Haryana Government Gazette
EXTRAORDINARY
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© Govt. of Haryana
No. 77-2018/Ext.] चण्डीगढ़, मंगलवार, दिनांक 08 मई, 2018
(18 वैषाख, 1940 शक)
विधायी परिषिष्ट
क्रमांक विषय वस्तु
पृृष्ठ भाग I अधिनियम
93-117
119-141 1. श्री कृष्णा आयुष विष्वविद्यालय कुरूक्षेत्र अधिनियम, 2016 (2017 का हरियाणा अधिनियम संख्या 25) 2. गुरूग्राम महानगर विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2017 (2017 का हरियाणा अधिनियम संख्या 34) (केवल हिन्दी में)
भाग II अध्यादेष
कुछ नहीं
भाग III प्रत्यायोजित विधान
1. अधिसूचना संख्या का०आ० 26/के०अ० 42/2005/धा० 4/2018, दिनांक 8 मई, 2018 433-434 -हरियाणा ग्रामीण रोजगार गारन्टी (संषोधन) स्कीम, 2018. 2. अधिसूचना संख्या सा०का०नि०31/संवि/अनु०309/2018, दिनांक 08 मई, 2018 435-444 -हरियाणा वित्तायुक्त कार्यालय (ग्रुप क) राज्य सेवा (संषोधन) नियम, 2018.
(प्राधिकृत अंग्रेजी अनुवाद सहित)
भाग IV षुद्धि-पर्ची, पुनः प्रकाषन तथा प्रतिस्थापन
कुछ नहीं।
(xlv)93 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) भाग -I हरियाणा सरकार विधि तथा विधायी विभाग अधिसूचना दिनांक 9 फरवरी, 2018
संख्या लेज० 27/2017़- श्री कृष्णा आयुष यूनिवर्सिटी कुरूक्षेत्र ऐक्ट, 2016, का निम्नलिखित हिन्दी अनुवाद हरियाणा के राज्यपाल की दिनांक 3 मई, 2018 की स्वीकृति के अधीन एतद्द्वारा प्रकाशित किया जाता है और यह हरियाणा राजभाषा अधिनियम, 1969 (1969 का 17), की धारा 4-क के खण्ड (क) के अधीन उक्त अधिनियम का हिन्दी भाषा में प्रामाणिक पाठ समझा जाएगा :-
2017 का हरियाणा अधिनियम संख्या 25
श्री कृष्णा आयुष विष्वविद्यालय कुरूक्षेत्र अधिनियम, 2016 आयुर्वेद, योग तथा प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धा तथा होमियोपैथि चिकित्सा पद्धति में अध्यापन तथा संबंधक के प्रयोजन और उचित तथा सुव्यवस्थित षिक्षण, प्रषिक्षण तथा अनुसंधान को सुनिष्चित करने के लिए तथा इन और संबंधित क्षेत्रों में उत्कृष्ठता प्राप्त करने के लिए तथा श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, कुरूक्षेत्र के प्रशासन के लिए राज्य में विष्वविद्यालय स्थापित तथा निगमित करने हेतु
अधिनियम
भारत गणराज्य के सड़सठवें वर्ष में हरियाणा राज्य विधानमण्डल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह
अधिनियमित हो :-
संक्षिप्त नाम तथा प्रारम्भ। 1. (1) यह अधिनियम श्री कृष्णा आयुष विष्वविद्यालय कुरूक्षेत्र अधिनियम, 2016, कहा जा सकता है। (2) यह तुरन्त लागू होगा।
परिभाषाएं। 2. इस अधिनियम में तथा इसके अधीन बनाए गए सभी परिनियमों, अध्यादेषों तथा विनियमों में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) ''षैक्षणिक पाठ्यक्रम'' से अभिप्राय है, विष्वविद्यालय द्वारा विहित पाठ्य विवरण तथा
पाठ्यचर्या के अनुसार आयुष के किसी षिक्षण में कोई अध्ययन पाठ्यक्रम;
(ख) ''सम्बद्ध महाविद्यालय'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम के अधीन विष्वविद्यालय के
विषेषाधिकारों से अनुमति प्राप्त कोई महाविद्यालय या संस्था;
(ग) ''आयुष'' से अभिप्राय है, निवारक, प्रोत्साहक, रोगनाषक तथा पुनर्वासन सेवाओं से संबंधित सभी शाखाओं सहित आयुर्वेद, योग तथा प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धा तथा होमियोपैथि;
(घ) ''आयुष पाठ्यक्रम'' से अभिप्राय है, आयुष की सभी शाखाओं का पाठ्यक्रम अर्थात् प्री-क्लीनिकल, पैरा-क्लीनिकल, क्लीनिकल, पैरा-मैडिकल तथा ऐसे अन्य पाठयक्रम, जो उपाधि या उससे ऊपर या उपाधि-पत्र स्तर पर विष्वविद्यालय द्वारा विहित किए जाएं;
(ङ) ''महाविद्यालय'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम के अधीन विष्वविद्यालय के विषेषाधिकारों
द्वारा अनुरक्षित, या अनुमति प्राप्त कोई महाविद्यालय;
(च) ''विभाग'' से अभिप्राय है, आयुष या उससे सहबद्ध किसी षिक्षण में अध्ययन पाठ्यक्रम के
लिए षिक्षा देने के प्रयोजन के लिए स्थापित कोई इकाई;
(छ) ''कर्मचारी'' से अभिप्राय है, विष्वविद्यालय द्वारा नियुक्त कोई व्यक्ति तथा इसमें
विष्वविद्यालय के अध्यापक तथा सभी अन्य अमला भी शामिल है;
(ज) ''सरकार'' से अभिप्राय है, हरियाणा राज्य की सरकार; (झ) ''विभागाध्यक्ष'' से अभिप्राय है, विष्वविद्यालय, किसी संस्था या सम्बद्ध महाविद्यालय में
संबंधित विषिष्ट/अति-विषिष्ट/ विषय/षिक्षण में वरिष्ठतम संकाय सदस्य/अध्यापक;
(ञ) ''होमियोपैथि'' से अभिप्राय है, डाक्टर हाहनेमन द्वारा स्थापित होमियोपैथि चिकित्सा पद्धति तथा इसमें शामिल है डाक्टर सस्लर द्वारा स्थापित जीव-रसायन विज्ञान की सहबद्ध पद्धति;
(ट) ''छात्रावास'' से अभिप्राय है, छात्रों के लिए निवास की कोई इकाई;
94 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA)(ठ) ''संस्था'' से अभिप्राय है, विष्वविद्यालय के विषेषाधिकारों द्वारा अनुरक्षित, या से अनुमति प्राप्त विष्वविद्यालय न होते हुए, कोई शैक्षणिक संस्था;
(ड) ''विहित'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए परिनियमों, अध्यादेषों तथा विनियमों द्वारा विहित;
(ढ) ''प्रधानाचार्य'' से अभिप्राय है, किसी महाविद्यालय या संस्था का अध्यक्ष तथा इसमें शामिल है, जब कोई प्रधानाचार्य नहीं है, तो ऐसे रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त उप-प्रधानाचार्य तथा प्रधानाचार्य या उप प्रधानाचार्य की अनुपस्थिति में, प्रधानाचार्य के रूप में कार्य करने के लिए तत्समय सम्यक् रूप से नियुक्त कोई व्यक्ति ;
(ण) ''मान्यताप्राप्त अध्यापक'' से अभिप्राय है, ऐसा व्यक्ति जो विश्वविद्यालय के विशेषाधिकारों से अनुमति प्राप्त किसी महाविद्यालय या संस्था में विष्वविद्यालय द्वारा षिक्षा प्रदान करने के प्रयोजन के लिए अनुमोदित किया गया है;
(त) ''अनुसूची'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम से संलग्न अनुसूची;
(थ) ''सिद्धा'' से अभिप्राय है, चिकित्सा पद्धति, जो मूल रूप में प्रकृति चिकित्सीय है;
(द) ''राज्य'' से अभिप्राय है, हरियाणा राज्य; (ध) ''परिनियमों'', ''अध्यादेषोंं'' तथा ''विनियमों'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विष्वविद्यालय के क्रमषः परिनियम, अध्यादेष तथा विनियम;
(न) ''विद्यार्थीं'' से अभिप्राय है, विष्वविद्यालय द्वारा सम्यक् रूप से संस्थित उपाधि, उपाधि-पत्र या विद्या संबंधी अन्य विशेष उपाधियां अध्ययन करने के लिए विष्वविद्यालय, महाविद्यालय या इसके सम्बद्ध महाविद्यालयों या संस्थाओं में से किसी एक में पंजीयत कोई व्यक्ति;
(प) ''यूनानी'' से अभिप्राय है, स्वास्थ्य के उन्नयन तथा रोगों के निवारण से संबंधित यूनानी चिकित्सा पद्धति;
(फ) ''विष्वविद्यालय'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम के अधीन यथा निगमित श्री कृष्णा आयुष विष्वविद्यालय कुरूक्षेत्र;
(ब) ''विष्वविद्यालय अध्यापक'' से अभिप्राय है, आचार्य, सह-आचार्य, सहायक आचार्य तथा ऐसा अन्य व्यक्ति, जो विष्वविद्यालय में या विष्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित किसी महाविद्यालय या संस्था में षिक्षण देने या अनुसंधान करने के लिए नियुक्त किया जाए तथा अध्यादेषों द्वारा अध्यापक के रूप में पदाभिहित किया गया है ;
(भ) ''योग तथा प्राकृतिक चिकित्सा'' से अभिप्राय है, पतंजलि ऋषि द्वारा स्थापित कोई जीवन मार्ग तथा इसमें शामिल है हवा, प्रकाष, जल तथा भूमि द्वारा स्वस्थ करने का प्राकृतिक मार्ग।
निगमन। 3. (1) विष्वविद्यालय के कुलाधिपति, कुलपति तथा प्रति-कुलपति तथा संसद, कार्य परिषद् तथा षिक्षा परिषद् के सदस्यों और सभी व्यक्तियों, जो इसके बाद, ऐसे सदस्यों अथवा अधिकारियों के रूप में बनें या नियुक्त किए जाएं, जब तक वे ऐसी सदस्यता पर या पद पर बने रहें, से मिलकर श्री कृष्णा आयुष विष्वविद्यालय कुरूक्षेत्र के नाम से निगमित निकाय बना रहेगा। (2) विष्वविद्यालय का शाष्वत उत्तराधिकार तथा सामान्य मुद्रा होगी और उसे सम्पति अर्जित, धारण तथा व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी, और वह उक्त नाम से वाद चला सकेगा या उस पर उक्त नाम से वाद चलाया जा सकेगा।
शक्तियों का क्षेत्रीय प्रयोग।
4. (1) क्षेत्र की सीमायें जिनके भीतर विष्वविद्यालय अपनी शक्तियों का प्रयोग करेगा ऐसी होंगी, जो सरकार, अधिसूचना द्वारा, समय-समय पर, विनिर्दिष्ट करेः
श् परन्तु भिन्न-भिन्न संकायों के लिए भिन्न-भिन्न क्षेत्र विनिर्दिष्ट किये जा सकते हैं । (2) उस समय लागू किसी अन्य राज्य विधि में दी गई किसी बात के होते हुए भी, उप-धारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट क्षेत्र की सीमाओं के भीतर स्थित कोई महाविद्यालय ऐसी तिथि, जो सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित की जाये, से विष्वविद्यालय के विषेषाधिकारों से सहयुक्त तथा अनुमति प्राप्त समझा जायेगा तथा वह किसी भी प्रकार से किसी अन्य विष्वविद्यालय के किन्हीं विषेषाधिकारों से सहयुक्त या अनुमति प्राप्त नहीं रहेगा तथा भिन्न-भिन्न महाविद्यालयों के लिये भिन्न-भिन्न तिथियां अधिसूचित की जा सकती हैंः95 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) परन्तु- (i) उक्त तिथि से पूर्व अन्य विष्वविद्यालय से सहयुक्त या अनुमति प्राप्त किसी महाविद्यालय का कोई विद्यार्थी, जो उस विष्वविद्यालय की किसी उपाधि या उपाधि-पत्र परीक्षा के लिए अध्ययन कर रहा था, उसकी तैयारी के संबंध में अपना पाठ्यक्रम पूरा करने के लिये अनुज्ञात किया जायेगा और विष्वविद्यालय ऐसे विद्याार्थियों के लिये, उस विष्वविद्यालय में लागू अध्ययन के पाठ्यचर्या के अनुसार, ऐसी अवधि, जो विहित की जाए, के लिए परीक्षाएं आयोजित करेगा;
(ii) कोई ऐसा विद्यार्थी, जब तक कोई ऐसी परीक्षा विष्वविद्यालय द्वारा आयोजित नहीं की जाती है, अन्य विष्वविद्यालय की परीक्षा में प्रविष्ट किया जा सकता है और उसे उस विष्वविद्यालय की ऐसी उपाधि, उपाधि-पत्र या कोई अन्य विषेषाधिकार प्रदत्त किया जा सकता है, जिसके लिए वह ऐसी परीक्षा के परिणाम पर अर्हता प्राप्त करता है ।
(3) विष्वविद्यालय, स्वयं या फ्रैंचाईज या अभिकरण के माध्यम से कोई ऑफ कैम्पस केन्द्र तथा अध्ययन केन्द्र संचालित नहीं करेगा या नहीं खोलेगा :
व्याख्या.- इस उपधारा के प्रयोजन हेतु,-
(i) ''ऑफ कैम्पस केन्द्र'' से अभिप्राय है, विष्वविद्यालय की सुविधाओं, संकाय तथा अमले के पूरक रखने वाला, इसकी संघटक इकाई के रूप में, विष्वविद्यालय द्वारा संचालित तथा अनुरक्षित मुख्य कैम्पस से बाहर, इसके द्वारा, किसी भी नाम से ज्ञात, स्थापित कोई केन्द्र; तथा
(ii) ''अध्ययन केन्द्र'' से अभिप्राय है, दूरस्थ षिक्षण के संदर्भ में विद्यार्थियों द्वारा अपेक्षित मंत्रणा, परामर्ष या कोई अन्य सहायता देने के प्रयोजन के लिए विष्वविद्यालय द्वारा किसी भी नाम से ज्ञात, स्थापित तथा अनुरक्षित या मान्यताप्राप्त कोई केन्द्र ।
श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय का विष्वविद्यालय को अंतरण। 5. (1) श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय कुरूक्षेत्र इस अधिनियम के प्रारम्भ की तिथि से विष्वविद्यालय को अंतरित हो जायेगा । (2) उससे संबंधित सभी सम्पतियां तथा आस्तियां, जो उक्त अंतरण के समय पर विद्यमान थी, के साथ-साथ उसमें कोई अभिवृद्धि तथा उपसाधन सरकार से अंतरित हो जायेगा तथा विष्वविद्यालय में निहित हो जाएगा ।
(3) राज्य औषधि फार्मेसी तथा राज्य औषधि जांच प्रयोगशाला से संबंधित भूमि और भवन को छोड़कर श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय कुरूक्षेत्र से संबंधित सभी सम्पत्तियां तथा आस्तियां, जो उक्त अंतरण के समय पर विद्यमान थीं, के साथ-साथ उसमें कोई अभिवृद्धि तथा उपसाधन, चाहे सरकार से अनुदानों या अन्यथा से अर्जित या सृजित किए गए हैं तथा महाविद्यालय द्वारा इसके लेखा में, चाहे किसी बैंक में जमा हो या अन्यथा से कोई नकद अतिशेष महाविद्यालय से अंतरित हो जायेगा तथा विश्वविद्यालय में निहित हो जाएगा ।
(4) महाविद्यालय के किन्हीं मामलों के संबंध में उत्पन्न या प्रोद्भूत या उपगत सरकार के संविदात्मक या अन्यथा सभी अधिकार, शक्तियां तथा विषेषाधिकार, कर्तव्य, ऋण, दायित्व तथा बाध्यताएं विष्वविद्यालय को अंतरित हो जायेंगी ।
(5) पूर्वगामी खण्डों के अधीन अंतरित चाहे कोई आस्ति या दायित्व के संबंध में कोई संदेह या भिन्नता हो, सरकार को निर्दिष्ट की जायेगी, जिस पर उसका निर्णय अंतिम होगा ।
(6) इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व या के बाद की गई या निष्पादित कोई विल, विलेख या अन्य दस्तावेजों के सभी संदर्भ, जो श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, कुरूक्षेत्र के प्रयोजन के लिए सरकार के पक्ष में कोई वसीयत, उपहार, विन्यास या न्यास रखता है, तो विष्वविद्यालय को अंतरित हो जायेगा । (7) श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, कुरूक्षेत्र का कोई विद्यार्थी जो इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पूर्व पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विष्वविद्यालय, रोहतक की किसी परीक्षा के लिए अध्ययन कर रहा था उस विष्वविद्यालय के विद्यार्थी के रूप में उसका शैक्षणिक वर्ष निरन्तर रहेगा तथा उसकी तैयारी के संबंध में उसके पाठ्यक्रम को पूरा करने के लिए अनुज्ञात किया जायेगा तथा परीक्षा में दाखिल किया जायेगा ।96 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) (8) भारतीय केन्द्रीय चिकित्सा परिषद् के लिए पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विष्वविद्यालय, रोहतक द्वारा चयनित संकाय के सदस्य उनकी अपनी-अपनी अवधि की समाप्ति तक निरन्तर बने रहेंगे ।
आस्तियों इत्यादि का उपयोग।
6. धारा 4 के फलस्वरूप विष्वविद्यालय को अंतरित सम्पत्तियां, आस्तियां तथा अधिकार प्रयोजनों, जिनके लिए वे इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक पूर्व उपयोग किए जा रहे थे या उपयोग किए जाने के लिए आषयित थे, निरन्तर उपयोग किए जायेंगे।
अप्राधिकृत संस्थाओं द्वारा उपाधियों, उपाधि पत्रों या प्रमाण पत्रों को प्रदत्त करने, अनुदत्त करने, या जारी करने पर वर्जन।
7 ़ (1) इस अधिनियम तथा उस समय लागू किसी अन्य राज्य विधि में दी गई किसी बात के होते हुए भी, विष्वविद्यालय से भिन्न कोई भी व्यक्ति या संस्था, विष्वविद्यालय की क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर उसको सौंपे गए ज्ञान के विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में कोई उपाधि, उपाधि-पत्र या प्रमाण-पत्र प्रदत्त, अनुदत्त या जारी नहीं करेगा/करेगी, या स्वयं को कोई ऐसी उपाधि, उपाधि-पत्र या प्रमाण-पत्र प्रदत्त, अनुदत्त या जारी करने के लिए हकदारी प्रकट नहीं करेगा/करेगी, जो उस विष्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त, अनुदत्त या जारी की गई किसी उपाधि, उपाधि-पत्र या प्रमाण-पत्र के समरूप हो या उसकी मिलती-जुलती नकल का हो ।
(2) उप-धारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन तीन वर्ष से अनधिक के कारावास या एक लाख रूपये से अनधिक के जुर्माने से या दोनों से दण्डनीय संज्ञेय अपराध होगा ।
(3) जहाँ इस धारा के अधीन कोई अपराध किसी संस्था द्वारा किया गया हो, तो वहां अपराध किए जाने के समय, संस्था के कार्य के संचालन के लिए इसका कार्यभारी और उत्तरदायी प्रत्येक व्यक्ति, अपराध के दोषी के रूप में समझा जायेगा और विष्वविद्यालय के नियमों के अनुसार विरूद्ध कार्यवाही किए जाने के लिए दायी होगा ।
(4) उप-धारा (3) में दी गई किसी बात के होते हुए भी, जहां इस धारा के अधीन किया गया अपराध किसी संस्था द्वारा किया गया हो तथा यह सिद्ध हो जाता है कि अपराध संस्था के किसी भागीदार, निदेषक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है, अथवा अपराध का किया जाना उसकी ओर से किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जाता है, वहां ऐसा भागीदार, निदेषक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध के दोषी के रूप में समझा जायेगा तथा तदनुसार अपने विरूद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के लिए दायी होगा ।
व्याख्या.- इस धारा के प्रयोजन के लिए ''संस्था'' से अभिप्राय है, कोई निगमित निकाय और इसमें शामिल है कोई फर्म या अन्य व्यष्टि संगम ।
8. विष्वविद्यालय निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग तथा निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात्ः- विष्वविद्यालय की शक्तियां तथा कृत्य।
(क) विद्या की ऐसी शाखाओं जिन्हें विष्वविद्यालय ठीक समझे में अनुसंधान तथा षिक्षण के लिए व्यवस्था करना, तथा विद्या और ज्ञान के प्रसार के अभिवर्धन के लिए ऐसे कदम उठाना जो वह आवष्यक समझता है ;
(ख) परीक्षाएं आयोजित करना तथा व्यक्तियों, जो परिनियमों, अध्यादेषों अथवा विनियमों में अधिकथित किए जाएं, को ऐसी उपाधियां, उपाधि-पत्र तथा विद्या संबंधी अन्य विशेष उपाधियां या मानोपाधियां प्रदान करना;
(ग) अनुमोदित व्यक्तियों को परिनियमों में अधिकथित की गई रीति में सम्मानिक उपाधियां अथवा विद्या संबंधी अन्य विशेष उपाधियां प्रदत्त करना;
(घ) पुरस्कार, पदक, अनुसंधान, अध्ययन-वृत्तियां, छात्र-सहायता वृत्तियां तथा अध्येता-वृत्तियां संंिस्थत करना;
(ड.) सरकार से उपहार, दान या धर्मदान प्राप्त करना तथा अंतरकों, दाताओं, वसीयतकर्ताओें, जैसी भी स्थिति हो, से चल या अचल सम्पति के उपहार, दान तथा अन्तरण प्राप्त करना; और विष्वविद्यालय के कल्याण के लिए इस प्रकार प्राप्त दानों से कायिक निधि का सृजन करना;
(च) विष्वविद्यालय द्वारा अपेक्षित प्रधानाचार्य पद, आचार्य पद, सह-आचार्य पद, सहायक आचार्य पद संस्थित करना और किसी किस्म के अन्य पद सृजित करना और ऐसे पदों पर व्यक्ति नियुक्त करना;
(छ) भारत तथा विदेष में, विष्वविद्यालय के समान उद्देष्य रखने वाली उन षिक्षा संबंधी तथा अन्य संस्थाओं को ऐसी रीति में सहयोग देना जो उनके सामूहिक लक्ष्यों में सहायक हों;
(ज) ऐसे व्यक्तियों, जो विष्वविद्यालय के सदस्य न हों, के लिए पत्राचार षिक्षा तथा ऐसे अन्य पाठ्यक्रमों सहित षिक्षण की व्यवस्था करना, जो वह अवधारित करे;
97 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA)(झ) विष्वविद्यालय के विषेषाधिकारों से अनुमति प्राप्त किसी महाविद्यालय या संस्था में षिक्षा
प्रदान करने के लिए व्यक्तियों को मान्यता देना;
(ञ) आयुष षिक्षा प्रदान करने वाले राज्य में अवस्थित महाविद्यालयों को अनुरक्षित करना;
(ट) किसी महाविद्यालय, संस्था या विभाग को स्वायत्त महाविद्यालय या संस्था या विभाग, जैसी
भी स्थिति हो, के रूप में घोषित करना;
(ठ) सरकार के अनुमोदन से, विष्वविद्यालय की सम्पति की प्रतिभूति पर, विष्वविद्यालय के
प्रयोजनों के लिए धन उधार लेना;
(ड) विष्वविद्यालय तथा विष्वविद्यालय की अधिकारिता के भीतर महाविद्यालयों तथा संस्थाओं के विद्यार्थियों के निवास, आचरण तथा अनुषासन का पर्यवेक्षण, नियंत्रण तथा विनियमन करना;
(ढ) विष्वविद्यालय से सम्बन्धित या उसमें निहित किसी सम्पति की कार्यवाही, ऐसी रीति जो
विष्वविद्यालय अपने उद्देष्यों को बढ़ावा देने के लिए ठीक समझे, में करना;
(ण) अल्प तथा दीर्घकालिक दोनों के आधार पर, विषयों, विषेष क्षेत्रों, षिक्षा स्तरों तथा मानव शक्ति के प्रषिक्षण के अनुसार राज्य तथा देष की जरूरतों का मूल्यांकन करना तथा उन जरूरतों को पूरा करने के लिए आवष्यक कार्यक्रम आरम्भ करना;
(त) विद्या की ऐसी शाखाएं, जो विष्वविद्यालय उचित समझे, में प्रवृत्तियों के गहन ज्ञान पर
आधारित उच्च अध्ययन तथा अनुसंधान कार्यक्रमों को आयोजित करना;
(थ) ऐसे अनुसंधान, रूपांकन (डिजाईन) तथा विकासात्मक क्रियाकलापों को उन्नत करना जो
सामाजिक जरूरतों तथा राज्य के विकास कार्यक्रमों से संबंध रखते हों;
(द) पूरक सुविधाएं देने के लिए उद्योगों तथा सरकारी कर्मचारियों का सहयोग प्राप्त करने के
लिए उपाय प्रारम्भ करना;
(ध) ज्ञान देने, प्रषिक्षण का आयोजन करने तथा पाठ्य-पुस्तकों तथा अन्य षिक्षा संबंधी
सामग्रियों को तैयार करने में निरन्तर प्रयोग का प्रबंध करना;
(न) षिक्षात्मक उपायों में विषयों के निरन्तर मूल्यांकन तथा पुनः अनुकूलन के उत्तरोत्तर प्रवेष
के लिए प्रबंध करना;
(प) अपने विद्यार्थियों में उद्यम संबंधी योग्यता को बढ़ावा देना; (फ) विद्या की प्रगति तथा ज्ञान के प्रसार के लिए आवष्यकता तथा अवसरों के बारे में जनता को षिक्षित करना;
(ब) विद्यार्थियों तथा समाज के ऐसे कमजोर वर्गों, विषेष रूप से अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जन-जातियों से संबंधित विद्यार्थियों की षिक्षा के लिए विषेष प्रबन्ध करना, जो विष्वविद्यालय वांछनीय समझे;
(भ) पूर्वोक्त सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए परिनियम, अध्यादेष अथवा विनियम बनाने तथा
उन्हें परिवर्तित, उपातंरित या विखण्डित करने;
(म) ऐसे सभी कार्य करना जो विष्वविद्यालय के सभी अथवा किन्हीं उद्देष्यों की प्राप्ति के
लिए आवष्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।
विष्वविद्यालय का सभी मूलवंषों, जातियों तथा पंथों के लिए खुला होना। 9. विष्वविद्यालय लिंग, मूलवंष, पंथ, जाति अथवा वर्ग को विचार में लाए बिना सभी के लिए खुला होगा तथा सदस्यों, विद्यार्थियों, अध्यापकों, कर्मकारों को प्रविष्ट अथवा नियुक्त करने में अथवा किसी अन्य संबंध में, चाहे जो भी हो, धर्म, विष्वास अथवा वृत्ति के बारे में, कोई भी परीक्षा थोपी नहीं जाएगी या शर्त नहीं लगाई जाएगी और ऐसा कोई भी धर्मदान स्वीकार नहीं किया जायेगा जिसमें विष्वविद्यालय के प्राधिकारियों की राय में, इस उपबंध के भाव तथा उद्देष्यों के विरूद्ध शर्तें अथवा बाध्यताएं आती होंः
परन्तु इस धारा में दी गई कोई भी बात विष्वविद्यालय को समाज के कमजोर वर्गों ओैर विषेष रूप से अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जन-जातियों के बारे में कोई विषेष उपबंध करने से रोकने वाली नहीं समझी जायेगी ।
अध्यापन। 10. विष्वविद्यालय में सारा अध्यापन, विष्वविद्यालय द्वारा तथा उसके नाम पर इस निमित्त बनाए गए परिनियमों, अध्यादेषों तथा विनियमोें के अनुसार चलाया जाएगा ।98 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) अधिकारी। 11. विष्वविद्यालय के निम्नलिखित अधिकारी होंगे, अर्थात्ः-
(i) कुलाधिपति; (ii) कुलपति; (iii) प्रति-कुलपति (iv) कुल-सचिव (रजिस्ट्रार); और (v) विष्वविद्यालय की सेवा में ऐसे अन्य व्यक्ति, जो परिनियमों द्वारा विष्वविद्यालय के अधिकारियों के रूप मेें घोषित किए जाएं।
कुलाधिपति। 12. (1) हरियाणा के राज्यपाल अपने पद के आधार पर विष्वविद्यालय के कुलाधिपति होंगे । (2) कुलाधिपति विष्वविद्यालय का अध्यक्ष होगा ।
(3) कुलाधिपति, यदि उपस्थित हो, उपाधियां प्रदान करने के लिए विष्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह तथा संसद की बैठकों की अध्यक्षता करेगा ।
(4) कुलाधिपति को निम्नलिखित अधिकार होंगे-
(i) ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों, जिन्हें वह निर्दिष्ट करे, द्वारा विष्वविद्यालय, उसके भवनों, प्रयोगषालाओं तथा उपकरणों का तथा विष्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित किसी महाविद्यालय या संस्था का तथा विष्वविद्यालय द्वारा संचालित परीक्षाओं, किए गए या करवाये गये अध्यापन तथा अन्य कार्य का भी निरीक्षण करवाना; और (ii) विष्वविद्यालय, महाविद्यालयों या संस्थाओं के वित्त प्रबन्धन से संबंधित किसी मामले
के बारे में वैसी ही रीति में की जाने वाली जांच करवाना ।
(5) कुलाधिपति, प्रत्येक मामले में, कराए जाने वाले निरीक्षण या की जाने वाली जांच के अपने आषय का विष्वविद्यालय को नोटिस देगा और ऐसे नोटिस की प्राप्ति पर, विष्वविद्यालय को कुलाधिपति को ऐसा अभ्यावेदन करने का अधिकार होगा, जो वह आवष्यक समझे । (6) विष्वविद्यालय द्वारा किए गए अभ्यावेदन, यदि कोई हो, पर विचार करने के पश्चात्, कुलाधिपति ऐसा निरीक्षण या जांच करवा सकता है जो उप-धारा (4) में निर्दिष्ट है । (7) जहां कुलाधिपति द्वारा किए जाने वाला कोई निरीक्षण या जांच करवाई गई हो, वहां विष्वविद्यालय ऐसा प्रतिनिधि नियुक्त करने का हकदार होगा जिसे ऐसे निरीक्षण या जांच के समय उपस्थित रहने और सुनवाई किए जाने का अधिकार होगा ।
(8) कुलाधिपति, यदि विष्वविद्यालय या उसके द्वारा अनुरक्षित किसी महाविद्यालय या संस्था के बारे में निरीक्षण या जांच की गई है, तो ऐसे निरीक्षण या जांच के निष्कर्ष के संदर्भ में, कुलपति को संबोधित करेगा, और कुलपति, कुलाधिपति के दृष्टिकोण तथा कुलाधिपति द्वारा दिए गए परामर्ष के अनुसार उस पर की जाने कार्रवाई कार्य परिषद् को संसूचित करेगा । (9) कार्य परिषद्, कुलाधिपति को कुलपति के माध्यम से, ऐसी कार्रवाई, यदि कोई हो, जो ऐसे निरीक्षण या जांच के निष्कर्ष पर करने का प्रस्ताव करती है या कर चुकी है, संसूचित करेगी । श् (10) जहां कार्य परिषद्, युक्तियुक्त समय के भीतर, कुलाधिपति की संतुष्टि के अनुसार कार्यवाई नहीं करती, तो कुलाधिपति, कार्य परिषद् द्वारा प्रस्तुत किए गए किसी स्पष्टीकरण या किए गए प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात्, ऐसे निर्देष जारी कर सकता है, जो वह ठीक समझे और कार्य परिषद् ऐसे निर्देषों का पालन करेगी ।
(11) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कुलाधिपति, लिखित में आदेष द्वारा, विष्वविद्यालय की किसी ऐसी कार्यवाही को निष्प्रभाव कर सकता है, जो उसकी राय में, इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेषों के अनुरूप न होंः
परन्तु कोई ऐसा आदेष करने से पहले, वह विष्वविद्यालय से कारण बताने की अपेक्षा करेगा कि क्यों न ऐसा आदेष किया जाये, और यदि युक्तियुक्त समय के भीतर कोई कारण दिया गया है, तो वह उस पर विचार करेगा ।
(12) कुलाधिपति, किसी भी समय, विष्वविद्यालय से इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए परिनियमों, अध्यादेषों तथा विनियमों के उपबन्धों के अनुरूप कार्य करने की अपेक्षा कर सकता है या निर्देष दे सकता है ।
(13) उप-धारा (11) तथा (12) के अधीन कुलाधिपति द्वारा प्रयोग की गई शक्तियां, किसी भी सिविल न्यायालय में प्रष्नगत नहीं की जायेंगी ।श्99 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) (14) विष्वविद्यालय का कोई कर्मचारी, जो उसके विरूद्ध की गई किसी अनुषासनिक कार्रवाई के बारे में कार्य परिषद् या कुलपति के निर्णय से व्यथित हो, कुलाधिपति को अभ्यावेदन ऐसी रीति में संबोधित कर सकता है, जो परिनियमों द्वारा विहित किया जाये और कुलाधिपति का निर्णय अन्तिम होगा।
(15) कुलाधिपति को ऐसी अन्य शक्तियां प्राप्त होंगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जायें ।
कुलपति। 13. (1) कुलपति केवल शैक्षणिक तर्कों पर नियुक्त किया जायेगा। वह ऐसे वचनबद्ध मूल्यों जिसके लिए विष्वविद्यालय स्थापित है तथा अपनी शैक्षणिक योग्यता, प्रषासनिक सक्षमता तथा नैतिक महत्ता द्वारा विष्वविद्यालय को नेतृत्व उपलब्ध करवाने की योग्यता रखने वाला कोई विख्यात षिक्षाविद् होगा।
(2) सरकार, कुलाधिपति के एक नामनिर्दिष्ट तथा कार्य परिषद् के दो नामनिर्दिष्टियों को मिलाकर कोई चयन समिति गठित करेगी, जो वर्णानुक्रम में, कम से कम तीन नामों का कोई पैनल तैयार करेगी, जिसमें से कुलाधिपति, सरकार के परामर्ष पर, कुलपति नियुक्त करेगा। कुलपति की सेवा के निबंधन तथा शर्तें, सरकार के परामर्ष पर, कुलाधिपति द्वारा अवधारित की जायेंगी ।
(3) कुलपति तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा जिसे एक अवधि से अधिक के लिए नवीकृत नहीं किया जा सकता : परन्तु कोई भी व्यक्ति, यदि उसने अड़सठ वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है, को कुलपति के पद पर नियुक्त नहीं किया जायेगा अथवा पद पर बना नहीं रहेगा ।
(4) कुलाधिपति, सरकार के परामर्ष पर, नैसर्गिंक न्याय के सिद्धान्तों के अनुसार की जाने वाली कोई जांच करवा सकता है तथा कुलपति को पद से हटा सकता है, यदि वह, ऐसी जांच पर, ऐसे पद पर प्रत्यक्ष रूप से बने रहने के अयोग्य व्यक्ति पाया जाता है ।
(5) यदि कुलपति बीमारी या किसी अन्य कारण से अपनी अस्थाई अषक्तता के फलस्वरूप अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है, या कुलपति का पद मृत्यु के कारण या अन्यथा रिक्त हो जाता है, जब तक वर्तमान कुलपति अपना पद पुनः ग्रहण करने के लिए समर्थ नहीं हो जाता है, या जब तक कोई नियमित कुलपति नियुक्त नहीं किया जाता है, जैसी भी स्थिति हो, तो प्रति-कुलपति, कुलपति के कर्तव्यों का पालन करेगा। कुलपति तथा प्रति-कुलपति दोनों की अनुपस्थिति में, जब तक कुलपति या प्रति-कुलपति अपना पद ग्रहण नहीं करता है, कुलाधिपति किसी प्राधिकारी द्वारा कुलपति के कर्तव्यों को सम्पादित किए जाने के लिए ऐसा प्रबन्ध करेगा। (6) कुलपति विष्वविद्यालय का प्रमुख कार्यकारी तथा षिक्षा अधिकारी होगा और उसका विष्वविद्यालय के कार्यकलापों पर सामान्य पर्यवेक्षण तथा नियंत्रण होगा और विष्वविद्यालय के सभी प्राधिकरण के निर्णयों को लागू करेगा ।
(7) कुलपति, यदि उसकी राय हो कि किसी मामले पर तुरन्त कार्रवाई करना आवष्यक है, तो वह संकाय, विभाग या पद के सृजन अथवा समाप्ति को अन्तर्वलित करने वाले मामलों, किसी कर्मचारी की नियुक्ति या उसे हटाए जाने वाले मामले के सिवाय, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण को प्रदत्त की गई किसी शक्ति का प्रयोग कर सकता हैः परन्तु इस धारा के अधीन शक्तियों का प्रयोग करने से पहले कुलपति कारण अभिलिखित करेगा कि मामले में सम्बद्ध प्राधिकरण की बैठक तक इन्तजार क्यों नहीं किया जा सकताः
परन्तु यह और कि यदि सम्बद्ध प्राधिकरण की राय है कि ऐसी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी, तो वह मामले को कुलाधिपति को निर्दिष्ट कर सकता है, जिसका निर्णय उस पर अन्तिम होगा :
परन्तु यह और कि विष्वविद्यालय की सेवा में किसी भी व्यक्ति को, जो इस उपधारा के अधीन कुलपति द्वारा की गई किसी कार्रवाई से व्यथित है, उसे ऐसी कार्रवाई पर निर्णय की संसूचना की तिथि से एक मास के भीतर कार्य परिषद् के पास प्रतिवेदन करने का अधिकार होगा और उस पर कार्य परिषद् कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई को पुष्ट कर सकती है, उपांतरित कर सकती है या उल्ट सकती है । कर्मचारी को सूचित किया जायेगा कि कार्रवाई आपात शक्तियों के अधीन की गई है ।
(8) कुलपति ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा तथा ऐसे अन्य कत्र्तव्यों का पालन करेगा जो परिनियमों तथा अध्यादेषों द्वारा विहित किए जाएं ।
प्रति-कुलपति। 14. (1) प्रति-कुलपति, सरकार के परामर्ष पर, कुलाधिपति द्वारा, सेवा के ऐसे निबंधन तथा शर्तें, जो उस द्वारा अवधारित की जाएं, पर नियुक्त किया जाएगा। वह आचार्य की पदवी से नीचे का नहीं होगा।
(2) प्रति-कुलपति तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा, जिसे एक अवधि से अधिक के लिए नवीकृत नहीं किया जाएगाः100 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) परन्तु कोई भी व्यक्ति प्रति-कुलपति के पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा या नहीं बना रहेगा, यदि उसने अड़सठ वर्ष की आयु पूरी कर ली है ।
(3) प्रति-कुलपति ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो कुलपति द्वारा उसे सौंपे जाएं । कुल-सचिव। 15. (1) कुल-सचिव सरकार के परामर्ष पर कुलाधिपति द्वारा नियुक्त किया जायेगा। (2) कुल-सचिव, विष्वविद्यालय का मुख्य प्रषासनिक अधिकारी होगा । वह प्रत्यक्ष रूप से कुलपति के अधीक्षण, निर्देषन तथा नियंत्रण के अधीन कार्य करेगा ।
अन्य अधिकारी। 16. विष्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति और शक्तियां तथा कर्तव्य ऐसे होंगे, जो अध्यापन तथा अध्यापनेत्तर पदों के सृजन।
परिनियमों द्वारा विहित किये जाएं । 17. इस अधिनियम में दी गई किसी बात के होते हुए भी, विष्वविद्यालय, सरकार का पूर्व अनुमोदन प्राप्त किये बिना कोई अध्यापन और अध्यापनेत्तर पद सृजित नहीं करेगा या अध्यापन और अध्यापनेत्तर कर्मचारियों के वेतनमान पुनरीक्षित नहीं करेगा ।
प्राधिकरण। 18. विष्वविद्यालय के निम्नलिखित प्राधिकरण होंगे, अर्थात्ः-
(i) संसद; (ii) कार्य परिषद्; (iii) षिक्षा परिषद; (iv) वित्त समिति; (v) संकाय; (vi) षिक्षा योजना बोर्ड; और (vii ऐसे अन्य प्राधिकरण, जो परिनियमों द्वारा विष्वविद्यालय के प्राधिकरणों के रूपमें घोषित किए जाएं।
संसद। 19. (1) संसद का गठन तथा इसके सदस्यों की पदावधि परिनियमों द्वारा विहित की जायेगी । (2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संसद की निम्नलिखित शक्तियां तथा कृत्य होंगे, अर्थात्ः-
(क) विष्वविद्यालय की मुख्य नीतियों तथा कार्यक्रमों का, समय-समय पर, पुनर्विलोकन
करना तथा विष्वविद्यालय के सुधार तथा विकास के लिए उपाय सुझाना;
(ख) विष्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट, वार्षिक बजट तथा वार्षिक लेखों और ऐसे लेखों
की लेखा-परीक्षा रिपोर्ट पर विचार करना तथा संकल्प पारित करना;
(ग) कुलाधिपति को किसी भी ऐसे मामले के बारे मेें परामर्ष देना जो उसे परामर्ष के
लिए निर्दिष्ट किया जाए; और
(घ) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं । कार्य परिषद्। 20. (1) कार्य परिषद् विष्वविद्यालय की प्रधान कार्यपालक निकाय होगी ।
(2) कार्य परिषद् का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि तथा इसकी शक्तियां तथा कर्तव्य ऐसे होंगे जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं : परन्तु प्रति-कुलपति कार्य परिषद् का पदेन सदस्य होगा ।
षिक्षा परिषद्। 21. (1) षिक्षा परिषद् विष्वविद्यालय की प्रधान शैक्षणिक निकाय होगी, और इस अधिनियम, परिनियमों तथा अध्यादेषों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विष्वविद्यालय की सभी षिक्षा नीतियों का समन्वय करेगी तथा उन पर सामान्य पर्यवेक्षण करेगी ।
(2) षिक्षा परिषद् का गठन, इसके सदस्यों की पदावधि तथा इसकी शक्तियां तथा कर्तव्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंः
परन्तु प्रति-कुलपति षिक्षा परिषद् का पदेन सदस्य होगा ।
संकाय। 22. संकायों के गठन तथा कृत्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं । वित्त समिति। 23. वित्त समिति का गठन, इसके सदस्यों की पदावधि तथा इसकी शक्तियां तथा कर्तव्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंः परन्तु प्रति-कुलपति वित्त समिति का पदेन सदस्य होगा । 24. षिक्षा योजना बोर्ड का गठन तथा कृत्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं। षिक्षा योजना बोर्ड।101 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) परिनियम तथा उनका क्षेत्र। 25. इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, परिनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकते हैं, अर्थात्ः-
(क) विष्वविद्यालय के प्राधिकरणों तथा अन्य निकायों, जो समय-समय पर गठित किए जाएं,
का गठन, शक्तियां तथा कृत्य ;
(ख) विष्वविद्यालय के अध्यापकों तथा अधिकारियाें का वर्गीकरण, नियुक्ति का ढंग, शक्तियां
तथा कर्तव्य;
(ग) विष्वविद्यालय के कर्मचारियों की सेवा शर्तें, जिनमें उनके लाभ के लिए पेंषन या भविष्य
निधि या बीमा योजना के लिए उपबंध शामिल हैं;
(घ) सम्मानिक उपाधियां प्रदान करना; (ड.) संकायों तथा विभागों की स्थापना तथा समाप्ति; (च) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, छात्र-सहायता वृत्तियां, पदकों तथा पुरस्कारों
को संस्थित करना;
(छ) विद्यार्थियों में अनुषासन बनाए रखना; (ज) शर्तें जिनके अधीन महाविद्यालयों तथा संस्थाओं को विष्वविद्यालय के विषेषाधिकारों की अनुमति दी जा सकती है तथा उन्हें वापिस लिया जा सकता है;
(झ) विष्वविद्यालय के प्राधिकारियों या अधिकारियों में निहित शक्तियों का प्रत्यायोजन; और (ञ) सभी अन्य मामले जो इस अधिनियम द्वारा उपबंधित किए जाने हैं, अथवा परिनियमों द्वारा,
उपबंधित किए जा सकते हैं ।
परिनियम बनाना। 26. (1) इस अधिनियम के प्रारम्भ होने पर, विष्वविद्यालय के परिनियम वे होंगे, जो अनुसूची में दिए गए हैं। (2) सरकार या कार्य परिषद्, समय-समय पर, इस धारा में इसमें, इसके बाद, उपबंधित रीति में, नये या अतिरिक्त परिनियम बना सकती है या परिनियमों का संषोधन अथवा निरसन कर सकती हैः परन्तु कार्य परिषद् विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण की हैसीयत, शक्तियां या गठन को प्रभावित करने वाले किसी परिनियम को तब तक नहीं बनाएगी, संषोधित या निरसित नहीं करेगी, जब तक ऐसे प्राधिकरण को प्रस्तावित परिवर्तनों पर लिखित में राय अभिव्यक्त करने का अवसर न दे दिया गया हो, और इस प्रकार अभिव्यक्त की गई किसी राय पर कार्य परिषद् द्वारा विचार किया जाएगा । (3) षिक्षा परिषद्, कार्य परिषद को शैक्षणिक विषयों से संबंधित किसी परिनियम के प्रारूप को कार्य परिषद् के विचारण के लिए प्रस्तावित कर सकती है ।
(4) प्रत्येक नये परिनियम या परिनियम में परिवर्धन अथवा किसी परिनियम के किसी संषोधन अथवा निरसन के लिए कुलाधिपति का अनुमोदन अपेक्षित होगा, जो इसे स्वीकृत, अस्वीकृत कर सकता है अथवा इस पर आगे विचार करने के लिए इसे लौटा सकता है । सरकार या कार्य परिषद् द्वारा पारित किसी परिनियम की तब तक विधिमान्यता नहीं होगी जब तक इसे कुलाधिपति द्वारा सहमति न दे दी गई हो ।
(5) पूर्वगामी उपधाराओं में दी गई किसी बात के होते हुए भी, कुलाधिपति, या तो स्वप्ररेणा से या सरकार के परामर्ष पर, उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किसी मामले के संबंध में, कार्य परिषद् को परिनियमों को बनाने, संषोधित करने या निरसन करने का निर्देष दे सकता है और यदि कार्य परिष्द, इसकी प्राप्ति के साठ दिन के भीतर ऐसे निर्देष को कार्यान्वित करने में असफल रहती है, तो कुलाधिपति ऐसे निर्देष का अनुपालन करने में कार्य परिषद् द्वारा अपनी अक्षमता के लिए संसूचित कारण, यदि कोई हो, पर विचार करने के बाद, परिनियम उचित रूप से बना सकता है, संषोधित कर सकता है या निरसित कर सकता है।
अध्यादेष तथा उनका क्षेत्र। 27. इस अधिनियम तथा परिनियमों के उपबंधों के अध्याधीन, अध्यादेष निम्नलिखित सभी या किन्हीं मामलों के लिए उपबंध कर सकते हैं, अर्थात्ः-
(क) विष्वविद्यालय में विद्यार्थियों का दाखिला तथा उनका ऐसे रूप में पंजीयन ; (ख) विष्वविद्यालय की परीक्षाओं, उपाधियों तथा उपाधि-पत्रों के लिए दाखिला तथा आगे फीस
ढांचे को उत्तरोत्तर इस प्रकार लचीला बनाना कि पाठ्यक्रम सम्भव सीमा तक स्वतः वित्तपोषण हो सके;
(ग) शर्तें, जिनके अधीन विद्यार्थियों को विष्वविद्यालय की उपाधि अथवा उपाधि-पत्र,
पाठ्यक्रमों तथा परीक्षाओं में दाखिला दिया जाएगा तथा ऐसी उपाधियों और उपाधि-पत्रों तथा प्रमाण-पत्रों के लिए पात्रता;
102 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA)(घ) विष्वविद्यालय में अध्ययन पाठ्यक्रमों के लिए तथा विष्वविद्यालय की परीक्षाओं, उपाधियों तथा उपाधि-पत्रों में दाखिले के लिए प्रभारित की जाने वाली फीसें; तथा आगे फीस के ढांचे को उत्तरोतर इस प्रकार लचीला बनाना कि संभव सीमा तक पाठ्यक्रम स्वतः वित्तपोषित हो सकें;
(ड.) अध्येता-वृत्तियां, छात्र-वृत्तियां, छात्र-सहायता वृति, पदक तथा पुरस्कार प्रदान करने की शर्तें;
(च) परीक्षाओं का संचालन, जिसमें परीक्षा लेने वाले निकायों, परीक्षकों तथा अनुसीमकों की पदावधि तथा नियुक्ति की रीति तथा कर्तव्य सम्मिलित हैं;
(छ) विष्वविद्यालयों के विद्यार्थियों के निवास की शर्तें; तथा (ज) सभी अन्य मामले जो इस अधिनियम अथवा परिनियमों द्वारा बनाए जाने हैं अथवा अध्यादेषों द्वारा उपबंधित किए जा सकते हैं ।
28. (1) अध्यादेष, कार्य परिषद् द्वारा बनाए, संषोधित, निरसित या परिवर्धित किए जायेंगेः अध्यादेष बनाना।
परन्तु कोई भी ऐसा अध्यादेष-
(i) जो विद्यार्थियों के दाखिले या उनके पंजीयन को अथवा विहित परीक्षाओं को विष्वविद्यालय की परीक्षाओं के बराबर मान्यता दिए जाने को प्रभावित करने वाला हो; और
(ii) जो परीक्षकों की नियुक्ति की शर्तें, ढंग या कर्तव्यों या परीक्षाओं अथवा किन्हीं अध्ययन पाठ्यक्रमों के संचालन या स्तर को प्रभावित करने वाला हो, तब तक नहीं बनाया जायेगा जब तक ऐसे अध्यादेष का प्रारूप षिक्षा परिषद् द्वारा प्रस्तावित नहीं किया गया है ।
(2) कार्य परिषद् उपधारा (1) के अधीन षिक्षा परिषद् द्वारा प्रस्तावित किसी प्रारूप को, अपने सुझावों सहित, या तो पूर्ण रूप में या आंषिक रूप में, पुनर्विचार के लिए षिक्षा परिषद् को लौटा सकती हैः परन्तु कार्य परिषद्, षिक्षा परिषद् द्वारा प्रस्तावित प्रारूप को स्वयं संषोधित नहीं करेगी । तथापि वह ऐसे प्रारूप को, जब उसे षिक्षा परिषद् द्वारा दूसरी बार इसे प्रस्तुत किया जाये, अस्वीकार कर सकती है। (3) कार्य परिषद् द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेष, ऐसी तिथि से प्रभावी होंगे, जो वह निर्दिष्ट करे और बनाया गया प्रत्येक अध्यादेष कुलाधिपति को, यथाषीघ्र, संसूचित किया जाएगा।
विनियम। 29. (1) विष्वविद्यालय के प्राधिकरण इस अधिनियम, परिनियमों तथा अध्यादेषों से संगत ऐसे विनियम बना सकते हैं, जो-
(क) उनकी बैठकों में पालन की जाने वाली प्रक्रिया अधिकथित करेंगे; और (ख) ऐसे सभी मामले उपबंधित करेंगे, जो इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेषों के
माध्यम से विनियमोें द्वारा विहित किए जाने हैं।
(2) विष्वविद्यालय का प्रत्येक प्राधिकरण, ऐसे प्राधिकरण के सदस्यों को बैठकों की तिथियों तथा बैठकों में विचार किए जाने वाले कार्य की सूचना देने के लिए और बैठकों की कार्यवाहियों के अभिलेख रखने के लिए उपबंध करने वाले विनियम बनाएगा ।
वार्षिक रिपोर्ट। 30. विष्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट, जिसमें रिपोर्ट के अधीन वर्ष के दौरान बनाए गए विस्तृत कार्यक्रमों, नीतियों तथा वित्त व्यवस्थाओं, परिनियमों तथा अध्यादेषों के संषोधन का विवरण देते हुए, कार्य परिषद् के निदेषों के अधीन तैयार की जाएगी और संसद को ऐसी तिथि को या इसके बाद, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, प्रस्तुत की जाएगी और संसद अपनी वार्षिक बैठक में रिपोर्ट पर विचार करेगी । वार्षिक लेखे। 31. (1) विष्वविद्यालय के वार्षिक लेखे तथा तुलन-पत्र कार्य परिषद् के निदेषों के अधीन तैयार किए जाएंगे और प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार तथा अधिक से अधिक पन्द्रह मास के अन्तरालों पर निदेषक, स्थानीय लेखा-परीक्षा, हरियाणा या किसी अन्य लेखा-परीक्षक, जो सरकार द्वारा नियुक्त किया जाये, द्वारा लेखा-परीक्षित किया जाएगा। वार्षिक लेखे, लेखा-परीक्षित किए जाने पर हरियाणा राजपत्र में प्रकाषित किए जाएंगे और वार्षिक लेखों की प्रति निदेषक, स्थानीय लेखा-परीक्षा, हरियाणा अथवा लेखा-परीक्षक की रिपोर्ट सहित, संसद तथा कुलाधिपति को कार्य परिषद् की टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत की जाएगी। वार्षिक लेखों पर कुलाधिपति द्वारा की गई कोई टिप्पणी संसद के ध्यान में लाई जाएगी तथा संसद की टिप्पणियां, यदि कोई हों, कार्य परिषद् द्वारा विचार किए जाने के बाद, कुलाधिपति को प्रस्तुत की जाएंगी ।
(2) विष्वविद्यालय के वार्षिक लेखे तथा तुलन-पत्र कुलाधिपति को उनके प्रस्तुतीकरण के समय सरकार को भी प्रस्तुत किए जाएंगे ।103 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) अधिकारियों तथा अध्यापकों की सेवा शर्तें। 32. (1) कुलपति के सिवाय, प्रत्येक वैतनिक अधिकारी तथा अध्यापक, लिखित संविदा के अधीन नियुक्त किया जाएगा, जो विष्वविद्यालय के पास रखी जायगी तथा विष्वविद्यालय और किन्हीं अधिकारियों या अध्यापकों के बीच संविदा से पैदा होने वाला कोई विवाद संबंधित अध्यापक या अधिकारी के अनुरोध पर या विष्वविद्यालय की प्ररेणा पर माध्यस्थम्-अधिकरण जो कार्य परिष्द द्वारा नियुक्त एक सदस्य, संबंधित अधिकारी या अध्यापक द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य तथा कुलपति का एक नामनिर्देषिती को मिलाकर बने, को निर्दिष्ट किया जाएगा। अधिकरण के सदस्यों के बहुमत का निर्णय अंतिम होगा और अधिकरण द्वारा निर्णित विषय के संबंध में किसी सिविल न्यायालय में कोई वाद नहीं हो सकेगा ।
(2) प्रत्येक ऐसा अनुरोध, माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (1996 का केन्द्रीय अधिनियम 26), के अर्थ के भीतर मध्यस्थता के लिए निवेदन के रूप में समझा जाएगा ।
33. (1) विष्वविद्यालय जैसा वह उचित समझे, अपने अधिकारियों, अध्यापकों तथा अ्रन्य कर्मचारियों के लाभ के लिए, ऐसी पेंषन, भविष्य-निधि तथा बीमा-निधि संस्थित करेगा ।
पेंषन, भविष्य-निधि और बीमा-निधि। (2) जहां कोई भविष्य-निधि और बीमा-निधि इस प्रकार गठित की गई है, वहां भविष्य-निधि अधिनियम, 1925 (1925 का केन्द्रीय अधिनियम 19), के उपबंध इसको ऐसे लागू होंगे, मानो यह सरकारी भविष्य-निधि थी ।
34. इस अधिनियम के अधीन विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय द्वारा किया गया कोई भी कार्य, अथवा की गई कोई कार्यवाही केवल निम्नलिखित आधार पर अविधिमान्य नहीं होगी-
रिक्तियों के कारण कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना। (क) प्राधिकरण या निकाय के गठन में किसी रिक्ति या त्रुटि; या (ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य कर रहे किसी व्यक्ति के निर्वाचन, नाम-निर्देषन अथवा
नियुक्ति में किसी त्रुटि या अनियमितता; या
(ग) मामले के गुणागुण को प्रभावित न करने वाले ऐसे कार्य या कार्यवाही में किसी त्रुटि या
अनियमितता ।
35. यदि कोई सन्देह उत्पन्न होता है कि क्या कोई व्यक्ति विष्वविद्यालय में किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय का सदस्य सम्यक् रूप से निर्वाचित या नियुक्त किया गया है या ऐसा सदस्य बने रहने का हकदार है, तो मामला कुलाधिपति को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसका उस पर निर्णय अन्तिम होगा ।
कतिपय विवादों का कुलाधिपति को निर्दिष्ट किया जाना।
कठिनाईयां दूर करने की शक्ति। 36. यदि विष्वविद्यालय की स्थापना के बारे में या विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण की पहली बैठक के संबंध में, या अन्यथा इस अधिनियम के उपबंधों को प्रथम बार प्रभाव देने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो सरकार, किसी भी समय, विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण का गठन किए जाने से पहले, आदेष द्वारा कोई नियुक्ति कर सकती है, या ऐसी कोई बात कर सकती है जो इस अधिनियम के उपबंधों से, जहां तक हो सके, संगत हो, जो कठिनाई दूर करने के प्रयोजनों के लिए उसे आवष्यक या समीचीन प्रतीत हो और प्रत्येक ऐसा आदेष, उसी प्रकार प्रभावी होगा मानो ऐसी नियुक्ति या कार्रवाई इस अधिनियम में उपबंधित रीति में की गई थी ।
विष्वविद्यालय अभिलेख के प्रमाण का ढंग।
सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाई के लिए संरक्षण। 37. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का केन्द्रीय अधिनियम 1), अथवा तत्समय लागू किसी विधि में दी गई किसी बात के प्रतिकूल होते हुए भी, किसी रसीद, आवेदन-पत्र, नोटिस, आदेष, कार्यवाहियों, विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण अथवा समिति के संकल्प अथवा विष्वविद्यालय के कब्जे में अन्य दस्तावेजों अथवा विष्वविद्यालय द्वारा सम्यक् रूप से अनुरक्षित किसी रजिस्टर में किसी प्रविष्टि की प्रति, यदि कुल-सचिव द्वारा प्रमाणित की गई है, तो ऐसी रसीद, आवेदन-पत्र, नोटिस, आदेष, कार्यवाहियों, संकल्प, दस्तावेज अथवा रजिस्टर में विद्यमान प्रविष्टि साक्ष्य के रूप में प्राप्त की जाएगी तथा जहां उसकी मूल प्रति, यदि प्रस्तुत की गई हो, साक्ष्य में स्वीकार्य हो, उन मामलों तथा संव्यवहारों में साक्ष्य के रूप में स्वीकार की जायेगी । 38. विष्वविद्यालय के किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरूद्ध किसी बात, जो इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेषों के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आषयित हो, के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाहियां नहीं हो सकेंगी ।
सम्पत्तियों का निहित होना। 39. (1) इस अधिनियम के प्रारम्भ से पहले श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, कुरूक्षेत्र में निहित राज्य औषधि फार्मेसी तथा राज्य औषधि जांच प्रयोगशाला से संबंधित भूमि और भवन को छोड़कर सभी चल अथवा अचल सम्पत्तियां तथा उनमें सभी हित चाहे किसी स्वरूप तथा किस्म के हों और उसके अधीन चलाए जा रहे पाठ्यक्रम तथा सृजित, भरे गये पद विष्वविद्यालय में निहित हो जाएंगे।
(2) श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, कुरूक्षेत्र से संबंधित उस द्वारा सभी ऋण, बाध्यताएं तथा उपगत दायित्व, की गई सभी संविदाएं तथा किए जाने वाले सभी मामले तथा बातें विष्वविद्यालय द्वारा, से या के लिए उपगत की गई, संविदा की गई या कीे जाने वाली समझी जाएंगी ।104 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) अनुसूची
[देखिए धारा 2(त) तथा 26 (1)]
कुलपति की शक्तियां और कर्तव्य।
1. (i) कुलपति, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद् और वित्त समिति का पदेन अध्यक्ष होगा और कुलाधिपति की अनुपस्थिति मेें, उपाधियां प्रदान करने के लिये विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित दीक्षान्त समारोहोें और संसद की बैठकोें की अध्यक्षता करेगा। कुलपति, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय की किसी बैठक मेें उपस्थित होने और उसे सम्बोधित करने का हकदार होगा, किन्तु जब तक वह ऐसे प्राधिकरण या निकाय का सदस्य न हो, वहां पर मतदान करने का हकदार नहीं होगा। (ii) यह देखना कुुलपति का कर्तव्य होगा कि इस अधिनियम, परिनियमोें, अध्यादेशों और विनियमोें के उपबन्धोें का सम्यक् रूप से पालन किया जाता है और वह ऐसी अनुपालना सुनिश्चित करने के लिये सभी आवश्यक कदम उठायेगा। (iii) कुलपति को संसद, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद् तथा वित्त समिति तथा विश्वविद्यालय के किसी अन्य प्राधिकरण या निकाय की बैठकें बुलाने या बुलवाने की शक्ति होगी। (iv) कुलपति, विश्वविद्यालय के मामलोें पर सामान्य नियंत्रण रखेगा और विश्वविद्यालय के प्राधिकरणोें के निर्णयोें को प्रभावशील करेगा। (v) विश्वविद्यालय के विभिन्न प्राधिकरणोें या निकायोें मेें नाम-निर्देशन के लिये वरिष्ठता के बारे में कुलपति का निर्णय अंतिम होगा।
प्रतिकुलपति। 2. (1) प्रतिकुलपति कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद्, वित्त समिति, चयन समिति, स्थापना समिति और योजना बोर्ड का पदेन उपाध्यक्ष होगा और कुलपति की अनुपस्थिति मेें, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद्, वित्त समिति, चयन समिति, स्थापना समिति और योजना बोर्ड की बैठकोें की अध्यक्षता करेगा। (2) यह देखना प्रतिकुुलपति का कर्तव्य होगा, कि कुलपति की अनुपस्थिति में, अधिनियम, परिनियमोें, अध्यादेशों और विनियमोें के उपबन्धोें का सम्यक् रूप से पालन किया जाता है और वह ऐसी अनुपालना सुनिश्चित करने के लिये सभी आवश्यक कदम उठायेगा। (3) प्रतिकुलपति का,े कुलपति की अनुपस्थिति में, संसद, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद्, वित्त समिति, चयन समिति, स्थापना समिति, योजना बोर्ड तथा विश्वविद्यालय के किसी अन्य प्राधिकरण या निकाय की बैठकें बुलाने या बुलवाने की शक्ति होगी।
(4) प्रतिकुलपति विश्वविद्यालय प्रशासन की उन शाखाओं के मामलोें पर सामान्य नियंत्रण रखेगा जो उसे कुलपति द्वारा सौंपे जाते हैं तथा विश्वविद्यालय के प्राधिकरणोें के निर्णयोें को उन शाखाओं में प्रभावशील करेगा।
कुूल-सचिव। 3. (i) कुल-सचिव, कार्य परिषद् तथा संकायोें का पदेन सचिव होगा किन्तु इन प्राधिकरणोें मेें से किसी को भी सदस्य के रूप में नहीं समझा जायेगा और वह संसद और शिक्षा परिषद् का पदेन सदस्य-सचिव होगा। (ii) जब कुल-सचिव का पद रिक्त हो जाता है या जब कुल-सचिव बीमारी के कारण अथवा किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्य निभाने मेें असमर्थ हो, तो जब तक सरकार के परामर्श पर कुलाधिपति द्वारा नियमित नियुक्ति नहीं की जाती है, पद के कर्तव्य ऐसे व्यक्ति द्वारा निभाए जायेंगेे, जिसे कुलपति इस प्रयोजन के लिये अस्थाई रूप से नियुक्त करे । (iii) कुल-सचिव का यह कर्तव्य होगा -
(क) विश्वविद्यालय के अभिलेखोें, सामान्य मुद्रा और ऐसी अन्य सम्पत्ति, जो कुलपति
उसके प्रभार मेें सौंपे, का अभिरक्षक होना ;
(ख) संसद, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद्, संकायोें और विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण
द्वारा नियुक्त की गई किसी समिति की बैठकें बुलाने के सभी नोटिस जारी करना;
(ग) संसद, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद्, संकायोें और विश्वविद्यालय के प्राधिकरणोें द्वारा
नियुक्त की गई किसी समिति की सभी बैठकोें के कार्यवृत्त रखना ;
(घ) संसद, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद् तथा संकायोें के शासकीय पत्र-व्यवहार का
संचालन करना;
(ङ) कुलाधिपति को विश्वविद्यालय के प्राधिकरणोें की बैठकोें की कार्यसूची, कार्यवृत्त की
प्रतियां, उनके जारी होते ही यथाशीघ्र भेजना ;
(च) ऐसे अन्य कर्तव्य जो कुलपति द्वारा, समय-समय पर, उसे सौंपे जायें, का पालन
करना ।105 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) (iv) कुल-सचिव को विश्वविद्यालय के अध्यापकोें तथा शैक्षणिक अमले, जो कार्य परिषद् के आदेश में विनिर्दिष्ट किये जायेें, को छोड़कर, ऐसे कर्मचारियोें को चेतावनी देने या परिनिन्दा की शास्ति अधिरोपित करने या वेतनवृद्धियां रोकने तथा लंंिबत जांच के दौरान उन्हेंं निलम्बित करने की शक्ति होगीः
परन्तु कोई भी ऐसी शास्ति तब तक अधिरोपित नहीं की जायेगी जब तक सम्बद्ध व्यक्ति को उसके विरुद्ध की जाने वाली प्रस्तावित कार्रवाई के बारे में कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर नहीं दिया गया हो। (v) खण्ड (iv) मेें विनिर्दिष्ट किन्हीं शास्तियों में से किसी को अधिरोपित करने वाले कुल-सचिव के किसी आदेश के विरुद्ध अपील कुलपति को होगी। (vi) यदि जांच से प्रकट होता है कि दण्ड, कुल-सचिव की शक्तियोें से परे का है, तो कुल-सचिव जांच के निष्कर्ष पर अपनी सिफारिशों सहित कुलपति को रिपोर्ट करेगा :
परन्तु कुलपति के किसी शास्ति को अधिरोपित करने वाले आदेश के विरुद्ध अपील कार्य परिषद् को होगी । (vii) कुल-सचिव विश्वविद्यालय की ओर से करार करने, दस्तावेज हस्ताक्षरित करने तथा अभिलेखों को अधिप्रमाणित करने के लिये प्राधिकृत अधिकारी होगा और ऐसी हैसियत में कार्य करेगा जब विश्वविद्यालय के समुचित प्राधिकरण द्वारा मामले में निर्णय ले लिया गया हो। कुल-सचिव ऐसी अन्य शक्तियोें का भी प्रयोग करेगा और ऐसे अन्य कर्तव्योें का भी पालन करेगा जो परिनियमोें या अध्यादेशों द्वारा विहित किये जायें । (viii) कुल-सचिव, सरकार के परामर्श पर, अध्यापन का कम से कम ग्यारह वर्ष का अनुभव या उपाचार्य के रूप में अध्यापन का पांच वर्ष का अनुभव रखने वाले राज्य की भारतीय केन्द्रीय चिकित्सा परिषद् द्वारा मान्यताप्राप्त किसी आयुर्वेदिक महाविद्यालय से किसी व्यक्ति की प्रतिनियुक्ति द्वारा या स्थानान्तरण द्वारा नियुक्त किया जाएगा तथा वह पचास वर्ष से कम की आयु का नहीं होगा। विधि में उपाधि रखने वाले व्यक्ति को अधिमान दिया जाएगा।
अन्य अधिकारी। 4. विश्वविद्यालय की सेवा में निम्नलिखित व्यक्तियोें को विश्वविद्यालय के अधिकारियों के रूप में भी घोषित किया जाता है, अर्थात् :-
(क) कुलानुशासक (प्रांॅक्टर ) ;
(ख) मुख्य रक्षक (चीफ वार्डन) ;
(ग) विद्यार्थी कल्याण अध्यक्ष, यदि कोई हो ;
(घ) अध्यक्ष, शैक्षणिक मामले ;
(ङ) महाविद्यालयों का अध्यक्ष ;
(च) पुस्तकाध्यक्ष ;
(छ) परीक्षा नियंत्रक ; (ज) वित्त अधिकारी ।
अन्य अधिकारियों की नियुक्ति। 5. कुलानुशासक, मुख्य रक्षक, विद्यार्थी कल्याण अध्यक्ष, अध्यक्ष शैक्षणिक मामले की नियुक्ति, कुलपति की सिफारिशों पर, विश्वविद्यालय के अध्यापकोें में से, जो प्राचार्य की पदवी से नीचे के न हों, ऐसे निबन्धनोें और शर्तों पर, कार्य परिषद् द्वारा की जायेगी जैसा कुलपति कार्य परिषद् को सिफारिश करें :
परन्तु अध्यक्ष, शैक्षणिक मामले की अवधि दो वर्ष की होगी जो कुलपति की सिफारिशों पर, कार्य परिषद् द्वारा, यदि उचित समझे, एक और वर्ष के लिए विस्तारयोग्य होगी।
महाविद्यालयों का अध्यक्ष। 6. महाविद्यालयों का अध्यक्ष, यदि कोई हो, विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा तथा कुलपति की सिफारिशों पर, ऐसे निबंधनों तथा शर्तों, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, पर कार्य परिषद् द्वारा नियुक्त किया जाएगा। वह ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगा, जो कुलपति द्वारा, समय-समय पर, उसे सौंपे जाएं।
वित्त अधिकारी। 7. (1) वित्त अधिकारी विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा तथा चयन समिति की सिफारिशों पर, ऐसे निबन्धनों तथा शर्तों, जो परिनियमों द्वारा विहित की जायें, पर कार्य परिषद् द्वारा नियुक्त किया जायेगा। (2) वित्त अधिकारी वित्त समिति का पदेन सचिव होगा, किन्तु ऐसी समिति के सदस्य के रूप में नहीं समझा जायेगा ।106 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) (3) जब वित्त अधिकारी का पद रिक्त हो जाता है या जब वित्त अधिकारी बीमारी के कारण अथवा किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, तो अधिकारी के कर्तव्य ऐसे व्यक्ति द्वारा किये जायेंगे, जिसे कुलपति इस प्रयोजन के लिये नियुक्त करे ।
(4) वित्त अधिकारी-
(क) विश्वविद्यालय की निधियों का सामान्य पर्यवेक्षण करेगा तथा इसको इसकी वित्तीय
नीतियों के सम्बन्ध मेें परामर्श देगा; तथा
(ख) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करेगा, जो उसे कार्य परिषद् द्वारा सौंपे जायें या जो
परिनियमों द्वारा विहित किये जायेंं।
(5) कार्य परिषद् के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, वित्त अधिकारी-
(क) न्यास तथा विन्यास की गई सम्पत्ति सहित विश्वविद्यालय की सम्पत्ति तथा निवेशों
को धारण करेगा तथा प्रबन्ध करेगा;
(ख) यह सुनिश्चित करेगा कि आवर्तक तथा अनावर्तक खर्च वित्त समिति द्वारा वर्ष के लिये नियत सीमाओं से अधिक न हो तथा सभी धन उसी प्रयोजनार्थ खर्च किये जाएं, जिनके लिये वे प्रदान अथवा आबंटित किए गए हैं ;
(ग) विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे तथा बजट तैयार करने के लिए और उन्हें कार्य
परिषद् को प्रस्तुत करने के लिये उत्तरदायी होगा ;
(घ) नकदी तथा बैंक में अतिशेष की स्थिति पर और निवेश की स्थिति पर लगातार
नज़र रखेगा;
(ड.) राजस्व के संग्रहण की प्रगति पर नज़र रखेगा तथा नियोजित किए जाने वाले
संग्रहण के ढंग पर परामर्श देगा;
(च) यह सुनिश्चित करेगा कि निर्माण, भूमि, फर्नीचर तथा उपकरणों के रजिस्टर अद्यतन रखे जाएं तथा विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित सभी कार्यालयों, विशेष केन्द्रों, विशिष्ट प्रयोगशालाओं, महाविद्यालयों तथा संस्थाओं में उपकरण तथा अन्य सम्बन्धित सामग्री के स्टॉक निरीक्षण का संचालन किया जाये;
(छ) किसी अनधिकृत खर्च तथा अन्य वित्तीय अनियमिततायें कुलपति के ध्यान में लाएगा तथा उसके लिये उत्तरदायी व्यक्ति के विरूद्ध की जाने वाली कार्रवाई का सुझाव देगा;
(ज) विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित केन्द्र, प्रयोगशाला, महाविद्यालय अथवा संस्था केे किसी अधिकारी से, कोई सूचना या विवरणी जो वह अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिये आवश्यक समझे, मंगवाएगा ।
(6) विश्वविद्यालय को भुगतानयोग्य किसी धन के लिए वित्त अधिकारी अथवा कार्य परिषद् द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत व्यक्ति की रसीद ऐसे धन के भुगतान के लिये पर्याप्त रूप से उन्मोचन होगी ।
परीक्षा नियंत्रक। 8. (1) परीक्षा नियंत्रक, विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा और स्थापना समिति की सिफारिशोें पर, ऐसे निबन्धनोें तथा शर्तों, जो कार्य परिषद् द्वारा विहित की जायें, पर कार्य परिषद् द्वारा नियुक्त किया जायेगा। (2) परीक्षा नियंत्रक का यह कर्तव्य होगा -
(क) परीक्षाओें का अनुशासनबद्ध और दक्षतापूर्ण रीति मेें संचालन करना ;
(ख) गोपनीयता का पूर्ण ध्यान रखते हुए, प्रश्न-पत्र बनवाने के लिए व्यवस्था करना ;
(ग) परीक्षा परिणामोें के लिये योजनाबद्ध समय अनुसूची के अनुसार उत्तर पुस्तिकाओें के
मूल्यांकन के लिये व्यवस्था करना ;
(घ) निष्पक्षता तथा विषयनिष्ठता के स्तर को बढ़ाने की दृष्टि से परीक्षा प्रणाली का निरन्तर पुनर्विलोकन करना ताकि इसे विद्यार्थ्ाियोें की उपलब्धियोें का मूल्यांकन करने के लिये बेहतर साधन बनाया जा सके ;
(ङ) परीक्षा प्रणाली से सम्बन्धित कोई अन्य मामला, जो कुलपति द्वारा, समय-समय पर,
उसे सौंपा जाए, करना।107 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) पुस्तकाध्यक्ष। 9. पुस्तकाध्यक्ष, विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा और स्थापना समिति की सिफारिशोें पर, ऐसे निबन्धनोें तथा शर्तों, जो कार्य परिषद् द्वारा विहित की जायें, पर कार्य परिषद् द्वारा नियुक्त किया जायेगा।
10. (1) संसद मेेें निम्नलिखित सदस्य हाेंगे, अर्थात् :-
संसद तथा इसका गठन। (क) पदेन सदस्य -
(i) कुलाधिपति ; (ii) कुलपति ; (iii) प्रतिकुलपति ; (iv) सचिव, हरियाणा सरकार, वित्त विभाग, या उसकी अनुपस्थिति में, उसका नामनिर्देशिती जो सयुंक्त सचिव की पदवी सेे नीचे का न हो ;
(v) सचिव, हरियाणा सरकार, स्वास्थ्य तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग या उसकी
अनुपस्थिति में, उसका नामनिर्देशिती जो सयुंक्त सचिव की पदवी से नीचे का न हो ;
(vi) महानिदेशक, आयुष या उसका नामनिर्देशिती जो उप निदेशक, आयुष की
पदवी से नीचे का न हो ;
(vii) निदेशक, आयुष, हरियाणा ; (viii) संकायोें के अध्यक्ष; (ix) महाविद्यालयों के अध्यक्ष;
(x) कुल-सचिव ; (xi) विद्यार्थी कल्याण अध्यक्ष, यदि कोई हो ; (xii) परीक्षा नियंत्रक ; (xiii) अध्यक्ष, शैक्षणिक मामले ; (xiv) पुस्तकाध्यक्ष ; (xv) वित्त अधिकारी ;
(ख) अन्य सदस्य -
(i) हरियाणा विधान सभा द्वारा इसके सदस्यों में से चुने जाने वाले दो सदस्य; (ii) विश्वविद्यालय के आचार्य जो दस से अधिक न हों, ज्येष्ठता के आधार पर
चक्रानुक्रम से ;
(iii) विश्वविद्यालय के उपाचार्य तथा प्राध्यापकों मेें से चुने जाने वाले पांच
अध्यापक जिनमेें से कम से कम दो उपाचार्य होंगे ;
(iv) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकारों से अनुमति प्राप्त महाविद्यालयों से एक
प्रधानाचार्य, ज्येष्ठता के आधार पर, चक्रानुक्रम से ;
(v) राज्य के आयुर्वेदिक महाविद्यालयों में अधिष्ठायी हैसियत में उनके पद धारण करने वाले प्रधानाचार्यों द्वारा स्वयं में से चुने जाने वाला एक प्रधानाचार्य ;
(vi) राज्य के आयुर्वेदिक महाविद्यालयों में अधिष्ठायी हैसियत में उनके पद धारण करने वाले अध्यापकों द्वारा स्वयं में से चुने जाने वाले प्रधानाचार्यों से भिन्न चार अध्यापक :
परन्तु इस उप-खण्ड के अधीन एक से अधिक अध्यापक किसी
एक महाविद्यालय से संबंधित नहीं होगा ;
(vii) निर्वाचन की तिथि से शैक्षिणक वर्ष की 31 मई तक की अवधि के लिए राज्य में आयुर्वेदिक महाविद्यालयों में विद्यार्थी यूनियन के सचिवों द्वारा स्वयं में से श्री कृष्णा आयुष विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र विद्यार्थी यूनियन में से चुने जाने वाले दो सचिव ;
(viii) कुलाधिपति द्वारा तीन वर्ष की अवधि के लिए नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले पन्द्रह प्रतिनिधि (विख्यात आयुष शिक्षाविदों में से दस तथा उद्योग, वाणिज्य, चिकित्सा-शास्त्र इंजीनियरिंग, विधि इत्यादि से पांच प्रतिनिधि) ;
108 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA)(ix) विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित महाविद्यालयों के प्रधानाचार्यों से एक, तीन वर्ष
की अवधि के लिए चक्रानुक्रम द्वारा ;
(x) गैर-सरकारी महाविद्यालयों के प्रबन्धकों के प्रतिनिधियों द्वारा स्वयं मेंं से चुने गए दो व्यक्ति। प्रबन्धकों के प्रतिनिधि सम्बद्ध प्रबंधकों के सदस्यों में से होंगे।
(ग) कुल-सचिव संसद का सदस्य-सचिव होगा :
परन्तु इसकी समवर्गी संस्थाओं सहित विश्वविद्यालय का कोई वैतनिक कर्मचारी उप-खंड (ii) से (vi) तथा (x) के सिवाय किन्हीं पूर्ववर्ती उपखंडों के अधीन निर्वाचन या नामनिर्देशन के लिए पात्र नहीं होगा तथा कि यदि उप-खंड (ii) से (vi) तथा (x) के सिवाय पूर्ववर्ती किन्हीं उपखंडों के अधीन निर्वाचित अथवा नामनिर्देशित किसी व्यक्ति को बाद में विश्वविद्यालय अथवा इसकी समवर्गी संस्थाओं में किसी वैतनिक पद पर नियुक्त किया जाता है, तो वह संसद का सदस्य नहीं रहेगा :
परन्तु यह और कि उप-खंड (vii) के सिवाय कोई भी व्यक्ति जब तक उसने पच्चीस वर्ष की आयु पूर्ण न कर ली हो संसद में नामनिर्देशन अथवा निर्वाचन हेतु पात्र नहीं होगा ।
(2) अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबन्धित हैं, उसके सिवाय, पदेन सदस्योें से भिन्न, संसद के सदस्य दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे। (3) संसद की सभी बैठकोें मेें, गणपूर्ति दो बटा पांच सदस्योेें से होगी।
(4) यदि बैठक के नियत समय के बाद आधे घंटे के भीतर गणपूर्ति के प्रयोजनार्थ अपेक्षित संख्या में सदस्य उपस्थित न हो, तो बैठक आयोजित नहीं की जाएगी तथा कुल-सचिव उस तथ्य का अभिलेख करेगा।
(5) निर्वाचन का ढंग मत पत्र द्वारा साधारण बहुमत से होगा तथा निर्वाचन का संचालन कुलपति द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार किया जाएगा।
11. (1) स्ांसद की बैठक कुलपति द्वारा नियत की गई तिथि को वर्ष मेें कम से कम एक बार होगी। संसद की बैठक।
(2) संसद की विशेष बैठक कुलाधिपति या कुलपति द्वारा इसके एक तिहाई सदस्योें के लिखित अनुरोध पर, किसी भी समय बुलाई जा सकती है ।
12. (1) कार्य परिषद् मेें निम्नलिखित व्यक्ति हाेंगे, अर्थात् :-
I. पदेन सदस्य-
कार्य परिषद् तथा इसका गठन।
नामनिर्देशिती जो संयुक्त सचिव की पदवी सेे नीचे का न हो ;
(iv) सचिव, हरियाणा सरकार, स्वास्थ्य तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग या उसकी अनुपस्थिति में, उसका नामनिर्देशिती जो निदेशक, आयुष की पदवी से नीचे का न हो ;
(v) महानिदेशक, आयुष या उसकी अनुपस्थिति में, उसका नामनिर्देशिती जो उप
निदेशक, आयुष की पदवी से नीचे का न हो ;
II. अन्य सदस्य -
(क) राज्य के आयुर्वेदिक महाविद्यालयों के दो प्रधानाचार्य (संकायों के अध्यक्षों से
अन्यथा), आयु की ज्येष्ठता के आधार पर, चक्रानुक्रम से ;
(ख) महाविद्यालयों/ संस्थाओं के संकायों के दो अध्यक्ष/ प्रधानाचार्य, चक्रानुक्रम
से ;
(ग) उपखण्ड (क) के अधीन अध्यक्षों से अन्यथा विश्वविद्यालय अध्यापन विभागों के आचार्यों में से एक, एक वर्ष के लिए, वरिष्ठता के आधार पर, चक्रानुक्रम से ;
109 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA)(घ) आचार्य से अन्यथा विश्वविद्यालय अध्यापन विभागों का एक अध्यापक,
वरिष्ठता के आधार पर, चक्रानुक्रम से ;
(ङ) राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विख्यात शिक्षाविदों अथवा विख्यात सेवारत/सेवानिवृत्त सिविल कर्मचारियों में से कुलाधिपति के नामनिर्देशितियों के रूप में दो व्यक्ति ;
(च) विश्वविद्यालय के अध्यापनेत्तर कर्मचारियों में से एक, एक वर्ष के लिए,
वरिष्ठता के आधार पर, चक्रानुक्रम से।
(2) कुल-सचिव कार्य परिषद् का पदेन सचिव होगा।
(3) गणपूर्ति तीन बटा पांच सदस्योें से होगी।
(4) अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबन्धित है, उसके सिवाय, पदेन सदस्योें से अन्यथा, कार्य परिषद् के सदस्य दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे। (5) कोई सदस्य जो अर्हता धारण करने से प्रविरत हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप वह कार्य परिषद् के सदस्य के रूप में निर्वाचित या नामनिर्देशित किया गया था, तो वह उसके सदस्य के रूप में नहीं रहेगा।
कार्य परिषद् का निर्णय। 13. विश्वविद्यालय के अतिरिक्त वित्तीय दायित्वों वाले तथा वार्षिक बजट से संबंधित उन मामलों में कार्य-परिषद् का कोई निर्णय केवल तभी लागू होगा जब ऐसा निर्णय लेते समय सरकार का कम से कम एक प्रतिनिधि उपस्थित हो तथा उसने ऐसे निर्णय की सहमति दे दी हो ।
14. कार्य परिषद् निम्नलिखित शक्तियोें का प्रयोग करेगी, अर्थात् :-
कार्य परिषद् की शक्तियां। (क) विश्वविद्यालय के राजस्व, सम्पत्ति तथा निधियोें का धारण, नियन्त्रण तथा प्रबन्ध करना ;
(ख) अध्यापन तथा शैक्षणिक पद सृजित करना, ऐसे पदोें की संख्या तथा परिलब्धियां अवधारित करना और भारतीय केन्द्रीय चिकित्सा परिषद् के अनुसार विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित महाविद्यालयों तथा संस्थाओे के आचार्य, उपाचार्य, प्राध्यापक और अन्य शैक्षणिक अमले और प्रधानाचार्योंं के कर्तव्य तथा सेवा शर्तें परिनिश्चित करना :
परन्तु अतिरिक्त वित्तीय दायित्व वाले नए पद के सृजन के मामले तभी लागू रहेंगे यदि सरकार के प्रतिनिधि अर्थात् वित्त सचिव या उसकी अनुपस्थिति मेें, उसका प्रतिनिधि तथा सचिव, स्वास्थ्य अथवा उसकी अनुपस्थिति में, उसका प्रतिनिधि, ऐसे निर्णय लेते समय उपस्थित है और उस निर्णय की सहमति दे दी हैः
परन्तु यह और कि यदि उचित नोटिस के बाद भी दो लगातार बैठकोें में वित्त या स्वास्थ्य विभाग से सरकारी प्रतिनिधि उपस्थित नहीं होता है, तो कार्य परिषद् पदों के सृजन के सम्बन्ध में प्रस्ताव का अनुमोदन कर सकती है :
परन्तु यह और कि अध्यापकोें और शैक्षणिक अमले की संख्या, अर्हताओें तथा परिलब्धियोें के बारे मेें, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद् तथा वित्त समिति की सिफारिशोें पर विचार के बाद कार्रवाई करेगी ;
(ग) विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित महाविद्यालयों तथा संस्थाओं के आचार्यो, उपाचार्यों, प्राध्यापकों, अन्य शैक्षणिक अमले तथा प्रधानाचार्यों को प्रयोजन के लिये गठित चयन समितियों की सिफारिशोें पर नियुक्त करना और उनमें अस्थायी रिक्तियां भरना ;
(घ) प्रशासनिक, लिपिक-वर्गीय तथा अन्य पद सृजित करना और परिनियमोें द्वारा विहित रीति
में, उन पर नियुक्तियां करना ;
(ड.) विश्वविद्यालय के वित्त, लेखे, निवेशों, सम्पत्ति, कारबार तथा सभी अन्य प्रशासनिक कार्यकलापों का प्रबन्ध तथा विनियमन करना और उस प्रयोजन के लिये ऐसे अभिकर्ताओं (एजेंटों) को, जिन्हेें वह ठीक समझे, नियुक्त करना ;
(च) विश्वविद्यालय से सम्बन्धित कोई भी धन, जिसमें ऐसे स्टॉकोें, निधियोें, हिस्सोें या प्रतिभूतियोें में उपयोग में न लाई गई कोई आय भी शामिल है, जिन्हें वह, समय-समय पर, ठीक समझे या समय-समय पर ऐसे निवेशों में परिवर्तित करने की उसी प्रकार की शक्तियोें सहित भारत मेें अचल सम्पत्ति की खरीद मेें निवेेश करना ;
(छ) विश्वविद्यालय की ओर से किसी चल तथा अचल सम्पत्ति का अन्तरण करना या अन्तरण
स्वीकार करना ;
110 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA)(ज) विश्वविद्यालय के कार्य को चलाने के लिये निर्माणों, परिसरों, फर्नीचर तथा उपकरणों तथा अन्य आवश्यक साधनोें की व्यवस्था करना ; (झ) विश्वविद्यालय के लिये कोई सामान्य मुद्रा चुनना ; (ञ) विश्वविद्यालय के कुलपति, कुल-सचिव या ऐसे अन्य कर्मचारी या प्राधिकरण या उसके द्वारा नियुक्त किसी समिति को अपनी कोई शक्ति, जो वह उचित समझे, प्रत्यायोजित करना ;
(ट) विश्वविद्यालय की ओर से संविदाएं करना, फेरबदल करना, उन्हेें कार्याविन्त करना अथवा रद्द करना ;
(ठ) परिनियम बनाना, संशोधन करना अथवा निरसन करना; (ड) विद्याार्थियोें मेें अनुशासन बनाये रखने के सम्बन्ध मेें निर्णय करना ; (ढ) ऐसी अन्य शक्तियोें का प्रयोग करना तथा ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करना, जो इस अधिनियम या परिनियमोें या अध्यादेशोें द्वारा कार्य परिषद् को प्रदत्त की जाएं या पर अधिरोपित की जाएं ; तथा
(ण) विश्वविद्यालय की सभी शक्तियोें का प्रयोग करना जो अधिनियम, परिनियमोें या अध्यादेशोें द्वारा अन्यथा उपबन्धित न हो।
15. शिक्षा परिषद् मेें निम्नलिखित व्यक्ति हाेंगे, अर्थात् :-
I. (क) पदेन सदस्य-
षिक्षा परिषद् और इसका गठन।
(i) कुलपति ; (ii) प्रतिकुलपति ; (iii) अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग, हरियाणा या निदेशक, चिकित्सा शिक्षा तथा अनुसंधान या उसकी अनुपस्थिति में, उसका नामनिर्देशिती जो उप निदेशक, आयुष की पदवी से नीचे का न हो ;
(iv) कुल-सचिव ; (v) संकायोें के अध्यक्ष ; (vi) विद्यार्थी कल्याण अध्यक्ष, यदि कोई हो ; (vii) अध्यक्ष, शैक्षणिक मामले ; (viii) महाविद्यालयों के अध्यक्ष ; (ix) विभागों के अध्यक्ष ; (x) विश्वविद्यालय छात्रावासों का मुख्य वार्डन ; (xi) कुलानुशासक; (xii) परीक्षा नियन्त्रक, यदि कोई हो ; (xiii) विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का पुस्तकाध्यक्ष; (xiv) विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित महाविद्यालयों के प्रधानाचार्यों में से एक, चक्रानुक्रम से,
बशर्ते वह कार्य-परिषद् का सदस्य न हो ;
(xv) विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त अवकाश-प्राप्त आचार्य (आचार्यों)/ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नियुक्त अवकाश-प्राप्त अधिसदस्य (किन्तु मत देने अथवा चुनाव लड़ने के अधिकार के बिना)।
II. अन्य सदस्य -
(i) प्रत्येक विभाग से विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त एक आचार्य, वरिष्ठता के आधार पर,
चक्रानुक्रम से ;
(ii) कुलपति द्वारा, विश्वविद्यालय के बाहर से, नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के तीन शिक्षाविद्, बशर्ते कि उन में से एक से अधिक उसी क्षेत्र से नहीं होगा ;
III (i) कुल-सचिव शिक्षा परिषद् का सदस्य-सचिव होगा ।
(ii) तीन बटा पांच सदस्योें से गणपूर्ति होगी । (iii) अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबन्धित है, उसके सिवाय, पदेन सदस्योें से भिन्न,
शिक्षा परिषद् के सदस्य, दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे। (iv) निर्वाचन का ढंग मतपत्र द्वारा साधारण बहुमत से होगा और निर्वाचनों का संचालन
कुलपति द्वारा बनाए गये नियमोें के अनुसार किया जायेगा ।111 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) 16. (1) शिक्षा परिषद् निम्नलिखित शक्तियोें का प्रयोग करेगी, अर्थात् :-
षिक्षा परिषद् की शक्तियां। (क) विश्वविद्यालय की शैक्षणिक नीतियोें पर सामान्य पर्यवेक्षण करना और महाविद्यालयों तथा संस्थाओं में शिक्षा पद्धतियों, सहकारी अध्यापन, शैक्षणिक स्तरों में अनुसंधान या सुधारोें के मूल्यांकन के संबंध मेें निदेश देना ;
(ख) या तो स्वयं अपनी प्ररेणा पर या कुलाधिपति, कुलपति, कार्य परिषद् अथवा किसी संकाय के प्रतिनिर्देश से, सामान्य शैक्षणिक हित के मामलों पर विचार करना तथा उन पर उचित कार्रवाई करना ;
(ग) कार्य परिषद् को अध्यापन पद सृजित करने तथा समाप्त करने की सिफारिश
करना ;
(घ) संकायोें की सिफारिशोें पर विभ्ािंन्न परीक्षाओें के लिये पाठ्य विवरण तथा
पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन विहित करना ;
(ङ) विश्वविद्यालय के शिक्षा सम्बन्धी कृत्यों, अनुशासन, निवास, प्रवेश, अध्येता- वृत्तियोें, अध्ययन-वृत्तियोें, छात्रवृत्तियोें, पदकोें तथा पुरस्कारोें को प्रदान करने, फीसों की रियायतोें, सामूहिक जीवन तथा उपस्थिति के सम्बन्ध मेें परिनियमों और अध्यादेशोें से संगत ऐसे विनियमों को बनाना ; और
(च) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना तथा ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करना जो इस अधिनियम, परिनियमों अथवा अध्यादेशों द्वारा शिक्षा परिषद् को प्रदत्त की जायें या सौंपे जायें।
(2) अध्ययन के पाठ्य-विवरण, पाठ्यक्रमानुसार तथा परीक्षाओें के संचालन के सम्बन्ध में शिक्षा परिषद् के सभी निर्णय, जहां तक वे परिनियमोें तथा अध्यादेशोें द्वारा उपबन्धित न हाें, अंतिम होंगे ।
17. (1) वित्त समिति में निम्नलिखित व्यक्ति शामिल होंगे, अर्थात् :-
वित्त समिति का गठन। I. पदेन सदस्य-
(क) कुलपति (अध्यक्ष) ;
(ख) प्रतिकुलपति ;
(ग) सचिव, हरियाणा सरकार, वित्त विभाग, या उसकी अनुपस्थिति में, उसका नामनिर्देशिती जो संयुक्त सचिव की पदवी सेे नीचे का न हो ;
(घ) सचिव, हरियाणा सरकार, स्वास्थ्य विभाग या उसकी अनुपस्थिति में, उसका
नामनिर्देशिती जो निदेशक, आयुष की पदवी से नीचे का न हो ;
II. अन्य सदस्य -
(क) कुलपति की सिफारिश पर कुलाधिपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले
वित्त में सुविज्ञता रखने वाले दो बाह्य सदस्य ;
(ख) कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले संकायों के दो अध्यक्ष ।
(2) कुल-सचिव समिति का सदस्य-सचिव होगा । (3) वित्त समिति के नामनिर्दिष्ट सदस्य दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे।
(4) पांच सदस्योें, जिनमेें से कम से कम दो सदस्य सरकार द्वारा नामनिर्देशिती होंगे, से गणपूर्ति होगी ।
वित्त समिति के कृत्य तथा शक्तियां। 18. (1) वित्त समिति लेखोें की परीक्षा और व्यय के प्रस्तावोें की संवीक्षा करेगी तथा कार्य परिषद् को वार्षिक बजट अनुमोदन के लिये प्रस्तुत करेगी। वित्त समिति जो विश्वविद्यालयोें के साधनोें तथा आय पर आधारित वर्ष के लिये कुल आवर्ती तथा अनावर्ती व्यय की सीमाएं नियत करेगी, के पूर्व अनुमोदन के बिना, विश्वविद्यालय द्वारा, बजट मेें से कोई व्यय उपगत नहीं किया जायेगा। इस प्रकार नियत सीमाओें से अधिक कोई व्यय विश्वविद्यालय द्वारा उपगत नहीं किया जायेगा ।
(2) यह अध्यापन तथा अन्य पदों के सृजन की जांच करेगी तथा कार्य परिषद् को सिफारिश करेगी ।
(3) विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे तथा शासकीय प्राक्कलन, वित्त समिति के सामने, उस पर उसके विचार तथा टिप्पणियों के लिये रखे जायेंगे तथा उसके बाद कार्य परिषद् को अनुमोदन के लिये प्रस्तुत किये जायेंगे ।112 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) संकाय। 19. निम्नलिखित संकाय होंगे, अर्थात्ः -
(1) आयुर्वेद संकाय ;
(2) योग तथा प्राकृतिक चिकित्सा संकाय ;
(3) यूनानी संकाय ; (4) सिद्धा संकाय ;
(5) होमियोपैथि संकाय ; (6) ऐसे अन्य संकाय, जिन्हें कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद् की सिफारिश पर, परिनियमों द्वारा विहित करें।
20. (1) प्रत्येक संकाय मेें निम्नलिखित होंगे -
संकायों का गठन।
(i) स्ांकाय का डीन (अध्यक्ष) ; (ii) उस संकाय मेें सम्मिलित विभागोें का अध्यक्ष ; (iii) प्रत्येक विभाग से एक आचार्य वरिष्ठता के आधार पर, चक्रानुक्रम से ; (iv) संकाय मेें सम्मिलित विभागों में विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त या मान्यता-प्राप्त एक
उपाचार्य तथा एक प्राध्यापक वरिष्ठता के अनुसार, चक्रानुक्रम से :
(v) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकारों से अनुमति प्राप्त आयुर्वेदिक महाविद्यालयों के दो
प्रधानाचार्य वरिष्ठता के आधार, चक्रानुक्रम से ।
(2) नामनिर्दिष्ट सदस्य दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे :
परन्तु कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद् के अनुरोध पर, किसी संकाय के सदस्योें की संख्या बढ़ा सकती है।
(3) कुल-सचिव प्रत्येक संकाय का सचिव होगा।
(4) प्रत्येक संकाय में सदस्योें के दो बटा पांच से गणपूर्ति होगी।
संकायों के अध्यक्ष।
21. (1) प्रत्येक संकाय का अध्यक्ष होगा जो कुलपति द्वारा नियुक्त किया जायेगा। अध्यक्ष, संकाय में सम्मिलित विभ्ािंन्न विभागोें मेें आचार्यों मेें से वरिष्ठता के आधार पर चक्रानुक्रम से नियुक्त किया जायेगा : परन्तु अध्यक्ष के रूप में नियुक्त आचार्य अगली बार तब नियुक्त किया जायेगा जब संकाय के सभी आचार्य अपनी वरिष्ठता के क्रम में अध्यक्ष के रूप में नियुक्त हो चुके होंगे :
परन्तु यह और कि यदि संकाय में कोई आचार्य नहीं है, तो सम्बन्धित विभागों में उपाचार्यों में से अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा।
(2) अध्यक्ष, जो दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेगा, के पद के साथ उपयुक्त पारिश्रमिक होगा ।
(3) अध्यक्ष, संकाय की बैठकें बुलाएगा तथा उनकी अध्यक्षता करेगा ।
(4) अध्यक्ष, उनमेें अध्यापन के समन्वय के लिये तथा संकाय के निर्णय के निष्पादन के लिये उत्तरदायी होगा ।
(5) अध्यक्ष को संकाय की समिति की किसी बैठक मेें उपस्थित होने और उसके विचार-विमर्श मेें भाग लेने का अधिकार होगा ।
22. शिक्षा परिषद् के नियन्त्रण के अध्यधीन, संकाय की निम्नलिखित शक्तियां होंगी-
संकाय की शक्तियां।
(क) संकाय को साैंपे गए विभागोें मेें विश्वविद्यालय के अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य में तालमेल लाना ;
(ख) अध्ययन बोर्डों से आवश्यक रिपोर्ट के बाद, विभिन्न परीक्षाओं के लिये पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन तथा पाठ्य विवरणों की शिक्षा परिषद् को सिफारिश करना ;
(ग) विभागों से पद सृजित करने तथा समाप्त करने के लिये रिपोर्ट प्राप्त करना तथा उन्हें शिक्षा परिषद् को ऐसी सिफारिशों के साथ भेजना, जो वह युक्तियुक्त समझे ;
(घ) अध्यापन तथा परीक्षाओं के स्तरों की उन्नति के लिये स्कीमों के बारे में शिक्षा परिषद् से विचार-विमर्श करना तथा सुझाव देना ; और
(ड.) किसी मामले के संबंध में कार्रवाई करना जो उसे शिक्षा परिषद् या कुलपति या संकाय के अध्यक्ष द्वारा निर्दिष्ट किया जाये।113 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) विभाग का अध्यक्ष। 23. (1) प्रत्येक अध्यापन विभाग का एक अध्यक्ष होगा जो कुलपति द्वारा तीन वर्ष की अवधि के लिए, चक्रानुक्रम से, नियुक्त किया जायेगा :
परन्तु-
(क) यदि किसी विभाग में दो या अधिक आचार्य हों, तो अध्यक्ष पद केवल आचार्यों में से वरिष्ठता द्वारा चक्रानुक्रम से होगा, परन्तु अध्यक्ष के रूप में नियुक्त आचार्य अगली बार तब नियुक्त किया जायेगा जब विभाग में सभी आचार्य अपनी वरिष्ठता के क्रम में अध्यक्ष नियुक्त हो चुके होंगे ;
(ख) यदि किसी विभाग में केवल एक ही आचार्य हो, तो अध्यक्ष पद, आचार्य तथा
वरिष्ठतम उपाचार्य के बीच चक्रानुक्रम से होगा ;
(ग) यदि किसी विभाग में कोई आचार्य न हो, तो अध्यक्ष पद वरिष्ठतम दो उपाचार्यों के
बीच चक्रानुक्रम से होगा ;
(घ) कुलपति, यदि वह किसी प्रशासकीय कारण से ऐसा करना आवश्यक समझता है, तो वह वरिष्ठता के स़िद्धांत में परिवर्तन कर सकता है, उस दशा में वह मामले की रिपोर्ट कार्य परिषद् को उसकी अगली बैठक में देगा ।
(2) ऐसे विभाग की दशा में, जहां कोई अध्यापक अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिये पात्र न हो, या ऐसे विभागों के लिए जहां महाविद्यालयों में केवल पूर्व स्नातक स्तर तक के लिये शिक्षा दी जाती है, संबंधित संकाय का अध्यक्ष ही उसका अध्यक्ष होगा ।
(3) यदि कोई वरिष्ठ व्यक्ति लम्बे अवकाश पर हो, तो अगला पात्र व्यक्ति विभाग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया जायेगा और वह अपनी समयावधि पूरी होने तक ऐसे रूप में निरन्तर बना रहेगा, यद्यपि वरिष्ठ व्यक्ति उस अवधि के दौरान अवकाश से वापस भी आ जाये। तथापि, वरिष्ठ व्यक्ति, वर्तमान पदधारी की समयावधि की समाप्ति के बाद, अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिये पात्र होगा । (4) यदि विभाग का अध्यक्ष, बीमारी के कारण, अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से, अपने पद के कर्तव्य का पालन में असमर्थ हो, तो जब तक कुलपति अन्यथा आदेश न करे, पद के कर्तव्य का पालन अगले पात्र व्यक्ति द्वारा किया जाएगा। (5) यदि कोई व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के प्रस्ताव कोे स्वीकार करने से इनकार करता है या स्वेच्छा से त्याग-पत्र देता है, तो वह विभाग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिये तब तक पात्र नहीं होगा जब तक पात्र अध्यापकों में से चक्रानुक्रम से चक्र की समाप्ति के बाद उसकी बारी फिर से न आ जाये। (6) यदि कुलपति, यह आवश्यक समझे, तो वह इस तथ्य को विचार में लाए बिना कि वर्तमान अध्यक्ष की समयावधि अभी समाप्त नहीं हुई है, अगले पात्र व्यक्ति को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर सकता है, ऐसी दशा में वह मामले की रिपोर्ट कार्य परिषद् को उसकी अगली बैठक में देगा ।
नियुक्ति। 24. (1) अध्यापन पदों पर सभी नियुक्तियां चयन समिति की सिफारिशों पर, कार्य परिषद् द्वारा की जायेंगी । (2) ग्रुप-क (अध्यापनेतर/तकनीकी) पदों पर नियुक्तियां, स्थापना/चयन समिति की सिफारिश पर, कार्य परिषद् द्वारा की जाएंगी ।
(3) (i) ग्रुप-क से भिन्न पदों पर नियुक्तियां, नियमों अथवा आदेशों में अधिकथित सम्यक् प्रक्रिया का अनुपालन करने के पश्चात् कुलपति द्वारा की जाएंगी । (ii) ग्रुप-ग तथा घ कर्मचारियों के संबंध में दैनिक वेतन आधार पर नियुक्तियां, नियमों अथवा आदेशों में अधिकथित सम्यक् प्रक्रिया का अनुपालन करने के पश्चात् कुल-सचिव द्वारा की जाएंगी ।
(4) उपर्युक्त खण्ड (1), (2) और (3) मेें दी गई किसी बात के होते हुए भी, कुलपति, जहां वह आवश्यक समझे, यदि नियमित नियुक्ति करना संभव अथवा वांछनीय न हो, छह मास से अन्धिक अवधि के लिये तदर्थ या अस्थायी नियुक्ति कर सकता है। जहां कार्य परिषद् नियुक्ति प्राधिकारी हो, कुलपति द्वारा लिया गया निर्णय कार्य परिषद् को उसकी अगली बैठक में सूचित किया जाएगा ।
चयन समिति। 25. (1) नीचे विनिर्दिष्ट आचार्य/उपाचार्य/प्राध्यापक की किसी नियुक्ति के लिए, चयन समिति में निम्नलिखित शामिल हाेंगे-
(i) कुलपति ; (ii) संकाय का अध्यक्ष ;
114 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA)(iii) सम्बद्ध विभाग का अध्यक्ष, यदि वह आचार्य हो ; (iv) विभाग में वरिष्ठतम आचार्य सिवाय उसके जहां कुलपति द्वारा अन्यथा निर्णीत हो ; (v) उस विषय में जिससे व्यक्ति सम्बद्ध है, अपने विशेष ज्ञान, अथवा रूचि के आधार पर, शिक्षा परिषद् द्वारा तैयार की गई नामावली से कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किए गए विश्वविद्यालय से सम्बन्ध न रखने वाले तीन व्यक्ति :
परन्तु कुलपति विशेष परिस्थितियों में नामावली में अधिक नाम जोड़ सकता
है औेर इन नामों की रिपोर्ट शिक्षा परिषद् को उसकी अगली बैठक में करेगा;
(vi) कुलाधिपति का नामनिर्देशिती।
(2) परिनियमों में यथा उपबन्धित, शिक्षा परिषद् द्वारा तैयार की गई नामावलियां तथा कुलपति द्वारा उनमें किये गए परिवर्धन, यदि कोई हों, आदेशों के जारी होने की तिथि से दो वर्ष की अवधि के लिए कुलाधिपति के अनुमोदन के अध्यधीन होंगे :
परन्तु यदि चयन समिति में उपस्थित होने के निमन्त्रण को स्वीकार करने के बाद भी विशेषज्ञों में से कोई एक उपस्थित होने में असफल रहता है, तो बैठक की कार्यवाही अविधिमान्य नहीं होगीः परन्तु यह और कि चयन समिति की बैठक की कार्यवाहियां अविधिमान्य नहीं होगी यदि चयन समिति का कोई पदेन सदस्य बैठक में उपस्थित होने में असफल रहता है । (3) कुलपति चयन समिति की बैठकों की अध्यक्षता करेगा और कुल-सचिव उसके सचिव के रूप में कार्य करेगा। चयन समिति की बैठक कुलपति द्वारा, या उसके निर्देशों के अधीन बुलाई जायेगी। (4) चयन समिति उसे निर्दिष्ट की गई नियुक्ति के बारे में विचार करेगी और कार्य परिषद् को सिफारिश प्रस्तुत करेगी। यदि कार्य परिषद् समिति द्वारा की गई सिफारिशों को स्वीकार करने में असमर्थ है, तो वह इसके कारण अभिलिखित करेगी और मामला कुुलाधिपति को अन्तिम आदेशों के लिये प्रस्तुत करेगी ।
स्थापना समिति। 26. स्थापना समिति का गठन ऐसा होगा, जो अध्यादेशों द्वारा अवधारित किया जाए।
27. (1) शिक्षा योजना बोर्ड में निम्नलिखित शामिल होंगे-
षिक्षा योजना बोर्ड का गठन और कृत्य।
(क) कुलपति ; (ख) शिक्षा में उच्च जानकारी रखने वाले सात से अन्धिक व्यक्ति, जो कुलपति की
सिफारिश पर कुलाधिपति द्वारा दो वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त किए जाएंगे ;
(ग) कुल-सचिव, जो बोर्ड का सचिव होगा।
(2) बोर्ड की सिफारिशों को, विश्वविद्यालय के समुचित प्राधिकरणों द्वारा उन्हें अनुमोदित किये जाने के बाद, कार्यरूप दिया जायेगा ।
(3) यह विश्वविद्यालय में विशेषकर शिक्षा और अनुसंधान के स्तरों के सम्बन्ध में विश्वविद्यालय की योजना और विकास पर परामर्श देगा।
दीक्षान्त समारोह।
28. उपाधियां प्रदत्त करने के लिए तथा अन्य प्रयोजनों के लिये विश्वविद्यालय का दीक्षान्त समारोह ऐसी रीति में आयोजित किया जायेगा, जो कार्य परिषद् द्वारा, समय-समय पर, अध्यादेश द्वारा, अधिकथित की जाये : परन्तु सम्मानार्थ उपाधि प्रदत्त करने का प्रत्येक प्रस्ताव कुलाधिपति की पुष्टि के अधीन रहते हुए होगा ।
विभाग। 29. विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों में कुलपति की सिफारिश पर शिक्षा परिषद् द्वारा सम्यक् रूप से सृजित विश्वविद्यालय अध्यापन विभाग हों।
30. कुलपति की सिफारिश पर, शिक्षा परिषद् द्वारा अध्ययन विभाग विभिन्न संकायों को समनुदेशित किये जायेंगे।
संकायों को अध्ययन विभाग को समनुदेषन।
अध्ययन बोर्ड। 31. (1) संकाय में सम्मिलित प्रत्येक विभाग में, दो अध्ययन बोर्ड होंगे, एक पूर्व स्नातक अध्ययन के लिये और दूसरा स्नातकोत्तर अध्ययन तथा अनुसंधान के लिये होगा।
(2) पूर्व स्नातक अध्ययन बोर्ड में निम्नलिखित शामिल होंगे -115 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) (i) विभाग का अध्यक्ष ; (ii) कुलपति द्वारा, वरिेष्ठता के अनुसार, चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले,
विश्वविद्यालय द्वारा विभाग में नियुक्त अथवा मान्यताप्राप्त एक आचार्य ;
(iii) कुलपति द्वारा, वरिष्ठता के अनुसार, नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले विश्वविद्यालय द्वारा विभाग में नियुक्त अथवा मान्यताप्राप्त एक उपाचार्य तथा एक प्राध्यापक; (iv) आयुर्वेदिक महाविद्यालयों से सम्बद्ध विषय में, पूर्व स्नातक अध्यापन अनुभव काल द्वारा अवधारित की जाने वाली वरिष्ठता के अनुसार, चक्रानुक्रम से, कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले पूर्व स्नातक पाठ्यक्रमों के छह अध्यापक (जिनमें प्रधानाचार्य भी शामिल हैं), किन्तु यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी एक महाविद्यालय से एक से अधिक ऐसा सदस्य न हो :
परन्तु कोई भी ऐसा अध्यापक दो क्रमिक अवधियों के लिये नामनिर्दिष्ट नहीं
किया जायेगा :
परन्तु यह और कि अध्यापक, जो संकाय के सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट
किया गया है, इस उप-खण्ड के अधीन नामनिर्दिष्ट नहीं किया जायेगा ;
(v) विभागाध्यक्ष की सिफारिश पर, कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले दो
बाहरी विशेषज्ञ :
परन्तु कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद् के अनुरोध पर, उपर्युक्त उप-खण्ड (iv)
के अधीन, पूर्व स्नातक अध्ययन बोर्ड के सदस्यों की संख्या बढ़ा सकती है।
(3) स्नातकोत्तर अध्ययन तथा अनुसंधान बोर्ड में निम्नलिखित शामिल होंगे -
(i) विभाग का अध्यक्ष ;
(ii) विश्वविद्यालय द्वारा विभाग में नियुक्त अथवा मान्यताप्राप्त सभी आचार्य ; (iii) कुलपति द्वारा, वरिष्ठता के अनुसार, चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले विश्वविद्यालय द्वारा विभाग में नियुक्त अथवा मान्यताप्राप्त दो उपाचार्य और दो प्राध्यापक ;
(iv) स्नातकोत्तर अध्यापन अनुभव काल द्वारा अवधारित की जाने वाली वरिष्ठता के अनुसार, कुलपति द्वारा चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले सम्बद्ध विषय में कम से कम दस वर्ष के अध्यापन अनुभव सहित, जिसमें से पांच वर्ष का स्नातकोत्तर उपाधि अध्यापक के रुप में होगा, विश्वविद्यालय के विशेषाधिकारों से अनुमति प्राप्त आयुर्वेदिक महाविद्यालयों में स्नातकोत्तर विभागों के अध्यक्षों सहित दो अध्यापक :
परन्तु यदि स्नातकोत्तर विभाग रखने वाले आयुर्वेदिक महाविद्यालयों की संख्या छह से अधिक हो, तो संबंधित विषय का एक और अध्यापक नामनिर्दिष्ट किया जायेगा, किंतु एक ही महाविद्यालय से एक से अधिक ऐसा सदस्य नहीं होगा;
(v) विभागाध्यक्ष की सिफारिश पर, कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले दो बाहरी
विशेषज्ञ :
परन्तु कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद् के अनुरोध पर, उपर्युक्त उप-खण्ड (iv)
के अधीन स्नातकोत्तर अध्ययन बोर्ड के सदस्यों की संख्या बढ़ा सकती है।
(4) (i) पूर्व स्नातक अध्ययन बोर्ड, सम्बद्ध संकाय के माध्यम से पूर्व स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए, विभिन्न विषयों हेतु अध्ययन के पाठ्यक्रमों और पाठ्य विवरणों तथा पाठ्य पुस्तकों के लिये शिक्षा परिषद् को सिफारिश करेगा और स्नातकोत्तर अध्ययन बोर्ड, स्नातकोत्तर कक्षाओं और अनुसंधान उपाधियों के लिये पाठ्यक्रमों के संबंध में ऐसी सिफारिशें करेगा ;
(ii) अध्ययन बोर्ड, पूर्व स्नातक या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमाें, जैसी भी स्थिति हो, के लिए प्राश्निकों तथा परीक्षकों की नियुक्ति के संबंध में शिक्षा परिषद् को सिफारिश भी करेगा ;
(iii) अध्ययन बोर्ड, ऐसे किसी अन्य मामले के बारे में भी कार्यवाही करेगा जो उन्हें
संकाय द्वारा निर्दिष्ट किया जाये। विभाग का अध्यक्ष, बोर्ड का अध्यक्ष होगा।116 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) पदेन-सदस्यों से भिन्न सदस्य, दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे :
परन्तु कोई व्यक्ति, जिसकी पुस्तक या कोई अन्य प्रकाशन बोर्ड के समक्ष
विचाराधीन हो, बोर्ड से आसक्त नहीं होगा :
परन्तु यह और कि कोई व्यक्ति जो किसी एक या अन्य प्रकार से तुच्छ नोटों, गाईडों या सहायक पुस्तकों के प्रकाशन में सम्मिलित हो, तो वह अध्ययन बोर्ड का सदस्य बनने का पात्र नहीं होगा।
32. विश्वविद्यालय द्वारा उपाधि, उपाधि-पत्र, प्रमाण-पत्र तथा विद्या सम्बन्धी अन्य विशेष उपाधियां वापस ली जा सकती हैं -
उपाधि/उपाधि- पत्र इत्यादि की वापसी।
(क) यदि सम्बन्धित व्यक्ति की उम्मीदवारी, अध्यादेश द्वारा अधिकथित रीति के अनुसार रद्द कर दी गई हो, या परीक्षाफल रद्द कर दिया गया हो ; अथवा
(ख) यदि उम्मीदवार ने विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में दुव्र्यवहार किया हो, परन्तु प्रश्न यह कि क्या किसी व्यक्ति ने इस परिनियम के निबन्धनों के अनुसार दुव्र्यवहार किया है, तो कुलपति द्वारा अन्तिम रूप से निर्णय किया जायेगा; अथवा
(ग) जब शिक्षा परिषद् के समक्ष यह दर्शाते हुये पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत किया जाता है कि कोई व्यक्ति जिसको विश्वविद्यालय द्वारा उपाधि या उपाधि-पत्र इत्यादि प्रदत्त किया गया था, ऐसे अपराध का सिद्धदोष हो गया है, जो उनकी राय में गम्भीर अपराध है, तो शिक्षा परिषद्, कार्य परिषद् को सिफारिश कर सकती है कि ऐसी उपाधि या उपाधि-पत्र को रद्द कर दिया जाये।
33. विश्वविद्यालय द्वारा किसी अध्यापक का अनुमोदन, मान्यता वापस ली जा सकती है - (क) यदि अध्यापक, अध्यादेशों द्वारा अधिकथित रीति के अनुसार कर्तव्यों का पालन करने में असफल रहता है ;
अध्यापकों का अनुमोदन, मान्यता की वापसी।
(ख) यदि कार्य परिषद् के समक्ष पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत किया जाता है कि अध्यापक ने ऐसा कार्य किया है, जो उनकी राय में गम्भीर अपराध है, कार्य परिषद् अध्यापक का अनुमोदन, मान्यता वापस ले सकती है।
34. विश्वविद्यालय, सरकार के पैटर्न पर, अपने अधिकारियों, अध्यापकों तथा अन्य कर्मचारियों के लाभ के लिये उपदान, अनुग्रह अनुदान, इत्यादि उपलब्ध करवायेगा।
उपदान, अनुग्रह अनुदान इत्यादि।
अध्येता-वृत्ति, छात्रवृत्ति, पदक तथा पुरस्कार।
35. प्रदान की जाने वाली अध्येता-वृाियों, छात्रवृाियों, पदकों तथा पुरस्कारों की संख्या तथा मूल्य कार्य परिषद् द्वारा या तो स्वप्रेरणा से या शिक्षा परिषद् या वित्त समिति की सिफारिशों पर अवधारित किया जायेगा ।
सदस्यता की समयावधि की परिसीमा।
36. (1) इन परिनियमों में दी गई किसी बात के होते हुये भी, कोई व्यक्ति, जो किसी विशेष प्राधिकरण या निकाय के सदस्य के रूप में अथवा किसी विशेष नियुक्ति के धारक के रूप में अपनी हैसियत में, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या निकाय का सदस्य है, केवल तब तक पद धारण करेगा जब तक उस विशेष प्राधिकरण या निकाय के सदस्य या उस विशेष नियुक्ति के धारक, जैसी भी स्थिति हो, के रूप में बना रहता है :
सदस्यता इत्यादि की समाप्ति।
परन्तु विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या निकाय का ऐसा अध्यापक-सदस्य जो अपनी सेवा से त्याग-पत्र दे देता है अथवा छह मास अथवा इससे अधिक के लिये छुट्टी पर चला जाता है, तो वह सम्बद्ध निकाय के सदस्य के रूप में नहीं बना रहेगा तथा कोई स्थानापन्न नियुक्त किया जायेगा। यदि उसकी छुट्टी की अवधि छह मास से कम हो, तो उसकी सदस्यता उसकी वापसी तक अथवा छह मास की अवधि की समाप्ति तक, जो भी बाद में हो, स्थगित रखी जायेगी। जहां सदस्यता स्थगित रखी जाती है, वहां कोई भी स्थानापन्न सदस्य नियुक्त या निर्वाचित नहीं किया जायेगा । (2) यदि कोई अध्यापक छह मास अथवा इससे अधिक की अवधि के लिये छुट्टी पर हो, तो वह उस विशेष रिक्ति के लिये नामनिर्देशन या पुनः निर्वाचन के लिये पात्र नहीं होगा। तथापि, वह ऐसी रिक्ति पर, जो छुट्टी से उसके लौटने के बाद उत्पन्न हो, नामनिर्देशन या निर्वाचन के लिये पात्र होगा । 37. विश्वविद्यालय के इन परिनियमों अथवा अध्यादेशों में दी गई किसी बात के होते हुये भी, कोई भी व्यक्ति, जो नैतिक अधमता वाले किसी अपराध का सिद्धदोष हो गया है अथवा किसी सरकारी या अर्ध सरकारी संस्था से अथवा विश्वविद्यालय अथवा किसी भी प्रकार की शिक्षा संस्था से कदाचार के लिए पदच्युत कर दिया गया है, तो विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण का अथवा विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त की गई किसी समिति का सदस्य बनने या बने रहने के लिये पात्र नहीं होगा। निलम्बनाधीन किसी व्यक्ति को उसके निलम्बन की अवधि के दौरान उपर्युक्त प्राधिकरणों या समितियों की किसी बैठक में बैठने के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाएगा।117 HARYANA GOVT. GAZ. , (EXTRA.) MAY 8, 2018 (VYSK. 18, 1940 SAKA) सदस्यता की निरर्हता। 38. यदि कोई व्यक्ति शिक्षा परिषद् द्वारा विश्वविद्यालय की किसी परीक्षा के संबंध में उसकी ओर से किये गये किसी प्रकार के अनाचार के कारण विश्वविद्यालय के किसी कार्य से विवर्जित कर दिया जाता है, तो ऐसा व्यक्ति अपवर्जन रहने तक, विश्वविद्यालय के किसी निकाय या प्राधिकरण का सदस्य बनने अथवा बने रहने के लिये निरर्हित रहेगा ।
अधिकारियों/
अध्यापकों/ 39. (1) विश्वविद्यालय के अधिकारी, अध्यापक तथा अन्य कर्मचारी कुलपति तथा संबंधित उच्च अधिकारियों के नियन्त्रण के अधीन रहते हुए ऐसी प्रशासनिक और/या वित्तीय शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं जिन्हें कार्य परिषद् अध्यादेश या नियमों या विनियमों या उसके द्वारा अंगीकृत संकल्पों द्वारा प्रत्यायोजित करे ।
कर्मचारियों को प्रषासनिक तथा वित्तीय शक्तियों का प्रत्यायोजन। (2) कुलपति या कुलपति के अनुमोदन से, कुल-सचिव, विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी, अध्यापक या किसी अन्य कर्मचारी को ऐसी शक्तियां जो वह आवश्यक समझे प्रत्यायोजित कर सकता है जो उनमें परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों द्वारा निहित की गई हैं।
कुलदीप जैन, सचिव, हरियाणा सरकार, विधि तथा विधायी विभाग।
55975—L.R.—H.G.P., Chd.