Servants of Knowledge
Extraordinary Gazette of India · Government of India

In exercise of the powers conferred upon it under sub section 2 of section11

Published 23 November 2016

Ministry
Telecom Regulatory Authority of India
Department
Not Applicable
Office
Not Applicable
Gazetteid
NOT available ( 172727 )
Identifier
in.gazette.central.e.2016-11-23.172727
Languages
English, Hindi
Published at
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REGD. NO. D. L.-33004/99 रजिस्ट्री सं॰ डी॰ एल॰-33004/99

असाधरण

EXTRAORDINARY

भाग III—खण्ड 4

PART III—Section 4

प्राध्किार से प्रकाशित

PUBLISHED BY AUTHORITY

सं. 422] नई दिल्ली, बुध्वार, नवम्बर 23, 2016/अग्रहायण 2, 1938

No. 422] NEW DELHI, WEDNESDAY, NOVEMBER 23, 2016/AGRAHAYANA 2, 1938

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण

दूरसंचार टैरिफ (इकसठवां संशोधन) आदेश, 2016] [दूरसंचार टैरिफ (इकसठवां संशोधन) आदेश, 2016 दूरसंचार टैरिफ (इकसठवां संशोधन) आदेश, 2016 दूरसंचार टैरिफ (इकसठवां संशोधन) आदेश, 2016

(2016 का 1)(2016 का 1)(2016 का 1)(2016 का 1)

अधिसूचनाअधिसूचनाअधिसूचनाअधिसूचना

नई दिल्ली, 22 नवम्बर, 2016

संख्या-301-30/2016-एफएंडईएसंख्या-301-30/2016-एफएंडईएसंख्या-301-30/2016-एफएंडईएसंख्या-301-30/2016-एफएंडईए.—भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 (1997 का 24) की धारा 11 की उप-धारा (1) के खण्ड (बी) उप-खण्ड (i) के साथ पठित उक्त धारा की उप-धारा (2) के अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण, दूरसंचार टैरिफ आदेश, 1999 में और संशोधन करने के लिए एतद्‌द्वारा निम्नलिखित आदेश बनाता है, नामतः-

1111.... (1) इस आदेश को दूरसंचार टैरिफ (इकसठवां संशोधन) आदेश, 2016 कहा जाएगा।

(2) यह आदेश, ''भारत का राजपत्र'' में प्रकाषित होने के तिथि से प्रवृत्त होगा।

2222.... दूरसंचार टैरिफ आदेश, 1999 (जिसे आगे मूल टैरिफ आदेश कहा गया है) के ख्ांड-2 में -

(अ) उप-खंड ''आरबी'' के लिए निम्नलिखित उप-खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, नामतः-

''आरबी. ''यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग तथा भुगतान सेवा'' से आशय यूएसएसडी पर मोबाइल फोन के द्वारा बैंकिंग तथा भुगतान सेवा प्रदान करने, से है'',

(ख) उप-खंड ''आरसी'' के लिए निम्नलिखित उप-खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, नामतः-

''आरसी. ''यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सेवाओं के लिए यूएसएसडी सत्र'' से आशय मोबाइल उपभोक्ता और बैंक अथवा उसके एजेंट अथवा इस प्रयोजनार्थ आरबीआई द्वारा प्राधिकृत किसी विनियमित कंपनी के बीच यूएसएसडी पर मोबाइल फोन के द्वारा बैंकिंग तथा भुगतान सेवा प्रदान करने हेतु यूएसएसडी पर एक सत्र, से है''

5405 GI/2016

(1)2 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART III—SEC. 4] 3. मूल टैरिफ आदेश की अनुसूची-2 में मद संख्या (7ए) के पष्चात्‌, निम्नलिखित मदें व उससे संबंधित प्रविष्टियों को सम्मिलित किया जाएगा, नामतः-

मदमदमदमद टैरिफ टैरिफटैरिफ
''(7बी) यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग एवं भुगतान सेवाओं के लिए यूएसएसडी का उपयोग
(7.ए) यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग तथा भुगतान सेवाओं के लिए आÅटगोइंग यूएसएसडी सत्र का प्रभार प्रति यूएसएसडी सत्र के लिए 0.50 रुपए की अधिकतम सीमा
(7.बी) यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सेवाओं तथा भुगतान सेवाओं से संबंधित अन्य मामले आस्थगित (फॉर्बेरन्स)''

विनोद कोतवाल, सलाहकार (एफएण्डईए)

[विज्ञापन-III/4/असा./213 (142)] टिप्पणी :टिप्पणी :टिप्पणी :टिप्पणी : इस अधिसूचना का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाषन सं. विज्ञापन-III/4/असा./311(142) दिनांक 22.11.2016 को प्रकाषित हो चुका है ।

टिप्पणी 1 :टिप्पणी 1 :टिप्पणी 1 :टिप्पणी 1 : दूरसंचार टैरिफ आदेश, 1999 दिनांक 09 मार्च, 1999 की अधिसूचना संख्या 99/3 के अंतर्गत भारत के राजपत्र, असाधारण, भाग-3, खण्ड 4 में प्रकाशित हुआ था तथा इसमें तत्पश्चात्‌ निम्नलिखित अधिसूचनाओं द्वारा संशोधन किए गएः-

संशोधन संख्या अधिसूचना संख्या और तारीख
पहला 301-4/99-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 30.3.1999
दूसरा 301-4/99-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 31.5.1999
तीसरा 301-4/99-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 31.5.1999
चौथा 301-4/99-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 28.7.1999
5वां 301-4/99-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 17.9.1999
6वां 301-4/99-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 30.9.1999
7वां 301-8/2000-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 30.3.2000
8वां 301-8/2000-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 31.7.2000
9वां 301-8/2000-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 28.8.2000
10वां 306-1/99-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 9.11.2000
11वां 310-1(5)/ट्राई-2000 दिनांक 25.1.2001
12वां 301-9/2000-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 25.1.2001
13वां 303-4/ट्राई-2001 दिनांक 1.5.2001
14वां 306-2/ट्राई-2001 दिनांक 24.5.2001
15वां 310-1(5)/ट्राई-2000 दिनांक 20.7.2001
16वां 310-5(17)/2001-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 14.8.2001
17वां 301/2/2002-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 22.1.2002
18वां 303/3/2002-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 30.1.2002
19वां 303/3/2002-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 28.2.2002
20वां 312-7/2001-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 14.3.2002
21वां 301-6/2002-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 13.6.2002
22वां 312-5/2002-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 4.7.2002
23वां 303/8/2002-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 6.9.2002
24वां 306-2/2003-आर्थिक दिनांक 24.1.2003
25वां 306-2/2003-आर्थिक दिनांक 12.3.2003
26वां 306-2/2003-आर्थिक दिनांक 27.3.2003
27वां 303/6/2003-ट्राई (आर्थिक) दिनांक 25.4.2003
28वां 301-51/2003-आर्थिक दिनांक 5.11.2003
29वां 301-56/2003-आर्थिक दिनांक 3.12.2003
30वां 301-4/2004 (आर्थिक) दिनांक 16.1.2004
31वां 301-2/2004-आर्थिक दिनांक 7.7.2004
32वां 301-37/2004-आर्थिक दिनांक 7.10.2004
33वां 301-31/2004-आर्थिक दिनांक 8.12.2004
34वां 310-3(1)/2003-आर्थिक दिनांक 11.3.2005
35वां 310-3(1)/2003-आर्थिक दिनांक 31.3.2005
36वां 312-7/2003-आर्थिक दिनांक 21.4.2005
37वां 312-7/2003-आर्थिक दिनांक 2.5.2005
38वां 312-7/2003-आर्थिक दिनांक 2.6.2005
39वां 310-3(1)/2003-आर्थिक दिनांक 8.9.2005
40वां 310-3(1)/2003-आर्थिक दिनांक 16.9.2005
41वां 310-3(1)/2003-आर्थिक दिनांक 29.11.2005
42वां 301-34/2005-आर्थिक दिनांक 7.3.2006
43वां 301-2/2006-आर्थिक दिनांक 21.3.2006
44वां 301-34/2006-आर्थिक दिनांक 24.1.2007
45वां 301-18/2007-आर्थिक दिनांक 5.6.2007
46वां 301-36/2007-आर्थिक दिनांक 24.1.2008
47वां 301-14/2008-आर्थिक दिनांक 17.3.2008
48वां 301-31/2007-आर्थिक दिनांक 01.9.2008
49वां 301-25/2009-ईआर दिनांक 20.11.2009
50वां 301-24/2012-ईआर दिनांक 19.04.2012
51वां 301-26/2011-ईआर दिनांक 19.04.2012
52वां 301-41/2012-ईआर दिनांक 19.09.2012
53वां 301-39/2012-एफएण्डईए दिनांक 01.10.2012
54वां 301-59/2012-एफएण्डईए दिनांक 05.11.2012
55वां 301-10/2012-एफएण्डईए दिनांक 17.06.2013
56वां 301-26/2012-एफएण्डईए दिनांक 26.11.2013
57वां 312-2/2013-एफएण्डईए दिनांक 14.07.2014
58वां 312-2/2013-एफएण्डईए दिनांक 01.08.2014
59वां 301-5¼2½/2013-एफएण्डईए दिनांक 21.11.2014
60वां 301-16/2014-एफएण्डईए दिनांक 09.04.2015
भारत का राजपत्रा : असाधरण [भाग III—खण्ड 4] 3

टिप्पणी 2 :टिप्पणी 2 :टिप्पणी 2 :टिप्पणी 2 : व्याख्यात्मक ज्ञापन दूरसंचार टैरिफ (इकसठवां संशोधन) आदेश, 2016 के लिए उद्‌देश्यों और कारणों की व्याख्या करता है।

4 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART III—SEC. 4]

व्याख्यात्मक टिप्पणीव्याख्यात्मक टिप्पणीव्याख्यात्मक टिप्पणीव्याख्यात्मक टिप्पणी

कककक.... प्रस्तावना तथा पृष्ठभूमिप्रस्तावना तथा पृष्ठभूमिप्रस्तावना तथा पृष्ठभूमिप्रस्तावना तथा पृष्ठभूमि

1. दूरसंचार टैरिफ आदेश में वर्तमान संशोधन का उद्‌देश्य, अनस्ट्रकचर्ड सप्लीमेंट्री सर्विस डाटा (यूएसएसडी) आधारित मोबाइल बैंकिंग एवं भुगतान सेवाओं के लिए एक संशोधित फ्रेमवर्क का निर्धारण करना है। संशोधन में मोबाइल फोन पर यूएसएसडी के माध्यम से भुगतान सेवाओं सहित बैंकिंग लेन-देन के लिए संशोधित टैरिफ का निर्धारण किया गया है। इस व्याख्यात्मक ज्ञापन का उद्‌देश्य इस विनियामकारी कार्रवाई के लिए तार्किक आधार प्रस्तुत करना है।

2. मोबाइल फोन का उपयोग कर, आधारभूत वित्तीय सेवाओं को प्रदान करने हेतु ढांचे (फ्रेमवर्क) को अनुमोदित करने के लिए अंतर्मंत्रालयी समूह (आईएमजी) की सिफारिशों पर मंत्रिमंडलीय सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की समिति द्वारा अप्रैल, 2010 में विचार किया गया था। इस फ्रेमवर्क के अनुसार, मोबाइल से जुड़ें ''नो फ्रिल'' खाताें को उपभोक्ता द्वारा पांच आधारभूत लेन-देन करने के लिए उपयोग किया जा सकता है यथा नकदी जमा, नकदी आहरण, शेष राशि का पता लगाने, एक मोबाइल से जुड़े से खाते से दूसरे मोबाइल से जुड़े खाते में धनराशि का अंतरण करना। तथापि, हाल ही में नीतिगत तथा विनियामकारी जोर मात्र बैंकिंग लेन-देन से इतर व्यापक वित्तीय समावेशन के एजेंडे तक फैल गया है। अब वित्तीय समावेशन को समान्यतः सस्ती लागत पर व्यापक स्तर की वित्तीय सेवाओं तक पहुंच माना जाता है, जिसमें बैंकिंग उत्पाद तथा अन्य वित्तीय सेवाएं जैसे बीमा और इक्विटी1 उत्पाद शामिल हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग नेटवर्क बिजनेस कोरसपोंडेंट एजन्टों (बीसी) मॉडल का विस्तार, प्रत्यक्ष अंतरण आदि के विस्तार पर व्यापक रूप से जोर दिया गया है।

3. तथापि, बीसीए नेटवर्क के विस्तार के होते हुए तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की शाखाएं खोलने पर जोर देते हुए भी, इन सेवाओं की पहुंच, एक चिंता का विषय बनी हुई है। जून, 20152 की स्थिति के अनुसार, ग्रामीण तथा अर्ध शहरी क्षेत्रों में प्रति 100,000 जनसंख्या पर केवल 7.8 बैंक शाखाएं हैं जो कि शहरी तथा महानगरों के क्षेत्रों में एक लाख की जनसंख्या पर 18.7 शाखाएं के आधे से भी कम हैं।

4. अगस्त, 2004 में घोषित की गई प्रधानमंत्री जन-धन योजना (टीएमजेडीवाई)3 वित्तीय पहुंच के लाभ कमजोर वर्गों तथा कम आय वाले समूहों तक पहुंच सुनिश्चित कर, इनमें से अनेक विसंगतियों का समाधान करती है। यह योजना, इस बात को मान्यता देती है कि प्रौद्‌योगिकी के प्रभावी उपयोग के माध्यम से ही सस्ती लागत पर प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंच बनाई जा सकती है। इसके साथ ही साथ जनधन आधार मोबाइल (जेएएम) की मोबाइल फोन के उपयोग के माध्यम से वांछित लाभार्थियों तक सरकारी लाभ तथा सहायता की लक्षित सुपुर्दगी हेतु व्यापक समाधान की पेशकश करती है।

5. भारतीय रिजर्व बैंक ने दिसंबर, 20154 की अपनी रिपोर्ट में ''वित्तीय समावेशन हेतु मध्यावधि मार्ग'' के संबंध में एक समिति का गठन किया, जिसने यह सुझाव दिया कि मोबाइल प्रौद्‌योगिकी आधारित कम लागत वाले समाधान वित्तीय समावेशन में सुधार करने के लिए एक बेहतर विकल्प हो सकता है। समिति का मत था कि वित्तीय पहुंच को अधिक सुलभकारी बनाने तथा उपयोग में वृद्धि करने के लिए मोबाइल बैंकिंग सुविधा का बेहतर उपयोग करने तथा सरकार से व्यक्ति विशेष (जी2पी) भुगतान किए जाने चाहिए, जिसके लिए वित्तीय समावेशन अभियान में सरकार द्वारा अधिकाधिक भागीदारी किए जाने की आवश्यकता पड़ेगी।

भारत का राजपत्रा : असाधरण [भाग III—खण्ड 4] 5

6. इसके अलावा, डिजिटल लेन-देन को प्रोत्साहित करने तथा ''कम नकदी'' वाले समाज की ओर बढ़ने की दिशा के प्रयास के रूप में भारत सरकार (जीओआई) ने अनेक कदमों की घोषणा की है। फरवरी, 2016 में जीओआई ने कॉर्डाें तथा डिजिटल माध्यमों के जरिए भुगतान को बढ़ावा देने के अभियान को आरंभ किया है, जिसके निम्नलिखित उद्‌देश्य5 हैः-

(i) किसी व्यक्ति विशेष के लिए कॉर्ड/डिजिटल लेन-देने करने हेतु सहुलियत में सुधार करना; (ii) व्यक्ति विशेष के स्तर पर नकदी की समलाई से जुड़े जोखिम तथा लागतों को कम करना; (iii) अर्थव्यवस्था में नकदी के प्रबंधन की लागत को कम करना; (iv) पिछले लेन-देन के ब्यौरे तैयार करना, जिससे ऋण तक बेहतर पहुंच सुिनश्चित की जा सके और वित्तीय समावेशन किया जा सके;

(v) कर अपवंचन को कम किया जा सके; और (vi) जाली मुद्रा के प्रभाव को कम किया जा सके।

7. भारत सरकार ने फरवरी, 2016 में कॉर्डाें तथा डिजिटल माध्यमों6 से भुगतान को बढ़ावा देने संबंधी दिशानिर्देश जारी किए हैं। दिशानिर्देशों में अन्य बातों के साथ ही साथ अल्पावधि में उठाए जाने वाले निम्नलिखित कदमों की भी चर्चा की गई है (जिसे एक वर्ष के भीतर कार्यान्वित किया जाना है)ः-

मोबाइल बैंकिंग/भुगतान चैनलों को प्रोत्साहित करना ''घ''घ''घ''घ.... मोबाइल बैंकिंग/भुगतान चैनलों को प्रोत्साहित करना मोबाइल बैंकिंग/भुगतान चैनलों को प्रोत्साहित करना मोबाइल बैंकिंग/भुगतान चैनलों को प्रोत्साहित करना

(i) दूरसंचार विभाग, यूएसएसडी प्रभारों को तर्कसंगत बनाने/उनमें कमी करने के लिए उपर्युक्त कदम उठाएगा तथा केवल सफल लेन-देन होने पर ही इन्हें प्रभारित करने की व्यवहार्यता की जांच करने के लिए उपर्युक्त कदम उठाएगा।

(ii) दूरसंचार विभाग/वित्तीय सेवा विभाग/भारतीय रिजर्व बैंक एकीकृत यूएसएसडी प्लेटफार्म हेतु उपबंध करेगा जो सभी भुगतान प्रणालियों में लेनदेन का समर्थन कर सकेगा।

………………………"

8. भारतीय रिजर्व बैंक दृष्टि-2018 में भी समाज के प्रत्येक वर्ग को इलेक्ट्रिॉनिक भुगतान का अधिकाधिक उपयोग करने हेतु प्रोत्साहित करने की परिकल्पना की गई है ताकि नकदी रहित समाज के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। दृष्टि में अन्य बातों के साथ ही साथ मोबाइल बैंकिंग उन्मुखी नीति बनाने की बात कही गई है ताकि मोबाइल बैंकिंग सेवाओं हेतु उपभोक्ताओं के पंजीकरण के लिए अधिक विकल्पों के माध्यम से स्मार्ट फोन का उपयोग नहींं करने वाले उपभोक्ताओं की अनेक भाषाओं में मोबाइल बैंक सेवाओं तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित की जा सके तथा मोबाइल आधारित नवोन्मेषी समाधानों को प्रोत्साहित किया जा सके।

9. भारतीय रिजर्व बैंक तथा भारत सरकार का बल वैश्विक रूझानों के अनुरूप है, जहां इस बात को अधिकाधिक रूप से स्वीकार किया जा रहा है कि पूर्णरूप से मोबाइल बैंकिंग सेवाओं से अन्य भुगतान सेवाओं की दिशा में जाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह वित्तीय सेवाओं के समग्र पैकेज का महत्वपूर्ण घटक है। वे न केवल अन्य वित्तीय सेवाओं तक पहुंच को सुलभ बनाते हैं परंतु ऐसी सेवाओं7 की कुशल व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकते हंैं।

10. मोबाइल फोन का उपयोग कर, आधारभूत वित्तीय सेवाओं की सुपुर्दगी हेतु आईएमजी फ्रेमवर्क का निर्धारण किए जाने के पश्चात्‌, विभिन्न हितधारकों ने वित्तीय समावेशन के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में अनेक कदम उठाए हैं।

---------------------------- 5. एफ नं. 01/02/2015-सीवाई-1, दिनांक 29 फरवरी, 2016, भारत सरकार, वित्त मंत्रालय, आर्थिक कार्य विभाग

6. पूर्वाेक्त

7. वित्तीय समावेशन का भुगतान संबंधी पहलू, भुगतान तथा बाजार अवसंरचना संबंधी समिति (अंतर्राष्ट्रीय भुगतान समाधान हेतु बैंक) तथा विश्व बैंक समूह कार्यदल, अप्रैल, 2016, http://www.bis.org/cpmi/publ/d144.pdf6 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART III—SEC. 4] 11. दिसंबर, 2011 में दूरसंचार विभाग ने एनपीसीआई के यूएसएसडी गेटवे के माध्यम से मोबाइल बैंकिंग सेवाओं हेतु वित्त सेवा विभाग (डीएफएस) को यूएसएसडी कोड *99# आबंटित किया है तथा दूरसंचार सेवा प्रदाताओं (टीएसपी) को एनपीसीआई के परामर्शानुसार सेवा की आवश्यकता के अनुरूप उपयोग कर संपर्क कर सकते हैं। अप्रैल, 2012 में भादूविप्रा ने अधिदेशित किया था कि प्रत्येक दूरसंचार सेवा प्रदाता बैंकों को एसएमएस, यूएसएसडी तथा आईवीआर उपयोग करने हेतु सुविधा प्रदान करगा ताकि वह अपने उपभोक्ताओं को बैंकिंग सेवा उपलब्ध करवा सके तथा बैंक द्वारा सृजित संदेश को अपने उपभोक्ताओं को एसएमएस के मामले में संदेश को अधिकतम दो चरणों में प्रेषित करे तथा यूएसएसडी और आईवीआर के मामले में विकल्प दर्ज करने के अधिकतम दो चरणों में प्रेषित करे। नवम्बर, 2012 में एनपीसीआई ने यूएसएसडी चैनल के माध्यम से मोबाइल बैंकिंग को सक्षमकारी बनाने के लिए एक यूएसएसडी गेटवे (राष्ट्रीय एकीकृत यूएसएसडी प्लेटफार्म) आरंभ किया है। प्राधिकरण ने दिनांक 26.12.2013 के मोबाइल बैंकिंग (सेवा की गुणवत्ता) (संशोधन) विनियम 2013 के माध्यम से मोबाइल बैंकिंग लेन-देन पूर्ण करने के लिए अधिकतम चरणों को 2 से बढ़ाकर 5 कर दिया था।

12. नवम्बर, 2013 में वित्तीय समावेशन के लिए मोबाइल बैंकिंग को सुकर बनाने हेतु भादूविप्रा ने यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सेवा के लिए यूएसएसडी के प्रति सत्र हेतु 1.50 रूपए के टैरिफ की अधिकतम सीमा विहित की थी तथा मोबाइल बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए बैंक के एजेंटों को एक्सेस सेवा प्रदाताओं के साथ संपर्क करने के लिए एसएमएस, यूएसएसडी तथा आईवीआर चैनलों के उपयोग को सुकर बनाने हेतु एक फ्रेमवर्क विहित किया है। अगस्त, 2014 तक सभी जीएसएम सेल्युलर टेलीफोन सेवा प्रदाता एनपीसीआई के राष्ट्रीय एकीकृत यूएसएसडी प्लेटफार्म (एनयूयूपी) से जुड़ गए, जिसके परिणामस्वरूप भी जीएसएम उपभोक्ता यूएसएसडी कोड *99# के उपयोग के माध्यम से यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सेवाओं का उपयोग करने के लिए सक्षम हो गए थे।

13. तथापि, इन कदमों से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए। मई, 2016 में केवल लगभग 37 लाख मोबाइल बैंकिंग लेन-देन के प्रयास (यूएसएसडी चैनल) एनपीसीआई. (*99#) तक ही पहुंच पाए। वर्ष 2015 के दौरान भी वित्तीय सेवाएं विभाग और भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से भादूविप्रा को यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग वित्तीय सेवाएं उपयोग को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने पर विचार करने के लिए कहा गया थाः-

• यूएसएसडी सत्र के मौजूदा पांच चरण की सीमा को आठ चरण करने की अनुमति दी जाए,

• टाइमर लिमिटेशन सत्र में वृद्धि की जाए,

• प्रत्येक यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग के लिए 1.50 रुपए की अधिकतम टैरिफ सीमा को हटाया जाए,

• निष्फल यूएसएसडी सत्र के लिए यूएसएसडी पुष्ट संदेश भेजे जाएं,

• एक एकीकृत यूएसएसडी प्लेटफार्म के लिए प्रावधान किए जाएं, जो सभी भुगतान तत्रों के लेन-देन में मदद कर सके,

14. संबंधित हितधारकों अर्थात्‌ एनपीसीआई, दूरसंचार सेवा प्रदाता और डीएफएस के साथ कई महीनों तक चर्चाएं और बैठकें हुई। तथापि, कोई सहमति नहीं बन पाई। अतः प्राधिकरण ने एक व्यापक परामर्श प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया। 02.08.2016 को ''मोबाइल वित्तीय सेवाओं के लिए यूएसएसडी के उपयोग हेतु विनियामक फ्रेमवर्क की समीक्षा'' के संबंध में एक परामर्श-पत्र जारी किया गया। 'भादूविप्रा' की वेबसाइट (www.trai.gov.in) और भारत सरकार के माई गर्वनमेंट प्लेटफार्म के माध्यम से पब्लिक डोमेन में रखा गया। हितधारकों को 14.09.2016 तक लिखित टिप्पणियां और 28.09.2016 तक प्रति-टिप्पणियां प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया था। हितधारकों से प्राप्त हुई टिप्पणियों और प्रति-टिप्पणियों को भादूविप्रा की वेबसाइट (www.trai.gov.in) पर डाला गया था। 27.10.2016 को नई दिल्ली में हितधारकों के लिए एक खुला मंच चर्चा का आयोजन किया गया। परामर्श पत्र में उठाए गए मुद्‌दों और उन पर हितधारकों के विचारों पर प्राधिकरण ने विचार-विमर्श किया जिनकी आगे के पैराग्राफों में समीक्षा की जा रही है।

परामर्श-पत्र में उठाए गए मुख्य मुद्‌दों का विश्लेषण खखखख परामर्श-पत्र में उठाए गए मुख्य मुद्‌दों का विश्लेषण परामर्श-पत्र में उठाए गए मुख्य मुद्‌दों का विश्लेषण परामर्श-पत्र में उठाए गए मुख्य मुद्‌दों का विश्लेषण

15. हितधारकों की टिप्पणियों सहित प्रत्येक मुद्‌दे का सारांश और उसका आगे और विश्लेषण नीचे प्रस्तुत किया गया है।

भारत का राजपत्रा : असाधरण [भाग III—खण्ड 4] 7

एक यूएसएसडी सत्र के लिए प्रविष्ट के लिए विकल्पों की पांच चरणों की मौजूदा सीमा की पर्याप्तता। (1)(1)(1)(1) एक यूएसएसडी सत्र के लिए प्रविष्ट के लिए विकल्पों की पांच चरणों की मौजूदा सीमा की पर्याप्तता। एक यूएसएसडी सत्र के लिए प्रविष्ट के लिए विकल्पों की पांच चरणों की मौजूदा सीमा की पर्याप्तता। एक यूएसएसडी सत्र के लिए प्रविष्ट के लिए विकल्पों की पांच चरणों की मौजूदा सीमा की पर्याप्तता।

16. अधिकांश दूरसंचार सेवा प्रदाताओं और उनके उद्‌योग सहयोगियों ने यूएसएसडी सत्र में प्रवेश के विकल्पों की पांच-चरणों की मौजूदा सीमा का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि यदि चरणों की संख्या पांच से बढ़ाकर 8 की जानी है, तो सीलिंग टैरिफ को भी अनुपातिक रूप में बढ़ाया जाए क्योंकि चरणों की संख्या बढ़ाने से उनके सिगनलिंग की अवसंचरनाओं पर काफी भार पड़ेगा। यह भी कहा गया कि यदि मात्रा में अचानक बढ़ोतरी होती है तो प्रति सत्र चरणों पर पुनर्विचार और समीक्षा करने की आवश्यकता पड़ सकती है। उन्होंने आगे अपनी राय व्यक्त की कि मौजूदा पांच चरणों से कोई भी वृद्धि बैंकों और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के बीच आपसी सहमति के आधार पर होनी चाहिए। तथापि, कुछ दूरसंचार सेवा प्रदाता सत्रों की संख्या 5 से बढ़ाकर 8 करने के लिए तैयार हैं क्योंकि कुछ लेन-देनों के लिए पांच से अधिक चरणों की आवश्यकता पड़ सकती है।

17. अधिकांश बैंकों और भारतीय रिजर्व बैंक ने चरण बढ़ाकर 8 करने का समर्थन किया है और कुछ ने तो यहां तक प्रस्ताव किया है कि प्रति यूएसएसडी सत्र के लिए चरणों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। इन बैंकों ने कहा है कि कतिपय लेन-देनों जैसे निधि अंतरण, जिनमें इनपुट त्रुटियों की संभावना होती है और जिनमें अधिक समय लगता है, के लिए प्रति यूएसएसडी सत्र के लिए मौजूदा पांच चरण पर्याप्त नहीं हैं।

दूसरी ओर कुछ बैंकों ने सुझाव दिया है कि केवल पांच ही चरण रहने चाहिए क्योंकि चरणों की संख्या बढ़ाने से इस प्रक्रिया के जटिल और प्रयोक्ता के अनुकूल न रहने की संभावना है।

18. कुछ संगठनों ने इस बात की भी वकालत की है कि प्रति यूएसएसडी के लिए, चरणों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से लक्षित उपभोक्ता समूह, जिसमें साक्षरता का स्तर निम्न है और जागरूकता भी कम है, की जरूरतों का समाधान करने में सहायता मिलेगी।

इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि पूरे विश्व में अधिकांश बड़े पैमाने पर मोबाइल मनी डिप्लायमेंट यूएसएसडी के माध्यम से किया जाता है। यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सर्विसेज के लिए व्यैक्तिक हितधारकों ने भी आठ या असीमित चरणों का समर्थन किया है।

19. प्राधिकरण इस तथ्य से अवगत है कि यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सेवाएं वित्तीय समावेशन एजेंडे को चलाने के लिए बनाई गई थी, जिसका लक्ष्य आबादी का वह वर्ग था, जो कम शिक्षित है और प्रौद्‌योगिकी का उपयोग करने का बहुत आदी नहीं है। अतः उपभोक्ता द्वारा इनपुट को कम से कम रखना होगा क्योंकि मनुष्यों के हस्तक्षेप से त्रुटियां होती हैं। उपभोक्ता से इंटरफेस, आसान कम से कम मेन्यू और शीघ्रता से काम हो जाने के तरीके से होना चाहिए। साथ ही मौजूदा परिदृश्य मे प्रति यूएसएसडी सत्र में पांच चरणों की सीमा से कतिपय लेन-देन करने में जहां इनपुट त्रुटियां होना असंभावी है, बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न करता है। इनपुट त्रुटियों के कारण असफल लेन-देन होते हैं और ऐसे उपभोक्ताओं को उनके खराब सेवा गुणवत्ता अनुभव के आधार पर फिर से यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल कम करने की संभावना रहती है। अतः एनसीपीआई और बैंकों को सॉफ्‌टवेयर फीचर्स में लगातार सुधार करते रहने का प्रयास करना पड़ेगा और ऐसी यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सेवाओं को उपभोक्ताओं के और अधिक अनुरूप डिजाइन तैयार करना पड़ेगा क्योंकि इससे उपभोक्ताओं का अनुभव अच्छा रहेगा और मोबाइल बैंकिंग लेन-देन सफलता की दर भी अच्छी रहेगी। इन तथ्यों के अलावा, प्राधिकरण का विश्वास है कि इस स्तर पर प्रति यूएसएसडी सत्र के लिए इस सेवा को गति देने के लिए चरणों की मौजूदा संख्या पांच की सीमा को बढ़ाकर आठ करने में कोई बुराई नहीं है। प्रति यूएसएसडी सत्र के लिए चरणों की उपरी सीमा आठ है और सॉफ्‌टवेयर डिजाइन में सुधार से उपभोक्ता की सुविधा के लिए चरणों की संख्या कम करने का प्रयास करना चाहिए। इस बात को ध्यान में रखते हुए मोबाइल बैंकिंग (सेवा की गुणवत्ता) (द्वितीय संशोधन) विनियम जारी किया जा रहा है, जिसमें मोबाइल बैंकिंग लेन-देन पूरा करने के लिए न्यूनतम चरणों की संख्या पांच से बढ़ाकर आठ की जा रही है।

यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग और यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लागत वहन करने के मुद्‌दे के बारे में टैरिफ निर्धारित (2)(2)(2)(2) यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग और यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लागत वहन करने के मुद्‌दे के बारे में टैरिफ निर्धारित यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग और यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लागत वहन करने के मुद्‌दे के बारे में टैरिफ निर्धारित यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग और यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लागत वहन करने के मुद्‌दे के बारे में टैरिफ निर्धारित ें उपयुक्त तरीके का निर्णय करना। करने के संबंध मकरने के संबंध मकरने के संबंध मकरने के संबंध में उपयुक्त तरीके का निर्णय करना। ें उपयुक्त तरीके का निर्णय करना। ें उपयुक्त तरीके का निर्णय करना।

20. टीटीओ (56वां संशोधन) 2013 के अनुसार, वर्तमान में बैंकिंग हेतु यूएसएसडी सत्र के लिए अधिकतम 1.50 रूपया प्रति सत्र वसूल किया जाता है। वॉयस कॉल्स और एसएमएस, जिनका प्रयोग कम हो रहा था, के लिए राजस्व वसूली में पिछले तीन वर्षाें में कमी आई है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मौजूदा परिस्थितियों में मोबाइल बैंकिंग और भुगतान हेतु यूएसएसडी सत्र के लिए टैरिफ निर्धारण हेतु और नई मूल्य निर्धारण पद्धति या नई दर निर्धारण के बेहतर तरीके के बारे में समीक्षा करना/निर्णय लेना उचित समझा गया।

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21. यूएसएसडी मोबाइल वित्तीय सेवाओं के लिए दर निर्धारित करने के सही तरीके का चुनाव करने के मुद्‌दे पर हितधारकों द्‌वारा भिन्न मत प्रकट किये गए हैं, यथाः-

(क) जहां उपयोगकर्ता से प्रति लेन-देन के आधार पर प्रभार वसूला जाता है, वहां लागत आधारित दर निर्धारित होनी चाहिए।

(ख) प्रणाली और उपभोक्ता द्वारा शुरू किए गए यूएसएसडी सत्र, दोनों के लिए 'लागत से ज्यादा' दर।

(ग) दूरसंचार सेवा प्रदाता को उपभोक्ताओं से प्रभार लेना चाहिए या उपभोक्ताओं को सेवा के लिए या तो प्रति सत्र के हिसाब से भुगतान (प्रीपेड उपभोक्ताओं के लिए) या जैसाकि पोस्टपेड श्रोतावृन्द के लिए उनके प्रत्येक माह के वैल्यू पैक में दिया गया है अथवा दोनों के लिए विकल्प देना चाहिए।

(घ) दूरसंचार सेवा प्रदाता आधारित अंशदान मॉडल, डेटा अथवा एसएमएस पैक्स की तर्ज पर, का ऑफर देने की भी अनुमति होनी चाहिए, उदाहरणार्थ दूरसंचार सेवा प्रदाता दस रुपए, बीस रुपए के असीमित यूएसएसडी लेन-देन पैक की पेशकश कर सकते हैं।

(च) भादूविप्रा को बैंकों और दूरसंचार सेवा प्रदाता के बीच अधिकतम व्यवसाय मॉडल निर्धारण करने में बाजार ताकतों के परस्पर

(छ) टैरिफ की अधिकतम सीमा 0.50 रुपए प्रति यूएसएसडी सत्र से काफी कम होनी चाहिए।

(ज) प्रणाली और उपभोक्ता द्वारा आरंभ किए गए यूएसएसडी सत्र दोनों के लिए 'लागत से ज्यादा' दर।

(झ) हजारों सत्रों के लिए थोक मूल्य भी हो सकता है, जिसे वित्तीय सेवाएं प्रदाता द्वारा प्रतिस्पर्धी बाजार मूल्य पर खरीदा जा सकता है, जहां विनियामक लागत आधारित घटक के अनुसार मूल्य सीमा निर्धारित कर सकता है, जिसके अंतर्गत थोक एसएमएस मूल्य की तरह प्रतिस्पर्धात्मक बाजार विकसित हो सकता है।

(ट) लेन-देन में लगने वाले समय के आधार पर प्रभार लगाए जाने चाहिए। ये प्रभार वॉयस कॉल्स के साथ निर्देशित किए जाने चाहिए।

22. अधिकांश बैंकों और व्यक्तियों ने लागत आधारित पद्धति और/अथवा मिश्रित पद्धति की वकालत की है।

(क)(क)(क)(क) लागत आधारित पद्धतिलागत आधारित पद्धतिलागत आधारित पद्धतिलागत आधारित पद्धति : लागत आधारित पद्धति में इसके शुल्क निर्धारण के लिए लागत की गणना प्रति यूएसएसडी सत्र के रूप में की जाती है। लागत में मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सत्र के लिए शुरू से अंत तक यूएसएसडी सत्र के स्थापना हेतु दैनिक परिचालन और अनुरक्षण में शामिल सभी प्रासंगिक पूॅंजीगत (कैपेक्स) और अपूूंॅजीगत (ओपेक्स) के साथ-साथ स्पष्ट रूप से चिन्हित नेटवर्क सूचना प्रौद्‌योगिकी और अन्य लागत घटक शामिल होंगे और उसका मूल्यांकन एवं सत्यापन विशेषज्ञों और/अथवा विनियामक द्वारा किया जाएगा।

लागत आधारित पद्धति को सही ठहराते समय, एक हितधारक द्वारा यह बताया गया कि यूएसएसडी मूल्य निर्धारण - अधिकतम शुल्क क्षमता और उपभोक्ता लाभ हेतु दो चरणों में होगी; मूल्य निर्धारण यूएसएसडी सत्र की पूर्ण अवधि पर किया जाना चाहिए और ऐसी कार्यप्रणाली से यूएसएसडी सत्र के 180 सेकेन्ड प्रति पचास पैसे से कम लागत निर्धारण का पता चलेगा। दूसरे हितधारक ने बताया कि वित्तीय समावेशन की सुविधा प्रदान करने की दृष्टि से मोबाइल बैंकों को लोक सेवा के रूप में देखा जाना चाहिए और चूंकि लागत उचित मूल्य का यथोचित संकेतक है और भादूविप्रा के हस्तक्षेप का आधार हो सकता है, इसलिए बहिर्गमन (आउटगोइंग) यूएसएसडी सत्र के लिए पारदर्शी लागत आधारित शुल्क पद्धति अपनाई जानी चाहिए। कुछ दूरसंचार सेवा प्रदाताओं ने भी लागत आधारित पद्धति की अनुसंषा की है।

(ख)(ख)(ख)(ख) मिमििमििमििश्रित पद्धतिश्रत पद्धतिश्रत पद्धतिश्रत पद्धति :ःःः ऐसी पद्धति जिसमें उपभोक्ता के पास सेवा चुनने का विकल्प हो चाहे वह प्रति सत्र भुगतान पर आधारित हो अथवा एक समान दर पर आधारित जैसाकि उसके सेवा पश्चात्‌ भुगतान वाले उपभोक्ताओं (पोस्ट पेड उपभोक्ता) के लिए प्रति माह वेल्यू पैक नियत हो अथवा अधिकांश दूरसंचार सेवा प्रदाताआें और उनके संघो द्वारा दोनों की वकालत की गई है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सभी मोबाइल उपभोक्ताओं के उपयोग प्रणाली को ध्यान में रखते हुए, इनकी अनुमति दी जानी चाहिए। एक हितधारक ने सुझाव दिया है कि मोबाइल बैंकिग और भुगतान सेवा के लिए यूएसएसडी शुल्क एक स्थानीय एसएमएस प्रति यूएसएसडी सत्र के बराबर होना चाहिए अर्थात्‌ पचास पैसा प्रति यूएसएसडी सत्र और दैनिक उपभोक्ताओं के लिए और एसएमएस के साथ जैसा भी मामला हो, मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा के लिए यूएसएसडी का वॉल्यूम पैक उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

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उदाहरण स्वरूप प्रति माह सौ यूएसएसडी सत्र के लिए प्रति माह सौ स्थानीय एसएमएस, जितने ही मूल्य के बराबर आरबीआई और एनपीसीआई ने भी मिश्रित पद्धति (दोनों विकल्प चाहे वह प्रति सत्र भुगतान पर आधारित हो अथवा एक समान दर पर जैसाकि उनके वेल्यू पैक में नियत हो) खुले होने चाहिए का समर्थन किया है ।

23. अधिकांश दूरसंचार सेवा प्रदाता और उनके उद्योग संघ लागत आधारित विधि के पक्ष में नहीं हैं, उन्होंने कहा है कि लागत आधारित विधि न्यायसंगत नहीं है और विनियम को बैंक और दूरसंचार सेवा प्रदाता के बीच व्यवस्था को रोकना नहीं चाहिए। एक हितधारक ने कहा है कि मोबाइल बैंकिंग के लिए यूएसएसडी चैनल पर कम ट्रैफिक के कारण लागत का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य/डेटा उपलब्ध नहीं हैं।

अधिकांश दूरसंचार सेवा प्रदाता मोबाइल बैकिंग और भुगतान सेवाओं के लिए यूएसएसडी सत्र हेतु आस्थगित (फॉर्बेरन्स) टैरिफ नीति के पक्ष में हैं। इनमें से कई ने यह भी कहा है कि प्राधिकरण को खुदरा और थोक मोबाइल बैंकिंग एक्सेस मूल्य निर्धारण को नियंत्रण मुक्त करना देना चाहिए और दूरसंचार सेवा प्रदाता एवं बैंकों को उपभोक्ताओं को सभी विकल्प की पेशकश करने की अनुमति देनी चाहिए। इसके अलावा, इनमें से अधिकांश के अनुसार व्यवस्थाएं बी2बी या बी2सी या दोनों की हाइब्रिड होनी चाहिए। उन्होंने कहा है कि मोबाइल बैंकिंग और ई-भुगतान विकास के शुरूआती चरण में हैं और ईको-सिस्टम का अभी भी विकास हो रहा है। इसलिए वर्तमान स्थिति में लागत के आधार पर मोबाइल बैंकिंग और भुगतान के लिए प्रति यूएसएसडी सत्र टैरिफ निर्धारित करना एक अपरिपक्व कदम होगा।

24. आदर्शतः लागत आधारित विधि को अपनाना तब एक सही विकल्प हो सकता है, जब अन्य सेवाओं (वॉयस कॉल, डेटा और एसएमएस) के टैरिफ में कमी आ रही है। यह उपभोक्ताओं के लिए भी फायदेमंद है। मगर इस विधि की सफलता के लिए लागत का सटीकता से पता लगाना एक जरूरी पूर्व शर्त है। इस परिदृश्य म,ें लागत निर्धारित करना, इसका पता लगाना और आवंटित करना विज्ञान कम और एक कला अधिक है क्योंकि यथोचित सटीकता से लागतों का पता लगाना मुश्किल काम है। यूएसएसडी में शामिल सभी प्रत्यक्ष लागतों का निर्धारण करना चुनौती भरा कदम है क्योंकि ये यूएसएसडी लेन-देनों के वर्तमान कम वॉल्यूम के साथ हमेशा तुरंत निर्धारित नहीं होते हैं।

25. जहॉं तक दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के तर्क कि मोबाइल बैंकिंग सेवाएं तृतीय पक्ष (अर्थात्‌ गैर-दूरसंचार बी2बी) सेवाओं की प्रकृति की हैं और प्राधिकरण को खुदरा और थोक मोबाइल बैंकिंग एक्सेस मूल्य निर्धारण को नियंत्रण मुक्त करना चाहिए और दूरसंचार सेवा प्रदाता एवं बैंकों को उपभोक्ताओं को एक या सभी विकल्प की पेशकश करने की अनुमति देनी चाहिए, इसके संबंध में यह कहना उपयुक्त होगा कि मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा के लिए यूएसएसडी सेवा पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं है और इसे इस चरण में मूल्य निर्धारण के बी2बी मॉडल के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए इस समय, मोबाइल आधारित यूएसएसडी वित्तीय सेवओं के लिए बी2बी और माफी जैसे व्यवस्थाएं उचित नहीं होगी।

26. वॉयस कॉल (0.49रु.), एसएमएस (0.16रु. प्रति एसएमएस) और डेटा (0.23रु. प्रति एमबी) के लिए राजस्व वसूली के दृष्टिगत, मोबाइल बैंकिंग के लिए यूएसएसडी सत्र के प्रभार काफी अधिक लग रहे हैं। उदाहरण के लिए शेष का पता लगाने के लिए उपभोक्ता से हर बार 1.50 रु.

लिए जाते हैं। इसकी तुलना में, खाताधारक खाते का शेष पता करने के लिए 'मिस्ड कॉल' बैंकिंग या एटीएम, शाखाओं या अन्य माध्यमों से निशुल्क अनुरोध कर सकता है। इसके अलावा, बैंकों ने यूएसएसडी आधारित बैंकिंग सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं। बैंक उपभोक्ता की सहुलियत के लिए एप्स को बढ़ावा दे रहे हैं और इस प्रकार खुद को स्मार्टफोन वाले यूजर तक सीमित कर रहे हैं।

बैंकिंग सेवाओं के लिए यूएसएसडी के यूनीक सेलिंग प्वाइंट यह है कि इसका इस्तेमाल बेसिक फीचर वाले फोन रखने वाले उपभोक्ता द्वारा भी किया जा सकता है, जिसका इस्तेमाल अधिकांश भारतीय उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है और इसमें डेटा कनेक्टीविटी की भी आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा, यह एक सुरक्षित माध्यम है क्योंकि कम्युनिकेशन रियल-टाइम है और हैंडसेट में कोई डेटा स्टोर नहीं होता है।

27. अधिकांश बैंकों और एकल हितधारकों ने मोबाइल बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के लिए यूएसएसडी सत्र की उच्चतम सीमा में कमी करने सुझाव दिया है। व्यैक्तिक हितधारकों ने सुझाव दिया है कि मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा के लिए यूएसएसडी सत्र की उच्चतम सीमा घटाकर 0.50 रु. प्रति सत्र की जानी चाहिए मगर आरबीआई, एनपीसीआई और कुछ हितधारकों ने इसे प्रति सत्र 0.25 से 0.50 रु.के बीच रखने का सुझाव दिया है। अन्य सुझावों में ये शामिल है कि मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा के लिए यूएसएसडी सत्र प्रभार लेन-देन करने में लिए गए समय के आधार पर लिए जाने चाहिए और ये प्रभार एसएमएस के साथ बैंचमार्क किए जाने चाहिए क्योंकि यूएसएसडी और एसएमएस,10 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART III—SEC. 4] दोनों जीएसएम में सिगनलिंग चैनलों का इस्तेमाल करते हैं न कि वॉयस/डेटा चैनलों का। एक हितधारक ने यह सुझाव दिया है कि यूएसएसडी टैरिफ एक लोकल एसएमएस प्रति यूएसएसडी सत्र बराबर हों अर्थात्‌ अधिकतम 50 पैसा प्रति यूएसएसडी सत्र। इन हितधारकों ने यह मत प्रकट किया है कि सेवा की वास्तविक वृद्धि 'लेन-देनों की बड़ी संख्या और कम मूल्य वाले प्रभारों' से हासिल होगी न कि 'प्रभारों के उच्च मूल्य और लेन-देनों की कम संख्या' से।

28. दूरसंचार सेवा प्रदाता और उनके उद्योग संघों ने कहा है कि निम्नलिखित बातों के दृष्टिगत प्रभार बढ़ाए जाने चाहिए/घटाए जाने नहीं चाहिएः-

(क) चरणों की संख्या में वृद्धि और/या लेन-देनों की संख्या में वृद्धि के लिए उन्हें इस सेवा अर्थात्‌ यूएसएसडी के लिए अतिरिक्त पूंजीगत व्यय करना होगा।

(ख) मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा के लिए बिलिंग सिस्टम और सेवा की गुणवत्ता संबंधी कठोर दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए भारी निवेश पहले ही किया जा चुका है मगर इसके बराबर कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं हुआ।

(ग) मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा के लिए यूएसएसडी सत्र में एकाधिक हिट्‌स शामिल हैं, जो सिगनलिंग चैनलों और कोर नेटवर्क को लंबे समय के लिए व्यस्त कर देंगे।

(घ) एसएमएस की तुलना में वॉयस और यूएसएसडी आधारित उपभोक्ता सेवा की दरों के कारण इन चैनलों द्वारा लागत की बचत ही रही है और यूएसएसडी आधारित बैंकिंग सेवाओं में दूरसंचार सेवा प्रदाता के लिए ऐसे किसी मूल्य प्रस्ताव का अभाव है।

29. अतः उपरोक्त चर्चाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि इस मुद्दे पर विभिन्न मत हैं। दूरसंचार सेवा प्रदाता और उनके उद्योग संघों से इतर अधिकांश हितधारक उच्चतम सीमा में कमी करने के पक्ष में हैं। कुछ हितधारकों का यह तर्क है कि मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा के लिए यूएसएसडी सत्र का टैरिफ यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा की सफलता का महत्वपूर्ण निर्धारक कारक है। क्योंकि मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा के लिए यूएसएसडी का इस्तेेमाल दूरसंचार सेवा प्रदाता का मुख्य प्रस्ताव नहीं है इसलिए इन सेवाओं का मूल्य निर्धारण इसी प्रतिस्पर्धी दबाव के अधीन आने की संभावना नहीं है, जो बाजार में दूरसंचार सेवा प्रदाता का मुख्य प्रस्ताव है (यथा वॉयस कॉल, डेटा और एसएमएस)। इसके अलावा, वित्तीय समावेशन के लिए मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा हेतु यूएसएसडी के इस्तेमाल में लक्षित समूहों अर्थात बैंक विहीन/बैंक अधीन जनता के लिए सुनिश्चित सामाजिक-आर्थिक लाभ निहित हैं इसलिए मोबाइल बैंकिंग के लिए यूएसएसडी के इस्तेमाल के मूल्य यथोचित और कम होने चाहिए। यह कहना उचित होगा कि हालांकि वॉयस कॉल ट्रैफिक चैनल के माध्यम से होती है, जबकि यूएसएसडी मैसेज और एसएमएस मैसेज सस्ते सिगनलिंग चैनलों के माध्यम से जाते हैं। दूरसंचार सेवा प्रदाता द्वारा आउटगोइंग एसएसम का औसत राजस्व संग्रहण 0.16 रु. प्रति एसएमएस है।

30. उपर्युक्त के आलोक में, प्राधिकरण का यह मत है कि मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवा (जिसमें बैंक/बैंक एजेंट के बीच समझौते के अनुसार एक या अधिक बैंकिंग लेनदेन शामिल हो सकते हैं) के लिए प्रति यूएसएसडी सत्र 0.50 रु. की उच्चतम सीमा मोबाइल बैंकिंग सेवा के लिए यूएसएसडी के इस्तेमाल में किए गए व्यय को पूरा करने के लिए, सत्र का परिणाम सफल या विफल बैंकिंग लेन-देन के रूप में जो भी रहा हो, पर ध्यान दिए बगैर दूरसंचार सेवा प्रदाता को प्रतिफल देने के लिए उपयुक्त होगी। चरणों की संख्या 5 से बढ़ाकर 8 करने पर परोक्ष क्षतिपूर्ति करने के लिए यह पर्याप्त रूप से उपयुक्त होगा। इसी दौरान, दूरसंचार सेवा प्रदातओं को प्रभारों में और कमी करने और निर्धारित उच्चतम सीमा से कम टैरिफ की पेशकश करने की छूट है।

31. इस प्रश्न पर विभिन्न मत/टिप्पणियां थी : क्या यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग के लिए वर्तमान मूल्य निर्धारण मॉडल को जारी रखा जाना चाहिए, जिसमें उपभोक्ता यूएसएसडी का उपयोग करने के लिए भुगतान करता है और अगर इसका जवाब नहीं है तो मूल्य निर्धारण का दूसरा कौन सा मॉडल होना चाहिए? एक दूरसंचार सेवा प्रदाता ने यह सुझाव दिया है कि बैंक शुरू के कुछेक महीनों के लिए लेन-देन प्रभार निशुल्क कर सकते हैं या वे बैंक द्वारा तैयार फार्मूले के अनुसार मामूली मूल्यों पर सब्सक्रिप्शन आधारित सेवा का अनुसरण कर सकते हैं।

दूरसंचार सेवा प्रदाता ने यह भी सुझाव दिया है कि बैंकों और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को प्रभारों के लिए परस्पर वार्ता द्वारा तय करने के लिए छोड़ देना चाहिए। अधिकांश दूरसंचार सेवा प्रदाता और उनके उद्योग संघों ने यह मत रखा था कि प्रभारों के लिए किसे भुगतान करनाभारत का राजपत्रा : असाधरण [भाग III—खण्ड 4] 11 है, इसका फैसला बाजार शक्तियों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, अधिकांश बैंकों का यह मत था कि प्रभाराेंं का भुगतान व्यक्तियों द्वारा किए जाने को जारी रखा जाना चाहिए, जैसाकि वर्तमान में चल रहा है। बहरहाल, एक बैंक का यह मत था कि इसका फैसला करने के लिए बैंकों और उपभोक्ताओं के बीच इष्टतम लागत शेयरिंग मॉडल तैयार किया जाना चाहिए।

32. हितधारकों की अधिकांश टिप्पणियों का यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह सिद्धांत कि सेवा मांगने वाले व्यक्ति को ही सेवा के लिए भुगतान करना चाहिए, व्यापक रूप से अभी भी स्वीकार्य है और इससे प्रभाराेंं की उच्चतम सीमा कम होती है। उपभोक्ता अन्य माध्यमों जैसे वेब आधारित अनुप्रयोगों, एसएमएस या अनुप्रयोगों के जरिये मोबाइल बैंकिंग और भुगतान सेवाओं के लिए भुगतान करते हैं। इसलिए प्राधिकरण का मानना है कि यूएसएसडी सत्र प्रभारों (बी2सी) के लिए उपभोक्ता द्वारा भुगतान के वर्तमान विनियामक व्यवस्था को जारी रखा जाना चाहिए।

उपभोक्ता द्वारा अपने लेन-देन को पूरा करने में समर्थ होने पर ही मोबाइल बैंकिंग के लिए यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लगाने के लिए (3)(3)(3)(3) उपभोक्ता द्वारा अपने लेन-देन को पूरा करने में समर्थ होने पर ही मोबाइल बैंकिंग के लिए यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लगाने के लिए उपभोक्ता द्वारा अपने लेन-देन को पूरा करने में समर्थ होने पर ही मोबाइल बैंकिंग के लिए यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लगाने के लिए उपभोक्ता द्वारा अपने लेन-देन को पूरा करने में समर्थ होने पर ही मोबाइल बैंकिंग के लिए यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लगाने के लिए सेवा प्रदाता को अधिदेश देने का औचित्सेवा प्रदाता को अधिदेश देने का औचित्सेवा प्रदाता को अधिदेश देने का औचित्सेवा प्रदाता को अधिदेश देने का औचित्यययय

33. वर्तमान में उपभोक्ता से सत्र शुरू होते ही प्रभार ले लिया जाता है, फिर चाहे उसके द्वारा शुरू किया गया लेन-देन पूरा हुआ हो ना हुआ हों।

इसके कारण उपभोक्ताओं में भारी असंतोष पैदा होता है क्योंकि लेन-देन विभिन्न स्तरों, जैसे बैंक, एनयूयूपी प्लेटफार्म, दूरसंचार सेवा प्रदाता या उपभोक्ता के कारण विफल हो सकता है। अतः परामर्श में यह प्रश्न उठाया गया था कि क्या उपभोक्ता द्वारा अपना लेन-देन पूरा करने में समर्थ होने पर ही मोबाइल बैंकिंग के लिए यूएसएसडी सत्र के लिए प्रभार लेने के सेवा प्रदाता को अधिदेश देना उचित होगा?

34. अधिकांश दूरसंचार सेवा प्रदाता और उनके उद्योग संघों ने इस बात का प्रमुखता से उल्लेख किया है कि किसी यूएसएसडी आधारित लेन-देन में विफलता के कई कारण हो सकते हैं, जो दूरसंचार नेटवर्क से परे या दूरसंचार सेवा प्रदाता के नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं और कई मामलों में तो बैंक/एनपीसीआई स्तर पर हुई विफलता की सूचना दूरसंचार सेवा प्रदाता को भी नहीं होती है। यह भी बताया गया है कि सत्र पूरा नहीं होने/अधूरा रहने से संबंधित निर्णय केवल बैंकों/एनपीसीआई सर्वरों द्वारा लिया जा सकता है क्योंकि दूरसंचार सेवा प्रदाता को यूएसएसडी सत्र की दृश्यता/विफलता का पता नहीं होता है। कुछ दूरसंचार सेवा प्रदाता ने यह सुझाव दिया है कि बैंक थोक में यूएसएसडी सत्र खरीद सकते हैं और इस तरह के विफल लेेन-देन के लिए अपने उपभोक्ताओं को क्षतिपूर्ति दे सकते हैं। अतः दूरसंचार सेवा प्रदाता और उनके संघों का मानना है कि वर्तमान प्रणाली को जारी रखना चाहिए क्योंकि दूरसंचार सेवा प्रदाता प्रणालियां, प्रणाली में हुई विफलता, जो उनके नियंत्रण से बाहर है, के आधार पर बिलिंग प्रणाली/आईएन में बदलाव करने में समर्थ नहीं होगी।

35. इसी प्रकार, कुछ बैंकों ने केवल सफल लेने-देनों के लिए ही प्रभार लेने के विचार का समर्थन नहीं किया है। दूसरी ओर, कुछ बैंकों ने कहा है कि कि इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल करके उपभोक्ता के वित्तीय समावेशन के पहलुओं; देश के विभिन्न हिस्सो में कनेक्टीविटी की समस्याओं;

और यूजरों की जानकारी के स्तर को ध्यान में रखकर सफल लेन-देनों के लिए उपभोक्ताओं से प्रभार लिए जाने चाहिए। कुछ हितधारकों ने यह राय रखी है कि उपभोक्ता से विफल लेन-देन के लिए प्रभार लिए जाने चाहिए मगर यदि उच्चतम प्रभार को कम किया जाता है तो वे इसके बारे में अधिक चिंतित नहीं होंगे।

36. इस मुद्दे पर हितधारकों की टिप्पणियों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने के बाद प्राधिकरण इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि यह मुद्ददा पेचीदा है और विफल लेन-देन के लिए 'जिम्मेदारी' पर निर्णय के कारण विवाद उत्पन्न हो सकते हैं क्योंकि यूएसएसडी आधारित सत्र में कई पहलु हैं, जो पूरी तरह से एक व्यक्ति/कंपनी के नियंत्रण में नहीं हैं। इसी तरह, उपभोक्ता द्वारा इनपुट में चूक और उनकी ओर से किसी और कारण से भी लेन-देन विफल हो सकता है। इस पद्धति को लागू करने के लिए दूरसंचार सेवा प्रदाता के आईएन/बिलिंग प्लेटफार्म और रिवर्स फ्लो सिस्टम के डिजाइन में भी बदलाव करने की जरूरत होगी। अतः प्राधिकरण का यह मानना है कि मामले को और अधिक जटिल बनाने के बजाय इस चरण में लेन-देन प्रभारों को कम करके इस समस्या का समाधान करना उचित होगा। इसके अलावा, एनपीसीआई को लेन-देन विफलता के लिए जिम्मेदार कारकों की गहराई से छानबीन करने और इन्हें रोकने के लिए उचित कदम उठाने होंगे।

12 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART III—SEC. 4]

ूएसएसडी पुश सत्रों की अनुमति देने की आवश्यकता। उपभोक्ता द्वारा शुरू किए गए यूएसएसडी सत्र के बंद होने के मामले में यूएसएसडी पुश सत्रों की अनुमति देने की आवश्यकता। (4)(4)(4)(4) उपभोक्ता द्वारा शुरू किए गए यूएसएसडी सत्र के बंद होने के मामले में य ूएसएसडी पुश सत्रों की अनुमति देने की आवश्यकता। ूएसएसडी पुश सत्रों की अनुमति देने की आवश्यकता। उपभोक्ता द्वारा शुरू किए गए यूएसएसडी सत्र के बंद होने के मामले में य उपभोक्ता द्वारा शुरू किए गए यूएसएसडी सत्र के बंद होने के मामले में य

37. दूरसंचार सेवा प्रदाता और उनके उद्योग संघों ने उपभोक्ता द्वारा शुरू किए गए यूएसएसडी सत्र के बंद होने के मामले में यूएसएसडी पुश सत्रों की अनुमति देने का समर्थन नहीं किया है क्योंकि इससे उनके नेटवर्क की सुरक्षा जोखिम में पड़ सकती है। मजबूती से यह तर्क रखा गया है कि इससे एग्रीगेशन प्लेटफार्म प्रदाता/बैंकों के समक्ष उनके स्विच सिस्टम प्रदर्शित हो जाएॅंगे। यह भी दोहराया गया है कि सिगनलिंग नेटवर्क के लिए तृतीय पक्ष को एक्सेस नहीं दी जा सकती क्योंकि पूरे नेटवर्क की सेवाओं को बाधित करने के लिए इसके दुरूपयोग होने की काफी संभावना है। यह भी मत प्रकट किया गया है कि विभिन्न प्रोटोकॉल जैसे एसएमएमपीपी पर पुश यूएसएसडी इंटरफेश की सलाह नहीं दी जा सकती क्योंकि यूएसएसडी कंटेंट/लेन-देन की संख्या और सत्र की अवधि पर कोई नियंत्रण नहीं होता है।

38. दूसरी ओर, अधिकांश बैंकों ने यूएसएसडी पुश सत्रों का समर्थन किया है क्योंकि इससे उपभोक्ता के लिए सुविधा बढ़ाने और प्रणाली में उनके विश्वास को हासिल करने में मदद मिलेगी। इसी तरह, अधिकांश व्यैक्तिक हितधारकों ने भी यूएसएसडी पुश सत्रों का समर्थन किया है।

39. प्राधिकरण ने प्राप्त उत्तरों की जांच की थी और इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि यूएसएसडी आधारित पुश सत्र की अनुमति देने से दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के नेटवर्क की सुरक्षा को कई तरह के खतरे हो सकते हैं और इसलिए दूरसंचार नेटवर्क की सुरक्षा के समग्र हित में इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। अतः प्राधिकरण का यह मानना है कि यूएसएसडी आधारित पुश सत्र की फिलहाल अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

एकीकृत यूएसएसडी प्लेटफार्म की आवश्यकता, जो सभी या भुगतान प्लेटफार्मों पर लेन-देनों को सपोर्ट कर सकता है।ेर्ट कर सकता है।ेर्ट कर सकता है।ेर्ट कर सकता है। (5)(5)(5)(5) एकीकृत यूएसएसडी प्लेटफार्म की आवश्यकता, जो सभी या भुगतान प्लेटफार्मों पर लेन-देनों को सपा एकीकृत यूएसएसडी प्लेटफार्म की आवश्यकता, जो सभी या भुगतान प्लेटफार्मों पर लेन-देनों को सपा एकीकृत यूएसएसडी प्लेटफार्म की आवश्यकता, जो सभी या भुगतान प्लेटफार्मों पर लेन-देनों को सपा

40. वर्तमान में, एनपीसीआई द्वारा संचालित राष्ट्रीय यूएसएसडी प्लेटफार्म के यूएसएसडी एग्रीगेशन प्लेटफार्मों पर केवल मोबाइल बैंकिंग लेनदेन करने की अनुमति है। परामर्श पत्र में यह प्रश्न उठाया गया था कि क्या मर्चेंट भुगतान, यूटीलिटी बिल भुगतान, मोबाइल/डीटीएच रिचार्ज आदि सहित सभी प्रकार की मोबाइल भुगतान सेवाओं को यूएसएसडी एग्रीगेशन प्लेटफार्मों पर अनुमति दी जानी चाहिए?

41. दूरसंचार सेवा प्रदाता और उनके संघों का यह मत है कि बेसिक मोबाइल बैंकिंग को यूएसएसडी प्लेटफार्म के जरिये अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि अन्य सेवाओं के लिए अनुमति देने से बैंक विहीन को बेसिक वित्तीय सेवाएं प्रदान करने पर ध्यान कम हो जाएगा। यह भी कहा गया है कि दूसरे भुगतान तंत्र को अनुमति देना वित्तीय समावेशन के लक्ष्य के दायरे से बाहर है। यह भी तर्क दिया गया कि बाजार शक्तियों को विनियामक हस्तक्षेप के बजाय ऐसे अवसरों के लिए दृष्टिकोण तय करने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि इससे परिणाम अनुकुल से कम हो सकते हैं। अगर बैंकिंग लेन-देन से बाहर के भुगतान को यूएसएसडी प्लेटफार्म के जरिये अनुमति दी जाती है तो यह दूरसंचार सेवा प्रदाता और एग्रीगेटर प्लेटफार्म के बीच पी2पी निर्णय होगा। इसलिए उनका यह मानना है कि अतिरिक्त सेवाओं का समावेशन एनपीसीआई और दूरसंचार सेवा प्रदाता के बीच परस्पर बातचीत से तय समझौते के आधार पर होना चाहिए।

42. दूसरी ओर, अन्य संगठनों का यह मानना है कि स्वीकृत अवसंरचना का विकास करने की आवश्यकता है और यूएसएसडी एग्रीगेशन प्लेटफार्म नकदी रहित/कॉर्ड रहित होने के नाते इसका इस्तेमाल कॉर्ड, मर्चेंट डिस्काउंट दर और इंटरनेट के बिना किया जा सकेगा और इससे उपभोक्ता मर्चेंट स्वीकृति और प्रोमोशन के माध्यम से डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक भुगतान को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। उन्होेंने यह सुझाव भी दिया है कि मोबाइल रिचार्ज, यूटीलिटी बिल भुगतान, डीटीएच भुगतान, पी2पी मनी ट्रांसफर जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं को अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि ये किसी भी श्रेणी के सबसे अधिक लोकप्रिय भुगतान हैं और इससे यूएसएसडी सेवाओं को अपनाने में बढ़ावा मिलेगा।

43. इसी तरह, आरबीआई सहित अधिकांश बैंकों ने यूएसएसडी प्लेटफार्म पर मर्चेंट भुगतानों, भारत बिल भुगतान प्रणाली (बीबीपीएस) के समावेशन का समर्थन किया है। बैंकों ने *99# प्लेटफार्म पर प्रीपेड इंस्ट्रुमेंट (पीपीआई) को शामिल करने का भी अनुरोध किया है क्योंकि ये भुगतान ईकोसिस्टम में महत्वपूर्ण हैं। आरबीआई ने भी यह अनुरोध किया है कि सभी यूनिट, जो भारतीय रिजर्व बैंक के भुगतान एवं निपटान अधिनियम, 2007 के अंतर्गत आती हैं, को इंटरओपरेटेबल यूएसएसडी प्लेटफार्म पर सेवाओं की पेशकश करने की अनुमति दी जाए।

भारत का राजपत्रा : असाधरण [भाग III—खण्ड 4] 13

44. मर्चेंट भुगतान, यूटीलिटी बिल भुगतान, मोबाइल/डीटीएच रिचार्ज आदि सहित विभिन्न मोबाइल भुगतान सेवाओं को यूएसएसडी एग्रीगेशन प्लेटफार्म पर अनुमति देने का प्रश्न डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के महत्व के अलोक में विशेष रूप से जरूरी है क्योंकि यह वित्तीय समावेशन योजना का महत्वपूर्ण भाग है। जीआईआरओ आधारित भुगतान प्रणालियों को लागू करने की व्यवहार्यता का अध्ययन करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गठित जी. पदमनाभन समिति3 ने अनुमान लगाया था कि देश के प्रमुख 20 शहरों में प्रतिवर्ष 6223 बिलियन राशि के 30800 मिलियन बिल जनरेट किए जाते हैं। रोकड़ और चेक भुगतान इन बिलों के भुगतान के सर्वाधिक प्रचलित रूप हैं हालांकि अन्य रूप में भी भुगतान स्वीकार किए जा रहे हैं। डिमिरगुक-कुंट एट एल4 ने टिप्पणी की है कि ''इस तरह की डिजिटाइजिंग भुगतान खाताधारक को अधिक आसान, अधिक किफायती और अधिक सुरक्षित तरीके से भुगतान करने में समर्थ बनाएंगे''। लेखिका ने टिप्पणी की है कि इसके निम्नलिखित लाभ हो सकते हैंः-

• यह भुगतान की गति बढ़ाकर और इनके संवितरण एवं प्राप्त करने की लागतों में कमी करके भुगतान करने की कुशलता को बेहतर कर सकता है।

• यह भुगतानों की सुरक्षा बढ़ा सकता है और इससे जुड़ी अपराधिक घटनाओं में कमी आएगी।

• यह भुगतानों की पारदर्शिता बढ़ा सकता है, जिससे भेजने वाले और प्राप्त करने वाले के लिए लीकेज की संभावना कम होगी।

45. यह सभी समझते हैं कि कम नकदी वाला समाज न केवल वित्तीय रूप से अधिक समावेशी होता है बल्कि राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से भी फायदेमंद होता है। किसी भी वित्तीय संस्था के लिए रोकड़ का प्रबंधन महत्वपूर्ण प्रचालनिक व्यय होता है। बैंक की यह लागत मद अंततः व्यक्तियों और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक लागत मद बन गई है। इस लागत मद सेे सबसे अधिक चोट गरीब को पहुंचती है और इसीलिए वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को कम नकदी वाले समाज के दृश्टिकोण से जोड़ दिया गया है। अतः कम नकदी और अधिक डिजिटल भुगतान लेन-देन वाला समाज बनाने में फायदा है क्योंकि इसे सरकार द्वारा अपने विभिन्न दिशानिर्देशों और कदमों के जरिये बढ़ावा दिया जा रहा है।

46. निर्धन सहायता परामर्श समूह (सीजीएपी) के अनुसार, पहुॅंच (हैंडसेट के साथ कंपेटिबिलिटी), यूजर अनुभव, सुरक्षा, लागत और प्रदाताओं के लिए लागू करने में आसानी जैसे कारकों को देखते हुए वर्तमान में कम आय वाले उपभोक्ता की भुगतान जरूरतों को पूरा करने लिए उपलब्ध विकल्पों में से यूएसएडी सबसे अच्छा विकल्प है5।

47. एनपीसीआई द्वारा इसी तरह, भारत बिल भुगतान प्रणाली (बीबीपीएस) एकीकृत और इंटरओरेटेबल बिल भुगतन प्रणाली कार्यान्वित की जा रही है, जिसमें उपभोक्ता विभिन्न बिलों को एक ही प्वाईंट पर कुशल और सुविधाजनक तरीके से अदा कर सकते हैं। इससे आशा है कि बैंक विहीन और बैंक अधीन आबादी के बड़े हिस्से को पहुॅंच योग्य बिल भुगतान प्रणाली उपलब्ध होगी। यह बिलर के लिए भी सुविधाजनक होगी।

इसकी शुरूआत में बिजली, पानी, गैस, टेलीफोन और डायरेक्ट-टु-होम (डीटीएच) जैसी प्रतिदिन की यूटीलिटी सेवाओं के लिए केवल दोहराव वाले भुगतान बीबीपीएस में शामिल किए जाएंगे। फिर धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ाया जाएगा और स्कूल/विश्वविद्यालय की फीस, निगम कर आदि जैसे दोहराव वाले अन्य भुगतान शामिल किए जाएंगे। बीबीपीएस प्लेटफार्म पर यूएसएसडी के इस्तेमाल को अनुमति देने से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि बेसिक फोन के यूजर, जिनकी इंटरनेट तक पहुंच नहीं है, भी इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल करके डिजिटल भुगतानों में भाग लेने में समर्थ हैं।

3 भारत में जीआईआरओ अधारित भुगतान प्रणाली के कार्यान्वयन का अध्ययन करने वाली समिति की दिनांक 7 मई, 2013 की रिपोर्ट,https://rbi.org.in/scripts/PublicationReportDetails.aspx?UrlPage=&ID=701#R5

4 असली डिमिरगुक-कुंट, लिओरा कलप्पर, डोरोथी सिंगर, पीटर वैन ओघीयुस्डेन, द ग्लोबल फिनडेक्स डेटाबेस 2014ः दुनियाभर में वित्तीय समावेशन का आकलन करना, विश्व बैंक समूह, अप्रैल, 2015, http://documents.worldbank.org/curated/en/187761468179367706/pdf/WPS7255.pdf#page=3

5 सीजीएपी, मोबाइल भुगतान में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रहा हैः यूएसएसडी, सीजीएपी की भूमिका, फरवरी, 2015, https://www.cgap.org/sites/default/files/Brief-The-Role-of-USSD-Feb-2015.pdf14 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART III—SEC. 4] 48. उपरोक्त मे दृष्टिगत, प्राधिकरण का यह मानना है कि यूएसएसडी प्लेटफार्म पर भारतीय रिजर्व बैंक के भुगतान एवं निपटान अधिनियम, 2007 के अधीन आने वाले सभी अधिकृत यूनिटों के लिए भुगतान सेवाओं और भारत बिल भुगतान प्रणाली (बीबीपीएस) पर प्राप्त किए जा रहे भुगतानों की पेशकश करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

(7) अन्य मुद्देेंंअन्य मुद्देेंंअन्य मुद्देेंंअन्य मुद्देेंं

49. कई हितधारकों ने एक अति-महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है कि यूएसएसडी आधारित मोबाइल बैंकिंग सेवाओं के संबंध में जागरूकता या इस सेवा की कार्यक्षमता के संबंध में उपभोक्ताओं को शिक्षित करक, उक्त सेवा को बढ़ावा देने के लिए बैंकों या एनपीसीआई द्वारा पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए हैं। विविधता, ग्रामीण क्षेत्रों के फैलाव तथा लक्षित आबादी के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए, सेवा को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक विपणन (मार्केटिंग) और संचार योजना तैयार की जानी चाहिए।

50. कुछ हितधारकों ने यूएसएसडी आधारित दृष्टिकोण को समाप्त करने और इसके बदले में एन्क्रिप्टेड एसएमएस का लेन-देन चैनल के रूप में प्रयोग करने तथा चैनल पर एन्क्रिप्टेड डेटा को लेने जाने का भी प्रस्ताव दिया। यह भी दलील दी गई कि यह पुश्टि करने के लिए कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है कि इन सेवाओं का कम उपयोग होने का कारण यूएसएसडी शुल्क को वहन करने (एक्सेस) की चुनौतियां हैं।

51. खुला मंच चर्चा के दौरान, कुछ हितधारकों द्वारा यह भी बताया गया कि सभी बैंक खाते मोबाइल फोन से लिंक नहीं हैं। उपभोक्ताओं के खातों को लिंक करने के लिए, उपभोक्ताओं को व्यक्तिगत रूप से बैंकों में जाना होगा। कुछ हितधारकों ने एक सुदृढ़ उपभोक्ता विवाद समाधान और निवारण प्रणाली के सृजन की आवष्यकता पर बल दिया।

52. उपर्युक्त मुद्‌्‌दों की जांच करने के उपरांत, प्राधिकरण का मत है कि मोबाइल बैंकिंग के साथ ही साथ अन्य वित्तीय सेवाओं के लिए यूएसएसडी का उपयोग किया जा सकता है। तथापि, अन्य कई उपाय किए जाने की आवष्यकता है, जिसमें एनपीसीआई द्वारा यूएसएसडी संरचना में सुधार (सॉफ्टवेयर में सुधार, उपभोक्ता जागरूकता में वृद्धि तथा मोबाइल फोनों को बैंक खातों के माध्यम से) शामिल है।

53. प्राधिकरण ने यह नोट किया है कि असफल लेन-देन प्रक्रिया की तादाद काफी ज्यादा है एवं लेन-देन प्रक्रिया की कुषलता भी नहीं है।

इसके कारण बहुत हो सकते हैंः टैरिफ भी इनमें से एक कारण है। एनपीसीआई/बैंक/बाकी पक्षकारों को इसके लिए नीति निर्धारण ढांचा इस प्रकार से बनाना होगा कि उपभोक्ताओं को इसका भुगतान न करना पड़े विषेश रूप से असफल लेन-देन प्रक्रिया के लिए और इस तरह का भुगतान एनपीसीआई/बैंक/अन्य पक्षकार वहन करें। इस तरह की व्यवस्था इस सेवा को प्रेरणा देगी जिससे डिजिटल इंडिया जैसे पहलू को कम नकदी वाले समाज के माध्यम से प्रोत्साहन मिलेगा। प्राधिकरण इस सेवा की प्रगति को देखना जारी रखेगा और आवष्यकता पड़ने पर जरूरी कदम उठाएगा।

संक्षिप्ताक्षरों की सूची
क्रम संख्या संक्षिप्ताक्षर विस्तार
1 एटीएम स्वचालित टेलर मशीन
2 बी2बी व्यापार से व्यापार
3 बी2सी व्यापार से उपभोक्ता
4 बीसीए व्यापार विनिमय एजेंट
5 बीबीपीएस भारत बिल पेमेंट सिस्टम
6 सीजीएपी गरीबों की सहायता हेतु सलाह समूह
7 डीएफएस वित्तीय सेवा विभाग
8 डीओटी दूरसंचार विभाग
9 डीटीएच डायरेक्ट टू होम
10 जीओआई भारत सरकार
11 जीएसएम ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाईल कम्यूनिकेसंस
12 जी2पी गवर्मेंट टू पर्सन
13 आईएमजी अंतर मंत्रालयी समूह
14 आईटी सूचना प्रौद्‌योगिकी
15 आईवीआर इंटरएक्टिव वॉयस रिस्पांस
16 जेएएम जन धन आधार मोबाईल
17 ओएचडी खुला चर्चा मंच
18 एनपीसीआई भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम
19 एनयूयूपी नेषनल यूनिफाईड यूएसएसडी प्लेटफॉर्म
20 पी2पी पीयर टू पीयर
21 पीपीआई प्रीपेड इंस्ट्र्‌ूमेंट
22 पीएमजेडीआई प्रधानमंत्री जन धन योजना
23 क्यूओएस सेवा की गुणवत्ता
24 आरबीआई भारतीय रिजर्व बै क ं
25 एसएमएस संक्षिप्त संदेश सेवा
26 एसएमपीपी संक्षिप्त संदेष पीयर टू पीयर
27 टीआरएआई भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण
28 टीएसपी टेलिफोन सेवा प्रदाता
29 टीटीओ दूरसंचार टैरिफ आदेश
30 यूएसपी यूनिक सेलिंग प्वाइंट
31 यूएसएसडी असंरचित अनुपूरक सेवा डेटा
भारत का राजपत्रा : असाधरण [भाग III—खण्ड 4] 15

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  1. ए हंड्रेड स्मॉल स्टेप्सः वित्तीय क्षेत्रों सुधार संबंधी समिति की रिपोर्ट, योजना आयोग, भारत सरकार, 2009, http://planningcommission.nic.in/reports/genrep/rep_fr/cfsr_all.pdf. ↩
  2. https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/PublicationReport/Pdfs/FFIRA27F4530706A41A0BC394D01CB4892CC.PDF 3. प्रधानमंत्री जनधन योजना के बारे में, http://www.pmjdy.gov.in/about 4. https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/PublicationReport/Pdfs/FFIRA27F4530706A41A0BC394D01CB4892CC.PDF ↩
Cite this issue. Extraordinary Gazette of India, Government of India, 23 November 2016. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.central.e.2016-11-23.172727/. Archive identifier in.gazette.central.e.2016-11-23.172727.