रजिस्ट्री सं. डी.एल.- 33004/99
REGD. No. D. L.-33004/99
सी.जी.-डी.एल.-अ.-30122022-241519
CG-DL-E-30122022-241519
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असाधारण
EXTRAORDINARY
भाग II—खण्ड 3A
PART II—Section 3A
प्राधिकार से प्रकाशित
PUBLISHED BY AUTHORITY
सं. 5] नई दिल्ली, शुक्रवार, दिसम्बर 30, 2022/पौष 9, 1944 No. 5] NEW DELHI, FRIDAY, DECEMBER 30, 2022/PAUSHA 9, 1944
विधि और न्याय मंत्रालय
(विधायी विभाग)
राजभाषा खण्ड
नई दिल्ली, 27 दिसम्बर, 2022
दि लक्षद्वीप वैल्यू एडेड टैक्स रेगुलेशन, 2022 का हिन्दी अनुवाद, राष्ट्रपति के प्राधिकार से, प्रकाशित किया जाता है और राजभाषा अधिनियम, 1963 (1963 का 19 ) की धारा 5 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन, यह हिन्दी में उसका प्राधिकृ त पाठ समझा जाएगा :—
MINISTRY OF LAW AND JUSTICE
(LEGISLATIVE DEPARTMENT)
OFFICIAL LANGUAGES WING
New Delhi, the 27th December, 2022
The translation in Hindi of the Lakshadweep Value Added Tax Regulation, 2022 is hereby published under the authority of the President and shall be deemed to be the authoritative text thereof in Hindi under clause (b) of sub- section (1) of section 5 of the Official Languages Act, 1963 (19 of 1963):—
8804 GI/2022 (90)
12 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A]
गृह मंत्रालय
लक्षद्वीप मूल्य वर्धित कर विनियम, 2022
(2022 का विनियम संख्यांक 1)
भारत गणराज्य के तिहत्तरवें वर्ष में राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित ।
संघ राज्यक्षेत्र माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 से अपवर्जित माल पर
एक कर प्रणाली और ऐसे माल के विक्रय पर, विक्रय के
प्रत्येक अवसर पर, कर उद्गृहीत करके कर आधार को
बढ़ाने, कर के उद् ग्रहण को पारदर्शी बनाने और उससे
संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों का
उपबंध करने के लिए
राष्ट्रपति, संविधान के अनुच्छेद 240 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, उनके द्वारा बनाए गए निम्नलिखित विनियम को प्रख्यापित करती हैं :—
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ—(1) इस विनियम का संक्षिप्त नाम लक्षद्वीप मूल्य वर्धित कर विनियम, 2022 है । (2) इसका विस्तार संपूर्ण लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर है । (3) इस विनियम के उपबंध उस तारीख को प्रवृत्त होंगे, जो प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे । 2. परिभाषाएं—(1) इस विनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,—
(क) "अकाउं टेंट" से,—
(i) चार्टर्ड अकाउं टेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथा परिभाषित कोई चार्टर्ड अकाउं टेंट अभिप्रेत है ;
(ii) लागत और संकर्म लेखापाल अधिनियम, 1959 (1959 का 23) में यथा परिभाषित कोई लागत लेखापाल अभिप्रेत है ;
(iii) कं पनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 139 के अधीन नियुक्त कोई संपरीक्षक अभिप्रेत है ;
(ख) "पर्याप्त सबूत" से ऐसे दस्तावेज, परिसाक्ष्य या अन्य साक्ष्य अभिप्रेत हैं, जो विहित किए जाएं ;
(ग) "अपील अधिकरण" से धारा 73 के अधीन गठित अपील अधिकरण अभिप्रेत है ;
(घ) "कारबार" में निम्नलिखित सम्मिलित हैं,-- (i) किन्हीं सेवाओं का उपबंध, किन्तु कर्मचारी द्वारा प्रदान की गई सेवाओं को छोड़कर ;
(ii) कोई व्यापार, वाणिज्य या विनिर्माण ;
(iii) किसी व्यापार, वाणिज्य या विनिर्माण की प्रकृ ति की कोई प्रोद्यम या प्रतिष्ठान ;
विनियम
(iv) ऐसे व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण, प्रोद्यम या प्रतिष्ठान के संबंध में या उसके आनुषंगिक या प्रासंगिक कोई संव्यवहार ; और
(v) ऐसी सेवा, व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण, प्रोद्यम या प्रतिष्ठान की प्रकृ ति में कभी-कभी किए जाने वाला संव्यवहार,
चाहे,—
(अ) ऐसे संव्यवहार का कोई परिणाम, आवृत्ति, निरंतरता या नियमितता हो या नहीं ;
(आ) ऐसी सेवा, व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण, प्रोद्यम या प्रतिष्ठान को, अभिलाभ या लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जा रहा हो या नहीं ; और
(इ) ऐसी सेवा, व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण, प्रोद्यम या प्रतिष्ठान से, कोई लाभ या अभिलाभ प्रोद्भूत हो या नहीं ;
(ङ) "कारबार परिसर" में निम्नलिखित सम्मिलित हैं,—
(i) आयुक्त के पास रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी का पता ;
(ii) किसी व्यक्ति द्वारा अपने कारबार के संचालन के लिए उपयोग की जाने वाली कोई इमारत या स्थान, इमारत या भवन के उन स्थानों के सिवाय, जो मुख्य रूप से निवास के रूप में उपयोग किए जाते हैं ;
(iii) कोई भी स्थान, जहां व्यौहारी किसी अभिकर्ता (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) के माध्यम से संव्यवहार करता है, ऐसे अभिकर्ता के संव्यवहार का स्थान और भांडागार, गोदाम या ऐसे अन्य स्थान, जहां व्यौहारी अपना माल भंडारित करता है ;
(च) "पू ंजी माल" से लक्षद्वीप में व्यापार या विनिर्माण की प्रक्रिया में या संकर्म संविदा के निष्पादन के लिए, प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत:, प्रयुक्त संयंत्र, तंत्र और उपस्कर अभिप्रेत है ;
(छ) "नैमित्तिक व्यापारी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, चाहे वह प्रधान, व्यौहारी या किसी अन्य हैसियत में कारबार की प्रकृ ति में कभी-कभी संव्यवहार करता है, जिसमें, चाहे नकद, आस्थगित संदाय, कमीशन, पारिश्रमिक या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए, लक्षद्वीप में माल का क्रय, विक्रय,3 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण आपूर्ति या वितरण या कोई प्रदर्शनी-सह-विक्रय आयोजित करना सम्मिलित है ;
(ज) "आयुक्त" से धारा 66 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त मूल्य वर्धित कर आयुक्त अभिप्रेत है ;
(झ) "व्यौहारी" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो लक्षद्वीप में, प्रत्यक्षत: या अन्यथा, अपने कारबार के प्रयोजन के लिए या अपने वचनबंध के परिणामस्वरूप या उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक या उसके अनुक्रम में, चाहे वह नकद या आस्थगित संदाय से या कमीशन, पारिश्रमिक या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए, माल का क्रय या विक्रय करता है और इसके अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं,—
या उसके आनुषंगिक या उसके अनुक्रम में, विक्रय किए जाने के लिए किसी ऐसे माल को, जो अदावाकृ त या अधिहृत रूप में या अनुपयोगी या स्क्रै प, अधिशेष, पुराना, अप्रचलित रूप में या व्यक्त सामग्री या अपशिष्ट उत्पाद के रूप में है, व्ययन करता है ;
(viii) सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) को प्रशासित करने वाला भारत सरकार का सीमाशुल्क विभाग ;
(ix) कें द्रीय सरकार, राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्र प्रशासनों के विभाग ;
(x) स्थानीय प्राधिकारी, पंचायतें, नगरपालिकाएं, (i) कोई फे क्टर, कमीशन अभिकर्ता, दलाल, प्रत्यापक अभिकर्ता, या कोई अन्य वाणिज्यिक अभिकर्ता, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो, जो किसी कारबार के प्रयोजन के लिए या अपने वचनबंध के परिणामस्वरूप या उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक या उसके अनुक्रम में, किसी मालिक या किन्हीं मालिकों के निमित्त, चाहे वे प्रकटित हो या नहीं, किसी माल का क्रय या विक्रय या पूर्ति या वितरण करता है ;
(ii) यथास्थिति, कोई अनिवासी व्यौहारी या कोई अभिकर्ता, जो एक अनिवासी व्यौहारी के राज्य में निवास करता है, लक्षद्वीप में कारबार के प्रयोजन के लिए या अपने वचनबंध के परिणामस्वरूप या उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक या उसके अनुक्रम में, किसी माल का क्रय या विक्रय करता है ;
(iii) लक्षद्वीप के बाहर, किसी फर्म या कं पनी या व्यक्तियों का संगम की एक ऐसी स्थानीय शाखा, जहां ऐसे संगम, कं पनी, व्यक्तियों का संगम इस परिभाषा के किसी अन्य उपखंड के अधीन एक व्यौहारी है ;
(iv) कोई क्लब, संगम, सोसाइटी, ट्रस्ट या सहकारी सोसाइटी, चाहे वह निगमित हो या अनिगमित, अपने सदस्यों से कीमत, फीस या अभिदान के लिए माल क्रय करता है या उनको माल विक्रय करता है, चाहे वह कारबार के अनुक्रम में हो या नहीं ;
(v) कोई नीलामकर्ता, जो माल का विक्रय करता है या नीलाम करता है, चाहे वह अभिकर्ता के रूप में काम कर रहा हो या अन्यथा, या जो माल के विक्रय का आयोजन करता है या माल की नीलामी करता है, चाहे उसके पास किसी मालिक के माल को विक्रय करने का प्राधिकार हो या नहीं, चाहे वह प्रकटित हो या नहीं, और चाहे आशयित क्रे ता का प्रस्ताव उसके द्वारा या मालिक द्वारा या मालिक के नामनिर्देशिती द्वारा स्वीकृ त हो या नहीं ;
(vi) कोई नैमित्तिक व्यापारी ;
(vii) कोई व्यक्ति, जो अपने कारबार के प्रयोजन के लिए या वचनबंध के परिणामस्वरूप या उससे संबंधित विकास प्राधिकरण और छावनी बोर्ड ;
(xi) लोक पूत्र्त न्यास ;
(xii) निगमित या अनिगमित सोसाइटियां, क्लब या व्यक्तियों के अन्य संगम ;
(xiii) प्रत्येक स्वायत्त या कानूनी निकाय या निगम या कं पनी या सोसाइटी या कोई औद्योगिक, वाणिज्यिक, बैंककारी, बीमा या व्यापारिक उपक्रम, निगम, संस्था या कं पनी, चाहे वे संघ सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी की हो या नहीं ;
(xiv) पोत परिवहन और सन्निर्माण कं पनियां, वायु परिवहन कं पनियां, एयरलाइन्स और विज्ञापन अभिकरण ;
(ञ) "उचित बाजार मूल्य" से ऐसा मूल्य अभिप्रेत है, जिस पर लक्षद्वीप में खुले बाजार में समान प्रकार और क्वालटिी का माल, असंबद्ध पक्षकारों के बीच उसी मात्रा में विक्रय किया जाता है या विक्रय किया जाएगा ;
(ट) "माल" से, समय-समय पर यथा संशोधित पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट माल अभिप्रेत है ;
(ठ) "माल यान" से माल ले जाने में प्रयुक्त कोई मोटर यान, जलयान, नौका, पशु और किसी अन्य प्रकार का वाहन अभिप्रेत है ;
(ड) "सरकार" से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक की अध्यक्षता में लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासन अभिप्रेत है ;
(ढ) "आयात" से भारत के राज्यक्षेत्र में माल के आयात के अनुक्रम में विक्रय या क्रय, यदि विक्रय या क्रय, या तो ऐसे आयात के अवसर पर किया जाता है या माल के स्वामी के दस्तावेज के अंतरण से प्रभावित होता है, इससे पहले कि माल भारत की सीमाशुल्क सीमाओं को पार कर गया हो और इसमें लक्षद्वीप के बाहर से या तो क्रय के परिणामस्वरूप या अन्यथा माल का क्रय शामिल है ।
स्पष्टीकरण—विदेश से लक्षद्वीप में सीमाशुल्क के माध्यम से आने वाले माल की दशा में, लक्षद्वीप में माल का आयात उस4 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] स्थान पर होगा, जहां घरेलू उपभोग के लिए सीमाशुल्क द्वारा माल की निकासी की जाती है ;
(ण) "आयातकर्ता" में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे,—
(i) कोई व्यक्ति, जो लक्षद्वीप में अपना माल लाता है ;
(ii) कोई व्यक्ति, जिसके निमित्त कोई अन्य व्यक्ति लक्षद्वीप में माल लाता है ;
(iii) कें द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 6 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट परिस्थितियों में उद्भूत विक्रय की दशा में, लक्षद्वीप में वह व्यक्ति, जिसे माल परिदान किया जाता है ;
(त) माल के क्रय के संबंध में "इनपुट टैक्स" से माल के लिए क्रे ता द्वारा संदत्त कीमत का अनुपात अभिप्रेत है, जो कर प्रस्तुत करता है, जिसके लिए विक्रय करने वाला व्यौहारी इस विनियम के अधीन दायी है ;
(थ) "लक्षद्वीप" से लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ;
(द) व्याकरणिक रूपभेदों और इसके सजातीय पदों सहित "विनिर्माण" पद से, किसी माल का उत्पादन, निर्माण, निष्कर्षण, परिवर्तन, अलंकरण, परिष्करण या अन्यथा प्रसंस्करण, उपचार या अनुकू लन अभिप्रेत है, किं तु इसमें विनिर्माण की ऐसी कोई प्रक्रिया या रीति सम्मिलित नहीं है, जो विहित की जाए ;
(ध) "शुद्ध कर" से धारा 11 के अधीन किसी कर अवधि के लिए संगणित रकम अभिप्रेत है ;
(न) "अनिवासी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसके कारबार या निवास का लक्षद्वीप में कोई नियत स्थान नहीं है ;
(प) "अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है तथा "अधिसूचित करना" और "अधिसूचित" पदों का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा ;
(फ) "राजपत्र" से लक्षद्वीप का राजपत्र अभिप्रेत है ;
(ब) "विहित" से इस विनियम के अधीन सरकार द्वारा बनाए गए नियम द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(भ) "रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी" से इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त कोई व्यौहारी अभिप्रेत है ;
(म) "संबंधित व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो किसी अन्य व्यक्ति (जिसे इस परिभाषा में "व्यौहारी" कहा गया है) से संबंधित है, यदि वह व्यक्ति,—
(i) व्यौहारी का नातेदार है ;
(ii) भागीदारी है, जिसका व्यौहारी एक भागीदार है;
(iii) एक कं पनी है, जिसमें व्यौहारी [या तो अके ले है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ है, या ऐसे व्यक्ति, जो उपखंड (i), उपखंड (ii), उपखंड (iv), उपखंड (v) और उपखंड (vi) के अधीन व्यौहारी के संबंधी है] – प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चालीस प्रतिशत या अधिक बकाया वोटिंग स्टॉक या शेयर धारण करता है ;
(iv) जो [या तो अके ले है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ है, या ऐसे व्यक्ति, जो उपखंड (i), उपखंड (ii), उपखंड (iii), उपखंड (v) और उपखंड (vi) के अधीन व्यक्ति के संबंधी है] – प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चालीस प्रतिशत या अधिक बकाया वोटिंग स्टॉक या शेयरों का मालिक है ;
(v) कं पनी है, जिसमें किसी व्यक्ति द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चालीस प्रतिशत या बकाया वोटिंग स्टॉक धारण किया गया है [या तो अके ले है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ है, या ऐसे व्यक्ति, जो उपखंड (i), उपखंड (ii), उपखंड (iii), उपखंड (iv) और उपखंड (vi) के अधीन व्यक्ति के संबंधी है] वह भी चालीस प्रतिशत या अधिक बकाया वोटिंग स्टॉक या व्यौहारी का शेयर धारण करता है ; या
(vi) व्यौहारी द्वारा नियंत्रित किया जाता है या वह व्यक्ति, जिसे व्यौहारी नियंत्रित करता है, एक ऐसा व्यक्ति है, जो व्यौहारी को नियंत्रित करता है, उसी व्यक्ति द्वारा नियंत्रित होता है ;
(य) "संबंधी" से कं पनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 2 के खंड (77) में यथापरिभाषित संबंधी अभिप्रेत है ;
(यक) व्याकरणिक रूपभेदों और इसके सजातीय पदों सहित "विक्रय" से किसी व्यक्ति द्वारा नकद या आस्थगित संदाय के लिए या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए माल में संपत्ति का कोई अंतरण अभिप्रेत है (जिसके अंतर्गत एक सरकारी अभिकरण या विभाग द्वारा किए गए अनुदान या आर्थिक सहायता संदाय नहीं है, चाहे वह कें द्रीय सरकार की हो या राज्य सरकार की, किसी और की हो) और जिसके अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं,—
(i) भाड़ा क्रय या किस्तों द्वारा संदाय की अन्य प्रणाली द्वारा माल का अंतरण, किं तु इसमें माल का बंधक करना या रेहन रखना या प्रभारण या गिरवी रखना शामिल नहीं है ;
(ii) किसी सोसाइटी, जिसके अंतर्गत सहकारी सोसाइटी भी है, क्लब, फर्म या किसी संगम द्वारा अपने सदस्यों को नकद या आस्थगित संदाय के लिए या कमीशन, पारिश्रमिक या अन्य मूल्यवान प्रतिफल, चाहे वह कारबार के अनुक्रम में हो या नहीं, के लिए माल की पूर्ति ;
(iii) खंड (i) के उपखंड (v) में निर्दिष्ट नीलामकर्ता द्वारा माल में संपत्ति का अंतरण, या बैंककारी की प्रकृ ति में किसी अन्य क्रियाकलाप के अनुक्रम में माल का विक्रय, बीमा, जो उनके मुख्य क्रियाकलाप के अनुक्रम में भी5 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण माल को पुन: वापस ले लिया या फिर से दावा किया जाता है ;
(iv) नकद, आस्थगित संदाय या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए किसी माल में संपत्ति की संविदा के अनुसरण के अलावा अन्यथा अंतरण ;
(v) नकद, आस्थगित संदाय या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए किसी भी प्रयोजन के लिए (चाहे वह निर्दिष्ट अवधि के लिए हो या नहीं) किसी भी माल का उपयोग करने के अधिकार का अंतरण ;
(vi) किसी भी सेवा के साथ में या भागरूप में या किसी अन्य रीति में, चाहे जो भी हो, माल की, भोजन या मानव उपभोग के लिए कोई अन्य वस्तु (चाहे नशीली हो या नहीं), जहां ऐसी आपूर्ति या सेवा है, नकद, आस्थगित संदाय या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए आपूर्ति ;
(vii) इस धारा के खंड (i) के उपखंड (vii) में निर्दिष्ट माल का प्रत्येक निपटान और "विक्रय", "क्रय" और "खरीदना", शब्दों, जहां कहीं भी वे सभी व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित आते हैं, का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा ;
(यख) "विक्रय कीमत" से किसी विक्रय के लिए मूल्यवान प्रतिफल के रूप में संदत्त या संदेय रकम अभिप्रेत है, जिसके अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं—
(i) कर की रकम, यदि कोई हो, जिसके लिए धारा 3 के अधीन व्यौहारी दायी है ;
(ii) भाड़ा क्रय या किस्तों द्वारा संदाय की अन्य प्रणाली द्वारा माल के अंतरण के संबंध में, ऐसे परिदान के लिए किसी व्यक्ति को संदेय मूल्यवान प्रतिफल की रकम, जिसके अंतर्गत ऐसे संव्यवहार के आनुषंगिक किराया प्रभार, ब्याज और अन्य प्रभार भी सम्मिलित हैं;
(iii) किसी भी प्रयोजन के लिए किसी भी माल के उपयोग करने के अधिकार के अंतरण के संबंध में, (चाहे वह विनिर्दिष्ट अवधि के लिए हो या नहीं) इस प्रकार के अंतरण के लिए प्राप्त या प्राप्य मूल्यवान प्रतिफल या भाड़ा प्रभार ;
(iv) माल के परिदान के समय, या उससे पहले, माल के संबंध में व्यौहारी द्वारा की गई किसी भी बात के लिए प्रभारित कोई राशि ;
(v) कें द्रीय उत्पाद-शुल्क अधिनियम, 1944 (1944 का 1) या सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) या लक्षद्वीप उत्पाद-शुल्क विनियम के अधीन माल पर उद्गृहीत या उद् ग्रहणीय शुल्कों की रकम, चाहे वह विक्रे ता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा संदेय हो ;
(vi) विक्रे ता द्वारा जमा के रूप में प्राप्त या प्राप्य रकम (चाहे वह वापसी योग्य हो या नहीं), जो प्राप्त हुई है या प्राप्य है, चाहे वह पृथक् करार के माध्यम से हो या नहीं या माल के विक्रय के लिए आनुषंगिक हो या सहायक;
और
(vii) संकर्म संविदा के संबंध में, संकर्म संविदा के निष्पादन के लिए किसी व्यौहारी को संदत्त या संदेय मूल्यवान प्रतिफल की रकम निम्नलिखित से कम होगी,—
(क) छू ट के रूप में अनुज्ञात कोई रकम, जो सामान्यत:
व्यापार में प्रचलित प्रथा के अनुसार विक्रय मूल्य को कम करेगी;
(ख) ढुलाई या परिदान की लागत या संस्थापन की लागत, उन मामलों में, जहां ऐसी लागत अलग से प्रभारित की जाती है और व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित "क्रय कीमत" शब्दों का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा :
परंतु जहां व्यौहारी भारत के राज्यक्षेत्र में आयातित माल का विक्रय करता है, वहां विक्रय मूल्य निम्नलिखित में से अधिक होगा,—
(क) व्यौहारी द्वारा प्राप्त या प्राप्य मूल्यवान प्रतिफल ;
(ख) ऐसे माल के आयात के समय, सीमाशुल्क के संदाय के लिए सीमाशुल्क प्राधिकारियों द्वारा अवधारित मूल्य ;
(यग) "अनुसूची" से इस विनियम से संलग्न अनुसूचियां अभिप्रेत हैं ;
(यघ) "कर" से इस विनियम के अधीन संदेय कर अभिप्रेत है ;
(यङ) "कराधेय मात्रा" से धारा 18 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट रकम की मात्रा अभिप्रेत है ;
(यच) "कर बीजक" से धारा 50 में निर्दिष्ट बीजक अभिप्रेत है ;
(यछ) "कर अवधि" से इस विनियम के अधीन बनाए गए नियमों में विहित अवधि अभिप्रेत है ;
(यज) "कर भाग" से आर/(आर+100) सूत्र के अनुसार संगणित भाग अभिप्रेत है, जहां 'आर' इस विनियम के अधीन विक्रय पर लागू कर की प्रतिशत दर है ;
(यझ) "के अनुक्रम में" पद में क्रियाकलाप के संबंध में या उसके आनुषंगिक प्रयोजन के लिए किए गए और क्रियाकलाप की तैयारी और क्रियाकलाप की समाप्ति के भाग के रूप में किए जाने वाले क्रियाकलाप सम्मिलित हैं ;
(यञ) "परिवाहक" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो अपने कारबार के प्रयोजन के लिए या उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक या उसके अनुक्रम में परिवहन करता है या माल परिवहन कारित करता है और जिसमें कोई भी व्यक्ति सम्मिलित है, जिसका रेल, पोत परिवहन कं पनी, एयर कारगो टर्मिनल, अंतर्देशीय आधान डिपो, आधान ढुलाई स्टेशन, कोरियर सेवा या एयरलाइन प्रचालन का कारबार है या जिसके कारबार में ये सम्मिलित है ;
6 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A](यट) "आवर्तन" से किसी कर अवधि में व्यक्ति द्वारा प्राप्त या प्राप्य विक्रय कीमत की कु ल रकम, घटाया हुआ कोई कर अभिप्रेत है, जिसके लिए धारा 3 के अधीन व्यक्ति दायी है ;
(यठ) "क्रय आवर्तन" से किसी कर अवधि में किसी व्यक्ति द्वारा संदत्त या संदेय क्रय कीमत की कु ल रकम अभिप्रेत है, जिसमें इनपुट कर सम्मिलित नहीं है ;
(यड) "माल की कीमत" से माल का उस समय का उचित बाजार मूल्य अभिप्रेत है, जिसके अंतर्गत बीमा प्रभार, उत्पाद- शुल्क, प्रतिशुल्क, विक्रय के संबंध में के न्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन संदत्त या संदेय कर, परिवहन प्रभार, ढुलाई प्रभार और माल के संव्यवहार से आनुषंगिक सभी अन्य प्रभार भी हैं ;
(यढ) "कार्य संविदा" के अंतर्गत नकद या आस्थगित संदाय या मूल्यवान प्रतिफल, भवन सन्निर्माण, विनिर्माण, प्रसंस्करण, गढ़ना, परिनिर्माण, संस्थापन, सज्जित करना, समुन्नति, मरम्मत या किसी जंगम या स्थावर संपत्ति को प्रवर्तन में लाने के लिए क्रियान्वित करने हेतु कोई करार भी है ;
(यण) "वर्ष" से अप्रैल के पहले दिन से मार्च के अंतिम दिन तक का वित्तीय वर्ष अभिप्रेत है ।
(2) इस विनियम में जब तक कि अन्यथा विनिर्दिष्ट न हो,—
(क) "लेखन" में निर्दिष्ट अभिव्यक्तियों में मुद्रण, टंकण, लिथोग्राफी, फोटोग्राफी और दृश्यमान रूप में शब्दों को प्रस्तुत करने या पुन:प्रस्तुत करने के अन्य तरीके सम्मिलित होंगे ; और (ख) किसी ऐसे व्यक्ति के संदर्भ में, जो अपने नाम का हस्ताक्षर करने में असमर्थ है, "हस्ताक्षर" शब्द में उसके अंगूठे का निशान या उसके हस्ताक्षर संज्ञापित करने के लिए सम्यक् रूप से अनुप्रमाणित अन्य चिह्न सम्मिलित होगा । (3) उन शब्दों और पदों के , जो इस विनियम में परिभाषित नहीं हैं, किं तु भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे, जो उक्त अधिनियम में क्रमश: उनके हैं ।
अध्याय 2
कर का उद् ग्रहण
3. कर का उद् ग्रहण— (1) इस विनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक व्यौहारी, जो,—
(क) इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त है ; या (ख) इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त होना अपेक्षित है,
इस विनियम के अनुसार संगणित कर का संदाय, इस विनियम में उपबंधित रीति में और समय पर करने का दायी होगा । (2) प्रत्येक ऐसा व्यौहारी, जो माल के विक्रय पर, इस विनियम के अधीन कर का संदाय करने का दायी हो गया है, तब तक इस प्रकार दायी बना रहेगा, जब तक पूर्ववर्ती बारह मास, या ऐसी और अवधि, जो विहित की जाए, के दौरान उसका कराधेय आवर्तन कराधेय मात्रा से कम रहता है और बारह मास या ऐसी और अवधि की समाप्ति पर, कर संदाय करने का उसका दायित्व समाप्त हो जाएगा :
परंतु कोई ऐसा व्यौहारी, जिसका इस विनियम के अधीन कर संदाय करने का दायित्व किसी अन्य कारण से समाप्त हो जाता है, वह अपना रजिस्ट्रीकरण रद्द कराने के लिए पहले आवेदन कर सके गा और ऐसे रद्दकरण पर, कर संदाय करने का उसका दायित्व समाप्त हो जाएगा :
परंतु यह और कि व्यौहारी, उस तारीख तक कर संदाय करने का दायी होगा, जिस तारीख को उसका रजिस्ट्रीकरण समाप्त कर दिया गया है ।
(3) प्रत्येक ऐसा व्यौहारी, जिसका इस विनियम के अधीन कर संदाय करने का दायित्व समाप्त हो गया है या जिसका रजिस्ट्रीकरण रद्द कर दिया गया है, यदि उसके आवर्तन का किसी भी वर्ष के प्रारंभ से संगणित किया जाता है, जिसके अंतर्गत ऐसा वर्ष भी है, जिसमें रजिस्ट्रीकरण रद्द कर दिया गया है, यदि ऐसे वर्ष के भीतर किसी भी दिन कराधेय मात्रा पुन:
अधिक हो जाती है तो, उस तारीख से और उसके पश्चात् उसके द्वारा किए गए सभी विक्रय पर, उस तारीख से ही, जिसको उसका आवर्तन फिर से कराधेय मात्रा से अधिक हो जाता है, ऐसे कर का संदाय करने के लिए दायी होगा ।
(4) जहां यह पाया जाता है कि व्यौहारी के रूप में रजिस्ट्रीकृ त किसी व्यक्ति को इस प्रकार रजिस्ट्रीकृ त नहीं होना चाहिए था, तो इस विनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसा व्यक्ति, उस अवधि के लिए, जिसके दौरान वह रजिस्ट्रीकृ त था, कर का संदाय करने का दायी होगा । (5) यदि कोई ऐसा व्यक्ति, जो माल का परिवहन करता है या किसी व्यक्ति की ओर से या उसके निमित्त परिदान करने के लिए माल को अभिरक्षा में रखता है तो ऐसा करने के लिए आयुक्त द्वारा अपेक्षित होने पर,—
(क) माल के संबंध में, अपने पास की कोई जानकारी प्रस्तुत करने में ; या
(ख) उसके निरीक्षण की अनुमति देने में,
असफल रहता है तो ऐसी किसी अन्य कार्रवाई पर, जो ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध की जा सकती है, प्रतिकू ल प्रभाव डाले बिना, यह उपधारणा की जा सके गी कि उस माल का, जिसके संबंध में वह जानकारी प्रस्तुत करने में या जिसके निरीक्षण की अनुमति देने में असफल रहा है, वह स्वामी है और वह उसके द्वारा लक्षद्वीप में विक्रय के लिए धारण किया गया है और उस पर विनियम के उपबंध लागू होंगे ।
(6) यदि कोई ऐसा व्यक्ति, जो मालिक, अभिकर्ता के रूप में या किसी अन्य हैसियत से लक्षद्वीप में कोई प्रदर्शनी-सह- विक्रय का आयोजन करता है और,—
(क) प्रदर्शनी-सह-विक्रय से पहले, उसके दौरान या उसके पश्चात्, किसी प्रतिभागी द्वारा खरीदे गए या स्टॉक में रखे गए7 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण या विक्रय किए गए माल के संबंध में कोई जानकारी प्रस्तुत करने ; या
(ख) यह सुनिश्चित करने कि प्रदर्शनी-सह-विक्रय में सभी प्रतिभागियों ने इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण अभिप्राप्त किया है और शोध्य कर का संदाय कर दिया है ; या
(ग) प्रतिभागियों के कारबार परिसर या माल या खाते और अभिलेखों के निरीक्षण की अनुमति देने ; या
(घ) प्रदर्शनी-सह-विक्रय के संबंध में आयोजक के खाते और अभिलेखों के निरीक्षण की अनुमति देने,
में असफल रहता है, तो ऐसी किसी अन्य कार्रवाई पर, जो ऐसे प्रतिभागी के विरुद्ध की जा सकती है, प्रतिकू ल प्रभाव डाले बिना, यह उपधारणा की जा सके गी कि ऐसे प्रतिभागी, जो इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्राप्त करने में असफल रहा है, के माल का, या उस माल का, जिसके संबंध में प्रतिभागी जानकारी प्रस्तुत करने में या निरीक्षण की अनुमति देने में असफल रहा है, का स्वामी आयोजक है और वह उसके द्वारा लक्षद्वीप में विक्रय के लिए धारण किया गया है और उस पर विनियम के उपबंध लागू होंगे ।
4. कर की दर— (1) ऐसे माल के संबंध में, जिसका विवरण पहली अनुसूची में दिया गया है, व्यौहारी के कराधेय आवर्तन पर, उस अनुसूची में यथा विनिर्दिष्ट कर की दर संदेय होगी ।
(2) सरकार, अधिसूचना द्वारा, यदि वह आवश्यक समझे, पहली अनुसूची में यथा विनिर्दिष्ट कर की दरों को संशोधित कर सके गी ।
5. कराधेय आवर्तन—इस विनियम के प्रयोजनों के लिए, "कराधेय आवर्तन" से कर अवधि के दौरान किसी व्यौहारी का आवर्तन अभिप्रेत है, जो उसमें से निम्नलिखित की कटौती करने के पश्चात् शेष बचता है,—
(क) ऐसे विक्रय का आवर्तन, जो धारा 7 के अधीन कर के अध्यधीन नहीं है ; और
(ख) ऐसे माल के विक्रय का आवर्तन, जो धारा 6 के अधीन कर से छू ट प्राप्त है ।
6. कर से छू ट प्राप्त विक्रय—दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध किए जाने वाला माल, उक्त अनुसूची में उपवर्णित निबंधनों और अपवादों के अध्यधीन रहते हुए, कर से छू ट प्राप्त होगा । 7. कतिपय विक्रय का कर से दायी न होना—इस विनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों में अंतर्विष्ट कोई बात, किसी माल के विक्रय के संबंध में कर अधिरोपित करने वाली या अधिरोपण के लिए प्राधिकृ त करने वाली नहीं समझी जाएगी, जब ऐसा विक्रय,—
(क) अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में होता है ; या
(ख) लक्षद्वीप से बाहर होता है ; या
(ग) भारत के राज्यक्षेत्र में माल के आयात के या राज्यक्षेत्र से बाहर माल के निर्यात के अनुक्रम में होता है ; या (घ) विदेशी वायुयान (ईंधन पर कर और शुल्क से छू ट) अधिनियम, 2002 (2002 का 36) की धारा 3 के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, कें द्रीय सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार ईंधन और स्नेहक तेलों के विक्रय पर कोई कर नहीं लगाया जाएगा, जो भारत से भिन्न अन्य देश में रजिस्ट्रीकृ त किसी भी वायुयान का भाग बनने वाले रिसेप्टकल्स में भरे जाते हैं, यदि,—
(i) उक्त देश अंतरराष्ट्रीय और नागरिक उड्डयन पर कन्वेंशन, 1944 का एक पक्षकार है ;
(ii) उक्त देश ने भारत के साथ एक वायु सेवा करार किया है ; और
(iii) वायुयान भारत के लिए या भारत से किसी अनुसूचित या गैर-अनुसूचित सेवा पर प्रचालित है । 8. कर का समायोजन—(1) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाए, यह धारा वहां लागू होगी, जहां किसी व्यौहारी द्वारा माल के विक्रय के संबंध में,—
(क) वह विक्रय रद्द कर दिया गया है ;
(ख) उस विक्रय की प्रकृ ति को मौलिक रूप से फे रफार या परिवर्तित कर दिया गया है ;
(ग) उस विक्रय के लिए पहले से सहमत प्रतिफल में, प्राप्तकर्ता के साथ करार द्वारा, या तो छू ट के प्रस्ताव या किसी अन्य कारण से, परिवर्तित कर दिया गया है ;
(घ) विक्रय किया गया माल या माल का भाग, विक्रय की तारीख से छह मास के भीतर व्यौहारी को वापस कर दिया गया है ; या
(ङ) माल के क्रय के लिए क्रे ता द्वारा देय संपूर्ण कीमत या उसका कु छ भाग व्यौहारी द्वारा डूबंत ऋण के रूप में दिखा दिया गया है ;
और व्यौहारी ने,--
(i) उस क्रय के संबंध में कर बीजक प्रदान कर दिया है और उस विक्रय पर कर के रूप में भारित उसमें दर्शित रकम, उस विक्रय पर उचित रूप से कर प्रभार्य नहीं है ; या (ii) कर अवधि के संबंध में विवरणी प्रस्तुत कर दी है, जिसके संबंध में उस विक्रय पर कर आरोप्य माना जा सका है और उस विक्रय पर कर की रकम के लिए संगणित किया गया है कि उस विक्रय पर उचित रूप से रकम प्रभार्य नहीं है । (2) जहां किसी व्यौहारी ने उपधारा (1) में अनुध्यात रूप से कर की गलत रकम का हिसाब लगाया है, वह व्यौहारी उस कर अवधि के लिए विवरणी में उस व्यौहारी द्वारा देय कर की गणना का समायोजन करेगा, जिसके दौरान यह प्रकट है कि कर गलत है और यदि,—
(क) उस विक्रय के संबंध में संदेय कर वास्तव में व्यौहारी द्वारा संगणित किए गए कर से अधिक है, उस अतिरिक्त रकम8 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] को उस कर अवधि में, जिसमें समायोजन किया गया है, उत्पन्न हुआ माना जाएगा और किसी पूर्व कर अवधि के लिए नहीं माना जाएगा ; या
(ख) कर वास्तव में विक्रय के संबंध में देय कर से अधिक है, उस कमी की रकम को उस कर अवधि में, जिसमें समायोजन किया गया है, व्यौहारी द्वारा देय कर से घटाया जाएगा और किसी पूर्व कर अवधि के लिए नहीं माना जाएगा ।
(3) जहां व्यौहारी माल विक्रय करता है, जिसका उपयोग,—
(क) ऐसा विक्रय, जो इस विनियम के अधीन कर के अध्यधीन है या ऐसा विक्रय, जो धारा 7 के अधीन कर के लिए दायी नहीं है, का भाग बनाने के लिए किया गया है ; और (ख) अन्य प्रयोजनों का भाग बनाने के लिए किया गया है, माल के विक्रय पर कर की रकम, निम्न में से अधिक होगी,—
(i) ए—(ए x बी/सी) ; या
(ii) ए— बी ;
जहां ए = वह कर, जिसके लिए व्यौहारी इस धारा के अतिरिक्त विक्रय के संबंध में दायी होगा ;
बी = वह रकम, जिसके द्वारा धारा 9 की उपधारा (4) के अधीन माल के संबंध में व्यौहारी का प्रतिदेय कर कम किया गया था ;
सी = धारा 9 की उपधारा (4) के अधीन कटौती से पहले कर प्रत्यय की रकम ।
9. कर प्रत्यय— (1) कोई कर प्रत्यय—
(क) किसी ऐसे व्यक्ति से, जो रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी नहीं है, क्रय किए गए माल के बदले माल के क्रय की दशा में अनुज्ञात नहीं किया जाएगा;
(ख) गैर-विश्वसनीय माल के क्रय के लिए तीसरी अनुसूची में यथा सूचीबद्ध है;
(ग) ऐसे माल के क्रय के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाना है जिसे व्यक्ति द्वारा स्वामित्व या अधिकृ त भवन के संन्निर्माण में सम्मलित किए जाने हैं ;
(घ) ऐसे व्यौहारी से क्रय किए गए माल के लिए जो धारा 16 के अधीन कर संदत्त करने के लिए चुने गए हैं, अनुज्ञात नहीं किया जाएगा ;
(ड.) नैमित्तिक व्यापारी से क्रय किए गए माल के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाएगा;
(च) व्यौहारी या व्यौहारियों के वर्ग को, तब तक अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक क्रय करने वाले व्यौहारी द्वारा संदत्त कर वास्तव में विक्रय करने वाले व्यौहारी द्वारा सरकार के पास जमा न करा दिया गया हो या आउटपुट कर देयता के प्रति विधिपूर्ण समायोजन न करा दिया गया हो और सम्बधित कर अवधि के लिए फाइल की गई विवरणी में ठीक से परावर्तित न कर दिया गया हो ।
(2) कर प्रत्यय की रकम, जिसके लिए व्यौहारी माल के क्रय के संबंध में हकदार है उपधारा (3), उपधारा (5) और उपधारा (7) में विहित रीति में कम की गई कर अवधि में होने वाले इनपुट कर की रकम होगी ।
(3) जहां किसी व्यौहारी ने माल क्रय किया है और माल भागत: उपधारा (1) में निर्दिष्ट विक्रय के प्रयोजन के लिए औऱ भागत: अन्य प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जाना है, वहां प्रत्यय कर की रकम अनुपाततः कम कर दी जाएगी । (4) व्यौहारी द्वारा उस विस्तार तक, जिसके लिए माल धारा 10 की उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट रीति में प्रयुक्त किया जाता है, अवधारित करने की पद्धति उन परिस्थितियो में ऋजु और युक्तियुक्त होगी :
परन्तु आयुक्त—
(क) कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात्, व्यौहारी द्वारा अपनाई गई पद्धति को अस्वीकार कर सके गा और कर प्रत्यय की रकम की गणना कर सके गा ; और
(ख) कतिपय मामलों में कर प्रत्यय की रकम या किसी समायोजन या कर प्रत्यय की रकम की कमी की सगंणना करने के लिए विहित कर सके गा ।
(5) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहाँ—
(क) व्यौहारी ने ऐसा माल (पू ंजी माल से भिन्न) क्रय किया है जिसके लिए उपधारा (1) के अधीन कर प्रत्यय उत्पन्न होता है ;
(ख) ऐसे माल में से विनिर्मित माल या मालों को—
(i) अनिवासी परेषण अभिकर्ता; या
(ii) व्यौहारी की अनिवासी शाखा के लिए अन्तरण के मद्दे लक्षद्वीप से निर्यात किया जाना है ; और
(ग) अन्तरण लक्षद्वीप में किए गए विक्रय के रूप में नहीं होगा ; कर प्रत्यय की रकम विहित किए गए प्रतिशत द्वारा कम कर दी जाएगी ।
स्पष्टीकरण—शंकाओं को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि अरजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी से माल के क्रय के लिए कोई कर प्रत्यय अनुज्ञात नहीं की जाएगी ।
(6) कर प्रत्यय का किसी व्यौहारी द्वारा के वल तभी दावा किया जा सके गा यदि वह उस समय कर बीजक धारण करता है जब कर अवधि के लिए विहित की गई विवरणी प्रस्तुत करता है।
(7) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां—
(क) व्यौहारी ने ऐसा माल (पू ंजी माल से भिन्न) क्रय किया है जिसके लिए उपधारा (1) के अधीन कर प्रत्यय हुआ है;
और
(ख) ऐसे माल में से विनिर्मित मालों को के न्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 8 की9 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण उपधारा (1) के अधीन किए गए विक्रय के रूप में लक्षद्वीप से निर्यात किए जाने हैं, तो कर प्रत्यय की रकम विहित किए गए प्रतिशत से कम कर दी जाएगी।
(8) उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंधों के अध्यधीन, विक्रय के लिए उपयोग किए जाने वाले माल का कर प्रत्यय, धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (यख) के उपखंड (v) में यथा परिभाषित है जो निम्नानुसार अनुज्ञात किया जाएगा :—
(क) कर अवधि में उत्पन्न हुए ऐसे माल के इनपुट कर का ¼ वां हिस्सा उसी कर अवधि में;
(ख) तीन ठीक वित्तीय वर्षों में, तत्स्थानी कर अवधि में समान अनुपात में, ऐसे इनपुट कर का शेष ¾वां हिस्सा । 10. कर प्रत्यय का समायोजन—(1) जहां किसी क्रे ता को धारा 51 के निबंधनानुसार साख पत्र या नामे नोट जारी किया गया है या यदि वह क्रय किए गए माल को वापस लौटाता है या उसे अस्वीकृ त कर देता है जिसके परिणामस्वरूप उसके द्वारा किसी ऐसी कर अवधि के संबंध में कर प्रत्यय का दावा किया जाता है जो माल को क्रय करने से संबंधित है, या अधिक हो जाता है, वहां वह ऐसे कर अवधि की बाबत जिसमें साख पत्र या नामे नोट जारी किया गया या माल वापस लिया जाता है उसे अनुज्ञात कर प्रत्यय की रकम को समायोजित करके ऐसी कम या अधिक की प्रतिपूर्ति करेगा ।
(2) यदि माल—
(क) धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के आशय से क्रय किया गया था और तत्पश्चात् उन प्रयोजनों से भिन्न जो उक्त उपधारा के अधीन विनिर्दिष्ट है, पूर्णत: या भागत: उपयोग किया गया है;
या
(ख) उक्त धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन उन विनिर्दिष्ट प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजन से क्रय करना आशयित था, और तत्पश्चात् उन प्रयोजनों से भिन्न जो उक्त उपधारा में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए पूर्णत: या भागत: उपयोग किया गया है, ऐसे क्रय में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए दावा किए गए, कर प्रत्यय उस कर अवधि के लिए घटाया या बढ़ाया जाएगा (यथास्थिति) जिसके दौरान उक्त उपयोग अन्यथा हुआ था । (3) जहां—
(क) माल व्यौहारी द्वारा क्रय किया गया था;
(ख) व्यौहारी ने माल की बाबत कर प्रत्यय का दावा किया और विहित प्रतिशत कर से प्रत्यय में कम नहीं किया जाता ; और
(ग) माल लक्षद्वीप से निर्यात किया है—
(i) के न्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 8 की उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार किए गए विक्रय के माध्यम से ; या
(ii) विक्रय रूप से भिन्न, रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी की शाखा के लिए या परेषण अभिकर्ता व्यौहारी,
विहित अनुपात द्वारा वास्तविक रूप से दावा किए गए कर प्रत्यय की रकम को कम करेगा ।
(4) यदि माल जो व्यौहारी द्वारा क्रय किया गया था—
(क) धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए जाने के लिए आशयित था ; और (ख) तत्पश्चात् व्यक्ति द्वारा स्वामित्वाधीन या अधिभोग भवन के संनिर्माण में सम्मिलित किया गया है,
तो ऐसे क्रय की बाबत दावा किए गए कर प्रत्यय ऐसी कर अवधि में कम किया जाएगा जिसके दौरान ऐसा निगमन होता है ।
(5) जहां माल जो व्यौहारी द्वारा क्रय किया गया है ऐसे मूल्य से कम मूल्य पर विक्रय किया जाता है जिस पर इसे व्यौहारी द्वारा क्रय किया गया था तो ऐसे क्रय पर कर प्रत्यय उस कर अवधि, जिसके दौरान माल विक्रय किया जाता है, आनुपातिक रूप से कम हो जाएगा ।
11. शुद्ध कर—(1) कर अवधि के लिए किसी व्यौहारी द्वारा संदेय शुद्ध कर को निम्नलिखित सूत्र द्वारा अवधारित किया जाएगा—
शुद्ध कर = ओ—आई—सी
जहां—
ओ = कर अवधि में उत्पन्न होने वाले कराधेय आवर्तन की बाबत धारा 4 में नियत दरों पर व्यक्ति द्वारा संदेय कर की रकम धारा 8 द्वारा अपेक्षित संदेय कर को किसी समायोजन को ध्यान में रखते हुए समायोजित की जाएगी ।
आई = कर अवधि में उत्पन्न होने वाले कर प्रत्यय की रकम जिसके लिए व्यक्ति धारा 9 के अधीन हकदार है, धारा 10 द्वारा अपेक्षित कर प्रत्यय को किसी समायोजन को ध्यान में रखते हुए समायोजित की जाएगी ।
सी = रकम, यदि कोई हो, उपधारा (2) के अधीन पूर्व कर अवधि से अग्रेषित की जाएगी ।
(2) जहां व्यौहारी का शुद्ध कर उपधारा (1) के अधीन ऋणात्मक मूल्य के बराबर है वहां व्यौहारी—
(क) के न्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन उसके द्वारा संदेय कर को, यदि कोई हो, के विरुद्ध उसी कर अवधि में उक्त रकम, समायोजित करेगा; और (ख) उपधारा (2) के खण्ड (क) के अधीन आवेदन के पश्चात् शेष रकम को, यथास्थिति, अगले कलैण्डर मास या कर अवधि के लिए, उसी वर्ष में अग्रनीत करने का हकदार होगा या उसी वर्ष की कर अवधि के अन्त में उपधारा (2) के खण्ड (क) के अधीन आवेदन करने के पश्चात् वापसी का दावा करने का हकदार होगा और आयुक्त धारा 38 और धारा 39 में वर्णित रीति से दावे वापस करेगा ।
(3) इस विनियम के अधीन किसी संविदाकार द्वारा संकर्म संविदा के निष्पादन में संविदाकार को संविदा द्वारा आपूर्ति किए गए माल के मूल्य का प्रतिनिधित्व करने वाली10 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] रकम पर कोई कर संदेय नहीं होगा, जिसमें संविदा के शर्तों के अधीन ऐसे माल का स्वामित्व संविदी के पास रहता है और संविदाकार को संविदी द्वारा आपूर्ति किए गए माल के मूल्य का प्रतिनिधित्व करने वाली रकम में संविदी का हिस्सा नहीं है और संकर्म संविदा के निष्पादन के लिए संविदी द्वारा संविदाकार को संदेय रकम से कटौती योग्य नहीं है ।
12. वह समय, जिस पर आवर्तन की रकम, क्रयों के आवर्तन और समायोजन उद्भूत होता है— (1) उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी व्यौहारी के आवर्तन और क्रयों के आवर्तन जो किसी कर अवधि के दौरान उत्पन्न होती है, की रकम ऐसे व्यौहारी के लेखाओं में अभिलिखित रकम वहां होगी जहां उन लेखाओं को नियमित रूप से और सुनियोजित रूप से तैयार किया जाता है और बनाए रखा जाता है, उनके व्यापार का सही अवलोकन किया जाता है औऱ व्यौहारी द्वारा वाणिज्यिक या आय-कर के प्रयोजनों के लिए व्यौहारी के कारबार के आवर्तन का अवधारण करने में नियोजित किया जाता है ।
(2) आयुक्त अधिसूचना द्वारा—
(क) व्यौहारी के कतिपय वर्गों को संदत्त या रकम के आधार पर आवर्तन रिकार्ड करने के लिए अनुज्ञात कर सके गा ;
और
(ख) देय या प्राप्य रकम के आधार पर व्यौहारी के कतिपय वर्गों को आवर्तन रिकार्ड करने के लिए अपेक्षा कर सके गा ।
(3) जहां कोई व्यौहारी क्रयों के आवर्तन और आवर्त को अवधारित करने वाली पद्धति को परिवर्तन करने की इच्छा रखता है तो वह के वल आयुक्त की सहमति से और निबंधनों और शर्तों पर जो आयुक्त अधिरोपित करे, परिवर्तन कर सके गा । (4) सरकार वह समय विहित कर सके गी जिस पर व्यौहारी :—
(क) आवर्तन ;
(ख) क्रयों के आवर्तन ; और
(ग) कर का समायोजन या कर प्रत्यय का समायोजन को, संव्यवहारों के किसी वर्ग के लिए उत्पन्न होने के रूप में मानेगा ।
अध्याय 3
विशेष व्यवस्थाएं
13. पूर्विकता—जहां इस अध्याय के उपबंध अध्याय 2 के उपबंध से असंगत है, वहां इस अध्याय के उपबंध असंगति की मात्रा तक अभिभावी होंगे।
14. संक्रमण के दौरान अग्रनीत स्टाक का उपचार—(1) इस विनियम के प्रारम्भ से चार मास की अवधि के भीतर उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रत्यय के दावे की इच्छा करने वाले सभी रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, व्यापार संबंधी स्टाक (जिसे इस धारा में आरम्भिक स्टाक कहा गया है) के लिए अपने व्यापार संबंधी स्टाक, कच्ची सामग्री औऱ पैकिं ग सामग्री के विवरण आयुक्त को प्रस्तुत करेगा ।
(2) शंका को दूर करने के लिए उपधारा (2) के अधीन किसी कर प्रत्यय का—
(क) कच्ची सामग्री या पू ंजी माल पर संदत्त कर के बिना विनिर्मित किए गए तैयार माल ;
(ख) प्रारम्भ के पश्चात् चार मास से अधिक पर प्रस्तुत किए गए विवरण ; या
(ग) आरम्भिक स्टाक जो लक्षद्वीप के बाहर किए हैं, के लिए दावा नहीं किया जा सके गा।
(3) आरंभिक स्टाक पर एक लाख रुपये से अधिक कर प्रत्यय का दावा करने की वांछा रखने वाला प्रत्येक व्यौहारी विहित प्रारूप में, विवरण के साथ लेखाकार द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र प्रस्तुत करेगा जिसमें प्रमाणित किया गया हो कि शुद्ध प्रत्यय दावा सत्य और सही है ।
15. उपयोग किया हुआ माल—(1) इस धारा के उपबंध लागू होंगे जहां—
(क) एक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी उपयोग किया हुआ माल विक्रय करता है ;
(ख) एक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी ऐसे निवासी विक्रे ता से माल खरीदता है, जो इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त नहीं था ;
(ग) माल या तो गैर-उपांतरित प्ररूप में पुन: विक्रय के लिए व्यापार स्टाक के रूप में या अन्यथा या व्यापार संबंधी स्टाक में सम्मिलित करने पर प्रभाग के लिए कच्ची सामग्री के रूप में खरीदा गया था ;
(घ) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, यथास्थिति, माल या माल के विक्रय पर जिसमें वे सम्मिलित थे धारा 3 के अधीन कर के लिए दायी होगा ; और
(ड.) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी मालों के लिए संदत्त रकम का पर्याप्त सबूत रखेगा ।
(2) उपधारा (1) में उल्लिखित परिस्थितियों में रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी—
(क) निवासी विक्रे ता द्वारा उत्पन्न इनपुट कर जब उसने माल क्रय किया हो;
(ख) निवासी विक्रे ता के लिए माल की वास्तविक लागत का कर भाग ;
(ग) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी द्वारा अपने क्रय के समय पर माल की उचित बाजार मूल्य का कर भाग ; या
(घ) माल के लिए रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी द्वारा संदत्त प्रतिफल के कर भाग का धारा 9 के प्रयोजन के लिए कर प्रत्यय का हकदार होगा ।
(3) जहां दो हजार रुपए से अधिक के माल के लिए रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी द्वारा संदत्त रकम, कर प्रत्यय, कर अवधि में अनुज्ञात की जाएगी जब माल रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी द्वारा11 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण विक्रय किया गया है या माल जिसमें वे सम्मिलित किए हैं रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी द्वारा विक्रय कर दिया गया है । 16. विनिर्दिष्ट व्यौहारी के लिए स्कीम की सरंचना—
(1) इस विनियम में प्रतिकू ल किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक व्यौहारी जिसका—
(क) प्रारम्भ से पूर्ववर्ष में आवर्तन ; या
(ख) वतर्मान वर्ष में आवर्तन पांच लाख या ऐसी अन्य रकम जो सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, से अधिक नहीं है, उसे इस धारा के अधीन कर संदाय करने का विकल्प होगा :
परन्तु यह उपधारा उस व्यौहारी पर लागू नहीं होगी जो वर्ष के दौरान किसी समय पर जिसमें उसे इस उपधारा के अधीन का सदांय करने का विकल्प है या यदि वह के न्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन लक्षद्वीप में रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी है, लक्षद्वीप के बाहर किसी स्थान से माल उत्पात कर रहा है या लक्षद्वीप के बाहर किसी स्थान से माल विक्रय या प्रदान कर रहा है :
परन्तु यह और कि उस मामले में, जिसमें सरकार ने उपधारा (12) के अधीन व्यौहारियों के वर्ग के लिए स्कीम सरंचना अधिसूचित की है, ऐसे व्यौहारी को इस उपधारा के अधीन कर सदाय करने का विकल्प नहीं होगा ।
(2) इस अधिनियम की धारा 19 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करते समय उपधारा (1) के अधीन आने वाले व्यौहारी के लिए यह विनिर्दिष्ट करना अपेक्षित होगा कि वह इस धारा के अधीन कर संदाय करने का आशय रखता है :
परन्तु यदि एक बार व्यौहारी इस धारा के अधीन कर संदाय करने का चुनाव करता है तो विकल्प के वल उस वर्ष के अन्त के पश्चात् वापस लिया जा सके गा जिसमें विकल्प आवेदन द्वारा ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, आयुक्त को किया गया था :
परन्तु यह और कि जहां व्यौहारी इस धारा के अधीन कर संदाय करने के अपने विकल्प को वापस लेने का चुनाव करता है तो वह उस तारीख पर, जब ऐसा वापस लेना धारा 20 में अन्तर्विष्ट परिस्थितियों में प्रभावशील होता है जहां तक ये लागू हो, लक्षद्वीप में उसके द्वारा किए गए व्यापार संबंधी स्टाक, कच्ची सामग्री और पैकिं ग सामग्री पर इस विनियम के अधीन संदत्त कर के प्रत्यय का दावा करने के लिए पात्र होगा । (3) उस दशा में, जहां कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन कर संदाय करने के लिए चुनाव करता है, जिसका इस विनियम के प्रारम्भ के पूर्व वर्ष में आवर्तन पांच लाख या ऐसी अन्य रकम जो सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए से अधिक नहीं है, तो उसी के लिए इस धारा के अधीन ऐसे समय के भीतर, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, कर संदाय करने का चुनाव विनिर्दिष्ट करना अपेक्षित होगा। (4) जहां कोई व्यौहारी इस धारा के अधीन कर संदाय करने का चुनाव करता है, तो व्यौहारी का शुद्ध कर व्यौहारी के आवर्तन के रुपए में एक पैसा की दर पर विनिश्चित की गई रकम होगी ।
(5) एक व्यौहारी जो इस धारा के अधीन कर संदाय करने के लिए चुना हुआ है—
(क) ऐसे व्यक्ति से, जो इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त नहीं है माल क्रय नहीं करेगा;
(ख) धारा 11 के अधीन अपना शुद्ध कर संगणित नहीं करेगा ;
(ग) धारा 9, धारा 14 और धारा 15 के अधीन प्रत्यय दावा करने के लिए अनुज्ञात नहीं होगा;
(घ) कर बीजक जारी करने का हकदार नहीं होगा;
(ङ) इस विनियम के अधीन कर के माध्यम से किसी धनराशि का संग्रहण करना अनुज्ञात नहीं होगा ; और (च) धारा 48 के अधीन यथा अपेक्षित उसके सभी क्रयों के लिए कर बीजक और खुदरा बीजक को जारी रखेगा । (6) ऐसे व्यक्ति के मामले में—
(क) जिसका आवर्तन इस विनियम के प्रारम्भ के पूर्व वर्ष में पांच लाख या ऐसी अन्य रकम, जो सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, से अधिक नही हैं ; और (ख) जो इस धारा की उपधारा (3) के निबंधनों में इस धारा के अधीन कर का संदाय करने का विकल्प रखता है, उसके लिए ऐसे मालों के उचित बाजार मूल्य पर, धारा 4 में विनिर्दिष्ट दरों पर इस विनियम के प्रारम्भ की तारीख पर धारित मालों पर कर संदाय करना अपेक्षित है जहां ऐसे माल पर लक्षद्वीप के अधीन कोई कर नहीं होता है ।
(7) उपधारा (6) के अधीन देय कर का संदाय किसी भी समय व्यक्ति द्वारा इस धारा के अधीन कर संदाय करने के अपने आशय को विनिर्दिष्ट करने से पहले किया जाएगा । (8) आरंभिक स्टाक और तैयार माल के विवरण के साथ उपधारा (6) में निर्दिष्ट कर के संदाय का सबूत ऐसे प्रारूप में, जो विहित किया जाए, आयुक्त को, किसी भी समय जब व्यक्ति इस धारा के अधीन संदान करने के अपने आशय को विनिर्दिष्ट करता है, प्रस्तुत किया जाएगा ।
(9) अन्य उपबंधों के अध्यधीन, जहां कोई रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी धारा 4 में निर्दिष्ट की गई दर पर कर संदाय करता है वहां वह आगामी वर्षों के प्रारंभ से इस धारा के अधीन कर संदाय करने का चुनाव कर सके गा :
परंतु ऐसा रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी के लिए उक्त आगामी वर्ष के प्रथम दिन पर उसके द्वारा धारित मालों पर धारा 4 में निर्दिष्ट दर पर कर संदाय करना अपेक्षित होगा ।
(10) यदि कोई व्यौहारी, जो इस धारा के अधीन कर संदाय करने के लिए चुनाव करता है, पांच लाख रुपए या ऐसी धनराशि, जो राजपत्र में अधिसूचना द्वारा सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, से अधिक है तो वह उस दिन को और उस दिन से पांच लाख रुपए या ऐसी अन्य धनराशि, जो राजपत्र में12 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] अधिसूचना द्वारा सरकार द्वारा निर्दिष्ट की जाए, से अधिक अपने कराधेय आवर्तन पर धारा 3 के अधीन कर संदाय करने के लिए दायी होगा और ऐसे दिन को लक्षद्वीप में उसके द्वारा धारित मालों पर इस विनियम के अधीन संदत्त इनपुट कर के प्रत्यय का दावा करने का हकदार होगा :
परंतु ऐसा व्यौहारी धारा 3 के अधीन कर संदाय करने के लिए दायी हो जाने के दिन से सात दिन के भीतर आयुक्त को विहित प्रारूप में सूचित करेगा और ऐसी अन्य जानकारी, जो विहित की जाए, आयुक्त को प्रस्तुत करेगा ।
(11) आयुक्त, ऐसे व्यौहारियों या व्यौहारियों के वर्ग को, जो इस धारा के अधीन कर का संदाय करने के लिए चुनाव करने हेतु हकदार नहीं है, अधिसूचित कर सके गा ।
(12) इस विनियम में अंतर्विष्ट प्रतिकू ल किसी बात के होते हुए भी सरकार—
(क) राजपत्र में अधिसूचना द्वारा स्कीमों की संरचना ऐसी शर्तों और निबंधनों के अध्यधीन, जो इसमें विनिर्दिष्ट की जाएं, व्यौहारियों के वर्ग या व्यौहारियों के वर्गों द्वारा कर संदाय के लिए अधिसूचित कर सके गी और स्कीमों के विभिन्न प्रकार व्यौहारियों के विभिन्न वर्गों के लिए अधिसूचित किए जा सकें गे ;
(ख) व्यौहारियों के वर्ग या व्यौहारियों के वर्गों द्वारा देय कर की संरचना की किसी स्कीम में, व्यौहारियों के विभिन्न वर्ग या वर्गों के लिए करों की विभिन्न दरें विनिर्दिष्ट कर सके गी किन्तु ऐसी स्कीम में तद् धीन कर संदाय के लिए विकल्प चुनने वाला व्यौहारी का शुद्ध कर दायित्व, व्यौहारी के आवर्तन के रुपए में आठ पैसे से अधिक नहीं होगा ।
(13) (क) इस विनियम में अन्तर्विष्ट प्रतिकू ल किसी बात के होते हुए भी नैमित्तिक व्यापारी—
(i) लक्षद्वीप में कारबार आरम्भ करने से कम से कम तीन दिन पहले अपने कारबार की ऐसी विशिष्टियों की सूचना, ऐसे प्ररूप और रीति में, जो विहित की जाए, आयुक्त को देगा;
(ii) ऐसी प्रतिभूति जो आयुक्त द्वारा नियत की जाए, नकद में या बैंक ड्राफ्ट प्ररूप में, जो कर संदाय करने के लिए प्राकल्लित दायित्व से अधिक न होगी, सात दिन या ऐसी कम अवधि जिसमें नैमित्तिक व्यापारी लक्षद्वीप में कारबार संचालित कर रहा है, जमा करेगा ;
(iii) पूर्ववर्ती दिवस के दौरान किए गए विक्रय पर दैनिक कर संदाय करेगा;
(iv) लक्षद्वीप में अपने कारबार के समापन के पश्चात् तत्काल एक विवरणी विहित प्ररूप और रीति में आयुक्त को प्रस्तुत करेगा; और
(v) कोई कर बीजक जारी नहीं करेगा।
(ख) आयुक्त, उपधारा (1) में खंड (क) के अधीन उसे प्रस्तुत की गई सूचना के सत्यापन के पश्चात् और उस उपधारा के खंड (ख) के अधीन प्रतिपूर्ति प्राप्त करने के पश्चात् नैमित्तिक व्यापारी को रजिस्ट्रर करेगा।
(ग) नैमित्तिक व्यापारी के रजिस्ट्रीकरण पर आयुक्त लक्षद्वीप में विक्रय के माल को लाने और लक्षद्वीप से अविक्रित माल को प्राप्त करने के लिए धारा 61 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट उद् घोषणा के रूप में प्रयुक्त करने के लिए उसे अपेक्षित प्ररूप जारी कर सके गा और नैमित्तिक व्यापारी धारा 26 में निर्दिष्ट विवरणी के साथ प्रयुक्त किए प्ररूप का पूर्ण लेखा जोखा देगा और उपयु र्क्त प्ररूपों को लौटाएगा ।
(घ) आयुक्त नैमित्तिक व्यापारी द्वारा प्रस्तुत की गई विवरणी की परीक्षा के पश्चात् जारी किए गए खुदरा बीजकों सहित उसके द्वारा रखे गए प्ररूपों और लेखाओं तक पांच दिन के भीतर कर के लिए उसका निर्धारण करेगा और निर्धारण का नोटिस उस पर तामील करेगा और इस विनियम के अधीन किसी कर और देय किसी अन्य बकाया का समायोजन करने के पश्चात् उस प्रतिपूर्ति के मामले में जो नकद जमा के प्ररूप में जमा की गई है, प्रतिभूति की बकाया रकम उसे वापस करेगा। (ङ) नैमित्तिक व्यापारी निर्धारण के नोटिस में उल्लिखित धन राशि तत्काल संदाय करेगा।
(च) यह समाधान हो जाने पर कि देय रकम संदत्त कर दी गई है, आयुक्त यथास्थिति, प्रतिभूति या बकाया प्रतिभूति से निमु र्क्त करेगा।
(छ) उस विनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, नैमित्तिक व्यापारी के संबंध में कराधेय मात्रा शून्य होगी । 17. संबंधित पक्षकारों के बीच संव्यवहार— यदि—
(क) एक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी संबंधित व्यक्ति को माल विक्रय करता है या देता है;
(ख) संव्यवहार के निबंधन या शर्तें संबंधों से प्रभावित हुई हैं ; और
(ग) संबंधित व्यक्ति ने माल खरीदा था, संबधित व्यक्ति क्रय के लिए कर प्रत्यय का हकदार नहीं होगा या कर प्रत्यय की रकम में धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन छू ट दी जाएगी, रजिस्ट्रीकरत व्यौहारी द्वारा किया गया संव्यवहार विक्रय समझा जाएगा और माल का विक्रय मूल्य उसका उचित बाजार मूल्य समझा जाएगा।
अध्याय 4
रजिस्ट्रीकरण और प्रतिभूति
18. आज्ञापक और स्वैच्छिक रजिस्ट्रीकरण—(1) प्रत्येक व्यौहारी के लिए इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करना अपेक्षित है, यदि—
(क) यदि व्यौहारी का आवर्तन प्रारंभ के पूर्व वर्ष में कराधेय मात्रा से अधिक है ; या
(ख) यदि व्यौहारी का आवर्तन वतर्मान वर्ष में कराधेय मात्रा से अधिक है ; या
(ग) व्यौहारी कें द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन रजिस्ट्रीकृ त है या रजिस्ट्रीकृ त होना अपेक्षित है, कर संदाय करने के लिए दायी है :
13 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारणपरंतु व्यौहारी प्रथम अनुसूची में उल्लिखित मालों में अनन्य रूप से व्यवहार करता है तो रजिस्ट्रीकरण करना अपेक्षित नहीं होगा ।
(2) इस विनियम के प्रयोजन के लिए व्यौहारी की "कराधेय मात्रा" दो लाख रुपए या ऐसी अन्य धनराशि, जो सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अधिसूचित की जाए, होगी :
परंतु कोई व्यौहारी, जो लक्षद्वीप में कोई माल विक्रय के लिए आयात करता है, तो कराधेय मात्रा "शून्य" या ऐसी अन्य धनराशि, जो सरकार द्वारा अधिसूचित की जाए, होगी । (3) व्यौहारी की कराधेय मात्रा में,—
(क) पू ंजी आस्तियों के विक्रय से ;
(ख) व्यौहारी के क्रियाकलापों के परिसमापन के अनुक्रम में किए गए विक्रय से ; और
(ग) व्यौहारी के क्रियाकलापों के अस्थायी कमी के भाग के रूप में किए गए विक्रय से,
आवर्तन सम्मिलित नहीं होगा ।
(4) कोई व्यक्ति, जो रजिस्ट्रीकृ त होने के लिए उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित नहीं है, किं तु जो—
(क) एक व्यौहारी है ; या
(ख) ऐसे क्रियाकलापों को करने के लिए विशिष्ट तारीख से आशय रखता है, जो उसे एक व्यौहारी बनाती है, रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर सके गा ।
19. रजिस्ट्रीकरण—(1) रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई आवेदन ऐसे प्ररूप में, ऐसे समय में, ऐसी विशिष्टियों और जानकारी को अंतर्विष्ट करते हुए तथा ऐसी फीस, प्रतिभूति और अन्य दस्तावेज, जो विहित किए जाएं, के साथ किया जाएगा ।
(2) जहां—
(क) कोई आवेदक विहित प्ररूप में और विहित धनराशि के लिए प्रतिभूति प्रस्तुत करता है ; और
(ख) इस विनियम के द्वारा अपेक्षित किए गए और विहित किए गए सभी अन्य प्ररूप और साक्ष्य पूर्ण है तथा अनुक्रम में है, आयुक्त आवेदक को रजिस्ट्रीकृ त करेगा । (3) जहां आयुक्त ने, उस तारीख से, जिस को आवेदन किया गया था, पन्द्रह दिन के भीतर व्यक्ति को रजिस्ट्रीकृ त नहीं किया है, आयुक्त ऐसी जांच संचालित करने के पश्चात्, जिसे वह उचित समझे या तो—
(क) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी के रूप में तत्काल व्यक्ति को रजिस्ट्रीकृ त करेगा ; या
(ख) आवेदक को, स्पष्ट रूप से उन आधारों को कथित करते हुए कि उसका आवेदन अस्वीकृ त किया जाना प्रस्तावित है और अतिरिक्त पन्द्रह दिन के भीतर लिखित में उसे कारण दर्शित करना अनुज्ञात करेगा कि क्यों न उसका आवेदन अस्वीकृ त किया जाए, नोटिस जारी करेगा :
परंतु जहां आयुक्त ने व्यक्ति को रजिस्ट्रीकृ त या अपेक्षित की गई तारीख द्वारा नोटिस जारी नहीं किया है, वहां आवेदक इस प्रयोजन के लिए रजिस्ट्रीकृ त समझा जाएगा और आयुक्त ऐसे व्यक्ति के लिए रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र जारी करेगा । (4) जहां उपधारा (3) के खंड (ख) के अनुसरण में आवेदक नोटिस का प्रत्युत्तर प्रस्तुत करता है, आयुक्त या तो आवेदन को स्वीकार करेगा और व्यक्ति को रजिस्ट्रीकृ त करेगा या लिखित में कारणों को लिखते हुए आवेदन को अस्वीकृ त करेगा ।
(5) यदि आवेदक दिए गए समय के भीतर उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन जारी किए गए नोटिस का प्रत्युत्तर देने में असफल होता है तो रजिस्ट्रीकरण का आवेदन अस्वीकृ त माना जाएगा ।
(6) जहां एक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी ने रजिस्ट्रीकरण की शर्त के रूप में कोई प्रतिभूति प्रस्तुत की है तो ऐसी प्रतिभूति रजिस्ट्रीकरण के जारी रहने के लिए अपेक्षित होगी जब तक कि आयुक्त द्वारा अन्यथा उपबंधित न किया जाए ।
20. रजिस्ट्रीकरण का प्रभाव—(1) यदि ऐसे समय पर, जिस को कोई अरजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी का रजिस्ट्रीकरण प्रारंभ के पश्चात् प्रभावी होता है और—
(क) व्यौहारी विक्रय के प्रयोजन के लिए या समाप्त हुए माल के उत्पादन के लिए कच्ची सामग्री के रूप में उपयोग के लिए व्यापारी स्टाक धारित करता है;
(ख) व्यौहारी ने व्यापारी स्टाक या कच्ची सामग्री के क्रय पर इनपुट कर उत्पन्न किया है;
(ग) व्यौहारी विहित किए गए प्रारूप में व्यापारी स्टाक और कच्ची सामग्री का विवरण आयुक्त को प्रस्तुत करता है; और (घ) व्यौहारी क्रयों के संबंध में इनपुट कर की धनराशि का पर्याप्त सबूत धारण करता हैं;
व्यौहारी उस तारीख को, जिस को व्यौहारी का रजिस्ट्रीकरण प्रभावी होता है व्यौहारी द्वारा धारित व्यापारी स्टाक या कच्ची सामग्री के लिए कर प्रत्यय का हकदार होगा:
परन्तु व्यौहारी को ऐसे कर प्रत्यय की संपूर्ण रकम का दावा करना चाहिए जिसके लिए वह एकल दावे का हकदार है, और जिसके साथ इस विनियम के अधीन व्यौहारी द्वारा प्रस्तुत विवरणी संग्लन है ।
(2) धारा 9 की उपधारा (3) के प्रयोजन के लिए कर प्रत्यय की रकम कम से कम—
(क) उपधारा (1) के खंड (घ) में निर्दिष्ट सबूत में दर्शित इनपुट कर की रकम होगी ; या
(ख) माल की लागत कर भाग होगी ; या
(ग) रजिस्ट्रीकरण के समय पर माल के उचित बाजार मूल्य की कर भाग होगी ; या
(घ) ऐसी रकम होगी, जो विहित की जाए ।14 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (3) जहां रजिस्ट्रीकरण व्यौहारी प्राप्त रकमों और संदत्त रकमों के आधार पर आवर्तन के लिए जिम्मेदार है वहां वह—
(क) उस समय, जब वह अरजिस्ट्रीकृ त था, किए गए विक्रयों के संबंध में उसके रजिस्ट्रीकृ त किए जाने के पश्चात् प्राप्त कोई रकम ; और
(ख) उस समय, जब वह अरजिस्ट्रीकृ त या किए गए क्रयों के संबंध में उसके रजिस्ट्रीकृ त किए जाने के पश्चात् संदत्त कोई रकम ,
उसकी आवर्तन से अपवर्जित होगी ।
21. रजिस्ट्रीकरण का संशोधन—(1) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी एक माह के भीतर विहित रीति में आयुक्त को सूचना देगा, यदि वह—
(क) अपने कारबार या अपने कारबार के किसी भाग या कारबार के किसी स्थान का विक्रय करता या अन्यथा व्ययन करता है या कारबार के स्वामित्व में किसी अन्य परिवर्तन को करता है या उसकी जानकारी में आता है ; या
(ख) एक मास से अधिक की अवधि के लिए अपने कारबार को बंद करता है या कारबार या गोदाम के अपने स्थानों में परिवर्तन करता है या कारबार के नए स्थान खोलता है या कारबारों को बंद करता है ; या
(ग) अपने कारबार के नाम, स्टाइल, गठन या प्रकृ ति में परिवर्तन करता है; या
(घ) अपने कारबार के संबंध में भागीदारी या अन्य संगम में प्रवेश करता है कारबार में हित रखने वाले व्यक्तियों की विशिष्टियां जोड़ता है, हटाता है या उनमें परिवर्तन करता है और यदि कोई ऐसा रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी मर जाता है तो उसका विधिक प्रतिनिधि उस रीति में उक्त प्राधिकारी को सूचित करेगा ।
(2) आयुक्त इस विनियम के अधीन प्रस्तुत की गई जानकारी या अन्यथा प्राप्त की गई जानकारी पर विचार करने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जिसे वह उचित समझे, समय-समय पर रजिस्ट्रीकरण में संशोधन कर सके गा । (3) उपधारा (2) के अधीन किया गया रजिस्ट्रीकरण का संशोधन ऐसी आकस्मिकता की तारीख से प्रभावी होगा जो संशोधन को इस बारे में आवश्यक बनाती है कि क्या सूचना उपधारा (1) के अधीन विहित समय के भीतर प्रस्तुत की गई है या नहीं ।
(4) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकरण का कोई संशोधन, इस विनियम के अधीन कर के लिए किसी दायित्व या अधिरोपणीय किसी शास्ति या किसी अपराध के लिए अभियोजन पर प्रतिकू ल प्रभाव नहीं डालेगा ।
(5) कठिनाइयों को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि जहां कोई रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी—
(क) मूल रूप से विक्रीत माल की प्रकृ ति में कोई परिवर्तन करता है ; या
(ख) कोई फर्म है और फर्म के विघटन के बिना उसके गठन में कोई परिवर्तन किया जाता है ; या
(ग) किसी न्यास का न्यासी है और उसके न्यासियों में परिवर्तन किया जाता है ; या
(घ) कोई फर्म या कं पनी या न्यास या कोई अन्य संगठन है और संगठन के प्रबंधन में कोई परिवर्तन घटित होता है, तब के वल उपरोक्त परिस्थितियों के कारण रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी के लिए रजिस्ट्रीकरण के नए प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करना आवश्यक नहीं होगा और रजिस्ट्रीकरण के लिए सूचना दिए जाने पर संशोधन किया जाएगा ।
22. रजिस्ट्रीकरण का रद्द किया जाना— (1) जहां—
(क) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, जिससे इन उपबंधों के अधीन प्रतिभूति प्रस्तुत किया जाना अपेक्षित है, ऐसी प्रतिभूति प्रस्तुत करने में या उसका अनुरक्षण करने में असफल रहता है ;
(ख) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी ने कोई क्रियाकलाप, जो इस विनियम के उपबंधों के अधीन व्यौहारी के रूप में उसे रजिस्ट्रीकृ त होने के लिए हकदार बनाता है, जारी रखना बंद कर दिया है ;
(ग) निगमित निकाय, बंद हो गया है या अन्यथा अस्तित्व समाप्त हो गया है ;
(घ) स्वामित्व कारबार का स्वामी और कारबार को चलाने के लिए किसी उत्तराधिकारी के बिना मर जाता है ;
(ङ) किसी फर्म या व्यक्तियों के संगम की दशा में, उसका विघटन हो जाता है ;
(च) एक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी इन विनियमों के अधीन कर का संदाय करने के लिए दायी नहीं रह जाता है ;
(छ) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी जानबूझकर ऐसी विवरणी प्रस्तुत करता है, जो तात्त्विक विशिष्टियों में भ्रम पैदा करती है या प्रवंचक है ; या
(ज) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी ने एक या अधिक अपराध कारित किया है या इन विनियमों के उपबंधों का अतिक्रमण किया है और ऐसा अपराध या अतिक्रमण आयुक्त की राय में ऐसे परिमाप का है, जिससे ऐसा करना आवश्यक हो जाता है, आयुक्त उचित जांच संचालित करने के पश्चात् और विहित प्ररूप में सूचना की तामील किए जाने के पश्चात् तथा व्यौहारी को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात् सूचना में अपने द्वारा विनिर्दिष्ट तारीख से व्यौहारी के रजिस्ट्रीकरण को रद्द कर सके गा ।
(2) जहां—
(क) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी ऐसे क्रियाकलाप करने से प्रविरत हो जाता है, जो उसे इस विनियम के अधीन व्यौहारी के रूप में रजिस्ट्रीकृ त करने के लिए हकदार बनाता है ;
(ख) निगमित निकाय बंद हो जाता है या अन्यथा विद्यमान नहीं रह जाता है ;
15 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण(ग) स्वामित्व कारबार का स्वामी कारबार को चलाने के लिए किसी उत्तराधिकारी को छोड़े बिना मर जाता है ;
(घ) किसी फर्म या व्यक्तियों के संगम की दशा में, वह विघटित हो जाना है ; या
(ङ) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी इस विनियम के अधीन कर देने के लिए उत्तरदायी नहीं रह जाता है,
रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी या खंड (ग) की दशा में व्यौहारी का विधिक प्रतिनिधि, आयुक्त को ऐसी रीति में और ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, रजिस्ट्रीकरण के रद्दकरण के लिए आवेदन करेगा ।
(3) ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर, यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि व्यौहारी रजिस्ट्रीकृ त किए जाने के लिए हकदार नहीं रहा है, वह विनिर्दिष्ट तारीख से रजिस्ट्रीकरण को रद्द कर सके गा ।
(4) यदि व्यौहारी का रजिस्ट्रीकरण, जो इस धारा के अधीन रद्द किया जा चुका है, अपील या इस विनियम के अधीन किसी अन्य कार्यवाही के परिणामस्वरूप पुन: स्थापित किया जाता है, तो व्यौहारी का रजिस्ट्रीकरण प्रत्यावर्तित किया जाएगा और वह कर देने का उत्तरदायी होगा, जैसे कि उसका रजिस्ट्रीकरण रद्द नहीं किया गया हो ।
(5) यदि कोई रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, जिसका रजिस्ट्रीकरण उपधारा (4) के अधीन पुन: स्थापित किया गया है, आयुक्त का यह समाधान हो जाने पर कि उसके द्वारा अपने रजिस्ट्रीकरण के अप्रभावी रहने की अवधि के दौरान आधिक्य कर का संदाय कर दिया गया है, किं तु अपने रजिस्ट्रीकरण के रद्दकरण के लिए उसका संदाय नहीं किया गया है, तब ऐसे कर की रकम व्यौहारी को ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, समायोजित या प्रतिदाय किया जाएगा ।
(6) प्रत्येक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, जो अपने रजिस्ट्रीकरण के रद्द किए जाने के लिए आवेदन करता है, वह अपने आवेदन के साथ उसे प्रदान किया गया रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र अभ्यर्पित करेगा और प्रत्येक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, जिसका रजिस्ट्रीकरण उसके द्वारा किए गए आवेदन के आधार से भिन्न रद्द किया जाता है, वह रजिस्ट्रीकरण के रद्दकरण की संसूचना की तारीख से सात दिन के भीतर रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र को अभ्यर्पित करेगा ।
(7) आयुक्त तीन मास से अनधिक के अंतरालों पर रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी की, जिसका रजिस्ट्रीकरण रद्द किया गया है, ऐसी विशिष्टियां, जो विहित की जाए, विभागीय वेबसाइट पर डालेगा ।
(8) रजिस्ट्रीकरण का रद्दकरण, किसी व्यक्ति के किसी अवधि के लिए शोध्य कर के और ऐसे रद्दकरण की तारीख पर असंदत्त कर के या जिसे उसके पश्चात् निर्धारित किया जाता है, इस बात के होते हुए भी कि वह इस विनियम के अधीन कर का संदाय करने के लिए अन्यथा दायी नहीं है, प्रभाव नहीं डालेगा । 23. विरजिस्ट्रीकरण का प्रभाव—(1) प्रत्येक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, जिसका रजिस्ट्रीकरण रद्द कर दिया गया है, रद्दकरण की तारीख को धारित सभी मालों की बाबत—
(क) वह कर, जो उन मालों की बाबत संदाय होगा, यदि उस तारीख को माल उचित बाजार मूल्य पर विक्रीत किए गए होते; या
(ख) उन मालों की बाबत पूर्व में दावाकृ त कर प्रत्यय, से अधिक की समतुल्य रकम संदत्त करेगा ।
(2) जहां व्यौहारी प्राप्त की गई रकमों और संदत्त की गई रकमों के आधार पर आवर्तन के लिए उत्तरदायी है, वह अपनी अंतिम विवरणी के आवर्तन में—
(क) उस विक्रय की बाबत अभी तक प्राप्त नहीं की गई कोई रकम, जब वह रजिस्ट्रीकृ त था ; और
(ख) उस क्रय की बाबत अभी तक संदत्त नहीं की गई कोई रकम, जब वह रजिस्ट्रीकृ त था, सम्मिलित करेगा । 24. संक्रमण के दौरान रजिस्ट्रीकरण—प्रत्येक व्यौहारी, जो प्रथम अनुसूची में सूचीबद्ध मालों का व्यौहार करता है, कें द्रीय विक्रय-कर अधिनियम, 1975 (1975 का 43) के उपबंधों के अधीन रजिस्ट्रीकृ त किया जाएगा और ऐसे मालों की बाबत कर की दर वह होगी, जो पहली अनुसूची के तीसरे स्तंभ में यथा उल्लिखित है ।
25. व्यौहारियों और अन्य व्यक्तियों के कतिपय प्रवर्गों से प्रतिभूति—(1) आयुक्त, रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र जारी रखने के लिए, इस विनियम के अधीन संदेय कर, सम्मिश्रण धन या अन्य शोध्य की उचित वसूली के लिए या व्यौहारी के रूप में किसी व्यक्ति को रजिस्ट्रीकृ त करने की शर्त के रूप में या धारा 38 के अधीन प्रतिदाय करने की शर्त के रूप में या धारा 60 की उपधारा (4) के अधीन विमुद्रित करने या निमु र्क्ति की शर्त के रूप में, यदि ऐसा करना आवश्यक प्रतीत हो, तो किसी व्यक्ति या ऐसे वर्ग के व्यक्तियों से, जो विहित किए जाएं, इस विनियम के अधीन या कें द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन उनके दायित्वों के उचित पालन के लिए ऐसी रकम के संदाय पर ऐसी रीति में और ऐसे समय में, जो विहित किया जाए, प्रतिभूति प्रस्तुत किया जाना अपेक्षित कर सके गा ।
(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, आयुक्त—
(क) व्यक्ति के कारबार क्रियाकलापों की प्रकृ ति और आकार ;
(ख) किसी कर, ब्याज या शास्ति की रकम, जिसके लिए व्यक्ति इस विनियम के अधीन किसी भी समय दायी हो सके गा या उसका दायी होना संभाव्य है ;
(ग) व्यक्ति की प्रत्यय योग्यता ;
(घ) प्रतिभूति की प्रकृ ति ; और
(ङ) कोई अन्य विषय, जो आयुक्त सुसंगत समझे,16 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] को ध्यान में रखते हुए प्रतिभूति की रकम में वृद्धि, फे रफार, कमी या अधित्याग कर सके गा ।
(3) जहां व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की गई प्रतिभूति, प्रतिभूति बंधपत्र के रूप में है और प्रतिभूति मर जाता है या दिवाला हो जाता है, तो वह व्यक्ति ऐसी घटना घटने के एक मास के भीतर आयुक्त को सूचना देगा और ऐसी घटना से तीन मास के भीतर नया प्रतिभूति बंधपत्र निष्पादित करेगा ।
(4) जहां प्रतिभूति बंधपत्र किसी अन्य रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी द्वारा निष्पादित किया गया है और व्यौहारी के रजिस्ट्रीकरण को या तो रद्द कर दिया जाता है या उसने अपने कारबार को बंद कर दिया है, तो वह व्यक्ति एक नई प्रतिभूति, जो विहित की जाए और उपधारा (3) में यथा कथित रीति में प्रस्तुत करेगा ।
(5) आयुक् त, आदेश द्वारा अच्छे और पर्याप्त कारण से व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की गई प्रतिभूति को पूर्णत: या भागत:
समपहृत कर सके गा ।
(6) जहां किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की गई प्रतिभूति पूर्णतया समपहृत कर ली जाती है या अपर्याप्त प्रतिभूति दी जाती है, वह यथास्थिति, अध्यपेक्षित रकम की नई प्रतिभूति प्रस्तुत करेगा या ऐसी कमी को ऐसी रीति में और ऐसी अवधि के भीतर, जो विनिर्दिष्ट की जाए, पूरी करेगा ।
अध्याय 5
विवरणी
26. करों का कालिक संदाय और विवरणियों का प्रस्तुत किया जाना— प्रत्येक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, जो इस विनियम के अधीन कर के संदाय के लिए दायी है, आयुक्त को प्रत्येक कर अवधि के लिए और ऐसी तारीख तक तथा ऐसे प्ररूप और रीति में, जो विहित किए जाएं, विवरणियां प्रस्तुत करेगा । 27. अन्य विवरणियां अपेक्षित करने की शक्ति—
आयुक्त, धारा 26 में विनिर्दिष्ट विवरणियों के अतिरिक्त किसी व्यक्ति से, चाहे वह रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी हो या नहीं हो, (चाहे उस व्यक्ति की ओर से या अभिकर्ता या न्यासी के रूप में) ऐसी अन्य विवरणियां, ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, प्रस्तुत करना अपेक्षित कर सके गा ।
28. कमियों में सुधार—यदि कोई व्यक्ति इस विनियम के अधीन किसी कर अवधि के लिए अपने द्वारा प्रस्तुत विवरणी में कमी पाता है, तो वह ऐसी कमी को दूर करेगा और ऐसी कर अवधि के आगामी एक वर्ष के भीतर पुनरीक्षित विवरणी प्रस्तुत करेगा :
परंतु यदि कमी के परिणामस्वरूप किसी व्यक् ति ने, इस विनियम के अधीन शोध्य कर से कम कर संदत्त किया है, तो वह अपना कर और उस पर ब्याज संदत्त करेगा ।
29. विवरणियों पर हस्ताक्षरित किया जाना—इस अध्याय के अधीन प्रत्येक विवरणी पर —
(क) किसी व्यष्टि की दशा में, व्यष्टि के स्वयं के द्वारा और उस व्यष्टि के भारत से अनुपस्थित रहने की दशा में, इस संबंध में उसके द्वारा प्राधिकृ त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा और जहां व्यष्टि अपने कार्य को करने में मानसिक रूप से अक्षम है वहां उसके संरक्षक या उसकी ओर से कार्य करने के लिए किसी अन्य सक्षम व्यक्ति द्वारा ;
(ख) कं पनी या स्थानीय प्राधिकरण की दशा में, उसके प्रधान अधिकारी द्वारा ;
(ग) फर्म की दशा में उसके भागीदार द्वारा, जो अवयस्क नहीं है ;
(घ) किसी अन्य संगम की दशा में, संगम के किसी अन्य सदस्य या व्यक्तियों द्वारा ;
(ङ) न्यास की दशा में, न्यासियों या किसी अन्य न्यासी द्वारा ; और
(च) किसी अन्य व्यक्ति की दशा में, उसकी ओर से कार्य करने वाले किसी अन्य सक्षम व्यक्ति द्वारा,
हस्ताक्षरित और सत्यापित की जाएगी ।
अध्याय 6
कर, ब्याज और शास्तियों का निर्धारण और संदाय तथा
प्रतिदाय करना
30. कर ब्याज या शस्ति का निर्धारण—आयुक्त द्वारा किसी व्यक्ति द्वारा इस विनियम के अधीन शोध्य कर की रकम, ब्याज या शास्ति या कर की प्रकृ ति की अन्य रकम, ब्याज या शास्ति के लिए उस रकम के लिए निर्धारण करने के सिवाय दावे के लिए कोई संदाय नहीं किया जा सके गा ।
31. स्वत: निर्धारण— (1) जहां किसी व्यक्ति द्वारा धारा 26 या धारा 27 के अधीन यथा अपेक्षित विवरणी प्रस्तुत की जाती है और उसमें ऐसी सूचना अंतर्विष्ट होती है, जो विहित की जाए तथा इस विनियम और नियमों की अपेक्षाओं के अनुपालन में होती है—
(क) आयुक्त उस दिन जब विवरणी प्रस्तुत की जाती है, विवरणी में विनिर्दिष्ट रकम के संदाय कर का निर्धारण करने के लिए हिसाब में लेगा ;
(ख) विवरणी निर्धारण की सूचना हुई समझी जाएगी और आयुक्त के अधीन होगी ; और
(ग) खंड (ख) के अधीन निर्दिष्ट सूचना, उस व्यक्ति पर उस दिन, जिसको आयुक्त द्वारा निर्धारण किया गया समझा जाता है, तामील की गई समझी जाएगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई निर्धारण उद्भूत नहीं होगा, यदि आयुक्त ने इस विनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन समान कर अवधि की बाबत पहले से ही कर का निर्धारण कर दिया है ।
32. संदेय कर के निर्धारण में चूक—(1) यदि किसी व्यक्ति ने—
(क) इस विनियम की धारा 26 के अधीन अपेक्षित तारीख तक विवरणी प्रस्तुत नहीं की है ;
(ख) अपूर्ण या गलत विवरणी प्रस्तुत की है ;
17 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण(ग) ऐसी विवरणी प्रस्तुत की है, जो इस विनियम की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं करती है ; या
(घ) किसी अन्य कारण से आयुक्त किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की गई विवरणी से संतुष्ट नहीं है,
आयुक्त ऐसे कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएं, किसी कर अवधि के लिए या एक से अधिक कर अवधि के लिए, जो इतनी हो कि ऐसी सभी कर अवधियां एक वर्ष में समाविष्ट हो जाती हो, शोध्य सकल कर की रकम का एकल आदेश द्वारा निर्धारण या पुन: निर्धारण कर सके गा ।
(2) यदि आयुक्त का ऐसी सूचना, जो उसके कब्जे में आई है, प्राप्त होने पर यह समाधान हो जाता है कि कोई व्यक्ति जो इस विनियम के अधीन किसी अवधि की बाबत कर संदाय के लिए दायी हो गया है, स्वयं को रजिस्ट्रीकृ त कराने में असफल हो जाता है, आयुक्त ऐसे कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएं, ऐसी अवधि और सभी पश्चात्वर्ती अवधियों के लिए शोध्य सकल कर की रकम का अवधारण कर सके गा और उस व्यक्ति को उस कर अवधि के लिए शोध्य किसी अतिरिक्त कर की रकम के निर्धारण की सूचना की तामील कराएगा । (3) जहां आयुक्त ने इस धारा के अधीन निर्धारण किया था और अतिरिक्त कर बकाया के रूप में निर्धारित किया जाता है, अतिरिक्त कर की निर्धारित रकम उस तारीख को शोध्य और संदेय होगी, जिसको कर अवधि के लिए सकल कर शोध्य था।
33. शास्ति का निर्धारण—(1) जहां आयुक्त के पास विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति इस विनियम के अधीन शास्ति संदत्त करने के लिए दायी है तो वह कारण अभिलिखित करने के पश्चात्, उस व्यक्ति को इस विनियम के अधीन शोध्य शास्ति के निर्धारण की सूचना देगा और तामील कराएगा ।
(2) इस धारा के अधीन निर्धारित किसी शास्ति की रकम, उस तारीख को शोध्य और संदेय होगी, जिसको आयुक्त द्वारा निर्धारण की सूचना की तामील की जाती है । (3) इस धारा के अधीन किया गया कोई निर्धारण, इस विनियम के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन पर प्रतिकू ल प्रभाव नहीं डालेगा ।
34. निर्धारण और पुन:निर्धारण की परिसीमा—(1) आयुक्त द्वारा—
(क) एक या अधिक कर अवधियों, जिसके लिए किसी व्यक्ति ने धारा 26 या धारा 27 के अधीन विवरणी प्रस्तुत की है, को समाविष्ट करने वाले वर्ष की समाप्ति ; या
(ख) वह तारीख, जिसको आयुक्त ने कर अवधि के लिए निर्धारण किया था, इनमें से जो भी पहले हो,
से चार वर्ष के अवसान के पश्चात् कोई निर्धारण या पुन:
निर्धारण नहीं किया जाएगा :
परंतु जहां आयुक्त के पास विश्वास करने का कारण है कि किसी व्यक्ति की ओर से छिपाव, लोप या तात्त्विक विशिष्टियों के पूर्ण प्रकटन में असफलता के कारण, कर संदत्त नहीं किया गया था, तो उक्त अवधि छह वर्ष तक बढ़ा दी जाएगी ।
(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, आयुक्त, अपील अधिकरण या न्यायालय के किसी विनिश्चय की तारीख के पश्चात् एक वर्ष के भीतर कर का निर्धारण कर सके गा, जहां निर्धारण अपील अधिकरण या न्यायालय, जो किसी व्यक्ति के पुन:निर्धारण की अपेक्षा करते हैं, के विनिश्चय के परिणामस्वरूप या उसे प्रभावी करने के लिए किया जाना अपेक्षित है ।
35. निर्धारित कर का एकत्रीकरण और शास्ति—(1) उपधारा (2) और उपधारा (4) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, जहां धारा 32 या धारा 33 के अधीन कर की रकम या शास्ति निर्धारित की गई है, आयुक्त निर्धारण की सूचना की तामील की तारीख के पश्चात् दो मास तक निर्धारित रकम के संदाय का प्रवर्तन प्रारंभ नहीं कर सके गा ।
(2) जहां किसी व्यक्ति ने निर्धारण या निर्धारण के किसी भाग पर आक्षेप किया है और धारा 74 में उपबंधित रीति में ऐसे आक्षेप को ग्रहण करने के लिए शर्त, यदि कोई हो, का अनुपालन किया है, आयुक्त उस निर्धारण के अधीन विवाद की अतिशेष रकम के संदाय का प्रवर्तन तब तक नहीं कर सके गा जब तक कि आयुक्त द्वारा आक्षेप का समाधान नहीं किया जाता है ।
(3) इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात—
(क) इस विनियम के अधीन शोध्य कोई रकम, जो आयुक्त के समक्ष विवाद की विषय-वस्तु नहीं है ; या (ख) इस विनियम के अधीन शोध्य कोई रकम, जहां किसी व्यक्ति ने अपील अधिकरण को अपील की है, की वसूली के लिए आयुक्त द्वारा या न्यायालय के समक्ष किसी कार्रवाई पर रोक नहीं लगाएगी ।
(4) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां आयुक्त द्वारा कर की रकम या शास्ति का निर्धारण किया गया है और उसका समाधान हो जाता है कि यह संभावना है कि यदि एकत्रण में विलंब किया जाता है तो निर्धारित रकम की वसूली संभाव्य नहीं हो सके गी, तो आयुक्त निर्धारण की सूचना में किसी तारीख को उस तारीख के रूप में, जिसको शोध्य और संदेय रकम का एकत्रण प्रारंभ किया जा सके गा, जो निर्धारण की सूचना की तामील की तारीख के पश्चात् दो मास से पूर्व होगी, विनिर्दिष्ट कर सके गा ।
36. कर, शास्तियों और ब्याज के संदाय की रीति—इस विनियम के अधीन कर, ब्याज, शास्ति और किसी अन्य रकम के लिए दायी प्रत्येक व्यक्ति इन नियमों के अधीन विहित लक्षद्वीप बैंक की किसी शाखा में या ऐसे अन्य स्थान पर या ऐसी अन्य रीति में, जो विहित की जाए, रकम संदत्त करेगा ।
37. संदायों के उपयोजन का आदेश—जहां किसी व्यक्ति से आयुक्त को कर, ब्याज या शास्ति बकाया है और वह व्यक्ति18 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] आयुक्त को उसका संदाय करता है या आयुक्त उस व्यक्ति द्वारा बकाया कु छ रकम किं तु पूर्ण रकम नहीं, वसूल करता है, तो रकम—
(क) इस विनियम के अधीन बकाया ब्याज, शास्ति और कर ; और
(ख) कें द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन बकाया ब्याज, शास्ति और कर,
संदत्त करने के किसी व्यक्ति के दायित्व को उपरोक्त आदेश में कम करने के रूप में मानी जाएगी ।
38. प्रतिदाय—(1) इस विनियम और नियमों के अन्य उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, आयुक्त किसी व्यक्ति को उससे शोध्य रकम के आधिक्य में ऐसे व्यक्ति द्वारा कर की रकम, शास्ति और ब्याज, यदि कोई हो, का प्रतिदाय संदत्त करेगा । (2) प्रतिदाय करने से पहले, आयुक्त, इस विनियम के अधीन या के न्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन शोध्य किसी रकम की वसूली के लिए ऐसे आधिक्य को पहले उपयोजित किया जाएगा ।
(3) उपधारा (4) और उपधारा (5) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, उपधारा (2) में निर्दिष्ट उपयोजन के पश्चात् शेष रकम व्यौहारी के निर्वाचन पर या तो—
(क) किसी व्यक्ति को, —
(i) उस तारीख से, जिसको विवरणी प्रस्तुत की गई थी या प्रतिदाय के लिए दावा किया गया था एक मास के पश्चात् किसी व्यक्ति को प्रतिदाय किया जाएगा, यदि व्यक्ति द्वारा प्रतिदाय का दावा करने के लिए कर अवधि एक मास है; या (ii) उस तारीख से, जिसको विवरणी प्रस्तुत की गई थी या प्रतिदाय के लिए दावा किया गया था दो मास के भीतर किसी व्यक्ति को प्रतिदाय किया जाएगा, यदि व्यक्ति द्वारा प्रतिदाय का दावा करने के लिए कर अवधि तीन मास है; या (ख) या उस अवधि में कर प्रत्यय के रूप में अगली कर अवधि के लिए अग्रेषित किया जाएगा ।
(4) जहां आयुक्त ने किसी व्यक्ति को धारा 58 के अधीन यह सलाह देते हुए सूचना जारी की है कि उसके कारबारी क्रियाकलापों में संपरीक्षा, अन्वेषण या जांच की जाएगी या उसमें इस विनियम की धारा 59 के अधीन अतिरिक्त सूचना मांगी गई है, तो रकम को उस अवधि में कर प्रत्यय के रूप में अगली कर अवधि के लिए अग्रेषित किया जाएगा ।
(5) आयुक्त, प्रतिदाय के संदाय की शर्त के रूप में, उस तारीख को, जिसको विवरणी प्रस्तुत की गई थी या प्रतिदाय के लिए दावा किया गया था, से पंद्रह दिन के भीतर धारा 25 में प्रदत्त शक्तियों के अनुसरण में किसी व्यक्ति से प्रतिभूति की मांग कर सके गा ।
(6) आयुक्त, उपधारा (5) के अधीन अपने समाधान के लिए व्यौहारी द्वारा प्रतिभूति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से पंद्रह दिन के भीतर प्रतिदाय करेगा ।
(7) उपधारा (3) के खंड (क) में विहित अवधि की गणना करने के लिए—
(क) आयुक्त के समाधान के लिए उपधारा (5) के अधीन प्रतिभूति प्रस्तुत करने; या
(ख) धारा 59 के अधीन मांगी गई अतिरिक्त सूचना प्रस्तुत करने; या
(ग) धारा 26 और धारा 27 के अधीन विवरणियां प्रस्तुत करने; या
(घ) के न्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन यथापेक्षित घोषणा या प्रमाणपत्र प्ररूप प्रस्तुत करने में लगे समय को अपवर्जित किया जाएगा ।
(8) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां—
(क) किसी रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी ने अरजिस्ट्रीकृ त व्यक्ति को माल का विक्रय किया है;
(ख) इस विनियम के अधीन संदेय कर की रकम के रूप में सम्मिलित माल के लिए कीमत प्रभारित की है ; और (ग) व्यौहारी इस रकम का प्रतिदाय या इस रकम का उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन उपयोजन चाह रहा है, तो किसी रकम का व्यौहारी को प्रतिदाय नहीं किया जाएगा या व्यौहारी द्वारा उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन उसका उपयोजन नहीं किया जा सके गा, जब तक कि आयुक्त का यह समाधान नहीं हो जाता है कि व्यौहारी ने क्रे ता को रकम का प्रतिदाय कर दिया है ।
(9) जहां—
(क) किसी रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी ने दूसरे रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी को माल का विक्रय किया है; और
(ख) माल के लिए प्रभारित कीमत में अव्यक्त रूप से इस विनियम के अधीन संदेय कर की रकम सम्मिलित है, वहां उस रकम का क्रे ता को प्रतिदाय किया जा सके गा या उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन क्रे ता द्वारा उसका उपयोजन किया जा सके गा और आयुक्त ऐसे क्रे ता द्वारा दावा किए गए तत्स्थानी कर प्रत्यय की रकम से इंकार के लिए क्रे ता का पुन:
निर्धारण कर सके गा, चाहे विक्रे ता ने क्रे ता को रकम का प्रतिदाय किया हो या नहीं ।
(10) जहां रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी माल का विक्रय करता है और माल के लिए प्रभारित कीमत में इस विनियम के अधीन संदेय कर की रकम को सम्मिलित नहीं करना अभिव्यक्त किया जाता है, तो विक्रे ता से क्रे ता को रकम के प्रतिदाय की अपेक्षा किए बिना, ऐसी रकम का विक्रे ता को प्रतिसंदाय किया जा सके गा या उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन क्रे ता द्वारा उसका उपयोजन किया जा सके गा ।19 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण (11) उपधारा (3) में अंतर्विष्ट किसी प्रतिकू ल बात के होते हुए भी, किसी व्यौहारी को जिसने इस विनियम के अधीन शोध्य कोई विवरणी फाइल नहीं की है, प्रतिदाय अनुज्ञात नहीं किया जाएगा ।
39. कतिपय मामलों में प्रतिदाय विधारित करने की शक्ति—(1) जहां कोई व्यक्ति प्रतिदाय के लिए हकदार है और इस विनियम के अधीन कार्यवाही उसके विरुद्ध लंबित है, जिसके अंतर्गत धारा 58 के अधीन संपरीक्षा भी है और आयुक्त की यह राय है कि ऐसे प्रतिदाय के संदाय से राजस्व पर प्रतिकू ल प्रभाव पड़ने की संभावना है और उस रकम को बाद में वसूल करना संभव नहीं हो सके गा, तो आयुक्त, ऐसे कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएं या तो किसी व्यक्ति को प्रतिदाय किए जाने वाली रकम के समतुल्य प्रतिभूति प्राप्त करेगा या ऐसी कार्यवाहियों तक या संपरीक्षा पूर्ण होने तक प्रतिदाय को विधारित कर सके गा ।
(2) जहां उक्त धारा (1) के अधीन प्रतिदाय विधारित किया जाता है, तो वह व्यक्ति धारा 42 की उपधारा (1) के अधीन यथा उपबंधित ब्याज का हकदार होगा, यदि अपील या अतिरिक्त कार्यवाही अथवा किसी अन्य कार्यवाही के परिणामस्वरूप वह प्रतिदाय का हकदार हो जाता है । 40. के वल रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारियों द्वारा कर का एकत्रण— (1) कोई व्यक्ति जो रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी नहीं है इस विनियम के अधीन कर के माध्यम से लक्षद्वीप में उसके द्वारा विक्रीत किसी माल की बाबत किसी रकम का एकत्रण नहीं करेगा और कोई रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी इस विनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार और इस विनियम के अधीन विनिर्दिष्ट दरों के सिवाय कोई ऐसा एकत्रण नहीं करेगा ।
(2) किसी व्यक्ति द्वारा जो रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी नहीं है एकत्र किए गए कर का प्रतिदाय नहीं किया जाएगा और वह समपहृत हो जाएगा ।
41. राजदूतावास, पदधारियों, अंतर्राष्ट्रीय लोक संगठनों के लिए कर का प्रतिदाय— (1) चौथी अनुसूची में सूचीबद्ध निकाय ऐसे निर्बंधनों और शर्तों, जो विहित की जाएं, के अध्यधीन रहते हुए लक्षद्वीप में क्रय किए गए माल पर संदत्त कर के प्रतिदाय का दावा करने के हकदार होंगे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रतिदाय के लिए हकदार कोई व्यक्ति ऐसी रीति में और विहित समय के भीतर आयुक्त को आवेदन कर सके गा ।
42. ब्याज—(1) इस विनियम के अधीन प्रतिदाय का हकदार कोई व्यक्ति—
(क) उस तारीख से, जिसको उस व्यक्ति को संदत्त किए जाने के लिए प्रतिदाय शोध्य था; या
(ख) उस तारीख से, जिसको किसी व्यक्ति द्वारा अतिसंदत्त रकम, संदत्त की गई थी,
जो भी पश्चात्वर्ती हो, के न्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित वार्षिक दर पर दैनिक आधार पर संगृहित साधारण ब्याज, प्राप्त करने का हकदार होगा और ऐसे ब्याज की गणना उस तारीख को, जिसको ऐसा प्रतिदाय किया जाता है, से की जाएगी:
परंतु शोध्य प्रतिदाय की रकम पर ब्याज की गणना इस विनियम के अधीन उसमें से कोई कर, ब्याज, शास्ति या कोई अन्य शोध्य घटाने के पश्चात् की जाएगी:
परंतु यह और कि, यथास्थिति, प्रतिदाय की ऐसी रकम को बढ़ाया या घटाया जाता है तो तदनुसार ऐसे ब्याज को भी बढ़ाया या घटाया जाएगा ।
(2) जब कोई व्यक्ति किसी कर, शास्ति या इस अधिनियम के अधीन शोध्य अन्य रकम का संदाय करने में चूक करता है, तो वह निर्धारित रकम के अतिरिक्त ऐसी चूक की तारीख से जब तक कि वह उक्त रकम का संदाय करने में चूक जारी रखता है, के लिए दैनिक आधार पर के न् द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित वार्षिक दर पर संगणित साधारण ब्याज संदत्त करने में दायी होगा ।
(3) जहां कर की रकम जिसके अंतर्गत शोध्य शास्ति भी है, को पूर्णतया घटा दिया जाता है तो संदत्त ब्याज की रकम का, यदि कोई हो, प्रतिदाय किया जाएगा या ऐसी रकम में कोई फे रफार हो तो शोध्य ब्याज की तदनुसार संगणना की जाएगी । (4) जहां किसी रकम के एकत्रण को अपील अधिकरण या किसी न्यायालय या किसी अन्य प्राधिकरण के आदेश द्वारा स्थगित कर दिया जाता है और ऐसे आदेश को तत्पश्चात् रद्द कर दिया जाता है, ब्याज, किसी ऐसी अवधि के लिए जिसके दौरान ऐसा आदेश प्रचालन में रहा था, संदेय होगा । (5) इस विनियम के अधीन किसी व्यक्ति द्वारा संदेय ब्याज इस विनियम के अधीन शोध्य कर के रूप में एकत्रित किया जा सके गा और ब्याज संदत्त करने का दायित्व उद्भूत होने पर शोध्य और संदेय होगा।
अध्याय 7
कर, ब्याज और शास्तियों की वसूली
43. कर की वसूली—(1) किसी कर, ब्याज, शास्ति या इस विनियम के अधीन शोध्य अन्य रकम धारा 36 में विनिर्दिष्ट रीति में संदत्त की जाएगी और ऐसी रकम के लिए किसी व्यक्ति पर तामील की गई निर्धारण की सूचना में नियत समय तक निर्धारण में वर्णित रकम के संदाय के लिए मांग का गठन करेगी ।
(2) धारा 35 के अधीन विनिर्दिष्ट नियत तारीख के अवसान से पहले किए गए आवेदन पर, आयुक्त किसी व्यौहारी या किसी व्यक्ति की बाबत, ऐसे कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएं, ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए जो वह मामले की परिस्थितियों में अधिरोपित करना उपयुक्त समझे, संदाय के लिए समय को बढ़ा सके गा या किश्तों द्वारा संदाय अनुज्ञात कर सके गा ।20 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (3) कर की कोई रकम, ब्याज या शास्ति, संविरचना धन या इस विनियम के अधीन शोध्य अन्य रकम जो असंदत्त है,—
(क) भू-राजस्व के बकाया के रूप में, या
(ख) कमिश्नर द्वारा, उपधारा (6) के उपबंधों और कर, ब्याज या शास्ति, संविरचना धन या अन्य शोध्य रकम जो विहित की जाए, की वसूली की प्रक्रिया को विनियमित करने वाले नियमों के अनुसार,
वसूली योग्य होगी ।
(4) जहां इस विनियम के अधीन प्रतिभूति बंधपत्र के प्ररूप से भिन्न प्रतिभूति प्रस्तुत की गई है, आयुक्त, ऐसे कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएं, प्रतिभूति को पूर्ण रूप से या उसके किसी भाग के समपहरण का आदेश करते हुए, किसी कर, ब्याज या शास्ति, संविरचना धन या अन्य शोध्य रकम या उसके भाग की वसूली कर सके गा ।
(5) जहां कोई प्रतिभूति विक्रय किए जाने के प्रयोजनों के लिए निविदत्त की गई है, उसे धारा 63 में नियत रीति से विक्रीत किया जाएगा ।
(6) जहां कर की कोई रकम, ब्याज या शास्ति, संविरचना धन या इस विनियम के अधीन शोध्य अन्य रकम, उपधारा (3) के खंड (ख) के उपबंधों के अनुसार वसूली योग्य है, आयुक्त व्यौहारी, आकस्मिक व्यौहारी, परिवाहक, वाहक या परिवहन अभिकर्ता, स्वामी या पट्टेदार या भांडागार के अधिभोगी, किसी माल के स्वामी या किसी अन्य व्यक्ति (जिसे इस अध्याय में इसके पश्चात् "प्रमाणपत्र-ऋणी" कहा गया है) से शोध्य कर की कोई रकम, ब्याज या शास्ति, संविरचना धन या इस विनियम के अधीन शोध्य अन् य रकम विनिर्दिष्ट करते हुए अपने हस्ताक्षर के अधीन वसूली प्रमाणपत्र (जिसे इस अध्याय में इसके पश्चात् "प्रमाणपत्र" कहा गया है) तैयार कर सके गा और उक्त प्रमाणपत्र की ऐसी रीति और ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, प्रमाणपत्र-ऋणी पर तामील कराएगा और प्रमाणपत्र-ऋणी से ऐसे नियमों को, जो विहित किए जाएं, के अनुसार निम्नलिखित एक या अधिक रीति द्वारा प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम की वसूली के लिए अग्रसर होगा—
(क) प्रमाणपत्र-ऋणी की चल संपत्ति की कु र्की और विक्रय;
(ख) प्रमाणपत्र-ऋणी की अचल संपत्ति की कु र्की और विक्रय;
(ग) प्रमाणपत्र-ऋणी की गिरफ्तारी और पंद्रह दिन की अवधि के लिए उसका कारावास निरोध;
(घ) प्रमाणपत्र-ऋणी की चल और अचल संपत्तियों के प्रबंध के लिए रिसीवर की नियुक्ति ।
(7) आयुक्त, व्यतिक्रमी पर उपधारा (6) के अधीन वसूली प्रमाणपत्र की तामील इस बात के होते हुए भी करा सके गा कि ऐसे कर, ब्याज या शास्ति, संविरचना, धन अन्य शोध्य रकम की वसूली के लिए कार्यवाहियां प्रारंभ की जा चुकी हैं या किसी अन्य रीति में जारी है ।
(8) प्रमाणपत्र-ऋणी पर उपधारा (6) के अधीन प्रमाणपत्र की तामील पर,—
(क) उसकी अचल संपत्ति या ऐसी किसी संपत्ति में किसी हित का कोई निजी अंतरण या परिदान, प्रमाणपत्र के निष्पादन में प्रवर्तनीय किसी दावे के विरुद्ध शून्य होगा; और
(ख) प्रमाणपत्र की बाबत समय-समय पर शोध्य रकम प्रमाणपत्र-ऋणी की अचल संपत्ति पर प्रभारित होगी, जिस पर उक्त प्रमाणपत्र की तामील के पश्चात्वर्ती सृजित प्रत्येक अन्य प्रभार मुल्तवी होंगे ।
(9) प्रमाणपत्र-ऋणी, प्रमाणपत्र की तामील से तीस दिन के भीतर अपने दायित्व का पूर्णत: या भागत: इंकार करते हुए आयुक्त को एक याचिका प्रस्तुत कर सके गा ।
(10) आयुक्त याचिका पर सुनवाई करेगा, यदि आवश्यक हो साक्ष्य लेगा और यह अवधारित करेगा कि प्रमाणपत्र-ऋणी उस रकम जिसके लिए प्रमाणपत्र हस्ताक्षरित किया गया था, के लिए पूर्ण रूप से या उसके किसी भाग के लिए उत्तरदायी है ।
(11) जहां असंदत्त रह गए किसी कर, ब्याज या शास्ति, संविरचना धन या किसी अन्य शोध्य रकम की वसूली के लिए कोई कार्यवाहियां इस धारा के अधीन प्रारंभ की गई है और कर, ब्याज या शास्ति, संविरचना धन या कोई अन्य शोध्य रकम तत्पश्चात् इस विनियम के अधीन किए गए किसी निर्धारण या किसी आक्षेप, अपील, पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन में पारित आदेश के परिणामस्वरूप उपांतरित, बढ़ाई या घटाई जाती है, तो आयुक्त, प्रमाणपत्र-ऋणी को सूचना दे सके गा और उसके पश्चात् ऐसी कार्यवाहियां जारी रह सके गी मानों कि इस प्रकार उपांतरित, बढ़ाया या घटाया कर, ब्याज या शास्ति, संविरचना, धन या कोई अन्य शोध्य रकम, उस कर, ब्याज या शास्ति, संविरचना, धन या कोई अन्य शोध्य रकम, जो उपधारा (3) के अधीन वसूल की जानी थी, से प्रतिस्थापित कर दी गई है ।
44. वसूली के प्रयोजनों के लिए लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप भूमि राजस्व और किरायेदारी विनियमन 1965 का लागू होना—(1) इस विनियम के अधीन भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूलनीय किसी रकम की वसूली के प्रयोजनों के लिए लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप भूमि राजस्व और किराएदारी विनियमन 1965, (1965 का 6) भू-राजस्व के बकाया की वसूली को, उस विनियम या किसी अन्य अधिनियमिति में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, संपूर्ण लक्षद्वीप में प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा और तदनुसार राजस्व वसूली अधिनियम, 1890 (1890 का 1) के उपबंध लागू होंगे ।
(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए,—
(क) अपर आयुक्त, मूल्य वर्धित कर और संयुक्त आयुक्त, मूल्य वर्धित कर को लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप भूमि राजस्व और किरायेदारी विनियम,21 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण 1965 (1965 का 6) के अधीन उप-आयुक्त द्वारा प्रयोक्तव्य सभी शक्तियों का प्रयोग करेंगे और कर्तव्यों का पालन करेंगे;
(ख) उपायुक्त, मूल्य वर्धित कर और सहायक आयुक्त, मूल्य वर्धित कर, उक्त विनियम के अधीन सहायक आयुक्त या सहायक आयुक्त (समझौता) के सभी कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे और सभी शक्तियों का प्रयोग करेंगे;
(ग) मूल्य वर्धित कर अधिकारी और सहायक मूल्य वर्धित कर अधिकारी उक्त विनियम के अधीन तहसीलदार के सभी कर्तव्यों का निर्वहन और सभी शक्तियों का प्रयोग करेंगे। 45. कतिपय वसूली कार्यवाहियों का जारी रहना—
जहां इस विनियम (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् "सरकारी शोध्य" कहा गया है) के अधीन किसी कर, शास्ति या अन्य संदेय रकम के संबंध में कोई निर्धारण या मांग नोटिस किसी व्यक्ति पर तामील किया जाता है और ऐसे सरकारी शोध्य के लिए निर्धारण या मांग के विरुद्ध व्यक्ति द्वारा कोई आक्षेप या अपील की जाती है, तो—
(क) यदि आक्षेप या अपील पूर्णत: या भाग रूप में अननुज्ञात हो जाती है तो, ऐसे सरकारी शोध्य की वसूली के लिए किन्हीं वसूली कार्यवाहियों को किसी नए निर्धारण या मांग नोटिस के तामील के बिना ऐसी वसूली कार्यवाहियां उसी स्तर से जारी रहेंगी जहां से ऐसे व्यक्ति जिसने ठीक पूर्व आक्षेप या अपील की थी;
(ख) जहां ऐसे सरकारी शोध्य किसी आक्षेप या अपील में कटौती की जाती है,—
(i) आयुक्त के लिए यह आवश्यक नहीं होगा कि किसी नए निर्धारण या मांग नोटिस की तामील व्यक्ति पर करें ;
(ii) आयुक्त ऐसी कटौती, उसे और उस व्यक्ति को, जिसके पास वसूली कार्यवाहियां लंबित है, की सूचना उसे देगा;
और
(iii) ऐसे आक्षेप या अपील के निपटान से पूर्व किसी व्यक्ति पर तामील किए गए मांग की नोटिस या किसी निर्धारण के आधार प्रारंभ कोई वसूली कार्यवाहियां इस प्रकार कम किए गए स्तर से जिस पर ऐसी कार्यवाहियां आक्षेप या अपील करने से पूर्व उस व्यक्ति के विरुद्ध जारी थी; और (ग) ऐसे सरकारी शोध्यों के संबंध में कोई वसूली कार्यवाहियां के वल इस कारण अविधिमान्य नहीं होंगी कि ऐसे आक्षेप या अपील के निपटान के पश्चात् व्यक्ति या व्यौहारी पर किसी नए मांग नोटिस की तामील नहीं की गई या ऐसे सरकारी शोध्यों में ऐसे आक्षेप या अपील में वृद्धि या कटौती की गई है;
46. विशेष वसूली पद्धति—(1) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि या संविदा में किसी प्रतिकू ल बात के होते हुए भी, आयुक्त, किसी समय या समय-समय पर, लिखित में नोटिस द्वारा, जिसकी एक प्रति उस व्यक्ति को उसके अंतिम ज्ञात पते पर अग्रेषित की जाएगी, निम्नलिखित की अपेक्षा कर सके गा,—
(क) कोई व्यक्ति जिससे धन की कोई रकम शोध्य है या शोध्य हो सके गी, व्यक्ति (इस धारा में "करदाता" कहा गया है) धारा 45 के अधीन कर, ब्याज या शास्तियों के संदाय का दायी होगा; या
(ख) कोई व्यक्ति जो करदाता के कारण कोई धन लेता है या पश्चात्वर्ती धन ले सके गा, आयुक्त को या तो तुरंत धन शोध्य होने पर या धन लिए जाने पर या नोटिस में पहले उल्लिखित विनिर्दिष्ट समय के भीतर (किं तु धन शोध्य होने से पूर्व नहीं या उपरोक्त कथित धन लेने से पूर्व नहीं) के वल उतना धन जितना इस विनियम के अधीन कर के बकाया, ब्याज और शास्ति के संबंध में करदाता द्वारा शोध्य रकम का संदाय करने के लिए पर्याप्त है या संपूर्ण धन जब यह उस रकम के बराबर या कम हो ।
(2) आयुक्त, ऐसा कोई नोटिस संशोधित या वापस ले सके गा या नोटिस के अनुसरण में कोई संदाय करने के लिए समय बढ़ा सके गा ।
(3) इस धारा के अधीन किसी नोटिस की अनुपालना में कोई संदाय करने वाले व्यक्ति को करदाता के प्राधिकाराधीन संदाय किया गया समझा जाएगा और आयुक्त द्वारा उसकी पावती में विनिर्दिष्ट रकम के विस्तार तक ऐसे व्यक्ति की देयता के उन्मोचन के लिए सही और पर्याप्त उन्मोचन हुआ समझा जाएगा ।
(4) इस धारा में निर्दिष्ट नोटिस की प्राप्ति के पश्चात् करदाता की देयता का उन्मोचन करने वाला कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से उन्मोचित देयता के विस्तार तक आयुक्त के लिए दायी होगा या व्यौहारी के लिए कर और शास्ति की देयता के विस्तार तक, दोनों में से जो भी कम हो । (5) कोई व्यक्ति जिसे इस धारा के अधीन नोटिस भेजा जाता है, आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि मांग की गई राशि या उसका कोई भाग करदाता से शोध्य नहीं है या उसके पास कोई धन नहीं है या करदाता के कारण, तो इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात, यथास्थिति, ऐसी राशि या उसके किसी भाग को आयुक्त को ऐसे व्यक्ति से संदाय करना अपेक्षित नहीं होगा।
(6) कोई रकम जिसे पूर्वोक्त व्यक्ति से आयुक्त को संदाय करना अपेक्षित है या वह इस धारा के अधीन आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से दायी है, यदि यह असंदत्त रहता है तो यह भू- राजस्व के रूप में वसूलनीय होगा ।
(7) आयुक्त, उस न्यायालय को आवेदन कर सके गा, जिसकी अभिरक्षा में करदाता से संबंधित धन है, ऐसे धन की संपूर्ण रकम का उसे संदाय करने के लिए या यदि यह कर, ब्याज और शास्ति यदि कोई है, से अधिक है तो ऐसे कर और शास्ति का उन्मोचन करने के लिए पर्याप्त शोध्य रकम का संदाय करने हेतु आवेदन कर सके गा ।
(8) जहां कार्यवाहियों की जांच के अनुक्रम के दौरान, जिसके अंतर्गत किसी व्यक्ति या व्यौहारी के संबंध में शोध्य22 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] किसी रकम की वसूली के लिए कार्यवाहियां भी हैं या इस विनियम के अधीन व्यौहारी या किसी व्यक्ति के कारबार के संबंध में किसी निरीक्षण या खोज के दौरान, यदि आयुक्त की राय है कि राजस्व का हित संरक्षित करने के प्रयोजन के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो वह तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी या किसी संविदा में प्रतिकू ल किसी बात के होते हुए भी लिखित में आदेश द्वारा, ऐसे व्यक्ति या व्यौहारी से संबंध रखने वाली कोई चल या अचल संपत्ति अंनतिम रूप से कु र्क कर सके गा ।
(9) उपधारा (8) में निर्दिष्ट प्रत्येक अंनतिम कु र्की, उपधारा (1) के अधीन आदेश की तारीख से छह मास की अवधि के अवसान के पश्चात् प्रवर्तन में नहीं रहेगी :
परंतु आयुक्त, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों के लिए पूर्वोक्त अवधि को ऐसी और अवधि या अवधियों के लिए जो वह ठीक समझे, बढ़ा सके गा, तथापि किसी भी दशा में विस्तार की कु ल अवधि दो वर्ष से अधिक नहीं होगी:
परंतु यह और कि आयुक्त, आदेश द्वारा ऐसा आदेश वापिस ले सके गा यदि ऐसा व्यक्ति या व्यौहारी आयुक्त को ऐसे समय में, ऐसी अवधि के लिए, जो इस निमित्त आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, बैंक प्रत्याभूति प्रस्तुत करता है:
परंतु यह भी कि इस धारा के अधीन शक्ति स्वयं आयुक्त द्वारा या ऐसे अपर आयुक्त द्वारा जिसे आयुक्त ने ऐसी शक्ति प्रत्यायोजित की है, प्रयोग की जाएगी ।
47. कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान आस्तियों का अंतरण—जहां इस विनियम के अधीन किसी व्यक्ति द्वारा शोध्य किसी रकम की वसूली के लिए कोई कार्यवाहियां लंबित है, वह व्यक्ति विक्रय, बंधक, गिफ्ट या विनियम या किसी भी प्रकार से किसी अन्य पद्धति से अंतरण द्वारा उसके कब्जे में या उसके किसी भाग पर भार सृजन करता है, तो उसकी कोई आस्ति किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में अंतरण करता है तो ऐसा प्रभार या अंतरण तो आयुक्त द्वारा दावे के विरुद्ध वह उस रकम के संबंध में शून्य होगा जो कार्यवाहियों का विषय है, जब तक कि ऐसा अन्य व्यक्ति ने,—
(क) सद् भावनापूर्वक और वसूली कार्यवाहियों की नोटिस के बिना कार्य किया है ; और
(ख) आस्तियों के लिए सही बाजार मूल्य संदत्त किया ।
अध्याय 8
लेखे और अभिलेख
48. लेखे और अभिलेख—(1) प्रत्येक ऐसा व्यौहारी या व्यक्ति, जिसको धारा 27 के अधीन विवरणियां प्रस्तुत करने के लिए नोटिस की तामील की गई है, कारबार के मुख्य स्थान पर, जो उसने अपने रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में अभिलिखित किया है, इस विनियम के अधीन देय कर की रकम और सभी संव्यवहारों, घटनाओं और उस व्यक्ति द्वारा किए गए अन्य कार्यों के लिए किसी प्रयोजन हेतु सुसंगत सभी संव्यवहारों का स्पष्टीकरण करने हेतु तुरंत अभिनिश्चित करने के लिए आयुक्त को अनुज्ञात करने हेतु पर्याप्त अभिलेख तैयार करेगा और उन्हें अनुरक्षित तथा बनाए रखेगा :
परंतु आयुक्त द्वारा जब और जहां अपेक्षित हो, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में उसके अभिलिखित कारबार के मुख्य स्थान पर तुरंत उपलब्ध की जा सकने वाली अभिलेख की हार्ड या साफ्ट कापी, किसी साफ्टवेयर के प्रयोग द्वारा कं प्यूटरीकृ त लेखाबहियां व्यौहारी द्वारा अनुरक्षित की जानी चाहिए । (2) उपनियम (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी—
(क) प्रत्येक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी उसके द्वारा जारी सभी कर बीजकों की प्रति संरक्षित करेगा;
(ख) प्रत्येक व्यौहारी उसके द्वारा प्राप्त सभी कर बीजकों की मूलप्रति संरक्षित करेगा; और
(ग) प्रत्येक व्यक्ति जिसने इस विनियम के अधीन शोध्य कर की रकम, ब्याज, शास्ति या अन्य शोध्य रकम संदत्त की है, चालान की एक प्रति संरक्षित करेगा जो इस बात का दस्तावेजी साक्ष्य होगी कि उसने रकम का संदाय कर दिया है । (3) आयुक्त ऐसी रीति और प्ररूप विहित कर सके गा, जिसमें लेखे और अभिलेख तैयार किए जाने हैं ।
(4) यदि आयुक्त यह समझता है कि ऐसे अभिलेख पर्याप्त रूप से स्पष्ट और इस अधिनियम के अधीन व्यक्ति से अपेक्षित बाध्यताओं की उचित जांच को समर्थ बनाने के लिए पठनीय नहीं है तो वह ऐसे व्यक्ति को लिखित में नोटिस द्वारा, जो उसमें विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसे लेखों को (जिसके अंतर्गत क्रय और विक्रय के अभिलेख भी है) बनाए रखने हेतु अपेक्षा कर सके गा ।
(5) आयुक्त, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा व्यौहारियों के किसी वर्ग, परिवाहकों या वेयरहाउस के प्रचालकों को ऐसे लेखे (जिसके अंतर्गत क्रय और विक्रय के अभिलेख भी है) जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, बनाए रखने के आदेश दे सके गा ।
(6) प्रत्येक व्यक्ति जिससे अभिलेख और लेखे तैयार करना या संरक्षित करना अपेक्षित है संव्यवहारों या घटनाओं की समाप्ति के पश्चात् कम से कम सात वर्ष के लिए लेखे और अभिलेख बनाए रखना अपेक्षित होगा जिनका वे अभिलेख रखते हैं, यदि ऐसे अभिलेख उस वर्ष के संबंध में किन्हीं कार्यवाहियों के लिए जो मामले में लंबित है, उन कार्यवाहियों के अंतिम विनिश्चय तक संरक्षित रखेगा । उनके खो जाने पर, घटना की तारीख से पन्द्रह दिन की अवधि के भीतर आयुक्त और पुलिस को रिपोर्ट की जाएगी ।
49. कतिपय मामलों में लेखापरीक्षित किए जाने वाले लेखा—यदि किसी विशिष्ट वर्ष के संबंध में किसी व्यौहारी का सकल आवर्तन 60 लाख रुपए या ऐसी अन्य रकम, जो विहित की जाए, से अधिक है, तो ऐसा व्यौहारी ऐसी रीति में और23 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण ऐसे प्ररूप में तथा ऐसी अवधि में जो आयुक्त द्वारा अधिसूचित की जाए, एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।
50. कर बीजक—(1) इस विनियम के अधीन विक्रयकर्ता रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी क्रे ता के अनुरोध पर विक्रय के समय क्रे ता को कर बीजक, उपनियम (2) में विनिर्दिष्ट विशिष्टियां अंतर्विष्ट करते हुए कर बीजक क्रे ता को उपलब्ध करेगा और उसकी एक प्रति अपने पास रखेगा :
परंतु कर बीजक किसी व्यौहारी द्वारा जारी नहीं की जाएगी जो—
(क) धारा 16 के अधीन कर संदाय करने का विकल्प चुनता है; या
(ख) अंतरराज्यीय व्यवसाय या वाणिज्य या निर्यात के अनुक्रम में विक्रयकर्ता है:
परंतु यह और कि प्रत्येक विक्रय के लिए एक से अधिक कर बीजक जारी नहीं किया जाएगा :
परंतु यह भी कि यदि कोई बीजक कें द्रीय सीमाशुल्क अधिनियम, 1944 (1944 का 1) के उपबंधों के अधीन जारी की गई है तो यह समझा जाएगा कि कर बीजक में उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट विशिष्टियां अंतर्विष्ट हैं ।
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी कर बीजक में मूल के साथ-साथ उसकी प्रतियों में भी निम्नलिखित विशिष्टियां अंतर्विष्ट होंगी :—
(क) सहजदृश्य स्थान पर "कर बीजक" शब्द ;
(ख) विक्रय करने वाले रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी का नाम, पता और रजिस्ट्रीकरण संख्यांक;
(ग) जहां क्रे ता रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी है वहां क्रे ता का नाम और पता तथा उसकी रजिस्ट्रीकरण संख्या;
(घ) कोई व्यष्टिक पूर्व मुद्रित क्रम संख्यावार संख्या और वह तारीख, जिसको कर बीजक जारी की जाती है :
परंतु कोई व्यौहारी प्रत्येक कारबार के स्थान के लिए पहले या बाद में जोड़े जाने वाले विशिष्ट विशेष कोडों सहित पृथक् अंकीय श्रृ ंखला रख सके गा यदि व्यौहारी का लक्षद्वीप में कारबार एक से अधिक स्थान पर है या यदि वह एक से अधिक या दोनों उत्पादों में कार्य करता है तो प्रत्येक उत्पाद के लिए पृथक् अंकीय श्रृ ंखला रख सके गा :
परंतु यह और कि ऐसी अंकीय श्रृ ंखला आयुक्त द्वारा ऐसी रीति और प्ररूप में तथा ऐसी तारीख से, जो उसके द्वारा अधिसूचित की जाए, प्रदान की जा सके गी ;
(ड.) विक्रय किए गए माल का वर्णन, मात्रा, संख्या और मूल्य तथा उपलब्ध कराई गई सेवाओं एवं उन पर प्रभार्य कर की रकम पृथक् रूप से दर्शित की जाएगी;
(च) विक्रय करने वाले व्यौहारी या उसके सेवक, प्रबंधक या अभिकर्ता सम्यक् रूप से उसके द्वारा प्राधिकृ त, के हस्ताक्षर ;
और
(छ) मुद्रक का नाम और पता और उसके द्वारा व्यौहारी को प्रदाय की गई और मुद्रित कर बीजकों की पहली और अंतिम क्रम संख्या ।
(3) किसी विक्रय के संबंध में कोई कर बीजक दो प्रतियों में जारी की जाएगी, मूल क्रे ता को जारी की जाएगी (या यथास्थिति, परिदान लेने वाले व्यक्ति को) और दूसरी प्रति विक्रय करने वाले व्यौहारी द्वारा रखी जाएगी ।
(4) तब के सिवाय जब कोई कर बीजक उपधारा (1) के अधीन जारी की जाती है, किसी एकल संव्यवहार में किसी व्यक्ति को यदि कोई व्यौहारी ऐसी रकम के मूल्य जो विहित की जाए, से अधिक माल का विक्रय करता है तो वह क्रे ता को एक खुदरा बीजक, उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट विशिष्टियां अंतर्विष्ट करते हुए, जारी करेगा और उसकी एक प्रति रखेगा । (5) उपधारा (4) के अधीन जारी की गई खुदरा बीजक में मूल के साथ-साथ उसकी प्रतियों पर निम्नलिखित विशिष्टियां अंतर्विष्ट होंगी—
(क) किसी सहज दृश्य स्थान पर "खुदरा बीजक" या "नकद ज्ञापन" या "बिल" शब्द ;
(ख) विक्रय करने वाला व्यौहारी यदि रजिस्ट्रीकृ त है तो रजिस्ट्रीकरण संख्या और नाम तथा पता;
(ग) यदि विक्रय अंतरराज्यीय व्यवसाय या वाणिज्य के अनुक्रम में है तो क्रय करने वाले व्यौहारी का नाम, रजिस्ट्रीकरण संख्या और पता और कानूनी प्ररूप का प्रकार, यदि कोई है, जिसके लिए विक्रय किया गया है;
(घ) एक व्यष्टिक पूर्व मुद्रित श्रृ ंखलावार संख्या और तारीख जिसको खुदरा बीजक जारी की गई है :
परंतु यदि व्यौहारी का लक्ष्यद्वीप में कारबार का एक से अधिक स्थान है या यदि वह एक से अधिक उत्पादों में कार्य करता है या दोनों के लिए, या तो पहले या बाद में जोड़े जाने वाले विशिष्ट कोड सहित पृथक् अंकीय श्रृ ंखला रख सके गा :
परंतु यह और कि ऐसी अंकीय श्रृ ंखला आयुक्त द्वारा ऐसी रीति में और ऐसी तारीख से, जो उसके द्वारा अधिसूचित की जाए, प्रदान की जा सके गी ।
(ड.) विक्रीत माल तथा उपलब्ध कराई गई सेवाओं का मूल्य और भाग, मात्रा और वर्णन तथा उन पर प्रभारित कर की रकम पृथक् रूप से दर्शित की जाएगी; और
(च) विक्रय करने वाले व्यौहारी या उसके सेवक सम्यक् रूप से प्राधिकृ त प्रबंधक या अभिकर्ता के हस्ताक्षर । (6) खुदरा बीजक दो प्रतियों में जारी की जाएगी, मूल क्रे ता को जारी की जाएगी और प्रति विक्रय करने वाले व्यौहारी द्वारा रखी जाएगी ।
(7) आयुक्त, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी रीति और प्ररूप विनिर्दिष्ट कर सके गा जिसमें किसी कर बीजक या खुदरा बीजक की विशिष्टियां अभिलिखित की जानी हैं ।24 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (8) यदि क्रे ता यह दावा करता है कि मूल कर बीजक खो गया है तो विक्रय करने वाला व्यौहारी, ऐसी शर्तों और निर्बंधनों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, दूसरी प्रति स्पष्ट रूप से चिन्हित करते हुए उपलब्ध करेगा ।
51. जमापत्र और नामे नोट—जहां कोई कर बीजक किसी विक्रय के संबंध में जारी किया गया है और—
(क) उस कर बीजक में कर के रूप में दर्शित रकम और विक्रय के संबंध में संदेय कर से अधिक है तो व्यौहारी क्रे ता को जमापत्र, ऐसी विशिष्टियां अंतर्विष्ट करते हुए जो विहित की जाएं, प्रदान करेगा; या
(ख) कर बीजक पर कर के रूप में दर्शित रकम विक्रय के संबंध में संदेय कर से अधिक है तो,
व्यौहारी क्रे ता को नामे नोट, ऐसी विशिष्टियां अंतर्विष्ट करते हुए, जो विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रदान करेगा ।
अध्याय 9
विशेष मामलों में दायित्व
52. कारबार के अंतरण की दशा में दायित्व —(1) जहां कोई व्यौहारी इस विनियमन के अधीन कर संदाय करने के लिए दायी कोई व्यौहारी अपने संपूर्ण या भाग रूप में विक्रय द्वारा, उपहार पट्टा, त्याग या अनुज्ञप्ति, किराया या किसी भी अन्य रीति में अंतरण करता है तो व्यौहारी और ऐसा व्यक्ति जिसको इस प्रकार कारबार अंतरित किया है संयुक्त: और पृथकत: कर, ब्याज या व्यौहारी से ऐसे अंतरण के समय से देय शास्ति के संदाय का दायी होगा, चाहे ऐसी रकम का निर्धारण अंतरण से पूर्व किया गया है किं तु जो असंदत्त रही है या उसके पश्चात् निर्धारित की गई है ।
(2) जहां उपधारा(1) में निर्दिष्ट अंतरिती या कारबार का पट्टाधारी या तो अपने स्वयं के नाम में या किसी अन्य नाम में ऐसा कारबार करता है तो वह ऐसे अंतरण की तारीख से उसके द्वारा मालों के विक्रय पर कर संदाय का दायी होगा और यदि वह व्यौहारी के रूप में रजिस्ट्रीकृ त है तो अपने रजिस्ट्रीकरण के संशोधन के लिए धारा 21 में विनिर्दिष्ट समय के भीतर आवेदन करेगा ।
53. परिसमापन में कं पनी की दशा में दायित्व—(1) प्रत्येक व्यक्ति—
(क) जो किसी कं पनी का समापक है जिसका परिसमापन किया जा रहा है, चाहे न्यायालय के आदेशों के अधीन या अन्यथा ; या
(ख) जो किसी कं पनी की किन्हीं आस्तियों का प्रापक नियुक्त किया गया है (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् "समापक" कहा गया है),
ऐसे समापक बनने के पश्चात् एक मास के भीतर आयुक्त को अपनी ऐसी नियुक्ति की सूचना देगा।
(2) आयुक्त, ऐसी जांच करने के पश्चात् या ऐसी जानकारी मांगने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, उस तारीख से तीन मास के भीतर समापक को अधिसूचित करेगा जिसको उसे समापक की नियुक्ति की सूचना प्राप्त हुई है, और ऐसी रकम जो आयुक्त की राय में कं पनी द्वारा संदेय किसी कर, ब्याज या शास्ति जो तब देय है या उसके पश्चात् देय होना संभाव्य है, का संदाय करने हेतु पर्याप्त होगी ।
(3) समापक कं पनी की आस्तियों या उसके पास संपत्तियों का तब तक कोई भाग नहीं होगा जब तक उपधारा (2) के अधीन आयुक्त द्वारा उसे अधिसूचित नहीं किया गया है और इस प्रकार अधिसूचित होने पर समापक अधिसूचित रकम के बराबर रकम अलग रखेगा और जब तक वह ऐसी रकम अलग नहीं रखता है तब तक वह कं पनी की किन् हीं आस्तियों या उसके हाथ में संपत्तियों का कोई भाग नहीं होगा :
परंतु इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात न्यायालय के किसी आदेश की अनुपालना में या कर और शास्ति, यदि कोई हो, इस अधिनियम के अधीन संदेय किसी कर या शास्ति का संदाय करने के प्रयोजन के लिए या ऐसे प्रतिभू उधार दाताओं को कोई संदाय करने के लिए जिनका उधार परिसमापन की तारीख पर सरकार को देय उधारों पर विधि के अधीन पूर्विकता का हकदार है या ऐसी लागतों और व्ययों को पूरा करने के लिए जो कं पनी के परिसमापन हेतु आयुक्त की राय में युक्तियुक्त हैं, के लिए ऐसी संपत्तियों या आस्तियों को अलग करने से समापक को अपवर्जित नहीं करेगा ।
(4) यदि समापक उपधारा (1) के अनुसार सूचना देने में असफल रहता है या उपधारा (3) द्वारा यथापेक्षित रकम को अलग रखने में असफल रहता है या कं पनी की किन् हीं आस्तियों या उसके हाथ में संपत्तियों को उस उपधारा के उपबंधों के उल्लंघन में अलग करता है तो वह व्यक्तिगत रूप से ऐसे कर के संदाय और शास्ति हेतु दायी होगा, यदि कोई हो, जिसका संदाय इस विनियम के अधीन करने हेतु कं पनी दायी होगी :
परंतु यदि कोई कर और शास्ति की रकम, यदि कोई हो, कं पनी द्वारा संदेय कर और शास्ति उपधारा (2) के अधीन अधिसूचित की जाती है तो इस उपधारा के अधीन समापक की व्यक्तिगत देयता ऐसी रकम के विस्तार तक होगी । (5) जहां एक से अधिक परिसमापक हैं, वहां इस धारा के अधीन परिसमापक से संलग्न बाध्यताएं और दायित्व सभी परिसमापकों से संयुक्तत: और पृथकत: संलग्न होंगे । (6) जब किसी प्राइवेट कं पनी का परिसमापन कर दिया जाता है और किसी अवधि के लिए कं पनी पर इस विनियम के अधीन किसी कर और शास्ति, यदि कोई हो, चाहे वह उसके परिसमापन से पूर्व या उसके दौरान या उसके पश्चात् निर्धारित किया गया हो, को वसूल नहीं किया जा सकता, तब ऐसा प्रत्येक व्यक्ति ऐसी अवधि, जिसके लिए कर देय है, के दौरान किसी भी समय प्राइवेट कं पनी का निदेशक था, ऐसे कर और शास्ति, यदि कोई हो, के संदाय के लिए संयुक्त रूप से और पृथक् रूप से तब तक दायी होगा जब तक वह आयुक्त के समाधानप्रद रूप में यह साबित नहीं कर देता है कि गैरवसूली को कं पनी के कार्यकलापों के संबंध में उसकी ओर से घोर25 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण उपेक्षा, अपकरण या कर्तव्य-भंग के कारण हुआ नहीं माना जा सकता ।
(7) इस विनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट तत्प्रतिकू ल बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे। (8) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "कं पनी" और "प्राइवेट कं पनी" पदों का वही अर्थ होगा जो कं पनी अधिनियम, 2013 (2013 का 18) की धारा 2 के खंड (20) और खंड (68) में क्रमश: उनका है ।
54. फर्म के भागीदारों का कर का संदाय करने का दायित्व—तत्प्रतिकू ल किसी संविदा के होते हुए भी, जहां कोई फर्म इस विनियम के अधीन किसी कर, ब्याज या शास्ति का संदाय करने की दायी है, वहां ऐसी फर्म और फर्म के भागीदारों में से प्रत्येक भागीदार ऐसे संदाय के लिए संयुक्तत: या पृथक्त: दायी होगा :
परंतु जहां कोई ऐसा भागीदार फर्म से सेवानिवृत्त हो जाता है, वहां वह लिखित में इस आशय की सूचना द्वारा आयुक्त को अपनी सेवानिवृत्ति की तारीख के बारे में सूचित करेगा और अपनी सेवानिवृत्ति के समय शेष असंदत्त कर, ब्याज या शास्ति और अपनी सेवा निवृत्ति की तारीख तक देय किसी कर, ब्याज या शास्ति भले वह उस तारीख को निर्धारित न की गई हो, का संदाय करने का दायी होगा :
परंतु यह और कि ऐसी कोई सूचना सेवानिवृत्ति की तारीख से पंद्रह दिन के भीतर दी जाती है तो पहले परंतुक के अधीन भागीदार का दायित्व उस तारीख तक बना रहेगा जिसको ऐसी सूचना आयुक्त द्वारा प्राप्त की जाती है । 55. संरक्षक, न्यासियों, आदि का दायित्व—जहां ऐसा कारबार, जिसके संबंध में इस विनियम के अधीन कर संदेय है, किसी संरक्षक, न्यासी द्वारा या अवयस्क के अभिकर्ता या उसकी ओर से अन्य असमर्थ व्यक्ति द्वारा और ऐसे अवयस्क या अन्य असमर्थ व्यक्ति के फायदे के लिए किया जाता है या उनमें के भारसाधन में है, वहां कर, ब्याज या शास्ति, यथास्थिति, ऐसे संरक्षक, न्यासी, अभिकर्ता से, वैसी ही रीति में और वैसी ही सीमा तक जैसा वह ऐसे किसी अवयस्क या अन्य असमर्थ व्यक्ति पर उसका इस प्रकार निर्धारण किया गया होता और उससे वसूलनीय होता मानों वह पूर्ण वयस्क और स्वस्थ चित्त का होता और वह मानों स्वयं कारबार कर रहा होता, पर उद् गृहीत की जाएगी और उससे वसूलनीय होगी तथा सभी उपबंध, यथाशक्य, तदनुसार लागू होंगे ।
56. प्रतिपाल्य अधिकरण, आदि के दायित्व—जहां ऐसे व्यौहारी, जो ऐसे कारबार का स्वामी है, की संपदा या उसका कोई भाग जिसके संबंध में इस विनियम के अधीन कर संदेय है, न्यायालय, अधिकरण, महाप्रशासक, शासकीय न्यासी या किसी रिसीवर या प्रबंधक (जिनमें ऐसा कोई व्यक्ति, उसका पदाभिधान जो भी हो, जो वास्तव में कारबार का प्रबंध करता है, भी है) जिसे न्यायालय के किसी आदेश द्वारा या उसके अधीन नियुक्त किया गया है, के नियंत्रणाधीन है वहां कर, ब्याज या शास्ति ऐसे प्रतिपाल्य अधिकरण महाप्रशासक, शासकीय न्यासी, रिसीवर या प्रबंधक पर वैसी ही रीति में और उसी विस्तार तक उद्गृहीत की जाएगी और वसूलनीय होगी जिस तक वह ऐसे व्यौहारी पर निर्धारणीय होती और मानों वह स्वयं कारबार कर रहा होता और सभी उपबंध, यथाशक्य, तदनुसार लागू होंगे ।
57. अन्य मामलों में दायित्व—(1) जहां कोई व्यौहारी फर्म है या व्यक्तियों का संगम है या हिंदू अविभक्त कु टु ंब है और ऐसे संगम या कु टु ंब ने कारबार बंद कर दिया है, वहां—
(क) इस अधिनियम के अधीन ऐसी फर्म, संगम या कु टु ंब द्वारा ऐसे समापन की तारीख तक संदेय कर का निर्धारण इस प्रकार किया जा सके गा मानों ऐसा समापन हुआ ही न हो; और (ख) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो ऐसे समापन के समय ऐसी फर्म का भागीदार है, या ऐसे संगम या कु टु ंब का सदस्य है, ऐसे समापन के होते हुए भी ऐसी फर्म, संगम या कु टु ंब के संबंध में निर्धारित कर और उस पर अधिरोपित शास्ति और उसके द्वारा संदेय कर का संदाय करने के लिए संयुक्तत: और पृथकत: दायी होगा चाहे ऐसा कर, ब्याज या शास्ति का निर्धारण ऐसे समापन से पहले या उसके पश्चात् किया गया है और पूर्वोक्त के अधीन रहते हुए, ये उपबंध, यथाशक्य, इस प्रकार लागू होंगे मानों प्रत्येक ऐसा व्यक्ति या भागीदार या सदस्य स्वयं ही व्यौहारी हो :
परंतु जहां फर्म का भागीदार, जो ऐसे कर, ब्याज या शास्ति का संदाय करने का दायी है, की मृत्यु हो जाती है, वहां उपधारा (4) के उपबंध, यथाशक्य, लागू होंगे ।
(2) जहां किसी फर्म या व्यक् तियों के किसी संगम के गठन में कोई परिवर्तन हुआ है, वहां फर्म के भागीदार या संगम के सदस्य जैसा वह इसके पुनर्गठन के पूर्व अस्तित्व में था और जैसा वह इसके पुनर्गठन के पश्चात् अस्तित्व में था, धारा 54 के उपबंधों पर प्रतिकू ल प्रभाव डाले बिना, ऐसी फर्म या संगम से इसके पुनर्गठन से पूर्व किसी भी अवधि के लिए, देय कर, ब्याज या शास्ति का संदाय करने के लिए संयुक्तत: या पृथकत: दायी होंगे ।
(3) उपधारा (1) के उपबंध, यथाशक्य, वहां लागू होंगे जहां व्यौहारी जो एक फर्म या व्यक्तियों का संगम है, विघटित हो जाती है या जो हिंदू अविभक्त कु टु ंब है, ने उसके द्वारा किए गए कारबार के संबंध में विभाजन कर दिया है और तदनुसार, समापन की उस धारा में प्रतिनिर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे, यथास्थिति, विघटन के या विभाजन के प्रति निर्देश हैं ।
(4) जहां इस विनियम के अधीन कर का संदाय करने के लिए दायी व्यौहारी की मृत्यु हो जाती है, तब वहां—
(क) यदि व्यौहारी द्वारा किए गए किसी कारबार को उसके विधिक प्रतिनिधि या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसकी मृत्यु के पश्चात् भी जारी रखा जाता है तो ऐसा विधिक प्रतिनिधि या अन्य व्यक्ति इस विनियम के अधीन व्यौहारी से देय कर, ब्याज या शास्ति का संदाय करने का दायी होगा, चाहे26 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] ऐसा कर, ब्याज या शास्ति का, उसकी मृत्यु के पूर्व निर्धारण किया गया था किं तु वह असंदत्त रह गया है या उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका निर्धारण किया गया है;
(ख) यदि व्यौहारी द्वारा किया गया कारबार उसकी मृत्यु के उपरांत बंद हो जाता है तब उसका विधिक प्रतिनिधि मृतक की संपदा में से इस विनियम के अधीन उस विस्तार तक जिस तक व्यौहारी से देय भार कर, ब्याज या शास्ति को चुकाने में संपदा समर्थ है, चाहे ऐसा कर, ब्याज या शास्ति का उसकी मृत्यु के पूर्व निर्धारण किया गया हो किं तु वह असंदत्त रह गया है या उसकी मृत्यु के पश्चात् निर्धारण किया गया है, और ये उपबंध, यथाशक्य, ऐसे विधिक प्रतिनिधियों या अन्य व्यक्ति को उसी प्रकार लागू होंगे मानों वे स्वयं ही व्यौहारी हों।
अध्याय 10
संपरीक्षा, अन्वेषण और प्रवर्तन
58. संपरीक्षा, अन्वेषण और प्रवर्तन—(1) आयुक्त, किसी व्यक्ति पर उसको यह सूचना देते हुए विहित रीति में सूचना तामील कर सके गा कि उसके कारबार के कार्यकलापों की संपरीक्षा की जाएगी और जहां लागू हो, वहां इस विनियम के अधीन पहले से ही समाप्त निर्धारण को पुन:आरंभ किया जा सके गा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन तामील की गई सूचना में ऐसे व्यक्ति से, जिस पर सूचना तामील की जाती है, अपेक्षा की जा सके गी कि वह उसमें विनिर्दिष्ट तारीख को और ऐसे स्थान पर, जो उसके कारबार परिसर में या सूचना में विनिर्दिष्ट स्थान पर उपसंजात हो और वह या तो हाजिर हो और लेखा बहियों को तथा ऐसे सभी साक्ष्यों को पेश करे या करवाए जिन पर व्यौहारी अपनी विवरणियों (जिनमें कर बीजक, यदि कोई हो, भी हैं) के समर्थन में विश्वास करता है या वह ऐसे साक्ष्य को पेश करे, जो सूचना में विनिर्दिष्ट है ।
(3) ऐसा व्यक्ति, जिस पर उपधारा (1) के अधीन सूचना की तामील की जाती है, आयुक्त को ऐसा पूर्ण सहयोग और युक्तियुक्त सहायता प्रदान करेगा जो उसके कारबार परिसर में इस धारा के अधीन कार्यवाहियों को संचालित करने के लिए अपेक्षित हो ।
(4) आयुक्त, विवरणी, विवरणियों के साथ प्रस्तुत साक्ष्य, यदि कोई हो, संपरीक्षा के दौरान अर्जित साक्ष्य, यदि कोई हो, उसके पास अन्यथा उपलब्ध कोई जानकारी पर विचार करने के पश्चात्—
(क) या तो पुनर्विलोकन निर्धारण की पुष्टि करेगा, या (ख) धारा 32 और धारा 33 के अनुसरण में कर, ब्याज और शास्ति की रकम, यदि कोई हो, के निर्धारण या पुन:निर्धारण की सूचना तामील करेगा ।
(5) व्यक्ति के कारबार के मामलों की संपरीक्षा के अनुसरण में कोई निर्धारण इस विनियम के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन पर प्रतिकू ल प्रभाव डाले बिना होगा ।
(6) (i) यदि आयुक्त की,—
(क) व्यौहारी के कारबार की प्रकृ ति और जटिलता; या (ख) राजस्व का हित; या
(ग) लेखाओं का परिमाण; या
(घ) लेखाओं के सही होने के बारे में शंकाएं ; या (ड.) लेखाओं में संव्यवहारों की बहुलता; या
(च) कारबार क्रियाकलाप की विशेषीकृ त प्रकृ ति; या (छ) सभी अभिलेखों और लेखाओं का पेश न किया जाना, या
(ज) इस विनियम के अधीन संपरीक्षा रिपोर्ट का फाइल न किया जाना, या
(झ) किसी अन्य कारण को ध्यान में रखते हुए यह राय है कि ऐसा करना आवश्यक है,
तो वह व्यौहारी को लिखित में सूचना द्वारा निदेश दे सके गा कि वह अपने अभिलेखों, जिनमें लेखा बहियां भी हैं, की किसी लेखाकार या लेखाकारों के पैनल या किसी अन्य व्यवसायी या आयुक्त द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित व्यवसायियों द्वारा जांच और संपरीक्षा कराए और वह ऐसी जांच और परीक्षा की ऐसे लेखाकार या लेखाकारों या व्यवसायियों के पैनल या व्यवसायियों के पैनल द्वारा सम्यक्त: हस्ताक्षरित और सत्यापित रिपोर्ट ऐसे रुपविधान में प्रस्तुत करे जो वह विनिर्दिष्ट करे और उसमें ऐसी विशिष्टियां उपवर्णित करे, जो विनिर्दिष्ट की जाएं । (ii) उपधारा (1) के उपबंध वही-वही प्रभाव होगा कि व्यौहारी के लेखाओं की संपरीक्षा किसी अन्य उपबंध या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या अन्यथा के अधीन की गई है;
(iii) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक रिपोर्ट, व्यौहारी द्वारा आयुक्त को ऐसी अवधि के भीतर प्रस्तुत की जाएगी जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए :
परंतु आयुक्त, व्यौहारी द्वारा इस निमित्त किए गए आवेदन पर और किसी मान्य और पर्याप्त कारण से उक्त अवधि को ऐसी और अवधि या अवधियों तक, जो वह ठीक समझे, तक बढ़ा सके गा :
परंतु यह और कि मूलत: नियत की अवधि का सकल और इस प्रकार बढ़ाई गई अवधि या अवधि किसी भी स्थिति में उस तारीख से एक सौ अस्सी दिन से अधिक नहीं होगी, जिस दिन उपधारा (1) के अधीन व्यौहारी द्वारा निदेश प्राप्त किया जाता है ;
(iv) उपधारा (1) के अधीन अभिलेखों की परीक्षा और लेखा परीक्षा के खर्च, और उसके लिए आनुषंगिक, (लेखाकार के पारिश्रमिक या लेखाकारों के पैनल या पेशेवर या पेशेवरों के पैनल सहित) द्वारा अवधारित किया जाएगा और आयुक्त द्वारा भुगतान किया जाएगा और वह अवधारण अंतिम होगा । 59. अभिलेखों का निरीक्षण—(1) भांडागार के व्यौहारी, परिवाहक या प्रचालक द्वारा रखे गए सभी अभिलेख,27 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण लेखा पुस्तकें , रजिस्टर और अन्य दस्तावेज, सभी उचित समय पर, आयुक्त द्वारा निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे ।
(2) आयुक्त, उचित प्रशासन के लिए और ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जो विहित की जाए—
(क) किसी व्यौहारी; या
(ख) किसी अन्य व्यक्ति, जिसके अंतर्गत बैंककारी कम्पनी, डाकघर, कोई व्यक्ति भी है, जो परिदान के लिए या किसी व्यौहारी की ओर से माल का परिवहन करता है या परिवहन के लिए अभिरक्षा में माल धारण करता है, जो व्यौहारी के कारबार संबंधी किन्हीं लेखा पुस्तकों, रजिस्ट्ररों या दस्तावेजों का रखरखाव करता है या अपने अभिरक्षा में रखता है और किसी व्यक्ति की दशा में, जो एक संगठन है, उसका कोई अधिकारी है को,
उसके क्रियाकलापों या किसी अन्य व्यक्ति के क्रियाकलापों, जो आयुक्त आवश्यक समझे, में संबंधित —
(i) ऐसे अभिलेख, लेखा पुस्तकों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेज अपने समक्ष प्रस्तुत करने की ;
(ii) ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने की ; और
(iii) ऐसी अतिरिक्त सूचना तैयार करने और प्रस्तुत करने की,
अपेक्षा कर सके गा।
(3) आयुक्त उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति की अपेक्षा कर सके गा :—
(क) कोई दस्तावेज तैयार करने और प्रदान करने की अपेक्षा कर सके गा; और
(ख) उसके द्वारा निर्दिष्ट रीति से किसी भी प्रश्न का उत्तर सत्यापित करने की अपेक्षा कर सके गा ।
(4) आयुक्त उस व्यक्ति द्वारा बिना फीस के उक्त अभिलेखों, लेखा पुस्तकों, रजिस्टरों और दस्तावेजों की प्रतियां या नकल अपने पास रख सके गा, हटा सके गा, प्रतियाँ या नकल ले सके गा या बना सके गा, जिसकी अभिरक्षा में अभिलेख, लेखा पुस्तकें , रजिस्टर और दस्तावेज रखे जाते हैं ।
60. परिसर में प्रवेश करने और अभिलेख और माल अभिग्रहण करने की शक्ति— (1) किसी व्यौहारी, परिवाहक या भांडागार का प्रचालक द्वारा किसी काराबार परिसर में रखे गए सभी माल उचित समय पर आयुक्त द्वारा निरीक्षण के लिए खुला रहेगा ।
(2) जहां आयुक्त के पास जानकारी होने पर या अन्यथा यह विश्वास करने का उचित आधार हो कि कोई व्यक्ति या व्यौहारी कर से बचने या चोरी करने का प्रयास कर रहा है या किसी भी रीति से अपनी कर देयता और प्रशासन के प्रयोजनों के लिए ऐसा करना अपेक्षित है, आयुक्त,—
(क) किसी काराबर परिसर या किसी अन्य स्थान या भवन में प्रवेश और तलाशी कर सके गा;
(ख) खंड (क) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए किसी भी दरवाजे, बॉक्स, लॉकर, तिजोरी, अलमारी या अन्य बर्तन का ताला तोड़ सके गा, जहां उसकी चाबियां आसानी से उपलब्ध नहीं हो;
(ग) किसी भी अभिलेख, लेखा पुस्तकें , रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों या सामानों को जब्त कर सके गा और हटा सके गा;
(घ) किसी अभिलेख, लेखा पुस्तकें , रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों पर पहचान के निशान लगा सके गा या बिना किसी प्रभार के नकल या प्रतियां बनवा सके गा;
(ङ) ऐसे माल की पहचान पर ऐसी खोज के स्थान के निशान के परिणामस्वरूप पाए गए किसी भी ऐसे पैसे या सामान का एक नोट या कोई सूची बना सके गा और (च) कार्यालय, दुकान, गोदाम, बॉक्स, तिजोरी, अलमारी या अन्य पात्र सहित परिसर को सील कर सके गा। (3) जहां किसी अभिलेख, लेखा पुस्तकें , रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों या मालों को हटाना संभव नहीं है, वहां आयुक्त स्वामी और किसी भी व्यक्ति को तत्काल कब्जे या नियंत्रण में रखने के लिए आदेश दे सके गा कि आयुक्त की पूर्व अनुमति के बिना वह नहीं हटाएगा या अलग नहीं करेगा या अन्यथा व्यवहार नहीं करेगा ।
(4) जहां किसी परिसर को उपधारा (2) के खंड (च) या उपधारा (3) के अधीन दिए गए आदेश के अधीन सील कर दिया गया है, वहां आयुक्त, स्वामी या कब्जे वाले व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर या ऐसी दुकान, गोदाम, बॉक्स, लॉकर, तिजोरी, अलमारी या अन्य पात्र के प्रभारी, यथास्थिति, ऐसे नियमों और शर्तों पर, ऐसी राशि के लिए प्रतिभूति प्रस्तुत करने सहित, ऐसे प्ररूप और रीति में, जो विहित की जाए, डी-सीलिंग या जारी करने की अनुमति दे सके गा।
(5) आयुक्त किसी भी पुलिस अधिकारी या किसी लोक सेवक, या दोनों की सेवाओं की अपेक्षा कर सके गा, जिससे कि वह उपधारा (2) में निर्दिष्ट सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए उसकी सहायता कर सके ।
(6) इस धारा में यथा उपबंध के सिवाय, इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक तलाशी या जब्ती जहां तक संभव हो, उस संहिता के अधीन की गई तलाशी या जब्ती संबंधीय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंधों के अनुसार की जाएगी ।
61. माल यान को रोकने, तलाशी लेने और निरुध करने की शक्ति— (1) आयुक्त, इस विनियम के उचित प्रशासन को समर्थ बनाने के लिए किसी भी चेक पोस्ट या बैरियर या किसी अन्य स्थान पर यान को रोकने के लिए माल यान के स्वामी, चालक या प्रभारी व्यक्ति से रुकने की अपेक्षा कर सके गा और तब तक स्थिर रखेगा जब तक यान की तलाशी लेना अपेक्षित हो, उसमें सामग्री की जांच करनें और माल से संबंधित सभी अभिलेखों का निरीक्षण करनें, जो ऐसे स्वामी, चालक या प्रभारी व्यक्ति के कब्जे में हों ।28 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (2) लक्षद्वीप में प्रवेश करने या छोड़ने वाले माल यानों का स्वामी, चालक या प्रभारी व्यक्ति ऐसे अभिलेखों को साथ रखेगा और आयुक्त से प्राप्त विहित विवरण में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, किसी चेक-पोस्ट या बैरियर के प्रभारी अधिकारी या पूर्वोक्त रूप में सशक्त अभिकर्ता के किसी अन्य अधिकारी के समक्ष ऐसे ब्यौरों से युक्त एक घोषणा भी फाइल करेगा :
परंतु जहां माल यान का स्वामी, चालक या प्रभारी व्यक्ति, लक्षद्वीप में प्रवेश करते समय एक घोषणा फाइल करने के पश्चात् कि माल को लक्षद्वीप के बाहर किसी स्थान पर ले जाने के लिए है, बिना उचित कारण के , ऐसे माल को बाहर ले जाने में विफल रहता है, वह लक्षद्वीप के बाहर, विहित अवधि के भीतर, कर के भुगतान के अलावा, यदि कोई हो, शास्ति के लिए उत्तरदायी होगा जो उस कर के ढाई गुना या एक हजार रुपए, जो भी अधिक हो, से अधिक नहीं होगा।
(3) लक्षद्वीप द्वीप समूह में प्रवेश करने या छोड़ने वाले कर माल यानों के स्वामी, चालक या प्रभारी व्यक्ति भी किसी चेक पोस्ट या बैरियर का या पूर्वोक्त रूप से सशक्त किसी अन्य अधिकारी या अभिकर्ता के समक्ष आयुक्त से प्राप्त विहित प्ररूप में ऐसे विवरण और विहित रीति से प्रभारी अधिकारी के समक्ष एक घोषणा फाइल करेंगे :
परंतु जहां माल यान का स्वामी, चालक या प्रभारी व्यक्ति, लक्षद्वीप द्वीप समूह में प्रवेश करते समय एक घोषणा फाइल करने के पश्चात् कि माल को लक्षद्वीप समूह के बाहर किसी स्थान पर ले जाने के लिए है, बिना उचित कारण के , ऐसे माल को बाहर ले जाने में विफल रहता है, लक्षद्वीप समूह के बाहर, विहित अवधि के भीतर वह, कर के भुगतान के अतिरिक्त, यदि कोई हो, जो शास्ति के लिए उत्तरदायी होगा उस कर के ढाई गुना से अधिक नहीं, जो लक्षद्वीप द्वीप समूह के अंदर माल बेचे जाने पर देय कर के ढाई गुना या एक हजार रुपए जो भी अधिक हो, से अधिक नहीं होगा।
(4) माल यान का स्वामी , चालक या प्रभारी व्यक्ति, यदि अपेक्षित हो, आयुक्त को सूचित करेगा—
(क) उसका नाम और पता;
(ख) यान के स्वामी का नाम और पता;
(ग) माल के प्रेषक का नाम और पता;
(घ) माल के परेषिती का नाम और पता; और (ड.) परिवाहक का नाम और पता ।
(5) यदि, किसी माल यान की सामग्री की जांच करने या ले जाए गए माल से संबंधित दस्तावेजों के निरीक्षण पर, आयुक्त के पास यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसे माल यान का स्वामी या चालक या प्रभारी व्यक्ति यान नहीं ले जा रहा है, उपधारा (2) के अनुसार अपेक्षित दस्तावेज या उचित और वास्तविक दस्तावेज नहीं ले रहा है या इस विनियम के अधीन देय कर का भुगतान से बचने का प्रयास कर रहा है, वह लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों के लिए, निम्नलिखित में से कोई एक या अधिक कर सके गा, अर्थात्:—
(क) माल या माल यान को लक्षद्वीप में प्रवेश करने या छोड़ने की अनुमति देने से इंकार करना;
(ख) माल और माल से संबंधित किसी भी दस्तावेज को जब्त करना; और
(ग) माल यान और माल यान से संबंधित किसी भी दस्तावेज को जब्त करना ।
(6) जहां माल यान का स्वामी, चालक या प्रभारी व्यक्ति,—
(क) निरुध करने या जब्त किए जाने वाले सामान के संबंध में कर के भुगतान का सबूत पेश करने के लिए समय का अनुरोध कर सके गा; और
(ख) आयुक्त की संतुष्टि के लिए ऐसी रीति में और ऐसी राशि के लिए प्रतिभूति प्रदान कर सके गा जो विहित किया जाए,
माल यान, माल और इस प्रकार जब्त किए गए दस्तावेजों को जारी कर सके गा:
परंतु जहां स्वामी या उसका अभिकर्ता, चालक या माल यान का प्रभारी व्यक्ति कर के साढ़े तीन गुना के बराबर राशि का जुर्माना देने का विकल्प चुनता है, जो कि आयुक्त की राय से लगाया जाएगा ऐसे माल पर उद्ग्रहणीय होगा, यदि ऐसा माल लक्षद्वीप में बेचा गया था, आयुक्त, माल या माल यान या माल और माल यान से संबंधित दस्तावेजों को निरुध करने या जब्त करने के बजाय उन्हें जारी करेगा ।
(7) आयुक्त, उपधारा (6) के अधीन जब्त किए गए किसी भी माल या माल यान को हटाने के लिए माल यान के स्वामी, चालक या प्रभारी व्यक्ति को एक उपक्रम के अधीन अनुज्ञा दे सके गा—
(क) कि माल और माल यान को कार्यालय, गोदाम या लक्षद्वीप के भीतर अन्य स्थान पर, माल यान के स्वामी से संबंधित और ऐसे स्वामी की अभिरक्षा में रख सके गा; और (ख) कि आयुक्त के लिखित अनुमोदन के बिना, माल को प्रेषक, प्रेषिति या किसी अन्य व्यक्ति को परिदत्त नहीं किया जाएगा और इस प्रयोजन के लिए माल का प्रभारी व्यक्ति माल के स्वामी से एक प्राधिकार प्रस्तुत करेगा जो उसे ऐसा उपक्रम देने के लिए अधिकृ त हो।
(8) इस धारा में यथा उपबंधित के सिवाय, इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक तलाशी या जब्ती उस संहिता के अधीन की गई तलाशी या जब्ती से संबंधित जहां तक संभव हो, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंधों के अनुसार की जाएगी ।
(9) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी रोलिंग स्टॉक पर लागू नहीं होगा जैसा रेल अधिनियम, 1989 (1989 का 24) में परिभाषित है ।29 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण 62. अभिरक्षा और अभिलेख को जारी करना—(1) जहां आयुक्त किसी लेखा पुस्तकों या अन्य दस्तावेजों को जब्त करता है, वहां यथास्थिति, व्यौहारी या उसकी ओर से उपस्थित व्यक्ति को उसकी रसीद देगा और उसकी पावती प्राप्त करेगा :
परंतु यदि व्यौहारी या व्यक्ति जिसकी अभिरक्षा से लेखा पुस्तकों या अन्य दस्तावेज जब्त किए गए हैं, पावती देने से इंकार करते हैं, आयुक्त रसीद को परिसर में छोड़ सके गा और इस तथ्य को अभिलिखित कर सके गा ।
(2) आयुक्त एक वर्ष से अनधिक अवधि के लिए धारा 60 के अधीन जब्त की गई लेखा पुस्तकों, रजिस्टरों, अन्य दस्तावेजों को अपनी अभिरक्षा में रखेगा, और उसके पश्चात् उसे उस व्यौहारी या व्यक्ति को वापस कर देगा, जिसकी अभिरक्षा या शक्ति से उन्हें जब्त किया गया था :
परंतु आयुक्त, लेखा पुस्तकों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों को वापस करने से पहले, यथास्थिति, व्यौहारी या व्यक्ति को एक लिखित वचनबद्धता देने के लिए कह सके गा कि लेखा पुस्तकें , रजिस्टर और अन्य दस्तावेज जब भी प्रस्तुत किए जाए इस विनियम के अधीन किसी भी कार्यवाही के लिए आयुक्त द्वारा अपेक्षित होंगे :
परन्तु यह और कि आयुक्त, अनुरोध किए जाने पर, उस व्यक्ति को, जिसकी लेखा पुस्तकों, रजिस्टर और दस्तावेज जब्त कर लिए गए हैं, निरीक्षण के प्रयोजन के लिए लेखा पुस्तकों, रजिस्टरों और दस्तावेजों तक उचित पहुंच की अनुमति देगा और व्यक्ति के स्वयं के खर्च पर उसकी प्रतियों के लिए व्यक्ति को ऐसा करने का अवसर देगा :
परंतु यह भी कि धारा 60 के अधीन जब्त किए गए लेखा पुस्तकों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों की अभिरक्षा की अवधि एक वर्ष से आगे बढ़ाई जा सकती है यदि इस विनियम के अधीन कोई कार्यवाही लंबित है या आयुक्त द्वारा लेखबद्ध किए जाने चाहिए।
63. माल, माल यान की अभिरक्षा, वापसी और निपटान तथा सुरक्षा— (1) जहां आयुक्त, किसी माल या माल यान को जब्त करता है, वहां, यथास्थिति,व्यौहारी, माल यान के प्रभारी व्यक्ति या उसकी ओर से विद्यमान व्यक्ति, उसके लिए एक रसीद देगा और उसे दी गई रसीद की पावती प्राप्त करेगा:
परंतु जिस व्यक्ति की अभिरक्षा से माल या माल यान जब्त किया गया है, वह पावती देने से इनकार करता है, आयुक्त उसकी उपस्थिति में रसीद को छोड़ सके गा और इस तथ्य को अभिलिखित कर सके गा ।
(2) आयुक्त—
(क) अपनी अभिरक्षा में धारा 61 के अधीन जब्त किए गए किसी भी माल या माल यान को रखेगा;
(ख) उन्हें ऐसे समय के लिए रख सके गा जब तक वह उचित समझे; और
(ग) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन, माल या माल यान का व्यौहारी या अन्य व्यक्ति को अभिरक्षा या शक्ति जिसमें उन्हें जब्त कर लिया गया था वापस कर देगा। (3) जहां आयुक्त—
(क) किसी भी माल को जब्त कर लिया है;
(ख) एक माल यान जब्त कर लिया है; या
(ग) इस विनियमन के अधीन, बाध्यताओं का पालन करने के लिए किसी माल को प्रतिभूति के रूप में धारण किया है,
वह सूचना की तामील के पश्चात् एक मास से पहले नहीं हो सके गा
(i) वह व्यक्ति, जिससे माल जब्त किया गया था;
(ii) वह व्यक्ति, जिससे माल यान जब्त किया गया था;
(iii) वह व्यक्ति, जिसके लिए सुरक्षा दी गई थी; और (iv) कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध सुरक्षा प्रवृत्त की जानी है,
माल बेचने के अपने आशय से, ऐसे माल या माल यान की नीलामी को इस विनियमन के अधीन बकाया कर, ब्याज या जुर्माना को पूरा करने का निर्देश देगा ।
(4) माल या माल यान की नीलामी आयुक्त द्वारा धारित संपत्ति की बिक्री के लिए विहित रीति में की जाएगी। 64. प्रकटीकरण में लंबित होने पर माल का निरुद्ध किया जाना— (1) यदि कोई व्यक्ति, आयुक्त द्वारा अपेक्षित होने पर, अपने कब्जे में किसी भी माल के संबंध में कोई जानकारी देने में विफल रहता है या उसके निरीक्षण की अनुमति देने में विफल रहता है तो आयुक्त, किसी भी माल को, जो उसकी अभिरक्षा या कब्जे में है जिसके संबंध में व्यतिक्रम कारित की गई है, जब्त कर सकता है ।
(2) जब्ती तब तक प्रवृत्त रहेगी जब तक इसे वापस नहीं किया जाता है या संबंधित व्यक्ति अपेक्षित जानकारी प्रस्तुत नहीं करता है या माल के निरीक्षण की, जो भी पहले हो, उचित व्यवस्था नहीं करता है।
65. उचित सहायता के लिए बाध्यता—प्रत्येक व्यक्ति आयुक्त को विनियमन के अधीन आयुक्त के क्रियाकलाप के संचालन के लिए अपेक्षित सहयोग और उचित सहायता करेगा।
अध्याय 11
मूल्य वर्धित कर प्राधिकरण और अपील अधिकरण 66. मूल्य वर्धित कर प्राधिकरण—(1) सरकार, मूल्य वर्धित कर आयुक्त के रूप में जाने जाने वाले व्यक्ति को नियुक्त करेगी।
(2) सरकार, इस विनियम के प्रशासन में आयुक्त की सहायता करने के लिए, मूल्य वर्धित कर के कई विशेष आयुक्त, मूल्य वर्धित कर अधिकारी और ऐसे अन्य व्यक्तियों को ऐसे पदनामों के साथ नियुक्त कर सके गी जिन्हें सरकार आवश्यक30 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] समझे (यहां इस अध्याय में "मूल्य वर्धित कर प्राधिकरण" के रूप में निर्दिष्ट किया गया है)।
(3) आयुक्त और मूल्य वर्धित कर प्राधिकरण ऐसी शक्तियों का प्रयोग और इस विनियम के अधीन ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे जो निर्दिष्ट की जाएं।
(4) मूल्य वर्धित कर अधिकारियों द्वारा कर के निर्धारण, गणना और दंड अधिरोपित करने, देय या बकाया ब्याज की गणना, पात्रता की गणना और किसी भी वापसी की राशि का निर्धारण करने के लिए प्रयोग की जाने वाली शक्तियां इस विनियमन के प्रयोजनों के लिए, धारा 84 के अधीन विशिष्ट प्रश्न के निर्धारण, धारा 85 के अधीन सामान्य नियम बनाने, और लेखा या अन्वेषण का संचालन, करने हेतु प्रशासनिक कृ त्य होंगे।
67. आयुक्त की शक्तियां और उत्तरदायित्व—(1) आयुक्त के पास सम्यक् और उचित प्रशासन का उत्तरदायित्व होगा और पूरे लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर उसका अधिकार क्षेत्र होगा। (2) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन, आयुक्त, समय- समय पर, किसी भी मूल्य वर्धित कर प्राधिकरणों को ऐसे आदेश, अनुदेश और निदेश जारी कर सके गा जैसा वह सम्यक् और उचित प्रशासन के लिए उपयुक्त समझे और ऐसे सभी व्यक्ति, प्रशासन में लगे आयुक्त के ऐसे आदेशों, अनुदेशों और निदेशों का सम्प्रेक्षण और पालन करेंगे।
(3) अवधारित करने की शक्ति का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को आयुक्त द्वारा कोई आदेश, अनुदेश या निदेश जारी नहीं किए जा सकें गे—
(क) धारा 74 के अधीन की गई या की जाने वाला कोई विशिष्ट आक्षेप; या
(ख) धारा 84 के अधीन बनाया गया एक विशिष्ट प्रश्न, जिससे व्यक्ति को किसी विशिष्ट रीति से आक्षेप का अवधारित करने या किसी विशेष व्यक्ति के प्रश्न का उत्तर देने की अपेक्षा हो।
(4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए, आयुक्त को किसी भी व्यक्ति को साधारण आदेश, अनुदेश और निदेश जारी करने से नहीं रोके गा, जो धारा 74 के अधीन की गई आपत्तियों का अवधारण करता है या आपत्तियों के वर्गों का अवधारण या प्रश्नों के वर्गों के उत्तर देने के बारे में धारा 84 के अधीन किए गए प्रश्नों के उत्तर देता है।
68. आयुक्त की शक्तियों का प्रत्यायोजन—(1) ऐसे निर्बंधनों और शर्तों के अधीन, जो विहित की जाए, आयुक्त इस विनियम के अधीन किसी भी मूल्य वर्धित कर प्राधिकरण को अपनी किसी भी शक्तियों का प्रत्यायोजन कर सके गा । (2) जहां आयुक्त, अध्याय 10 के अधीन अपनी शक्तियों को प्रत्यायोजित करता है, शक्तियों का प्रयोग करते समय इन शक्तियों के प्रत्यायोजन के विहित रूप में मांग पर साक्ष्य देगा और प्रस्तुत करेगा।
(3) जहां आयुक्त ने मूल्य वर्धित कर प्राधिकरण को शक्ति प्रत्यायोजित की है, वहां आयुक्त उस प्राधिकरण द्वारा किए गए किसी भी विनिश्चय या की गई कार्रवाई का पर्यवेक्षण, समीक्षा और सुधार कर सके गा ।
(4) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, धारा 74 के अधीन आपत्ति का अवधारण करने के लिए आयुक्त द्वारा किसी व्यक्ति को प्रत्यायोजित शक्ति का प्रयोग उस व्यक्ति द्वारा किया जा सके गा, यद्यपि आपत्ति का अवधारण करने वाला व्यक्ति उस व्यक्ति के रैंक के समान है जिसका विनिश्चय आपत्ति के अधीन है।
69. पदधारी का पद परिवर्तन—इस विनियम के अधीन किसी कार्यवाही की बाबत जब भी आयुक्त या किसी मूल्य वर्धित कर प्राधिकारी का उत्तराधिकारी कोई अन्य व्यक्ति होता है—
(क) उत्तराधिकार के आधार पर पूर्व पदधारी द्वारा दी गई शक्ति का कोई प्रत्यायोजन वापस नहीं किया जाएगा; और (ख) इस प्रकार उत्तराधिकार होने वाला व्यक्ति उस चरण से कार्यवाही जारी रख सके गा जिस पर कार्यवाही उसके पूर्ववर्ती द्वारा छोड़ी गई थी।
70. प्ररूप को अधिसूचित करने की आयुक्त की शक्तियाँ— (1) आयुक्त ऐसे प्ररूप को अधिसूचित कर सके गा जो मूल्य वर्धित कर प्राधिकारी को सूचना देने के लिए आवश्यक हों।
(2) जहां आयुक्त ने किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए एक प्ररूप को अधिसूचित किया है, वहां सभी व्यक्तियों से अपेक्षा की जाएगी कि वे प्ररूप का उपयोग करते हुए जानकारी की ऐसी रीति से रिपोर्ट करे, जो उसके द्वारा अधिसूचित किया जाए । (3) जहां उसकी राय में ऐसा करना आवश्यक या सुविधाजनक हो, आयुक्त, प्रयोजनों को पूरा करने के लिए अधिसूचना जारी कर सके गा :
परंतु कोई भी अधिसूचना इस विनियम या इसके अनुसार बनाए गए किसी भी नियम या विनियम से असंगत नहीं होगी।
(4) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकू ल प्रभाव डाले बिना, आयुक्त द्वारा जारी अधिसूचना उन सभी या किसी भी मामले को अनुबंधित कर सके गी जो आयुक्त की राय में उचित प्रशासन के लिए आवश्यक या सुविधाजनक हो।
(5) इस विनियम के अधीन आयुक्त द्वारा जारी प्रत्येक अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी और ऐसे प्रकाशन से पूर्व इसका कोई प्रभाव नहीं होगा ।
71. व्यक्तियों का लोक सेवक होना— आयुक्त, मूल्य वर्धित कर प्राधिकरण और अपील अधिकरण के सभी सदस्यों को भारतीय दंड संहिता की धारा 21 (1860 का 45) के अर्थांतर्गत लोक सेवक के रूप में समझा जाएगा ।31 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण 72. सिविल वाद से उन्मुक्ति—कोई वाद या कार्यवाही इस विनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन सद्.भावपूर्वक किए गए या किए जा चुके आशय पूर्ण कार्य के लिए सरकार, आयुक्त, कोई मूल्य वर्धित कर प्राधिकरण या अपील अधिकरण के सदस्य के विरुद्ध कोई सिविल वाद नहीं लाया जाएगा ।
73. अपील अधिकरण—(1) सरकार, इस विनियम के प्रारंभ होने के पश्चात् यथासंभवशीघ्र अपील अधिकरण द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए और कृ त्यों का निर्वहन करने के लिए एक या अधिक सदस्यों से मिलकर एक अपील अधिकरण का गठन करें, जो वह उचित समझे या इस विनियम के अधीन या प्रयोजन के लिए अपील अधिकरण के रूप में कृ त्य के लिए नजदीकी राज्य के किसी अधिकरण को अभिहित करने के लिए के न्द्रीय सरकार से अनुरोध कर सके गी :
परंतु अपील अधिकरण में एक सदस्य होता है, वहां वह सदस्य वह व्यक्ति होगा जिसने कम से कम पांच वर्ष तक सिविल न्यायिक पद धारण किया हो या जो कम से कम तीन वर्ष तक भारतीय विधिक सेवा (ग्रेड III से अन्यून) का सदस्य रहा हो या जो कम से कम दस वर्ष से अधिवक्ता के रूप में व्यवसाय कर रहा हो और जहां अपील अधिकरण में एक से अधिक सदस्य हों, वहां ऐसा एक सदस्य पूर्वोक्त के रूप में अर्हित व्यक्ति हो ।
(2) जहां अपील अधिकरण के सदस्यों की संख्या एक से अधिक है, वहां सरकार, उन सदस्यों में से एक को अपील अधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त करेगी।
(3) उपधारा (1) के उपबंधों के अध्यधीन अपील अधिकरण का गठन करने वाले सदस्य या सदस्यों की अर्हता और सेवा की अन्य शर्तें और वह अवधि जिसके लिए ऐसे सदस्य या सदस्य पद धारण करेंगे, वह ऐसी होगी जो सरकार द्वारा अवधारित की जाए ।
(4) अपील अधिकरण में कोई भी रिक्ति सरकार द्वारा यथासाध्यशीघ्र ही भरी जाएगी।
(5) जहां अपील अधिकरण के सदस्यों की संख्या एक से अधिक है और यदि सदस्यों की राय में किसी भी बिंदु पर मतभेद है, तो बिंदु बहुमत की राय के अनुसार होगा, यदि बहुमत है, लेकिन यदि सदस्य समान रूप से विभाजित हैं, तो उस पर अपील अधिकरण के अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होगा। (6) सरकार की पूर्व मंजूरी के अध्यधीन, अपील अधिकरण, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने और अपने कारबार के निपटान के प्रयोजन के लिए उपबंधों और उसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत विनियम बनाएगा। (7) उपधारा (6) के अधीन बनाए गए विनियमों को राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा।
(8) अपील अधिकरण के पास, अपने कृ त्यों के निर्वहन के प्रयोजन के लिए सभी शक्तियां होंगी जो धारा 75 के अधीन आयुक्त में निहित हैं और अपील अधिकरण के समक्ष किसी भी कार्यवाही को भारतीय दंड संहिता की धारा 193 (1860 का 45) और धारा 228 के अर्थांतर्गत और धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा। (9) इस धारा में अंतर्विष्ट प्रतिकू ल बात के होते हुए भी सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी शर्तों और विनियमों के अधीन, जो अधिसूचना में अधिकथित की जाए, एक या एक से अधिक सदस्यों वाली न्यायपीठ का गठन कर सके गी।
अध्याय 12
आपत्तियां, अपील, विवाद और प्रश्न
74. (1) आपत्तियां—कोई व्यक्ति जो असंतुष्ट है,—
(क) इस विनियमन के अधीन किया गया एक निर्धारण;
या
(ख) इस विनियम के अधीन, यथास्थिति, किया गया कोई अन्य आदेश या विनिश्चय,
ऐसे निर्धारण या आदेश या विनिश्चय, के विरुद्ध आयुक्त को आपत्ति कर सके गा :
परंतु धारा 79 में परिभाषित गैर-अपील योग्य आदेश के विरुद्ध कोई आपत्ति नहीं की जा सके गी :
परंतु यह और कि किसी निर्धारण के विरुद्ध कोई आपत्ति तब तक स्वीकार नहीं की जाएगी जब तक कि कर, ब्याज या जुर्माने की राशि का अवधारण नहीं किया जाता है और जो विवाद में नहीं है और उसका भुगतान किया गया है, जिसके विफल होने पर आपत्ति दर्ज नहीं की गई समझी जाएगी:
परंतु यह भी कि आयुक्त, व्यौहारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, ऐसी आपत्ति पर विचार करने से पहले, विवादाधीन राशि में से उचित समझी गई राशि को जमा करने का निदेश दे सके गा:
परंतु यह भी कि किसी निर्धारण, विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध व्यक्ति द्वारा के वल एक ही आपत्ति की जा सके गी:
परंतु यह भी कि संशोधित निर्धारण, आदेश या विनिश्चय पर आपत्ति के मामले में के वल संशोधित भाग पर ही आपत्ति की जा सके गी:
परंतु यह भी कि धारा 84 या धारा 85 के अधीन दिए गए आदेश के विरुद्ध आयुक्त को कोई आपत्ति नहीं की जाएगी यदि आयुक्त ने उक्त धाराओं के अधीन अपनी शक्ति अन्य मूल्य वर्धित कर अधिकारियों को प्रत्यायोजित नहीं की है। (2) कोई व्यक्ति जो इस विनियम के अधीन किसी निर्णय पर पहुंचने या कोई निर्धारण या आदेश जारी करने या किसी अन्य प्रक्रिया को शुरू करने में आयुक्त की विफलता से व्यथित है, ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखित में अनुरोध किए जाने के पश्चात् छह मास के भीतर ऐसी विफलता के विरुद्ध ऐसे प्ररूप और ऐसी रीति में सहायता करेगा, जो विहित की जाए ।32 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (क) उपधारा (1) के अधीन की गई आपत्ति के मामले में, यथास्थिति, निर्धारण, या आदेश या विनिश्चय के सेवा की तारीख से दो मास के भीतर ; या
(ख) उपधारा (2) के अधीन की गई किसी आपत्ति के मामले में, छह मास से पूर्व नहीं और व्यक्ति द्वारा की गई सेवा के लिखित में अनुरोध के आठ मास के पश्चात् नहीं की जाएगी :
परन्तु जहां आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि व्यक्ति को विनिर्दिष्ट समय के भीतर आपत्ति दर्ज करने से पर्याप्त कारणों से रोका गया था, वह ऐसी आपत्ति को दो मास से अधिक की अवधि के भीतर स्वीकार कर सकता है।
(4) आयुक्त, आक्षेप का, यथास्थिति, निर्धारण या आदेश या विनिश्चय की परीक्षा द्वारा उसकी कार्यवाही का संचालन करेगा और किसी अन्य दस्तावेज या जानकारी जो सुसंगत हो :
परन्तु जहां व्यथित व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से सुनवाई का अनुरोध करता है वहां ऐसे व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से सुनवाई का अवसर दिया जाएगा।
(5) जहां किसी व्यक्ति ने उपधारा (4) के अधीन सुनवाई का अनुरोध किया है और व्यक्ति नियत समय और स्थान पर सुनवाई में सम्मिलित होने में विफल रहता है, आयुक्त उस व्यक्ति की अनुपस्थिति में आपत्ति को आगे बढ़ाएगा और अवधारणा करेगा।
(6) आपत्ति प्राप्त होने के पश्चात् तीन मास के भीतर, आयुक्त या तो,—
(क) आपत्ति को पूर्ण या आंशिक रूप से स्वीकार करे और स्वीकृ ति को प्रभावी करने के लिए उचित कार्रवाई करे (जिसमें पूर्ण या आंशिक रूप से निर्धारण किए गए किसी भी दंड से छू ट भी सम्मिलित है) ; या
(ख) यथास्थिति, आपत्ति या शेष आपत्ति से इंकार कर सके गा और किसी ऐसे मामले में आपत्ति करने वाले व्यक्ति को विनिश्चय की लिखित सूचना और इसके कारण, साक्ष्य के लिए एक कथन सहित, जिस पर यह आधारित है, प्रस्तुत करेगा :
परंतु जहां आयुक्त आपत्ति करने के तीन मास के भीतर व्यक्ति को लिखित रूप में सूचित करता है, वह दो मास से अनधिक की और अवधि के लिए आपत्ति पर विचार करना जारी रख सके गा:
परन्तु यह और कि वह व्यक्ति लिखित रूप में आयुक्त से अनुरोध कर सके गा कि वह आपत्ति पर विचार करने में तीन मास की अवधि के लिए अपनी स्थिति की सम्यक् तैयारी के लिए देरी करे,जिस मामले में स्थगन की अवधि की गणना उस अवधि के लिए नहीं की जाएगी जिसके द्वारा आयुक्त अपने विनिश्चय पर पहुंचेंगे।
(7) जहां आयुक्त ने उपधारा (6) के अधीन विनिर्दिष्ट समय के भीतर अपने विनिश्चय के बारे में व्यक्ति को सूचित नहीं किया है, वहां वह व्यक्ति एक लिखित नोटिस तामील कर सके गा जिसमें उसे पंद्रह दिन के भीतर निर्णय लेने की अपेक्षा होती है।
(8) यदि उपधारा (7) में विनिर्दिष्ट नोटिस दिए जाने के पश्चात् पंद्रह दिन की अवधि के अंत तक विनिश्चय नहीं किया गया है, तो, उस अवधि के अंत में, आयुक्त के पास आपत्ति की अनुमति दिया जाना माना जाएगा ।
(9) (क) इस धारा के अधीन किसी भी आदेश के पुनर्विलोकन के मामले में या इसके अधीन विनियम,नियमों या अधिसूचनाओं के अधीन आपत्ति में कोई विनिश्चय पारित किया जाता है, उसके अधीनस्थ किसी अधिकारी या व्यक्ति द्वारा, आयुक्त, अपने स्वयं के प्रस्ताव पर उसके द्वारा प्राप्त सूचना, ऐसे आदेश के अभिलेख की मांग करे और जांच करे कि क्या—
(i) बिक्री के किसी भी आवर्तन पर कर नहीं लगाया गया है या कम दर पर कर लाया गया है, या गलत रीति से वर्गीकृ त किया गया है, या कोई दावा गलत रीति से किया गया है या कर के दायित्व को कम करके आंका गया है; या
(ii) किसी भी मामले में, आदेश त्रुटिपूर्ण है, जहां तक यह राजस्व के हित के प्रतिकू ल है और जांच के पश्चात्, आयुक्त अपने सर्वोत्तम निर्णय के लिए, जहां आवश्यक हो, आदेश पारित कर सके गा।
(ख) (i) परीक्षा और आदेश पारित करने के प्रयोजन के लिए, आयुक्त, नोटिस की तामील द्वारा, व्यौहारी से अपेक्षा कर सके गा कि वह उसके समक्ष ऐसी लेखा पुस्तकें और अन्य दस्तावेज या साक्ष्य करे जैसा वह उपरोक्त प्रयोजन के लिए आवश्यक समझता है।
(ii) धारा 34 में अन्तर्विष्ट प्रतिकू ल बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन कोई भी आदेश उस वर्ष के अंत से चार वर्ष की समाप्ति के पश्चात् पारित नहीं किया जाएगा, जिसमें अधीनस्थ अधिकारी द्वारा पारित आदेश व्यौहारी को दिया गया है।
(iii) धारा 34 में अन्तर्विष्ट प्रतिकू ल बात के होते हुए भी, जहां अधीनस्थ अधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश या उक्त आदेश के भाग के संबंध में, आपत्ति की सुनवाई करने वाले किसी प्राधिकारी द्वारा या अधिकरण सहित किसी अपील प्राधिकारी द्वारा एक आदेश पारित किया गया है या ऐसा आदेश आपत्ति में विनिश्चय के लिए लंबित है या अपील दायर की जाती है, तो, यदि परीक्षा में शामिल मुद्दों का निर्णय या आपत्ति या अपील में उठाया गया है, तो आयुक्त उस वर्ष के अंत के पांच वर्ष के भीतर, जिसमें अधीनस्थ अधिकारी द्वारा पारित उक्त आदेश व्यौहारी पर तामील किया गया है, उसकी परीक्षा या रिपोर्ट या प्राप्त जानकारी के बारे में अधिकरण सहित उक्त आपत्ति पर सुनवाई, प्राधिकरण या अपीलीय प्राधिकारी को रिपोर्ट करेगा और अधिकरण सहित उक्त अपील प्राधिकारी, व्यौहारी को सुनवाई का एक उचित अवसर देने के पश्चात्, जहां आवश्यक हो, अपने सर्वोत्तम निर्णय के लिए एक आदेश पारित करेगा।
(ग) यदि आयुक्त ने किसी ऐसे मुद्दे के विरुद्ध उचित मंच के समक्ष कोई कार्यवाही आरंभ की है जो अधिकरण के आदेश33 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण द्वारा राजस्व के विरुद्ध विनिश्चय किया गया है, तो आयुक्त किसी भी आदेश के संबंध में, आदेश के अलावा, जो अधिकरण के आदेश का विषय-वस्तु है, अभिलेख के लिए कॉल कर सके गा, पूर्वोत्तर के रूप में परीक्षा आयोजित कर सके गा अपने निष्कर्षों को अभिलिखित कर सके गा, खाते की उक्त पुस्तकों और अन्य साक्ष्यों के लिए कॉल कर सके गा और इस धारा के अधीन उपबंध किए गए आदेश पारित कर सके गा जैसे कि मुद्दा राजस्व के विरुद्ध तय नहीं किया गया था, लेकिन ब्याज या शास्ति सहित बकाया की वसूली पर रोक तब तक लगा दी जाएगी, जब तक कि वे ऐसे मुद्दे से संबंधित नहीं हैं, समुचित मंच द्वारा विनिश्चय नहीं लिया जाता है और ऐसे निर्णय के बाद, यदि आवश्यक हो, तो पुनर्विलोकन के आदेश को उपांतरित कर सके गा।
(घ) इस धारा के अधीन किसी व्यौहारी या व्यक्ति द्वारा किए गए किसी आवेदन पर कोई कार्यवाही ग्रहण नहीं की जाएगी ।
(ड.) किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश में किसी बात के होते हुए भी, इस विनियम के उपबंध, राजपत्र में इस विनियम के प्रकाशन की तारीख को प्रवृत्त हुए समझे जाएंगे ।
(10) (क) धारा 34 में, अंतर्विष्ट किसी प्रतिकू ल बात के होते हुए भी, आयुक्त वर्ष के अंत जिसमें उसके द्वारा पारित किसी आदेश की तामील से चार वर्ष के भीतर किसी समय, स्वप्रेरणा से, अभिलेख में दृश्यमान किसी भूल को सुधार सकता है और उक्त अवधि के भीतर या तत्पश्चात् ऐसी किसी भूल को, जो उक्त अवधि के भीतर ऐसे आदेश से प्रभावित किसी व्यक्ति द्वारा उसके संज्ञान में लाई जाती है, को सुधार सके गा । (ख) उपधारा (1) के उपबंध, अपील प्राधिकरण या आक्षेप सुनवाई प्राधिकरण द्वारा भूल को सुधारने को लागू होंगे जैसे वे आयुक्त द्वारा भूल के सुधारने को लागू होते हैं :
परंतु जहां कोई मामला किसी आदेश या आदेश के भाग के संबंध में, आक्षेप या अपील या पुनर्विलोकन के माध्यम से किसी कार्यवाही में विचारित या विनिश्चित किया गया है, प्राधिकरण जो आक्षेप, अपील या पुनर्विलोकन पर आदेश पारित कर रही है इस विनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, मामला जो विचारित या विनिश्चित किया गया है, से भिन्न किसी मामले पर आदेश या आदेश के भाग को सुधार सके गा ।
(ग) जहां कोई ऐसा सुधार कर या शास्ति या ब्याज की रकम को घटाने का प्रभाव रखता है, आयुक्त, उपबंधों के अनुसार ऐसे व्यक्ति को ऐसी देय रकम को वापिस करेगा । (घ) जहां कोई ऐसा सुधार कर या शास्ति या ब्याज की रकम को बढ़ाने या वापसी की रकम को घटाने का प्रभाव है आयुक्त, उपबंधों के अनुसार ऐसे व्यक्ति से ऐसी देय़ रकम को वसूल करेगा ।
(ङ) पूर्वगामी उपधाराओं में यथाउपबंधित के सिवाय और ऐसे नियमों के अध्यधीन, जो विहित किए जाएं, धारा 66 के अधीन नियुक्त किए गए किसी व्यक्ति द्वारा इस विनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन किया गया कोई निर्धारण या पुनःनिर्धारण या पारित किया गया आदेश, स्वप्रेरणा से ऐसे व्यक्ति द्वारा या इस बाबत किए गए आवेदन पर पुनर्विलोकित किया जा सके गा।
75. शपथ, आदि पर साक्ष्य लेने की आयुक्त और अन्य प्राधिकारियों की शक्ति—(1) इस विनियम के प्रयोजन के लिए, धारा 74 के अधीन आक्षेपों का अवधारण करने वाला आयुक्त या कोई व्यक्ति का वाद का विचारण करते समय निम्नलिखित मामलों के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन न्यायालय में निहित वही शक्तियां होगी, अर्थात् :—
(क) किसी व्यक्ति को हाजिर कराना और उसकी शपथ पर परीक्षा या प्रतिज्ञान करना ;
(ख) लेखाओं और दस्तावेजों के प्रकटीकरण के लिए बाध्य करना; और
(ग) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन जारी करना और धारा 74 के अधीन आक्षेपों का अवधारण करने वाले आयुक्त या किसी व्यक्ति के समक्ष इस विनियम के अधीन कोई कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत और धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी ।
(2) इस बाबत बनाए गए किन्हीं नियमों के अध्यधीन, धारा 74 के अधीन आक्षेपों का अवधारण करने वाला आयुक्त या कोई व्यक्ति इन विनियमों के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों में उसके समक्ष प्रस्तुत की गई लेखा पुस्तिका और अन्य दस्तावेजों को जब तक ऐसी कार्यवाहियां समाप्त नहीं हो जाती हैं, परिबद्ध और उसकी अभिरक्षा में अभिधारित कर सके गा :
परंतु धारा 74 के अधीन आक्षेपों का अवधारण करने वाला आयुक्त या व्यक्ति लेखा पुस्तिकाओं या अन्य दस्तावेजों को ऐसा करने के लिए उसके कारणों को लेखबद्ध किए बिना परिबद्ध नहीं करेगा ।
76. अपील अधिकरण में अपील—(1) धारा 74, धारा 84, और धारा 85 के अधीन आयुक्त द्वारा किए गए विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे विनिश्चय के विरुद्ध अपील अधिकरण में अपील कर सके गा ।
(2) धारा 77 के उपबंधों के अध्यधीन, कोई अपील ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक यह विनिश्चय के विरुद्ध अपील की तामील की तारीख से दो मास के भीतर नहीं की जाती है । (3) इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक अपील ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति में सत्यापित की जाएगी और ऐसी फीस के साथ की जाएगी, जो विहित की जाए ।
(4) अपील अधिकरण द्वारा निर्धारण के विरुद्ध कोई अपील तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक कि अपील के34 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] साथ विवादित रकम और ऐसे व्यक्ति द्वारा निर्धारित अन्य देय रकम के संदाय के संतोषजनक सबूत संलग्न नहीं हों :
परंतु अपील अधिकरण, यदि वह ठीक समझे, लिखित में लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, अपीलार्थी ऐसी रकम जो निदेशित की जाए, के लिए प्रतिभूत द्वारा ऐसी रीति में जो विहित की जाए, के प्रस्तुत करने पर कु छ या पूरी विवादित रकम के संबंध के बिना ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील ग्रहण कर सके गा :
परंतु यह और कि अपील अधिकरण द्वारा कोई अपील तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक कि यह समाधान न हो जाए कि ऐसी रकम जिसे अपीलार्थी उससे देय मानता है, का संदाय कर दिया गया है ।
(5) अपील अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों में,—
(क) व्यथित व्यक्ति के वल आक्षेप में कथित किए गए मामलों पर विवाद करने तक ही सीमित रहेगा;
(ख) व्यथित व्यक्ति के वल आक्षेप में कथित किए गए आधारों पर ही बहस करने तक ही सीमित रहेगा; और (ग) व्यथित व्यक्ति को अच्छे और पर्याप्त कारणों के लिए आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए गए साक्ष्य को पेश करने की अनुज्ञा दी जा सके गी ।
(6) अपील अधिकरण—
(क) निर्धारण के मामलें में, पुष्टि, अवनत या वार्षिक निर्धारण करेगा (जिसमें कोई शास्ति और अधिरोपित ब्याज भी है);
(ख) आयुक्त के किसी अन्य विनिश्चय के मामले में, विनिश्चय अभिपुष्ट या नामंजूर करेगा ;या
(ग) दावे के अवधारण के लिए ऐसा अन्य आदेश पारित करेगा, जो वह ठीक समझे :
परंतु अपील अधिकरण अपने विनिश्चय के लिए लिखित में कारण देगा जिसमें तथ्य के प्रश्नों पर इसका निष्कर्ष और साक्ष्य या अन्य सामग्री, जिस पर वह निष्कर्ष आधारित थे, सम्मिलित होंगे ।
(7) अपील अधिकरण इसके समक्ष मामले का अंतिम समाधान करने के लिए अपने सर्वोत्तम प्रयास करेगा और इस प्रयोजन के लिए विवादित आदेश हेतु प्रतिस्थापन में विनिश्चय कर सके गा जिसके अंतर्गत किसी विवेकाधिकार का प्रयोग या पुनःप्रयोग या आयुक्त में निहित शक्ति भी है ।
(8) अपील अधिकरण निर्धारण को अपास्त नहीं करेगा और अतिरिक्त निर्धारण के लिए मामला आयुक्त को वापस नहीं भेजेगा, जब तक इसने पहले—
(क) प्रस्तावित आदेश से व्यथित व्यक्ति को सलाह देने ;
(ख) व्यक्ति को, इसके समक्ष अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने का, जो अपील अधिकरण को अंतिम अवधारण तक पहुंचने में सहायक होता, के लिए अवसर प्रदत्त नहीं किया है । (9) जहां अपील अधिकरण निर्धारण को अपास्त करता है और अतिरिक्त निर्धारण के लिए मामला आयुक्त को भेजता है, अपील अधिकरण आयुक्त को उसी समय कु छ या पूरी विवादित रकम को व्यक्ति को वापस करने का आदेश देगा :
परंतु जहां कोई आदेश नहीं दिया गया है, यह उपधारणा की जाएगी कि अपील अधिकरण ने विवादित रकम की वापसी का आदेश दिया है ।
(10) जहां व्यक्ति अनुबद्ध समय और स्थान पर सुनवाई के लिए उपस्थित होने में असफल रहता है अपील अधिकरण कार्यवाहियों को आगे बढ़ाने, अपील विखण्डित या व्यक्ति की अनुपस्थिति में आक्षेप के अवधारण करने का आदेश अग्रेषित कर सके गा ।
(11) धारा 81 और उपधारा (12) में यथाउपबंधित के सिवाय अपील अधिकरण द्वारा अपील पर पारित आदेश अंतिम होगा ।
(12) अपील अधिकरण इसकी कार्यवाहियों के अभिलेख से दृश्यमान कोई भूल या त्रुटि सुधार सके गा ।
(13) अपील अधिकरण द्वारा पारित कोई आदेश स्वप्रेरणा से या इस बाबत किए गए आवेदन पर पुनर्विलोकित किया जा सके गा :
परंतु कोई आदेश जिससे किसी व्यक्ति को प्रतिकू ल रूप से प्रभावित होने की संभावना है, पहले ऐसे व्यक्ति को सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा ।
77. कतिपय मामलों में परिसीमा की अवधि का विस्तार— (1) अपील अधिकरण धारा 76 के अधीन उस धारा में अधिकथित परिसीमा की अवधि के पश्चात् अपील स्वीकार कर सके गी । यदि अपीलार्थी अपील अधिकरण को संतुष्ट करता है कि ऐसी अवधि के भीतर अपील न करने के लिए पर्याप्त कारण थे ।
(2) धारा 76 और धारा 81 के अधीन अधिकथित अवधि की संगणना करने में, परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) की धारा 4 और धारा 12 के उपबंध, जहां तक हो सके , लागू होंगे ।
(3) धारा 76 या धारा 81 से भिन्न, परिसीमा की अवधि की संगणना करने में किसी उपबंध या तद् धीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित या अधीन, किसी अवधि, जिसके दौरान किसी न्यायालय के आदेश या आदेश द्वारा कोई कार्यवाही रोकी गई है, अपवर्जित होगी ।
78. सबूत का भार—धारा 74 के अधीन या अपील अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों में कोई विवाद का विषय, जो कर या इस विनियम के अधीन किसी अन्य रकम के देय दायित्व से संबंधित है, को साबित करने का भार रकम के संदाय के दायी अभिकथित व्यक्ति पर होगा ।
79. कतिपय आदेशों के विरुद्ध अपील या आक्षेप —(1) निम्नलिखित के विरुद्ध कोई आक्षेप या अपील नहीं होगी —
35 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण(क) कर या शास्ति का निर्धारण करने का आयुक्त का विनिश्चय ;
(ख) व्यक्ति को विवरणी प्रस्तुत करने की अपेक्षा की सूचना;
(ग) धारा 58 और धारा 59 के अधीन जारी सूचना;
(घ) आयुक्त का किसी मामले को अधिसूचित करने का विनिश्चय;
(ड.) व्यौहारी पर कारण बाताओ नोटिस कि क्यों न उस पर इस विनियम के अधीन अपराध के लिए अभियोजित न किया जाए ;
(च) लेखा पुस्तिका, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों की जब्ती या प्रतिधारण से संबंधित विनिश्चय;
(छ) इस विनियम के अधीन अभियोजन मंजूर करने का विनिश्चय;
(ज) किन्हीं कार्यवाहियों के अनुक्रम में किया गया अन्तरिम विनिश्चय,
(झ) मूल्य वर्धित कर प्राधिकरणों के आन्तरिक प्रशासन के संबंध में आयुक्त का विनिश्चय ,
(ञ) अपील अधिकरण या न्यायालय के आदेश को प्रभावी करने को आयुक्त द्वारा जारी निर्धारण, या (ट) ''गैर-अपीलीय आदेशों'' की तरह निर्देशित धारा 84 की उपधारा (10) के अधीन व्यक्ति पर तामील की गई सूचना, (2) उपधारा (1) के खंड (ञ) में यथा उपबंधित के सिवाय, उपधारा (1) में अंतर्विष्ट कोई बात, किसी व्यक्ति को धारा 74 के अधीन आयुक्त द्वारा निर्धारित किसी रकम के या किसी रकम के संदाय की बाध्यता को आक्षेप करने से नहीं रोके गी ।
80. निर्धाऱण कार्यवाहियां, आदि का कतिपय आधारों पर अविधिमान्य न होना—(1) किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में या पूर्वगामी विधि के अधीन किए गए या जारी किए गए या लिए गए कोई निर्धारण, सूचना, समन या अन्य कार्यवाहियां, ऐसे निर्धारण, सूचना, समन या अन्य कार्यवाहियों में किसी भूल, त्रुटि या लोप के कारण मात्र से अविधिमान्य नहीं होगी या अविधिमान्य नहीं समझी जाएंगी, यदि ऐसा निर्धारण, सूचना, समन या अन्य कार्यवाहियां, आशय और प्रयोजन के अनुसार या अन्य पूर्वगामी विधि के सार और प्रभाव के अनुरूप हो । (2) कोई सूचना, आदेश या संसूचना की तामील प्रश्नगत नहीं की जाएगी, यदि उक्त सूचना, आदेश या संसूचना, यथास्थिति, व्यौहारी या व्यक्ति, जिसको यह जारी की गई है, द्वारा पहले से ही उस पर कृ त्य किया जा चुका है या जो तामील ऐसी सूचना, आदेश या संसूचना के अनुसरण में पूर्वगामी प्रारंभ की गई, निरंतर की गई, समाप्त की गई कार्यवाहियों पर या में प्रश्नगत नहीं की गई है ।
(3) इस विनियम के अधीन किया गया कोई निर्धारण इस आधार मात्र से किसी अन्य उपबंधों के अधीन किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा कार्रवाई की जा सकती थी, अविधिमान्य नहीं होगा ।
81. उच्च न्यायालय में अपील—(1) इस विनियम के अधीन अधिकरण द्वारा पारित प्रत्येक आदेश के विरुद्ध अपील उच्च न्यायालय में होगी, यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि मामले में विधि का सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है ।
(2) अपील अधिकरण द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित आयुक्त या अन्य पक्षकार उच्च न्यायालय में अपील कर सके गा और इस उपधारा के अधीन ऐसी अपील—
(क) उस तारीख से, जिसको अपीलगत आदेश आयुक्त को प्राप्त हुआ या अन्य पक्षकार को तामील हुआ, साठ दिन की अवधि में फाइल की जाएगी :
परंतु उच्च न्यायालय उक्त साठ दिन की अवधि के अवसान के पश्चात् अपील को ग्रहण कर सके गा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसी अवधि में इसको फाइल न कर पाने का पर्याप्त कारण था :
परंतु यह और कि उपरोक्त परंतुक राजपत्र में इस विनियम के प्रकाशन की तारीख को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ;
(ख) अपील ज्ञापन, जिसमें प्रमिततः विधि का सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है, का कथन है, के प्ररूप होगा ।
(3) जहां उच्च न्यायालय का समाधान हो जाता है कि किसी मामले में विधि का सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है, वह उस प्रश्न को विरचित करेगा ।
(4) इस प्रकार के वल विरचित प्रश्न पर अपील की सुनवाई होगी और प्रत्यर्थी को अपील की सुनवाई के दौरान इस बात पर बहस करने की अनुमति होगी कि मामले में ऐसा प्रश्न अंतर्वलित नहीं है :
परंतु इस उपधारा की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से न्यायालय की किसी अपील की, उसके द्वारा विरचित न किए गए विधि के किसी अन्य सारवान् प्रश्न पर सुनवाई करने की शक्ति को समाप्त करने या उसका अल्पीकरण करने वाली है, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि मामले में ऐसा प्रश्न अंतर्वलित है ।
(5) उच्च न्यायालय इस प्रकार विरचित विधि के प्रश्न का विनिश्चय करेगा और ऐसे निर्णय को, उन आधारों सहित, जिन पर ऐसा निर्णय आधारित है, प्रदान करेगा और ऐसी लागत लगा सके गा, जो वह ठीक समझे ।
(6) उच्च न्यायालय किसी ऐसे मुद्दे का अवधारण कर सके गा जिसे—
(क) अपील अधिकरण द्वारा अवधारित न किया गया हो;
(ख) उपधारा (1) में यथानिर्दिष्ट विधि के ऐसे प्रश्न पर विनिश्चय के कारण, अपील अधिकरण द्वारा त्रुटिपूर्ण रूप से अवधारित किया गया हो ।36 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (7) जहां उच्च न्यायालय के समक्ष कोई अपील फाइल की गई है, वहां यह उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों से कम की न्यायपीठ द्वारा नहीं सुनी जाएगी और उसका विनिश्चय ऐसे न्यायाधीशों या उनके बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा।
(8) जहां ऐसा कोई बहुमत नहीं है, वहां न्यायाधीश विधि के उस बिदु ं को बताएंगे जिस पर वे मतांतर रखते हैं और वहां के वल उस बिंदु पर उच्च न्यायालय के एक या अधिक अन्य न्यायाधीशों द्वारा मामले को सुना जाएगा और ऐसे न्यायाधीशों, जिन्होंने पहले इस मामले को सुना है, सहित सभी न्यायाधीशों के बहुमत की राय के अनुसार ऐसे बिंदु पर विनिश्चय किया जाएगा ।
(9) इस विनियम में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के उपबंध, जो उच्च न्यायालय को अपील से संबंधित है, इस धारा के अधीन अपीलों के संबंध में, जहां तक संभव हो, लागू होंगे । 82. किसी प्राधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों में हाजिरी— (1) कोई व्यक्ति, जो किसी प्राधिकारी के समक्ष इस विनियम के अधीन किसी कार्यवाही के संबंध में हाजिर होने के लिए हकदार है या अपेक्षित है,—
(क) इस बाबत लिखित में उसके द्वारा प्राधिकृ त व्यक्ति द्वारा, रिश्तेदार या उसके द्वारा नियमित रूप से नियोजित व्यक्ति होते हुए ; या
(ख) विधि व्यवसायी या चार्टर्ड अकाउं टेंट, लागत लेखापाल या कं पनी सचिव द्वारा, जो उपधारा (2) के द्वारा या अधीन निरर्हित नहीं है ; या
(ग) मूल्य वर्धित कर व्यवसायी द्वारा, जो सूची में विहित अर्हताएं रखता है और सूची में दर्ज है, जिसका आयुक्त इस बाबत अनुरक्षण करेगा और जो उपधारा (2) के द्वारा या अधीन निरर्हित नहीं है, हाजिर हो सके गा ।
(2) आयुक्त, ऐसे कारणों से जो लिखित में लेखबद्ध किए जाए, किसी प्राधिकारी, किसी विधि व्यवसायी, चार्टर्ड अकाउं टेंट, लागत लेखापाल, कं पनी सचिव, या मूल्य वर्धित कर व्यवसायी के समक्ष हाजिर होने की अवधि के लिए निरर्हित हो सके गा—
(क) जो सरकारी सेवा से बर्खास्त किया गया हो; या (ख) जो विधि व्यवसायी या चार्टर्ड अकाउं टेंट या लागत लेखापाल या कं पनी सचिव होते हुए इस विनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के संबंध में कदाचार का दोषी पाया गया हो ; या
(ग) जो मूल्य वर्धित कर व्यवसायी होते हुए, आयुक्त द्वारा ऐसे कदाचार का दोषी पाया गया हो ।
(3) कोई व्यक्ति, जो इस धारा के अधीन निरर्हित है, निरर्हता की तारीख से एक मास के भीतर सरकार को ऐसी निरर्हता को रद्द करने के लिए अपील कर सके गा।
(4) आयुक्त का विनिश्चय, उसके किए जाने के एक मास तक या जब तक अपील प्रस्तुत नहीं की जाती है या जब तक अपील विनिश्चत नहीं हो जाती, तब तक प्रभावी नहीं होगा । (5) आयुक्त किसी समय स्वप्रेरणा से या इस बाबत उसके द्वारा किए गए आवेदन पर, उपधारा (2) के अधीन किसी व्यक्ति के विरुद्ध किए गए किसी विनिश्चय का प्रतिसंहरण कर सके गा और तत्पश्चात् ऐसा व्यक्ति निरर्हित नहीं रह जाएगा। 83. सिविल न्यायालयों में वादों का वर्जन— कोई वाद या कार्यवाही इस विनियम या तद् धीन बनाए गए नियमों के अधीन किए गए किसी निर्धारण या पारित किसी आदेश को अपास्त करने या संशोधन करने के लिए सिविल न्यायालय में नहीं लाई जाएगी ।
84. विनिर्दिष्ट प्रश्नों का अवधारण—(1) यदि कोई अवधार्य प्रश्न उद्भूत होता है तब न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों से अन्यथा, व्यक्ति उस प्रश्न के अवधारण के लिए आयुक्त को विहित रीति में आवेदन कर सके गा ।
(2) उपधारा (3) के अध्यधीन, अवधार्य प्रश्न के अवधारण के लिए आवेदन, प्रस्तावित संव्यवहार की बाबत संव्यवहार हो जो किया जा रहा हो, या संव्यवहार समाप्त हो गया हो, किया जा सकता हो ।
(3) अवधार्य प्रश्न के अवधारण के लिए कोई आवेदन तत्पश्चात् नहीं किया जा सकता जब—
(क) आयुक्त ने धारा 58 के अनुसरण में व्यक्ति की लेखा परीक्षा प्रारंभ की है; या
(ख) आयुक्त ने कर अवधि के लिए निर्धारण जारी किया है, जिसमें संव्यवहार उपस्थित अवधार्य प्रश्न के अध्यधीन है । (4) इस धारा के प्रयोजन के लिए निम्नलिखित अवधार्य प्रश्न होगे—
(क) क्या कोई व्यक्ति, सोसाइटी, क्लब या संगम या कोई फर्म या कोई शाखा या किसी फर्म या विभाग व्यौहारी है या होगा ;
(ख) क्या किसी व्यौहारी का इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त होना अपेक्षित है या होगा ;
(ग) अवधि के लिए व्यौहारी की कराधेय मात्रा की रकम;
(घ) क्या संव्यवहार विक्रय से उद्भूत धारा 8 के अधीन किया गया विक्रय या अपेक्षित समायोजन है या होगा ;
(ङ) क्या संव्यवहार कार्य संविदा की प्रकृ ति या किसी माल के उपयोग के अधिकार के अंतरण में है या होगा;
(च) क्या विक्रय धारा 7 के अधीन कर का दायी नहीं है ;
(छ) क्या विक्रय धारा 6 के अधीन कर से छू ट प्राप्त है ;
(ज) संव्यवहार की विक्रय कीमत ;
(झ) व्यौहारी के आवर्तन का अनुपात या आवर्तन का क्रय, जिस कर अवधि में उद्भूत होता है और वह समय, जिस पर कर या कर प्रत्यय का समायोजन उद्भूत होता है ;
37 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण(ञ) क्या कोई संव्यवहार माल के आयात में है या होगा ;
(ट) लक्षद्वीप में आयातित किसी माल का मूल्य ;
(ठ) कर की दर, जो अनुसूची के अधीन माल के विक्रय या आयात और माल के वर्गीकरण पर संदेय है ;
(ड) क्या संव्यवहार माल के क्रय या क्रय से उद्भूत होने वाली धारा 10 के अधीन समायोजन अपेक्षित है ;
(ढ) किसी कर प्रत्यय की रकम, जिसका व्यौहारी माल के क्रय या आयात की बाबत हकदार है;
(ण) व्यौहारी द्वारा क्रय किए गए किसी उपयोगिता माल की बाबत किसी कर प्रत्यय की रकम ;
(त) किसी विक्रय या क्रय की अवस्थिति ;
(थ) व्यौहारी की परिस्थितियों में स्कीम संरचना का आवेदन ; या
(द) व्यौहारी की कर अवधि ।
5. आयुक्त, ऐसी अवधि के भीतर, जो विहित की जाए अवधारण करेगा ।
6. जहां—
(क) आयुक्त, उपधारा (5) के अधीन विहित समय के भीतर इस धारा के अधीन अवधारण करने में असफल रहता है ;
(ख) व्यक्ति, तत्पश्चात्, संव्यवहार कार्यान्वित करेगा, जो आवेदन के अध्यधीन और आवेदन में वर्णित रीति में होता है;
और
(ग) व्यक्ति ने, अवधार्य प्रश्न के अवधारण के लिए आवेदन में, अवधार्य प्रश्न के उत्तर को इंगित किया है, जिसे व्यक्ति सही मानता है (इस धारा में "प्रस्तावित अवधारण" कहा गया है),
आयुक्त द्वारा प्रस्तावित अवधारण के निबंधनों में अवधार्य प्रश्न का अवधारण विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् दिन पर व्यक्ति को किए गए और जारी प्रयोजन के लिए किया गया समझा जाएगा ।
7. आयुक्त—
(क) निदेश देता है कि अवधारण के पूर्व प्रभावित किसी संव्यवहार की बाबत अवधारण इस विनियम के अधीन किसी व्यक्ति के दायित्व को प्रभावित नहीं करेगा ;
(ख) अवधि की सीमा, जिसके लिए अवधारण लागू होगा;
(ग) संव्यवहारों की सीमा, जिसका अवधारण लागू होगा; और
(घ) अवधारण पर जैसा उचित लगे, ऐसी अन्य परिसीमाओं या निर्बंधनों अधिरोपण कर सके गा।
(8) यदि किसी आदेश से उद्भूत कोई ऐसा प्रश्न इस विनियम के अधीन पहले ही पारित कर दिया गया है, तब ऐसा प्रश्न इस धारा के अधीन अवधारण के लिए ग्रहण नहीं किया जाएगा किं तु ऐसा प्रश्न ऐसे आदेश के विरुद्ध आक्षेप या अपील में समुत्थापित किया जा सकता है ।
(9) जहां—
(क) आयुक्त ने व्यक्ति को विशिष्ट संव्यवहार की बाबत अवधारण जारी किया है; और
(ख) व्यक्ति, इस धारा के अधीन और आवेदन में वर्णित रीति में उसे जारी किए अवधारण पर आधारित संव्यवहार को कार्यान्वित करता है,
कोई निर्धारण उस व्यक्ति के विरुद्ध आयुक्त द्वा्रा समुत्थापित नहीं किया जा सके गा, जो अवधारण से असंगत है और कोई शास्ति व्यक्ति पर अधिरोपित नहीं की जा सके गी, यदि अवधारण बाद में गलत ठहराया गया है ।
(10) आयुक्त, व्यक्ति पर सूचना की तामील द्वारा, इस धारा के अधीन जारी किया गया अवधारण प्रत्याहृत या अर्हित कर सके गा, किं तु ऐसा प्रत्याहरण या अर्हता किसी संव्यवहार या कार्रवाई की बाबत अवधारण पर निर्भर होने की किसी व्यक्ति की हकदारी को प्रभावित नहीं करेगा, जिसे उसने प्रारंभ कर दिया है या जिसे उसने प्रत्याहरण या अर्हता के पूर्व में पूरा कर लिया है।
85. साधारण प्रश्नों पर विनिर्णय—(1) आयुक्त, किसी प्रश्न पर, जिसमें व्यक्तियों के वर्ग या संव्यवहारों के वर्ग का निर्वचन या प्रयोज्यता अंतर्वलित है, के उत्तर पर उसका विनिर्णय राजपत्र में अधिसूचना के प्रकाशन द्वारा दे सके गा । (2) इस धारा के अधीन आयुक्त द्वारा जारी किया गया विनिर्णय, आयुक्त जैसा उचित समझे ऐसे निर्बंधनों और शर्तों के अध्यधीन जारी किया जा सके गा ।
(3) विनिर्णय, विनिर्णय में (जो विनिर्णय के प्रकाशन से पूर्व की तारीख हो सकती है) कथित तारीख पर या यदि राजपत्र के प्रकाशन की तारीख पर, विनिर्णय में कोई तारीख कथित नहीं है, प्रभावी होना अभिक्रियित होगा ।
(4) जहां—
(क) आयुक्त ने व्यक्तियों या संव्यवहारों की बाबत विनिर्णय प्रकाशित किया है ;
(ख) व्यक्ति विनिर्णय पर आधारित संव्यवहार का कार्यान्वयन या कोई कार्रवाई करता है ;
(ग) विनिर्णय संव्यवहार का कार्यान्वयन या कार्रवाई के उत्तरदायित्व के समय पर, आयुक्त द्वारा प्रत्याह्रत नहीं किया गया है ; और
(घ) विनिर्णयों के निबंधनों के अनुसार, विनिर्णय का तात्पर्य व्यक्ति द्वारा किए गए संव्यवहार या की गई कार्रवाई पर लागू होता है,
कोई निर्धारण, जो विनिर्णय से असंगत है उस व्यक्ति के विरुद्ध आयुक्त दवारा समुत्थापित नहीं किया जा सकता है और कोई शास्ति व्यक्ति पर अधिरोपित नहीं की जा सकती, यदि विनिर्णय बाद में गलत ठहराया गया है ।38 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (5) आयुक्त, राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा, इस धारा के अधीन पहले से ही जारी किया गया विनिर्णय प्रत्याह्रत या अर्हित कर सके गा किं तु ऐसा प्रत्याहरण या अर्हता किसी संव्यवहार या कार्रवाई की बाबत विनिर्णय पर निर्भर होने की किसी व्यक्ति की हकदारी को प्रभावित नहीं करेगा, जो उसके द्वारा ऐसे प्रत्याहरण या अर्हता के पूर्व में प्रारंभ या पूरा कर लिया गया है ।
अध्याय 13
शास्तियां और अपराध
86. निर्वचन— (1) इस अध्याय में "कर ऊनता" से इस विनियम के उपबंधों के अनुसार व्यक्ति द्वारा उचित रूप से कर संदाय और कै लेण्डर मास की बाबत व्यक्ति द्वारा संदत्त कर की रकम के बीच अंतर अभिप्रेत है ।
(2) जहां इस विनियम के अधीन उसी व्यक्ति की बाबत दो या अधिक शास्तियां उद्भूत होती है, वहां ऐसा व्यक्ति के वल उच्चतर शास्ति का संदाय करने का दायी होगा ।
87. अरजिस्ट्रीकरण के लिए शास्ति—जहां ऐसे व्यक्ति, जिसका इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त होना अपेक्षित है जिस दिन को अपेक्षा उद्भूत हुई है, से एक मास के भीतर रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने में असफल रहता है, ऐसा व्यक्ति प्रतिदिन पांच सौ रुपए के बराबर की रकम की शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा, उक्त अवधि की समाप्ति के ठीक पश्चात् का दिन जब तक ऐसा व्यक्ति ऐसे प्ररूप में, ऐसी विशिष्टियां और जानकारी अंतर्विष्ट करने वाली और ऐसी फीस, प्रतिभूति और अन्य दस्तावेज द्वारा, जो विहित किए जाएं, के साथ रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करता है :
परंतु इस उपधारा के अधीन संदेय शास्ति की रकम पचास हजार रुपए की रकम से अधिक की नहीं होगी । 88. धारा 21 के उल्लंघन के लिए शास्ति—यदि, रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, धारा 21 की उपधारा (1) के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है तब वह अधिकतम पांच हजार रुपए के अध्यधीन रहते हुए प्रतिदिन के व्यतिक्रम के लिए दो सौ पचास रुपए की रकम की शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।
89. धारा 22 के उल्लंघन के लिए शास्ति—यदि रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी—
(क) धारा 22 की उपधारा (2) के उपबंधों के अनुपालन में असफल रहता है ;या
(ख) धारा 22 की उपधारा (7) में उपबंधित उसके रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का अभ्यर्पण करने में असफल रहता है, रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी अधिकतम पद्रंह हजार रुपए के अध्यधीन रहते हुए प्रत्येक दिन के व्यतिक्रम के लिए पांच सौ रुपए के बराबर की रकम की शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।
90. मिथ्या व्यपदेशन के लिए शास्ति—यदि कोई व्यक्ति मिथ्या व्यपदेशन करता है कि वह इस विनियम के अधीन व्यौहारी के रूप में रजिस्ट्रीकृ त है तब वह दोषपूर्वक संगृहित कर की रकम के बराबर या पचास हजार रुपए, जो भी उच्चतर हो, शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।
91. कतिपय शर्तों के अननुपालन के लिए शास्ति—जहां कोई व्यक्ति—
(क) धारा 18 की उपधारा (4) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर दिया है ;
(ख) रजिस्ट्रीकरण किया गया है; और या तो—
(i) क्रियाकलापों को करने में असफल रहता है जो व्यक्ति को उसके आवेदन में निर्दिष्ट अवधि के भीतर व्यौहारी बना देगा; या
(ii) किन्हीं निर्बंधनों या शर्तों के अनुपालन में असफल रहा है, जिसके अध्यधीन रहते हुए ऐसा रजिस्ट्रीकरण अनुदत्त था,
ऐसा व्यक्ति पांच हजार रुपए की शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।
92. विवरणी देने में असफलता के लिए शास्ति—यदि किसी व्यक्ति को अध्याय 5 के अधीन विवरणी देना अपेक्षित है—
(क) नियत तारीख को कोई विवरणी देने में असफल रहता है; या
(ख) विवरणी के साथ कोई अन्य दस्तावेज, जिसका विवरणी के साथ दिया जाना अपेक्षित है, देने में असफल रहता है ; या
(ग) पहले से प्रस्तुत विवरणी का संशोधन अपेक्षित होने के कारण, नियत तारीख तक संशोधित विवरणी देने में असफल रहता है; या
(घ) धारा 70 के अधीन जारी की गई अधिसूचना में अपेक्षा का अनुपालन करने में असफल रहता है,
ऐसा व्यक्ति नियत तारीख के ठीक पश्चात् के दिन से लेकर असफलता को परिशोधित किए जाने तक प्रतिदिन दो सौ पचास हजार रुपए की रकम की शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा :
परंतु इस उपधारा के अधीन शास्ति की कु ल रकम पच्चीस हजार रुपए से अधिक की नहीं होगी ।
93. मिथ्या विवरणी फाइल करने के लिए शास्ति—कोई व्यक्ति जो—
(क) इस अधिनियम के अधीन विवरणी देता है जो सामग्री विशेष में मिथ्या, भ्रामक या प्रवंचक है; या
(ख) इस विनियम के अधीन प्रस्तुत विवरणी से किसी मामले या विषय का लोप करता है जिसके बिना विवरणी सामग्री विशेष में मिथ्या, भ्रामक या प्रवंचक है, पांच हजार रुपए की रकम या कर ऊनता की रकम, जो भी उच्चतर हो, शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।39 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण 94. अन्य शास्तियां—(1) कोई व्यक्ति जो—
(क) धारा 14 के अधीन कर प्रत्यय का दावा करता है, जिसका वह हकदार नहीं है ; या
(ख) धारा 14 के अधीन अनुज्ञा से अधिकतर कर प्रत्यय का दावा करता है,
ऐसे दावा किए गए कर प्रत्यय की रकम या पांच हजार रुपए, जो भी उच्चतर हो, के बराबर की रकम की शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।
(2) जहां कर ऊनता व्यक्ति के संबंध में उद्भूत हुई है, व्यक्ति, प्रति सप्ताह कर ऊनता के एक प्रतिशत के बराबर की रकम या प्रति सप्ताह पचास रुपए के बराबर की रकम, व्यतिक्रम के अवधि के लिए, जो भी उच्चतर हो, की शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।
(3) जहां विनियम के अधीन व्यक्ति से अपेक्षित है कि—
(क) अभिलेखों या लेखाओं को तैयार करे ; या (ख) विहित रीति में अभिलेखों या लेखाओं को तैयार करे; या
(ग) विहित या अधिसूचित अभिलेखों या लेखाओं को प्रतिधारित करे ; और ऐसा व्यक्ति—
(i) विहित और अधिसूचित अभिलेखों और लेखाओं को तैयार करने में असफल रहता है ; या
(ii) विहित या अधिसूचित अभिलेखों और लेखाओं में विहित रीति में तैयार करने में असफल रहता है ; या (iii) विहित या अधिसूचित अभिलेखों और लेखाओं को विहित अवधि के लिए प्रतिधारित करने में असफल रहता है ;
या
(iv) अपने रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में यथाअभिलिखित कारोबार के मूल स्थान पर विहित या अधिसूचित अभिलेखों को प्रतिधारित करने या प्रस्तुत करने में असफल रहता है ; या (v) धारा 58 की उपधारा (6) के खंड (क) के अधीन जारी किए गए निदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है या विहित या अधिसूचित अभिलेखों या लेखाओं को या उनकों आयुक्त द्वारा या लेखाकार द्वारा या लेखाकार के पैनल द्वारा या किसी अन्य वृत्तिक या आयुक्त द्वारा इस बाबत नामनिर्दिष्ट वृत्तिकों के पैनल द्वारा उन पर तामील किसी सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख को या पहले प्रस्तुत करने में असफल रहता है, ऐसा व्यक्ति पच्चीस हजार रुपए या कर निर्धारण की बीस प्रतिशत की रकम, यदि कोई हो, जो भी उच्चतर हो, की शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।
(4) यदि कोई व्यौहारी धारा 49 के उपबंधों की अनुपालन करने में असफल रहता है, तो व्यौहारी अपनी व्यापारवर्त के एक प्रतिशत के बराबर रकम या पचास हजार रुपए, जो भी न्यूनतम हो, शास्ति के रूप में संदाय का दायी होगा ।
(5) कोई व्यक्ति, जिससे इस विनियम के अधीन अभिलेख और लेखे तैयार करना अपेक्षित है, ऐसी रीति में अभिलेख और लेखे तैयार करता है जो मिथ्या, भ्रामक या प्रवंचक है, तो वह व्यक्ति पचास हजार रुपए की रकम या कर की कमी की रकम, यदि कोई हो, में से जो भी उच्चतर हो, शास्ति के रूप में संदाय का दायी होगा ।
(6) जहां किसी व्यक्ति ने—
(क) कर बीजक या फु टकर बीजक, अपूर्ण या गलत विशिष्टियों सहित जारी किया है ; या
(ख) कर बीजक या फु टकर बीजक जारी किया है, किं तु लेखा बहियों में सही रूप से उनका गणना करने में असफल रहा है,
ऐसा व्यक्ति तीन हजार रुपए की रकम या कर की कमी का बीस प्रतिशत, यदि कोई हो, में से जो भी उच्चतर हो, शास्ति के रूप में संदाय का दायी होगा ।
(7) कोई व्यक्ति, जो इस विनियम के अधीन कर बीजक जारी करने के लिए प्राधिकृ त नहीं है, विक्रय के लिए कर बीजक जारी करता है, ऐसा व्यक्ति पचास हजार रुपए की रकम या कर की कमी, यदि कोई हो, में से जो भी उच्चतर हो, शास्ति के रूप में संदाय का दायी होगा ।
(8) कोई व्यक्ति, जो धारा 59 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन अपेक्षाओं की अनुपालन में असफल रहता है, पच्चीस हजार रुपए की रकम का शास्ति के रूप में संदाय का दायी होगा ।
(9) जहां माल का वहन, परिवाहक द्वारा बिना दस्तावेजों या बिना कागज तथा वास्तविक दस्तावेजों के या धारा 61 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट दस्तावेजों में उचित रूप से जिम्मेदारी लिए बिना किया जा रहा है, तो परिवाहक ऐसे माल के मूल्य के लिए एक रुपए में बीस पैसे के बराबर शास्ति का दायी होगा ।
(10) कोई व्यक्ति जो—
(क) आयुक्त को कथन करता है, जो कि गलत, या तात्त्विक विशिष्टि में प्रवंचक है ; या
(ख) आयुक्त को दिए गए कथन में से किसी विषय या चीज का लोप करता है, जिसके बिना कथन गलत, भ्रामक या तात्त्विक विशिष्ट में प्रवंचक है,
ऐसा व्यक्ति पच्चीस हजार रुपए या कर की कमी की रकम, जो भी उच्चतर हो, शास्ति के रूप में संदाय का दायी होगा ।
95. कतिपय व्यक्तियों पर शास्तियां—(1) कोई अनियमित व्यापारी, जिसका इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त होना अपेक्षित है, अनुबद्ध अवधि के भीतर रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करने में असफल रहता है, तो अनियमित व्यापारी देय तारीख के अवसान के तुरंत अगले दिन से प्रतिदिन तीन हजार रुपए की शास्ति के संदाय का दायी तब40 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] तक होगा, जब तक कि वह व्यक्ति इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन नहीं कर देता है :
परंतु उपधारा के अधीन शास्ति की संदेय रकम पचास हजार रुपए से अनधिक होगी ।
(2) यदि इस विनियम के अधीन अनियमित व्यापारी से विवरणी प्रस्तुत करना अपेक्षित है—
(क) देय तारीख तक कोई विवरणी प्रस्तुत करने में असफल रहता है ; या
(ख) विवरणी के साथ कोई अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने मे, असफल रहता है, जो विवरण के साथ प्रस्तुत करना अपेक्षित है,
ऐसा व्यक्ति, देय तारीख के तुरंत अगले दिन से प्रतिदिन पांच सौ रुपए की रकम की शास्ति के संदाय का दायी तब तक होगा, जब तक कि असफलता का सुधार नहीं किया जाता :
परन्तु इस उपधारा के अधीन शास्ति की संदेय रकम पंद्रह हजार रुपए से अनधिक होगी ।
(3) कोई व्यक्ति जो प्रधान, अभिकर्ता या किसी अन्य हैसियत में लक्षद्वीप में किसी विक्रय-सह-प्रदर्शनी का आयोजन करता है, और—
(क) किसी भागीदार द्वारा विक्रय-सह-प्रदर्शनी से पूर्व या के दौरान या पश्चात् लाए गए माल या रखे गए या विक्रय किए गए स्टॉक के संबंध में कोई सूचना प्रस्तुत करने में असफल रहता है ; या
(ख) यह सुनिश्चित करने में असफल रहता है कि विक्रय- सह-प्रदर्शनी में सभी ऐसे भागीदारों ने इस विनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण अभिप्राप्त किया है तथा देय कर संदत्त किया है ;
या
(ग) भागीदारों के कारबार परिसर या माल या लेखों या अभिलेखों की जांच करने की अनुज्ञा देने में असफल रहता ; या (घ) विक्रय-सह-प्रदर्शनी के संबंध में आयोजकों के लेखों तथा अभिलेखों की जांच की अनुज्ञा देने में असफल रहता है, तो ऐसा व्यक्ति पच्चीस हजार रुपए के बराबर या ऐसे माल पर संदेय कर की रकम के बराबर की रकम, जो भी उच्चतर हो, की शास्ति संदाय करने का दायी होगा, यदि ऐसा माल लक्षद्वीप में बेचा गया था ।
96. साधारण शास्ति—कोई व्यक्ति, जो इस विनियम के किन्हीं उपबंधों या तद् धीन बनाए गए नियमों का उल्लंघन करता है, जिसके लिए अधिनियम के अधीन पृथक् रूप से शास्ति उपबंधित नहीं है, पांच हजार रुपए की शास्ति के रूप में संदाय करने का दायी होगा ।
97. स्वतः शमन तथा शास्तियों को बढ़ाना—(1) किन्हीं कार्यवाहियों के परिणामस्वरूप, कर की रकम जिसके संबंध में शास्ति उद्गृहीत की गई थी, पूर्णतः घटा दी गई है, उद्गृहीत शास्ति रद्द कर दी जाएगी तथा यदि शास्ति संदत्त की जा चुकी है, वह प्रतिदाय की जाएगी ।
(2) यदि—
(क) कोई व्यक्ति, धारा 94 की उपधारा (2) के अधीन शास्ति संदाय का दायी है ; और
(ख) आयुक्त द्वारा यह सूचना देने पर कि व्यक्ति की कर बाध्यताओं की संपरीक्षा की जानी है से पूर्व, व्यक्ति विद्यमान कर की कमी लिखित में आयुक्त को स्वेच्छया से प्रकट करता है, तो अन्यथा देय शास्ति की रकम, शास्ति के अस्सी प्रतिशत द्वारा कम कर दी जाएगी ।
(3) यदि—
(क) कोई व्यक्ति, धारा 94 की उपधारा (2) के अधीन शास्ति संदाय का दायी है ; और
(ख) आयुक्त द्वारा यह सूचना देने पर कि व्यक्ति की कर बाध्यताओं की संपरीक्षा की जानी है से पूर्व, व्यक्ति विद्यमान कर की कमी लिखित में आयुक्त को स्वेच्छया से प्रकट करता है, तो देय शास्ति की रकम, शास्ति के पचास प्रतिशत से कम कर दी जाएगी ।
(4) यदि—
(क) कोई व्यक्ति धारा 94 की उपधारा (2) के अधीन शास्ति के संदाय का दायी है ;
(ख) कर की कमी उद्1भव हुई है, क्योंकि व्यक्ति ने इस विनियम को एक विशिष्ट माध्यम में व्यक्ति को लागू करने के रूप में माना है; और
(ग) व्यक्ति द्वारा उस व्यवहार को अंगीकार करने का विनिश्चय, व्यक्ति को आयुक्त द्वारा धारा 84 के अधीन दिए गए अवधारण या धारा 85 के अधीन आयुक्त द्वारा जारी व्यवस्था, पर निर्भर रहते हुए किया गया है,
अन्यथा देय शास्ति की रकम कम करके शून्य कर दी जाएगी । (5) जहां—
(क) शास्ति इस विनियम के अधीन निर्धारित की गई है ;
(ख) आक्षेप के पश्चात् शास्ति पूर्णतः माफ नहीं की गई है; और
(ग) व्यक्ति पश्चात्वर्ती रूप से, किसी अन्य अवसर पर हुई समान या सारवान् समान असफलता के संबंध में और शास्ति के लिए निर्धारित हुआ है (जिसे इसमें इसके पश्चात् इस धारा में "पश्चात्वर्ती अपराध" कहा गया है),
इस विनियम के अधीन अन्यथा देय शास्ति निम्नलिखित द्वारा बढ़ा दी जाएगी—
(i) पहले पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में, विनिर्दिष्ट शास्ति का पचास प्रतिशत ; और
(ii) दूसरे तथा किसी और पश् चात्वर्ती अपराध की दशा में विनिर्दिष्ट शास्ति का सौ प्रतिशत ।
(6) यदि—
(क) कोई व्यक्ति धारा 86 के अधीन शास्ति के संदाय का दायी है ;
41 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण(ख) व्यक्ति, धारा 60 के अधीन कार्यवाहियों के अनुक्रम के दौरान विद्यमान कर की कमी के बारे में लिखित में आयुक्त को स्वेच्छया से प्रकट करता है ; और
(ग) उक्त कार्यवाहियों के निष्कर्ष के तीन कार्य दिवस के भीतर ऐसी कर कमी का संदाय करता है,
तो स्वीकृ त कर और संदत कर के लिए अन्यथा देय शास्ति की रकम, अस्सी प्रतिशत से घटा दी जाएगी । 98. निर्धारण से संबंध और अपराधी शास्तियों पर समाघात—(1) इस विनियम के अधीन विनिर्दिष्ट शास्तियां इस बात के होते हुए भी देय है कि इस विनियम के अधीन देय कर का कोई निर्धारण नहीं किया गया है ।
(2) इस विनियम के अधीन अधिरोपित कोई भी शास्ति, इस अध्याय के अधीन किसी अपराध के लिए किसी अभियोजन पर प्रतिकू ल प्रभाव नहीं डालेगी ।
99. कतिपय कृ त्यों के लिए कारावास तथा जुर्माना—
(1) जो कोई—
(क) रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी नहीं है, उस समय जब वह माल विक्रय या क्रय करता है, गलत रूप से प्रतिनिधित्व करता है कि वह एक रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी है या था ;
(ख) जानबूझकर गलत लेखे रखता है या धारा 48 के उल्लंघन में उसके द्वारा खरीदे या बेचे गए माल का लेखा नहीं रखता है ; या
(ग) किसी व्यक्ति को कोई गलत बीजक, बिल, नकद ज्ञापन, वाउचर या अन्य दस्तावेज जारी करता है, जो वह जानता है या कारणवश विश्वास करता है, कि गलत है ;
दोषसिद्धि पर, कठोर कारावास की अवधि जो छह मास तक की हो सकती है, और जुर्माने से जो तीन हजार रुपए तक हो सके गा, से दंडनीय होगा ।
(2) जो कोई जानबूझकर—
(क) गलत विवरणी प्रस्तुत करता है ;
(ख) आयुक्त के समक्ष मिथ्या बिल, कै श मेमों, वाउचर, घोषणा, प्रमाणपत्र, कर बीजक या कर प्रतिदाय पर कटौती का दावा करने वाले अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करता है ; या (ग) मिथ्या लेखा, रजिस्टर या दस्तावेज प्रस्तुत करता है या जानते हुए भी मिथ्या सूचना देता है, —
उसे—
(i) ऐसे मामले में जहां कर की रकम जिसका अपवंचन किया जा सकता था यदि, यथास्थिति, कर प्रत्यय, लेखाओं, रजिस्टरों या दस्तावेजों या मिथ्या सूचना पर कटौती का दावा करने के लिए मिथ्या रिटर्न बिल, कै श मेमों, वाउचर, घोषणा, प्रमाणपत्र, कर बीजक या अन्य दस्तावेज सत्य के रूप में स्वीकार किए गए थे, पचास हजार रुपये से अधिक है तो वह दोषसिद्धि पर ऐसी अवधि के लिए कठोर कारावास से जो छह मास तक की हो सके गी, दंडित किया जाएगा ; और (ii) किसी अन्य मामले में ऐसी अवधि के लिए कठोर कारावास से जो छह मास तक की हो सके गी, और जुर्माना से जो तीन हजार रुपए तक का हो सके गा, दंडित किया जाएगा । (3) जो कोई इस विनियम के अधीन, जानबूझकर किसी भी तरीके से कर संदाय, शास्ति या ब्याज या इन सभी का अपवंचन करता है, उसे दोषसिद्धि—
(क) ऐसे किसी मामले में जहां एक वर्ष की अवधि के दौरान पचास हजार रुपए से अधिक की रकम अंतर्वलित है, ऐसी अवधि से, जो छह मास तक की हो सके गी, कठोर कारावास और जुर्माना से, जो तीन हजार रुपए तक का हो सके गा, दंडित किया जाएगा ; और
(ख) किसी अन्य मामले में ऐसी अवधि के कठोर कारावास जो छह मास तक की हो सके गी, और जुर्माना से जो तीन हजार रुपए तक का हो सके गा, दंडित किया जाएगा । (4) जो कोई—
(क) धारा 18 की उपधारा (1) का जानबूझकर उल्लंघन करते हुए, रजिस्ट्रीकृ त हुए बगैर व्यौहारी के रूप में व्यवसाय करता है ;
(ख) धारा 21 के अधीन अपेक्षित किसी सूचना के प्रस्तुत करने में, बगैर किसी पर्याप्त कारण के असफल रहता है ;
(ग) धारा 22 की उपधारा (7) में यथा उपबंधित अपने रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र का अभ्यर्पण करने में असफल रहता है ;
(घ) धारा 27 के अधीन यथा अपेक्षित, तारीख द्वारा या विहित तरीके से कोई रिटर्न देने में बिना किसी पर्याप्त कारण के असफल होता है ;
(ङ) धारा 40 के किन्हीं उपबंधों का बिना किसी युक्तियुक्त कारण के उल्लंघन करता है ;
(च) धारा 50 के अधीन यथाअपेक्षित कर बीजक जारी करने में बिना किसी पर्याप्त कारण के असफल होता है ;
(छ) जब धारा 48 के अधीन निदेश दिए जाते हैं, तो निदेशों के अनुसार किसी लेखा या रिकार्ड को रखने में, बिना किसी पर्याप्त कारण के असफल होता है ;
(ज) धारा 58 या धारा 59 के अधीन उसके द्वारा की गई अपेक्षाओं का पालन करने में, बिना किसी पर्याप्त कारण के असफल होता है, या धारा 60 और धारा 61 के अधीन निरीक्षण या तलाशी या अभिग्रहण करने वाले किसी अधिकारी को बाधित करता है ;
(झ) अध्याय 10 के अधीन किसी अधिकारी को उसका कार्य करने में बाधित करता है या रोकता है ;
(ञ) माल यान का प्रभारी मालिक होते हुए धारा 61 में सम्मिलित अपेक्षाओं में से किसी भी अपेक्षा का पालन करने में असफल होता है, उपेक्षा करता है या पालन करने से इनकार करता है ; या42 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A] (ट) आयुक्त या किसी अधिकारी को, इस विनियम के अधीन प्रदत्त किसी अन्य शक्ति का प्रयोग करने में हस्तक्षेप करता है या बाधा उत्पन्न करता है, तो दोषसिद्धि पर ऐसी अवधि का कारावास जो छह मास तक का हो सके गा और जुर्माना से जो पांच हजार रुपए तक का हो सके गा, दंडित किया जाएगा ;
(5) जो कोई, उपधारा (1) से उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट किसी कृ त्य को करने के लिए सहयोग करता है या अवप्रेरित करता है तो उसे दोषसिद्धि पर ऐसी अवधि का कठोर कारावास से जो छह मास तक का हो सके गा, और जुर्माना से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सके गा, दंडित किया जाएगा । (6) जो कोई, उपधारा (1) से उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट किसी कृ त्य को करता है और उन धाराओं के किसी उपबंध के अधीन अपराध सतत् करता रहता है, तो, दोषसिद्धि पर प्रतिदिन इस धारा के अधीन उपबंधित दंड के अतिरिक्त अपराध के बने रहने की अवधि के दौरान जुर्माना से जो प्रतिदिन एक सौ रुपए से अनधिक नहीं होगा, दंडनीय होगा । (7) इस धारा की उपधारा (1) से उपधारा (5) में किसी बात के होते हुए भी, इन उपधाराओं के अधीन कोई कार्यवाही नहीं होगी, यदि—
(क) एक वर्ष की अवधि के दौरान सम्मिलित कु ल राशि दो सौ से कम है ; या
(ख) व्यक्ति ने अधिनियम के उपबंधों के अधीन स्वेच्छा से कर में कमी होना प्रकटित किया हो ।
(8) जहां कोई व्यौहारी उपधारा (1), उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (4) के खंड (क), खंड (ख), खंड (ग), खंड (घ), खंड (ङ), खंड (च) खंड (छ), खंड (ज) और खंड (झ) या उपधारा (6) में विनिर्दिष्ट किसी अपराध में अभियुक्त है, तो, उस व्यक्ति को धारा 95 के अधीन ऐसे व्यौहारी के कारबार का प्रबंधक समझा जाएगा और ऐसे अपराध में तब तक दोषी भी समझा जाएगा, जब तक वह यह साबित न कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने सभी सम्यक् तत्परता से उसे रोकने का प्रयास किया था ।
100. कम्पनी, आदि द्वारा किए गए अपराध—(1) इन विनियमों या नियमों के अधीन जब किसी कम्पनी द्वारा कोई अपराध किया जाता है तब कम्पनी और कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए कम्पनी का प्रभारी है और कम्पनी के प्रति उत्तरदायी प्रत्येक व्यक्ति को अपराध का दोषी समझा जाएगा और उसके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी और तद्नुसार दंडित किया जाएगा :
परन्तु इस उपधारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी ऐसे व्यक्ति को इन विनियमों में उपबंधित दंड से दंडित नहीं किया जाएगा यदि वह यह साबित कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया है और उसने सभी सम्यक् तत्परता से ऐसे अपराध को रोकने का प्रयास किया है । (2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इन विनियमों के अधीन किसी कम्पनी द्वारा कोई अपराध किया जाता है और यह साबित हो जाता है कि निदेशक, प्रबंधक, सचिव या कम्पनी के अन्य अधिकारी की अपेक्षा के कारण या सहमति से या मौनानुकू लता से अपराध हुआ है तो ऐसे निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारियों को उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और उनके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी और तद्नुसार दंडित किया जाएगा ।
101. अपराध का संज्ञान—(1) इन विनियम और इनके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन कोई भी न्यायालय आयुक्त की पूर्व मंजूरी के बिना ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं लेगा और प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट से निम्नतर कोई न्यायालय ऐसे अपराध पर विचारण नहीं करेगा।
(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इन विनियमों या इनके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन सभी अपराध संज्ञेय और जमानतीय हैं।
102. अपराधों का अन्वेषण—(1) आयुक्त, विहित की गई ऐसी शर्तों के अध्यधीन, साधारणतया या किसी विशिष्ट मामले या मामलों के वर्ग के संबंध में किसी अधिकारी या उनके अधीनस्थ किसी व्यक्ति को इन विनियमों के अधीन दंडनीय सभी या किन्हीं अपराधों के अन्वेषण के लिए प्राधिकृ त करेगा । (2) प्रत्येक अधिकारी या व्यक्ति जिसे प्राधिकृ त किया गया है, अन्वेषण के संचालन में, उन्हीं शक्तियों का प्रयोग करेंगे जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) द्वारा संज्ञेय अपराध के अन्वेषण के लिए पुलिस थाना के प्रभारी अधिकारी को प्रदत्त है ।
103. अपराधों का प्रशमन—(1) आयुक्त, धारा 89 की उपधारा (4) के अधीन या इन विनियमों के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए कार्यवाही संस्थित करने से पहले, किसी ऐसे व्यक्ति से, जिस पर अपराध के प्रशमन द्वारा ऐसे अपराध का आरोप हो, कोई रकम, जो पचास हजार रुपए से अधिक न हो या उस कर की रकम का, जो उनके द्वारा बचाया जा सकता था, तीन गुना रकम, जो भी अधिक हो, प्रतिगृहीत कर सके गा ।
(2) आयुक्त द्वारा उपधारा (1) के अधीन अवधारित ऐसी रकम का संदाय करने पर, उस अपराध के संबंध में कोई अतिरिक्त कार्यवाही नहीं की जाएगी।
104. कतिपय मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का अध्याय 36 का लागू नहीं होना— दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अध्याय 36 में अंतर्विष्ट कोई बात—
(क) इन विनियमों के अधीन दंडनीय किसी अपराध ;
या
(ख) उस संहिता के उपबंधों के अधीन कोई अन्य अपराध जिस पर ऐसे अपराध के साथ विचारण किया जा सके गा,43 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण पर लागू नहीं होगा और खंड (क) या खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रत्येक अपराध में इन विनियमों के अधीन अधिकारिता रखने वाले न्यायालय उसी प्रकार संज्ञान ले सकें गे, जैसे उस अध्याय के उपबंधों को अधिनियमित नहीं किया गया हो ।
अध्याय 14
प्रकीर्ण
105. कारबार के प्रबंधक का नाम, स्थायी खाता संख्या और आयात-निर्यात कोड की घोषणा— (1) प्रत्येक व्यौहारी जो व्यक्तियों का संघटन या क्लब या सोसाइटी या फर्म या कम्पनी या कोई व्यक्ति या निकाय होते हुए, एक संरक्षक या न्यासी के रूप में या अन्यथा किसी अन्य व्यक्ति की ओर से कारबार में लगा हुआ है और जो इन विनियमों के अधीन कर संदत्त करने का दायी है, उन व्यक्तियों के नाम जो ऐसे व्यक्ति के कारबार के प्रयोजन के लिए प्रबंधक समझा/समझे जाएगा/जाएंगे, विहित अवधि में, विहित रीति से विवरण की घोषणा करेगा । (2) उपधारा (1) के अधीन की गई घोषणा समय-समय पर यथा अपेक्षित पुनरीक्षित की जा सके गी ।
(3) प्रत्येक व्यौहारी को विनियमों के अधीन राजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करते समय आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अधीन प्राप्त स्थायी लेखा संख्या वर्णित करेगा :
परन्तु यह कि इस अधिनियम के अधीन पहले से रजिस्ट्रीकृ त व्यौहारी, आय-कर अधिनियम, 1961 के अधीन प्राप्त अपनी स्थायी लेखा संख्या की घोषणा, इस संशोधन की अधिसूचना जारी होने की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर विहित प्ररूप में करेगा ।
(4) इन विनियमों के अधीन कर संदत्त का दायी और विदेशी व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992 (1992 का 22) के उपबंधों के अधीन आयातकर्ता निर्यातकर्ता कोड रखने वाले प्रत्येक व्यौहारी, इन विनियमों के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करते समय आयातकर्ता- निर्यातकर्ता कोड उल्लिखित करेगा :
परन्तु यह कि इस अधिनियम के अधीन पहले से रजिस्ट्रीकृ त और विदेशी व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम,1992 (1992 का 22) के उपबंधों के अधीन आयातकर्ता-निर्यातकर्ता कोड रखने वाले प्रत्येक व्यौहारी, इस संशोधन की अधिसूचना जारी होने की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर, विहित प्ररूप में ब्यौरे की सूचना देगा :
परन्तु यह और कि इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृ त प्रत्येक व्यौहारी, जो विदेश व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992 (1992 क 22) के उपबंधों के अधीन एक आयातकर्ता निर्यातकर्ता कोड प्राप्त करता है, तत्पश्चात् ऐसा कोड प्राप्त करने की तारीख के पंद्रह दिन की अवधि के भीतर, विहित प्ररूप में कोड के ब्यौरे प्रदान करेगा ।
(5) कोई भी व्यक्ति जो उपधारा (1) और उपधारा (2) में यथाउपबंधित कथन करने में या पुनरीक्षित कथन करने में, जैसे भी मामला हो, असफल रहता है या उपधारा (3) में यथाउपबंधित आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अधीन अभिप्राप्त किये गए स्थायी खाता संख्या के ब्यौरे प्रदान करने में असफल रहता है या उपधारा (4) में यथाउपबंधित विदेश व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992(1992 का 22) के उपबंधों के अधीन आयातकर्ता निर्यातकर्ता कोड प्रदान करने में असफल रहता है तो वह व्यतिक्रम के प्रति सप्ताह के लिए एक हजार रुपये के बराबर की रकम, जो अधिकतम पचास हजार रुपये तक की हो सके गी, शास्ति के लिए दायी होगा ।
106. कु टु ंब के विभाजित होने पर या फर्म के विघटित हो जाने पर सूचना की तामील—(1) जहां एक हिन्दू अविभक्त कु टु ंब का विभाजन किया गया है, वहां इस विनियम के अधीन नोटिस उस व्यक्ति पर तामील किया जाएगा जो हिन्दू अविभक्त कु टु ंब का अंतिम कर्ता था, या यदि ऐसा व्यक्ति नहीं मिल सकता है, तो उन सभी वयस्कों पर, जो विभाजन से ठीक पहले हिन्दू अविभक्त कु टु ंब के सदस्य थे ।
(2) जहां एक फर्म या व्यक्तियों का संगम विघटित हो जाता है, वहां इस विनियम के अधीन नोटिस किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जा सके गा जो विघटन से ठीक पहले फर्म का भागीदार (जो अप्राप्तवय न हो) या संगम का सदस्य, जैसा भी मामला हो, रहा हो ।
107. बंद किए गए कारबार के मामले में सूचना की तामील— जहां बंद किए गए कारबार के संबंध में कोई निर्धारण किया जाना है, वहां इस विनियम के अधीन नोटिस, फर्म या व्यक्तियों के संगम या किसी व्यक्ति के मामले में, जो बंद किए जाने के समय ऐसे फर्म या संगम का सदस्य रहा हो या कं पनी के मामले में उसके प्रधान अधिकारी को दिया जाएगा । 108. विवरणियों, आदि का गोपनीय होना—(1) इस विनियम के अनुसार दिए गए किसी कथन, विवरणियों या लेखाओं में या पेश किये गए दस्तावेजों में या इस विनियम के अधीन दंड न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही से भिन्न किसी कार्यवाही के दौरान दिए गए साक्ष्य के किसी अभिलेख में निहित सभी विशिष्टियां, उपधारा (3) में यथा उपबंधित के सिवाय गोपनीय मानी जाएगी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी न्यायालय, जैसा ऊपर कहा गया है उसके सिवाय, सरकार के किसी सेवक से ऐसे किसी दस्तावेज, विवरणियां, लेखा या अभिलेख या उसके किसी भाग को अपने समक्ष प्रस्तुत करने या अपने समक्ष उसके संबंध में साक्ष्य देने की अपेक्षा करने का हकदार नहीं होगा ।
(2) यदि सरकार का कोई सेवक, उपधारा (3) में यथा उपबंधित के सिवाय, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी भी विशिष्टि को प्रकट करता है, तो वह कारावास से दंडनीय होगा जिसकी अवधि छह मास तक की हो सके गी, और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
44 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A](क) इस विनियम या भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन अन्वेषण या अभियोजन के प्रयोजनों के लिए उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी विशिष्टि के ;
(ख) कें द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के किसी अधिकारी को ऐसे तथ्यों के , जो ऐसे तथ्यों के सत्यापन के लिए आवश्यक हो या उस सरकार को उसके द्वारा लगाए गए किसी भी कर को उद् ग्रहण करने या वसूल करने में सक्षम बनाने के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हो;
(ग) ऐसी किसी विशिष्टि के , जहां ऐसा प्रकटीकरण, किसी नोटिस की तामील या किसी मांग की वसूली के लिए किसी भी प्रक्रिया के इस विनियमन के अधीन विधिपूर्ण नियोजन द्वारा हुआ हो;
(घ) किसी वाद या कार्यवाही में सिविल न्यायालय में ऐसी किसी विशिष्टि के , जिसमें सरकार या कोई मूल्य वर्धित कर प्राधिकारी एक पक्षकार है और जो मूल्य वर्धित कर प्राधिकारी को तद् धीन किसी शक्ति के प्रयोग को प्राधिकृ त करने वाले इस विनियमन के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी कार्यवाही से उद्भूत किसी मामले से संबंधित है;
(ङ) किसी लोक सेवक द्वारा ऐसी किसी विशिष्टि के , जहाँ प्रकटीकरण उसके द्वारा एक अपर्याप्त स्टांप दस्तावेज़ को परिबद्ध करने के लिए भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (1899 का 2) के अधीन उसकी शक्तियों के विधिपूर्ण प्रयोग द्वारा हुआ है;
(च) भारतीय रिज़र्व बैंक को ऐसी किसी विशिष्टि के , जो उस बैंक द्वारा उसे अंतर्राष्ट्रीय विनिधान और भुगतान संतुलन की वित्तीय सांख्यिकी को संकलित करने में सक्षम बनाने के लिए आवश्यक है;
(छ) कर प्राप्तियों या प्रतिदाय की लेखापरीक्षा के प्रयोजन के लिए भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा नियुक्त किसी अधिकारी को ऐसी किसी विशिष्टि के ;
(ज) किसी विधि व्यवसायी या चार्टर्ड एकाउं टेंट के विरुद्ध आय-कर कार्यवाही के संबंध में अवचार के आरोप में किसी भी जांच से सुसंगत ऐसी किसी विशिष्टि के , उस वृत्ति, जिससे वह संबंधित है, के सदस्यों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए सशक्त प्राधिकारी को;
(झ) कें द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अधिकारियों को ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए ऐसी विशिष्टि के , जैसा सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, निदेश दे; या (ञ) व्यौहारियों के किसी वर्ग या संव्यवहारों के किसी वर्ग से संबंधित किसी ऐसी जानकारी के , यदि आयुक्त की राय में ऐसी जानकारी प्रकाशित करना लोकहित में वांछनीय है, प्रकटीकरण पर लागू नहीं होगी ।
109. विक्रय और क्रय पर लागू होना—(1) धारा 3 द्वारा अधिरोपित किया गया कर—
(क) इस विनियम के प्रारंभ होने की तारीख को और उसके पश्चात् किए गए प्रत्येक विक्रय, जिसमें माल के किस्त विक्रय और अवक्रय सम्मिलित है;
(ख) माल के उपयोग के अधिकार के अंतरण के रूप में प्रत्येक विक्रय, उस विस्तार तक जहाँ माल के उपयोग के अधिकार का प्रयोग इस विनियम के प्रारंभ होने की तारीख के पश्चात् किया गया है;
पर लागू होता है ।
(2) धारा 9 के अधीन उत्पन्न होने वाले प्रतिदेय—
(क) इस विनियम के प्रारंभ होने की तारीख को और उसके पश्चात् किए गए क्रय, जिसमें माल के किस्त विक्रय और अवक्रय के अधीन क्रय सम्मिलित है; और
(ख) माल के उपयोग के अधिकार के अंतरण के रूप में होने वाले क्रय, उस विस्तार तक, जहां माल के उपयोग के अधिकार का प्रयोग इस विनियम के प्रारंभ होने की तारीख के पश्चात् किया गया है; और
(ग) इस विनियम के प्रारंभ की तारीख को या उसके बाद वाले विक्रय या क्रय के संबंध में, जहां इस विनियम के प्रारंभ की तारीख से पहले किसी रकम का संदाय किया जाता है या उसको प्राप्त किया जाता है, और संदाय की गई और प्राप्त की गई रकम के आधार पर, व्यक्ति अपने आवर्तन या क्रय के आवर्तन की गणना करता है, वहाँ ऐसी रकम को उस व्यक्ति के आवर्तन या क्रय के आवर्तन का, उस कर अवधि में जिसमें विक्रय होता है, भाग समझा जाएगा,
के लिए अनुज्ञात होंगे ।
110. लोकहित में व्यौहारी और अन्य व्यक्तियों से संबंधित जानकारी का प्रकाशित और प्रकट किया जाना—(1) इस विनियम में किसी बात के होते हुए भी, यदि सरकार की यह राय है कि लोकहित में यह आवश्यक या समीचीन है कि किसी भी व्यौहारी या अन्य व्यक्तियों के नाम और ऐसे व्यौहारियों तथा व्यक्तियों के संबंध में इस विनियम के अधीन किसी कार्यवाही से संबंधित किसी अन्य विशिष्टि को प्रकाशित किया जाए या प्रकट किया जाए, तो वह ऐसे नामों और विशिष्टियों को, ऐसे रीति में, जो वह उचित समझे, प्रकाशित कर सके गी या प्रकट कर सके गी या प्रकाशित करवा सके गी या प्रकट करवा सके गी ।
(2) इस विनियम के अधीन किसी कार्यवाही से संसक्त किसी अपराध के लिए उद्गृहीत किसी कर या अधिरोपित शास्ति या उद्गृहित ब्याज या किसी दोषसिद्धि के संबंध में इस धारा के अधीन कोई प्रकाशन या प्रकटीकरण तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक कि समुचित अपील प्राधिकारी के समक्ष अपील प्रस्तुत करने के समय का अवसान, अपील प्रस्तुत किये बिना न हो गया हो या यदि अपील प्रस्तुत की गयी है तो उसका निपटारा कर दिया गया है।
111. आंकड़ों को एकत्रित करने की शक्ति—(1) यदि आयुक्त को यह प्रतीत होता है कि बेहतर प्रशासन के प्रयोजनों के लिए ऐसा करना आवश्यक है, तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सके गा कि इस विनियम से संसक्त, उसके द्वारा45 [भाग II—अनुभाग 3क] भारत का राजपत्र : असाधारण या उसके संबंध में किसी मामले से संबंधित आंकड़े एकत्रित किए जाएं।
(2) ऐसा निदेश दिए जाने पर, आयुक्त या इस संबंध में उसके द्वारा प्राधिकृ त कोई व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा, सभी व्यौहारियों या व्यौहारियों के किसी वर्ग या व्यक्तियों को किसी मामले से संबंधित ऐसी जानकारी या कथन प्रस्तुत करने के लिए कहा जा सके गा जिसके संबंध में आंकड़े एकत्रित किए जाने हैं और ऐसे प्ररूप, जिसमें ऐसी जानकारी या विवरणियां उन व्यक्तियों या उन प्राधिकारियों को दी जानी है और ऐसे, अंतराल जिसमें ऐसी जानकारी या विवरणियां दी जानी चाहिए, ऐसे होंगे जैसे विहित किया जाए :
परन्तु यह कि जानकारी को राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, समाचार पत्रों में सूचना द्वारा या ऐसी अन्य रीति से माँगा जा सके गा, जैसी कि आयुक्त या उक्त व्यक्ति की राय में, व्यौहारियों और अन्य व्यक्तियों के ध्यान में लाने के लिए सर्वोत्तम प्रकल्पित हो ।
(3) पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकू ल प्रभाव डाले बिना, सरकार नियमों द्वारा यह उपबंध कर सके गी कि प्रत्येक व्यौहारी या व्यौहारी का कोई वर्ग, जैसा भी मामला हो, स्वतः निर्धारण के साथ ऐसे कथन प्रस्तुत करेगा जैसा कि विहित किया जाए और व्यौहारियों के विभिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न उपबंध किए जा सकें गे ।
(4) (क) सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह उपबंध कर सके गी कि समय-समय पर संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) में और इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों में और दिए गए निदेशों में अंतर्विष्ट उपबंध, जिनमें अंकीय चिह्नक, इलैक्ट्रानिक नियमन, इलैक्ट्रानिक अभिलेख का अधिकार, अभिस्वीकृ ति और प्रेषण, सुरक्षित इलैक्ट्रानिक अभिलेख और सुरक्षित अंकीय चिह्नक तथा अंकीय चिह्नक प्रमाणपत्र से संबंधित उपबंध सम्मिलित है, जैसा कि उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, जहां तक हो सके , यथासाध्य, इस विनियम के अधीन प्रक्रियाओं पर लागू होंगे ।
(ख) जहां किसी स्वचालित आकड़े प्रक्रमण प्रणाली पर एक सूचना या संसूचना तैयार की जाती है और किसी भी व्यौहारी या व्यक्ति पर उचित रूप से तामील की जाती है, तो उक्त सूचना या संसूचना को आयुक्त या उससे अधीनस्थ किसी अन्य अधिकारी द्वारा व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षरित करने की आवश्यकता नहीं होगी और उक्त सूचना या संसूचना को के वल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं माना जाएगा कि यह आयुक्त द्वारा व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षरित नहीं है।
112. चेक पोस्ट और बेरियर का स्थापित किया जाना—इस विनियम के अधीन देय कर और अन्य संदेय शोध्यों के अपवंचन को रोकने के लिए, सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, लक्षद्वीप में किसी भी स्थान पर चेक पोस्ट या बैरियर या दोनों स्थापित कर सके गी ।
113. अनुसूची का संशोधन करने की शक्ति—यदि सरकार की यह राय है कि लोक हित में ऐसा करना समीचीन है, तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, पहली अनुसूची, दूसरी अनुसूची, तीसरी अनुसूची और चौथी अनुसूची में भविष्यलक्षी प्रभाव से कु छ जोड़कर या लोप करके या अन्यथा संशोधन कर सके गी और तब उक्त अनुसूचियां तदनुसार संशोधित किया गया समझा जाएगा:
परंतु यह कि ऐसा कोई संशोधन भूतलक्षी प्रभाव से नहीं किया जाएगा यदि इससे किसी व्यौहारी के हितों पर प्रतिकू ल प्रभाव पड़ता हो।
114. नियम बनाने की शक्ति—(1) सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए, इस विनियमन के उपबंधों और प्रयोजनों को पूरा करने के लिए नियम बना सके गी जो इस विनियम के उपबंधों से असंगत न हो।
(2) इस अधिनियम के अधीन कें द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कु ल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सके गी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकू ल प्रभाव नहीं पड़ेगा । 115. कठिनाइयों को दूर करने की शक्तियां—(1) यदि उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, कठिनाई को दूर करने के लिए ऐसे उपबंध बना सके गी जैसे कि इसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत होता हो, जो इस विनियम के उपबंधों से असंगत न हों:
परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस विनियम के प्रारंभ होने की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।46 THE GAZETTE OF INDIA : EXTRAORDINARY [PART II—SEC. 3A]
पहली अनुसूची
[धारा 4 देखिए]
कर लगाने योग्य माल की सूची
क्रम सं. मालों का विवरण
कर की दर (1) (2)
(3) 1. कच्चा पेट्रोलियम
10 प्रतिशत 2. उच्च गति डीजल
10 प्रतिशत 3. उच्च गति डीजल (पोत)
10 प्रतिशत 4. मोटर स्पिरिट (सामान्यतः पेट्रोल के नाम से ज्ञात)
10 प्रतिशत 5. प्राकृ तिक गैस
10 प्रतिशत 6. विमानन टर्बाइन ईंधन
10 प्रतिशत 7. भारतीय निर्मित विदेशी मद्य
10 प्रतिशत 8. बीयर
10 प्रतिशत
दूसरी अनुसूची
[धारा 6 देखिए]
छू ट प्राप्त माल की सूची
क्रम सं. मालों का विवरण
कर की दर (1) (2)
(3)
शून्य
तीसरी अनुसूची
[धारा 9(1)(ख) देखिए]
गैर-प्रत्ययनीय माल
क्रम सं. मालों का विवरण
कर की दर (1) (2)
(3)
शून्य
चौथी अनुसूची
[धारा, 41(1) देखिए]
खरीदे गए माल पर संदत्त कर के प्रतिदाय का दावा करने के हकदार निकाय
क्रम सं. संगठन का नाम
शर्तें (1) (2)
(3)
शून्य
————
अगस्तुस के रके ट् टा,
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