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REGISTERED No. D. 221 रजिस्ट्री सं ० डी 221
-8 FEB 1965
भारत स्थ्यमेव जयते का राजपत्र The Gazette of India
प्राधिकार से प्रकाशित
PUBLISHED BY AUTHORITY
प्रसाधारण EXTRAORDINARY
भाग II- खण्ड 1 -अ PART II- Sec 1 -A
No. 2] NEW DELHI , WEDNESDAY, JANUARY 27 , 1965 MAGHA 7 , 1886
Separate paging is given to this Part in order that it may be filed as a separate compilation
MINISTRY OF LAW
( Legislative Department)
New Delhi , 27th January , 1965 Magha 7 , 1886 ( Saka)
The following translation in Hindi of the Transfer of Property Act , 1882 , is hereby published under the authority of the President and shall be deemed to be the authoritative text thereof in Hindi under clause (a) of Sub - section ( 1 ) of Section 5 of the Official Languages Act , 1963 (19 of 1963) .
सम्पत्ति -अन्तरण अधिनियम , 1882 (1882 का अधिनियम सं ० 4 )
[17 फरवरी , 1882 ]
पक्षकारों के कार्य द्वारा किए गए सम्पत्ति- अन्तरण से सम्बन्धित विधि को संशोधित करने के लिए
अधिनियम
यतः पक्षकारों के कार्य द्वारा किए गए सम्पत्ति - अन्तरण से सम्बन्धित विधि के कतिपय भागों को परिभाषित और संशोधित करना समीचीन है, अतः एतद्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है
अध्याय 1
प्रारम्भिक
संक्षिप्त नाम ।
1. यह अधिनियम सम्पत्ति- अन्तरण अधिनियम , 1882 कहा जा सकेगा ।
प्रारम्भ ।
यह जुलाई , 1882 के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा ।
विस्तार ।
प्रथमतः इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है सिवाय उन राज्यक्षेत्तों के जो 1 नवम्बर , 1956 से अव्यवहित पूर्व भाग ( ख ) राज्यों में या मुम्बई पंजाब और दिल्ली के राज्यों में समाविष्ट थे ।
किन्तु इस अधिनियम या इस के किसी भाग का विस्तार उक्त सम्पूर्ण राज्यक्षेत्रों या उन के किसी भाग पर सम्पृक्त राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा कर सकेगी ।
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827 G. of I.-1 .
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भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
और कोई भी राज्य सरकार अपने द्वारा प्रशासित राज्यक्षेत्तों के किसी भी भाग को निम्नलिखित सब उपबन्धों से या उनमें किसी से भी चाहे भूतलक्षी या चाहे भविष्यलक्षी रूप से छूट शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय- समय पर दे सकेगी, अर्थात्
1908 का 16 धारा 54 पैरा 2 और 3 , धाराएं 59, 107 और 123 इस धारा के पूर्ववर्ती भाग में किसी बात के होते हुए भी , धारा 54 पैरा 2 और 3 और धारा 59,107 और 123 का विस्तार किसी ऐसे जिले या भू- भाग पर न तो होगा और न किया जाएगा , जो भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम , 1908 के प्रवर्तन से उस अधिनियम की प्रथम धारा द्वारा प्रदत शक्ति के अधीन या अन्यथा तत्समय अपवर्जित हों ।
2. उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का तत्समय विस्तार हो, वे अधिनियमितियां , जो एतद्धपाबद्ध अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं उसमें उक्त विस्तार तक निरसित हो जाएंगी । किन्तु एतस्मिन् अन्र्तावष्ट कोई भी बात निम्न- लिखित पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी
(क ) एतद्वारा अभिव्यक्त रूप से न निरसित किसी भी अधि- नियमिति के उपबन्ध,
अधिनियमों का निरसन । किन्हीं अधिनियमितियों, प्रसंगतियों, अधि- कारों , दायित्वों इत्यादि की व्यावृत्ति ।
(ख ) किसी संविदा के या सम्पत्ति संघटन के , इस अधिनियम के उपबन्धों से संगत और तत्समय प्रवृत्त- विधि द्वारा अनुज्ञात कोई भी निबन्धन या प्रसंगतियां,
( ग ) इस अधिनियम के प्रवृत्त होने से पूर्व गठित किसी विधिक मम्बन्ध से उत्त्पन्न कोई अधिकार या दायित्व या किसी ऐसे अधिकार या दायित्व के बारे में कोई अनुतोष, अथवा
(घ) इस अधिनियम की धारा 57 और अध्याय 4 द्वारा यथा- उपबन्धित के सिवाय , विधि की क्रिया द्वारा या सक्षम अधिकारितायुक्त न्याया- लय की डिक्री या आदेश के द्वारा या उसके निष्पादन में हुआ कोई श्रन्तरण , और इस अधिनियम के दूसरे अध्याय की कोई भी बात मोहमेडन विधि के किसी नियम पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।
निर्वचन खंड ।
न हो 3. इस अधिनियम में जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध भाती ; "स्थावर सम्पत्ति " के अन्तर्गत खड़ा काष्ठ , उगती फसलें या भास नहीं " लिखत" से श्रवसीयती लिखत अभिप्रेत है ;
किसी लिखत के सम्बन्ध में " अनुप्रमाणित " से ऐसे दो या अधिक साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित अभिप्रेत है और सर्वदा अभिप्रेत रहा होना समझा जाएगा जिनमें से हर एक ने निष्पादक को लिखत पर हस्ताक्षर करते या अपना चिक्ल लगाते देखा है या निष्पादक की उपस्थिति में और उसके निदेश द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को लिखत पर हस्ताक्षर करते देखा है , या निष्पादक से उस के अपने हस्ताक्षर या चिह्न की या ऐसे अन्य व्यक्ति के हस्ताक्षर की वैयक्तिक अभि- स्वीकृति पाई है, और जिनमें से हर एक ने निष्पादक की उपस्थिति में लिखत पर हस्ताक्षर किए हैं , किन्तु यह आवश्यक न होगा कि ऐसे साक्षियों में से एक से 217
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1क]
अधिक एक ही समय उपस्थित रहे हों और अनुप्रमाणन का कोई विशिष्ट प्ररूप आवश्यक न होगा , " रजिस्ट्रीकृत " से ऐसे किन्हीं राज्यक्षेत्रों के , जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, किसी भी भाग में , दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण को विनियमित करने वाली तत्समय-प्रवृत्त-विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत अभिप्रेत है,
" भूबद्ध " से अभिप्रेत है
( क ) भूमि में मूलित, जैसे पेड़ और झाड़ियां ;
(ख ) भूमि में निविष्ट, जैसे भित्तियां या निर्माण; अथवा
(ग ) ऐसी निविष्ट वस्तु से इसलिए बद्ध कि जिससे यह बद्ध है उसका स्थायी फ़ायदाप्रद उपभोग किया जा सके ,
"अनुयोज्य दावे " से स्थावर सम्पत्ति के बन्धक द्वारा या जंगम सम्पत्ति के आडमान या गिरवी द्वारा प्रतिभूत ऋण से भिन्न किसी ऋण का या उस जंगम सम्पत्ति में , जो दावेदार के वास्तविक या आन्वयिक कब्जे में नहीं है फ़ायदाप्रद हित का ऐसा दावा अभिप्रेत है , जिसे सिविल न्यायालय अनुतोष देने के लिए आधार प्रदान करने वाला मानता हो चाहे ऐसा ऋण या फ़ायद्राप्रद हित वर्तमान , प्रोद्भवमान , सशर्त, या समाश्रित हो ,
किसी तथ्य की किसी व्यक्ति को " सूचना " है यह तब कहा जाता है , जब वह वास्तव में उस तथ्य को जानता है , अथवा यदि ऐसी जांच या तलाश , जो उसे करनी चाहिए थी, करने से जानबूझकर प्रविरत न रहता था घोर उपेक्षा न करता , तो वह उस तथ्य को जान लेता ।
1908 को 16
स्पष्टीकरण 1 -- जहां कि स्थावर सम्पत्ति से सम्बन्धित कोई संव्यवहार रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया जाना विधि द्वारा अपेक्षित है, और वह रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया गया है वहां यह समझा जाएगा कि ऐसे व्यक्ति को , जो ऐसी सम्पत्ति को या ऐसी सम्पत्ति के किसी भाग या ऐसी सम्पत्ति में किसी अंश या हित को अर्जित करता है , ऐसी लिखत की सूचना उस तारीख से है , जिस तारीख को रजिस्ट्रीकरण हुआ है , या जहां कि एक ही उपजिले में सब सम्पत्ति स्थित नहीं है या जहां कि रजिस्ट्रीकृत लिखत भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम , 1908 की धारा 30 की उपधारा ( 2 ) के अधीन रजिस्ट्रीकृत की गई है, वहां उस पूर्वतम तारीख से है , जिसको ऐसे रजिस्ट्रीकृत लिखत का कोई ज्ञापन उस उपरजिस्ट्रार के पास फाइल किया गया, जिस के उपजिले में उस सम्पत्ति को , जो अर्जित की जा रही है या उस सम्पत्ति का , जिसमें अंश या हित अर्जित किया जा रहा है , कोई भाग स्थित है ;
परन्तु यह तब जब कि
1908 का 16
( 1 ) उस लिखत का रजिस्ट्रीकरण और उसके रजिस्ट्रीकरण की पूर्ति भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम , 1908 द्वारा और तदधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित रीति से की जा चुकी हो ।
( 2 ) लिखत या ज्ञापन को उन पुस्तकों में यथास्थिति सम्यक् रूप से प्रविष्ट या फाइल कर दिया गया हो जो उस अधिनियम की धारा 51 के अधीन रखी जाती है ; तथा 218
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
( 3 ) उस संव्यवहार के बारे में , जिससे वह लिखत सम्बन्धित है , विशिष्टियां उन अनुक्रमणिकाओं में ठीक - ठीक प्रविष्ट कर दी गई हों , जो उस अधिनियम की धारा 55 के अधीन रखी जाती हैं ।
स्पष्टीकरण 2- जो व्यक्ति किसी स्थावर सम्पत्ति को या किसी ऐसी सम्पत्ति में के किसी अंश या हित को अर्जित करता है , यह समझा जाएगा कि उसे उस सम्पत्ति में उस व्यक्ति के ह्क़ की, यदि कोई हो , सूचना है, जिसका तत्समय उस पर बास्तविक कब्जा है ।
स्पष्टीकरण 3-यदि किसी व्यक्ति के अभिकर्ता को किसी तथ्य की उस
कारबार के अनुक्रम में , जिसके लिए वह तथ्य तात्त्विक है, उस व्यक्ति की ओर से कार्य करते हुए सूचना मिल जाती है तो यह समझा जाएगा कि उस तथ्य की सूचना उस व्यक्ति को थी ;
परन्तु यदि अभिकर्ता कपटपूर्वक तथ्य को छिपा लेता है तो जहां तक कि उस व्यक्ति का सम्बन्ध है , जो उस कपट में पक्षकार था या अन्यथा उसका संज्ञान रखता था , उसकी सूचना मालिक पर आरोपित न की जाएगी ।
संविदाओं से
1872 का 9 4. इस अधिनियम के वे अध्याय और धाराएं , जो संविदाओं से सम्बन्धित हैं, भारतीय संविदा अधिनियम , 1872 का भाग मानी जाएंगी ।
1908 का 16 तथा धारा 54 , पैरा 2 और 3 और धाराएं 59 , 107 और 123 भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम , 1908 के अनुपूरक के रूप में पढ़ी जाएंगी ।
सम्बन्धित अधि नियमितियों का संविदा अधि- नियम का भाग और रजिस्ट्रीकरण अधिनियम का अनु- प्ररक समझा जाना ।
अध्याय 2
पक्षकारों के कार्य द्वारा सम्पत्ति - अम्तरण के विषय में
( क ) जंगम या स्थावर सम्पत्ति का अन्तरण
"सम्पत्ति के
अन्तरण" की
परिभाषा ।
5. आगामी धाराओं में " सम्पत्ति के अन्तरण " से ऐसा कार्य श्रभिप्रेत है , जिसके द्वारा कोई जीवित व्यक्ति एक या अधिक अन्य जीवित व्यक्तियों को या स्वयं को अथवा स्वयं और एक या अधिक अन्य जीवित व्यक्तियों को वर्तमान में या भविष्य में सम्पत्ति हस्तान्तरित करता है और " सम्पत्ति का अन्तरण करना" ऐसा कार्य करना है ।
इस धारा में " जीवित व्यक्ति" के अन्तर्गत कम्पनी या संगम या व्यक्तियों का निकाय , चाहे वह निगमित हो या न हो, आता है, किन्तु एतस्मिन् अन्तविष्ट कोई भी बात कम्पनियों, संगमों या व्यक्तियों के निकायों को या के द्वारा किए जाने वाले सम्पत्ति अन्तरण से सम्बन्धित किसी भी तत्समय प्रवृत्त - विधि पर प्रभाव न डालेगी ।
क्या किया अन्तरित जा 6. किसी भी किस्म की सम्पत्ति , इस अधिनियम या किसी भी अम्य तत्समय- प्रवृत्त -विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय , अन्तरित की जा सकेगी ।
सकेगा।
( क ) किसी प्रत्यक्ष वारिस की सम्पदा का उत्तराधिकारी होने की संभावना, 219
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1 क ]
कुल्य की मृत्यु पर किसी नातेदार की वसीयत सम्पदा श्रभिप्राप्त करने की संभावना या इसी प्रकृति की कोई अन्य संभावना मात्र अन्तरित नहीं की जा सकती ;
(ख) किसी उत्तरभाब्य शर्त के भंग के कारण पुनः प्रवेश का अधिकार मान्न उस सम्पत्ति के , जिस पर तद्वारा प्रभाव पड़ा है , स्वामी के सिवाय किसी अन्य को अन्तरित नहीं किया जा सकता ;
(ग ) कोई सुखाचार अधिष्ठायी स्थल से पृथकतः अन्तरित नहीं किया जा सकता ;
(घ) सम्पत्ति में का ऐसा हित , जो उपभोग में स्वयं स्वामी तक ही निर्बन्धित है, उसके द्वारा अन्तरित नहीं किया जा सकता;
(घघ ) भावी भरणपोषण का अधिकार , चाहे वह किसी भी रीति से उद्भूत, प्रतिभूत या अवधारित हो, अन्तरित नहीं किया जा सकता;
(ङ ) वाद लाने का अधिकार मात्न अन्तरित नहीं किया जा सकता ;
(च ) लोक पद अन्तरित नहीं किया जा सकतर , और न लोक श्राफ़िसर का संबलम उसके देय होने से , चाहे पूर्व या पश्चात् , अन्तरित किया जा सकता ;
( छ) वृत्तिकाएं , जो सरकार के सैनिक , नौसैनिक , वायुसैनिक और सिविल पेन्शन भोगियों को श्रनुज्ञात हों , और राजनैतिक पेन्शनें अन्तरित नहीं की जा सकतीं ;
1872 का 9
( ज) कोई भी अन्तरण ( 1 ) जहां तक कि वह तद्वारा उस हित की , जिस पर प्रभाव पड़ा है , प्रकृति के प्रतिकूल हो, या ( 2 ) जो भारतीय संविदा अधिनियम , 1872 की धारा 23 के अर्थ के अन्तर्गत किसी विधिविरुद्ध उद्देश्य या प्रतिफल के लिए हो या ( 3 ) जो ऐसे व्यक्ति को , जो अन्तरिती होने से विधितः निरहित हो , नहीं किया जा सकता;
( झ) इस धारा की कोई भी बात अधिभोग का अनन्तरणीय अधिकार रखने वाले किसी अभिधारी को , उस सम्पदा के फार्मर को , जिस सम्पदा के लिए राजस्व देने में व्यतिक्रम हुआ है , या किसी प्रतिपाल्य अधिकरण के प्रबन्ध के अधीन किसी सम्पदा के पट्टेदार को, ऐसे अभिधारी , फार्मर या पट्टेदार के नाते अपने हित का समनुदेशन करने के बारे में प्राधिकृत करने वाली नहीं समझी जाएगी ।
अन्तरण करने के लिए सक्षम व्यक्ति ।
7. हर व्यक्ति , जो संबिदा करने के लिए सक्षम हो और अन्तरणीय सम्पत्ति का हकदार हो या अन्तरणीय सम्पत्ति के , जो उसकी अपनी नहीं है , व्ययन के लिए प्राधिकृत हो, ऐसी सम्पत्ति का अन्तरण पूर्णतः या भागतः तथा आत्यन्तिक रूप से या सशर्त , उन परिस्थितियों में , उतने विस्तार तक और उस प्रकार से , जो किसी भी तत्समय -प्रवृत्त- विधि द्वारा अनुज्ञात और विहित हो, करने के लिए सक्षम है ।
का
अन्तरण प्रभाव ।
8. जब तक कि कोई भिन्न आशय अभिव्यक्त न हो या आवश्यक रूप से विवक्षित न हो , सम्पत्ति का अन्तरण अन्तरिती को तत्काल ही सम्पत्ति में के और उसकी विधिक प्रसंगतियों में के उस समस्त हित का संक्रामण कर देता है जिसका संक्रामण करने के लिए अन्तरक तब समर्थ हो ।
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भारत का राजपत्न असाधारण
[भाग 2
ऐसी प्रसंगतियों के अन्तर्गत आते हैं-
जहां कि सम्पत्ति भूमि हो , वहां उससे उषाबद्ध सुखाधार, श्रन्तरण के पश्चात् प्रोद्भवमान उसके भाटक और लाभ तथा भूबद्ध सब चीजें,
और जहां कि सम्पत्ति भूबद्ध मशीनरी हो , वहां उसके जंगम भाग ,
और जहां कि सम्पत्ति कोई गृह हो वहां उससे उपाबद्ध सुखाचार, श्रन्तरण के पश्चात् प्रोद्भवमान उसका भाटक और उसके साथ स्थायी उपयोग के लिए उपबन्धित उसके ताले , चाबियां , छड़ें, द्वार , खिड़कियां और अन्य सब चीजें ,
और जहां कि सम्पत्ति कोई ऋण या अन्य अनुयोज्य दावा हो वहां उसके लिए प्रतिभूतियां ( उस दशा के सिवाय जिसमें वे ऐसे अन्य ऋणों, दावों के लिए भी हैं, जिन्हें अन्तरिती को अन्तरित नहीं किया गया है ) किन्तु अन्तरण के पूर्व प्रोद्भूत ब्याज की बकाया नहीं,
और जहां कि सम्पत्ति धन या आय देने वाली अन्य सम्पत्ति हो , वहां अन्तरण के प्रभावशील होने के पश्चात् प्रोद्भवमान उसका ब्याज या आय ।
मौखिक अन्तरण ।
9. हर उस दशा में , जिसमें विधि द्वारा कोई लेख अभिव्यक्ततः अपेक्षित नहीं है, सम्पत्ति का अन्तरण लिखे बिना किया जा सकेगा ।
अन्य-संक्रामण अवरुद्ध वाली शर्त । करने
10. जहां कि सम्पत्ति ऐसी शर्त या मर्यादा के अध्यधीन अन्तरित की जाती है, जो अन्तरिती या उसके अधीन दावा करने वाले व्यक्ति को सम्पत्ति में अपने हित को अलग करने या व्ययनित करने से आत्यन्तिकतः श्रवरुद्ध करती है, वहां ऐसी शर्त या मर्यादा शून्य है, सिवाय ऐसे पट्टे की दशा के जिसमें कि वह शर्त पट्टाकर्ता या उसके अधीन दावेदारों के फ़ायदे के लिए हो, परन्तु सम्पत्ति किसी स्त्री को ( जो हिन्दू, मुसलमान या बौद्ध न हो ) या उसके फ़ायदे के लिए इस प्रकार अन्तरित की जा सकेगी कि उसे अपनी विवाहित स्थिति के दौरान में उस सम्पत्ति को या उसमें के अपने फ़ायदाप्रद हित को अन्तरित या भारित करने की शक्ति न होगी ।
सृष्ट हित विरुद्ध निर्बन्धन । के
11. जहां कि सम्पत्ति के अन्तरण पर उस सम्पति में किसी व्यक्ति के पक्ष में हित आत्यन्तिकतः सुष्ट किया जाता हो, किन्तु अन्तरण के निर्बन्धन निदेश करते हों कि वह ऐसे हित का किसी विशिष्ट रीति से उपयोजन या उपभोग करे , वहां वह ऐसे हित को ऐसे प्राप्त और व्ययनित करने का हकदार होगा मानो ऐसा कोई निदेश था ही नहीं ।
जहा कि ऐसा कोई निदेश स्थावर सम्पत्ति के एक टुकड़े के बारे में उस सम्पत्ति के दूसरे टुकड़े के फ़ायदाप्रद उपभोग को सुनिश्चित करने के प्रयोजन से किया गया हो, वहां इस धारा की कोई भी बात किसी ऐसे अधिकार पर , जो अन्त- रक ऐसे निदेश का प्रवर्तन कराने के लिए रखता हो, या किसी ऐसे उपचार पर , जो वह उसके भंग के बारे में रखता हो , प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।
दिवाले या प्रय- तित अन्य-संक्रा मण पर हित को पर्यवमेय बनाने वाली शर्त ।
12. जहां कि इस शर्त या मर्यादा के अध्यधीन सम्पत्ति अन्तरित की जाती है कि किसी व्यक्ति को या उसके फ़ायदे के लिए आरक्षित या दिवा हुआ उस सम्पत्ति में का कोई भी हित उस व्यक्ति के दिवालिया होने पर या उसके अन्तरण या व्ययन करने का प्रयास करने पर समाप्त हो जाएगा, वहां ऐसी शर्त या मर्यादा शून्य है ।
221
भारत का राजपत्त्र असाधारण
खण्ड 1क]
इस धारा की कोई भी बात पट्टे में की किसी ऐसी शर्त को लागू न होगी जो पट्टाकर्ता या उसमे व्युत्पन्न िकाराधीन दावा करने वालों के फ़ायदे के लिए हो ।
श्रजात व्यक्ति के फ़ायदे के लिए श्रन्तरग ।
13. जहां कि सम्पत्ति के अन्तरण पर उस सम्पत्ति में कोई हित उसी अन्तरण द्वारा सूष्ट किसी पूर्विक हित के अध्यधीन ऐसे व्यक्ति के फ़ायदे के लिए , जो अंतरण की तारीख को अस्तित्व में न हो, सृष्ट किया जाता है , वहां ऐसे व्यक्ति के फ़ायदे के लिए सृष्ट हित प्रभावी न होगा जब तक कि उसका विस्तार सम्पत्ति में अन्तरक के सम्पूर्ण अवशिष्ट हित पर न हो ।
वृष्टीत
क उस सम्पत्ति का, जिसका वह स्वामी है , ख को अनुक्रमशः अपने और अपनी आशयित पत्नी के जीवनपर्यन्त के लिए और उत्तरजीवी की मृत्यु के पश्चात् आशयित विवाह के ज्येष्ठ पुत्त्र के जीवनपर्यन्त के लिए और उसकी मृत्यु के पश्चात्क के दूसरे पुन्न के लिए न्यास के रूप में अन्तरित करता है । ज्येष्ठ पुत्त्र के फ़ायदे के लिए इस प्रकार सृष्ट हित प्रभावशील नहीं होता है क्योंकि उसका विस्तार उस सम्पत्ति में क के सम्पूर्ण अवशिष्ट हित पर नहीं है ।
शाश्वतता विरुद्ध नियम । के 14. कोई भी सम्पत्ति - अन्तरण ऐसा हित सृष्ट करने के लिए प्रवृत्त नही हो सकता जो ऐसे अन्तरण की तारीख को जीवित एक या अधिक व्यक्तियों के जीवन काल के , और किसी व्यक्ति की , जो उम कालावधि के अवसान के समय अस्तित्व में हो, जिसे यदि वह पूर्ण वयस प्राप्त करे तो वह सृष्ट हित मिलना हो, अप्राप्तययता के पश्चात् प्रभावी होना है ।
15. यदि सम्पत्ति-अन्तरण से उस सम्पत्ति में किसी हित का सूजन ऐसे व्यक्तियों के किसी वर्ग के फ़ायदे के लिए किया जाता है जिनमें से कुछ के सम्बन्ध में ऐसा हित धारा 13 और 14 में अन्तर्विष्ट नियमों में से किसी के कारण निष्फल हो जाता है तो ऐसा हित केवल उन्हीं व्यक्तियों के सम्बन्ध में , न कि सम्पूर्ण वर्ग के सम्बन्ध में , निष्फल हो जाता है ।
उस वर्ग को अन्त- रण , जिसमें के कुछ व्यक्ति धारा 13 और 14 के अन्दर श्राते हैं ।
अन्तरर्ण किसी का पूर्विक हित की निष्फलता पर प्रभावी होना ।
16. जहां कि व्यक्ति या व्यक्तियों के किसी वर्ग के फ़ायदे के लिए सुष्ट हित धाराओं 13 और 14 में अन्तर्विष्ट नियमों में से किसी के कारण ऐसे व्यक्ति या ऐसे संपूर्ण वर्ग के सम्बन्ध में निष्फल हो जाता है , वहां उसी संव्यवहार में सृष्ट और ऐसे पूर्विक हित की निष्फलता के पश्चात् या पर प्रभावी होने के लिए ग्राशयित कोई हित भी निष्फल हो जाता है ।
संचयन के लिए निदेश ।
17. ( 1 ) जहां कि सम्पत्ति के किसी अन्तरण के निबन्धन निदिष्ट करते हैं कि उस सम्पत्ति से उद्भूत आय--
(क) अन्तरक के जीवन से, या (ख ) श्रन्तरण की तारीख से
अठारह वर्ष की कालावधि से अधिक कालावधि तक पूर्णतः या भागत संचित की जाएगी, 222
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
वहां एतस्मिन् पश्चात् यथाउपबंधित के सिवाय ऐसा निदेश वहां तक शून्य होगा, जहां तक कि वह कालावधि , जिसके दौरान में संचय करना निदिष्ट है, पूर्वोक्त कालावधियों में से दीर्घतर कालावधि से अधिक हो और ऐसी अन्तिम वर्णित कालावधि का अन्त होने पर वह संपत्ति और उसकी आय इस प्रकार व्ययनित की जाएगी मानो वह कालावधि, जिसके दौरान में संचय करना निदिष्ट किया गया है, बीत गई है ।
( 2 ) यह धारा ऐसे किसी निदेश पर प्रभाव न डालेगी जो
( i) अन्तरक के ऋणों का या अन्तरण के अधीन कोई हिंत पाने वाले किसी अन्य व्यक्ति के ऋणों का संदाय करने के, अथवा
( ii ) अन्तरक के या अन्तरण के अधीन कोई हित पाने वाले किसी अन्य व्यक्ति के पुत्त्र-पुत्रियों या दूरतर सन्तति के लिए भागों का उपबन्ध करने के, अथवा
( iii ) अन्तरित सम्पत्ति के परिरक्षण या अनुरक्षण के ,
प्रयोजन से संचय करने के लिए हो , और ऐसा निदेश तवनुकूल किया जा सकेगा ।
लोक के फ़ायदे के लिए शाश्व- सिक अन्तरण ।
18. धारा 14, 16 और 17 में के निर्बन्धन ऐसे सम्पत्ति अन्तरण की दशा में लागू नहीं होंगे , जो लोक के फ़ायदे के लिए धर्म , ज्ञान , वाणिज्य , स्वास्थ्य, क्षेम को या मानव जाति के लिए फ़ायदाप्रद किसी अन्य उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए किया गया हो ।
निहित हित ।
19. जहां कि किसी सम्पत्ति अन्तरण से किसी व्यक्ति के पक्ष में उस सम्पत्ति में कोई हित वह समय विनिर्दिष्ट किये बिना , जब से वह प्रभावी होगा, या शब्दों में यह विनिर्दिष्ट करते हुए कि वह तत्काल या किसी ऐसी घटना के घटित होने पर , जो अवश्यंभावी है , प्रभावी होगा, सूष्ट किया जाता है, वहां जब तक कि अन्तरण के निबन्धनों से प्रतिकूल आशय प्रतीत न होता हो ऐसा हित निहित हित है ।
निहित हित क़ब्ज़ा अभिप्राप्त करने से पहले अन्तरिती की मृत्यु हो जाने से बिफल नहीं हो जाता ।
स्पष्टीहरण- केवल ऐसे उपबन्ध से, जिसके द्वारा हित का उपभोग मुल्तवी किया जाता है , या उसी सम्पत्ति में कोई पूर्विक हित किसी अन्य व्यक्ति के लिए दिया जाता या आरक्षित किया जाता है, या उस सम्पत्ति से उद्भत श्राय को उस समय तक संचित किए जाने का निवेश किया जाता है , जब तक उपभोग का समय नहीं आ जाता, या केवल ऐसे किसी उपबन्ध से कि यदि कोई विशेष घटना घटित हो जाए तो वह हित किसी अन्य व्यक्ति को संक्रात हो जाएगा यह आशय कि हित निहित नहीं होगा अनुमित न किया जाएगा ।
223 भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1क]
20. जहां कि सम्पत्ति- अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित ऐसे व्यक्ति के फ़ायदे के लिए सृष्ट किया जाता है जो उस समय अजात है वहां , जब तक कि अन्तरण के निबन्धनों से कोई तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न होता हो, वह अपना जन्म होने पर निहित हित अर्जित कर लेता है , यद्यपि उसे यह क़ न हो कि वह अपने जन्म से ही उसका उपभोग करने लगे ।
अजात व्यक्ति अपन फ़ायदे के लिए किए गए श्रन्तरण पर कब निहित हित अर्जित करता है ।
समाश्रित हित ।
21. जहां कि सम्पत्ति - अन्तरण से उस सम्पत्ति में किसी व्यक्ति के पक्ष में हित विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने पर ही श्रथवा किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित न होने पर ही प्रभावी होने के लिए सृष्ट किया गया हो, वहां ऐसा व्यक्ति तद्वारा उस सम्पत्ति में समाश्रित हित अजित करता है । ऐसा हित पूर्व कथित दशा में उस घटना के घटिन होने पर और पश्चात् कथित दशा में उस घटना का घटित होना असम्भव हो जाने पर निहित हित हो जाता है ।
अपवाद-जहां कि सम्पत्ति अन्तरण के अधीन कोई व्यक्ति उस सम्पत्ति में किसी हित का हक़दार कोई विशिष्ट आयु प्राप्त करने पर हो जाता है, और अम्तरक उसको वह आय भी आत्यन्तिकतः देता है जो उसके वह आयु प्राप्त करने सेपहले ऐसे हित से उद्भूत हो , या निदेश देता है कि वह श्राय या उसमें से उतनी, जितनी आवश्यक हो, उसके फ़ायदे के लिए उपयोजित की जाए , वहां ऐसा हित समाश्रित हित नहीं है ।
सदस्यों को
श्रन्तरण जो
किसी विशिष्ट 22. जहा कि सम्पत्ति- अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित किसी वर्ग के किसी वर्ग के ऐसे केवल ऐसे सदस्यों के पक्ष में सुष्ट किया गया हो, जो कोई विशिष्ट श्रायु प्राप्त करे , वहां ऐसा हित वर्ग के ऐसे किसी सदस्य में निहित नहीं होता जिसने बह आयु प्राप्त नहीं कर ली है ।
आयु को प्राप्त करें ।
भन्तरण , जो विनिर्दिष्ट भनि- श्चित घटना के घटित होने पर समाश्रित है ।
23. जहां कि सम्पत्ति- अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति को किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने पर ही प्रोद्भत होना हो , और उस घटना के घटित होने के लिए कोई समय उक्त न हो , वहां वह हित निष्फल हो जाता है जब तक ऐसी घटना मध्यवर्ती या पूर्ववर्ती हित के अस्तित्वहीन होने के पहले ही या साथ ही घटित नहीं हो जाती ।
24. जहां कि सम्पत्ति -अन्तरण से उस सम्पत्ति में हित निश्चित व्यक्तियों में से ऐसे व्यक्तियों को प्रोद्भूत होना हो , जो किसी कालावधि पर उत्तरजीवी रहें किन्तु निश्चित कालावधि विनिर्दिष्ट न हो, वहां वह हित उन व्यक्तियों में से ऐसों को जो मध्यवर्ती या पूर्ववर्ती हित के अस्तित्व का अन्त होने के समय जीवित हों, चला जाएगा , जब तक कि अन्तरण के निबंधनों से कोई तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न होता हो ।
निश्चित व्यक्तियो में से ऐसे व्य- क्तियों को अन्त- रण जो अवि- निर्दिष्ट काला- वधि पर उत्तर- जीवी हों ।
दृष्टीत
क सम्पत्ति को स्ण के जीवनपर्यन्त के लिए ख को और उसकी मृत्य के पश्चात् ग और घ को उन में समविभाजित किए जाने के लिए या उन में से उत्तरजीवी को अन्तरित करता है । ब के जीवनकाल में की
827 G. of I.- 2 .
224
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग2
मृत्यु हो जाती है । ख का उत्तरजीवी घ घ को संक्रामित हो जाती है । । ख की मृत्यु पर वह सम्पत्ति
सशर्त अन्तरण ।
25. सम्पत्ति-अन्तरण से सूष्ट और किसी शर्त पर निर्भर हित निष्फल हो जाता है , यदि उस शर्त की पूर्ति असंभव हो, या विधि द्वारा निषिद्ध हो या ऐसी प्रकृति की हो कि यदि वह अनुज्ञात की जाए तो वह किसी विधि के उपबन्धों को विफल कर देगी या कपटपूर्ण हो, या ऐसी हो जिसमें किसी दूसरे के शरीर या सम्पत्ति को क्षति अन्तलित या अन्तर्हित हो, या जिसे न्यायालय अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध समझता हो ।
( क ) ज को क कोई खेत पट्टे पर इस शर्त पर देता है कि वह एक घंटे में 100 मील पैदल चले । पट्टा शून्य है ।
(ख ) ख को क 500 रुपये इस शर्त पर देता है कि वह क की पुत्री ग से विवाह करे । अन्तरण की तारीख पर ग की मृत्यु हो चुकी थी । अन्तरण शून्य है ।
( ग) स को क 500 रुपये इस शर्त पर अन्तरित करता है कि वह न की हत्या करे । अन्तरण शून्य है ।
( घ) क अपनी भतीजी ग को 500 रुपये इस शर्त पर अम्तरित करता है कि वह अपने पति का अभित्याग कर दे । श्रन्तरण शून्य है ।
पूरोभाव्य शर्त की पूर्ति ।
26. जहां कि सम्पत्ति- श्रन्तरण के निबन्धन कोई ऐसी शर्त अधि रोपित करते हैं जो इस से पहले कि कोई व्यक्ति उस सम्पत्ति में हित प्राप्त कर सके , पूरी की जानी हो, वहां यदि उस शर्त का सारतः अनुपालन कर दिया गया है, तो यह समझा जाएगा कि उस की पूर्ति कर दी गई है ।
वृष्टीत
(क) क 5000 रुपये ण को इस शर्त पर अन्तरित करता है कि वह न, घ और की सम्मति से विवाह करेगा । की मृत्यु हो जाती है । न श्रीर म की सम्मति से व विवाह करता है । यह समझा जाएगा किख ने शर्त पूरी कर दी है ।
(ख ) क 5000 रुपये व को इस शर्त पर अन्तरित करता है कि यह न, घ और की सम्मति से विवाह करेगा । ग , घ और की सम्मति के बिना व विवाह करता है, किन्तु विवाह के पश्चात् उन की सम्मति प्रभिप्राप्त कर लेता है । स ने शर्त पूरी नहीं की है ।
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भारत का राजपत्न असाधारण
अॅण्ड 1फ
27. जहां कि सम्पत्ति- अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित एक व्यक्ति के पक्ष में सूष्ट किया जाता है और उसी संव्यवहार द्वारा उसी हित का कोई परतर व्ययन उस अन्तरण के अधीन पूर्विक व्ययन के निष्फल होने की दशा में किसी दूसरे के पक्ष में किया जाता है , वहीं पूर्विक व्ययन की निष्फलता पर परतर व्ययन प्रभावी हो जाएगा, यद्यपि वह निष्फलता अन्तरक द्वारा अनुध्यात प्रकार से न हुई हो ।
अन्तरण एक व्यक्ति को सशर्त ऐसे अन्तरण के साथ जो पूर्विक व्ययन के निष्फल होने पर दूसरे व्यक्ति के पक्ष में हो जाएगा ।
किन्तु जहां कि संव्यवहार के पक्षकारों का आशय यह हो कि पूर्विक व्ययन के किसी विशेष प्रकार से निष्फल हो जाने की दशा में ही परतर व्ययन प्रभावी होगा , वहां जब तक कि पूषिक व्ययन उस प्रकार से निष्फल नहीं हो जाता, परतर व्ययन प्रभावी न होगा ।
वृष्टांत
(क) क इस शर्त पर कि क की मृत्यु के पश्चात् व तीन मास के भीतर अमुक पट्टा निष्पादित कर देगा , ख को और यदि वह ऐसा करने में उपेक्षा करे तो ग को 500 रुपये अन्तरित करता है । क के जीवनकाल में ण की मृत्यु हो जाती है । ग के पक्ष में व्ययन प्रभावी हो जाता है ।
(ख ) क अपनी पत्नी को सम्पत्ति अन्तरित करता है किन्तु उसके जीवनकाल में ही उस की पत्नी की मृत्यु हो जाने की दशा में वह सर्पान्न , जिसे उसने अपनी पत्नी को अन्तरित किया था , ल को अन्तरित करता है । क और उस की पत्नी ऐसी परिस्थितियों में एक साथ विनष्ट हो जाते हैं, जिन से यह साबित करना असम्भव हो जाता है कि वह उस के पहले मर गई । ज के पक्ष में व्ययन प्रभावी नहीं होता ।
परतर अन्तरण का विनिर्दिष्ट घटन। के घटित होने या न होने की शर्त पर आश्रित 28. सम्पत्ति-अन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित किसी व्यक्ति के लिए इस अधियोजित शर्त के साथ प्रोद्भूत होने के लिए सूष्ट किया जा सकेगा कि विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने की दशा में ऐसा हित किसी अन्य व्यक्ति को संक्रान्त हो जाएगा या विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित न होने की दशा में ऐसा हित किसी अन्य व्यक्ति को संक्रान्त हो जाएगा । हर एक दशा में के व्ययन धारा 10, 12 , 21 , 22, 23, 24 , 25 और 27 में अन्तविष्ट होना । नियमों के अध्यधीन हैं ।
उत्तरभाग्य शर्त की पूर्ति ।
29. पूर्वगामी अन्तिम श्रारा द्वारा श्रनुष्यात किस्म का परतर व्ययन प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक कि शर्न की पूर्ति यथावत् नहीं हो जाती ।
वृष्टांत
क 500 रुपये एव को उस के प्राप्तवय होने या विवाह करने पर उसे दिए जाने के लिए इस उपबन्ध के साथ अन्तरित करता है कि यदि व अप्राप्तषय ही मर जाए याग की सम्मति के बिना विवाह कर ले , तो वे 500 रुपये ध को मिलेंगे । ख केवल 17 वर्ष की आयु में और ग की सम्मति के बिना विवाह करता है । घ को अन्तरण प्रभावी हो जाता है ।
827 G. of I. 3 .
226
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
30. यदि परतर व्ययन विधिमान्य न हो, तो पूषिक व्ययन पर उस का प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
वृष्टांत
पूर्विक ष्ययन का परतर व्ययन की बारा श्रविधिमान्यता न होना । प्रभावित
क एक फ़ारम क्षण को उसके जीवनपर्यन्त के लिए तथा यदि वह अपने पति का अभित्यजन न करे , तो ग को अन्तरित करता है । व अपने जीवनपर्यन्त फ़ारम की ऐसे हक़दार है मानो कोई शर्त अन्तःस्थापित थी ही नहीं ।
31. धारा 12 के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि सम्पत्ति के अन्तरण पर उस सम्पत्ति में कोई हित इस अधियोजित शर्त के साथ सुष्ट किया जा सकेगा कि किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने की दशा में या किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित न होने की दशा में उस के अस्तित्व का अन्त हो जाएगा ।
वृष्टांत
यह शर्त कि श्रन्तरण विनि- दिष्ट अनिश्चित घटना के घटित होने या न होने की दशा में प्रभावी न रहेगा।
( क ) क कोई फ़ारम ना को उस के जीवनपर्यन्त के लिए इस उपबन्ध के साथ अन्तरित करता है कि यदि स ने अमुक जंगल को काटा तो अन्तरण के प्रभाव का अन्त हो जाएगा । सत्र जंगल काट डालता है । वह फ़ारम में अपना आजीवन हित खो देता है ।
( ख ) क कोई फ़ारम ख को इस उपबन्ध के साथ अन्तरित करता है, कि यदि श्रन्तरण की तारीख के पश्चात् तीन वर्ष के भीतर स इंग्लैंड न जाएगा तो फ़ारम में उसके हित का अन्त हो जाएगा । स विहित अवधि के भीतर इंग्लैंड नहीं जाता । फारम में उस के हित का अन्त हो जाता है ।
एसी शर्त अविधि- मान्य नहीं होनी चाहिए ।
32. इस के लिए कि यह शर्त विधिमान्य हो कि हित के अस्तित्व का अन्त हो जाएगा, यह श्रावश्यक है कि वह घटना , जिससे वह सम्बन्धित है, ऐसी हो जो हित के सूजन की शर्त विधितः हो सकती है ।
33. जहां कि सम्पत्ति- श्रन्तरण से उस सम्पत्ति में कोई हित इस शर्त के अध्यधीन सृष्ट किया जाता है कि उसे लेने वाला व्यक्ति अमुक कार्य करेगा , किन्तु उस कार्य के करने के लिए कोई समय विनि- दिष्ट नहीं है, वहां वह शर्त भंग हो जाती है, जब वह ऐसे कार्य का करना सर्वदा के लिए या किसी अनिश्चित कालावधि के लिए असम्भव कर देता है ।
कार्य करने की शर्त पर आश्रित अन्तरण जब कि उस कार्य के करने के लिए कोई समय विनिर्दिष्ट नहीं है ।
कार्य करने की शर्त पर श्राश्रित अन्तरण जबकि समय विनिर्दिष्ट है ।
34. जहां कि या तो सम्पत्ति के अन्तरण से सृष्ट किसी हित का किसी व्यक्ति द्वारा उपभोग किए जाने से पहले पूर्त की जाने वाली शर्त के तौर पर या ऐसी शर्त के तौर पर , जिस की अपूर्ति की दशा में वह हित उससे किसी दूसरे व्यक्ति को संक्रान्त हो जाना है, कोई कार्य उस व्यक्ति द्वारा किया जाना है और उस कार्य के करने के लिए कोई समय विनिविष्ट किया गया है, वहां यदि विनिर्दिष्ट समय के 227
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1 फ ]
भीतर ऐसे कार्य का किया आना किसी ऐसे व्यक्ति के कपट द्वारा निवारित कर दिया जाए, जिसे शर्त की अपूर्ति से सीधे फ़ायदा होता हो, तो उस कार्य को करने के लिए उसके मुक़ाबले में इतना अतिरिक्त समय अनुज्ञात किया जाएगा जितना ऐसे वपट द्वारा किए गए विलम्ब की प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित हो । किन्तु यदि उस कार्य को करने के लिए कोई समय विनिर्दिष्ट न हो तो यदि उसका किया जाना शर्त की अपूति में हितबद्ध व्यक्ति के कपट द्वारा असम्भव बना दिया जाए , या अनिश्चित समय के लिए मुल्तवी हो जाए , तो वह शर्त , जहां तक उस व्यक्ति का सम्बन्ध है, पूरी कर दी गई समझी जाएगी ।
निर्वाचन
निर्वाचन आवश्यक है । कब 35. जहां कि कोई व्यक्ति ऐसी सम्पत्ति अन्तरित करने की प्रव्यञ्जना करता है, जिसे अन्तरित करने का उसे कोई अधिकार नहीं है और उसी संध्यवहार के भागरूप कोई फ़ायदा उस सम्पत्ति के स्वामी को प्रदत्त करता है वहां ऐसे स्वामी को निर्वाचन करना होगा कि वह या तो ऐसे अन्तरण को पुष्ट करे या उससे विसम्मत हो और पश्चात्कथित दशा में वह ऐसे प्रदत्त फ़ायदे का त्याग करेगा और इस प्रकार त्यक्त फ़ायदा अन्तरक या उसके प्रतिनिधि को ऐसे प्रतिर्वार्तत हो जाएगा, मानो वह व्ययनित ही नहीं हुआ था , तथापि--
जहाँ कि अन्तरण आनुग्रहिक है और अन्तरक निर्वाचन किए जाने से पहले मर गया है या नवीन अन्तरण करने के लिए अन्यथा असमर्थ हो गया है ,
भौर उन सब दशाओं में , जिनमें अन्तरण प्रतिफलार्थ है ,
निराश अन्तरिती को , प्रतिफल की रकम या उस सम्पत्ति के , जिसे उसको अन्तरित किए जाने का प्रयत्न किया गया था , मूल्य को चुका देने के भार के मध्यधीन ही वह फ़ायदा प्रतिवर्तित होगा ।
वृष्टीत
सुल्तानपुर का खेत ग की सम्पत्ति है और उसका मूल्य 800 रुपये है । क उसे दान की लिखत द्वारा ख को अन्तरित करने की प्रव्यञ्जना करता है और उसी लिखत द्वारा ण को 1,000 रुपयें देता है । । खेत को अपने पास रखना निर्वा चित करता है । 1,000 रुपये का दान उससे समपहृत हो जाता है ।
उसी मामले में क निर्वाचन के पहले मर जाता है । उसका प्रतिनिधि 1,000 रुपये में से 800 रुपये ख को देगा ।
इस धारा के प्रथम पैरा का नियम लागू होता है चाहे अन्तरक यह विश्वास करता हो या न करता हो कि जिस का अन्तरण करने की वह प्रव्यञ्जना करता है , वह स्वयं उसकी अपनी है ।
जोव्यक्ति किसी संव्यवहार के अधीन कोई फ़ायदा मीधा नहीं लेता किन्तु उसके अधीन फ़ायदा उसे परतः व्युत्पन्न होता है उसे निर्वाचन करने की आव श्यकता नहीं है ।
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भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
जो व्यक्ति अपनी किसी एक हैसियत में कोई फ़ायदा उस संव्यवहार के अधीन लेता है , वह किसी अन्य हैसियत में उससे विसम्मत हो सकेगा ।
अन्तिम पूर्ववर्ती चारों नियमों का अपवाद।
जहां कि उस सम्पत्ति के स्वामी को , जिसका अन्तरण करने की अन्तरक प्रभ्यञ्जना करता है, कोई विशिष्ट फ़ायदा प्रदत्त किया जाना अभिव्यक्त किया गया है और ऐसा फ़ायदा उस सम्पत्ति के बदले में किया जाना अभिव्यक्त है, वहां यदि ऐसा स्वामी सम्पत्ति का दावा करे तो उसे विशिष्ट फ़ायदे का त्याग करना होगा किन्तु वह उसी संव्यवहार द्वारा उसे प्रदत्त किसी अन्य फ़ायदे को त्यागने के लिए आबद्ध नहीं है ।
जिस व्यक्ति को फ़ायदा प्रदत्त किया गया है उस व्यक्ति द्वारा प्रतिग्रहण ही अन्तरण की पुष्टि के लिए उस द्वारा किया गया निर्वाचन गठित करता है, यदि वह निर्वाचन करने के अपने कर्तव्य को जानता हो और उम परिस्थितियों को जानता हो जो निर्वाचन करने में किसी युक्तिमान मनुष्य के निर्णय पर प्रभाव डालती हैं , अथवा यदि वह उन परिस्थितियों की जांच करने का अधित्यजन कर देता है ।
यदि वह व्यक्ति, जिसे वह फ़ायदा प्रदत्त किया गया है, विसम्मति अभि- व्यक्त करने के लिए कोई कार्य किए बिना उसका उपभोग दो वर्ष तक कर लेता है तो ऐसा ज्ञान या अधित्यजन तत्प्रतिकूल साक्ष्य के अभाव में उपधारित कर लिया जाएगा ।
ऐसा ज्ञान या अधित्यजन उस के किसी ऐसे कार्य से अनुमित किया जा सकेगा जिसने उस सम्पत्ति में, जिसके अन्तरित करने की प्रव्यञ्जना की गई है हितबद्ध व्यक्तियों को उसी दशा में रखना असम्भव बना दिया है जिसमें वे होते यदि वह कार्य न किया गया होता ।
वृष्टीत
ख को क एक सम्पदा अन्तरित करता है , जिसका ण हक़दार है , और उस संव्यवहार के भाग रूप ण को कोयले की एक खान देता है । । खान को क़ब्ज़े में लेता है और उसे निःशेष कर देता है । तद्वारा उसने सम्पदा के को अन्तरण की पुष्टि कर दी है ।
यदि वह अन्तरण की तारीख से एक वर्ष के भीतर अन्तरण की पुष्टि करने का या उससे विसम्मति का अपना आशय अन्तरक या उसके प्रतिनिधि को जता नहीं देता , तो अन्तरक या उसका प्रतिनिधि उस कालावधि के अबसान पर उससे यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह निर्वाचन करे और यदि वह ऐसी अपेक्षा की प्राप्ति के पश्चात् युक्तियुक्त समय के भीतर उसका पालन नहीं करता तो यह समझा जाएगा कि उसने उस अन्तरण की पुष्टि करने का निर्वाचन कर लिया है ।
निर्योग्यता की दशा में निर्वाचन उस समय तक मुल्तबी रहेगा, जब तक उस निर्योग्यता का अन्त नहीं हो जाता, या जब तक निर्वाचन किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा नहीं किया जाता । تک 229 खण्ड 1क
भारत का राजपत्र असाधारण
प्रभाजन
हक़दार व्यक्ति के हित के पर्यवसान पर कालिक संदायों का प्रभाजन ।
36. तत्- प्रतिकूल संविवा या स्थानीय प्रथा के अभाव में सब भाटक, वाषिकिया, पेंशन , लाभांश और अन्य कालिक संदाय , जो आय की प्रकृति के हैं, ऐसे संदायों को पाने के लिए हक़दार व्यक्ति के हित के अन्तरण पर , जहां तक अन्तरक और अन्तरिती के बीच का सम्बन्ध है , दिन प्रतिदिन प्रोद्भवमान और तदनुकूल प्रभाअनीय , किन्तु वे उनके संदाय के लिए नियत दिनों को संदेय , समझे जाएंगे ।
विभाजन बाध्यता फ़ायदे का प्रभा- पर के जन ।
37. जब कि अस्तरण के परिणामस्वरूप सम्पत्ति विभाजित और कई अंशों में धारित है और तदुपरि पूरी सम्पत्ति से सम्बन्धित किसी बाध्यता का फ़ायदा उस सम्पत्ति के एक स्वामी से कई स्वामियों को संक्रान्त हो जाता है, तब तत्सम्बन्धी कर्तव्य का पालन, स्वामियों के बीच कोई तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो, ऐसे स्वामियों में से हर एक के पक्ष में उस अनुपात में किया जाएगा जो सम्पत्ति में उसके अंश के मूल्य का है, परन्तु यह तब जब कि कर्तव्य का विभाजन किया जा सकता हो और उस विभाजन से बाध्यता का बोझ सारवान् रूप में बढ़ नहीं जाता, किन्तु यदि कर्तव्य का विभाजन नहीं किया जा सकता अथवा विभाजन बाध्यता के बोझ को सारवान् रूप में बढ़ाता है , तो कर्तव्य पालन कई स्वामियों में ऐसे एक के फ़ायदे के लिए किया जाएगा जिसे ये संयुक्त तौर पर उस प्रयोजन के लिए अभिहित कर दें,
परम्तु कोई भी व्यक्ति, जिस पर बाध्यता का बोझ हो , उसका इस धारा द्वारा उपबन्धित प्रकार से निर्वहन करने में असफलता के लिए उत्तरदायी नहीं होगा, यवि और जब तक उसे विभाजन की युक्तियुक्त सूचना न मिल गई हो ।
इस धारा की कोई भी बात ऐसे पट्टों को , जो कृषि प्रयोजनों के लिए हों, लागू नहीं होगी यदि और जब तक राज्य सरकार उसे उन पट्टों को लागू करने का निदेश शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा न दे दे ।
वृष्टांत
( क) क किसी गांव में स्थित ऐसा गृह , जो को 30 रुपये और एक मोटी भेड़ के परिदान के वार्षिक भाटक पर पट्टे पर दिया हुआ है , ख, न और ध को बेचता है । क्रय मूल्य का ण ने आधा रुपया और ग और ध में से हर एक ने एक चौथाई दिया है । को उसकी सूचना है अतः वह पन्द्रह रुपये ख को , साढ़े सात रुपये ग को , साढ़े सात रुपये घ को देगा और भेड़ का परिदान ख, ग और घ के संयुक्त निदेश के अनुसार करेगा ।
(ख ) उसी दृष्टान्त में गांव का हर एक गृह बाढ़ रोकने के लिए तट- बन्ध में प्रति वर्ष 10 दिन के श्रम का प्रदाय करने के लिए आबद्ध है और * ने अपने पट्टे के निबन्धन के तौर पर क के लिए यह काम करने का करार किया था । ख , ग और घ में से हर एक अपने गृह की ओर से अलग अलग 10 दिन तक काम करने की अपेक्षा से करते हैं । ऐसे निदेशों के अनुसार जैसा सम्मिलित हो कर ख, ग और घ दें , कुल 10 दिन से अधिक काम करने के लिए आबद्ध नहीं हैं ।
230
भारत का राजपत्त असाधारण
[भाग 2
(ख ) स्थावर सम्पत्ति का अम्तरण
कुछ परिस्थितियों में ही अन्तरण करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अन्तरण ।
38. जहां कि कोई व्यक्ति, जो ऐसी परिस्थितियों में ही, जिनमें प्रकृत्या फेरफार होता रहता है , स्थावर सम्पत्ति का व्ययन करने के लिए प्राधिकृत है, ऐसी परिस्थितियों के वर्तमान होने का अभिकथन करके ऐसी सम्पत्ति को प्रति- फल के लिए अन्तरित करता है , वहां यदि अन्तरिती ने ऐसी परिस्थितियों में होने का अभिनिश्चय करने के लिए युक्तियुक्त सावधानी बरतने के पश्चात् सद्भावपूर्वक कार्य किया है , तो जहां तक एक ओर अन्तरिती का और दूसरी ओर अन्तरक और ऐसे अन्य व्यक्तियों के , ( यदि कोई हों ) जिन पर प्रभाव पड़ा है, बीच का सम्बन्ध है यह समझा जाएगा कि वे परिस्थितियां वर्तमान थीं ।
वृष्टांत
हिन्दू विधवा क जिसका पति सांपाश्विक वारिस छोड़ गया है, यह अभिकथित करते हुए कि ऐसे रूप में उसके द्वारा धारित सम्पत्ति उसके भरण- पोषण के लिए अपर्याप्त है, एक खेत को, जो उस सम्पत्ति का भाग है ख को ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो न तो धार्मिक है और न खैराती है , बेचने का क़रार करती है । ख युक्तियुक्त जांच के बाद अपना यह समाधान कर लेता है कि क के भरणपोषण के लिए सम्पत्ति की आय अपर्याप्त है और खेत का विक्रय आवश्यक है , और सद्भावपूर्वक कार्य करते हुए क से खेत खरीद लेता है । जहां तक कि एक ओर ण और दूसरी और क और सांपाश्विक वारिसों के बीच का सम्बन्ध है यह समझा जाएगा कि उक्त विक्रय की आवश्यकता वर्तमान थी ।
श्रन्तरण, जहां कि अन्य व्यक्ति भरणपोषण का हक़दार है ।
39. जहां कि अन्य व्यक्ति स्थावर सम्पत्ति के लाभों में से भरणपोषण या अपने अभिवर्धन या विवाह के लिए उपबन्ध पाने का अधिकार रखता है और ऐसी सम्पत्ति अन्तरित की जाती है , वहां उस अधिकार को अम्तरिती के विरुद्ध प्रवृत्त कराया जा सकेगा , यदि अन्तरिती को उस अधिकार की सूचना है या भ्रन्तरण श्रनुग्रहिक है किन्तु उस अन्तरित्ती के विरुद्ध नहीं जो सप्रतिफल है भौर जिसे उस अधिकार की सूचना नहीं है, और न उस के हाथ में की "वैसी सम्पत्ति के विरुद्ध ।
40. जहां कि अपनी निजी स्थावर सम्पत्ति के अधिक फ़ायदाप्रद उपभोग के लिए किसी अन्य व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति की स्थावर सम्पत्ति में के किसी हित या सुखाचार पर अनाश्रित यह अधिकार हो कि वह पश्चात्कथित सम्पत्ति का किसी विशिष्ट रीति से उपभोग किए जाने पर अवरोध लगा दे , अथवा
जहां कि अन्य व्यक्ति ऐसी बाध्यता से फ़ायदा उठाने का हकदार हो , जो संबिदा से उद्भूत होता है और स्थावर सम्पत्ति के स्वामित्व से उपाबद्ध है , किन्तु जो उसमें हित या सुखाचार की कोटि में नहीं आता ,
भूमि के उपयोग पर निर्बन्धन लगाने वाली बाध्यता का या स्वामित्व से उपाबद्ध किन्तु हिंत या सुखा- चार की कोटि में न आने वाली बाध्यता का बोझ ।
वहां ऐसा अधिकार या बाध्यता ऐसे अन्तरिती के विरुद्ध तो प्रवर्तित की जा सकेगी, जिसको उसकी सूचना है या जो उस सम्पत्ति का जिस पर तद्वारा प्रभाव पड़ा है , आनुग्रहिक मम्तरिती है, किन्तु उस अन्तरिती के विरुद्ध नहीं जो सप्रतिफल है और जिसे अधिकार या बाध्यता की सूचना नहीं है और न उसके हाथ में की वैसी सम्पत्ति के विरुद्ध ।
231
भारत को राजपक्ष असाधारणं
खण्ड क
स को सुलतानपुर बेचने की संविदा क करता है । संविदा के प्रवर्तन में होते हुए भी वह सुलतानपुर को ग को, जिसे संविदा की सूचना है , बेच देता है । ख संविदा को ग के विरुद्ध उसी विस्तार तक प्रर्तित करा सकेगा जिस तक बह क के विरुद्ध प्रतित करा सकता है ।
दृश्यमान स्वामी द्वारा अन्तरण ।
41. जहांकि स्थावर सर्पत्त में हितबद्ध व्यक्तियों की अभिव्यक्त या विवक्षित सम्मति से कोई व्यक्ति ऐसी सम्पत्ति का दृश्य स्वामी है और उसे प्रतिफलार्थ अन्तरित करता है, वहां अन्तरण इस आधार पर शून्यकरणीय नहीं होगा कि अन्तरक वैसा करने के लिए प्राधिकृत नहीं था , परन्तु यह तब जब कि अन्तरिती ने यह अभिनिश्चित करने के लिए कि अन्तरक अन्तरण करने की शक्ति रखता था युक्तियुक्त सावधानी बरतने के पश्चात् सद्भाव पूर्वक कार्य किया हो ।
42. जहां कि कोई व्यक्ति किसी स्थावर सम्पत्ति को यह शक्ति श्रारक्षित रखते हुए अन्तरित करता है कि वह उस अन्तरण का प्रतिसंहरण कर सकेगा और तत्पश्चात् उस सम्पत्ति को किसी अन्य अन्र्तारती को प्रतिफलार्थ अन्तरित कर वेता है वहां ऐसा अन्तरण ( ऐसी किसी शर्त के अध्यधीन , जो उस शक्ति के प्रयोग से बद्ध है ) उस पूर्वतर अन्तरण के प्रतिसंहरण के रूप में ऐसे अन्र्तारती के पक्ष में उस शक्ति के विस्तार तक प्रवृत्त होता है ।
पूर्वतर अन्तरण का प्रतिसंहरण करने का प्राधि- कार रखने वाले व्यक्ति अन्तरण । द्वारा
वृष्टांत
व को क एक गृह पट्टे पर देता है, और यह शक्ति भारक्षित रखता है कि यदि ख उसका ऐसा उपयोग करेगा जिससे उस गृह का मूल्य विनिर्दिष्ट सवक्षक की राय में गिर जाएगा , तो वह पट्टे को प्रतिसंहृत कर देगा । इस के पश्चात् यह सोच कर कि ऐसा उपयोग किया गया है वह उस गृह को पट्टे पर ग को देता है । इसके अध्यधीन कि ख द्वारा किए गए उस गुह के उपयोग क बारे में सर्वेक्षक की यह राय हो कि उस गृह का मूल्य गिर गया है , यह अन्तरण त के पट्टे के प्रतिसंहरण के रूप में क्रियाशील होता है ।
43. जहां कि कोई व्यक्ति कपटपूर्वक या भूलवश यह व्यपदेश करता है कि वह अमुक स्थावर सम्पत्ति को अन्तरित करने के लिए प्राधिकृत है और ऐसी सम्पत्ति को प्रतिफलार्थ अन्तरित करने की प्रव्यञ्जना करता है , वहां ऐसा अन्तरण , अन्तरिती के विकल्प पर किसी भी उस हित पर प्रवृत्त होगा, जिसे अन्तरक ऐसी सम्पत्ति में उतने समय के दौरान कभी भी अर्जित करे जितने समय तक उस अन्तरण की संविदा अस्तित्व में रहती है ।
श्रप्राधिकृत व्यक्ति द्वारा अन्तरण , जो अन्तरित सम्पत्ति में पीछे हित अर्जित कर लेता है ।
इस धारा की कोई भी बात उक्त विकल्प के अस्तित्व की सूचना न रखने वाले सद्भावपूर्ण सप्रतिफल अन्तरितियों के अधिकार का ह्रास न करेगी ।
232
भाई का राजपत्र असाधारणे
वृष्टांत
क, ओ हिन्दू है और अपने पिता स से पृथक हो गया है , तीन खेल , क्ष, त्र और श ।यह व्यपदेशन करते हुए । को बेच देता है , कि क उन्हें अन्तरित करने के लिए प्राधिकृत है । इन खेतों में से श खेत क का नहीं है , क्योंकि विभाजन के समय ख ने इसे अपने लिए प्रतिधृत कर लिया था , किन्तु व के मरने पर वारिस के रूप में ज्ञ को क प्राप्त कर लेता है । ग ने विक्रय संविदा को विखण्डित नहीं किया है , इसलिए वह क से अपेक्षा कर सकेगा कि क उसे श को परिदत्त करे ।
एक सहस्वामी द्वारा अन्तरण ।
44. जहां कि स्थावर सम्पत्ति के दो या अधिक सहस्वामियों में से एक, जो ऐसा करने के लिए वैधरूप से सक्षम है, ऐसी सम्पत्ति में का अपना अंश या कोई हित अन्तरित करता है , वहां अन्तरिती ऐसे अंश या हित के बारे में और वहां तक , जहां तक उस अन्तरण को प्रभावशील करने के लिए आवश्यक हो सम्पत्ति पर संयुक्त कब्जा रखने का , या सम्पत्ति का अन्य सामान्य या भागिक उपभोग करने का और उस सम्पत्ति का विभाजन कराने का अन्तरक का अधिकार अर्जित करता है जो से अन्तरित अंश या हित पर अन्तरण की तारीख प्रभाव डालने वाली शर्तों और दायित्वों के अध्यधीन है ।
जहां कि किसी अविभक्त कुटुम्ब के निवास गृह के किसी अंश का अन्तरिती उस कुटुम्ब का सदस्य नहीं है वहा इस धारा की कोई भी बात उसे उस गृह पर संयुक्त क़ब्जा रखने का या कोई दूसरा सामान्य या भागिक उपभोग करने का हक़दार करने वाली नहीं समझी जाएगी ।
प्रतिफलार्थ संयुक्त अन्तरण ।
45. जहां कि स्थावर सम्पत्ति दो या अधिक व्यक्तियों को प्रतिफलार्थ अन्तरित की जाती है और ऐसा प्रतिफल किसी ऐसी निधि में से दिया जाता है जो उनकी साझे की है , वहां तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में वे ऐसी सम्पत्ति में उन हितों के क्रम नः हक़दार होंगे जो उन हितों के यथाशक्य समान होंगे जिनके वे उस निधि में क्रमशः हक़दार थे और जहां कि ऐसा प्रतिफल उस की अपनी अपनी पृथक् निधियों में से दिया जाता है वहां कोई तत्प्रतिकूल संविधा न हो तो वे ऐसी सम्पत्ति में हित के हकदार क्रमशः उसी अनुपात में होंगे जो प्रतिफल के उन अंशों का है जिन्हें उन्होंने क्रमशः दिया था ।
इस बात के बारे में साक्ष्य के अभाव में कि उस निधि में वे किस हित के क्रमशः हक़दार थे या उन्होंने क्रमशः कितना कितना अंश दिया था यह उप- धारणा की जाएगी कि वे व्यक्ति उस सम्पत्ति में बराबर का हित रखते हैं ।
सुभिन्न हित रखने वाले व्यक्तियों प्रति- द्वारा फलार्थ अन्तरण ।
46. जहां कि स्थावर सम्पत्ति उस में सुभिन्न हित रखने वाले व्यक्तियों द्वारा प्रतिफलार्थ अन्तरित की जाती है , वहां कोई तत्प्रतिकल संविदा न हो तो वे अन्तरक, जहां कि उस सम्पत्ति में उनके हित बराबर मूल्य के हों, वहां बराबर बराबर अंश और, जहां कि ऐसे हित असमान मूल्य के हों, वहां अपने अपने हितों के मूल्य के अनुपात में अंश पाने के हक़दार हैं ।
233
वृष्टांत
(क) सुलतानपुर मौजे में क का अंण आधा और स्व और ग में से हर एक का एक -चौथाई है । वे इस मौजे के आठवें अंश का लालपुर मौजे में एक-चौथाई अंश से विनिमम कर लेते हैं । कोई तत्प्रतिकूल क़रार नहीं है इसलिए क लालपुर में आठवें अंश का और व और न हर एक उंस मौजे में सोलहवें अंश का हक़दार है ।
( ख ) अतरौली मौजे में क, जो आजीवन हित का, और वं और ग, जो उस मौजे के शेवभोग के हकदार हैं , उस मौजे को 1000 रुपये में बेच देते हैं । क के आजीवन हित का मूल्य 600 रुपये और शेषभोग का मूल्य 400 रुपये अभिनिश्चित किया जाता है । क क्रयवन में से 600 रुपये और ग 400 रुपये पाने के हकदार हैं । और
सामान्य सम्पत्ति में के भ्रंश का सहस्वामियों द्वारा अन्तरण ।
47. जहां कि स्थावर सम्पत्ति के कई सहस्वामी उसमें के किसी अंश को यह विनिर्दिष्ट किए बिना अन्तरित करते हैं कि वह अन्तरण उन अन्तरकों के किसी विशिष्ट अंश या अंशों पर प्रभावी होना है वहां ऐसा अन्तरण , जहां तक कि ऐसे अन्तरकों के बीच का सम्बन्ध है , ऐसे अंशों पर, जहां कि वे अंश बराबर थे , वहां बराबर बराबर और , जहां कि वे अंश बराबर नहीं थे, वहीं ऐसे अशों के विस्तार के अनुपात में प्रभावी होता है ।
वृष्टांत
सुलतानपुर मौजे में क , जो आठ आने के अंश का स्वामी है, और ख और ग, जो हर एक चार चार आने के स्वामी हैं उस मौजों का दो आना अंश यह विनिर्दिष्ट किए बिना घ को अन्तरित कर देते हैं कि उनके विभिन्न अंशों में किस में से यह अन्तरण किया गया है । उस अन्तरण को प्रभावी करने के लिए क के अंश से एक आना अंश और और ग के अंशों में से आध -आध आना अंश लिया जाएगा ।
अन्तरण द्वारा सृष्ट अधिकारों की पूर्विकता ।
48. जहा कि किसी व्यक्ति द्वारा भिन्न समयों पर अन्तरण द्वारा एक ही स्थावर सम्पत्ति में या पर अधिकार सृष्ट किया जाना तात्पयित है और ऐसे अधिकार सब अपने पूरे विस्तार तक. एक साथ अस्तित्वयुक्त या प्रयुक्त नहीं हो मकते वहां पश्चात् सुष्ट हर एक अधिकार पूर्वतर अन्तरितियों को बाध्य करने बाली कोई विशेष संविदा या आरक्षण न हो तो पूर्व सष्ट अधिकारों के अध्यधीन रहेगा ।
बीमा पालिसी के अधीन अन्तरिती का अधिकार ।
49. जहां कि स्थावर सम्पत्ति प्रतिफलार्थ अन्तरित की जाती है और अन्तरण की तारीख को ऐसी सम्पत्ति या उसका कोई भाग हानि या नुकसान के लिए, जो अग्नि से हो, बीमाकृत है , वहां तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो अन्तरिती ऐसी हानि या नुक़सान की दशा में यह अपेक्षा कर सकेगा कि कोई भी धन , जो अन्तरक को उस पालिसी के अधीन वास्तव में प्राप्त होता है या उसका उतना भाग , जितना आवश्यक हो, उस सम्पत्ति के यथापूर्वकरण में लगाया जाए । 827 G. of I. 4 .
234
भारत का राजपत्र असाधारण
[भानें 2
त्रुटियुक्त हक्त के अधीन धारक को सद्भावपूर्वक दिया गया भाटक ।
50. किसी भी व्यक्ति पर किसी स्थावर सम्पति के ऐसे भाटकों या लाभों का प्रभार न डाला जा सकेगा जो उसने सद्भावपूर्वक किसी ऐसे व्यक्ति को दे दिए हैं या परिदत्त कर दिए हैं, जिसमे उसने ऐमी सम्पत्ति को सद्भावपूर्वक धारित कर रखा था यद्यपि पीछे यह प्रतीत हो कि वह व्यक्ति, जिसे ऐसा संदाय या परिदान किया गया था , ऐमे भाटकों या लाभों को प्राप्त करने का अधिकार नहीं रखता था ।
व को क एक खेत 50 रुपये भाटक पर देता है और फिर खेत ग को अन्तरित करता है । व अन्तरण की कोई सूचना न रखते हुए सद्भावपूर्वक क को भाटक दे देता है । ख इस प्रकार दिए गए भाटक से प्रभार्य नही है ।
के त्रुटियुक्त हक़ों अधीन सभाषपूर्वक धारकों द्वारा की गई श्रभि- बृद्धियां ।
51. जब कि स्थावर सम्पत्ति का श्रन्तरिती सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि उस पर उसका आत्यन्तिक एक है सम्पत्ति में अभिवृद्धि करता है , किन्तु पीछे बेहतर हक़ रखने वाले किसी व्यक्ति द्वारा बहू उसने बेदखल कर दिया जाता है तब बेदखन करने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षा करने का अन्तरिती को अधिकार है कि वह या तो अभिवृद्धि के मूल्य को प्राक्कलित कराए और उसे अन्तरिती को दिलाए या प्रतिभूत कराए अथवा अपने उस हित को , जो उस सम्पत्ति में उसे हो , ऐमी अभिवृद्धि के मूल्य को दृष्टि में लाए बिना अन्तरिती को तत्कालीन बाजार भाव पर बेच दे ।
जो रक़म ऐसी अभिवृद्धि के लिए दी जानी या प्रतिभूत की जानी है वह बेदखली के समय का उसका प्राक्कलित मूल्य होगी ।
जब कि अन्तरिती ने उस सम्पत्ति में पूर्वोक्त परिस्थितियों के अधीन ऐसी फ़सल लगाई या बोई हो, जो उसके वहां से बेदखल होने के समय उगी हुई है , तब वह ऐसी फ़सलों का और उन्हें एकत्रित करने और ले जाने के लिए सम्पत्ति पर अबाध रूप से आने जाने का हक़दार है ।
सम्पत्ति सम्बन्धी वाद के लंबित रहते हुए सम्पत्ति का अन्तरण ।
52. जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़ कर भारत की सीमाओं के अन्दर प्राधिकारवान् या केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी सीमाओं के परे स्थापित किसी न्यायालय में ऐसे वाद या कार्यवाही के लम्बित रहते हुए , जो दुस्संधिपूर्ण न हो और जिसमें स्थावर सम्पत्ति का कोई अधिकार प्रत्यक्षतः और विनिदिष्टतः प्रश्नगत हो, वह सम्पत्ति उस वाद या कार्यवाही के किसी भी पक्षकार द्वारा उस न्यायालय के प्राधिकार के अधीन और एसे निबन्धनों के साथ , जैसे वह अधिरोपित करे, अन्तरित या व्ययनित की जाने के सिवाय ऐसे अन्तरित या अन्यथा व्ययनित्त नहीं की जा सकती कि उस के किसी अन्य पक्षकार के किसी डिक्री या आदेश के अधीन , जो उस में दिया जाए, अधिकारों पर प्रभाव पड़े ।
स्पष्टीकरण-किसी वाद या कार्यवाही का लम्बन इस धारा के प्रयोजनों के लिए उस तारीख से प्रारम्भ हुआ समझा जाएगा जिन तारीख़ को सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय में वह वादपन्न प्रस्तुत किया गया या बह कार्यवाही संस्थितकी गई और तब तक चलता हुआ समझा जाएगा जब तक उस वाद या कार्यवाही का निपटारा अन्तिम डिक्री या आदेश द्वारा न हो गया हो और ऐसी 235
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1 क]
डिक्री या भादेश की पूरी तुष्टि या उन्मोचन अभिप्राप्त न कर लिया गया हो या तत्समय प्रवृत्त- विधि द्वारा उस के निष्पादन के लिए विहित किसी अवधि के अवमान के कारण वह अनभिप्राप्य न हो गया हो ।
कपटपूर्ण अन्तरण ।
53. ( 1 ) स्थावर सम्पत्ति का हर एक ऐसा अन्तरण , जो अन्तरक के लेनदारों को विफल करने या उन्हें देरी कराने के आशय से किया गया है , ऐसे किसी भी लेनदार के विकल्प पर शून्यकरणीय होगा जिसे इस प्रकार विफल या देरी कराई गई है ।
इस उपधारा की कोई भी बात किसी सद्भावपूर्ण सप्रतिफल अन्तरिती के अधिकारों का लास न करेगी ।
इस उपधारा की कोई भी बात दिवाला सम्बन्धी किसी तत्समय प्रवृत्त- विधि पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
वह बाद , जो किसी लेनदार ने ( जिस शब्द के अन्तर्गत डिक्रीदार आता है चाहे उस ने अपनी डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन किया हो या नहीं ) किसी अन्तरण को इस आधार पर शून्य कराने के लिए संस्थित किया है कि वह श्रन्तरण अन्तरक के लेनदारों को विफल करने या उन्हें देरी कराने के आशय से किया गया है उन सब लेनदारों की ओर से या के फ़ायदे के लिए संस्थित किया जाएगा ।
( 2 ) स्थावर सम्पत्ति का हर एक ऐसा अन्तरण , जो पाश्विक अन्त- रिती को कपटबंचित करने के आशय से प्रतिफल के बिना किया गया है, ऐसे अन्तरिती के विकल्प पर शून्यकरणीय होगा ।
प्रतिफल के बिना किया गया कोई अन्तरण इस धारा के प्रयोजनों के लिए केवल इस कारण से ही कपटबंधित करने के भ्राशय में किया गया न समझा जाएगा कि कोई पाश्चिक अन्तरण प्रतिफलार्थ किया गया था ।
भागिक पालन ।
53 क . जहां कि कोई व्यक्ति किमी स्थावर सम्पत्ति को प्रतिफलार्थ अम्तरित करने के लिए अपने द्वारा या अपनी ओर से हस्ताक्षरित लेख- बद्ध ऐसी संविदा करता है जिससे उस अन्तरण को गठित करने के लिए आवश्यक निबन्धन युक्तियुक्त निश्चय के साथ अभिनिश्चित किए जा सकते हैं,
और अन्तरिती ने संविदा के भागिक पालन में उस सम्पत्ति या उसके किसी भाग का क़ब्ज़ा ले लिया है या अन्तरिती , जिसका क़ब्ज़ा पहले से ही है , संविदा के भागिक पालन में अपना क़ब्ज़ा चालू रखता है और उस संविदा को अग्रसर करने के लिए कोई कार्य कर चुका है ,
और अन्तरिती संविदा के अपने भाग का पालन कर चुका है , या पालन करने के लिए रजामन्द है , 236
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
वहां इस बाप्त के होते हुए भी कि संविदा , यद्यपि उसका रजिस्ट्रीकरण अपेक्षित है , रजिस्ट्रीकृत नहीं की गई है या जहां कि अन्तरण की कोई लिखत है, वहां वह अन्तरण किसी तत्समय प्रवृप्त- विधि द्वारा उस के लिए विहित रीति से पूरा नहीं किया गया है , अन्तरक या उस से व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाला कोई व्यक्ति अन्तरिती या उस से व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध उस सम्पत्ति के विषय में , जिस पर अम्तरिती ने क़ब्ज़ा ले लिया है या चालू रखा है , कोई भी ऐसा अधिकार , जो उस संविदा के निबन्धनों द्वारा अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित अधिकार से भिन्न है , प्रवर्तित कराने से विजित होगा,
परन्तु इस धारा की कोई भी बात ऐसे सप्रतिफल अन्तरिती के अधिकारों पर प्रभाव नहीं डालेगी जिसे उस संविदा या उस के भागिक पालन की कोई सूचना न हो ।
अध्याय 3
स्थावर सम्पति के विक्रयों के विषय में
'विक्रय' की परि- भाषा ।
54. " विक्रय" ऐसी क़ीमत के बदले में स्वामित्व का अन्तरण है जो दी जा चुकी हो , या जिसके देने का वचन दिया गया हो या जिस का कोई भाग दे दिया गया हो और किसी भाग के देने का वचन दिया गया हो ।
विक्रय कैसे किया जाता है ।
ऐसा अन्तरण एक सौ रुपये और उस से अधिक के मूल्य की मूर्त स्थावर सम्पत्ति की दशा में , या किसी उत्तर - भोग या अन्य अमूर्त वस्तु की दशा में केवल रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया जा सकता है ।
एक सौ रुपये से कम मूल्य की मूर्त स्थावर सम्पत्ति की दशा में एसा अन्तरण या तो रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा या सम्पत्ति के परिदान द्वारा किया जा सकेगा ।
मूर्त स्थावर सम्पत्ति का परिदान तब हो जाता है जब विक्रेता क्रेता का या क्रेता द्वारा निविष्ट व्यक्ति का सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा करा देता है ।
विक्रय - संबिदा ।
स्थावर सम्पत्ति की विक्रय - संविदा यह संविदा है कि उस स्थावर सम्पत्ति का विक्रय पक्षकारों के बीच तय हुए निबन्धनों पर होगा ।
करती । वह स्वतः ऐसी सम्पत्ति में कोई हित या उस पर कोई भार सुष्ट नहीं
क्रेता और विक्रेता के अधिकार और दायित्व ।
55. तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो स्थावर सम्पत्ति का क्रेता और विक्रेता दमशः उन दायित्वों के अध्यधीन और उन अधिकारों से युक्त होंगे जोकि ठीक नीचे लिखे नियमों में , या उन में से ऐसों में , जो बेची गई सम्पत्ति को लागू हों, वर्णित हैं
( 1) विक्रेता आबद्ध है कि वह--
(क) उस सम्पत्ति में या विक्रेता के उस सम्पत्ति पर के हक़ में किसी ऐसी तात्त्विक त्रटि को , जिसे धिक्रेता जानता हो 237
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड कि]
और क्रेता नहीं जानता हो और क्रेता जिस का पता मामूली सावधानी से नही लगा सकता था , क्रेता को प्रकट करे,
(ख ) उम सम्पत्ति सम्बन्धी जो हक़ की दस्तावेजें विक्रेता के क़ब्ज़े या शक्ति में हों, उन सब को क्रेता को उस की प्रार्थना पर परीक्षा के लिए पेश करे ,
( ग) उस सम्पत्ति या उस पर के हक़ के बारे में क्रेता द्वारा उससे पूछे गए सभी सुसंगत प्रश्नों का उत्तर अपनी पूरी जानकारी मे दे ,
( घ ) कीमत की बाबत शोध्य रकम के 'मंदाय या निविदा पर सम्पत्ति का उचित हस्तांतरण-पत्र निष्पादित करे जबकि क्रेना उसे उचित समय और स्थान पर निष्पादन के लिए विक्रेता को निविदत्त करे ,
(ङ) विक्रय-संविदा और उस सम्पत्ति के परिदान की नारीत्रों के बीच उस सम्पत्ति को और उस पर के हर सम्बन्धी सब दस्तावेजों को , जो उसके कब्ज़े में हों , ऐसी सावधानी से रखें जैसी मामूली प्रज्ञा वाला स्वामी ऐसी स पत्ति और दस्तावेजों की रखता ,
(च) ऐसे अपेक्षित किए जाने पर क्रेला या तश्निदिष्ट व्यक्ति को उस सम्पत्ति पर ऐसा क़ब्जा दे जैमा सम्पत्ति की प्रकृति के अनुसार दिया जा सकता है ,
( छ) सम्पत्ति पर विक्रय की तारीख तक प्रोद्भूत शोध्य सब लोक प्रभारों और भाटक को , ऐसी सम्पत्ति पर सब विल्लंकमों पर के ब्याज को , जो ऐसी तारीख को शोध्य हो, वे और सिवाय उस दशा के जहां कि सम्पत्ति विल्लंकमों के अध्यधीन बेची गई हो सम्पत्ति पर उस समय वर्तमान सब विल्लंकमों को उन्मोचित कर दे ।
( 2) यह समझा जाएगा कि विक्रेता क्रेता से यह संविदा करता है कि वह हित , जिसे विक्रेता क्रेता को अन्तरित करने की प्रव्यंजना करता है, अस्तित्वयुक्त है और उसे अन्तरित करने की शक्ति विक्रेता रखता है,
परन्तु जहां कि विक्रय किसी व्यक्ति द्वारा अपनी वैश्वासिक हैसियत में किया जाता है , वहां यह समझा जाएगा कि वह व्यक्ति क्रेता से यह संविदा करता है कि विक्रेता ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया है जिस से सम्पत्ति विल्लंकित हो गई है या जिस से वह उसे अन्तरित करने मे प्रतिबाधित हो गया है ।
238
भारत का राजपक्ष असाधारण
[भाग 2
इस नियम में वर्णित संविदा का फ़ायदा अन्तरिती की हैसियत में उस अन्तरिती के हित के साथ उपाबद्ध रहेगा और जाएगा और ऐसे हर एक व्यक्ति द्वारा प्रतित कराया जा सकेगा जिस में समय - समय पर वह हित संपूर्णतः या उसका कोई भाग निहित हो ।
( 3 ) जहां कि विक्रेता को पूर्ण क्रय -धन दे दिया गया है, वहां वह क्रेता को सम्पत्ति से सम्बन्धित सब ऐसी हक़ की दस्तावेजों का भी परिदान करने के लिए आबद्ध है , जो विक्रेता के क़ब्ज़े या शक्ति में हों,
परन्तु ( क ) जहां कि विक्रेता ऐसी दस्तावेजों में समाविष्ट सम्पत्ति के किसी भाग को अपने पास प्रतिधृत करता है , वहां वह उन सब दस्तावेजों का प्रतिधारण करने का हक़दार है , और ( ख ) जहां कि ऐसी सम्पूर्ण सम्पत्ति विभिन्न क्रेताओं को बेची जाती है , वहां सर्वाधिक मूल्य वाले टुकड़े का क्रेता उन वस्तावेजों का हक़दार है । किन्तु ( क ) दशा में विक्रेता और ( ख ) दशा में सर्वाधिक मूल्य वाले टुकड़ों का क्रेता , यथास्थिति , क्रेता की या अन्य क्रेताओं में से किसी एक की हर युक्तियुक्त प्रार्थना पर और प्रार्थना करने वाले व्यक्ति के खर्चे पर उक्त वस्ता- वेजों को पेश करने और उन की ऐसी सही प्रतियां या उन में से ऐसे उद्धरण , जैसों की यह अपेक्षा करे , देने के लिए आबद्ध है और इस बीच यथास्थिति विक्रेता या सर्वाधिक मूल्य वाले टुकड़े के क्रेता को उक्त दस्तावेजें , यदि यह ऐसा करने से अग्नि या अनिवार्य दुर्घटना द्वारा निवारित न हो जाए , सुरक्षित, अरद्द और अविरूपित रखनी होंगी ।
(4) विक्रेता हरुदार है-
(क ) सम्पत्ति के तब तक के भाटकों और लाभों का जब तक उसका स्वामित्व क्रेता को संक्रान्त न हो जाए ,
( ख ) जहां कि सम्पत्ति का स्वामित्व , पूरा क्रय- धन दिए जाने के पूर्व , क्रेता को संक्रान्त हो गया है वहां क्रय - धन की रकम या उस के अमंदत्त शेष भाग के लिए और उस तारीख मे. जिस को कब्ज़ा परिदान किया गया है , ऐसी रकम या भाग पर ब्याज के लिए क्रेता या किसी भी अप्रति- फल अन्तरिती या क्रय धन के असंदाय की सूचना रखने वाले किसी अन्तरिती के हाथ में की उस सम्पत्ति पर भार का ।
( 5) क्रेता आबद्ध है कि वह
( क ) सम्पत्ति में विक्रेता के हित की प्रकृति या विस्तार के बारे में ऐसा तथ्य, जिसे क्रेता जानता है किन्तु जिसे उस के पास यह विश्वास करने का कारण है कि विक्रेता नहीं भारत का राजपत्र असाधारण
239 खण्ड 1 फ]
जानता है और जिससे ऐसे हित के मूल्य में तात्त्विक वृद्धि होती है , विक्रेता को प्रकट करे,
(ख ) विक्रय के पूरण के समय और स्थान पर विक्रेता या तन्निदिष्ट व्यक्ति को क्रय - धन का संदाय या निविदा करे परन्तु जहां कि सम्पत्ति विल्लंकमों से मुक्त बेचीं जाती है , वहां विक्रय की तारीख पर सम्पत्ति पर वर्तमान किन्हीं विल्लंकमों की रकम क्रेता क्रय-धन में से प्रति- धारित कर सकेगा , और इस प्रकार प्रतिधारित रकम का संदाय उन व्यक्तियों को करेगा जो उस के लिए हक़- दार हैं,
( ग ) जहां कि सम्पत्ति का स्वामित्व क्रेता संक्रान्त हो गया है, वहां सम्पत्ति के ऐसे नाश, ऐसी क्षति या मूल्य में ऐसी गिरावट से, जो विक्रेता द्वारा कारित न हो, उद्धृत किसी हानि को सहे ,
( घ ) जहां कि सम्पत्ति का स्वामित्व क्रेता को संक्रान्त हो गया है वहां , जहां तक कि उस का और विक्रेता के बीच का सम्बन्ध है, वे सब लोक प्रभार और भाटक , जो उस सम्पत्ति के बारे में देय हो जाएं , और जिन किन्हीं विल्लंकमों के अध्यधीन सम्पत्ति बेची गई है उन मद्धे शोध्य मूलधन और उन पर तत्पश्चात् प्रोद्भवमान शोध्य याज दे
( 6 ) क्रेता हक़दार है-
(क) जहां कि सम्पत्ति का स्वामित्व उस को संक्रान्त हो गया है, वहां सम्पत्ति में किसी अभिवृद्धि का या उस सम्पत्ति के मूल्य में वृद्धि का फ़ायदा उठाने का और उस के भाटकों भौर लाभों का ,
( ख ) जब तक कि उस ने सम्पत्ति का परिदान प्रतिगृहीत अनुचित रूप से इन्कार न कर दिया हो, विक्रेता और उसने व्युलन्न श्रधिकाराधीन दावा करने वाले सब व्यक्तियों के विरुद्ध सम्पत्ति में विक्रेता के हित के विस्तार तक किसी क्रय- धन की उस रकम का, जो क्रेता ने परिदान की पूर्वाशा में उपयुक्त रूप से दे दी हो और ऐसी रकम पर व्याज का भार उस सम्पत्ति पर डालने का तथा जब कि उस ने परिचान प्रति- गृहीत करने के लिए उपयुक्त रूप से इन्कार कर दिया हो तब अग्रिम धन का भी , यदि कोई हो, भार और संविदा का विनिर्दिष्ट पालन कराने के या उस के विखंडनार्थ डिक्री अभिप्राप्त करने के बाद के उस के पक्ष में अधि- निर्णीत खर्चे का भी , यदि कोई हों, भार उस सम्पत्ति पर डालने का ।
240
भारत को राजपत्र प्रसाधारण
[भाग 2
जिन बातों के प्रकट करने का इस धारा के पैरा ( 1 ) खंड (क) और पैरा ( 5 ) खंड ( क ) में वर्णन है , उन के प्रकट करने का लोप करना कपटपूर्ण है ।
पाश्विक द्वारा क्रसबन्धन ।
56. यदि दो या अधिक सम्पत्तियों का स्वामी उन्हें एक व्यक्ति के पास बन्धक रख देता है और फिर उन सम्पत्तियों में से एक या अधिक को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच देता है तो तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में क्रेता उक्त बन्धक ऋण को उसे न बेची गई या स पत्ति या स पत्तियों से , जहां तक कि उससे या उन से उसकी तुष्टि हो सकती है, तुष्टि कराने का हक़दार है किन्तु इस प्रकार नहीं कि उससे बन्धकदार के या उसने व्युत्पन्न अधिकाराधीन दावा करने वाले व्यक्तियों के या उक्त सम्पत्तियों में से किसी में प्रतिफलार्थ हित अर्जित करने वाले किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े ।
विक्रय पर विल्लंकमों का उन्मोजन
57. ( क ) जहां कि स्थावर सम्पत्ति , जो किसी विल्लंकम के , चाहे वह सुरन्त देय हो या नहीं, अध्यधीन है, किसी न्यायालय द्वारा या किसी डिक्री के निष्पादन में या न्यायालय से बाहर बेची जाती है, वहां विक्रय के किसी पक्षकार के आवेदन पर न्यायालय , यदि वह ठीक समझे-
विल्लंकमों और उन मे मुक्त विक्रय के लिए न्यायालय द्वारा उपबन्ध ।
( 1) उस सम्पत्ति पर भारित वार्षिक या मासिक राशि, या उस सम्पत्ति में के अवधारणीय हित पर भारिप्त मूलधन की दशा में-इतनी रकम , जितनी न्यायालय समझे कि केन्द्रीय सरकार की प्रतिभूतियों में विनिहित किए जाने पर उन के ब्याज के सहारे वह उस भार को नीचा रखने या उस के लिए अन्यथा उपबन्ध करने को पर्याप्त होगी , तथा
( 2) उस सम्पत्ति पर भारित मूलधन की किसी अन्य दशा में उस विल्लंकम को और उस पर शोध्य ब्याज को चुकाने के लिए पर्याप्त रकम,
न्यायालय में जमा किए जाने के लिए निदेश या अनुज्ञा दे सकेगा ।
किन्तु इन दोनों दशाओं में से हर एक में इतनी अतिरिक्त रकम भी , जितनी के बारे में न्यायालय समझता है कि वह सम्भावित अतिरिक्त खर्चा , व्ययों और ब्याज के लिए और विनिधानों के अवक्षय के सिवाय किसी अन्य श्राकस्मिकता के लिए भुगतान करने को पर्याप्त होगी और जो मूल रकम के दशमांश से तब के सिवाय अधिक न होगी जबकि न्यायालय विशेष कारणों के लिए, जिन्हें बह श्रभिलिखित करेगा , यह ठीक समझता हो कि दशमांश से अधिक अतिरिक्त रकम अपेक्षित की जाए , न्यायालय में जमा की जाएगी ।
(ख ) तदृपरि न्यायालय , यदि वह ठीक समझे तो , और विल्लकंमदार को सूचना देने के पश्चात्, जब तक कि न्यायालय विल्लंकमदार को ऐसी सूचना का दिया जाना लिखित रूप से अभिलिखित किए जाने वाले कारणों के लिए अभिमुक्त न कर दे , सम्पत्ति को विल्लंकम से मुक्त घोषित कर सकेगा और ऐसा हस्त न्तरण- आदेश या निधान- आदेश , जो विक्रय को प्रभाषी करने के लिए उपयुक्त हो , दे सकेगा और न्यायालय में जमा धन के प्रतिधारण और विनिधान के लिए निवेश दे सकेगा ।
241
भारत की राजपत्न असाधारण
खण्ड 1 क)
( ग ) न्यायालय में के उस धन या निधि में हित या पर हक़ रखने वाले व्यक्तियों पर सूचना की तामील होने के पश्चात् न्यायालय ऐसे व्यक्तियों को उसके दिए जाने या अन्तरित किए जाने के लिए निदेश दे सकेगा जो उसे प्राप्त करने या उसके लिए उन्मोचन देने के हकदार हैं और साधारणतया उस मूलधन या उसकी आय के उपयोजन या वितरण के बारे में निदेश दे सकेगा ।
(घ) इस धारा के अधीन की गई किसी घोषणा , आदेश या निदेश के विरुद्ध अपील उसी प्रकार होगी मानो वह डिक्री हो ।
(ङ) इस धारा में न्यायालय से अभिप्रेत है ( 1 ) अपने मामूली या गैरमामूली आरम्भिक सिविल अधिकारिता का प्रयोग करता हुआ उच्च न्यायालय ( 2 ) जिला न्यायाधीश का न्यायालय जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर सम्पत्ति या उसका कोई भाग स्थित है, ( 3 ) अन्य कोई न्यायालय , जिसे समय समय पर राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधि सूचना द्वारा इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए सक्षमं घोषित करे ।
अध्याय 4
स्थावर सम्पत्ति के बन्धकों और भारों के विषय में
58. ( क ) बन्धक विनिर्दिष्ट स्थावर सम्पत्ति में के किसी हित का वह श्रन्तरण है जो उधार के तौर पर दिए गए या दिए जाने वाले धन के संदाय को या वर्तमान या भाषी ऋण के संदाय को या ऐसे वचनबन्ध का पालन , जिससे धन सम्बन्धी दायित्व पैदा हो सकता है, प्रतिभूत करने के प्रयोजन से किया जाता है ।
" बन्धक" , " बन्धक कर्ता" , " बन्धक- दार" , " बन्धक धन " और " बन्धक विलेख " की परिभाषा ।
अन्तरक बन्धककर्ता और अन्तरिती बन्धकदार कहलाता है , मूल धन और ब्याज, जिन का संदाय तत्समय प्रतिभूत है , बन्धकधन कहलाते हैं और वह लिखत , ( यदि कोई हो ) जिसके द्वारा अन्तरण किया जाता है बन्धक विलेख कहलाती है ।
सादा बन्धक ।
(ख) जहां कि बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति का कब्जा परिवत्त किए बिना बन्धक धन चुकाने के लिए अपने को व्यक्तितः आबद्ध करता है और अभिव्यक्त या विवक्षित तौर पर क़रार करता है कि उस संविदा के अनुसार संदाय करने में उसके असफल रहने की दशा में बन्धकदार को बन्धक सम्पत्ति का विक्रय कराने का और विक्रय के श्रागमों को , जहां तक वह आवश्यक हो. बन्धक धन के संदाय में उपयोजित कराने का अधिकार होगा , वहां वह संव्यवहार सादा बंधक और बन्धकदार सादा बन्धकदार कहलाता है ।
( ग) जहां कि कोई बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति को वृश्यतः बेच देता है , सशर्त विक्रय द्वारा बम्धक ।
इस शर्त पर कि किसी निश्चित तारीख को बन्धक धन के संदाय में व्यतिक्रम होते ही विक्रय आत्यन्तिक हो जाएगा, अथवा 827 G of I.-5 .
242
भारत का राजपत्न असाधारण
[भाग 2
इस शर्त पर कि ऐसा संदाय किए जाने पर विक्रय शून्य हो जाएगा , अथवाः
इस शर्त पर कि ऐसा संदाय किए जाने पर क्रेता वह सम्पत्ति विक्रेता को अन्तरित कर देगा,
वहीं ऐसा संव्यवहार सशर्त विक्रय द्वारा बन्धक और बन्धकवार सशर्त विक्रय द्वारा बन्धकदार कहलाता है ।
परन्तु ऐसा कोई भी संव्यवहार बन्धक नहीं समझा आएगा जब तक कि वह शर्त उस दस्तावेज़ में सन्निविष्ट न हो जिससे विक्रय किया गया है या किया जाना तात्पयित है ।
भोग-बन्धक ।
(घ ) जहां कि बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति का क़ब्ज़ा बन्धकवार को परिदत्त कर देता है या परिवत्त करने के लिए अपने को अभिव्यक्त या विवक्षित तौर पर आबद्ध कर लेता है और उसे प्राधिकृत करता है कि बन्धक धन का संदाय किए आने तक वह ऐसा क़ब्जा प्रतिधृत करे और उस सम्पत्ति से प्रोदूभूत भाटकों और लाभों को या ऐसे भाटकों और लाभों के किसी भाग को प्राप्त करे और उन्हें ब्याज मद्धे या बन्धक धन के संदाय में , या भागतः ब्याज मद्धे और भागतः बन्धक- धन के संदाय में , विनियोजित कर ले , वहां वह संव्यवहार भोग-बन्धक और वह बन्धकदार भोग बन्धकदार कहलाता है ।
अंग्रेजी बन्धक ।
( ङ) जहां कि बन्धककर्ता बन्धकधन का प्रतिसंदाय निश्चित तारीख को करने के लिए अपने को आबद्ध करता है और बन्धक सम्पत्ति को बन्धकदार को आत्यन्तिक रूप से किन्तु इस परन्तुक के अध्यधीन अन्तरित करता है कि क़रार के अनुसार बन्धक धन के संदाय पर बन्धकदार उसे बन्धककर्ता को प्रति- अन्तरित कर देगा , वहां वह संव्यवहार अंग्रेज़ी बन्धक कहलाता है ।
हक़-विलेखों के निक्षेप द्वारा बन्धक ।
(च) जहां कि कोई व्यक्ति निम्नलिखित नगरों, अर्थात् कलकत्ता, मद्रास और मुम्बई नगरों में से किसी में और किसी भी अन्य नगर में, जिसे संपृक्त राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, किसी लेनदार को या उसके अभिकर्ता को स्थावर सम्पत्ति की हक़ की दस्तावेजों को, उस सम्पत्ति पर प्रतिभूति सृष्ट करने के आशय से परिदत्त करता है , वहां वह संव्यवहार हक़ -विलेखों के निरोप द्वारा बन्धक कहलाता है ।
विलक्षण बन्धक ।
( छ) जो बन्धक इस धारा के अर्थ में सादा बन्धक , सशर्त विक्रय द्वारा बन्धक, भोग बन्धक , अंग्रेजी बन्धक या हक़ विलेखों के निक्षेप द्वारा बन्धक नहीं है, वह विलक्षण बन्धक कहलाता है ।
59. जहां कि प्रतिभूत मूलधन सौ रुपये या उससे अधिक है, वहां वह बन्धक, जो हक़ विलेखों के निक्षेपों द्वारा बन्धक से भिन्न है, बन्धककर्ता द्वारा हस्ताक्षरित और कम से कम दो साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा ही किया जा सकेगा ।
बन्धक कब हस्तान्तरण पत्त्र द्वारा किया जाना चाहिए ।
जहां कि प्रतिभूत मूलधन सौ रुपये से कम है वहां बन्धक या तो उपर्युक्त जैसे हस्ताक्षरित और अनुप्रमाणित रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा या ( सिवाय सादा बन्धक की दशा में के ) सम्पत्ति के परिधान द्वारा किया जा सकेगा ।
5.फ. जब तक कि अभिव्यक्त तौर पर अन्यथा उपबंधित न हो, इस भरबाय में बम्धककर्ताओं और बन्धकदारों के प्रति निर्देशों के अन्तर्गत क्रमशः उन व्यक्तियों के प्रत्ति भी निर्देश समझे जाएंगे जिन्हें उनसे हक़ व्युत्पन्न हुआ है ।
बन्धककर्ताओं और बन्धकदारों के प्रति निर्देशों के अन्तर्गत वे व्यक्ति भी हैं जिन्हें उन से हक़ व्युत्पन्न हुआ है ।
बन्धककर्ता के अधिकार और वायित्व
मोचन करने का बन्धककर्ता का अधिकार ।
80. मूलधन के शोध्य हो जाने के पश्चात् किसी भी समय बन्धककर्ता का बन्धकधन को उपयुक्त समय और स्थान में देने या निविदत्त करने पर यह अधिकार होता है कि वह बन्धकदार से अपेक्षा करे कि यह (क ) बन्धककर्ता को बन्धक विलेख और बन्धक सम्पत्ति से सम्बन्धित ऐसी सब दस्तावेजों का परिधान करे जो बन्धकदार के क़ब्ज़े में या शक्ति में हों ( ख ) जहां कि बन्घकदार बन्धक- सम्पत्ति पर कब्जा रखता है वहां बन्धककर्ता को उस पर क़ब्ज़ा परिदत्त करे और (ग) बन्धककर्ता के खर्च पर या तो बन्धक सम्पत्ति उस को या एसे अन्य व्यक्ति को, जिसे वह निदेशित करे, प्रति- अन्तरित करे या यह लेखबद्ध अभिस्वीकृति किऐसा कोई अधिकार, जो बन्धककर्ता के उस हित का अल्पीकरण करता है जो बन्धकदार को अन्तरित किया गया है , निर्वापित हो गया है निष्पादित करे और (जहां कि बन्धक रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया गया है ) रजिस्ट्रीकृत कराए ।
परम्तु यह तब जब कि इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार, पक्षकारों के कार्य द्वारा या न्यायालय की डिक्री द्वारा निर्वापित न हो चुका हो ।
इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार मोचन अधिकार 'कहलाता है भौर उसे प्रवर्तित कराने का वाद मोधन बाद कहलाता है ।
इस धारा की कोई भी बात ऐसे किसी उपबन्ध को प्रविधिमान्य कर देने वाली न समझी जाएगी जिसका यह प्रभाव है कि यदि वह समय निकल जाने दिया गया है जो मूलधन के संदाय के लिए नियत है या यदि ऐसा कोई समय मियत नहीं किया गया है तो बन्धकदार ऐसे धन के संदाय या निविदा से पहले युक्तियुक्त सूचना पाने का हक़दार होगा ।
बन्धक सम्पत्ति के भाग का मोचन ।
इस धारा की कोई भी बात बन्धक सम्पत्ति के अंश में ही हितबद्ध किसी व्यक्ति को बन्धक मद्धे अवशिष्ट शोध्य रकम के आनुपातिक भाग के संदाय पर अपने ही अंश का मोचन कराने का हक़दार नहीं बनाएगी केवल वहां के सिवाय जहां कि बन्धकदार ने या यदि एक से अधिक बन्धकदार है तो ऐसे सब बन्धकारों ने बम्धककर्ता के उस भ्रंश को पूर्णतः या भागतः अर्जित कर लिया है ।
60क. ( 1 ) जहां कि बन्धककर्ता मोचन के लिए हक़दार है , वहा उन किन्हीं भी शर्तों की पूर्ति पर , जिनकी पूर्ति पर वह प्रति - अन्तरण कराने की अपेक्षा करने का हक़दार हो जाता है , वह बन्धकदार से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस सम्पत्ति को प्रति- अन्तरित करने के बजाय ऐसे अन्य व्यक्ति को , जिसे बन्धककर्ता निदिष्ट करे , बन्धक ऋण समनुदेशित करे और बन्धक सम्पत्ति अन्तरित करे , तथा बन्धकदार तदनुसार समनुदेशन और अन्तरण करने के लिए आबद्ध होगा ।
बन्धककर्ता को प्रति- अम्तरण करने के बजाय किसी तृतीय पक्षकार को करने भन्तरण की बाध्यता ।
( 2 ) इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार बन्धककर्ता और विल्लंकमदार के होंगे और किसी मध्यवर्ती विल्लंकम के होते हुए भी बन्धककर्ता द्वारा या किसी भी विल्लंकमदार द्वारा प्रवर्तित कराए जा सकेंगे , किन्तु किसी विल्लंकमदार द्वारा की गई अपेक्षा बन्धककर्ता द्वारा की गई अपेक्षा पर अभिभावी होगी और जहां तक विल्लकमदारों के बीच का सम्बन्ध है परस्पर पूर्विक विल्लंकमदारों की अपेक्षा पाश्चिक विल्लंकमदारों की अपेक्षा पर अभिभावी होगी ।
( 3 ) इस धारा के उपबन्ध उस बन्धकवार के बारे में लागू नहीं होते जिसका क़ब्यता है या रहा है ।
बस्तावेजों के निरीक्षण और पेश कराने का अधिकार ।
60ख. बन्धककर्ता का उस समय तक , जब तक उसका मोचन अधिकार बना रहता है , यह हक़ होगा कि बन्धक सम्पत्ति संबंधी जो हक़ की दस्तावजे बन्धकदार की अभिरक्षा या शक्ति में हैं, उनका निरीक्षण और उनकी प्रतियां या संक्षिप्तियां या उन में से उद्धरण सब युक्तियुक्त समयों पर अपनी प्रार्थना और अपने खर्च पर और बन्धकदार के तन्निमित्त खचों और व्ययों को देकर कर ले ।
61. यह बन्धककर्ता, जिस ने दो या अधिक बन्धक एक ही बन्धकदार के पृथक्तया या साथ- का अधिकार । साथ मोचन कराने पक्ष में निष्पादित कर दिए हैं , तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो उस समय , जब उन बन्धकों में से वो या अधिक बन्धकों का मूलधन शोध्य हो गया हो , ऐसे किसी एक बन्धक का पृथक्तः या ऐसे बन्धकों में से एक साथ ही वो या अधिक बन्धकों का मोचन कराने का हक़दार होगा ।
62. भोग- बन्धक की दशा में बन्धककर्ता को यह अधिकार है कि यह बन्धक- विलेख और बन्धक सम्पत्ति सम्बन्धी सब दस्तावेजों के सहित, जो बन्धकवार के कब्जे या शक्ति में हों उस सम्पत्ति के क़ब्जे का प्रत्युद्धरण कर ले-
कन्या प्रत्युद्धरण का भोग बन्धक- कर्ता का प्रधि काए ।
(क ) जहां कि बन्धकदार सम्पत्ति के भाटकों और लाभों से बन्धकधन का भुगतान स्वयं कर लेने के लिए प्राधिकृत है वहां तब जब ऐसे धन का भुगताम हो गया हो,
(ख ) जहां कि बन्धकदार ऐसे भाटकों और लाभों से या उनके किसी भाग से बन्धक धन के केवल किसी भाग का भुगतान स्वयं कर लेने के लिए प्राधिकृत है , वहां तब जब बन्धक धन के संदाय के लिए विहित कालावधि का ( यदि कोई हो ) अवसान हो गया हो और बन्धककर्ता बम्धक धन या उसका कोई अतिशेष बन्धकदारों को दे दे या निविदत्त कर दे या जैसा कि एतस्मिन् पश्चात् उपबन्धित है , न्यायालय में निक्षिप्त कर दे ।
बन्धक सम्पत्ति में अनुवृद्धि ।
63. जहां कि बन्धकदार के क़ब्ज़े में की बन्धक सम्पत्ति में अनुवृद्धि बन्धक चालू रहने के दौरान में होती है , वहां तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो मोचन किए जाने पर बन्धकदार के प्रतिमुख बन्धककर्ता ऐसी अनुवृद्धि का हक़दार होगा ।
स्वा- अन्तरित मित्व के आधार पर अर्जित अनुवृद्धि ।
जहां कि ऐसी अनुवृद्धि बन्धकदार के व्यय से अर्जित की गई है , और मूल सम्पत्ति का श्रपाय हुए बिना पृथक् कब्जे या उपभोग के योग्य है, वहां उस अनुवृद्धि को लेने की वांछा करने वाला बन्धककर्ता उसे अर्जित करने का व्यय बन्धकदार को देगा । यदि ऐसा पृथक कब्ज़ा या उपभोग सम्भव न हो तो वह अनुवृद्धि , सम्पत्ति के साथ , परिदत्त करनी होगी और बन्धककर्ता दायी होगा कि ऐसी दशा में , जब उस सम्पत्ति को नाश , समपहरण या विक्रय से परिरक्षित रखने के लिए अर्जन आवश्यक हो , या ऐती दशा में , जब अर्जन बन्धककर्ता की अनुमति से किया गया हो, उस अर्जन में लगे उचित खर्चों को उन पर उसी दर से , जो मूलधन पर देय है , या जहां कि ऐसी कोई दर नियत नहीं की गई है , वहां ना प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज सहित मूलधन में जोड़कर दे ।
अन्तिम वर्णित दशा में अनुवृद्धि से उत्पन्न होने वाले लाभ , यदि कोई हों, बन्धककर्ता के नाम जमा किए जाएंगे ।
जहां कि बन्धक भोग -बन्धक है और अनुवृद्धि बन्धकदार के व्यय स अर्जित की गई है, वहां अनुवृद्धि से उद्भूत लाभ, यदि कोई हों, तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो ऐसे व्यय किए गये धन पर देय ब्याज मद्धे , यदि कोई हो, मुजरा कर दिए जाएंगे ।
बन्धक सम्पत्ति में अभिवृद्धि।
63 फ. ( 1 ) जहां कि बन्धकदार के क़ब्ज़े में की बन्धक सम्पत्ति में अभिवृद्धि बन्धक के चालू रहने के दौरान में की गई है, वहां मोचन पर बन्धककर्ता तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो अभिवृद्धि का हक़दार होगा और बन्धककर्ता केवल उपधारा ( 2) में उपबन्धित मामलों को छोड़कर उसका खर्षा देने का दायी न होगा ।
( 2 ) जहां कि कोई ऐसी अभिवृद्धि बन्धकदार के खर्चे पर की गई थी और सम्पत्ति को नाश या क्षय से परिरक्षित करने के लिए आवश्यक थी या प्रतिभूति को अपर्याप्त होने से रोकने के लिए आवश्यक थी, या किसी लोकसेवक या लोक प्राधिकारी के विधिपूर्ण आदेश के अनुपालन में की गई थी, वहां तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो बन्धककर्ता दायी होगा कि अभिवृद्धि के उचित खर्चों को उसी दर से ब्याज सहित , जो मूलधन पर देय है, या जहां कि कोई ऐसी दर नियत नहीं है वहां नौ प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज सहित मूलधन में जोड़कर दे तथा उस अभिवृद्धि के कारण प्रोद्भवमान लाभ, यदि कोई हों, बन्धककर्ता के नाम जमा किए जाएंगे ।
बन्धकित पट्ट का नवीकरण ।
64. जोहो कि बन्धक सम्पत्ति पट्टा है और बन्धकदार उस पट्टे का नवीकरण अभिप्राप्त करता है , वहां बन्धककर्ता द्वारा तत्प्रतिकूल संविदा न की गई हो तो मोचन पर नवीन पद्धे का फ़ायदा उसे मिलेगा ।
बन्धककर्ता द्वारा
65. तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो यह समझा जाएगा कि बन्धककर्ता मे बन्धकदार से संविदा की है कि--
विवक्षित संवि- दाएं ।
(क) वह हित, जिसे बन्धककर्ता बन्धकदार को अन्तरित करने की प्रव्यंजना करता है, अस्तित्वयुक्त है , और उसे अन्तरित करने की शक्ति बन्धककर्ता को है ,
( ख ) बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति पर दन्धककर्ता के हक़ की प्रतिरक्षा करेगा या यदि बन्धकदार का उस पर क़ब्ज़ा है तो बन्धककर्ता उसे उस हक़ की प्रतिरक्षा करने के योग्य बनाएगा ,
( ग ) जब तक बन्धक सम्पत्ति पर बन्धकदार का क़ब्ज़ा नहीं है, तब तक सम्पत्ति की बाबत प्रोद्भवमान शोध्य सब लोक प्रभारों को बन्धककर्ता देगा,
(घ) और, जहां कि बन्धक सम्पत्ति पट्टा है, वहां उस पट्टे के अधीम देय भाटकों का संदाय , उसमें अन्र्तावष्ट शर्तों का पालन और पट्टेदार को आबद्ध करने वाली संविदाओं का अनुपालन बन्धक के प्रारम्भ होने तक का किया जा चुका है , तथा बन्धककर्ता उस समय तक, जब तक प्रतिभूति वर्तमान रहती है , और बन्धक- दार का क़ब्ज़ा बन्धक सम्पत्ति पर नहीं है , पट्टे द्वारा या यदि पट्टे का नवीकरण कराया जाए तो नवीकृत पट्टे द्वारा श्रारक्षित भाटक देगा , उसमें अन्तर्विष्ट शर्तों का पालन करेगा और पट्टेदार को आबद्ध करने वाली संविदाओं का अनुपालन करेगा और उक्त भाटक के असंदाय के या उक्त शर्तों और संविदाओं के अपालन या अननुपालन के कारण जो दावे बन्धकदार को भुगतने पड़ें , उन सब के लिए बन्धकदार की क्षतिपूर्ति करेगा,
( ङ) और जहां कि वह बन्धक उस सम्पत्ति पर द्वितीय या पाश्चिक विल्लंकम है वहां बन्धककर्ता हर एक पूर्विक विल्लंकम मद्धे प्रोद्भवमान शोध्य ब्याज , जैसे और जब वह शोध्य हो जाए , समय - समय पर देगा और ऐसे पूर्विक विस्लंकम मद्धे शोध्य मूलधन का भुगतान उचित समय पर करेगा ,
इस धारा में वणित संविदाओं का फ़ायषा बन्धकदार के अपमी उस हैसियत के हित के साथ उपाबद्ध होगा और जाएगा और ऐसे हर व्यक्ति द्वारा प्रवृत्त कराया जा सकेगा जिस में वह हित पूर्णतः या भागतः समय समय पर निहित हो ।
बन्धककर्ता की पट्टा करने की
65 फ. ( 1 ) . उपधारा ( 2 ) के उपबन्धों के अध्यधीन जब बन्धककर्ता का बन्धक सम्पत्ति पर विधिपूर्ण रूप से क़ब्ज़ा हो तब उस की यह शक्ति होगी कि उसे पट्टों पर दे दे , जो पट्टे बन्धकदार पर आबद्धकर होंगे ।
247
भारत का राजपत्न असाधारणं
खण्ड 1क]
( 2) ( क) हर ऐसा पट्टा ऐसा होगा जो सम्पृक्त सम्पत्ति के प्रबन्ध के मामली अनुक्रम में और किसी स्थानीय विधि , रूढ़ि या प्रथा के अनुसार किया जाता,
(ख ) हर ऐसे पट्टे में वह सर्वोत्तम भाटक आरक्षित होगा जो युक्तियुक्ततः अभिप्राप्त किया जा सकता हो और कोई भी प्रीमियम न तो विया जाएगा और न उस के लिए वचन दिया जाएगा तथा कोई भी भाटक अग्रिम देय नहीं होगा ।
होगी । (ग ) किसी भी ऐसे पट्टे में नवीकरण के लिए प्रसंविदा अन्तर्विष्ट नहीं
( घ ) हर ऐसा पट्टा ऐसी तारीख से प्रभावी होगा जो उस के लिए किए जाने की तारीख से छह मास से अधिक पश्चात् की न हो ,
(ङ) निर्माणों के पट्टे की दशा में , चाहे वे उस भूमि के, जिस पर ये स्थित हैं , सहित या बिना पट्टे पर दिए गए हों, पट्टे की अस्तित्वावधि किसी दशा में भी तीन वर्ष से अधिक की न होगी और पट्टे में भाटक देने के लिए प्रसंविदा और उसमें विनिविष्ट समय के भीतर भाटक न चुकाए जाने पर पुनः प्रवेश करने की शर्त अविष्ट होगी ।
(3) उपधारा ( 1 ) के उपबन्ध केवल तभी और वहीं तक लागू होते हैं जब और जहां तक कि बन्धक विलेख में कोई तत्प्रतिकूल आशय अभिव्यक्त न किया गया हो और उपधारा ( 2 ) के उपबन्धों में फेरफार या उन का विस्तारण बन्धक विलेख द्वारा किया जा सकेगा और इस प्रकार फेरफार किए गए या विस्तारित उपबन्ध यावत्शक्य वैसे ही प्रकार से और वैसी ही प्रसंगतियों, प्रभावों और परिणामों के सहित प्रतित होंगे , मानो ऐसे फेरफार या विस्तारण उस उपधारा में अन्तविष्ट हों ।
क़ब्ज़ारखने वाले बन्धककर्ता द्वारा दुर्भय ।
66. बन्धक सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा रखने वाला बन्धककर्ता सम्पत्ति का क्षय होने वेने के लिए बन्धकदार के प्रति दायी नहीं होगा किन्तु वह ऐसा कोई कार्य नहीं करैगा जो सम्पत्ति के लिए विनाशक या स्थायी रूप से क्षतिपूर्ण हो यदि प्रतिभूति अपर्याप्त हो या ऐसे कार्य द्वारा अपर्याप्त कर दी जाएगी ।
स्पष्टीकरण-- प्रतिभूति इस धारा के अर्थ में अपर्याप्त है जब तक बन्धक- सम्पत्ति का मूल्य बन्धक पर उस समय शोध्य रकम से एक तिहाई से , या यदि वह सम्पत्ति निर्माण है तो आधे से अधिक न हो ।
बन्धकवार के अधिकार और वायित्वय
या पुरोबन्ध विक्रय का अधि- कार ।
67. तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो, बन्धकदार को यह अधिकार है कि बन्धकधन के अपने को शोध्य हो जाने के पश्चात् और बन्धक सम्पत्ति के मोचन के लिए डिक्री दी जाने से, या बन्धकधन चुकाए जाने से या यथा एतस्मिन्- पश्चात् उपबन्धित तौर पर निक्षिप्त किए जाने से पहले किसी भी समय वह न्यायालय से यह डिक्री कि बन्धककर्ता उस सम्पत्ति का मोचन कराने के अपने अधिकार से आत्यन्तिक रूप से विवर्जित होगा या यह डिक्री कि वह सम्पत्ति बेच वी जाए अभिप्राप्त कर ले ।
248
भारत का राजपत्त असाधारण
[भाग 2
यह डिक्री अभिप्राप्त करने के लिए बाव कि बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति का मोचन कराने के अपने अधिकार से श्रात्यन्तिक रूप से विजित होगा- पुरोबंध वाद कहलाता है ।
इस धारा की किसी भी बात से यह न समझा जाएगा कि वह-
(क) सशर्त विक्रय वाले बन्धकदार से भिन्न या ऐसे विलक्षण बन्धक वाले बन्धकवार से भिन्न , जिसके निबन्धन द्वारा वह पुरोबन्ध कराने का हक़दार है , किसी बन्धकदार को पुरोबन्ध घाद संस्थित करने या किसी भोग-बन्धकदार को अपनी वैसी हैसियत में या सशर्त विक्रय वाले किसी बन्धकवार को अपनी जैसी हैसियत में विक्रय के लिए वाद संस्थित करने को प्राधि- कृत करती है , अथवा
(ख ) उस बन्धककर्ता को , जो बन्धकदार के अधिकार उस के न्यासधारी या विधिक प्रतिनिधि की हैसियत से धारित करता है और जो सम्पत्ति के विक्रय के लिए वाद ला सकता है , पुरोबन्ध वाद संस्थित करने को प्राधिकृत करती है , अथवा
( ग ) रेल , नहर या अन्य ऐसे संकर्म के , जिसके क़ायम रखने में जनता हितबद्ध है , बन्धकदार को पुरोबन्ध या विक्रय के लिए वाद संस्थित करने को प्राधिकृत करती है, अथवा
( घ ) बंधक धन के भाग मात्र में हितबद्ध व्यक्ति को बंधक-सम्पत्ति के तत्सम भाग के सम्बन्ध में ही घाव संस्थित करने को प्राधिकृत करती है , जब तक कि बन्धकदारों ने बन्धककर्ता की सम्पत्ति से बन्धक के अधीन के अपने हितों को विभक्त न कर लिया हो ।
बन्धकदार कई
बन्धकों के
श्राधार पर एक
कब आबद्ध होता
67क. जो बन्धकदार एक ही बन्धककर्ता द्वारा निष्पादित ऐसे दो या अधिक बन्धक धारण करता है, जिन में से हर एक के विषय में उसे धारा 67 के अधीन एक ही किस्म की डिक्री श्रभिप्राप्त करने का अधिकार है , और जो उन बन्धकों में से किसी एक के लिए ऐसी डिक्री अभिप्राप्त करने के लिए वाद लाता है, वह तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो, उन सब बन्धकों के आधार पर, जिन के बारे में बन्धक धन शोध्य हो गया है, वाद लाने के लिए आबद्ध होगा ।
वाद लाने को है ।
बन्धक-धन के
68. ( 1 ) बन्धक- धन के लिए घाद लाने का अधिकार बन्धकवार को निम्नलिखित दशाओं में ही है , अन्यों में नहीं , अर्थात्--
लिए याद लाने
का अधिकार ।
(क ) जहां कि बन्धककर्ता बन्धक धन के प्रतिसंदाय के लिए अपने आप को आबद्ध करता है,
(ख ) जहां कि बन्धककर्ता या बन्धकदार के सदोष कार्य या व्यतिक्रम से भिन्न किसी हेतुक से बन्धक सम्पत्ति पूर्णतः या भागतः नष्ठ 249
भारत का राजपत्न असाधारण
खण्ड 1क
हो जाती है या प्रतिभूति धारा 66 के अर्थ के अन्दर अपर्याप्त हो जाती है और बन्धकदार ने बन्धककर्ता को इतनी अति- रिक्त प्रतिभूति उपबन्धित करने के लिए, जितनी से कुल प्रति- भूति पर्याप्त हो जाए , युक्तियुक्त अवसर दिया है , और बन्धक- कर्ता ऐसा करने में असफल रहा है ,
( ग) जहां कि बन्धकदार अपनी पूर्ण प्रतिभूति से या उस के किसी भाग से बन्धककर्ता के सदोष कार्य या व्यतिक्रम के द्वारा या परिणामस्वरूप वंचित कर दिया गया है ,
( घ ) जहां कि बन्धकदार बन्धक सम्पत्ति पर क़ब्ज़े का हक़दार है, वहां यदि बन्धककर्ता उसे उस का परिदान करने में अथवा बन्धककर्ता या बन्धककर्ता के हक़ से वरिष्ठ हक के अधीन दावा करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किए गए विघ्न के बिना उस पर क़ब्ज़ा सुनिश्चित कराने में असफल रहता है,
परन्तु खण्ड ( क ) में निर्देशित दशा में , बन्धककर्ता का या उस के विधिक प्रतिनिधि का कोई अन्तरिती इस दायित्व के अधीन न होगा कि बन्धक घन के लिए उस पर बाद लाया जाए ।
( 2 ) जहां कि बाद उपधारा ( 1 ) के खंड ( क ) या खंड ( ख ) के अधीन लाया जाता है, वहां यवि बन्धकदार अपनी प्रतिभूति का परित्याग नहीं कर देता और यदि आवश्यकता हो तो बन्धक सम्पत्ति का प्रति अन्तरण नहीं कर देता वाद और उस में की सब कार्यवाहियों को, किसी तत्प्रतिकूल संविदा के होते हुए भी, न्यायालय स्वविवेक में तब तक के लिए रोक सकेगा जब तक बन्धकदार बन्धक सम्पत्ति, या उस में से शेष जो बची हो उसके विरुद्ध अपने सब उपलभ्य उपचारों को निःशेष नहीं कर देता है ।
विक्रय करने की शक्ति कब विधि- मान्य होती है ।
69. ( 1 ) बन्धकदार को, या उस की ओर से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति को, इस धारा के उपबन्धों के अध्यधीन निम्नलिखित दशाओं में ही, न कि किन्हीं भी अन्य दशाओं में , यह शक्ति होगी कि बन्धक धन के संदाय में व्यति- क्रम होने पर न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना वह बन्धक सम्पत्ति या उस का कोई भाग बेच दे या बेचे जाने में सहमत हो जाए , अर्थात्
( क ) जहां कि बन्धक अंग्रेजी-बन्धक है , और न तो बन्धककर्ता और न बन्धकदार हिन्दू, मुसलमान या बौद्ध या राज्य सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में इस निमित्त समय - समय पर विनिर्दिष्ट किसी अन्य मूलवंश, पंथ , जनजाति या वर्ग का सदस्य है;
(ख ) जहां कि बन्धकदार को बन्धक विलेख द्वारा अभिव्यक्त रूप से यह शक्ति प्रदत्त है कि वह न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना विक्रय करा सके और बन्धकदार सरकार है ;
(ग) जहां कि बन्धकदार को बन्धक विलेख द्वारा अभिव्यक्त रूप से यह शक्ति प्रदत्त है कि वह न्यायालय के मध्यक्षेप के
827 G. of I.-6 .
250
भारत को राजपत्न असाधारण
[भाग 2
बिना विक्रय करा सके और बन्धक सम्पत्ति या उसका कोई भाग बन्धक विलेख के निष्पादन की तारीख को कलकत्ता , मद्रास , मुम्बई के नगरों के भीतर स्थित था या किसी अन्य नगर या क्षेत्र में स्थित था, जिसे राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस बारे में विनिदिष्ट करे ।
( 2 ) ऐसी कोई भी शक्ति प्रयोग में न लाई जाएगी यदि श्र.र जब तक-
(क ) मूलधन के संदाय की अपेक्षा करने वाली लिखित सूचना की तामील बन्धककर्ता या कई बन्धककर्ताओं में से किसी एक पर न कर दी गई हो और मूलधन या उसके किसी भाग का संदाय करने में ऐसी तामील के पश्चात् तीन मास तक व्यतिक्रम न किया गया हो ; श्रथवा
(ख) बन्धक के अधीन कुछ ब्याज, जिसकी रक्रम कम से कम पांच सौ रुपया हो, बक़ाया न हो और शोध्य होने के पश्चात् तीन भास तक अदत न रहा हो ।
( 3 ) जब कि विक्रय ऐसी शक्ति के प्रव्यञ्जित प्रयोग में कर दिया गया है तब क्रेता का हक़ इस आधार पर अधिक्षेपणीय न होगा कि उस विक्रय को प्राधिकृत करने के लिए कोई भी दशा पैदा न हुई थी जिसमें वह विक्रय प्राधि- कुत होता या कि सम्यक् सूचना नहीं दी गई थी या कि शक्ति अन्यथा अनुचित या अनियमित रूप से प्रयुक्त की गई थी ; किन्तु इस शक्ति के किसी अप्राधिकृत या अनुचित या अनियमित प्रयोग से क्षतिग्रस्त व्यक्ति को उस शक्ति का प्रयोग करने बाले व्यक्ति के विरुद्ध नुकसानी प्राप्ति का उपचार उपलब्ध होगा ।
(4) बन्धकदार को विक्रय द्वारा जो धन प्राप्त हुआ है , वह उन पूर्विक विल्लंकमों के , यदि कोई हों , उन्मोचन के पश्चात्, जिनके अध्यधीन वह विक्रय नहीं किया गया है, या न्यायालय में धारा 57 के अधीन वह राशि जमा किए जाने के पश्चात्, जो किसी पूर्विक विस्लंकम को चुकाने के लिए पर्याप्त है , तत्- प्रतिकूल संविदा न हो , तो प्रथमतः विक्रय या किसी प्रयतित विक्रय के प्रसंगतः अपने द्वारा उश्चित रूप से उपगत सब खों, प्रभारों और व्ययों का संदाय करने में और द्वितीयतः बन्धक- धन और खर्चे और बन्धक के अधीन शोध्य अन्य धन के, यदि कोई हो, भुगतान में अपने द्वारा उपयोजित किए जाने के लिए बन्धकदार न्यासतः धारित रखेगा , और इस प्रकार प्राप्त धन की अवशिष्टि बन्धक सम्पत्ति के हक़दार , या उस के विक्रय के आगमों की रसीदें देने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति को दे दी जाएंगी ।
( 5 ) इस धारा या धारा 69 क की कोई भी बात 1882 की जुलाई के पहले दिन से पूर्व दत्त शक्तियों को लागू नहीं है ।
251
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1 क]
रिसीवर कौ नियुक्ति ।
69फ. ( 1 ) धारा 69 के अधीन विक्रय की शक्ति के प्रयोग का अधिकार रखने वाले बन्धकदार को , उपधारा ( 2 ) के उपबन्धों के अध्यधीन यह हक़ होगा कि वह बन्धक सम्पत्ति या उसके किसी भाग की आय का रिसीवर अपने द्वारा या अपनी ओर से हस्ताक्षरित लेख द्वारा नियुक्त करे ।
( 2 ) जो व्यथित रिसीवर के रूप में कार्य करने के लिए बन्धक विलेख में नामित है और उस रूप में कार्य करने के लिए रजामन्द और योग्य है , वह बन्धक- दार द्वारा नियुक्त किया जा सकेगा ।
यदि कोई भी व्यक्ति ऐसे नामित न किया गया हो या यदि सब नामित व्यक्ति कार्य करने के लिए अयोग्य हों या रजामन्द न हों या मर चुके हों , तो बन्धकदार ऐसे किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगा जिसकी नियुक्ति के लिए बन्धककर्ता भी सहमत हो , ऐसी सहमति न होने पर बन्धकदार न्यायालय से रिसीवर की नियुक्ति करने के लिए आवेदन करने का हक़दार होगा और न्यायालय द्वारा नियुक्त कोई भी व्यक्ति बन्धकदार द्वारा सम्यक् रूप से नियन्त किया गया समझा जाएगा ।
रिसीवर किसी समय भी ऐसे लेख द्वारा , जो बन्धककर्ता और बन्धक- दार द्वारा या उनकी ओर से हस्ताक्षरित हो, अथवा दोनों में से किसी पक्षकार द्वारा आवेदन पर और सम्यक् हेतुक दर्शित किए जाने पर न्यायालय द्वारा हटाया जा सकेगा
रिसीवर का पद खाली होने पर उसकी पूर्ति इस उपधारा के उपबन्धों के अनुकूल की जा सकेगी ।
( 3 ) इस धारा द्वारा प्रदत्त शश्तियों के अधीन नियुक्त रिसीवर बन्धककर्ता का अभिकर्ता समझा जाएगा तथा रिसीवर के कार्यों या व्यतिक्रमों के लिए बन्धककर्ता अकेले ही उत्तरदायी होगा जब तक कि बन्धक विलेख में अन्यथा उपबन्धित न हो या जब तक कि ऐसे कार्य या व्यतिक्रम बन्धकदार के अनुचित मध्यक्षेप के कारण न हुए हों,
( 4) रिसीवर को यह शक्ति होगी कि वह उस समस्त आय की , जिसके लिए वह रिसीवर नियुक्त किया गया है , उस हित के , जिसका व्ययन बन्धककर्ता कर सकता था , पूरे विस्तार तक , मांग और वसूली या तो बन्धककर्ता के या बन्धक- दार के नाम में वाद ला कर या निष्पादन करा के या अन्यथा करे और उसके लिए तदनुकूल विधिमान्य रसीदें दे और ऐसी किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करे जो उसको बन्धकदार द्वारा इस धारा के उपबन्धों के अनुकूल प्रत्यायोजित हों ।
( 5 ) रिसीबर को धन देने वाले व्यक्ति को यह आंच करने की आवश्य- कता नहीं है कि रिसीवर की नियुक्ति विधिमान्य थी या नहीं ।
252
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
( 6 ) रिसीवर का यह हक़ होगा कि वह उसे प्राप्त समस्त धन की रक़म पर कमीशन पांच प्रतिशत से श्रनधिक ऐसी दर से , जैसी उसके नियुक्ति- पत्न में विनिर्दिष्ट है , और यदि कोई दर ऐसे विनिर्दिष्ट न हो तो उस कुल रक़म पर पांच प्रतिशत की दर से या ऐसी अन्य दर से, जैसी न्यायालय रिसीवर द्वारा उस प्रयोजन के लिए किए गए आवेदन पर अनुज्ञात करना ठीक समझे उस किसी रक़म में से , जो उसे प्राप्त हुई है, अपने पारिश्रमिक के लिए और रिसीवर के तौर पर स्वयं द्वारा उपगत सब खर्चों , प्रभारों और व्ययों की तुष्टि के लिए रख ले ।
( 7 ) यदि रिसीवर को बन्धकदार द्वारा ऐसा करने के लिए लिखित निदेश दिया जाए , तो रिसीवर बन्धक सम्पत्ति या उसके किसी भाग का , जो प्रकृत्या बीमा कराने योग्य है , हानि या नुक़सान के लिए , जो श्रग्नि से हो , उस माल्ला तक , यदि कोई हो, जिस तक बन्धकदार ने उसका बीमा कराया होता , उस धन में से , जो उसे प्राप्त हुआ है , बीमा कराएगा और उसे बीमाकृत रखेगा ।
( 8 ) बीमाधन के उपयोजन के बारे में इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रिसीवर अपने द्वारा प्राप्त सब धन को निम्न प्रकार से उपयोजित करेगा, अर्थात्--
( i ) बन्धक सम्पत्ति पर पड़ने बाले सब भाटकों, करों, भूराजस्व, रेटों और निर्गमों के , चाहे वे , 'कैसे ही क्यों न हों, भुगतान में;
( ii ) जिस बन्धक के अधिकार के बारे में वह रिसीवर है उस बन्धक से पूर्विकता रखने वाली सब वार्षिक राशियों या अन्य संदायों को और सब मूल राशियों पर ब्याज को नीचा रखने में ;
( iii ) अपने कमीशन के और अग्नि, जीवन या अन्य प्रकार के बीमानों के, यदि कोई हों, प्रीमियमों के , जो बन्धक विलेख के अधीन या इस अधिनियम के अधीन उचित तौर पर वेय हैं, और बन्धकदार द्वारा लिखित रूप में निदिष्ट आवश्यक या उचित मरम्मत में हुए खर्चे के संदाय में;
( iv) बन्धक के अधीन शोध्य होने वाले व्याज के संदाय में ;
( v ) मूलधन के भुगतान में या उस मद्धे यदि बन्धकवार द्वारा वह ऐसा करने के लिए लिखित रूप में निदिष्ट हो;
और जो धन उसे प्राप्त हुआ है , उसकी अवशिष्टि; यदि कोई हो , उस व्यक्ति को देगा, जो यदि रिसीवर का क़ब्ज़ा न होता, तो उस आय को प्राप्त करने का हक़दार होता जिसका वह रिसीवर नियुक्त किया गया है , या जो बन्धक सम्पत्ति का अन्यथा हक़दार है ।
( 9 ) उपधारा ( 1 ) के उपबन्ध केवल तब और वहीं तक लागू होते , जब और जहां तक कि बन्धक विलेख में कोई तत्प्रतिकूल आशय अभिव्यक्त नहीं किया गया है, और उपधारा ( 3 ) से ( 8 ) तक के, जिनके अम्तर्गत ये दोनों 253
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1क]
उपधाराएं हैं, उपबन्धों में फेरफार या विस्तारण , बन्धक विलेख द्वारा किए जा सकेंगे और वे उपबन्ध इस प्रकार फेरफार या विस्तारण किए गए रूप में यावत्- शक्य उसी प्रकार से और वैसी ही सब प्रसंगतियों , प्रभावों और परिणामों के सहित प्रर्वार्तत होंगे मानो ऐसे फेरफार या विस्तारण उक्त उपधाराओं में अन्त- विष्ट थे ।
( 10 ) बन्धक सम्पत्ति के प्रबन्ध या प्रशासन विषयक किसी वर्तमान प्रश्न पर, जो ऐसे कठिनाईपूर्ण था महत्वपूर्ण प्रश्नों से भिन्न हो , जिनके बारे में न्यायालय की राय हो कि वे संक्षिप्त निपटारे के लिए उचित नहीं हैं, न्यायालय की राय , सलाह या निदेश के लिए न्यायालय से आवेदन वाद संस्थित किए बिना किया जा सकेगा । आवेदन में हितबद्ध व्यक्तियों में से उन पर, जिन्हें म्यायालय इस सम्बंध में ठीक समझे , आवेदन की प्रति की तामील कराई जाएगी और वे उसकी सुनवाई में हाजिर हो सकेंगे ।
इस उपधारा के अधीन किए गए हर एक आवेदन के खचों का अधि- निर्णयन न्यायालय के विवेकाधीन होगा ।
( 11 ) इस धारा में 'न्यायालय' से वह न्यायालय अभिप्रेत है जिसे उस बन्धक को प्रवर्तित कराने के वाद में अधिकारिता हो ।
बन्धक सम्पत्ति में अनुवृद्धि ।
70. यदि बन्धक की तारीख के पश्चात् बन्धक सम्पत्ति में कोई अनुवृद्धि होती है , तो बन्धकदार तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो, प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए ऐसी अनुवृद्धि का हक़दार होगा ।
वृष्टीत
(क ) क, नदी के किनारे बाला कोई खेत ख के पास बधक रखता है । वह बेत जलोढ़ से बढ़ जाता है । अपनी प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए खइस वृद्धि का हक़दार है ।
(ख ) क निर्माण भूमि का कोई टुकड़ा ख के पास बन्धक रखता है, और तत्पश्चात् उस टुकड़े पर गृह खड़ा करता है । अपनी प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए ख गृह का तथा उस भूमि के टुकड़े का हक़दार है ।
बन्धकित पट्टे का नबीकरण ।
71. जब कि बन्धक सम्पत्ति पट्टा है और बन्धककर्ता उस पट्टे का नवीकरण अभिप्राप्त कर लेता है तब बन्धकदार तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो नये पट्टे का प्रतिभूति के प्रयोजनों के लिए हकदार होगा ।
72. बन्धकदार इतना धन व्यय कर सकेगा जितना-
सकब्जा बन्धक- दार के अधिकार ।
(क) + + + +
(ख ) नाश , समपहरण या विक्रय से बन्धक सम्पत्ति का परिरक्षण करने के लिए ,
(ग) उस सम्पत्ति पर बन्धककर्ता के हक के समर्थन के लिए, 254
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
( घ) उसमें स्वयं अपने हक को बन्धककर्ता के विरुद्ध पक्का करने के लिए, तथा,
( ङ ) जब कि बन्धक सम्पत्ति मबीकरणौय पट्टाधृति है तब बट्टे के नवीकरण के लिए,
श्रावश्यक है ;
और तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो ऐसे धन को मूलधन में जोड़ सकेगा ; उस धन पर ऐसी दर से , जो मूलधन पर देय है , और जहां कि ऐसी कोई दर नियत न हो, वहां नौ प्रतिशत वार्षिक दर से, ब्याज लगेगा ,
परन्तु बन्धकदार द्वारा खंड ( ख) या खंड ( ग ) के अधीन किया गया धन का व्यय आवश्यक न समझा जाएगा , जब तक कि बन्धककर्ता सम्पत्ति को परिरक्षित करने के लिए या हक्र का समर्थन करने के लिए अपेक्षित न किया गया हो और वह तदर्थ उचित और यथासमय पग उठाने में असफल न हो गया हो ।
जहां कि सम्पत्ति अपमी प्रकृति से बीमायोग्य है , वहां तत्प्रतिकून संविधा न हो तो बन्धकदार ऐसी सब सम्पत्ति या उसके किसी भाग को हानि या नुक़सान के लिए , जो अग्नि से हो, बीमाक्कृत भी कर और रख सकेगा और किसी ऐसे बीमे के लिए दिए गए प्रीमियम उसी दर से , जो मूलधन पर देय है , या जहां कि ऐसी वर नियत नहीं है वहां नौ प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज सहित मूलधन में जोड़े जाएंगे । किन्तु ऐसे बीमे की रकम उस रक़म से अधिक न होगी जो बन्धक विलेख में इस निमित्त विनिर्दिष्ट है या ( यदि ऐसी कोई रक़म उसमें विनिर्दिष्ट न हो तो) उस रक़म के दो तिहाई से अधिक न होगी जो पूर्ण नाश की दशा में बीमाक्कृत सम्पत्ति के पुनः स्थापित करने के लिए अपेक्षित होती ।
इस धारा की कोई भी बात बन्धकदार को बीमा कराने के लिए प्राधिकृत करने वाली न समझी जाएगी , जब कि सम्पत्ति का श्रीमा बन्धककर्ता द्वारा या बन्धककर्ता की ओर से उतनी रकम का किया हुआ रखा जाता है जितने के लिए बन्धकदार बीमा कराने के लिए एतद्वारा प्राधिकृत है ।
राजस्व के लिए किए गए विक्रय के आगमों पर या अर्जन पर प्रतिकर अधिकार । पर
73. ( 1 ) जहां कि बन्धक सम्पत्ति या उसका कोई भाग या उसमें का कोई हित ऐसी सम्पत्ति के बारे में राजस्व की बक़ाया , लोकप्रकृति के अम्य प्रभार या शोध्य भाटक देने में असफलता के कारण बेचा जाता है, भौर ऐसी असफलता बन्धकदार के किसी व्यतिक्रम से उत्पन्न नहीं हुई है , वहां बन्धकवार उस बकाया के और विधि द्वारा निदिष्ट सब प्रभारों और कटौतियों के संदाय के पश्चात् विक्रय श्रागमों में जो कुछ अधिशेष रहे उसमें से बन्धक धन के पूर्णतः या भागतः दिए जाने का दावा करने का हक़दार होगा ।
1894 का 1
( 2 ) जहां कि बन्धक सम्पत्ति या उसका कोई भाग या उसमें का कोई हित भूमि अर्जन अधिमियम , 1894 या स्थावर सम्पत्ति के वैवश्यक प्रर्जन के लिए उपबन्ध करने बाली किसी अन्य तत्समय प्रवृत-अधिनियमति के अधीन अर्जित किया जाता है, वहां बन्धकदार बन्धककर्ता को प्रतिकर के रूप में शोष्य रक़म में से बन्धक धन के पूर्णतः या भागतः संदाय का दावा करने का हक़दार होगा ।
265
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1क
( 3 ) ऐसे दावे पूविक विल्लंकमदारों के दावों के सिवाय अन्य सब दाषों के विरुद्ध अभिभावी होंगे और इस बात के होते हुए भी कि बन्धक पर मूलधन शोध्य नहीं हुआ है, प्रतित किए जा सकेंगे ।
74. + + +
75. + + +
सकन्जा मन्धक्षक- दार के दायित्व ।
76. जब कि बन्धक चालू रहने के दौरान में बन्धकदार बन्धक- सम्पत्ति का क़ब्ज़ा ले लेता है, तब
(क) उसको उस सम्पत्ति का प्रबन्ध उस प्रकार करना होगा जैसा मामूली प्रज्ञावाला व्यक्ति उसका प्रबन्ध करता, यदि वह उसकी अपनी होती ;
(ख ) उसको उस सम्पत्ति के भाटकों और लाभों को बसूल करने में अपने सर्वोत्तम प्रयास करने होंगे ;
(ग) तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो उसे सरकारी राजस्व, लोक प्रकृति के सब अन्य प्रभार और ऐसे कब्जे के दौरान में तत्सम्बन्धी प्रोद्भवमान शोध्य सब भाटक और भाटक की ऐसी कोई बक़ाया , जिसका संदाय करने में व्यतिक्रम होने पर वह सम्पत्ति संक्षेपतः बेची जा सके , उस सम्पति की आय में से देनी होगी ;
( घ) तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो , उसे उस सम्पत्ति की ऐसी श्रावश्यक मरम्मत करानी होगी जिसके लिए वह उस सम्पत्ति के भाटकों और लाभों में से खंड ( ग ) में वणित संदायों की और मूलधन पर ब्याज की कटौती करने के पश्चात् उन भाटकों और लाभों में से संदाय कर सकता हो ;
( ङ) वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जो सम्पति के लिए विनाशक या स्थायी रूप से क्षतिकर हो ;
(च) अहो कि उसने सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग का हानि या नुक़सान के लिए , जो अग्नि से हो , बीमा कराया है, वहां ऐसी हानि या नुक़सान होने पर, उसे ऐसा कोई धन , जिसे वह पालिसी के अधीन वस्तुतः प्राप्त करता है या उसमें से इतना, जितना आवश्यक हो, सम्पत्ति के यथापूर्वकरण में , अथवा यदि बन्धककर्ता ऐसा निदेश दे तो बन्धक धन के घटाने या भुगतान में उपयोजित करना होगा ;
256
भारत को राजपत्र असाधारण
[भाग 2
(छ ) बन्धकदार की हैसियत में उस द्वारा प्राप्त और खर्च की गई सब राशियों का स्पष्ट, पूरा और शुद्ध लेखा उसे रखना होगा और बन्धक के चालू रहने के दौरान में किसी भी समय बन्धककर्ता को उसके निवेदन और खर्च पर ऐसे लेखाओं की और ऐसे बाउचरों की , जिनसे वे सथित हों, सही प्रतियां देनी होंगी ;
(ज ) बन्धक सम्पत्ति से उसे हुई प्राप्तियां, या जहां कि ऐसी सम्पत्ति उसके वैयक्तिक अधिभोग में है, वहां उस सम्पत्ति के बारे में उचित अधिभोग - भाटक , उस सम्पत्ति के प्रबन्ध के लिए और भाटकों और लाभों के संग्रहण के लिए समुचित रूप से उपगत व्ययों को और अन्य व्ययों को , जो खण्ड ( ग) और ( घ) में वर्णित हैं , तथा उन पर के ब्याज को काट लेने के पश्चात् उस रक़म को ( यदि कोई हो ) , जो समय समय पर ब्याज मद्धे शोध्य हो, कम करने में और ऐसी प्राप्तियां , जितनी शोध्य ब्याज से अधिक हों, बन्धक घन के घटाने या भुगतान में उसके प्रति विकलित की जाएंगी और अधिशेष , यदि कोई हो , बन्धककर्ता को दे दिया जाएगा ;
( स) जब कि बन्धककर्ता बन्धक पर तत्समय शोध्य रकम निविदत करता है या एतस्मिन्पश्चात् उपबन्धित प्रकार से निक्षिप्त करता है , तब बन्धकदार बन्धक सम्पत्ति से यथास्थिति निविदा की तारीख से या उस पूर्वतम समय से , जब वह न्यायालय से ऐसी रकम निकाल सकता था, अपने को हुई प्राप्तियों का लेखा इस धारा के अन्य खण्डों में के उपबन्धों के होते हुए भी देगा और वह ऐसी तारीख या समय के पश्चात् किए गए बन्धक- सम्पति सम्बन्धी किन्हीं भी व्ययों मद्धे , कोई रक्कम उनमें से काटने का हक़दार नहीं होगा ।
उसके व्यतिक्रम के हानि। कारण हुई
यदि अन्धकदार इस धारा द्वारा अपने पर अधिरोपित कर्तव्ों में से किसी का पालन करने में असफल रहे , तो ऐसी असफलता के कारण हुई हानि, यदि कोई हो, उस समय , जब इस अध्याय के अधीन की गई किसी डिक्री के अनुसरण में लेखा लिया जाए , उसके प्रति विकलित की आ सकेगी ।
ब्याज के बदले में प्राप्तिमां ।
77. धारा 76 के खण्ड ( ख ) , ( घ ) , (छ) और ( ज ) में की कोई भी बात उन दशाओं को लागू नहीं होती जिनमें बन्धकदार और बन्धक- कर्ता के बीच यह संविदा है कि जितने समय सम्पत्ति बन्धकदार के कन्यो में रहेगी, बन्धक सम्पत्ति से प्राप्तियां मूलधन पर ब्याज के बदले में या ऐसे ब्याज और मूलधन के सुनिश्चित भागों के बदले में ली जाएंगी ।
257
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1क]
पूविकता
बन्धक- पूर्विक दार का मुल्तवी होना ।
78. जहां कि किसी पूर्विक बन्धकदार के कपट , मिथ्या व्यपदेशन या घोर उपेक्षा से कोई अन्य व्यक्ति बन्धक सम्पत्ति की प्रतिभूति पर धन उधार देने के लिए उत्प्रेरित हुआा है, वहां वह पूर्विक बन्धकदार उस पाश्चिक बन्धकदार के मुक़ाबले में मुल्लवी हो जाएगा ।
जबकि अधिकतम रक्कम अभिव्यक्त है , तब अनिश्चित रकम को प्रति- भूत करने के लिए बम्धक ।
2 79. यदि भविष्यवत्ती उधारों को , वचनबन्ध के पालन को , या किसी चालू खाते की बाक़ी को प्रतिभूत करने के लिए किए गए किसी बन्धक में वह अधिकतम रक़म अभिव्यक्त है, जो तद्वारा प्रतिभूत की जानी है, तो उसी सम्पत्ति का कोई पाश्चिक बन्धक, यदि वह किसी पूषिक बन्धक की सूचना होते हुए किया गया है, उस श्रधिकतम से अनधिक उन सब उधारों या विकलनों की बाबत , यद्यपि वे पाश्चिक बन्धक की सूचना होते हुए दिए गए या अनुज्ञात किए गए हों, उसी सम्पत्ति का पाश्चिक बन्धक पूर्विक बन्धक के मुक़ाबले में मुल्तवी रहेगा ।
वृष्टीत
क सुल्तानपुर का बन्धक अपने महाजन ख एवं कम्पनी के पास 10,000 रुपये तक उनके साथ अपने लेखाओं की बाक़ी को प्रतिभूत करने के लिए करता है । क फिर न के पास , जिसे व एवं कम्पनी के पास किए गए बन्धक की सूचना है , सुल्तानपुर का बन्धक 10,000 रुपये को प्रतिभूत करने के लिए करता है, और ख एवं कम्पनी को न उस दूसरे बन्धक की सूचना देता है ।
दूसरे बन्धक की तारीख को ख एवं कम्पनी को शोध्य बाक़ी 5,000 रुपये से अधिक नहीं है । ख एवं कम्पनी उसके पश्चात् विकलन बाक़ी 10,000 क को ऐसी राशि देते हैं जिससे क के खाते में रुपये की राशि से अधिक हो जाती है । ख एवं कम्पनी, ग के मुक़ाबले में 10,000 रुपये तक पूर्विकता के हक़दार हैं ।
80. * * * * *
क्रमबन्धन और अभिदाय
प्रतिभूतियों का क्रमबन्धन ।
81. यदि दो या अधिक सम्पत्तियों का स्वामी उन्हें एक व्यक्ति के पास बन्धक रखता है और फिर उन सम्पत्तियों में से एक या अधिक को किसी अन्य व्यक्ति के पास बन्धक रखता है, तो तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में पाश्चिक बन्धकदार इस बात का हक़दार है कि यह पूर्विक बन्धक ऋण को , उसे बन्धक न की गई सम्पत्ति या सम्पत्तियों में से वहां तक तुष्ट करवाए जहां तक उससे या उनसे उसकी तुष्टि हो सकती है, किन्तु ऐसे नहीं कि पूर्विक बन्धकदार के या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति के , जिसने उन सम्पत्तियों में से किसी भी सम्पत्ति में कोई हित प्रतिफलेन अजिस किया है , अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े ।
827 G. of I.-7 .
258
भारत का राजपत्त्र असाधारण
[भाग 2
बन्धक ऋण की बाबत अभिदाय ।
82. जहां कि बन्धक के अध्यधीन सम्पत्ति ऐसे दो या अधिक व्यक्तियों की है , जिनके उसमें सुभिन्न और प्रथक् स्वामित्वाधिकार हैं तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो ऐसी सम्पत्ति में के विभिन्न अंश या भाग , जो ऐसे व्यक्तियों के स्वामित्व में है , उस बन्धक द्वारा प्रतिभूत ऋण के लिए अनुपात में अभिदाय करने के दायी हैं, और ऐसा हर अंश या भाग जिस अनुपात में अभिदाय करेगा , उसके अवधारण के प्रयोजन के लिए उसका मूल्य ऐसे किसी अन्य बन्धक या भार की रक़म को , जिसके अध्यधीन यह बन्धक की तारीख पर रहा हो, काट कर वह मूल्य समझा जाएगा जो उस तारीख पर उसका था ।
जहां कि एक ही स्वामी की दो सम्पत्तियों में से एक सम्पत्ति एक ऋण की प्रतिभूति के लिए बन्धक रखी गई है और फिर दोनों एक अन्य ऋण की प्रतिभूति के लिए बन्धक रखी गई हैं और पूर्वभावी ऋण पूर्वोक्त सम्पत्ति में से चुकाया गया है वहां तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो जिस सम्पत्ति में से यह पूर्वभावी ऋण चुकाया गया है , उसके मूल्य में से उस पूर्वभावी ऋण की रक़म काटकर हर एक सम्पत्ति उत्तरभावी ऋण में अनुपाती श्रभिदाय करने की दायी है ।
पाश्चिक बन्धकदार के दावे के लिए जो सम्पत्ति धारा 81 के भधीन दायी है उसे इस धारा की कोई भी बात लागू नहीं होती ।
न्यायालय में निक्षेप
बन्धक मझे शोध्य धन का न्यायालय में निक्षेप करने की शक्ति ।
83. किसी बन्धक के बारे में देय मूलधन के शोध्य हो जाने के पश्चात् और बन्धक सम्पति के मोचन के लिए वाद वर्जित हो जाने से पहन किसी भी समय बन्धककर्ता या ऐसा वाद संस्थित करने के लिए हक़दार कोई भी अन्य व्यक्ति ऐसे किसी भी न्यायालय में , जिसमें वह ऐसा वाद संस्थित कर सकता था , उस बन्धक के बारे में शोध्य अवशिष्ट राशि का बन्धकदार के नाम निक्षेप कर सकेगा ।
बन्धककर्ता द्वारा निक्षिप्त धन पर अधिकार ।
तदुपरि न्यायालय निक्षेप की लिखित सूचना की तामील बन्धकदार पर कराएगा और बन्धकदार ( वादपत्नों के सत्यापन के लिए विधि-विहित प्रकार से सत्यापित ) ऐसी अर्जी पेश करने पर, जिसमें बन्धक मद्धे तब शोध्य रक़म और इस तरह निक्षिप्त धन को ऐसी रक़म के पूर्णतः भुगतान में प्रति- गृहीत करने के लिए उसकी अपनी रजामन्दी कथित हो और उसी न्यायालय में बन्धक विलेख और बन्धक सम्पत्ति सम्बन्धी सब दस्तावेजों को, जो उसके अपने कब्जे या शक्ति में हों, निक्षिप्त करने पर उस धन के लिए आवेदन कर सकेगा और उसे प्राप्त कर सकेगा तथा ऐसे निक्षिप्त बन्धकविलेख और अन्य सब ऐसी दस्तावेजों बन्धककर्ता या यथापूर्वोक्त अन्य व्यक्ति को परि- दत्त कर दी जाएंगी ।
जहां कि बन्धक सम्पत्ति बन्धकदार के क़ब्ज़े में है , वहां न्यायालय ऐसी निक्षिप्त रक़म का उसे संदाय करने से पहले उसे यह निदेश देगा कि 259
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1क]
वह बन्धककर्ता को उसका क़ब्ज़ा परिदत्त करे और बन्धककर्ता के खर्च पर या तो बन्धक सम्पत्ति बन्धककर्ता को या ऐसे अन्य व्यक्ति को , जिसे बन्धककर्ता निर्देशित करे, प्रति- अन्तरित करे या यह लेखबद्ध अभिस्वीकृति कि ऐसा कोई अधिकार , जो बन्धककर्ता के उस हिंत का अल्पीकरण करता है जो बन्धकदार को अन्तरित किया गया है , निर्वापित हो गया है , निष्पादित करे और ( जहां कि बन्धक रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया गया है ) रजिस्ट्रीकृत कराए ।
ब्याज का बन्द हो जाना ।
84. जब कि बन्धककर्ता ने या यथापूर्वोक्त अन्य व्यक्ति ने बन्धक पर शोध्य श्रवशिष्ट रक़म निविदत्त कर दी है या न्यायालय में धारा 83 के श्रधीन निक्षिप्त कर दी है, तब निविदा की तारीख से या निक्षेप की दशा में , जहां कि पहले ऐसी रक़म की कोई निविदा नहीं की गई है , ज्योंही बन्धककर्ता या पूर्वोक्त अन्य व्यक्ति वे सब बातें कर देता है जो उसे बन्धकदार को न्यायालय से ऐसी रकम निकालने के योग्य करने के लिए करनी हैं और बन्धकदार पर धारा 83 द्वारण अपेक्षित सूचना की तामील हो जाती है, त्योंही मूलधन पर ब्याज चलना बन्द हो जाएगा ;
परन्तु जहां कि बन्धककर्ता ने ऐसी रकम को उसकी पूर्व निविधा किये बिना निक्षिप्त कर दिया है और तत्पश्चात् उसका या उसके किसी भाग का प्रत्याहरण कर लिया है वहां मूलधन पर ब्याज ऐसे प्रत्याहरण की तारीख से देय होगा ।
जब कि यह संविदा वर्तमान हो कि बन्धकदार इस बात का हक़दार होगा कि बन्धक धन के संदाय या निविदा से पूर्व उसे युक्तियुक्त सूचना वी जाए और उसे ऐसी सूचना, यथास्थिति, निविदा या निक्षेप करने से पहले नहीं दी गई हो , तो इस धारा की या धारा 83 की कोई भी बात बन्धकदार को ब्याज के लिए अपने अधिकार से वंचित करने वाली न समझी जाएगी ।
पुरोबन्ष, विक्रय या मोचन के लिए बाव
*
*
*
*
85 .
पुरोबंध और विक्रय
*
*
*
*
86.
*
*
*
*
87 .
*
*
*
*
88.
*
*
*
*
89.
*
*
*
*
90 .
मोचन
वे व्यक्ति जो मोचन के लिए
बाद ला सकेंगे ।
91. बन्धककर्ता के अतिरिक्त निम्नलिखित व्यक्तियों में से कोई भी बन्धक सम्पत्ति का मोचन करा सकेगा या उसके मोचन के लिए वाद ला सकेगा , अर्थात्--
(क) कोई व्यक्ति ( उस हित के बन्धकदार से भिन्न जिसका मोचन कराना ईप्सित है ) जिसका उस बन्धक सम्पत्ति 260
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
या उसके मोचन अधिकार में कोई हित या पर कोई भार है ,
( ख) बन्धक ऋण या उसके किसी भाग का संदाय करने के लिये कोई भी प्रतिभू, अथवा
(ग ) बन्धककर्ता का कोई लेनदार, जिसने उसकी संपदा के प्रशासन के लिए वाद में उस बन्धक सम्पत्ति के विक्रय के लिए डिक्री श्रभिप्राप्त की हो ।
प्रत्यासन ।
92. धारा 91 में निर्दिष्ट व्यक्तियों में से ( बन्धककर्ता से भिन्न) कोई भी , और कोई भी स.ह - बन्धककर्ता , उस सम्पत्ति का , जो बन्धक के अध्यधीन है , मोचन कराने पर वहां तक , जहां तक कि ऐसी सम्पत्ति के मोचन , पुरोबन्ध या विक्रय का सम्बन्ध है , वे ही अधिकार रखेगा , जिन्हें बन्धककर्ता के या किसी अन्य बन्धकदार के विरुद्ध वह बन्धकदार रखता हो जिस के बन्धक का वह मोचन कराता है ।
इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार प्रत्यासन- अधिकार कहलाता है तथा जो व्यक्ति उसे अर्जित करता है , वाह उस बन्धकदार के अधिकारों में प्रत्यासीन हुआा कहलाता है जिसके बन्धक का वह मोचन कराता है ।
वह व्यक्ति , जिसने बन्धककर्ता को वह धन उधार दिया है, जिससे बन्धक का मोचन हुआ है , उस बन्धकदार के अधिकारों में प्रत्यासीन हो जाएगा जिसके बन्धक का मोचन कराया गया है यदि बन्धककर्ता ने रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा यह क़रार किया हो कि ऐसा व्यक्ति ऐसे प्रत्यासीन हो जाएगा ।
इस धारा की कोई भी बात किसी भी व्यक्ति को प्रत्यासन का अधिकार प्रदान करने वाली न समझी जाएगी , जब तक कि उस बन्धक का , जिसके बारे में इस अधिकार का दावा किया जाता है मोचन पूर्णतः न करा लिया गया हो ।
श्रबन्धन प्रतिषेध । का
93. कोई भी बन्धकदार , जो पूर्विक बन्धक को मध्यवर्ती बन्धक की सूचना होते हुए या न होते हुए चुका देता है, अपनी मूल प्रतिभूति के विषय में कोई पूर्विकता तद्वारा अर्जित नहीं करेगा , और धारा 79 द्वारा उपबन्धित दशा के सिवाय कोई भी बन्धकदार , जो मध्यवर्ती बन्धक की सूचना होते हुए या न होते हुए बन्धककर्ता को पाश्चिक उधार दे , ऐसे पाश्चिक उधार के लिए अपनी प्रतिभूति के बारे में तद्धारा कोई पूविकता अर्जित नहीं करेगा ।
मध्यवर्ती बन्धक- दार के अधिकार ।
94. जहां कि सम्पत्ति आनुक्रमिक ऋणों के लिए आनुक्रमिक बन्धक- दारों के पास बन्धक रखी जाती है वहां मध्यवर्ती बन्धकदार के अपने से पीछे वाले बन्धकदारों के विरुद्ध वे ही अधिकार होंगे जो उसे बन्धककर्ता के विरुद्ध हैं ।
मोचन कराने वाले सहबन्धककर्ता का व्यय पाने का अधिकार ।
95. जहां कि कई बन्धककर्ताओं में से एक बन्धककर्ता बन्धक सम्पत्ति का मोचन करा लेता है , वहां अपने सह बन्धककर्ताओं के विरुद्ध धारा 92 के अधीन प्रत्यासन का अपना अधिकार प्रवृत्त कराने में वह ऐसे मोचन में उचित तौर पर किए गए व्ययों का ऐसा आनुपातिक भाग उन से वसूलीय बन्धक धन में जोड़ने का हक़दार होगा जैसा उस सञ्पत्ति में उन के अपने अपने अंश मद्धे हुआ माना जा सकता है ।
261
भारत का राजपत्न श्रसाधारण
खण्ड 1 क ]
96. एतस्मिन्पूर्व अन्तर्विष्ट जो उपबन्ध सादा बन्धक को लागू होते हैं, बे हक विलेखों के निक्षेप द्वारा बन्धक को यावत्शक्य लागू होंगे ।
ह्क़ विलेखों के निक्षेप द्वारा बन्धक ।
97.
t
विलक्षण बन्धक
98. विलक्षण बन्धक की दशा में पक्षकारों के अधिकार और दायित्व बन्धक विलेख में यथासाक्षित उनकी संविदा द्वारा , तथा ऐसी संविदा के विस्तार के बाहर स्थानीय प्रथा द्वारा अवधारित होंगे ।
विलक्षण बन्धकों के पक्षकारों के अधिकार और दायित्व ।
†
+
99.
भार
भार ।
100. जर्हा कि एक व्यक्ति की स्थावर सम्पत्ति पक्षकारों के कार्य द्वारा या विधि की क्रिया द्वारा किषी दूसरे व्यक्ति को धन के संदाय के लिए प्रतिभूति बन जाती है और वह संव्यवहार बन्धक की कोटि में नहीं आता , वहां यह कहा जाता है कि पश्चात् कथित व्यक्ति का उस सम्पति पर भार है और एतस्मिन्पूर्व अन्तर्विष्ट वे सब उपबन्ध , जो साषा बन्धक कोलागू होते हैं, ऐसे भार को यावत्शक्य लागू होंग
न्यास के निष्पादन में उचित रूप से किए गए "व्ययों के लिए जो भार न्यासधारी का न्यस्त सम्पत्ति पर होता है उसे इस धारा की कोई भी बात लागू नहीं है और किसी तत्समय -प्रवृत्त- विधि द्वारा अन्यथा अभिव्यक्ततः उपबन्धित को छोड़ कोई भी भार उस सम्पत्ति के विरुद्ध प्रतित न किया जाएगा, जो ऐसे व्यक्ति के हस्तगत हो जिसे ऐसी सम्पत्ति प्रतिफलार्थ और उस भार की सूचना के बिना अन्तरित की गई है ।
जर्बाक पाश्चिक विल्लंकम् वर्त- मान होने पर विलयन होगा ।
101. स्थावर सम्पत्ति का कोई भी बन्धकदार या वैसी सम्पत्ति पर भार रखने वाला कोई भी व्यक्ति या ऐसे बन्धकदार या भारक का कोई अन्तरिती यथा- स्थिति बन्धककर्ता या स्वामी के उस सम्पत्ति में के अधिकारों का क्रय या अन्यथा अर्जन , जहां तक कि उस के अपने और उसी सम्पत्ति के किसी पाश्चिक बन्धकवार या किसी पाश्चिक भारक के बीच का सम्बन्ध है , बन्धक या भार का तद्वारा विलयन कारित किए बिना कर सकेगा और ऐसा कोई भी पाश्चिक बन्धकदार या भारक पूर्विक बन्धक या भार का मोचन कराए बिना या बन्धक या भार के अध्यधीन बने रहने से अन्यथा पुरोबन्ध कराने या ऐसी सम्पत्ति का विक्रय कराने का हक़दार न होगा ।
सूचना और मिविया
102. जहां कि वह व्यक्ति, जिस पर या जिसको इस अध्याय के अधीन किसी सूचना की तामील या निविदा की जानी है, उस जिले में निवास नहीं करता , जिस में बन्धक सम्पत्ति या उसका कुछ भाग स्थित है , वहां ऐसे व्यक्ति से
थभिकर्ता पर तामील गा उसको निविदा ।
262
भारत का राजपत्न श्रसाधारण
[भाग 2
श्रम-मुख्तारनामा-प्राप्त था ऐसी तामील या निविदा को प्रतिगृहीत करने के लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता पर तामील या उसको निविदा पर्याप्त समझी जाएगी ।
जहां कि ऐसा कोई व्यक्ति या अभिकर्ता, जिस पर ऐसी सूचना की तामील होनी चाहिए, नहीं मिल सकता या सूचना की तामील करने के लिए अपेक्षित व्यक्ति को ज्ञात नहीं है वहां पश्चात् कथित व्यक्ति ऐसे किसी भी न्यायालय से, जिस में उस बन्धक सम्पत्ति के मोचन के लिए वाद लाया जा सकता है , आवेदन कर सकेगा और ऐसा न्यायालय निदिष्ट करेगा कि किस प्रकार से ऐसी सूचना की तामील होगी और ऐसे निदेश के अनुवर्तन में तामील की गई सूचना पर्याप्त समझी जाएगी ;
परन्तु यदि वह सूचना ऐसी सूचना है जो किसी निक्षेप की दशा में धारा 83 द्वारा अपेक्षित है तो उसके बारे में आवेदन उस न्यायालय में किया जाएगा जिस में वह निक्षेप किया गया है ।
जहां कि कोई भी व्यक्ति या अभिकर्ता, जिसे ऐसी निविदा की जानी चाहिए , नहीं मिल सकता या निविदा करने के लिए इच्छुक व्यक्ति को ज्ञात नहीं है वहां पश्चात्कथित व्यक्ति किसी भी ऐसे न्यायालय में , जिसमें उस बन्धक सम्पत्ति के मोचन के लिए वाद लाया जा सकता है, वह रक़म, जिसकी निविदा की जानी ईप्सित थी , निक्षिप्त कर सकेगा , और ऐसा निक्षेप ऐसी रक़म की निविदा का प्रभाव रखेगा ।
संविदा करने के মিয় अक्षम व्यक्ति को या उस द्वारा सूचना इत्यादि ।
1908 का
103. इस अध्याय के उपबन्धों के अधीन जहां कि संविदा करने के लिए अक्षम किसी व्यक्ति पर या द्वारा किसी सूचना की तामील होनी या कराई जानी है, या ऐसे व्यक्ति द्वारा कोई निविदा या निक्षेप किया जाना या प्रतिगृहीत किया जाना या न्यायालय से निकाला जाना है वहां ऐसे व्यक्ति की सम्पत्ति के वैध रक्षक पर या के द्वारा ऐसी सूचना की तामील हो सकेगी या कराई जा सकेगी था के द्वारा निविदा या निक्षेप किया जा सकेगा या प्रतिगृहीत हो सकेगा या निकाला जा सकेगा, किन्तु जहां कि ऐसा कोई रक्षक नहीं है और ऐसे व्यक्ति के हितों में यह श्रपेक्षित या वांछनीय है कि इस अध्याय के उपबन्धों के अधीन सूचना की तामील होनी चाहिए या निविदा या निक्षेप किया जाना चाहिए वहां किसी भी न्यायालय से, जिसमें बन्धकमोचन के लिए वाव लाया जा सकता हो, ऐसी सूचना की तामील करने या प्राप्त करने , या ऐसी निविदा करने या प्रतिगृहीत करने या ऐसे निक्षेप को न्यायालय में करने या से निकालने के प्रयोजन से और उन सब पारिणामिक कार्यों को करने के लिए , जो यदि ऐसा व्यक्ति संविदा करने के लिए सक्षम होता तो उसके द्वारा किए जा सकते या किए जाने चाहिए थे , वादार्थ संरक्षक नियुक्त करने के लिए आवेदन किया जा सकेगा , और सिविल प्रक्रिया संहिता , 1908 की प्रथम अनुसूची के श्रादेश 32 के उपबन्ध यावत्शक्य ऐसे आवेदनों और उसके पक्षकारों और उसके अधीन नियुक्त संरक्षक को लागू होंगे ।
263
भारत का राजपत्र श्रसाधारण
खण्ड क ]
नियम बनाने की शक्ति ।
104. उच्च न्यायालय स्वयं अपने यहां और अपने अधीक्षणाधीन न्याया- लयों में इस अध्याय में अन्तविष्ट उपबन्धों के कार्यान्वयन के लिए समय समय पर ऐसे नियम बना सकेगा जो इस अधिनियम से संगत हो ।
अध्याय 5
स्थावर सम्पत्ति के पड्डों के विषय में
पट्टे की परि- भाषा ।
105. स्थावर सम्पत्ति का पट्टा ऐसी सम्पत्ति का उपभोग करने के अधिकार का ऐसा अन्तरण है , जो एक अभिव्यक्त या विवक्षित समय के लिए या शाश्वत काल के लिए , किसी क़ीमत के, जोदी गई हो या जिसे देने का वचन दिया गया हो , अथवा धन, या फालों के अंश या सेवा या किसी अन्य मूल्यवान वस्तु के , जो कालावधीय रूप से या विनिर्दिष्ट अवसरों पर अन्तरिती द्वारा , जो उस अन्तरण को ऐसे निबधनों पर प्रतिगृहीत करता है, अन्तरक को की या दी जानी है , प्रतिफल के रूप में किया गया हो ।
वह अन्तरक पट्टाकर्ता कहलाता है , वह अन्तरिती पट्टेदार कहलाता है , वह क़ीमत प्रीमियम कहलाती है और इस प्रकार देय या करणीय धन, अंश, सेवा या अन्य वस्तु भाटक कहलाती है ।
पट्टाकर्ता , पट्टे- प्रीमियम दार, और भाटक की परिभाषा ।
लिखित संविदा या स्थानीय प्रथा के अभाव में कुछ पट्टों की काला- वधि ।
106. तत्प्रतिकूल संविदा या स्थानीय विधि या प्रथा न हो तो कृषि या विनिर्माण के प्रयोजनों के लिए स्थावर सम्पत्ति का पट्टा ऐसा वर्षानुवर्षी पट्टा समझा जाएगा जो या तो पट्टाकर्ता या पट्टेदार द्वारा छह मास की ऐसी सूचना द्वारा पर्यवसेय है जिसका अवसान किसी अभिधूति वर्ष के अन्त के साथ होता है ; और किसी अन्य प्रयोजन के लिए स्थावर सम्पत्ति का पट्टा मासानुमासी पट्टा समझा जाएगा , जो या तो पट्टाकर्ता या पट्टेदार द्वारा पन्द्रह दिन की ऐसी सूचना द्वारा पर्यवसेय है जिसका अवसान किसी अभिधृति मास के अन्त के साथ होता है ।
इस धारा के अधीन हर सूचना लेखबद्ध और उसे देने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से हस्ताक्षरित होगी और उस पक्षकार को , जिसे उसके द्वारा आबद्ध करना आशयित है या तो डाक द्वारा भेजी जाएगी या स्वयं उस पक्षकार को या उसके कुटुम्बिया या नौकरों में से किसी एक को, उसके निवास पर निविदत्त या परिदत्त की जाएगी, या ( यदि ऐसी निविदा या परिदान साध्य नहीं है तो) सम्पत्ति के किसी सहज दृश्य भाग पर लगा दी जाएगी ।
पट्टे कैसे किये जाते हैं ।
107. स्थावर सम्पत्ति का वर्षानुवर्षी या एक वर्ष से अधिक किसी अवधि का या वाषिक भाटक आरक्षित करने वाला पट्टा केवल रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया जा सकेगा ।
स्थावर सम्पत्ति के अन्य सब पट्टे या तो रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा या क़ब्जे के परिदान सहित मौखिक करार द्वारा किए जा सकेंगे ।
जहां कि स्थावर सम्पत्ति का पट्टा रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा किया गया है वहां ऐसी लिखत या जहां कि एक लिखत से अधिक लिखत हैं वहां हर एक ऐसी लिखत पट्टाकर्ता और पट्टेदार दोनों द्वारा निष्पादित की जाएंगी ;
264
भारत का राजपत्न असाधारण
[भाग 2
परन्तु राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय समय पर निदिष्ट कर सकेगी कि वर्षानुवर्षी या वर्ष से अधिक अवधि के या वार्षिक भाटक आरक्षित करने वाले पट्टों को छोड़ कर स्थावर सम्पत्ति के पट्टे या ऐसे पट्टों का कोई वर्ग अरजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा या क़ब्ज़े के परिदान बिना मौखिक क़रार द्वारा किया जा सकेगा ।
पट्टाकर्ता और
पट्टेदार
और
के अधिकार दायित्व ।
108. तत्प्रतिकूल संविदा या स्थानीय प्रथा न हो तो स्थावर सम्पत्ति का पट्टाकर्ता और पट्टेदार एक दूसरे के विरुद्ध क्रमशः वे अधिकार रखते हैं और उन दायित्वों के अध्यधीन होते हैं जो निम्नलिखित नियमों में या उनमें से ऐसों में, जो उस पट्टाकृत सम्पत्ति को लागू हों, वर्णित हैं--
( क ) पट्टाकर्ता के अधिकार और वायित्व
(क ) सम्पत्ति के श्राशयित उपयोग के बारे की सम्पत्ति में की किसी तात्विक त्रुटि को , जिसे पट्टाकर्ता जानता है और पट्टेवार नहीं जानता और मामूली सावधानी बरत कर भी मालूम नहीं कर सकता पट्टेदार से प्रकट करने को पट्टाकर्ता आबद्ध है ;
(ख ) पट्टाकर्ता पट्टेदार की प्रार्थना पर उसे सम्पत्ति पर क़ब्जा देने के लिए आबद्ध है ;
( ग ) यह समझा जाएगा कि पट्टेवार से पट्टाकर्ता यह संविदा करता है कि यदि पट्टेदार पट्टे में आरक्षित भाटक देता रहे और पट्टेदार पर आबद्धकर संविदाओं का पालन करता रहे , तो उस पट्टे द्वारा परिसीमित समय के दौरान में वह सम्पत्ति को निविघ्न धारण कर सकेगा ।
ऐसी संविदा का फ़ायदा पट्टेदार के उस हित से उपाबद्ध होगा और उसी के साथ जाएगा , जो उसका पट्टेदार के नाते हो, और ऐसे ह्र व्यक्ति द्वारा प्रवर्तित कराया जा सकेगा जिसमें वह पूर्ण हित या उसका कोई भाग समय -समय पर निहित हो ।
( ख ) पट्टेवार के अधिकार और वायित्व
(घ) यदि पट्टे के चालू रहने के दौरान में सम्पत्ति में कोई अनुवृद्धि होती है तो ऐसी अनुवृद्धि ( जलोढ़ सम्बन्धी तत्समय - प्रवृत्त विधि के अध्यधीन ) पट्टे में समाविष्ट समझी जाएगी ;
( ङ) यदि अग्नि , तूफ़ान , या बाढ़ से अथवा किसी सेना या भीड़ द्वारा की गई हिंसा से अथवा अन्य अप्रतिरोध्य बल से सम्पत्ति का कोई तात्विक भाग पूर्णतः नष्ट हो जाए या उन प्रयोजनों के लिए , जिसके लिये वह पट्टे पर दी गई थी , सारवान रूप में और स्थायी तौर पर अयोग्य हो जाए तो पट्टा, पट्टेवार के विकल्प पर , शून्य होगा ;
परन्तु यदि क्षति पट्टेदार के सदोष कार्य या व्यतिक्रम के कारण हो तो वह इस उपबन्ध का फ़ायदा उठाने का हक़दार नहीं होगा , 264
भारत का राजपत्र असाधारणं
खण्ड 1 क ]
( च ) यदि पट्टाकर्ता सूचना के पश्चात् युक्तियुक्त समय के अन्दर सम्पत्ति की ऐसी मरम्मत करना उपेक्षित करे , जिसे करने के लिए बह आबद्ध है , तो पट्टेदार स्वयं उसे करा सकेगा मौर ऐसी मरम्मत का व्यय भाटक में से ब्याज सहित काट सकेगा या पट्टाकर्ता मे अन्यथा वसूल कर मकेगा ;
( छ) यदि पट्टाकर्ता ऐसा गदाय करने में उपेक्षा करे , जिसे करने के लिए वह आबद्ध है , और जो यदि उस द्वारा न किया जाए तो पट्टेदार से या उस सम्पत्ति से वसूलीय है, तो पट्टेदार ऐसा संदाय स्वयं कर सकेगा और उसे उस भाटक में से ब्याज सहित काट सकेगा या पट्टाकर्ता से अन्यथा वसूल कर सकेगा ।
( ज) पट्टेवार पट्टे का पर्यवसान किए आने के पश्चात् भी, किसी भी समय , जब तक पट्टे की सम्पत्ति पर उसका कब्जा है , किन्तु तत्पश्चात् नहीं , उन सब वस्तुओं कोजो उसने भूबद्ध की हूँ हटा सकेगा, परन्तु यह तब जब कि वह सम्पत्ति को उसी अवस्था में छोड़े जिसमें उसने उसे प्राप्त किया था ;
(श) जब कि अनिश्चित कालावधि का पट्टा पट्टेदार के व्यतिक्रम के सिवाय किसी अन्य कारण द्वारा पर्यवसित कर दिया जाता है तब वह या उसका विधिक प्रतिनिधि पट्टेदार द्वारा रोपित या बोई गई और उस सम्पत्ति पर उस समय , जब पट्टे का पर्यवसान किया जाता है , उगी हुई कुल फसलों का ग्रौर उन्हें एकत्रित करने और ले जाने के लिए अबाध रूप से आने जाने का हक़दार होगा ;
( अ ) पट्टेदार सम्पत्ति में के अपने पूर्ण हित को या उसके भाग को आत्यन्तिक रूप से अथवा बन्धक या उपपट्टे द्वारा अन्तरित कर सकेगा, और ऐसे हित या भाग का अन्तरिती उसे पुन अन्तरित कर सकेगा । पट्टेदार का पट्टे से संलग्न दायित्वों से किसी के अध्यधीन रहना केवल ऐसे अन्तरण के कारण परिविरत न हो जाएगा ;
इस खंड की कोई भी बात अधिभोग का अनन्तरणीय अधिकार रखने वाले किसी अभिधारी को , उस सम्पदा के फार्मर को, जिस सम्पदा के लिए राजस्व देने में व्यतिक्रम हुआ है, या किसी प्रतिपाल्य अधिकरण के प्रबन्ध के अधीन सम्पदा के पट्टेदार को ऐसे अभिधारी , फार्मर या पट्टेदार के नाते अपने हित का समनुदेशन करने के लिए प्राधिकृत करने वाली नहीं समश्नी जाएगी ;
( ८) पट्टेदार उस हित की , जिसे पट्टेदार लेने वाला है , प्रकृति या विस्तार के बारे में ऐसा तथ्य, जिसे पट्टेवार जानता है और
827 G. of I.-B.
266
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
पट्टाकर्ता नहीं जानता और जिससे ऐसे हित के मूल्य में तात्त्विक वृद्धि होती है , पट्टाकर्ता को प्रकट करने के लिए आबद्ध है;
( ठ ) पट्टेदार उचित समय और स्थान पर पट्टाकर्ता या उसके तन्निमित्त अभिकर्ता को प्रीमियम या भाटक देने या निविदत्त करने के लिए आबद्ध है ।
(ड) पट्टेदार सम्पत्ति में युक्तियुक्त घिसाई या अप्रतिरोध्य बल द्वारा हुए परिवर्तनों के सिवाय सम्पत्ति को वैसी ही अच्छी हालत में , जैसी में वह उस समय थी जब उस पर उसका क़ब्ज़ा कराया गया था , रखने के लिए. और पट्टे के पर्यवसान पर प्रत्यावर्तन करने के लिए और पट्टाकर्ता और उसके अभिकर्ताओं को पट्टे की अवधि के वीरान सब युक्तियुक्त समयों पर सम्पत्ति में प्रवेश करने और उसकी हालत का निरीक्षण करने देने और उसकी हालत में किसी खराबी की सूचना देने या सूचना वहाँ छोड़ने की अनुशा देने के लिए आबद्ध है ; तथा जब कि ऐसी खराबी पट्टेदार या उसके सेवकों या अभिकर्ताओं के किसी कार्य या व्यतिक्रम द्वारा दुई हो तब वह ऐसी सूचना के दिये जाने या छोड़े जाने से तीन मास के अन्दर उसे ठीक करने के लिए आबद्ध है ;
( ढ ) यदि सम्पत्ति या उसके किसी भाग के प्रत्युद्धरण के लिए किसी कार्यवाही की या ऐसी सम्पत्ति से संयुक्त पट्टाकर्ता के अधिकारों पर किसी अधिक्रमण की या उनमें किसी हस्तक्षेप की जानकारी पट्टेदार को हो जाए , तो वह पट्टाकर्ता को उसकी सूचना युक्तियुक्त तत्परता से देने के लिए आबद्ध है।
( ण ) पट्टेदार सम्पत्ति का और उसकी पैदावार का ( यदि कोई हो ) ऐसे उपयोग कर सकेगा जैसे मामूली प्रज्ञावाला व्यक्ति करता, यदि वह उसकी अपनी होती किन्तु सम्पत्ति का उस प्रयोजन से भिन्न , जिसके लिए वह पट्टे पर दी गई थी , उपयोग न तो स्वयं करेगा , न किसी अन्य को करने देगा , न काष्ठ काटेगा , न बेंचेगा, न पट्टाकर्ता के निर्माणों को गिराएगा , न नुक़सान पहुंचाएगा, न ऐसी खानों या खदानों को खुदवाएगा, जो पट्टा देने के समय खुली नहीं थीं, न कोई ऐसा अन्य कार्य करेगा जो उस सम्पत्ति के लिए नाशक हो या स्थायी रूप से क्षतिकर हो ;
(त) वह पट्टाकर्ता की सम्मति के बिना उम सम्पत्ति पर कोई स्थायी संरचना कृषि-प्रयोजनों से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए खाड़ी न करेगा ।
267
भारत का राजपत्ल असाधारण
खण्ड क]
(थ ) पट्टे के पर्यवसान पर पट्टेदार पट्टाकर्ता को सम्पत्ति कर क़ब्ज़ा देने के लिए आबद्ध है ।
पट्टाकर्ता अन्तरिती अधिकार । के के 109. यदि पट्टाकर्ता पट्टे पर दी हुई सम्पत्ति को या उसके किसी भाग को या उसमें के अपने हित के किसी भाग को ग्रन्तरित कर देता है तो अन्तरिती तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में उम अन्तरित सम्पत्ति या भाग के बारे में पट्टाकर्ता के वे सब अधिकार तब तक रखेगा और यदि पट्टेदार ऐसा निर्वाचन करे तो पट्टाकर्ता के सब दायित्वों के अध्यधीन तत्र तक रहेगा , जब तक वह उसका म्यामी रहता है, किन्तु पट्टाकर्ता का पट्टे द्वारा अपने पर अधिरोपित दायित्वों में से किसी के अध्यधीन रहना केवल ऐसे अन्तरण के कारण ही परिविरत न हो जाएगा, जब तक कि पट्टेदार अन्तरिती को अपने प्रति दायी व्यक्ति मानने का निर्वाचन न कर ले ;
परन्तु अन्तरिती अन्तरण से पहले के भाटक के शोध्य बक़ायों का हकदार नहीं है, और यदि पट्टेदार यह विश्वास करने का कारण न रखते हुए कि ऐसा अन्तरण किया गया है, पट्टाकर्ता को भाटक दे देता है तो पट्टेदार अन्तरिती को ऐसा भाटक पुनः देने का दायी न होगा ।
पट्टाकर्ता, अन्तरिती और पट्टेदार यह अवधारित कर सकेंगे कि पट्टे द्वह्मग आरक्षिन प्रीमियम या भाटक का कौन सा अनुपात इस प्रकार अन्तरित भाग के लिए देय है और उनमें असहमति होने की दशा में ऐसा अवधारण ऐसे किसी भी न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा जो पट्टे पर दी गई सम्पत्ति के कब्जे के लिए वाद को ग्रहण करने की अधिकारिता रखता हो ।
का उस दिन अपवर्जन जिससे अवधि का प्रारम्भ होता है ।
110. जहां कि किसी स्थावर सम्पत्ति के पट्टे द्वारा परिसीमित समय का किसी विशिष्ट दिन से प्रारम्भ होना अभिव्यक्त है वहां उस समय की संगणना करने में यह दिन अपर्जित कर दिया जाएगा । जहां कि प्रारम्भ होने के लिए कोई दिन नामित न हो वहां इस प्रकार परिसीमिन समय पट्टा करने के दिन से प्रारम्भ होना है ।
वर्ष के पट्टे की कालावधि ।
जहां कि इस प्रकार परिमीमित समय एक वर्ष या कई वर्षों का है वहां नत्प्रतिकूल अभिव्यक्त करार न हो तो पट्टा उस दिन की आब्दिकी के पूरे दिन चालू रहेगा जिस दिन मे ऐमा समय प्रारम्भ होता . है ।
पट्टे का पर्यव- मान करने के लिए विकल्प ।
जहां कि यह अभिव्यक्त है कि इस प्रकार परिमीमित समय अपने अत्रमान में पूर्व पर्यवसेय है और पट्टे में इस का वर्णन नही है कि किस के विकल्प पर वह इस प्रकार पर्यवमेय है , वहां ऐसा विकल्प पट्टेदार को प्राप्त होगा , पट्टाकर्ता को नहीं ।
111. स्थावर मम्पत्ति के पट्ट का पर्यवसान हो जाता है--
पट्टे का पर्यवमान ।
( क ) नद्वारा परिसीमित समय के बीत जाने से ,
( ख ) जहां कि ऐसा समय किसी घटना के घटित होने को गर्म पर परिमीमिन है , वहां ऐसी घटना के घटित होने से, 268
भारत का राजपक्ष असाधारण
[भाग 2
(ग) जहां कि उस सम्पत्ति में पट्टाकर्ता के हित का पर्यवसान किसी घटना के घटित होने पर होता है या उसका व्ययन करने की उसकी शक्ति का विस्तार किसी घटना के घटित होने तक ही है , वहां ऐसी घटना के घटित होने से,
( घ ) उस दशा में , जब कि उस सम्पूर्ण सम्पत्ति में पट्टेदार और पट्टाकर्ता के हित एक ही व्यक्ति में एक ही समय एक ही अधिकार के नाते निहित हो जाते हैं,
( ङ) अभिव्यक्त अभ्यर्पण द्वारा , अर्थात् उस दशा में जबकि पट्टे- वार पट्टे के अधीन अपना हित पारस्परिक करार द्वारा पट्टाकर्ता के प्रति छोड़ देता है,
( च) विवक्षित अभ्यपर्ण द्वारा ,
( छ) समपहरण द्वारा अर्थात् ( 1 ) उस दशा में जब कि पट्टेदार किसी ऐसी अभिव्यक्त शर्त को भंग करता है , जिससे यह उपबंधित है कि उसका भंग होने पर पट्टाकर्ता पुनः प्रवेश कर सकेगा ; या ( 2) उस दशा में , जब कि पट्टेवार किसी अन्य व्यक्ति का हक़ खड़ा करके या यह दावा करके कि वह स्वयं हक़दार है अपनी पट्टेदारी हैसियत का त्याग करता है , या ( 3 ) जब कि पट्टेदार दिवालिया न्यायनिर्णीत हो जाता है और पट्टा यह उपबंध करता है कि पट्टाकर्ता ऐसी घटना के घटित होने पर पुनः प्रवेश कर सकेगा, और जब कि उन दशाओं में से किसी में पट्टाकर्ता या उसका अन्तरिती पट्टेदार को पट्टे का पर्यवसान करने के अपने ग्राशय की लिखित सूचना देता है,
( ज) पट्टे का पर्यवसान करने या पट्टे पर दी गई सम्पत्ति को छोड़ देने या छोड़ देने के आशय की एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार को सम्यक् रूप से दी गई सूचना के अवसान पर ।
खंड ( च) का दृष्टांत
पट्टाकृत सम्पत्ति का नया पट्टा एक पट्टेदार अपने पट्टाकर्ता से वर्तमान पट्टे के चालू रहने के दौरान में प्रभावी होने के लिए प्रलिगृहीत करता है । यह पूर्वोक्त पट्टे का विवक्षित अभ्यर्पण है और उस पट्टे का तदुपरि पर्यवसान हो जाता है ।
सघपहरण प्रविश्यजन । का
112. धारा 111 के खंड ( छ ) के अधीन हुआ समपहरण उस भाटक के प्रतिग्रहण द्वारा , जो समपहरण की तिथि से शोध्य हो गया है, या ऐसे भाटक के लिए करस्थम् द्वारा या पट्टाकर्ता की तरफ से किसी ऐसे अन्य कार्य द्वारा , जिससे पट्टे को नाम् मानने का उसका आशय दर्शित होना हो, अधित्यक्त हो जाता है :
269
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1 क ]
परम्सु यह तब जब कि पट्टाकर्ता को यह जानकारी हो कि समपहरण उपगत हो गया है ;
परन्तु यह और भी कि जहां पट्टेदार को समपहरण के आधार पर बेदखल करने के लिए वाद संस्थित किए जाने के पश्चात् भाटक प्रतिगृहीत कर लिया जाता है यहां ऐसा प्रनिग्रहण अधित्यजन नहीं है ।
छोड़ देने की- सूचना का अत्रि- त्यजन ।
113. धारा 111 के खंड ( ज ) के अधीन दी गई सूचना जिस व्यक्ति को दी गई है, उस व्यक्ति की अभिव्यक्त या विवक्षित सम्मति से वह उसे देने वाले व्यक्ति के किसी ऐसे कार्य द्वारा , जिससे पट्टे को चाम् मानने का उसका आशय दशित होता है , अधित्यक्त हो जानी है ।
(क ) पट्टाकर्ता क पट्टेदार ख को पट्टे पर दी गई सम्पति को छोड़ देने के लिए सूचना देता है । सूचना का अवसान हो जाता है । उस भाटक की निविदा , जो सूचना के अवसान से सम्पत्ति मद्धे शोध्य हुआ हो त्व करता है और क उसे प्रतिगृहीत कर लेता है । सूचना अधित्यक्त हो जाती है ।
(ख ) पट्टाकर्ता क पट्टेदार व को पट्टे पर दी गई सम्पत्ति को छोड़ देने के लिए सूचना देता है । सूचना का अवमान हो जाता है और न अपना कब्जा। क़ायम रखता है । क छोड़ देने की दूसरी सूचना को अपने पट्टेदार के नाते देता है । पहली सूचना अधित्यक्त हो जाती है ।
भाटक का सदाय न करने के कारण समप- हरण से मुक्ति ।
114. जहां कि स्थावर सम्पत्ति के पट्टे का पर्यवसान भाटक न देने में समपहरण द्वारा हो गया है और पट्टाकर्ता पट्टेदार को बेदखल करने के लिए बाद लाता है वहां यदि वाद की सुनवाई में पट्टेदार पट्टाकर्ता को बक़ाया भाटक उस पर ब्याज सहित और बाद के उसके पूरे खर्चे दे देता है या निविदत करता है या ऐसी प्रतिभूति दे देता है , जिसे न्यायालय ऐसा संदाय पन्द्रह दिन मे किए जाने के लिए पर्याप्त समझता है , तो न्यायालय बेदखली के लिए डिक्री देने के बदले पट्टेदार को समपह्मण से मुक्ति देने का आदेश दे सकेगा और नखुर्पार पट्टेदार पट्टाकृत सम्पत्ति को ऐसे धारित करेगा मानो समपहरण हुआ ही नहीं था ।
कुछ अन्य वणाों म समपहरण से मुक्ति ।
114क . जहां कि स्थावर सम्पत्ति के किसी पट्टे का पर्यवसान किसी ऐसी अभिव्यक्त शर्त के भग के कारण समपहरण द्वारा हो गया है , जो यह उपबंधित करती है कि उसके भंग पर पट्टाकर्ता पुनः प्रवेश कर सकेगा, वहां बेदखली के लिए कोई बाद तब तक न होगा जब तक कि और यदि पट्टा- कर्ता ने पट्टेदार पर
(क) परिवादित विशिष्ट भग का विनिर्देश करने बाली, तथा 270
भारत का राजपत्र असाधारण
[भग 2
( ख) यदि भंग उपचारयोग्य है तो उस भंग का उपचार करने की पट्टेदार से अपेक्षा करने वाली ,
लिखित सूचना की तामील न कर दी हो और यदि वह भंग उपचारयोग्य है तो पट्टेवार उसका उपचार सूचना की नामील की तारीख में युक्तियुक्त समय के भीतर करने में असफल न रहा हो ।
इस धारा की कोई भी बात ऐसी किसी अभिव्यक्त शर्त को , जो पट्टे पर दी गई सम्पत्ति के समनुदेशन , उपपट्टाकरण , कब्जा-विलगन या व्ययन के विरुद्ध है , अथवा भाटक के असंदाय की दशा में समपहरण से सम्बन्धिन किसी श्रभिध्यक्न शर्त को लागू नहीं होगी ।
अभ्यर्पण और
समपहरण का उपपट्टों प्रभाव । पर
115. स्थावर सम्पत्ति के पष्ट्ट के अभिव्यक्त या विवक्षित अभ्यर्पण का प्रतिकूल प्रभाव सम्पत्ति के या उसके किसी भाग के ऐसे उपपष्ट्ट पर नहीं पड़ता , जो पट्टेदार द्वारा उन निबंधनों और णों पर पहले ही अनुदस कर दिया गया है जो ( भाटक की रकम के बारे में के सिवाय ) मारतः वे ही हैं, जो मूल पट्टे की हैं , किन्तु जब तक कि यह अभ्यर्पण नया पट्टा अभिप्राप्त करने के प्रयोजन में न किया गया हो उपपट्टेदार द्वारा देय भाटक और उसे आबद्ध करने वाली संविदाएं क्रमशः पट्टाकर्ता को देय और उसके द्वारा प्रवर्त्तनीय रहेंगी ।
ऐसे पट्टे का समपहरण ऐसे सब उपपट्टों को यहां के सिवाय बासिभ कर देता है जहां कि ऐसा समपहरण पट्टाकर्ता द्वारा उपपट्टेदारों को कपट- वचित करने के लिए उपाप्त किया गया है, या जहां कि समपहरण से मुक्ति धाग 114 के अधीन अनुदत की गई है ।
अतिधारण प्रभात्र । का
116. यदि मम्पत्ति का पट्टेदार या उपपट्टेदार पट्टेदार को अनुदत्त पट्टे के पर्यवसान के पश्चात् उस पर अपना क़ब्जा बनाए रखता है और पट्टाकर्ता या उसका विधिक प्रतिनिधि पट्टेदार या उपपट्टेदार से भाटक प्रति- गृहीत करता है या कब्जा बनाए रखने के लिए अन्यथा उसको अनुमति देता है तो तत्प्रतिकूल क़रार के अभाव में पट्टा धारा 106 में यथा विनिर्दिष्ट उम प्रयोजन के अनुसार, जिसके लिए सम्पत्ति पट्टे पर दी गई थी , वर्षानुवर्ष या मामानुमाम के लिए नवीकृत हो जाना है ।
( क ) क एक गृह क्ष को पांच वर्ष के लिए पट्टे पर देता है । ख वाह गृह ग को 100 रुपये मासिक भाटक पर उपपट्टे पर देता है । पांच वर्ष का अवमान हो जाता है किन्तु ग गृह पर कब्जा बनाए रखना है और क को भाटक देना है । ग का पट्टा मामानुमाम नवीकृत होता रहता है ।
271
भारत का राजपत्र असाधारण
खंण्ड 1 क]
(ख ) खकोक एक फार्म ग के जीवनपर्यन्त के लिए पट्ट पर देता है । न की मृत्यु हो जाती है किन्तु क की अनुमति से रख कब्ज़ा चनाए रखता है । का पट्टा वर्षानुवर्ष नत्रीकृत होता रहता है ।
कृषि प्रयोजनों वाले पट्टों को छूट ।
117. इस अध्याय के उपबन्धों में से कोई भी उपबन्ध कृषि प्रयोजनों वाले पट्टों को वहां तक के सिवाय लागू नहीं होता जहां तक कि गज्य सरकार शासकीय राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा घोषित कर दें कि ऐसे सब उपबन्ध या उन में से कोई उपबन्ध ऐसे सब पट्टों या उनमें से किसी के विषय में तत्समय प्रवृत स्थानीय विधि के , यदि कोई हो, उपबन्धों के सहित या अध्यधीन लागू होंगे ।
ऐसी अधिसूचना तब तक प्रभाष में न श्राएगी जब तक उसके प्रकाणम की तारीख से छह मास का अवसान न हो जाए ।
अध्याय 6
विनिमयों के विषय में
" विनिमय " की परिभाषा ।
118. जब कि दो व्यक्ति एक चीज का स्वामित्व किसी अन्य बीज के स्वामित्व के लिए परम्पर अन्तरित करते है जिन दोनों श्रीष्ठों में से कोई भी केवल घम नहीं है . या दोनों चीजे केवल धन हैं, तब वह संब्यवहार ' बिनिमय ' कहा जाता है ।
विनिमय को पूर्ण करने के लिए सम्पत्ति का अन्तरण केवल ऐसे प्रकार से किया जा सकता है जैसा ऐसी सम्पत्ति के विक्रय द्वारा श्रन्तरण के लिए उपबन्धित है ।
विनिमय में प्राप्स चीज से वंचित किए गए पक्षकार का अधिकार ।
119. यदि विनिमय का कोई पक्षकार या एसे पक्षकार से व्युत्पन्न अधिकार के द्वारा या अधीन दावा करने वाला कोई व्यक्ति दूसरे पक्षकार के हक में किसी त्रुटि के कारण उस चीज या चीज़ के भाग से , जो विनिमय द्वारा उसने प्राप्त की है, वचित हो जाता है तो जब तक कि विनिमय के निबन्धनों से कोई नत्प्रतिकूल श्राशय प्रतीत नहीं होता हो ऐसा दूसरा पक्षकार उसके प्रति या उससे व्युत्पन्न अधिकार के द्वारा या अधीम दावा करने वाले व्यक्ति के प्रति उस हानि के लिए, जो तद्द्वारा हुई है, दायी है , अथवा इस प्रकार वंचित व्यक्ति के विकल्प पर उस अन्तरित चीज़ को लौटाने के लिए दायी है, यदि अन्तरित चीज तब तक ऐसे दूसरे पक्षकार या उसके विधिक प्रतिनिधि या उसके अप्रतिफल श्रन्तरिती के कब्जे में ही हो ।
पक्षकारों के अधि- कार और दायित्व ।
120. इस अध्याय में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय ह्र एक पक्षकार उस चीज़ के बारे में , जो वह देता है , विक्रेता के अधिकार रखता है और विक्रेता के दायित्वो के अध्यधीन होता है और उस चीज के बारे में , जिसे वह लेता है , कैता के अधिकार रखता है और क्रेता के दायित्वों के अध्यधीन होता है ।
272
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
धन का विनिमय ।
121. धन के विनिमय पर हर एक पक्षकार अपने द्वारा दिए गए भ्रम के असली होने की तद्द्वारा वारण्टी देता है ।
अध्याय 7
दान के विषय में
"वान" की परि- भाषा ।
122. " दान " किसी वर्तमान जंगम या स्थावर सम्पत्ति का वह अन्तरण है, जो एक व्यक्ति द्वारा , जो दाता कहलाता है, दूसरे व्यक्ति को , जो भावाता कहलाता है, स्वेच्छया और प्रतिफल के बिना किया गया हो भौर आदाता द्वारा या की ओर से प्रतिगृहीत किया गया हो ।
प्रतिप्रक्षण करमा होगा । कब
ऐसा प्रतिग्रहण दाता के जीवन काल में और जब तक वह देने के लिए समर्थ हो , करना होगा
यवि प्रतिग्रहण करने से पहले आदाता की मत्यु हो जाती है तो वशम शून्य हो जाता है ।
अन्तरण कैसे किया जाता है ।
123. स्थावर सम्पत्ति के दान के प्रयोजन के लिए वह अन्तरण वाता द्वारा या उसकी ओर से हस्ताक्षरित और कम से कम दो साक्षियों द्वारा अनु- प्रमाणित र। जस्ट्रीक्कृत लिखत द्वारा करना होगा ।
जंगम सम्पत्ति के दान के प्रयोजन के लिए अन्तरण या तो पथा- पूर्वोक्त प्रकार से हस्ताक्षरित रजिस्ट्रीकृत लिखत द्वारा , या परिवाम द्वारा , किया जा सकेगा ।
ऐसा परिदान उसी प्रकार से किया जा सकेगा जैसे बेचा शुभा माल परिदत्त किया जा सकता हो ।
124. जिस वान में वर्तमान और भावी सम्पत्ति दोनों समाविष्ट हों वह भावी सम्पत्ति के विषय में शून्य है ।
वर्तमान और भाषी सम्पत्ति का दान ।
125. ऐसे दो या अधिक आदालाओं को किसी बीज का दान , जिनमें से एक उसे प्रतिगुहीत नहीं करता है , उस हित के सम्बन्ध में शून्य है जिसे यदि वह प्रतिगृहीत करता तो वह लेता ।
ऐसे कई व्यक्तियों को दान, जिन में से एक प्रतिगृहीत नहीं करता है ।
दान निलम्बित प्रतिसंहृत या कस किया जा सकेगा ।
126. दाता और श्रदाता क़रार कर सकेंगे कि किसी ऐसी विनिदिष्ट घटमा के घटित होने पर, जो वाता की इच्छा पर निर्भर नहीं करती , वा निलंबित या प्रतिसंहृत हो जाएगा , किन्तु वह दाम , जिसके बारे में पक्षकार क़रार करते हैं कि वह दाता की इच्छामात्र से पूर्णतः या भागतः प्रतिसंहरणीय होगा, यथास्थित्ति पूर्णतः या भागतः शून्य है ।
273
भारत का राजपत्र असाधारण
खण्ड 1 क]
दान उन दशाओं में से ( प्रतिफल के अभाव या असफलता की दशा को छोड़ कर ) , किसी भी दशा में प्रतिसंहृत किया जा सकेगा जिनमें कि यदि यह संविदा होता तो विखण्डित किया जा सकता ।
यथा पूर्वोक्त को छोड़ कर दान प्रतिसंहृत नहीं किया जा सकता ।
इस धारा में अन्र्तावष्ट कोई भी बात बिना सूचना सप्रतिफल अन्त- रितियों के अधिकारों पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।
वृष्टांत
( क) को फ एक खेल ख की अनुमति से अपना यह अधिकार श्रारक्षित कर के देता है कि ख और उसके बंशजों के क के पहले मर जाने की सूरत में वह उसे वापस ले सकेगा । क के जीवन काल में ख अपने वंशज छोड़े बिना मर जाता है । फखेत वापस ले सकेगा ।
(ख ) खको कएक लाख रुपया, ख की अनुमति से अपना यह अधिकार आरक्षित करते हुए देता है कि वह उन लाख रुपयों में से 10,000 रुपये जब जी चाहे वापस ले सकेगा । 90,000 रुपयों के बारे में दान वैध है, किन्तु 10,000 रुपयों के बारे में , जो क के ही बने रहते हैं , शून्य है ।
दुर्भर वाम ।
127. जहां कि दान , एक ही व्यक्ति को ऐसी कई चीजों के एकल अन्तरण के रूप में है जिनमें से एक पर बाध्यता का बोझ है और अन्यों पर नहीं है . वहां श्रादाता उस दान द्वारा कुछ नहीं पा सकता जब तक कि वह उसे पूर्णतः प्रतिगृहीत नहीं करता ।
जहां कि कोई दान कई चीजों के एक ही व्यक्ति को दो या अधिक पृथक् और स्वतन्त्र अन्तरणों के रूप में है , वहां आदाता उनमें से एक को प्रति- गृहीत करने के लिए और अन्यों को लेने से इन्कार करने के लिए स्वतन्त्र है चाहे पूर्व कथित फ़ायदाप्रद हो और पश्चात्कथित दुर्भर हो ।
निरहित व्यक्ति को दुर्भर दान ।
जो श्रदाता संविदा करने के लिए अक्षम है और किसी ऐसी सम्पत्ति को, जिस पर बाध्यता का बोक्ष है , प्रतिगहीत कर लेता है वह अपने प्रसिग्र ण से आबद्ध नहीं है । किन्तु यदि संविदा करने के लिए सक्षम होने के पश्चात् भौर बाध्यता की जानकारी रखते हुए वह दी हुई सम्पत्ति को प्रतिधृत कर लेता है, तो वह ऐसे आबद्ध हो जाता है ।
वृष्टीत
(क) फ के एक समृद्ध संयुक्त स्टाक कम्पनी भ में अंश हैं और कठि- नाइयों में ग्रस्त एक संयुक्त स्टाक कम्पनी म में भी उसके अंश हैं ।
म में के अंशों मद्धे भारी मांगों की प्रत्याशा है । क संयुक्त टाक कम्पनियों में के अपने सब अश खको दे देता है । म में के अंशों को प्रतिगृहीत करने से व इन्कार करता है । वह भ में के अंशों को नहीं ले सकता ।
827 G. of I.-9 .
27:4
भारत का राजपत्र असाधारण
[भाग 2
(ख ) क ऐसे गृह का पट्टा एस को देता है जो कुछ वर्षों की अवधि के लिए पट्टे पर उस द्वारा ऐसे भाटक पर लिया हुआ है, जिस भाटक को अवधि भर तक देने के लिए वह और उसके प्रतिनिधि आबद्ध हैं, और जो उतने से अधिक है जितने पर कि गृह पट्टे पर चढ़ाया जा सकता है , और एक पृथक् और स्वतन्त्र संव्यवहार के रूप में उसे एक धनराशि भी देता है । ख पट्टे को प्रतिगृहीत करने से इन्कार करता है । इस इन्कार के कारण उससे धन का समपहरण नहीं हो जाता ।
सर्वस्व आदाता ।
128. धारा 127 के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि जहां कि दाता की पूरी सम्पत्ति का दान है वहां अदाता दान के समय के दाता के सब शोध्य ऋणों और दायित्वों केलिए वैयक्तिक रूप से उस में समाविष्ट सम्पत्ति के विस्तार तक दायी है ।
129. इस अध्याय की किसी भी बात का सम्बन्ध सम्पत्ति के उन वानों से नहीं है जो मृत्यु को आसन्न मान कर किए गए हैं और न वह मोहमेडन विधि के किसी नियम पर प्रभाव डालने वाली समझी जाएगी ।
भासन्न मरण दान और मोह- मेडन विधि की व्यावृत्ति ।
अध्याय 8
अनुयोज्य वाबों के अन्तरण के विषय में
अनुयोज्य दावों का मन्तरण ।
130. ( 1 ) अनुयोज्य दावे का अन्तरण ( चाहे , वह प्रतिफल सहित या रहित हो ) ऐसी लिखत के निष्पादन द्वारा ही किया जाएगा जो अन्तरक या उस के सम्यक्रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित है, वह ऐसी लिखत के निष्पादन पर पूरा और प्रभावी हो जाएगा और तदुपरि अन्तरक के सब अधिकार भौर उपचार , चाहे वे नुक़सान के तौर पर हों या अन्यथा हों, अन्तरिती में निहित हो जाएंग , चाहे अन्तरण की ऐसी सूचना, जैसी एतस्मिन्पश्चात् उपबंधित है , दी गई हो या न री गई हो ;
परन्तु ऋण या अन्य अनुयोज्य दावे के बारे में हर व्यवहार , जो ऋणी द्वारा या अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया है जिससे या जिस के विरुद्ध अन्तरक यथा- पूर्वोक्त अन्तरण की लिखत के अभाव में ऐसा ऋण या अन्य अनुयोज्य दावा वसूल करने या प्रवर्तित कराने का हक़दार होता , ऐसे अन्तरण के मुकाबले में विधिमान्य होगा ( सिवाय वहां के जहां कि ऋणी या अन्य व्यक्ति उस अन्तरण का पक्षकार है या उसकी ऐसी अभिव्यक्त सूचना पा चुका है जैसी एतस्मिन्- पश्चात् उपबन्धित है ) ।
(2) अनुयोज्य दावे या अन्तरिती अन्तरण की यथापूर्वोक्त लिखत के निष्पादन पर उसके लिए वाद या कायघाहियां करने के लिए अन्तरक की सम्मति अभिप्राप्त किए बिना और उसे उनमें का पक्षकार बनाए बिना स्वयं अपने नाम से " वाद लाः या ऐसी कार्यवाहियो संस्थित कर सकेगा ।
भारत को राजपत्र असाधारण
275 बैंड क
1938 का 4 अपवाद- इस धारा की कोई भी बात किसी समुद्री बीमा या अग्नि बीमा पालिसी के अन्तरण को लागू नहीं है और न बीमा अधिनियम , 1938 की धारा 38 के उपबंधों पर प्रभाव डालती है ।
वृष्टांत
( 1) ख का क देनदार है । ख वह ऋण गको अन्तरित कर देता है । तब क से ऋण के चुकाने के लिए ण तक़ाज़ा करता है । अन्तरण की क को धार। 131 में यथा बिहित सूचना नहीं मिली है और वह त को संदाय कर देता है । यह संवाय विधिमान्य है , और ण उस ऋण के लिए क पर वाद नहीं ला सकता ।
( 2) क एक बीमा कम्पनी से अपने जीवन के लिए पालिसी लेता है और उस पालिसी को ' पान या भावी ऋण का संदाय प्रतिभूत करने के लिए किसी बैंक को समनुदिष्ट भ है । यदि क की मृत्यु हो जाती है, तो बैंक धारा 130 की उपधारा ( 1 ) के परेन्तुक और धारा 132 के उपबंधों के अध्यधीन क के निष्पा- दक की सहमति के बिना पालिसी की रकम पाने और उसके आधार पर वाद लाने का हक़दार है ।
सूचना का लिखित और हस्ताक्षरित होमा ।
131. अनुयोज्य दावे के अन्तरण की हर सूचना लिखित होगी और अन्तरक या इरा भिनित सम्यन् रूप से प्राधिकृत उसके अभिकर्ता द्वारा , या अन्तरक के हस्ताक्षर करने से इनकार करने की दशा में , अन्तरिती या उस के अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित होगी और उस में अन्तरिती का नाम और पता कथित होगा ।
132. अनुयोज्य दावे का अन्तरिती ऐसे दावे को उन सब दायित्वों और साम्याओं के अध्यधीन लेगा जिनके अध्यधीन अन्तरक अन्तरण की तारीख को उस दावे के बारे में था ।
अनुयोज्य दावे के अन्तरिती दायित्व । का
वृष्टांत
( i ) ण को क वह ऋण अन्तरित करता है जो त द्वारा उसे शोध्य है । * उस समय स का ऋणी है । त पर न उस ऋण के लिए वाद लाता है जो फको ख द्वारा शोध्य है । ऐसे बाद में ख वह ऋण मुजरा कराने का हक़दार है जो उसे क द्वारा शोध्य है, यद्यपि ग ऐसे अन्तरण की तारीख पर उसकी जानकारी नहीं रखता था ।
( ii ) क ने ख के पक्ष में ऐसी परिस्थितियों में बम्धपत्र का निष्पादन किया जिन में उसे इस बात का हक़ था कि वह बन्धपत्तन को परिदत्त और रद्द करवा ले । ख बन्धपत्र को ग को, जिसे ऐसी परिस्थितियों की सूचना नहीं है, मूल्यार्थं समनु- विष्ट कर देता है । ग बन्धपत्त्र को क के विरुद्ध प्रवृत्त नहीं करा सकता ।
ऋणी की शोधन क्षमता की वारण्टी ।
133. जहां कि ऋण का अन्तरक ऋणी की शोधनक्षमता की वारण्टी देता है वहां तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो वह वारण्टी उस ऋणी की अन्तरण के समय की शोधनक्षमता को ही लागू होती है और जहां कि अन्तरण प्रतिफल के लिए किया जाता है , यहां ऐसे प्रतिफल की रकम या मूल्य तक परिसीमित रहती है ।
276
भारत को राजपत्र असाधारण
[भाग 2
बन्धंकित ऋण ।
134. जहां कि ऋण वर्तमान या भावी ऋण को प्रतिभूत करने के प्रयोजन से अन्तरित किया जाता है वहां ऐसे अन्तरित किया गया ऋण यदि अन्तरक द्वारा प्राप्त या अन्तरिती द्वारा वसूल कर लिया जाता है तो वह प्रथमतः ऐसी वसूली के खर्चे के चुकाने में और द्वितीयतः उस श्रन्तरण द्वारा तत्समय प्रतिभूत रक़म की तुष्टि में या उस रकम मद्धे उपयोजनीय है और अवशिष्टि , यदि कुछ रहे , अन्तरक की या अन्य ऐसे व्यक्ति की होती है जो उसे प्राप्त करने का हक़दार है ।
अग्नि बीमा- पालिसी के अधीन के अधिकारों का समनुदेशन ।
135. अग्नि बीमा पालिसी के पृष्ठांकन या अन्य लेखन द्वारा ऐसे हर समनुदेशिती को , जिस में बीमाकृत विषय वस्तु में की सम्पत्ति समनवेशन की तारीख पर आत्यन्तिक रूप से निहित हो, बाद के सब अधिकार ऐसे अन्तरित और उसमें ऐसे निहित हो जाएंगे मानो उस पालिसी में अन्तर्विष्ट संविदा स्वयं उस से ही की गई थी ।
न्यायालय से संसक्त श्राफ़िसरों की असामर्थ्य ।
136. कोई भी न्यायाधीश , या विधि व्यवसायी अथवा कोई भी आफिसर , जो किसी न्यायालय से संसक्त है , किसी अनुयोज्य दावे में किसी अंश या हित का न तो क्रय करेगा , न दुर्व्यापार करेगा , न उस के लिए अनुबन्ध करेगा , और न उसे प्राप्त करने के लिए क़रार करेगा , और न कोई न्यायालय उसकी प्रेरणा पर या उस से व्युत्पन्न अधिकार के अधीन या द्वारा दावा करने वाले किसी व्यक्ति की प्रेरणा पर ऐसा कोई भी अनुयोज्य दावा प्रवृत्त करेगा जिस के बारे में उसने उपर्युक्त व्यवहार किया है ।
परक्राम्य लिखतों की व्यावृत्ति ।
137. इस अध्याय की पूर्वगामी धाराओं की कोई भी बात , स्टाकों, अंशों या डिबेन्चरों को अथवा उन लिखतों को , जो विधि या रूढ़ि द्वारा तत्समय परक्राम्य हैं , अथवा माल पर हक़ की वाणिज्यिक दस्तावेज को लागू नहीं है ।
स्पष्टीकरण "माल पर हक़ की वाणिज्यिक दस्तावेज्ज " पद के अन्तर्गत वहह्नपत्र , डाक वारण्ट , भाण्डागारिक प्रमाणपत्र, रेल रसीद , भाल के परिवान के लिए वारण्ट या आदेश , और ऐसी अन्य कोई भी दस्तावेज आती है जिसका व्यापार के मामुली अनुक्रम में उपयोग माल पर क़ब्ज़े या नियंत्रण के सबूत के रूप में किया जाता है , या जो उस दस्तावेज पर क़ब्ज़ा रखने वाले व्यक्ति को वह माल , जिस के बारे में वह दस्तावेज है अन्तरित करने या प्राप्त करने के लिए पृष्ठांकन द्वारा या परिदान द्वारा प्राधिकृत करती है या प्राधिकृत करने वाली तायित है ।
अनुसूची
(क) स्टेट्यूट्स
विषय
निरसन का विस्तार
वर्ष और अध्याय
हेनरी 8 चैप्टर 10
27
यूजेज
पूरा
एलिजाबेथ चैप्टर 5
13
फाडूलेन्ट कन्वेयन्सेज पूरा
पूरा
फाडूलेन्ट कन्वेयन्सेज्ज
एलिजाबेथ चैप्टर 4
27
4 विलियम एंड मेरी
पूरा
चंप्टर 16
फ्लैन्डस्टाइन
मार्गेजेज
(ख ) सपरिषद् गवर्नर जनरल के अधिनियम
विषय
निरसन का विस्तार
संख्या और वर्ष
1842 का 9
लीज एण्ड रिलीज
पूरा
1834 का 31
भूमि के हस्तान्तरण के धारा 17 ढंग
अन्तःकालीन
1855 का 11
धारा ( 1 ) ; नाम में से
लाभ और अभि-
वृद्धि
"टु लिमिट दिलाय-
" टु मीन प्राफिट्स एण्ड" शब्द और उद्देशिका में से बिलिटी फार मीम
प्राफ्ट्सि एण्ड" शब्द
1866 का 27
धारा 31
इण्डियन ट्रस्टी एक्ट
1872 का 4
पंजाब लाज एक्ट
जहां तक कि बह सन 1798 के बंगाल रेगूलेशन 1 भौर 1806 के बंगाल रेगुलेशन 17 से सम्बन्धित है ।
8
भारत का राजपत्र असाधारण
संख्या और वर्ष
विषय
1875 का 20
[भाग 2
निरसन का विस्तार
सेन्ट्रल प्राविन्सेज
लाज एक्ट
1876 का 18
जहां तक कि वह 1798 के बंगाल रेगूलेशन 1 और 1806 के बंगाल रेगूलेशन 17 से सम्बन्धित है ।
अवध लाज एक्ट
1877 का ।
जहां तक कि वह 1806 के बंगाल रेगूलेशन 17 से सम्बन्धित है ।
स्पेसिफ़िक
रिलीफ़
(ग) धारा 35 और 36 में " इन राटिंग" शब्द
विनियम
संख्या और वर्ष
विषय
का बंगाल रेगूलेशन निरसन का विस्तार
1 सशर्त विक्रय
1798
का बंगाल रेगूलेशन 17 मोचन 1806
पूरा विनियम
पूरा विनियम
धारा 15
ऋणों की अभि-
1827 का मुम्बई रेगूलेशन 5
स्वीकृति , ब्याज ,
और सक्रम्जा
बन्धकदार
प्रार ० सी ० एस ० सरकार, सचिव , भारत सरकार
व्यवस्थापक , भारत सरकार मुद्रणालय , मिन्टो रोड, नई विल्ली द्वारा मुद्रित तथा व्यवस्थापक , प्रकाशन विभाग , दिल्ली द्वारा प्रकाशित , 1965 ।
HAT