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Extraordinary Gazette of India · Government of India

The translation in Hindi of the Lakshadweep Co operative Societies Regulation, 2022 is hereby published under the authority of the President and shall be deemed to be the authoritative text thereof in Hindi under clause

Published 06 December 2022

Ministry
Ministry of Law and Justice
Department
Legislative Department
Office
Official Languages Wing
Gazetteid
CG-DL-E-06122022-240826
Identifier
in.gazette.central.e.2022-12-06.240826
Languages
English, Hindi
Published at
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रजिस्ट्री सं. डी.एल.- 33004/99

REGD. No. D. L.-33004/99

सी.जी.-डी.एल.-अ.-06122022-240826

CG-DL-E-06122022-240826

सी.जी.-डी.एल.-अ.-06122022-240826

CG-DL-E-06122022-240826

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असाधारण

EXTRAORDINARY

भाग II—अनुभाग 3क

PART II—Section 3A

प्राधिकार से प्रकाशित

PUBLISHED BY AUTHORITY

[खण्ड. XLV सं. 04] नई दिल्ली, मंगलवार, दिसम्बर 6, 2022/अग्रहायण 15, 1944 No. 04] NEW DELHI, TUESDAY, DECEMBER 6, 2022/AGRAHAYANA 15, 1944 [Vol. XLV

विधि और न्याय मंत्रालय

(विधायी विभाग)

राजभाषा खण्ड

नई दिल्ली, 25 नवम्बर, 2022

दि लक्षद्वीप को-ऑपरेटिव सोसाइटीज रेगुलेशन, 2022 का हिन्दी अनुवाद, राष्ट्रपति के प्राधिकार से, प्रकाशित किया जाता है और राजभाषा अधिनियम, 1963 (1963 का 19 ) की धारा 5 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन, यह हिन्दी में उसका प्राधिकृ त पाठ समझा जाएगा :—

MINISTRY OF LAW AND JUSTICE

(LEGISLATIVE DEPARTMENT)

OFFICIAL LANGUAGES WING

New Delhi, the 25th November, 2022

The translation in Hindi of the Lakshadweep Co-operative Societies Regulation, 2022 is hereby published under the authority of the President and shall be deemed to be the authoritative text thereof in Hindi under clause (b) of sub-section (1) of section 5 of the Official Languages Act, 1963 (19 of 1963):—

8087 GI/2022

(1)2 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A]

लक्षद्वीप सहकारी सोसाइटी विनियम, 2022

(2022 का विनियम संख्यांक 4)

भारत गणराज्य के तिहत्तरवें वर्ष में राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित ।

लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र में सहकारी सोसाइटियों के रजिस्ट्रीकरण, निगमन

और प्रबंधन के लिए और लक्कादीव, मिनीकोय और अमीनदीवी

आइसलैंड को-ऑपरेटिव सोसायटी विनियम, 1960

का निरसन करने और उससे संबंधित

या आनुषंगिक विषयों

के मामले के लिए

विनियम

राष्ट्रपति, संविधान के अनुच्छेद 240 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उनके द्वारा बनाए गए निम्नलिखित विनियम को प्रख्यापित करते है:—

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ— (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम लक्षद्वीप सहकारी सोसायटी विनियम, 2022 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर होगा।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं— इस विनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो –

(1) ''प्रशासन" से लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासन अभिप्रेत है ;

(2) "प्रशासक" से राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त किया गया लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक अभिप्रेत है ;

(3) "लेखापरीक्षक" से एक प्रमाणित लेखापरीक्षक अभिप्रेत है, जो अधिकृ त है और सोसाइटी के खातों की लेखा परीक्षा के लिए रजिस्ट्रार से अपील करता है ;

स्पष्टीकरण-- इस खंड के प्रयोजनों के लिए, अभिव्यक्ति "प्रमाणित लेखा परीक्षा'' से एक ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो विहित अर्हता रखता है और धारा 84 के अधीन लेखापरीक्षक के रूप में अधिकृ त रजिस्ट्रार है ;

(4) "अधिकृ त व्यक्ति" से इस विनियम के उपबंधों के अधीन कार्रवाई करने के लिए रजिस्ट्रार द्वारा विधिवत अधिकृ त कोई भी व्यक्ति अभिप्रेत है ;

(5) "बोर्ड" से निदेशक-मंडल या किसी सहकारी सोसाइटी का शासी निकाय अभिप्रेत है, जिसे किसी भी नाम से जाना जाता है, जिसे किसी सोसायटी के मामलों के प्रबंधन का निर्देश और नियंत्रण सौंपा जाता है ;

(6) "उप-विधियों" से तत्समय प्रवृत्त रजिस्ट्रीकृ त उप-विधियां अभिप्रेत हैं और इसमें ऐसी उप-विधियों का एक रजिस्ट्रीकृ त संशोधन सम्मिलित है ;

(7) "कें द्रीय बैंक" से एक सहकारी बैंक अभिप्रेत है, जिसके उद्देश्यों में अन्य सोसाइटियों को ऋण देने के लिए निधि का सृजन सम्मिलित है, किन्तु इसमें शहरी सहकारी बैंक सम्मिलित नहीं है ;

(8) "सोसाइटी" से किसी सोसाइटी की प्रबंध सोसाइटी या अन्य शासी निकाय अभिप्रेत है, जिसे किसी सोसाइटी के मामलों के प्रबंधन का निदेश और नियंत्रण सौंपा गया है ;

(9) "कं पनी" से कं पनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) में परिभाषित कं पनी अभिप्रेत है और इसमें किसी भी संगठन का विकास के प्रयोजन के लिए किसी कें द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम द्वारा गठित या स्थापित एक बैंकिं ग कं पनी, कोई बोर्ड, निगम या अन्य कॉर्पोरेट निकाय सम्मिलित है ;

(10) "सहकारी बैंक" से इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त सोसाइटी अभिप्रेत है और बैंकिं ग का व्यवसाय करना अभिप्रेत है, जैसा कि बैंकिं ग विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (बी) में परिभाषित किया गया है ;

(11) "सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण" से धारा 68 के अधीन प्रशासक द्वारा गठित एक प्राधिकरण अभिप्रेत है ;

(12) "सहकारी सोसाइटी " से लक्षद्वीप के संघ राज्यक्षेत्र में तत्समय प्रवृत्त सहकारी सोसाइटियों से संबंधित विविधियों और विधियों या किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृ त या रजिस्ट्रीकृ त मानी गई सोसाइटी अभिप्रेत है ;

3 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण

(13) "जमा बीमा निगम" से जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम अधिनियम, 1961 (1961 का 47) की धारा 3 के अधीन स्थापित जमा बीमा ऋण गारंटी निगम अभिप्रेत है;

(14) "लाभांश" से किसी सोसाइटी के लाभ में से किसी सदस्य को ऐसे सदस्य द्वारा धारित शेयरों के अनुपात में भुगतान की गई राशि अभिप्रेत है ;

(15) "संघीय सोसाइटी " से एक सोसाइटी, जो-- (क) कम से कम पांच सदस्य जिनमें से स्वयं सोसाइटी हैं; और

(ख) जिसमें मतदान के अधिकार इस प्रकार विनियमित होते हैं कि सदस्य सोसाइटियों के पास ऐसी सोसाइटी की साधारण बैठक की वोटों की कु ल संख्या का कम से कम चार-पाँचवां हिस्सा हो ;

(16) "फर्म" से भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) के अधीन रजिस्ट्रीकृ त एक फर्म अभिप्रेत है ;

(17) "साधारण निकाय" से संबंधित सोसाइटियों की सदस्यता को प्राप्त करने वाले व्यष्टि या संस्थान अभिप्रेत है;

(18) "द्वीप समूह" से लक्षद्वीप संघ राज्य क्षेत्र अभिप्रेत है;

(19) "परिसमापक" से धारा 108 के अधीन नियुक्त किया गया व्यक्ति अभिप्रेत है;

(20) ''सदस्य से सहकारी सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने वाला वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो रजिस्ट्रेशन के पश्चात् पश्चात्वर्ती रूप में रजिस्ट्रीकृ त है या सदस्यता के लिए जिसमें सम्यक् रूप से स्वीकृ त व्यक्ति है और नामित संगम या सहानुभूति रखने वाला व्यक्ति सम्मिलित है ;

(21) "राष्ट्रीय बैंक" से राष्ट्रीय कृ षि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 61) की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृ षि और ग्रामीण विकास बैंक अभिप्रेत है;

(22) "अधिकारी" से उसके ऊपर विधियों के अनुसार ऐसी सोसाइटी के किसी कार्यालय के लिए सोसाइटी द्वारा निर्वाचित या नियुक्त किया गया व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके अंतर्गत इस विनियम,नियम या उपनियम के अधीन निर्वाचित या नियुक्त किया गया ऐसी सोसाइटी के कारोबार के संबंध में निदेश देने के लिए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति, उपसभापति, प्रबंध निदेशक, महानिदेशक, प्रबंधक, सचिव, रोकड़िया, समिति का सदस्य और कोई व्यक्ति अभिप्रेत है;

(23) "कार्यवाहक'' से सहकारी सोसाइटी के एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और रोकड़िया अभिप्रेत हैं और इसमें सहकारी सोसाइटी के बोर्ड द्वारा चुने जाने वाले किसी भी अन्य व्यक्ति को सम्मिलित करता है ;

(24) "शासकीय समनुदेशिती'' से धारा 22 की उपधारा (2) के अधीन कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय अभिप्रेत है ;

(25) ''राजपत्र'' से लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र का राजपत्र अभिप्रेत है ;

(26) ''विहित'' से इस विनियम के अधीन बनाए गए नियम द्वारा विहित किया गया अभिप्रेत है ;

(27) "छू ट" से किसी सोसाइटी के लाभ में से किसी सदस्य या किसी अन्य व्यक्ति को, सोसाइटी के कारबार में उसके योगदान के आधार पर नकद या वस्तु के रूप में किया गया कोई भुगतान अभिप्रेत है ;

(28) "रजिस्ट्रार" से इस विनियम के अधीन सहकारी सोसाइटियों के रजिस्ट्रार के रूप में नियुक्त व्यक्ति अभिप्रेत है और इसमें एक अतिरिक्त रजिस्ट्रार, संयुक्त रजिस्ट्रार, उप रजिस्ट्रार और सहायक रजिस्ट्रार सम्मिलित हैं ;

(29) "रिज़र्व बैंक" से भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित भारतीय रिज़र्व बैंक अभिप्रेत है ;

(30) "नियम'' से इस विनियम के अधीन बनाए गए नियम अभिप्रेत हैं ;

(31) "सोसाइटी'' से इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त या रजिस्ट्रीकृ त समझी जाने वाली सहकारी सोसाइटी अभिप्रेत है ;

(32) "सीमित दायित्व वाला सोसाइटी " से एक ऐसी सोसाइटी अभिप्रेत है जिसके सदस्यों की देयता उसकी उप-विधियों द्वारा सीमित है ;

(33) "अधिकरण" से संघ राज्यक्षेत्र सहकारी अधिकरण की धारा 123 के अधीन गठित किया गया संघ राज्यक्षेत्र सहकारी अधिकरण अभिप्रेत है ;

(34) "संघ राज्यक्षेत्र'' से लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

रजिस्ट्रार और रजिस्ट्रीकरण

3. रजिस्ट्रार और अधिकारी और उनकी शक्तियां—(1) इस विनियम के प्रयोजनों को पूरा करने के लिए, प्रशासक, संघ राज्यक्षेत्र के लिए सहकारी सोसाइटियों के रजिस्ट्रार नाम से ज्ञात एक व्यक्ति को नियुक्त करेगा ।

(2) इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रार कृ त्यों में सहायता करने के लिए प्रशासक, ऐसे अतिरिक्त रजिस्ट्रारों, संयुक्त रजिस्ट्रारों, उप रजिस्ट्रारों, सहायक रजिस्ट्रारों और ऐसे पद के साथ अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है जो वह उचित समझे।

(3) प्रशासक, विनियम के अधीन रजिस्ट्रार के सभी या किन्हीं शक्तियों से उपनियम (2) के अधीन साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है।4 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (4) उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किया गया प्रत्येक व्यक्ति रजिस्ट्रार के साधारण दिशानिर्देशों और अधीक्षण और नियंत्रण के अधीन कार्य करेगा।

4. सोसाइटी जिसे रजिस्ट्रीकृ त किया जा सकता है—एक सोसाइटी निम्नलिखित कारणों से स्थापित की जाएगी : —

(i) सरकारी सिद्धांतों के अनुसार उसके सदस्यों या जनहित में आर्थिक हितों या साधारण कल्याण का संवर्धन करना ; या

(ii) किसी ऐसी सोसाइटी के प्रचालन को सुकर बनाने के लिए इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त किया जा सकता है :

परंतु कोई भी सोसाइटी रजिस्ट्रीकृ त नहीं की जाएगी यदि उसके आर्थिक रूप से कमजोर होने की संभावना है या उसका रजिस्ट्रीकरण किसी अन्य सोसाइटी पर प्रतिकू ल प्रभाव डाल सकता है, विरोध किया गया है या कार्य करना सार्वजनिक नीति के उल्लंघन में होने की संभावना है या जो हो सकता है सहकारी आंदोलन के विकास पर या जिसका रजिस्ट्रीकरण नीति निर्देशों के विपरीत हो सकता है, जो संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन से हो सकता है ।

5. सीमित अथवा असीमित दायित्व के साथ रजिस्ट्रीकरण—किसी सोसाइटी को सीमित अथवा असीमित दायित्व के साथ रजिस्ट्रीकृ त किया जा सकता है ।

6. रजिस्ट्रीकरण की शर्तें—(1) कोई भी सोसाइटी, संघीय सोसाइटी से भिन्न, इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त नहीं होगी, जिसमें कम से कम दस व्यक्ति या ऐसे उच्च व्यक्ति सम्मिलित होते हैं, जो रजिस्ट्रार किसी सोसाइटी के उद्देश्यों और आर्थिक दायित्व का ध्यान रखते हुए और सहकारी आंदोलन के विकास के संबंध में हो सकते हैं। सोसाइटियों (ऐसे प्रत्येक व्यक्ति एक अलग परिवार के सदस्य की मांग करते हैं) के एक वर्ग के लिए समय-समय पर अवधारित करें जो विनियम के अधीन सदस्य बनने के लिए अर्हित हैं और जो ऐसी सोसाइटी के संचालन के क्षेत्र में रहते हैं :

परंतु रजिस्ट्रार सोसाइटी या सोसाइटियों के वर्ग के रजिस्ट्रीकरण के लिए मानदंडों और शर्तों को विनिर्दिष्ट कर सकता है।

(2) असीमित दायित्व वाली कोई भी सोसाइटी तब तक रजिस्ट्रीकृ त नहीं होगी जब तक कि सोसाइटी के सभी व्यक्ति एक ही द्वीप या द्वीपों के एक ही समूह में निवास न करें। स्पष्टीकरण-- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए अभिव्यक्ति ''असीमित दायित्व के साथ सोसाइटी'' से एक सोसाइटी, जिसके सदस्य इसके परिसमाप्त होने की स्थिति में हैं, इसके दायित्वों के संबंध में और सोसाइटी की आस्तियों में ऐसी कमी में योगदान करने के लिए संयुक्त रूप से और गंभीर रूप से उत्तरदायी हैं ।

(3) कोई भी संघीय सोसाइटी तब तक रजिस्ट्रीकृ त नहीं होगी जब तक कि उसमें उसके सदस्यों के रूप में कम से कम पांच सोसाइटियां न हों ।

(4) इस विनियम में किसी बात के होते हुए भी, इस विनियम के प्रारंभ से पूर्व किए गए किसी भी सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण को प्रभावित करने के लिए नहीं समझा जाएगा । (5) शब्द "सीमित'' या ''असीमित'', सीमित या असीमित देयता वाली सोसाइटी के नाम पर अंतिम शब्द होगा, यथास्थिति, जो इस विनियमन के अधीन रजिस्ट्रीकृ त या रजिस्ट्रीकृ त माना जाता है।

स्पष्टीकरण-- इस धारा के प्रयोजनों के लिए "कु टु ंब के सदस्य" से पत्नी, पति, पिता, माता, दादा-दादी, सौतेले पिता, सौतेली माता, पुत्र,पुत्री,सौतेला पुत्र-पुत्री, पुत्री, पोता-पोती, भाई-बहन, छोटा भाई, छोटी बहन और भाई की पत्नी या छोटा भाई अभिप्रेत है ।

7. रजिस्ट्रेशन के रूप में शर्तों से सोसाइटियों को छू ट प्रदान करने की शक्ति—इस विनियम में किसी भी बात के होते हुए भी, प्रशासक, प्रत्येक मामले में विशेष आदेश कर सके गा और अभिलिखित किए जाने वाले कारणों के लिए, रजिस्ट्रेशन के रूप में इस विनियम की किन्हीं अपेक्षाओं से कोई सोसाइटी, यदि कोई हो जैसा कि उसे अधिरोपित किया गया है ऐसी शर्तों के अधीन छू ट प्राप्त कर सकता है।

8. रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन—(1) रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजनों के लिए विहित प्रपत्र प्रस्तावित उप-विधियों की चार प्रतियों के साथ होगा और उसके साथ सोसाइटी और वह व्यक्ति जिसके द्वारा या जिसकी ओर से, ऐसा आवेदन किया गया है, सोसाइटी के संबंध में ऐसी जानकारी प्रस्तुत करेगा, जैसा कि रजिस्ट्रार को आवश्यकता हो सकती है ।

(2) आवेदन पर हस्ताक्षर किए जाएंगे--

(क) एक संघीय सोसाइटी के अतिरिक्त किसी अन्य सोसाइटी के मामले में, कम से कम दस व्यक्तियों द्वारा (ऐसे प्रत्येक व्यक्ति एक अलग कु टु ंब के सदस्य होने के नाते) जो इस विनियमन के अधीन योग्य हैं ; और (ख) एक संघीय सोसाइटी के मामले में, कम से कम पांच सोसाइटियों द्वारा ।

(3) किसी सोसाइटी की ओर से किसी आवेदन पर कोई हस्ताक्षर तब तक वैध नहीं होगा जब तक कि उस पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति ऐसी सोसाइटी का सदस्य न हो और सोसाइटी और उसके उपनियम रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन पर उसकी ओर से हस्ताक्षर करने के लिए संकल्प द्वारा अधिकृ त5 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण ऐसी सोसाइटी द्वारा नहीं किया जाता है; और ऐसे संकल्प की एक प्रति आवेदन के साथ संलग्न है ।

9. अनंतिम रजिस्ट्रीकरण—(1) किसी सोसाइटी से रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन प्राप्त होने पर,--

(क) यदि रजिस्ट्रार का समाधान होता है कि सोसाइटी ने रजिस्ट्रीकरण के रूप में इस विनियम और नियम के उपबंधों का पालन किया है और इसके उप- नियम इस विनियम और विधियों के विपरीत नहीं हैं, वह सोसाइटी और उसके उपनियम को रजिस्ट्रीकृ त करेगा ; तथा

(ख) यदि रजिस्ट्रार की राय है कि आवेदन धारा 8 की अपेक्षाओं का अनुपालन करता है, किन्तु इसके उप- नियम इस विनियम के उपबंधों और इसके अधीन बनाए गए विधियों के अनुरूप नहीं हैं, वह अनंतिम रूप से सोसाइटी को रजिस्ट्रीकृ त कर सकता है और लिखित में एक आदेश द्वारा सोसाइटी को ऐसी शर्तों के अधीन ऐसे कार्यों को करने की अनुमति देता है जो वह आदेश में निर्दिष्ट कर सकते हैं और लिखित आदेश द्वारा भी सोसाइटी को इस संबंध में विहित अवधि के भीतर, इसकी उपविधियों में संशोधन करने का निर्देश दे सकते हैं। जिससे उन्हें इस विनियम और उसके अधीन बनाए गए विधियों के अनुरूप लाया जा सके ।

(2) जब किसी सोसाइटी को अनंतिम रूप से रजिस्ट्रीकृ त किया गया है, रजिस्ट्रार, उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन किए गए आदेश के अनुपालन पर, इसे और इसकी उपविधियों को अंतिम रूप से रजिस्ट्रीकृ त करेगा; और आदेश का पालन करने में इसकी विफलता पर इसके अनंतिम रजिस्ट्रीकरण को रद्द कर देगा :

परंतु किसी सोसाइटी का अनंतिम रजिस्ट्रीकरण तब तक रद्द नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसी सोसाइटी को मामले में सुनवाई का अवसर न दिया गया हो ।

(3) एक अनंतिम रूप से रजिस्ट्रीकृ त सोसाइटी को इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त सोसाइटी नहीं माना जाएगा । (4) किसी सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण पर, रजिस्ट्रार उसे रजिस्ट्रीकरण की तारीख से पंद्रह दिनों की अवधि के भीतर अपने द्वारा हस्ताक्षरित रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करेगा । (5) उपधारा (4) के अधीन जारी रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र इस बात का निर्णायक साक्ष्य होगा कि उसमें उल्लिखित सोसाइटी सम्यक् त: रजिस्ट्रीकृ त है, जब तक कि यह साबित नहीं हो जाता है कि रजिस्ट्रीकरण रद्द कर दिया गया है। (6) यदि रजिस्ट्रार सोसाइटी को रजिस्ट्रीकृ त करने से इनकार करता है, तो वह तुरंत अपने विनिश्चय को कारणों के साथ उस व्यक्ति को सूचित करेगा, जिसने आवेदन पर पहले हस्ताक्षर किए हैं ।

10. सोसाइटियों का रजिस्ट्रीकरण—रजिस्ट्रार इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त या रजिस्ट्रीकृ त समझी जाने वाली सभी सोसाइटियों के विहित प्ररूप में एक रजिस्टर रखेगा ।

11. कतिपय प्रश्नों पर विनिश्चय लेने की रजिस्ट्रार की शक्ति—जब कोई प्रश्न उठता है कि क्या इस विनियम के अधीन किसी सोसाइटी के गठन या रजिस्ट्रीकरण या जारी रखने या किसी व्यक्ति के एक सोसाइटी के सदस्य के रूप में प्रवेश के प्रयोजन से, एक व्यक्ति एक कृ षक या गैर-कृ षक है, या क्या कोई है व्यक्ति एक है, एक द्वीप या द्वीपों के समूह में निवासी, या दो या दो से अधिक द्वीपों को एक समूह बनाने के लिए माना जाएगा, या क्या कोई व्यक्ति किसी विशेष जनजाति, वर्ग या व्यवसाय से संबंधित है, प्रश्न का विनिश्चय रजिस्ट्रार द्वारा किया जाएगा ।

12. सोसाइटियों का वर्गीकरण—रजिस्ट्रार सभी सोसाइटियों को ऐसी रीति से और ऐसे वर्गों में वर्गीकृ त कर सकता है, जैसे . वह ठीक समझे ; और रजिस्ट्रार द्वारा वर्गीकरण के किसी भी शीर्ष के अधीन अंतिम और समितियों पर बाध्यकारी होगा ।

13. उपविधि सोसाइटी का संशोधन—(1) इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त होने तक किसी सोसाइटी की उपविधियों का कोई भी संशोधन मान्य नहीं होगा ।

(2) उपविधियों के संशोधन के रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजन के लिए, पारित संशोधन की एक प्रति, समिति की एक साधारण बैठक में, विहित रीति में, रजिस्ट्रार को अग्रेषित की जाएगी ।

(3) यदि रजिस्ट्रार का समाधान है कि इस प्रकार अग्रेषित संशोधन इस विनियम या विधियों के प्रतिकू ल नहीं है, तो वह संशोधन को रजिस्ट्रीकृ त कर सकता है:

परन्तु संशोधन को रजिस्ट्रीकृ त करने से इंकार करने वाला कोई भी आदेश समिति को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात् पारित नहीं किया जाएगा:

परन्तु यह और कि किसी सोसाइटी की उपविधियों के संशोधन के रजिस्ट्रीकरण के आवेदन का निस्तारण उसकी प्राप्ति की तारीख से दो माह के भीतर किया जाएगा ।

(4) जब रजिस्ट्रार किसी सोसाइटी की उपविधियों में संशोधन को रजिस्ट्रीकृ त करता है, वह संशोधन के रजिस्ट्रीकरण की तारीख से पंद्रह दिनों की अवधि के भीतर सोसाइटी को अपने द्वारा प्रमाणित संशोधन की प्रति जारी करेगा, जो कि इसके रजिस्ट्रीकरण का निर्णायक साक्ष्य होगा ।6 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (5) जहां रजिस्ट्रार किसी सोसाइटी की उपविधियों में संशोधन को रजिस्टर करने से इंकार करता है, वह इंकार के आदेश को उसके कारणों के साथ सोसाइटी के लिए पंद्रह दिनों की अवधि के भीतर संसूचित करेगा ।

14. उपविधियों में संशोधन को निदेशित करने की शक्ति—(1) यदि रजिस्ट्रार को यह प्रतीत होता है कि किसी सोसाइटी की उपविधियों के संशोधन ऐसी सोसाइटी या सोसाइटी के हित में आवश्यक या वांछनीय है इस विनियम या इसके अधीन बनाए गए विधियों के उपबंधों से असंगत हैं, और ऐसी उपविधियों में संशोधन आवश्यक हैं, वह विहित रीति से सोसाइटी को ऐसे समय के भीतर संशोधन करने के लिए कह सकता है जो वह विनिर्दिष्ट कर सकता है ।

(2) यदि सोसाइटी इस प्रकार विनिर्दिष्ट समय के भीतर संशोधन करने में विफल रहती है, तो रजिस्ट्रार सोसाइटी को सुनवाई का अवसर देने के पश् चात् और प्रशासक के पूर्व अनुमोदन से संशोधन को रजिस्ट्रीकृ त कर सकता है और उसके पश्चात् सोसाइटी को उसके द्वारा एक प्रमाणित प्रति जारी करेगा ।

(3) पूर्वोक्त रीति से संशोधन के रजिस्ट्रीकरण की तारीख से, उपविधियों को तदनुसार सम्यक् रूप से संशोधित माना जाएगा और संशोधित उपविधियां सोसाइटी और उसके सदस्यों के लिए बाध्यकारी होंगी ।

15. नाम का परिवर्तन—(1) इस विनियम के अधीन बनाई गए विधियों के उपबंधों के अधीन, एक सोसाइटी, एक साधारण बैठक में पारित प्रस्ताव द्वारा और रजिस्ट्रार के अनुमोदन से, अपना नाम परिवर्तित कर सकती है, किन्तु ऐसे परिवर्तन से किसी भी अधिकार या दायित्व को प्रभावित नहीं करेगा। सोसाइटी या इसके किसी भी सदस्य या ऐसे व्यक्तियों, जो सदस्य नहीं रह गए हैं, और किसी भी व्यक्ति, प्राधिकरण या न्यायालय के समक्ष लंबित विधिक कार्यवाही सोसाइटी द्वारा या उसके विरुद्ध, उसके नए नाम के अधीन जारी रखी जा सकती है ।

(2) जब कोई सोसाइटी अपना नाम परिवर्तित करती है, तो रजिस्ट्रार सोसाइटी के रजिस्टर में उसके स्थान पर नया नाम प्रविष्ट करेगा, और तदनुसार रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र में भी संशोधन करेगा ।

16. दायित्व का परिवर्तन—(1) इस विनियम और इसके अधीन बनाए गए विधियों के उपबंधों के अधीन, सोसाइटी एक संकल्प पारित करके और अपनी उपविधियों में संशोधन करके , अपने दायित्व के प्ररूप या सीमा को बदल सकता है । (2) जब किसी सोसाइटी ने अपने दायित्व के प्ररूप या सीमा को बदलने का संकल्प पारित किया हो, वह अपने सभी सदस्यों और लेनदारों को लिखित रूप में नोटिस देगा और इसके विपरीत किसी भी उपविधि या संविदा में किसी भी बात के होते हुए भी, कोई भी सदस्य या लेनदार, उस पर ऐसे नोटिस की तामील की तारीख से तीस दिनों की अवधि के दौरान होगा, अपने शेयरों, और अपनी जमाराशियों और ऋणों में अपने निवेश को वापस लेने का विकल्प है और अपनी अन्य बकाया राशि, यदि कोई हो, के भुगतान की मांग करने के लिए है । (3) कोई भी सदस्य या लेनदार जो उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अपने विकल्प का प्रयोग नहीं करता है, को परिवर्तन के लिए सहमति दी गई समझी जाएगी । (4) किसी सोसाइटी की उपविधियों में संशोधन, उसके दायित्व के प्ररूप या सीमा को परिवर्तित करते हुए, रजिस्ट्रीकृ त नहीं किया जाएगा या तब तक प्रभावी नहीं होगा, जब तक या तो —

(क) सभी सदस्यों और लेनदारों ने पूर्वोक्त रूप से सहमति दी है, या सहमति दी गई समझी गई है ; या (ख) उपधारा (2) के अधीन विकल्प का प्रयोग करने वाले सदस्यों और लेनदारों के सभी दावों का पूरी तरह से पालन किया गया है।

17. सोसाइटियों का समामेलन, अंतरण, प्रभाग या संपरिवर्तन—(1) इस विनियम के अधीन बनाए गए विधियों के उपबंधों के अधीन और रजिस्ट्रार की पूर्व मंजूरी, एक सोसाइटी दो-तिहाई बहुमत से पारित संकल्प द्वारा प्रयोजन के लिए उपस्थित सदस्यों के और एक विशेष साधारण सभा में मतदान कर सकती है, यह विनिश्चय करेगा कि--

(क) बहुराज्य सहकारी समितियां अधिनियम, 2002 के अधीन किसी अन्य सोसाइटी या रजिस्ट्रीकृ त सोसाइटी के साथ समामेलन करने के लिए ;

(ख) अपनी आस्तियों और देनदारियों को पूर्णरूप से या आंशिक रूप से किसी अन्य सोसाइटी में स्थानांतरित करने के लिए ;

(ग) स्वयं को दो या दो से अधिक सोसाइटियों में विभाजित करने के लिए ;

(घ) स्वयं को दूसरे वर्ग में बदलने के लिए ; या

(ड.) अपनी वस्तुओं को बदलने के लिए ।

(2) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट समामेलन, स्थानांतरण, विभाजन या संपरिवर्तन में किसी सोसाइटी की देनदारियों का किसी अन्य सोसाइटी को हस्तांतरण सम्मिलित है, रजिस्ट्रार सोसाइटी के संकल्प को तब तक मंजूरी नहीं देगा जब तक कि वह संतुष्ट न हो कि--

(i) सोसाइटी ने ऐसे संकल्प को पारित करने के पश्चात्, अपने सभी सदस्यों, लेनदारों और अन्य व्यक्तियों को लिखित रूप में नोटिस दिया है जिनके हित प्रभावित होने की संभावना है (इसे इसमें इसके पश् चात् इस धारा में "अन्य इच्छु क व्यक्ति" के रूप में कहा गया7 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण है) उन्हें ऐसे नोटिस की प्राप्ति की तारीख से एक महीने के भीतर, किसी भी नई सोसाइटी के सदस्य बनने, या समामेलित या संपरिवर्तित सोसाइटी में अपनी सदस्यता जारी रखने या इसके शेयरों में अपने निवेश को वापस लेने, अपनी जमा राशि को वापस लेने और ऋण और उनके अन्य देय राशि के भुगतान की मांग, यदि कोई हो, का विकल्प चुनने का विकल्प है ;

(ii) सभी सदस्यों और लेनदारों और अन्य इच्छु क व्यक्तियों ने विनिश्चय के लिए सहमति दी है या खंड (i) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर विकल्प का प्रयोग करने में विफल रहने के कारण इसके लिए सहमति दी गई है;

और

(iii) निर्दिष्ट अवधि के भीतर विकल्प का प्रयोग करने वाले सदस्यों और लेनदारों और अन्य इच्छु क व्यक्तियों के सभी दावों का पूर्ण रूप से अनुपालन किया गया है ।

(3) संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882, (1882 का 4) या भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, विभाजन या संपरिवर्तन की स्थिति में, नई समितियों का रजिस्ट्रीकरण या, यथास्थिति, परिवर्तित सोसाइटी का और समामेलन की स्थिति में, समामेलन पर, समामेलन से संबंधित सोसाइटियों का संकल्प, मूल सोसाइटी या समामेलन सोसाइटियों की आस्तियों और दायित्वों को यथास्थिति, नई सोसाइटियों या परिवर्तित या समामेलित सोसाइटी में निहित करने के लिए पर्याप्त संप्रेषण होगा ।

(4) इस धारा के अधीन किए गए समामेलन, स्थानांतरण, विभाजन या संपरिवर्तन से इस प्रकार समामेलित सोसाइटियों या विभाजित या परिवर्तित या हस्तांतरण, या दोषपूर्ण, किसी भी विधिक कार्यवाही को जारी रखा या आरंभ किया जा सकता है जो कि समामेलित या विभाजित या परिवर्तित हो गई है और तदनुसार ऐसी विधिक कार्यवाही जारी रखी जा सकती है या आरंभ की जा सकती है या यथास्थिति, समामेलित सोसाइटी, संपरिवर्तित सोसाइटी, नई समितियों या अंतरिती के विरुद्ध सोसाइटी के किसी भी अधिकार या दायित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

18. समामेलन और पुन: संगठन को लोकहित, आदि में सोसाइटियों को निदेशित करने की शक्ति—(1) जहां रजिस्ट्रार का समाधान हो कि जनहित में या सहकारी आंदोलन के हित में, या किसी भी सोसाइटी के उचित प्रबंधन को हासिल करने के प्रयोजन से यह आवश्यक है कि दो या दो से अधिक सोसाइटियों को समामेलित किया जाना चाहिए या कि किसी भी सोसाइटी को फिर से संगठित किया जाना चाहिए, फिर, धारा 17 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी किं तु इस धारा के उपबंधों में सोसाइटियों के अधीन, रजिस्ट्रार, ऐसी संघीय सोसाइटी से परामर्श करने के पश्चात्, जो सार्वजनिक हित हो सकता है, इस संबंध में राजपत्र में प्रकाशित आदेश प्रशासक द्वारा अधिसूचित किया जा सकता है, यथास्थिति, इन सोसाइटियों के एकल सोसाइटी में समामेलन के लिए या उस सोसाइटी के पुनर्गठन के लिए, ऐसे संविधान, संपत्ति के अधिकार, हितों और प्राधिकरणों और ऐसी देनदारियों के साथ प्रदान करता है, कर्तव्यों और दायित्वों के रूप में जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जा सकता है । (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट आदेश नए समामेलित या पुनर्गठित सोसाइटी की प्रबंधन समिति या किसी अन्य समिति के गठन के लिए भी उपबंध कर सकता है, जो व्यक्ति होंगे, या बने रहेंगे, ऐसी समिति के अधिकारी और वह अवधि जिसके पश्चात् ऐसी समिति या समितियों का पुनर्गठन किया जा सकता है ।

(3) इस धारा के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक, —

(क) प्रस्तावित आदेश के प्रारूप की एक प्रति सोसाइटी या प्रत्येक संबंधित सोसाइटी को भेज दी गई है ; और (ख) रजिस्ट्रार ने ऐसी अवधि (जिस तारीख से एक महीने से कम नहीं हो सकता है जैसा कि पूर्वोक्त आदेश की प्रति सोसाइटी को प्राप्त हुई थी) के भीतर सोसाइटी या किसी सदस्य या उसके सदस्यों के वर्ग से या किसी लेनदार या लेनदारों के वर्ग से प्राप्त सुझावों और आपत्तियों पर विचार किया है जैसा कि रजिस्ट्रार उस संबंध में नियत कर सकता है, और यदि आवश्यक हो, तो ऐसे सुझावों और आक्षेपों को ध्यान में रखते हुए उसमें संशोधन किया है ।

(4) उपधारा (1) में निर्दिष्ट आदेश में ऐसे आकस्मिक, परिणामी और पूरक उपबंध अंतर्विष्ट हो सकते हैं, जो रजिस्ट्रार की राय में समामेलन या पुनर्संगठन को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक हो सकते हैं ।

(5) इस प्रकार समामेलित प्रत्येक सोसाइटी के प्रत्येक सदस्य को नई समामेलित सोसाइटी का सदस्य माना जाएगा और इस प्रकार पुनर्गठित सोसाइटी के प्रत्येक सदस्य को नई पुनर्गठित सोसाइटी का सदस्य माना जाएगा और ऐसे सभी सदस्यों के पास संबंधित नई सोसाइटियों के सदस्यों के सभी अधिकार, विशेषाधिकार और दायित्व होंगे:

परन्तु इस प्रकार समामेलित या पुनर्गठित नई सोसाइटी का कोई भी सदस्य, ऐसी अवधि के भीतर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, नई सोसाइटी की सदस्यता से त्यागपत्र दे सकता है और ऐसे त्यागपत्र पर वह सोसाइटी में अपना हिस्सा वापस लेने और कोई भी अन्य बकाया और हित का हकदार होगा ।8 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (6) किसी भी सोसाइटी या सोसाइटियों के संबंध में उपधारा (1) के अधीन एक आदेश जारी करने पर, तत्समय प्रवृत्त किसी भी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए, यथास्थिति, समामेलन समितियों की सभी संपत्ति, अधिकार और देनदारियां, या, यथास्थिति, मूल सोसाइटी जिसे पुनर्गठित किया गया है, और नई समेकित सोसाइटी में निहित होगी, या, यथास्थिति, नई पुनर्गठित सोसाइटी को स्थानांतरित हो जाएगी ।

(7) धारा 17 की उपधारा (3) और (4) के उपबंध और धारा 19 के उपबंध इस धारा के अधीन समितियों के एकीकरण या पुनर्गठन के संबंध में इस प्रकार लागू होंगे जैसे कि,-- (क) समामेलन का आदेश समामेलन से संबंधित सोसाइटियों का एक संकल्प था ; और

(ख) मूल सोसाइटी को धारा 17 के अधीन पुनर्गठित किया गया था ।

19. निरस्तीकरण समामेलित, विभाजित या संपरिवर्तित सोसाइटियां—जहां दो या दो से अधिक सोसाइटियों को समामेलित किया गया है, या एक सोसाइटी को विभाजित या संपरिवर्तित किया गया है, यथास्थिति, ऐसी सोसाइटियों या सोसाइटी का रजिस्ट्रीकरण, यथास्थिति, नई सोसाइटी या सोसाइटियों के रजिस्ट्रीकरण की तारीख को रद्द कर दिया जाएगा ।

20. सोसाइटी का परिसमापक— जहां समझौता या व्यवस्था प्रस्तावित है--

(क) एक सोसाइटी और उसके लेनदारों के मध्य; या (ख) एक सोसाइटी और उसके सदस्यों के मध्य, रजिस्ट्रार, सोसाइटी या किसी सदस्य या सोसाइटी के किसी भी लेनदार के आवेदन पर, या किसी सोसाइटी के मामले में, जिसे परिसमापक का आदेश किया जा रहा है, सोसाइटी को विहित रीति में आदेश दे सकता है । 21. रजिस्ट्रीकरण का निरस्तीकरण—(1) रजिस्ट्रार किसी सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण को निरस्त करने का आदेश देगा यदि वह अपनी संपूर्ण आस्तियों और देनदारियों को किसी अन्य सोसाइटी को हस्तांतरित करता है, या किसी अन्य सोसाइटी के साथ समामेलित करता है, या स्वयं को दो या अधिक सोसाइटियों में विभाजित करता है, या यदि इसके मामले समाप्त हो गए हैं या यह अपने रजिस्ट्रीकरण के उचित समय के भीतर व्यवसाय शुरू नहीं किया है या कार्य करना बंद कर दिया है:

परंतु किसी सोसाइटी का रजिस्ट्रीकरण तब तक निरस्त नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसी सोसाइटी को मामले में सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया हो ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया आदेश राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा।

(3) सोसाइटी, निरस्त करने के ऐसे आदेश की तारीख से, भंग समझी जाएगी और एक कॉर्पोरेट निकाय के रूप में अस्तित्व में नहीं रहेगी ।

22. सोसाइटियों का पुन: रजिस्ट्रीकरण करना—(1) यदि रजिस्ट्रार इस बात से संतुष्ट है कि आवेदकों द्वारा किए गए गलत प्रतिनिधित्व पर कोई सोसाइटी रजिस्ट्रीकृ त है, या जहां सोसाइटी का काम पूरा हो गया है या समाप्त हो गया है या जिन प्रयोजनों के लिए सोसाइटी को रजिस्ट्रीकृ त किया गया है, या कोई भी "बैंक", "बैंकिं ग", "बैंकर" या "बैंक" शब्द के किसी अन्य व्युत्पन्न शब्द का प्रयोग करते हुए प्राथमिक कृ षि सहकारी ऋण समिति सेवा नहीं कर रही है, वह सोसाइटी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् सोसाइटी का रजिस्ट्रीकरण करें । (2) जब उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन किसी सोसाइटी का रजिस्ट्रीकरण रद्द हो जाता है, तो रजिस्ट्रार, तत्समय प्रवृत्त इस विनियम या किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसे आकस्मिक और परिणामी आदेश दे सकता है जिसके अंतर्गत शासकीय समनुदेशिती की नियुक्ति के रूप में परिस्थितियों की अपेक्षा हो सकती है । (3) इस विनियम के अधीन बनाए गए विधियों के अधीन, शासकीय समनुदेशिती संपत्ति, आस्तियों, पुस्तकों, अभिलेखों और अन्य दस्तावेजों का प्रभार लेने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर आस्तियों का एहसास करेगा और देनदारियों को समाप्त करेगा, जिसकी अवधि, रजिस्ट्रार के विवेक पर, समय-समय पर बढ़ाई जा सकती है, तथापि, कु ल अवधि कु ल मिलाकर तीन वर्ष से अधिक नहीं है ।

(4) शासकीय समनुदेशिती को ऐसे पारिश्रमिक और भत्ते का भुगतान किया जाएगा जो विहित किया जाए और वह विहित पारिश्रमिक या भत्तों से परे किसी भी पारिश्रमिक का हकदार नहीं होगा ।

23. सोसाइटियों की भागीदारी—(1) कोई भी दो या दो से अधिक सोसाइटियां, रजिस्ट्रार के पूर्व अनुमोदन से प्रत्येक ऐसी सोसाइटी की साधारण बैठक में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के तीन-चौथाई बहुमत द्वारा पारित संकल्प की भागीदारी द्वारा किसी विशिष्ट कारबार या व्यवसाय को चलाने के लिए साझेदारी में प्रवेश करें, परंतु यह कि प्रत्येक सोसाइटी के प्रत्येक सदस्य के पास संकल्प की दस दिन की लिखित सूचना और बैठक की तारीख स्पष्ट हो ।

(2) भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932का 9) और कं पनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) में किसी बात के होते हुए भी ऐसी भागीदारी पर लागू नहीं होगा ।9 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण 24. सोसाइटियों द्वारा सहयोग—(1) कोई भी सोसाइटी या सोसाइटियां, प्रशासक के पूर्व अनुमोदन से और ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन, जो प्रशासक अधिरोपित कर सकता है और ऐसी रीति से जो विहित की जाए, किसी भी उपक्रम या औद्योगिक निवेश, वित्तीय सहायता या विपणन और प्रबंधन विशेषज्ञता सहित किसी विशिष्ट व्यवसाय या व्यवसाय को चलाने के लिए प्रशासक द्वारा अनुमोदित किसी उपक्रम के साथ सहयोग में प्रवेश कर सकता है ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी भी सोसाइटी या सोसाइटी द्वारा सहयोग की ऐसी किसी भी स्कीम को मंजूरी देने से पूर्व, प्रशासक को निम्नलिखित मामलों पर ध्यान देना होगा, अर्थात्:--

(क) यह योजना आर्थिक रूप से व्यवहार्य है;

(ख) कि इसे किसी भी तरह से सोसाइटी या संबंधित समितियों के सहकारी चरित्र को नष्ट किए बिना लागू किया जा सकता है; तथा

(ग) यह स्कीम संबंधित सोसाइटी या सोसाइटी के सदस्यों के हित में है, या जनहित में है, और साधारण रूप से सहकारी आंदोलन के हित में है ।

अध्याय 3

सदस्य और उनके अधिकार और दायित्व 25. ऐसे व्यक्ति जो सदस्य हो सकते हैं—(1) धारा 28 के उपबंधों के अधीन, किसी भी व्यक्ति को किसी सोसाइटी के सदस्य के रूप में तब तक प्रवेश नहीं दिया जाएगा जब तक कि ऐसा व्यक्ति—

(क) एक व्यक्ति, जो भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) के उपबंधों के अधीन अनुबंध करने के लिए सक्षम है ;

(ख) एक फर्म, कं पनी या कोई अन्य निगम निकाय जो तत्समय प्रवृत्त किसी भी विधि के अधीन गठित किया गया हो ;

(ग) इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त या रजिस्ट्रीकृ त समझी जाने वाली सोसाइटी ;

(घ) कें द्रीय सरकार ;

(ड.) प्रशासक ;

(च) एक स्थानीय प्राधिकरण ;

(छ) कोई सार्वजनिक न्यास जो तत्समय प्रवृत्त लागू विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृ त या रजिस्ट्रीकृ त माना गया हो ;

(ज) जमाकर्ता या वित्तीय सेवा उपयोगकर्ता ; या (झ) खंड (क) के अधीन पात्र व्यक्तियों का एक समूह, चाहे निगमित हो या नहीं और किसी विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित किया गया हो या नहीं :

परंतु खंड (क) के उपबंध किसी स्कू ल या कॉलेज के छात्रों के लाभ के लिए विशेष रूप से बनाई गई सोसाइटी में प्रवेश पाने के इच्छु क व्यक्ति पर लागू नहीं होंगे :

परंतु यह भी कि साधारण या विशेष आदेश द्वारा प्रशासक द्वारा अधिकथित ऐसे निबंधन और शर्तों के अधीन, एक फर्म या कं पनी को के वल उस सोसाइटी के सदस्य के रूप में भर्ती किया जा सकता है जो एक संघीय या शहरी सोसाइटी है या जो संचालन या करने का आशय रखता है एक औद्योगिक उपक्रम का संचालन करें :

परंतु यह भी कि कोई फर्म या कं पनी, जो इस विनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त समझी जाने वाली सोसाइटी का सदस्य है, को इस विनियम के अन्य उपबंधों के अधीन ऐसे प्रारंभ पर और उसके पश्चात् ऐसे सदस्य बने रहने का अधिकार होगा ।

(2) सोसाइटी के सदस्य के रूप में प्रवेश पाने वाला प्रत्येक व्यक्ति, यदि इस विनियम के उपबंधों के अधीन ऐसी सोसाइटी की सदस्यता के लिए सम्यक् रूप से अर्हित है, तो सोसाइटी के नियम और उपविधि सदस्यता के लिए सोसाइटी को आवेदन कर सकते हैं और सोसाइटी आवेदन पर विनिश्चय लेगा और आवेदन प्राप्त होने की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर विनिश्चय विनिश्चय की सूचना देगा। (3) यदि सोसायटी ऐसे आवेदन की प्राप्ति की तारीख से तीन महीने के भीतर आवेदक को कोई विनिश्चय नहीं देती है, तो आवेदक को सोसाइटी के सदस्य के रूप में भर्ती किया गया समझा जाएगा ।

(4) यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति मानित सदस्य बन गया है या अन्यथा, उसका विनिश्चय सभी संबंधित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद रजिस्ट्रार द्वारा किया जाएगा ।

(5) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी भी बात के होते हुए भी, प्रशासक, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग के हित, जो किसी वृत्तिक, कारबार या रोजगार में लगे हुए हैं या चला रहे हैं, के हितों के टकराव या होने की संभावना है राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा सोसाइटी घोषणा करता है कि ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के ऐसे वर्ग को सदस्य या सदस्यों के रूप में भर्ती होने या जारी रखने के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा या किसी भी सोसाइटी या सोसाइटी के वर्ग की के वल एक सीमित सीमा तक सदस्यता के लिए पात्र, जब तक कि ऐसा व्यक्ति या व्यक्ति उस वृत्तिक, कारबार या रोजगार में लगे हुए हैं या करते हैं, और यह सवाल कि कोई व्यक्ति ऐसे जुड़ा हुआ है या नहीं या कोई वृत्तिक, कारबार या रोजगार कर रहा है या कोई व्यक्ति इस उपधारा के अधीन घोषित व्यक्तियों के ऐसे वर्ग से संबंधित है या नहीं है और इस उपधारा के अधीन अयोग्यता हुई है या10 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] नहीं, धारा 11 के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा विनिश्चत की जाएगी।

(6) जहां रजिस्ट्रार ने धारा 11 के अधीन विनिश्चय किया है कि एक व्यक्ति को धारा 11 के अधीन अनर्हता के कारण उपगत किया गया है, रजिस्ट्रार, जांच करने के पश्चात्, आदेश द्वारा, ऐसे व्यक्ति को सोसाइटी की सदस्यता से हटा सकता है, और ऐसे व्यक्ति को सोसाइटी के एक सदस्य के रूप में समाप्त माना जाएगा ।

26. कतिपय परिस्थितियों में सदस्यता से हटाना—(1) जहां कोई व्यक्ति सोसाइटी की उपविधियों द्वारा अपेक्षित या अन्यथा किसी भी सोसाइटी का सदस्य बन जाता है और ऐसी घोषणा झूठी पाई जाती है, तो ऐसा व्यक्ति सोसाइटी के एक सदस्य के रूप में जारी रखने के लिए निरर्हित होगा । (2) जहां कोई व्यक्ति धारा 25 की उपधारा (5) या उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा की गई निरर्हता के सिवाय सोसाइटी के सदस्य के रूप में जारी रहता है, उसे रजिस्ट्रार द्वारा सोसाइटी से हटा दिया जाएगा :

परंतु रजिस्ट्रार, हटाने का आदेश देने से पहले व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देगा।

27. खुली सदस्यता—(1) कोई भी सोसाइटी बिना पर्याप्त कारण के इस विनियम और इसके उपविधियों के उपबंधों के अधीन किसी भी व्यक्ति को सदस्यता में प्रवेश से मना नहीं करेगी।

(2) जहां कोई सोसाइटी सदस्य के रूप में प्रवेश के लिए किसी पात्र व्यक्ति से सदस्यता के लिए आवेदन या सदस्यता के संबंध में उसके द्वारा किए गए भुगतान को जारी करने या स्वीकार करने से इनकार करती है, ऐसा व्यक्ति ऐसे रूप में जो विहित की जाए, एक आवेदन प्रस्तुत कर सकता है, सदस्यता के संबंध में भुगतान के साथ, यदि कोई हो, रजिस्ट्रार को, जो आवेदन और राशि, यदि कोई हो, संबंधित सोसायटी को ऐसे आवेदन और राशि की प्राप्ति की तारीख से तीस दिनों के भीतर अग्रेषित करेगा ; और तत्पश्चात्, यदि सोसाइटी ऐसे आवेदन की प्राप्ति की तारीख से तीन महीने के भीतर आवेदक को किसी भी विनिश्चय के बारे में सूचित करने में विफल रहता है और सोसायटी द्वारा राशि, आवेदक को ऐसी सोसाइटी का सदस्य माना जाएगा।

(3) यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति मानित सदस्य बन गया है या अन्यथा, उसका विनिश्चय सभी संबंधित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद रजिस्ट्रार द्वारा किया जाएगा।

(4) समिति के विनिश्चय से व्यथित कोई भी व्यक्ति, समिति के विनिश्चय की तारीख से दो महीने की अवधि के भीतर, उसकी सदस्यता में प्रवेश से इनकार करते हुए, रजिस्ट्रार से अपील कर सकता है और ऐसी हर अपील, जहां तक संभव हो, रजिस्ट्रार द्वारा इसकी प्राप्ति की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निपटारा किया जाएगा। (5) अपील में रजिस्ट्रार का विनिश्चय अंतिम और पार्टियों के लिए बाध्यकारी होगा।

28. नामांकित, संगम और समर्थक सदस्य—(1) धारा 25 में किसी भी बात के होते हुए भी, ऐसे वर्ग की एक सोसाइटी, जो विहित की जाए, किसी भी व्यक्ति को नाममात्र, संगम या समर्थक सदस्य के रूप में स्वीकार कर सकती है :

परंतु किसी सोसायटी में सहयोगी और सहानुभूति रखने वाले सदस्यों की कु ल संख्या उसके सदस्यों की कु ल संख्या के दस प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।

(2) एक नाममात्र, सहयोगी या सहानुभूति रखने वाला सदस्य किसी भी रूप में, सोसाइटी की आस्तियों या लाभ में किसी भी हिस्से का हकदार नहीं होगा ।

परन्तु यह की धारा 32 की उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन रहते हुए एक नाममात्र, सहयोगी या सहानुभूति रखने वाले सदस्य को एक सदस्य के ऐसे अधिकार और विशेषाधिकार और ऐसे सदस्य के उत्तरदायित्व के अधीन रहते हुए होंगे, जो सोसाइटी की उपविधियों में विनिर्दिष्ट किए जाए । 29. सदस्यता की समाप्ति—परंतु कोई व्यक्ति किसी सोसाइटी की सदस्यता से उसका त्यागपत्र सोसाइटी को लिखित रूप में दिए जाने और सोसाइटी द्वारा स्वीकार किए जाने पर या सोसाइटी में अपने पूरे हिस्से या हित को किसी अन्य सदस्य को हस्तांतरित करने पर, या उसकी मृत्यु पर या सोसाइटी से हटाने या निष्कासन पर उसका सदस्य नहीं रहेगा :

परंतु किसी व्यक्ति का किसी सोसाइटी की सदस्यता से त्यागपत्र, यदि ऐसा सदस्य सोसाइटी के कर्जदार नहीं है या सोसायटी के बकाया कर्ज के लिए प्रतिभूति नहीं है, जब तक कि इसे पहले स्वीकार नहीं किया जाता है, सोसाइटी को अपना इस्तीफा लिखित रूप में देने की तारीख से एक महीने की समाप्ति पर तब तक इसे स्वीकार कर लिया गया समझा जाएगा।

30. सदस्यता के अधिकार का प्रयोग करने के लिए शोध्य देय भुगतान नहीं किया जाता है—एक सदस्य इस विनियम और इसके अधीन बनाए गए विधियों और उपविधियों में उपबंधित किए गए अधिकारों का प्रयोग करने का हकदार होगा:

परंतु कोई भी सदस्य तब तक अधिकारों का प्रयोग नहीं करेगा, जब तक कि उसने सदस्यता के संबंध में सोसाइटी को ऐसा भुगतान नहीं किया है, या सोसाइटी में ऐसा हित अर्जित नहीं किया है, जैसा कि समय-समय पर सोसायटी के उपविधियों के अधीन विहित और निर्दिष्ट किया जा सकता है :

परंतु यह और कि सदस्यता के अधिकार का प्रयोग करने के लिए शेयर पू ंजी में सदस्य के न्यूनतम योगदान में वृद्धि के मामले में, समिति सदस्यों को मांग की उचित सूचना देगी और अनुपालन के लिए उचित अवधि देगी ।11 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण 31. सदस्य के कर्तव्य—यह सोसाइटी के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा,—

(क) पांच वर्ष की लगातार अवधि के भीतर कम से कम एक साधारण सभा की बैठक में भाग लेने के लिए :

परंतु इस खंड की कोई बात उस सदस्य पर लागू नहीं होगी जिसकी अनुपस्थिति को सोसाइटी के साधारण निकाय द्वारा माफ कर दिया गया है ;

(ख) सोसाइटी की उपविधियों में निर्दिष्ट पांच लगातार वर्षों की अवधि में कम से कम एक बार सेवाओं के न्यूनतम स्तर का उपयोग करने के लिए:

परंतु एक सदस्य जो साधारण निकाय की कम से कम एक बैठक में सम्मिलित नहीं होता है और लगातार पांच वर्षों की अवधि में कम से कम एक बार सेवाओं के न्यूनतम स्तर का उपयोग नहीं करता है, जैसा कि गैर-सक्रिय सदस्य के रूप में वर्गीकृ त ऐसी सोसाइटी की उपविधियों में निर्दिष्ट किया गया है :

परन्तु यह और कि जब कोई सोसायटी किसी सदस्य को गैर-सक्रिय सदस्य के रूप में वर्गीकृ त करती है, तो समिति वित्तीय वर्ष की समाप्ति की तारीख से तीस दिनों की अवधि के भीतर संबंधित सदस्य को विहित रीति से ऐसे वर्गीकरण की सूचना देगी :

परंतु यह भी कि एक गैर-सक्रिय सदस्य जो साधारण निकाय की कम से कम एक बैठक में सम्मिलित नहीं होता है और उपविधियों में निर्दिष्ट न्यूनतम स्तर की सेवाओं का उपयोग नहीं करता है, अगले पांच वर्षों में एक गैर-सक्रिय के रूप में वर्गीकरण की तारीख से सदस्य को वोट देने का कोई अधिकार नहीं होगा :

परंतु यह भी कि एक गैर-सक्रिय सदस्य के रूप में वर्गीकृ त सदस्य, इस धारा में यथा उपबंधित की गई पात्रता मानदंड को पूरा करने पर एक सक्रिय सदस्य के रूप में पुन:

वर्गीकृ त होने का हकदार होगा :

परंतु यह भी कि यदि किसी सदस्य के सक्रिय या गैर- सक्रिय सदस्य होने का प्रश्न उठता है, तो वर्गीकरण के संचार की तारीख से साठ दिनों की अवधि के भीतर रजिस्ट्रार को अपील की जाएगी ।

32. सदस्य की मतदान शक्तियां —(1) किसी भी सोसाइटी का किसी भी सदस्य के पास उसके मामलों में एक से अधिक मत नहीं होंगे और मत देने के अधिकार की प्रत्येक शक्ति का प्रयोग व्यक्तिगत रूप से न कि प्रॉक्सी द्वारा किया जाएगा :

परंतु मत बराबर होने की स्थिति में अध्यक्ष का निर्णायक मत होगा ।

(2) जहां किसी सोसाइटी का हिस्सा एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्त रूप से धारण किया जाता है, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को, पूर्ववर्ती व्यक्ति या व्यक्तियों की अनुपस्थिति में, वोट देने का अधिकार होगा :

परंतु ऐसा व्यक्ति उपस्थित होगा और अवयस्क नहीं होगा :

परंतु यह और कि जहां मतदान की रीति मतपत्र द्वारा है, वहां शेयर के सभी संयुक्त धारक सोसाइटी के मामलों में अपनी ओर से मतदान करने के लिए उनमें से किसी एक को नियुक्त कर सकते हैं ।

(3) एक सोसाइटी जिसने अपनी निधि का कोई हिस्सा किसी अन्य सोसाइटी के शेयरों में निवेश किया है, अपने सदस्यों में से एक को उस अन्य सोसाइटी के मामलों में अपनी ओर से वोट देने के लिए नियुक्त कर सकता है, और तदनुसार पहली सोसाइटी की ओर से ऐसे सदस्य को वोट देने का अधिकार होगा :

परंतु पहली सोसाइटी अपने किसी भी सदस्य को नियुक्त नहीं करेगी जो उसका वेतनभोगी कर्मचारी भी हो । (4) कोई कं पनी या कोई अन्य निगमित निकाय जो तत्समय प्रवृत्त लागू किसी विधि के अधीन गठित हो, जिसने अपनी निधि का कोई हिस्सा किसी सोसाइटी के शेयरों में निवेश किया हो, अपनी ओर से मतदान करने के लिए अपने किसी एक निदेशक या अधिकारी को नियुक्त कर सकता है, ऐसे सोसाइटी के मामलों और तदनुसार ऐसे निदेशक या अधिकारी को, यथास्थिति, कं पनी या निगमित निकाय की ओर से मतदान करने का अधिकार होगा ।

(5) जहां एक फर्म ने अपनी निधि का कोई हिस्सा किसी सोसाइटी के शेयरों में निवेश किया है, फर्म द्वारा नियुक्त उसके किसी भी भागीदार को फर्म की ओर से सोसाइटी के मामलों में वोट देने का अधिकार होगा ।

(6) एक स्थानीय प्राधिकरण या सार्वजनिक न्यास जिसने अपनी निधि का कोई भाग किसी सोसाइटी के शेयरों में निवेश किया है, अपने किसी सदस्य या न्यासी को उस सोसाइटी के मामलों में अपनी ओर से मतदान करने के लिए नियुक्त कर सकता है; और तदनुसार, ऐसे व्यक्ति को, यथास्थिति, स्थानीय प्राधिकारी या लोक न्यास की ओर से मतदान करने का अधिकार होगा ।

(7) किसी भी नाममात्र या समर्थक सदस्य को मत देने का अधिकार नहीं होगा और ऐसा कोई भी सदस्य किसी समिति का सदस्य होने या किसी अन्य सोसाइटी में सोसाइटी के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा । (8) जिस व्यक्ति ने चूक की है और ऐसे ऋण या ब्याज या किस्त के पुनभु र्गतान की नियत तारीख से एक वर्ष की अवधि के लिए ऋण या उस पर ब्याज का भुगतान करने में चूककर्ता के रूप में रहता है, वह मतदान के अधिकार का प्रयोग करने का12 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] हकदार नहीं होगा सोसाइटी के किसी सदस्य की तब तक की ऐसे सभी भुगतान नहीं हो जाते हैं ।

(9) कोई भी व्यक्ति किसी वित्तीय वर्ष में किसी समिति के सदस्य के निर्वाचन में वोट देने के अधिकार का प्रयोग नहीं करेगा जब तक कि वह उस वित्तीय वर्ष से पहले पूरे वित्तीय वर्ष के लिए समिति का सदस्य न हो जिसमें निर्वाचन हो रहा है :

परंतु किसी संघीय सोसाइटी का कोई भी सदस्य सोसाइटी किसी समिति के सदस्य के निर्वाचन में वोट देने के अधिकार का प्रयोग तब तक नहीं करेगा जब तक कि ऐसी सोसाइटी के अपने अंतिम खातों की क, ख या ग श्रेणी में ऑडिट न हो जाए ।

(10) उपधारा (9) में किसी बात के होते हुए समिति के रजिस्ट्रीकरण के तुरंत बाद होने वाली समिति के पहले निर्वाचन पर लागू नहीं होगा ।

(11) एक संघीय सोसाइटी के व्यक्तिगत सदस्यों के मतदान अधिकार ऐसे होंगे जो सोसाइटी की विधियों और उप- विधियों द्वारा विनियमित किए जा सकते हैं ।

33. शेयरों के धारण पर प्रतिबंध—किसी भी सोसाइटी में, प्रशासक या सोसाइटी के अतिरिक्त कोई भी सदस्य, सोसाइटी की कु ल शेयर पू ंजी के पांचवे हिस्से से अधिक के हिस्से से अधिक नहीं रखेगा, जैसा कि विहित किया जा सकता है :

परंतु प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, सोसाइटी के किसी भी वर्ग के संबंध में शेयर पू ंजी के एक-पांचवें से अधिक से अधिक निर्दिष्ट कर सकता है ।

34. शेयरों या ब्याज के हस्तांतरण पर प्रतिबंध—(1) धारा 33 और उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन, किसी सोसायटी की पू ंजी में किसी सदस्य के शेयर या ब्याज पर स्थानांतरण, या प्रभार ऐसी शर्तों के अधीन होगा जो विहित की जा सकती हैं ।

(2) कोई सदस्य अपने द्वारा धारित किसी शेयर, या किसी सोसाइटी की पू ंजी या संपत्ति, या उसके किसी हिस्से में अपने हित को तब तक हस्तांतरित नहीं करेगा, जब तक कि,—

(क) उसने एक वर्ष से कम समय के लिए ऐसा शेयर या ब्याज नहीं रखा है ;

(ख) सोसाइटी या सोसाइटी के किसी सदस्य या किसी ऐसे व्यक्ति को स्थानांतरण या प्रभार किया जाता है जिसकी सदस्यता के लिए आवेदन सोसाइटी द्वारा स्वीकार कर लिया गया है ; और

(ग) समिति ने ऐसे हस्तांतरण को मंजूरी दे दी है । (3) उपधारा (1) और (उपधारा) (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी सदस्य को पदत्याग देने की अनुमति दी जाती है, या निष्कासित कर दिया जाता है, या इस विनियम या बनाए गए विधियों द्वारा अयोग्य घोषित किए जाने के कारण सदस्य नहीं रहता है, इसके अधीन या सोसाइटी की उपविधियों द्वारा, सोसाइटी विहित रीति से विहित मूल्य पर इसके लिए भुगतान करके शेयर पू ंजी में ऐसे सदस्य का हिस्सा या ब्याज प्राप्त कर सकती है :

परंतु ऐसे प्रयोजनों के लिए किसी भी वित्तीय वर्ष में किसी सोसाइटी की शेयर पू ंजी का कु ल भुगतान तत्काल पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन सोसाइटी की प्रदत्त शेयर पू ंजी के दस प्रतिशत से अधिक नहीं है ।

स्पष्टीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, पद "वित्तीय वर्ष" से मार्च के 31 वें दिन को समाप्त होने वाला वर्ष या, किसी भी सोसाइटी या सोसाइटी के वर्ग के मामले में, जिनके खाते रजिस्ट्रार की पिछली मंजूरी के साथ संतुलित हैं किसी अन्य दिन, ऐसे दिन को समाप्त होने वाला वर्ष अभिप्रेत है।

(4) जहां प्रशासक किसी सोसाइटी का सदस्य है, इस धारा में अंतर्विष्ट प्रतिबंध लागू नहीं होंगे और वह प्रशासक, इस विनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, सोसायटी को देने के बाद, किसी भी समय कम से कम तीन महीने का नोटिस, सोसाइटी से अपनी शेयर पू ंजी वापस ले सकता है । 35. सदस्य की मृत्यु पर ब्याज का हस्तांतरण—(1) सोसाइटी के किसी सदस्य की मृत्यु होने पर, सोसाइटी उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन, नियम के अनुसार सोसाइटी में अपना हिस्सा या हित ऐसे सदस्य द्वारा नियम या नामित व्यक्ति या व्यक्तियों को हस्तांतरित करेगी, ऐसे व्यक्ति को ऐसे नामांकन के भाव में जो समिति को ऐसे सदस्य का उत्तराधिकारी या विधिक प्रतिनिधि प्रतीत हो ।

(2) ऐसा कोई स्थानांतरण तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसे नामित व्यक्ति, यथास्थिति, उत्तराधिकारी या विधिक प्रतिनिधि को सोसाइटी के सदस्य के रूप में विधिवत रूप से स्वीकार नहीं किया जाता है ।

(3) उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी भी बात के होते हुए भी, कोई भी ऐसा नामित व्यक्ति, यथास्थिति, उत्तराधिकारी या विधिक प्रतिनिधि, मृत सदस्य को, ऐसी रीति से जो विहित की जाए, सोसाइटी को उसके शेयर या ब्याज के मूल्य के बराबर राशि का भुगतान करने की आवश्यकता हो सकती है । (4) एक सोसाइटी सोसाइटी के मृत सदस्य को देय अन्य सभी धन का भुगतान ऐसे नामित व्यक्ति, यथास्थिति, वारिस या विधिक प्रतिनिधि को कर सकती है ।

(5) इस धारा के उपबंधों के अनुसार किसी सोसायटी द्वारा सम्यक् त: किए गए सभी हस्तांतरण और भुगतान, किसी अन्य व्यक्ति द्वारा सोसायटी पर की गई किसी भी मांग के विरुद्ध मान्य और प्रभावी होंगे ।13 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण (6) इस धारा या धारा 25 के पूर्वगामी उपबंधों की कोई बात विरासत या अन्यथा से किसी अवयस्क या विकृ त दिमाग के व्यक्ति को किसी सोसाइटी के मृत सदस्य के किसी भी हिस्से या हित को प्राप्त करने से रोकने के लिए निवारित नहीं करेगी, किन्तु उसकी व्यवहार्यता में ऐसे अधिग्रहण का परिणाम सोसाइटी के शेयरों में उसके हित और अवैतनिक लाभांश के साथ-साथ ऋण, स्टॉक, बांड, यदि कोई हो, और उन पर अर्जित ब्याज तक सीमित होगा जो कि अवैतनिक है और उसे मतदान का अधिकार नहीं होगा ।

(7) धारा 6 में निर्दिष्ट किसी भी तरह की के अधीन एक व्यक्ति, अपनी नि:शक्त्तता समाप्त होने पर, नि:शक्तता सोसाइटी को सदस्य बनने की अपनी इच्छा की घोषणा करेगा और इस तरह की घोषणा की प्राप्ति पर सोसाइटी, इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए घोषणा कर सकता है, और यदि यह एक सहकारी हाउसिंग सोसाइटी है तो ऐसी सोसाइटी उसे सदस्य के रूप में स्वीकार करेगी यदि वह अन्यथा अयोग्य नहीं है और इस प्रकार भर्ती किया गया व्यक्ति सदस्य के सभी अधिकारों और विशेषाधिकारों का हकदार हो जाएगा और देनदारियों के अधीन हो जाएगा जैसे सोसाइटी का कोई अन्य सदस्य ।

36. शेयर या ब्याज जो अटैचमेंट के लिए उत्तरदायी नहीं होगा—किसी सोसाइटी की पू ंजी में,किसी सदस्य का शेयर या ब्याज या हाउसिंग सोसाइटी द्वारा जारी लोन स्टॉक या किसी सोसाइटी द्वारा अपने सदस्यों से बचत जमा के रूप में जुटाई गई धनराशि किसी न्यायालय के किसी डिक्री या आदेश के अधीन कु र्की या बिक्री के लिए या किसी सदस्य द्वारा किए गए किसी भी ऋण या दायित्व के संबंध में उत्तरदायी नहीं होगा और तदनुसार, न तो प्रांतीय दिवाला अधिनियम,1920 (1920 का 5) के अधीन एक रिसीवर, और न ही ऐसा कोई व्यक्ति या प्राधिकरण, जो किसी भी संबंधित विधि के अधीन उस समय लागू हो, ऐसे शेयर या ब्याज पर कोई दावा हकदार होगा।

37. बहियों आदि को देखने का सदस्यों के अधिकार—

(1) सोसाइटी के प्रत्येक सदस्य को कार्यालय समय के दौरान, या सोसाइटी द्वारा इस प्रयोजन के लिए नियत किसी भी समय, विनियमन, विधियों और उप-विधियों के लिए, अंतिम लेखापरीक्षित वार्षिक तुलन-पत्र, वार्षिक लेखा परीक्षा रिपोर्ट, लाभ-हानि लेखा, समिति के सदस्यों की सूची, सदस्यों का एक रजिस्टर, साधारण बैठकों के कार्यवृत्त, और बहियों और अभिलेखों के उन अंशों में जिसमें उसके लेन-देन सोसाइटी के साथ दर्ज किया गया है, सोसाइटी के कार्यालय में नि:शुल्क निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।

(2) समिति, सदस्य को लिखित में अनुरोध करने पर और ऐसी फीस के भुगतान पर जो विहित की जा सकती है, उपधारा (1) में उल्लिखित किसी भी दस्तावेज की एक प्रति प्रस्तुत करेगा ।

(3) एक सोसाइटी, उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन प्रदान किए गए कार्यों के निर्वहन के लिए किसी अधिकारी या अधिकारी को, जैसा कि वह आवश्यक समझे, अधिकृ त करेगी ।

38. उस व्यक्ति का दायित्व जिसने सदस्य रहना बंद कर दिया—(1) जहां कोई व्यक्ति धारा 29 के अधीन किसी सोसाइटी का सदस्य नहीं रह गया है,--

(क) सोसाइटी के लिए उसके द्वारा देय किसी भी ऋण के संबंध में और उसके द्वारा सोसाइटी के कारण किसी भी बकाया मांग के संबंध में उसका दायित्व जारी रहेगा जैसे कि वह सदस्य नहीं था, सदस्य बनना बंद कर दिया ; और (ख) सोसाइटी के ऋणों के लिए उनका दायित्व, जैसे कि वे ऐसी समाप्ति की तारीख से ठीक पूर्व थे, उपधारा (2) में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, ऐसी तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए जारी रहेगा जैसे कि उसने नहीं किया था सदस्य नहीं रहे :

परंतु दायित्व ऐसे व्यक्ति की आस्ति से जुड़ा होगा, यदि ऐसी समाप्ति उसकी मृत्यु के कारण हुई थी या ऐसे व्यक्ति की सदस्य बनने के बाद मृत्यु हो जाती है ।

(2) जहां इस विनियम के किन्हीं उपबंधों के अधीन किसी सोसाइटी को बंद करने का आदेश दिया जाता है, तो उस व्यक्ति की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन दायित्व, जो तुरंत तीन वर्ष के भीतर उसका सदस्य नहीं रह गया है परिसमापन के आदेश की तारीख से तत्काल पूर्व तक जारी रहेगा, जब तक कि संपूर्ण परिसमापन कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती ।

39. सदस्यों का दिवाला होना— प्रान्तीय दिवाला अधिनियम, 1920 (1920का 5) या तत्समय प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, सदस्यों में किसी सदस्य से समिति का बकाया, उसके विरुद्ध दिवाला कार्यवाही, संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन या स्थानीय प्राधिकरण को उसके अगले बकाया के आगे प्राथमिकता के क्रम में होगी । 40. सदस्यों का निष्कासन —(1) सोसाइटी, इस प्रयोजन के लिए आयोजित सदस्यों की एक साधारण बैठक में उपस्थित और मतदान करने वाले सभी सदस्यों के तीन-चौथाई बहुमत से पारित संकल्प द्वारा ऐसे कार्य जो सोसाइटी के समुचित कार्य के लिए हानिकारक हैं, सदस्यों के लिए एक सदस्य को निष्कासित कर सकती है :

परंतु, कोई संकल्प नहीं होगा,--

(i) वैध, जब तक संबंधित सदस्य को अपने मामले को साधारण निकाय में प्रतिनिधित्व करने का अवसर नहीं दिया जाता है ; और14 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (ii) प्रभावी जब तक कि यह रजिस्ट्रार को उनके अनुमोदन के लिए प्रस्तुत नहीं किया जाता है और उनके द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता है :

परंतु यह भी कि रजिस्ट्रार के अनुमोदन या अस्वीकृ ति की सूचना ऐसे जमा करने की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर सोसाइटी को दी जाएगी ।

(2) किसी सोसाइटी का कोई भी सदस्य जिसे उपधारा (1) के अधीन निष्कासित कर दिया गया है, दो वर्ष की अवधि के लिए उस सोसाइटी के सदस्य के रूप में या किसी अन्य सोसाइटी के सदस्य के रूप में ऐसे निष्कासन की तारीख से प्रवेश के लिए पात्र नहीं होगा :

परंतु रजिस्ट्रार, विशेष परिस्थितियों में, उक्त अवधि के भीतर, किसी भी सदस्य को, यथास्थिति, उक्त सोसाइटी या किसी अन्य सोसाइटी के सदस्य के रूप में, पुन: प्रवेश या प्रवेश की मंजूरी दे सकता है ।

अध्याय 4

सोसाइटियों का निगमन, कर्तव्य और विशेषाधिकार 41. सोसाइटियों का निगमित निकाय होना—एक सोसाइटी अपने रजिस्ट्रीकरण पर उस नाम के अधीन एक निगमित निकाय होगी, जिसके नाम से वह शाश्वत उत्तराधिकार और एक साधारण मुहर के साथ रजिस्ट्रीकृ त है, और संपत्ति के अधिग्रहण, धारण और निपटान, अनुबंधों में प्रवेश करने, मुकदमा संस्थित करने और बचाव करने की शक्ति के साथ और अन्य विधिक कार्यवाही, और ऐसी सभी चीजें करना जो उस प्रयोजन के लिए आवश्यक हैं जिसके लिए इसे निगमित किया गया है ।

42. सोसाइटियों का पता—प्रत्येक सोसाइटी के पास नियमों के अनुसार रजिस्ट्रीकृ त एक पता होगा, जिस पर सभी नोटिस और संचार भेजे जा सकते हैं; और सोसाइटी उक्त पते में किसी भी परिवर्तन की सूचना उसके तीस दिनों के भीतर रजिस्ट्रार को लिखित रूप में भेजेगी।

43. सदस्यों का रजिस्टर—(1) प्रत्येक सोसाइटी अपने सदस्यों का एक रजिस्टर रखेगी और उसमें निम्नलिखित विवरण दर्ज करेगी, अर्थात् :--

(क) प्रत्येक सदस्य का नाम, पता और व्यवसाय ;

(ख) शेयर पू ंजी वाली सोसाइटी के मामले में, प्रत्येक सदस्य द्वारा धारित हिस्सा;

(ग) जिस तारीख को प्रत्येक व्यक्ति को सदस्य के रूप में प्रवेश दिया गया था;

(घ) जिस तारीख को कोई व्यक्ति सदस्य नहीं रहा ; और (ड.) ऐसे अन्य विवरण जो विहित किए जा सकते हैं :

परंतु जहां किसी सोसाइटी ने इस विनियम के अधीन या उसके अधीन किसी सदस्य की किसी व्यक्ति की मृत्यु पर अपना हिस्सा या ब्याज हस्तांतरित करने की अनुमति दी हो, सदस्य के शेयर या हित का हकदार व्यक्ति और जिस तारीख को नामांकन दर्ज किया गया था, रजिस्टर में संबंधित सदस्य के नाम को भी दिखाया जाएगा ।

(2) रजिस्टर उस तारीख का प्रथम दृष्टया साक्ष्य होगा जिस दिन किसी व्यक्ति को सदस्यता में प्रवेश दिया गया था, और जिस तारीख को वह सदस्य नहीं रहा था ।

44. साक्ष्य के रूप में प्रविष्टि की प्रति की स्वीकार्यता—

(1) किसी बही, रजिस्टर या सूची में किसी प्रविष्टि की एक प्रति, जो नियमित रूप से कारबार के दौरान और किसी सोसाइटी के कब्जे में रखी जाती है, यदि उस रीति में, जो विहित की जाए, सम्यकत: प्रमाणित की जाए तो ऐसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य होगी प्रविष्टि का अस्तित्व, और प्रत्येक मामले में दर्ज किए गए मामलों और लेनदेन के साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाएगा, और उसी सीमा तक, जहां तक मूल प्रविष्टि, यदि प्रस्तुत की जाती है, तो ऐसे मामले को साबित करने के लिए स्वीकार्य होती है ।

(2) ऐसी सोसाइटियों के मामले में, जैसा प्रशासक साधारण या विशेष आदेश द्वारा निर्देशित करे, किसी सोसाइटी का कोई भी अधिकारी किसी भी विधिक कार्यवाही में, जिसमें सोसाइटी एक पक्ष नहीं है, सोसाइटी की किसी भी बही को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, जिसकी सामग्री को उपधारा (1) के अधीन साबित किया जा सकता है या न्यायालय या विशेष मामले के लिए किए गए न्यायाधीश के आदेश को छोड़कर, दर्ज किए गए मामलों, लेनदेन और खातों को साबित करने के लिए साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ।

45. सोसाइटी के शेयरों और डिबेंचर से संबंधित लिखतों के अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण से छू ट—भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) की धारा 17 की उपधारा (1) के खंड (ख) और खंड (ग) की कोई बात निम्नलिखित पर लागू होना-- (क) सोसाइटी में शेयरों से संबंधित किसी भी लिखत के लिए, जो हाउसिंग सोसाइटी न होने पर भी सोसाइटी की संपत्ति अचल संपत्ति में पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से हो, या (ख) किसी भी सोसाइटी द्वारा जारी किए गए किसी भी डिबेंचर के लिए और अचल संपत्ति पर या अचल संपत्ति में किसी अधिकार, हक या हित को सृजित न करने, घोषित न करने, असाइन करने, सीमित न करना या समाप्त न करना, सिवाय इसके कि जहां तक धारक को एक रजिस्ट्रीकृ त लिखत द्वारा वहन की जाने वाली सुरक्षा का अधिकार देता है, जिसके अधीन सोसाइटी ने अपनी पूरी या आंशिक अचल संपत्ति या ऐसे डिबेंचर के धारकों के लाभ के लिए ट्रस्ट पर ट्रस्टियों के15 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण लिए किसी हित को गिरवी, संप्रेषित या अन्यथा स्थानांतरित कर दिया है ; या

(ग) किसी सोसाइटी द्वारा जारी किसी भी डिबेंचर पर किसी भी समर्थन, या हस्तांतरण के लिए लागू होगी । 46. कराधान से छू ट देने की शक्ति—प्रशासक, किसी भी सोसाइटी या सोसाइटी के वर्ग के मामले में, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा छू ट दे सकता है--

(क) स्टाम्प शुल्क जिसके साथ, तत्समय प्रवृत्त स्टाम्प शुल्क से संबंधित किसी भी विधि के अधीन , किसी सोसाइटी या उसकी ओर से या उसके किसी अधिकारी या सदस्य द्वारा निष्पादित लिखत, और सोसाइटी के कारबार से संबंधित, या इस विनियम के अधीन ऐसे लिखतों का कोई वर्ग, या रजिस्ट्रार या उनके नामिती या नामितों के बोर्ड के पुरस्कार क्रमशः प्रभार्य हैं ;

(ख) तत्समय प्रवृत्त दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण और न्यायालय-फीस से संबंधित विधि के अधीन किसी सोसाइटी द्वारा या उसकी ओर से देय कोई भी शुल्क, जो कु छ समय के लिए लागू है ; और

(ग) कोई अन्य कर या फीस या शुल्क (या उसका कोई हिस्सा) किसी भी विधि के अधीन किसी सोसाइटी द्वारा या उसकी ओर से देय हो ।

47. उधार लेने पर प्रतिबंध—(1) कोई सोसाइटी सदस्यों और अन्य व्यक्तियों से के वल उस सीमा तक जमा और ऋण प्राप्त करेगी, और ऐसी शर्तों के अधीन, जो विहित की जाए या सोसाइटी के उपविधियों द्वारा निर्दिष्ट किया जा सकता है । (2) यदि रजिस्ट्रार की राय में उपधारा (1) के अधीन प्राप्त धन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है, तो संबंधित सोसाइटी या सोसाइटी के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए ऐसी निधियों के उचित उपयोग के लिए उन्हें नियमों और उपविधियों में विहित उधार सीमा के भीतर रखते हुए उनके लिए, रजिस्ट्रार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, किसी भी सोसाइटी या सोसाइटी के वर्ग पर अतिरिक्त शर्तें लगा सकता है, जिसके अधीन ऐसी सोसाइटी या ऐसे वर्ग की समितियां कें द्रीय बैंक के अतिरिक्त किसी अन्य लेनदार से जमा प्राप्त कर सकती हैं, डिबेंचर जारी कर सकती हैं या ऋण ले सकती हैं ।

48. ऋण लेने पर प्रतिबंध —(1) कोई भी सोसाइटी सदस्य के सिवाए किसी अन्य व्यक्ति को, या अपने स्वयं के शेयरों की प्रतिबंध सुरक्षा पर, या किसी ऐसे व्यक्ति की सुरक्षा पर ऋण नहीं देगी जो सदस्य नहीं है :

परंतु ऐसे नियमों के अधीन, जो अवधारित किए जा सकते हैं, एक सोसाइटी किसी अन्य सोसाइटी को ऋण दे सकती है ।

(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई सोसाइटी जमाकर्ता को उसकी जमा राशि की जमानत पर ऋण दे सकती है ।

(3) इस विनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, सदस्य या सदस्यों के सिवाए कोई भी व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह प्राथमिक कृ षि ऋण सहकारी समिति से उधार लेने या जमा करने के लिए पात्र नहीं होगा ।

(4) यदि प्रशासक की राय में, संबंधित सोसाइटी या सोसाइटियों के हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, प्रशासक, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, किसी संपत्ति की सुरक्षा पर सोसाइटी या सोसाइटी का वर्ग किसी भी व्यक्ति द्वारा धन उधार देने को निवारित, प्रतिबंधित या विनियमित कर सकता है :

परंतु रजिस्ट्रार, संबंधित सोसाइटी या सोसाइटियों की निधियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, ऐसी निधियों के उनके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में उचित उपयोग के लिए और उन्हें नियमों और उपविधियों में विहित ऋण लेने की सीमा के भीतर रखने के लिए, साधारण या विशेष आदेश, किसी भी सोसाइटी या सोसाइटी के वर्ग द्वारा अपने सदस्यों या अन्य सोसाइटियों को ऋण देने की सीमा, शर्तों और रीति को और विनियमित करते हैं ।

49. गैर-सदस्यों के साथ अन्य संव्यवहार पर प्रतिबंध—

इस विनियम में दिए गए प्रावधान के अतिरिक्त, सदस्यों के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों के साथ एक सोसाइटी के लेन-देन ऐसे प्रतिबंधों के अधीन होंगे, यदि कोई हो, जो विहित की जाए । 50. सदस्य के शेयर या हित के संबंध में प्रभार और प्रतितुलन—किसी सोसाइटी के किसी सदस्य द्वारा देय किसी भी ऋण के संबंध में, सोसाइटी के पास सोसाइटी की पू ंजी में ऐसे सदस्य के शेयर या ब्याज पर, सोसाइटी के पास ऐसे सदस्य की जमा राशि पर और किसी भी लाभांश पर प्रभार होगा। , ऐसे सदस्य को देय छू ट या लाभ, और सोसाइटी ऐसे किसी भी ऋण के भुगतान में या उसके लिए ऐसे सदस्य को जमा या देय किसी भी राशि को समायोजित कर सकती है :

परंतु किसी भी सहकारी बैंक के पास धारा 62 में निर्दिष्ट भविष्य निधि में से किसी सोसाइटी द्वारा निवेश की गई किसी राशि पर कोई प्रभार नहीं होगा, और कोई भी सहकारी बैंक किसी भी देय ऋण के लिए सोसाइटी से ऐसी किसी भी राशि को समायोजित करने का हकदार नहीं होगा । 51. सोसाइटी का पूर्व दावा—(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी किन्तु भू- राजस्व या भू-राजस्व के रूप में वसूली योग्य किसी भी धन और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 60 और धारा 61 के उपबंधों के संबंध में संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के किसी भी पूर्व दावे के अधीन--16 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (क) किसी भी सदस्य या ऐसे व्यक्ति जो सदस्य नहीं रह गया है, द्वारा सोसाइटी के कारण किसी भी ऋण या बकाया मांग पर पहला आरोप होगा--

(i) पूर्ण या आंशिक रूप से उगाई गई फसलें या अन्य कृ षि उपज, चाहे उसके द्वारा सोसाइटी से लिए गए ऋण के साथ या उसके बिना ;

(ii) मवेशी, मवेशियों के लिए चारा, कृ षि या औद्योगिक उपकरण या मशीनरी, या निर्माण के लिए कच्चा माल, या कार्यशाला, गोदाम या व्यवसाय का स्थान, किसी भी ऋण से, चाहे वह पैसे में हो, आपूर्ति की गई हो या खरीदी गई हो या सोसाइटी द्वारा उसे बनाया गया सामान ; और

(iii) कोई चल संपत्ति जो उसके द्वारा सोसाइटी के पास बंधक रखी गई हो, अभिवाक् की गई हो या अन्यथा गिरवी रखी गई हो, और उसकी अभिरक्षा में रह गई हो;

(ख) किराए, शेयर, ऋण या खरीद धन या ऐसी सोसाइटी को देय किसी अन्य अधिकार या राशि के संबंध में किसी भी सदस्य या किसी सदस्य द्वारा सदस्य नहीं रहने वाले किसी भी बकाया मांग या बकाया राशि, सोसाइटी की अचल संपत्ति में उसके हित पर पहला आरोप होगा :

परंतु भू-राजस्व के सिवाए अन्य देय राशियों के संबंध में संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन का पूर्व दावा, इस उपधारा के प्रयोजन के लिए किसी सदस्य द्वारा उस निधि से सृजित संपत्ति तक सीमित होगा जिसके संबंध में संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन ने एक दावा किया है ।

(2) किसी भी संपत्ति या संपत्ति में हित, जो उपधारा (1) के अधीन आरोप के अधीन है, सोसाइटी की पूर्व अनुमति के बिना किसी रीति में स्थानांतरित नहीं किया जाएगा और ऐसा स्थानांतरण ऐसी शर्तों के अधीन होगा, यदि कोई हो, जो सोसाइटी विहित करे ।

(3) उपधारा (2) के उल्लंघन में किया गया कोई भी स्थानांतरण शून्य होगा ।

(4) उपधारा (2) और (उपधारा) (3) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी एक सोसाइटी, जिसका एक उद्देश्य अपने सदस्यों के उत्पाद का निपटान है, अपनी उपविधियो में प्रदान कर सकता है, या इसके सदस्य अन्यथा अनुबंध कर सकता है-- (क) कि ऐसा प्रत्येक सदस्य सोसाइटी के माध्यम से अपनी उत्पाद का निपटान करेगा ; और

(ख) कि कोई भी सदस्य, जो उपविधियो के उल्लंघन या ऐसे किसी अनुबंध के लिए दोषी पाया जाता है, किसी भी परिणामी नुकसान के लिए सोसाइटी को प्रतिपूर्ति करेगा, जैसा कि उपविधियो में उपबंध किया जा सकता है ।

52. कतिपय सोसाइटियों की अचल संपत्ति पर प्रभार—(1) तत्समय प्रवृत्त इस विनियम या किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी--

(क) कोई भी व्यक्ति जो किसी सोसाइटी को ऋण के लिए आवेदन करता है, जिसका वह सदस्य है, यदि वह किसी भूमि का मालिक है या किरायेदार के रूप में किसी भूमि में उसका हित है, विहित प्रपत्र में घोषणा, ऐसी घोषणा करेगा में कथन किया जाएगा कि आवेदक उसके द्वारा ऋण की राशि के भुगतान के लिए घोषणा में निर्दिष्ट ऐसी भूमि या ब्याज पर एक प्रभार सर्जित करता हो, जो सोसाइटी आवेदन के अनुसरण में सदस्य को दे सकती है, और भविष्य के सभी अग्रिमों के लिए, यदि कोई हो, उसके लिए अपेक्षित है, जो सोसाइटी उसे ऐसे सदस्य के रूप में बना सकता है, अधिकतम राशि के अधीन, ऋण और अग्रिम की ऐसी राशि पर ब्याज के साथ, जो कि सोसाइटी द्वारा अवधारित की जाए ;

(ख) कोई भी व्यक्ति जिसने इस विनियम के तुरंत प्रवृत्त होने की तारीख से पूर्व किसी सोसाइटी से ऋण लिया है, और जो किसी भी भूमि का मालिक है या किरायेदार के रूप में भूमि में रुचि रखता है, और जिसने ऐसी घोषणा नहीं की है पूर्वोक्त तारीख से पूर्व ही यथासंभवशीघ्र तत्पश्चात् प्ररूप में और खंड (क) में निर्दिष्ट प्रभाव के लिए एक घोषणा करेगा; और ऐसा कोई भी व्यक्ति, जब तक उसने ऐसी घोषणा नहीं की है, सोसाइटी के सदस्य के रूप में किसी भी अधिकार का प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा ;

(ग) खंड (क) या खंड (ख) के अधीन की गई घोषणा किसी भी समय किसी सदस्य द्वारा उस समिति की सहमति से बदली जा सकती है जिसके पक्ष में ऐसा आरोप बनाया गया है ;

(घ) कोई भी सदस्य खंड (क) या खंड (ख) के अधीन की गई घोषणा में विनिर्दिष्ट भूमि या ब्याज के पूरे या किसी हिस्से को तब तक अलग नहीं करेगा जब तक कि सदस्य द्वारा उधार ली गई पूरी राशि को भरे हुए ब्याज सहित चुकाया नहीं जाता है :

परंतु किसी सदस्य के लिए ऐसी भूमि के किसी नहर से पानी की आपूर्ति के लिए तत्समय प्रवृत्त लागू विधि के अधीन ऐसी भूमि या उसके किसी हिस्से के संबंध में संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के पक्ष में एक बंधक बांड निष्पादित करना वैध होगा:

परंतु यह और कि यदि किसी सदस्य द्वारा उधार ली गई राशि के एक हिस्से का भुगतान किया जाता है, तो सोसाइटी, सदस्य के आवेदन पर, सुरक्षा की घोषणा में निर्दिष्ट चल या अचल संपत्ति खंड (क) या खंड (ख) के अधीन की गई घोषणा के अधीन बनाए गए आरोप से, सदस्य से देय या बकाया राशि की शेष राशि के लिए सुरक्षा की पर्याप्तता के संबंध में, जैसा वह उचित समझे, मुक्त कर सकती है ;

17 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण

(ड.) खंड (घ) के उपबंधों के उल्लंघन में किया गया कोई अलगाव शून्य होगा;

(च) भू-राजस्व या भू-राजस्व के रूप में वसूली योग्य किसी भी धन के संबंध में संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के पूर्व दावों के अधीन, और संघ राज्यक्षेत्र के किसी भाग से तत्समय प्रवृत्त किसी भी हिस्से में विधि के अधीन किए गए किसी पंचाट के अधीन बनाया गया शुल्क, यदि कोई हो :

परंतु भू-राजस्व संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी भी बात के होते हुए भी, उसके अधीन बनाए गए अधिकारों के रिकॉर्ड में खंड (क) या खंड (ख) के अधीन एक घोषणा के अधीन बनाए गए भूमि या ब्याज पर हर शुल्क का विवरण भी सम्मिलित होगा ।

(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "सोसाइटी" पद से निम्नलिखित अभिप्रेत है—

(i) कोई भी सोसाइटी, जिसके अधिकांश सदस्य कृ षक हैं और जिसका प्राथमिक उद्देश्य अपने सदस्यों के लिए ऋण प्राप्त करना है ; या

(ii) किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट कोई सोसाइटी, या सोसाइटीयों के वर्ग की कोई सोसाइटी है।

53. कतिपय मामलों में वेतन से दावे के लिए कटौती—

(1) सोसाइटी का कोई सदस्य सोसाइटी के पक्ष में एक करार कर सकता है, परंतु यह कि उसका नियोक्ता, ऐसी राशि जो करार में निर्दिष्ट की जा सकती है, और सोसाइटी को भुगतान करने के लिए किसी भी ऋण या सदस्य के विरूद्ध सोसाइटी की अन्य मांग की संतुष्टि में कटौती की गई राशि को नियोक्ता द्वारा उसे देय वेतन या मजदूरी से कटौती करने के लिए सक्षम हो ।

(2) ऐसे करार के निष्पादन पर, नियोक्ता यदि सोसाइटी द्वारा इस प्रकार अपेक्षित लिखित में एक मांग के द्वारा और जब तक सोसाइटी यह सूचित नहीं करता है कि ऐसे पूर्ण ऋण या मांग का भुगतान किया गया है, में कटौती करेगा वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 (1936 का 4) या तत्समय प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि में अंतर्विष्ट प्रतिकू ल किसी बात के होते हुए भी और ऐसी कटौती की गई राशि का भुगतान सोसाइटी को चौदह दिनों की अवधि के भीतर करें, जिस तारीख को ऐसी कटौती की जाती है जैसे कि यह उसके द्वारा देय मजदूरी का एक हिस्सा था जैसा कि जिस दिन वह भुगतान करता है और ऐसी कटौती और भुगतान करने के लिए, यह खुला नहीं होगा, ऐसे ऋण या मांग की वैधता या अन्यथा पर सवाल उठाने के लिए नियोक्ता उक्त अधिनियम के अधीन अपेक्षित है ।

(3) यदि उपधारा (2) के अधीन की गई मांग की प्राप्ति के पश्चात्, नियोक्ता किसी भी समय संबंधित सदस्य को देय वेतन या मजदूरी से मांग में निर्दिष्ट राशि की कटौती करने में विफल रहता है, या सोसाइटी के लिए कटौती की गई राशि को भेजने में चूक करता है नियोक्ता उसके भुगतान के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होगा; और राशि सोसाइटी की ओर से उससे भू-राजस्व के बकाया के रूप में, रजिस्ट्रार द्वारा जारी किए जा रहे प्रमाणपत्र पर ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, वसूली योग्य होगी, और ऐसी देय राशि नियोक्ता के बकाया मजदूरी के रूप में ऐसी देयता के संबंध में और रजिस्ट्रार द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्र पर किसी भी न्यायालय में सवाल नहीं उठाया जाएगा ।

(4) इस धारा में अंतर्विष्ट कु छ भी संविधान के अर्थ के भीतर और खानों और तेल क्षेत्रों में किसी भी रेलवे में नियोजित व्यक्तियों पर लागू नहीं होगा।

अध्याय 5

सोसाइटियों को सहायता

54. सोसाइटियों में संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन की प्रत्यक्ष भागीदारी—(1) संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन सीमित देयता वाले सोसाइटी की शेयर पू ंजी में सीधे सदस्यता ले सकता है। (2) उपधारा (1) के अधीन संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा सदस्यता ली गई शेयर पू ंजी, संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के पूर्व अनुमोदन के सिवाए सोसाइटी द्वारा संघ राज्यक्षेत्र को वापस नहीं की जाएगी ।

55. सोसाइटियों को सहायता के अन्य प्ररूप—तत्समय प्रवृत्त किसी भी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए किं तु ऐसी शर्तों के अधीन, जो संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, इस संबंध में निर्दिष्ट कर सकता है,-- (क) एक सोसाइटी को ऋण देना ;

(ख) किसी सोसाइटी द्वारा जारी किए गए डिबेंचर के मूलधन के भुगतान की गारंटी, या उस पर ब्याज, या दोनों, या किसी सोसाइटी की शेयर पू ंजी का उसके सदस्यों को पुनभु र्गतान, या उस पर लाभांश का भुगतान ऐसी दरों पर हो सकता है संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा निर्दिष्ट ;

(ग) सहकारी बैंक द्वारा किसी सोसाइटी को दिए गए साधनों के मूलधन का पुन: संदाय करने और ब्याज के भुगतान की गारंटी देना ;

(घ) भारतीय रिजर्व बैंक, या भारतीय औद्योगिक वित्त निगम, या तत्समय प्रवृत्त किसी भी विधि के अधीन गठित किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा दिए गए ऋण और अग्रिम के मूलधन का पुन: संदाय करने और ब्याज के भुगतान की गारंटी देता है ; या

(ड.) किसी सोसाइटी को सब्सिडी सहित किसी अन्य रूप में वित्तीय सहायता प्रदान करना ।18 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] अध्याय 6

सोसाइटी की संपत्ति और निधि

56. विभाजित न की जाने वाली निधि—(1) किसी सोसाइटी की निधि या आस्तियों का कोई भी भाग, लाभांश समकारी निधि के अतिरिक्त, यदि कोई हो, और उसके शुद्ध लाभ का भुगतान छू ट या लाभांश अन्यथा वितरित, इसके सदस्यों को या विभाजित के रूप में किया जाएगा :

परंतु किसी सदस्य के मामले में, जो सोसाइटी का वेतनभोगी कर्मचारी भी है, ऐसे कर्मचारी के रूप में किए गए कार्य के लिए उसे ऐसे वेतनमान पर भुगतान किया जा सकता है जो उपविधियो द्वारा अधिकथित किया जा सकता है । (2) शुद्ध लाभ के अतिरिक्त किसी सोसाइटी की निधि और आस्तियों से कोई मानदेय का भुगतान नहीं किया जाएगा और ऐसा मानदेय विहित सीमा से अधिक नहीं होगा । 57. लाभ का विनियोग—(1) लाभ अर्जित करने वाली सोसाइटी, सभी अर्जित ब्याज जो कि तीन महीने, स्थापना शुल्क, योगदान, यदि कोई हो, से अधिक लाभों के लिए अतिदेय है, वर्ष के सकल लाभ को घटाकर अपने वार्षिक शुद्ध लाभ की गणना करेगी । अपने कर्मचारियों के भविष्य निधि और ग्रेच्युटी निधि के लिए, ऋण और जमा पर देय ब्याज, ऑडिट फीस, मरम्मत, किराए, कर और मूल्यह्रास सहित काम करने का खर्च, और खराब ऋण और हानियों को लाभ से सृजित किसी निधि में समायोजित नहीं किया गया है ।

(2) तथापि, एक सोसाइटी, वर्ष के लिए शुद्ध लाभ में, पूर्ववर्ती वर्षों में अर्जित ब्याज, किन्तु वास्तव में वर्ष के दौरान वसूल किया जा सकता है और इस प्रकार प्राप्त शुद्ध लाभ पिछले वर्ष से आगे लाए गए लाभ की राशि के साथ जोड़कर विनियोग के लिए उपलब्ध होगा ।

(3) कोई सोसाइटी अपने लाभ को अपनी आरक्षित निधि या उसके द्वारा सृजित किसी अन्य निधि में सदस्यों को उनके शेयरों पर लाभांश के भुगतान के लिए, शैक्षिक निधि में योगदान करने के लिए विनियोजित कर सकती है, जैसा कि प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा सदस्यों और व्यक्तियों से प्राप्त समर्थन के आधार पर छू ट के भुगतान के लिए जो इसके कारबार के सदस्य नहीं हैं और मानदेय के भुगतान के लिए विहित शर्तों के अधीन और किसी अन्य उद्देश्य के लिए जो नियमों या उपविधियों में निर्दिष्ट किया जा सकता है, निर्दिष्ट कर सकता है :

परंतु वार्षिक साधारण बैठक के अनुमोदन और इस विनियम, नियमों और उपविधियों के अनुरूप होने के सिवाय लाभ का कोई भी भाग विनियोजित नहीं किया जाएगा । 58. आरक्षित निधि—(1) प्रत्येक सोसायटी जो अपने संव्यवहार से लाभ कमाती है या प्राप्त कर सकती है, निधि आरक्षित करेगी, एक आरक्षित निधि बनाए रखेगी । (2) प्रत्येक वर्ष सोसाइटी के शुद्ध लाभ का कम से कम एक-चौथाई, आरक्षित निधि में ले जाया जाएगा, और ऐसी आरक्षित निधि का उपयोग सोसाइटी के कारबार में किया जा सकता है या धारा 63 के उपबंधों के अधीन हो सकता है, निवेश किया जा सकता है, जैसा कि प्रशासक साधारण या विशेष आदेश द्वारा निर्देशित कर सकता है, या, प्रशासक की पिछली मंजूरी के साथ, इस विनियम या संघ राज्यक्षेत्र या स्थानीय हित के उद्देश्यों को बढ़ावा देने के लिए कु छ सार्वजनिक प्रयोजन के लिए या कु छ ऐसे प्रयोजन के लिए उपयोग किया जा सकता है :

परंतु यदि रजिस्ट्रार का समाधान हो जाता है कि सोसाइटी की वित्तीय स्थिति ऐसी है कि वह अपने शुद्ध लाभ के एक-चौथाई की उपरोक्त सीमा तक अपनी आरक्षित निधि तक ले जाने में असमर्थ है, तो वह लिखित आदेश द्वारा, ऐसी अवधि के लिए, जैसा कि वह आदेश में निर्दिष्ट कर सकता है, सोसाइटी के लिए पूर्वोक्त सीमा से कम लेकिन उसके शुद्ध लाभ के दसवें भाग से कम नहीं तय कर सकता है ।

(3) जहां किसी सोसाइटी की आरक्षित निधि उसकी अधिकृ त शेयर पू ंजी से अधिक हो जाती है, तब, उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी भी बात के होते हुए भी, सोसाइटी रजिस्ट्रार की पूर्व अनुमति से प्रत्येक वर्ष अपनी आरक्षित निधि में एक राशि ले जा सकती है जो एक-चौथाई से कम हो सकता है लेकिन अपने शुद्ध लाभ के दसवें हिस्से से कम नहीं हो सकता है । 59. लाभांश पर प्रतिबंध—कोई भी सोसाइटी रजिस्ट्रार की पूर्व मंजूरी के बिना अपने सदस्यों को पन्द्रह प्रतिशत से अधिक की दर से लाभांश का भुगतान नहीं करेगी ।

60. शैक्षणिक निधि में अभिदाय— (1) प्रत्येक सोसाइटी जो चालू वर्ष के लाभ में से अपने अंशदान सदस्यों को लाभांश घोषित करता है, शैक्षणिक निधि में उस दर पर अभिदाय करेगा जैसा कि शिक्षा के लिए विहित किया जा सकता है । (2) शैक्षणिक निधि में अभिदाय करने के लिए उत्तरदायी कोई भी सोसाइटी अपने सदस्यों को तब तक लाभांश का भुगतान नहीं करेगी, जब तक कि रजिस्ट्रार को उक्त अभिदाय, उस तारीख से दो महीने के भीतर नहीं किया जाता है, जिस दिन उसके खातों को उसके सदस्यों के वार्षिक आम बैठक के साधारण निकाय द्वारा अपनाया जाता है ।

(3) कोई अधिकारी जो जानबूझकर इस धारा की अपेक्षाओं का पालन करने में विफल रहता है, वह व्यक्तिगत रूप से रजिस्ट्रार को राशि की भरपाई करने के लिए उत्तरदायी होगा ।19 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण 61. अन्य सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अभिदाय—धारा 58 में उपबंधित की गई आरक्षित निधि प्रदान करने के पश्चात्, धारा 60 में प्रदान की गई शैक्षणिक निधि के लिए, एक सोसाइटी अपने शुद्ध लाभ का बीस प्रतिशत से अधिक की राशि को अलग रख सकती है और, रजिस्ट्रार के अनुमोदन से, ऐसी पूरी या आंशिक राशि का उपयोग किसी भी विहित सहकारी उद्देश्य में योगदान करने के लिए या चैरिटेबल बंदोबस्ती अधिनियम, 1890 (1890 का 6) की धारा 2 के अर्थ के भीतर किसी भी धर्मार्थ प्रयोजन के लिए समय-समय पर उपयोग करें। 62. निधियों का विनिधान—कोई सोसाइटी अपनी निधि का निवेश या जमा कर सकती है,—

(क) एक कें द्रीय बैंक, या राज्य सहकारी बैंक में;

(ख) भारतीय स्टेट बैंक या किसी राष्ट्रीयकृ त बैंक में;

(ग) डाक बचत बैंक में;

(घ) भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 (1882 का 20) की धारा 20 में निर्दिष्ट किसी भी प्रतिभूति में;.

(ड.) सीमित देयता वाले किसी अन्य सोसाइटी द्वारा जारी शेयरों, या सुरक्षा बांडों, या डिबेंचर में;

(च) किसी भूमि या भवन में;

(छ) कर्मचारी भविष्य निधि में; या

(ज) संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के स्वामित्व या नियंत्रण वाले किसी भी निगम में, प्रशासक के पूर्व अनुमोदन के साथ ऐसे विधियों और शर्तों के अधीन जो इस संबंध में विहित की जा सकती हैं ।

स्पष्टीकरण-- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, अभिव्यक्ति "राष्ट्रीयकृ त बैंक" से अर्थ बैंककारी कं पनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) और बैंककारी कं पनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित एक नया बैंक अभिप्रेत है ।

63. व्यक्तिगत क्षमताओं में अधिकारियों द्वारा या उनके विरुद्ध फाइल की गई या ली गई कतिपय कार्यवाहियों के लिए उपयोग नहीं की जाने वाली निधियां—(1) किसी सोसाइटी की निधि से कोई व्यय इस विनियम की किसी भी धारा के अधीन सोसाइटी के किसी अधिकारी द्वारा या व्यक्तिगत क्षमता से फाइल की गई या उसके विरुद्ध की गई किसी भी कार्यवाही की लागत को चुकाने के प्रयोजन से उपगत नहीं किया जाएगा । (2) यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यय इस प्रकार किया जा सकता है या नहीं, तो ऐसा प्रश्न रजिस्ट्रार के पास भेजा जाएगा और उस पर विनिश्चय लिया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा ।

(3) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उल्लंघन में व्यय उपगत करता है, रजिस्ट्रार व्यक्ति को एक महीने के भीतर सोसाइटी को राशि चुकाने का निर्देश देगा और जहां ऐसा व्यक्ति निर्देशित राशि को चुकाने में विफल रहता है, ऐसी राशि, रजिस्ट्रार द्वारा जारी प्रमाणपत्र पर, भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूली योग्य होगी ।

(4) जिस व्यक्ति के विरुद्ध उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा कार्रवाई की जाती है, वह किसी भी अगले उप- निर्वाचन सहित किसी भी अगले निर्वाचन में एक महीने की अवधि की समाप्ति के तुरंत बाद किसी भी सोसाइटी का अधिकारी या किसी भी सोसाइटी का अधिकारी होने के लिए अयोग्य हो जाएगा, जिसके दौरान ऐसा व्यक्ति उपधारा (3) में निर्दिष्ट राशि का भुगतान करने में विफल रहा है ।

अध्याय 7

समितियों का प्रबंधन

64. सोसाइटी का अंतिम प्राधिकार—इस विनियम और इसके अधीन बनाए गए विधियों के उपबंधों के अधीन, प्रत्येक सोसाइटी का अंतिम प्राधिकार साधारण बैठक में सदस्यों के साधारण निकाय में निहित होगा, जिसे उस रीति से बुलाया जाएगा जिसे उपविधियों में निर्दिष्ट किया जा सकता है :

परंतु जहां किसी सोसाइटी की उपविधिया ऐसे सदस्यों के प्रतिनिधियों के निर्वाचन का उपबंध करती हैं, अंतिम प्राधिकार ऐसे सदस्यों के प्रतिनिधियों में निहित हो सकता है जो विहित रीति से चुने जाते हैं, और साधारण बैठक में इकट्ठे होते हैं ।

65. समिति के सदस्य का अर्हित, निरर्हित होना, समिति की शक्तियां और कृ त्य—(1) प्रत्येक सोसायटी का प्रबंधन इस विनियम, नियमों और उपविधियों के अनुसार गठित एक समिति में निहित होगा, जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो इसके विनियमन, नियम और उपविधियों द्वारा क्रमशः सुनिश्चित या अधिरोपित किए जा सकते हैं ।

(2) इसमें जैसा उपबंधित है उसके सिवाए, किसी सोसाइटी की प्रबंध समिति, जो एक शीर्ष समिति नहीं है, इसमें अन्य लोगों के साथ-साथ इक्कीस से अनधिक निर्वाचित सदस्यों की संख्या सम्मिलित होगी ।

स्पष्टीकरण-- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, अभिव्यक्ति "शीर्ष सोसाइटी" से एक सोसाइटी अभिप्रेत है-- (क) जिसके संचालन का क्षेत्र पूरे संघ राज्यक्षेत्र लक्षद्वीप तक फै ला हुआ है;

(ख) जिसका मुख्य उद्देश्य सदस्यों के रूप में इससे संबद्ध समितियों के प्रमुख उद्देश्यों को बढ़ावा देना और उन्हें सुविधाएं और सेवाएं प्रदान करना है; तथा

(ग) जिसे रजिस्ट्रार द्वारा एक शीर्ष सोसाइटी के रूप में वर्गीकृ त किया गया है ।20 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (3) प्रत्येक सोसाइटी की प्रबंध समिति में महिलाओं के लिए दो स्थान आरक्षित होंगे जो सदस्यों के रूप में व्यष्टियों से मिलकर बनेगी और ऐसे वर्ग या व्यक्तियों की श्रेणी के सदस्य होंगे जो विहित किए जा सकते हैं:

परंतु एक सीट उन व्यक्तियों के लिए आरक्षित होगी जो छोटे किसान और सीमांत किसान हैं ।

(4) सोसाइटी का प्रत्येक सदस्य जो वोट का हकदार है, उसकी समिति के सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र होगा—

(क) वह लगातार कम से कम तीन वर्ष की अवधि के लिए सोसाइटी का सदस्य है और ऐसा सदस्य बना रहता है और उसके द्वारा किसी सहकारी समिति, सहकारी बैंक या किसी अन्य वित्तीय संस्थान से किसी भी ऋण के संबंध में चूक नहीं करता है ;

(ख) सोसाइटी के साथ किए गए किसी भी विद्यमान करार में या सोसाइटी द्वारा बेची या खरीदी गई किसी भी संपत्ति में या सोसाइटी के किसी भी अन्य संव्यवहार में किसी भी निवेश या सोसाइटी से लिए गए किसी भी ऋण को छोड़कर उसका कोई हित है ;

(ग) वह ऐसे सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए अन्यथा अनर्हित नहीं है ;

(घ) उसे धारा 80 के अधीन उत्तरदायी नहीं ठहराया जाता है ;

(ड.) धारा 90 के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा उसके विरुद्ध लागत की वसूली का कोई आदेश नहीं दिया गया है ;

(च) उसके विरुद्ध धारा 92 के अधीन कोई आदेश नहीं दिया गया है ;

(छ) वह इस विनियम की धारा 120 के अधीन किसी भी अपराध या किसी भी सोसाइटी की संपत्ति के संबंध में भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 403 के किसी भी अपराध के लिए दोषी नहीं पाया जाता है ।

(5) समिति का कोई सदस्य, जो ऊपर विनिर्दिष्ट किसी भी निरर्हताए को वहन करता है, कार्यालय को खाली कर देगा और यदि वह ऐसे पद को खाली नहीं करता है, तो उसे रजिस्ट्रार द्वारा ऐसे सदस्य के रूप में हटा दिया जाएगा :

परंतु रजिस्ट्रार हटाने का ऐसा आदेश देने से पहले संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का मौका देगा ।

(6) उपधारा (4) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी,--

(क) ऋण देने वाली समितियों के मामले में, कोई भी व्यक्ति जो उधार देने का व्यवसाय करता है, सोसाइटी की प्रबंध समिति के सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा ; तथा

(ख) किसी सोसाइटी का कोई सदस्य, जो उस सोसाइटियों द्वारा चलाए जा रहे किसी प्रकार का व्यवसाय करता है, जिसका वह सदस्य है, रजिस्ट्रार की मंजूरी के बिना उस सोसाइटी की किसी भी समिति का सदस्य बनने का पात्र नहीं होगा ।

(7) जहां कोई व्यक्ति उपधारा (6) के उल्लंघन में किसी सोसाइटी का सदस्य बन जाता है, उसे रजिस्ट्रार द्वारा ऐसी समिति के सदस्य के रूप में पद से हटा दिया जाएगा :

परंतु रजिस्ट्रार हटाने का आदेश देने से पहले संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देगा ।

(8) प्रबंध समिति के निर्वाचित सदस्यों और उसके पदाधिकारियों का कार्यकाल निर्वाचन की तारीख से पांच वर्ष का होगा :

परंतु पदाधिकारियों का कार्यकाल सहकारी बैंकों और संघीय समितियों के लिए प्रबंध समिति के निर्वाचन की तारीख से ढाई वर्ष का होगा :

परन्तु यह और कि प्रबंध समिति में एक आकस्मिक रिक्ति को उसी वर्ग या सदस्यों की श्रेणियों में से नामांकन द्वारा भरेगी जिनके संबंध में आकस्मिक रिक्ति ऐसी रिक्ति की तारीख से साठ दिनों के भीतर उत्पन्न हुई है, यदि शेष अवधि प्रबंध समिति का कार्यालय अपने मूल कार्यकाल के आधे से भी कम है । (9) प्रबंध समिति के निर्वाचित सदस्य और उसके पदाधिकारी अपने कार्यकाल की समाप्ति की तारीख पर पद पर बने रहेंगे ।

(10) सहकारी बैंकों और संघीय समितियों की प्रबंध समिति के पदाधिकारी पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र होंगे । (11) सोसाइटी द्वारा किए गए उद्देश्यों और क्रियाकलापों से संबंधित किसी अन्य क्षेत्र में बैंकिं ग, प्रबंधन, वित्त या विशेषज्ञता के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले व्यक्तियों को प्रबंध समिति के सदस्यों के रूप में सहयोजित करेगा :

परंतु उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट इक्कीस सदस्यों के अतिरिक्त ऐसे सहयोजित सदस्यों की संख्या दो से अधिक नहीं होगी ।

(12) पूर्वोक्त सहयोजित सदस्यों को समिति के किसी भी निर्वाचन में ऐसे सदस्यों के रूप में मतदान करने या प्रबंध समिति के पदाधिकारियों के रूप में निर्वाचित होने के पात्र होने का अधिकार नहीं होगा ।

(13) यदि किसी सोसायटी के कार्यात्मक निदेशक हैं, तो वे भी प्रबंध समिति के सदस्य होंगे और ऐसे सदस्यों को ऐसी प्रबंध समिति के सदस्यों की कु ल संख्या की गणना के प्रयोजन से बाहर रखा जाएगा ।

स्पष्टीकरण-- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, "कार्यात्मक निदेशक" अभिव्यक्ति से और इसमें एक प्रबंध21 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण निदेशक या एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जो भी पदनाम कहा जाता है, या कोई पदेन सदस्य या संबंधित सोसाइटी के विभाग के प्रमुख सम्मिलित हैं, समिति द्वारा मनोनीत सदस्य अभिप्रेत है ।

66. कतिपय परिस्थितियों में संरक्षक की नियुक्ति—(1) जहां किसी सोसाइटी के संबंध में--

(i) प्रबंधन की एक नई समिति, किसी भी कारण से, ऐसी सोसाइटी की प्रबंधन समिति के सदस्यों के कार्यकाल की समाप्ति से पहले निर्वाचित नहीं होती है ;

(ii) एक नई समिति चुनी गई है और पंद्रह दिनों की अवधि के भीतर कार्य नहीं कर रही है (धारा 79 में निर्दिष्ट समिति नहीं है) ;

(iii) समिति के गठन में गतिरोध है और यदि ऐसी समिति ने कार्य करना बंद कर दिया है और प्रबंधन में एक रिक्त स्थान अर्जित हो गया है ;

(iv) किसी समिति को कार्यालय में प्रवेश करने से निवारित किया जाता है ;

(v) एक नई समिति उस तारीख को कार्यालय में प्रवेश करने में विफल रही है जिस तारीख को विद्यमान समिति का कार्यकाल समाप्त हो गया था ; या

(vi) जहां एक सोसाइटी में व्यक्तियों के एक से अधिक समूह समिति के सदस्यों के रूप में निर्वाचित होने का दावा कर रहे हैं और उसके संबंध में कार्यवाही दायर की गई है, रजिस्ट्रार, यथास्थिति, एक वर्ष की अवधि के लिए या जब तक कोई नई प्रबंधन समिति नहीं चुनी जाती है या कार्य करना शुरू कर देता है, तब तक सोसाइटी के मामलों का प्रबंधन करने के लिए सोसाइटी का संरक्षक हो लिखित आदेश द्वारा एक व्यक्ति या व्यक्तियों की एक समिति को नियुक्त करेगा:

परन्तु ऐसा आदेश करने से पूर्व, रजिस्ट्रार सोसाइटी के प्रधान कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर नोटिस में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर प्रस्तावित आदेश के संबंध में आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित करते हुए एक नोटिस प्रकाशित करेगा और उसे उस अवधि के भीतर प्राप्त सभी आपत्तियों और सुझावों पर विचार करेगा :

परन्तु यह और कि ऐसे नोटिस को किसी भी मामले में प्रकाशित करना आवश्यक नहीं होगा जहां रजिस्ट्रार का समाधान हो कि तत्काल कार्रवाई की जानी अपेक्षित है या ऐसी नोटिस को प्रकाशित करना उचित रूप से व्यावहारिक नहीं है । (2) अभिरक्षक एक वर्ष की अवधि के भीतर ऐसी सोसाइटी का निर्वाचन कराने की व्यवस्था करेगा और उस अवधि की समाप्ति से पहले समिति का गठन किया जाएगा । (3) इस प्रकार नियुक्त अभिरक्षक, रजिस्ट्रार के नियंत्रण और ऐसे निर्देशों के अधीन रहते हुए, जो वह समय-समय पर देता है, उसे समिति के सभी या किन्हीं कार्यों का प्रयोग करने और ऐसी सभी कार्रवाई करने का अधिकार होगा जो कि सोसाइटी के हित में आवश्यक है ।

(4) उस अवधि के दौरान जब सोसाइटी के मामलों को ऐसे संरक्षक द्वारा चलाया जाता है, अभिरक्षक द्वारा किए गए या किए जाने वाले सभी कार्य, नई प्रबंधन समिति के लिए बाध्यकारी होंगे ।

67. अविश्वास मत का प्रस्ताव— (1) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति, उपसभापति, सचिव, कोषाध्यक्ष अविश्वास प्रस्ताव या कोई अन्य अधिकारी, चाहे वह किसी भी पदनाम से पुकारा जाए, जो उस पद के लिए अपने निर्वाचन संख्या-सह के आधार पर पद धारण करता है, यथास्थिति, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति, उपसभापति, सचिव, कोषाध्यक्ष या ऐसे अधिकारी का पद समाप्त हो जाएगा, यदि समिति की बैठक में और मतदान में उपस्थित सदस्यों की कु ल संख्या का तिहाई कम से कम दो के बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, और उसके पश्चात् ऐसा पद रिक्त माना जाएगा । (2) ऐसी विशेष बैठक के लिए मांग पर समिति के सदस्यों की कु ल संख्या के कम से कम एक तिहाई द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे, जो वोट देने के हकदार हैं । रजिस्ट्रार को इसके सदस्य के रूप में और किन्हीं अन्य मामलों में भी रजिस्ट्रार को ऐसी सोसाइटी के संबंध में रजिस्ट्रार को सौंपे जाएंगे :

परंतु किसी विशेष बैठक के लिए ऐसी कोई मांग उस तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर नहीं की जाएगी, जिस पर उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी भी अधिकारी ने अपने कार्यालय में प्रवेश किया है ।

(3) रजिस्ट्रार जिस पर उपधारा (2) के अधीन मांग की गई है, ऐसी मांग प्राप्त होने की तारीख से तीस दिनों की अवधि के भीतर समिति की एक विशेष बैठक बुलाएगा ।

(4) बैठक की अध्यक्षता रजिस्ट्रार और अधिकारी द्वारा अधिकृ त ऐसे अधिकारी द्वारा की जाएगी, ऐसी बैठक की अध्यक्षता करते समय अध्यक्ष या सभापति के समान अधिकार होंगे, लेकिन वोट का अधिकार नहीं होगा :

परंतु मतदान गुप्त मतदान द्वारा होगा ।

(5) इस धारा के अधीन बुलाई गई बैठक किसी भी कारण से स्थगित नहीं की जाएगी ।

(6) यदि ऐसे अविश्वास प्रस्ताव को अस्वीकृ त कर दिया जाता है, तो प्रस्ताव की अस्वीकृ ति की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर कोई नया अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा ।

68. सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण—(1) किसी सोसाइटी के सभी चुनावों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार करने और उसके संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण22 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] "सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण" नामक प्राधिकरण में निहित होगा, उस संबंध में प्रशासक द्वारा जैसा कि गठित किया जा सकता है ।

(2) समिति के सदस्यों का प्रत्येक साधारण निर्वाचन और किसी भी आकस्मिक रिक्ति सहित किसी सोसायटी के पदाधिकारियों का निर्वाचन, लागू सीमा तक, निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आयोजित किया जाएगा ।

(3) सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण में एक सहकारी निर्वाचन अधिकारी होगा, जो प्रशासक द्वारा संघ राज्यक्षेत्र के अधिकारियों में से नियुक्त किया जाएगा, जो ऐसी अर्हता और अनुभव को पूरा करता है जो विहित किया जा सकता है । (4) प्रशासक संघ राज्यक्षेत्र के किसी भी कर्मचारी को सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण के सचिव के रूप में नियुक्त कर सकता है ।

(5) प्रशासक, सहकारी निर्वाचन अधिकारी से परामर्श के पश्चात्, इस विनियम के अधीन अपने कार्यों को करने में उसकी सहायता करने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने कार्यालय के लिए प्रदान कर सकता है ।

(6) प्रशासक, जब सहकारी निर्वाचन अधिकारी द्वारा ऐसा अनुरोध किया जाता है, तो सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण को ऐसे कर्मचारी उपलब्ध करा सकते हैं जो उपधारा 1 द्वारा सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण को दिए गए कार्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हो सकते हैं ।

(7) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी भी बात के होते हुए भी, प्रत्येक सोसोइटी का निर्वाचन, सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा विद्यमान समिति के कार्यकाल की समाप्ति से एक महीने पहले आयोजित किया जाएगा जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि समिति के नवनिर्वाचित सदस्य निर्वतमान समिति के सदस्यों के कार्यालय की समाप्ति पर तुरंत पद ग्रहण करें ।

(8) सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण नवीनतम तकनीक और विशेषज्ञता का उपयोग करने सहित, प्रक्रिया, दिशा-निर्देशों और रीति के अनुसार सोसाइटी या सोसाइटियों के वर्ग के निर्वाचन आयोजित करेगा, जो विहित किया जा सकता है :

परंतु प्रशासक, सोसाइटी के उद्देश्यों, सोसाइटियों के वर्ग, संचालन के क्षेत्र और व्यवसाय के मानदंडों और सदस्यों के उचित प्रबंधन और हितों पर विचार करते हुए, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, ऐसी रीति से सोसाइटियों को वर्गीकृ त कर सकता है जो विहित किया जा सकता है ।

(9) सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण समिति के लिए और अध्यक्ष या सभापति, उपाध्यक्ष या उपसभापति के कार्यालय और ऐसे अन्य पदाधिकारियों के लिए भी निर्वाचन कराएगा, साधारण निर्वाचन के बाद समिति के गठन की तारीख से पंद्रह दिनों के भीतर सोसाइटी जो उपविधियों के अनुसार चुने जाने के लिए अपेक्षित हैं ।

(10) सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण के स्तर पर एक निर्वाचन कोष रखा जाएगा और प्रत्येक समिति अपने निर्वाचन पर खर्च की अनुमानित राशि अग्रिम रूप से जमा करेगी, जैसा कि निर्वाचन कोष के संबंध में सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा विहित और अपेक्षित हो। । सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण, समितियों के निर्वाचन के संचालन के लिए, पदाधिकारियों के निर्वाचन सहित, संबंधित समिति द्वारा योगदान की गई उक्त निधि से आवश्यक खर्च वहन करेगा ।

(11) निर्वाचन का आयोजन करने में व्यय शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करने के लिए नियुक्त व्यक्तियों को यात्रा भत्ते, दैनिक भत्ते और पारिश्रमिक, यदि कोई हो, के भुगतान सहित किसी भी निर्वाचन के आयोजन का खर्च, से वहन किया जाएगा उक्त निधि एवं व्यय विहित रीति से किया जाएगा तथा रजिस्ट्रार, सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा मांग किए जाने पर, ऐसी किसी भी सोसाइटी या सोसायटियों के वर्ग से, जो नियमों में विहित की जाए, निर्वाचन कराने का व्यय वसूल करेगा :

परन्तु यदि कोई समिति निर्वाचन व्यय का भुगतान करने में असफल रहती है तो रजिस्ट्रार देय राशि की वसूली के लिए वसूली प्रमाण पत्र जारी कर सकता है और ऐसी राशि भू- राजस्व के बकाया के रूप में वसूल की जाएगी ।

(12) प्रत्येक सहकारी सोसाइटी की समिति,-- (क) सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार को ऐसी अवधि की समाप्ति की तारीख से कम से कम छह महीने पहले अपने कार्यकाल की समाप्ति के बारे में सूचित करें ;

(ख) समिति या उसके पदाधिकारियों में हुई किसी आकस्मिक रिक्ति को ऐसी रिक्ति होने के पन्द्रह दिनों के भीतर सूचित करना ;

(ग) सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा निर्दिष्ट कै लेंडर के अनुसार ऐसी पुस्तकों, अभिलेखों और सूचनाओं को प्रस्तुत करना ; और

(घ) निर्वाचन के संचालन के लिए निर्वाचक नामावली को सुचारू रूप से तैयार करने के लिए सभी आवश्यक सहायता, लाभकर और सहयोग प्रदान करना । 69. पश्च निर्वाचन के लिए प्रशासक की शक्ति—जहां परिषद या लोक सभा या स्थानीय प्राधिकरण की कमी, सूखा, बाढ़, आग या किसी अन्य प्राकृ तिक आपदा या बरसात की शक्ति या किसी निर्वाचन कार्यक्रम के कारण, प्रशासक किसी भी सोसाइटी के निर्वाचन कार्यक्रम से मेल खाता हो या प्रशासक की राय में, किसी भी सोसाइटी या सोसाइटियों के वर्ग के लिए निर्वाचन कराना जनहित में नहीं है, प्रशासक, इस विनियम या23 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण इसके अधीन बनाए गए नियमों या उप-विधियों या तत्समय प्रवृत्त् किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी कु छ समय के लिए बल, लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों के लिए, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, किसी भी सोसाइटी या सोसाइटी के वर्ग के निर्वाचन को एक बार में छह महीने से अधिक की अवधि के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता है, जो अवधि आगे बढ़ाई जा सकती है, तथापि कि, कु ल अवधि कु ल मिलाकर एक वर्ष से अधिक नहीं होगी । 70. सोसाइटी की समिति पर एक से अधिक सीटों के लिए निर्वाचन—यदि कोई व्यक्ति समिति में एक से अधिक सीटों के लिए निर्वाचित होता है, जब तक कि निर्वाचन के परिणाम की घोषणा की तारीख से सात दिनों की अवधि के भीतर वह अपने हस्ताक्षर के अधीन लिखित रूप से सभी सीटों में से एक को संबोधित करते हुए इस्तीफा दे देता है निर्वाचन अधिकारी, या यथास्थिति, सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा इस संबंध में प्राधिकृ त अधिकारी, समस्त सोसाइटी की सीटें रिक्त हो जाएंगी और यथास्थिति, ऐसा त्यागपत्र प्राप्त होने पर या इस प्रकार रिक्त होने पर, निर्वाचन अधिकारी या इस संबंध में सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण द्वारा अधिकृ त अधिकारी रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करवाएगा ।

71. कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व, निर्वाचन की व्यवस्था करने के लिए सूचित करने के लिए और सहायता करने के लिए समिति या विशेष अधिकारी या अभिरक्षक का उत्तरदायित्व—

(1) समिति का यह कर्तव्य होगा कि वह सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण को उसके कार्यकाल की समाप्ति से पहले उसके निर्वाचन कराने के बारे में सूचित करे ।

(2) जहां समिति के भाग पर इसके निर्वाचन के लिए उपधारा (1) के अधीन अपेक्षित सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण को, और किसी भी कारण से समिति के सदस्यों के निर्वाचन के बारे में सूचित करने में असफल रहा है, उसका समिति का कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व आयोजित नहीं किया जा सकता है तो उसके सदस्य अपने पद पर बने रहेंगे और ऐसी स्थिति में रजिस्ट्रार धारा 66 के अधीन विचार के अनुसार कार्रवाई करेगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन ऐसी कार्रवाई करने पर, इस प्रकार नियुक्त अभिरक्षक तत्काल प्रभाव से निर्वाचन कराने के लिए सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण को सूचित करेगा और निर्दिष्ट अवधि के भीतर ऐसे निर्वाचन कराने के लिए आवश्यक व्यवस्था करने में सहायता करेगा ।

72. निर्वाचन पर नए अध्यक्ष को अभिलेख और संपत्ति सौंपना—(1) एक नई समिति और उसके सभापति के निर्वाचन पर, सेवानिवृत्त सभापति, जिसके स्थान पर नए सभापति का निर्वाचन किया जाता है, समिति के कार्यालय का प्रभार और कब्जे में सोसाइटी के सभी कागजात और संपत्ति, यदि कोई हो, समिति या उसका कोई अधिकारी, समिति के नए सभापति को को सौंप देगा ।

(2) यदि सेवानिवृत्त होने वाला सभापति पूर्वोक्त के रूप में कार्यभार सौंपने या सोसाइटी के कागजात और संपत्ति को सौंपने में विफल रहता है या इंकार करता है, तो रजिस्ट्रार, या उसके द्वारा इस संबंध में सशक्त कोई व्यक्ति, लिखित आदेश द्वारा उसे तत्काल निर्देश दे सकता है इस तरह के प्रभार और संपत्ति को सौंप दें और रजिस्ट्रार, सेवानिवृत्त सभापति के इस तरह के अनुपालन में विफलता धारा 83 में उपबंधित की गई रीति पर अभिलेखों एवं सम्पत्ति को जब्त कर नए सभापति को सौंपने का आदेश देना ।

73. समिति के सदस्यों के बैठक शुल्क तथा यात्रा एवं दैनिक भत्तों की दरों पर प्रतिबंध—किसी सोसाइटी की उपविधियों में किसी बात के होते हुए भी,--

(1) कोई भी समिति न तो विहित नहीं करेगी और न ही उसकी समिति का कोई सदस्य सार्वजनिक व्यवसाय पर भ्रमण करते समय ऐसी दरों से अधिक दरों पर, जो विहित की जा सकती हैं, बैठक शुल्क और यात्रा और दैनिक भत्ते का हकदार नहीं होगा ; और

(2) किसी सोसायटी की समिति का सदस्य, सार्वजनिक व्यवसाय पर दौरे के संबंध में, ऐसी शर्तों और सीमाओं के अधीन होगा जो विहित किया जा सकता है और विभिन्न सोसाइटियों या सोसाइटियों के वर्गों की समितियों के सदस्यों के संबंध में अलग-अलग दरें, शर्तें और सीमाएं निर्धारित की जा सकती हैं ।

स्पष्टीकरण-- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "सार्वजनिक व्यवसाय पर भ्रमण" अभिव्यक्ति में सम्मिलित हैं--

(क) समिति की किसी बैठक में भाग लेने के लिए एक यात्रा ;

(ख) समिति के किन्हीं अन्य कृ त्यों के प्रदर्शन के संबंध में एक यात्रा ;

(ग) प्रायोजित किसी भी सम्मेलन में भाग लेने के लिए एक यात्रा---

(i) कें द्र सरकार ;

(ii) राज्य सरकार ;

(iii) संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन ;

(iv) कोई सहकारी संस्था ; या

(v) इस संबंध में संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा मान्यता प्राप्त ऐसे अन्य संस्थान ।

74. अधिकारी को हटाना—(1) यदि, रजिस्ट्रार की राय में, कोई अधिकारी लगातार चूक करता है या इस विनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या उपविधियों द्वारा उस पर24 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] लगाए गए कर्तव्यों के प्रदर्शन में व्यतिक्रम करता है या ऐसा कु छ भी करता है जो सोसाइटी के हितों के लिए प्रतिकू ल है या जहां वह इस विनियम द्वारा या इसके अधीन अयोग्य ठहराया जाता है, रजिस्ट्रार, अधिकारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, आदेश द्वारा ऐसे अधिकारी को हटा सकता है और ऐसे पद से हटाए जाने के कारण हुई रिक्ति के कारण सोसाइटी को किसी व्यक्ति या योग्य सदस्य को चुनने या नियुक्त करने का निदेश दे सकता है और इस प्रकार निर्वाचित या नियुक्त अधिकारी के वल तब तक पद धारण करेगा जब तक कि जिस अधिकारी के स्थान पर वह निर्वाचित या नियुक्त किया गया है, यदि रिक्ति नहीं हुई होती तो वह पद धारण करता ।

(2) रजिस्ट्रार, आदेश द्वारा निदेश दे सकता है कि इस प्रकार हटाए गए अधिकारी को उस सोसाइटी में किसी भी पद के लिए निर्वाचन लड़ने या निर्वाचन लड़ने के लिए निरर्हित घोषित किया जाएगा, जहां से उसे हटाया गया है और किसी भी अन्य सोसाइटी में आदेश की तारीख से छह वर्ष से अधिक की अवधि के लिए नहीं होगा और ऐसा अधिकारी तद्नुसार अयोग्य ठहराया जाएगा ।

75. वार्षिक साधारण बैठक—(1) प्रत्येक समिति वित्तीय वर्ष की समाप्ति के छह महीने की अवधि के भीतर अपने सदस्यों की आम बैठक बुलाएगी, ताकि इस विनियम के अधीन व्यवसाय का लेन-देन किया जा सके :

परंतु यदि समिति द्वारा ऐसी अवधि के भीतर ऐसी बैठक नहीं बुलाई जाती है, तो रजिस्ट्रार या उसके द्वारा इस संबंध में अधिकृ त कोई भी व्यक्ति निर्धारित तरीके से ऐसी बैठक बुला सकता है, जिसे सोसाइटी द्वारा सम्यकत: बुलाई गई साधारण बैठक समझी जाएगी ।

(2) सोसाइटी की प्रत्येक वार्षिक साधारण बैठक में, समिति सोसाइटी के समक्ष वर्ष के लिए एक तुलनपत्र और लाभ और हानि खाते को रजिस्ट्रार द्वारा विहित रीति से किसी भी वर्ग या वर्गों के लिए साधारण या विशेष आदेश द्वारा समिति के समक्ष रखेगी ।

स्पष्टीकरण-- इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि लाभ के लिए व्यवसाय नहीं करने वाली सोसाइटी के मामले में, आय और व्यय का लेखा वार्षिक साधारण बैठक में लाभ और हानि के सिवाए खाता सोसाइटी के समक्ष रखा जाएगा और लाभ और हानि खाते के सभी निर्देश और "इस विनियम में लाभ या हानि, ऐसे सोसाइटी के संबंध में क्रमशः "व्यय से अधिक आय" और "आय से अधिक व्यय" के प्रति निर्देश में माना जाएगा ।

(3) साधारण बैठक में समिति के समक्ष रखे गए प्रत्येक तुलनपत्र के साथ उसकी समिति द्वारा निम्नलिखित के संबंध में एक रिपोर्ट संलग्न की जाएगी--

(क) सोसाइटी के मामलों की स्थिति ;

(ख) राशि, यदि कोई हो, जिसे वह ऐसी तुलनपत्र या किसी विशिष्ट तुलनपत्र में किसी भी रिजर्व में ले जाने का प्रस्ताव करता है ; और

(ग) मानद कर्मचारियों को लाभांश, बोनस, या मानदेय के रूप में भुगतान के लिए सिफारिश की गई राशि, यदि कोई हो ।

(4) समिति की रिपोर्ट सोसायटी के व्यवसाय की प्रकृ ति में किसी भी बदलाव पर भी विचार करेगी, जो उस वर्ष के दौरान हुई है जिसके लिए खाते तैयार किए गए हैं और समिति की ओर से ऐसी रिपोर्ट पर उसके अध्यक्ष या हस्ताक्षर करने के लिए अधिकृ त किसी अन्य सदस्य द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे । (5) प्रत्येक वार्षिक साधारण बैठक में, तुलनपत्र, लाभ और हानि खाता, लेखा परीक्षक की रिपोर्ट और समिति की रिपोर्ट को अपनाने के लिए रखा जाएगा, और इस तरह के अन्य व्यवसाय का लेन-देन किया जाएगा जैसा कि उप-विधियों में अधिकथित किया जा सकता है। और जिसे उचित सूचना दे दी गई है ।

(6) जहां सोसाइटी का कोई अधिकारी, जिसका कर्तव्य उपधारा (1) में निर्दिष्ट अवधि के भीतर एक साधारण बैठक बुलाना या उपधारा (2), (3) या (4) का अनुपालन करना था, बिना उचित बहाने से बुलाने में विफल रहता है ऐसी बैठक या ऐसे उप-वर्गों का पालन करने के लिए, तब—

(i) यदि ऐसा अधिकारी सोसाइटी का सेवक है, तो रजिस्ट्रार लिखित आदेश द्वारा उस पर दस हजार रुपए से अनधिक राशि का जुर्माना लगा सकता है ; और (ii) यदि ऐसा अधिकारी सोसाइटी का सेवक नहीं है, तो रजिस्ट्रार लिखित आदेश द्वारा ऐसे अधिकारी को समिति का अधिकारी या सदस्य होने या किसी पद पर निर्वाचित या नियुक्त होने के लिए सोसाइटी की, ऐसी अवधि के लिए जो छह साल से अधिक न हो, जैसा कि वह आदेश में निर्दिष्ट कर सकता है, अयोग्य घोषित कर सकता है :

परन्तु इस उपधारा के अधीन आदेश करने से पूर्व, रजिस्ट्रार अधिकारी को उसके संबंध में प्रस्तावित अधिनियम के विरुद्ध कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर देगा ।

76. विशेष साधारण बैठक—(1) विशेष साधारण बैठक किसी भी समय समिति, विशेष साधारण के बहुमत से बुलाई जा सकती है और एक महीने के भीतर समिति द्वारा बुलाई जाएगी,--

(i) सोसाइटी के सदस्यों या सदस्यों के एक-पांचवें हिस्से की लिखित मांग पर, जिसकी संख्या इस प्रयोजन के लिए उप-विधियों में निर्दिष्ट है, जो भी कम हो ;

(ii) रजिस्ट्रार के अनुरोध पर ; या25 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण (iii) किसी सोसाइटी के मामले में, जो ऐसे संघीय सोसाइटी की समिति से अनुरोध पर एक संघीय सोसाइटी का सदस्य है।

(2) जहां कोई अधिकारी या समिति का कोई सदस्य, जिसका कर्तव्य ऐसी बैठक बुलाना था, बिना उचित बहाने के , ऐसी बैठक बुलाने में विफल रहता है, तो रजिस्ट्रार आदेश द्वारा ऐसे अधिकारी या सदस्य को समिति का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित कर सकता है, जो अवधि छह वर्ष से अधिक नहीं होगी, जैसा कि वह इस तरह के आदेश में निर्दिष्ट कर सकता है और यदि अधिकारी सोसाइटी का कर्मचारी है, तो वह उस पर दस हजार रुपये से अधिक का जुर्माना नहीं लगा सकता है :

परंतु इस उपधारा के अधीन आदेश देने से पूर्व, रजिस्ट्रार संबंधित व्यक्ति को उसके संबंध में की जाने वाली प्रस्तावित कार्रवाई के विरुध कारण बताने का एक उचित अवसर देगा या दिया जाएगा ।

(3) यदि किसी सोसाइटी की विशेष साधारण बैठक उपधारा (1) में निर्दिष्ट अपेक्षा के अनुसार नहीं बुलाई जाती है, तो रजिस्ट्रार या उसके द्वारा इस संबंध में अधिकृ त किसी भी व्यक्ति को ऐसी बैठक बुलाने की शक्ति होगी, जो समिति द्वारा विधिवत बुलाई गई बैठक मानी जाएगी ।

(4) रजिस्ट्रार को यह आदेश देने की शक्ति होगी कि उप- धारा (3) के अधीन बैठक बुलाने में किए गए खर्च का भुगतान सोसाइटी की निधि से या ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जाएगा, जो रजिस्ट्रार की राय में बैठक बुलाने से इंकार या विफलता के लिए जिम्मेदार थे ।

77. सोसाइटियों आदि कार्यों का कतिपय कमियों द्वारा अविधिमान्य न किया जाना—(1) सोसाइटी या समिति या किसी अधिकारी का कोई भी कार्य, सोसाइटी के व्यवसाय आदि के अनुसरण में सद् भावपूर्वक किया गया, पश्चात् वर्ती सोसाइटी के संगठन या समिति के संविधान में खोजे गए या नियुक्ति में या किसी अधिकारी के निर्वाचन में के वल कु छ दोष के अमान्य न होने के कारण अमान्य नहीं समझा जाएगा या इस आधार पर कि ऐसा अधिकारी दोषपूर्ण है अपने पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था ।

(2) इस विनियम के अधीन नियुक्त किसी भी व्यक्ति द्वारा सद्12भावपूर्वक किया गया कोई भी कार्य, इसके अधीन बनाए गए नियम या उपविधियां के वल इस तथ्य के कारण अमान्य नहीं होंगे कि उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई है या इसके अधीन बाद में पारित किसी आदेश के परिणामस्वरूप रद्द कर दिया गया है ।

(3) रजिस्ट्रार यह विनिश्चय करेगा कि क्या कोई कार्य सद् भावपूर्वक के अनुसरण में किया गया था सोसाइटी का व्यवसाय और उस पर उसका विनिश्चय अंतिम होगा ।

78. संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के नामनिर्देशिती को नियुक्त करने की शक्ति—(1) जहां संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन ने सोसाइटी शेयर पू ंजी की सदस्यता ली है सोसाइटी के , सीधे या किसी अन्य सोसाइटी के माध्यम से मूलधन और ब्याज का भुगतान के जारी किए गए डिबेंचर या किसी सोसाइटी द्वारा उठाए गए ऋण पुनभु र्गतान की गारंटी दी है, संघ राज्य क्षेत्र प्रशासन, प्रशासन की उपविधियों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसे सोसाइटी को उस रीति में, जो ऐसे संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा समय-समय पर अवधारित किया जा सकता है, समिति में तीन प्रतिनिधियों को नामित करने का अधिकार होगा । (2) इस प्रकार नामनिर्देशित सदस्य संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के प्रसाद पर्यन्त या उतनी अवधि तक, जो उस क्रम में विनिर्दिष्ट की जाए, जिसके द्वारा उनकी नियुक्ति की जाती है, पद धारण करेंगे और ऐसे किसी भी सदस्य के पद ग्रहण करने पर सभी अधिकार, कर्तव्य होंगे, उत्तरदायित्वों और देनदारियों के रूप में मानो वह सम्यकत: निर्वाचित समिति के सदस्य थे । स्पष्टीकरण -- इस खंड के प्रयोजनों के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि ऐसी समिति की उपविधियों के अधीन किसी सोसाइटी की समिति में रजिस्ट्रार या उसके नामिती का नामांकन इस उपधारा के अधीन संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के अधिकार के प्रयोग में उस समिति में प्रतिनिधि के नामांकन के रूप में नहीं माना जाएगा ।

(3) जहां संघ राज्य क्षेत्र प्रशासन की राय है कि किसी सोसाइटी के संचालन में सम्मिलित जनहित को ध्यान में रखते हुए ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, वह ऐसी समिति की समिति में अपने प्रतिनिधियों को नामित कर सकता है जैसे कि संघ क्षेत्र प्रशासन ने सोसाइटी की शेयर पू ंजी और उपधारा (1) और उपधारा (2), जहाँ तक ऐसे नामांकन पर लागू हो सकते हैं के उपबंधों की सदस्यता ली थी ।

79. नाम निर्देशित समिति के पदावधि के विस्तार या अभिरक्षक की नियुक्ति—(1) जहां प्रशासक या रजिस्ट्रार द्वारा नामनिर्देशित प्रबंधन समिति की किसी भी समिति के सदस्यों के पद की अवधि की समाप्ति पर, यथास्थिति, प्रशासक या एक समिति के रूप में रजिस्ट्रार की राय है कि ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, वह या वह नियुक्ति, राजपत्र में प्रकाशित एक आदेश द्वारा निम्नलिखित करेगा,—

(क) प्रबंधन की उक्त समिति के सदस्यों के कार्यालय की अवधि का विस्तार ; या

(ख) किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की समिति को ऐसी अवधि के लिए सोसाइटी का अभिरक्षक नियुक्त करना जो कु ल मिलाकर दो वर्ष से अधिक न हो या जब तक कि नई प्रबंधन समिति का निर्वाचन न हो जाए, जो भी पहले हो ।26 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (2) इस प्रकार नियुक्त अभिरक्षक, रजिस्ट्रार के नियंत्रण और ऐसे अनुदेशों के अधीन रहते हुए, जो वह समय-समय पर दे सकता है, उसके पास सभी या किन्हीं समिति के कृ त्यों का प्रयोग करने की शक्ति होगी और सोसाइटी के हित में आवश्यक सभी प्रकार की कार्रवाई करना ।

(3) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त अभिरक्षक द्वारा सोसाइटी के मामलों को चलाने की अवधि के दौरान अभिरक्षक द्वारा किए गए या किए जाने वाले सभी कार्य नई प्रबंधन समिति के लिए बाध्यकारी होंगे ।

80. समिति का अधिकरण और समिति या विशेष अधिकारियों की नियुक्ति—(1) यदि, सोसाइटी की समिति के बाबत, जिसका रजिस्ट्रार इसके सदस्य के रूप में है, प्रशासक और सोसाइटी के बाबत जिसके रजिस्ट्रार इसके सदस्य के रुप में नहीं है, रजिस्ट्रार की यह राय है कि –

(i) समिति बार-बार व्यतिक्रम करती है;

(ii) समिति इस विनियम या तद् धीन बनाए गए नियमों या उपविधियों द्वारा उस पर अधिरोपित कर्तव्यों के पालन में उपेक्षा करता है; या

(iii) समिति ने कोई ऐसा कृ त्य किया है जो सोसाइटी के या उसके सदस्यों के हित पर प्रतिकू ल प्रभाव डालता है;

प्रशासक या, यथास्थिति, रजिस्ट्रार, समिति को सुनवाई का अवसर देने के पश् चात् सूचना जारी करने की तारीख से पंद्रह दिन के भीतर, लिखित आदेश द्वारा समिति को अधिक्रान्त कर सके गा ; और

(क) समिति, इस उपधारा के अधीन अधिक्रान्त समिति के सदस्य न होते हुए सोसाइटी के एक या अधिक सदस्यों को गठित कर सके गी; या

(ख) संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के अधिकारियों में से एक विशेष अधिकारी, सोसाइटी के कार्यकलापों का एक वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए जो अवधि, यथास्थिति, प्रशासक या रजिस्ट्रार के विवेक पर समय समय पर बढ़ाई जा सके गी किं तु समिति या विशेष अधिकारी का कार्यकाल योग में दो वर्ष होगा, प्रबंध करने के लिए नियुक्त कर सके गी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन आदेश पारित करने के पहले, यथास्थिति, प्रशासक या रजिस्ट्रार सहकारी वित्तीय संस्था से परामर्श करेगी, यदि ऐसी सोसाइटी इसकी ऋणी है । (3) ऐसे नियुक्त समिति या विशेष अधिकारी, यथास्थिति, प्रशासक या रजिस्ट्रार के ऐसे अनुदेशो और नियंत्रण के अध्यधीन होंगे, समिति के या सोसाइटी के किसी अधिकारी को सभी या किसी कृ त्य को करने की शक्ति होगी, और वह ऐसी सभी कार्रवाई करेगा, जो सोसाइटी के हितों में अपेक्षित हों ।

(4) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त समिति या विशेष अधिकारी सोसाइटी की समिति का निर्वाचन ऐसे समय पर जो यथास्थिति प्रशासक या रजिस्ट्रार द्वारा निदेशित हो, किं तु उपधारा (1) में यथाविनिर्दिष्ट अवधि से अपश्चात् होगी, व्यवस्था करेगा ।

(5) समिति या विशेष अधिकारी द्वारा उस अवधि के दौरान किए गए या किए जाने के लिए तात्पर्यित सभी कार्य जिसके दौरान समिति के कार्यकलाप उपधारा (1) के अधीन नियुक्त समिति या विशेष अधिकारी द्वारा किए जाते है, नई समिति पर बाध्यकारी होंगे ।

(6) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त समिति या विशेष अधिकारी के सदस्यों का पारिश्रमिक ऐसा होगा जो विहित किया जाए और वैसे ही सोसाइटी की निधि से संदत्त होगा । (7) समिति के सदस्य, जो उपधारा (1) के अधीन अधिक्रांत किए गए हैं, ऐसी समिति के अधिक्रमण की तारीख से छह वर्ष की अवधि के लिए किसी सोसाइटी की समिति के सदस्य होने के लिए पात्र नहीं होंगे ।

81. बाध्यता के अनुपालन प्रवर्तन की रजिस्ट्रार की शक्ति—(1) प्रत्येक सोसाइटी का यह कर्तव्य होगा कि वह सोसाइटी द्वारा प्राप्त और व्यनित किए गए धन की सभी राशियों की बाबत और विषयों जिसके बाबत सोसाइटी द्वारा माल का सभी क्रय और विक्रय के लिए प्राप्ति और व्यय होता है और सोसाइटी की आस्तियों और दायित्वों और रजिस्ट्रार को ऐसे विवरण और विवरणी और ऐसे अभिलेख प्रस्तुत करने की जैसा रजिस्ट्रार समय समय पर आदेशित कर सके गा विहित बही पुस्तिका रखेंगे, और अधिकारी या सोसाइटी के अधिकारी इसमें विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर आदेश के अनुपालन को बाध्य होंगे ।

(2) जहां किसी सोसाइटी को इस विनियम, तद् धीन बनाए गए नियमों या उपविधियों के अधीन या उपधारा (1) के अधीन किए गए आदेश के अनुपालन में कोई कार्रवाई करना अपेक्षित होता है और जहां ऐसी कार्रवाई नहीं की जाती—

(क) यथास्थिति, इस विनियम, नियम या उपविधियों या आदेश में उपबंधित समय के भीतर ;या

(ख) जहां कोई समय उपबंधित नहीं किया गया है, ऐसे समय के भीतर, कार्रवाई की प्रकृ ति और विस्तार को ध्यान में रखते हुए जैसा कि रजिस्ट्रार लिखित रूप में सूचना द्वारा विनिर्दिष्ट कर सके गा;

रजिस्ट्रार, स्वयं उसको या उसके द्वारा प्राधिकृ त किसी माध्यम से सोसाइटी के व्यय पर ऐसी कार्रवाई कर सके गा और ऐसे व्यय सोसाइटी से वसूली योग्य होंगे यदि यह भू-राजस्व की बकाया थे ।27 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण (3) जहां रजिस्ट्रार उपधारा (2) के अधीन कार्रवाई करता है, वह सोसाइटी के किसी अधिकारी को बुला सके गा जिनको वह इस विनियम, तद् धीन बनाए गए नियमों या उपविधियों के उपबंधों से या उपधारा (1) के अधीन किए गए आदेश से अनुपालन न करने के लिए उत्तरदायी मानता है, और उसको सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् संदत्त व्यय सोसाइटी को या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन को उसके द्वारा देय व्ययों का संदाय करने में असफलता के परिणामस्वरुप कार्रवाई करने के लिए, और सोसाइटी की आस्तियों के संदाय के लिए ऐसी राशि प्रत्येक दिन के लिए एक सौ रुपए से अनधिक की जब तक कि रजिस्ट्रार के निदेशों का पालन नहीं किया जाता है, संदाय करना अपेक्षित है ।

82. लोकहित आदि में निदेश देने की संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन की शक्ति—(1) यदि संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन का रजिस्ट्रार से रिपोर्ट की प्राप्ति पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा अनुमोदित या हाथ में लिए गए सहकारी उत्पादन और अन्य विकास कार्यक्रमों का समुचित रूप से क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए या साधारणतया विनिर्दिष्ट कारबार का समुचित प्रबंध सुनिश्चित करने के लिए या सोसाइटी के ऐसी रीति से किए जा रहे लोकहित में क्रियाकलापों को रोकने के लिए, जो उसके सदस्यों, निक्षेपकर्ताओं या लेनदारों के हितों के लिए अहितकर हो, साधारणतया किसी वर्ग की सोसाइटियों को या किसी भी सोसाइटी या विशेष सोसाइटियों को निदेश देना आवश्यक है, तो संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन समय-समय पर उन्हें निदेश दे सके गी और यथास्थिति, सभी सोसाइटियां या संबंधित सोसाइटी ऐसे निदेशों का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगी या होंगी ।

(2) संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किसी निदेशों को उपांतरित या रद्द कर सके गा और ऐसे निदेशों को उपांतरित या रद्द करने में, वह ऐसी शर्तें अधिरोपित कर सके गा जो वह ठीक समझे ।

(3) जहां रजिस्ट्रार का समाधान हो जाता है कि कोई व्यक्ति उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन सोसाइटी को जारी किए गए निदेशों या उपांतरित निदेशों का अनुपालन करने के लिए उत्तरदायी था और वह निदेशों के अनुपालन के लिए बिना किसी कारण और न्यायोचित्य के असफल हुआ, रजिस्ट्रार को आदेश दे सके गा, -

(क) यदि व्यक्ति सोसाइटी की समिति का सदस्य है, उसे आदेश की तारीख के छह वर्ष की अवधि के लिए किसी सोसाइटी की समिति का सदस्य होने से अनर्हक या बने रहना घोषित कर सके गा ;

(ख) यदि व्यक्ति सोसाइटी का कर्मचारी है, तो तत्काल सोसाइटी के नियोजन से ऐसे व्यक्ति को हटाने को समिति को निदेश दे सके गा और यदि समिति का कोई सदस्य या सदस्यों इस आदेश का अनुपालन करने में बिना किसी कारण और न्यायोचित्य के असफल रहता है तो खंड (क) में यथाउपबंधित अनर्हक घोषित किया जा सके गा :

परंतु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश करने से पहले, रजिस्ट्रार व्यक्ति या संबंधित व्यक्तियों को सुनवाई का उचित अवसर देगा और परिसंघीय सोसाइटी से परामर्श करेगा, जिससे सोसाइटी सहबद्ध है :

परंतु यह और कि ऐसी परिसंघीय सोसाइटी संसूचना की प्राप्ति की तारीख से पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर रजिस्ट्रार को अपनी राय संसूचित करेगा, जिसके असफल होने पर यह उपधारित किया जाएगा कि ऐसी परिसंघीय सोसाइटी ने इस धारा के अधीन कार्रवाई करने में कोई आक्षेप नहीं किया है और रजिस्ट्रार तद्नुसार कार्रवाई करने को आगे और स्वतंत्र होगा ।

(4) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा किया गया कोई आदेश पक्षकारों के लिए अंतिम और आबद्धकर होगा । 83. अभिलेख, आदि अभिग्रहण करने की रजिस्ट्रार की शक्ति—(1) जहां रजिस्ट्रार का यह समाधान हो जाता है कि सोसाइटी की पुस्तिका और अभिलेख को छिपाए जाने, बिगाड़े जाने या नष्ट किए जाने की संभावना है या सोसाइटी की विधियों और संपत्ति का दुर्विनियोग या दुरुपयोजन किए जाने की संभावना है या अधिकारी या व्यक्ति अनुचित रूप से कब्जे में पुस्तिका, अभिलेख, निधियों और संपत्ति का कब्जा देने से इंकार करता है, रजिस्ट्रार सोसाइटी की ऐसी पुस्तिका, अभिलेख, निधियों और संपत्ति का अभिग्रहण करने और कब्जा लेने के लिए लिखित रुप में उसके द्वारा सम्यक रुप से प्राधिकृ त व्यक्ति को निदेशित करते हुए आदेश जारी कर सके गा और सोसाइटी का अधिकारी ऐसी पुस्तिका, अभिलेख, निधियों और संपत्ति की अभिरक्षा के लिए उत्तरदायी है या उसी प्रकार कब्जे वाला व्यक्ति, ऐसे प्राधिकृ त व्यक्ति को तत्काल उसका परिदान देगा ।

(2) यदि सोसाइटी का अधिकारी, या कब्जे वाला व्यक्ति परिदान नहीं देता है, तब किसी अन्य कार्रवाई पर प्रतिकू ल प्रभाव डाले बिना, इस विनियम के उपबंधों के अधीन ऐसे अधिकारी, व्यक्ति या सोसाइटी के विरुद्ध की जा सके गी, रजिस्ट्रार या उसके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति उस कार्यपालक मजिस्ट्रेट को जिसकी अधिकारिता के भीतर सोसाइटी कार्य कर रही है, सोसाइटी की ऐसी पुस्तिका, अभिलेखों, निधियों और संपत्ति का कब्जा अभिग्रहण करने या लेने के लिए अपील कर सके गा।

(3) उपधारा (2) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर, मजिस्ट्रेट किसी पुलिस अधिकारी को जो उपनिरीक्षक से नीचे की पंक्ति का न हो किसी ऐसे स्थान पर जहां पुस्तिका, अभिलेख, निधियां और संपत्ति रखी जाती है या उसके रखे जाने28 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] की संभावना हो, प्रवेश करने और तलाशी लेने के लिए और उसका अभिग्रहण करने के लिए प्राधिकृ त कर सके गा और यथास्थिति, रजिस्ट्रार और उसके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति को उसका कब्जा दे दिया जाएगा ।

अध्याय 7

संपरीक्षा, जांच, निरीक्षण और पर्यवेक्षण 84. संपरीक्षा—(1) रजिस्ट्रार, प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार प्रत्येक सोसाइटी के लेखाओं की इस निमित्त लिखित रूप में साधारण या विशेष आदेश द्वारा विहित अर्हताएं रखने वाले और रजिस्ट्रार द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति द्वारा संपरीक्षा कराएगा और ऐसा प्राधिकृ त व्यक्ति इस विनियम के प्रयोजनों के लिए संपरीक्षक होगा ।

(2) संपरीक्षक की संपरीक्षा के प्रयोजन के लिए सभी पुस्तिकाओं, लेखाओं, दस्तावेजों कागजों, प्रतिभूतियों, नगद और अन्य संपत्तियों तक संबंधित सोसाइटी से संबंधित या अभिरक्षा में रखी गई सभी समयों पर पहुंच होगी और वह ऐसे किसी व्यक्ति के जिसके कब्जे में या सोसाइटी के मुख्यालय या उसकी शाखा पर किसी स्थान में किसी ऐसी पुस्तिका, लेखा, दस्तावेजों, कागजों, प्रतिभूतियों, नगद और अन्य संपत्तियां है या जो उसकी अभिरक्षा के लिए उत्तरदायी है प्रस्तुत करने के लिए समन करेगा ।

(3) यदि आवेदन पर या अन्यथा रजिस्ट्रार को यह प्रतीत होता है कि सोसाइटी के किसी लेखा पुनःसंपरीक्षा के लिए यह आवश्यक या समीचीन है, तो रजिस्ट्रार, आदेश दवारा ऐसी पुनः संपरीक्षा के लिए उपबंध कर सके गा और सोसाइटी के लेखा की संपरीक्षा को लागू इस विनियम के उपबंध ऐसी पुनः संपरीक्षा को लागू होंगे ।

(4) रजिस्ट्रार, आदेश दवारा अपने विवेक पर या भारतीय रिजर्व बैंक या यथास्थिति राष्ट्रीय बैंक की सिफारिश के आधार पर किसी सोसाइटी की विशेष संपरीक्षा के लिए उपबंध करेगा और इस धारा के अधीन बनाए गए सोसाइटी के लेखाओं की संपरीक्षा से संबंधित उपबंध ऐसी विशेष संपरीक्षा को भी लागू होंगे ।

(5) इस धारा के अधीन सोसाइटी के लेखाओं की संपरीक्षा करने के लिए प्रत्येक सोसाइटी संपरीक्षा फीस के रूप में ऐसी रकम जो सोसाइटिय़ों के विभिन्न प्रवर्गों या वर्गों के लिए विहित की जाए, संपरीक्षक को संदाय करने के लिए दायी होगी ।

(6) रजिस्ट्रार, राष्ट्रीय बैंक के परामर्श से प्रज्ञापूर्ण मानक जिसके अंतर्गत प्राथमिक कृ षि प्रत्यय सहकारी सोसाइटी के लिए पू ंजी से जोखिम भारित आस्तियों का अनुपात भी है, का अवधारण कर सके गा ।

(7) प्रशासक, नियम द्वारा जिसमें प्ररूप और रीति के लिए और अवधि जिसके भीतर सोसाइटी के लेखाओं या सोसाइटी के वर्ग तैयार किए जाएंगे और आनलाइन संपरीक्षा के प्रयोजन के लिए प्रस्तुत किए जाएंगे, उपबंध कर सके गा । (8) संपरीक्षकों की रिपोर्ट में अंतर्विष्ट होगा,—

(क) संपरीक्षा में संप्रेक्षित त्रुटियों या अनियमिताओं के सभी विवरण और वित्तीय अनियमताओं और दुर्विनियोग या निधियों के गबन या कपट की दशा में, संपरीक्षक या संपरीक्षा करने वाली फर्म सौपें जाने और अंतर्वलित रकम, कार्यप्रणाली का अन्वेषण और रिपोर्ट होगी ;

(ख) लेखांकन अनियमिताओं और वित्तीय विवरणों पर उनकी विवक्षा को विस्तार से लाभ और हानि पर तत्स्थानी प्रभावों के साथ इंगित किया जाएगा ;

(ग) जांची गई सोसाइटी की समिति और उपसमिति के कार्य करने की रीति होगी और यदि कोई अनियमितता या उल्लंघन संप्रेक्षित या रिपोर्ट किए जाते हो तब ऐसी अनियमिताओं या उल्लंघनों के लिए उत्तरदायित्व सम्यक् रुप से नियत होगा ।

(9) यदि रजिस्ट्रार के ध्यान में लाया जाता है कि संपरीक्षक द्वारा प्रस्तुत की गई संपरीक्षा रिपोर्ट लेखाओं का सही और स्पष्ट चित्र प्रकट नहीं करती है तब रजिस्ट्रार या प्राधिकृ त व्यक्ति ऐसी सोसाइटी के लेखाओं की जांच संपरीक्षा कार्यान्वित कर सके गा या कार्यान्वित करवा सके गा और जांच परीक्षा में ऐसी मदों का परीक्षण सम्मिलित होगा जो ऐसे आदेश में रजिस्ट्रार द्वारा विहित और विनिर्दिष्ट किया जाए ।

(10) यदि, किसी सोसाइटी की संपरीक्षा के अनुक्रम के दौरान संपरीक्षक का यह समाधान हो जाता है कि कु छ लेखा पुस्तकों या अन्य दस्तावेजों में सोसाइटी के भूतपूर्व या वतर्मान अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कोई अपराध में फं साने वाला साक्ष्य अंतर्विष्ट है, संपरीक्षक रजिस्ट्रार को मामले की तत्काल रिपोर्ट करेगा और रजिस्ट्रार की पूर्व अनुमति से पुस्तकों या दस्तावेजों को परिबद्ध कर सके गा और सोसाइटी को उसकी रसीद देगा ।

(11) संपरीक्षक, उसकी संपरीक्षा रिपोर्ट इसके पूर्ण होने से एक सप्ताह की अवधि के भीतर, सोसाइटी को और रजिस्ट्रार को ऐसी रीति में जो रजिस्ट्रार द्वारा विहित की जाए, उसके द्वारा परीक्षा किए गए लेखाओं और तुलनपत्र को और लाभ तथा हानि लेखा जो तारीख पर और उस अवधि के लिए जिसकों लेखा संपरीक्षित किया गया है, प्रस्तुत करेगा, और यह कथन होगा कि क्या उसकी राय में और उसकी सूचना में और सोसाइटी द्वारा उसको दिए गए स्पष्टीकरण के अनुसार उक्त लेखाओं में इस विनियम द्वारा अपेक्षित सभी जानकरी दी गई है और सोसाइटी के वित्तीय संव्यवहार की दशा में सही और उचित दृश्य उपस्थित करती है :

29 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण

परंतु जहां संपरीक्षक अपनी संपरीक्षा रिपोर्ट में इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि कोई व्यक्ति खातों से सबंधित किसी अपराध या किसी अन्य अपराध का दोषी है, वह अपनी संपरीक्षा रिपोर्ट के प्रस्तुत करने की तारीख से प्रद्रंह दिन की अवधि के भीतर रजिस्ट्रार को विशेष रिपोर्ट फाइल करेगा और संबंद्ध संपरीक्षक रजिस्ट्रार की लिखित अनुमति प्राप्त करने के पश्चात् अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट फाइल करेगा और संपरीक्षक जो प्रथम सूचना रिपोर्ट फाइल करने में असफल रहता है निरर्हता के लिए दायी होगा और उसका नाम संपरीक्षकों के पैनल से हटाने का दायी होगा और वह रजिस्ट्रार जो ठीक समझे किसी अन्य कार्रवाई के लिए भी दायी होगा :

परंतु यह और कि जब रजिस्ट्रार के ध्यान में यह लाया जाता है कि संपरीक्षक कार्रवाई आरंभ करने में असफल रहा है, रजिस्ट्रार इस बाबत उसके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट फाइल करेगा :

परंतु यह भी कि उसकी संपरीक्षा के निष्कर्ष पर, यदि संपरीक्षक पाता है कि समिति के किसी सदस्य या सोसाइटी के किसी अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कारित सोसाइटी की हानियों के परिणामस्वरुप वित्तीय अनियमितताओं के उदाहरण प्रकट होते हैं तब वह ऐसी विशेष रिपोर्ट तैयार करेगा और अपनी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ रजिस्ट्रार को प्रस्तुत करेगा और ऐसी विशेष रिपोर्ट फाइल करने में असफलता संपरीक्षक के कर्तव्यों में लापरवाही होगी और वह संपरीक्षक के रुप में नियुक्ति के लिए निरर्हता या किसी अन्य कार्रवाई जो रजिस्ट्रार ठीक समझे, के लिए दायी होगा ।

85. लेखाओं में त्रुटियों या अनियमितताओं की परिशुद्धि और सोसाइटी की रिपोर्ट का निरीक्षण—यदि धारा 84 के अधीन की गई संपरीक्षा, धारा 87 और धारा 88 के अधीन किए गए निरीक्षण के परिणाम में सोसाइटी के कार्यकरण में किसी त्रुटि का प्रकटन होता है, तब सोसाइटी संपरीक्षा और निरीक्षण रिपोर्ट की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर संपरीक्षा और निरीक्षण रिपोर्ट में इस प्रकार इंगित की गई त्रुटियों या अनियमितताओं के संबंध में रजिस्ट्रार को स्पष्ट करेगी और यदि किसी त्रुटि या अनियमितता के बाबत स्पष्टीकरण स्वीकृ त नहीं किया जाता, तब ऐसी अवधि के भीतर जो रजिस्ट्रार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए त्रुटियों को दूर करने और अनियमितताओं को सुधारने के लिए कदम उठाएगा और रजिस्ट्रार को रिपोर्ट करेगा, जिसके न हो सकने पर रजिस्ट्रार को दस हजार रुपए से अनधिक ऐसी रकम की शास्ति अधिरोपित करने की शक्ति होगी और जहां संबंद्ध सोसाइटी परिसंघीय सोसाइटी की सदस्य है, ऐसा आदेश परिसंघीय सोसाइटी से परामर्श करने के पश्चात् किया जाएगा । 86. रजिस्ट्रार द्वारा जांच—(1) रजिस्ट्रार स्वप्रेरणा से जांच कर सके गा या,—

(क) सोसाइटी के स्वयं ऐसे सदस्य होते हुए, अपने सदस्यों के बाबत ऐसा अनुरोध करने पर इस निमित्त बनाए गए नियमों द्वारा सम्यक् रुप से प्राधिकृ त सोसाइटी के अनुरोध पर ;

(ख) सोसाइटी की समिति की बहुसंख्या के आवेदन पर ;

या

(ग) सोसाइटी के एक तिहाई सदस्यों के आवेदन पर स्वयं उनके या इस निमित्त लिखित रुप में उनके द्वारा सम्यक रूप से प्राधिकृ त व्यक्ति द्वारा ऐसी जांच कर सके गा, सोसाइटी के गठन, कार्यकरण और वित्तीय स्थिति के बारे में जांच कर सके गा । (2) सोसाइटी का प्रत्येक अधिकारी, सदस्य और भूतपूर्व सदस्य जिसके बाबत जांच की जाती है, और कोई अन्य व्यक्ति जो सोसाइटी से संबंधित सूचना, पुस्तकों और कागजपत्रों के कब्जे में है ऐसी अपेक्षा होने पर ऐसी सूचना प्रस्तुत करेगा जो उसके कब्जे में है और सोसाइटी से संबंधित सभी पुस्तकें और कागजपत्रों को उसकी अभिरक्षा या शक्ति में है, प्रस्तुत करेगा और अन्यथा जांच करने वाले अधिकारी को जांच के संबंध जो वह युक्तियुक्त रुप से दे सके गा, सभी सहायता देगा । (3) यदि कोई ऐसा व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रार या उसके द्वारा प्राधिकृ त किसी व्यक्ति को उपधारा (2) के अधीन किसी पुस्तक या कागज को जिसको प्रस्तुत करना उसका कर्तव्य है प्रस्तुत करने से या किसी प्रश्न के उत्तर के लिए जो उपधारा (2) के अनुसरण में रजिस्ट्रार या रजिस्ट्रार द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति द्वारा उसे रखा जाता है, इंकार करता है या रजिस्ट्रार या रजिस्ट्रार द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति इंकार प्रमाणित करता है और रजिस्ट्रार पांच हजार रुपए से अनधिक की रकम की शास्ति व्यतिक्रमी पर अधिरोपित कर सके गा ओर ऐसी शास्ति अधिरोपित करने के पहले, रजिस्ट्रार व्यतिक्रमी को उसके संबंध में प्रस्तावित कार्रवाई के विरुद्ध कारण बताने के लिए, युक्तियुक्त अवसर देने का कारण देगा ।

(4) यदि इस धारा के अधीन जांच के किसी स्तर पर, रजिस्ट्रार का समाधान हो जाता है कि सोसाइटी के सदस्यों के हित में यह आवश्यक है जांच की अवधि के दौरान सोसाइटी से संबंधित सभी पुस्तकें और काजगपत्रों को ग्रहण कर लिया जाए, वह इस आशय का लिखित में सोसाइटी को निदेश करेगा कि वह सोसाइटी से संबंधित सभी पुस्तकें और कागजपत्रों को ऐसे अधिकारी को जो आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाए सौपें और रजिस्ट्रार सोसाइटी को ऐसे कृ त्यों को करने या ऐसी कार्यवाहियों में सम्मिलित होने जो निदेश में विनिर्दिष्ट की जाए से विरत रहने के लिए निदेश भी जारी कर सके गा । (5) सोसाइटी उपधारा (4) के अधीन इसको जारी किए गए किसी निदेशों के अनुपालन को बाध्य होगी ।

(6) उपधारा (4) के अधीन ली गई पुस्तकें और कागजपत्र जांच के पूरा होने पर सोसाइटी को वापस किए जाएंगे ।30 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (7) जब जांच इस धारा के अधीन की जाती है तब रजिस्ट्रार जांच के परिणाम संसूचित करेगा –

(क) यदि संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन ने, संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अधिकारी को सोसाइटी की शेयर पू ंजी में प्रत्यक्ष रूप से अभिदान किया है ;

(ख) संबंद्ध परिसंघीय सहकारी सोसाइटी को; और (ग) संबंद्ध सोसाइटी को ।

(8) रजिस्ट्रार, उस अधिकारी से जांच का उत्तरदायित्व जिसे वह सौंपा गया है, और स्वयं जांच के लिए या किसी अन्य व्यक्ति को सैंपने के लिए जो वह ठीक समझे प्रत्याह्रत कर सके गा।

87. ऋणी सोसाइटी की पुस्तकों का निरीक्षण—(1) सोसाइटी के लेनदार के आवेदन पर जो,—

(क) रजिस्ट्रार का यह समाधान नहीं कर देता कि वह एक ऋण है जो देय है और उसने उसके संदाय की मांग की है और युक्तियुक्त समय के भीतर उसकी तुष्टि नहीं की गई है; और (ख) रजिस्ट्रार के पास सोसाइटी की पुस्तकों के निरीक्षण के खर्चों के लिए प्रतिभूति के रुप में ऐसी राशि का निक्षेप जिसकी अपेक्षा रजिस्ट्रार करे,

रजिस्ट्रार यदि वह आवश्यक या समीचीन समझे, सोसाइटी की पुस्तकों को निरीक्षण करेगा या इस निमित्त लिखित रुप में आदेश द्वारा उनके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति को निरीक्षण करने का निदेश देगा ।

(2) रजिस्ट्रार अपीलार्थी को और उस सोसाइटी को जिसकी पुस्तकों का निरीक्षण किया गया किसी ऐसे निरीक्षण के परिणाम संसूचित करेगा ।

(3) रजिस्ट्रार किसी निरीक्षण को उस अधिकारी से जिसको वह सौंपा गया है और निरीक्षण स्वयं करने के लिए या किसी अन्य व्यक्ति को सौंपने के लिए जो वह ठीक समझे प्रत्याह्रत कर सकता है ।

88. रजिस्ट्रार या वित्तीय बैंक या परिसंघीय सोसाइटी द्वारा पुस्तकों का निरीक्षण—(1) रजिस्ट्रार या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृ त व्यक्ति को किसी सोसाइटी की पुस्तकों के निरीक्षण का अधिकार होगा और उसकी अभिरक्षा में रखी गई पुस्तकों, लेखाओं, दस्तावेजों, प्रतिभूतियों, नगद और अन्य संपत्तियों तक अबाध पहुंच होगी ।

(2) प्रत्येक व्यक्ति जो सोसाइटी का किसी समय पर अधिकारी या कर्मचारी रहा है या है और सोसाइटी का प्रत्येक सदस्य और भूतपूर्व सदस्य सोसाइटी के ऐसे संव्यवहारों और कार्यकरण के संबंध में ऐसी सूचना देगा जैसा रजिस्ट्रार या उनके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति अपेक्षा करे ।

(3) जहां सोसाइटी किसी सहकारी वित्तीय बैंक की ऋणी है, ऐसे बैंक को उस सोसाइटी की पुस्तकों के निरीक्षण का अधिकार होगा और निरीक्षण या तो ऐसे बैंक की समिति द्वारा प्राधिकृ त बैंक के किसी अधिकारी द्वारा या रजिस्ट्रार द्वारा प्रमाणित वेतन पाने वाला कर्मचारी जो ऐसा निरीक्षण करने को सक्षम हो, इसके सदस्य द्वारा किया जा सके गा ।

(4) ऐसे निरीक्षण करने वाले अधिकारी या सदस्य की सभी युक्तियुक्त समयों पर सोसाइटी से संबंधित या उसकी अभिरक्षा में रखी गई पुस्तकों, लेखाओं, दस्तावेजों, प्रतिभूतियों नकद और अन्य संपत्तियों तक अबाध पहुंच होगी और ऐसी सूचना, विवरण और विवरणियां जो आवश्यक हो, सोसाइटी की वित्तीय स्थिति और बैंक द्वारा उसको दी गई राशि की सुरक्षा अभिनिश्चित करने के लिए भी बुला सके गा । (5) जहां सोसाइटी धारा 95 के अधीन संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा मान्यताप्राप्त परिसंघीय सोसाइटी का सदस्य है ऐसी परिसंघीय सोसाइटी को उस सोसाइटी की पुस्तकों के निरीक्षण का अधिकार होगा और निरीक्षण या तो ऐसी परिसंघीय सोसाइटी की समिति द्वारा प्राधिकृ त परिसंघीय सोसाइटी के अधिकारी या पृष्ठांकिती द्वारा या रजिस्ट्रार द्वारा प्रमाणित ऐसी परिसंघीय सोसाइटी के वेतन पाने वाले कर्मचारी द्वारा जो ऐसा निरीक्षण करने को सक्षम है, किया जा सके गा ।

(6) उपधारा (5) में निर्दिष्ट अधिकारी या कर्मचारी की सभी युक्तियुक्त समयों पर सोसाइटी से संबंधित या उसकी अभिरक्षा में रखी गई पुस्तकों, लेखाओं, दस्तावेजों, प्रतिभूतियों, नकद और अन्य संपत्तियों तक अबाध पहुंच होगी और ऐसी सूचना, विवरणों और विवरणियां जो आवश्यक हो, के लिए बुलाया जा सके गा ।

89. सोसाइटी के अधिकारी या सेवक का निलंबन—(1) जहां धारा 84 के अधीन संपरीक्षा या धारा 86 के अधीन जांच या धारा 87 या धारा 88 के अधीन निरीक्षण के अनुक्रम में, रजिस्ट्रार को यह ध्यान दिलाया जाता है कि सोसाइटी का संदाय पाने वाले अधिकारी या सेवक सोसाइटी के संबंध में मिथ्या दुर्विनियोग, आपराधिक न्यास भंग या अन्य अपराध के लिए प्रतिबद्ध है या अन्यथा उत्तरदायी किया गया है, रजिस्ट्रार, यदि उसकी राय में वहां ऐसे संदाय पाने वाले अधिकारी या सेवक के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई साक्ष्य है और ऐसे संदाय पाने वाले अधिकारी या सेवक का निलंबन सोसाइटी के हित में आवश्यक है तो मामले के अन्वेषण और निपटान लंबित रहने तक सोसाइटी की समिति को निदेश दे सके गा कि ऐसे संदाय पाने वाले अधिकारी या सेवक को निलंबन के अधीन ऐसी तारीख से और ऐसी अवधि के लिए जो उनके द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, निलंबित कर दिया जाए ।

(2) उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रार से निदेश की प्राप्ति पर, सोसाइटी की समिति उपविधियों में प्रतिकू ल किन्हीं31 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण उपबंधों के होते हुए भी, पूर्वोक्त संदाय पाने वाले अधिकारी या सेवक को निलंबित करेगा ।

(3) रजिस्ट्रार निलंबन की अवधि के लिए समय से विस्तार के लिए समिति को निदेश दे सके गा और निलंबित संदाय पाने वाला अधिकारी या सेवक रजिस्ट्रार की पूर्ववर्ती मंजूरी के सिवाय पुनः बहाल नहीं किया जाएगा ।

(4) यदि समिति उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए निदेशों के अनुपालन में असफल रहती है तब रजिस्ट्रार ऐसे संदाय पाने वाले अधिकारी या सेवक को ऐसी तारीख से और ऐसी अवधि के लिए जो वह आदेश में विनिर्दिष्ट करे, निलंबित करने का आदेश दे सके गा और तत्पश्चात् यथास्थिति, संदाय पाने वाला अधिकारी या सेवक, निलंबन के अधीन होगा । 90. जांच और निरीक्षण के खर्च—(1) जहां धारा 86 के अधीन कोई जांच की जाती है या धारा 88 के अधीन कोई निरीक्षण किया जाता है वहां रजिस्ट्रार खर्चों या खर्चों के ऐसे भाग को, जो वह ठीक समझे, सोसाइटी जांच या निरीक्षण की मांग करने वाले सदस्यों और लेनदार तथा उस सोसाइटी के अधिकारियों या भूतपूर्व अधिकारियों और सदस्यों या भूतपूर्व सदस्यों या मृत सदस्य की संपदा के बीच प्रभाजित कर सके गा और ऐसा आदेश जांच रिपोर्ट के प्रस्तुत करने की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर पारित कर सके गा :

पंरतु—

(क) खर्च के प्रभाजन का कोई आदेश इस धारा के अधीन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि सोसाइटी या उसके अधीन खर्चों का संदाय करने के लिए दायी व्यक्ति या मृत व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधि को सुना न गया हो या सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ; और

(ख) रजिस्ट्रार, उन आधारों का लिखित कथन करेगा जिन पर खर्च का प्रभाजन किया गया हो ;

(2) सोसाइटी की निधि से कोई व्यय पूर्वगामी उपधारा के अधीन किए गए आदेश के विरुद्ध सोसाइटी से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति द्वारा की गई किसी अपील के समर्थन में किसी खर्च को चुकाने के प्रयोजन के लिए उपगत नहीं किया जायेगा । 91. शास्ति के रूप में अधिरोपित या खर्च के रूप में अधिनिर्णीत राशि की वसूली का ढंग—धारा 68, धारा 75, धारा 76, धारा 81, धारा 85 या धारा 86 के अधीन शास्ति के रूप में अधिरोपित या धारा 90 के अधीन खर्च के रूप में अधिनिर्णीत कोई राशि, रजिस्ट्रार या निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति द्वारा आवेदन करने पर ऐसे मजिस्ट्रेट को जिसकी अधिकारिता में वह स्थान है जहां व्यक्ति जिससे शास्ति या खर्च वसूली योग्य है, निवास करता है या उसका कारबार करता है न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा वसूल किया जाएगा जैसे कि वह स्वयं उसके द्वारा अधिरोपित किया गया जुर्माना था और ऐसा मजिस्ट्रेट ऐसी रीति में ऐसी वसूली की कार्यवाही करेगा मानो वह उसके द्वारा अधिरोपित जुर्माना हो ।

92. रजिस्ट्रार को जांच या निरीक्षण में प्रकट त्रुटियों के लिए सोसाइटी की सूचना—(1) यदि धारा 86 के अधीन की गई जांच या धारा 87 या धारा 88 के अधीन किए गए निरीक्षण के परिणामस्वरूप सोसाइटी के गठन, कार्यकरण या वित्तीय स्थिति या पुस्तकों में कोई त्रुटियां प्रकट होती हैं, रजिस्ट्रार सोसाइटी की सूचना पर ऐसे त्रुटियों पर ध्यान देगा और रजिस्ट्रार सोसाइटी या उसके अधिकारियों को इसमें विनिर्दिष्ट समय के भीतर त्रुटियों को दूर करने के लिए जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसी कार्रवाई करने का निदेश भी दे सके गा ।

(2) संबद्ध सोसाइटी प्रशासक को सोसाइटी के आदेश की संसूचना की तारीख से दो मास के भीतर उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा किए गए आदेश के विरुद्ध अपील कर सके गी । (3) प्रशासक, अपील का विनिश्चय करने में, रजिस्ट्रार के आदेश को बातिल करना, उलट देना, उपांतरण करना या पुष्टि कर सके गा ।

(4) जहां सोसाइटी रजिस्ट्रार द्वारा यथानिर्देशित त्रुटियों की परिशुद्धि में असफल रहती है और जहां उपधारा (2) के अधीन प्रशासक को कोई अपील नहीं की गई है या प्रशासन ने की गई ऐसी अपील पर बातिलीकरण, उलटने या उपांतरित करने का आदेश नहीं किया है रजिस्ट्रार स्वयं त्रुटियों की परिशुद्धि के लिए कदम उठा सके गा और सोसाइटी के अधिकारियों जो उसकी राय में त्रुटियों की परिशुद्धि में असफल रहते हैं, से खर्च वसूल कर सके गा ।

93. अपचारी संप्रवर्तक आदि के विरुद्ध नुकसानी का आकलन करने की रजिस्ट्रार की शक्ति—(1) जहां धारा 84 के अधीन की गई संपरीक्षा या धारा 86 के अधीन की गई जांच या धारा 87 या धारा 88 के अधीन, निरीक्षण या सोसाइटी के परिसमापन के अनुक्रम में या परिणामस्वरूप, रजिस्ट्रार का धारा 84 के अधीन जांच करने के लिए संपरीक्षक या प्राधिकृ त व्यक्ति या धारा 87 या धारा 88 के अधीन पुस्तकों के निरीक्षण के लिए प्राधिकृ त व्यक्ति या धारा 110 के अधीन समापक द्वारा बनाई गई रिपोर्ट के आधार पर यह समाधान हो जाता है कि कोई व्यक्ति जो सोसाइटी या कोई मृत या सोसाइटी ने भूतपूर्व या वतर्मान अधिकारी के संगठन या प्रबंधन में कोई भाग ले लिया है ऐसी संपरीक्षा प्रारंभ होने की तारीख या जांच, निरीक्षण या परिसमापन, दुरुपयोजन या प्रतिधारण के लिए या सोसाइटी के धन या संपत्ति के लिए दायी होना या लेखादायी होने के लिए या सोसाइटी के संबंध में अपकरण या आपराधिक न्यास भंग का दोषी किए गए आदेश की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के भीतर रजिस्ट्रार या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के आचरण का अन्वेषण कर32 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] सके गा और ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के विरुद्ध आरोप विरचित करने के पश्चात् और संबद्ध व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और मृत व्यक्ति की दशा में उसके प्रतिनिधि जो उसकी संपदा के उत्तराधिकारी हैं आरोप का उत्तर देने के लिए रजिस्ट्रार या इस धारा के अधीन प्राधिकृ त व्यक्ति अवधारित करेगा ऐसी दर पर ब्याज के साथ धन या संपत्ति या उसका कोई भाग चुकाने या बहाल करने के लिए अपेक्षित है, आदेश दे सके गा, या दुरुपयोजन, प्रतिधारण, अपकरण या आपराधिक न्यासभंग के संबंध में प्रतिकर के माध्यम से सोसाइटी की आस्तियों की ऐसी राशि का अभिदाय करेगा, जो वह अवधारित करे :

परंतु इस उपधारा के अधीन की गई कार्यवाहियां, रजिस्ट्रार द्वारा आदेश के जारी किए जाने की तारीख से दो वर्ष की अवधि के भीतर प्राधिकृ त व्यक्ति दवारा पूरी की जाएंगी:

परंतु यह और कि रजिस्ट्रार, इसके लिए कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात् छह मास की अधिकतम अवधि के लिए उक्त अवधि का विस्तार कर सके गा :

परंतु यह भी कि प्रशासक, रजिस्ट्रार की रिपोर्ट पर या स्वप्रेरणा से लिखित रूप में ऐसे कारणों के लिए जो लेखबद्ध किए जाएंगे, इस उपधारा के अधीन कार्यवाहियां पूरी करने के लिए समय-समय पर, उक्त अवधि का विस्तार, जो अपेक्षित हो, कर सके गा ।

(2) रजिस्ट्रार या उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृ त व्यक्ति इस धारा के अधीन कोई आदेश करने में ऐसा अन्वेषण जो वह उचित समझे, करने के खर्च या उसके किसी भाग का संदाय करने के लिए उपबंध कर सके गा, और वह निदेश दे सके गा कि ऐसा खर्च या उसका कोई भाग ऐसे व्यक्ति से वसूल किया जाएगा जिसके विरुद्ध आदेश जारी किया गया है ।

(3) यह धारा, इस बात के होते हुए भी कि कृ त्य वह है जिसके लिए संबंद्ध व्यक्ति दांडिक रूप से उत्तरदायी किया जा सके गा, लागू होगी ।

94. उपस्थिति, आदि प्रवृत्त करने की शक्ति— रजिस्ट्रार या उसके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति को, जब धारा 86, धारा 87, धारा 88 और धारा 93 के अधीन कार्य करते समय, किसी व्यक्ति को साक्ष्य देने या किसी दस्तावेज को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने या अन्य विषयवस्तु के लिए उपस्थित होने और हाजिर कराने की शक्ति होगी और उसी प्रकार और उसी रीति में जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय के मामले में उपबंधित की जाए । 95. सोसाइटी के कार्यकरण के पर्यवेक्षण के लिए परिसंघीय सोसाइटी का गठन या मान्यता—(1) संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन समितियों का गठन कर सके गा या सोसाइटी या सोसाइटी के वर्ग के पर्यवेक्षण करने के लिए ऐसी रीति में, जो विहित की जाए और ऐसी शर्तों के अध्यधीन जो संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन अवधारित करे एक या अधिक सहकारी परिसंघीय सोसाइटी को मान्यता दे सके गा और किसी ऐसी समिति या परिसंघीय सोसाइटी को अनुदान देने के लिए नियम बना सके गा ।

(2) संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसी राशि जो रजिस्ट्रार द्वारा नियत की जाए व्यय की प्रतिपूर्ति का अभिदाय करने के लिए सोसाइटी या सोसाइटी के वर्ग को अपेक्षित कर सके गा, जो संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन या इस निमित्त प्रधिकृ त कोई व्यक्ति या समिति ने सोसाइटी के पर्यवेक्षण करने की बाबत उपगत किया है या उपगत किए जाने की संभावना है ।

(3) सोसाइटी जिसको उपधारा (2) लागू है, ऐसे प्राधिकारी को युक्तियुक्त समय के भीतर, ऐसी फीस जो विहित की जाए का संदाय करेगा और यदि वह युक्तियुक्त समय के भीतर ऐसी फीस का संदाय करने में असफल रहता है, प्राधिकारी इसे वसूल कर सके गा यदि यह भू-राजस्व का बकाया था ।

अध्याय 9

विवाद विनिश्चत करने के लिए प्रक्रिया 96. विवाद—(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी कोई विवाद समिति या इसके अधिकारियों या सोसाइटी की साधारण बैठकों के संचालन के गठन, प्रबंधन, कारबार, निर्वाचन के संबंध में किसी विवाद के पक्षकारों के द्वारा या परिसंघीय सोसाइटी द्वारा जिससे सोसाइटी सहबद्ध है, या सोसाइटी के लेनदार द्वारा रजिस्ट्रार को निर्दिष्ट किया जाएगा, यदि इसके पक्षकार निम्नलिखित में से है, अर्थात् :—

(क) सोसाइटी, इसकी समितियां, कोई भूतपूर्व समिति, कोई भूतपूर्व या वतर्मान अधिकारी, कोई भूतपूर्व या वतर्मान अभिकर्ता कोई भूतपूर्व या वतर्मान सेवक या नामनिर्देशिती, सोसाइटी के किसी मृत अधिकारी के वारिस या विधिक प्रतिनिधि, मृत अभिकर्ता या मृत सेवक या सोसाइटी के समापक;

(ख) सोसाइटी के सदस्य, भूतपूर्व सदस्य या मृत सदस्यों के माध्यम से दावा करने वाले सदस्य, भूतपूर्व सदस्य या व्यक्ति, या सोसाइटी के सदस्य है ;

(ग) सोसाइटी के सदस्यों से भिन्न व्यक्ति जिसे सोसाइटी द्वारा ऋण अनुदत्त किया गया है या जिसने सोसाइटी की धारा 49 के उपबंधों के अधीन संव्यवहार किया है या किया था, और ऐसे व्यक्ति के माध्यम से दावा करने वाला कोई व्यक्ति; और (घ) किसी सदस्य, भूतपूर्व सदस्य या मृत सदस्य या सदस्य से भिन्न किसी अन्य़ व्यक्ति की प्रतिभूति जिसे धारा 4933 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण के अधीन सोसाइटी द्वारा ऋण अनुदत्त किया गया है चाहे ऐसा प्रतिभू सोसाइटी का सदस्य है या नहीं ;और

(ड.) कोई अन्य सोसाइटी, शासकीय समनुदेशिती या ऐसी सोसाइटी का समापक ।

(2) जब कोई प्रश्न उठता है कि उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए, विनिश्चय के लिए निर्दिष्ट विषय पर विवाद है या नहीं, प्रश्न रजिस्ट्रार द्वारा विचारणीय होगा जिसका विनिश्चय अंतिम होगा ।

स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजन के लिए-

(क) विवादों में अंतर्विष्ट होगा —

(i) सोसाइटी द्वारा किसी सदस्य या भूतपूर्व सदस्य या मृत सदस्य के नामनिर्देशिती, वारिस या विधिक प्रतिनिधि से किसी ऐसे देय ऋण या मांग के लिए कोई दावा, चाहे ऐसा ऋण या ऐसी मांग स्वीकार की गई हो या नही;

(ii) किसी सोसाइटी द्वारा ऋण के संबंध में मूल उधारकर्ता से उसको किसी राशि या देय मांग के लिए प्रतिभू द्वारा दावा और मूल उधारकर्ता के व्यतिक्रम के कारण प्रतिभू से वसूली, चाहे ऐसी राशि या ऐसी मांग स्वीकार की गई हो या नहीं ;

(iii) सदस्य, भूतपूर्व सदस्य या मृत सदस्य द्वारा, किसी अधिकारी, भूतपूर्व अधिकारी या मृत अधिकारी द्वारा किसी अभिकर्ता, भूतपूर्व अभिकर्ता या मृत अभिकर्ता द्वारा या किसी सेवक, भूतपूर्व सेवक या मृत सेवक द्वारा या इसकी भूतपूर्व या वतर्मान समितियों द्वारा इसको कारित की गई किसी हानि के लिए सोसाइटी द्वारा कोई दावा, चाहे ऐसी हानि स्वीकार की गई हो या नहीं; और

(iv) किसी सदस्य, भूतपूर्व सदस्य या मृत सदस्यों के नामनिर्देशिती, वारिस या विधिक प्रतिनिधि द्वारा, सोसाइटी की भूमि के या समनुदेशन की शर्तों के भाग के लिए इसके द्वारा पुनरारंभ किसी अन्य आस्ति के कब्जे के परिदान करने के लिए इंकार या असफलता; और

(ख) पद "अभिकर्ता" के अंतर्गत आवासन सोसाइटी की दशा में, सोसाइटी द्वारा सम्मिलित किए गए वास्तुविद् इंजीनियर या ठेके दार भी है —

97. परिसीमा—(1) परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किं तु इस विनियम में किए गए विनिर्दिष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, धारा 96 के अधीन रजिस्ट्रार को निर्दिष्ट विवाद के मामले में परिसीमा की अवधि—

(क) जब विवाद किसी सोसाइटी के उसके किसी सदस्य द्वारा सोसाइटी को देय किसी राशि की वसूली से संबंधित है जिसके अंतर्गत उस पर ब्याज भी है, उस तारीख से संगणित की जाएगी जिसको ऐसे सदस्य की मृत्यु होती है या वह सोसाइटी का सदस्य नहीं रह जाता है ;

(ख) जब विवाद सोसाइटी या इसकी समिति या किसी भूतपूर्व समिति, किसी भूतपूर्व या वतर्मान अधिकारी, या भूतपूर्व या वतर्मान अभिकर्ता या भूतपूर्व या वतर्मान सेवक या सोसाइटी के मृत अधिकारी, मृत अभिकर्ता या मृत सेवक के नामनिर्देशिती, वारिस या विधिक प्रतिनिधि या सदस्य या भूतपूर्व सदस्य या मृत सदस्य के नामनिर्देशिती, वारिस या विधिक प्रतिनिधि के बीच होता है और जब विवाद किसी कार्य या लोक से संबंधित हो, वह कार्य या लोप जिसके संबंध में विवाद उत्पन्न हुआ था, उस तारीख से छह वर्ष होगी ;

(ग) जब विवाद सोसाइटी के गठन, प्रबंधन या कारबार से संबंधित किसी विषय के बाबत है जो धारा 107 के अधीन परिसमापन का आदेश किया गया है या जिसकी बाबत नामनिर्दिष्ट समिति या विशेष अधिकारी को धारा 81 के अधीन नियुक्त किया गया है, यथास्थिति, धारा 107 या धारा 81 के अधीन जारी किए गए आदेश की तारीख से छह वर्ष होगी ;

और

(घ) जब विवाद सोसाइटी के किसी पदाधिकारी के निर्वचन के संबंध में है, तब निर्वाचन के परिणाम की घोषणा की तारीख से दो मास होगी ।

(2) उपधारा (1) में वर्णित विवादों के भिन्न, जो धारा 96 के अधीन रजिस्ट्रार को निर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित है, किसी विवाद के मामले में परिसीमा की अवधि, भारतीय परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के उपबंधों द्वारा इस प्रकार विनियमित की जाएगी मानो कि विवाद एक वाद हो और रजिस्ट्रार एक सिविल न्यायालय ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, रजिस्ट्रार परिसीमा की अवधि की समाप्ति के पश्चात् किसी विवाद को ग्रहण कर सके गा, यदि आवेदक उसका समाधान कर देता है कि उसके पास ऐसी अवधि के भीतर, विवाद को निर्दिष्ट न करने के पर्याप्त कारण थे, और इस प्रकार ग्रहण किया गया विवाद एक ऐसा विवाद होगा जो इस आधार पर वर्जित नहीं किया जाएगा कि परिसीमा की अवधि समाप्त हो गई है ।

98. विवादों का निपटारा—(1) यदि रजिस्ट्रार का यह समाधान हो जाता है कि उसको निर्दिष्ट कोई मामला धारा 96 के अर्थ के भीतर विवाद है रजिस्ट्रार इस निमित्त बनाए गए नियमों के अध्यधीन स्वयं विवाद विनिश्चत करेगा या रजिस्ट्रार द्वारा नियुक्त किए गए नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड को निपटान के लिए इसे निर्दिष्ट करेगा:

परंतु कोई व्यक्ति जो किसी स्तर पर किसी विवाद या सोसाइटी से संबंधित है या प्रवर्तन सोसाइटी को निरीक्षित या34 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] इसके लेखाओं को संपरीक्षित किया गया है विवाद के निपटारे के लिए नामनिर्देशिती के रूप में या नामनिर्देशितियों के बोर्ड के सदस्य के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा ।

(2) जहां कोई विवाद रजिस्ट्रार के नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड के विनिश्चय के लिए उपधारा (1) के अधीन निर्दिष्ट किया जाता है, रजिस्ट्रार लिखित रूप में कारणों के लिए लेखबद्ध करते हुए, किसी समय पर उसके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड से विवाद प्रत्याह्रत कर सके गा और स्वयं विवाद विनिश्चित कर सके गा या उसके द्वारा नियुक्त किए गए किसी अन्य नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड को विनिश्चय के लिए फिर से इसे निर्दिष्ट कर सके गा ।

(3) धारा 96 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, रजिस्ट्रार, यदि वह ठीक समझे किसी विवाद के संबंध में कार्यवाहियां लंबित कर सके गा, यदि प्रश्न सोसाइटी और दावेदार के बीच या विभिन्न दावेदारों के बीच विवाद्यक पर है, विधि या तथ्य का जटिल प्रश्न अंतर्वलित हो रहा है, जब तक प्रश्न किसी एक पक्ष या सोसाइटी द्वारा संस्थित नियमित वाद द्वारा विचारित नहीं किया जाता है और यदि कोई ऐसा वाद कार्यवाहियां निलंबित करने के आदेश से रजिस्ट्रार द्वारा दो मास के भीतर संस्थित नहीं किया जाता है, रजिस्ट्रार ऐसी कार्रवाई करेगा जो उपधारा (1) में उपबंधित की गई है । 99. विवाद के निपटान के लिए प्रक्रिया और रजिस्ट्रार उसके नामनिर्देशिती या बोर्ड नामनिर्देशितियों के बोर्ड की शक्ति—(1) धारा 96 के अधीन विवाद की सुनवाई करने वाला रजिस्ट्रार या उसके नामनिर्देशिती या बोर्ड के नामनिर्देशितियों का बोर्ड विहित रीति में विवाद की सुनवाई करेगा और उसके पास हितबद्ध पक्षकारों या उनमें से कोई सहित साक्षियों की हाजिरी और उपस्थिति को प्रवृत्त करने की और उन्हें साक्ष्य देने के लिए बाध्य करने के लिए और दस्तावेजों को उसी प्रकार से पेश करने के लिए बाध्य करने की और यथासंभव शीघ्र उसी रीति में जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा सिविल न्यायालय के मामले में विहित की जाए, शक्ति होगी और

(2) सिवाय जहां विधि या तथ्य जटिल प्रश्न अंतर्वलित है, किसी विधिक व्यवसायी के रुप में उसकी क्षमता में विधिक व्यवसायी को या मुख्तारनामा धारण करने वाले व्यक्ति को विवाद की सुनवाई करने में किसी पक्षकार की ओर से उपस्थित होने की अनुज्ञा नहीं दी जाएगी ।

(3) यदि रजिस्ट्रार या उसके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड का यह समाधान कर दिया जाता है कि व्यक्ति चाहे वह सोसाइटी का सदस्य हो या नहीं उस व्यक्ति की संपत्ति में कोई हित अर्जित करता है, जो विवाद का पक्षकार है, तब वह व्यक्ति आदेश करेगा जो संपत्ति में हित अर्जित करता है वह विवाद में एक पक्षकार के रुप में सम्मिलित हो सके गा और कोई विनिश्चय रजिस्ट्रार या उसका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड द्वारा संदर्भ पर पारित किया जा सके गा जो इसमें सम्मिलित पक्षकारों पर बाध्यकर होगा, उसी रीति में जो यदि वह विवाद का मूल पक्षकार था ।

(4) जहां विवाद गलत व्यक्ति के नाम में संस्थित किया गया है या जहां सभी प्रतिवादी सम्मिलित नहीं किए हैं रजिस्ट्रार या उसका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड का, विवाद की सुनवाई करने के किसी स्तर पर यदि समाधान हो जाता है कि गलती सद् भावपूर्वक थी, किसी अन्य व्यक्ति को वादी या प्रतिवादी के रुप में प्रतिस्थापित या जोड़े जाने का आदेश, ऐसे निबंधनों पर जो वह उचित समझे, कर सके गा । (5) रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड, कार्यवाहियों के किसी स्तर पर, चाहे पक्षकार के आवेदन पर या उसके बिना और ऐसे निबंधनों पर जो यथास्थिति, रजिस्ट्रार या उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड को प्रतीत हो, न्यायपूर्ण होने के लिए, आदेश दे सके गा कि किसी पक्षकार का नाम उचित रुप में सम्मिलित हो गया है चाहे वह वादी या प्रतिवादी के रुप में काटा गया हो, और कि किसी व्यक्ति का नाम जो चाहे वादी या प्रतिवादी के रुप में सम्मिलित किया जाना चाहिए था या जिसकी उपस्थिति यथास्थिति रजिस्ट्रार, उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड के समक्ष रजिस्ट्रार, उनके नामनिर्देशिती या बोर्ड के नामनिर्देशिती को सहायता देने के लिए विवाद में अंतर्वलित सभी प्रश्नों पर विनिर्णय लेने और निपटान के लिए प्रभावपूर्ण रुप से और पूर्ण रुप से समर्थ बनाने के लिए आदेश में आवश्यक हो सके गा ।

(6) कोई व्यक्ति जो विवाद का पक्षकार है और उसी कारण हेतुक के बाबत एक या अधिक अनुतोष के लिए हकदार है ऐसे सभी या किसी अनुतोष का दावा कर सके गा, किं तु यदि वह सभी ऐसी दावों का लोप करता है, वह रजिस्ट्रार उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड की अनुज्ञा के सिवाय ऐसे लोप किए गए किसी अनुतोष के लिए अग्रनीत नहीं किया जाएगा ।

(7) उपधारा (4) से उपधारा (6) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, निम्नलिखित विवादों या विवादों के वर्ग यदि वादी की ऐसी वांछा है, रजिस्ट्रार उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड द्वारा ऐसी रीति में, जो विहित की जाए संक्षिप्त रूप से विनिश्चित किया जाएगा ।

(क) वचनपत्र, हुंडी, विनिमय पत्र या बांड पर ऋण की वसूली के लिए कोई विवाद ब्याज सहित या बिना ब्याज चाहे ऐसी लिखत के अधीन या उपविधियों के अधीन सहमत हो ;

35 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण

(ख) एक लिखित संविदा पर उद्भूत होने वाली एक नियत राशि या ब्याज संहित या बिना ब्याज के ऋण के प्रकृ ति की वसूली के लिए कोई विवाद;

(ग) विक्रीत या परिदत्त माल की कीमत की वसूली के लिए कोई विवाद, जहां दर क्वालिटी और मात्रा लिखित रूप में स्वीकृ त हो ;या

(घ) आवासन सोसाइटी के किसी सदस्य द्वारा गृह के संनिर्माण के लिए योगदान के लिए देय शोध्यों की वसूली के लिए कोई विवाद या कोई उधार, उधार पर ब्याज, भूमि का किराया, स्थानीय प्राधिकरण कर, निक्षेप निधि, जल प्रभार, विद्युत प्रभार, रखरखाव और अनुरक्षण प्रभार और सोसाइटी द्वारा दी गई सेवाएं और लिखित करार के अधीन या उपविधियों के अधीन संदेय ऐसे बकाया पर ब्याज के लिए किसी प्रभार के पुर्नसंदाय के बाबत कोई विवाद ।

(8) प्रतिवादी विवाद का बचाव करने का हकदार नहीं होगा जब तक कि वह यथास्थिति, रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड से ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, इजाजत प्राप्त नहीं करता ।

(9) रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड, उपधारा (8) के अधीन ऐसी शर्तों पर, जो वह या उसे उचित समझे, इजाजत अनुदत्त कर सके गा । (10). रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड विवाद के बचाव के लिए इजाजत देने से इंकार नहीं करेगा जब तक वह या उसका समाधान नहीं हो जाता कि प्रतिवादी द्वारा प्रकटित तथ्य यह नहीं इंगित करते कि उसने सारवान प्रतिवाद किया है या कि उनके द्वारा किया गया आशयित प्रतिवाद तुच्छ या तंग करने वाला है ।

(11) जहां प्रतिवादी ऐसी इजाजत प्राप्त करने के लिए असफल रहता है या ऐसी इजाजत के अनुसरण में विवाद में उपस्थिति होने या बचाव करने के लिए असफल रहता है, वादपत्र में किए गए प्रकथन और उसके साथ प्रस्तुत किए गए दस्तावेज प्रतिवादी द्वारा स्वीकार किए गए समझे जाएंगे :

परंतु रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड अपने विवेक से ऐसे स्वीकार किए गए किसी तथ्य को ऐसी स्वीकृ ति से अन्यथा साबित करने की अपेक्षा कर सके गा ।

(12). जहां शर्तें जिन पर बचाव की इजाजत अनुदत्त की जाती है, प्रतिवादी द्वारा अनुपालित नहीं की जाती है यथास्थिति, रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड उसके विरुद्ध अधिनिर्णय पारित कर सके गा, जैसा यदि ऐसी इजाजत अनुदत्त नहीं दी गई है । (13). यथास्थिति, रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड विशेष परिस्थितियों के अधीन उनके द्वारा या उसे पारित किए गए अधिनिर्णय को अपास्त कर सके गा और यदि आवश्यक हो, निष्पादन को रोक या अपास्त कर सके गा और प्रतिवादी को विवाद में उपस्थित होने और बचाव करने के लिए इजाजत अनुदत्त कर सके गा, यदि उसे ऐसा करना युक्तियुक्त लगता हो और ऐसे निबंधनों पर जो वह या उसे उचित समझे ।

100. अधिनिर्णय के पहले कु र्की—(1) जहां विवाद, धारा 98 या धारा 110 के अधीन रजिस्ट्रार या उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड को निर्दिष्ट किया जाता है, या जबकि रजिस्ट्रार या धारा 93 के अधीन प्राधिकृ त व्यक्ति, उस व्यक्ति की सुनवाई करता है जिसके विरुद्ध प्रभार उस धारा के अधीन विरचित किए गए हैं, रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड या यथास्थिति धारा 93 के अधीन ऐसे प्राधिकृ त व्यक्ति का यदि जांच या अन्यथा पर समाधान हो जाता है कि ऐसे विवाद का पक्षकार या जिसके विरुद्ध कार्यवाहियां धारा 93 के अधीन लंबित है किसी अधिनिर्णय के निष्पादन को विफल, विलंब या बाधा डालने का आश्य या किसी आदेश को कार्यान्वित करने में, --

(क) संपूर्ण संपत्ति या उसके किसी भाग का निपटान करने वाला है ;या

(ख) संपूर्ण संपत्ति या उसके किसी भाग को उसकी अधिकारिता से हटाने वाला है, रजिस्ट्रार, जब तक कि पर्याप्त प्रतिभूति न दे दी जाए, उक्त संपत्ति को सशर्त कु र्क करने का निदेश दे सके गा और ऐसी कु र्की का वही प्रभाव होगा जो यदि सक्षम सिविल न्यायलय द्वारा की गई होती ।

(2) जहां संपत्ति कु र्क करने के लिए निदेश उपधारा (1) के अधीन जारी किया जाता है, वहां रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड या धारा 93 के अधीन प्राधिकृ त व्यक्ति उस व्यक्ति को सूचना जारी करेगा जिसकी संपत्ति ऐसी अवधि के भीतर जो सूचना में विनिर्दिष्ट की जाए ऐसी प्रतिभूति देने के लिए ऐसे कु र्क की जाती है और यदि व्यक्ति ऐसी मांग पर प्रतिभूति देने में असफल रहता है तो यथास्थिति, रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड या धारा 93 के अधीन प्राधिकृ त व्यक्ति आदेश की पुष्टि कर सके गा और विवादों में विनिश्चय और उपधारा (1) में निर्दिष्ट कार्यवाहियों के पूरा करने के पश्चात् दावे के प्रति ऐसी कु र्क संपत्ति के निपटान के लिए निर्देश किया जा सके गा, यदि यह अधिनिर्णीत है ।

(3) इस धारा के अधीन की गई कु र्की उन व्यक्तियों की संपत्ति की कु र्की से पहले विद्यमान अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगी जो कु र्की के संबंध में कार्यवाहियों के पक्षकार नहीं है, या ऐसी कु र्की को पहले डिक्री धारण करने वाले किसी व्यक्ति को वर्जित नहीं करेंगे जिस व्यक्ति की संपत्ति के विरुद्ध ऐसी डिक्री36 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] के निष्पादन में कु र्की के अधीन संपत्ति के विक्रय के लिए आवेदन करने में ऐसी कु र्की की जाती है ।

101. रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड—(1) जब विवाद, रजिस्ट्रार को विनिश्चय के लिए निर्दिष्ट किया जाता है यथास्थिति वह या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड विवाद के पक्षकारों को सुनवाई के लिए युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् यथास्थिति, रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड विवाद पर कार्यवाहियों से संबंधित विवाद के पक्षकारों द्वारा उपगत व्ययों और फीस और संदेय व्ययों पर, अधिनिर्णय कर सके गा और ऐसा अधिनिर्णय इस आधार पर के वल अमान्य नहीं होगा कि यह रजिस्ट्रार द्वारा विवाद का विनिश्चय करने के लिए नियत अवधि की समाप्ति के पश्चात् किया गया था और अपील या पुनर्विलोकन का पुनरीक्षण के अध्यधीन विवाद के पक्षकारों पर बाध्यकर होगा । (2) यथास्थिति, रजिस्ट्रार या उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों का बोर्ड पक्षकारों की सुनवाई करने के पहले उसकी या उनकी राय में, फीस के संदाय सहित व्ययों के पूरा करने के लिए युक्तियुक्त समझे जाए, ऐसी राशि के निक्षेप के लिए ऐसे विवाद के पक्षकार या पक्षकारों से अपेक्षा कर सके गा, उसकी उपधारा (1) के अधीन किए गए अधिनिर्णय के अनुसरण में, यथास्थिति, रजिस्ट्रार या उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों का बोर्ड को संदाय हो सके गा ।

(3) रजिस्ट्रार, कार्रवाई के कारण की प्रकृ ति और विवाद की विषय-वस्तु को ध्यान में रखते हुए, अनुतोष की प्रकृ ति जो कि विवाद में दावा की जा सके और ऐसे अन्य विषयों की साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट कर सके गा, फीस का स्तर और व्यय उपधारा (1) के अधीन किए गए अधिनिर्णय द्वारा या के अधीन जो यथास्थिति उसे या उसके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों का बोर्ड को संदाय किया जा सके गा । 102. रजिस्ट्रार या उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड के विनिश्चय के विरुद्ध अपील—धारा 101 के अधीन य़ा धारा 100 के अधीन पारित किए गए किसी आदेश से, यथास्थिति रजिस्ट्रार या उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड के किसी विनिश्चय द्वारा व्यथित कोई पक्षकार, विनिश्चय या आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर, अधिकरण को अपील कर सके गा :

परंतु अपील अधिकरण साठ दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात् कोई अपील ग्रहण कर सके गा, यदि उसका समाधान हो जाता है कि उसके पास उस अवधि के भीतर इसे फाइल न कर पाने का पर्याप्त कारण था ।

103. धन कै से वसूला जाए—रजिस्ट्रार या धारा 93 के अधीन उनके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति द्वारा या धारा 100 या धारा 101 के अधीन रजिस्ट्रार, उनका नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों का बोर्ड द्वारा पारित किया गया प्रत्येक आदेश, धारा 110 के अधीन समापक द्वारा पारित किया गया प्रत्येक आदेश, धारा 110 के अधीन पारित किए गए आदेश के विरुद्ध अपील में प्रशासक द्वारा पारित किया गया प्रत्येक आदेश और धारा 128 के अधीन पुनरीक्षण में पारित किया गया प्रत्येक आदेश, यदि कार्यान्वित नहीं किया गया तो,- (क) रजिस्ट्रार या समापक द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र पर, सिविल प्रक्रिया संहिता,1908 (1908 का 5) की धारा 2 के खंड (2) में यथापरिभाषित सिविल न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा और ऐसे न्यायालय की डिक्री के रूप में ऐसी रीति में निष्पादित किया जाएगा ; या

(ख) भू-राजस्व संहिता या प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि और भू-राजस्व के बकाया की वसूली के लिए तत्समय प्रवृत्त तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अनुसार निष्पादित होना :

परंतु कोई आवेदन किसी ऐसी राशि की ऐसी रीति में वसूली के लिए कलेक्टर को किया जाएगा और रजिस्ट्रार या किसी सहायक रजिस्ट्रार द्वारा जिसको उक्त शक्ति रजिस्ट्रार द्वारा प्रत्यायोजित की गई है, द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र द्वारा संलग्न किया जाएगा और ऐसा आवेदन आदेश में नियत तारीख से बारह वर्ष के भीतर और यदि कोई ऐसी तारीख नियत नहीं है तो आदेश की तारीख से किया जाएगा । 104. प्रमाणपत्र के जारी करने के पश्चात् की गई संपत्ति का प्राइवेट अंतरण सोसाइटी के विरुद्ध शून्य—धारा 103 के अधीन, यथास्थिति रजिस्ट्रार, समापक या सहायक रजिस्ट्रार के प्रमाणपत्र जारी करने के पश्चात् बनाई गई या सृजति की गई संपत्ति पर कोई प्राइवेट अंतरण या परिदान या विल्लंगम या प्रभार सोसाइटी के विरुद्ध अकृ त और शून्य होंगे जिसके आवेदन पर उक्त प्रमाणपत्र जारी किया गया था ।

105. संपत्ति का अंतरण जो विक्रीत नहीं किया जा सकता—(1) जब धारा 103 के अधीन निष्पादित किए जाने के लिए ईप्सित आदेश के निष्पादन में कोई संपत्ति क्रे ता के अभाव में विक्रीत नहीं की जा सकती, यदि ऐसी संपत्ति धारा 103 के खंड (क) या खंड (ख) के अधीन रजिस्ट्रार, समापक या सहायक रजिस्ट्रार के प्रमाणपत्र के जारी करने के पश् चात् व्यतिक्रमी द्वारा सृजित हक के अधीन दावा करने वाले व्यतिक्रमी, या उसके बाबत कु छ व्यक्ति या कु छ व्यक्ति संपत्ति के अधिभोग में है यथास्थिति, न्यायालय या कलक्टर या रजिस्ट्रार उक्त संपत्ति या उसके भाग के लिए निदेश दे सके गा, सोसाइटी को अंतरित की जाएगी जिसे विहित रीति में, उक्त आदेश के निष्पादन के लिए लागू किया गया है ।

(2) जहां संपत्ति उपधारा (1) के अधीन सोसाइटी को अंतरित की जाती है या धारा 103 के उपबंधों के अधीन विक्रीत की जाती है, यथास्थिति, न्यायालय कलेक्टर या37 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण रजिस्ट्रार, नियमों के अनुसार अंतरित या विक्री संपत्ति के कब्जे में यथास्थिति सोसाइटी या क्रे ता रख सके गा ।

(3) इन निमित्त बनाए गए नियमों किसी व्यक्ति से किसी अधिकार, विल्लंगम, प्रभार या इक्विटी के अध्यधीन ऐसी संपत्ति या उसका कोई भाग उपधारा (1) के अधीन उक्त सोसाइटी द्वारा ऐसा निबंधनों और शर्तों पर जैसा यथास्थिति न्यायालय, कलेक्टर या रजिस्ट्रार के बीच करार पाया जाए, धारित करेगा और उक्त सोसाइटी प्रशासक, कलेक्टर या रजिस्ट्रार के साधारण या विशेष, आदेश के अध्यधीन सहायक या उप-कलेक्टर या सहायक रजिस्ट्रार की पंक्ति से नीचे का न हो, इस धारा के अधीन कलेक्टर या रजिस्ट्रार द्वारा प्रयोग की जाने योग्य शक्तियां हो, को प्रत्यायोजित कर सके गा ।

106. फसल उधारों की वसूली—(1) धारा 96, धारा 98 और धारा 103 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, सोसाइटी द्वारा किए गए आवेदन पर जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन यथापरिभाषित फसलों का वित्तपोषण और मौसमी वित्तपोषण का कार्य करती है, या इसके द्वारा फसलों के वित्तपोषण, मौसमी वित्तपोषण या मध्यम अवधि वित्तपोषण के अनुक्रम में अपने किन्हीं सदस्यों में से किसी से किसी राशि के बकाया की वसूली के लिए मध्यम अवधि वित्तपोषण का कार्य करती है, और इसके बकाया के बाबत लेखाओं का विवरण प्रस्तुत करने पर, रजिस्ट्रार ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे बकाया के रुप में देय होने वाली इसमें विवरणित रकम की वसूली के लिए प्रमाणपत्र अनुदत्त कर सके गा । स्पष्टीकरण-- इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, "मध्यम अवधि वित्तपोषण" पद से अभिप्रेत है कृ षि, मत्स्य, पशुपालन, मुर्गी पालन, दुग्ध उत्पादन और उद्योग से संबंधित उत्पादन के किसी प्रयोजन के लिए उधार की अग्रसरता है ऐसा उधार तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन "फसलों का वित्तपोषण" और "मौसमी वित्तपोषण" पद की परिभाषाओं में विनिर्दिष्ट रीति से भिन्न प्रतिसंदेय होता है ।

(2) यदि सोसाइटी उपधारा (1) में निर्दिष्ट उस उपधारा के अधीन आवेदन करने में असफल रहती है, तब, यदि ऐसी सोसाइटी किसी सहकारी वित्तीय बैंक की सदस्य है ऐसी सहकारी वित्तीय बैंक ऐसी कार्रवाई करने के लिए ऐसी सोसाइटी को निदेश दे सके गा और यदि सोसाइटी ऐसे निदेशन के अनुसरण में कार्रवाई करने में असफल रहता है तब सहकारी वित्तीय बैंक सोसाइटी की ओर से उपधारा (1) के अधीन आवेदन स्वयं कर सके गा ।

(3) जहां रजिस्ट्रार का समाधान हो जाता है कि सोसाइटी या सहकारी वित्तीय बैंक जिसको ऐसी सोसाइटी संबंद्ध है उपधारा (1) के अधीन आवेदन करने में असफल रहता है या यथास्थिति, ऐसे बकाया के बाबत उपधारा (2) के अधीन, रजिस्ट्रार, स्वप्रेरणा से ऐसी जांच करने के पश् चात् जो वह ठीक समझे, ऐसे बकाया के रुप में देय होने वाली इसमें कथित रकम की वसूली के लिए प्रमाणपत्र अनुदत्त कर सके गा और ऐसा प्रमाणपत्र संबंद्ध सोसाइटी द्वारा किए गए आवेदन पर ऐसे जारी किया गया समझा जाएगा ।

(4) उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा अनुदत्त प्रमाणपत्र अंतिम और इसमें देय होने वाली बकाये के लिए निश्चायक सबूत होगा जो भू-राजस्व संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि और भू-राजस्व की वसूली के लिए तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अनुसार वसूली योग्य होंगे ।

(5) कलेक्टर और रजिस्ट्रार के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वे भू-राजस्व संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन विनिर्दिष्ट पूर्वावधानी उपाय करें, जब तक कि सोसाइटी को देय बकाया ब्याज और ऐसे बकाया की वसूली में उपगत किसी आकस्मिक प्रभार के साथ संदत्त है, या ऐसे बकाया के संदाय के लिए प्रतिभूति रजिस्ट्रार की तुष्टि के लिए दी जाती है।

अध्याय 10

परिसमापन

107. परिसमापन—(1) उपधारा (2) में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, यदि रजिस्ट्रार,-

(क) धारा 86 के अधीन कोई जांच किए जाने या धारा 87 या धारा 88 के उपबंधों के अधीन कोई निरीक्षण किए जाने के पश्चात् या सोसाइटी के लेखाओं की संपरीक्षा करने वाले संपरीक्षक की रिपोर्ट पर;

(ख) इस प्रयोजन के लिए बुलायी गई विशेष साधारण बैठक पर उपस्थित सोसाइटी के तीन-चौथाई सदस्यों द्वारा कार्यान्वित किए संकल्प पर किए गए

आवेदन की प्राप्ति पर; या

(ग) स्वप्रेरणा से, सोसाइटी की दशा में,जिसमें- (i) कार्य आरंभ नहीं किया है;

(ii) कार्य समाप्त किया है;

(iii) शेयरों या सदस्यों की निक्षेप राशि पांच हजार से अधिक नहीं है ;या

(iv) इस विनियम या नियमों या उपविधियों को रजिस्ट्रीकरण और प्रबंधन के संबंध में किसी शर्त का अनुपालन करना समाप्त कर दिया है,

वह सोसाइटी को अभ्यावेदन करने का अवसर देने के पश्चात् उसका परिसमापन करने का निदेश देने वाला आदेश कर सके गा ।

(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी यदि जहां सोसाइटी के सदस्यों ने, सोसाइटी के ऋण और आस्तियों में अग्रनीत दायित्वों का निर्वहन करने के पश्चात्,38 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] इस प्रयोजन के लिए बुलाई गई विशेष साधारण बैठक में उपस्थित सोसाइटी के सदस्यों की तीन चौथाई बहुसंख्या द्वारा कार्यान्वित संकल्प पर, स्वप्रेरणा से सोसाइटी का परिसमापन के लिए संकल्प करती है और रजिस्ट्रार के लिए संकल्प प्रवहित करेगा और रजिस्ट्रार धारा 115 के उपबंधों के अनुसार अधिशेष आस्तियों का निपटान करने के पश् चात्, धारा 21 के अधीन ऐसी सोसाइटी का रजिस्ट्रीकरण रद्द करेगा । (3) जहां अंतरिम आदेश उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (ग) के उपखंड (iv) में विनिर्दिष्ट आधार पर किया जाता है, उसकी प्रति ऐसे आदेश के जारी होने की तारीख से एक मास की अवधि के भीतर रजिस्ट्रार को अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के लिए कहते हुए सोसाइटी को विहित रीति में, संसूचित की जाएगी ।

(4) रजिस्ट्रार सोसाइटी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, अंतिम आदेश को बातिल करते या पुष्टि करते हुए, अंतिम आदेश कर सके गा ।

108. समापक की नियुक्ति—(1) जब सोसाइटी के परिसमापन के लिए धारा 107 के अधीन कोई अंतरिम या अंतिम आदेश किया जाता है, रजिस्ट्रार इस विनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार, सोसाइटी का समापक होने के लिए व्यक्ति की नियुक्ति और उसका पारिश्रमिक नियत कर सके गा ।

(2) जहां तक अंतरिम आदेश किया जाता है, सोसाइटी के अधिकारी सभी संपत्ति, चीजवस्तु और अनुयोज्य दावे की जिसकी सोसाइटी हकदार है या हकदार प्रतीत होती है और सोसाइटी के कारबार से संबंध रखने वाली सभी पुस्तकों अभिलेखों और अन्य दस्तावेजों की अभिरक्षा और नियंत्रण समापक को सौंप दिया जाएगा और उनमें से किसी तक उनकी पहुंच नहीं होगी ।

(3) जब अंतरिम आदेश की पुष्टि करते हुए अंतिम आदेश दिया जाता है तब सोसाइटी के अधिकारी

(क) सोसाइटी के कारबार से संबंध रखने वाली सभी संपत्ति, चीजवस्तु और अनुयोज्य दावे और कोई पुस्तक, अभिलेख और अन्य दस्तावेजों जिसे किसी कारण से, उस समय पर जब अंतरिम आदेश किया गया था उपधारा (2) के अधीन समापक को सौंपा नहीं है की अभिरक्षा और नियंत्रण समापक को सौंप दिए जाएंगे ; और

(ख) अपने कार्यालय रिक्त कर देंगे और परिसमापन आदेश प्रवृत्त रहने के दौरान सोसाइटी का साधारण निकाय किसी शक्ति का प्रयोग नहीं करेगा ।

(4) समापक, रजिस्ट्रार के साधारण नियंत्रण के अध्यधीन, धारा 110 में वर्णित सभी या किसी शक्ति का प्रयोग करेगा और रजिस्ट्रार कोई कारण दिए बिना उसको उसके पद से हटा सके गा और उसके स्थान पर अन्य को नियुक्त कर सके गा।

(5) सोसाइटी की संपूर्ण आस्तियां, समापक की नियुक्ति पर उसमें निहित होगी और तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यदि कोई अमूर्त संपत्ति सोसाइटी की ओर से उसके द्वारा धारित की जाती है, जैसे ही उसके कार्यालय के नाम का नामांतरण कर दिया जाता है भूमि पर हक पूरा हो जाएगा और कोई न्यायालय बेकब्जा होना, कब्जे का अभाव या कब्जे के भौतिक परिदान के आधार पर हक पर प्रश्न नहीं उठाएगी ।

(6) अंतरित आदेश रिक्त होने की स्थिति में, समापक सोसाइटी की संपत्ति, चीजवस्तु, अनुयोज्य दावे, पुस्तकों, अभिलेख और अन्य दस्तावेजों को उन अधिकारियों को सौंप देगा, जिन्होंने उसको और किए गए कार्यों को परिदत्त किया था और समापक द्वारा की गई कार्रवाई, सोसाइटी पर बाध्यकारी होगी और ऐसी कार्यवाहियां, धारा 107 के अधीन अंतरिम आदेश के रिक्त होने के पश्चात्, सोसाइटी के अधिकारियों द्वारा जारी रखी जाएगी ।

109. परिसमापन के आदेश के विरुद्ध अपील—(1) समिति या सोसाइटी का कोई सदस्य परिसमापन करने का आदेश दिया गया है, अपील धारा 107 के अधीन किए गए आदेश की सोसाइटी को संसूचना की तारीख से दो मास के भीतर, यदि आदेश रजिस्ट्रार अपर रजिस्ट्रार या संयुक्त रजिस्ट्रार द्वारा दिया जाता है तो प्रशासक को या यदि आदेश किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जिसको रजिस्ट्रार की शक्तियां प्रदान की जाती है तो रजिस्ट्रार को, कर सके गी :

परंतु धारा 107 की उपधारा (1) के खंड (ग) उपखंड (i) या उपखंड (ii) या उपखंड (iii) के अधीन जारी किए गए किसी आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जाएगी :

परंतु यह और कि अपील पर रजिस्ट्रार द्वारा पारित किए गए आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जाएगी ।

(2) इस धारा के अधीन कोई अपील सदस्य से ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक यह अपील की सुनवाई के खर्चों के लिए किसी प्रतिभूति के रुप में ऐसी राशि द्वारा, जो विहित की जाए संलग्न नहीं की जाती है ।

110. समापक की शक्तियां—धारा 108 के अधीन नियुक्त समापक को, नियमों और रजिस्ट्रार के साधारण पर्यवेक्षण नियंत्रण, और निदेश के अध्यधीन, शक्तियां होगीं,- (क) सोसाइटी की ओर, सिविल या आपराधिक, वादों और अन्य कार्यवाहियों को अपने पदनाम से संस्थित करना और उनकी प्रतिरक्षा करना;

(ख) सोसाइटी का उतना कारबार करना, जितना उसके फायदाप्रद परिसमापन के लिए आवश्यक हो ;

39 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण

(ग) किसी व्यक्ति या निगमित निकाय को संपूर्ण या उसका भाग अंतरण करने की शक्ति के साथ लोक नीलामी या प्राइवेट संविदा द्वारा सोसाइटी की अमूर्त और मूर्त संपत्ति और अनुयोज्य दावों का विक्रय करना या पार्सल में उसी प्रकार से विक्रय करना ;

(घ) सोसाइटी की आस्तियों की प्रतिभूति पर, कोई धन अपेक्षित हो, ऊं चा करना;

(ड.) सोसाइटी के विरुद्ध दावों का अन्वेषण करना और इस विनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, ऐसे दावों में उठने वाले पूर्विकता के प्रश्नों का विनिश्चय करना और ऐसे ऋण की रकम के अनुसार पूर्ण रुप से या अनुपाततः में लेनदार के किसी वर्ग या लेनदारों को संदाय करना, अधिशेष को रजिस्ट्रार द्वारा अनुमोदित दर पर परिसमापन की तारीख से, किं तु जो संविदा दर से अधिक न हो, ब्याज के संदाय में उपयोजित करना;

(च) लेनदारों या लेनदार होने का दावा करने वाले व्यक्तियों या कोई ऐसा दावा, उस समय या भविष्य में जिसके द्वारा सोसाइटी दायी हो सकती है, उनको रखने वाले या रखने का अभिकथन करने वाले व्यक्तियों के साथ कोई समझौता या ठहराव करना ;

(छ) सभी मांगों या मांगो और ऋणों के प्रति दायित्वों और ऋणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले दायित्वों तथा वतर्मान या भविष्य के निश्चित या आकस्मिक सभी दावों से, जो सोसाइटी और किसी अभिदायी या अभिकथित अभिदायी या अन्य ऋणी या सोसाइटी के प्रति दायित्व की आशंका करने वाले व्यक्ति के बीच विद्यमान है या जिनका विद्यमान होना अनुमित है, और सोसाइटी की आस्तियों या उसके परिमापन से किसी प्रकार संबंधित या उस पर प्रभाव डालने वाले सभी प्रश्नों से ऐसे निबंधनों पर, जो तय किए जाएं, समझौता करना और किसी ऐसी मांग, दायित्व, ऋण या दावे के उन्मोचन के लिए कोई प्रतिभूति लेना और उसका पूर्ण रूप से उन्मोचन करना ;

(ज) दावे का उत्तर देने के लिए अवसर देने के पश् चात्, समय-समय पर, सदस्यों या भूतपूर्व सदस्यों द्वारा या मृत सदस्यों की संपदाओं या नामनिर्देशितियों, वारिसों या विधिक प्रतिनिधियों द्वारा या किन्हीं अधिकारियों या भूतपूर्व अधिकारियों या मृत अधिकारियों की संपदाओं या नामनिर्देशितियों, वारिस या विधिक प्रतिनिधियों द्वारा सोसाइटी की आस्तियों में किए जाने वाले या किए जाने के लिए शेष अभिदाय का अवधारण करना, ऐसा अभिदाय ऐसे सदस्यों या अधिकारियों से देय ऋणों को सम्मिलित करके होना चाहिए ;

(झ) धारा 103 के अधीन आवेदन करना;

(ञ) स्वयं से या उनके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के बोर्ड द्वारा विनिश्चय के लिए रजिस्ट्रार को विवाद निर्दिष्ट करना ;

(ट) यह अवधारण करना कि समापन के खर्चों को किन व्यक्तियों द्वारा और किन अनुपातों में वहन किया जाएगा;

(ठ) वह समय या समयों को नियत करना जिसके भीतर लेनदार, व ऋण या दावे जो पहले साबित किए गए है अपने ऋण और दावों को किसी वितरण के फायदों को सम्मिलित करते हुए साबित करेगा ;

(ज) साक्षियों की उपस्थिति के लिए समन और हाजिर कराना और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय के वाद में यथाउपबंधित उसी अर्थ और उसी रीति द्वारा सोसाइटी से संबंधित या उसकी अभिरक्षा में रखी गई किसी पुस्तकों, लेखाओं, दस्तावेजों नगद या अन्य संपत्ति को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करना ;

(ढ) सभी कृ त्य करना और सोसाइटी के नाम पर और उसकी ओर से सभी विलेखों रसीदों और अन्य दस्तावेज जो ऐसे परिसमापन के लिए आवश्यक हों, का निष्पादन करना;

(ण) ऐसी कार्रवाई करना जो धारा 20 के अधीन आवश्यक हो, रजिस्ट्रार के पूर्व अनुमोदन से, यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि सोसाइटी पुनर्निमित हो सकती है ।

111. परिसमापन के आदेश का प्रभाव—(1) धारा 107 की उपधारा (3) के अधीन किए गए आदेश के विरुद्ध धारा 109 के अधीन की गई अपील के लिए अवधि समाप्ति के पश्चात् या जहां अपील खारिज की गई है, परिसमापन के लिए आदेश प्रभावी होगा और सभी लेनदारों और सभी अभिदाताओं के पक्ष में जो यदि यह लेनदारों और अभिदाताओं की संयुक्त याचिका पर किया गया है प्रवर्तित होगा ।

(2) जब परिसमापन का आदेश प्रभावी होता है, समापक विक्रय या अन्य द्वारा, सोसाइटी की आस्तियों की वसूली के लिए कार्यवाही करेगा और कोई विवाद प्रारंभ नहीं किया जाएगा या यदि आदेश परिसमापन की तारीख पर लंबित है, रजिस्ट्रार की अनुमति के सिवाय, सोसाइटी के विरुद्ध कार्यवाहियां होगी और ऐसे निबंधनों के अध्यधीन रहते हुए जो रजिस्ट्रार अधिरोपित कर सके गा और रजिस्ट्रार तथापि, स्वप्रेरणा से, सोसाइटी द्वारा या विरुद्ध किसी विवाद को ग्रहण या निपटान कर सके गा ।

112. परिसमापन और मामलों के विघटन वाद का वर्जन—इस विनियम में अभिव्यक्त रूप से उपबंधित के सिवाय, कोई सिविल न्यायालय इस विनियम के अधीन सोसाइटी के परिसमापन और विघटन से संबंधित किसी मामले का संज्ञान नहीं लेगा और जब परिसमापन आदेश किया गया है कोई वाद40 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] या अन्य विधिक कार्यवाहियां, रजिस्ट्रार की अनुमति के सिवाय, और ऐसे निबंधनों पर जो वह अधिरोपित करे, सोसाइटी या समापक के विरुद्ध नहीं की जाएगी या न कार्यवाही होगी ।

परंतु जहां परिसमापन आदेश रद्द किया जाता है, इस धारा के उपबंध जहां तक सोसाइटी और उसके सदस्यों जो वाद चलाने के दायित्व से संबंधित है, का प्रवर्तन समाप्त हो जाएगा, किं तु वे उस व्यक्ति पर लागू होते रहेंगे जो समापक के रुप में कृ त्य करते हैं ।

113. समापकों के लेखाओं की संपरीक्षा—(1) समापक, अपने कार्यकाल के दौरान, ऐसे समयों पर, जो विहित किया जाए, किं तु प्रत्येक वर्ष, में दो बार से कम नहीं, रजिस्ट्रार को, समापन उसकी रसीद और संदाय के रुप में विहित प्ररुप में लेखा प्रस्तुत करेगा और रजिस्ट्रार लेखाओं की संपरीक्षा ऐसी रीति में जो वह ठीक समझे करवाएगा और संपरीक्षा के प्रयोजन के लिए समापक, रजिस्ट्रार की ऐसे वाउचर और सूचना देगा जो वह या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति अपेक्षा करे ।

(2) समापक संपरीक्षित लेखाओं का सारांश तैयार करवाएगा, और प्रत्येक अभिदाता को ऐसे सारांश की प्रति भेजेगा ।

(3) समापक, ऐसी फीस जो रजिस्ट्रार विहित रीति में उसके द्वारा रखी गई पुस्तकों के लेखाओं की संपरीक्षा के लिए निदेश करे, का संदाय करेगा ।

(4) समापक किसी अनियमितता के लिए दायी होगा जो सोसाइटी के मामलों का प्रभाव उनके द्वारा लेने के पश्चात् संव्यवहार के बाबत संपरीक्षा के अनुक्रम में या परिणामस्वरुप पाई जाती है, उसके विरुद्ध कार्यवाही की जा सके गी जो यदि वह धारा 93 के अधीन की जा सकने वाली कार्रवाई के विरुद्ध कृ त्य था :

परंतु कोई ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी जब तक अनियमितताओं से सोसाइटी की हानि कारित हुई हो या कारित होने की संभावना हो, और कर्तव्यों और कृ त्यों को कार्यान्वित करने में समापक द्वारा सकल नुकसानी और लोप के कारण देय उपगत हुए हो ।

114. समापन कार्यवाहियों का पर्यवसान—(1) किसी सोसाइटी का समापन कार्यवाहियों के समापन के आदेश की तारीख से पांच वर्ष के भीतर बंद किया जाएगा, जब तक अवधि रजिस्ट्रार द्वारा विस्तारित नहीं की जाती है :

परंतु रजिस्ट्रार एक समय में एक वर्ष और कु ल मिलाकर पांच वर्ष से अधिक अवधि के लिए कोई विस्तारण अनुदत्त नहीं किया जाएगा और सोसाइटी के समापन के लिए आदेश की तारीख से दस वर्ष की समाप्ति के पश्चात् तत्काल यह समझा जाएगा कि समापन कार्यवाही पर्यवसित कर दी गई है और समापक कार्यवाहियों के पर्यावसान करने के लिए आदेश पारित करेगा ।

स्पष्टीकरण – इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि ऐसी सोसाइटी के मामले में जो इस विनियम के प्रारंभ की तारीख पर समापन के अधीन है, सोसाइटी के परिसमापन के आदेश को उक्त तारीख पर पारित किए गए इस धारा के प्रयोजन के लिए समझा जाएगा । (2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, रजिस्ट्रार समापक से अंतिम रिपोर्ट की प्राप्ति पर समापन कार्यवाहियों का पर्यवसान करेगा और समापक की अंतिम रिपोर्ट कथित करेगी कि सोसाइटी की समापन कार्यवाहियां बंद कर दी गई हैं और यह भी कथित करेगा कि परिसमापन कै से संचालित किया गया है और सोसाइटी की संपत्ति का और दावों का निपटान कर दिया गया है, और समापन की लागत सहित, रकम यदि कोई हो परिसमापन के लेखा के सारांश दिखाने वाला एक विवरण सम्मिलित होगा, सदस्यों के शेयर या ब्याज सहित अपने दायित्वों का संदाय करने के पश्चात् सोसाइटी के नाम जमा करेगा और सुझाव देगा कि कै से अधिशेष उपयोजित किया जाना चाहिए ।

(3) रजिस्ट्रार समापक से अंतिम रिपोर्ट की प्राप्ति पर, रिपोर्ट को अभिलिखित करने के लिए रजिस्ट्रार के सदस्यों की साधारण बैठक का संयोजन करने के लिए समापक को निदेश देगा ।

115. अधिशेष आस्तियों का निपटान—सोसाइटी के समापक की अंतिम रिपोर्ट में दर्शायी गई कोई अधिशेष आस्ति जिसका परिसमापन किया गया है, अपने सदस्यों में से विभाजित नहीं की जाएगी, किं तु सोसाइटी की उपविधियों में विहित किसी उद्देश्य या उद्देश्यों के लिए समर्पित होंगे, यदि वे विनिर्दिष्ट करें कि ऐसा कोई अधिशेष विशिष्ट प्रयोजन के लिए उपयोजित किया जाएगा और जहां सोसाइटी की, कोई ऐसी उपविधियां नहीं हैं, अधिशेष रजिस्ट्रार में निहित होगा, जो जिसे न्यास में रखेगा और इसे नई रजिस्ट्रीकृ त सोसाइटी की आरक्षित निधि को अंतरित करेगा, उसी उद्देश्य से और अधिक और कम क्षेत्र में तामील करना जिस सोसाइटी को अधिशेष की तामील की गई थी :

परंतु, जहां कोई ऐसी सोसाइटी विद्यमान या सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण के रद्दकरण के तीन वर्ष के भीतर रजिस्ट्रीकृ त नहीं है वहां अधिशेष रजिस्ट्रार में निहित है, रजिस्ट्रार अधिशेष ऐसी रीति में जो वह सर्वोत्तम समझे निम्नलिखित में या सभी में वितरित कर सके गा, अर्थात्

(क) जो धारा 114 के अधीन आयोजित साधारण बैठक में सदस्यों द्वारा सिफारिश की जाए या जहां सोसाइटी के कृ त्य को समाप्त कर दिया है इसके अभिलेख उपलब्ध नहीं है या इसका कोई सदस्य नहीं आ रहा है जो रजिस्ट्रार उचित समझे लोक उपयोगिता और स्थानीय हित के उद्देश्य में;

41 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण

(ख) परिसंघीय सोसाइटी को उसी उद्देश्य से जिसको रद्द की गई सोसाइटी की संबंद्ध करने के लिए पात्र थी ;और (ग) पूर्त विन्यास अधिनियम, 1890 (1890 का 6) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी पूर्त प्रयोजन में है ।

अध्याय 11

बीमाकृ त सहकारी बैंक

116. बीमाकृ त सहकारी बैंक की समिति आदि के परिसमापन, पुननिर्माण, अधिक्रमण के लिए आदेश, रिजर्व बैंक की मंजूरी या अध्यपेक्षा के बिना नहीं किया जाता है— इस विनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, बीमाकृ त सहकारी बैंक की दशा में.—

(क) बैंक के समझौता या ठहराव या समामेलन या पुननिर्माण (प्रभाग और पुनर्गठन सहित) की स्कीम के परिसमापन के आदेश और मंजूरी करने का आदेश के वल रिजर्व बैंक की लिखित रुप में पूर्व मंजूरी से किया जा सके गा ;

(ख) बैंक के परिसमापन का आदेश. रजिस्ट्रार दवारा यदि अपेक्षित हो निक्षेप बीमा और प्रत्यय गांरटी निगम अधिनियम 1961 (1961 का 47) की धारा 13 घ में निर्दिष्ट परिस्थितियों में रिजर्व बैंक या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा किया जा सके गा;

(ग) रजिस्ट्रार सहकारी बैंक के अधिक्रमण और परिसमापन सहित रिजर्व बैंक द्वारा दिया गया विनियामक चिरभोग का कार्यान्वयन सुनिश्चित करेगा और विशेष अधिकारी या समापक को जो रिजर्व बैंक द्वारा ऐसी सलाह दिए जाने के एक मास की अवधि के भीतर नियुक्त करेगा । (घ) यदि रिजर्व बैंक द्वारा लोक हित में या बैंक के कार्यकलापों के जमाकर्ताओं के हित में प्रतिकू ल रीति में संचालित करने का निवारण करने के लिए या बैंक के समुचित प्रबंधन के लिए अपेक्षित हो तो रजिस्ट्रार द्वारा समिति को अधिक्रांत करने के लिए और उसके स्थान पर कु ल मिलाकर पांच वर्ष से अनधिक अवधि या अवधियों के लिए, जो रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट की जाएं, एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति करने के लिए आदेश किया जाएगा और इस प्रकार नियुक्त अधिकारी अपनी पदावधि के अवसान पर ऐसे बैंक की नई समिति की पहली बैठक की तुरंत पूर्ववर्ती तारीख के दिन तक अपने पद पर बना रहेगा ;

(ड.) बैंक के परिसमापन के लिए आदेश या समझौता या ठहराव या समामेलन या पुननिर्माण (प्रभाग या पुनर्गठन सहित) की स्कीम का मंजूरी आदेश या बैंक की समिति के अधिक्रमण और लिखित रुप में पूर्व मंजूरी से की गई उसके स्थान में विशेष अधिकारी की नियुक्ति के लिए आदेश या रिजर्व बैंक की अध्यपेक्षा पर अंतिम होगा और किसी न्यायालय में किसी रीति में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ; और

(च) यथास्थिति, समापक या ऐसा बैंक या अंतिरती बैंक निक्षेप बीमा और प्रत्यय गांरटी निगम अधिनियम, 1961 (1961 का 47) के अधीन स्थापित निक्षेप बीमा निगम को या इस अधिनियम की धारा 21 में निर्दिष्ट परिस्थितियों में, परिमाण तक और ऐसी रीति में तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन संदाय करने के लिए बाध्यता के अधीन होगा ;

स्पष्टीकरण – इस धारा के प्रयोजनों के लिए, पद—

(क) "बीमाकृ त सहकारी बैंक" से सोसाइटी अभिप्रेत है जो निक्षेप बीमा और प्रत्यय गांरटी निगम अधिनियम, 1961 (1961 का 47) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधिक के उपबंधों के अधीन बीमाकृ त बैंक है ;

(ख) "अंतरिती बैंक" से कोई बीमाकृ त सहकारी बैंक के संबंध में सहकारी बैंक अभिप्रेत है ;

(i) जो ऐसे बीमाकृ त बैंक से समामेलित है;

(ii) जिसको ऐसा बीमाकृ त सहकारी बैंक की आस्तियां और दायित्व अंतरित किए गए है ;या

(iii) जिसमें ऐसा बीमाकृ त सहकारी बैंक धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन विभाजित या संपरिवर्तित किया जाता है ।

117. 1949 का अधिनियम संख्यांक 10 के उपबंधों और इसके अध्यारोही प्रभाव का लागू होना—(1) बैंककारी का कारबार, करने वाली सहकारी समिति की दशा में समय समय पर यथासंशोधित बैंककारी विनियम अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के उपबंध बैंककारी क्रियाकलापों के संबंध में भी लागू होंगे ।

(2) इस विनियम के उपबंध और बैंककारी विनियम अधिनियम 1949 (1949 का 10) के बीच किसी विरोध की दशा में, समय समय पर रिजर्व बैंक द्वारा तद् धीन जारी किए गए नियम विनियम, निदेश या अनुदेश के साथ पश्चात्कथित उपबंध लागू होंगे ।

118. सहकारी बैंक की समिति द्वारा कतिपय मामलों को सुनिश्चित करना—सहकारी बैंक की समिति सुनिश्चित करेगी कि:—

(क) प्रत्येक समिति सदस्य, कु टु ंब के सदस्यों और कं पनियों जिससे वह किसी रीति में, सहयुक्त है, द्वारा बैंक से उधार लेने के संबंध में ऐसे प्ररुप में जो विहित की जाए रजिस्ट्रार को प्रत्येक मास सूचना दी जाती है ;

(ख) बैंक जो निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम 1961 (1961 का 47) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन बीमाकृ त बैंक के रुप में रजिस्ट्रीकृ त है ;

42 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A]

(ग) बैंक के कार्यकरण में त्रुटियों को सुधारा जाता है और बैंक की संपरीक्षा के अनुक्रम में वित्तीय अनियमिताएं प्रकटित की जाती है या अन्यता दूर किया जाता है ;

(घ) बैंक द्वारा दिए गए उधार की वसूली के लिए उस तारीख से एक वर्ष के भीतर कार्रवाई की जाती है जब उसका पुर्नसंदाय देय हो गया हो ;

(ड.) बैंक को कोई वित्तीय हानि नहीं हुई है और बैंक को देय कोई ऋण जो देय होने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर वसूल नहीं किया जाता है, उसे वसूल किया जाएगा ;

(च) व्यक्ति के विरुद्ध सिविल और दांडिक कार्यवाहियां जो, समिति की राय में, बैंक की किसी निधि का दुर्विनियोग करती है, आरंभ की जाती है ;

(छ) बैंककारी विनियम अधिनियम 1949 (1949 का 10) की धारा 18 और 24 के उपबंध सहकारी सोसाइटियों पर यथा लागू होते है और इस विनियम की धारा 63 का अनुपालन किया जाता है और यदि उसकी राय में उक्त उपबंधों में से किसी का उल्लंघन किया जाता है, ऐसा उल्लंघन की रजिस्ट्रार को तत्काल सूचना दी जाती है ।

119. सरकारी सोसाइटी शब्द के उपयोग का प्रतिषेध—

(1) कोई व्यक्ति, इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त सोसाइटी से भिन्न, या रजिस्ट्रीकृ त नहीं समझा जाएगा और किसी व्यक्ति या उसके हित उत्तरवर्ती किसी ऐसे नाम या संक्षिप्त नाम के , जिससे उसने उस तारीख को, जिसको यह विनियम प्रवृत्त होता है, व्यापार या कारबार किया था, प्रशासक की मंजूरी के बिना किसी ऐसे नाम या संक्षिप्त नाम से जिसका प्ररुप भाग "सहकारी" शब्द है या किसी भारतीय भाषा में जिसके समतुल्य है, कार्य व्यापार नहीं करेगा या न ही कोई कारबार करेगा । (2) प्रत्येक व्यक्ति पूर्वगामी उपधारा के उपबंधों का उल्लंघन करने के लिए, दोषसिद्धि पर, जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक का हो सके गा, दंडनीय होगा ।

120. अपराध—(1) यह इस विनियम के अधीन अपराध होगा, यदि—

(क) कोई व्यक्ति धारा 26 में निर्दिष्ट घोषणा करता है जो वह जानता या उसके पास विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या है ;

(ख) यदि धारा 37 की उपधारा (3) के अधीन कोई अधिकारी या प्राधिकृ त अधिकारी उक्त धारा में यथाउपबंथित कृ त्यों के निर्वहन में असफल रहता है;

(ग) किसी सोसाइटी का कोई सदस्य धारा 51 की उपधारा (2) के उल्लंघन में किसी संपत्ति या संपत्ति में हित को अंतरित करता है या कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसी संपत्ति अर्जित करता है या अर्जित करने का दुष्प्रेऱण करता है;

(घ) कोई नियोक्ता या कोई निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी या अभिकर्ता बिना पर्याप्त कारण के ऐसे नियोक्ता की ओर से कार्य करने में धारा 53 की उपधारा (2) का पालन करने में असफल रहता है ;

(ड.) सोसाइटी की समिति या उसका कोई अधिकारी या सदस्य धारा 62 द्वारा अपेक्षित रीति में ऐसी सोसाइटी की निधियां न्यस्त करने में असफल रहता है ;

(च) कोई व्यक्ति किसी सोसाइटी या सूचना के लिए शेयर धन एकत्र करते हुए युक्तियुक्त अवधि के भीतर राज्य सहकारी बैंक या के न्द्रीय सहकारी बैंक या किसी राष्ट्रीयकृ त बैंक या डाकपत्र बचत बैंक में जमा नहीं करता है ;

(छ) कोई व्यक्ति किसी सोसाइटी या सूचना के लिए शेयर धन एकत्र करता है किसी सोसाइटी के नाम पर जिसे रजिस्ट्रीकृ त या अन्यथा होना चाहिए, कोई कारबार या व्यापार या कारबार करने के लिए इस प्रकार जुटाई गई निधियों का उपयोग करता है;

(ज) कोई व्यक्ति प्रबंधन समिति या पदाधिकारी के सदस्यों के निर्वाचन के पहले, दौरान या पश्चात् भ्रष्ट आचरण अपनाता है;

(झ) सेवानिवृत्त अध्यक्ष जिनको निदेशन धारा 72 के उपधारा (2) के अधीन जारी किया गया है ऐसे निदेशन के अनुपालन में असफल रहता है ;

(ञ) सोसाइटी की समिति या सदस्य जो धारा 73 के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है;

(ट) सोसाइटी की समिति या उसका अधिकारी या सदस्य जो धारा 75 की उपधारा (2), उपधारा (3) या उपधारा (4) के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है;

(ठ) सोसाइटी का कोई अधिकारी या सदस्य जो सूचना, पुस्तकों और अभिलेख के कब्जे में है ऐसी सूचना देने या पुस्तक और कागजपत्र प्रस्तुत करने या धारा 22, धारा 66, धारा 78, धारा 81, धारा 84, धारा 86, धारा 87, धारा 88, धारा 99 या धारा 108 के अधीन संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासकों या रजिस्ट्रार द्वारा नियुक्त या प्राधिकृ त व्यक्ति को सहायता देने में असफल रहता है ;

(ड़) सोसाइटी का कोई अधिकारी धारा 22, धारा 66, धारा 78, धारा 81, या धारा 108 के अधीन नियुक्त व्यक्ति को जिसका वह अधिकारी है उस सोसाइटी की पुस्तकों, अभिलेखों, नकद, प्रतिभूति और अन्य संपत्ति की अभिरक्षा सौंपने में असफल रहता है ;

(ढ) सोसाइटी की समिति या उसका कोई अधिकारी या सदस्य धारा 81 के अधीन किए गए आदेश का अनुपालन या कोई सूचना देने या कोई विवरणी या दस्तावेज भेजने, कु छ भी करने या करने की अनुज्ञा देने के लिए किसी युक्तियुक्त कारण के43 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण बिना असफल रहता है जिसे समिति, अधिकारी या सदस्य को इस विनियम द्वारा देना, भेजना, करना या करने का अनुज्ञा देना अपेक्षित है ;

(ण) सोसाइटी की समिति या उसका कोई अधिकारी या सदस्य जानबूझकर उपेक्षा करता है या किसी कार्य को करने से इंकार करता है या इन विनियम के प्रयोजनों के लिए रजिस्ट्रार या इस निमित्त लिखित रूप से उसके द्वारा सम्यक रूप से प्राधिकृ त अन्य व्यक्ति द्वारा अपेक्षित कोई सूचना देने से इंकार करता है ;

(त) सोसाइटी की समिति या उसका कोई अधिकारी या सदस्य जानबूझ कर मिथ्या विवरणी देता है या मिथ्या सूचना देता है या उचित लेखा रखनें में असफल रहता है;

(थ) कोई व्यक्ति जानबूझकर या बिना किसी युक्तियुक्त कारण से इस विनियम के उपबंधों के अधीन जारी किए गए समन, अध्यपेक्षा या विधिपूर्ण लिखित आदेश की अवज्ञा करता है ;

(द) कोई अधिकारी या सोसाइटी धारा 83 के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा किए गए आदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है ;

(ध) सोसाइटी का कोई अधिकारी, सदस्य अभिकर्ता, या सेवक धारा 84 की उपधारा (4) की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में असफल रहता है;

(न) सोसाइटी का कोई अधिकारी या सदस्य जानबूझकर धारा 98 के अधीन पारित विनिश्चय अधिनिर्णय या आदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है ;

(प) सोसाइटी का कोई सदस्य उस संपत्ति का कपटपूर्वक निपटान करता है जिस पर सोसाइटी का पूर्व दावा है, या कोई सदस्य या अधिकारी या कर्मचारी या कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को विक्रय, अंतरण, बंधक दान या अन्यथा कपटपूर्ण आश्य से निपटान करता है सोसाइटी के देय से बचने के लिए;

(फ) सोसाइटी का कोई सदस्य जानबूझकर अपने व्यक्तिगत उपयोग या फायदे के लिए या किसी ऐसे व्यक्ति के उपयोग या फायदे के लिए, जिसमें वह हितबद्ध है, किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर उधार की सिफारिश या मंजूरी देता है;

(व) किसी सोसाइटी का कोई अधिकारी या सदस्य किसी पुस्तक, कागजपत्र या प्रतिभूतियों को नष्ट, विकृ त या छेड़छाड़ या अन्यथा परिवर्तित करता है, मिथ्याकरण या छिपाने का संसर्गी है या विनाश, विकृ ति, परिवर्तन, मिथ्याकरण या गुप्तीकरण बनाता है या सोसाइटी से संबंधित किसी रजिस्टर, लेखा पुस्तिका या अभिलेख में कोई मिथ्या या कपटपूर्ण प्रविष्टि करने का संसर्गी है;

(भ) यदि सहकारी बैंक की समिति धारा 118 के खंड (क) से खंड (छ) के किन्हीं उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहती है;

(म) यदि समिति धारा 118 के खंड (क) के अधीन सूचना जो सही है सुनिश्चित करने में असफल रहती है;

(य) यदि समिति धारा 118 के खंड (छ) के अधीन रिपोर्ट जो सही है सुनिश्चित करने में असफल रहती है (2) जहां इस विनियम के अधीन कोई अधिकारी सोसाइटी की समिति द्वारा प्रतिबद्ध किया गया है, प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध के समय पर प्रतिबद्ध था, ऐसी समिति का सदस्य था, अपराध का दोषसिद्ध समझा जाएगा और उसके विरुद्ध कार्यवाहियों का दायी होगा और तदनुसार दंडित किया जाएगा;

परंतु इस उपधारा में अंतर्विष्ट न होते हुए, कोई ऐसा व्यक्ति इस विनियम में यथाउपबंधित किसी अपराध के लिए दायी नहीं किया जाएगा, यदि वह साबित करता है कि अपराध उसकी सूचना के बिना किया गया है या उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सम्यक तत्परता बरती है

121. धारा 118 और धारा 120 के अधीन अपराधों के लिए शास्ति—(1) सोसाइटी का प्रत्येक कर्मचारी या अधिकारी, सदस्य, अभिकर्ता या सेवक या कोई अन्य व्यक्ति जो धारा 118 के अधीन अपराध करता है, दोषसिद्धि पर दंडित किया जाएगा —

(क) यदि यह उस धारा के खंड (क) के अधीन अपराध है तो जुर्माना जो पचास हजार रुपए तक हो सके गा ;

(ख) यदि यह उस धारा के खंड (ख) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ग) यदि यह उस धारा के खंड (ग) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह वर्ष तक की हो सके गी या जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(घ) यदि यह उस धारा के खंड (घ) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ड.) यदि यह उस धारा के खंड (ड.) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सके गी या जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(च) यदि यह उस धारा के खंड (च) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सके गी या जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

44 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A]

(छ) यदि यह उस धारा के खंड (छ) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सके गी या जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक हो सके गा या दोनों से ;

(2) सोसाइटी का प्रत्येक सदस्य या अधिकारी, सदस्य, अभिकर्ता या सेवक या कोई व्यक्ति जो धारा 120 के अधीन कोई अपराध करता है दोषसिद्धी पर, दंडित किया जाएगा (क) यदि यह उस धारा के खंड (क) के अधीन अपराध है जो साधारण कारावास से जो छह मास तक की हो सके गा या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ख) यदि यह उस धारा के खंड (ख) के अधीन अपराध है तो जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा ;

(ग) यदि यह उस धारा के खंड (ग) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो पांच हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(घ) यदि यह उस धारा के खंड (घ) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि एक मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ड.) यदि यह उस धारा के खंड (घ) के अधीन अपराध है जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(च) यदि यह उस धारा के खंड (च) के अधीन अपराध है जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(छ) यदि यह उस धारा के खंड (छ) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सके गी या जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ज) यदि यह उस धारा के खंड (ज) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(झ) यदि यह उस धारा के खंड (झ) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि एक मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ञ) यदि यह उस धारा के खंड (ञ) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ट) यदि यह उस धारा के खंड (ट) के अधीन अपराध है जुर्माने से जो पच्चीस हजार पांच सौ रुपए तक हो सके गा ;

(ठ) यदि यह उस धारा के खंड (ठ) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ड) यदि यह उस धारा के खंड (ड) के अधीन अपराध है जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा ;

(ढ) यदि यह उस धारा के खंड (ढ) के अधीन अपराध है जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा ;

(ण) यदि यह उस धारा के खंड (ण) के अधीन अपराध है जो कारावास से जो एक मास तक का हो सके गा या जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(त) यदि यह उस धारा के खंड (त) के अधीन अपराध है जो कारावास से एक वर्ष तक की हो सके गा या जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(थ) यदि यह उस धारा के खंड (थ) के अधीन अपराध है जो कारावास से जो छह मास तक का हो सके गा या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(द) यदि यह उस धारा के खंड (द) के अधीन अपराध है जो कारावास से जो एक वर्ष तक का हो सके गा या जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ध) यदि यह उस धारा के खंड (ध) के अधीन अपराध है जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा ;

(न) यदि यह उस धारा के खंड (न) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(प) यदि यह उस धारा के खंड (प) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सके गी या जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(फ) यदि यह उस धारा के खंड (फ) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सके गी या जुर्माने से जो पच्चीस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(ब) यदि यह उस धारा के खंड (ब) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सके गी या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(भ) यदि यह उस धारा के खंड (भ), खंड (म) और खंड (य) के अधीन अपराध है तो वह कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सके गी या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक हो सके गा या दोनों से;

(3) धारा 120 के अधीन किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन उन तथ्यों जिन पर इस विनियम के किसी उपबंधों के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा शास्ति अधिरोपित की गई है, के संबंध में संस्थापित नहीं किया जाएगा ।

122. अपराधों का संज्ञान—(1) किसी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से नीचे का कोई न्यायालय इस45 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण विनियम के अधीन किसी दंडनीय अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए इस संहिता की धारा 32 के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग में धारा 121 के अधीन यथाविहित धारा 120 के अधीन अपराध के लिए दोषसिद्ध किसी व्यक्ति को दंडादेश या जुर्माना देने के लिए विधिपूर्ण होगा ।

(3) इस विनियम के अधीन कोई अभियोजन रजिस्ट्रार की पूर्व मंजूरी के सिवाय दाखिल नहीं किया जाएगा।

अध्याय 12

अपील, पुनर्विलोकन और पुनरीक्षण 123. सहकारी अधिकरण का गठन—(1) प्रशासक इस विनियम द्वारा या के अधीन अधिकरण को प्रदत्त कार्यों का प्रयोग करने के लिए सहकारी अधिकरण नामक एक अधिकरण का गठन करेगा ।

(2) अधिकरण अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की ऐसी संस्था से जो चार से अनधिक होगी गठित की जाएगी ।

(3) अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए अर्हताएं, अनुभव, निबंधन और शर्तें वे होगीं जो विहित की जाएं ।

(4) प्रशासक उसके पद की अवधि की समाप्ति के पहले अधिकरण के किसी सदस्य की नियुक्ति का पर्यवसान कर सके गा यदि ऐसा सदस्य :—

(क) दिवालिया घोषित किया गया है;

(ख) यदि पद की उसकी अवधि के दौरान अपने पद के कर्तव्यों के बाहर किसी संदत्त नियोजन भी संलग्न होता है जब तक कि ऐसा नियोजन प्रशासक द्वारा प्राधिकृ त नहीं किया जाता है ;

(ग) संघ राज्य क्षेत्र प्रशासन द्वारा या उसकी निमित्त किसी संविदा या काम में किसी प्रकार से संबंध या हितबद्ध है या होता है या किसी सदस्य के रूप में या अन्यथा उसके लाभ उससे उद्भूत होने वाले किसी फायदे या उपलब्धियों में भाग लेता है ;

(घ) सदस्य के रुप में कार्य करने में शारीरिक या मानसिक रुप से अक्षम हो गया है :

परंतु सदस्य उसकी अधिकारिता में ऐसी रीति में जो विहित की जाए, संबंद्ध उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा की गई जांच के पश्चात् प्रशासक द्वारा किए गए आदेश के सिवाय इस उपधारा के खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन विनिर्दिष्ट आधार पर उसके पद से नहीं हटाया जा सके गा ।

(ड.) नैतिक अधमता से जुड़े अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है ;

(5) अधिकरण की सदस्यता में कोई रिक्ति प्रशासक द्वारा भरी जाएगी ।

(6) अधिकरण की शक्तियां और कृ त्य अध्यक्ष द्वारा स्वयं सहित अधिकरण के सदस्यों में से गठित पीठों द्वारा प्रयोग या निर्वहित की जा सके गी ।

(7) ऐसी पीठें दो या अधिक सदस्यों से गठित होगी । (8) जहां मामले तीन सदस्यों द्वारा सुना जाता है बहुमत की राय अभिभावी होगी और विनिश्चय बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा और जहां मामला सदस्यों की सम संख्या द्वारा सुना जाता है और सदस्य बराबर विभाजित होते है, यदि अध्यक्ष सदस्यों में से एक है, अध्यक्ष की राय अभिभावी होगी और अन्य मामलों में मामला अध्यक्ष की सुनवाई के लिए निर्दिष्ट किया जाएगा और उसके विनिश्चय के अनुसार विनिश्चित किया जाएगा :

पंरतु अंतर्वर्ती आवेदन एक या अधिक सदस्यों द्वारा जो उपस्थित हो सकें गे सुना जा सके गा ।

(9) प्रशासक की पूर्व मंजूरी के अध्यधीन रहते हुए अधिकरण, अपनी कार्यवाहियां विनियमित करने के लिए और अपने कारबार के निपटान के लिए इस विनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबंधों से संगत ऐसे विनियमों की विरचना करेगा और वे राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी । (10) अधिकरण किसी कार्यवाही पारित किसी विनिश्चय या आदेश की वैधता या औचित्य में स्वयं को संतुष्ट करने के प्रयोजन के लिए, जिसमें इसको अपील होती है, का अभिलेख मांग सके गा और परीक्षा कर सके गा और यदि किसी मामले में, अधिकरण को प्रतीत होता है कि ऐसा कोई विनिश्चय या आदेश उपांतरित, बातिल या उलट देना चाहिए, अधिकरण ऐसा आदेश जो यह न्यायसंगत समझे पारित कर सके गा ।

(11) जहां धारा 102 के अधीन अधिकरण को अपील की जाती है, यह न्याय के उद्देश्यों को विफलता से रोकने के अनुक्रम में, अपील के लंबित विनिश्चय में, ऐसा अंर्तवर्ती आदेश जो इसको न्यायसंगत और सुविधापूर्ण प्रतीत हो या ऐसे आदेशों जो न्याय के उद्देश्यों के लिए यह अधिकरण की कार्यवाही का दुरुपयोग रोकने के लिए आवश्यक हों, कर सके गा । (12) अधिकरण द्वारा उपधारा (10) के अधीन अपील में या पुनरीक्षण में या धारा 124 के अधीन पुनर्विलोकन में पारित किया गया आदेश अंतिम और निश्चायक होगा और किसी सिविल न्यायालय या राजस्व न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।46 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (13) इस विनियम के अधीन अपील की सुनवाई करने वाला अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची में धारा 97 और आदेश 41 द्वारा में अपील न्यायालय को प्रदत्त सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा । 124. अधिकरण के आदेशों का पुनर्विलोकन—(1) अधिकरण, रजिस्ट्रार के आवेदन पर या किसी हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर किसी भी मामले में अपने आदेश का पुनर्विलोकन कर सके गा और उसके संदर्भ में ऐसा आदेश पारित कर सके गा जैसा वह ठीक समझे :

परंतु हितबद्ध पक्षकार द्वारा किए गए ऐसे किसी आवेदन को तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक कि अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि नए और महत्वपूर्ण साक्ष्य का पता चला है, जो सम्यक् सावधानी बरतने के पश् चात आवेदक की जानकारी में नहीं था या उसके द्वारा उस समय प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जब आदेश किया गया था या अभिलेख में कु छ स्पष्ट भूल या गलती हैं या कोई अन्य पर्याप्त कारण है :

परंतु यह और कि ऐसे किसी आदेश में परिवर्तन या संशोधन नहीं किया जाएगा जब तक कि हितबद्ध पक्षकारों को उपस्थित होने का और ऐसे आदेश के संबंध में सुने जाने का अवसर प्रदान नहीं कर दिया जाता है ।

(2) किसी पक्षकार द्वारा उपधारा (1) के अधीन पुनर्विलोकन के लिए आवेदन अधिकरण के आदेश की संसूचना की तारीख से नब्बे दिन के भीतर किया जाएगा ।

125. न्यायालय को सिविल न्यायालय की शक्ति होना—(1)अधिकरण में उसे इस विनियम के अधीन प्रदत्त कृ त्यों का निर्वहन करते समय निम्नलिखित के संबंध में सिविल न्यायालय की शक्तियां निहित होंगी –

(क) शपथपत्र द्वारा तथ्यों का सबूत ;

(ख) किसी व्यक्ति को समन करना और उसकी उपस्थिति प्रवृत्त करना तथा शपथ पर उसकी जांच करना ;

(ग) दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करना ;

(घ) साक्ष्यों की जांच करने के लिए कमीशन जारी करना; या

(ङ) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए । (2) किसी ऐसे शपथपत्र की दशा में अधिकरण द्वारा इस निमित्त नियुक्त किया गया अधिकारी अभिसाक्षी को शपथ दिला सके गा ।

126. अपील—(1) धारा 4, धारा 9. धारा 11, धारा 13, धारा 17, धारा 20, धारा 22, धारा 40 और धारा 81 के अधीन किसी आदेश या विनिश्चय के विरुद्ध अपील,- (क) यदि रजिस्ट्रार या किसी अपर रजिस्ट्रार या संयुक्त रजिस्ट्रार द्वारा की जाती है या स्वीकृ त की जाती है या अनुमोदित की जाती है, जिसको रजिस्ट्रार की शक्तियांअनुदत्त की गई है;

(ख) यदि किसी रजिस्ट्रार या उप रजिस्ट्रार या सहायक रजिस्ट्रार से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा की जाए या स्वीकृ त की जाए, जिसे रजिस्ट्रार द्वारा रजिस्ट्रार की शक्तियां प्रदत्त की गई हों, की जाएगी ।

(2) किसी समापक के आदेश के विरुद्ध धारा 110 के अधीन अपील-

(क) प्रशासक को की जाएगी, यदि आदेश रजिस्ट्रार की स्वीकृ ति या अनुमोदन द्वारा किया गया था ;और (ख) किसी अन्य दशा में रजिस्ट्रार को । (3) धारा 81, धारा 90, धारा 93 के अधीन किसी आदेश या विनिश्चय के विरुद्ध अपील और सोसाइटी को प्रतिकर का संदाय करने के लिए रजिस्ट्रार द्वारा पारित किसी अन्य आदेश तथा किसी अन्य आदेश, जिसके लिए इस विनियम के अधीन अधिकरण को अपील का उपबंध किया गया है, अधिकरण को की जाएगी ।

(4) उपधारा (1), उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन अपील आदेश या विनिश्चय की संसूचना की तारीख से दो मास के भीतर फाइल की जाएगी ।

(5) इस धारा के अधीन या इस विनियम के अन्य उपबंधों के अधीन किसी अपीलों को प्रस्तुत करने और उनका निपटान करने के लिए अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया वह होगी, जो विहित की जाए ।

(6) इस विनियमन में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस विनियम के अनुसार किए गए किसी आदेश, विनिश्चय या पारित अधिनिर्णय के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जाएगी और ऐसा प्रत्येक आदेश, विनिश्चय या अधिनिर्णय अंतिम होगा और जहां किसी अपील के लिए उपबंध किया गया है, अपील पर पारित किया गया कोई आदेश अंतिम होगा और उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं की जाएगी ।

127. कतिपय मामलों में अपील प्राधिकारी की परिसीमा अवधि का विस्तार—सभी मामलों में, जिनमें विनियम के अधीन यह उपबंध किया गया है कि किसी विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अपील फाइल की जा सके गी, अपील प्राधिकारी ऐसी अवधि के अवसान के पश्चात् किसी अपील को स्वीकार कर सके गा, यदि अपीलार्थी अपील प्राधिकारी का यह समाधान कर देता है कि ऐसी अवधि के भीतर अपील न करने का पर्याप्त कारण था । 128. प्रशासक और रजिस्ट्रार की आदेश पारित करने के लिए अधीनस्थ अधिकारियों की कार्यवाहियों की मांग करने की शक्ति—प्रशासक और रजिस्ट्रार उनसे अधीनस्थ किसी अधिकारी की किसी अन्य मामले में किसी जांच या कार्यवाहियों के अभिलेख की, सिवाय धारा 123 की उपधारा (10) में निर्दिष्ट मामलों के , स्वयं का किसी विनिश्चय या पारित आदेश47 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण की वैधता और औचित्य का और ऐसे अधिकारी की कार्यवाहियों की नियमितता के संबंध में किसी मामले में समाधान करने के लिए मांग सके गा और किसी मामले में प्रशासक या रजिस्ट्रार को यह प्रतीत होता है कि इस प्रकार मांग किए गए किसी विनिश्चय या आदेश या कार्यवाहियों को उपांतरित, बातिल या उलट देना चाहिए, तो, यथास्थिति, प्रशासक या रजिस्ट्रार उनसे प्रभावित व्यक्तियों को सुने जाने का अवसर प्रदान करने के पश्चात् उन पर ऐसा आदेश पारित करेगा जो वह उचित समझे ।

अध्याय 13

प्रकीर्ण

129. प्रशासक की ई-निविदा प्रक्रिया के लिए निदेश देने की शक्ति—प्रशासक, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, जिसे राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा, किसी सोसाइटी या सोसाइटी के किसी वर्ग को ऐसी सोसाइटी या किसी सोसाइटी के वर्ग से संबंधित ऐसे मामलों के संबंध में संविदा नहीं देने का और ऐसी रकम के लिए ई-निविदा प्रक्रिया का अनुसरण करने का निदेश दे सके गा ।

130. संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन को देय राशियों की वसूली—(1)इस विनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, किसी सोसाइटी या सोसाइटी के किसी अधिकारी या सदस्य या भूतपूर्व सदस्य या मृत सदस्य से संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन को देय सभी राशियों की वसूली भूराजस्व के बकाया के रूप में की जाएगी ।

(2) सोसाइटी से संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन को देय राशियां और उपधारा (1) के अधीन वसूलनीय की वसूली – (i) सोसाइटी की संपत्ति ;

(ii) ऐसी सोसाइटी की दशा में जिसके सदस्यों का दायित्व सीमित है, के सदस्यों या भूतपूर्व सदस्यों या उनकी संपदा से उनके दायित्व की सीमा के अध्यधीन रहते हुए, यदि उनकी मृत्यु हो गई है; और

(iii)असीमित दायित्व वाली सोसाइटियों की दशा में उनके सदस्यों या भूतपूर्व सदस्यों या उनकी संपदा से यदि उनकी मृत्यु हो गई है ।

(3) इस धारा के अधीन दायित्व सभी मामलों में धारा 38 के उपबंधों की शर्त के अध्यधीन होगा ।

131. किसी सदस्य की भूमि या उसमें हित को सोसाइटी को अतंरित करने की क्षमता—संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) और भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी सहकारी कृ षक सोसाइटी के किसी सदस्य के लिए उसके द्वारा धारित किसी भूमि या उसमें उसके संपूर्ण हित में उसके संपूर्ण भाग या उसके किसी भाग को किसी करार द्वारा और ऐसी रीति में जो विहित की जाए, सोसाइटी को अंतरित करना विधिपूर्वक होगा।

132. रजिस्ट्रार की कतिपय राशियों को संपत्ति की कु र्की और विक्रय द्वारा वसूल करने की शक्ति—(1)रजिस्ट्रार या इस निमित्त उसके द्वारा सशक्त अधिकारी ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए जो प्रशासक द्वारा बनाए जाए, किं तु इस विनियम द्वारा या उसके अधीन वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकू ल प्रभाव डाले बिना,-

(क) सोसाइटी द्वारा अभिप्राप्त सिविल न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश के अधीन देय किसी रकम ;

(ख) रजिस्ट्रार, उसके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशिती के बोर्ड या समापक या अधिकरण के किसी विनिश्चय, अधिनिर्णय या आदेश के अधीन देय किसी रकम ;

(ग) इस विनियम के अधीन लागत के माध्यम से प्रदान की गई किसी राशि ;या

(घ) इस विनियम के अधीन सोसाइटी की आस्तियों को अभिदाय के रूप में संगत किए जाने के लिए आदेश की गई किसी रकम,

को ब्याज सहित, यदि कोई हो, जो ऐसी रकम या राशि पर देय हो और उसकी वसूली के लिए कु र्की और विक्रय या व्यक्ति की संपत्ति के बिना किसी विक्रय के कु र्की, जिसके विरुद्ध ऐसी डिक्री, विनिश्चय, अधिनिर्णय या आदेश अभिप्राप्त किया गया है या पारित किया गया है, वसूल कर सके गा । (2) रजिस्ट्रार या उसके द्वारा सशक्त अधिकारी को, जब वह उपधारा (1) के अधीन शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो या जब वह उसे वसूली के लिए किए गए किसी आवेदन पर कोई आदेश पारित कर रहा हो, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

133. सोसाइटियों को विनियमों के उपबंधों से छू ट प्रदान करने की शक्ति.—प्रशासक, राजपत्र में प्रकाशित होने वाले, साधारण या विशेष आदेश द्वारा,ऐसे लिखित कारणों से जो अभिलखित किए जाएंगे, इस विनियम के उपबंध से किसी सोसाइटी या सोसाइटियों के वर्ग को इस विनियम के किन्हीं उपबंधों से छू ट दे सके गा या निदेश दे सके गा कि ऐसे उपबंध के , ऐसी सोसाइटियों पर जो कि आदेश में विर्निर्दिष्ट किया जाए, ऐसे उपांतरणों के साथ, जो उनके सार को प्रभावित न करें, लागू होंगे :

परंतु कोई आदेश, ऐसी सोसाइटी को अपने मामले का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिए बिना, सोसाइटी के पूर्वाग्रह के लिए पारित नहीं किया जाएगा ।

134. प्रशासक को और रजिस्ट्रार को शक्तियों का प्रत्यायोजन—प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और ऐसी48 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] शर्तों के अधीन रहते हुए, जो अधिरोपित करना वह ठीक समझे—

(क) सिवाय धारा 126 की उपधारा (1) और धारा 139 के अधीन शक्ति के इस विनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोगतव्य किसी शक्ति को रजिस्ट्रार को ; और

(ख) इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रार की सभी या किन्हीं शक्तियों को गठित किसी समिति या किसी सहकारी परिसंघीय सोसाइटी को जिसे धारा 95 के अधीन मान्यता प्रदान की गई है या ऐसी सोसाइटी के किसी अधिकारी या तत्समय प्रवृत्त पंचायतों से संबंधित किसी विधि के अधीन गठित किसी पंचायत को, प्रत्यायोजित कर सके गा ।

135. संघ राज्यक्षेत्र से बाहर सोसाइटियों की शाखाएं आदि—(1) कोई सोसाइटी संघ राज्यक्षेत्र से बाहर कोई शाखा या कारबार का कोई स्थान नहीं खोलेगी और किसी अन्य राज्य में किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृ त सहकारी सोसाइटी रजिस्ट्रार की अनुज्ञा के बिना संघ राज्यक्षेत्र में कोई शाखा या कारबार का स्थान नहीं खोलेगी ।

(2) किसी अन्य राज्य में किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृ त और उपधारा (1) के अधीन संघ राज्यक्षेत्र में कोई शाखा या कारबार का स्थान खोलने के लिए अनुज्ञेय प्रत्येक सहकारी समिति या जिसकी इन विनियमों के प्रारंभ से पूर्व, संघ राज्यक्षेत्र में कोई शाखा या कारबार का कोई स्थान है, इन विनियमों के प्रारंभ होने की तारीख से, यथास्थिति, ऐसी शाखा या कारबार का स्थान खोलने के तीन मास के भीतर रजिस्ट्रार के पास उपविधियों और संशोधनों की प्रमाणित प्रति फाइल करेगी और यदि वह अंग्रेजी में नहीं हो तो उनका अंग्रेजी या हिन्दी में प्रमाणित अनुवाद प्रस्तुत करेगी और उस राज्य जिसमें ऐसी सोसाइटी रजिस्ट्रीकृ त है,रजिस्ट्रार को प्रस्तुत की जाने वाली विवरणियों और सूचना के अतिरिक्त रजिस्ट्रार को ऐसी विवरणियां और सूचना प्रस्तुत करेगी जैसा कि इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त वैसी ही सोसाइटियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंध ऐसी सहकारी सोसाइटियों को लागू नहीं होंगे जिन्हें बहु-राज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 2002 (2002 का 39) के उपबंध लागू होते हैं ।

(4) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट कोई बात किसी सोसाइटी को प्रभावित नहीं करेगी जिसकी इस विनियम के प्रारंभ से पूर्व संघ राज्यक्षेत्र से बाहर कोई शाखा या कारबार का स्थान है । 136. रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारियों का लोकसेवक होना—रजिस्ट्रार, रजिस्ट्रार की शक्तियों का प्रयोग करने वाला कोई व्यक्ति, धारा 22 के अधीन शासकीय समनुदेशिती, धारा 66 के अधीन कोई अभिरक्षक, धारा 68 के अधीन सहकारी निर्वाचन अधिकारी, धारा 84 के अधीन सोसाइटी के लेखाओं की संपरीक्षा करने के लिए या धारा 86 के अधीन जांच करने के लिए धारा 87 या धारा 88 के अधीन निरीक्षण करने के लिए प्राधिकृ त व्यक्ति, और धारा 81 या धारा 116 के अधीन विशेष अधिकारी के रूप में नियुक्त व्यक्ति या धारा 98 के अधीन नामनिर्देशिती या नामनिर्देशिती के बोर्ड या धारा 108 के अधीन समापक के रूप में शक्तियों का प्रयोग करने वाला व्यक्ति और अधिकरण के सभी सदस्यों को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तंर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।

137. सद् भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण—

इस विनियम या तद्p6धीन बनाए गए किसी नियम के अनुसरण में सद्0भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही सोसाइटी के रजिस्ट्रार या किसी अधिकारी या अपील अधिकरण या किसी सदस्य या अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी। 138. न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन—(1) इस विनियम में अन्यथा यथाउपबंधित के सिवाय किसी सिविल न्यायालय या राजस्व न्यायालय को निम्नलिखित के संबंध में कोई अधिकारिता नहीं होगी–

(क) सोसाइटी के रजिस्ट्रीकरण या उसकी उपविधियों या उपविधियों के संशोधन या सोसाइटी की समिति के विघटन पर उसके प्रबंधन ;

(ख) विनिश्चय के लिए किसी विवाद को रजिस्ट्रार या उसके नामनिर्देशिती या नामनिर्देशिती के बोर्ड को निर्दिष्ट करने की अपेक्षा ; या

(ग) किसी सोसाइटी के परिसमापन और विघटन से संबंधित किसी विषय के संबंध में –

(2) जब किसी सोसाइटी का परिसमापन किया जा रहा हो, ऐसी सोसाइटी के कारबार के संबंध में कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही सोसाइटी या उसके किसी सदस्य के विरुद्ध कं पनी के कार्यों से संबंध रखने वाले किसी विषय पर सिवाय रजिस्ट्रार की अनुमति के और ऐसे निबंधनों के अधीन रहते हुए, जो वह अधिरोपित करे, नहीं की जाएगी ।

(3) इस विनियम या नियम के अनुसार पारित सभी आदेश, विनिश्चय या अधिनिर्णय इस विनियम के पुनरीक्षण या अपील के उपबंधों के अधीन रहते हुए अंतिम होंगे और ऐसा कोई आदेश, विनिश्चय या अधिनिर्णय चुनौती देने, अपास्त करने, उपांतरित करने, उलटने या गुणागुण या किसी अन्य आधार पर सिवाय अधिकारिता का अभाव के शून्य घोषित किए जाने का दायी नहीं होगा ।

139. नियम बनाने की शक्ति और संसद् के समक्ष उनका रखा जाना—(1)प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और पूर्व49 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए इस विनियम के प्रयोजनों के लिए इस विनियम के उपबंधों से संगत नियम बना सके गा । (2) इस विनियम के अधीन प्रशासक द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम उसके बनाए जाने के पश्चात् था शीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कु ल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सके गी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा,यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह नियम निष्प्रभाव हो जाएगा, किं तु नियम के इस प्रकार परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकू ल प्रभाव नहीं पड़ेगा। 140. 2013 के अधिनियम संख्यांक 18 का लागू नहीं होना—कं पनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) के उपबंध इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त या रजिस्ट्रीकृ त मानी गई सोसाइटियों को लागू नहीं होंगे ।

141. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति—(1) यदि इस विनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो प्रशासक , राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सके गा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो, उस कठिनाई को दूर कर सके गा :

परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस विनियम के प्रारंभ से एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा। (2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

142. निरसन और व्यावृत्ति—(1) लक्षद्वीप, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप समूह सहकारी सोसाइटी विनियम, 1960 (1960 का 5) (जिसे इसमें इसके पश्चात् इस धारा में के रूप में निर्दिष्ट किया गया है) का निरसन किया जाता है :

परंतु ऐसा निरसन –

(i) इस प्रकार निरसित उक्त विनियम के पूर्व प्रचालन या उसके अधीन सम्यकतः की गई या कराई गई किसी बात ;

(ii) इस प्रकार निरसित उक्त विनियम के अधीन किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या अर्जित उद्भूत या उपगत दायित्व ;

(iii) इस प्रकार निरसित उक्त विनियम के अधीन कारित किसी अपराध के संबंध में किसी शास्ति, समपहरण या उपगत दंड ; या

(iv) पूर्वोक्त किसी ऐसे अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, दायित्व, शास्ति, समपहरण या दंड के संबंध में किसी जांच, कार्यवाही, विधिक कार्यवाही या उपचार, को प्रभावित नहीं करेगा और ऐसी कोई जांच, कार्यवाही, विधिक कार्यवाही या उपचार संस्थित किया जा सके गा, लागू रखा जा सके गा या प्रवृत्त किया जा सके गा और ऐसी शास्ति, समपहरण या दंड अधिरोपित किया जा सके गा, मानो यह विनियम प्रख्यापित ही नहीं किया गया था ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट विशिष्ट विषयों के वर्णन को साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के ऐसे निरसन को साधारण रूप से लागू होने को या प्रभावित करने के प्रति प्रतिकू ल रूप से प्रभावित करने वाली नहीं ठहराई जाएगी ।

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राजेश श्रीवास्तव,

सहायक विधायी परामर्शी Uploaded by Dte. of Printing at Government of India Press, Ring Road, Mayapuri, New Delhi-110064 and Published by the Controller of Publications, Delhi-110054.

Cite this issue. Extraordinary Gazette of India, Government of India, 06 December 2022. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.central.e.2022-12-06.240826/. Archive identifier in.gazette.central.e.2022-12-06.240826.