना चाहिए तो वह संपदा अधिकारी , अप्राधिकृत अधिभोग के संबंध में जानकारी प्राप्त होने की तारीख से सात कार्य दिवसों के भीतर, इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति में एक लिखित सूचना जारी करेगा , जिसमें अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
47
संबंधित व्यक्ति से अपेक्षा की जाएगी कि वह कारण दर्शित करे कि बेदखली का आदेश क्यों न किया जाए ।
(1क) यदि संपदा अधिकारी यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने के कारण हैं कि कोई व्यक्ति किसी सरकारी स्थान का अप्राधिकृत अधिभोग कर रहा है तो वह, उपधारा ( 1 क) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, तत्काल एक लिखित सूचना जारी करेगा , जिसमें संबंधित व्यक्ति से अपेक्षा की जाएगी कि वह कारण दर्शित करे कि बेदखली का आदेश क्यों न किया जाए ।
(1ख) उपधारा (1 ) और उपधारा ( 1 क) में निर्दिष्ट सूचना जारी करने में हुए किसी विलंब से , इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियां दूषित नहीं होंगी । " ;
(ख) उपधारा (2) के खंड ( ख ) के उपखंड (i) में, " से अधिक पहले की" शब्दों के स्थान पर, " के पश्चात् की " शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 5 का 4. मूल अधिनियम की धारा 5 में,-
संशोधन ।
(क
) उपधारा ( 1 ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी , अर्थात्ः-
" (1 ) यदि, धारा 4 के अधीन सूचना के अनुसरण में किसी व्यक्ति द्वारा दर्शित कारण , यदि कोई हो, पर और उसके समर्थन में उसके द्वारा पेश किए गए किसी साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् और धारा 4 की उपधारा (2) के खंड (ख) के उपखंड ( ii) के अधीन व्यक्तिगत सुनवाई, यदि कोई हो, करने के पश्चात्, संपदा अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि सरकारी स्थान अप्राधिकृत अधिभोग में हैं तो संपदा अधिकारी बेदखली का आदेश देगा जिसमें उसके कारण अभिलिखित होंगे और यह निदेश होगा कि सरकारी स्थान उस तारीख को, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए , किन्तु जो आदेश की तारीख से पन्द्रह दिन के पश्चात् की न हो , उन सभी व्यक्तियों द्वारा , जो उसका या उसके किसी भाग का अधिभोग कर रहे हैं, खाली कर दिया जाए और उस आदेश की एक प्रति उस सरकारी स्थान के बाहरी द्वार पर या किसी अन्य सहजदृश्य भाग पर लगवाएगा :
परंतु संपदा अधिकारी द्वारा इस उपधारा के अधीन प्रत्येक आदेश यथासंभवशीघ्रता के साथ किया जाएगा और उसके द्वारा धारा 4 की, यथास्थिति, उपधारा ( 1 ) या उपधारा (1 क) के अधीन सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख के पन्द्रह दिन के भीतर आदेश जारी करने के सभी प्रयास किए जाएंगे ।" ;
(ख) उपधारा (2) के पश्चात्, निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" परन्तु यदि संपदा अधिकारी का लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से यह समाधान हो जाता है कि कोई ऐसा बाध्यकारी कारण विद्यमान है जो उस व्यक्ति को पन्द्रह दिन के भीतर स्थान खाली करने से निवारित करता है, तो संपदा अधिकारी , उस व्यक्ति को स्थान खाली करने के लिए उपधारा ( 1 ) के अधीन आदेश की समाप्ति की तारीख से पन्द्रह दिन का और समय प्रदान कर सकेगा । " ।
5. मूल अधिनियम की धारा 7 में,-
धारा 7 का
संशोधन ।
(क) उपधारा ( 2 क) में, " साधारण ब्याज " शब्दों के स्थान पर " चक्रवृद्धि ब्याज" शब्द रखे जाएंगे ;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
48
(ख) उपधारा (3) में, " उतने समय के अन्दर जितना सूचना में विनिर्दिष्ट हो " शब्दों के स्थान पर, " उसके जारी किए जाने की तारीख से सात दिन के भीतर" शब्द रखे जाएंगे;
(ग) उपधारा (3) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी ,
अर्थात्ः-
" (4) संपदा अधिकारी द्वारा , इस धारा के अधीन प्रत्येक आदेश यथासंभव शीघ्रता के साथ किया जाएगा और उसके द्वारा सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख के पन्द्रह दिन के भीतर आदेश जारी करने के सभी प्रयास किए जाएंगे। " ।
6. मूल अधिनियम की धारा 9 में,-
धारा 9 का संशोधन ।
(क) उपधारा (2) में, परंतुक के स्थान पर, निम्नलिखित परंतुक रखा जाएगा,
अर्थात्:-
" परंतु यदि अपील अधिकारी का लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से यह समाधान हो जाता है कि ऐसे बाध्यकारी कारण विद्यमान थे , जिनसे व्यक्ति समय पर अपील फाइल करने से निवारित हो गया था तो वह आपवादिक मामलों में उक्त कालावधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा। " ;
(ख) उपधारा (4) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्ः-
" (4) इस धारा के अधीन अपील अधिकारी द्वारा प्रत्येक अपील का यथासंभव शीघ्रता के साथ निपटारा किया जाएगा और पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् अपील का अंतिम रूप से निपटारा , अपील फाइल किए जाने की तारीख से एक मास के भीतर करने का प्रत्येक प्रयास किया जाएगा ।" ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1 क]
49
संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश ( संशोधन) अधिनियम, 2015
(2015 का अधिनियम संख्यांक 4)
[20मार्च, 2015]
जातियां आदेश , 1962
का और संशोधन
करने के लिए
हरियाणा , कर्नाटक और ओडिशा राज्यों में अनुसूचित जातियों की सूची का उपांतरण करने के लिए संविधान (अनुसूचित जातियां ) आदेश , 1950 तथा संविधान ( दादरा और नागर हवेली) अनुसूचित अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-
1. इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश (संशोधन) संक्षिप्त नाम । अधिनियम, 2015 है ।
सं० आ0 19
संविधान 2. संविधान ( अनुसूचित जातियां) आदेश , 1950 की अनुसूची में,-
(अनुसूचित
जातियां)
आदेश, 1950 (क) भाग 5-हरियाणा में, प्रविष्टि 19 के स्थान पर रखें,- " 19. कबीरपंथी, जुलाहा, कबीरपंथी जुलाहा";
का संशोधन ।
(ख) भाग 7-कर्नाटक में, प्रविष्टि 23 के स्थान पर रखें ,
" 23. भोवी, ओड, ओड्डे, वड्डार, वड्डर, वोड्डार, वोड्डर, बोवी (बिस्ता इतर) कल्लूवाड्डार, मन्नूवड्डार" ;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
50
(ग) भाग 13-ओडिशा में,-
(i) प्रविष्टि 26 और प्रविष्टि 27 के स्थान पर रखें,-
"26. धोबा, धोबी, रजक, रजाका ;
27. डोम , डोम्बौ, दुरिया डोम, अधुरिया डोम , अधुरिया डोम्ब" ;
(ii) प्रविष्टि 44, प्रविष्टि 45 और प्रविष्टि 46 के स्थान पर रखें ,-
"44. कटिआ, खाटिया ;
45. केला, सपुआ केला, नलुआ केला, सबखिया केला, मटिया केला, गोडिया केला ;
46. खदाल, खादल, खोदल" ;
(iii ) प्रविष्टि 91 के स्थान पर रखें,-
" 91. तुरी, बेतरा " ;
(घ) भाग 24-उत्तरांचल में " उत्तरांचल " के स्थान पर " उत्तराखंड" रखें ।
3. संविधान (दादरा और नागर हवेली) अनुसूचित जातियां आदेश, 1962 की अनुसूची में , सं० आ0 64 प्रविष्टि2 के स्थान पर रखें,-
" 2. चमार, रोहित ।" ।
संविधान (दादरा और नागर हवेली) अनुसूचित जातियां आदेश, 1962 का संशोधन ।
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
51
खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम, 2015 (2015 का अधिनियम संख्यांक 10 )
[26मार्च, 2015]
खान और खनिज (विकास और विनियमन ) अधिनियम, 1957
का और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
1.(1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम संक्षिप्त नाम और प्रारंभ ।
2015है।
(2 ) यह 12 जनवरी , 2015 से प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
52
1957 का67 धारा 3 का संशोधन । 2. खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) अधिनियम, 1957 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम कहा गया है ) , की धारा 3 में,-
(i ) खंड ( ङ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः- '(डक ) " अधिसूचित खनिज " से चौथी अनुसूची में विनिर्दिष्ट खनिज अभिप्रेत है; ' ;
( ii ) खंड ( छ ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
' (छक ) " पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह - खनन पट्टा " से खनन संक्रियाओं के पश्चात् पूर्वेक्षण संक्रियाएं करने के प्रयोजन के लिए अनुदत्त दो स्तरीय रियायत अभिप्रेत है; ';
(iii) खंड ( जख ) में अंत में आने वाले " और " शब्द का लोप किया जाएगा;
(iv) खंड ( जख ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्:-
' (जग ) " विशेष न्यायालय " से धारा 30 ख की उपधारा ( 1 ) के अधीन विशेष न्यायालय के रूप में अभिहित सेशन न्यायालय अभिप्रेत है; और ' ।
1956 का 1 2013 का 18 धारा 4का संशोधन।
3. मूल अधिनियम की धारा 4 में उपधारा ( 1 ) के दूसरे परंतुक में, " कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 617 के अर्थ में सरकारी कम्पनी है " शब्दों और अंकों के स्थान पर, " कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 के खंड ( 45 ) के अर्थ में सरकारी कम्पनी है और ऐसे किसी अस्तित्व द्वारा , जिसे इस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए " शब्द, अंक और कोष्ठक रखे जाएंगे ।
धारा 4क का संशोधन ।
4. मूल अधिनियम की धारा 4 क की उपधारा ( 4 ) में परंतुकों के स्थान पर निम्नलिखित परंतुक रखे जाएंगे, अर्थात्ः-
" परंतु राज्य सरकार, पट्टे के ऐसे धारक द्वारा इस उपधारा के अधीन पट्टे के व्यपगत होने से पहले किए गए आवेदन पर और अपना यह समाधान हो जाने पर कि पट्टे के धारक के लिए, ऐसे कारणों से जिन पर उसका नियंत्रण नहीं है, ऐसी खनन संक्रियाओं का करना या ऐसी संक्रियाओं का जारी रखना संभव नहीं होगा, ऐसी शर्तों के अधीन जो विहित की जाएं, ऐसा आवेदन प्राप्त होने की तारीख से तीन मास की कालावधि के भीतर, इस आशय का आदेश कर सकेगी कि ऐसा पट्टा व्यपगत नहीं होगाः
परंतु यह और कि ऐसा पट्टा, राज्य सरकार के आदेश की तारीख से छह मास की कालावधि के समाप्त होने से पूर्व खनन संक्रियाएं करने में असफल होने या उन्हें जारी रखने में असमर्थ होने पर व्यपगत होजाएगा:
परंतु यह भी कि राज्य सरकार पट्टे के धारक द्वारा आवेदन किए जाने पर, जो पट्टे के व्यपगत होने कीतारीख से छह मास की कालावधि के भीतर प्रस्तुत किया गया हो और अपना यह समाधान हो जाने पर किऐसे प्रारंभ न किया जाना या बंद किया जाना ऐसे कारणों से हुआ है , जिन पर पट्टे के धारक का नियंत्रण नहीं था, पट्टे को ऐसे भविष्यलक्षी या भूतलक्षी तारीख से जिसे वह ठीक समझे , किन्तु जो पट्टे के व्यपगत होने की तारीख से पूर्वतर न हो , आवेदन प्राप्त होने की तारीख से तीन मास की कालावधि के भीतर पुनः प्रवर्तित कर सकेगी:
परंतु यह भी कि तीसरे परंतुक के अधीन किसी पट्टे को पट्टे की संपूर्ण कालावधि के दौरान दो बार सेअधिक पुनः प्रवर्तित नहीं किया जाएगा। " ।
5. मूल अधिनियम की धारा 5 में,-
धारा 5 का संशोधन ।
(क) उपधारा ( 1 ) में, -
2013का 18 1956 का 1 ( i ) खंड (क ) में, " कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 3 की उपधारा ( 1 ) " शब्दों, अंकों और कोष्ठकों के स्थान पर " कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 का खंड ( 20 ) " शब्द, अंक और कोष्ठक रखे जाएंगे;
(ii ) परंतुक के स्थान पर निम्नलिखित परंतुक रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" परंतु प्रथम अनुसूची के भाग क और भाग ख में विर्निदिष्ट किसी खनिज की बाबत कोई भूमीक्षण, अनुज्ञापत्र, पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या खनन पट्टा, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से ही अनुदत्त किया जाएगा, अन्यथा नहीं । " ;
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
53
(ख) उपधारा ( 2 ) में,-
(i) खंड ( क) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" ( क ) यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य है कि जिस क्षेत्र के लिए खनन पट्टे के लिए ऐसे पैरामीटरों के अनुसार जो इस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं आवेदन किया गया है , उसमें खनिज अंतर्वस्तु विद्यमान है; " ;
( ii) खंड ( ख ) के पश्चात् निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः--
" परंतु खनन योजना तैयार करने, उसका प्रमाणन और उसे मानीटर करने के लिए, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से राज्य सरकार द्वारा स्थापित प्रणाली के अनुसार ऐसी कोई योजना फाइल करने पर खनन पट्ट्टा अनुदत्त किया जा सकेगा । " ।
धारा 6 का संशोधन ।
6. मूल अधिनियम की धारा 6 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ख ) के परंतुक के स्थान पर निम्नलिखित परंतुक रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" परंतु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी खनिज या उद्योग के विकास के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह ऐसे कारणों से, जो उसके द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे पूर्वेक्षण खनिज या खनन पट्टे की बाबत पूर्वोक्त क्षेत्र सीमाओं को, जहां तक कि वे किसी विशिष्ट खनिज से संबंधित हैं या ऐसे खनिजों के भंडार विशिष्ट वर्ग से संबंधित हैं या किसी विशिष्ट क्षेत्र में अवस्थित किसी विशिष्ट खनिज से संबंधित हैं, बढ़ा सकेगी । " ।
7. मूल अधिनियम की धारा 8 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी , अर्थात्ः-
धारा 8 के स्थान पर नई धारा का प्रतिस्थापन ।
" 8. ( 1 ) इस धारा के उपबंध प्रथम अनुसूची के भाग क में विनिर्दिष्ट खनिजों को लागू होंगे ।
(2 ) वह अधिकतम कालावधि जिसके लिए खनन पट्टा अनुदत्त किया जा सकेगा तीस वर्ष से अधिक नहींहोगी:
वह कालावधि जिसके लिए खननपट्टे अनुदत्त या नवीकृतकिए जा सकेंगे ।
परंतु वह निम्नतम कालावधि जिसके लिए ऐसा कोई खनन पट्टा अनुदत्त किया जा सकेगा, बीस वर्ष सेकम नहीं होगी ।
( 3) किसी खनन पट्टे को बीस वर्ष से अनधिक कालावधि के लिए, केन्द्रीय सरकार के पूर्व
अनुमोदन से नवीकृत किया जा सकेगा । " ।
8. मूल अधिनियम की धारा 8 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः- नई धारा 8क का अंतःस्थापन ।
" 8क. ( 1 ) इस धारा के उपबंध प्रथम अनुसूची के भाग क और भाग ख में विनिर्दिष्ट खनिजों से भिन्न खनिजों को लागू होंगे ।
कोयला, लिग्नाइटऔर आणविक
खनिजों से भिन्न (2) खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ होने की तारीख से ही सभी खनन पट्टे पचास वर्ष की कालावधि के लिए अनुदत्त किए जाएंगे ।
खनिजों के लिए (3) खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ होने की तारीख से पूर्व अनुदत्त सभी खनन पट्टे पचास वर्ष की कालावधि के लिए अनुदत्त किए गए समझे जाएंगे ।
खनन पट्टा अनुदत्त करने की कालावधि।
(4 ) पट्टा कालावधि के अवसान पर पट्टे को इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार नीलामी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा ।
( 5 ) उपधारा ( 2 ) , उपधारा ( 3 ) और उपधारा ( 4 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां खनिज का उपयोग कैप्टिव प्रयोजन के लिए किया जाता है, खान और खनिज ( विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ की तारीख के पूर्व अनुदत्त पट्टे की कालावधि का, उसके अंतिम बार किए गए नवीकरण की कालावधि के अवसान की तारीख से 31 मार्च, 2030 को समाप्त होने वाली कालावधि तक के लिए या नवीकरण की कालावधि, यदि कोई हो, के पूरा होने तक के लिए या ऐसा पट्टा अनुदत्त किए जाने की तारीख से पचास वर्ष तक की कालावधि के लिए, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, इस शर्त के अधीन रहते हुए कि पट्टे के सभी निबंधनों और शर्तों का अनुपालन किया गया है, विस्तार किया जाएगा और विस्तार किया गया समझा जाएगा ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
54
(6 ) उपधारा ( 2 ) , उपधारा ( 3 ) और उपधारा ( 4 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां
खनिज का उपयोग कैप्टिव से भिन्न प्रयोजन के लिए किया जाता है, खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ की तारीख के पूर्व अनुदत्त पट्टे की कालावधि का उसके अंतिम बार किए गए नवीकरण की कालावधि के अवसान की तारीख से 31 मार्च , 2020 को समाप्त होने वाली कालावधि तक के लिए, या नवीकरण की कालावधि, यदि कोई हो, के पूरा होने तक के लिए या ऐसा पट्टाअनुदत्त किए जाने की तारीख से पचास वर्ष की कालावधि के लिए इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो , इस शर्त के अधीन रहते हुए कि पट्टे के सभी निबंधनों और शर्तों का अनुपालन किया गया है , विस्तार किया जाएगा और विस्तार किया गया समझा जाएगा ।
(7 ) अनुदत्त किए गए पट्टे के किसी धारक को, जहां खनिज का उपयोग किसी कैप्टिव प्रयोजन के लिएकिया गया है, पट्टा कालावधि के अवसान पर ऐसे पट्टे के लिए की जाने वाली नीलामी के समय, पहले इंकार का अधिकार होगा ।
(8 ) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी खनन पट्टों की कालावधि, जिसके अंतर्गत सरकारी कंपनियों या निगमों के विद्यमान खनन पट्टे सम्मिलित है, वह होगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए ।
(9 ) इस धारा के उपबंध , उनमें अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी खान और खनिज ( विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ होने की तारीख से पूर्व अनुदत्त ऐसे खनन पट्टे को, जिसके नवीकृत करने को अस्वीकृत किया गया है, या जिसका अवधारण किया गया है या जो व्यपगत हो गया है, लागू नहीं होंगे। "। 9. मूल अधिनियम की धारा १ क के पश्चात् निम्नलिखित धाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः-
नई धारा 9ख और धारा 9ग काअंतःस्थापन । जिला खनिज प्रतिष्ठान ।
" 9ख. ( 1 ) राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा खनन से संबंधित संक्रियाओं से प्रभावित किसी जिले में जिला खनिज प्रतिष्ठान के नाम से ज्ञात एक अलाभकर निकाय के रूप में एक न्यास की स्थापना करेगी ।
(2) जिला खनन प्रतिष्ठान का उद्देश्य खनन से संबंधित संक्रियाओं से प्रभावित व्यक्तियों और क्षेत्रों के हित और फायदे के लिए ऐसी रीति में कार्य करना होगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।
(3 ) जिला खनिज प्रतिष्ठान का गठन और कृत्य वे होंगे जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।
1996 का 40 2007 का 2 (4) राज्य सरकार, उपधारा ( 2 ) और उपधारा ( 3 ) के अधीन नियम बनाते समय अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित संविधान की पांचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची के साथ पठित अनुच्छेद 244 में अंतर्विष्ट उपबंधों तथा पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार ) अधिनियम, 1996 तथा अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी ( वन अधिकारों की मान्यता ) अधिनियम, 2006 से मार्ग दर्शित होगी ।
(5) खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ की तारीख को या उसके पश्चात् अनुदत्त खनन पट्टे या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति सह खनन पट्टे का धारक, उस जिले के जिला खनिज प्रतिष्ठान को जिसमें खनन संक्रियाएं की गई हैं, स्वामिस्व के अतिरिक्त ऐसी रकम का संदाय करेगा जो दूसरी अनुसूची के निबंधनानुसार संदत्त स्वामिस्व की ऐसी प्रतिशतता के समतुल्य है, जो केंद्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए किन्तु जो ऐसे स्वामिस्व के एक- तिहाई से अधिक नहीं हो ।
(6) खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ की तारीख से पहले अनुदत्त खनन पट्टे का धारक , उस जिले के, जिला खनिज प्रतिष्ठान को जिसमें खनन संक्रियाएं की गई हैं, स्वामिस्व के अतिरिक्त, द्वितीय अनुसूची के निबंधनानुसार ऐसी रीति में तथा खनन पट्टों के वर्गीकरण और पट्टा धारकों के विभिन्न वर्गों द्वारा संदेय रकमों के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए, संदत्त स्वामित्व से अनधिक रकम का संदाय करेगा ।
9ग . ( 1 ) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा राष्ट्रीय खनिज खोज न्यास के नाम से ज्ञात एक अलाभकर निकाय के रूप में एक न्यास की स्थापना करेगी ।
राष्ट्रीय खनिज खोज न्यास ।
(2 ) न्यास का उद्देश्य , प्रादेशिक और विस्तृत खोज के प्रयोजनों के लिए न्यास को प्रोद्भूत निधियों का उपयोग ऐसी रीति में करना होगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए ।
(3 ) न्यास का गठन और कृत्य वे होंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।
(4) खनिज पट्टे या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह - खनन पट्टे का धारक, न्यास को द्वितीय अनुसूची के निबंधनों में संदत्त स्वामिस्व के दो प्रतिशत के समतुल्य राशि का संदाय ऐसी रीति में करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए । " ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
55
10. मूल अधिनियम की धारा 10 के पश्चात् निम्नलिखित धाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः नई धारा 10क, धारा 10ख और धारा 10गका अंतःस्थापन ।
धारकों और " 10क. ( 1 ) खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम , 2015 के प्रारंभ विद्यमान रियायत होने की तारीख से पूर्व प्राप्त सभी आवेदन अपात्र हो जाएंगे ।
आवेदकों के ( 2 ) उपधारा ( 1 ) पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना निम्नलिखित खान और खनिज ( विकास और अधिकार। विनियमन ) संशोधन अधिनियम , 2015 के प्रारंभ होने की तारीख से ही पात्र रहेंगे ;-
(क) इस अधिनियम की धारा 11 क के अधीन प्राप्त आवेदन;
(ख ) जहां खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ होने से पूर्व किसी भूमि की बाबत किसी खनिज के संबंध में कोई भूमीक्षण अनुज्ञापत्र या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति अनुदत्त की गई है, वहां अनुज्ञापत्रधारक या अनुज्ञप्तिधारी को, यथास्थिति, पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति अभिप्राप्त करने के पश्चात् खनन पट्टा या उस भूमि में उस खनिज की बाबत खनन पट्टा अभिप्राप्त करने का अधिकार होगा, यदि राज्य सरकार का यह समाधान हो जाता है कि, यथास्थिति, अनुज्ञापत्रधारक या अनुज्ञप्ति धारक ने,-
( i ) उस भूमि में खनिज अंतर्वस्तु विद्यमान होने को साबित करने के लिए ऐसे पैरामीटरों के अनुसार जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं, यथास्थिति, भूमीक्षण संक्रियाएं या पूर्वेक्षण संक्रियाएं की हैं;
कियाहै; ( ii ) भूमीक्षण अनुज्ञापत्र या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति के निबंधनों और शर्तों को भंग नहीं
( iii ) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन अपात्र नहीं हो गया है; और
( iv) यथास्थिति , भूमीक्षण अनुज्ञापत्र या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति के समाप्त होने के पश्चात्तीन मास की कालावधि के भीतर या ऐसी छह मास से अनधिक और कालावधि जो राज्य सरकार द्वारा विस्तारित की जाए, के भीतर, यथास्थिति, पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या खनन पट्टा अनुदत्त करने के लिए आवेदन करने के लिए असफल नहीं रहा है;
( ग) जहां केन्द्रीय सरकार ने खनन पट्टा अनुदत्त करने के लिए धारा 5 की उपधारा ( 1 ) के अधीन यथा अपेक्षित पूर्व अनुमोदन से संसूचित कर दिया है या यदि राज्य सरकार द्वारा खनन पट्टा अनुदत्त करने के लिए खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम, 2015 के प्रारंभ होने से पूर्व, आशय पत्र ( चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो ) , जारी कर दिया गया है, वहां खनन पट्टा पूर्व अनुमोदन या आशय पत्र की शर्तों को पूरा करने के अधीन रहते हुए उक्त अधिनियम के प्रारंभ होने की तारीख से दो वर्ष की कालावधि के भीतर अनुदत्त किया जाएगा:
परंतु प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी खनिज की बाबत इस उपधारा के खंड ( ख ) के अधीन के सिवाय केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, कोई पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या खनन पट्टा अनुदत्त नहीं किया जाएगा ।
10ख. ( 1 ) इस धारा के उपबंध धारा 10क या धारा 17क के अंतर्गत आने वाले मामलों को या प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में विनिर्दिष्ट खनिजों को या उस भूमि की बाबत जिसके खनिज सरकार में निहित नहीं हैं , को लागू नहीं होंगे ।
नीलामी के माध्यम से अधिसूचित खनिजों की बाबत खनन पट्टा अनुदत्त ( 2) जहां किसी क्षेत्र की बाबत अधिसूचित खनिज की खनिज अंतर्वस्तु की विद्यमानता को दर्शित करना । करने के लिए अपर्याप्त साक्ष्य हैं , तो राज्य सरकार, केन्द्रीय सरकार का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त करने के पश्चात्धारा 11 में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसरण में, ऐसे क्षेत्र में उक्त अधिसूचित खनिजों के लिए पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टा अनुदत्त कर सकेगी ।
(3 ) उन क्षेत्रों में, जहां किसी अधिसूचित खनिज अंतर्वस्तु की विद्यमानता केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित रीति में स्थापित की गई है, राज्य सरकार ऐसे क्षेत्रों को ऐसे अधिसूचित खनिज के लिए खनन पट्टा अनुदत्त करने के लिए, ऐसे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन ऐसा खनन पट्टा अनुदत्त किया जा सकेगा और किन्हींअन्य सुसंगत शर्तों को , ऐसी रीति में जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए, अधिसूचित करेगी ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
56
(4 ) राज्य सरकार, ऐसे अधिसूचित क्षेत्र में किसी अधिसूचित खनिज की बाबत खनन पट्टा अनुदत्त करने के प्रयोजन के लिए प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से, जिसके अंतर्गत ई- नीलामी भी है, किसी ऐसे आवेदक का चयन करेगी जो इस अधिनियम में यथा विनिर्दिष्ट पात्रता शर्तों को पूरा करता है ।
(5) केन्द्रीय सरकार उन निबंधनों और शर्तों तथा प्रक्रिया को विहित करेगी , जिनके अधीन रहते हुए, जिसके अंतर्गत चयन के लिए बोली के पैरामीटर भी हैं, नीलामी का संचालन किया जाएगा , जिसके अंतर्गत खनिज के उत्पादन में हिस्सा या संदेय स्वामिस्व से संबंधित कोई संदाय या कोई अन्य सुसंगत पैरामीटर या उनका कोई संयोजन या उपांतरण भी हो सकेगा ।
(6) केन्द्रीय सरकार उपधारा ( 5 ) की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि उसकी राय हैकि ऐसा करना आवश्यक और समीचीन है, खनिजों की श्रेणियों, किसी राज्य या राज्यों में खनिज निक्षेप के आकार और क्षेत्र की बाबत , निबंधन और शर्तें, प्रक्रिया और बोली पैरामीटर जिनके अधीन बोली का संचालन किया जाएगा, विहित कर सकेगीः
परंतु निबंधनों और शर्तों में किसी विशिष्ट खान या खानों का विशिष्ट अंतिम उपयोग के लिए आरक्षण और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो ऐसे पात्र अंतिम उपयोगकर्ताओं को बोली में भाग लेने के लिए अनुज्ञात करे, को सम्मिलित किया जा सकेगा ।
(7 ) राज्य सरकार किसी अधिसूचित क्षेत्र में, ऐसे अधिसूचित खनिज की बाबत इस धारा में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसरण में चयनित किसी आवेदक को खनन पट्टा अनुदत्त करेगी ।
गैर समाविष्ट भूमीक्षणअनुज्ञा पत्रोंकाअनुदत्त कियाजाना।
10ग. (1 ) प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में विनिर्दिष्ट खनिजों से भिन्न किसी अधिसूचित खनिज या गैर अधिसूचित खनिज या विनिर्दिष्ट खनिजों के समूह के लिए ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं, गैर समाविष्ट भूमीक्षण अनुज्ञापत्र अनुदत्त किए जासकेंगे ।
(2 ) ऐसे गैर समाविष्ट भूमीक्षण अनुज्ञापत्र धारक किसी पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टे या किसी खनन पट्टे को अनुदत्त किए जाने के लिए दावा करने का हकदार नहीं होगा । " ।
11. मूल अधिनियम की धारा 11 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी , अर्थात्ः-
धारा 11 केस्थान परनई धारा का प्रतिस्थापन ।
" 11. ( 1 ) इस धारा के उपबंध धारा 10 क या धारा 17 क के अंतर्गत आने वाले मामलों को या प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में विनिर्दिष्ट खनिजों को या उस भूमि की बाबत जिसके खनिज सरकार में निहित नहीं हैं, लागू नहीं होंगे ।
(2) उन क्षेत्रों में जहां धारा 5 की उपधारा ( 2 ) के खंड ( क ) द्वारा यथा अपेक्षित खनिज अंतर्वस्तु की विद्यमानता को दर्शित करने का साक्ष्य है, राज्य सरकार धारा 10 ख में अधिकथित प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए अधिसूचित खनिजों से भिन्न खनिजों के लिए खनन पट्य अनुदत्त करेगी ।
अधिसूचित खनिजों सेभिन्न खनिजों कीबाबत नीलामी केमाध्यम से पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह-खनन पट्टे का अनुदत्तकिया जाना ।
(3) उन क्षेत्रों में जहां धारा 5 की उपधारा ( 2 ) के खंड ( क ) के अधीन यथा अपेक्षित खनिज अंतर्वस्तु कीविद्यमानता को दर्शित करने के लिए अपर्याप्त साक्ष्य है, राज्य सरकार इस धारा में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसरण में अधिसूचित खनिजों से भिन्न खनिजों के लिए पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टा अनुदत्त करेगी ।
( 4 ) राज्य सरकार उन क्षेत्रों को जिनमें अधिसूचित खनिजों से भिन्न किन्हीं खनिजों के लिए पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति-सह-खनन पट्ट्टा प्रदान किया जाएगा , उन निबंधनों और शर्तों और किन्हीं अन्य सुसंगत शर्तों को, ऐसी रीति में , जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए, अधिसूचित करेगी ।
( 5 ) राज्य सरकार ऐसे अधिसूचित क्षेत्र में किसी अधिसूचित खनिज की बाबत पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति - सह - खनन पट्ट्टा अनुदत्त करने के प्रयोजन के लिए प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से जिसके अंतर्गत ई -नीलामी भी है, किसी ऐसे आवेदक का चयन करेगी जो इस अधिनियम में यथा विनिर्दिष्ट पात्रता शर्तों को पूरा करता है ।
(6) केन्द्रीय सरकार उन निबंधनों और शर्तों तथा प्रक्रिया को विहित करेगी जिनके अधीन रहते हुए नीलामी का जिसके अंतर्गत चयन के लिए बोली के पैरामीटर भी हैं, संचालन किया जाएगा , जिसके अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
57
अंतर्गत खनिज के उत्पादन में हिस्सा या संदेय स्वामिस्व से संबंधित कोई संदाय या कोई अन्य सुसंगत पैरामीटर या उनका कोई संयोजन या उपांतरण भी हो सकेगा ।
( 7 ) केन्द्रीय सरकार उपधारा ( 6 ) की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना , यदि उसकी राय
हैकिऐसा करना आवश्यक और समीचीन है , खनिजों की श्रेणियों, किसी राज्य या राज्यों में खनिज निक्षेप के आकार और क्षेत्र की बाबत, निबंधन और शर्तें , प्रक्रिया और बोली पैरामीटर जिनके अधीन बोली का संचालन किया जाएगा , विहित कर सकेगी ।
( 8 ) राज्य सरकार इस धारा में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसरण में चयनित किसी आवेदक को पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह - खनन पट्टा अनुदत्त करेगी ।
(9 ) पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह - खनन पट्य धारक से धारा 7 में अधिकथित अवधि के भीतर आवेदन आमंत्रित करने की सूचना में यथा विनिर्दिष्ट पूर्वेक्षण संक्रियाओं को समाधानप्रद रूप से पूरा किया जाना अपेक्षित होगा ।
(10 ) कोई पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टा धारक जो उपधारा ( 9 ) में यथा अधिकथित पूर्वेक्षण संक्रियाओं को पूरा करता है और इस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा यथा विहित पैरामीटरों केअनुसार क्षेत्र में खनन अंतर्वस्तु की विद्यमानता को स्थापित करता है, से ऐसे क्षेत्र के लिए खनन पट्टे के लिए आवेदन किया जाना अपेक्षित होगा और उसे खनन पट्य प्राप्त करने और तत्पश्चात् इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार खनन संक्रियाएं करने का अधिकार होगा । " ।
12. मूल अधिनियम की धारा 11 क के पश्चात् निम्नलिखित धाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी , अर्थात्ः- नई धारा 11 ख औरधारा 11 ग काअंतःस्थापन ।
केन्द्रीय सरकार की प्रथम अनुसूची के विनिर्दिष्ट आणविक भाग ख के अधीन खनिजों के " 11ख. केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रथम अनुसूची के भाग ख में विनिर्दिष्ट खनिजों की बाबत , खनन पट्टे या अन्य खनिज रियायतों को अनुदत्त करने का विनियमन करने के लिए और उनसे संबद्ध प्रयोजनों के लिए नियम बना सकेगी तथा राज्य सरकार ऐसे नियमों के अनुसार ऐसे किसी खनिज की बाबत भूमीक्षण अनुज्ञापत्र, पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या खनन पट्टा अनुदत्त करेगी ।
विनियमन के लिए नियम बनाने की शक्ति।
11 ग. केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रथम अनुसूची और चौथी अनुसूची का संशोधन कर सकेगी जिससे उसमें ऐसे किसी खनिज को जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, जोड़ा या हटाया जा सके । " ו
केन्द्रीय सरकार की प्रथम अनुसूची और चौथी अनुसूचीको संशोधित करने की शक्ति।
13. मूल अधिनियम की धारा 12 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः- नई धारा 12कका अंतःस्थापन ।
खनिज रियायतों का अंतरण ।
" 12क. ( 1 ) इस धारा के उपबंध प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में विनिर्दिष्ट खनिजों को लागूनहींहोंगे ।
( 2 ) किसी खनिज पट्टे या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टे का कोई धारक, धारा 10 ख या धारा 11 में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार , राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से, यथास्थिति, अपने खनन पट्टे या पूर्वेक्षण- सह- खनन पट्टे को ऐसी रीति में जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए, इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अनुसरण में ऐसे खनन पट्टे या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति सह-खनन- पट्टेह- खनन पट्टे को धारण करने के लिए पात्र व्यक्ति को अंतरित कर सकेगा ।
( 3 ) यदि राज्य सरकार, यथास्थिति, ऐसे खनन पट्टे या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह - खनन पट्टे के अंतरण के लिए ऐसी सूचना प्राप्त होने की तारीख से नब्बे दिन के भीतर अपने पूर्वानुमोदन की सूचना नहीं देती है, तो यह अर्थ लगाया जाएगा कि राज्य सरकार को ऐसे अंतरण पर कोई आपत्ति नहीं है:
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 58
परन्तु मूल खनन पट्टे या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टे का धारक राज्य सरकार को अंतरण के लिए हितबद्ध उत्तरवर्ती द्वारा संदेय प्रतिफल से संसूचित करेगा जिसके अंतर्गत पहले से ही की जा रही पूर्वेक्षण संक्रियाओं की बाबत प्रतिफल और संक्रियाओं के दौरान सृजित रिपोर्ट और डाटा भी हैं ।
(4) उपधारा ( 2 ) में निर्दिष्ट किसी खनन पट्टे या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टे का कोई अंतरण नहीं होगा यदि राज्य सरकार सूचना अवधि के भीतर और संसूचित किए जाने वाले लिखित कारणों सेअंतरण को इस आधार पर अननुमोदित कर देती है कि अंतरिती इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार पात्र नहीं है:
परन्तु किसी खनन पट्टे या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टे का ऐसा अंतरण किसी शर्त के, जिसके अधीन खनन पट्टा या पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह-खनन पट्टा अनुदत्त किया गया था, के उल्लंघन में नहींकिया जाएगा ।
(5 ) इस धारा के अधीन किए गए सभी अंतरण इस शर्त के अधीन होंगे कि अंतरिती ने तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन सभी शर्तों और दायित्वों को स्वीकार कर लिया है जिनके अधीन अंतरण, यथास्थिति, ऐसे खनन पट्टे या अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टे की बाबत था ।
(6) खनन रियायतों का अंतरण केवल उन रियायतों के लिए अनुज्ञात किया जाएगा जो नीलामी के माध्यम से अनुदत्त की गई हैं ।" ।
14. मूल अधिनियम की धारा 13 की उपधारा ( 2 ) में,-
धारा 13 का
संशोधन ।
(i) खंड ( ञ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" ( ञञ ) धारा 5 की उपधारा ( 2 ) के खंड ( क ) के अधीन खनिज अंतर्वस्तुकी विद्यमानता के पैरामीटर; ";
(ii) खंड ( थथ ) में अंत में आने वाले, " और " शब्द का लोप किया जाएगा ;
(iii) खंड ( थथ ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किए जाएंगे , अर्थात्ः-
" ( थथक ) धारा १ख की उपधारा ( 5 ) और उपधारा ( 6 ) के अधीन जिला खनिज प्रतिष्ठान को किए जाने वाले संदाय की रकम;
(थथख ) धारा 9 ग की उपधारा ( 2 ) के अधीन राष्ट्रीय खनिज खोज न्यास को उद्भूत निधियों के उपयोजन की रीति;
कृत्य; ( थथग ) धारा 9 ग की उपधारा ( 3 ) के अधीन राष्ट्रीय खनिज खोज न्यास की संरचना और
(थथघ ) धारा 9 ग की उपधारा ( 4 ) के अधीन राष्ट्रीय खनिज खोज न्यास को रकम के संदाय की रीति;
(थथङ) वे निबंधन और शर्तें जिनके अध्यधीन धारा 10ख की उपधारा ( 3 ) के अधीन खनन पट्टा अनुदत्त किया जाएगा;
(थथच) वे निबंधन और शर्तें तथा प्रक्रिया जिनके अध्यधीन नीलामी का संचालन किया जाएगा जिसके अंतर्गत धारा 10ख की उपधारा ( 5 ) के अधीन चयन के लिए बोली पैरामीटर भी हैं;
(थथछ) धारा 10ख , धारा 11 , धारा 11 क, धारा 11 ख और धारा 17क के अधीन खनन पट्टे यापूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति-सह - खनन पट्टे को अनुदत्त करने के लिए आवेदनों और उनके नवीकरण की कार्यवाही के विभिन्न प्रक्रमों की समय - सीमा;
(थथज ) धारा 10 ग की उपधारा ( 1 ) के अधीन गैर समाविष्ट भूमीक्षण अनुज्ञापत्रों को अनुदत्त करने के लिए निबंधन और शर्तें;
( थथझ) धारा 11 की उपधारा ( 4 ) के अधीन पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति- सह- खनन पट्टा अनुदत्त करने के लिए निबंधन और शर्तें;
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
59
( थथञ) धारा 11 की उपधारा ( 6 ) के अधीन चयन के लिए निबंधन और शर्तें तथा प्रक्रिया जिसके अंतर्गत बोली लगाने के पैरामीटर भी हैं ;
( थथट) धारा 17क की उपधारा ( 2 ग ) के अधीन खनन पट्टा अनुदत्त करने के लिए सरकारी कंपनी या निगम या किसी संयुक्त उद्यम द्वारा संदेय रकम; और" ।
धारा 15 का संशोधन ।
15. मूल अधिनियम की धारा 15 की उपधारा ( 3 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" ( 4 ) राज्य सरकार, उपधारा ( 1 ) , उपधारा ( 2 ) और उपधारा ( 3 ) पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना अधिसूचना द्वारा , निम्नलिखित के लिए इस अधिनियम के उपबंधों को विनियमित करने के लिए नियम बना सकेगी , अर्थात्ः-
(क) धारा १ख की उपधारा ( 2 ) के अधीन वह रीति जिसमें जिला खनिज प्रतिष्ठान प्रभावित व्यक्तियों और क्षेत्रों के हित और फायदे के लिए कार्य करेगा;
(ख) धारा 9ख की उपधारा ( 3 ) के अधीन जिला खनिज प्रतिष्ठान की संरचना और कृत्य; और
(ग) धारा 15क के अधीन गौण खनिजों के रियायत धारकों द्वारा जिला खनिज प्रतिष्ठान को किए जाने वाले संदाय की रकम। " ।
16. मूल अधिनियम की धारा 15 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः- नई धारा 15क का अंतःस्थापन ।
" 15क. राज्य सरकार, गौण खनिजों से संबंधित रियायत धारकों द्वारा उस जिले के, जिसमें खनन संक्रियाएं की जा रही हैं, जिला खनिज प्रतिष्ठान को संदाय की जाने वाली रकमों को विहित कर सकेगी । " ।
राज्य सरकार की गौण खनिजों की दशा मेंजिला खनिज प्रतिष्ठान के लिए निधियां एकत्रित करने की शक्ति ।
धारा 17क का संशोधन ।
17. मूल अधिनियम की धारा 17क की उपधारा ( 2 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः-
" (2क ) जहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार उपधारा ( 1 क ) या उपधारा (2 ) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी क्षेत्र को पूर्वेक्षण या खनन संक्रियाएं करने के लिए आरक्षित करती है, वहां राज्य सरकार ऐसे क्षेत्र की बाबत ऐसी सरकारी कंपनी या निगम को , यथास्थिति, पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या खनन पट्टा अनुदत्त करेगीः
परंतु राज्य सरकार, प्रथम अनुसूची के भाग क और भाग ख में विनिर्दिष्ट किसी खनिज की बाबत, यथास्थिति, पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या खनन पट्टा केन्द्रीय सरकार का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त करने के पश्चात् ही अनुदत्त करेगी ।
(2ख ) जहां सरकारी कंपनी या निगम पूर्वेक्षण संक्रियाएं या खनन संक्रियाएं अन्य व्यक्तियों के साथ संयुक्त उद्यम में करने की वांछा रखती हैं, वहां संयुक्त उद्यम भागीदार का चयन एक प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा और ऐसी सरकारी कंपनी या निगम ऐसे संयुक्त उद्यम में समादत्त शेयर पूंजी का चौहत्तर प्रतिशत से अधिक का धारण करेगी ।
(2 ग) उपधारा ( 2क ) और उपधारा ( 2ख ) में निर्दिष्ट सरकारी कंपनी या निगम या संयुक्त उद्यम कोअनुदत्त खनन पट्टा ऐसी रकम , जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए, के संदाय पर अनुदत्त किया जाएगा ।" ।
18. मूल अधिनियम की धारा 20 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः- नई धारा 20क का अंतःस्थापन ।
केन्द्रीय सरकार की निदेश जारी करने की शक्ति ।
" 20क. ( 1 ) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी राज्य सरकारों को ऐसे निदेश जारी कर सकेगी जो खनिज संसाधनों के संरक्षण के लिए या राष्ट्रीय हित में किसी नीति के विषय पर और खनिज संसाधनों के वैज्ञानिक और धारणीय विकास तथा विदोहन के लिए अपेक्षित हों ।
(2 ) केन्द्रीय सरकार, विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना निम्नलिखित विषयों की बाबत भी निदेश जारी कर सकेगी , अर्थात्ः- [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
60
(i ) खनिज रियायतें अनुदत्त करने की प्रक्रिया में सुधार और कानूनी निकासियां प्रदान करने का उत्तरदायित्व सौंपे गए अभिकरणों के बीच समन्वय का सुनिश्चय;
(ii ) इंटरनेट आधारित डाटा बेस का अनुरक्षण जिसके अंतर्गत खनन भूखंड प्रणाली के विकास और प्रचालन का अनुरक्षण भी है;
(iii) धारणीय विकास ढांचे का कार्यान्वयन और मूल्यांकन;
(iv) अपशिष्ट सृजन में कटौती और संबंधित अपशिष्ट प्रबंधन पद्धतियों तथा सामग्रियों के पुनः चक्रीकरण का संवर्धन;
(v) प्रतिकूल पर्यावरणीय समाघातों का न्यूनीकरण और उनका अवशमन विशिष्टतया भू-जल, वायु, परिवेश रव और भूमि;
(vi ) जैव विविधता वनस्पति, प्राणी और पर्यवास के निबंधनों में न्यूनतम पारिस्थितिकीय विक्षोभ का सुनिश्चय;
(vii) प्रत्यावर्तन भूमि उद्धार कार्यकलापों का संवर्धन जिससे खनन की गई भूमि का स्थानीय समुदायों के फायदे के लिए अनुकूलतम उपयोग किया जा सके; और
(viii) ऐसे अन्यविषय जो इस अधिनियम के कार्यान्वयन के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हों । " ।
धारा 21 का संशोधन ।
19. मूल अधिनियम की धारा 21 की उपधारा ( 1 ) और उपधारा ( 2 ) के स्थान पर निम्नलिखित उपधाराएं रखी जाएंगी, अर्थात्ः-
" ( 1 ) जो कोई धारा 4 की उपधारा ( 1 ) या उपधारा ( 1 क ) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा वह कारावास से जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो प्रति हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पांच लाख रुपए तक हो सकेगा , दंडनीय होगा ।
(2) इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन बनाया गया कोई नियम उपबंध कर सकेगा कि उसका उल्लंघन कारावास से जो दो वर्ष तक का हो सकेगा या जुर्माने से जो पांच लाख रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से और उल्लंघन के चालू रहने की दशा में, अतिरिक्त जुर्माने से जो ऐसे उल्लंघन के लिए प्रथम दोषसिद्धि के पश्चात् प्रत्येक दिन जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन चालू रहता है पचास हजार रुपए तक हो सकेगा, दंडनीय होगा । " ।
20. मूल अधिनियम की धारा 30 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी , अर्थात्ः-
धारा 30के स्थान परनई धारा का प्रतिस्थापन ।
" 30. केन्द्रीय सरकार, स्वप्रेरणा से या विहित समय के भीतर किसी व्यथित पक्षकार द्वारा किए गए आवेदन पर, -
केन्द्रीय सरकार द्वारा पुनरीक्षणकी शक्ति।
(क) राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी द्वारा गौण खनिज से भिन्न किसी खनिज की बाबत इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए किए गए किसी आदेश का पुनरीक्षण कर सकेगी; या
(ख) जहां राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी द्वारा उसे इस अधिनियम के अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए गौण खनिज से भिन्न किसी खनिज की बाबत उसके लिए विहित समय के भीतर ऐसा कोई आदेश नहीं किया जाता है, ऐसा कोई आदेश पारित कर सकेगी जो वह परिस्थितियों में ठीक और उचित समझेः
परंतु केन्द्रीय सरकार, खंड ( ख ) के अधीन आने वाले मामलों में इस खंड के अधीन कोई आदेश पारित करने से पूर्व मामले में सुने जाने का अवसर या मामले को प्रस्तुत करने काअवसर प्रदान करेगी । " ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
61
21. मूल अधिनियम की धारा 30 क के पश्चात् निम्नलिखित धाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः- नई धारा 30ख और धारा 30 ग का अंतःस्थापन ।
विशेष न्यायालयों का
गठन।
" 30ख. ( 1 ) राज्य सरकार धारा 4 की उपधारा ( 1 ) या उपधारा ( 1 क ) के उल्लंघन के अपराधों के त्वरित विचारण के प्रयोजनों के लिए अधिसूचना द्वारा उतने विशेष न्यायालयों का गठन कर सकेगी जितने अधिसूचना में विनिर्दिष्ट क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए आवश्यक हों ।
होगा । ( 2) विशेष न्यायालय में उच्च न्यायालय की सहमति से राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक न्यायाधीश
(3 ) कोई व्यक्तिविशेष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए तभी अर्हित होगा जब वह जिला और सेशन न्यायाधीश हो या रहा हो ।
(4) विशेष न्यायालय के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय को ऐसे आदेश की तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर अपील कर सकेगा ।
1974का 2
विशेष न्यायालयों को सेशन न्यायालय की शक्तियों काहोना ।
30ग. इस अधिनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय , दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होगी और इस अधिनियम के उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय को सेशन न्यायालय माना जाएगा और उसे सेशन न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी तथा विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाले व्यक्ति को लोक अभियोजक माना जाएगा । " ।
22. मूल अधिनियम की प्रथम अनुसूची में, " 8 ( 2 ) " अंकों और कोष्ठकों के स्थान पर, 8 ( 1 ) , 8 क ( 1 ) , प्रथम अनुसूची का संशोधन ।
10क, 10ख ( 1 ) , 10 ग( 1 ) , 11 ( 1 ) , 11ख , 117 , 12 क( 1 ) और 17क( 2 क) " अंक, कोष्ठक, अक्षर और शब्द रखे जाएंगे ।
नई अनुसूची का अंतःस्थापन ।
23. मूल अधिनियम में तृतीय अनुसूची के पश्चात् निम्नलिखित अनुसूची अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" चतुर्थ अनुसूची
[धारा 3 का खंड (ङक ) देखिए]
अधिसूचित खनिज
1. बॉक्साइट
2.लौह अयस्क
3. चूना पत्थर
4. मैग्नीज अयस्क । " ।
कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति।
24. ( 1 ) खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अधिनियम , 2015 के उपबंधों को लागू करने में यदिकोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध जो उक्त अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों जो कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों, करसकेगी:
परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश उक्त अधिनियम के प्रवृत्त होने से दो वर्ष की अवधि के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2 ) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उसके किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
2015का
अध्यादेश सं०3 है। 25. ( 1 ) खान और खनिज ( विकास और विनियमन ) संशोधन अध्यादेश , 2015 का निरसन किया जाता निरसन और व्यावृत्ति।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
62
(2 ) ऐसे निरसन के होते हुए भी उक्त अध्यादेश द्वारा यथा संशोधित मूल अधिनियम के अधीन की गई कोई बात या की गई कोई कार्रवाई मूल अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की या की गई समझी जाएगी ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग । क]
63
प्रादेशिक ग्रामीण बैंक (संशोधन)
अधिनियम , 2015
(2015 का अधिनियम संख्यांक 14)
[12मई, 2015]
प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम , 1976
का और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
1. (1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम प्रादेशिक ग्रामीण बैंक (संशोधन) अधिनियम, संक्षिप्त नाम और 2015है ।
प्रारम्भ ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न- भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न- भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी।
1976 का 21
धारा 3 का संशोधन ।
2. प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम कहा गया है) की धारा 3 की उपधारा (3) के खंड (ग) में,-
(क) " उसके कार्यकरण के प्रथम पांच वर्षों के दौरान " शब्दों का लोप किया जाएगा;
(ख) परंतुक का लोप किया जाएगा ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
64
धारा 5 का संशोधन । 3. मूल अधिनियम की धारा 5 में, -
(क) " पांच करोड़ रुपए होगी जो सौ- सौ रुपए के पांच लाख " शब्दों के स्थान पर, "बीस अरब रुपए होगी जो दस- दस रुपए के दो अरब " शब्द रखे जाएंगे;
(ख) परंतुक में, "पच्चीस लाख रुपए से कम न होगी और सभी दशाओं में शेयर सौ- सौ रुपए के पूर्णतः समादत्त शेयर होंगे " शब्दों के स्थान पर "एक करोड़ रुपए से कम न होगी और सभी दशाओं में शेयर दस - दस रुपए के पूर्णतः समादत्त शेयर होंगे" शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 6 का संशोधन । 4. मूल अधिनियम की धारा 6 में, -
(क) उपधारा (1 ) में, " पच्चीस लाख रुपए से कम या एक करोड़ रुपए से अधिक" शब्दों के स्थान पर, " एक करोड़ रुपए से कम " शब्द रखे जाएंगे ;
(ख) उपधारा (2) में, निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्ः-
"परंतु यदि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार या प्रायोजक बैंक से भिन्न स्रोतों से अपनी पूंजी जुटाता है तो केंद्रीय सरकार और प्रायोजक बैंक की शेयरधारिता इक्यावन प्रतिशत से कम नहीं होगी :
परंतु यह और कि यदि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक में ऐसी राज्य सरकार की शेयरधारिता का स्तर पन्द्रह प्रतिशत से कम किया जाता है तो केंद्रीय सरकार संबंधित राज्य सरकार से परामर्श करेगी। " ;
(ग) उपधारा (2) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी,
अर्थात्ः-
" (2क) केंद्रीय सरकार, प्रायोजक बैंक और राज्य सरकार से परामर्श करके, अधिसूचना द्वारा , केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार या प्रायोजक बैंक की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट शेयरधारिता की सीमा को बढ़ा या घटा सकेगी:
परंतु केंद्रीय सरकार, ऐसी राज्य सरकार की शेयरधारिता की सीमा को कम करने से पूर्व संबंधित राज्य सरकार से परामर्श करेगी।" ;
(घ) उपधारा (3 ) में, "जो उपधारा (2 ) में विनिर्दिष्ट है " शब्दों, कोष्ठकों और अंक के
स्थान पर, "जो, यथास्थिति, उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट है या उपधारा (2 क) के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर रखे जाएंगे ।
धारा 9 का संशोधन । 5. मूल अधिनियम की धारा 9 की उपधारा (1 ) में, -
(क) खंड (क) में निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
"परंतु ऐसे किसी व्यक्ति को निदेशक के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं किया जाएगा, यदि वह पहले से किसी अन्य प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के बोर्ड में कोई निदेशक है ;";
(ख ) खंड (ङ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" (च) केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार, प्रायोजक बैंक और केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन अन्य संस्थाओं द्वारा नामनिर्दिष्ट निदेशकों से भिन्न शेयर धारकों द्वारा निर्वाचित उतने निदेशक, जिनके नाम उस अधिवेशन की तारीख से कम से कम नब्बे दिन पूर्व प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के शेयर धारकों के रजिस्टर में दर्ज हों, जिस अधिवेशन में निदेशकों का निर्वाचन निम्नलिखित आधार पर होता है, अर्थात्ः- अनुभाग 1 क]
भारत का राजपत्र असाधारण
65
(i) जहां ऐसे शेयर धारकों को निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी का दस प्रतिशत या उससे कम है, वहां ऐसे शेयर धारकों में से एक निदेशक निर्वाचित किया जाएगा;
(ii) जहां ऐसे शेयर धारकों को निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी के दस प्रतिशत से अधिक, किंतु पच्चीस प्रतिशत से कम है , वहां उपखंड (i ) में निर्दिष्ट शेयर धारकों को सम्मिलित करते हुए ऐसे शेयर धारकों में से दो निदेशक निर्वाचित किए जाएंगे ;
(iii ) जहां ऐसे शेयर धारकों को निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी का पच्चीस प्रतिशत या उससे अधिक है, वहां उपखंड (i ) और उपखंड ( ii ) में निर्दिष्ट शेयर धारकों को सम्मिलित करते हुए ऐसे शेयर धारकों में से तीन निदेशक निर्वाचित किए जाएंगे ।" ।
(ग
) उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्-
" (3) केन्द्रीय सरकार, यदि वह प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के प्रभावी कार्यकरण के प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझती है तो प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के बोर्ड में केन्द्रीय सरकार का एक अधिकारी नियुक्त कर सकेगी । " ।
6. मूल अधिनियम की धारा 10 के स्थान पर, निम्नलिखित धारा रखी जाएगी , अर्थात्ः-
धारा 10 के स्थान पर नई धारा का प्रतिस्थापन ।
निदेशक की पदावधि ।
"10. धारा 9 की उपधारा ( 1 ) के खंड (क) के अधीन नामनिर्दिष्ट निदेशक, केंद्रीय सरकार के प्रसादपर्यंत और उस तारीख से, जिसको वह पद ग्रहण करता है, तीन वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो केंद्रीय सरकार उसके नामनिर्देशन के समय विनिर्दिष्ट करे, अपना पद धारण करेगा और पुनः नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा :
परंतु ऐसा कोई निदेशक लगातार या आंतरायिक रूप से छह वर्ष से अधिक अवधि के लिए पद धारण नहीं करेगा ।" ।
धारा 19 का संशोधन ।
7. मूल अधिनियम की धारा 19 की उपधारा (1 ) में, " 31 दिसंबर, " अंकों और शब्द के स्थान पर, " 31 मार्च, " अंक और शब्द रखे जाएंगे ।
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 66 भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
67
भाण्डागारण निगम ( संशोधन)
अधिनियम , 2015
(2015 का अधिनियम संख्यांक 16)
[13 मई, 2015]
भाण्डागारण निगम अधिनियम , 1962 का और संशोधन करने के लिए अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
संक्षिप्त नाम ।
है। 1. (1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भाण्डागारण निगम (संशोधन) अधिनियम , 2015
1962का 58
2. भाण्डागारण निगम अधिनियम, 1962 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम कहा गया है) की धारा 5 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी, अर्थात्ः-
धारा 3 के स्थान पर नई धारा का प्रतिस्थापन।
"5. इस धारा में वर्णित अधिनियमों में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय भाण्डागारण निगम के शेयरों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे -
कतिपय शेयरों काअनुमोदित प्रतिभूतियां होना ।
1882 का 2
(क) " उन अन्य प्रतिभूतियों के अंतर्गत हैं जो भारतीय न्यास अधिनयम, 1882 की धारा 20 में प्रगणित हैं ; और
1938 का 4
1949 का 10
(ख) बीमा अधिनियम, 1938 और बैंककारी विनियमन अधिनियम , 1949 के प्रयोजन के लिए अनुमोदित प्रतिभूतियां हैं । " ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
68
धारा 27 का
3. मूल अधिनियम की धारा 27 में, उपधारा (4) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी,
संशोधन ।
अर्थात्ः-
"(4) राज्य भाण्डागारण निगम के बंधपत्र और डिबेंचर ऐसे बंधपत्रों या डिबेंचरों के पुरोधरण के समय राज्य भाण्डागारण निगम के निदेशक बोर्ड की सिफारिश पर समुचित सरकार द्वारा प्रतयाभूत किए जाएंगे ।" ।
4. मूल अधिनियम की धारा 30 में, उपधारा (2 ) के परंतुक का लोप किया जाएगा ।
धारा 30 का संशोधन ।
5. मूल अधिनियम की धारा 31 में, उपधारा (8 ) के परंतुक का लोप किया जाएगा ।
धारा 31 का संशोधन ।
6. मूल अधिनियम की धारा 39 के दोनों परंतुकों का लोप किया जाएगा ।
धारा 39 का संशोधन ।
69
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
निरसन और संशोधन अधिनियम, 2015
(2015 का अधिनियम संख्यांक 17)
[13मई, 2015]
कतिपय अधिनियमितियों का निरसन करने और कतिपय अन्य अधिनियमितियों का संशोधन करने के लिए अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-
संक्षिप्त नाम ।
1. इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम निरसन और संशोधन अधिनियम, 2015 है ।
2. पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियों को इसके द्वारा उसके चौथे स्तंभ में वर्णित विस्तार तक निरसित किया जाता है ।
कतिपय अधिनियमितियों कानिरसन ।
3. दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियों को इसके द्वारा उसके चौथे स्तंभ में वर्णित विस्तार तक और रीतिसे संशोधित किया जाता है ।
कतिपय अधिनियमितियों कासंशोधन ।
व्यावृत्तियां ।
4. इस अधिनियम द्वारा किसी अधिनियमिति के निरसन से ऐसे किसी अधिनियम पर प्रभाव नहीं पड़ेगा जिसमें ऐसी अधिनियमिति को लागू किया गया है, समाविष्ट किया गया है या निर्दिष्ट किया गया है;
और इस अधिनियम का प्रभाव पहले से की गई या हुई किसी बात अथवा पहले से अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत किसी अधिकार, हक, बाध्यता या दायित्व अथवा किसी उपचार या उसके संबंध में कार्यवाही अथवा किसी 70
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2-
ऋण , शास्ति, बाध्यता, दायित्व , दावे या मांग के या से किसी निर्मोचन या उससे उन्मोचन अथवा पहले से अनुदत्त किसी परित्राण अथवा किसी पूर्व कार्रवाई या बात के सबूत की विधिमान्यता, अविधिमान्यता, प्रभाव या परिणाम पर नहीं पड़ेगा;
और इस अधिनियम का प्रभाव विधि के किसी सिद्धांत या नियम अथवा स्थापित अधिकारिता , अभिवाक्, के प्ररूप या अनुक्रम, पद्धति या प्रक्रिया अथवा विद्यमान प्रथा, रूढ़ि, विशेषाधिकार, निर्बंधन, छूट, पद या नियुक्ति पर नहीं पड़ेगा भले ही वह इसके द्वारा निरसित किसी अधिनियमिति द्वारा , उसमें या उससे किसी भी रीति में क्रमशः अभिपुष्ट, मान्यताप्राप्त या व्युत्पन्न ही क्यों न हुई हो;
और इस अधिनियम द्वारा किसी अधिनियमिति के निरसन से किसी अधिकारिता , पद, रूढ़ि, दायित्व, अधिकार, हक, विशेषाधिकार, निर्बंधन, छूट, प्रथा, पद्धति, प्रक्रिया या किसी अन्य विषय या बात का, जो अब विद्यमान या प्रवृत्त नहीं है, उपबंध या प्रत्यावर्तन नहीं होगा ।
पहली अनुसूची
(धारा 2 देखिए)
निरसन
संक्षिप्त नाम
वर्ष संख्या निरसन का
विस्तार
(1) (2) (3) (4)
1897 4 भारतीय मत्स्य- क्षेत्र अधिनियम , 1897 संपूर्ण
1947 47 विदेशी अधिकारिता अधिनियम, 1947 संपूर्ण
1978 49 चीनी उपक्रम (प्रबंध-ग्रहण ) अधिनियम, 1978 संपूर्ण
1999 30 लोक प्रतिनिधित्व ( संशोधन ) अधिनियम, 1999 संपूर्ण
1999 33 भारतीय वयस्कता ( संशोधन ) अधिनियम, 1999 संपूर्ण
1999 34 महाप्रशासक ( संशोधन ) अधिनियम, 1999 संपूर्ण
1999 36 नोटेरी (संशोधन ) अधिनियम, 1999 संपूर्ण
1999 39 विवाह विधि ( संशोधन ) अधिनियम, 1999 संपूर्ण
2001 30 निरसन और संशोधन अधिनियम, 2001 संपूर्ण
2001 49 विवाह विधि ( संशोधन) अधिनियम, 2001 संपूर्ण
2001 51 विवाह विच्छेद ( संशोधन ) अधिनियम, 2001 संपूर्ण
2002 26 भारतीय उत्तराधिकार ( संशोधन ) अधिनियम, 2002 संपूर्ण
2002 37 विधिक सेवा प्राधिकरण ( संशोधन ) अधिनियम, 2002 संपूर्ण
2002 72 लोक प्रतिनिधित्व ( तीसरा संशोधन ) अधिनियम, 2002 संपूर्ण
2003 3 संपत्तिअंतरण ( संशोधन ) अधिनियम , 2002 संपूर्ण
2003 4 भारतीय साक्ष्य ( संशोधन ) अधिनियम, 2002 संपूर्ण
2003 6 लोक प्रतिनिधित्व ( दूसरा संशोधन ) अधिनियम, 2002 संपूर्ण
2003 9 लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन ) अधिनियम, 2002 संपूर्ण
2003 24 निर्वाचन विधि ( संशोधन ) अधिनियम, 2003 संपूर्ण
2003 40 लोक प्रतिनिधित्व ( संशोधन ) अधिनियम, 2003 संपूर्ण
2003 46
निर्वाचन और अन्य सहबद्ध विधियां ( संशोधन ) अधिनियम, 2003
संपूर्ण 71
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
(1) (2) (3) (4) 2003 50 विवाह विधि ( संशोधन ) अधिनियम, 2003 संपूर्ण 2004 2 लोक प्रतिनिधित्व ( दूसरा संशोधन ) अधिनियम, 2003 संपूर्ण 2004 3 परिसीमन ( संशोधन) अधिनियम, 2003 संपूर्ण 2005 4 प्रत्यायोजित विधान उपबंध ( संशोधन) अधिनियम, 2004 संपूर्ण 2005 39 हिंदू उत्तराधिकार ( संशोधन ) अधिनियम, 2005 संपूर्ण 2006 31 संसद् ( निरर्हता निवारण ) संशोधन अधिनियम, 2006 संपूर्ण 2008 9 परिसीमन (संशोधन ) अधिनियम, 2008 संपूर्ण 2008 10 लोक प्रतिनिधित्व ( संशोधन ) अधिनियम, 2008 संपूर्ण 2009 41 लोक प्रतिनिधित्व ( संशोधन) अधिनियम, 2009 संपूर्ण 2010 30 स्वीय विधि (संशोधन ) अधिनियम, 2010 संपूर्ण 2010 36 लोक प्रतिनिधित्व ( संशोधन ) अधिनियम, 2010 संपूर्ण 2012 29 आनंद विवाह ( संशोधन) अधिनियम, 2012 संपूर्ण 2012 33 महाप्रशासक ( संशोधन ) अधिनियम, 2012 संपूर्ण 2013 28 संसद् ( निरर्हता निवारण ) संशोधन अधिनियम , 2013 संपूर्ण
दूसरी अनुसूची
(धारा 3 देखिए)
संशोधन
वर्ष संख्या संक्षिप्त नाम संशोधन
2013 25 हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन धारा 1 की उपधारा ( 3 ) के परन्तुक में,
काप्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, " अधिसूचना " शब्द के स्थान पर " उक्त
2013 अधिसूचना " शब्द रखे जाएंगे ।
2014 17 सूचना प्रदाता संरक्षण अधिनियम , 2011 (क ) अधिसूचना में , " बासठवें वर्ष"
शब्दों के स्थान पर " पैंसठवें वर्ष " शब्द
रखे जाएंगे; और
(ख) धारा 1 की उपधारा ( 1 ) में " 2011 " अंकों के स्थान पर " 2014 " अंक रखे जाएंगे ।
72
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- भारत का राजपत्र असाधारण
73 अनुभाग 1क]
संदाय और निपटान प्रणाली ( संशोधन)
अधिनियम , 2015
(2015 का अधिनियम संख्यांक 18)
[13मई, 2015]
संदाय और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 का संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित
हो:-
औरप्रारंभ ।
1. (1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम संदाय और निपटान प्रणाली (संशोधन) अधिनियम , संक्षिप्त नाम 2015 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न- भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न- भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी ऐसे उपबंध का इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रारंभ के प्रति निर्देश है ।
2007 का 51
धारा 2 का संशोधन ।
2. संदाय और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम कहा गया है) की धारा 2 में, -
(i) खंड (घ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात् :-
' ( घक) " जारीकर्ता" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो विधिक सत्ता पहचानकर्ता या ऐसी अन्य विशिष्ट पहचान (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो ) , जो रिजर्व बैंक द्वारा समय -समय पर विनिर्दिष्ट की जाए , जारी करता है ;
74
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2-
(घख) "विधिक सत्ता पहचानकर्ता " से ऐसा विशिष्ट पहचान कोड अभिप्रेत है जो जारीकर्ता द्वारा किसी व्यक्ति को उस व्यक्ति की ऐसे व्युत्पन्नों या वित्तीय संव्यवहारों में, जो रिजर्व बैंक द्वारा समय- समय पर विनिर्दिष्ट किए जाएं , पहचान करने के प्रयोजन के लिए समनुदिष्ट किया गया हो; ' ;
(ii) खंड (थ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
' (द) " व्यापार संग्रहकर्ता " से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो ऐसे व्युत्पन्नों या वित्तीय संव्यवहारों से, जो रिजर्व बैंक द्वारा समय- समय पर विनिर्दिष्ट किए जाएं , संबंधित इलैक्ट्रानिक अभिलेख या डाटा के संग्रहण , समाकलन , भंडारण, अनुरक्षण, प्रसंस्करण या प्रसारण के कारबार में लगा हुआ है ।' ।
3. मूल अधिनियम की धारा 23 में,-
धारा 23 का संशोधन ।
(i) उपधारा (1 ) में, " संदाय प्रणाली को प्राधिकार जारी करते समय रिजर्व बैंक द्वारा " शब्दों के स्थान पर " धारा 7 के अधीन संदाय प्रणाली को या ऐसी सकल या शुद्ध अवधारण प्रक्रिया को, जो रिजर्व बैंक द्वारा इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन अनुमोदित की जाए , प्राधिकार जारी करते समय उसके द्वारा " शब्द और अंक रखे जाएंगे ;
(ii) उपधारा (4) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्:-
" (4) जहां किसी न्यायालय , अधिकरण या प्राधिकारी के किसी आदेश द्वारा- (क) किसी प्रणाली भागीदार को दिवालिया घोषित किया जाता है या उसका विघटन या परिसमापन किया जाता है; या
(ख) किसी समापक या रिसीवर या समनुदेशिती को (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) अनंतिम रूप से या अन्यथा, किसी प्रणाली भागीदार के दिवालिएपन या विघटन या परिसमापन से संबंधित किसी कार्यवाही में नियुक्त किया जाता है,
1949 का 10
1956 का 1
2013 का 18 वहां बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 या कंपनी अधिनियम, 1956 या कंपनी अधिनियम, 2013 या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी ऐसा आदेश ऐसे किसी निपटान को, जो ऐसे आदेश के पूर्व या ठीक उसके पश्चात् अन्तिम और अप्रतिसंहरणीय हो गया है तथा प्रणाली भागीदारों द्वारा ऐसे प्रणाली प्रदाता से संबंधित नियमों, विनियमों या उपविधियों के अनुसार उसके निपटान या अन्य बाध्यताओं के मद्दे अभिदाय किए गए किन्हीं सांपार्श्विकों का विनियोग करने के प्रणाली प्रदाता के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। " ;
(iii ) उपधारा (4) के पश्चात् निम्नलिखित उपधाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी ,
अर्थात्:-
1949 का 10
1956 का 1
2013 का 18 "(5) जहां उपधारा (4) में निर्दिष्ट कोई आदेश किसी केन्द्रीय प्रतिपक्ष के संबंध में किया जाता है वहां ऐसे आदेश या बैंककारी विनियमन अधिनियम , 1949 या कंपनी अधिनियम, 1956 या कंपनी अधिनियम, 2013 या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय प्रतिपक्ष और प्रणाली भागीदारों के तथा उनके जो किसी भावी तारीख को निपटान के लिए ग्रहण किए गए संव्यवहार से उद्भूत हुए हैं, बीच संदाय बाध्यताओं और निपटान अनुदेशों का ऐसे केन्द्रीय प्रतिपक्ष द्वारा अवधारण , प्राधिकार जारी करते समय रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित, यथास्थिति, सकल या शुद्ध अवधारण प्रक्रिया के अनुसार या इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन तुरन्त किया जाएगा और ऐसा अवधारण अन्तिम तथा अप्रतिसंहरणीय होगा ।
भारत का राजपत्र असाधारण
75 अनुभाग 1 क]
1949 का 10
1956 का 1
2013 का 18
(6) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 या कंपनी अधिनियम, 1956 या कंपनी अधिनियम, 2013 या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय प्रतिपक्ष का समापक या रिसीवर या समनुदेशिती (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) चाहे वह अनंतिम रूप से नियुक्त किया गया है या अन्यथा नियुक्त किया गया है,-
(क) ऐसे किसी अवधारण को , जो अन्तिम और अप्रतिसंहरणीय हो गया है, पुनः नहीं खोलेगा;
(ख) केन्द्रीय प्रतिपक्ष के नियमों, विनियमों या उपविधियों के अनुसार प्रणाली भागीदारों द्वारा उनके निपटान या अन्य बाध्यताओं के मद्दे उपलब्ध कराए गए सांपार्श्विकों का विनियोग करने के पश्चात्, धारित आधिक्य सांपार्श्विक संबंधित प्रणाली भागीदारों को वापस कर देगा। " ;
(iv) विद्यमान स्पष्टीकरण को उसके स्पष्टीकरण 1 के रूप में संख्यांकित किया जाएगा और इस प्रकार संख्यांकित स्पष्टीकरण 1 के पश्चात् निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
' स्पष्टीकरण 2- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, " केन्द्रीय प्रतिपक्ष " पद से ऐसा प्रणाली प्रदाता अभिप्रेत है जो निपटान के लिए ग्रहण किए गए संव्यवहारों में, प्रणाली भागीदारों के बीच उनके संव्यवहारों के निपटान को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए दायित्व नवीयन के रूप में तद्द्वारा प्रत्येक विक्रेता के प्रति क्रेता बनकर और प्रत्येक क्रेता के प्रति विक्रेता बनकर अन्तःक्षेप करता है। ' ।
4. मूल अधिनियम की धारा 23 के पश्चात्, निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाएगी, नई धारा 23 क का अन्तःस्थापन।
अर्थात्:-
ग्राहकों से संगृहीत निधियों की संरक्षा ।
'23क. ( 1 ) रिजर्व बैंक, लोक हित में या अभिहित संदाय प्रणालियों के ग्राहकों के हित में या ऐसी अभिहित संदाय प्रणाली के कार्यों को, ऐसी रीति में , जिससे उसके ग्राहकों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो, करने से निवारित करने के लिए ऐसी संदाय प्रणाली के प्रणाली प्रदाता से अभिहित संदाय प्रणाली के प्रणाली प्रदाता द्वारा अपने ग्राहकों से संगृहीत और बकाया बची रकमों की ऐसी प्रतिशतता के बराबर राशि, जो रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट की जाए ,-
(क) किसी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक में धारित किसी पृथक् खाते या खातों में जमा कराने और जमा रखे रखने की;
(ख) परिनिर्धारित आस्तियों को ऐसी रीति और प्ररूप में, जो वह समय - समय पर विनिर्दिष्ट करे, बनाए रखने की,
अपेक्षा कर सकेगाः
परन्तु रिजर्व बैंक अभिहित संदाय प्रणालियों के भिन्न- भिन्न प्रवर्गों के लिए भिन्न- भिन्न प्रतिशतता तथा रीति और प्ररूप विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
(2) उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट खाते या खातों में धारित अतिशेष का ग्राहकों द्वारा भुगतान सेवा का प्रयोग किए जाने के कारण उद्भूत दायित्वों के उन्मोचन के अथवा ग्राहकों को प्रतिसंदाय करने के प्रयोजन से या ऐसे अन्य प्रयोजन से, जो रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किया जाए , भिन्न किसी प्रयोजन के लिए उपयोग नहीं किया जाएगा।
1949 का 10
1956 का 1
2013 का 18
(3) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 या कंपनी अधिनियम, 1956 या कंपनी अधिनियम, 2013 में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (2) के अधीन भुगतान प्राप्त करने के हकदार व्यक्तियों का उस खाते में भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 76
धारित अतिशेष पर प्रथम और सर्वोपरि अधिकार होगा और अभिहित संदाय प्रणाली के प्रणाली प्रदाता या संबंधित वाणिज्यिक बैंक का समापक या रिसीवर या समनुदेशिती (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) चाहे वह अनंतिम रूप से या अन्यथा नियुक्त किया गया हो, उक्त अतिशेषों का किन्हीं अन्य प्रयोजनों के लिए तब तक उपयोग नहीं करेगा जब तक कि ऐसे सभी व्यक्तियों को पूर्ण रूप से संदाय नहीं कर दिया जाता या उसके लिए पर्याप्त उपबंध नहीं कर दिया जाता है ।
स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) "अभिहित संदाय प्रणाली " पद से ऐसी संदाय प्रणाली या संदाय प्रणाली का ऐसा कोई वर्ग , जो रिजर्व बैंक द्वारा समय - समय पर विनिर्दिष्ट किया जाए , अभिप्रेत है जो कि भुगतान सेवा प्रदान करने के लिए अपने ग्राहकों से निधियों का संग्रहण करने में लगा हुआ है;
1949 का 10 1934 का 2 (ख) " अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक " से बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 5 में यथापरिभाषित तथा भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में सम्मिलित कोई " बैंककारी कंपनी ", "तत्स्थानी नया बैंक ", " भारतीय स्टेट बैंक" और " समनुषंगी बैंक " अभिप्रेत है ।' ।
5. मूल अधिनियम की धारा 34 के पश्चात्, निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्: -
नई धारा 34क का अन्तःस्थापन।
'34क. (1 ) इस अधिनियम के उपबंध किसी अभिहित व्यापार संग्रहकर्ता या जारीकर्ता को, या उसके संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे, संपूर्ण अधिनियम में लागू सीमा तक संदाय प्रणालियों को या उनके संबंध में इस उपांतरण के अधीन रहते हुए लागू होते हैं कि जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-
अधिनियम का अभिहित व्यापार संग्रहकर्ता और जारीकर्ता को लागू होना ।
(क) "संदाय प्रणाली" या " प्रणाली प्रदाता " के प्रति निर्देश का अर्थ, यथास्थिति, " अभिहित व्यापार संग्रहकर्ता " या " जारीकर्ता " के प्रति निर्देश के रूप में लगाया जाएगा;
(ख) " इस अधिनियम के प्रारंभ " के प्रति निर्देश का अर्थ-
(i) किसी अभिहित व्यापार संग्रहकर्ता के संदर्भ में, उस तारीख के प्रति निर्देश के रूप में लगाया जाएगा जिसको किसी व्यापार संग्रहकर्ता को रिजर्व बैंक द्वारा अभिहित व्यापार संग्रहकर्ता के रूप में विनिर्दिष्ट किया जाता है; और
(ii) किसी जारीकर्ता के संदर्भ में , संदाय और निपटान प्रणाली ( संशोधन) अधिनियम, 2015 के प्रारंभ के प्रति निर्देश के रूप में लगाया जाएगा।
(2) रिजर्व बैंक, किसी अभिहित व्यापार संग्रहकर्ता के आवेदन पर या अन्यथा, अभिहित व्यापार संग्रहकर्ता को ऐसी अन्य सेवाएं , जो समय - समय पर आवश्यक समझी जाएं, उपलब्ध कराने की अनुज्ञा दे सकेगा या निदेश दे सकेगा।
स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, " अभिहित व्यापार संग्रहकर्ता " पद से ऐसा कोई व्यापार संग्रहकर्ता या व्यापार संग्रहकर्ताओं का कोई वर्ग अभिप्रेत है जो रिजर्व बैंक द्वारा समय - समय पर विनिर्दिष्ट किया जाए। ' ।
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
77
वित्त अधिनियम , 2015
(2015 का अधिनियम संख्यांक 20 )
[14मई, 2015]
वित्तीय वर्ष 2015-2016 के लिए केन्द्रीय सरकार की वित्तीय प्रस्थापनाओं को प्रभावी करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. ( 1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वित्त अधिनियम, 2015 है ।
संक्षिप्त नाम और
प्रारंभ ।
( 2) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, धारा 2 से धारा 81 तक 1 अप्रैल, 2015
को प्रवृत्त हुई समझी जाएंगी ।
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भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
अध्याय 2
आय- कर की दरें
आय-कर ।
2. ( 1 ) उपधारा ( 2 ) और उपधारा ( 3 ) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, 1 अप्रैल, 2015 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के लिए आय- कर, पहली अनुसूची के भाग 1 में विनिर्दिष्ट दरों से प्रभारित किया जाएगा और ऐसे कर में , प्रत्येक दशा में, उसमें उपबंधित रीति से, परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा ।
(2) उन दशाओं में, जिनमें पहली अनुसूची के भाग 1 का पैरा क लागू होता है, जहां निर्धारिती की, पूर्ववर्ष में, कुल आय के अतिरिक्त, पांच हजार रुपए से अधिक कोई शुद्ध कृषि आय है, और कुल आय दो लाख पचास हजार रुपए से अधिक हो जाती है वहां,-
(क) शुद्ध कृषि- आय को, कुल आय के संबंध में केवल आय - कर प्रभारित करने के प्रयोजन के लिए, खंड (ख ) में उपबंधित रीति से हिसाब में लिया जाएगा [अर्थात् मानो शुद्ध कृषि- आय कुल आय के प्रथम दो लाख पचास हजार रुपए के पश्चात् कुल आय में समाविष्ट हो, किंतु कर के दायित्वाधीन न हो] ; और
(ख) प्रभार्य आय-कर निम्नलिखित रीति से परिकलित किया जाएगा,-
( i) कुल आय और शुद्ध कृषि आय को संकलित कर दिया जाएगा और संकलित आय के संबंध में आय - कर की रकम, उक्त पैरा क में विनिर्दिष्ट दरों से ऐसे अवधारित की जाएगी मानो ऐसी संकलित आय कुल आय हो;
(ii ) शुद्ध कृषि- आय में दो लाख पचास हजार रुपए की राशि बढ़ा दी जाएगी और इस प्रकार बढ़ाई गई शुद्ध कृषि- आय के संबंध में आय- कर की रकम, उक्त पैरा क में विनिर्दिष्ट दरों से ऐसे अवधारित की जाएगी, मानो इस प्रकार बढ़ाई गई शुद्ध कृषि- आय कुल आय हो;
(iii ) उपखंड ( i ) के अनुसार अवधारित आय- कर की रकम में से उपखंड ( ii ) के अनुसार अवधारित आय - कर की रकम घटा दी जाएगी और इस प्रकार प्राप्त राशि, कुल आय के संबंध में आय -कर होगी:
परंतु पहली अनुसूची के भाग 1 के पैरा क की मद ( II ) में निर्दिष्ट प्रत्येक व्यष्टि की दशा में , जो भारत में निवासी है और पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय साठ वर्ष का या उससे अधिक, किंतु अस्सी वर्ष से कम आयु का है, इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो " दो लाख पचास हजार रुपए " शब्दों के स्थान पर, " तीन लाख रुपए " शब्द रखे गए हों:
परंतु यह और कि पहली अनुसूची के भाग 1 के पैरा क की मद ( III ) में निर्दिष्ट प्रत्येक व्यष्टि की दशा में, जो भारत में निवासी है और पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय अस्सी वर्ष या अधिक आयु का है, इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो " दो लाख पचास हजार रुपए " शब्दों के स्थान पर, " पांच लाख रुपए " शब्द रखे गए हों ।
1961 का 43 (3 ) उन दशाओं में, जिनमें आय - कर अधिनियम , 1961 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् आय- कर अधिनियम कहा गया है ) के अध्याय 12 या अध्याय 12 क या धारा 115ञख या धारा 115ञग या अध्याय 12चक या धारा 161 की उपधारा ( 1 क ) या धारा 164 या धारा 164 क या धारा 167ख के उपबंध लागू होते हैं, प्रभार्य कर का अवधारण, उस अध्याय या उस धारा में यथा उपबंधित रीति से, और, यथास्थिति, उपधारा ( 1 ) द्वारा अधिरोपित दरों के या उस अध्याय या उस धारा में विनिर्दिष्ट दरों के प्रति निर्देश से किया जाएगाः
परंतु आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय- कर की रकम में, पहली अनुसूची के भाग 1 के, यथास्थिति, पैरा क, पैरा ख , पैरा ग , पैरा घ या पैरा ङ में यथा उपबंधित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
भारत का राजपत्र असाधारण
79 अनुभाग 1क]
परंतु यह और कि किसी ऐसी आय के संबंध में, जो आय - कर अधिनियम की धारा 115 क, धारा 115कख, धारा 115कग , धारा 115 कगक , धारा 115 कघ , धारा 115 ख , धारा 115 खख, धारा 115खखक, धारा 115 खखग , धारा 115खखघ, धारा 115 खखड; धारा 115ञख या धारा 115ञग के अधीन कर से प्रभार्य है, इस उपधारा के अधीन संगणित आय- कर की रकम में, -
(क ) प्रत्येक व्यष्टि या हिंदू अविभक्त कुटुंब या व्यक्ति- संगम या व्यष्टि- निकाय , चाहे वह निगमित हो या न हो , या आय- कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 31 ) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति या सहकारी सोसाइटी या फर्म या स्थानीय प्राधिकारी की दशा में , जहां कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय कर के दस प्रतिशत की दर से;
(ख) प्रत्येक देशी कंपनी की दशा में,-
( i) जहां कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं हैं, ऐसे आय -कर के पांच प्रतिशत की दर से;
( ii ) जहां कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय कर के दस प्रतिशत की दर
से;
(ग) देशी कंपनी से भिन्न प्रत्येक कंपनी की दशा में,-
( i) जहां कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे आय कर के दो प्रतिशत की दर से;
(ii ) जहां कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय - कर के पांच प्रतिशत की दर
से,
परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
परंतु यह भी कि उपरोक्त ( क ) में वर्णित व्यक्तियों की दशा में, जिनकी कुल आय आय- कर अधिनियम कीधारा 115ञग के अधीन कर से प्रभार्य है और ऐसी आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय-कर और उस पर अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम एक करोड़ रुपए की कुल आय पर आय - कर के रूप में संदेय कुल रकम आय की उस रकम से अधिक नहीं होगी , जो एक करोड़ रुपए से अधिक है:
परंतु यह भी कि प्रत्येक ऐसी कंपनी की दशा में, जिसकी कुल आय आय- कर अधिनियम की धारा 115ञख के अधीन कर से प्रभार्य है और ऐसी आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहींहै, ऐसी आय पर आय- कर और उस पर अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम एक करोड़ रुपए की कुल आय पर आय - कर के रूप में संदेय कुल रकम आय की उस रकम से अधिक नहीं होगी , जो एक करोड़ रुपए से अधिक है:
परंतु यह भी कि प्रत्येक ऐसी कंपनी की दशा में , जिसकी कुल आय आय- कर अधिनियम की धारा 115ञख के अधीन कर से प्रभार्य है और ऐसी आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय-कर और उस पर अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम दस करोड़ रुपए की कुल आय पर आय- कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम आय की उस रकम से अधिक नहीं होगी , जो दस करोड़ रुपए से अधिक है ।
(4) उन दशाओं में, जिनमें कर, आयकर अधिनियम की धारा 115ण या धारा 115 थक या धारा 115द की उपधारा ( 2 ) या धारा 115 नक के अधीन प्रभारित और संदत्त किया जाना है, कर उन धाराओं में यथा विनिर्दिष्ट दरों से प्रभारित और संदत्त किया जाएगा और उसमें ऐसे कर के बारह प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए बढ़ा दिया जाएगा ।
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भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2-
(5) उन दशाओं में , जिनमें कर, आयकर अधिनियम की धारा 193 , धारा 194 , धारा 194क, धारा 194ख, धारा 194खख , धारा 194घ , धारा 194 ठखक और धारा 195 के अधीन प्रवृत्त दरों से , काटा जाना है, कटौतियां पहली अनुसूची के भाग 2 में विनिर्दिष्ट दरों से की जाएंगी और उन दशाओं में, जहां कहीं विहित हो , उनमें उपबंधित रीति से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा ।
(6) उन दशाओं में, जिनमें कर, आयकर अधिनियम की धारा 192 क, धारा 194 ग , धारा 194घक , धारा 194ड; धारा 194डङ धारा 194 च, धारा 194छ, धारा 194ज , धारा 194 झ, धारा 194झक , धारा 194ञ, धारा 194ठक, धारा 194ठख , धारा 194ठखक, धारा 194 ठखख , धारा 194ठग, धारा 194ठघ, धारा 196ख , धारा 196 ग और धारा 196 घ के अधीन काटा जाना है, कटौतियां उन धाराओं में विनिर्दिष्ट दरों से की जाएंगी और
उनमें,-
(क ) प्रत्येक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुंब या व्यक्ति- संगम या व्यष्टि निकाय, चाहे वह निगमित होया न हो , या आय- कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 31 ) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति या सहकारी सोसाइटी या फर्म, जो अनिवासी है, की दशा में , जहां संदत्त या संदत्त की जाने वाली संभावित और कटौती के अधीन रहते हुए आय या ऐसी आय का योग एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे कर के बारह प्रतिशत की दर से;
(ख) देशी कंपनी से भिन्न प्रत्येक कंपनी की दशा में,-
( i) जहां संदत्त या संदत्त की जाने वाली संभावित और कटौती के अधीन रहते हुए आय या ऐसी आय का योग एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे कर के दो प्रतिशत की दर से;
( ii ) जहां संदत्त या संदत्त की जाने वाली संभावित और कटौती के अधीन रहते हुए आय या ऐसी आय का योग दस करोड़ रुपए से अधिक है , ऐसे कर के पांच प्रतिशत की दर से,
परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा ।
(7) उन दशाओं , जिनमें कर का संग्रहण, आयकर अधिनियम की धारा 194ख के परंतुक के अधीन किया जाना है, ऐसा संग्रहण पहली अनुसूची के भाग 2 में विनिर्दिष्ट दरों से किया जाएगा और उन दशाओं में, जहां कहीं विहित हो, उनमें उपबंधित रीति से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा ।
(8 ) उन दशाओं में, जिनमें कर का संग्रहण, आय - कर अधिनियम की धारा 206ग के अधीन किया जाना है, ऐसा संग्रहण उस धारा में विनिर्दिष्ट दरों से किया जाएगा और उसमें,-
(क) प्रत्येक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुंब या व्यक्ति- संगम या व्यष्टि निकाय, चाहे वह निगमित होया न हो, या आय - कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 31 ) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्तिया सहकारी सोसाइटी या फर्म, जो अनिवासी है, की दशा में, जहां संगृहीत और संग्रहण के अधीन रहते हुए रकम या ऐसी रकमों का योग एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे कर के बारह प्रतिशत कीदरसे;
(ख) देशी कंपनी से भिन्न प्रत्येक कंपनी की दशा में,-
( i ) जहां संगृहीत और संग्रहण के अधीन रहते हुए रकम या ऐसी रकमों का योग एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे कर के दो प्रतिशत की दर से;
(ii ) जहां संगृहीत और संग्रहण के अधीन रहते हुए रकम या ऐसी रकमों का योग दस करोड़ रुपए से अधिक है , ऐसे कर के पांच प्रतिशत की दर से,
परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा ।
भारत का राजपत्र असाधारण
81 अनुभाग 1क]
( 9) उपधारा ( 10 ) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उन दशाओं में, जिनमें आय - कर, प्रवृत्त दर या दरों से, आय-कर अधिनियम की धारा 172 की उपधारा ( 4 ) या धारा 174 की उपधारा ( 2 ) या धारा 174 क या धारा 175 या धारा 176 की उपधारा ( 2 ) के अधीन प्रभारित किया जाना है या उक्त अधिनियम की धारा 192 के अधीन " वेतन " शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय में से काटा जाना है या उस पर संदत्त किया जाना है अथवा उक्त अधिनियम के अध्याय 17 ग के अधीन संदेय " अग्रिम कर " की संगणना की जानी है, यथास्थिति, ऐसा आय-कर या " अग्रिम कर " , पहली अनुसूची के भाग 3 में विनिर्दिष्ट दर या दरों से इस प्रकार प्रभारित किया जाएगा , काटा जाएगा या संगणित किया जाएगा और ऐसे कर में, उन दशाओं में और उनमें यथा उपबंधित रीति से, परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
परंतु उन दशाओं में , जिनमें आय - कर अधिनियम के अध्याय 12 या अध्याय 12क या धारा 115ञख या धारा 115ञग या अध्याय 12चक या अध्याय 12चख या धारा 161 की उपधारा ( 1 क ) या धारा 164 या धारा 164क या धारा 167ख के उपबंध लागू होते हैं , " अग्रिम कर " की संगणना, यथास्थिति , इस उपधारा द्वारा अधिरोपित दरों के या उस अध्याय या धारा में यथा विनिर्दिष्ट दरों के प्रति निर्देश से की जाएगी:
परंतु यह और कि आय- कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित " अग्रिम कर" की रकम में, पहली अनुसूची के भाग 3 के, यथास्थिति , पैरा क, पैरा ख , पैरा ग, पैरा घ या पैरा ङ में यथा उपबंधित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
परंतु यह भी कि आय- कर अधिनियम की धारा 115 क , धारा 115कख, धारा 115कग , धारा 115कगक, धारा 115कघ , धारा 115ख , धारा 115खख , धारा 115 खखक , धारा 115खखग, धारा 115खखघ, धारा 115खखङ; धारा 115ङ, धारा 115ञख और धारा 115 ञग के अधीन कर से प्रभार्य किसी आय के संबंध में पहले परंतुक के अधीन संगणित" अग्रिम कर " में,-
(क) प्रत्येक व्यष्टि या हिन्दूअविभक्त कुटुंब या व्यक्ति- संगम या व्यष्टि-निकाय, चाहे वह निगमित हो या न हो, या आय- कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 31 ) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्तिया सहकारी सोसाइटी या फर्म या स्थानीय प्राधिकारी की दशा में, जहां कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है , ऐसे कर के बारह प्रतिशत की दर से;
(ख ) प्रत्येक देशी कंपनी की दशा में,-
(i ) जहां कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है , किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे " अग्रिम कर " के सात प्रतिशत की दर से;
( ii ) जहां कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे " अग्रिम कर " के बारह प्रतिशत कीदर से;
(ग ) देशी कंपनी से भिन्न प्रत्येक कंपनी की दशा में,-
( i ) जहां कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपएसे अधिक नहींहै, ऐसे " अग्रिम कर " के दो प्रतिशत की दर से;
( ii ) जहां कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे " अग्रिम कर " के पांच प्रतिशत की
दरसे,
परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
परंतु यह भी कि उपरोक्त ( क ) में वर्णित व्यक्तियों की दशा में, जिनकी कुल आय आय - कर अधिनियम कीधारा 115ञग के अधीन कर से प्रभार्य है और ऐसी आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर " अग्रिम 82
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2-
कर" और उस पर अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम एक करोड़ रुपए की कुल आय पर " अग्रिम कर " के रूप में संदेय कुल रकम से, आय की उस रकम से , अधिक नहीं होगी, जो एक करोड़ रुपए से अधिक है:
परंतु यह भी कि ऐसी प्रत्येक कंपनी की दशा में , जिसकी आय-कर अधिनियम की धारा 115ञख के अधीन कर से प्रभार्य कुल आय है और ऐसी आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहींहै, ऐसी आय पर " अग्रिम कर " के रूप में संदेय कुल रकम और उस पर अधिभार की रकम एक करोड़ रुपए कीकुल आय पर " अग्रिम कर " के रूप में संदेय कुल रकम पर आय की उस रकम से अधिक नहीं होगी , जो एक करोड़ रुपएसे अधिक है:
परंतु यह भी कि प्रत्येक ऐसी कंपनी की दशा में, जिसकी कुल आय आय- कर अधिनियम की धारा 115ञख के अधीन कर से प्रभार्य है और ऐसी आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर " अग्रिम कर " और उस पर अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम दस करोड़ रुपए की कुल आय पर " अग्रिम कर" के रूप में संदेय कुल रकम से आय की उस रकम से, अधिक नहीं होगी , जो दस करोड़ रुपए से अधिक है ।
(10) उन दशाओं में, जिनमें पहली अनुसूची के भाग 3 का पैरा क लागू होता है, जहां निर्धारिती की पूर्ववर्ष में या, यदि आय- कर अधिनियम के किसी उपबंध के आधार पर आय- कर पूर्ववर्ष से भिन्न किसी अवधि की आय केसंबंध में प्रभारित किया जाना है, ऐसी अन्य अवधि में कुल आय के अतिरिक्त पांच हजार रुपए से अधिककोई शुद्ध कृषि आय है और कुल आय दो लाख पचास हजार रुपए से अधिक है, वहां प्रवृत्त दर या दरों से, उक्त अधिनियम की धारा 174 की उपधारा ( 2 ) या धारा 174 क या धारा 175 या धारा 176 की उपधारा ( 2 ) के अधीन आय-कर प्रभारित करने में अथवा उक्त अधिनियम के अध्याय 17 ग के अधीन संदेय " अग्रिम कर " की संगणना करने में,-
(क ) शुद्ध कृषि- आय को, कुल आय के संबंध में केवल, यथास्थिति, ऐसा आय- कर या " अग्रिम कर " प्रभारित या संगणित करने के प्रयोजन के लिए, खंड ( ख ) में उपबंधित रीति से हिसाब में लिया जाएगा [ अर्थात्, मानो शुद्ध कृषि - आय कुल आय के प्रथम दो लाख पचास हजार रुपए के पश्चात् कुल आय में समाविष्ट हो , किंतु कर के दायित्वाधीन न हो; और
(ख ) यथास्थिति, ऐसा आय- कर या " अग्रिम कर " निम्नलिखित रीति से इस प्रकार प्रभारित या संगणित किया जाएगा , अर्थात्ः-
(i ) कुल आय और शुद्ध कृषि- आय को संकलित कर दिया जाएगा और संकलित आय के संबंध में आय- कर या " अग्रिम कर " की रकम उक्त पैरा क में विनिर्दिष्ट दरों से ऐसे अवधारित की जाएगी मानो ऐसी संकलित आय कुल आय हो;
( ii ) शुद्ध कृषि- आय में दो लाख पचास हजार रुपए की राशि बढ़ा दी जाएगी और इस प्रकार बढ़ाई गई शुद्ध कृषि आय के संबंध में आय- कर या " अग्रिम कर " की रकम, उक्त पैरा क में विनिर्दिष्ट दरों से ऐसे अवधारित की जाएगी , मानो शुद्ध कृषि आय कुल आय हो;
(iii ) उपखंड ( i ) के अनुसार अवधारित आयकर या " अग्रिम कर " की रकम में से उपखंड ( ii ) के अनुसार अवधारित, यथास्थिति, आय- कर या " अग्रिम कर " की रकम घटा दी जाएगी और इस प्रकार प्राप्त राशि, कुल आय के संबंध में, यथास्थिति, आय - कर या " अग्रिम कर" होगी:
परंतु ऐसे प्रत्येक व्यष्टि की दशा में , जो पहली अनुसूची के भाग 3 के पैरा क की मद ( II ) में निर्दिष्ट भारत में निवासीहै और पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय साठ वर्ष या उससे अधिक ,
किन्तु अस्सी वर्ष से कम की आयु का है, इस उपधारा के उपबंध ऐसे प्रभावी होंगे मानो, " दो लाख पचास हजार रुपए" शब्दों के स्थान पर, " तीन लाख रुपए " शब्द रखे गए हों:
परन्तु यह और कि ऐसे प्रत्येक व्यष्टि की दशा में, जो पहली अनुसूची के भाग 3 के पैरा क की मद ( III) में निर्दिष्ट भारत में निवासी है और पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय अस्सी वर्ष या उससे अधिक की आयु का है, इस भारत का राजपत्र असाधारण
83 अनुभाग 1क]
उपधारा के उपबंध ऐसे प्रभावी होंगे मानो, " दो लाख पचास हजार रुपए " शब्दों के स्थान पर, " पांच लाख रुपए"
शब्द रखे गए हों:
परन्तु यह भी कि इस प्रकार प्राप्त आय - कर या " अग्रिम कर " की रकम पर प्रत्येक दशा में परिकलित अधिभार, उसमें उपबंधित रीति में , संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा ।
( 11) उपधारा ( 1 ) से उपधारा ( 10 ) में यथा विनिर्दिष्ट और उसमें उपबंधित रीति से परिकलित लागू अधिभार द्वारा , संघ के प्रयोजनों के लिए बढ़ाई गई आय- कर की रकम को, ऐसे आय- कर और अधिभार पर दो प्रतिशत की दर से परिकलित " आय- कर पर शिक्षा उपकर " नाम से ज्ञात, अतिरिक्त अधिभार द्वारा , संघ के प्रयोजनों के लिए, और बढ़ा दिया जाएगा, जिससे सार्वत्रिक स्तर की क्वालिटी की प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने और उसका वित्तपोषण करने की सरकार की प्रतिबद्धता को पूरा किया जा सकेः
परन्तु इस उपधारा की कोई बात उन दशाओं में लागू नहीं होगी जिनमें उपधारा ( 5 ) , उपधारा ( 6 ) , उपधारा ( 7 ) और उपधारा ( 8 ) में वर्णित आय- कर अधिनियम की धाराओं के अधीन कर की कटौती या उसका संग्रहण किया जाना है , यदि स्रोत पर कर की कटौती के या स्रोत पर कर के संग्रहण के अधीन रहते हुए आय का संदाय किसी देशी कंपनी और भारत में निवासी किसी अन्य व्यक्ति को किया जाता है ।
(12) उपधारा ( 1 ) से उपधारा ( 10 ) में यथा विनिर्दिष्ट और उसमें उपबंधित रीति से परिकलित लागू अधिभार द्वारा , संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ाई गई आय - कर की रकम को, ऐसे आय- कर और अधिभार पर एक प्रतिशत की दर से परिकलित " आय- कर पर माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा उपकर " नाम से ज्ञात , अतिरिक्त अधिभार द्वारा, संघ के प्रयोजनों के लिए, और बढ़ा दिया जाएगा, जिससे सार्वत्रिक स्तर की क्वालिटी की माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा उपलब्ध कराने और उसका वित्तपोषण करने की सरकार की प्रतिबद्धता को पूरा किया जा सके:
परंतु इस उपधारा की कोई बात उन दशाओं में लागू नहीं होगी जिनमें उपधारा ( 5 ) , उपधारा ( 6 ) , उपधारा ( 7 ) और उपधारा ( 8 ) में वर्णित आयकर अधिनियम की धाराओं के अधीन कर की कटौती या उसका संग्रहण किया जाना है, यदि स्रोत पर कर की कटौती के या स्रोत पर कर के संग्रहण के अधीन रहते हुए आय का संदाय किसी देशी कंपनी और भारत में निवासी किसी अन्य व्यक्ति को किया जाता है ।
( 13 ) इस धारा और पहली अनुसूची के प्रयोजनों के लिए,-
(क) " देशी कंपनी " से कोई भारतीय कंपनी या कोई अन्य ऐसी कंपनी अभिप्रेत है, जिसने 1 अप्रैल, 2015 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के लिए, आय- कर अधिनियम के अधीन आय-कर के दायित्वाधीन अपनी आय के संबंध में ऐसी आय में से संदेय लाभांशों ( जिनके अंतर्गत अधिमानी शेयरों पर लाभांश भी हैं ) की घोषणा और भारत में उनके संदाय के लिए विहित इंतजाम कर लिए हैं;
(ख) " बीमा कमीशन " से बीमा कारबार की याचना करने या उसे उपाप्त करने के लिए ( जिनके अंतर्गत बीमा पालिसियों को जारी रखने, उनका नवीकरण या उन्हें पुनरुज्जीवित करने से संबंधित कारबार है) कमीशन के रूप में या अन्यथा कोई पारिश्रमिक या इनाम अभिप्रेत है;
(ग ) किसी व्यक्ति के संबंध में, " शुद्ध कृषि आय" से, पहली अनुसूची के भाग 4 में अंतर्विष्ट नियमों के अनुसार संगणित, उस व्यक्ति की किसी भी स्रोत से व्युत्पन्न कृषि आय की कुल रकम अभिप्रेत है;
84
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2-
(घ) अन्य सभी शब्दों और पदों के, जो इस धारा में और पहली अनुसूची में प्रयुक्त हैं, किन्तु इस उपधारा में परिभाषित नहीं हैं और आय - कर अधिनियम में परिभाषित हैं, वहीं अर्थ होंगे , जो उनके क्रमशः उस अधिनियम में हैं ।
अध्याय 3
प्रत्यक्ष कर
आय-कर
धारा 2 का संशोधन ।
3. आय- कर अधिनियम की धारा 2 में , 1 अप्रैल , 2016 से-
(क) खंड ( 13 क ) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्ः-
' ( 13क) " कारबार न्यास " से निम्नलिखित के रूप में रजिस्ट्रीकृत न्यास अभिप्रेत है,-
(i) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम , 1992 के अधीन बनाए गए 1992 का 15 भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( अवसंरचना विनिधान न्यास ) विनियम, 2014 के अधीन कोई अवसंरचना विनिधान न्यास; या
1992 का 15
(ii) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( भू- सम्पदा विनिधान न्यास ) विनियम, 2014 के अधीन कोई भू- संपदा विनिधान न्यास; और
जिसकी इकाइयों का पूर्वोक्त विनियमों के अनुसार मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होना अपेक्षित है;' ;
(ख) खंड ( 15 ) में, -
(i ) " शिक्षा " शब्द के पश्चात्, " योग, " शब्द अंतःस्थापित किया जाएगा;
(ii) पहले और दूसरे परंतुक के स्थान पर, निम्नलिखित परंतुक रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" परन्तुकिसी ऐसे अन्य सामान्य लोक उपयोगी उद्देश्य को अग्रसर किया जाना, यदि उसमें किसी उपकर या फीस या किसी अन्य प्रतिफल के लिए व्यापार, वाणिज्य या कारबार कीप्रकृति का कोई क्रियाकलाप या किसी व्यापार, वाणिज्य या कारबार के संबंध में कोई सेवा प्रदान करने का कोई क्रियाकलाप किया जाना अंतर्वलित है, भले ही ऐसे क्रियाकलाप से आय के उपयोग या उपयोजन या प्रतिधारण की प्रकृति कुछ भी हो, तब तक पूर्त प्रयोजन नहीं होगा जब तक कि
(i) ऐसे क्रियाकलाप को किसी अन्य सामान्य लोक उपयोगी उद्देश्य के ऐसे अग्रसरण के वस्तुतः किए जाने के अनुक्रम में हाथ में नहीं लिया गया है; और
(ii) ऐसे क्रियाकलाप या क्रियाकलापों से सकल प्राप्तियां, पूर्ववर्ष के दौरान , उस न्यास या संस्था की, जो ऐसा क्रियाकलाप या ऐसे क्रियाकलापों को हाथ में ले रही है, उस पूर्ववर्ष की कुल प्राप्तियों के बीस प्रतिशत से अनधिक नहीं है; " ;
(ग) खंड 24 में , उपखंड (xvii) के पश्चात्, निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किया जाएगा,
अर्थात्ः-
(xviii) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी प्राधिकरण या निकाय या अभिकरण द्वारा , सहायकी या अनुदान या नकद प्रोत्साहन या शुल्क वापसी या अधित्यजन या रियायत या भारत का राजपत्र असाधारण
85 अनुभाग 1क]
प्रतिपूर्ति ( चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो ) के रूप में निर्धारिती को, ऐसी सहायकी या अनुदान या प्रतिपूर्ति से भिन्न, जिसे धारा 43 के खंड ( 1 ) के स्पष्टीकरण 10 के उपबंधों के अनुसार आस्ति की वास्तविक लागत के अवधारण के लिए हिसाब में लिया जाता है, नकद या वस्तु रूप में सहायता;";
( घ ) खंड ( 37क ) के उपखंड (iii ) के आरंभ में , " धारा 195 " शब्द और अंकों के पहले , " धारा 194ठखक या " शब्द, अंक और अक्षर अंतःस्थापित किए जाएंगे ;
(ङ) खंड ( 42 क ) के स्पष्टीकरण 1 में, खंड ( i) के उपखंड ( जग ) के पश्चात् निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्ः-
" ( जघ ) किसी ऐसी पूंजी आस्ति , जो कोई यूनिट या यूनिटें हैं, की दशा में, जो धारा 47 के खंड (xviii) में निर्दिष्ट किसी अंतरण के प्रतिफलस्वरूप निर्धारिती की संपत्ति हो जाती है, वह कालावधि, जिसके लिए पारस्परिक निधि की समेकन स्कीम में यूनिट या यूनिटें निर्धारिती द्वारा धारित की गई थीं , सम्मिलित कर ली जाएगी:
(जङ) किसी ऐसी पूंजी आस्ति, जो किसी कंपनी का शेयर है या के शेयर हैं, की दशा में, जिसकाकिसी अनिवासी निर्धारिती द्वारा धारित धारा 115कग की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ख ) में निर्दिष्ट सार्वत्रिक निक्षेपागार रसीदों के मोचन पर अर्जन किया जाता है, उस कालावधि की संगणना उस तारीख से की जाएगी जिसको ऐसे मोचन के लिए कोई अनुरोध किया गया था; " ।
धारा 6 का संशोधन ।
4. आय- कर अधिनियम की धारा 6 में,-
(i) खंड ( 1 ) में, स्पष्टीकरण को उसके स्पष्टीकरण 1 के रूप में संख्यांकित किया जाएगा और इस प्रकार संख्यांकित स्पष्टीकरण 1 के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" स्पष्टीकरण 2- इस खंड के प्रयोजनों के लिए, किसी ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो भारत का नागरिक और भारत से विदेश को जाने वाले पोत के कर्मीदल का सदस्य है, ऐसी समुद्र यात्रा के संबंध में , भारत में रहने की कालावधि या कालावधियां ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए अवधारित की जाएगी या की जाएंगी, जो विहित की जाएं ।";
(ii) खंड ( 3 ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड, 1 अप्रैल, 2016 से रखा जाएगा, अर्थात्ः-
' (3) कोई कंपनी किसी पूर्ववर्ष में भारत में निवासी तब कही जाती है, यदि,-
(i ) वह एक भारतीय कंपनी है ; या
(ii) उसके प्रभावी प्रबंध का स्थान उस वर्ष में भारत में है ।
स्पष्टीकरण इस खंड के प्रयोजनों के लिए " प्रभावी प्रबंध का स्थान " से ऐसा स्थान अभिप्रेत है जहां किसी सत्ता के संपूर्ण कारबार के संचालन के लिए आवश्यक प्रमुख प्रबंधन और वाणिज्यिक विनिश्चय , सारवान् रूप में किए जाते हैं । ' ।
धारा 9 कासंशोधन ।
5. आय- कर अधिनियम की धारा 9 की उपधारा ( 1 ) में, 1 अप्रैल , 2016 से,-
(अ ) खंड (i ) के स्पष्टीकरण 5 के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किए जाएंगे ,
अर्थात्ः-
' स्पष्टीकरण 6-इस खंड के प्रयोजनों के लिए यह घोषित किया जाता है कि,-
(क ) स्पष्टीकरण 5 में निर्दिष्ट शेयर या हित का, भारत में अवस्थित आस्तियों से (चाहे वे मूर्त हों या अमूर्त हों ) उसका मूल्य सारवान् रूप में व्युत्पन्न हुआ समझा जाएगा यदि विनिर्दिष्ट तारीख को ऐसी आस्तियों का मूल्य,- 86
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2-
( i) दस करोड़ रुपए की रकम से अधिक हो जाता है ; और
(ii ) यथास्थिति, कंपनी या सत्ता के स्वामित्वाधीन सभी आस्तियों के मूल्य काकम से कम पचास प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है;
(ख) किसी आस्तिका मूल्य आस्ति के संबंध में दायित्वों को, यदि कोई हों , घटाए बिना ऐसी आस्तिका, विनिर्दिष्ट तारीख को, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, अवधारित उचित बाजार मूल्य होगा;
(ग) " लेखा अवधि" से मार्च के इकतीसवें दिन को समाप्त होने वाली बारह मास की प्रत्येक अवधि अभिप्रेतहै:
परन्तु जहां स्पष्टीकरण 5 में निर्दिष्ट कोई कंपनी या सत्ता
(i ) कर प्रयोजनों के लिए उस राज्यक्षेत्र की, जिसकी वह निवासी है, कर विधियों के उपबंधों का अनुपालन करने; या
(ii) शेयर या हित धारण करने वाले व्यक्तियों को रिपोर्ट करने,
के प्रयोजन के लिए मार्च के इकतीसवें दिन से भिन्न किसी दिन को समाप्त होने वाली बारह मास की अवधि को नियमित रूप से अंगीकार करती है तो ऐसे भिन्न दिन को समाप्त होने वाली बारह मास की अवधि, यथास्थिति, कंपनी या सत्ता की लेखा अवधि होगी:
परन्तु यह और कि, यथास्थिति, कंपनी या सत्ता की प्रथम लेखा अवधि उसके रजिस्ट्रीकरण या निगमन की तारीख से प्रारंभ होगी और ऐसे रजिस्ट्रीकरण या निगमन की तारीख के पश्चात् यथास्थिति, मार्च के इकतीसवें दिन को या किसी अन्य दिन को समाप्त होगी और पश्चात्वर्ती लेखा अवधि बारह मास की क्रमवर्ती अवधियां होंगीः
परंतु यह भी कि यदि कंपनी या सत्ता यथा पूर्वोक्त लेखा अवधि के समाप्त होने के पूर्व अस्तित्व में रहती है तो लेखा अवधि यथास्थिति, कंपनी या सत्ता के अस्तित्व में न रहने के ठीक पूर्व समाप्त हो जाएगी;
(घ) " विनिर्दिष्ट तारीख " से,-
(i ) ऐसी तारीख अभिप्रेत है, जिसको, यथास्थिति, कंपनी या सत्ता की लेखा अवधिकिसी शेयर या हित के अंतरण की तारीख के पूर्व समाप्त होती है; या
(ii) अंतरण की तारीख अभिप्रेत है, यदि, अंतरण की तारीख को, यथास्थिति, कंपनी या सत्ता की आस्तियों का बही मूल्य उपखंड ( i) में निर्दिष्ट तारीख को यथा विद्यमान आस्तियों के बही मूल्य से पन्द्रह प्रतिशत अधिक हो जाता है;
स्पष्टीकरण 7 इस खंड के प्रयोजनों के लिए-
(क) कोई आय, स्पष्टीकरण 5 में निर्दिष्ट ऐसी किसी कंपनी या सत्ता के जो भारत के बाहर रजिस्ट्रीकृत या निगमित हो, किसी शेयर या उसमें के किसी हित का भारत के बाहर अंतरण से किसी अनिवासी को उस दशा में प्रोद्भूत या उद्भूत हुई नहीं समझी जाएगी,-
(i) यदि भारत में स्थित आस्तियां प्रत्यक्षतः ऐसी कंपनी या सत्ता के स्वामित्वाधीन हैं और अंतरक ( चाहे व्यष्टिक रूप से या अपने सहयुक्त उद्यमों के साथ ) , अंतरण की तारीख के पूर्व बारह मास में किसी भी समय , यथास्थिति, ऐसी कंपनी या सत्ता के संबंध में, न तो प्रबंध या नियंत्रण का अधिकार धारण करता है भारत का राजपत्र असाधारण
87 अनुभाग 1क]
और न ही ऐसी कंपनी या सत्ता की कुल मतदान शक्ति या कुल शेयर पूंजी या कुल हित के पांच प्रतिशत से अधिक मतदान शक्ति या शेयर पूंजी या हित धारण करता है;या
( ii ) यदि भारत में स्थित आस्तियां अप्रत्यक्षतः ऐसी कंपनी या अस्तित्व के स्वामित्वाधीन हैं और अंतरक ( चाहे व्यष्टिक रूप से या अपने सहयुक्त उद्यमों के साथ ) , अंतरण की तारीख के पूर्व बारह मास में किसी भी समय, यथास्थिति, ऐसी कंपनी या सत्ता के संबंध में न तो प्रबंध या नियंत्रण का अधिकार धारण करता है और न ही ऐसी कंपनी या सत्ता में या उसके संबंध में कोई ऐसा अधिकार धारण करता है जो उसे ऐसी कंपनी या सत्ता में, जो भारत में स्थित आस्तियों की प्रत्यक्षतः स्वामी है, प्रबंध या नियंत्रण के अधिकार का हकदार बनाता हो और न ही ऐसी कंपनी या सत्ता में ऐसी मतदान शक्ति या शेयर पूंजी या हित की ऐसी प्रतिशतता धारित करता हो जिसकी परिणति यथास्थिति , उस कंपनी या सत्ता की, जो भारत में स्थित आस्तियों की प्रत्यक्षतः स्वामी हो , कुल मतदान शक्ति या कुल शेयर पूंजी या कुल हित के पांच प्रतिशत से अधिक मतदान शक्ति या शेयर पूंजी या हित धारण करने में ( चाहे व्यष्टिक रूप से या सहयुक्त उद्यमों के साथ ) होती है ;
(ख) ऐसी किसी दशा में , जहां कि स्पष्टीकरण 5 में निर्दिष्ट यथास्थिति , किसी कंपनी या सत्ता के प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः स्वामित्वाधीन सभी आस्तियां भारत में अवस्थित नहीं हैं; अनिवासी अंतरक की, ऐसी कंपनी या सत्ता के किसी शेयर या उसमें के हित के भारत के बाहर अंतरण से , इस खंड के अधीन भारत में प्रोद्भूत या उद्भूत हुई समझी गई आय का केवल ऐसा भाग होगी जो भारत में अवस्थित आस्तियों के कारण युक्तियुक्त रूप से हुई मानी जा सकती है और वह ऐसी रीति से अवधारित की जाएगी जो विहित की जाए;
( ग) " सहयुक्त उद्यम " का वही अर्थ होगा जो धारा 92क में उसका है;' ;
( आ) खंड ( v ) के उपखंड ( ग ) के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
' स्पष्टीकरण इस खंड के प्रयोजनों के लिए,-
(क) यह घोषित किया जाता है कि किसी अनिवासी की दशा में , जो बैंककारी कारबार में लगा हुआ कोई व्यक्ति है, ऐसे अनिवासी के भारत में के स्थायी स्थापन द्वारा ऐसे अनिवासी के भारत के बाहर के प्रधान कार्यालय या किसी स्थायी स्थापन या किसी अन्य भाग को संदेय कोई ब्याज भारत में प्रोद्भूत या उद्भूत हुआ समझा जाएगा और वह भारत में के स्थायी स्थापन को हुई मानी जा सकने वाली किसी आय के अतिरिक्त कर से प्रभार्य होगी और भारत में के स्थायी स्थापन को उस अनिवासी व्यक्ति से पृथक् और स्वतंत्र व्यक्ति समझा जाएगा जिसका कि वह स्थायी स्थापन है और कुल आय की संगणना, करके अवधारण और संग्रहण तथा वसूली से संबंधित अधिनियम के उपबंध तदनुसार लागू होंगे ;
है।' । (ख) " स्थायी स्थापन" का वही अर्थ होगा जो धारा 92 च के खंड ( iiiक ) में उसका
नई धारा 9 क का अंतःस्थापन ।
6. आय- कर अधिनियम की धारा 9 के पश्चात् निम्नलिखित धारा 1 अप्रैल, 2016 से अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
कतिपय क्रियाकलापों से भारत में कारबारी संपर्क गठित न होना ।
' 9क. ( 1 ) धारा 9 की उपधारा ( 1 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी और इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी पात्र विनिधान निधि की दशा में , ऐसी निधि की ओर से कार्य करने वाले किसी पात्र निधि प्रबंधक के माध्यम से किए गए निधि प्रबंधन क्रियाकलाप से उक्त निधि का भारत में कारबारी संपर्क गठित नहीं होगा ।
भारत का राजपत्र असाधारण
88
[भाग 2-
(2) धारा 6 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी , किसी पात्र विनिधान निधि को, केवल इस कारण से कि उसकी ओर से निधि प्रबंधन क्रियाकलाप करने वाला पात्र निधि प्रबंधक भारत में स्थित है, उस धारा के प्रयोजन के लिए भारत में निवासी नहीं कहा जाएगा ।
(3 ) उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट पात्र विनिधान निधि से भारत के बाहर स्थापित या निगमित या रजिस्ट्रीकृत ऐसी निधि अभिप्रेत है, जो अपने सदस्यों के फायदे के लिए निधियां उसका विनिधान करने हेतु अपने सदस्यों से संगृहीत करती है और निम्नलिखित शर्तें पूरी करती है, अर्थात्ः-
(क) निधि भारत में निवासी व्यक्ति नहीं है;
(ख) निधि ऐसी किसी देश या किसी विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्र की निवासी है जिसके साथ धारा 90 की उपधारा ( 1 ) या धारा 90क की उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट करार किया गया है;
(ग) भारत में निवासी व्यक्तियों द्वारा निधि में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः, संकलित सहभागिता याविनिधान समग्र निधि के पांच प्रतिशत से अधिक नहीं होता है;
(घ ) निधि और उसके क्रियाकलाप , उस देश या विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्र में जहां वह स्थापित या निगमित किया जाता है या कोई निवासी है, लागू विनिधानकर्ता संरक्षण विनियमों के अध्यधीन हैं,
है; (ङ) निधि में कम से कम पच्चीस सदस्य हैं जो प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संबद्ध व्यक्ति नहीं
(च) संबद्ध व्यक्तियों सहित निधि का कोई भी सदस्य, निधि में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः दस प्रतिशत से अधिक कोई सहभागिता हित नहीं रखेगा;
(छ) निधि में दस या उससे कम सदस्यों का उनके संबद्ध व्यक्तियों सहित प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संकलित सहभागिता हित पचास प्रतिशत से कम होगा;
(ज) निधि किसी सत्ता में के अपने समग्र अंश के बीस प्रतिशत से अधिक का विनिधान नहींकरेगी;
(झ) निधिअपनी सहयुक्त सत्ता में कोई विनिधान नहीं करेगी;
(ञ) समग्र निधि का मासिक औसत एक अरब रुपए से कम नहीं होगाः
परंतु यदि निधि पूर्ववर्ष में स्थापित या निगमित की गई है तो समग्र निधि ऐसे पूर्ववर्ष के अंत में एक अरब रुपए से कम की नहीं होगी;
(ट) निधि, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः भारत में या भारत से कोई कारबार नहीं करेगी या उसे नियंत्रित या उसका प्रबंधन नहीं करेगी;
(ठ) निधि न तो किसी ऐसे क्रियाकलाप में जिससे भारत में कारबारी संपर्क गठित होता हो, लगी हुई है और न ही उसमें, उसकी ओर से कार्य करने वाला ऐसा कोई व्यक्ति है जिसके , उसकी ओरसे पात्र निधि प्रबंधक द्वारा किए गए क्रियाकलापों से भिन्न, क्रियाकलापों से भारत में कारबारी संपर्क गठित होता है;
(ड) निधिद्वारा पात्र निधि प्रबंधक को उसके द्वारा किए गए निधि प्रबंधन क्रियाकलाप की बाबत संदत्त पारिश्रमिक उक्त क्रियाकलाप की असन्निकट कीमत से कम नहीं है:
परंतु खंड ( ङ) , खंड ( च ) और खंड ( छ) में विनिर्दिष्ट शर्तें किसी विदेशी राज्य की सरकार या सेंट्रल बैंक द्वारा गठित किसी विनिधान निधि या किसी प्रभुत्वसंपन्न निधि या ऐसी अन्य निधि को, जो केन्द्रीय सरकार शर्तों, यदि कोई हों , के अधीन रहते हुए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, लागू नहीं होगी ।
भारत का राजपत्र असाधारण
89 अनुभाग 1क]
(4) किसी पात्र विनिधान निधि के संबंध में पात्र निधि प्रबंधक से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो निधि प्रबंधन के क्रियाकलाप में लगा हुआ है और निम्नलिखित शर्तें पूरी करता है, अर्थात्ः-
है; (क) व्यक्ति, पात्र विनिधान निधि या निधि के संबद्ध व्यक्ति का कोई कर्मचारी नहीं
( ख ) व्यक्ति विनिर्दिष्ट विनियमों के अनुसार निधि प्रबंधक या विनिधान सलाहकार के रूप में रजिस्ट्रीकृत है ;
(ग ) व्यक्ति अपने कारबार के सामान्य अनुक्रम में निधि प्रबंधक के रूप में कार्य कर रहा है;
(घ ) व्यक्ति अपने से संबद्ध व्यक्तियों के साथ , प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः निधि प्रबंधक के माध्यम से निधि द्वारा किए गए संव्यवहारों से पात्र विनिधान को प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाले लाभों के बीस प्रतिशत से अधिक का हकदार नहीं होगा ।
( 5) प्रत्येक पात्र विनिधान निधि, किसी वित्तीय वर्ष में अपने क्रियाकलापों के संबंध में वित्तीय वर्ष की समाप्ति से नब्बे दिन के भीतर विहित प्ररूप में एक विवरण , विहित आय- कर प्राधिकारी को प्रस्तुत करेगी जिसमें इस धारा में विनिर्दिष्ट शर्तों को पूरा करने के संबंध में सूचना अंतर्विष्ट होगी और वह ऐसी अन्य सुसंगत सूचना या दस्तावेज भी, जो विहित किए जाएं उपलब्ध कराएगी ।
(6 ) इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात, पात्र विनिधान निधि की कुल आय से किसी ऐसी आय को अपवर्जित करने के प्रति लागू नहीं होगी , जिसे इस बात पर विचार किए बिना कि क्या पात्र निधि प्रबंधक के क्रियाकलाप से ऐसी निधि का भारत में कारबारी संपर्क गठित होता है या नहीं, सम्मिलित किया गया हो ।
(7 ) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात का पात्र निधि प्रबंधक की दशा में कुल आय की व्याप्ति या कुल आय के अवधारण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
( 8 ) इस धारा के उपबंध ऐसे मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार और ऐसी रीति से लागू किए जाएंगे जो बोर्ड इस निमित्त विहित करे ।
(9 ) इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) " सहयुक्त" से ऐसी सत्ता अभिप्रेत है जिसमें विनिधान निधि का कोई निदेशक या न्यासी या भागीदार या सदस्य या निधि प्रबंधक या ऐसी निधि के निधि प्रबंधक का कोई निदेशक या न्यासी या भागीदार या सदस्य, व्यष्टिक रूप से या सामूहिक रूप से ऐसा शेयर या हित धारण करता है जो उसकी यथास्थिति, शेयर पूंजी या हित के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक है;
(ख) " संबद्ध व्यक्ति " का वही अर्थ होगा जो धारा 102 के खंड ( 4 ) में उसका है;
(ग) " समग्रअंश " से पात्र विनिधान निधि द्वारा विनिधान के प्रयोजन के लिए किसी विशिष्ट तारीख को जुटाई गई निधियों की कुल रकम अभिप्रेत है;
( घ) " सत्ता " से ऐसी सत्ता अभिप्रेत है जिसमें कोई पात्र विनिधान निधि कोई विनिधान करती है;
1992का 15
(ङ) " विनिर्दिष्ट विनियमों " से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( विभाग प्रबंधक ) विनियम, 1993 या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( विनिधान सलाहकार ) विनियम, 2013 या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधीन बनाए गए ऐसे अन्य विनियम अभिप्रेत हैं जो इस खंड के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाएं । ' ।
भारत का राजपत्र असाधारण
90
[भाग 2-
धारा 10 का
7. आय- कर अधिनियम की धारा 10 में,-
संशोधन ।
(i) खंड ( 11 ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
1873का 5 " ( 11क ) सरकारी बचत बैंक अधिनियम, 1873 के अधीन बनाए गए सुकन्या समृद्धि खाता नियम, 2014 के अनुसार खोले गए खाते से कोई संदाय, " ;
(II) खंड ( 23 ग ) के उपखंड (iiiक) के पश्चात्, निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किए जाएंगे,
अर्थात्ः-
" ( iiiकक) केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित स्वच्छ भारत कोष; या
(iiiककक) केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित स्वच्छ गंगा निधि; या " ;
(III) 1 अप्रैल, 2016 से,--
(क) खंड ( 23 ङघ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा अर्थात्ः-
(23डङ) किसी मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम द्वारा ऐसे विनियमों के अनुसार, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किए जाएं, स्थापित ऐसी आंतरक समझौता प्रत्याभूति निधि की कोई विनिर्दिष्ट आयः
परंतु जहां निधि के जमा खाते में पड़ी और किसी पूर्ववर्ष के दौरान आय - कर से प्रभारित न की गई किसी रकम को पूर्णतः या भागतः विनिर्दिष्ट व्यक्ति के साथ बांटा जाता है, वहां इस प्रकार बांटी गई संपूर्ण रकम को उस पूर्ववर्ष की आय समझा जाएगा जिसमें ऐसी रकम को इस प्रकार बांटा जाता है और तदनुसार वह आय - कर से प्रभार्य होगी ।
स्पष्टीकरण इस खंड के प्रयोजनों के लिए-
1992 का 15
1956 का 42
(i )" मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम " का वही अर्थ होगा जो भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 और प्रतिभूति संविदा ( विनियमन ) अधिनियम , 1956 के अधीन बनाए गए प्रतिभूति संविदा ( विनियमन ) , ( स्यक एक्सचेंज और समाशोधन निगम ) विनियम, 2012 के विनियम 2 के उप विनियम ( 1 ) के खंड ( ण ) में उसका है;
1992 का 15
1956 का 42
(ii) "विनियमों" से भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 और प्रतिभूति संविदा ( विनियमन ) अधिनियम, 1956 के अधीन बनाए गए प्रतिभूति संविदा (विनियमन ) ( स्टाक एक्सचेंज और समाशोधन निगम ) विनियम, 2012 अभिप्रेत है;
(iii) " विनिर्दिष्ट आय " से अभिप्रेत है ---
है; (क ) विनिर्दिष्ट व्यक्तियों से अभिदाय के रूप में प्राप्त आय अभिप्रेत
(ख) मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम द्वारा अधिरोपित और आंतरक समझौता प्रत्याभूति निधि में जमा की गई शास्तियों के रूप में आय ,
(ग) निधि द्वारा किए गए विनिधान से आय;
(iv) " विनिर्दिष्ट व्यक्ति" से अभिप्रेत है-
(क) कोई ऐसा मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम, जो आंतरक समझौता प्रत्याभूति निधि को स्थापित और बनाए रखता है; और भारत का राजपत्र असाधारण
91 अनुभाग 1 क]
(ख) कोई ऐसा मान्यताप्राप्त स्यक एक्सचेंज जो , ऐसे मान्यताप्राप्त समाशोधन निगम में शेयरधारक है या आंतरक समझौता प्रत्याभूति निधि में अभिदाता है; और
(ग) आंतरक समझौता प्रत्याभूति निधि में अभिदाय करने वाला कोई समाशोधक सदस्य;
(ख ) खंड ( 23 चख ) के स्पष्टीकरण के पूर्व , निम्नलिखित परन्तुक अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" परंतु इस खंड में अंतर्विष्ट कोई बात, किसी जोखिम पूंजी कंपनी या जोखिम पूंजी निधिकी जो धारा 115पख के स्पष्टीकरण 1 के खंड (क ) में विनिर्दिष्ट एक विनिधान निधि है, 1 अप्रैल, 2016 को या उसके पश्चात् आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष कीकिसी आय के संबंध में लागू नहीं होगी;";
(ग) खंड ( 23चख ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किए जाएंगे , अर्थात्ः-
'(23चखक) " कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ " शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय से भिन्न किसी विनिधान निधि की कोई आय;
(23चखख ) किसी विनिधान निधि के यूनिट धारक को प्रोद्भूत या उद्भूत या उसके द्वारा प्राप्त धारा 115पख में निर्दिष्ट कोई आय , जो उस आय का वह अनुपात है, जो उसी प्रकृति का है जैसी कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय है;' ।
स्पष्टीकरण खंड ( 23चखक ) और खंड ( 23चखख ) के प्रयोजनों के लिए" विनिधान निधि" पद का वही अर्थ होगा जो धारा 115पख के स्पष्टीकरण 1 के खंड ( क ) में उसका है";
( घ) खंड ( 23 चग ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
(23चगक ) किसी ऐसे कारबार न्यास की जो भू- संपदा विनिधान न्यास है, ऐसे कारबार न्यास के प्रत्यक्षतया स्वामित्वाधीन किसी भू- संपदा आस्ति को किराए या पट्टे या भाटक पर देने से हुई कोई आय ।
1992का 15
स्पष्टीकरण इस खंड के प्रयोजनों के लिए, " भू- संपदा आस्ति " पद का वहीं अर्थ होगा, जो भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड अधिनियम 1992 के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( भू- संपदा विनिधान न्यास ) विनियम, 2014 के विनियम 2 के उपविनियम ( 1 ) के खंड ( यञ ) में उसका है;' ;
(ङ) खंड ( 23चघ ) में, " खंड ( 23 चग ) " शब्द, कोष्ठकों, अंकों और अक्षरों के पश्चात् " या खंड ( 23 चगक ) " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर अंतःस्थापित किए जाएंगे;
( च) खंड ( 38 ) में , दूसरे परंतुक का लोप किया जाएगा ।
8. आय- कर अधिनियम की धारा 11 में, 1 अप्रैल , 2016 से,-
धारा 11 का संशोधन ।
(I) उपधारा ( 1 ) के स्पष्टीकरण के खंड ( 2 ) के उपखंड ( ख ) के पश्चात्, दीर्घ पंक्ति में " ( ऐसे विकल्प का प्रयोग धारा 139 की उपधारा ( 1 ) के अधीन आय की विवरणी देने के लिए अनुदान समय [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
92
की समाप्ति के पूर्व लिखित रूप में किया जाएगा ) " कोष्ठकों, शब्दों और अंकों के स्थान पर " ( ऐसे विकल्पका प्रयोग धारा 139 की उपधारा ( 1 ) के अधीन आय की विवरणी देने के लिए अनुज्ञात समय की समाप्ति के पूर्व ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से जो विहित की जाए , किया जाएगा ) कोष्ठक , शब्द और अंक रखे जाएंगे; "
(II ) उपधारा ( 2 ) में , खंड ( क ) और खंड ( ख ) तथा पहले और दूसरे परंतुक के स्थान पर, निम्नलिखित रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" (क ) ऐसा व्यक्ति निर्धारण अधिकारी को विहित प्ररूप में और विहित रीति से एक विवरण उस प्रयोजन का कथन करते हुए जिसके लिए आय संचित की जा रही है या अलग रखी जा रही है और वह कालावधि, जिसके लिए आय संचित की जानी है या अलग रखी जानी है, जो किसी भी दशा में पांच वर्ष से अधिक की नहीं होगी , दे दे;
(ख) इस प्रकार संचित किया गया या अलग रखा गया धन उपधारा ( 5 ) में विनिर्दिष्ट स्वरूप या पद्धतियों में विनिहित या निक्षिप्त कर दिया जाए;
(ग ) खंड ( क ) में निर्दिष्ट विवरण पूर्ववर्ष की आय की विवरणी देने के लिए धारा 139 की उपधारा ( 1 ) के अधीन विनिर्दिष्ट देय तारीख को या उससे पहले दे दिया जाए:
परंतु खंड ( क ) में निर्दिष्ट पांच वर्ष की कालावधि की संगणना करने में, वह कालावधि जिसके दौरान आय उस प्रयोजन के लिए, जिसके लिए आय इस प्रकार संचित की गई है या अलग रखी गई है किसी न्यायालय के आदेश या व्यादेश के कारण उपयोजित नहीं की जा सकी है, अपवर्जितकर दी जाएगी। " ।
धारा 13 का
संशोधन।
9. आय- कर अधिनियम की धारा 13 की उपधारा ( 8 ) के पश्चात् और स्पष्टीकरण 1 के पूर्व निम्नलिखित उपधारा 1 अप्रैल , 2016 से अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 9 ) धारा 11 की उपधारा ( 2 ) में अंतर्विष्ट किसी बात का इस प्रकार का प्रभाव नहीं होगा जिससे कोई आय उस व्यक्ति की पूर्ववर्ष की कुल आय में से, जो उसने प्राप्त की है, अपवर्जित हो जाए, यदि,-
(i) ऐसी आय की बाबत उक्त उपधारा के खंड ( क ) में निर्दिष्ट विवरण , पूर्ववर्ष की आय की विवरणी देने के लिए धारा 139 की उपधारा ( 1 ) के अधीन विनिर्दिष्ट देय तारीख को या उसके पूर्व नहीं दे दिया जाता है;
( ii) ऐसे व्यक्ति द्वारा पूर्ववर्ष की आय की विवरणी, उक्त पूर्ववर्ष की आय की विवरणी देने के लिए धारा 139 की उपधारा ( 1 ) के अधीन विनिर्दिष्ट देय तारीख को या उसके पूर्व नहीं दे दी जातीहै ।" ।
10. आय- कर अधिनियम की धारा 32 की उपधारा ( 1 ) में, 1 अप्रैल , 2016 से,-
धारा 32का
संशोधन ।
(क) खंड ( ii) में,-
(अ ) दूसरे परंतुक में, " खंड (i) या खंड ( ii ) या खड (iiक) " शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षर के पश्चात्" या खंड (iiक) के पहले परंतुक " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर अंतःस्थापित किएजाएंगे;
(आ) दूसरे परंतुक के पश्चात्, निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" परंतु यह भी कि जहां, यथास्थिति, खंड ( iiक) या खंड ( iiक) के पहले परंतुक में निर्दिष्ट कोई आस्ति, निर्धारिती द्वारा पूर्ववर्ष के दौरान अर्जित की जाती है और उस पूर्ववर्ष भारत का राजपत्र असाधारण
93 अनुभाग 1क]
में एक सौ अस्सी दिन से कम की अवधि के लिए कारबार के प्रयोजनों के लिए प्रयोग में लाई जाती है और ऐसी आस्ति की बाबत इस उपधारा के अधीन कटौती उस पूर्ववर्ष के लिए खंड ( iiक) के अधीन किसी आस्ति के लिए विहित प्रतिशतता के आधार पर परिकलित रकम के पचास प्रतिशत तक निर्बंधित की जाती है वहां, खंड (ii क) के अधीन ऐसी आस्ति के लिए विहित प्रतिशतता के आधार पर परिकलित रकम के शेष पचास प्रतिशत की इस उपधारा के अधीन कटौती ऐसी आस्ति की बाबत ठीक उत्तरवर्ती पूर्ववर्ष में अनुज्ञात की जाएगी;";
(ख) खंड ( iiक) में,
जाएंगे; (अ) परंतुक में, " परंतु " शब्द के स्थान पर, " परंतु यह और कि " शब्द रखे
(आ) परंतुक के पूर्व, निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" परंतु जहां निर्धारिती किसी वस्तु या चीज के विनिर्माण या उत्पादन के लिएकोई उपक्रम या उद्यम, आन्ध्र प्रदेश राज्य में या बिहार राज्य में या तेलंगाना राज्य में या पश्चिमी बंगाल राज्य में, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किसी पिछड़े क्षेत्र में, 1 अप्रैल , 2015 को या उसके पश्चात् प्रतिष्ठापित करता है और उक्त पिछड़े क्षेत्र में, उक्त उपक्रम या उद्यम के प्रयोजनों के लिए 1 अप्रैल , 2015 को आरंभ होने वाली और 1 अप्रैल, 2020 के पूर्व समाप्त होने वाली अवधि के दौरान कोई नई मशीनरी या संयंत्र ( पोत और वायुयान से भिन्न) अर्जित और संस्थापित करता है , वहां खंड ( iiक) के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे , मानो " बीस प्रतिशत " शब्दों के स्थान पर " पैंतीस प्रतिशत " शब्द रख दिए गए हैं । " ।
नई धारा 32 कघ का अंतःस्थापन ।
11. आय- कर अधिनियम की धारा 32 कग के पश्चात् निम्नलिखित धारा 1 अप्रैल , 2016 से अंतःस्थापित कीजाएगी , अर्थात्ः-
कतिपय राज्यों में अधिसूचित पिछड़े क्षेत्रों में नए संयंत्र या मशीनरी में विनिधान ।
'32कघ . ( 1 ) जहां कोई निर्धारिती किसी वस्तु या चीज के विनिर्माण या उत्पादन के लिए कोई उपक्रम या उद्यम, आंध्र प्रदेश राज्य में या बिहार राज्य में या तेलंगाना राज्य में या पश्चिमी बंगाल राज्य में, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किसी पिछड़े क्षेत्र में , 1 अप्रैल, 2015 को या उसके पश्चात् प्रतिष्ठापित करता है और उक्त पिछड़े क्षेत्र में , उक्त उपक्रम या उद्यम के प्रयोजनों के लिए 1 अप्रैल , 2015 को आरंभ होने वाली और 1 अप्रैल, 2020 के पूर्व समाप्त होने वाली अवधि के दौरान कोई नई आस्तिको अर्जित करता है और प्रतिष्ठापित करता है, वहां उस पूर्ववर्ष से, जिसमें नई आस्ति प्रतिष्ठापित की जाती है, सुसंगत निर्धारण वर्ष के लिए ऐसी नई आस्ति की वास्तविक लागत के पन्द्रह प्रतिशत के बराबर राशि की कटौती अनुज्ञात की जाएगी ।
( 2 ) यदि निर्धारिती द्वारा अर्जित और प्रतिष्ठापित किसी नई आस्ति का, उसके प्रतिष्ठापित किए जाने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के भीतर, धारा 47 के खंड (xiii ) या खंड (xiiiख) या खंड (xiv) में निर्दिष्ट कारबार के समामेलन या निर्विलियन या पुनर्गठन के संबंध में के सिवाय, विक्रय किया जाता है या अन्यथा उसे अंतरित किया जाता है , तो ऐसी नई आस्ति के संबंध में उपधारा ( 1 ) के अधीन अनुज्ञात कटौती की रकम को, उस पूर्ववर्ष की जिसमें ऐसी नई आस्ति का विक्रय किया जाता है या उसे अन्यथा अंतरित किया जाता है , ऐसी नई आस्ति के अंतरण के मद्दे, उद्भूत अभिलाभों की कराधेयता के अतिरिक्त, " कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ " शीर्ष के अधीन निर्धारिती की प्रभार्य आय समझा जाएगा ।
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 94
(3 ) जहां नई आस्ति का, उसके प्रतिष्ठापित किए जाने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के भीतर, धारा 47 के खंड (xiii) या खंड (xiiiख) या खंड (xiv) में निर्दिष्ट कारबार के समामेलन या निर्विलियन या पुनर्गठन के संबंध में विक्रय किया जाता है या उसे अन्यथा अंतरित किया जाता है , वहां उपधारा ( 2 ) के उपबंध, यथास्थिति, धारा 47 के खंड (xiii) या खंड (xiiiख) या खंड ( xiv ) में निर्दिष्ट समामेलित कंपनी या परिणामी कंपनी या उत्तराधिकारी को इस प्रकार लागू होंगे जैसे वे धारा 47 के खंड (xiii) या खंड (xiiiख) या खंड ( xiv) में निर्दिष्ट समामेलक कंपनी या निर्विलयित कंपनी या पूर्वाधिकारी को लागूहोते हैं ।
(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए " नई आस्ति" से कोई नया संयंत्र या मशीनरी ( पोत या वायुयान सेभिन्न) अभिप्रेत है, किन्तु इसमें निम्नलिखित सम्मिलित नहीं हैं-
(क) ऐसा कोई संयंत्र या मशीनरी, जिसका निर्धारिती द्वारा उसके संस्थापित किए जाने के पूर्व उपयोग किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भारत के भीतर या बाहर किया गया था;
(ख) किसी कार्यालय परिसर या किसी निवास स्थान में, जिसके अंतर्गत अतिथि गृह की प्रकृति की वास- सुविधा भी है, संस्थापित कोई संयंत्र या मशीनरी;
(ग) कोई कार्यालय साधित्र, जिनके अंतर्गत कम्प्यूटर या कम्प्यूटर साफ्टवेयर भी हैं;
(घ) कोई यान; या
(ङ) कोई संयंत्र या मशीनरी , जिसकी संपूर्ण वास्तविक लागत को किसी पूर्ववर्ष की " कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ " शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय की संगणना करने में कटौती के रूप में ( चाहे अवक्षयण के रूप में या अन्यथा ) अनुज्ञात किया जाता है । ' ।
12. आय -कर अधिनियम की धारा 35 में , 1 अप्रैल , 2016 से,-
धारा 35 का संशोधन ।
(i ) उपधारा ( 2 कक ) के परंतुक में, " ऐसे प्ररूप में जो विहित किया जाए " शब्दों के पश्चात्, " प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा ( 2कख ) में,-
(क) खंड ( 3 ) में तथा उस सुविधा के लिए रखे गए लेखाओं की संपरीक्षा के लिए विहित प्राधिकारी के साथ करार नहीं करती है " शब्दों के स्थान पर " विहित प्राधिकारी के साथ करार नहीं करती है और लेखाओं के बनाए रखे जाने और उनकी संपरीक्षा किए जाने तथा रिपोर्टों को ऐसी रीति में, जो विहित की जाए प्रस्तुत करने संबंधी ऐसी शर्तों को पूरा नहीं करती है " शब्द रखे जाएंगे ;
(ख ) खंड ( 4 ) में " जो विहित किया जाए " शब्दों के पश्चात्, " प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
13. आय -कर अधिनियम की धारा 36 की उपधारा ( 1 ) में , 1 अप्रैल , 2016 से,--
धारा 36का संशोधन ।
(क) खंड ( iii ) के परंतुक में, " विद्यमान कारबार या वृत्ति के विस्तारण के संबंध में " शब्दों का लोप किया जाएगाः
(ख) खंड (vii) के परंतुक के पश्चात् निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" परंतु यह और कि जहां ऐसे ऋण या उसके भाग की रकम को निर्धारिती की उस पूर्ववर्ष की, जिसमें ऐसे ऋण या उसके भाग की रकम अवसूलीय बन जाती है, या किसी पूर्ववर्ती पूर्ववर्ष की आय की संगणना करने में धारा 145 की उपधारा ( 2 ) के अधीन अधिसूचित आय संगणना और प्रकटन मानकों के आधार पर, उसे लेखाओं में लेखबद्ध किए बिना, हिसाब में लिया गया है, वहां ऐसे ऋण या उसके भाग को उस पूर्ववर्ष में , जिसमें ऐसा ऋण या उसका भाग अवसूलीय भारत का राजपत्र असाधारण
95 अनुभाग 1क]
बन जाता है, अनुज्ञात किया जाएगा और यह समझा जाएगा कि ऐसे ऋण या उसके भाग को इस खंड के प्रयोजनों के लिए लेखाओं में अवसूलीय रूप में अपलिखित कर दिया गया है । " ;
( ग) खंड (xvi ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
"(xvii) चीनी के विनिर्माण के कारबार में लगी किसी सहकारी सोसाइटी द्वारा गन्ने का उस कीमत पर, जो सरकार द्वारा नियत या अनुमोदित कीमत के बराबर या उससे कम है, क्रय करने के लिए उपगत व्यय की रकम। " ।
14. आय- कर अधिनियम की धारा 47 में, 1 अप्रैल, 2016 से ,-
धारा 47 का संशोधन ।
(क ) खंड (viकक) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
"(viकख) समामेलन की किसी स्कीम में , किसी ऐसी पूंजी आस्ति का, जो धारा 9 की उपधारा ( 1 ) के खंड (i ) के स्पष्टीकरण 5 में निर्दिष्ट किसी ऐसी विदेशी कंपनी का शेयर है, जो अपना मूल्य प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः सारवान् रूप से समामेलक विदेशी कंपनी द्वारा धारित किसी भारतीय कंपनी के शेयर या शेयरों से व्युत्पन्न करती है, समामेलित विदेशी कंपनी को कोई अंतरण, यदि
(अ) समामेलक विदेशी कंपनी के कम से कम पच्चीस प्रतिशत शेयर- धारक समामेलित विदेशी कंपनी के शेयर धारक बने रहते हैं ; और
( आ) ऐसे अंतरण से उस देश में , जिसमें समामेलक कंपनी निगमित है, पूंजी अभिलाभों पर कर नहीं लगता है; " ;
( ख ) खंड (vi गख) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
"(viगग) किसी निर्विलयन में ऐसी पूंजी आस्ति का, जो धारा 9 की उपधारा ( 1 ) के खंड (i) के स्पष्टीकरण 5 में निर्दिष्ट किसी ऐसी विदेशी कंपनी का शेयर है, जो अपना मूल्य प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः सारवान् रूप से निर्विलीन विदेशी कंपनी द्वारा धारित किसी भारतीय कंपनी के शेयर या शेयरों से व्युत्पन्न करती है परिणामी विदेशी कंपनी को कोई अंतरण , यदि
(क) निर्विलीन विदेशी कंपनी के तीन - चौथाई से अन्यून मूल्य के शेयर धारण करने वाले शेयर धारक परिणामी विदेशी कंपनी के शेयर धारक बने रहते हैं; और
( ख ) ऐसे अंतरण से उस देश में , जिसमें निर्विलीन विदेशी कंपनी निगमित है , पूंजी अभिलाभों पर कर नहीं लगता है:
1956 का 1
परंतु कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 391 से धारा 394 के उपबंध इस खंड में निर्दिष्ट निर्विलयनों की दशा में लागू नहीं होंगे ;";
(ग) खंड (xvii) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" (xviii) किसी यूनिट धारक द्वारा किसी पारस्परिक निधि की समेकन स्कीम में उसके द्वारा धारित किसी पूंजी आस्ति का, जो कोई यूनिट है या यूनिटें हैं, ऐसा कोई अंतरण , जो उसको किसी आस्तिके, जो कोई यूनिट है या यूनिटें हैं आबंटन के प्रतिफलस्वरूप पारस्परिक निधि की समेकित स्कीम में किया गया हो:
परंतु समेकन साधारण शेयरोन्मुख निधि की दो या अधिक स्कीमों या साधारण शेयरोन्मुख निधिसे भिन्न निधि की दो या अधिक स्कीमों का है ।
भारत का राजपत्र असाधारण
96
[भाग 2-
स्पष्टीकरण इस खंड के प्रयोजनों के लिए,-
(क) " समेकित स्कीम " से ऐसी स्कीम अभिप्रेत है जिसके साथ समेकन स्कीम का विलय होता है या जो ऐसे विलयन के परिणामस्वरूप बनाई जाती है;
(ख) " समेकन स्कीम " से किसी पारस्परिक निधि की ऐसी स्कीम अभिप्रेत है, जिसका भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधीन बनाए गए 1992 का 15 भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( पारस्परिक निधि ) विनियम, 1996 के अनुसार पारस्परिक निधि की स्कीमों के समेकन की प्रक्रिया के अधीन विलय होता है;
(ग) " साधारण शेयरोन्मुख निधि " का वही अर्थ होगा जो धारा 10 के खंड ( 38 ) मेंउसका है;
(घ) " पारस्परिक निधि " से धारा 10 के खंड ( 23 घ ) के अधीन विनिर्दिष्ट पारस्परिक निधिअभिप्रेत है ।" ।
15. आय - कर अधिनियम की धारा 49 , में, 1 अप्रैल , 2016 से-
धारा 49 का संशोधन ।
(I) उपधारा ( 1 ) के खंड ( iii ) के उपखंड ( ङ) में, " या खंड (viकक) या खंड (vi गक) या खंड (vi गख) " शब्दों, कोष्ठकों , अंकों और अक्षरों के स्थान पर " या खंड (viकक) या खंड ( viकख) या खंड (vi ख) या खंड (vi गक) या खंड (vi गख) या खंड (vi गग) " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर रखे जाएंगे ।
'(II) उपधारा ( 2 कख ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
' (2कखख ) जहां पूंजी आस्ति का , जो किसी कंपनी का शेयर है या के शेयर हैं, किसी अनिवासी निर्धारिती द्वारा धारित धारा 115 कग की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ख ) में निर्दिष्ट सार्वत्रिक निक्षेपागार रसीदों के मोचन पर , ऐसे निर्धारिती द्वारा अर्जन किया जाता है , वहां शेयर या शेयरों के अर्जन की लागत उस शेयर या उन शेयरों की वह कीमत होगी जो किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में उस तारीख को , जिसको ऐसे मोचन का अनुरोध किया गया था, प्रचलित है ।
स्पष्टीकरण इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, " मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज " का वही अर्थ होगा जो धारा 43 की उपधारा ( 5 ) के स्पष्टीकरण 1 के खंड ( ii) में उसका है । " ; ' ।
(III) उपधारा ( 2 कग ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" ( 2कघ ) जहां पूंजी आस्ति, जो पारस्परिक निधि की समेकित स्कीम में की कोई यूनिट या यूनिटें हैं, धारा 47 के खंड ( xviii) में निर्दिष्ट अंतरण के प्रतिफलस्वरूप निर्धारिती की संपत्ति हो गई है, वहां आस्ति के अर्जन की लागत को , पारस्परिक निधि की समेकित स्कीम में की यूनिट या यूनिटों के उसे अर्जित होने की लागत समझा जाएगा । " ।
16. आय- कर अधिनियम की धारा 80 ग में,-
धारा 80 ग का संशोधन ।
(I ) उपधारा ( 2 ) के खंड (viii) में, " अभिदान के रूप में " शब्दों के स्थान पर " उपधारा ( 4 ) में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति के नाम में अभिदान के रूप में " शब्द रखे जाएंगे;
(II) उपधारा (4 ) के खंड ( ख ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा,
अर्थात्ः- भारत का राजपत्र असाधारण
97 अनुभाग 1क]
" (खक ) उस उपधारा के खंड (viii) के प्रयोजनों के लिए किसी व्यष्टि की दशा में व्यष्टि या यदिस्कीम में ऐसा विनिर्दिष्ट हो, ऐसे व्यष्टि की कोई बालिका या ऐसी कोई बालिका, जिसके लिए ऐसा व्यक्तिविधिक संरक्षक है;" ।
धारा 80 गगग का संशोधन ।
17. आय-कर अधिनियम की धारा 80 गगग की उपधारा ( 1 ) में, " एक लाख रुपए " शब्दों के स्थान पर, " एक लाख पचास हजार रुपए" शब्द 1 अप्रैल , 2016 से रखे जाएंगे ।
18. आय- कर अधिनियम की धारा 80 गगघ में , 1 अप्रैल , 2016 से,-
धारा 80 गगघ का संशोधन ।
(क) उपधारा ( 1 क) का लोप किया जाएगा ;
(ख) इस प्रकार लोप की गई उपधारा ( 1 क ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की
जाएगी , अर्थात्ः--
" ( 1ख ) उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट किसी निर्धारिती को, चाहे उपधारा ( 1 ) के अधीन कोई कटौती अनुज्ञात की गई हो अथवा नहीं, पूर्ववर्ष में ऐसी किसी पेंशन स्कीम के अधीन, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित की गई हो या अधिसूचित की जाए, संदत्त या उसके खाते में जमा की गई संपूर्ण रकम की, जो पचास हजार रुपए से अधिक नहीं होगी , कटौती उसकी कुल आय की संगणना करने में अनुज्ञात की जाएगीः
परंतु इस उपधारा के अधीन कोई कटौती ऐसी रकम के संबंध में अनुज्ञात नहीं की जाएगी जिस पर उपधारा ( 1 ) के अधीन कटौती का दावा किया गया है और उसे अनुज्ञात किया गया है । " ;
(ग) उपधारा ( 3 ) में,
(I) " उपधारा ( 1 ) " शब्दों, कोष्ठक और अंक के स्थान पर, जहां - कहीं वे आते हैं, " उपधारा ( 1 ) या उपधारा ( 1 ख ) " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर रखे जाएंगे;
(II) " उस उपधारा " शब्दों के स्थान पर, " उन उपधाराओं " शब्द रखे जाएंगे ;
(घ ) उपधारा ( 4 ) में " उपधारा ( 1 ) " शब्दों, कोष्ठक और अंक के स्थान पर, " उपधारा
( 1) या उपधारा ( 1ख ) " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर रखे जाएंगे ।
19. आय-कर अधिनियम की धारा 80 घ में , 1 अप्रैल, 2016 से,-
धारा 80 घ का संशोधन ।
(अ) " पंद्रह हजार रुपए ", शब्दों के स्थान पर, जहां - कहीं वे आते हैं " पच्चीस हजार रुपए" शब्द रखे जाएंगे;
(आ) " बीस हजार रुपए " शब्दों के स्थान पर, जहां - कहीं वे आते हैं, " तीस हजार रुपए" शब्द रखे जाएंगे;
(इ ) उपधारा ( 2 ) के खंड ( ख ) के पश्चात्, निम्नलिखित अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" (ग ) निर्धारिती या उसके कुटुंब के किसी सदस्य के स्वास्थ्य पर उपगत चिकित्सा व्यय के मद्दे संदत्त संपूर्ण रकम, जो कुल मिलाकर तीस हजार रुपए से अधिक नहीं हो; और
( घ ) निर्धारिती के माता - पिता में से किसी के स्वास्थ्य पर उपगत चिकित्सा व्यय के मद्दे संदत्त संपूर्ण रकम, जो कुल मिलाकर तीस हजार रुपए से अधिक नहीं होः भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 98
परंतु खंड ( ग ) या खंड ( घ ) में निर्दिष्ट रकम किसी अति वरिष्ठ नागरिक के संबंध में संदत्त की गई हो और उस व्यक्ति के स्वास्थ्य का बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए कोई रकम संदत्त न की गई हो:
परंतु यह और कि खंड ( क ) और खंड ( ग ) के अधीन विनिर्दिष्ट राशि का योग या खंड (ख ) और खंड ( घ ) के अधीन विनिर्दिष्ट राशि का योग तीस हजार रुपए से अधिक नहीं होगा । " ;
(ई ) उपधारा ( 3 ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 3 ) जहां निर्धारिती हिन्दूअविभक्त कुटुंब है, वहां उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट राशि निम्नलिखित का योग होगी , अर्थात्ः-
(क) उस हिन्दूअविभक्त कुटुंब के किसी सदस्य के स्वास्थ्यका बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए संदत्त संपूर्ण रकम, जो कुल मिलाकर पच्चीस हजार रुपए से अधिक
नहींहो; और
(ख) हिन्दूअविभक्त कुटुंब के किसी सदस्य के स्वास्थ्य पर उपगत चिकित्सा व्यय के मद्दे संदत्त संपूर्ण रकम, जो कुल मिलाकर तीस हजार रुपए से अधिक नहीं होः
परंतु खंड ( ख ) में निर्दिष्ट रकम किसी अति वरिष्ठ नागरिक के संबंध में संदत्त की गई हो और उस व्यक्ति के स्वास्थ्यका बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने पर कोई रकम संदत्त नकी गईहोः
परंतु यह और कि खंड ( क) और खंड ( ख ) के अधीन विनिर्दिष्ट राशि का योग तीस हजार रुपए से अधिक नहीं होगा । " ;
(उ) उपधारा (4 ) में,-
(i) " या उपधारा ( 3 ) " शब्दों, कोष्ठकों और अंक के स्थान पर, " या उपधारा ( 3 ) के खंड (क) " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर रखे जाएंगे;
(ii) " वरिष्ठ नागरिक " शब्दों के पश्चात्, " या अति वरिष्ठ नागरिक " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ;
(iii) स्पष्टीकरण का लोप किया जाएगा;
(ऊ) उपधारा ( 5 ) के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
'स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(i) " वरिष्ठ नागरिक " से भारत में निवासी कोई ऐसा व्यष्टि अभिप्रेत है जो सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय साठ वर्ष या उससे अधिक की आयु का है;
(ii) " अति वरिष्ठ नागरिक " से भारत में निवासी कोई ऐसा व्यष्टि अभिप्रेत है जो सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय अस्सी वर्ष या उससे अधिक की आयु का है । ' ।
धारा 80 घघ का संशोधन ।
20. आय-कर अधिनियम की धारा 80 घघ की उपधारा ( 1 ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा , 1 अप्रैल, 2016 से रखी जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 1 ) जहां किसी निर्धारिती ने , जो व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुंब है और भारत में निवासी है, पूर्ववर्ष के दौरान,-
(क) कोई व्यय किसी आश्रित के, जो निःशक्त व्यक्ति है, चिकित्सीय उपचार ( जिसके अंतर्गत परिचर्या भी है ) , प्रशिक्षण और पुनर्वास के लिए किया है; या भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1 क]
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(ख) जीवन बीमा निगम या किसी अन्य बीमाकर्ता या प्रशासक या विनिर्दिष्ट कंपत्ती द्वारा उपधारा ( 2 ) में विनिर्दिष्ट शर्तों के अधीन रहते हुए किसी आश्रित के, जो निःशक्त व्यक्ति है, भरण- पोषण के लिए इस निमित्त बनाई गई और बोर्ड द्वारा इस निमित्त अनुमोदित किसी स्कीम के अधीन कोई रकम संदत्त या जमा की है ,
वहां निर्धारिती को इस धारा के उपबंधों के अनुसार और उनके अधीन रहते हुए, पूर्ववर्ष की बाबत उसकी सकल कुल आय से पचहत्तर हजार रुपए की राशि की कटौती अनुज्ञात की जाएगी:
परंतु जहां ऐसा आश्रित गंभीर निःशक्तता से ग्रस्त व्यक्ति है, वहां इस उपधारा के उपबंधों का प्रभाव इस प्रकार होगा मानो " पचहत्तर हजार रुपए " शब्दों के स्थान पर " एक लाख पच्चीस हजार रुपए " शब्द रखे गए हैं ।" ।
21. आय- कर अधिनियम की धारा 80 घघख में, 1 अप्रैल , 2016 से,-
धारा 80 घघख का संशोधन ।
(i) पहले परंतुक के स्थान पर, निम्नलिखित परंतुक रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" परंतु ऐसी कोई कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक निर्धारिती, किसी तंत्रिका विज्ञानी , किसी अर्बुद्ध विज्ञानी , किसी मूत्र रोग विज्ञानी , किसी रुधिर विज्ञानी, किसी प्रतिरक्षा विज्ञानी या ऐसे अन्य विशेषज्ञ से , जो विहित किया जाए, ऐसे चिकित्सा उपचार की चिकित्सा पर्ची अभिप्राप्त नहीं करता है;
(ii) तीसरे परंतुक के पश्चात्, निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
' परंतु यह भी कि जहां वस्तुतः संदत्त की गई रकम, निर्धारिती या उसके आश्रित या निर्धारिती के हिन्दूअविभक्तकुटुंब के किसी सदस्य के संबंध में है और जो अति वरिष्ठ नागरिक है, वहां इस धारा के उपबंध ऐसे प्रभावी होंगे मानो " चालीस हजार रुपए " शब्दों के स्थान पर " अस्सी हजार रुपए " शब्द रखे गए हैं;' ;
(iii) स्पष्टीकरण में,-
(i) खंड ( ii) का लोप किया जाएगा;
(ii) खंड ( iv) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः
'(v)" अति वरिष्ठ नागरिक " से भारत में निवासी कोई ऐसा व्यष्टि अभिप्रेत है, जो सुसंगत पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय अस्सी वर्ष या उससे अधिक की आयु का है। ' ।
22. आय- कर अधिनियम की धारा 80छ में,-
धारा 80छ का संशोधन ।
(अ) उपधारा ( 1 ) के खंड (i ) में,-
(I))" उपखंड (iiiजञ) या" शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षरों के पश्चात् " उपखंड ( iiiजट) या उपखंड (iiiजठ) या " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर अंतःस्थापित किए जाएंगे;
( II) इस प्रकार यथा अंतःस्थापित " उपखंड (iiiजठ) या" शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षरों के पश्चात्' उपखंड ( iiiजड) या " शब्द, कोष्ठक , अंक और अक्षर 1 अप्रैल , 2016 से अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(आ) उपधारा ( 2 ) के खंड ( क ) में, -
( I) उपखंड ( iiiजञ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्ः-
2013का 18
" (iiiजट) केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित स्वच्छ भारत कोष, ऐसी राशि से भिन्न, जो निर्धारिती द्वारा कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 की उपधारा ( 5 ) के अधीन कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अनुसरण में खर्च की गई है ; या [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
100
(iiiजठ) केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित स्वच्छ गंगा निधि, जहां ऐसा निर्धारिती निवासी है और ऐसी राशि निर्धारिती द्वारा कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 की उपधारा ( 5 ) के अधीन कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अनुसरण में खर्च की गई राशि से भिन्न है;"; या
1985 का 61 (II ) निम्नलिखित उपखंड 1 अप्रैल , 2016 से अंत:स्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः- " ( iiiजड) स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम , 1985 की धारा 7क केअधीन गठित राष्ट्रीय ओषधि दुरुपयोग नियंत्रण निधि; या" ।
23. आय- कर अधिनियम की धारा 80ञञकक में, 1 अप्रैल , 2016 से,-
धारा 80ञञकक का संशोधन ।
(क) उपधारा ( 1 ) में, " जो भारतीय कंपनी है " शब्दों का लोप किया जाएगा;
(ख ) उपधारा ( 2 ) के खंड ( क) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" (क ) यदि कारखाना निर्धारिती द्वारा , किसी अन्य व्यक्ति से अंतरण के रूप में या किसी कारबार पुनर्गठन के परिणामस्वरूप अर्जित किया जाता है; " ;
(ख ) स्पष्टीकरण के खंड (i) में, " एक सौ कर्मकारों " शब्दों के स्थान पर, " पचास कर्मकारों " शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 80 प का संशोधन ।
24. आय- कर अधिनियम की धारा 80 प की उपधारा ( 1 ) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा 1 अप्रैल , 2016 से, रखी जाएगी , अर्थात्ः-
' ( 1 ) किसी ऐसे व्यष्टि की, जो निवासी है और जिसे पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा निःशक्त व्यक्ति के रूप में प्रमाणित किया गया है, कुल आय की संगणना करने में पचहत्तर हजार रुपए की राशि की कटौती अनुज्ञात की जाएगीः
परंतु जहां ऐसा व्यष्टि गंभीर रूप से निःशक्त व्यक्ति है वहां इस उपधारा के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो " पचहत्तर हजार रुपए " शब्दों के स्थान पर " एक लाख पच्चीस हजार रुपए " शब्द रखे गए है।' ।
धारा 92खक का संशोधन।
25. आय- कर अधिनियम की धारा 92 खक के अंत में आने वाले " पांच करोड़ रुपए " शब्दों के स्थान पर " बीस करोड़ रुपए" शब्द 1 अप्रैल, 2016 से रखे जाएंगे ।
धारा 95का संशोधन ।
26. आय - कर अधिनियम की धारा 95 को उसकी उपधारा ( 1 ) के रूप में संख्यांकित किया जाएगा और इस प्रकार संख्यांकित उपधारा ( 1 ) के पश्चात् और स्पष्टीकरण के पूर्व, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 2 ) यह अध्याय, 1 अप्रैल , 2018 को या उसके पश्चात् आरंभ होने वाले किसी निर्धारण वर्ष की बाबत लागू होगा। " ।
धारा 111क का संशोधन ।
27. आय-कर अधिनियम की धारा 111 क की उपधारा ( 1 ) के दूसरे परंतुक का 1 अप्रैल, 2016 से लोप किया जाएगा ।
28. आय- कर अधिनियम की धारा 115क की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ख ) में , 1 अप्रैल , 2016 से,-
धारा 115क का संशोधन ।
जाएंगे; (क) उपखंड ( अ ) में , " पच्चीस प्रतिशत " शब्दों के स्थान पर , " दस प्रतिशत " शब्द रखे भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1 क]
101
(ख) उपखंड ( आ ) में , " पच्चीस प्रतिशत" शब्दों के स्थान पर, " दस प्रतिशत " शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 115कगक का संशोधन ।
29. आय- कर अधिनियम की धारा 115 कगक की उपधारा ( 3 ) के स्पष्टीकरण के खंड ( क ) के अंत में आने वाले, " अनिवासी विनिधानकर्ताओं को साधारण शेयरों के पुरोधरण या पुरोधरण कंपनी के विदेशी मुद्रा में संपरिवर्तनीय बंधपत्रों के मद्दे पुरोधृत किए गए हैं " शब्दों के स्थान पर , 1 अप्रैल, 2016 से, निम्नलिखित रखा जाएगा , अर्थात्ः
" विनिधानकर्ताओं को,-
( i ) पुरोधरण कंपनी के, जो भारत में किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनी है, साधारण शेयरों के; या
( ii ) पुरोधरण कंपनी के विदेशी मुद्रा में संपरिवर्तनीय बंधपत्रों के , पुरोधरण मद्दे पुरोधृत किए गए है; " ।
धारा 115ञख का संशोधन।
से,- 30. आय- कर अधिनियम की धारा 115ञख की उपधारा ( 2 ) के नीचे स्पष्टीकरण 1 में, 1 अप्रैल , 2016
( क ) खंड ( च ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किए जाएंगे , अर्थात्ः-
" (चक ) ऐसी आय से, जो व्यक्तियों के संगम या व्यष्टियों के निकाय की आय में निर्धारिती का ऐसा हिस्सा हो , जिस पर धास 86 के उपबंधों के अनुसार कोई आय- कर संदेय नहीं है, संबंधित व्यय की रकम या रकमें;
(चख ) किसी निर्धारिती को, जो कोई विदेशी कंपनी है,-
(अ ) प्रतिभूतियों में के संव्यवहारों पर उद्भूत पूंजी अभिलाभों से;
(आ) तकनीकी सेवाओं के लिए अध्याय 12 में विनिर्दिष्ट दर या दरों पर कर से प्रभार्य ब्याज स्वामिस्वया फीस से,
प्रोद्भूत या उद्भूत आय से संबंधित व्यय की रकम या रकमें,
यदि इस अधिनियम के, इस अध्याय के उपबंधों से भिन्न, उपबंधों के अनुसार उस पर संदेय आय- कर उपधारा ( 1 ) में विनिर्दिष्ट दर से कम दर पर है ; या
(चग ) ऐसी किसी पूंजी आस्ति के, जो विशेष प्रयोजन एकक का शेयर है, किसी कारबार न्यास को धारा 47 के खंड ( xvii ) में निर्दिष्ट उस न्यास द्वारा आबंटित यूनिटों के बदले, अंतरण पर काल्पनिक हानि को दर्शाने वाली रकम या उक्त यूनिटों की धारित रकम में किसी परिवर्तन के परिणामस्वरूप काल्पनिक हानि को दर्शाने वाली रकम या धारा 47 के खंड (xvii ) में निर्दिष्ट यूनिटों के अंतरण पर हानि की रकम; या " ;
(ख) खंड ( ञ ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
(ट) धारा 47 के खंड ( xvii ) में निर्दिष्ट यूनिटों के अंतरण पर यथास्थिति, उक्त खंड में निर्दिष्ट यूनिटों के साथ बदले गए शेयरों की लागत को या शेयरों की उनके बदले जाने के समय धारित रकम का, जहां कि ऐसे शेयर लागत से भिन्न ऐसे मूल्य पर लाभ या हानि खाते के माध्यम से धारित किए जाते हैं, हिसाब में लेते हुए संगणित अभिलाभ की रकम;";
( ग ) खंड ( iiख ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्ः-
" ( iiग ) आय की ऐसी रकम, जो व्यक्तियों के संगम या व्यष्टियों के निकाय की आय में निर्धारिती का हिस्सा है, जिस पर धारा 86 के उपबंधों के अनुसार कोई आय - कर संदेय नहीं है, यदि ऐसी कोई रकम लाभ- हानि लेखे में जमा की जाती है; या
( ii घ) किसी निर्धारिती को, जो कोई विदेशी कंपनी है,- [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
102
(अ ) प्रतिभूतियों में के संव्यवहारों पर उद्भूत पूंजी अभिलाभों से; या
(आ) तकनीकी सेवाओं के लिए अध्याय 12 में विनिर्दिष्ट दर या दरों पर कर से प्रभार्य ब्याज , स्वामिस्व या फीस से प्रोद्भूत या उद्भूत आय की रकम, यदि ऐसी आय को लाभ - हानि खाते में जमा किया जाता है और इस अधिनियम के, इस अध्याय के उपबंधों से भिन्न, उपबंधों के अनुसार उस पर संदेय आय- कर उपधारा ( 1 ) में विनिर्दिष्ट दर से कम दर पर है; या
(iiङ) ( अ ) किसी पूंजी आस्ति के, जो विशेष प्रयोजन एकक का शेयर है, किसी कारबार न्यास को , धारा 47 के खंड ( xvii ) में निर्दिष्ट उस न्यास द्वारा आबंटित यूनिटों के बदले अंतरण पर काल्पनिक अभिलाभ को; या
( आ ) उक्त यूनिटों की धारित रकम में किसी परिवर्तन के परिणामस्वरूप काल्पनिक अभिलाभ को; या
में निर्दिष्ट यूनिटों के अंतरण पर अभिलाभ को,
(इ ) धारा 47 के खंड ( xvii )
लाभ- हानि खाते में जमा किया गया हो; या
यदि कोई हो , दर्शाने वाली रकम, जिसे
( iiच) धारा 47 के खंड ( xvii ) में निर्दिष्ट यूनिटों के अंतरण पर, यथास्थिति उक्त खंड में निर्दिष्ट यूनिटों के साथ बदले गए शेयरों की लागत को या शेयरों की उनके बदले जाने के समय धारित रकम को , जहां कि ऐसे शेयर लागत से भिन्न मूल्य पर लाभ या हानि खाते के माध्यम से धारित किए जाते हैं, हिसाब में लेकर संगणित हानि की रकम; या ";
(घ) स्पष्टीकरण 3 के पश्चात् निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
1956का 42 ' स्पष्टीकरण 4-उपधारा ( 2 ) के प्रयोजनों के लिए, " प्रतिभूति " पद का वही अर्थ होगा जो प्रतिभूति संविदा ( विनियमन ) अधिनियम, 1956 की धारा 2 के खंड ( ज ) में उसका है। ' ।
धारा 115प का संशोधन ।
31. आय- कर अधिनियम की धारा 115 प की उपधारा ( 5 ) के पश्चात् स्पष्टीकरण । के पूर्व निम्नलिखित उपधारा , 1 अप्रैल , 2016 से अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" (6) इस अध्याय में अंतर्विष्ट कोई बात, 1 अप्रैल , 2016 को या उसके पश्चात् आरंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष की ऐसी किसी आय के संबंध में लागू नहीं होगी जो किसी जोखिम पूंजी कंपनी या जोखिम पूंजी निधि में , जो धारा 115पख के स्पष्टीकरण 1 के खंड ( क ) में विनिर्दिष्ट कोई विनिधान निधि है, किए गए विनिधानों से किसी व्यक्ति को प्रोद्भूत या उद्भूत हुई या उसके द्वारा प्राप्त हुई हो।" ।
धारा 115पक का संशोधन ।
32. आय- कर अधिनियम की धारा 115पक की उपधारा ( 3 ) में, " खंड ( 23 चग ) " शब्द, कोष्ठकों, अंकों और अक्षरों के पश्चात् " या खंड ( 23 चगक ) " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर 1 अप्रैल, 2016 से अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
अध्याय 12चख काअंतःस्थापन ।
33. आय- कर अधिनियम के अध्याय 12चक के पश्चात्, निम्नलिखित अध्याय, 1 अप्रैल, 2016 से अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
' अध्याय 12 चख
विनिधान निधियों की आय और ऐसी निधियों से प्राप्त आय पर कर से संबंधित विशेष उपबंध
विनिधान निधि और उसके यूनिट धारकोंकी आय ।
115पख. ( 1 ) इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी और इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे किसी व्यक्ति को, जो किसी विनिधान निधि का यूनिट धारक है, विनिधान निधि में किए गए विनिधानों से प्रोद्भूत या उद्भूत या उसके द्वारा प्राप्त कोई आय उसी अनुभाग 1 क]
भारत का राजपत्र असाधारण
103
रीतिसे आय- कर से प्रभार्य होगी मानो वह ऐसे व्यक्ति को प्रोद्भूत या उद्भूत या उसके द्वारा प्राप्त ऐसी आय होती यदि उसने विनिधान निधि से, ऐसे विनिधान सीधे किए होते ।
(2 ) जहां किसी पूर्ववर्ष में विनिधान निधि की कुल आय की संगणना करने का [ धारा 10 के खंड (23चखक ) के उपबंधों को प्रभावी किए बिना] शुद्ध परिणाम आय के किसी शीर्ष के अधीन हानि है और ऐसी हानि उक्त पूर्ववर्ष की आय का किसी अन्य शीर्ष के अधीन आय से पूर्णतया मुजरा नहीं किया जा सकता या पूर्णतया मुजरा नहीं किया जाता है वहां-
( i ) ऐसी हानि को अग्रनीत किए जाने को अनुज्ञात किया जाएगा और इसका अध्याय 6 के उपबंधों के अनुसार विनिधान निधि द्वारा मुजरा किया जाएगा; और
( ii ) ऐसी हानि की उपधारा ( 1 ) के प्रयोजनों के लिए अनदेखी की जाएगी ।
(3) विनिधान निधि द्वारा संदत्त या जमा की गई आय उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट व्यक्ति के पास उसी प्रकृति की और उसी अनुपात में आय समझी जाएगी मानो वह उपधारा ( 2 ) के उपबंधों के अधीन रहते हुए पूर्ववर्ष के दौरान विनिधान निधि द्वारा प्राप्त की गई हो या उसे प्रोद्भूत या उद्भूत हुई हो ।
(4) विनिधान निधि की कुल आय पर-
( i ) जहां ऐसी निधि कोई कंपनी या कोई फर्म है सुसंगत वर्ष के वित्त अधिनियम में यथा विनिर्दिष्ट दर या दरों पर; या
( ii) किसी अन्य मामले में , अधिकतम सीमांत दर पर,
कर प्रभारित किया जाएगा ।
(5) अध्याय 12घ या अध्याय 12ङ के उपबंध इस अध्याय के अधीन किसी विनिधान निधि द्वारा संदत्त आय को लागू नहीं होंगे ।
(6 ) विनिधान निधि को पूर्ववर्ष के दौरान प्रोद्भूत या उद्भूत या उसके द्वारा प्राप्त आय , यदि वह उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट व्यक्ति को संदत्त या उसके पास जमा नहीं की जाती है, उपधारा ( 2 ) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, पूर्ववर्ष के अंतिम दिन को उक्त व्यक्ति के खाते में उसी अनुपात में जमा की गई समझी जाएगी जिसमें ऐसा व्यक्ति आय प्राप्त करने का तब हकदार होता यदि उसका पूर्ववर्ष में संदाय किया गया होता।
( 7) किसी विनिधान निधि की ओर से आय को जमा करने या उसका संदाय करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति और विनिधान निधि, ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, उस व्यक्ति को, जो ऐसी आय के संबंध में कर के लिए दायी है और विहित आय - कर प्राधिकारी को विहित रूप में और ऐसी रीति में सत्यापित एक विवरण प्रस्तुत करेंगे जिसमें पूर्ववर्ष के दौरान संदत्त या जमा की गई आय की प्रकृति के ब्यौरे और ऐसे अन्य सुसंगत ब्यौरे, जो विहित किए जाएं, होंगे ।
स्पष्टीकरण 1- इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए,-
1992का 15
(क)" विनिधान निधि " से ऐसे किसी न्यास या कंपनी या सीमित दायित्व भागीदारी या निगमित निकाय के रूप में भारत में स्थापित या निगमित कोई ऐसी निधि अभिप्रेत है जिसे प्रवर्ग 1 या प्रवर्ग 2 आनुकल्पिक विनिधान निधि के रूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किया गया है और जिसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (आनुकल्पिक विनिधान निधि ) विनियम, 2012 के अधीन विनियमित किया जाता है;
1882 का 2
(ख) " न्यास " से भारतीय न्यास अधिनियम , 1882 या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन स्थापित कोई न्यास अभिप्रेत है;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
104
(ग) " यूनिट" सेविनिधान निधि या विनिधान निधि की किसी स्कीम में विनिधानकर्ता का फायदाप्रद हित अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत शेयर या भागीदारी हित भी आएंगे ।
स्पष्टीकरण 2- शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि ऐसी कोई आय , जो उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट व्यक्ति की पूर्ववर्ष में कुल आय में , उक्त पूर्ववर्ष में उसके प्रोद्भूत या उद्भूत होने केकारण सम्मिलित की गई है, उस व्यक्ति की उस पूर्ववर्ष में की कुल आय में सम्मिलित नहीं की जाएंगी जिसमें ऐसी आय का विनिधान निधि द्वारा उसे वस्तुतः संदाय किया गया है ।' ।
धारा 132ख का संशोधन।
34. आय-कर अधिनियम की धारा 132ख की उपधारा ( 1 ) के खंड ( i ) में अंत में आने वाले, " व्यतिक्रम करने वाला समझा जाता है " शब्दों के पश्चात्, " या धारा 245ग की उपधारा ( 1 ) के अधीन समझौता आयोग के समक्ष किए गए किसी आवेदन से उद्भूत दायित्व की रकम " शब्द, अंक , अक्षर और कोष्ठक, 1 जून, 2015 से अंत :स्थापित किए जाएंगे ।
धारा 139 का संशोधन ।
35. आय - कर अधिनियम की धारा, 139 में, 1 अप्रैल , 2016 से,- (1 ) उपधारा ( 1 ) में,-
(अ) चौथे परंतुक के स्थान पर, निम्नलिखित परंतुक रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" परंतु यह भी कि कोई ऐसा व्यक्ति, जो धारा 6 के खंड ( 6 ) के अर्थातर्गत भारत में मामूली तौर से अनिवासी से भिन्न निवासी है, जिससे इस उपधारा के अधीन विवरणी प्रस्तुत करना अपेक्षित नहीं है और जो पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय-
(क) भारत के बाहर अवस्थित कोई आस्ति ( जिसके अंतर्गत किसी इकाई मेंकोई वित्तीय हित भी है ) हिताधिकारी स्वामी के रूप में या अन्यथा धारण करता है या उसे भारत के बाहर अवस्थित किसी खाते में हस्ताक्षर करने का प्राधिकार प्राप्त है; या
(ख) भारत के बाहर अवस्थित किसी आस्ति का ( जिसके अंतर्गत किसी इकाई में कोई वित्तीय हित भी है) हिताधिकारी है,
पूर्ववर्ष की अपनी आय या हानि के संबंध में एक विवरणी , ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से सत्यापित तथा जिसमें ऐसी अन्य विशिष्टियां , जो विहित की जाएं, उपवर्णित हो, नियत तारीख को या उसके पूर्व प्रस्तुत करेगा:
परंतु यह भी कि चौथे परंतुक में अंतर्विष्ट कोई भी बात ऐसे किसी व्यष्टि को, जो भारत के बाहर अवस्थित किसी आस्ति में ( जिसके अंतर्गत किसी इकाई में कोई वित्तीय हित भी है ) हिताधिकारी है, उस दशा में लागू नहीं होगी जहां ऐसी आस्ति से उद्भूत आय , यदि कोई हो, उस परंतुक के खंड ( क ) में निर्दिष्ट व्यक्ति की आय में इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार सम्मिलित किए जाने योग्य हैः " ;
(आ) स्पष्टीकरण 3 के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:-
'स्पष्टीकरण 4-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, " हिताधिकारी स्वामी " से, किसी आस्तिके संबंध में, ऐसा कोई व्यष्टि अभिप्रेत है जिसने आस्ति के लिए प्रतिफल , प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः, स्वयं के या किसी अन्य व्यक्ति के अव्यवहित या भावी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, फायदे के लिए उपलब्ध कराया है ।
स्पष्टीकरण 5 इस धारा के प्रयोजनों के लिए, " हिताधिकारी " से, किसी आस्ति के संबंध में, ऐसा व्यष्टि अभिप्रेत है जो पूर्ववर्ष के दौरान आस्ति से फायदा प्राप्त करता है भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1 क]
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और ऐसी आस्तिके लिए प्रतिफल ऐसे हिताधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा उपलब्ध कराया गया है ।' ;
( II) उपधारा ( 4 ग) के खंड ( ङ) में,
(क) " न्यास या संस्था या " शब्दों के पश्चात्, " उपखंड ( iiiकख ) या " शब्द, कोष्ठक , अंक और अक्षर अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ख) " अन्य संस्था या " शब्दों के पश्चात्, " उपखंड ( iiiकग ) या " शब्द, कोष्ठक , अंक और अक्षर अंतःस्थापित किए जाएंगे ;
( III ) उपधारा ( 4ङ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
" (4च) धारा 115पख में निर्दिष्ट प्रत्येक विनिधान निधि, जिससे इस धारा के किसी अन्य उपबंध के अधीन आय या हानि की विवरणी देना अपेक्षित नहीं है, प्रत्येक पूर्ववर्ष में अपनी आय या हानि की बाबत विवरणी देगी और इस अधिनियम के सभी उपबंध, जहां तक हो सके, इस प्रकार लागू होंगे मानो यह उपधारा ( 1 ) के अधीन दिए जाने के लिए अपेक्षित विवरणी हो । " ;
( IV) उपधारा (6 ) में, " विहित प्रकृति, मूल्य की आस्तियों की, जो उसकी हों, " शब्दों के स्थान पर" उसके द्वारा हिताधिकारी स्वामी के रूप में या अन्यथा धारित विहित प्रकृति और मूल्य की आस्तियोंकी या उनकी, जिनमें वह कोई हिताधिकारी है " शब्द रखे जाएंगे ।
36. आय- कर अधिनियम की धारा 151 के स्थान पर, 1 जून , 2015 से निम्नलिखित धारा रखी जाएगी , अर्थात्ः-
धारा 151 के स्थान पर नई धारा का प्रतिस्थापन ।
सूचना जारी किए जाने के लिए मंजूरी ।
" 151. ( 1 ) किसी निर्धारण अधिकारी द्वारा धारा 148 के अधीन कोई सूचना सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से चार वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् तब तक जारी नहीं की जाएगी , जब तक कि प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त का, निर्धारण अधिकारी द्वारा लेखबद्ध किए गए कारणों के आधार पर यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसी सूचना जारी किए जाने के लिए यह एक उपयुक्तमामला है ।
(2) उपधारा ( 1 ) के अंतर्गत आने वाले किसी मामले से भिन्न मामले में, किसी ऐसे निर्धारण
अधिकारी द्वारा , जो संयुक्त आयुक्त की पंक्ति से नीचे का है, धारा 148 के अधीन कोई सूचना तब तक जारी नहीं की जाएगी जब तक कि संयुक्त आयुक्त का, ऐसे निर्धारण अधिकारी द्वारा लेखबद्ध किए गए कारणों के आधार पर यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसी सूचना जारी किए जाने के लिए यह एक उपयुक्तमामला है ।
(3) उपधारा ( 1 ) और उपधारा ( 2 ) के प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति, प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्तया प्रधान आयुक्त या आयुक्त या संयुक्त आयुक्त के लिए, धारा 148 के अधीन सूचना जारी किए जाने के लिए मामले की उपयुक्तता के बारे में निर्धारण अधिकारी द्वारा लेखबद्ध किए गए कारणों के आधार पर समाधान हो जाने पर स्वयं ऐसी सूचना जारी करना आवश्यक नहीं है । " ।
धारा 153 ग का संशोधन ।
37. आय - कर अधिनियम की धारा 153 ग की उपधारा ( 1 ) में, " धारा 139 , धारा 147 , धारा 148 , धारा 149, धारा 151 और धारा 153 में किसी बात के होते हुए भी, " शब्दों और अंकों से आरंभ होने वाले और " अधिकारिता रखने वाले निर्धारण अधिकारी को सौंप दिए जाएंगे " शब्दों पर समाप्त होने वाले भाग के स्थान पर, " धारा 139 , धारा 147, धारा 148 , धारा 149 , धारा 151 और धारा 153 में किसी बात के होते हुए भी, जहां निर्धारण अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि,-
(क ) अभिगृहीत या अध्यपेक्षित कोई धन, सोना- चांदी, आभूषण या अन्य बहुमूल्य वस्तु या चीज;
या [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
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सूचना, (ख) अभिगृहीत या अध्यपेक्षित लेखा बहियां या दस्तावेज या उसमें अंतर्विष्ट कोई धारा 153क में निर्दिष्ट व्यक्ति से भिन्न किसी व्यक्ति की है या उससे तात्पर्यित है या हैं या उसके संबंध में हैं, वहां अभिगृहीत या अध्यपेक्षित लेखा बहियां या दस्तावेज या आस्तियां ऐसे अन्य व्यक्ति पर अधिकारिता रखने वाले निर्धारण अधिकारी को सौंप दी जाएंगी " शब्द, अंक , कोष्ठक और अक्षर 1 जून , 2015 से रखे जाएंगे ।
38. आय - कर अधिनियम की धारा 154 में, 1 जून, 2015 से,
धारा 154 का संशोधन ।
(i ) उपधारा ( 1 ) के खंड ( ग ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" (घ ) धारा 206 गख की उपधारा ( 1 ) के अधीन किसी सूचना का संशोधन कर सकेगा । " ;
(ii ) उपधारा ( 2 ) के खंड ( ख ) में, " या कटौतीकर्ता द्वारा " शब्दों के पश्चात्, " या संग्रहणकर्ता द्वारा " शब्दअंतःस्थापित किए जाएंगे;
(iii) उपधारा (3 ) में, " या कटौतीकर्ता" शब्दों के पश्चात्, जहां - कहीं वे आते हैं, " या संग्रहणकर्ता" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(iv) उपधारा ( 5 ) में, " या कटौतीकर्ता " शब्दों के पश्चात्, दोनों स्थानों पर जहां वे आते हैं, " या संग्रहणकर्ता " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(v) उपधारा ( 6 ) में, " या कटौतीकर्ता " शब्दों के पश्चात्, दोनों स्थानों पर जहां वे आते हैं, " या संग्रहणकर्ता" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ;
(vi ) उपधारा ( 8 ) में, " या कटौतीकर्ता द्वारा " शब्दों के पश्चात्, " या संग्रहणकर्ता द्वारा " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
धारा 156का संशोधन ।
39. आय- कर अधिनियम की धारा 156 के परंतुक में, " धारा 143 की उपधारा ( 1 ) या धारा 200 क की उपधारा ( 1 ) के अधीन किसी राशि का अवधारण निर्धारिती द्वारा या कटौतीकर्ता द्वारा " शब्दों, अंकों, कोष्ठकों और अक्षर के स्थान पर, " धारा 143 की उपधारा ( 1 ) या धारा 200 क की उपधारा ( 1 ) या धारा 206गख की उपधारा ( 1 ) के अधीन किसी राशि का अवधारण निर्धारिती द्वारा या कटौतीकर्ता द्वारा या संग्रहणकर्ता द्वारा " शब्द, अंक, कोष्ठक और अक्षर 1 जून , 2015 से रखे जाएंगे ।
40. आय-कर अधिनियम की धारा 158 क के पश्चात् निम्नलिखित धारा , 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
नईधारा 158कक काअंतःस्थापन ।
प्रक्रिया, जब
राजस्वद्वारा की
गई किसी अपील
में विधिका
समरूप प्रश्न
उच्चतम न्यायालय
के समक्ष लंबित
हो।
" 158कक. ( 1 ) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां आयुक्त या प्रधान आयुक्तकी यह राय है कि किसी निर्धारण वर्ष के लिए किसी निर्धारिती के मामले में (ऐसे मामले को इसमें सुसंगत मामला कहा गया है ) उद्भूत होने वाला विधि का कोई प्रश्न दूसरे निर्धारण वर्ष के लिए उसके मामले में उद्भूत होने वाले ऐसे विधि के प्रश्न के समरूप हो जो धारा 261 के अधीन किसी अपील में या निर्धारिती के पक्ष में उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध संविधान के अनुच्छेद 136 के अधीन किसी विशेष इजाजत याचिका, में ( ऐसे मामले को इसमें अन्य मामला कहा गया है ) उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित हो, वहां वह धारा 253 की उपधारा ( 2 ) या उपधारा ( 2 क ) के अधीन निर्धारण अधिकारी को अपील अधिकरण में अपील करने का निर्देश देने के बजाय , निर्धारण अधिकारी को आयुक्त ( अपील ) का आदेश प्राप्त होने की तारीख से साठ दिन के भीतर अपील अधिकरण में विहित प्ररूप में आवेदन करने का निदेश दे सकेगा जिसमें यह कथन हो कि सुसंगत मामले में उद्भूत विधि के प्रश्न पर अपील तभी फाइल की जा सकती है जब अन्य मामले में विधि के प्रश्न पर विनिश्चय अंतिम बन जाए ।
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
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(2) आयुक्त या प्रधान आयुक्त , निर्धारण अधिकारी को उपधारा ( 1 ) के अधीन आवेदन करने का निदेश केवल तभी देगा यदि निर्धारिती से इस आशय की स्वीकृति प्राप्त हो जाती है कि अन्य मामले में विधि का प्रश्न सुसंगत मामले में उद्भूत होने वाले प्रश्न के समरूप है ; और यदि ऐसी कोई स्वीकृति प्राप्त नहीं होती है तो आयुक्त या प्रधान आयुक्त धारा 253 की उपधारा ( 2 ) या उपधारा ( 2 क ) में अंतर्विष्ट उपबंधों केअनुसार कार्यवाही करेगा ।
(3 ) जहां उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट आयुक्त ( अपील ) का आदेश अन्य मामले में विधि के प्रश्न पर अंतिमविनिश्चय के समरूप नहीं है, वहां आयक्त या प्रधान आयुक्त निर्धारण अधिकारी को ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील अधिकरण में अपील करने का निदेश दे सकेगा और इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय अध्याय 10 के भाग ख के सभी अन्य उपबंध तदनुसार लागू होंगे ।
(4) उपधारा ( 3 ) के अधीन प्रत्येक अपील, उस तारीख से जिसको उच्चतम न्यायालय का अन्य मामले में आदेश आयुक्त या प्रधान आयुक्त को संसूचित किया जाता है, साठ दिन के भीतर फाइल की जाएगी ।" ।
धारा 192 का संशोधन ।
41. आय- कर अधिनियम की धारा 192 की उपधारा ( 2 ग ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा , 1 जून, 2015 सेअंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
" (2घ ) उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट संदाय के लिए उत्तरदायी व्यक्ति, निर्धारिती की आय का प्राक्कलन करने या उपधारा ( 1 ) के अधीन कटौती योग्य कर की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए, निर्धारिती से अधिनियम के उपबंधों के अधीन विहित दावों का ( जिसके अंतर्गत हानि को मुजरा करने का दावा भी है ) साक्ष्य या सबूत या विशिष्टियां ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से अभिप्राप्त करेगा, जो विहित किए जाएं ।" ।
नई धारा 192क काअंतःस्थापन ।
42. आय- कर अधिनियम की धारा 192 के पश्चात् निम्नलिखित धारा 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
1952 का 19
किसी कर्मचारी को शोध्य संचयित अतिशेष का संदाय।
" 192क. इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी , कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 5 के अधीन विचरित कर्मचारी भविष्य निधि स्कीम, 1952 के न्यासी या स्कीम के अधीन कर्मचारियों को देय संचित अतिशेष का संदाय करने के लिए प्राधिकृत कोई व्यक्तिऐसे मामले में , जहां किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि में भाग लेने वाले किसी कर्मचारी को देय संचित अतिशेष को चतुर्थ अनुसूची के भाग क के नियम 8 के उपबंधों के लागू न होने के कारण उसकी कुल आय में सम्मिलित किए जाने योग्य है, कर्मचारी को देय संचित अतिशेष का संदाय करने के समय उस पर दस प्रतिशत की दर से आय - कर की कटौती करेगाः
परंतु इस धारा के अधीन कोई कटौती वहां नहीं की जाएगी, जहां पाने वाले को किए गए, यथास्थिति ऐसे संदाय की रकम या ऐसे संदाय की संकलित रकम तीस हजार रुपए से कम है:
परंतु यह और कि ऐसी किसी रकम को जिस पर इस धारा के अधीन कर कटौती योग्य है, प्राप्त करने के लिए हकदार कोई व्यक्ति, अपना स्थायी खाता संख्यांक ऐसे कर की कटौती करने के उत्तरदायी व्यक्ति को देगा , जिसमें असफल रहने पर, अधिकतम सीमांत दर पर कर की कटौती की जाएगी ।" ।
43. आय- कर अधिनियम की धारा 194 क की उपधारा ( 3 ) में , 1 जून , 2015 से,-
धारा 194क का संशोधन।
( क) खंड ( i ) में , परंतुक के पश्चात्, निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" परंतु यह और कि पहले परंतुक में निर्दिष्ट रकम की संगणना , यथास्थिति, बैंककारी [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
108
कंपनी या सहकारी सोसाइटी या पब्लिक कंपनी द्वारा जमा की गई या संदत्त की गई आय के प्रति निर्देश से की जाएगी , जहां कि ऐसी बैंककारी कंपनी या सहकारी सोसाइटी या पब्लिक कंपनी द्वारा आंतरिक बैंककारी समाधानों को अंगीकार किया गया हो; " ;
(ख) खंड ( v ) में " ऐसी आय को " शब्दों से आरंभ होने वाले और " संदत्त की गयी है " पर समाप्त होने वाले शब्दों के स्थान पर " ऐसी आय को, जो किसी सहकारी सोसाइटी द्वारा ( किसी सहकारी बैंक से भिन्न) उसके किसी सदस्य के खाते में जमा की जाती है या उसे संदत्त की जाती है या ऐसी आय को, जोकिसी सहकारी सोसाइटी द्वारा किसी अन्य सहकारी सोसाइटी के खाते में जमा की जाती है या उसे संदत्त की जाती है, लागू नहीं होंगे;
1949का 10 (ग) खंड ( v ) के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः- ' स्पष्टीकरण इस खंड के प्रयोजनों के लिए, " सहकारी बैंक " का वही अर्थ होगा जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 के भाग 5 में उसका है;' ;
(घ) खंड ( ix) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किए जाएंगे , अर्थात्ः-
" ( ix ) मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा अधिनिर्णीत प्रतिकर की रकम पर ब्याज के रूप में जमा की गई ऐसी आय को लागू नहीं होंगे ;
( ixक ) मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा अधिनिर्णीत प्रतिकर की रकम पर ब्याज के रूप में संदत्त ऐसी आय को लागू नहीं होंगे जहां, यथास्थिति, ऐसी आय की रकम या वित्तीय वर्ष के दौरान संदत्त ऐसी आय की रकमों का योग पचास हजार रुपए से अधिक नहीं है; ";
(ङ) खंड ( xi ) के नीचे स्पष्टीकरण 1 में " आवर्ती निक्षेप नहीं हैं " शब्दों के स्थान पर, " आवर्ती निक्षेप भी हैं " शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 194 ग का संशोधन ।
44. आय- कर अधिनियम की धारा 194 ग की उपधारा ( 6 ) में, " माल वाहन चलाने " से आरंभ होने वाले तथा " कटौती नहीं की जाएगी " शब्दों पर समाप्त होने वाले शब्दों के स्थान पर " माल वाहन चलाने, किराए या पट्टे पर देने के कारबार के दौरान , पूर्ववर्ष के दौरान ठेकेदार के खाते में जमा या संदत्त की गई या संदत्त किए जाने के लिए संभावित ऐसी राशि से कोई कटौती नहीं की जाएगी जहां कि ऐसे ठेकेदार के स्वामित्वाधीन पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय दस या उससे कम माल वाहन हैं और उसने इस आशय का घोषणापत्र स्थायी लेखा संख्यांक सहित उस राशि का संदाय करने या जमा करने वाले व्यक्ति को दे दिया है " शब्द 1 जून , 2015 से रखे जाएंगे ।
धारा 194झ का संशोधन ।
45. आय- कर अधिनियम की धारा 194 झ में , दूसरे परंतुक के पश्चात् निम्नलिखित परंतुक, 1 जून, 2015 सेअंत:स्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
परन्तु यह भी कि इस धारा के अधीन कोई कटौती उस दशा में अनुज्ञात नहीं की जाएगी जहां कि ऐसे किसी कारबार न्यास के, जो भू- संपदा विनिधान निधि है, खाते में धारा 10 के खंड ( 23 चगक ) में निर्दिष्ट किसी भू- संपदा आस्ति की बाबत , जो प्रत्यक्षतया ऐसे कारबार न्यास के स्वामित्वाधीन है, किराए के रूप में आय जमा की गई है या उसे संदत्त की गई है । " ।
46. आय- कर अधिनियम की धारा 194ठखक में, 1 जून, 2015 से,-
नईधारा 194ठखक का संशोधन ।
(क) उपधारा ( 1 ) में, " खंड ( 23 चग ) " शब्द, कोष्ठकों, अंकों ओर अक्षरों के पश्चात्" या खंड (23चगक ) " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ख) उपधारा ( 2 ) में , " जो ऐसा अनिवासी है, जो कंपनी या कोई विदेशी कंपनी नहीं है " शब्दों के स्थान पर, " जो अनिवासी ( जो कंपनी नहीं है ) या कोई विदेशी कंपनी है " शब्द और कोष्ठक रखे जाएंगे;
(ग ) उपधारा ( 2 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः- " ( 3 ) जहां धारा 115पक में निर्दिष्ट कोई वितरित आय , जो धारा 10 के खंड ( 23चगक ) भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
109
में निर्दिष्ट प्रकृति की है, किसी कारबार न्यास द्वारा अपने यूनिट धारक को, जो ऐसा अनिवासी है (जो कंपनी नहीं है ) या किसी विदेशी कंपनी को संदेय है, वहां संदाय करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति, ऐसे संदाय को पाने वाले के खाते में जमा करते समय या उसका नकद रूप में या चेक या ड्राफ्टदेकर या किसी अन्य ढंग से संदाय करते समय , इसमें जो भी पूर्वतर हो, उस पर प्रवृत्त दरों से आय- कर की कटौती करेगा । " ।
नई धारा 194 ठखख काअंतःस्थापन ।
47. आय-कर अधिनियम की धारा 194 ठखक के पश्चात्, निम्नलिखित धारा , 1 जून, 2015 से अंत:स्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
विनिधान निधि की यूनिटों के संबंध में आय ।
' 194ठखख. जहां कोई आय, जो आय के उस अनुपात से भिन्न है जो उसी प्रकृति की आय है जैसी धारा 10 के खंड ( 23चखख ) में निर्दिष्ट है, किसी यूनिट धारक को धारा 115 पख के स्पष्टीकरण 1 के खंड (क) में विनिर्दिष्ट किसी विनिधान निधि की यूनिटों के संबंध में संदेय है, वहां संदाय करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति ऐसी आय को पाने वाले के खाते में जमा करते समय या उसका नकद में या कोई चैक या ड्राफ्ट देकर या किसी अन्य ढंग से, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, संदाय करते समय उस पर दस प्रतिशत की दर से आय- कर की कटौती करेगा ।
स्पष्टीकरण इस धारा के प्रयोजनों के लिए -
(क) " यूनिट" का वही अर्थ होगा जो धारा 115 पख के स्पष्टीकरण 1 के खंड ( ग ) में उसकाहै;
(ख) जहां यथा पूर्वोक्त किसी आय को ऐसे किसी खाते में, चाहे वह " उचंत खाते " के नाम से या किसी अन्य नाम से ज्ञात हो , ऐसी आय का संदाय करने के लिए दायी व्यक्ति की लेखा बहियों में जमा किया जाता है , वहां ऐसे जमा किए जाने को पाने वाले के खाते में उस आय का जमा किया जाना समझा जाएगा और इस धारा के उपबंध तदनुसार लागू होंगे । ' ।
धारा 194 ठ्घ का संशोधन।
48. आय- कर अधिनियम की धारा 194ठघ की उपधारा (2 ) में, " 1 जून 2015 अंकों और शब्द के स्थान पर, " 1 जुलाई , 2017 " अंक और शब्द, 1 जून, 2015 से रखे जाएंगे ।
धारा 195 का संशोधन ।
49. आय-कर अधिनियम की धारा 195 की उपधारा ( 6 ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा 1 जून, 2015 से रखी जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 6 ) किसी अनिवासी को, जो कंपनी नहीं है या किसी विदेशी कंपनी को किसी राशि चाहे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन प्रभार्य हो या न हो , का संदाय करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति, ऐसी राशि के संदाय से संबंधित जानकारी , ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से देगा , जो विहित की जाए । " ।
50. आय- कर अधिनियम की धारा 197 क में, 1 जून , 2015 से,-
धारा 197 क का संशोधन ।
(i ) उपधारा ( 1क ) में , " धारा 193 या धारा 194 क " शब्दों, अंकों और अक्षर के स्थान पर, दोनों स्थानों पर, जहां वे आते हैं, क्रमशः " धारा 192 क या धारा 193 या धारा 194क या धारा 194घक" शब्द, अंक और अक्षर रखे जाएंगे;
( ii ) उपधारा ( 1 ग ) में, " धारा 193 या धारा 194 या धारा 194 क " शब्दों, अंकों और अक्षर के स्थान पर, दोनों स्थानों पर, जहां वे आते हैं, क्रमशः " धारा 192 क या धारा 193 या धारा 194 या धारा 194क या धारा 194 घक " शब्द, अंक और अक्षर रखे जाएंगे ।
धारा 200 का संशोधन ।
51. आय- कर अधिनियम की धारा 200 की उपधारा ( 2 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा 1 जून , 2015 से अंत:स्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 2क ) सरकार के किसी कार्यालय की दशा में, जहां इस अध्याय के पूर्वगामी उपबंधों के अनुसार भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2- 110
काटी गई राशि को या धारा 192 की उपधारा ( 1 क ) में निर्दिष्ट कर को कोई चालान पेश किए बिना, केंद्रीय सरकार के खाते में संदत्त किया गया है, वेतन और लेखा अधिकारी या कोषाधिकारी या चेक आहरण और संवितरण अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो , जो ऐसी राशि या कर केंद्रीय सरकार के खाते में जमा करने के लिए उत्तरदायी है, विहित आय - कर प्राधिकारी को या ऐसे प्राधिकारी द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को एक विवरण ऐसे प्रारूप में, ऐसी रीति से सत्यापित कराकर, उसमें ऐसी विशिष्टियां उपदर्शित करते हुए और ऐसे समय के भीतर जो विहित किया जाए, परिदत्त करेगा या परिदत्त कराएगा। " ।
धारा 200 क का संशोधन ।
52. आय-कर अधिनियम की धारा 200क की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ग ) से खंड (ङ) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड, 1 जून, 2015 से रखे जाएंगे , अर्थात्ः-
" ( ग ) फीस, यदि कोई हो , की संगणना धारा 234ङ के उपबंधों के अनुसार की जाएगी;
(घ ) कटौतीकर्ता द्वारा संदेय राशि या उसको शोध्य प्रतिदाय की रकम का अवधारण खंड ( ख ) और खंड ( ग ) के अधीन संगणित रकम का धारा 200 या धारा 201 या धारा 234ङ के अधीन संदत्त किसी रकम और कर या ब्याज या फीस के रूप में अन्यथा संदत्त किसी रकम से समायोजन करने के पश्चात् किया जाएगा;
(ङ) एक इत्तिला, कटौतीकर्ता द्वारा खंड ( घ ) के अधीन संदेय रूप में अवधारित राशि को या उसे शोध्य प्रतिदाय की रकम को विनिर्दिष्ट करते हुए तैयार की जाएगी या बनाई जाएगी और उसे भेजी जाएगी; और;
(च) खंड ( घ ) के अधीन अवधारण के अनुसरण में कटौतीकर्ता को शोध्य प्रतिदाय की रकम कटौतीकर्ता को दी जाएगी । " ।
धारा 203 क का संशोधन ।
53. आय -कर अधिनियम की धारा 203 क की उपधारा ( 2 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" ( 3 ) इस धारा के उपबंध ऐसे व्यक्ति को लागू नहीं होंगे, जो केंद्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किया जाए । " ।
धारा 206 गका संशोधन ।
54. आय-कर अधिनियम की धारा 206 ग की उपधारा ( 3 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधाराएं 1 जून, 2015 सेअंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः-
" (3क) सरकार के किसी कार्यालय की दशा में, जहां उपधारा ( 1 ) या उपधारा ( 1 ग ) या उपधारा (1घ) के अधीन संगृहीत रकम को, चालान पेश किए बिना, केंद्रीय सरकार के खाते में संदत्त किया गया है , वेतन ओर लेखा अधिकारी या कोषाधिकारी या चेक आहरण और संवितरण अधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो , जो ऐसा कर केंद्रीय सरकार के खाते में जमा करने के लिए उत्तरदायी है, विहित आय - कर प्राधिकारी को या ऐसे प्राधिकारी द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति को एक विवरण , ऐसे प्ररूप में, ऐसी रीति से सत्यापित कराकर, उसमें ऐसी विशिष्टियां उपदर्शित करते हुए और ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, परिदत्त करेगा या परिदत्त कराएगा ।
(3ख) उपधारा ( 3 ) के परंतुक में निर्दिष्ट व्यक्ति उक्त परंतुक के अधीन विहित प्राधिकारी को, किसी भूल की परिशुद्धि के लिए या उक्त परंतुक के अधीन परिदत्त विवरण में दी गई सूचना में कुछ जोड़ने, हटाने या उसे अद्यतन करने के लिए, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, सत्यापित रूप में एक संशोधन विवरण भी परिदत्त कर सकेगा । " ।
नई धारा 206गख काअंतःस्थापन ।
55. आय- कर अधिनियम की धारा 206 गक के पश्चात् निम्नलिखित धारा 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित कीजाएगी , अर्थात्ः-
स्रोत पर संगृहीत कर के विवरणों पर प्रक्रिया ।
'206गख. ( 1 ) जहां स्रोत पर कर संग्रहण का कोई विवरण या कोई संशोधन विवरण , धारा 206ग के अधीन किसी राशि का संग्रहण करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा ( जिसे इसमें संग्रहणकर्ता कहा गया है) बनाया गया है, वहां ऐसे विवरण पर निम्नलिखित रीति से प्रक्रिया की जाएगी, अर्थात्ः- अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
111
(क) इस अध्याय के अधीन संग्रहणीय राशियों की संगणना निम्नलिखित समायोजन करने के पश्चात्की जाएगी, अर्थात्ः-
( i ) विवरण में कोई अंकगणितीय भूल;
( ii ) विवरण में किसी सूचना से प्रकट कोई गलत दावा;
(ख) ब्याज, यदि कोई हो, की संगणना विवरण में यथा संगणित संग्रहणीय धनराशियों के आधार पर की जाएगी ;
(ग) फीस यदि कोई हो, की संगणना धारा 234ङ के उपबंधों के अनुसार की जाएगी;
( घ) संग्रहणकर्ता द्वारा संदेय राशि या उसको शोध्य प्रतिदाय की रकम का अवधारणा खंड ( ख ) और खंड ( ग ) के अधीन संगणित रकम का धारा 206 ग या धारा 234ङ के अधीन संदत्त किसी रकम और कर या ब्याज या फीस के रूप में अन्यथा संदत्त किसी रकम से समायोजन करने के पश्चात् किया जाएगा;
(ङ) एक इत्तिला संग्रहणकर्ता द्वारा खंड ( घ ) के अधीन संदेय रूप में अवधारित राशि को या उसे शोध्य प्रतिदाय की रकम को विनिर्दिष्ट करते हुए तैयार की जाएगी या बनाई जाएगी और उसे भेजी जाएगी; और
( च) खंड ( घ ) के अधीन अवधारण के अनुसरण में संग्रहणकर्ता को शोध्य प्रतिदाय की रकम संग्रहणकर्ता को दी जाएगी:
परंतु इस उपधारा के अधीन कोई इत्तिला उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें विवरण फाइल किया जाता है, अंत से एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं भेजी जाएगी ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए " विवरण में किसी सूचना से प्रकट गलत दावा" से किसी विवरण में,-
( i ) ऐसी किसी मद की जो उसकी किसी अन्य प्रविष्टि से असंगत है या उस विवरण में की किसी अन्य मद की; या
( ii ) स्रोत पर कर के संग्रहण की दर के संबंध में जहां ऐसी दर इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नहीं है,
किसी प्रविष्टि के आधार पर कोई दावा अभिप्रेत होगा ।
(2 ) बोर्ड, संग्रहणकर्ता द्वारा संदेय कर का या उसे शोध्य प्रतिदाय का यथाशीघ्र अवधारण करने के लिए स्रोत पर संगृहीत कर के विवरण पर केंद्रीयकृत रूप में उपधारा ( 1 ) के अधीन यथा अपेक्षित प्रक्रिया करने संबंधी स्कीम बना सकेगा । ' ।
धारा 220 का संशोधन ।
56. आय- कर अधिनियम की धारा 220 की उपधारा ( 2 ख ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा , 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" (2 ग) उपधारा ( 2 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां धारा 206गख की उपधारा ( 1 ) के अधीन जारी की गई इत्तिला में विनिर्दिष्ट कर की रकम पर धारा 206ग की उपधारा ( 7 ) के अधीन ब्याज किसी अवधि के लिए प्रभारित किया जाता है, वहां उसी रकम पर उसी अवधि के लिए उपधारा ( 2 ) के अधीन कोई ब्याज प्रभारित नहीं किया जाएगा । " ।
57. आय-कर अधिनियम की धारा 234ख में, 1 जून, 2015 से,-
धारा 234ख का संशोधन।
( i ) उपधारा ( 2 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 2क) ( क ) जहां किसी निर्धारण वर्ष के लिए धारा 245 ग की उपधारा ( 1 ) के अधीन कोई आवेदन किया है, वहां निर्धारिती उस उपधारा में निर्दिष्ट आय- कर की अतिरिक्त रकम पर, [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
112
ऐसे निर्धारण वर्ष के अप्रैल के प्रथम दिन से प्रारंभ होने वाली और ऐसी आवेदन करने की तारीख कोसमाप्त होने वाली अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या किसी मास के भाग के लिए एक प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा;
(ख ) जहां, किसी निर्धारण वर्ष के लिए धारा 245 घ की उपधारा ( 4 ) के अधीन समझौता
आयोग के किसी आदेश के परिणामस्वरूप , धारा 245 ग की उपधारा ( 1 ) के अधीन आवेदन में प्रकट की गई कुल आय की रकम बढ़ाई जाती है, वहां निर्धारिती , ऐसे निर्धारण वर्ष के अप्रैल के प्रथम दिन से प्रारंभ होने वाली और ऐसे आदेश की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या किसी मास के भाग के लिए उस रकम पर जितनी से ऐसे आदेश के आधार पर अवधारित कुल आय पर कर, धारा 245 ग की उपधारा ( 1 ) के अधीन फाइल किए गए आवेदन में प्रकट किए गए कुल आय पर कर से अधिक हो जाता है, एक प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा । " ।
(ग) जहां धारा 245घ की उपधारा ( 6 ख ) के अधीन किसी आदेश के परिणामस्वरूप उस रकम में, जिस पर खंड ( ख ) के अधीन ब्याज संदेय था, यथास्थिति बढ़ाई गई है या घटाई गई है, वहां ब्याज तदनुसार बढ़ा दिया जाएगा या घटा दिया जाएगा। ";
(ii ) उपधारा ( 3 ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 3 ) जहां धारा 147 या धारा 153 क के अधीन पुनः निर्धारण या पुनःसंगणना के आदेश के परिणामस्वरूप , ऐसी रकम, जिस पर उपधारा ( 1 ) के अधीन किसी वित्तीय वर्ष के लिए अग्रिम कर के कम संदाय की बाबत ब्याज संदेय था , बढ़ाई जाती है, वहां निर्धारिती, ऐसे वित्तीय वर्ष के ठीक अगले अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाली और धारा 147 या धारा 153 क के अधीन पुनःनिर्धारण या पुनःसंगणना की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या किसी मास के भाग के लिए उस रकम पर, जितनी से ऐसे पुनः निर्धारण या पुनःसंगणना के आधार पर अवधारित कुल आय पर कर, यथास्थिति, धारा 143 की उपधारा ( 1 ) के अधीन या उपधारा (1) में यथा निर्दिष्ट नियमित निर्धारण के आधार पर अवधारित कुल आय पर कर से अधिक हो जाता है, एक प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा । " ;
(iii ) उपधारा (4 ) में, " अथवा धारा 245 घ की उपधारा ( 4 ) के अधीन समझौता आयोग के किसी आदेश के " शब्दों, अंकों, अक्षर और कोष्ठकों का लोप किया जाएगा ।
58. आय -कर अधिनियम की धारा 245 क के खंड ( ख ) के स्पष्टीकरण में, 1 जून , 2015 से,-
धारा 245क का संशोधन।
(अ) खंड ( i ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" ( i ) धारा 147 के अधीन निर्धारण या पुनः निर्धारण या पुनःसंगणना के लिए कोई कार्यवाही,-
(क) उस तारीख से प्रारम्भ की गई समझी जाएगी, जिसको किसी निर्धारण वर्ष के लिए धारा 148 के अधीन सूचना जारी की जाती है;
(ख) उपखंड ( क ) में निर्दिष्ट ऐसी सूचना के, किसी अन्य निर्धारण वर्ष या निर्धारण वर्षों के लिए, जिनके लिए धारा 148 के अधीन सूचना जारी नहीं की गई है , किन्तु ऐसी सूचना ऐसी तारीख को जारी की जा सकती थी, जारी किए जाने की तारीख से प्रारंभ की गई समझी जाएगी, यदि अन्य निर्धारण वर्ष या निर्धारण वर्षों के लिए आय की विवरणी धारा 139 के अधीन या धारा 142 के अधीन किसी सूचना के उत्तर में प्रस्तुत की गई है; " ;
(आ) खंड ( iv ) में , आने वाले " निर्धारण वर्ष के पहले दिन से प्रारंभ की गई और उस तारीख को समाप्त की गई समझी जाएगी, जिसको निर्धारण किया जाता है " शब्दों के स्थान पर, " उस तारीख से, जिसको धारा 139 के अधीन या धारा 142 के अधीन सूचना के उत्तर में आय की विवरणी उस निर्धारण वर्ष अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
113
के लिए प्रस्तुत की जाती है, प्रारंभ और उस तारीख को, जिसको निर्धारण किया जाता है या जहां कोई निर्धारण न किया गया हो , सुसंगत निर्धारण वर्ष के अंत से दो वर्ष की समाप्ति पर समाप्त हुई समझी जाएगी" शब्द और अंक रखे जाएंगे ।
धारा 245घ का संशोधन ।
59. आय- कर अधिनियम की धारा 245घ की उपधारा ( 6 ख ) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा 1 जून , 2015 से रखी जाएगी, अर्थात्ः-
" ( 6ख ) समझौता आयोग, अभिलेख में प्रकट किसी भूल को सुधारने की दृष्टि से, उपधारा ( 4 ) के अधीन उसके द्वारा पारित किसी आदेश का,-
(क) उस मास के अंत से , जिसमें आदेश पारित किया गया था, छह मास की अवधि के
भीतर किसी समय; या
(ख) उस मास के अंत से, जिसमें, यथास्थिति, प्रधान आयुक्त या आयुक्त या आवेदक द्वारा सुधार के लिए कोई आवेदन किया गया है, छह मास की अवधि के भीतर किसी समय,
संशोधन कर सकेगाः
परंतु प्रधान आयुक्त या आयुक्त या आवेदक द्वारा , उस मास के अंत से, जिसमें समझौता आयोग द्वारा उपधारा ( 4 ) के अधीन कोई आदेश पारित किया जाता है, छह मास की समाप्ति के पश्चात् सुधार के लिए कोई आवेदन नहीं किया जाएगाः
परंतु यह और कि इस उपधारा के अधीन ऐसा कोई संशोधन , जिसका आवेदक के दायित्व को उपांतरित करने का प्रभाव है, तब तक नहीं किया जाएगा जब तक समझौता आयोग , आवेदक और प्रधान आयुक्त या आयुक्त को ऐसा करने के अपने आशय की सूचना नहीं दे देता है और आवेदक तथा प्रधान आयुक्त या आयुक्त को सुनवाई का अवसर नहीं दे देता है । " ।
धारा 245ज का संशोधन ।
60. आय-कर अधिनियम की धारा 245ज की उपधारा ( 1 ) में, " ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे " शब्दों के पश्चात्, " लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से " शब्द 1 जून , 2015 से अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
61. आय- कर अधिनियम की धारा 245जक की उपधारा ( 1 ) में , 1 जून, 2015 से,-
धारा 245जक का संशोधन।
(अ) खंड ( iii) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंत:स्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" (iiiक) धारा 245ग के अधीन किए गए किसी आवेदन के संबंध में, धारा 245घ की उपधारा ( 4 ) के अधीन समझौते के निबंधनों का उपबंध न करते हुए कोई आदेश पारित किया गया है; या",
(आ) स्पष्टीकरण के खंड (ग ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" (गक ) खंड ( iiiक) में निर्दिष्ट किसी आवेदन के संबंध में, वह दिन, जिसको धारा 245घ की उपधारा ( 4 ) के अधीन आदेश समझौते के निबंधनों का उपबंध न करते हुए पारित किया गया था;" ।
जून, 2015 से,-
62. आय-कर अधिनियम की धारा 245ट में, 1
धारा 2452 का संशोधन ।
(अ ) उपधारा ( 1 ) में, दीर्घ पंक्ति में, " वहां वह किसी अन्य मामले के संबंध में " शब्दों के स्थान
पर, " वहां वह या ऐसे व्यक्ति से संबंधित कोई व्यक्ति ( जिसे इसमें इसके पश्चात् संबंधित व्यक्ति कहा गया है ) किसी अन्य मामले के संबंध में " शब्द और कोष्ठक रखे जाएंगे ;
(आ) उपधारा (2 ) में, " वहां ऐसा व्यक्तिबाद में " शब्दों के स्थान पर " वहां ऐसा व्यक्ति या कोई अन्य संबंधित व्यक्ति बाद में " शब्द रखे जाएंगे;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
114
(इ) उपधारा ( 2 ) के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
' स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति के संबंध में , " संबंधित व्यक्ति" से निम्नलिखित अभिप्रेत है,-
(i) जहां ऐसा व्यक्ति कोई व्यष्टि है, वहां ऐसी कोई कंपनी जिसमें ऐसा व्यक्तिकिसी समय पचास प्रतिशत से अधिक शेयर या मतदान अधिकार धारण करता है या कोई फर्म या व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय , जिसमें ऐसा व्यक्ति किसी समय पचास प्रतिशत से अधिक लाभों का हकदार है या कोई हिन्दूअविभक्त कुटुंब, जिसमें ऐसा व्यक्ति कर्ता है;
(ii) जहां ऐसा व्यक्ति कोई कंपनी है, वहां ऐसा व्यष्टि, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा समझौता आयोग के समक्ष आवेदन करने की तारीख के पूर्व किसी समय ऐसी कंपनी में पचास प्रतिशत से अधिक शेयर या मतदान अधिकार धारण किए हुए था;
(iii) जहां ऐसा व्यक्ति कोई फर्म या व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय है, वहां ऐसा कोई व्यष्टि, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा समझौता आयोग के समक्ष आवेदन करने की तारीख के पूर्व किसी समय उस फर्म, व्यक्ति संगम या व्यष्टि निकाय में पचास प्रतिशत से अधिक लाभों का हकदार था;
(iv) जहां ऐसा व्यक्ति कोई. हिन्दू अविभक्त कुटुंब है, उस हिन्दू अविभक्त कुटुंब का कर्ता । ' ।
धारा 245ण का संशोधन ।
63. आय-कर अधिनियम की धारा 245ण की उपधारा ( 3 ) के खंड ( घ ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" ( घ ) भारतीय विधिक सेवा से ऐसा विधि सदस्य, जो भारत सरकार में अपर सचिव है या अपर सचिव होने के लिए अर्हित है । " ।
64. आय- कर अधिनियम की धारा 246क की उपधारा ( 1 ) में, 1 जून, 2015 से,-
धारा 246क का संशोधन ।
(क) आरंभिक भाग में , " या कोई कटौतीकर्ता " शब्दों के पश्चात्, " या कोई संग्रहणकर्ता" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ख) खंड ( क ) में, " धारा 200क की उपधारा ( 1 ) के अधीन कोई संसूचना , जहां निर्धारिती या कटौतीकर्ता" शब्दों, अंकों, अक्षरों और कोष्ठकों के स्थान पर, " धारा 200क की उपधारा ( 1 ) या धारा 206गख की उपधारा ( 1 ) के अधीन कोई संसूचना, जहां निर्धारिती या कटौतीकर्ता या संग्रहणकर्ता " शब्द, अंक , अक्षर और कोष्ठक रखे जाएंगे ।
धारा 253का संशोधन ।
65. आय- कर अधिनियम की धारा 253 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ङ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड, 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
" ( च) धारा 10 के खंड ( 23 ग ) के उपखंड (vi) या उपखंड (viक) के अधीन विहित प्राधिकारी द्वारा पारित कोई आदेश । " ।
धारा 255 का संशोधन ।
66. आयकर अधिनियम की धारा 255 की उपधारा ( 3 ) में, " पांच लाख रुपए " शब्दों के स्थान पर, " पन्द्रह लाख रुपए " शब्द 1 जून, 2015 से रखे जाएंगे ।
धारा 263 का संशोधन ।
67. आय-कर अधिनियम की धारा 263 की उपधारा ( 1 ) में , स्पष्टीकरण को उसके स्पष्टीकरण 1 के रूप में संख्यांकित किया जाएगा और इस प्रकार संख्यांकित स्पष्टीकरण 1 के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण 1 जून , 2015 से अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" स्पष्टीकरण 2- इस धारा के प्रयोजनों के लिए घोषित किया जाता है कि निर्धारण अधिकारी द्वारा भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
115
पारित किसी आदेश को जहां तक वह राजस्व के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है, गलत समझा जाएगा यदि प्रधान आयुक्त या आयुक्त की राय में,-
(क) आदेश ऐसी जांच या सत्यापन के, जो किया जाना चाहिए था, बिना पारित किया
जाता है;
(ख ) आदेश , ऐसी कोई राहत , दावे की जांच किए बिना , अनुज्ञात करते हुए पारित किया
गया है;
( ग ) आदेश, बोर्ड द्वारा धारा 119 के अधीन जारी किए गए किसी आदेश , निदेश या अनुदेश के अनुसार नहीं किया गया है;
( घ ) आदेश , निर्धारिती या किसी अन्य व्यक्ति के मामले में , अधिकारिता प्राप्त उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा किए गए ऐसे किसी विनिश्चय , जो निर्धारिती पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है , के अनुसार पारित नहीं किया गया है ।" ।
68. आय- कर अधिनियम की धारा 269 धध के स्थान पर, निम्नलिखित धारा 1 जून , 2015 से रखी जाएगी , अर्थात्ः-
धारा 269 धध के स्थान पर नई धारा काप्रतिस्थापन।
' 269 धध. कोई व्यक्तिकिसी अन्य व्यक्ति से ( जिसे इसमें निक्षेपकर्ता कहा गया है ) कोई उधार या निक्षेप या कोई विनिर्दिष्ट धनराशि, पाने वाले के खाते में देय चैक या पाने वाले के खाते में देय बैंक ड्राफ्ट द्वारा या किसी बैंक खाते के माध्यम से इलैक्ट्रानिक समाशोधन प्रणाली का उपयोग करके ही लेगा या प्रतिगृहीत करेगा अन्यथा नहीं, यदि-
कुछ उधार, निक्षेप और विनिर्दिष्ट राशिलेनेया प्रतिग्रहण करने का ढंग ।
(क) ऐसे उधार या निक्षेप की रकम या विनिर्दिष्ट राशि अथवा ऐसे उधार, निक्षेप और विनिर्दिष्ट राशि की कुल रकम; या
(ख) ऐसे उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट राशि लेने या उसका प्रतिग्रहण करने की तारीख को, ऐसे व्यक्तिद्वारा निक्षेपकर्ता से पहले से लिया गया या प्रतिगृहीत कोई उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट राशि ( चाहे प्रति संदाय शोध्य हो गया हो या नहीं ) असंदत्त है , वह रकम या कुल रकम जो असंदत्त
है;या
( ग ) खंड ( ख ) में निर्दिष्ट रकम या कुल रकम खंड ( क ) में निर्दिष्ट रकम या कुल रकम के साथ मिलकर,
बीस हजार रुपए या उससे अधिक है:
परंतु इस धारा के उपबंध ऐसे किसी उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट राशि को लागू नहीं होंगे जो निम्नलिखित से ली अथवा प्रतिगृहीत की जाती है या ऐसे किसी उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट राशि को लागू नहीं होंगे जो निम्नलिखित द्वारा ली जाती है या प्रतिगृहीत की जाती है, अर्थात्ः-
(क) सरकार;
(ख) कोई बैंककारी कंपनी, डाकघर बचत बैंक या सहकारी बैंक;
( ग) केंद्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा स्थापित कोई निगम;
2013का 18
कंपनी; (घ) कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 के खंड ( 45 ) में यथापरिभाषित कोई सरकारी
(ङ) ऐसी अन्य संस्था, संगम या निकाय अथवा ऐसे वर्ग की संस्थाएं, संगम या निकाय जिन्हें केन्द्रीय सरकार, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, राजपत्र में इस निमित्त अधिसूचित करे:
परंतु यह और कि इस धारा के उपबंध किसी उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट राशि को लागू नहीं होंगे जहां ऐसे व्यक्ति की, जिससे उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट राशि ली जाती है या प्रतिगृहीत की [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
116
जाती है और ऐसे व्यक्ति की, जिसके द्वारा उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट धनराशि ली जाती है या प्रतिगृहीत की जाती है, दोनों की ही कृषि आय है और उनमें से किसी की भी इस अधिनियम के अधीन कर से प्रभार्य कोई आय नहीं है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
1949का10 (i) " बैंककारी कंपनी " से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसे बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 के उपबंध लागू होते हैं और इसके अंतर्गत उस अधिनियम की धारा 51 में निर्दिष्ट कोई बैंक या बैंककारी संस्था भी है;
1949 का 10 (ii) " सहकारी बैंक " का वही अर्थ होगा , जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 के भाग 5 में उसका है;
(iii) " उधार या निक्षेप " से धन का उधार या निक्षेप अभिप्रेत है;
(iv) " विनिर्दिष्ट राशि " से किसी स्थावर संपत्ति के अंतरण के संबंध में, चाहे ऐसा अंतरण होता है अथवा नहीं, अग्रिम के रूप में या अन्यथा, प्राप्य कोई धनराशि अभिप्रेत है । ' ।
69. आय - कर अधिनियम की धारा 269 न में, 1 जून , 2015 से,-
धारा 269न का संशोधन ।
(अ) आरंभिक भाग में,-
(क) " उनको दिए गए किसी उधार या किए गए निक्षेप का शब्दों के पश्चात् " या उसके द्वारा प्राप्त किसी विनिर्दिष्ट अग्रिम का " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ख) " जिसने ऐसा उधार दिया है या निक्षेप किया है " शब्दों के पश्चात् " या विनिर्दिष्ट अग्रिम का संदाय किया है " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(आ) खंड (क ) में " उधार या निक्षेप " शब्दों के पश्चात्" या विनिर्दिष्ट अग्रिम " शब्दअंतःस्थापित किए जाएंगे;
(इ) खंड ( ख ) में, अंत में " या " शब्द अंतःस्थापित किया जाएगा;
(ई ) खंड ( ख ) के पश्चात् और दीर्घ पंक्ति के पूर्व, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" (ग ) ऐसे प्रतिसंदाय की तारीख को, ऐसे व्यक्ति द्वारा चाहे अपने नाम में या किसी अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्ततः प्राप्त विनिर्दिष्ट अग्रिमों की कुल रकम, ऐसे विनिर्दिष्ट अग्रिमों पर संदेय ब्याज पारित , यदि कोई हो";
(उ ) दूसरे परंतुक में " किसी ऋण या निक्षेप " शब्दों के स्थान पर " किसी उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट अग्रिम " शब्द रखे जाएंगे;
(ऊ) स्पष्टीकरण में, खंड ( iii ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
'( iv ) " विनिर्दिष्ट अग्रिम " से किसी स्थावर संपत्ति के अंतरण के संबंध में, चाहे ऐसा अंतरण होता है अथवा नहीं, अग्रिम की चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो प्रकृति की कोई धनराशि अभिप्रेत है ।
धारा 271 का संशोधन ।
70. आय- कर अधिनियम की धारा 271 की उपधारा ( 1 ) में स्पष्टीकरण 4 के स्थान पर, 1 अप्रैल, 2016 से, निम्नलिखित स्पष्टीकरण रखा जाएगा , अर्थात्ः-
स्पष्टीकरण 4- इस उपधारा के खंड ( iii) के प्रयोजनों के लिए,-
(क) अपवंचन के लिए प्रयास की जाने वाली कर की रकम निम्नलिखित सूत्र के अनुसार अवधारित की जाएगी- भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1 क]
117
(कख) + ( ग - घ )
जहां
क = धारा 115ञख या धारा 115जग में अंतर्विष्ट उपबंधों से भिन्न उपबंधों के अनुसार (जिन्हें इसमें साधारण उपबंध कहा गया है ) निर्धारित कुल आय पर कर की रकम है;
ख = कर की वह रकम है, जो तब प्रभार्य होती यदि साधारण उपबंधों के अनुसार निर्धारित कुल आय में से आय की ऐसी रकम को घटा दिया जाता, जिसकी बाबत विशिष्टियां छिपाई गई हैं या गलत विशिष्टियां दी गई हैं ;
ग = धारा 115ञख या धारा 115ञग में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार निर्धारित कुल आय पर कर की रकम है;
घ = कर की वह रकम है, जो तब प्रभार्य होती यदि धारा 115ञख या धारा 115ञग में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार निर्धारित कुल आय में से आय की ऐसी रकम को घटा दिया जाता, जिसकी बाबत विशिष्टियां छिपाई गई हैं या गलत विशिष्टियां दी गई हैं:
परंतु जहां आय की ऐसी रकम को जिसकी बाबत विशिष्टियां छिपाई गई हैं या गलत विशिष्टियां दी गई हैं , किसी मुद्दे पर धारा 115 ञख या धारा 115ञग में अंतर्विष्ट उपबंधों और साधारण उपबंधों , दोनों के अधीन माना गया है , वहां ऐसी रकम को , मद घ के अधीन रकम का अवधारण करते समय निर्धारित कुल आय में से घटाया नहीं जाएगा:
परंतु यह और कि ऐसे मामले में जहां धारा 115 ञख या धारा 115ञग में अंतर्विष्ट उपबंध लागू नहीं होते हैं , वहां सूत्र में मद (ग घ ) पर ध्यान नहीं दिया जाएगा;
(ख) किसी ऐसे मामले में , जहां आय की उस रकम का, जिसके संबंध में विशिष्टियों को छिपाया गया है या गलत विशिष्टियां दी गई हैं, प्रभाव विवरणी में घोषित हानि को कम करने या उस हानि को आय में संपरिवर्तित करने का है, वहां अपवंचन के लिए प्रयास की जाने वाली कर की रकम का अवधारण खंड ( क ) में विनिर्दिष्ट सूत्र के अनुसार इस उपांतरण के साथ किया जाएगा कि उस सूत्र में मद (कख ) के लिए अवधारित की जाने वाली रकम, कर की वह रकम होगी जो उस आय पर प्रभार्य होती, जिसके संबंध में विशिष्टियों को छिपाया गया है या गलत विशिष्टियां दी गई हैं, यदि ऐसी आय कुल आय होती;
( ग ) किसी ऐसे मामले में, जिसको स्पष्टीकरण 3 लागू होता है , अपवंचन के लिए प्रयास की जाने वाली कर की रकम निर्धारित कुल आय पर कर की वह रकम होगी जो धारा 148 के अधीन सूचना जारी किए जाने के पूर्व संदत्त अग्रिम कर, स्रोत पर काटे गए कर, स्रोत पर संगृहीत कर और स्वःनिर्धारण कर को घटाने पर आए । ' ।
धारा 271 घ का संशोधन ।
71. आय- कर अधिनियम की धारा 271 घ की उपधारा ( 1 ) में, दोनों स्थानों पर आने वाले " उधार या निक्षेप " शब्दों के पश्चात् " या विनिर्दिष्ट राशि " शब्द 1 जून , 2015 से अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
धारा 271 ङ का संशोधन ।
72. आय- कर अधिनियम की धारा 271 ङकी उपधारा ( 1 ) में, " कोई उधार लेगा या निक्षेप प्रतिगृहीत करेगा तो वह शास्ति के रूप में इस प्रकार लिए गए उधार या प्रतिगृहीत किए गए निक्षेप " शब्दों के स्थान पर " कोई उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट अग्रिम लेता या प्रतिगृहीत करता है तो वह शास्ति के रूप में इस प्रकार लिए गए या प्रतिगृहीत किए गए उधार या निक्षेप या विनिर्दिष्ट अग्रिम " 1 जून , 2015 से रखे जाएंगे ।
धारा 271 चकख
का अन्तःस्थापन ।
73. आय-कर अधिनियम की धारा 271चकक के पश्चात्, निम्नलिखित धारा 1 अप्रैल, 2016 से अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः- [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
118
" 271 चकख . यदि कोई पात्र विनिधान निधि, जिससे धारा 9 क की उपधारा ( 5 ) के अधीन यथा अपेक्षित कोई विवरण या कोई जानकारी या दस्तावेज देने की अपेक्षा की जाती है, ऐसा विवरण या जानकारी या दस्तावेज या उपधारा के अधीन विहित समय के भीतर देने में असफल रहती है, तो उक्त उपधारा के अधीन विहित आय - कर प्राधिकारी यह निदेश दे सकेगा कि ऐसी निधि, शास्ति के रूप में, पांच लाख रुपए की राशि का संदाय करेगी । " ।
किसी पात्रविनिधान निधि द्वारा विवरण या जानकारी या दस्तावेज देने में असफल रहने के लिएशास्ति ।
नई धारा 271छक काअंतःस्थापन ।
74. आय- कर अधिनियम की धारा 271 छ के पश्चात्, निम्नलिखित धारा 1 अप्रैल, 2016 से अंतःस्थापित कीजाएगी, अर्थात्ः-
" 271 छक. यदि कोई भारतीय समुत्थान, जिससे धारा 285क के अधीन कोई जानकारी या दस्तावेज देने कीअपेक्षा की जाती है, ऐसा करने में असफल रहता है, तो ऐसा आय- कर प्राधिकारी, जो उक्त धारा के अधीन विहित किया जाए, यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा भारतीय समुत्थान,-
धारा 285क के अधीनजानकारी या दस्तावेज देने में असफलता के लिएशास्ति।
(i ) ऐसे संव्यवहार के, जिसके संबंध में ऐसी असफलता हुई है, मूल्य के दो प्रतिशत के बराबर की राशि का, यदि ऐसे संव्यवहार का प्रभाव भारतीय समुत्थान के संबंध में प्रबंध या नियंत्रण काअधिकार प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः अंतरित करने का है;
(ii) किसी अन्य मामले में पांच लाख रुपए की राशिका,
शास्ति के रूप में, संदाय करेगा । " ।
नई धारा 271झ का अंतःस्थापन ।
75. आय- कर अधिनियम की धारा 27ज के पश्चात्, निम्नलिखित धारा 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
" 271 झ. यदि कोई व्यक्ति, जिससे धारा 195 की उपधारा ( 6 ) के अधीन जानकारी प्रस्तुत करने कीअपेक्षा की जाती है, ऐसी जानकारी देने में असफल रहता है या गलत जानकारी देता है, तो निर्धारण अधिकारी यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा व्यक्ति शास्ति के रूप में एक लाख रुपए की राशि का संदाय करेगा । " ।
धारा 195 के अधीन जानकारी देने में असफलता के लिए या गलत जानकारी देने के लिए शास्ति।
76. आय- कर अधिनियम की धारा 272क की उपधारा ( 2 ) में, 1 जून, 2015 से,-
धारा 272क का संशोधन ।
(क) खंड ( ठ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" (ड) कोई विवरण ऐसे समय के भीतर जो धारा 200 की उपधारा ( 2 क ) या धारा 206ग की उपधारा ( 3 क ) में विहित किया जाए, परिदत्त करने या परिदत्त कराने में; " ;
(ख) पहले परंतुक में, " धारा 200 की उपधारा ( 3 ) या धारा 206 ग की उपधारा ( 3 ) के परंतुक के अधीन विवरणों" शब्दों, अंकों, कोष्ठकों और अक्षर के स्थान पर " धारा 200 की उपधारा ( 2 क ) या उपधारा ( 3 ) या धारा 206ग की उपधारा ( 3 ) के परंतुक या उपधारा ( 3क ) के अधीन विवरणों" शब्द, अंक, कोष्ठक और अक्षर रखे जाएंगे ।
77. आय -कर अधिनियम की धारा 273ख में,-
धारा 273 ख का संशोधन ।
(i ) " धारा 271 चख , धारा 271 छ " शब्दों, अंकों और अक्षरों के स्थान पर, " धारा 271 चकख , धारा 271चख , धरा 271 छ, धारा 271 छक " शब्द, अंक और अक्षर 1 अप्रैल, 2016 से रखे जाएंगे;
(ii) " धारा 271 ज " शब्द, अंकों और अक्षरों के पश्चात्, " धारा 271 झ " शब्द, अंक और अक्षर , 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
नई धारा 285क काअंतःस्थापन ।
78. आय- कर अधिनियम की धारा 285 के पश्चात्, निम्नलिखित धारा 1 अप्रैल, 2016 से अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" 285क. जहां भारत के बाहर रजिस्ट्रीकृत या निगमित किसी कंपनी या इकाई में कोई शेयर या हित का अपना मूल्य प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः सारवान् रूप से धारा 9 की उपधारा ( 1 ) के खंड (i ) के स्पष्टीकरण 5 में यथा विनिर्दिष्ट भारत में अवस्थित आस्तियों से सारतः व्युत्पन्न होता है और, यथास्थिति, ऐसी कंपनी या इकाई , भारत में ऐसी आस्तियां प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किसी समुत्थान के माध्यम से या में कतिपय मामलों में भारतीय समुत्थान द्वारासूचनाया दस्तावेजों का प्रस्तुत कियाजाना ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1 क]
119
धारित करती है, वहां ऐसा भारतीय समुत्थान , धारा 9 की उपधारा ( 1 ) के खंड (i ) के अधीन भारत में प्रोद्भूत या उद्भूत किसी आय के अवधारण के प्रयोजनों के लिए ऐसी सूचना या दस्तावेज विहित आय- कर प्राधिकारी को विहित अवधि के भीतर, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, प्रस्तुत करेगा । " ।
79. आय- कर अधिनियम की धारा 288 में, 1 जून, 2015 से,
धारा 288 का
संशोधन ।
(i ) उपधारा ( 2 ) के पश्चात् स्पष्टीकरण के स्थान पर, निम्नलिखित स्पष्टीकरण रखा जाएगा ,
अर्थात्:-
1949का 38
" स्पष्टीकरण इस धारा में, " लेखापाल " से चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 की धारा 2 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ख ) में यथा परिभाषित कोई ऐसा चार्टर्ड अकाउंटेंट अभिप्रेत है, जिसके पास उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा ( 1 ) के अधीन व्यवसाय का एक विधिमान्य प्रमाणपत्र है किंतु इसमें [उपधारा ( 1 ) के अधीन निर्धारिती का प्रतिनिधित्व करने के प्रयोजनों के सिवाय निम्नलिखित सम्मिलित नहीं है,-
2013 का 18
(क) ऐसे निर्धारिती की दशा में , जो कंपनी है ऐसा व्यक्ति जो कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 141 की उपधारा ( 3 ) के उपबंधों के अनुसार उक्त कंपनी में संपरीक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र नहीं है; या
(ख) किसी अन्य मामले में,-
(i) स्वयं निर्धारिती या ऐसे निर्धारिती की दशा में, जो फर्म व्यक्तियों का संगम या हिंदू अविभक्त कुटुंब है, फर्म का कोई भागीदार अथवा संगम या कुटुंब का सदस्य;
(ii) ऐसे निर्धारिती की दशा में , जो न्यास या संस्था है, धारा 13 की उपधारा ( 3 ) के खंड (क) , खंड ( ख ) , खंड (ग ) और खंड ( गग ) में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति;
(iii) उपखंड (i) और ( ii ) में निर्दिष्ट व्यक्तियों से भिन्न किसी व्यक्ति की दशा में, ऐसा व्यक्ति जो धारा 140 के उपबंधों के अनुसार धारा 139 के अधीन विवरणियां सत्यापित करने के लिए सक्षम है;
(iv) उपखंड ( i) और (ii) और उपखंड ( iii) में निर्दिष्ट व्यक्तियों में से किसी काकोई नातेदार;
(v) निर्धारिती का कोई अधिकारी या कर्मचारी;
(vi ) ऐसा कोई व्यष्टि जो निर्धारिती के किसी अधिकारी या कर्मचारी का भागीदार है या उसके नियोजन में है;
(vii) ऐसा कोई व्यष्टि या उसका नातेदार या भागीदार जो-
(I ) निर्धारिती की कोई प्रतिभूति या हित धारण कर रहा है:
परंतु यह कि नातेदार, निर्धारिती में उस अंकित मूल्य की प्रतिभूति या हित धारण कर सकेगा जो एक लाख रुपए से अधिक का न हो;
( II) निर्धारिती का ऋणी है:
परंतु यहकि नातेदार निर्धारिती की ऐसी रकम जो एक लाख रुपएसे अधिक का ऋणी हो सकेगा;
( III) किसी अन्य व्यक्ति के लिए निर्धारिती को ऋणिता के संबंध में गारंटी देता है या कोई प्रतिभूति उपलब्ध कराता है:
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
120
परंतु यह कि नातेदार किसी अन्य व्यक्ति की ऋणिता के संबंध में निर्धारिती को ऐसी रकम के लिए, जो एक लाख रुपए से अधिक की न हो गारंटी दे सकेगा या प्रतिभूति उपलब्ध करा सकेगा;
(viii) कोई ऐसा व्यक्ति जो चाहे प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः निर्धारिती के साथ ऐसी प्रकृति का जो विहित किया जाए कारोबारी संबंध रखता है;
(ix) ऐसा कोई व्यक्ति, जो किसी न्यायालय द्वारा ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया हो जिसमें कपट अंतर्वलित है और ऐसी दोषसिद्धि की तारीख से दस वर्ष की अवधि समाप्त नहीं हुई है। ";
(iii) उपधारा ( 4 ) में, " ( ग ) जो दिवालिया हो गया है " कोष्ठकों, अक्षर और शब्दों से प्रारंभ होने वाले और " अर्ह नहीं होगा " शब्दों पर समाप्त होने वाले भाग के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" ( ग ) जो दिवालिया हो गया है; या
(घ ) जिसे किसी न्यायालय द्वारा ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है जिसमें कपट अंतर्वलित है,
उपधारा (1 ) के अधीन किसी निर्धारिती का प्रतिनिधित्व करने के लिए खंड ( क ) में निर्दिष्ट व्यक्ति की दशा में सभी समयों के लिए, खंड ( ख ) में निर्दिष्ट व्यक्ति की दशा में, ऐसे समय के लिए जो प्रधान मुख्य आयुक्त या मुख्य आयुक्त या प्रधान आयुक्त या आयुक्त, आदेश द्वारा अवधारित करे, खंड ( ग ) में निर्दिष्ट व्यक्ति की दशा में ऐसी अवधि के लिए जिसके दौरान दिवालापन बना रहे , और खंड ( घ ) में निर्दिष्ट व्यक्तिकी दशा में दोषसिद्धि की तारीख से दस वर्ष की अवधि के लिए अर्ह होगा । ";
(iii) उपधारा ( 7 ) के पश्चात्, निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
' स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यष्टि के संबंध में " नातेदार " से, अभिप्रेत है-
(क) व्यष्टि की पत्नी या पति;
(ख ) व्यष्टि का भाई या बहिन;
(ग ) व्यष्टि की पत्नी या पति का भाई या बहिन;
(घ ) व्यष्टि का कोई पारंपरिक पूर्वपुरुष या वंशज;
(ङ) व्यष्टि की पत्नी या पति का कोई पारंपरिक पूर्वपुरुष या वंशज;
(च) खंड ( ख ) , खंड ( ग ) , खंड ( घ ) या खंड ( ङ) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति की पत्नी या पति;
(छ) व्यष्टि या व्यष्टि की पत्नी या पति के भाई अथवा बहिन का कोई पारंपरिक वंशज । ' ।
धारा 295 का संशोधन ।
80. आय-कर अधिनियम की धारा 295 की उपधारा ( 2 ) के खंड ( ज ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड 1 जून, 2015 से अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" ( जक ) धारा 90 या धारा 90क या धारा 91 के अधीन अधिनियम के अधीन संदेय आय - कर के प्रति, भारत के बाहर किसी देश या विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्र में संदत्त किसी आय- कर की, यथास्थिति, राहत देने याकटौती करने की प्रक्रिया; " ।
धन-कर
1957 के
81. धन -कर अधिनियम की धारा 3 की उपधारा ( 2 ) में, " 1 अप्रैल , 1993 से" अंकों और शब्दों के पश्चात्, " किंतु 1 अप्रैल, 2016 के पूर्व " शब्द और अंक, 1 अप्रैल, 2016 से अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
अधिनियम संख्यांक
27 का संशोधन ।
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
121
अध्याय 4
अप्रत्यक्ष कर
सीमाशुल्क
1962का 52
82. सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् सीमाशुल्क अधिनियम कहा गया है) की धारा 28 का धारा 28 में,- संशोधन ।
(क) उपधारा ( 2 ) में , निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" परंतु जहां उपधारा ( 1 ) के खंड ( क ) के अधीन सूचना की तामील की गई है और उचित अधिकारी की यह राय है कि, यथास्थिति, धारा 28 कक के अधीन शुल्क की रकम उस पर संदेय ब्याज सहित या सूचना में यथाविनिर्दिष्ट ब्याज की रकम, सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर पूर्णतया संदत्त कर दी गई है, वहां कोई शास्ति उद्गृहीत नहीं की जाएगी और ऐसे व्यक्ति या अन्यव्यक्तियों के विरुद्ध जिनको उपधारा ( 1 ) के खंड ( क ) के अधीन उक्त सूचना की तामील कीगईहै , कार्यवाहियां समाप्त हुई समझी जाएंगी । " ;
(ख) उपधारा ( 5 ) में, " पच्चीस प्रतिशत " शब्दों के स्थान पर, " पंद्रह प्रतिशत " शब्द रखे जाएंगे ;
(ग ) स्पष्टीकरण 2 के पश्चात् निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" स्पष्टीकरण शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि अननुग्रहण , कम उग्रहण , असंदाय , कम संदाय या भूल से प्रतिदाय के किसी मामले के संबंध में , जहां हेतुक दर्शित करने संबंधी सूचना, यथास्थिति, उपधारा ( 1 ) या उपधारा ( 4 ) के अधीन जारी की गई है किंतु उपधारा ( 8 ) के अधीन शुल्क का अवधारण करने संबंधी आदेश उस तारीख के पूर्व, जिसको वित्त विधेयक, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, पारित नहीं किया गया है, कार्यवाहियां धारा 135 , धारा 135क और धारा 140 के उपबंधों पर, जैसे लागू हों, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना समाप्त हुई समझी जाएंगी , यदि, यथास्थिति, उपधारा ( 2 ) के परंतुक या उपधारा ( 5 ) के अधीन शुल्क, ब्याज और शास्ति को उस तारीख से, जिसको ऐसी अनुमति प्राप्त होती है, तीस दिन के भीतर पूर्णतया संदत्त कर दिया जाता है । " ।
धारा 112 का संशोधन ।
83. सीमाशुल्क अधिनियम की धारा 112 के खंड ( ख ) में, उपखंड ( ii) के स्थान पर, निम्नलिखित उपखंड रखा जाएगा , अर्थात्ः-
" (ii) प्रतिषिद्ध माल से भिन्न ऐसे शुल्क्य माल की दशा में, ऐसी शास्ति का दायी होगा , जो धारा 114क के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे शुल्क के, जिसका अपवंचन किए जाने का प्रयास किया गया है, दस प्रतिशत से अनधिक होगी या पांच हजार रुपए होगी, इनमें से जो भी अधिक होः
परंतु जहां धारा 28 की उपधारा ( 8 ) के अधीन यथा अवधारित ऐसा शुल्क और धारा 28 कक के अधीन उस पर संदेय ब्याज ऐसे शुल्क का अवधारण करने वाले उचित अधिकारी के आदेश के संसूचित किए जाने की तारीख से तीस दिन के भीतर संदत्त कर दिया जाता है, वहां ऐसे व्यक्ति द्वारा इस धारा के अधीन संदत्त किए जाने के लिए दायी शास्ति की रकम इस प्रकार अवधारित शास्ति का पच्चीस प्रतिशत होगी;" ।
84. सीमाशुल्क अधिनियम की धारा 114 के खंड (ii) के स्थान पर, निम्नलिखित रखा जाएगा, अर्थात्ः- धारा 114 का संशोधन ।
" ( ii ) प्रतिषिद्ध माल से भिन्न शुल्क्य माल की दशा में, ऐसी शास्ति का दायी होगा जो धारा 114क [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
122
के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे शुल्क के, जिसका अपवंचन करने का प्रयास किया गया है, दस प्रतिशत से अनधिक होगी या पांच हजार रुपए होगी , इनमें से जो भी अधिक होः
परंतु जहां धारा 28 की उपधारा (8 ) के अधीन यथा अवधारित ऐसा शुल्क और धारा 28 कक के अधीन उस पर संदेय ब्याज ऐसे शुल्क का अवधारण करने वाले उचित अधिकारी के आदेश के संसूचित किए जाने की तारीख से तीस दिन के भीतर संदत्त कर दिया जाता है, वहां ऐसे व्यक्ति द्वारा इस धारा के अधीन संदत्त किए जाने के लिए दायी शास्ति की रकम इस प्रकार अवधारित शास्ति का पच्चीस प्रतिशत होगी;" ।
धारा 127क का संशोधन ।
85. सीमाशुल्क अधिनियम की धारा 127क के खंड (ख ) के परंतुक में " यथास्थिति, किसी अपील या पुनरीक्षण में " शब्दों का लोप किया जाएगा ।
86. सीमाशुल्क अधिनियम की धारा 127ख की उपधारा ( 1 क ) का लोप किया जाएगा ।
धारा 127ख का संशोधन ।
87. सीमाशुल्क अधिनियम की धारा 127 ग की उपधारा ( 6 ) का लोप किया जाएगा ।
धारा 127 ग का संशोधन ।
88. सीमाशुल्क अधिनियम की धारा 127ङ का लोप किया जाएगा ।
धारा 127 ङका संशोधन ।
89. सीमाशुल्क अधिनियम की धारा 127ज की उपधारा ( 1 ) के स्पष्टीकरण का लोप किया जाएगा ।
धारा 127ज का संशोधन ।
90. सीमाशुल्क अधिनियम की धारा 127 ठ की उपधारा ( 1 ) में,-
धारा 127 ठ का संशोधन ।
2007 का 22 (क) खंड ( i ) में, " धारा 127 ग की उपधारा (7 ) जैसी वह वित्त अधिनियम, 2007 की धारा 102 के प्रारंभ से ठीक पूर्व विद्यमान थी, या धारा 127 ग की उपधारा ( 5 ) के अधीन पारित " शब्दों, अंकों, अक्षर और कोष्ठकों का लोप किया जाएगा;
2007 का 22 (ख) खंड (ii) में " उक्त उपधारा ( 7 ) , जैसी वह वित्त अधिनियम, 2007 की धारा 122 के प्रारंभ सेठीक पूर्व विद्यमान थी, या धारा 127ग की उपधारा ( 5 ) के अधीन " शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षर कालोप किया जाएगा ।
सीमाशुल्क टैरिफ
1975 का 51 पहली अनुसूची कासंशोधन ।
91. सीमाशुल्क टैरिफ अधिनियम, 1975 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् सीमाशुल्क टैरिफ अधिनियम कहा गया है ) में, पहली अनुसूची का दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट रीति से संशोधन किया जाएगा ।
केन्द्रीय उत्पाद शुल्क
1944 का 1 धारा 3क का संशोधन ।
92. केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम कहा गया है ) की धारा 3 क के स्पष्टीकरण 2 के पश्चात् निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" स्पष्टीकरण 3 उपधारा ( 2 ) और उपधारा ( 3 ) के प्रयोजनों के लिए " कारक " शब्द के अंतर्गत" कारक आते हैं " भी है ।
93. केन्द्रीय उत्पाद- शुल्क अधिनियम की धारा 11 क में,-
धारा 11 क का संशोधन ।
(i ) उपधारा ( 5 ) , उपधारा ( 6 ) और उपधारा ( 7 ) का लोप किया जाएगा;
(ii) उपधारा ( 7क ) , उपधारा ( 8 ) और उपधारा ( 11 ) के खंड ( ख ) में " या उपधारा ( 5 ) " शब्दों, कोष्ठकों और अंक का, जहां - कहीं वे आते हैं, लोप किया जाएगा;
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
123
( iii ) स्पष्टीकरण 1 में ,-
(अ) खंड ( ख ) के उपखंड (ii) में, " नियत तारीख को " शब्दों का लोप किया जाएगा;
(आ) उपखंड (v) के पश्चात्, निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" (vi ) उस दशा में जहां केवल ब्याज की वसूली की जानी है, शुल्क के संदाय की ऐसी तारीख जिससे ऐसा ब्याज संबंधित है । ";
( इ) खंड ( ग ) का लोप किया जाएगा;
(iv) उपधारा ( 15 ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" ( 16 ) इस धारा के उपबंध उस मामले को लागू नहीं होंगे जिनमें ऐसे शुल्क के दायित्व का, जिसकासंदाय नहीं किया गया है या कम संदाय किया गया है, स्वतः निर्धारण किया गया है और निर्धारिती द्वारा फाइल की गई कालिक विवरणियों में उसके द्वारा संदेय शुल्क के रूप में घोषित किया गया है और ऐसे मामले में शुल्क के असंदाय या कम संदाय की वसूली ऐसी रीति में की जाएगी, जो विहित की जाए । " ।
(v) स्पष्टीकरण 2 के स्थान पर, निम्नलिखित स्पष्टीकरण रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" स्पष्टीकरण 2- शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि जहां उस तारीख से पहले जिसको वित्त विधेयक, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है कोई हेतुक दर्शित करने संबंधी सूचना जारी नहीं की गई है, वहां कोई उद्ग्रहण न किया जाना , कम उद्ग्रहण किया जाना, असंदाय , कम संदाय या भूल से प्रतिदाय किया जाना , वित्त अधिनियम , 2015 द्वारा यथा संशोधित धारा 11 क के उपबंधों द्वारा शासित होगा । " ।
94. केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 11 कग के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी ,
अर्थात्ः-
धारा 11 कग के स्थान पर नई धारा काप्रतिस्थापन ।
11 कग. ( 1 ) उद्ग्रहण न किए जाने या कम उद्ग्रहण किए जाने या संदाय न किए जाने या कम संदाय किए जाने या भूल से प्रतिदाय किए जाने के लिए शास्ति की रकम निम्नानुसार होगी , अर्थात्ः-
कतिपय मामलों में शुल्क के कम उग्रहण या उद्ग्रहण न किए जाने के लिए शास्ति।
(क) जहां कोई उत्पाद शुल्क कपट या दुरभिसंधि या जानबूझकर किए गए किसी मिथ्या कथन या तथ्यों को छिपाने या शुल्क के संदाय से बचने के आशय से इस अधिनियम अथवा इसके अधीन बनाए गए नियमों के किसी उपबंध के उल्लंघन से भिन्न किसी कारण से उद्गृहीत नहीं किया गया है या संदत्त नहीं किया गया है या कम उद्गृहीत किया गया है या कम संदत्त किया गया या उसका भूल से प्रतिदाय किया गया है , वहां वह व्यक्ति, जो धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन यथा अवधारित शुल्क का संदाय करने के लिए दायी है, इस प्रकार अवधारित शुल्क के दस प्रतिशत से अनधिक शास्ति या पांच हजार रुपए का, इनमें से जो भी अधिक हो, संदाय करने के लिए भी दायीहोगा:
परंतु जहां धारा 11 कक के अधीन संदेय ऐसे शुल्क और ब्याज का हेतुक दर्शित करने वाली सूचना जारी किए जाने के पूर्व या हेतुक दर्शित करने वाली सूचना के जारी किए जाने के तीस दिन के भीतर संदाय कर दिया जाता है, वहां शुल्क का संदाय करने के लिए दायी व्यक्ति द्वारा या ऐसे व्यक्ति द्वारा , जिसने शुल्क का संदाय कर दिया है, कोई शास्ति संदेय नहीं होगी और उक्त शुल्क और ब्याज के संबंध में सभी कार्यवाहियां समाप्त हुई समझी जाएंगी;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
124
(ख) जहां खंड ( क ) में निर्दिष्ट संव्यवहारों के संबंध में धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन यथा अवधारित किसी शुल्क और धारा 11 कक के अधीन उस पर संदेय ब्याज का , ऐसे केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिकारी के, जिसने ऐसे शुल्क को अवधारित किया है, आदेश की संसूचना की तारीख से तीस दिन के भीतर संदाय किया जाता है, वहां ऐसे व्यक्ति द्वारा संदत्त किए जाने के लिए दायित्वाधीन शास्ति की रकम इस शर्त के अधीन रहते हुए कि ऐसी कम की गई शास्तिका भी इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर संदाय कर दिया गया है, अधिरोपित शास्तिका पच्चीस प्रतिशत होगी;
(ग ) जहां कोई उत्पाद शुल्क कपट या दुरभिसंधि या जानबूझकर किए गए किसी मिथ्या कथन या तथ्यों को छिपाने या शुल्क के संदाय से बचने के आशय से इस अधिनियम अथवा इसके अधीन बनाए गए नियमों के किसी उपबंध का उल्लंघन करने के कारण उद्गृहीत नहीं किया गया हैया संदत्त नहीं किया गया है या कम उद्गृहीत किया गया है या कम संदत्त किया गया है या उसका भूल से प्रतिदाय किया गया है, वहां वह व्यक्ति, जो धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन यथा अवधारित शुल्क का संदाय करने के लिए दायी है, इस प्रकार अवधारित शुल्क के बराबर शास्ति का संदाय करने के लिए भी दायी होगाः
परंतु जहां ऐसे मामलों के संबंध में , जहां ऐसे संव्यवहारों से संबंधित ब्यौरे 8 अप्रैल, 2011 से आरंभ होने वाली और उस तारीख तक की, जिसको वित्त विधेयक, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है ( इसमें दोनों दिन सम्मिलित हैं ) , अवधि के लिए विनिर्दिष्ट अभिलेख में लेखबद्ध किए जाते हैं, वहां शास्ति इस प्रकार अवधारित शुल्क का पचास प्रतिशत होगी;
(घ) जहां ऐसे किसी शुल्क का, जिसकी खंड ( ग ) में निर्दिष्ट संव्यवहारों की बाबत जारी कीगई हेतुक दर्शित करने वाली किसी सूचना में मांग की गई है और धारा 11 कक के अधीन उस पर संदेय ब्याज का हेतुक दर्शित करने वाली सूचना की संसूचना के तीस दिन के भीतर संदाय कर दिया जाता है, वहां ऐसी शास्ति की रकम , जिसका वह व्यक्ति संदाय करने का दायी है, इस शर्त के अधीन रहते हुए कि ऐसी कम की गई शास्ति का भी इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर संदाय करदिया गया है। मांग किए गए शुल्क का पन्द्रह प्रतिशत होगी और उक्त शुल्क, ब्याज और शास्ति के संबंध में सभी कार्यवाहियां समाप्त हुई समझी जाएंगी;
(ङ) जहां खंड ( ग ) में निर्दिष्ट संव्यवहारों के संबंध में धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन यथा अवधारित किसी शुल्क और धारा 11 कक के अधीन उस पर संदेय ब्याज का ऐसे केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिकारी के, जिसने ऐसे शुल्क को अवधारित किया है, आदेश की संसूचना की तारीख के तीस दिन के भीतर संदाय किया जाता है, वहां ऐसे व्यक्ति द्वारा संदत्त किए जाने के लिए दायित्वाधीन शास्ति की रकम इस शर्त के अधीन रहते हुए कि ऐसी कम की गई शास्तिका भी इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर संदाय कर दिया गया है अधिरोपित शास्ति का पच्चीस प्रतिशत होगी ।
(2) जहां अपील प्राधिकारी या अधिकरण या न्यायालय धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिकारी द्वारा अवधारित उत्पाद शुल्क की रकम को उपांतरित करता है वहां उपधारा ( 1 ) के खंड ( ग ) के अधीन संदेय शास्ति और धारा 11 कक के अधीन संदेय ब्याज तदनुसार उपांतरित हो जाएगा और इस प्रकार उपांतरित उत्पाद शुल्क की रकम को हिसाब में लेने के पश्चात्वह व्यक्ति, जो धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन यथा अवधारित शुल्क का संदाय करने के लिए दायी है, इस प्रकार उपांतरित शास्ति और ब्याज की ऐसी रकम का संदाय करने का भी दायी होगा ।
( 3 ) जहां शुल्क या शास्ति की रकम अपील प्राधिकारी या अधिकरण या न्यायालय द्वारा केन्द्रीय उत्पाद- शुल्क अधिकारी द्वारा धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन अवधारित रकम से और अधिक भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
125
बढ़ाई जाती है वहां उस समय की, जिसके भीतर उपधारा ( 1 ) के खंड ( ख ) या खंड ( ङ) के अधीन ब्याज और कम की गई शास्ति संदेय है, संगणना ऐसी वर्धित रकम के संबंध में अपील प्राधिकारी या अधिकरण या न्यायालय के आदेश की तारीख से की जाएगी ।
स्पष्टीकरण 1- शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि
( i ) उद्ग्रहण न किए जाने, कम उद्ग्रहण किए जाने, संदाय न किए जाने, कम संदाय किए जाने या भूल से प्रतिदाय किए जाने का कोई ऐसा मामला, जहां उस तारीख से, जिसको वित्त अधिनियम, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, पूर्व कोई हेतुक दर्शित करने संबंधी सूचना जारी नहीं की गई है, वित्त अधिनियम, 2015 द्वारा यथासंशोधित धारा 11 कग के उपबंधों द्वारा शासितहोगा;
( ii ) उग्रहण न किए जाने , कम उग्रहण किए जाने, संदाय न किए जाने, कम संदाय किए जाने या भूल से प्रतिदाय किए जाने का कोई ऐसा मामला, जहां हेतुक दर्शित करने संबंधी सूचना जारी की गई है किन्तु धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन शुल्क का अवधारण करने संबंधी आदेश उस तारीख से, जिसको वित्त अधिनियम , 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है , पूर्व पारित नहीं किया गया है, उपधारा ( 1 ) के खंड ( क ) के परंतुक के अधीन शुल्क और ब्याज का संदाय करने पर या उपधारा ( 1 ) के खंड ( घ ) के अधीन शुल्क, ब्याज और शास्ति का संदाय करने पर इस शर्त के अधीन रहते हुए कि, यथास्थिति, शुल्क, ब्याज और शास्ति का संदाय उस तारीख से, जिसको वित्त अधिनियम, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, तीस दिन के भीतर कर दिया गया है , कार्यवाहियां बंद किए जाने का पात्र होगा;
( iii ) उद्ग्रहण न किए जाने, कम उद्ग्रहण किए जाने, संदाय न किए जाने , कम संदाय किए जाने या भूल से प्रतिदाय किए जाने का कोई ऐसा मामला, जहां धारा 11 क की उपधारा ( 10 ) के अधीन शुल्क का अवधारण करने संबंधी आदेश उस तारीख के, जिसको वित्त अधिनियम, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, पश्चात् पारित किया जाता है , उपधारा ( 1 ) के खंड ( ख ) या खंड (ङ) के अधीन कम की गई शास्ति का इस शर्त के अधीन रहते हुए कि शुल्क, ब्याज और शास्ति का संदाय आदेश की संसूचना की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर कर दिया गया है , संदाय करने कापात्र होगा ।
स्पष्टीकरण 2- इस धारा के प्रयोजनों के लिए " विनिर्दिष्ट अभिलेख " पद से ऐसे अभिलेख अभिप्रेत हैं जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अनुसार शुल्क से प्रभार्य व्यक्ति द्वारा रखे गए हैं और इसके अंतर्गत कम्प्यूटरीकृत अभिलेख भी हैं । ' ।
धारा 31 का संशोधन ।
95. केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 31 के खंड (ग ) के परंतुक में " यथास्थिति, किसी अपील या पुनरीक्षण में " शब्दों का लोप किया जाएगा ।
96. केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 32 की उपधारा ( 3 ) के परंतुक का लोप किया जाएगा। धारा 32 का संशोधन ।
97. केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 32 ख में, " यथास्थिति, उपाध्यक्ष या उपाध्यक्षों में से ऐसा कोई एक उपाध्यक्ष" शब्दों के स्थान पर, दोनों स्थानों पर जहां वे आते हैं, " उपाध्यक्ष या सदस्य " शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 32 ख का संशोधन ।
98. केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 32ङकी उपधारा ( 1क ) का लोप किया जाएगा ।
धारा 32ङका संशोधन।
धारा 32 च का संशोधन ।
99. केंद्रीय उत्पाद- शुल्क अधिनियम की धारा 32च की उपधारा ( 6 ) में " 31 मई, 2007 को या उससे पूर्व फाइल किए गए आवेदन की बाबत 29 फरवरी , 2008 के पश्चात् और 1 जून, 2007 को या उसके पश्चात् किए गए आवेदन की बाबत " शब्दों का लोप किया जाएगा ।
100. केंद्रीय उत्पाद - शुल्क अधिनियम की धारा 32ज का लोप किया जाएगा ।
धारा 32ज का लोप।
धारा 32 ट का संशोधन ।
जाएगा । 101. केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 32 ट की उपधारा ( 1 ) में, स्पष्टीकरण का लोप किया [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
126
102. केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 32 ण की उपधारा ( 1 ) में, -
धारा 32 ण का संशोधन ।
2007 का 22 (क) खंड ( i ) में, " धारा 32च की उपधारा ( 7 ) जैसी वह वित्त अधिनियम, 2007 की धारा 122
के प्रारंभ से ठीक पूर्व विद्यमान थी, या धारा 32च की उपधारा ( 5 ) के अधीन पारित " शब्दों, अंकों, अक्षरों और कोष्ठकों का लोप किया जाएगा ।
2007 का 22 (ख) खंड ( ii ) में, " उक्त उपधारा ( 7 ) , जैसी वह वित्त अधिनियम, 2007 की धारा 122 के प्रारंभ सेठीक पूर्व विद्यमान थी, या धारा 32च की उपधारा ( 5 ) के अधीन शब्दों, कोष्ठकों, अंकों और अक्षर का लोप कियाजाएगा।
धारा 37 का संशोधन ।
103. केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 37 की उपधारा ( 4 ) और उपधारा ( 5 ) में , " दो हजार रुपए " शब्दों के स्थान पर, " पांच हजार रुपए " शब्द रखे जाएंगे ।
1944 का 1 104. ( 1 ) केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम कहा गया है) की धारा ऽक की उपधारा ( 1 ) के अधीन जारी की गई भारत सरकार, वित्त मंत्रालय (राजस्व विभाग ) की अधिसूचना सं० सा०का०नि० 163 ( अ ) , तारीख 17 मार्च, 2012 , तीसरी अनुसूची के स्तंभ (2) में विनिर्दिष्ट रीति से, उस अनुसूची के स्तंभ ( 3 ) में विनिर्दिष्ट तारीख से ही, और विनिर्दिष्ट तारीख तक के लिए, संशोधित हो जाएगी और भूतलक्षी रूप से संशोधित की गई समझी जाएगी ।
केन्द्रीय उत्पाद- शुल्क अधिनियमकी धारा ऽक के अधीन जारी की गईअधिसूचना कासंशोधन ।
(2 ) केंद्रीय सरकार को उपधारा ( 1 ) के प्रयोजनों के लिए, उक्त अधिसूचना को भूतलक्षी प्रभाव से संशोधित करने की शक्ति होगी और यह समझा जाएगा कि उसे उसी रूप में शक्ति प्राप्त है, मानो केंद्रीय सरकार कोकेंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 5क की उपधारा ( 1 ) के अधीन उक्त अधिसूचना का भूतलक्षी रूप से संशोधन करने की शक्ति सभी तात्विक समयों पर प्राप्त थी ।
(3 ) ऐसे सभी उत्पाद शुल्क का प्रतिदाय किया जाएगा जो संगृहीत किया गया है , किन्तु जो उस दशा में इस प्रकार संगृहीत नहीं किया गया होता , यदि उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट अधिसूचना केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 11 ख के उपबंधों के अधीन रहते हुए सभी तात्विक समयों पर प्रवृत्त होती ।
(4 ) केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 11 ख में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, केंद्रीय उत्पाद- शुल्क के प्रतिदाय के दावे के लिए उपधारा ( 3 ) के अधीन कोई आवेदन उस तारीख से, जिसको वित्त विधेयक, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, छह मास की अवधि के भीतर किया जाएगा।
तीसरी अनुसूची कासंशोधन ।
105. केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की तीसरी अनुसूची का चौथी अनुसूची में विनिर्दिष्ट रीति में संशोधन किया जाएगा ।
केंद्रीय उत्पाद शुल्क टैरिफ
1986 का 5 पहली अनुसूची कासंशोधन ।
106. केंद्रीय उत्पाद शुल्क टैरिफ अधिनियम, 1985 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् केंद्रीय उत्पाद शुल्क टैरिफ अधिनियम कहा गया है ) की पहली अनुसूची का पांचवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट रीति में संशोधन किया जाएगा ।
अध्याय 5
सेवा कर
1994 का 32 धारा 65ख का संशोधन ।
107. वित्त अधिनियम, 1994 में ( जिसे इसमें इसके पश्चात् 1994 का अधिनियम कहा गया है) , अन्यथा उपबंधित के सिवाय , धारा 65ख में,-
(क) खंड ( 9 ) का उस तारीख से लोप किया जाएगा , जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे;
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
127
( ख ) खंड ( 23 ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
1982का 40
' (23 क) " चिट फंड का प्रधान " का वही अर्थ होगा जो चिट फंड अधिनियम, 1982 की धारा 2 के खंड (ञ ) में " प्रधान " पद का है; ';
( ग ) खंड ( 24 ) का उस तारीख से लोप किया जाएगा , जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे;
(घ) खंड ( 26 ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
'( 26क ) " सरकार " से केंद्रीय सरकार के विभाग , कोई राज्य सरकार और उसके विभाग तथा संघ राज्यक्षेत्र और उसके विभाग अभिप्रेत हैं, किंतु इसके अंतर्गत कोई ऐसी इकाई, चाहे वह किसी कानून द्वारा या अन्यथा सृजित की गई हो, सम्मिलित नहीं है, जिसके लेखे संविधान के अनुच्छेद 150 और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार रखे जाने अपेक्षित नहीं हैं; ' ;
(ङ) खंड ( 31 ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
1998 का 17
' ( 31क) " लाटरी वितरक या विक्रय अभिकर्ता " से किसी राज्य द्वारा , लाटरी (विनियमन) अधिनियम, 1998 के उपबंधों के अनुसार उस राज्य द्वारा किसी भी रीति से आयोजित किसी भी प्रकार की लाटरी के संवर्धन, विपणन, विक्रय या आयोजनों को सुकर बनाने के प्रयोजनों के लिए नियुक्तया प्राधिकृत कोई व्यक्ति अभिप्रेत है; ' ;
(च) खंड (40 ) में, " मानव उपभोग के लिए एल्कोहली लिकर " शब्दों का उस तारीख से लोप किया जाएगा , जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे;
(छ) खंड ( 44 ) में, स्पष्टीकरण 2 के स्थान पर, निम्नलिखित स्पष्टीकरण रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" स्पष्टीकरण 2-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, " धन या अनुयोज्य दावे के संव्यवहार " पद के अंतर्गत निम्नलिखित नहीं आएंगे ,-
( i ) धन के प्रयोग या एक स्वरूप , करेंसी या अंकित मूल्य से किसी दूसरे स्वरूप, करेंसी या अंकित मूल्य में नकद या किसी अन्य ढंग से उसके संपरिवर्तन से संबंधित कोई ऐसा क्रियाकलाप , जिसके लिए कोई पृथक् प्रतिफल प्रभारित किया जाता है;
( ii ) धन या अनुयोज्य दावे के किसी संव्यवहार के संबंध में या उसे सुकर बनाने के लिए प्रतिफलार्थ किया गया कोई क्रियाकलाप , जिसके अंतर्गत,-
(क) लाटरी वितरक या विक्रय अभिकर्ता द्वारा लाटरी के संवर्धन, विपणन, आयोजन, विक्रय या किसी प्रकार की लाटरी के आयोजन को किसी अन्य रीति से सुकर बनाने के संबंध में किया गया क्रियाकलाप;
(ख) किसी रीति में किसी चिट का संचालन या आयोजन करने के लिए चिटफंड के किसी प्रधान द्वारा किया गया क्रियाकलाप,
भीहै ।";
(ज) खंड ( 49 ) का उस तारीख से लोप किया जाएगा, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , नियत करे ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
128
धारा 66ख का संशोधन ।
108. 1994 के अधिनियम की धारा 66 ख में, उस तारीख से, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , नियत करे, " बारह प्रतिशत " शब्दों के स्थान पर, " चौदह प्रतिशत " शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 66 घ का संशोधन ।
109. 1994 के अधिनियम की धारा 66 घ में , उस तारीख से, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे,-
( 1 ) खंड ( क ) के उपखंड ( iv ) में, " सहायक सेवाएं " शब्दों के स्थान पर, " कोई सेवा " शब्द रखे जाएंगे;
( 2 ) खंड (च ) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" (च ) किसी संक्रिया के, जो माल के निर्माण या उत्पादन की कोटि में आती है, मानव उपभोग के लिए एल्कोहली लिकर को छोड़कर, क्रियान्वयन के रूप में सेवाएं; ";
(3) खंड (झ ) में , निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
'स्पष्टीकरण इस खंड के प्रयोजनों के लिए, " दांव , द्यूत या लाटरी " पद के अंतर्गत धारा 65ख के खंड ( 44 ) के स्पष्टीकरण 2 में विनिर्दिष्ट क्रियाकलाप सम्मिलित नहीं होगा;" ;
(4) खंड ( ञ) का लोप किया जाएगा ।
धारा 66च का संशोधन ।
110. 1994 के अधिनियम की धारा 66च की उपधारा ( 1 ) में, निम्नलिखित दृष्टांत अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
' दृष्टयंत
" भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सेवाओं में " जो धारा 66 घ के खंड ( 10 ) के अर्थान्तर्गत मुख्य सेवा है, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उपलब्ध मुख्य सेवा के प्रति निर्देश करती हैं, किंतु इनके अंतर्गत किसी बैंक द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक को उपलब्ध कराई गई या उपलब्ध कराई जाने के लिए करार पाई गई अभिकरण संबंधी सेवा नहीं आती है । भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपनी मुख्य सेवा उपलब्ध करवाने के लिए प्रयुक्त ऐसी अभिकरण संबंधी सेवा , जो निवेश सेवा है, जिसके लिए प्रतिफल अभिकर्ता बैंक द्वारा प्राप्त फीस या कमीशन या किसी अन्य रकम के रूप में है, धारा 66 घ में की नकारात्मक सूची के खंड ( ख ) में की मुख्य सेवा में सम्मिलित किए जाने के आधार पर सेवा कर के उद्ग्रहण से अपवर्जित नहीं होगी और इस प्रकार ऐसी सेवा पर सेवा कर उग्रहणीय है ।
धारा 67 का संशोधन ।
111. 1994 के अधिनियम की धारा 67 के स्पष्टीकरण में, खंड ( क ) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्ः-
'(क) " प्रतिफल " के अंतर्गत,-
(i ) कोई ऐसी रकम, जो उपलब्ध कराई गई या उपलब्ध कराई जाने वाली कराधेय सेवाओं के लिए संदेय है;
( ii ) ऐसी परिस्थितियों के सिवाय और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, कोई कराधेय सेवा उपलब्ध कराने के या उपलब्ध कराने का करार करने के अनुक्रम में ऐसे सेवा प्रदाता द्वारा उपगत और प्रभारित कोई प्रतिपूर्ति योग्य व्यय या लागत;
(iii ) लाटरी वितरक या विक्रय अभिकर्ता द्वारा , लाटरी टिकट की सकल विक्रय रकम से, यथास्थिति, फीस या कमीशन, यदि कोई हो, या प्राप्त छूट अर्थात् लाटरी टिकट के अंकित मूल्य और ऐसी कीमत , जिस पर वितरक या विक्रय अभिकर्ता ऐसा टिकट प्राप्त करता है, के बीच के अंतर के अतिरिक्त प्रतिधारित कोई रकम । ' ।
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
129
112. 1994 के अधिनियम की धारा 73 में,-
धारा 73 का संशोधन ।
(i ) उपधारा ( 1 क ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" ( 1ख ) उपधारा ( 1 ) में किसी बात के होते हुए भी, उस दशा में, जहां धारा 70 की उपधारा ( 1 ) के अधीन दी गई विवरणी में संदेय सेवा कर की रकम का स्वतः निर्धारण किया गया है किन्तु उसका पूर्णरूप से या भागतः संदाय नहीं किया गया है, वहां उसको उपधारा ( 1 ) के अधीन सूचना की तामील के बगैर धारा 87 में विनिर्दिष्ट रीतियों में से किसी रीति से उस पर ब्याज के साथ वसूल किया जाएगा।" ;
(ii) उपधारा ( 4क) का लोप किया जाएगा ।
113. 1994 के अधिनियम की धारा 76 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी , अर्थात्ः-
धारा 76 के स्थान पर नई धारा का प्रतिस्थापन ।
सेवा कर का संदाय करने में असफलता के लिएशास्ति ।
" 76. ( 1 ) जहां सेवा कर के संदाय के अपवंचन के आशय से कोई सेवा कर कपट या दुरभिसंधि या जानबूझकर किए गए मिथ्या कथन या तथ्यों को छिपाने या इस अध्याय या उसके अधीन बनाए गए नियमों के किन्हीं उपबंधों के उल्लंघन से भिन्न किसी कारण से उद्गृहीत नहीं किया गया है या संदत्त नहीं किया गया है या कम उद्गृहीत किया गया है या कम संदत्त किया गया है या भूलवश उसका प्रतिदाय किया गयाहै वहां ऐसा व्यक्ति, जिस पर धारा 73 की उपधारा ( 1 ) के अधीन सूचना की तामील की गई है, सूचना में विनिर्दिष्ट सेवा कर और ब्याज के अतिरिक्त ऐसी शास्ति का संदाय करने का भी दायी होगा जो ऐसी सेवा कर की रकम के दस प्रतिशत से अधिक नहीं होगी:
परंतु जहां सेवा कर और ब्याज-
(i ) धारा 73 की उपधारा ( 1 ) के अधीन सूचना की तामील होने की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर संदत्त कर दिया जाता है वहां कोई शास्ति संदेय नहीं होगी और ऐसे सेवा कर और ब्याज के संबंध में कार्यवाहियों को समाप्त हुआ समझा जाएगा;
(ii) धारा 73 की उपधारा ( 2 ) के अधीन सेवा कर की रकम का अवधारण करने वाले केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिकारी के आदेश की प्राप्ति से तीस दिन की अवधि के भीतर संदत्त कर दिया जाता है वहां यदि ऐसी घटाई गई शास्ति का भी ऐसी अवधि के भीतर संदाय कर दिया जाता है तो संदेय शास्ति उस आदेश में अधिरोपित शास्ति का पच्चीस प्रतिशत होगी ।
( 2 ) जहां, यथास्थिति, आयुक्त ( अपील ) , अपील अधिकरण या न्यायालय द्वारा शास्ति की रकम को, धारा 73 की उपधारा ( 2 ) के अधीन यथा अवधारित रकम से अधिक बढ़ा दिया जाता है, वहां ऐसे समय की जिसके भीतर शास्ति की बढ़ाई गई ऐसी रकम के संबंध में उपधारा ( 1 ) के परंतुक के खंड (ii) के अधीन घटाई गई शास्ति संदेय है, संगणना , यथास्थिति, आयुक्त ( अपील ) , अपील अधिकरण या न्यायालय के आदेश की तारीख से की जाएगी । " ।
114. 1994 के अधिनियम की धारा 78 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी, अर्थात्ः-
धारा 78 के स्थान पर नई धारा का प्रतिस्थापन ।
कारण सेवा कर कासंदाय करने में असफलता के कपट आदि के लिए शास्ति ।
" 78. ( 1 ) जहां सेवा कर के संदाय के अपवंचन के आशय से कोई सेवा कर कपट या दुरभिसंधि या जानबूझकर किए गए मिथ्या कथन या तथ्यों को छिपाने या इस अध्याय या उसके अधीन बनाए गए नियमों के किन्हीं उपबंधों के उल्लंघन के कारण उद्गृहीत नहीं किया गया है या संदत्त नहीं किया गया है या कम उद्गृहीत किया गया है या कम संदत्त किया गया है या भूलवश उसका प्रतिदाय किया गया है वहां ऐसा व्यक्ति, जिस पर धारा 73 की उपधारा ( 1 ) के अधीन सूचना की तामील की गई है, सूचना में विनिर्दिष्ट सेवा कर और ब्याज के अतिरिक्त ऐसी शास्ति का संदाय करने का भी दायी होगा जो ऐसी सेवा कर की रकम के शत प्रतिशत बराबर होगी:
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
130
परंतु ऐसे मामलों के संबंध में, ऐसे संव्यवहारों से संबंधित ब्यौरे 8 अप्रैल , 2011 से आरंभ होने वाली और उस तारीख तक ही, जिसको वित्त विधेयक, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है ( जिसमें दोनों दिन सम्मिलित हैं ) अवधि के लिए विनिर्दिष्ट अभिलेख में लेखबद्ध किए जाते हैं, शास्ति इस प्रकार अवधारित सेवा कर का पचास प्रतिशत होगी:
परंतु यह और कि जहां ऐसा सेवा कर और ब्याज,-
(i ) धारा 73 की उपधारा ( 1 ) के परंतुक के अधीन सूचना की तामील होने की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर संदत्त कर दिया जाता है वहां संदेय शास्ति ऐसे सेवा कर का पन्द्रह प्रतिशत होगी और ऐसे सेवा कर , ब्याज और शास्ति के संबंध में कार्यवाहियों को समाप्त हुआ समझा जाएगा;
(ii) धारा 73 की उपधारा ( 2 ) के अधीन सेवा कर की रकम का अवधारण करने वाले केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिकारी के आदेश की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर संदत्त कर दिया जाता है, वहां संदेय शास्ति इस प्रकार अवधारित सेवा कर का पच्चीस प्रतिशत होगी:
परंतु यह भी कि दूसरे परंतुक के अधीन कम की गई शास्ति का फायदा केवल तभी उपलब्ध होगा यदि ऐसी कम की गई शास्ति की रकम का भी ऐसी अवधि के भीतर संदाय कर दिया जाता है ।
स्पष्टीकरण इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, " विनिर्दिष्ट अभिलेख " से ऐसे अभिलेख अभिप्रेत हैं जिनके अंतर्गत ऐसा कम्प्यूटरीकृत डाटा सम्मिलित है जिनको तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अनुसार किसी निर्धारिती द्वारा बनाए रखा जाना अपेक्षित है या जहां ऐसी कोई अपेक्षा नहीं हैं वहां निर्धारिती द्वारा अभिलिखित बीजकों को निर्धारिती द्वारा लेखा पुस्तकों में विनिर्दिष्ट अभिलेख माना जाएगा ।
(2 ) जहां, यथास्थिति, आयुक्त ( अपील ) , अपील अधिकरण या न्यायालय, धारा 73 की उपधारा (2 ) के अधीन अवधारित सेवा कर की रकम को उपांतरित करता है, वहां उपधारा ( 1 ) के अधीन संदेय शास्तिकी रकम और धारा 75 के अधीन उस पर संदेय ब्याज तद्नुसार उपांतरित हो जाएगा और इस प्रकार उपांतरित सेवा कर की रकम को हिसाब में लेने के पश्चात्, वह व्यक्ति, जो सेवा कर की ऐसी रकम का संदाय करने के लिए दायी है, इस प्रकार उपांतरित शास्ति और ब्याज की रकम का संदाय करने का भी दायी होगा ।
( 3 ) जहां , यथास्थिति, आयुक्त ( अपील ) , अपील अधिकरण , या न्यायालय द्वारा सेवा कर या शास्तिकी रकम को धारा 73 की उपधारा ( 2 ) के अधीन यथा अवधारित रकम से अधिक बढ़ा दिया जाता है वहां ऐसे समय की, जिसके भीतर सेवा कर की बढ़ाई गई ऐसी रकम के संबंध में उपधारा ( 1 ) के दूसरे परंतुक के खंड ( ii ) के अधीन कम की गई शास्ति संदेय है, संगणना , यथास्थिति, आयुक्त ( अपील ) , अपील अधिकरण या न्यायालय के आदेश की तारीख से की जाएगी। " ।
नई धारा 78ख का 115. 1994 के अधिनियम की धारा 78क के पश्चात्, निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी,
अन्तःस्थापन ।
अर्थात्ः-
अस्थायी उपबंध ।
" 78ख. ( 1 ) जहां , किसी मामले में,-
(क) सेवा कर का उद्ग्रहण नहीं किया गया है या संदाय नहीं किया गया है या कम उद्ग्रहण किया गया है या कम संदाय किया गया है या भूलवश प्रतिदाय किया गया है और धारा 73 की उपधारा ( 1 ) के अधीन या उसके परंतुक के अधीन उस तारीख से पूर्व, जिसको वित्त अधिनियम, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है , किसी सूचना की तामील नहीं की गई है; या
(ख ) सेवा कर का उद्ग्रहण नहीं किया गया है या संदाय नहीं किया गया है या कम उद्ग्रहण किया गया है या कम संदाय किया गया है या भूलवश प्रतिदाय किया गया है और धारा 73 की अनुभाग 1 क]
भारत का राजपत्र असाधारण
131
उपधारा ( 1 ) के अधीन या उसके परंतुक के अधीन सूचना की तामील कर दी गई है, किन्तु उस तारीख से पूर्व, जिसको वित्त अधिनियम, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, धारा 73 की उपधारा ( 2 ) के अधीन कोई आदेश पारित नहीं किया गया है,
वहां ऐसे मामलों की बाबत वित्त अधिनियम , 2015 द्वारा यथा संशोधित, यथास्थिति, धारा 76 या धारा 78 के उपबंध लागूहोंगे ।
( 2 ) ऐसे मामलों में जहां धारा 13 की उपधारा ( 1 ) के अधीन या उसके परंतुक के अधीन हेतुक दर्शित करने संबंधी सूचना जारी की गई है, किन्तु धारा 73 की उपधारा ( 2 ) के अधीन कोई आदेश उस तारीख के पूर्व, जिसको वित्त विधेयक, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, पारित नहीं किया गया है, वहां धारा 76 की उपधारा ( 1 ) के परंतुक के खंड ( i) के अधीन सेवा कर और ब्याज का संदाय करने पर या धारा 78 की उपधारा ( 1 ) के दूसरे परंतुक के खंड (i) के अधीन सेवा कर, ब्याज और शास्ति का संदाय करने पर कार्यवाहियां बंद करने के प्रयोजन के लिए तीस दिन की अवधि की संगणना उस तारीख से कीजाएगी जिसको वित्त विधेयक, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है । " ।
धारा 80 का लोप ।
116. 1994 के अधिनियम की धारा 80 का लोप किया जाएगा ।
117. 1994 के अधिनियम की धारा 86 की उपधारा ( 1 ) में,-
धारा 86 का संशोधन ।
(क) " कोई निर्धारिती " शब्दों के स्थान पर, " अन्यथा उपबंधित के सिवाय कोई निर्धारिती " शब्द रखे जाएंगे;
(ख) निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
1944 का ।
" परंतु जहां किसी ऐसी सेवा से , जो निर्यात की जाती है, संबंधित कोई आदेश धारा 85 के अधीन पारित किया गया है और उसके अधीन विवाद निवेश सेवाओं पर सेवा कर के रिबेट या ऐसी सेवा उपलब्ध कराने में प्रयुक्त निवेशों पर संदत्त शुल्क का रिबेट अनुदत्त करने के संबंध में है वहां ऐसे आदेश पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की धारा 35 ङङके उपबंधों के अनुसार कार्रवाई कीजाएगी:
2012का 23
1944का 1
परंतु यह और कि पहले परंतुक के अधीन आने वाले सभी विषयों की बाबत अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई सभी अपीलें, जो वित्त अधिनियम, 2012 के प्रवृत्त होने के पश्चात्और जो उस तारीख तक , जिसको वित्त विधेयक, 2015 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, लंबित हैं, केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की धारा 35 ङङके उपबंधों के अनुसार अंतरित हो जाएगी और उन पर कार्रवाई की जाएगी । " ।
धारा 94 का संशोधन ।
118. 1994 के अधिनियम की धारा 94 की उपधारा ( 2 ) में, खंड ( कक ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" (कक) कराधेय सेवा की रकम और मूल्य का अवधारण, उसकी रीति तथा वे परिस्थितियां और शर्तें, जिनके अधीन ऐसी रकम धारा 67 के अधीन प्रतिफल नहीं होगा ;" ।
अध्याय 6
स्वच्छ भारत उपकर
स्वच्छ भारत उपकर ।
करे। 119. ( 1 ) यह अध्याय उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केंद्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत
( 2 ) स्वच्छ भारत अभिक्रमों के वित्तपोषण और संवर्धन के प्रयोजनों के लिए या उससे संबंधित किसी अन्य प्रयोजन के लिए इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार सभी या किन्हीं कराधेय सेवाओं पर ऐसी सेवाओं के मूल्य पर, सेवा कर के रूप में दो प्रतिशत की दर से स्वच्छ भारत नामक उपकर उद्गृहीत और संगृहीत किया जाएगा ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
132
1994 का 32 (3) उपधारा ( 2 ) के अधीन उद्ग्रहणीय स्वच्छ भारत उपकर, वित्त अधिनियम, 1994 के अध्याय 5 के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन ऐसी कराधेय सेवाओं पर उग्रहणीय किसी उपकर या सेवा कर के अतिरिक्त होगा ।
(4) उपधारा ( 2 ) के अधीन उद्ग्रहणीय स्वच्छ भारत उपकर के आगमों को, पहले भारत की संचित निधि में जमा किया जाएगा और केंद्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, स्वच्छ भारत उपकर की ऐसी धनराशियों का उपयोग उपधारा ( 2 ) में विनिर्दिष्ट ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो वह आवश्यक समझे, कर सकेगी ।
1994 का 32 (5) वित्त अधिनियम, 1994 के अध्याय 5 और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध , जिसके अंतर्गत कर, ब्याज के प्रतिदाय और उससे छूट तथा शास्ति के अधिरोपण से संबंधित उपबंध भी हैं, जहां तक हो सके, कराधेय सेवाओं पर स्वच्छ भारत उपकर के उद्ग्रहण और संग्रहण के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे, यथास्थिति, वित्त अधिनियम, 1994 के अध्याय 5 या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन ऐसी कराधेय सेवाओं पर कर के उद्ग्रहण और संग्रहण के संबंध में लागू होते हैं ।
अध्याय 7
वरिष्ठ नागरिक कल्याण निधि
भाग 1
प्रारंभिक
विस्तार और प्रारंभ ।
120. ( 1 ) इस अध्याय का विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(2 ) यह अध्याय उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , नियत करे ।
121. इस अध्याय में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो ,-
परिभाषाएं।
(1) " समिति" से धारा 123 के अधीन गठित अंतर-मंत्रालयीय समिति अभिप्रेत है;
(2) " पात्र ब्याज " से केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित दर पर निधि को अंतरित मूल पर ब्याज अभिप्रेत है;
(3) " वित्तीय वर्ष" से प्रत्येक वर्ष के 1 अप्रैल से प्रारंभ होने वाली और 31 मार्च को समाप्त होने वाली अवधि अभिप्रेत है;
(4) " निधि" से धारा 122 के अधीन स्थापित निधि अभिप्रेत है;
(5) " अप्रवर्तनशील खाता " से धारा 122 की उपधारा ( 2 ) द्वारा या उसके अधीन विनिर्दिष्ट स्कीमों में से किसी स्कीम के अधीन कोई खाता अभिप्रेत है और जो, यथास्थिति, यदि नियमित आधार पर प्रवर्तनयोग्य है तो तीन वर्ष की अवधि तक या यदि परिपक्वता की तारीख है तो परिपक्वता की तारीख से अप्रवर्तनशील है;
(6) " संस्था" से कोई बैंक, डाकघर या केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित कोई अन्य ऐसी संस्था अभिप्रेत है जो अदावाकृत रकम वाले अप्रवर्तनशील खाते धारित कर रही है;
(7 ) " अधिसूचना " से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(8 ) " विहित" से इस अध्याय के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(9 ) " वरिष्ठ नागरिक " से भारत का ऐसा नागरिक अभिप्रेत है जिसने साठ वर्ष या अधिक की आयु प्राप्त कर ली है;
( 10) " अदावाकृत रकम " से धारा 122 की उपधारा ( 2 ) में यथानिर्दिष्ट रकम अभिप्रेत है ।
भारत का राजपत्र असाधारण
133 अनुभाग 1 क]
भाग 2
निधि की स्थापना और प्रशासन
122. ( 1 ) केंद्रीय सरकार, " वरिष्ठ नागरिक कल्याण निधि" , नामकएक निधि की स्थापना करेगी । निधिकी स्थापना ।
(2) निम्नलिखित स्कीमों के अधीन खातों में से ऐसे किसी खाते में, जो उसे अप्रवर्तनीय घोषित किएजाने कीतारीख से सात वर्ष की अवधि तक अदावाकृत बना रहता है, जमा किसी अतिशेष को उन संबंधित संस्थाओं द्वारा जो उसे धारित कर रही हैं निधि में अंतरित कर दिया जाएगा:-
(क) ऐसी स्कीमों को लागू करने के लिए प्राधिकृत डाकघरों और बैंकों के साथ केंद्रीय सरकार की लघु बचत और अन्य बचत स्कीमें;
(ख) संस्था द्वारा अनुरक्षित लोक भविष्य निधि स्कीम, 1968 के अधीन लोक भविष्य निधि के खाते; और
(ग) ऐसे किन्हीं खातों या स्कीमों में जो केंद्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ऐसी अन्य धनराशियां ।
(3) निधिका उपयोग वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण की अभिवृद्धि के लिए और ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए, जो विहित किए जाएं किया जाएगा ।
(4) केंद्रीय सरकार, समय- समय पर निधि में पड़े धन के लिए ब्याज की पात्र दर अधिसूचित करेगी ।
123. ( 1 ) केंद्रीय सरकार, निधि के प्रशासन के लिए अधिसूचना द्वारा एक अंतर- मंत्रालयीय समिति का गठन करेगी जो अध्यक्ष और उतने अन्य सदस्यों को मिलाकर बनेगी जितने केंद्रीय सरकार नियुक्त करे।
निधि के प्रशासन के लिए समिति का गठन ।
(2) निधि के प्रशासन की रीति, समिति की बैठकों का आयोजन ऐसे नियमों के अनुसार किया जाएगा जो विहितकिए जाएं ।
( 3) समिति धारा 122 की उपधारा ( 3 ) में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों को क्रियान्वित करने के लिए निधि में से धन व्यय करने के लिए सक्षम होगी ।
दावों का संदाय ।
124. ( 1 ) ऐसा कोई व्यक्ति जो निधि को अंतरित अदावाकृत रकम का दावा करने का हकदार है, धारा 126 में यथा उपबंधित रकम के निर्वापित हो जाने के अधिकार के पूर्व किसी समय उस संबद्ध संस्था को आवेदन कर सकेगा जिसके पास शोध्य रकम मूलतः पड़ी थी या जमा थी ।
( 2 ) आवेदन करने वाले व्यक्ति पर उस रकम को जिससे आवेदन संबंधित है प्राप्त करने के अपने अधिकार को स्थापित करने का भार होगा ।
( 3 ) संस्था, यथासंभव यथाशीघ्र आवेदन पर विचार करेगी और किसी भी दशा में आवेदन की प्राप्ति के साठ दिन के भीतर पात्र ब्याज के साथ संदाय करेगी ।
जाएगी । (4) इस धारा के अधीन किसी संदाय से संस्था निधि में जमा रकम की बाबत दायित्व से उन्मोचित हो
(5) निधि में अंतरित धनराशि पर संदेय ब्याज, यदि कोई हो, केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित और अधिसूचित किया जाएगा ।
जानकारी का प्रकाशन ।
125. ( 1 ) संस्था ऐसी जानकारी प्रकाशित करेगी जो अदावाकृत रकम को निधि में जमा करने से पूर्व अदावाकृत रकम के अस्तित्व की युक्तियुक्त सूचना देने के लिए आवश्यक और पर्याप्त है ।
(2) केंद्रीय सरकार, ऐसी रीति विहित कर सकेगी जिसके द्वारा ऐसी जानकारी प्रकाशित की जाए ।
[भाग 2
भारत का राजपत्र असाधारण
134
केन्द्रीय सरकार को राजगामित्व ।
126. ( 1 ) जहां , इस अध्याय की धारा 124 में यथा विनिर्दिष्ट कोई अनुरोध या दावा निधि में अदावाकृत रकम के जमा की तारीख से पच्चीस वर्ष की अवधि के भीतर किया जाता है वहां तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, जब तक न्यायालय अन्यथा आदेश न करे, यह केंद्रीय सरकार कीराजगामी सम्पत्ति हो जाएगी ।
(2) अदावाकृत रकम का हकदार होने का दावा करने वाले किसी व्यक्ति का अधिकार उपधारा ( 1 ) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि तक बना रहेगा और उसके पश्चात् निर्वापित हो जाएगा ।
(3 ) उपधारा ( 2 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यदि किसी मामले में केंद्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसे वास्तविक कारण थे जिससे कोई व्यक्ति समय पर प्रतिदाय का दावा करने से विरत रहा है, तो वह, तथ्यों की परीक्षा पर आधारित समिति की सिफारिशों पर उसे राजगामित्व धनराशि का प्रतिदाय कर सकेगी ।
(4) केंद्रीय सरकार, निधि के प्रयोजनों के लिए निधि में राजगामित्व ऐसी धनराशि को रख सकेगी ।
भाग 3
लेखा और संपरीक्षा
127. ( 1 ) निधि, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का पूरा लेखा- जोखा देते हुए अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी और उसकी एक प्रति केंद्रीय सरकार को अग्रेषित करेगी ।
लेखाओं और संपरीक्षा की रिपोर्ट तैयारकियाजाना औरदियाजाना ।
(2 ) निधि के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर , जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, की जाएगी और संस्था द्वारा ऐसे संपरीक्षित लेखाओं की, उस पर संपरीक्षा रिपोर्ट केसाथ प्रतिवर्ष केंद्रीय सरकार को अग्रेषित किया जाएगा ।
( 3 ) केंद्रीय सरकार, वार्षिक रिपोर्ट और भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा दी गई संपरीक्षा रिपोर्ट को संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
भाग 4
प्रकीर्ण
128. ( 1 ) केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा , इस अध्याय के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
नियम बनानेकी केंद्रीय सरकार की शक्ति।
(2 ) उपधारा ( 1 ) द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना , ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे :-
(क) धारा 122 की उपधारा (2 ) के खंड ( ग ) में निर्दिष्ट ऐसी अन्य रकमें;
(ख ) धारा 122 की उपधारा ( 3 ) के अधीन प्रयोजनों के लिए निधि का उपयोग;
(ग ) धारा 123 की उपधारा ( 2 ) के अधीन निधि का प्रबंध करने के लिए समिति की संरचना;
(घ) धारा 123 की उपधारा ( 2 ) के अधीन निधि के प्रशासन की रीति और समिति की बैठकें करने सेसंबंधित प्रक्रिया;
(ङ) धारा 125 की उपधारा ( 2 ) के अधीन अदावाकृत रकम के अस्तित्व के बारे में आम जनता कोसूचना देने की रीति;
(च) कोई अन्य विषय जिसका होना अपेक्षित हो या विहित किया जाए ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
135
(3 ) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदनके समक्ष , जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
कतिपय दशाओं में छूट देने की शक्ति।
129. केंद्रीय सरकार, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, किसी अदावाकृत रकम या संस्था या अदावाकृत रकमों के वर्ग या संस्थाओं को इस अध्याय के किन्हीं या सभी उपबंधों से साधारणतया या ऐसी अवधि के लिए, जो विहित की जाए, छूट दे सकेगी ।
कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति ।
130. ( 1 ) यदि इस अध्याय के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, आदेश द्वारा ऐसी कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए कोई बात कर सकेगी जो इस अध्याय के उपबंधों से असंगत न हो:
परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अध्याय के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात्नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
अध्याय 8
प्रकीर्ण
भाग 1
अग्रिम संविदा (विनियमन ) अधिनियम, 1952 का संशोधन
131. [अ] इस भाग के उपबंध उस तारीख को प्रवृत्त होंगे जो केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस भाग के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न -भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
प्रारंभ और 1952 केअधिनियम संख्यांक 74 का संशोधन ।
1952का74
नई धारा 28क का अंतःस्थापन ।
[आ] अग्रिम संविदा ( विनियमन ) अधिनियम, 1952 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् अग्रिम संविदा अधिनियम कहा गया है ) की धारा 28 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
1956का 42
मान्यताप्राप्त संगमाँ की व्यावृत्ति ।
" 28क. ( 1 ) अग्रिम संविदा विनियमन अधिनियम के अधीन मान्यताप्राप्त सभी संगम प्रतिभूति संविदा ( विनियमन ) अधिनियम , 1956 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् प्रतिभूति संविदा अधिनियम कहा गया है ) के अधीन मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज समझे जाएंगेः
परंतु ऐसे मानित मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज तब तक जब तक उक्त मानित मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों को भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट रूप से अनुज्ञात न किया जाए, वस्तु व्युत्पन्नियों के क्रय , विक्रय या व्यौहार के कारबार में सहायता प्रदान करने, उसे विनियमित करने या नियंत्रित करने के क्रियाकलापों से भिन्न कोई क्रियाकलाप नहीं करेंगे:
परंतु यह और कि वस्तु व्युत्पन्नियों का वस्तु व्युत्पन्नियों के दलाल के रूप में क्रय करने या उनका विक्रय करने या अन्यथा व्यौहार करने वाला ऐसा व्यक्ति या ऐसा अन्य मध्यवर्ती जो वस्तु व्युत्पन्नी बाजार के साथ भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के अधिकारों और आस्तियों का ऐसा अंतरण करने और उनको उसमें निहित करने के ठीक पूर्व जिसके लिए ऐसे अंतरण पूर्व कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र आवश्यक नहीं था, सहयोजित हो ऐसे अंतरण से तीन मास की अवधि तक या यदि उसने तीन मास की उक्त अवधि के भीतर ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर दिया है तो ऐसे आवेदन का निपटारा होने तक ऐसा करना जारी रख सकेगा ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
136
(2 ) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( जिसे इसमें प्रतिभूति बोर्ड कहा गया है ) ऐसे मानित एक्सचेंजों को प्रतिभूति संविदा अधिनियम और उक्त अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं विनियमों, नियमों , मार्गदशक सिद्धांतों या वैसी ही लिखतों का अनुपालन करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध करा सकेगा ।
(3) अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन किसी मान्यताप्राप्त संगम द्वारा बनाई गई उपविधियां, परिपत्र और वैसी ही कोई लिखतें, उस तारीख से, जिसको वह अधिनियम को निरसित होता है, एक वर्ष की अवधि तक या प्रतिभूति बोर्ड द्वारा यथा अधिसूचित समय की, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, लागू बनीं रहेंगी मानो कि अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ।
(4) अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन मान्यताप्राप्त संगमों को लागू आयोग या केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए सभी नियम, निदेश , मार्गदर्शक सिद्धांत, अनुदेश , परिपत्र या वैसी ही कोई लिखतें उस तारीख से , जिसको उस अधिनियम को निरसित होता है, एक वर्ष की अवधि तक या बोर्ड द्वारा यथा अधिसूचित समय तक , इनमें से जो भी पूर्वतर हो, इस प्रकार प्रवृत्त बनी रहेंगी मानो कि अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ।
(5 ) अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन शक्तियों के अतिरिक्त, प्रतिभूति बोर्ड और केंद्रीय सरकार ऐसे मानित एक्सचेंजों पर मान्यताप्राप्त संगमों के संबंध में क्रमशः आयोग और केंद्रीय सरकार की सभी शक्तियों का प्रयोग एक वर्ष की अवधि तक इस प्रकार करेगी , मानो अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है ।" ।
132. अग्रिम संविदा अधिनियम की धारा 29 के पश्चात्, निम्नलिखित धाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी ,
अर्थात्ः-
नई धारा 29क और धारा 29ख काअंतःस्थापन ।
1952का 74 " 29क. ( 1 ) अग्रिम संविदा ( विनियमन ) अधिनियम, 1952 निरसित किया जाता है ।
निरसन और व्यावृत्ति ।
(2) अग्रिम संविदा अधिनियम के निरसन की तारीख से ही-
(क) केंद्रीय सरकार और आयोग द्वारा अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन विरचित नियम और विनियम निरसित हो जाएंगे ;
(ख) केंद्रीय सरकार द्वारा अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन स्थापित सभी प्राधिकरण और इकाइयां, जिनमें उस अधिनियम की धारा 25 के अधीन स्थापित आयोग और सलाहकार परिषद् भी सम्मिलित है, विघटित हो जाएंगी;
(ग) उपधारा ( 1 ) में निरसित अधिनियम के अधीन किए गए, प्रारंभ किए गए या जारी किए गए कोई निरीक्षण , आदेश, शास्ति, कार्यवाही या सूचना अथवा की गई कोई पुष्टि या घोषणा अथवा उपांतरित या प्रतिसंहृत कोई अनुज्ञप्ति, अनुज्ञा, प्राधिकार या छूट अथवा निष्पादित कोई दस्तावेज या लिखत अथवा दिए गए किसी निदेश सहित की गई कोई बात या कार्रवाई या किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई बात या कार्रवाई इस रूप में जारी रहेगी या प्रतिभूति बोर्ड द्वारा इस प्रकार प्रवृत्त की जाएगी , मानो वह अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है;
(घ ) ऐसे सभी अपराध और ऐसे अपराधों के संबंध में जो अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन कारित किए गए हों विद्यमान कार्यवाहियां, उस अधिनियम के उपबंधों द्वारा इस प्रकार शासित होती रहेंगी, मानो वह अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है;
भारत का राजपत्र असाधारण
137 अनुभाग 1क]
(ङ) प्रतिभूति बोर्ड द्वारा अग्रिम संविदा अधिनियम के अधीन उस तारीख से जिसको वह अधिनियम निरसित हुआ हो, तीन वर्षों की अवधि के भीतर उस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के संबंध में कोई नई कार्यवाही इस प्रकार प्रारंभ की जा सकेगी और इस प्रकार कार्यवाही चलाई जा सकेगी मानो अधिनियम निरसित ही नहीं हुआ है;
( च) खंड ( घ ) और खंड (ङ) में यथा उपबंधित के सिवाय , कोई भी न्यायालय अग्रिम
संविदा अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान उस तारीख से नहीं लेगा जिसको वह अधिनियम निरसित होता है;
1897 का 10
(छ) खंड ( घ ) , खंड ( ङ) और खंड ( च ) , इन उपधाराओं के अधीन न आने वाले विषयों पर निरसन के प्रभाव के संबंध में , साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6 के साधारणतया लागू होने पर प्रभाव डालने वाले नहीं माने जाएंगे और न ही उनके लागू होने पर प्रभाव डालेंगे ।
29ख. ( 1 ) उस तारीख को जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, उपक्रम भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को अंतरित और उसमें निहित हो जाएगा ।
आयोग के उपक्रम काअंतरण और विहित होना ।
( 2) यदि उस तारीख को, जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, उपक्रम के संबंध में आयोग के विरुद्ध कोई कार्यवाही या वाद हेतुक विद्यमान हो, तो ऐसी कार्यवाही या वाद हेतुक प्रतिभूति बोर्ड द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखा जा सकेगा तथा प्रवृत्त कराया जा सकेगा ।
(3) आयोग की उसके उपक्रम के संबंध में किसी कर, शुल्क और उपकर के संदाय की बाबत कोई फायदे और छूटें भी हैं, ऐसी रियायतें, विशेषाधिकार, फायदे और छूटें, जिनके अंतर्गत उस तारीख को जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है प्रतिभूति बोर्ड को अंतरित हो जाएंगी ।
(4) आयोग के अधीन उस तारीख के ठीक पूर्व, जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, कोई पद धारित करने वाला ऐसा प्रत्येक कर्मचारी ( आयोग के सदस्यों को छोड़कर ) , केन्द्रीय सरकार या प्रतिभूति बोर्ड में, जैसा केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचित करे, उसी सेवाधृति के लिए और सेवा के उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर धारित करेगा जिन पर वह कर्मचारी ऐसा पद तब धारण करता, यदि आयोग विघटित नहीं हुआ होताः
परंतु जहां केंद्रीय सरकार यह अधिसूचित करती है कि आयोग का कोई कर्मचारी, पूर्वगामी उपबंध के अधीन केंद्रीय सरकार का कर्मचारी बना रहेगा , वहां केंद्रीय सरकार, प्रतिभूति बोर्ड के अनुरोध पर ऐसे कर्मचारी को ऐसी अवधि के लिए, जो उस तारीख से जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, दो वर्ष से अधिक की न हो, प्रतिभूति बोर्ड में प्रतिनियुक्त कर सकेगी ।
(5) आयोग का ऐसा कर्मचारी जो उस तारीख से , जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित होता है, छह मास के भीतर, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या प्रतिभूति बोर्ड का कर्मचारी न रहने का विकल्प अपनाता है, अपना ऐसा विनिश्चय केंद्रीय सरकार या प्रतिभूति बोर्ड को जैसे लागू हो संसूचित करेगा ।
(6) किसी अन्य प्रवृत्त विधि में अंतर्विष्ट कोई बात किसी कर्मचारी को अग्रिम संविदा अधिनियम के निरसन और आयोग के पारिणामिक विघटन के कारण पद की हानि के लिए किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगी और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ऐसा कोई दावा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
(7 ) अग्रिम संविदा अधिनियम की धारा 3 के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त आयोग के सदस्य उस तारीख से जिसको अग्रिम संविदा अधिनियम निरसित किया जाता है, पद पर नहीं रहेंगे ।
(8 ) आयोग के सदस्य, अग्रिम संविदा के निरसन और आयोग के पारिणामिक विघटन के कारण या ऐसे सदस्य द्वारा आयोग के साथ की गई प्रबंध की किसी संविदा के समय पूर्व समापन के कारण , पद की हानिके लिए किसी प्रतिकर के हकदार नहीं होंगे और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ऐसा कोई दावा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
1899का 2
(9) उपक्रम का अंतरण और निहित होना, भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 के अधीन किसी स्टांप शुल्क या राज्य विधियों के अधीन लागू किन्हीं स्टांप शुल्कों के संदाय के लिए दायी नहीं होगा । " ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
138
भाग 2
प्रतिभूति संविदा ( विनियमन ) अधिनियम, 1956 का संशोधन
133. ( अ ) इस भाग के उपबंध उस तारीख को प्रवृत्त होंगे जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस भाग के भिन्न- भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न- भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
प्रारंभ और 1956के अधिनियम संख्यांक 42का संशोधन ।
1956 का 42 धारा 2 का संशोधन ।
(आ) प्रतिभूति संविदा ( विनियमन ) अधिनियम, 1956 ( जिसे इसमें इसके पश्चात्, प्रतिभूति संविदा अधिनियम कहा गया है) की धारा 2 में,-
(i ) खंड ( कग ) के उपखंड ( आ ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किए जाएंगे,
अर्थात्ः-
(ई ) वस्तु व्युत्पन्न; और
(उ) ऐसी अन्य लिखतें, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा व्युत्पन्न घोषित की जाएं; ";
(ii ) खंड ( ख ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किए जाएंगे , अर्थात्ः-
'(खख) " माल " से अनुयोज्य दावों , धन और प्रतिभूतियों से भिन्न हर प्रकार की जंगम सम्पत्ति अभिप्रेत है;
(खग) " वस्तुव्युत्पन्न " से निम्नलिखित अभिप्रेत हैं,-
(i ) ऐसे माल के परिदान की संविदा, जो केंन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचित की जाए और जो कोई तुरंत परिदान संविदा नहीं है; या
(ii ) अंतरों की संविदा , जो अपना मूल्य ऐसे अंतर्निहित माल की कीमतों या कीमतों के अक्षांकों या क्रियाकलापों , सेवाओं, अधिकारों, हितों और दशाओं, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बोर्ड के परामर्श से अधिसूचित किए जाएं, से व्युत्पन्न करती है, किंतु इसके अंतर्गत खंड ( कग ) के उपखंड ( अ ) और ( आ ) में यथानिर्दिष्ट प्रतिभूतियां नहीं हैं; ';
(iii ) खंड ( ग ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
'(गक ) " अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा " से ऐसी विनिर्दिष्ट परिदान संविदा अभिप्रेत है, जिसके अधीन या किसी परिदान आदेश, रेल प्राप्ति, लदान बिल या भांडागार प्राप्ति या उससे संबंधित किन्हीं अन्य हकदारी दस्तावेजों के अधीन अधिकार या दायित्व अंतरणीय नहीं होते; ';
(iv) खंड (ङ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
'(डक ) " तुरंत परिदान संविदा " से ऐसी संविदा अभिप्रेत है, जिसमें या तो तुरंत या संविदा कीतारीख के पश्चात्, ग्यारह दिन से अनधिक की ऐसी अवधि के भीतर और ऐसी शर्तों के अधीन, जो माल के संबंध में केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और माल के परिदान तथा उसकी कीमत के संदाय के लिए उपबंध है और ऐसी संविदा के अधीन अवधि उसके पक्षकारों की पारस्परिक समिति से या अन्यथा नहीं बढ़ाई जा सकती है:
परंतु यदि ऐसी संविदा का पालन या तो पूर्णतः या भागतः,-
(1 ) किसी ऐसी धनराशि, जो संविदा दर और निपटान दर या समाशोधन दर या किसी मुजराई संविदा की दर के बीच के अंतर के बराबर हो वसूली द्वारा; अथवा
( II ) किन्ही अन्य साधनों, जो भी हों, द्वारा ,
किया गया है और जिसके परिणामस्वरूप संविदा के अन्तर्गत आने वाले माल के वास्तविक निविदान या उसकी पूरी कीमत के संदाय से छूट दे दी गई है तो ऐसी संविदा तुरंत परिदान संविदा नहींसमझी जाएगी;';
भारत का राजपत्र असाधारण
139 अनुभाग 1क]
( v ) खंड (ज ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
' (जक) " विनिर्दिष्ट माल संविदा " से ऐसी वस्तु व्युत्पन्त्री अभिप्रेत है जिसमें भविष्य की किसी विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान विनिर्दिष्ट क्वालिटी या प्रकार के माल के ऐसी कीमत पर जो संविदा द्वारा नियत की गई है या संविदा द्वारा करार पाई गई रीति से नियत की जाने वाली है, वास्तविक परिदान के लिए उपबन्ध है और जिसमें क्रेता और विक्रेता दोनों के नाम उल्लिखित हैं; ' ;
( v) खंड (ञ ) के, पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
(ट) " अंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा " से ऐसी विनिर्दिष्ट माल संविदा अभिप्रेत है जो अनंतरणीय विनिर्दिष्ट परिदान संविदा नहीं है, और जो उसकी अंतरणीयता के बारे में ऐसी शर्तों के अधीन है , जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे; ' ।
134. प्रतिभूति संविदा अधिनियम की धारा 18 क में,-
धारा 18 क का संशोधन ।
(i ) खंड (ख ) में, " में परिनिर्धारण " शब्दों के स्थान पर " में परिनिर्धारण; या " शब्द रखे जाएंगे;
( ii ) इस प्रकार यथासंशोधित खंड ( ख ) के पश्चात् और दीर्घ पंक्ति के पूर्व, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" ( ग ) ऐसे पक्षकारों के बीच और ऐसे निबंधनों पर, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , विनिर्दिष्ट करे, " ।
135. प्रतिभूति संविदा अधिनियम की धारा 30 के पश्चात्, निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, नई धारा 30क का अंतःस्थापन ।
अर्थात्-
" 30क. ( 1 ) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई बात अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं को लागू नहींहोगी:
वस्तुव्युत्पन्नों से संबंधित विशेष उपबंध।
परंतु कोई व्यक्तिकिसी ऐसे क्षेत्र में जिसको धारा 13 के उपबंध लागू किए गए हैं, न तो ( किसी स्टॉक एक्सचेंज से भिन्न ) किसी ऐसे संगम का गठन करेगा और न उसके गठन में सहायता करेगा और न उसका सदस्य होगा, जो संविदा के दूसरे पक्षकार या उससे या संविदा में नामित किसी दूसरे पक्षकार को या उससे वास्तविक परिदान किए बिना या प्राप्त किए बिना उसके किसी पक्षकार द्वारा किसी अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदा के पालन की सुविधाएं प्रदान करता है ।
(2 ) जहां किसी क्षेत्र की बाबत, धारा 13 के उपबंध किसी माल या माल के वर्ग के क्रय या विक्रय के लिए वस्तुव्युत्पन्नों के संबंध में लागू किए गए हैं वहां केंद्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा यह घोषित कर सकेगी कि उक्त क्षेत्र या उसके किसी ऐसे भाग में , जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, इस अधिनियम के सभी या कोई उपबंध उक्त माल या माल के वर्ग के क्रय या विक्रय के लिए अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं को साधारणतया लागू नहीं होंगे या विशिष्टतया ऐसी संविदाओ के किसी वर्ग को लागू नहीं होंगे ।
(3) उपधारा ( 1 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यदि केंद्रीय सरकार की यह राय है कि व्यापार के हित में या लोक हित में किसी क्षेत्र में अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं को विनियमित या नियंत्रित किया जाना समीचीन है तो वह , राजपत्र में अधिसूचना द्वारा , यह घोषित कर सकेगी कि इस अधिनियम के सभी या कोई उपबंध ऐसे क्षेत्र में अनंतरणीय विनिर्दिष्ट माल संविदाओं के ऐसे वर्ग या वर्गों को और ऐसे माल या माल के वर्ग की बाबत, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, लागू होंगे और वह ऐसी रीति, जिसमें तथा वह सीमा, जिस तक उक्त सभी या कोई उपबंध इस प्रकार लागूहोंगे, भी विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।" ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
140
भाग 3
वित्त ( संख्यांक 2 ) अधिनियम, 1998 का संशोधन
दूसरी अनुसूची का संशोधन ।
136. वित्त ( संख्यांक 2 ) अधिनियम, 1998 की दूसरी अनुसूची में, स्तंभ ( 3 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, 1998 का 21 'आठ रुपए प्रति लीटर " प्रविष्टि रखी जाएगी ।
भाग 4
वित्त अधिनियम, 1999 का संशोधन
दूसरी अनुसूचीका संशोधन।
137. वित्त अधिनियम, 1999 की दूसरी अनुसूची में, स्तंभ ( 3 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " आठ रुपए 1999 का 27 प्रतिलीटर" प्रविष्टि रखी जाएगी ।
भाग 5
विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 का संशोधन
138. (अ ) इस भाग के उपबंध उस तारीख को प्रवृत्त होंगे जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस भाग के भिन्न- भिन्न उपंबधों के लिए भिन्न- भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
प्रारंभ और 1999 के अधिनियम संख्यांक 42का संशोधन ।
धारा 2 का संशोधन ।
(आ ) विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् विदेशी मुद्रा अधिनियम कहा 1999 का 42 गया है ) की धारा 2 में,-
( i ) खंड (ग ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः- *( गग ) " प्राधिकृत अधिकारी " से धारा 37क के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत प्रवर्तन निदेशालय का कोई अधिकारी अभिप्रेत है;' ;
(ii ) खंड (छ ) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः- ' (छछ) " सक्षम प्राधिकारी " से धारा 37क की उपधारा ( 2 ) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्तप्राधिकारी अभिप्रेत है; ' ।
धारा 6 का संशोधन ।
139. विदेशी मुद्रा अधिनियम की धारा 6 की,-
(अ) उपधारा (2 ) में,-
(i ) खंड ( क ) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" (क ) पूंजीगत खाता संव्यवहार के, जिसमें ऋण लिखतें अंतर्वलित हैं, ऐसे किसी वर्ग या वर्गों को, जो अनुज्ञेय हैं";
( ii ) खंड (ख ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः- " ( ग ) ऐसी कोई शर्तें जो ऐसे संव्यवहारों पर लगाई जाएं; ";
(iii ) परंतुक के स्थान पर निम्नलिखित परंतुक रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" परंतु रिजर्व बैंक या केंद्रीय सरकार, कारबार के मामूली अनुक्रम में उधारों के
अपकरण के मद्दे या सीधे विनिधानों के अवक्षयण के लिए शोध्य संदायों के लिए विदेशी मुद्रा के निकाले जाने पर कोई निर्बन्धन नहीं लगाएगी । ";
(आ) उपधारा ( 2 ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
(2क) ' केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के परामर्श से ,
(क) पूंजीगत खाता संव्यवहार के, जिसमें ऋण लिखतें अंतर्वलित नहीं हैं, ऐसे किसी वर्ग या वर्गों को, जो अनुज्ञेय है;
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
141
(ख ) वह सीमा जिस तक विदेशी मुद्रा ऐसे संव्यवहारों के लिए अनुज्ञेय होगी ; और
(ग ) ऐसी कोई शर्तें , जो ऐसे संव्यवहारों पर लगाई जाएं,
विहित कर सकेगी । " ;
(इ ) उपधारा ( 3 ) का लोप किया जाएगा;
(ई ) उपधारा ( 6 ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
' (7) इस धारा के प्रयोजनों के लिए " ऋण लिखतें " पद से ऐसी लिखतें अभिप्रेत हैं जो केंद्रीय सरकार द्वारा रिजर्व बैंक के परामर्श से अवधारित की जाएं । ' ।
धारा 13 का संशोधन ।
140. विदेशी मुद्रा अधिनियम की धारा 13 की उपधारा ( 1 ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधाराएं अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः-
" ( 1क ) यदि किसी व्यक्ति के बारे में यह पाया जाता है कि उसने धारा 37 क की उपधारा ( 1 ) के परंतुक के अधीन विहित अवसीमा से अधिक संकलित मूल्य की कोई विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के बाहर अवस्थित स्थावर संपत्ति अर्जित की है, तो वह ऐसे उल्लंघन और अधिहरण में अंतर्वलित विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत में अवस्थित स्थावर संपत्ति के समतुल्य मूल्य की राशि के तीन गुणा तक की शास्ति के लिए दायी होगा ।
( 1ख ) यदि न्यायनिर्णायक अधिकारी , उपधारा ( 1क ) के अधीन की किसी कार्यवाही में उचित समझता है तो वह कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् अभियोजन आरंभ करने की सिफारिश कर सकेगा और यदि प्रवर्तन निदेशक का यह समाधान हो जाता है तो वह कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् दोषी व्यक्तिके विरुद्ध ऐसे अधिकारी द्वारा, जो सहायक निदेशक की पंक्तिसे नीचे का न हो, दांडिक शिकायत फाइल करके अभियोजन करने का निदेश दे सकेगा ।
( 1 ग ) यदि किसी व्यक्ति के बारे में यह पाया जाता है कि उसने धारा 37क की उपधारा ( 1 ) के परंतुक के अधीन विहित अवसीमा से अधिक संकलित मूल्य की कोई विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के बाहर अवस्थित स्थावर संपत्ति अर्जित की है, तो वह उपधारा ( 1क ) के अधीन अधिरोपित शास्ति के अतिरिक्त, ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से दंडनीय होगा।
( 1 घ ) कोई भी न्यायालय, धारा 13 की उपधारा ( 1 ग ) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान, ऐसे अधिकारी की, जो उपधारा ( 1 ख ) में निर्दिष्ट सहायक निदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो, लिखित शिकायत पर ही करेगा, अन्यथा नहीं । " ।
धारा 18 का संशोधन ।
141. विदेशी मुद्रा अधिनियम की धारा 18 में, " न्यायनिर्णायक प्राधिकारियों " शब्दों के पश्चात् " सक्षम प्राधिकारियों" शब्दअंतःस्थापित किए जाएंगे ।
142. विदेशी मुद्रा अधिनियम की धारा 37 के पश्चात्निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी; अर्थात्ः- नई धारा 37क का अंतःस्थापन ।
धारा 4 के उल्लंघन में भारत से बाहर धारित आस्तियोंके संबंध मेंविशेष उपबंध ।
" 37क. ( 1 ) किसी जानकारी की प्राप्ति पर या अन्यथा यदि केंद्रीय सरकार द्वारा विहित प्राधिकृत अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के बाहर स्थित किसी स्थावर संपत्ति के धारा 4 के उल्लंघन में धारित किए जाने का संदेह है, तो वह कारणों को लेखबद्ध किए जाने के पश्चात् आदेश द्वारा , ऐसी विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के भीतर स्थावर संपत्ति के समतुल्य मूल्य का अभिग्रहण कर सकेगाः
परंतु ऐसा कोई अभिग्रहण ऐसे मामले में नहीं किया जाएगा जहां ऐसी विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के बाहर स्थित किसी स्थावर संपत्ति का कुल मूल्य उस मूल्य से कम है जो विहित किया जाए ।
(2) अभिग्रहण का सुसंगत सामग्री सहित आदेश केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त ऐसे सक्षम अधिकारी के समक्ष , जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का नहीं होगा ऐसे अभिग्रहण की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर रखा जाएगा ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
142
(3 ) सक्षम प्राधिकारी ऐसी याचिका का निपटारा प्रवर्तन निदेशालय के प्रतिनिधियों और व्यथित व्यक्तिको सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् अभिग्रहण की तारीख से एक सौ अस्सी दिन की अवधि के भीतर ऐसे आदेश की पुष्टि करके या उसे अपास्त करके करेगा ।
स्पष्टीकरण -एक सौ अस्सी दिनों की अवधि की संगणना करते समय न्यायालय द्वारा मंजूर की गई रोक की अवधि को अपवर्जित किया जाएगा और ऐसे रोक आदेश के बातिल किए जाने की संसूचना कीतारीख से कम से कम तीस दिन की अतिरिक्त अवधि की मंजूरी दी जाएगी ।
(4) सक्षम प्राधिकारी का समतुल्य आस्ति के अभिग्रहण की पुष्टि करने संबंधी आदेश न्यायनिर्णयन कीकार्यवाहियों का निपटारा होने तक बना रहेगा और तत्पश्चात् न्यायनिर्णायक प्राधिकारी उपधारा ( 1 ) के अधीन किए गए अभिग्रहण के बारे में और कार्रवाई करने के संबंध में न्यायनिर्णयन संबंधी आदेश में समुचित निदेश पारित करेगाः
परंतु यदि इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम पर व्यथित व्यक्ति ऐसी विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या स्थावर संपत्ति के तथ्य को प्रकट करता है और उसे भारत में वापस लाता हैतो, यथास्थिति, सक्षम प्राधिकारी या न्यायनिर्णायक व्यथित व्यक्ति से इस संबंध में आवेदन की प्राप्ति पर और व्यथित व्यक्ति तथा प्रवर्तन निदेशालय के प्रतिनिधियों को सुने जाने का अवसर दिए जाने के पश्चात् ऐसा समुचित आदेश पारित करेगा जो वह ठीक समझे, जिसके अंतर्गत उपधारा ( 1 ) के अधीन किए गए अभिग्रहण को अपास्त किए जाने का आदेश भी है ।
(5) सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।
(6 ) धारा 15 में अंतर्विष्ट कोई बात इस धारा को लागू नहीं होगी । " ।
143. विदेशी मुद्रा अधिनियम की धारा 46 की उपधारा (2 ) में,-
धारा 46 का
संशोधन ।
(i ) खंड ( क ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्ः-
" (कक) ऐसी लिखतें, जिन्हें धारा 6 की उपधारा ( 7 ) के अधीन ऋण लिखतें अवधारित किया जाए;
(कख ) धारा 6 की उपधारा ( 2क ) के अनुसार पूंजीगत खाता संव्यवहारों के अनुज्ञेय वर्ग, विदेशी मुद्रा की ग्राह्यता की परिसीमाएं और ऐसे संव्यवहारों का प्रतिषेध , निर्बन्धन या विनियमन; ";
(ii ) खंड ( छ ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" (छछ) धारा 37क की उपधारा ( 1 ) में निर्दिष्ट विदेशी मुद्रा का सकल मूल्य; " ।
144. विदेशी मुद्रा अधिनियम की धारा 47 में,-
धारा 47 का संशोधन ।
(अ ) उपधारा (2 ) में, -
( i ) खंड ( क ) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात्ः-
" (क) पूंजीगत लेखा संव्यवहारों के ऐसे अनुज्ञेय वर्ग, जिनमें धारा 6 की उपधारा ( 7 ) के अधीन अवधारित ऋण लिखतें अंतर्वलित हैं, ऐसे संव्यवहारों के लिए विदेशी मुद्रा की ग्राह्यता की परिसीमाएं और धारा 6 के अधीन ऐसे पूंजीगत लेखा संव्यवहारों का प्रतिषेध , निर्बन्धन या विनियमन;";
( ii ) खंड ( छ) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः- " (छक ) करेंसी या करेंसी नोटों का निर्यात, आयात या उन्हें रखना; " ;
(आ) उपधारा ( 2 ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
(3 ) रिजर्व बैंक द्वारा, उस तारीख के पूर्व, जिसको इस अधिनियम की धारा 6 और धारा 47 के अधीन पूंजीगत लेखा संव्यवहारों पर इस धारा के उपबंध अधिसूचित किए जाते हैं, बनाए गए भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
143
ऐसे सभी विनियम, जिनकी बाबत विनियम बनाने की शक्ति अब केन्द्रीय सरकार में निहित है, तब तक विधिमान्य बने रहेंगे जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा उन्हें संशोधित या विखंडित नहीं कर दिया जाताहै ।" ।
भाग 6
धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 का संशोधन
2003 का 15
धारा 2 का संशोधन।
145. धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् धन- शोधन अधिनियम कहा गया है ) की धारा 2 की उपधारा ( 1 ) में,-
(i ) खंड (प ) में, " या ऐसी किसी संपत्ति का मूल्य " शब्दों के पश्चात्" या जहां ऐसी संपत्ति देश के बाहर ली जाती है या धारित की जाती है , वहां देश के भीतर धारित सममूल्य की संपत्ति " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
( ii ) खंड ( म ) के उपखंड ( ii ) में, " तीस लाख रुपए " शब्दों के स्थान पर " एक करोड़ रुपए "
शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 5 का संशोधन ।
( 1 ) के दूसरे परंतुक में, " खंड ( ख ) " शब्द,
146. धन-शोधन अधिनियम की धारा 5 की उपधारा कोष्ठक और अक्षर के स्थान पर " पहले परंतुक " शब्द रखे जाएंगे ।
धारा 8 का संशोधन ।
147. धन-शोधन अधिनियम की धारा 8 में,-
( i) उपधारा ( 3 ) के खंड ( ख ) में, " न्यायनिर्णायक प्राधिकरण " शब्दों के स्थान पर " विशेष न्यायालय " शब्द रखे जाएंगे;
( ii ) उपधारा ( 7 ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-
" (8 ) जहां कोई संपत्ति उपधारा ( 5 ) के अधीन केंद्रीय सरकार को अधिकृत हो गई है , वहां विशेष न्यायालय ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, केन्द्रीय सरकार को दावाकर्ता की ऐसी अधिहृत संपत्तिया उसका कोई भाग संपत्ति में के विधि सम्मत हित के साथ प्रत्यावर्तित करने का निदेश भी दे सकेगा, जिसे धन- शोधन के अपराध के परिणामस्वरूप अपरिमेय हानि हुई होः
परंतु विशेष न्यायालय ऐसे दावे पर तब तक विचार नहीं करेगा जब तक उसका यह समाधान न हो जाए कि दावाकर्ता ने सद्भावपूर्वक कार्य किया है और उसे सभी युक्तियुक्त पूर्वावधानियां बरतने के बावजूद हानि हुई है और वह धन- शोधन के अपराध में संलिप्त नहीं है; " ।
148. धन-शोधन अधिनियम की धारा 20 में,-
धारा 20 का संशोधन ।
( i) उपधारा ( 5 ) में, " यथास्थिति, न्यायालय या न्यायनिर्णायक प्राधिकरण " शब्दों के स्थान पर, "विशेष न्यायालय " शब्द रखे जाएंगे ;
(ii ) उपधारा ( 6 ) में,-
(क) " न्यायालय " शब्द के स्थान पर, " विशेष न्यायालय " शब्द रखे जाएंगे;
(ख ) " ऐसे आदेश की" शब्दों के पश्चात्, " प्राप्ति की " शब्दअंतः स्थापित किए जाएंगे ।
149. धन- शोधन अधिनियम की धारा 21 में,-
धारा 21 का संशोधन ।
( i ) उपधारा ( 5 ) में, " धारा 8 की उपधारा ( 5 ) या उपधारा ( 7 ) के अधीन अधिहरण " शब्दों, अंकों और कोष्ठकों के स्थान पर, " धारा 8 की उपधारा ( 5 ) या उपधारा ( 6 ) या उपधारा ( 7 ) या धारा 58ख या धारा 60 की उपधारा ( 2 क ) के अधीन अधिहरण या निर्मोचन " शब्द, अंक, कोष्ठक और अक्षर रखे जाएंगे;
(ii) उपधारा (6 ) में, - [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
144
(क) " धारा 8 की उपधारा ( 6 ) के अधीन न्यायालय द्वारा या धारा 58 ख या धारा 60 की उपधारा ( 2क ) के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकरण द्वारा " शब्दों, अंकों, कोष्ठकों और अक्षरों के स्थान पर " न्यायालय द्वारा या धारा 21 की उपधारा ( 5 ) के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा " शब्द, अंक और कोष्ठक रखे जाएंगे;
(ख) " ऐसे आदेश की " शब्दों के पश्चात्" प्राप्ति की " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
धारा 60 का संशोधन।
150. धन-शोधन अधिनियम की धारा 60 की उपधारा ( 2 क ) में " न्यायनिर्णायक प्राधिकरण " शब्दों के स्थान पर " विशेष न्यायालय " शब्द रखे जाएंगे ।
अनुसूचीका संशोधन ।
151. धन-शोधन अधिनियम की अनुसूची में, भाग क के पश्चात्, निम्नलिखित भाग अंतःस्थापित किया जाएगा , अर्थात्ः-
" भाग ख
सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 के अधीन अपराध
अपराध का वर्णन
धारा
मिथ्या घोषणा, मिथ्या दस्तावेज, आदि । " ।
132
भाग 7
राजवित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंध अधिनियम, 2003 का संशोधन
धारा 4 का संशोधन ।
152. राजवित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंध अधिनियम, 2003 की धारा 4 में , " 31 मार्च, 2015 " 2003 का 39 अंकों, और शब्द के स्थान पर , जहां - कहीं वे आते हैं " 31 मार्च, 2018 अंक और शब्द रखे जाएंगे ।
भाग 8
वित्त ( संख्यांक 2 ) अधिनियम, 2004 का संशोधन
2004 का 23 धारा 95 का लोप ।
153. वित्त ( संख्यांक 2 ) अधिनियम, 2004 ( जिसे इसमें इसके पश्चात् 2004 का अधिनियम कहा गया है) के अध्याय 6 में, धारा 95 का, उस तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, लोप किया जाएगा ।
154. 2004 के अधिनियम में, 1 जून, 2015 से, धारा 97 में,
धारा 97 का संशोधन ।
(i ) खंड (5 क ) के पश्चात, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
'( 5कक ) " आरंभिक प्रस्थापना " का वही अर्थ होगा, जो-
1992 का 15
(i ) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधीन बनाए गए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( भू- संपदा विनिधान न्यास ) विनियम, 2014 के विनियम 2 के उपविनियम ( 1 ) के खंड ( थ ) में किसी ऐसे कारबार न्यास, जो भू- संपदा विनिधान न्यास है, की दशा में उसका है,;
(ii) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम , 1992 के अधीन बनाए गए 1992 का 15 भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( अवसंरचना विनिधान न्यास ) विनियम, 2014 के विनियम 2 के उपविनियम ( 1 ) के खंड (फ ) में किसी ऐसे कारबार न्यास , जो अवसंरचना विनिधान न्यास है, की दशा में उसका है,;
(ii) खंड ( 13 ) के उपखंड ( कक ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपखंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-
" (कख ) किसी कारबार न्यास की ऐसी असूचीबद्ध यूनिटों का, जो आय- कर भारत का राजपत्र असाधारण
145 अनुभाग 1क]
1961का 43
अधिनियम, 1961 की धारा 47 के खंड (xvii) में निर्दिष्ट किसी अंतरण के प्रतिफलस्वरूप अर्जित की गई थीं, ऐसी यूनिटों के किसी धारक द्वारा जनसाधारण को विक्रय के लिए ऐसी किसी प्रस्थापना के अधीन , जो किसी आरंभिक लोक प्रस्थापना में सम्मिलित है और जहां ऐसी यूनिटें बाद में किसी मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध की जाती हैं, विक्रय; या" ।
धारा 98 का संशोधन ।
155. 2004 के अधिनियम की धारा 98 की सारणी में, क्रम संख्यांक 6 और उससे संबंधित प्रविष्टियों के पश्चात्, निम्नलिखित क्रम संख्यांक और प्रविष्टियां अंतःस्थापित की जाएंगी , अर्थात्ः-
क्रम सं०
दर
कराधेय प्रतिभूति संव्यवहार
द्वारा संदेय
1
2
3
4
0.2प्रतिशत विक्रेता ।" ।
" 7. धारा 97 के खंड ( 13 ) के उपखंड ( कख ) में निर्दिष्ट विक्रय की किसी प्रस्थापना के अधीन किसी कारबार न्यास की असूचीबद्ध यूनिटों का विक्रय ।
156. 2004 के अधिनियम की धारा 100 में,-
धारा 100 का संशोधन ।
(i ) उपधारा ( 2 क ) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी , अर्थात्ः-
" (2ख ) किसी आरंभिक प्रस्थापना की बाबत कारबार न्यास द्वारा नियुक्त प्रमुख वाणिज्यिक बैंककार, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति से , जो धारा 97 के खंड ( 13 ) के उपखंड ( कख ) में निर्दिष्ट कोई कराधेय प्रतिभूति संव्यवहार करता है , धारा 98 में विनिर्दिष्ट दरों पर प्रतिभूति संव्यवहार कर का संग्रहण करेगा । " ;
(ii ) उपधारा ( 3 ) में,-
(अ) " उपधारा (2क ) " शब्द, कोष्ठकों, अंक और अक्षर के पश्चात्, " या उपधारा ( 2ख ) " शब्द, कोष्ठक, अंक और अक्षर अंतःस्थापित किए जाएंगे ;
( आ) " आरंभिक लोक प्रस्थापना " शब्दों के पश्चात्" या किसी आरंभिक प्रस्थापना " शब्दअंतःस्थापित किए जाएंगे ।
(iii) उपधारा ( 4 ) में, " आरंभिक लोक प्रस्थापना " शब्दों के पश्चात्" या आरंभिक प्रस्थापना " शब्दअंतःस्थापित किए जाएंगे ।
157. 2004 के अधिनियम की धारा 101 की उपधारा ( 1 ) में,-
धारा 101 का संशोधन ।
(अ) " आरंभिक लोक प्रस्थापना " शब्दों के पश्चात्, " या किसी आरंभिक प्रस्थापना " शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।
(आ ) " जो ऐसे वित्तीय वर्ष के दौरान ऐसी पारस्परिक निधि के यूनिटों का विक्रय है " शब्दों के स्थान पर " जो ऐसे वित्तीय वर्ष के दौरान किसी आरंभिक लोक प्रस्थापना के अधीन ऐसी पारस्परिक निधि के यूनिटों का विक्रय या असूचीबद्ध शेयरों का विक्रय या ऐसी आरंभिक प्रस्थापना के अधीन जिसकी बाबत ऐसा प्रमुख मर्चेन्ट बैंककार नियुक्त किया जाता है, कारबार न्यास की असूचीबद्ध यूनिट का विक्रय है " शब्द रखे जाएंगे ।
भाग 9
वित्त अधिनियम, 2005 का संशोधन
2005 का 18
सातवीं अनुसूची का
संशोधन ।
158. वित्त अधिनियम, 2005 की सातवीं अनुसूची में, उपशीर्ष 2202 10 और उससे संबंधित प्रविष्टियों का लोप किया जाएगा ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
146
भाग 10
वित्त अधिनियम, 2007 का संशोधन
2007 का 22 धारा 140 का संशोधन ।
159. वित्त अधिनियम, 2007 के अध्याय 4 की धारा 140 का, उस तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, लोप किया जाएगा ।
भाग 11
वित्त अधिनियम, 2010 का संशोधन
160. वित्त अधिनियम, 2010 की दसवीं अनुसूची में, सभी शीर्षों के सामने आने वाली स्तंभ ( 4 ) में की 2010 का 14 दसवींअनुसूची का संशोधन ।
प्रविष्टिके स्थान पर, " 300 रुपए प्रति टन " प्रविष्टि रखी जाएगी ।
भारत का राजपत्र असाधारण
147 अनुभाग 1 क]
पहली अनुसूची
(धारा 2 देखिए)
भाग 1
आय-कर
पैरा क
( 1) इस पैरा की मद ( II ) और मद ( III ) में निर्दिष्ट व्यष्टि से भिन्न प्रत्येक व्यष्टि या हिन्दूअविभक्त कुटुंब या व्यक्ति- संगम या व्यष्टि- निकाय की, चाहे वह निगमित हो या नहीं, या आय - कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 31 ) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति की दशा में , जो ऐसी दशा नहीं है, जिसमें इस भाग का कोई अन्य पैरा लागू होता है,-
आय-कर की दरें
( 1) जहां कुल आय 2,50,000 रु० से अधिक नहीं है
कुछ नहीं;
उस रकम का 10 प्रतिशत, जिससे कुल आय 2,50,000 रु०
(2) जहां कुल आय 2,50,000 रु० से अधिक है, किंतु 5,00,000 रु० से अधिक नहीं है
से अधिक हो जाती है;
( 3) जहां कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक है, किंतु 10,00,000 रु० से अधिक नहीं है
25,000 रु० धन उस रकम का 20 प्रतिशत, जिससे कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक हो जाती है ;
(4) जहां कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक है
1,25,000 रु० धन उस रकम का 30 प्रतिशत, जिससे कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक हो जाती है ।
( II ) प्रत्येक ऐसे व्यष्टि की दशा में , जो भारत में निवासी है और जो पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय साठ वर्ष या अधिक आयु का, किंतु अस्सी वर्ष से कम आयु का है
आय-कर की दरें
(1) जहां कुल आय 3,00,000 रु० से अधिक नहीं है
कुछ नहीं;
(2) जहां कुल आय 3,00,000 रु० से अधिक है, किंतु 5,00,000 रु० से अधिक नहीं है
उस रकम का 10 प्रतिशत, जिससे कुल आय 3,00,000 रु० से अधिक होजाती है;
(3) जहां कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक है, किंतु 10,00,000 रु० से अधिक नहीं है
20,000 रु० धन उस रकम का 20 प्रतिशत, जिससे कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक हो जाती है ;
(4) जहां कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक है
1,20,000 रु० धन उस रकम का 30 प्रतिशत, जिससे कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक हो जाती है ।
( III ) प्रत्येक ऐसे व्यष्टि की दशा में , जो भारत में निवासी है और जो पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय अस्सी वर्ष या अधिक आयु का है-
आय-कर की दरें
(1 ) जहां कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक नहीं है कुछ नहीं;
(2) जहां कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक है, किंतु उस रकम का 20 प्रतिशत, जिससे कुल आय 5,00,000 रु०
10,00,000 रु० से अधिक नहीं है सेअधिक हो जाती है;
(3 ) जहां कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक है, 1,00,000 रु० धन उस रकम का 30 प्रतिशत, जिससे कुल आय
10,00,000 रु० से अधिक हो जाती है ।
आय-कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय- कर की रकम में, ऐसे प्रत्येक व्यष्टि या हिन्दु अविभक्त कुटुंब या व्यक्ति- संगम या व्यष्टि- निकाय की, चाहे वह निगमित हो या नहीं या आय- कर अधिनियम की धारा 2 के [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
148
खंड ( 31 ) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय- कर के दस प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
परंतु ऊपर उल्लिखित व्यक्तियों की दशा में , जिनकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय - कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम, एक करोड़ रुपए की कुल आय पर, आय - कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी , जो आय की उस रकम के एक करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है ।
पैरा ख
प्रत्येक सहकारी सोसाइटी की दशा में,-
आय-कर की दरें
(1 ) जहां कुल आय 10,000 रु० से अधिक नहीं है कुल आय का 10 प्रतिशत;
(2) जहां कुल आय 10,000 रु० से अधिक है, किंतु 1,000 रु० धन उस रकम का 20 प्रतिशत , जिससे कुल आय
20,000 रु० से अधिक नहीं है 10,000 रु० से अधिक हो जाती है;
( 3 ) जहां कुल आय 20,000 रु० से अधिक है 3,000 रु० धन उस रकम का 30 प्रतिशत , जिससे कुल आय
20,000 रु० से अधिक हो जाती है ।
आय- कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय- कर की रकम में, ऐसी प्रत्येक सहकारी सोसाइटी की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय कर के दस प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
परंतु ऊपर उल्लिखित प्रत्येक सहकारी सोसाइटी की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय - कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम, एक करोड़ रुपए की कुल रकम पर, आय - कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी , जो आय की उस रकम के, जो एक करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है ।
पैरा ग
प्रत्येक फर्म की दशा में,-
आय-कर की दर
30प्रतिशत।
संपूर्ण कुल आय पर
आय-कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय - कर की रकम में, ऐसी प्रत्येक फर्म की दशा में , जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय कर के दस प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगाः
परंतु ऊपर उल्लिखित प्रत्येक फर्म की दशा में , जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय - कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम , एक करोड़ रुपए की कुल रकम पर, आय - कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी , जो आय की उस रकम के, जो एक करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है ।
पैरा घ
प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी की दशा में, -
आय-कर की दर
30प्रतिशत ।
संपूर्णकुल आय पर
आय -कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय- कर की रकम में , ऐसे प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय कर के दस प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
अनुभाग 1क]
भारत का राजपत्र असाधारण
149
परंतु ऊपर उल्लिखित प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी की दशा में , जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय- कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम, एक करोड़ रुपए की कुल रकम पर, आय- कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी , जो आय कीउस रकम के, जो एक करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है ।
पैरा ङ
किसी कंपनी की दशा में,-
आय-कर की दरें
1. देशी कंपनी की दशा में
कुल आय का 30 प्रतिशत ।
II . देशी कंपनी से भिन्न कंपनी की दशा में,-
(i) कुल आय के उतने भाग पर, जो निम्नलिखित के रूप में है,
(क) उसके द्वारा 31 मार्च , 1961 के पश्चात्, किंतु 1 अप्रैल, 1976 के पूर्व सरकार या किसी भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में सरकार या भारतीय समुत्थान से प्राप्त स्वामिस्व; या
(ख ) उसके द्वारा 29 फरवरी, 1964 के पश्चात्, किंतु 1 अप्रैल , 1976 के पूर्व सरकार या किसी भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में तकनीकी सेवाएं प्रदान
करने के लिए उस सरकार या भारतीय समुत्थान से प्राप्त फीस ,
50प्रतिशत;
और जहां , ऐसा करार दोनों में से प्रत्येक दशा में, केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित कर दिया गया है
40 प्रतिशत ।
(ii) कुल आय के अतिशेष पर, यदि कोई हो
आय-कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय - कर की रकम में प्रत्येक कंपनी की दशा में निम्नलिखित दर से,-
(i ) प्रत्येक देशी कंपनी की दशा में,-
(क) जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे आय कर के पांच प्रतिशत कीदर से; और
(ख) जिसकी कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय कर के दस प्रतिशत की दर से,
( ii) देशी कंपनी से भिन्न प्रत्येक कंपनी की दशा में,-
(क) जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे आय कर के दो प्रतिशत कीदर से; और
(ख) जिसकी कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय- कर के पांच प्रतिशत की दर से,
परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगाः
परंतु प्रत्येक ऐसी कंपनी की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसी आय पर आय-कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम, एक करोड़ रुपए की कुल आय पर आय - कर के रूप में संदेय उस रकम से अधिक नहीं होगी , जो आय की उस रकम के, जो एक करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है ।
परंतु यह और कि प्रत्येक ऐसी कंपनी की दशा में, जिसकी कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय- कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम , दस करोड़ रुपए की कुल आय पर आय- कर और अधिभार के रूप में संदेय उस रकम से , अधिक नहीं होगी, जो आय की उस रकम के, जो दस करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
150
भाग 2
कतिपय दशाओं में स्रोत पर कर की कटौती की दरें
ऐसी प्रत्येक दशा में , जिसमें आय- कर अधिनियम की धारा 193 , धारा 194 , धारा 194 क , धारा 194ख , धारा 194खख , धारा 194घ , धारा 194 ठखक और धारा 195 के उपबंधों के अधीन कर की कटौती प्रवृत्त दरों से की जानी है, आय में से कटौती निम्नलिखित दरों पर कटौती के अधीन रहते हुए की जाएगी:-
आय-कर की दर
1. कंपनी से भिन्न व्यक्ति की दशा में,-
(क) जहां व्यक्ति भारत में निवासी है, --
10 प्रतिशत;
(i) " प्रतिभूतियों पर ब्याज " से भिन्न ब्याज के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
(ii ) लाटरी, वर्ग पहेली , ताश के खेल और किसी प्रकार के अन्य खेल से जीत के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
(iii) घुड़दौड़ से जीत के रूप में आय पर
10 प्रतिशत;
(iv) बीमा कमीशन के रूप में आय पर
10 प्रतिशत;
(v) निम्नलिखित पर संदेय ब्याज के रूप में आय पर-
( अ ) किसी केंद्रीय , राज्य या प्रांतीय अधिनियम द्वारा स्थापित किसी स्थानीय प्राधिकरण या निगम द्वारा या उसकी ओर से धन के लिए पुरोधृत किए गए कोई डिबेंचर या प्रतिभूतियां;
(आ) किसी कंपनी द्वारा पुरोधृत किए गए कोई डिबेंचर, जहां ऐसे डिबेंचर, भारत में मान्यता प्राप्त किसी स्टाक एक्सचेंज में प्रतिभूति संविदा ( विनियमन ) अधिनियम , 1956 ( 1956 का 42 ) और उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अनुसार सूचीबद्ध हैं;
(इ ) केंद्रीय या राज्य सरकार की कोई प्रतिभूति
10 प्रतिशत;
(vi) किसी अन्य आय पर
(ख) जहां व्यक्ति भारत में निवासी नहीं हैं,-
(i) किसी अनिवासी भारतीय की दशा में,-
20 प्रतिशत;
(अ ) विनिधान से किसी आय पर
10 प्रतिशत;
(आ) धारा 115 ङ या धारा 112 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ग ) के उपखंड ( iii) में निर्दिष्ट दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर
15 प्रतिशत;
(इ ) धारा 111क में निर्दिष्ट अल्पकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर
20प्रतिशत;
(ई ) अन्य दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर [ जो धारा 10 के खंड ( 33 ) , खंड (36 ) और खंड ( 38 ) में निर्दिष्ट दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ नहीं है]
20प्रतिशत;
(उ) सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा विदेशी करेंसी में उधार लिए गए धन या उपगत ऋण पर सरकार या किसी भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय ब्याज के रूप में आय पर (जो धारा 194 ठख या धारा 194 ठग में निर्दिष्ट ब्याज के रूप में आय नहीं है)
(ऊ) उसके द्वारा सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में, सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय स्वामिस्व के रूप में आय पर, जहां ऐसा स्वामिस्व, भारतीय समुत्थान को आय- कर अधिनियम की धारा 115क की उपधारा ( 1 क ) के पहले परंतुक में निर्दिष्ट किसी विषय की किसी पुस्तक में प्रतिलिप्यधिकार के संबंध में अथवा भारत में निवासी किसी व्यक्तिको आय - कर अधिनियम की धारा 115क की उपधारा ( 1क ) के दूसरे परंतुक में निर्दिष्ट किसी कम्प्यूटर साफ्टवेयर के संबंध में सभी या किन्हीं अधिकारों के अनुभाग 1 क]
भारत का राजपत्र असाधारण
151
आय-कर की दर
(जिनके अंतर्गत अनुज्ञप्ति देना है ) अंतरण के प्रतिफल के रूप में है
10 प्रतिशत;
( ऋ) उसके द्वारा सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में , और जहां ऐसा करार किसी भारतीय समुत्थान के साथ है, वहां वह करार केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है या जहां वह भारत सरकार की तत्समय प्रवृत्त औद्योगिक नीति में सम्मिलित किसी विषय से संबंधित है, वहां वह करार उस नीति के अनुसार है , सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय स्वामिस्व के रूप में [जो उपमद ( ख ) ( i ) ( ऊ ) में निर्दिष्ट प्रकृति कास्वामिस्व नहीं है, ] आय पर
( ए) उसके द्वारा सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में , और जहां ऐसा करार किसी भारतीय समुत्थान के साथ है, वहां वह करार केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है या जहां वह भारत सरकार की तत्समय प्रवृत्त औद्योगिक नीति में सम्मिलित किसी विषय से संबंधित है, वहां वह करार उस नीति के अनुसार है , सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा तकनीकी सेवाओं के लिए संदेय फीस के रूप में आय पर
10 प्रतिशत;
(ऐ) लाटरी , वर्ग पहेली , ताश के खेल और किसी प्रकार के खेल से जीत के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
(ओ ) घुड़दौड़ से जीत के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
(औ ) अन्य सम्पूर्ण आय पर
30प्रतिशत;
(ii) किसी अन्य व्यक्ति की दशा में,
(अ) सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा विदेशी करेंसी में उधार लिए गए धन या उपगत ऋण पर सरकार या किसी भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय ब्याज के रूप में आय पर ( जो धारा 194ठख या धारा 194 ठग में निर्दिष्ट ब्याज के रूप में आय नहीं है)
20प्रतिशत;
( आ) उसके द्वारा सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में, सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय स्वामिस्व के रूप में आय पर, जहां ऐसा स्वामिस्व, भारतीय समुत्थान को आय- कर अधिनियम की धारा 115 क की उपधारा ( 1 क ) के पहले परंतुक में निर्दिष्ट किसी विषय की किसी पुस्तक में प्रतिलिप्यधिकार के संबंध में अथवा भारत में निवासी किसी व्यक्ति को आय- कर अधिनियम की धारा 115क की उपधारा ( 1 क) के दूसरे परंतुक में निर्दिष्ट किसी कम्प्यूटर साफ्टवेयर के संबंध में सभी या किन्हीं अधिकारों के (जिनके अंतर्गत अनुज्ञप्ति देना है ) अंतरण के प्रतिफल के रूप में है,
( इ) उसके द्वारा सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में , और जहां ऐसा करार किसी भारतीय समुत्थान के साथ है, वहां करार केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है या जहां यह भारत सरकार की तत्समय प्रवृत्त औद्योगिक नीति में सम्मिलित किसी विषय से संबंधित है, वहां वह करार उस नीति के अनुसार है, सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय स्वामिस्व के रूप में [जो उपमद ( ख ) ( ii ) ( आ) में निर्दिष्ट प्रकृति का स्वामिस्व नहीं है। , आय पर
10 प्रतिशत;
(ई ) उसके द्वारा सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में , और जहां ऐसा करार किसी भारतीय समुत्थान के साथ है, वहां वह करार केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित है या जहां यह भारत सरकार की तत्समय प्रवृत्त औद्योगिक नीति में सम्मिलित किसी विषय से संबंधित है , वहां वह करार उस नीति के अनुसार है, उस सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा तकनीकी सेवाओं के लिए संदेय फीस के रूप में आय पर
( उ) लाटरी , वर्ग पहेली, ताश के खेल और किसी प्रकार के अन्य खेल से जीत के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
(ऊ) घुडदौड़ से जीत के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
152
आय-कर की दर
15 प्रतिशत;
(ऋ) धारा 111क में निर्दिष्ट अल्पकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर
( iii ) में निर्दिष्ट
(ए) धारा 112 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ग ) के उपखंड
10 प्रतिशत;
दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर
(ऐ) अन्य दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर [जो धारा 10 के खंड ( 33 ) ,
20 प्रतिशत;
खंड ( 36 ) और खंड ( 38 ) में निर्दिष्ट दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ नहीं हैं।
30प्रतिशत;
(ओ ) अन्य सम्पूर्ण आय पर
2. किसी कंपनी की दशा में,-
(क) जहां कंपनी देशी कंपनी है,-
10 प्रतिशत;
(i) " प्रतिभूतियों पर ब्याज " से भिन्न ब्याज के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
(ii) लाटरी, वर्ग पहेली, ताश के खेल और किसी प्रकार के अन्य खेल से जीत के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
(iii) घुड़दौड़ से जीत के रूप में आय पर
10 प्रतिशत;
(iv) किसी अन्य आय पर
(ख) जहां कंपनी देशी कंपनी नहीं है,-
30 प्रतिशत;
(i ) लाटरी , वर्ग पहेली , ताश के खेल और किसी प्रकार के अन्य खेल से जीत के रूप में आय पर
30प्रतिशत;
(ii ) घुड़दौड़ से जीत के रूप में आय पर
20प्रतिशत;
(iii ) सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा विदेशी करेंसी में उधार लिए गए धन या उपगत ऋण पर सरकार या किसी भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय ब्याज के रूप में आय पर ( जो धारा 194ठख या धारा 194ठग में निर्दिष्ट ब्याज के रूप में आय नहीं है )
10 प्रतिशत;
(iv) उसके द्वारा 31 मार्च, 1976 के पश्चात् सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में सरकार या किसी भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय स्वामिस्व के रूप में आय पर, जहां ऐसा स्वामिस्व, भारतीय समुत्थान को आय- कर अधिनियम की धारा 115 क की उपधारा (1क) के पहले परंतुक में निर्दिष्ट विषय की किसी पुस्तक में प्रतिलिप्यधिकार के संबंध में अथवा भारत में निवासी किसी व्यक्ति को आय - कर अधिनियम की धारा 115क की उपधारा ( 1 क ) के दूसरे परंतुक में निर्दिष्ट किसी कंप्यूटर साफ्टवेयर के संबंध में सभी या किन्हीं अधिकारों के ( जिनके अंतर्गत अनुज्ञप्ति देना है ) अंतरण के प्रतिफल के रूप में है
(v) उसके द्वारा सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में, और जहां ऐसा करार किसी भारतीय समुत्थान के साथ है वहां पर करार केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित हैया जहां वह भारत सरकार की तत्समय प्रवृत्त औद्योगिक नीति में सम्मिलित विषय से संबंधित है, वहां वह करार उस नीति के अनुसार है, सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा संदेय स्वामिस्व के रूप में आय पर [जो उपमद ( ख ) ( iv ) में निर्दिष्ट प्रकृति का स्वामिस्व नहीं है।-
50 प्रतिशत;
(अ) जहां करार 31 मार्च , 1961 के पश्चात्, किंतु 1 अप्रैल, 1976 के पूर्व किया गया है
10 प्रतिशत;
(आ) जहां करार 31 मार्च , 1976 के पश्चात् किया गया है
(vi ) उसके द्वारा सरकार या भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में, और जहां ऐसा करार किसी भारतीय समुत्थान के साथ है, वहां वह करार केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित भारत का राजपत्र असाधारण
153 अनुभाग 1क]
आय-कर की दर
है या जहां वह भारत सरकार की तत्समय प्रवृत्त औद्योगिक नीति में सम्मिलित किसी विषय से संबंधित है, वहां वह करार उस नीति के अनुसार है, सरकार या भारतीय समुत्थान द्वारा , तकनीकी सेवाओं के लिए, संदेय फीस के रूप में आय पर,-
(अ) जहां करार 29 फरवरी , 1964 के पश्चात् किंतु 1 अप्रैल, 1976 के पूर्व किया गयाहै
50 प्रतिशत;
(आ) जहां करार 31 मार्च, 1976 के पश्चात् किया गया है
10 प्रतिशत;
(vii ) धारा 111 क में निर्दिष्ट अल्पकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर
15 प्रतिशत;
(viii) धारा 112 की उपधारा ( 1 ) के खंड ( ग ) के उपखंड ( iii ) में निर्दिष्ट दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर
10 प्रतिशत;
20 प्रतिशत;
( ix ) अन्य दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभों के रूप में आय पर [ जो धारा 10 के खंड ( 33 ) , खंड ( 36 ) और खंड ( 38 ) में निर्दिष्ट दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ नहीं है]
40प्रतिशत ।
(x ) किसी अन्य आय पर
स्पष्टीकरण-इस भाग की मद 1 ( ख ) ( i ) के प्रयोजन के लिए, " विनिधान से आय " और " अनिवासी भारतीय " के वही अर्थ हैं , जो आय- कर अधिनियम के अध्याय 12 क में उनके हैं ।
आय -कर पर अधिभार
निम्नलिखित उपबंधों के अनुसार कटौती की गई आय- कर की रकम में,-
( i ) इस भाग की मद 1 के उपबंधों के अनुसार, संघ के प्रयोजनों के लिए, प्रत्येक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुंब या व्यक्ति- संगम या व्यष्टि- निकाय , चाहे वह निगमित हो या नहीं या आय- कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 31 ) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति या सहकारी सोसाइटी या फर्म या स्थानीय प्राधिकारी, जो अनिवासी है, की दशा में, जहां संदत्त या संदाय किए जाने के लिए संभाव्य और कटौती के अधीन रहते हुए, आय अथवा ऐसी आय का योग , एक करोड़ रुपए से अधिक है , ऐसे कर के बारह प्रतिशत की दर से;
( ii ) इस भाग की मद 2 के उपबंधों के अनुसार , संघ के प्रयोजनों के लिए, किसी देशी कंपनी से भिन्न प्रत्येक कंपनी की दशा में, -
(क) जहां संदत्त या संदाय किए जाने के लिए संभाव्य और कटौती के अधीन रहते हुए, आय अथवा ऐसी आय का योग, एक करोड़ रुपएसे अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे आय- कर के दो प्रतिशत की दर से;
(ख) जहां संदत्त या संदाय किए जाने के लिए संभाव्य और कटौती के अधीन रहते हुए, आय अथवा ऐसी आय का योग दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय कर के पांच प्रतिशत की दर से,
परिकलित अधिभार , बढ़ा दिया जाएगा ।
भाग 3
कतिपय दशाओं में आय- कर के प्रभारण , " वेतन " शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय से आय - कर की कटौती और " अग्रिम कर " की संगणना के लिए दरें
उन दशाओं में , जिनमें आय - कर, प्रवृत्त दर या दरों से , आय- कर अधिनियम की धारा 172 की उपधारा ( 4) या उक्त अधिनियम की धारा 174 की उपधारा ( 2 ) या धारा 174क या धारा 175 या धारा 176 की उपधारा ( 2 ) के अधीन प्रभारित किया जाना है अथवा " वेतन " शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय में से उक्त अधिनियम की धारा 192 के [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
154
अधीन काटा जाना है या उस पर संदाय किया जाना है अथवा जिसमें उक्त अधिनियम के अध्याय 17 ग के अधीन संदेय " अग्रिम कर " की संगणना की जानी है, यथास्थिति, ऐसा आय- कर या " अग्रिम कर " [ जो आय- कर अधिनियम के अध्याय 12 या अध्याय 12 क या धारा 115ञख या धारा 115जग या अध्याय 12चक या अध्याय 12चख या धारा 161 की उपधारा ( 1 क ) या धारा 164 या धारा 164क या धारा 167ख के अधीन , उस अध्याय या धारा मेंविनिर्दिष्ट दरों पर कर से प्रभार्य किसी आय के संबंध में " अग्रिम कर " नहीं है या धारा 115क या धारा 115 कख या धारा 115 कग या धारा 115कगक या धारा 115कघ या धारा 115ख या धारा 115 खख या धारा 115 खखक या धारा 115 खखग या धारा 115खखघ या धारा 115खखङ या धारा 115ङ या धारा 115ञख या धारा 115ञग के अधीन कर से प्रभार्य किसी आय के संबंध में ऐसे " अग्रिम कर " पर अधिभार नहीं है। निम्नलिखित दर या दरों से, प्रभारित किया जाएगा, काय जाएगा या संगणित किया जाएगा:-
पैरा क
(1) इस पैरा की मद ( II ) और मद ( III ) में निर्दिष्ट व्यष्टि से भिन्न प्रत्येक व्यष्टि या हिन्दू अविभक्त कुटुंब या व्यक्ति- संगम या व्यष्टि-निकाय की, चाहे वह निगमित हो या नहीं या आय - कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 31 ) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति की दशा में, जो ऐसी दशा नहीं है, जिसे इस भाग का कोई अन्य पैरा लागू होता है,-
आय-कर की दरें
( 1 ) जहां कुल आय 2,50,000 रु० से अधिक नहीं है
(2 ) जहां कुल आय 2,50,000 रु० से अधिक है, किंतु 5,00,000 रु० से अधिक नहीं है
(3 ) जहां कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक है, किंतु 10,00,000 रु० से अधिक नहीं है
(4 ) जहां कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक है कुछ नहीं;
उस रकम का 10 प्रतिशत, जिससे कुल आय 2,50,000 रु० से अधिक हो जाती है;
25,000 रु० धन उस रकम का 20 प्रतिशत, जिससे कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक हो जाती है;
1,25,000 रु० धन उस रकम का 30 प्रतिशत , जिससे कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक हो जाती है ।
(II ) प्रत्येक ऐसे व्यष्टि की दशा में, जो भारत में निवासी है और जो पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय साठ वर्ष या अधिक का, किंतु अस्सी वर्ष से कम आयु का है-
आय- कर की दरें
( 1 ) जहां कुल आय 3,00,000 रु० से अधिक नहीं है
(2 ) जहां कुल आय 3,00,000 रु० से अधिक है , किंतु 5,00,000 रु० से अधिक नहीं है
(3 ) जहां कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक है, किंतु 10,00,000 रु० से अधिक नहींहै
(4 ) जहां कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक है कुछ नहीं;
उस रकम का 10 प्रतिशत, जिससे कुल आय 3,00,000 रु० सेअधिक हो जाती है;
20,000 रु० धन उस रकम का 20 प्रतिशत, जिससे कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक हो जाती है;
1,20,000 रु० धन उस रकम का 30 प्रतिशत , जिससे कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक हो जाती है ।
( III ) प्रत्येक ऐसे व्यक्ति की दशा में , जो भारत में निवासी है और जो पूर्ववर्ष के दौरान किसी समय अस्सी वर्ष या अधिक आयु का है
आय-कर की दरें
( 1 ) जहां कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक नहीं है कुछ नहीं;
(2 ) जहां कुल आय 5,00,000 रु० से अधिक है, किन्तु उस रकम का 20 प्रतिशत , जिससे कुल आय 5,00,000
10,00,000 रु० से अधिक नहीं है रु० से अधिक हो जाती है;
(3) जहां कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक है 1,00,000 रु० धन उस रकम का 30 प्रतिशत , जिससे
कुल आय 10,00,000 रु० से अधिक हो जाती है।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
155
आय- कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय - कर की रकम में, ऐसे प्रत्येक व्यष्टि या हिन्दूअविभक्त कुटुंब या व्यक्ति संगम या व्यष्टि - निकाय, चाहे वह निगमित हो या नहीं या आय - कर अधिनियम की धारा 2 के खंड (31) के उपखंड ( vii ) में निर्दिष्ट प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय - कर के बारह प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगाः
परंतु ऊपर उल्लिखित व्यक्तियों की दशा में , जिनकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय- कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम, एक करोड़ रुपए की कुल रकम पर, आय- कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी जो आय की उस रकम के जो एक करोड़ रुपए से अधिक है , आधिक्य में है ।
पैरा ख
प्रत्येक सहकारी सोसाइटी की दशा में, -
आय-कर की दरें
(1 ) जहां कुल आय 10,000 रु० से अधिक नहीं है
कुल आय का 10 प्रतिशत;
(2 ) जहां कुल आय 10,000 रु० से अधिक है, किंतु 20,000 रु० से अधिक नहीं है
1,000 रु० धन उस रकम का 20 प्रतिशत, जिससे कुल आय 10,000 रु० से अधिक हो जाती है;
(3 ) जहां कुल आय 20,000 रु० से अधिक है
3,000 रु० धन उस रकम का 30 प्रतिशत, जिससे कुल आय 20,000 रु० से अधिक जो जाती है ।
आय- कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय- कर की रकम में, ऐसी प्रत्येक सहकारी सोसाइटी की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय - कर के बारह प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगा:
परंतु ऊपर उल्लिखित प्रत्येक सहकारी सोसाइटी की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय- कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम, एक करोड़ रुपए की कुल रकम पर, आय- कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी , जो आय की उस रकम के, जो एक करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है ।
पैरा ग
प्रत्येक फर्म की दशा में,-
आय-कर की दर
30प्रतिशत ।
संपूर्ण कुल आय पर
आय-कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय- कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय - कर की रकम में ऐसी प्रत्येक फर्म की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है ऐसे आय कर के बारह प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए बढ़ा दिया जाएगाः
परंतु ऊपर उल्लिखित प्रत्येक फर्म की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय- कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम एक करोड़ रुपए की कुल रकम पर, आय - कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी, जो आय की उस रकम के, जो एक करोड़ रुपएं से अधिक है , आधिक्य में है ।
पैरा घ
प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी की दशा में,- [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
156
आय- कर की दर
30प्रतिशत ।
संपूर्ण कुल आय पर
आय- कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय - कर की रकम में , ऐसे प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी की दशा में , जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय - कर के बारह प्रतिशत की दर से परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए, बढ़ा दिया जाएगाः
परंतु ऊपर उल्लिखित प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आयकर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम एक करोड़ रुपए की कुल रकम पर आय- कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी, जो आय की उस रकम के, जो एक करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है ।
पैरा ङ
कंपनी की दशा में, -
आय-कर की दरें
कुल आय का 30 प्रतिशत ।
I. देशी कंपनी की दशा में
II . देशी कंपनी से भिन्न कंपनी की दशा में,-
(i ) कुल आय के उतने भाग पर, जो निम्नलिखित के रूप में है,-
(क) उसके द्वारा 31 मार्च, 1961 के पश्चात् किंतु 1 अप्रैल, 1976 के पूर्व सरकार या किसी भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में सरकार या भारतीय समुत्थान से प्राप्त स्वामिस्व; या
50प्रतिशत ।
(ख) उसके द्वारा 29 फरवरी , 1964 के पश्चात् किंतु 1 अप्रैल, 1976 के पूर्व सरकार या किसी भारतीय समुत्थान के साथ किए गए किसी करार के अनुसरण में तकनीकी सेवाएं प्रदान करने के लिए सरकार या भारतीय समुत्थान से प्राप्त फीस ,
और जहां, ऐसा करार दोनों में से प्रत्येक दशा में, केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित कर दिया गया है
40प्रतिशत ।
(ii ) कुल आय के अतिशेष पर, यदि कोई हो
आय -कर पर अधिभार
इस पैरा के पूर्ववर्ती उपबंधों या आय - कर अधिनियम की धारा 111 क या धारा 112 के उपबंधों के अनुसार संगणित आय - कर की रकम में निम्नलिखित दर से, -
( i ) प्रत्येक देशी कंपनी की दशा में,-
(क) जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे आय - कर के सात प्रतिशत कीदर से; और
(ख ) जिसकी कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसे आय- कर के बारह प्रतिशत की दर से;
( ii ) देशी कंपनी से भिन्न प्रत्येक कंपनी की दशा में,-
(क) जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसे आय- कर के दो प्रतिशत कीदर से; और
(ख) जिसकी कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है , ऐसे आय - कर के पांच प्रतिशत की दर से,
परिकलित अधिभार, संघ के प्रयोजनों के लिए बढ़ा दिया जाएगा:
परंतु प्रत्येक ऐसी कंपनी की दशा में, जिसकी कुल आय एक करोड़ रुपए से अधिक है, किंतु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, ऐसी आय पर भारत का राजपत्र असाधारण
157 अनुभाग 1क]
आय -कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम, एक करोड़ रुपए की कुल आय पर आय - कर के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी जो अन्य की उस रकम के जो एक करोड़ रुपए से अधिक है, आधिक्य में है:
परंतु यह और कि प्रत्येक ऐसी कंपनी की दशा में, जिसकी कुल आय दस करोड़ रुपए से अधिक है, ऐसी आय पर आय- कर और अधिभार के रूप में संदेय कुल रकम, दस करोड़ रुपए की कुल आय पर आय - कर और अधिभार के रूप में संदेय उस कुल रकम से अधिक नहीं होगी , जो आय की उस रकम के , जो दस करोड़ रुपए से अधिक है , आधिक्य में है ।
भाग 4
[धारा 2( 13 ) ( ग ) देखिए।
शुद्ध कृषि- आय की संगणना के नियम
नियम 1- आय-कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 1 क ) के उपखंड ( क ) में निर्दिष्ट प्रकृति की कृषि आय इस प्रकार संगणित की जाएगी मानो वह उस अधिनियम के अधीन " अन्य स्रोतों से आय " शीर्ष के अधीन आय - कर से प्रभार्य आय हो और उस अधिनियम की धारा 57 से धारा 59 के उपबंध, जहां तक हो सके, तदनुसार लागू होंगे:
परंतु धारा 58 की उपधारा ( 2 ) इस उपांतरण के साथ लागू होगी कि उसमें धारा 40 क के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत धारा 40क की उपधारा ( 3 ) और उपधारा ( 4 ) के प्रति निर्देश नहीं है ।
नियम 2-आय-कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 1 क ) के उपखंड ( ख ) या उपखंड ( ग ) में निर्दिष्ट प्रकृति की कृषि-आय ( जो ऐसी आय से भिन्न है, जो ऐसे भवन से व्युत्पन्न होती है, जिसकी उक्त उपखंड ( ग ) में निर्दिष्ट भाटक या आमदनी के पाने वाले को या खेतिहर को या वस्तु रूप में भाटक के पाने वाले को निवास - गृह के रूप में आवश्यकता हो ) इस प्रकार संगणित की जाएगी मानो वह उस अधिनियम के अधीन " कारबार या वृत्तिके लाभ और अभिलाभ " शीर्ष के अधीन आय- कर से प्रभार्य आय हो और आय- कर अधिनियम की धारा 30 , धारा 31 , धारा 32 , धारा 36 , धारा 37, धारा 38 , धारा , 40 , धारा 40 क उसकी उपधारा ( 3 ) और उपधारा ( 4 ) से भिन्न] धारा 41 , धारा 43 , धारा 43क , धारा 43ख और धारा 43 ग के उपबंध, जहां तक हो सके , तदनुसार लागू होंगे ।
नियम 3- आय- कर अधिनियम की धारा 2 के खंड ( 1 क ) के उपखंड ( ग ) में निर्दिष्ट प्रकृति की कृषि आय , जो ऐसी आय है, जो ऐसे भवन से व्युत्पन्न होती है, जिसकी उक्त उपखंड ( ग ) में निर्दिष्ट भाटक या आमदनी के पाने वाले को या खेतिहर को या वस्तु रूप में भाटक के पाने वाले को निवास - गृह के रूप में आवश्यकता हो, इस प्रकार संगणित की जाएगी मानो वह उस अधिनियम के अधीन " गृह- संपत्ति से आय " शीर्ष के अधीन आय-कर से प्रभार्य आय हो और उस अधिनियम की धारा 23 से धारा 27 के उपबंध , जहां तक हो सके , तदनुसार लागू होंगे ।
नियम 4- इन नियमों के किन्हीं अन्य उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, उस दशा में-
(क ) जहां निर्धारिती को भारत में उसके द्वारा उपजाई गई और विनिर्मित चाय के विक्रय से आय व्युत्पन्न होती है, ऐसी आय , आय-कर नियम, 1962 के नियम 8 के अनुसार संगणित की जाएगी और ऐसी आय के साठ प्रतिशत भाग को , निर्धारिती की कृषि आय समझा जाएगा;
( ख ) जहां निर्धारिती को, भारत में उसके द्वारा उगाए गए रबड़ के पौधों से उसके द्वारा विनिर्मित या प्रसंस्कृत तकनीकी रूप से विनिर्दिष्ट ब्लाक रबड़ के सेंट्रीफ्यूज लेटेक्स या सिनेक्स या क्रेप्स पर आधारित लेटेक्स ( जैसे पेल लेटेक्स क्रेप ) या ब्राउन क्रेप ( जैसे एस्टेट ब्राउन क्रेप , रिमिल्डक्रेप , स्माक्ड ब्लेन्केट क्रेप या फ्लेट बार्क क्रेप ) के विक्रय से आय व्युत्पन्न होती है, ऐसी आय , आय- कर नियम , 1962 के नियम 7क के अनुसार संगणित की जाएगी और ऐसी आय के पैंसठ प्रतिशत भाग को, निर्धारिती की कृषि- आय समझा जाएगा;
( ग ) जहां निर्धारिती को भारत में उसके द्वारा उपजाई गई और विनिर्मित कॉफी के विक्रय से आय व्युत्पन्न होती है, ऐसी आय , आय-कर नियम, 1962 के नियम 7ख के अनुसार संगणित की जाएगी और ऐसी आय के, यथास्थिति, साठ प्रतिशत या पचहत्तर प्रतिशत भाग को, निर्धारिती की कृषि- आय समझा जाएगा ।
नियम 5- जहां निर्धारिती किसी ऐसे व्यक्ति- संगम या व्यष्टि- निकाय ( हिन्दू अविभक्त कुटुंब, कंपनी या फर्म से भिन्न ) का सदस्य है, जिसकी पूर्ववर्ष में आय- कर अधिनियम के अधीन कर से प्रभार्य या तो कोई आय नहीं है या जिसकी कुल आय किसी व्यक्ति- संगम या व्यष्टि- निकाय (हिंदू अविभक्त कुटुंब, कंपनी या फर्म से भिन्न) की दशा में कर से प्रभार्य न होने वाली अधिकतम रकम से अधिक नहीं है किंतु जिसकी कोई कृषि- आय भी है वहां उस संगम या निकाय की कृषि- आय या हानि, इन नियमों के अनुसार संगणित की जाएगी और इस प्रकार संगणित कृषि- आय या हानि में निर्धारिती के अंश को, निर्धारिती की कृषि आय या हानि समझा जाएगा ।
नियम 6-जहां कृषि- आय के किसी स्रोत के संबंध में पूर्ववर्ष के लिए संगणना का परिणाम हानि है, वहां ऐसी हानि, कृषि- आय के किसी अन्य स्रोत से उस पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती की आय के प्रति, यदि कोई हो, मुजरा की जाएगीः [भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
158
परंतु जहां निर्धारिती किसी व्यक्ति- संगम या व्यष्टि- निकाय का सदस्य है और, यथास्थिति, संगम या निकाय की कृषि- आय में निर्धारिती का अंश हानि है, वहां ऐसी हानि, कृषि- आय के किसी अन्य स्रोत से निर्धारिती की किसी आय के प्रति मुजरा नहीं की जाएगी ।
नियम 7- राज्य सरकार द्वारा कृषि आय पर उद्गृहीत किसी कर मद्धे निर्धारिती द्वारा संदेय राशि की, कृषि आय की संगणना करने में, कटौती कीजाएगी ।
नियम 8-( 1 ) जहां निर्धारिती की, 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष में कोई कृषि आय है और 2007 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2008 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2009 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्षों से सुसंगत पूर्ववर्षों में से किसी एक या अधिक के लिए निर्धारिती की कृषि - आय की संगणना का शुद्ध परिणाम हानि है, वहां इस अधिनियम की धारा 2की उपधारा ( 2 ) के प्रयोजनों के लिए, -
(i ) 2007 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदिकोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2008 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2009 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि- आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(ii) 2008 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदिकोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2009 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 केअप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि- आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(iii) 2009 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदि कोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि- आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(iv) 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदि कोई हो , जिस तक ऐसी हानि 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि- आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(v) 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदि कोई हो , जिस तक ऐसी हानि 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(vi ) 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि , उस परिमाण तक, यदि कोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(vii ) 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदिकोई हो , जिस तक ऐसी हानि 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि- आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(viii) 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती की कृषि आय के प्रति मुजरा की जाएगी ।
(2 ) जहां निर्धारिती की, 2016 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष में या, यदि आय- कर अधिनियम केकिसी उपबंध के आधार पर, आय - कर उस पूर्ववर्ष से भिन्न किसी अवधि की आय के संबंध में प्रभारित किया जाना है तो , ऐसी अन्य अवधि में, कोई कृषि- आय है और 2008 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2009 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्षों से सुसंगत पूर्ववर्षों में से किसी एक या अधिक के लिए निर्धारिती की कृषि आय की संगणना का शुद्ध परिणाम हानि है, वहां इस अधिनियम की धारा 2 की उपधारा ( 10 ) के प्रयोजनों के लिए,- भारत का राजपत्र असाधारण
159 अनुभाग 1 क]
(i) 2008 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदिकोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2009 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(ii) 2009 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदि कोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि- आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(iii) 2010 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदिकोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
( iv) 2011 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदि कोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(v) 2012 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदिकोई हो , जिस तक ऐसी हानि 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि - आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(vi) 2013 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदि कोई हो , जिस तक ऐसी हानि 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन या 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(vii ) 2014 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, उस परिमाण तक, यदि कोई हो, जिस तक ऐसी हानि 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए कृषि- आय के प्रति मुजरा नहीं की गई है;
(viii) 2015 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए इस प्रकार संगणित हानि, 2016 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती की कृषि आय के प्रति मुजरा की जाएगी ।
(3) जहां किसी स्रोत से कृषि - आय प्राप्त करने वाले व्यक्ति का, कोई अन्य व्यक्ति, विरासत से भिन्न रीति से, उसी हैसियत में उत्तराधिकारी हो गयाहै , वहां उपनियम ( 1 ) या उपनियम ( 2 ) की कोई बात, हानि उठाने वाले व्यक्ति से भिन्न किसी व्यक्ति को, यथास्थिति, उपनियम ( 1 ) या उपनियम (2) के अधीन मुजरा कराने का हकदार नहीं बनाएगी ।
(4) इस नियम में किसी बात के होते हुए भी, ऐसी हानि, जिसे निर्धारण अधिकारी द्वारा इन नियमों के या वित्त अधिनियम, 2007 (2007 का 22) की पहली अनुसूची या वित्त अधिनियम, 2008 ( 2008 का 18 ) की पहली अनुसूची या वित्त ( संख्यांक 2 ) अधिनियम, 2009 ( 2009 का 33 ) की पहली अनुसूची या वित्त अधिनियम, 2010 ( 2010 का 14 ) की पहली अनुसूची या वित्त अधिनियम, 2011 ( 2011 का 8 ) की पहली अनुसूची या वित्त अधिनियम, 2012 (2012 का 23 ) की पहली अनुसूची या वित्त अधिनियम, 2013 ( 2013 का 17 ) की पहली अनुसूची या वित्त ( संख्यांक 2 ) अधिनियम, 2014 ( 2014 का 25 ) की पहली अनुसूची में अंतर्विष्ट नियमों के उपबंधों के अधीन अवधारित नहीं किया गया है, यथास्थिति, उपनियम ( 1) या उपनियम ( 2 ) के अधीन मुजरा नहीं की जाएगी ।
नियम 9-जहां इन नियमों के अनुसार की गई संगणना का अंतिम परिणाम हानि है, वहां इस प्रकार संगणित हानि पर ध्यान नहीं दिया जाएगा और शुद्ध कृषि- आय को शून्य समझा जाएगा ।
नियम 10-आय- कर अधिनियम के निर्धारण की प्रक्रिया से संबंधित उपबंध ( जिनके अंतर्गत आय के पूर्णांकन से संबंधित धारा 288 क के उपबंध भी हैं ) आवश्यक उपांतरणों सहित, निर्धारिती की शुद्ध कृषि आय की संगणना के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे, जैसे वे कुल आय के निर्धारण के संबंध में लागू होते हैं ।
नियम 11- निर्धारिती की शुद्ध कृषि-आय की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए, निर्धारण अधिकारी को वही शक्तियां होंगी , जो उसे कुल आय के निर्धारण के प्रयोजनों के लिए आय- कर अधिनियम के अधीन हैं ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
160
दूसरी अनुसूची
(धारा 91 देखिए)
सीमाशुल्क टैरिफ अधिनियम , की पहली अनुसूची में,-
(1 ) अध्याय 27 में, टैरिफ मद 2701 1200 के सामने आने वाली स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 10 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(2 ) अध्याय 72 में, सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाली स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 15 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(3) अध्याय 73 में, सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाली स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 15 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(4) अध्याय 87 में , शीर्ष 8702 और 8704 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाली स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 40 % " प्रविष्टिरखी जाएगी ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
161
तीसरी अनुसूची (धारा 104 देखिए)
अधिसूचना संख्यांक और तारीख
(1)
सा०का०नि० संख्यांक 163 (अ) ,
संशोधन
संशोधनके प्रभावी होने की अवधि
(2)
(3)
17 मार्च, 2012 से
उक्तअधिसूचना की सारणी में, क्रम संख्यांक 205 और उससे संबंधित प्रविष्टिके पश्चात्, निम्नलिखित क्रम संख्यांक और प्रविष्टियां अंतःस्थापित की
जाएंगी , अर्थात्ः- 2012- केंद्रीय उत्पाद शुल्क, तारीख 17 मार्च, 2012] ,
जिसका, सा०का०नि०
(1)
(2)
"205क
7302या संख्यांक 75 ( अ ) , तारीख 3
2फरवरी, 2014 (जिसमें दोनों दिन सम्मिलित हैं )
(3)
(4) (5)
49 " ;
12%
लौह और इस्पात की रेल या
8530 ट्राम पथ निर्माण सामग्री ।
तारीख 17 मार्च, 2012 [12/ फरवरी , 2014 [ 03/2014- केंद्रीय उत्पाद शुल्क, तारीख 3फरवरी , 2014] द्वारा संशोधन किया गया ।
स्पष्टीकरण इस छूट के प्रयोजनों के लिए, माल का मूल्य रेल के मूल्य को अपवर्जित करते हुए माल का मूल्य होगा।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
162
चौथी अनुसूची
(धारा 105 देखिए)
केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की तीसरी अनुसूची में,-
(i ) क्रम संख्यांक 15 और उससे संबंधित प्रविष्टियों के पश्चात् निम्नलिखित क्रम संख्यांक और प्रविष्टियां अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः-
क्रम सं०
शीर्ष, उपशीर्ष या टैरिफ मद
(2)
(1)
2101 20 "15क.
माल का विवरण
(3)
चाय या मेट के निष्कर्ष, सत और सांद्र और इन निष्कर्षों, सतों या सांद्रों के आधार वाली या चाय या मेट के आधार वाली निर्मितियां ";
(ii ) क्रम संख्यांक 23 और उससे संबंधित प्रविष्टियों के पश्चात् निम्नलिखित क्रम संख्यांक और प्रविष्टियां अंतःस्थापित की जाएंगी, अर्थात्ः-
(2)
(1)
2202
"23क.
(iii) क्रम संख्यांक 94 के सामने, -
(3)
सभी माल";
(क) स्तंभ ( 2 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " अध्याय 85 या अध्याय 94 " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख ) स्तंभ ( 3 ) में " आटोमोबाइल्स के लिए लैम्प के सिवाय " शब्दों के स्थान पर " शीर्ष 8539 के अधीन आने वाली (आटोमोबाइल्स के लिए लैम्प के सिवाय ) , एलईडी लाइट्स या फिक्सचर्स जिसके अंतर्गत अध्याय 85 या शीर्ष 9405 के अधीन आने वाला एलईडी लैम्प भी है" शब्द, अंक, कोष्ठक और अक्षर रखे जाएंगे ।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
163
पांचवी अनुसूची
(धारा 106 देखिए)
केन्द्रीय उत्पाद शुल्क टैरिफ अधिनियम की पहली अनुसूची में,-
(i) अध्याय 4 की, टैरिफ मद 0402 91 10 और 0402 99 20 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(ii) अध्याय 11 में,-
(क) शीर्ष 1107 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) शीर्ष 1108 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 1108 2000 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(iii) अध्याय 13 में स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर ( टैरिफ मद 1302 11 00 के सिवाय ) सभी टैरिफ मदों के सामने " 12.5 % " प्रविष्टिरखीजाएगी;
(iv) अध्याय 15 में, -
(क) टैरिफ मद 1517 10 22 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर , " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख ) टैरिफ मद 1520 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ग ) शीर्ष 1521 और शीर्ष 1522 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(v) अध्याय 17 में शीर्ष 1701 ( टैरिफ मद 1701 13 20 और 1701 14 20 के सिवाय ) , 1702 (टैरिफ मद 1702 90 10 के सिवाय ) और 1704 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(vi ) अध्याय 18 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी ;
(vii ) अध्याय 19 में,-
(क) टैरिफ मद 1901 2000, 1901 9010 और 1901 90 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख ) टैरिफ मद 19024010 और 190240 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ग ) शीर्ष 1904 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ (4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(घ) टैरिफ मद 1905 32 11, 1905 3219 और 1905 32 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5%" प्रविष्टि रखी जाएगी;
(viii) अध्याय 21 में,-
(क) शीर्ष 2101 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 2101 30 10 , 210130 20 और 2101 30 90 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख ) शीर्ष 2102 , 2103 और 2104 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5%" प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ग) शीर्ष 2106 की सभी टैरिफ मदों (टैरिफ मद 2106 90 20 और 2106 90 92 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
164
(ix) अध्याय 22 में,-
(क ) शीर्ष 2201 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 2201 90 10 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 2202 1010 , 2202 10 20 और 2202 10 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 18% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ग ) टैरिफ मद 2202 90 30 और 2202 90 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 12.5 % " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(घ) टैरिफ मद 2207 2000 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 12.5% " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(ङ) शीर्ष 2209 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ (4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(x) अध्याय 24 में,-
(क) टैरिफ मद 24021010 और 240210 20 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% या 3375 रुपए प्रति हजार, जो भी उच्चतर हो , " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 2402 2010 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर " 1280 रुपए प्रति हजार " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ग ) टैरिफ मद 2402 20 20 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 2335 रुपए प्रति हजार " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(घ) टैरिफ मद 2402 20 30 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 1280 रुपए प्रति हजार " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ङ) टैरिफ मद 2402 20 40 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 1740 रुपए प्रति हजार " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(च) टैरिफ मद 2402 20 50 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 2335 रुपए प्रति हजार " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(छ) टैरिफ मद 2402 20 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 3375 रुपए प्रति हजार " प्रविष्टि रखीजाएगी;
(ज) टैरिफ मद 2402 9010 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 3375 रुपए प्रति हजार " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(झ ) टैरिफ मद 2402 90 20 और 2402 90 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% या 3375 रुपए प्रति हजार, जो भी उच्चतर हो, " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ञ) टैरिफ मद 2403 99 70 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 70 रुपए प्रति कि० ग्रा०" प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xi) अध्याय 25 में,-
(क) टैरिफ मद 2503 00 10 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 2515 12 20 और 2515 12 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखीजाएगी;
(ग ) टैरिफ मद 2523 1000 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(घ) टैरिफ मद 2523 21 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ङ) उपशीर्ष 2523 29 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 1000 रुपए प्रतिटन " प्रविष्टि रखी जाएगी;
भारत का राजपत्र असाधारण
165 अनुभाग 1क]
( च) टैरिफ मद 2523 30 00, 2523 90 10 , 2523 9020 और 2523 90 90 के सामने आने वाले स्तंभ (4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xii ) अध्याय 26 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xiii) अध्याय 27 की टैरिफ मद 27101930 के सामने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 14%+15 रुपए प्रति लीटर "प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xiv) अध्याय 28 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 2804 4010, 2844 3022, 2845 10 00 , 2845 90 10 और 2853 00 30 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xv) अध्याय 29 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 2933 4100 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xvi) अध्याय 31 में शीर्ष 3102, 3103 , 3104 और 3105 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xvii) अध्याय 32 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 3215 9010 और 3215 90 20 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xviii) अध्याय 33 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 3307 41 00 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5%" प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xix) अध्याय 34 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xx) अध्याय 35 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxi) अध्याय 36 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxii ) अध्याय 37 में शीर्ष 3701 , 3702, 3703, 3704 और 3707 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxiii) अध्याय 38 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 3824 50 10, 38251000, 3825 2000 और 3825 3000 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxiv) अध्याय 39 में,-
(क) सभी टैरिफ मदों (टैरिफ मद 391610 20 , 3916 20 11 , 3916 20 91 , 3916 90 10 , 3923 21 00, 3923 29 10 और 3923 29 90 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 3923 21 00 , 3923 2910 और 3923 29 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 18% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxv) अध्याय 40 में,-
(क) शीर्ष 4002 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी ;
(ख) टैरिफ मद 4003 00 00 और 4004 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ग ) शीर्ष 4005 से 4007, 4008 ( टैरिफ मद 400819 10 , 4008 21 10 और 4008 29 20 के सिवाय) , 4009 से 4011 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(घ) टैरिफ मद 4012 90 10 से 4012 90 90 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ङ) शीर्ष मद 4013 , 4014 ( टैरिफ मद 40141010 और 401410 20 के सिवाय ) , 4015, 4016 और 4017 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
166
(xxvi ) अध्याय 42 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxvii ) अध्याय 43 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxviii ) अध्याय 44 में,-
(क) शीर्ष 4401 , 4403, 4404, 4406 , 4408 ( टैरिफ मद 44081030, 4408 31 30 और 4408 39 30 और 4408 90 20 के सिवाय ) , 4409 से 4412 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 4413 00 00 और 4414 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(ग ) शीर्ष 4415 और 4416 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टिरखीजाएगी;
(घ) टैरिफ मद 4417 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ङ) शीर्ष 4418 से 4421 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ (4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखीजाएगी;
(xxix ) अध्याय 45 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxx ) अध्याय 47 में, शीर्ष 4707 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxxi) अध्याय 48 में,-
(क ) शीर्ष 4803 , 4806 ( टैरिफ मद 4806 2000 और 4806 4010 के सिवाय ) , 4809 और 4811 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
में की प्रविष्टि के स्थान पर, "
4812 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 )
(ख ) टैरिफ मद
(ग) शीर्ष 4813 , 4814, 4816, 4818 , 4819 ( टैरिफ मद 4819 2010 के सिवाय ) , 4820 से 4822 और 4823 ( टैरिफ मद 4823 90 11 के सिवाय ) , की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxxii ) अध्याय 49 में, शीर्ष 4908 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxxiii ) अध्याय 50 में, शीर्ष 5004 से 5007 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5%" प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxxiv ) अध्याय 51 में, शीर्ष 5105 से 5113 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxxv) अध्याय 52 में, शीर्ष 5204 से 5212 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxxvi ) अध्याय 53 में, शीर्ष 5302 , 5305, 5306, 5307 (टैरिफ मद 5307 10 90 के सिवाय ) , 5308 ( टैरिफ मद 5308 10 10 , 5308 10 20 और 53081090 के सिवाय ) , 5309 , 5310 और 5311 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxxvii ) अध्याय 54 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xxxviii ) अध्याय 55 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
" 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर,
(xxxix ) अध्याय 56 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ
(xl ) अध्याय 57 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
भारत का राजपत्र असाधारण
167 अनुभाग 1क]
(xli ) अध्याय 58 में , शीर्ष 5801 , 5802, 5803 , 5804 (टैरिफ मद 5804 3000 के सिवाय ) , 5806 और 5808 से 5811 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xlii ) अध्याय 59 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xliii ) अध्याय 60 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
( xliv ) अध्याय 61 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ (4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी ;
(xlv) अध्याय 62 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xlvi ) अध्याय 63 में,
(क ) शीर्ष 6301 से 6307 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ (4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखीजाएगी;
(ख ) टैरिफ मद 6308 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
( xlvii ) अध्याय 64 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xlviii ) अध्याय 65 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 65030000 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ (4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(xlix ) अध्याय 66 में शीर्ष 6603 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(1) अध्याय 67 में शीर्ष 6702 से 6704 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 %" प्रविष्टिरखी जाएगी;
( li ) अध्याय 68 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
( lii ) अध्याय 69 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 6901 00 10 और 69041000 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(liii) अध्याय 70 में सभी टैरिफ मदों के टैरिफ मद 70120000, 7018 10 10, 7018 10 20 , 7020 00 11 , 7020 0012 और 7020 00 21 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(liv) अध्याय 71 में,-
(क) शीर्ष 7101 , 7103, 7104 (टैरिफ मद 71041000 के सिवाय ) , 7105 और 7106 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 7107 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
जाएगी; ( ग) शीर्ष 7108 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी (घ) टैरिफ मद 7109 0000 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी ;
(ङ) शीर्ष 7110 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(च) टैरिफ मद 71110000 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(छ) शीर्ष 7112 से 7116 और 7118 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(lv) अध्याय 72 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lvi ) अध्याय 73 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
168
(Ivii) अध्याय 74 में,-
(क) शीर्ष 7401 से 7404 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 7405 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी ;
(ग) शीर्ष 7406 से 7412 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखीजाएगी;
(घ) टैरिफ मद 7413 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ङ) शीर्ष 7415, 7418 और 7419 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(lviii) अध्याय 75 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lix) अध्याय 76 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी ;
(Ix) अध्याय 78 की शीर्ष 7801 , 7802 , 7804 और 7806 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxi ) अध्याय 79 में , शीर्ष 7901 से 7905 और 7907 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, "12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxii) अध्याय 80 में, शीर्ष 8001 , 8002, 8003 और 8007 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxiii) अध्याय 81 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxiv) अध्याय 82 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 8215 10 00, 8215 20 00, 8215 91 00 और 8215 9900 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(Ixv) अध्याय 83 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxvi) अध्याय 84 में, शीर्ष 8401 से 8423, 8424 ( टैरिफ मद 8424 8100 के सिवाय ) 8425 से 8431 , 8434, 8435, 8438 से 8451 , 8452 ( टैरिफ मद 8452 10 12, 8452 10 22, 8452 30 10 , 8452 30 90 , 8452 90 11 , 8452 90 19 , 8452 90 91 और 8452 90 99 के सिवाय ) 8453 से 8468 , 8469 ( टैरिफ मद 846900 30 और 846900 40 के सिवाय ) , 8470 से 8478 , 8479 ( टैरिफ मद 8479 89 92 के सिवाय ) 8480 से 8484, 8486 और 8487 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxvii) अध्याय 85 में,-
(क) शीर्ष 8501 से 8519 , 8521 , 8522 , 8523 , 8525 से 8533 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख ) टैरिफ मद 8534 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर , " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ग ) शीर्ष 8535 से 8547 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(घ) टैरिफ मद 8548 9000 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxviii) अध्याय 86 में, -
(क ) टैरिफ मद 8604 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 %" प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख ) शीर्ष 8607 और 8608 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1क]
169
(ग ) टैरिफ मद 8609 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी; ( lxix) अध्याय 87 में,
(क ) शीर्ष 8701 , 8702 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 8702 1011 , 8702 10 12, 8702 10 19 , 8702 90 11 , 8702 90 12 और 87029019 के सिवाय ) , के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 %" प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मदें 8703 10 10 और 8703 90 10 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
( ग) शीर्ष 8704 (टैरिफ मद 87041090 , 8704 31 90 , 8704 32 19 , 8704 32 90 , 8704 90 19 और 8704 90 90 के सिवाय ) और 8705 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर , " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(घ) टैरिफ मद 8706 00 11 , 8706 00 19 , 8706 00 31 , 8706 00 41 और 8706 00 50 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ङ) शीर्ष 8707, 8708 और 8709 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(च) टैरिफ मद 8710 0000 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(छ) शीर्ष 8711 , 8712 और 8714 से 8716 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxx) अध्याय 88 में , शीर्ष 8802 ( टैरिफ मद 88026000 के सिवाय ) और 8803 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ (4) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxxi) अध्याय 89 में, -
(क ) शीर्ष 8903 और 8907 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 8908 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी ; (lxxii) अध्याय 90 में,-
(क ) शीर्ष 9001 (टैरिफ मद 9001 4010 , 9001 40 90 और 9001 5000 के सिवाय ) , 9002 से 9008 , 9010 से 9016 , 9017 (टैरिफ मद 9017 20 10, 9017 20 20 , 901720 30 और 9017 20 90 के सिवाय ) , 9018 और 9019 की सभी टैरिफ मदों केसामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 9020 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी ;
(ग ) शीर्ष 9022 से 9032 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(घ) टैरिफ मद 9033 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी ; (lxxiii) अध्याय 91 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ (4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxxiv) अध्याय 92 में, - ( क) शीर्ष 9201 , 9202 और 9205 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5%" प्रविष्टि रखी जाएगी;
( ख ) टैरिफ मद 9206 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी; ( ग) शीर्ष 9207 से 9209 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखीजाएगी;
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
170
(lxxv) अध्याय 93 में,-
(क) टैरिफ मद 9302 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
जाएगी; (ख ) शीर्ष 9303 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी (ग ) टैरिफ मद 9304 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(घ ) शीर्ष 9305 और 9306 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टिरखीजाएगी;
(ङ) टैरिफ मद 93070000 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(Ixxvi) अध्याय 94 की सभी टैरिफ मदों ( टैरिफ मद 9405 50 10 के सिवाय ) के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(Ixxvii ) अध्याय 95 में शीर्ष 9503 से 9508 ( टैरिफ मद 9508 1000 के सिवाय ) की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टिके स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(lxxviii ) अध्याय 96 में,-
(क) शीर्ष 9601 से 9603 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ख) टैरिफ मद 9604 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ग ) शीर्ष 9605 , 9606 में ( टैरिफ मदें 9606 21 00 , 9606 22 00 , 960629 10 , 960629 90 और 9606 30 10 के सिवाय ) और 9607 से 9608 के सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(घ ) टैरिफ मद 9611 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी;
(ङ) शीर्ष 9612 और 9613 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टिरखी जाएगी;
(च ) टैरिफ मद 9614 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5 % " प्रविष्टि रखी जाएगी; (छ) शीर्ष 9616 और 9617 की सभी टैरिफ मदों के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टिरखीजाएगी;
(ज ) टैरिफ मद 9618 00 00 के सामने आने वाले स्तंभ ( 4 ) में की प्रविष्टि के स्थान पर, " 12.5% " प्रविष्टि रखी जाएगी;
भारत का राजपत्र असाधारण
171 अनुभाग 1क]
दिल्ली उच्च न्यायालय ( संशोधन) अधिनियम , 2015
(2015 का अधिनियम संख्यांक 23)
[10अगस्त, 2015 ]
दिल्ली उच्च न्यायालय अधिनियम , 1966 का और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छियासठवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
1. ( 1 ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली उच्च न्यायालय ( संशोधन) अधिनियम ,
2015है ।
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ,
नियत करे ।
1966 का 26
धारा 5 का
संशोधन ।
2. दिल्ली उच्च न्यायालय अधिनियम, 1966 की धारा 5 की उपधारा (2) में "बीस लाख रुपए" शब्दों के स्थान पर " दो करोड़ रुपए" शब्द रखे जाएंगे ।
[भाग 2-
भारत का राजपत्र असाधारण
172
3. राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली में यथा प्रवृत्त पंजाब न्यायालय अधिनियम, 1918 की धारा 25 में , " बीस लाख रुपए " शब्दों के स्थान पर, " दो करोड़ रुपए " शब्द रखे जाएंगे ।
राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली में यथा प्रवृत्त 1918 के पंजाब अधिनियम 6 का संशोधन ।
4. दिल्ली उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति ऐसा कोई वाद या अन्य कार्यवाहियां , जो इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व उच्च न्यायालय में लंबित है या हैं, राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली में ऐसे अधीनस्थ न्यायालय को अन्तरित कर सकेगा जिसे ऐसे वाद या कार्यवाहियां उसी प्रकार ग्रहण करने की अधिकारिता होगी , मानो ऐसा वाद या ऐसी कार्यवाहियां ऐसे प्रारंभ के पश्चात् प्रथम बार में संस्थित किया गया है या फाइल की गई हैं ।
लंबित वाद और कार्यवाहियां अधीनस्थ न्यायालयों को अन्तरित करने की मुख्य न्यायमूर्तिकी शक्ति।
भारत का राजपत्र असाधारण
अनुभाग 1 क]
173
भारत का राजपत्र, असाधारण , भाग 2 , अनुभाग 1 क, संख्यांक 1 , तारीख 20 मार्च , 2015 ,
खण्डLI का शुद्धिपत्रः-
धारा
पंक्ति
पृष्ठ
9
1
(7) ( v)
21
2
7( ii) (ख)
21
3
7(ii) (ख)
4
105
11 (i ) ( 1क) के स्थान पर
पढ़े
केअंधीन
के अधीन
रकम की, घटा दिया रकमको,
जाएगा
घटा दिया जाएगा
नईआस्तिअ
नई आस्तियों
डॉ॰ वी॰ नारायण राजू, सचिव, भारत सरकार ।
RAM
Digitallysigned by RAMDAYAL
DAYAL
Date: 2016.06.03 13:36:15+05'30'
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GMGIPMRND-4343 GI (S3 )-26-05-2016.