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छत्तीसगढ़ शासन
पंजीयन क्रमांक "छत्तीसगढ़ /दुर्ग/ 09 / 2013-2015 . " "बिजनेस पोस्ट के अन्तर्गत डाक शुल्क के नगद भुगतान (बिना डाक टिकट) के प्रेषण हेतु अनुमत . क्रमांक जी.2-22- छत्तीसगढ़ गजट / 38 सि. से. भिलाई. दिनांक 30-05-2001 ."
सत्यमेव जयते
छत्तीसगढ़ राजपत्र
(असाधारण)
प्राधिकार से प्रकाशित
क्रमांक 644 ]]
रायपुर, बुधवार, दिनांक 21 फरवरी 2024- -फाल्गुन 2, शक 1945
छत्तीसगढ़ विधान सभा सचिवालय
रायपुर, बुधवार, दिनांक 21 फरवरी , 2024 (फाल्गुन 2, 1945)
क्रमांक-2995/ वि.स./ विधान / 2024.- छत्तीसगढ़ विधान सभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमावली के नियम 64 के उपबंधों के पालन में छत्तीसगढ़ सिविल न्यायालय (संशोधन) विधेयक, 2024 (क्रमांक 2 सन् 2024) जो बुधवार , दिनांक 21 फरवरी , 2024 को पुरःस्थापित हुआ है , को जनसाधारण की सूचना के लिये प्रकाशित किया जाता है ।
हस्ता./- (दिनेश शर्मा) सचिव.
127 128
छत्तीसगढ़ राजपत्र , दिनांक 21 फरवरी 2024
छत्तीसगढ़ विधेयक
(क्रमांक 2 सन् 2024)
छत्तीसगढ़ सिविल न्यायालय (संशोधन) विधेयक, 2024.
छत्तीसगढ़ सिविल न्यायालय अधिनियम, 1958 (क्र. 19 सन् 1958 ) को और संशोधित करने हेतु विधेयक ।
भारत गणराज्य के पचहत्तरवें वर्ष में छत्तीसगढ़ विधानमण्डल द्वारा निम्नलिखित रुप में यह अधिनियमित हो:-
संक्षिप्त नाम तथा प्रारंभ.
1. (1 ) यह अधिनियम छत्तीसगढ़ सिविल न्यायालय (संशोधन) अधिनियम , 2024 कहलायेगा ।
(2) यह राजपत्र में इसके प्रकाशन की तारीख से प्रवृत्त होगा ।
मूल अधिनियम का संशोधन.
2. छत्तीसगढ़ सिविल न्यायालय अधिनियम, 1958 (क्र. 19 सन् 1958 ) (जो इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम के रुप में निर्दिष्ट है ) में, धारा 2 के खण्ड (क) , धारा 25 एवं 26 को छोड़कर,-
(1 ) शब्द " जिला न्यायाधीश" जहां कहीं भी आये हों के स्थान पर , शब्द " प्रधान जिला न्यायाधीश " प्रतिस्थापित किया जाये;
(2) शब्द " अपर जिला न्यायाधीश" जहां कहीं भी आये हों के स्थान पर , शब्द " जिला न्यायाधीश " प्रतिस्थापित किया जाये;
(3) शब्द " व्यवहार न्यायाधीश प्रथम वर्ग " जहां कहीं भी आये हों के स्थान पर, शब्द " व्यवहार न्यायाधीश , वरिष्ठ श्रेणी " प्रतिस्थापित किया जाये; और छत्तीसगढ़ राजपत्र, दिनांक 21 फरवरी 2024
128(1) (4) शब्द " व्यवहार न्यायाधीश द्वितीय वर्ग " जहां कहीं भी आये हों के स्थान पर, शब्द " व्यवहार न्यायाधीश, कनिष्ठ श्रेणी" प्रतिस्थापित किया जाये ।
धारा 2 का 3. मूल अधिनियम की धारा 2 के खण्ड (क) के स्थान पर , निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाये , अर्थात्ः-
संशोधन.
" (क) " उच्चतर न्यायिक सेवा का संवर्ग " से अभिप्रेत है जिला न्यायाधीशों का संवर्ग, और इसमें सम्मिलित है प्रधान जिला न्यायाधीश , जिला न्यायाधीश (सुपर टाईम स्केल) , जिला न्यायाधीश (चयन श्रेणी) तथा जिला न्यायाधीश (प्रवेश स्तर) ; "
धारा 18 का संशोधन.
4. मूल अधिनियम की धारा 18 में, शब्द " जिला न्यायालय " के स्थान पर, शब्द "प्रधान जिला न्यायालय " प्रतिस्थापित किया जाये । छत्तीसगढ़ राजपत्र, दिनांक 21 फरवरी 2024
128(2)
उद्देश्यों और कारणों का कथन
यतः, माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा प्रकरण क्रमांक W.P. ( Civil ) No. 643/2015 All India Judges Association Vs. Union of India and Ors . में माननीय श्री न्यायमूर्ति पी.व्ही. रेड्डी ( सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में न्यायिक अधिकारियों के संबंध में द्वितीय राष्ट्रीय न्यायिक वेतन आयोग गठित की गई थी;
और यतः, न्यायिक अधिकारियों के पदनाम को ऑल इंडिया पैटर्न के अनुरूप पुनः नामित करने के संबंध में आयोग द्वारा की गई अनुशंसाओं को, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा W.P. (Civil ) No. 643/2015 में आदेश दिनांक 19 मई , 2023 द्वारा स्वीकार किया गया है , इसलिये , उक्त आदेश के अनुपालन में कतिपय उपांतरण करना आवश्यक हो गया है ।
अतएव , छत्तीसगढ़ सिविल न्यायालय अधिनियम , 1958 (क. 19 सन् 1958) में संशोधन करना प्रस्तावित है ।
अतः यह विधेयक प्रस्तुत है ।
अरूण साव रायपुर,
दिनांक 6 फरवरी , 2024
उप मुख्यमंत्री, विधि एवं विधायी कार्य (भारसाधक सदस्य) छत्तीसगढ़ राजपत्र , दिनांक 21 फरवरी 2024
128(3)
उपाबंध
छत्त्तीसगढ़ सिविल न्यायालय अधिनियम, 1958 (क्र. 19 सन् 1958) का सुसंगत उद्धहरण ।
"धारा 2. परिभाषाएँ- इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा आपेक्षित न हो,-
(क) "उच्चतर न्यायिक सेवा का संवर्ग " से अभिप्रेत है जिला न्यायाधीशों का संवर्ग और उसके अन्तर्गत जिला न्यायाधीश , तथा अपर जिला न्यायाधीश सम्मिलित रहेंगे,
(ख ) " निम्नतर न्यायिक सेवा का सवंर्ग " से अभिप्रेत है सिविल न्यायाधीश , प्रथम वर्ग तथा सिविल न्यायाधीश , द्वितीय वर्ग से गठित होने वाला सिविल न्यायधीश का संवर्ग"
"धारा 3. सिविल न्यायालयों के वर्ग-
(1 ) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन स्थापित न्यायालयों के अतिरिक्त व्यवहार न्यायालयों के निम्नलिखित वर्ग होंगे , अतः-
(1 ) जिला न्यायाधीश का न्यायालय
(2 ) ( ) लुप्त
(3 ) व्यवहार न्यायाधीश प्रथम वर्ग का न्यायालय और
(4) व्यवहार न्यायाधीश द्वितीय वर्ग का न्यायालय ।
(2) जिला न्यायाधीश के प्रत्येक न्यायालय का पीठासीन उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त जिला न्यायाधीश होगा और उच्च न्यायालय , जिला न्यायाधीश के न्यायालय में अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए, उच्चतर न्यायिक सेवा के संवर्ग में से अपर जिला न्यायाधीशों को भी नियुक्ति कर सकेगा ।
(3) सिविल न्यायाधीश के न्यायालय का अपर न्यायाधीश निम्नतर न्यायिक सेवा से नियुक्त किया जा सकेगा ।
(4) जिला न्यायाधीश के न्यायालय के अंतर्गत अपर जिला न्यायाधीश का न्यायालय आयेगा तथा सिविल न्यायाधीश , प्रथम वर्ग या सिविल न्यायाधीश , द्वितीय वर्ग के न्यायालय के अंतगत उस न्यायालय के अपर सिविल न्यायाधीश का न्यायालय आयेगा । "
"धारा 5. सिविल न्यायालयों की स्थापना- राज्य सरकार,
(अ) प्रत्येक व्यवहार जिले के लिये जिला न्यायाधीश के न्यायालय , और (ब) प्रत्येक व्यवहार जिले के लिये अतिरिक्त जिला न्यायाधीश , व्यवहार न्यायाधीशों प्रथम वर्ग , और व्यवहार न्यायाधीशों द्वितीय वर्ग के उतने न्यायालयों की स्थापना कर सकेगी जितने उसे उचित प्रतीत हों । " छत्तीसगढ़ राजपत्र , दिनांक 21 फरवरी 2024
128( 4)
"धारा 6. सिविल न्यायालयों की प्रारम्भिक अधिकारिता-
(1 ) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के प्रावधानों के अधीन रहते हुये - (क) व्यवहार न्यायाधीश द्वितीय वर्ग के न्यायालय को 50,000 / - रूपये से अनधिक मूल्य के किसी भी व्यवहार बाद या मूल कार्यवाही को होगी; सुनने तथा अवधरित करने की अधिकारिता,
(ख) व्यवहार न्यायालय प्रथम वर्ग के न्यायालय को 10,00,000 / - रूपये से अनधिक मूल्य के किसी भी व्यवहार वाद या मूल कार्यवाही की सुनने यथा अवधारित करने की अधिकारिता होगी ,
(ग) जिला न्यायाधीश के न्यायालय को मूल्य के सम्बंध में बिना किसी निबंधन के किसी सिविल वाद या मूल कार्यवाही की श्रवण करने का क्षेत्राधिकार होगा । "
"धारा 7. प्रारम्भिक अधिकारिता का मुख्य सिविल न्यायालय-
(1 ) जिला न्यायाधीश का न्यायालय सिविल जिले की प्रारम्भिक अधिकारिता का मुख्य सिविल न्यायालय होगा ।
(2) कोई अपर जिला न्यायाधीश जिला न्यायालय के कृत्यों, जिनमें आरम्भिक अधिकारिता वाला प्रधान सिविल न्यायालय के कृत्य भी सम्मिलित हैं , में से किन्ही भी ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो कि जिला न्यायाधीश साधारण या विशेष आदेश द्वारा , उसे सौपें, और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करने में वह उन्ही शक्तियों का प्रयोग करेगा, जिनका कि प्रयोग जिला न्यायाधीश करता हैं । "
"धारा 8. अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति-
(1 ) जब कभी यह आवश्यक या समीचीन प्रतीत होता हो, जिला न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, व्यवहार न्यायाधीश , प्रथम वर्ग या व्यवहार न्यायाधीश द्वितीय वर्ग के न्यायालय के लिये अपर न्यायाधीश या अपर न्यायाधीशों की नियुक्ति यथास्थिति जिला न्यायाधीश या अपर जिला न्यायाधीश या व्यवहार न्यायाधीश , प्रथम वर्ग या व्यवहार न्यायाधीश द्वितीय वर्ग के न्यायालय में की जा सकेगी , और ऐसा अपर न्यायाधीश उस न्यायालय की , जिसमें कि उसे नियुक्त किया गया है , अधिकारिता का तथा उस न्यायालय के न्यायाधीश की शक्तियों का प्रयोग उस प्राधिकारी के, जिसके कि द्वारा उसकी नियुक्ति की गई है , किन्हीं ऐसे साधारण या विशेष आदेशों के अध्यधीन रहते हुये करेगा जो कि वह प्राधिकारी उन वादों, जिनका कि विचारण, सुनवाई या अवधारण ऐसे अपर न्यायाधीश द्वारा किया जा सकेगा, के वर्ग या मूल्य सम्बन्ध में दे । (2) किसी अधिकारी को एक या अधिक न्यायालयों का अपर न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकेगा , और किसी अधिकारी को, जो किसी एक न्यायालय का न्यायाधीश है, किसी अन्य न्यायालय का अथवा अन्य न्यायालयों का अपर न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकेगा । "
"धारा 9. कुछ न्यायालयों को लघुवाद न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से विनिहित करने की शक्ति-
(2) लघुवाद स्वरूप के व्यवहार वादों का मूल्य जिला न्यायाधीश के न्यायालय की दशा में एक हजार रूपये से कम , व्यवहार न्यायाधीश प्रथम वर्ग के न्यायालय की दशा में पांच सौ रूपये से, और व्यवहार न्यायालय द्वितीय वर्ग के न्यायालय की दशा में दो सौ रूपये से अधिक न होगा । " छत्तीसगढ़ राजपत्र, दिनांक 21 फरवरी 2024
128 (5) "धारा 10. कुछ कार्यवाहियों में सिविल न्यायाधीशों द्वारा जिला न्यायालय के क्षेत्राधिकार का प्रयोग-
(1 ) उच्च न्यायालय सामान्य या विशेष आदेश द्वारा किसी व्यवहार न्यायाधीश प्रथम वर्ग को और उन्हें अपने नियन्त्रणाधीन किसी व्यवहार न्यायाधीश प्रथम वर्ग के पास हस्तान्तरित करने के लिये किसी जिला न्यायाधीश को संज्ञान लेने के लिये अधिकार दे सकेगा यथा-
(अ) भाग 1 से 8 के अधीन, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम , 1925 (क्रमांक 39 सन् 1925) ;
(ब) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम , 1925 (क्रमांक 39 सन् 1925 ) के भाग 9 के अधीन किसी कार्यवाही या किसी कार्यवाही का वर्ग जिसका निपटारा जिला प्रत्योजन द्वारा न किया जा सके;
(स) संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 ( क्रमांक 8 सन् 1890) ; अथवा
(द) प्रान्तीय शोधन क्षमता अधिनियम, 1920 ( क्रमांक 5 सन् 1920 ) के अधीन उत्पन्न होने वाली किसी कार्यवाही या कार्यवाही के वर्ग का । (2) भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (क्र. 39 सन् 1925 ) की धारा 388 में किसी बात के होते हुये भी उच्च न्यायालय सामान्य या विशेष आदेश द्वारा जिला न्यायाधीश की श्रेणी से अनिम्न किसी न्यायाधीश की उस अधिनियम के भाग 10 के अधीन जिला न्यायाधीश के अधिकारी का प्रयोग करने की शक्ति से युक्त कर सकता हैं ।
(3) जिला न्यायाधीश अपने नियत्रणाधीन किसी व्यवहार न्यायाधीश प्रथम वर्ग द्वारा संज्ञान ली गई या उसे हस्तान्तरित ऐसी कोई कार्यवाहियां को वापस ले सकता है , जिनका या तो वह स्वयं निपटारा कर सकता है अथवा किसी सक्षम न्यायालय को हस्तान्तरित कर सकता हैं ।
(4 ) इस धारा के अधीन व्यवहार न्यायाधीश प्रथम वर्ग द्वारा संज्ञान ली गई अथवा उसे हस्तान्तरित कार्यवाहियां जिला न्यायालय के न्यायाधीश के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होने वाली विधि और नियमों के अनुसार उसके द्वारा निपटाई जायेगी । " "धारा 11. भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम के अधीन क्षेत्राधिकार,-
जिला न्यायालय के न्यायाधीश के न्यायालय को भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम , 1869 (क्र. 4 सन् 1869 ) के अधीन किसी मूल कार्यवाही की सुनवाई और निर्णय करने का क्षेत्राधिकार होगा और वह उस व्यवहार जिले के इस अधिनियम के अधीन जिला न्यायालय समझे जायेगें । "
"धारा 12. (3 ) जिला न्यायाधीश तथा जिले के न्यायाधीश, किसी विशिष्ट मामले की या किसी विशिष्ट वर्ग के मामलो की सुनवाई करने के लिये, उच्च न्यायालय की पूर्व मंजूरी से तथा पक्षकारों को सम्यक् सूचना देने के पश्चात्, जिले के भीतर के किसी अन्य स्थान पर अस्थायी रूप से बैठ सकेंगे । " 128(6)
छत्तीसगढ़ राजपत्र, दिनांक 21 फरवरी 2024
"धारा 13. अपीलीय क्षेत्राधिकारी-
(1 ) तत्समय प्रवृत किसी विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित स्थिति को छोडकर मूल क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने वाले न्यायालयों की आज्ञप्तियों (डिक्रीयों) या आदेशों से अपीलें निम्नांकित प्रारम्भिक अधिकारिता बाले न्यायालयों में होगी ।
(क) व्यवहार न्यायाधीश प्रथम वर्ग या व्यवहार न्यायाधीश द्वितीय वर्ग की आज्ञप्ति या आदेश से जिला न्यायाधीश के न्यायालय को
(ख ) जिला न्यायाधीश या अपर न्यायाधीश के न्यायालय की डिक्री या आदेश की उच्च न्यायालय में
स्पष्टीकरण- सिविल न्यायाधीश के न्यायालय या जिला न्यायाधीश के न्यायालय के अंतर्गत इस न्यायालय का. अपर न्यायाधीश आयेगा । "
"धारा 14. जिले में के सिविल न्यायालयों और न्यायधीशों पर अधीक्षण तथा नियन्त्रण- उच्च न्यायालय के साधारण अधीक्षण तथा नियंत्रण के अधीन रहते हुये जिला न्यायाधीश अपनी अधिकारिता के भीतर के स्थानीय क्षेत्र में इस अधिनियम के अधीन स्थापित किये गये समस्त अन्य सिविल न्यायालयों का तथा ऐसे न्यायालयों में नियुक्त किये गये समस्त अपर उसका यह कर्तव्य होगा कि वह
"
"धारा 15. कार्य विभाजन की शक्ति-
" (1 ) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (क्रं. 5 सन् 1908) में, या किसी क्षेत्र में तत्समय प्रवृत्त लघुवाद न्यायालयों से संबंधित विधि में, या इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किन्ही अन्य उपबन्धों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुये भी , जिला न्यायाधीश लिखित आदेश द्वारा , यह निर्देश दे सकेगा कि उसके न्यायालय द्वारा उसके सिविल जिले में धारा 5 के अधीन स्थापित किये गये अन्य सिविल न्यायलयों के अपर न्यायाधीशों के बीच कार्य परस्पर ऐसी रीति में किया जाय , जैसा कि वह उचित समझे :
परंतु, वहां तक के सिवाय जहां तक कि इस धारा के अधीन दिये गये किसी निर्देश से किसी लघुवाद न्यायालय की या किसी ऐसे न्यायालय की, जिसमें लघुवाद न्यायालय की अधिकारिता विनिहित है , अन्य अधिकारिता प्रभावित होती हो , ऐसा कोई निर्देश किसी न्यायालय को ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने या ऐसा कार्य करने के लिये सशक्त नही करेगा जो उसकी धन - सम्बम्धी अधिकारिता तथा अधिसूचित क्षेत्रीय अधिकारिता की सीमाओं से परे हो । "
(4 ) उपधारा ( 1 ) के अधीन सिविल कार्य का वितरण करते समय जिला न्यायाधीश ऐसे सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित करेगा जो कि उच्च न्यायालय , नियमों द्वारा , विहित करें । " छत्तीसगढ़ राजपत्र, दिनांक 21 फरवरी 2024
128(7) "धारा 16. न्यायाधीश उन प्रकरणों का विचारण न करें, जिनमें उनका व्यक्तिगत हित सम्बन्ध हो ........
(2) यदि कोई ऐसा वाद , अपील या अन्य कार्यवाही जिले में के किसी सिविल न्यायालय के समक्ष या ऐसे न्यायालय के किसी अपर न्यायाधीश की समक्ष आती है , तो वह न्यायाधीश उस मामले को, उसके अभिलेख तथा सहवर्ती परिस्थितियों के बारे में अपनी रिर्पोट के साथ , जिला न्यायाधीश को निर्देशित करेगा जो ऐसे मामले को या तो स्वयं निपटा सकेगा या धन - सम्बंधी अधिकारिता की सीमाओं के अध्यधीन रहते हुये , उसे जिले में के यथास्थिति किसी अन्य न्यायालय को या जिले में के न्यायालयों में से किसी न्यायालय के अपर न्यायाधीश को निपटारे के लिये सौंप सकेगा या अन्तरित कर सकेगा ।
(3) यदि कोई ऐसा वाद, अपील या अन्य कार्यवाही स्वयं जिला न्यायाधीश के समक्ष आती है, तो वह ऐसे मामले को या तो अपने न्यायालय के किसी अपर न्यायाधीश को सौंप सकेगा, या समुचित आदेशों के लिये अभिलेख को, सहवर्ती परिस्थितयों पर अपनी टिप्पणियों के साथ उच्च न्यायालय को पारेषित कर सकेगा । "
"धारा 18. जिला न्यायाधीशों के पद में अस्थायी रिक्ति किसी जिला न्यायाधीश की मृत्यु हो जाने की दशा में या छुट्टी पर होने के कारण सिविल जिले से उसके अनुपस्थित होने की दशा में अथवा रूणता या अन्य कारण से अपने कर्तव्यों का पालन करने से उसके निवारित हो जाने की दशा में , वह न्यायाधीश जो संवर्ग- अधिक्रम में संवर्ग - ज्येष्ठता के अनुसार सबसे ज्येष्ठ हो, अपने मामूली कर्तव्यों में विघ्न डाले बिना, जिला न्यायालय का कार्यभार ग्रहण करेगा; और ऐसा भारसाधक रहते समय , वह वादों तथा अपीलों के फाइल किये जाने , अभिवचन , अजियां प्राप्त करने , आदेशिकाओं के निष्पादन, रिटों की तामीली रिर्पोट ( रिटर्न ऑफ -रिट्स ) तथा ऐसे ही अन्य कार्यों के सम्बन्ध में जिला न्यायाधीश के कर्तव्यों का पालन करेगा; और उसे इस प्राकर के आपाती अन्तवर्ती मामले , जैसे कि उच्च न्यायालय नियमों द्वारा विहित करे , निपटाने की शक्ति तथा अधिकारिता भी होगी और ऐसा भारसाधक न्यायाधीश ऐसा कार्यभार तब तक रखे रहेगा जब तक कि जिला न्यायाधीश का पद पुर्नग्रहीत न कर लिया जाय या ऐसे अधिकारी द्वारा ग्रहण न कर लिया जाय , जो उस पद पर सम्यक् रूप से नियुक्त किया गया हो ।
"धारा 19. जिला न्यायाधीश की शक्तियों का प्रत्यायोजन-
कोई भी जिला न्यायाधीश, जो मुख्यालय छोड़कर कर्त्तव्य हेतु अपने जिले के भीतर के किसी स्थान को जा रहा हो , ऐसे कर्तव्यों का, जो आपातिक स्वरूप के हों, पालन करने की तथा किन्ही ऐसे आपाती मामलों का, जो धारा 18 के अधीन विनिर्दिष्ठ किये जायं , निपटारा करने की शक्तियां, मुख्यालय पर के अपने न्यायालय के ज्येष्ठम अपर न्यायाधीश को या जहां और अपर न्यायाधीश न हो, वहां मुख्यालय पर के किसी सिविल न्यायाधीश को प्रत्योजित कर सकेगा, और ऐसे न्यायाधीश के सम्बन्ध में यह समझा जायेगा कि वह जिला न्यायाधीश के न्यायालय का भारसाधक न्यायाधीश हैं । "
दिनेश शर्मा सचिव छत्तीसगढ़ विधान सभा संचालक, मुद्रण तथा लेखन सामग्री , छत्तीसगढ़ द्वारा शासकीय मुद्रणालय , रायपुर से मुद्रित तथा प्रकाशित - 2024 .