Haryana Government Gazette
EXTRAORDINARY Published by Authority
© Govt. of Haryana
No. 143–2022/Ext.] चण्डीगढ़, मंगलवार, दिनांक 9 अगस्त, 2022
(श्रावण 18, 1944 शक)
विधायी परिषिष्ट
क्रमांक विषय वस्तु
पृृष्ठ भाग I अधिनियम
195—221 1. हरियाणा खेलकूद विश्वविद्यालय अधिनियम, 2022 (2022 का हरियाणा अधिनियम संख्या 21)
(केवल हिन्दी में)
भाग II अध्यादेष
कुछ नहीं।
भाग III प्रत्यायोजित विधान
कुछ नहीं।
भाग IV षुद्धि-पर्ची, पुनः प्रकाषन तथा प्रतिस्थापन
कुछ नहीं।
(lxxii)195 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) भाग-I
हरियाणा सरकार
विधि तथा विधायी विभाग
अधिसूचना
दिनांक 9 अगस्त, 2022
संख्या लैज. 21/2022.- दि स्पोटर््स यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा ऐक्ट, 2022 का निम्नलिखित हिन्दी अनुवाद हरियाणा के राज्यपाल की दिनांक 04 अगस्त, 2022 की स्वीकृति के अधीन एतद्द्वारा प्रकाशित किया जाता है और यह हरियाणा राजभाषा अधिनियम, 1969 (1969 का 17), की धारा 4-क के अधीन उक्त अधिनियम का हिन्दी भाषा में प्रामाणिक पाठ समझा जाएगा :-
2022 का हरियाणा अधिनियम संख्या 21
हरियाणा खेलकूद विश्वविद्यालय अधिनियम, 2022 सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय पद्धतियों को अपनाते हुए श्रेष्ठ खेलकूद शिक्षण के लिए प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में कार्य करने के अतिरिक्त खेलकूद विज्ञान, खेलकूद प्रौद्योगिकी, खेलकूद प्रबंधन और खेलकूद कोचिंग के क्षेत्रों में खेलकूद शिक्षा को प्रोन्नत करने के लिए हरियाणा राज्य में विशिष्ट विश्वविद्यालय के रूप में खेलकूद विश्वविद्यालय स्थापित करने और निगमित करने के लिए तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक मामलों के लिए अधिनियम
भारत गणराज्य के तिहारवें वर्ष में हरियाणा राज्य विधानमण्डल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह
अधिनियमित हो :-
संक्षिप्त नाम तथा प्रारम्भ। 1. (1) यह अधिनियम हरियाणा खेलकूद विश्वविद्यालय अधिनियम, 2022, कहा जा सकता है। (2) यह ऐसी तिथि सेे लागू होगा, जो राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।
परिभाषाएं। 2. इस अधिनियम तथा इसके अधीन बनाए गए सभी परिनियमों, अध्यादेशों तथा विनियमों में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) ''विद्या और गतिविधि परिषद्'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय की विद्या और गतिविधि
परिषद् ;
(ख) ''शैक्षणिक कर्मचारिवृंद'' से अभिप्राय है, ऐसे प्रवर्गों के कर्मचारिवृंद, जो अध्यादेशों द्वारा
शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के रूप में पदाभिहित किए जाते हैं ;
(ग) ''खेलकूद अध्ययन बोर्ड'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय के विभाग का खेलकूद अध्ययन
बोर्ड ;
(घ) ''कुलाधिपति'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय का कुलाधिपति ; (ङ) ''महाविद्यालय'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित या अनुरक्षित या विश्वविद्यालय
के विशेषाधिकार प्राप्त महाविद्यालय या कोई अन्य शैक्षणिक संस्था ;
(च) ''सभा'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय की सभा ; (छ) ''विभाग'' से अभिप्राय है, अध्ययन विभाग और इसमें अध्ययन केन्द्र भी शामिल हैं ; (ज) ''कर्मचारी'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त कोई व्यक्ति और इसमें
विश्वविद्यालय के शिक्षक और अन्य कर्मचारिवृंद भी शामिल हैं ; (झ) ''कार्य परिषद्'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय की कार्य परिषद् ; (ञ) ''वित्त समिति'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय की वित्त समिति; (ट) ''निधि'' से अभिप्राय है, धारा 30 में निर्दिष्ट विश्वविद्यालय की निधि ; (ठ) ''हॉल'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय, या विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित दूरस्थ कैंपस या
महाविद्यालय या संस्था के छात्रों के लिए निवास या सामूहिक जीवन की इकाई ;
(ड) ''विभागाध्यक्ष'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय के किसी अध्यापन विभाग का अध्यक्ष ; (ढ) ''संस्था'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित या विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार
प्राप्त कोई शैक्षणिक संस्था, जो महाविद्यालय नहीं है;
196 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)(ण) ''दूरस्थ कैंपस'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय का ऐसा कैंपस, जो इसके द्वारा राज्य में या राज्य के बाहर किसी स्थान पर स्थापित किया जाए ;
(त) ''प्राचार्य'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित कोई महाविद्यालय या संस्था का मुखिया और इसमें शामिल हैं जहां कोई प्राचार्य नहीं है, वह व्यक्ति, जो प्राचार्य के रूप में कार्य करने के लिए सम्यक् रूप से तत्समय नियुक्त किया गया है और प्राचार्य या कार्यवाहक प्राचार्य की अनुपस्थिति में, ऐसे रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त उप-प्राचार्य ; (थ) ''कुलानुशासक'' से अभिप्राय है, कुलपति की सहायता करने हेतु विश्वविद्यालय का कुलानुशासक, जिसे कार्य परिषद् द्वारा नियुक्त किया जाएगा ;
(द) ''क्षेत्रीय केन्द्र'' से अभिप्राय है, किसी क्षेत्र में अध्ययन केन्द्रों के कार्य के समन्वय और पर्यवेक्षण के प्रयोजन के लिए और ऐसे अन्य कृत्यों को करने के लिए, जो कार्य परिषद् द्वारा ऐसे केन्द्रों को प्रदत्त किए जाएं, विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित या अनुरक्षित कोई केन्द्र ;
(ध) ''कुल-सचिव'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय का कुल-सचिव ; (न) ''विनियम'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम के अधीन विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण द्वारा बनाए गए तत्समय लागू विनियम ;
(प) ''विद्यापीठ'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय की अध्ययन विद्यापीठ; (फ) ''धारा'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम की धारा ; (ब) ''राज्य'' से अभिप्राय है, हरियाणा राज्य ; (भ) ''राज्य सरकार'' से अभिप्राय है, हरियाणा राज्य की सरकार; (म) ''परिनियमों'' और ''अध्यादेशों'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विश्वविद्यालय के क्रमशः परिनियम और अध्यादेश;
(य) ''अध्ययन केन्द्र'' से अभिप्राय है, सलाह, परामर्श, प्रशिक्षण देने के प्रयोजनों के लिए या छात्रों द्वारा अपेक्षित कोई अन्य सहायता देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित, अनुरक्षित या मान्यताप्राप्त कोई केन्द्र;
(कक) ''विश्वविद्यालय के शिक्षक'' से अभिप्राय है, आचार्य, सह आचार्य, सहायक आचार्य और ऐसे अन्य व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय में या विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित किसी दूरस्थ कैंपस, महाविद्यालय या संस्था या क्षेत्रीय केन्द्रों और अध्ययन केन्द्रों में शिक्षण, प्रशिक्षण प्रदान करने या अनुसंधान करने के लिए नियुक्त किए जाएं और जो अध्यादेशों द्वारा शिक्षकों के रूप में पदाभिहित किए जाते हैं ;
(कख) ''विश्वविद्यालय'' से अभिप्राय है, इस अधिनियम के अधीन विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित और निगमित हरियाणा खेलकूद विश्वविद्यालय; (कग) ''कुलपति'' से अभिप्राय है, विश्वविद्यालय का कुलपति।
विश्वविद्यालय की स्थापना।
3. (1) ''हरियाणा खेलकूद विश्वविद्यालय'' के नाम से विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी। (2) विश्वविद्यालय का मुख्यालय, जिला सोनीपत में राई में होगा और यह राज्य में ऐसे अन्य स्थानों पर दूरस्थ कैंपसों, महाविद्यालयों, क्षेत्रीय केन्द्रों और अध्ययन केन्द्रों की स्थापना कर सकता है और अनुरक्षण कर सकता है, जो यह उचित समझे : परन्तु विश्वविद्यालय, राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से, राज्य के बाहर भी दूरस्थ कैंपसों और अध्ययन केन्द्रों की भी स्थापना कर सकता है। (3) कुलाधिपति, कुलपति तथा सभा, कार्य परिषद् तथा विद्या और गतिविधि परिषद् के सदस्य, और ऐसे सभी व्यक्ति, जो आगे चलकर ऐसे अधिकारी या सदस्य बनें, जब तक वे ऐसा पद या सदस्यता धारण करते रहें, ''हरियाणा खेलकूद विश्वविद्यालय'' के नाम से निगमित निकाय का गठन करेंगे। (4) विश्वविद्यालय का शाश्वत उत्तराधिकार होगा और इसकी एक सामान्य मुद्रा होगी तथा उक्त नाम से वह वाद चला सकेगा और उस पर वाद चलाया जा सकेगा।
4. विश्वविद्यालय के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे-
विश्वविद्यालय के उद्देश्य।
(i) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान के क्षेत्र में उच्च अध्ययन के संस्थान के रूप में विकसित करना;
(ii) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में विशेष रूप से डिजाइनड शैक्षणिक और प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा खेलकूद की उच्च प्रौद्योगिकियों में प्रशिक्षण की व्यवस्था करते हुए शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान में अनुसंधान और विकास तथा ज्ञान के प्रसार की व्यवस्था करना;
197 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)(iii) खेलकूद को प्रोन्नत करने के लिए शारीरिक विद्या और खेलकूद प्रशिक्षण कार्यक्रमों को
सुदृढ बनाना;
(iv) अन्य महाविद्यालयों/ संस्थाओं को सम्बद्ध करने तथा शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान, खेलकूद प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में कलात्मक शैक्षणिक प्रशिक्षण देने और अनुसंधान करने तथा सभी खेलकूद और खेलों के लिए उच्च प्रदर्शन करने हेतु प्रशिक्षण के लिए उत्कृष्टता के केन्द्रों और संस्थाओं की स्थापना करना ;
(v) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान के क्षेत्र में अन्य संस्थाओं को व्यावसायिक और
शैक्षणिक नेतृत्व प्रदान करना ;
(vi) शारीरिक विद्या, खेलकूद विज्ञान, खेलकूद चिकित्सा, खेलकूद प्रौद्योगिकी और अन्य
संबंधित क्षेत्रों में व्यावसायिक मार्गदर्शन देना और प्लेसमेंट सेवाएं प्रदान करना;
(vii) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान, खेलकूद प्रौद्योगिकी तथा सभी खेलकूद और खेलों के लिए उच्च प्रदर्शन प्रशिक्षण के क्षेत्रों में विभिन्न स्तरों पर ज्ञान, कौशल और सामथ्र्य के विकास के लिए क्षमताएं उत्पन्न करना ;
(viii) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान, खेलकूद प्रौद्योगिकी तथा सभी खेलकूद और खेलों के लिए उच्च प्रदर्शन से संबंधित क्षेत्रों में शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक की अवसंरचना उपलब्ध कराने के लिए क्षमताएं उत्पन्न करना; (ix) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान, खेलकूद प्रौद्योगिकी तथा सभी खेलकूद और खेलों
के लिए उच्च प्रदर्शन प्रशिक्षण के क्षेत्रों में उच्च अर्हता प्राप्त व्यवसायिकों को तैयार करना ;
(x) सभी खेलकूद और खेलों के सर्वोत्कृष्ट और अन्य प्रतिभाशाली खिलाड़ियों और शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान में नवाचार तथा अनुसंधान करने, समर्थन और प्रचार करने के लिए उत्कृष्टता केन्द्र के रूप में कार्य करना ;
(xi) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान, खेलकूद प्रौद्योगिकी तथा सभी खेलकूद और खेलों के लिए उच्च प्रदर्शन प्रशिक्षण के क्षेत्रों में ज्ञान और विकास के लिए अग्रणी संसाधन केन्द्र के रूप में कार्य करना ;
(xii) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान, खेलकूद प्रौद्योगिकी तथा सभी खेलकूद और खेलों
के लिए उच्च प्रदर्शन प्रशिक्षण के क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग उपलब्ध कराना ;
(xiii) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान, खेलकूद प्रौद्योगिकी तथा सभी खेलकूद और खेलों के लिए उच्च प्रदर्शन प्रशिक्षण में शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान के प्रयोजन के लिए खेलकूद अकादमियों, विद्यापीठों, महाविद्यालयों, खेलकूद और मनोरंजन क्लबों, खेलकूद संगमों और अंतरराष्ट्रीय परिसंघों के साथ सघन संयोजन स्थापित करना ;
(xiv) प्रतिभाशाली एथलीटों को प्रशिक्षित करना, जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर के सर्वोत्कृष्ट
एथलीटों के रूप में उभरने में सहायता की जा सके ;
(xv) राज्य तथा भारत को खेलकूद शक्ति बनाना ; (xvi) ऐसे अन्य उद्देश्य, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हों, जिन्हें राज्य सरकार,
राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे।
5. (1) विश्वविद्यालय की निम्नलिखित शक्तियां और कृत्य होंगे, अर्थात् :-
विश्वविद्यालय की शक्तियां और कृत्य। (i) शारीरिक विद्या और खेलकूद विज्ञान, इसमें खेलकूद प्रौद्योगिकी, खेल चिकित्सा, खेलकूद अवसंरचना अभियान्त्रिकी, काइनिजियोलोजी, नैदानिक जैव यान्त्रिकी, खेलकूद मनोविज्ञान, खेलकूद पोषण, पुनर्वासन तथा भौतिक चिकित्सा, खेलकूद पत्रकारिता, खेलकूद मार्किटिंग तथा खेल कॉचिंग भी शामिल हैं, में पाठयक्रमों की योजना बनाना, डिजाइन विकसित और विहित करना तथा समुचित शैक्षणिक और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को संचालित करना तथा शिक्षण की ऐसी शाखाओं, जो विश्वविद्यालय, समय-समय पर अवधारित करे, में शिक्षण और प्रशिक्षण की व्यवस्था करना और अनुसंधान के लिए तथा ज्ञान की अभिवृद्धि और प्रसार के लिए उपबंध करना;
(ii) ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, परीक्षा, मूल्यांकन या परीक्षण की किसी पद्धति के आधार पर व्यक्तियों को उपाधि-पत्र या प्रमाण-पत्र देना, और उपाधियां या अन्य शिक्षण संबंधी उपाधियां प्रदान करना और उपयुक्त और पर्याप्त कारण से किन्हीं ऐसे प्रमाणपत्रों, उपाधि-पत्रों, उपाधियों या अन्य शिक्षण संबंधी उपाधियों को वापस लेना ;
198 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)(iii) विश्वविद्यालय के छात्रों को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय खेलकूद परिसंघों, राष्ट्रीय खेलकूद परिसंघों, भारतीय ओलम्पिक संघ तथा भारतीय विश्वविद्यालय संघ के समन्वय से खेल-प्रतियोगिताओं और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर प्रदान करना ; (iv) विभिन्न अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक संगठनों या निकायों से संपर्क करना या उनकी
सदस्यता रखना ;
(v) राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से अनुसंधान, शिक्षण और प्रशिक्षण के लिए ऐसे दूरस्थ कैंपस, क्षेत्रीय केन्द्र, विशेष प्रयोगशालाएं या अन्य इकाइयां स्थापित करना और अनुरक्षण करना, जो विश्वविद्यालय की राय में इसके उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए आवश्यक हैं;
(vi) परिनियमों द्वारा अधिकथित रीति में अध्ययन केन्द्र स्थापित करना, अनुरक्षण करना या
उनको मान्यता देना ;
(vii) महाविद्यालयों, संस्थाओं और हॉलज स्थापित करना और अनुरक्षण करना ; (viii) परिनियमों द्वारा विहित रीति में मानद उपाधियां या अन्य शिक्षण संबंधी उपाधियां
प्रदान करना ;
(ix) विश्वविद्यालय द्वारा अपेक्षित प्राचार्य पद, आचार्य पद, सह आचार्य पद, सहायक आचार्य पद और अन्य अध्यापन या शैक्षणिक पद संस्थित करना तथा ऐसे प्राचार्य पदों, आचार्य पदों, सह आचार्य पदों, सहायक आचार्य पदों या अन्य अध्यापन या शैक्षणिक पदों पर व्यक्तियों की नियुक्ति करना ;
(x) किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए विश्वविद्यालय के शिक्षकों के रूप में किसी विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्था, इसमें देश से बाहर अवस्थित विश्वविद्यालय भी शामिल हैं, में कार्य करने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति करना ;
(xi) प्रशासनिक, अनुसचिवीय और अन्य पदों को सृजित करना और उन पर नियुक्तियां
करना ;
(xii) उच्चतर विद्या के किसी अन्य विश्वविद्यालय या प्राधिकरण या संस्था, इसमें देश से बाहर अवस्थित अन्य विश्वविद्यालय या प्राधिकरण या संस्था भी शामिल हैं, के साथ ऐसी रीति में और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, समन्वय करना या सहयोग करना या सहयुक्त होना ;
(xiii) ऐसे व्यक्तियों को ऐसी रीति, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए, में दूरस्थ विद्या
प्रणाली के माध्यम से सुविधाएं प्रदान करना ;
(xiv) शैक्षणिक मानकों तथा अनुसंधान को उन्नत करने के लिए अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति,
अध्ययनवृत्ति, पदक और पुरस्कार संस्थित करना और प्रदान करना ;
(xv) बाहरी अध्ययनों, प्रशिक्षण और विस्तारी सेवाओं को आयोजित करना और उनका
जिम्मा लेना ;
(xvi) अनुसंधान और सलाहकारी सेवाओं के लिए उपबंध करना तथा उस प्रयोजन के लिए अन्य संस्थाओं, औद्योगिक या अन्य संगठनों के साथ ऐसे समझौते करना, जो विश्वविद्यालय आवश्यक समझे;
(xvii) शिक्षकों, मूल्यांककों, अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद और छात्रों के लिए नवीन पाठ्यक्रम,
कर्मशालाएं, सेमिनार और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन और संचालन करना;
(xviii) अभ्यागत आचार्यों, प्रतिष्ठित आचार्यों, परामर्शदाताओं तथा ऐसे अन्य व्यक्तियों को संविदा पर या अन्यथा से नियुक्त करना, जो विश्वविद्यालय के उद्देश्यों की अभिवृद्धि में योगदान दे सकते हैं;
(xix) विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए मानक अवधारित करना, जिसमें परीक्षा, मूल्यांकन
या परीक्षण की कोई अन्य पद्धति भी शामिल हैं;
(xx) फीसों और अन्य प्रभारों के भुगतान की मांग करना और उन्हें प्राप्त करना ; (xxi) विश्वविद्यालय के छात्रों के आवासों का पर्यवेक्षण करना और उनके स्वास्थ्य और
सामान्य कल्याण की अभिवृद्धि के लिए प्रबन्ध करना ;
(xxii) सभी प्रवर्ग के कर्मचारियों की सेवा शर्तें अधिकथित करना, इसमें उनकी आचार
संहिता भी शामिल है;
(xxiii) छात्रों और कर्मचारियों में अनुशासन का विनियमन करना और उसका पालन करवाना और इस संबंध में ऐसे अनुशासनिक उपाय करना, जो विश्वविद्यालय द्वारा आवश्यक समझे जाएं;
199 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)(xxiv) कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सामान्य कल्याण की अभिवृद्धि के लिए प्रबन्ध करना;
(xxv) धर्मदान, दान और उपहार प्राप्त करना और विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से किसी चल या अचल संपत्ति, जिसमें न्यास और विन्यास संपत्ति भी शामिल है, अर्जित करना, धारण करना, उसका प्रबन्ध और निपटान करना;
(xxvi) राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए
विश्वविद्यालय की संपत्ति की प्रतिभूति पर धन उधार लेना;
(xxvii) शारीरिक विद्या, खेलकूद विज्ञानों, खेलकूद चिकित्सा, खेलकूद प्रौद्योगिकी, खेलकूद प्रबंधन के क्षेत्रों और अन्य संबंधित क्षेत्रों में नए प्रयोग करना और नई पद्धतियों तथा प्रौद्योगिकियों को प्रोन्नत करना;
(xxviii) किसी भूमि या भवन या खेलकूद परिसर या खेलकूद अवसंरचना और वैज्ञानिक खेलकूद अनुसंधान उपकरण या इनडोर स्टेडियम या कर्मशालाओं, जो विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए आवश्यक और सुविधाजनक हाें, का ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक और उचित समझे, क्रय करना या उन्हें पट्टे पर लेना तथा ऐसे किसी भवन या कर्मशाला का सन्निर्माण करना, उसमें परिवर्तन करना और उसका रख-रखाव करना ;
(xxix) किसी नए सहबद्ध पाठ्यक्रम या अनुसंधान कार्यक्रम या उपाधि-पत्र या प्रशिक्षण कार्यक्रम को आरंभ करना तथा किसी पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण कार्यक्रम को बंद करना;
(xxx) विश्वविद्यालय की निधियों का ऐसी प्रतिभूतियों में निवेश करना और समय-समय पर ऐसी रीति, जिसे विश्वविद्यालय के हित में उचित समझे, में किसी निवेश को स्थानांतरित करना ;
(xxxi) विश्वविद्यालय से संबंधित या विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए अर्जित की जाने वाली चल या अचल संपत्ति, जिसमें सरकारी प्रतिभूतियां भी शामिल हैं, के संबंध में, राज्य सरकार की पूर्व अनुज्ञा लेने के बाद, अंतरणों, बंधकों, पट्टों, अनुज्ञप्तियों, करारों और अन्य हस्तांतरणों के संबंध में हस्तांतरण-पत्र निष्पादित करना;
(xxxii) खेलकूद से संबंधित सभी मामलों पर राज्य सरकार और राष्ट्रीय खेलकूद परिसंघों
तथा अन्य संगठनों के लिए तकनीकी सलाहकारी निकाय के रूप में कार्य करना;
(xxxiii) विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलकूद प्रतियोगताओं में सफलता प्राप्त करने के लिए उच्च स्तरीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, कोचिंग और अन्य सहायता प्रदान करना ;
(xxxiv) राज्य प्रतिभा खोज तथा शिनाख्त कार्यक्रमों के अधीन उपबंधित प्रक्रिया और
मानकों को प्रभावी बनाना;
(xxxv) परिनियमों द्वारा अधिकथित रीति में किसी महाविद्यालय या किसी संस्था को
स्वायत प्रास्थिति प्रदान करना;
(xxxvi) ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जो परिनियमों द्वारा अधिकथित की जाएं, भारत में या भारत के बाहर किसी भी महाविद्यालय या संस्था को अपने विशेषाधिकार प्रदान करना :
परन्तु किसी महाविद्यालय या संस्था को राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन के
सिवाय ऐसे विशेषाधिकार नहीं दिए जाएंगे ;
(xxxvii) शिक्षण और प्रशिक्षण सामग्रियों की निर्मितियों की व्यवस्था करना, इसमें फिल्म,
कैसेट, टेप, वीडियो कैसेट और अन्य साफ्टवेयर भी शामिल हैं ;
(xxxviii) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त किसी महाविद्यालय या संस्था में शिक्षण प्रदान
करने के लिए व्यक्तियों को मान्यता प्रदान करना; और
(xxxix) ऐसे सभी अन्य कार्य और बातें करना, जो इसके सभी या किन्हीं उद्देश्यों की
प्राप्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों।
(2) विश्वविद्यालय अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए संपूर्ण हरियाणा राज्य में और राज्य के बाहर दूरस्थ कैंपसों और अध्ययन केन्द्रों पर इसकी अधिकारिता होगी।200 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (3) विश्वविद्यालय को अध्यापन, प्रशिक्षण और अनुसंधान के उच्च मानक बनाए रखने का प्रयास करना होगा तथा विश्वविद्यालय, ऐसे अन्य उपायों में, जो उक्त प्रयोजन के लिए आवश्यक हों, विशिष्टतया निम्नलिखित उपाय करेगा, अर्थात् :-
(i) छात्रों के दाखिले और संकाय की भर्ती, विश्वविद्यालय की कार्य परिषद् द्वारा
अनुमोदित समुचित प्रक्रियाओं के माध्यम से की जाएंगी ;
(ii) विश्वविद्यालय द्वारा विदेशी छात्रों को विभिन्न पाठ्यक्रमों और कार्यक्रमों में दाखिला, विश्वविद्यालय की कार्य परिषद् द्वारा अनुमोदित पालिसी तथा स्कीमों तथा प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा;
(iii) सेमेस्टर पद्धति, निरंतर मूल्यांकन और विकल्प-आधारित ख्याति पद्धति को शुरू किया जाएगा और विश्वविद्यालय, ख्याति अंतरण तथा संयुक्त उपाधि कार्यक्रमों के लिए अन्य विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के साथ करार करेगा; (iv) आवधिक पुनर्विलोकन और पुनसंरचना की व्यवस्था के साथ अध्ययन के नए पाठ्यक्रमों
और कार्यक्रमों को चलाया जाएगा ;
(v) विश्वविद्यालय के सभी शैक्षणिक क्रियाकलापों, इसमें शिक्षकों का मूल्यांकन भी शामिल
है, में छात्रों की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित किया जाएगा ;
(vi) राष्ट्रीय निर्धारण और प्रत्यायन परिषद् या राष्ट्रीय स्तर पर किसी अन्य प्रत्यायन
अभिकरण से प्रत्यायन प्राप्त किया जाएगा ; और
(vii) प्रभावी प्रबंधन सूचना के साथ ई-गवर्नेंस प्रारम्भ की जाएगी।
विश्वविद्यालय का सभी जातियों, धर्मों, मूलवंशों या वर्गों के लिए खुला होना।
6. विश्वविद्यालय किसी भी लिंग तथा किसी भी जाति, धर्म, मूलवंश या वर्ग के व्यक्तियों के लिए खुला होगा और विश्वविद्यालय के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वह किसी व्यक्ति को विश्वविद्यालय में शिक्षक के रूप में ऐसे व्यक्ति को नियुक्ति का हकदार बनाने या उसमें कोई अन्य पद धारण करने या विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में दाखिला लेने या वहां से स्नातक होने या उसके किसी विशेषाधिकार का उपभोग या प्रयोग करने के लिए किसी धार्मिक विश्वास या मान्यता संबंधी मानदंड को अपनाएं या उन पर अधिरोपित करें :
परन्तु इस धारा की कोई भी बात विश्वविद्यालय की महिलाओं, दिव्यांगजनों या समाज के दुर्बल वर्गों और विशिष्टतया अनुसूचित जाति तथा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से अन्य पिछड़े वर्ग के नागरिकों के नियोजन या दाखिले के लिए विशेष उपबंध करने से निवारित करने वाली नहीं समझी जाएगी : परन्तु यह और कि ऐसा कोई विशेष उपबंध हरियाणा राज्य के अधिवास के आधार पर किया जाएगा।
राज्य सरकार द्वारा विश्वविद्यालय के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन किया जाना।
7. (1) राज्य सरकार, विश्वविद्यालय द्वारा संचालित दूरस्थ कैंपस, महाविद्यालय, संस्था, क्षेत्रीय केन्द्र और अध्ययन केन्द्र सहित इसके कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए, और उस पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए, समय-समय पर, (i) ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति या (ii) व्यक्ति, जो सचिव, हरियाणा सरकार की पदवी से नीचे का न हो, को नियुक्त कर सकती है, उस रिपोर्ट की प्राप्ति पर, राज्य सरकार, उस पर कुलपति के माध्यम से कार्य परिषद् का विचार प्राप्त करने के पश्चात्, ऐसी कार्रवाई कर सकती है और ऐसे निर्देश जारी कर सकती है, जो वह रिर्पोट में चर्चित विषयों में से किसी के बारे में आवश्यक समझे और विश्वविद्यालय ऐसी कार्रवाई का पालन करेगा और ऐसे निर्देशों की पालना करने के लिए बाध्य होगा। (2) राज्य सरकार को ऐसे व्यक्ति जो सचिव, हरियाणा सरकार की पदवी से नीचे का न हो, द्वारा जिसे वह निर्देश दे, विश्वविद्यालय, उसके भवनों, खेलकूद परिसरों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं तथा उपकरण और विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित किसी दूरस्थ कैंपस या महाविद्यालय या संस्था या क्षेत्रीय केन्द्र या अध्ययन केन्द्र और विश्वविद्यालय द्वारा संचालित की गई परीक्षाओं, दिए गए शिक्षण या किए गए अन्य कार्य का भी निरीक्षण कराने और विश्वविद्यालय, महाविद्यालयों या संस्थाओं या क्षे़त्रीय केन्द्रों या अध्ययन केन्द्रों के प्रशासन या वित्त से संबंधित किसी मामले के संबंध में उसी रीति में जांच कराने का अधिकार होगा। (3) राज्य सरकार, उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रत्येक मामले में, विश्वविद्यालय को किए जाने वाले निरीक्षण या जांच के संबंध में अपने आशय का नोटिस देगी, और विश्वविद्यालय को राज्य सरकार को ऐसे अभ्यावेदन करने का अधिकार होगा, जो वह आवश्यक समझे। (4) विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अभ्यावेदनों, यदि कोई हों, पर विचार करने के पश्चात्, राज्य सरकार ऐसा निरीक्षण या जांच करवा सकती है, जो उपधारा (3) में निर्दिष्ट है।201 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (5) जहां राज्य सरकार द्वारा कोई निरीक्षण या जांच कराई गई है, तो विश्वविद्यालय को प्रतिनिधि नियुक्त करने का हकदार होगा, जिसे ऐसे निरीक्षण या जांच में उपस्थित होने और सुने जाने का अधिकार होगा। (6) राज्य सरकार, यदि विश्वविद्यालय या उसके द्वारा अनुरक्षित किसी दूरस्थ कैंपस या महाविद्यालय या संस्था या क्षेत्रीय केन्द्र या अध्ययन केन्द्र के संबंध में निरीक्षण या जांच की जाती है, तो ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणाम और उस पर की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में ऐसे विचारों और सलाह सहित, जो राज्य सरकार प्रदान करे, कुलपति को संबोधित कर सकती हैं और राज्य सरकार से संबोधन प्राप्त होने पर, कुलपति, राज्य सरकार के विचारों और उस पर की जाने वाली कार्रवाई पर ऐसी सलाह, जो राज्य सरकार प्रदान करे, को कार्य परिषद् को संसूचित करेगा। (7) कार्य परिषद, ऐसी कार्रवाई, यदि कोई हो, जो ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणामों पर करने के लिए प्रस्तावित या उसके द्वारा की गई है, कुलपति के माध्यम से राज्य सरकार को संसूचित करेगी। (8) जहां कार्य परिषद्, युक्तियुक्त समय के भीतर राज्य सरकार की संतुष्टि के लिए कार्रवाई नहीं करती है, तो राज्य सरकार, कार्य परिषद् द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण या किए गए अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात्, ऐसे निर्देश जारी कर सकती है, जो राज्य सरकार उचित समझे, और कार्य परिषद् ऐसे निर्देशों का अनुपालन करेगी। (9) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, राज्य सरकार, लिखित आदेश द्वारा विश्वविद्यालय की किसी ऐसी कार्यवाही को निष्प्रभाव कर सकती है, जो इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों के उपबंधों के संगत नहीं हो : परन्तु ऐसा कोई आदेश करने से पहले, राज्य सरकार कुलपति को कारण बताने के लिए कहेगी कि क्यों न ऐसा आदेश किया जाए और यदि युक्तियुक्त समय के भीतर कोई कारण बताया जाता है, तो वह उस पर विचार करेगी। (10) राज्य सरकार को विश्वविद्यालय के कार्यों के संबंध में ऐसी अन्य शक्तियां होंगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं।
8. विश्वविद्यालय के निम्नलिखित अधिकारी होंगे, अर्थात् :-
विश्वविद्यालय के अधिकारी। (क) कुलाधिपति; (ख) कुलपति; (ग) कुलसचिव; (घ) विद्यापीठों के डीन; (ङ) वित्त अधिकारी; (च) परीक्षा नियंत्रक; (छ) कुलानुशासक ; (ज) पुस्तकालयाध्यक्ष; और (झ) ऐसे अन्य अधिकारी, जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के अधिकारी घोषित किए जाएं।
कुलाधिपति । 9. (1) हरियाणा के राज्यपाल, अपने पदाभिधान से विष्वविद्यालय का कुलाधिपति होगा । (2) कुलाधिपति, जब उपस्थित हो, तो विष्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह तथा सभा की बैठकों की अध्यक्षता करेगा । (3) कुलाधिपति, विष्वविद्यालय के भवनों, पुस्तकालयों तथा उपकरणों तथा विष्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित किसी संस्था तथा विष्वविद्यालय द्वारा संचालित परीक्षाओं, अध्यापन या किए गए अन्य कार्यों की विश्वविद्यालय के ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों, जिन्हें वह निदेश करे, द्वारा की जाने वाली जांच करवा सकता है तथा विश्वविद्यालय के प्रशासन तथा वित्त से संबंधित किसी मामले के संबंध में उसी रीति में की जाने वाली जांच करवा सकता है। (4) कुलाधिपति, विष्वविद्यालय को ऐसी सलाह दे सकता है, जो वह ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणाम के संदर्भ में उचित समझे। (5) विष्वविद्यालय, कुलाधिपति को ऐसी सलाह पर की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई के बारे में संसूचित करेगा। (6) कुलाधिपति, विष्वविद्यालय के मामलों के संबंध में, जब भी वह इसे आवश्यक समझे, विष्वविद्यालय को सलाह देने हेतु विधि तथा विधिक विद्या में उत्कृष्टता प्राप्त किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को आमन्त्रित कर सकता है।202 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) कुलपति। 10. (1) कुलपति ऐसी रीति, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए, में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा।
(2) कुलपति, विष्वविद्यालय का प्रधान कार्यपालक और शैक्षणिक अधिकारी होगा और विष्वविद्यालय के कार्यकलापों पर सामान्य पर्यवेक्षण तथा नियंत्रण रखेगा और वह विष्वविद्यालय के सभी प्राधिकरणों के निर्णयों को कार्यान्वित करेगा ।
(3) कुलपति, यदि उसकी राय है कि किसी मामले पर तुरन्त कार्रवाई करना आवष्यक है, तो वह इस अधिनियम द्वारा या के अधीन विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण को प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग कर सकता है और उसकी अगली बैठक में उसके द्वारा ऐसे मामले में की गई कार्रवाई से ऐसे प्राधिकरण को अवगत कराएगा : परन्तु यदि सम्बद्ध प्राधिकरण की राय है कि ऐसी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी, तो वह मामला राज्य सरकार को निर्दिष्ट कर सकता है, जिसका निर्णय उस पर अन्तिम होगा : परन्तु यह और कि विष्वविद्यालय की सेवा में किसी भी व्यक्ति, जो इस उपधारा के अधीन कुलपति द्वारा की गई किसी कार्रवाई से व्यथित है, को ऐसी कार्रवाई पर उसे निर्णय की सूचना देने की तिथि से तीन मास के भीतर कार्य परिषद् के पास ऐसी कार्रवाई के विरूद्ध प्रतिवेदन करने का अधिकार होगा और उस पर कार्य परिषद्, कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई को पुष्ट कर सकती है, उपान्तरित कर सकती है या उलट सकती है।
(4) जहां कुलपति की यह राय है कि विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण द्वारा लिया गया कोई विनिश्चय इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेषों के उपबंधों द्वारा प्रदत्त प्राधिकरण की शक्तियों के बाहर है, या यह कि प्राधिकरण द्वारा लिया गया कोई विनिश्चिय विश्वविद्यालय के हित में नहीं है, तो वह संबंधित प्राधिकरण से अपने विनिश्चय को ऐसे विनिश्चय के साठ दिन के भीतर पुनर्विलोकन करने के लिए कह सकता है और यदि प्राधिकरण उस विनिश्चय को पूर्णतः या भागतः पुनर्विलोकन करने से इंकार करता है या उसके द्वारा उक्त साठ दिन की अवधि के भीतर कोई विनिश्चय नहीं किया जाता है, तो वह मामला राज्य सरकार को निर्दिष्ट किया जाएगा, जिसका उस पर विनिश्चय अन्तिम होगा। (5) कुलपति ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा, जो परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएं।
कुल-सचिव । 11. (1) कुल-सचिव की नियुक्ति, ऐसी रीति में और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं। (2) कुल-सचिव को विष्वविद्यालय की ओर से करार करने, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने और अभिलेखों को अधिप्रमाणित करने की शक्ति होगी, और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं।
विद्यापीठों का डीन।
12. विद्यापीठ के प्रत्येक डीन की नियुक्ति, ऐसी रीति में और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं।
13. वित्त अधिकारी, परीक्षा नियंत्रक, कुलानुशासक तथा पुस्तकाध्यक्ष ऐसी रीति में नियुक्त किए जाएंगे, तथा वे ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं। वित्त अधिकारी, परीक्षा नियंत्रक, कुलानुशासक तथा पुस्तकाध्यक्ष।
अन्य अधिकारी। 14. विष्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति और उनकी शक्तियां और कर्तव्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं।
पदों का सृजन तथा वेतनमानों का पुनरीक्षण।
15. इस अधिनियम में दी गई किसी बात के होते हुए भी, विश्वविद्यालय, राज्य सरकार से पूर्व अनुमोदन प्राप्त किए बिना, कोई अध्यापन और गैर-अध्यापन पद सृजित नहीं करेगा या अध्यापन और गैर-अध्यापन कर्मचारियों के वेतनमान पुनरीक्षित नहीं करेगा।
16. विश्वविद्यालय के निम्नलिखित प्राधिकरण होंगे, अर्थात् :-
विश्वविद्यालय के प्राधिकरण।
(क) सभा; (ख) कार्य परिषद्; (ग) विद्या और गतिविधि परिषद्; (घ) खेलकूद अध्ययन बोर्ड; (ङ) वित्त समिति; (च) ऐसे अन्य प्राधिकरण, जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के प्राधिकरण घोषित किए जाएं।203 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) सभा। 17. (1) सभा का गठन तथा उसके सदस्यों की पदावधि ऐसी होगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए। (2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभा की निम्नलिखित शक्तियां और कृत्य होंगे, अर्थात् :-
(क) विष्वविद्यालय की व्यापक नीतियों और कार्यक्रमों का समय-समय पर पुनर्विलोकन
करना, तथा विश्वविद्यालय के सुधार और विकास के लिए उपाय सुझाना;
(ख) विष्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट और वार्षिक लेखों पर तथा ऐसे लेखों की संपरीक्षा
रिपोर्ट पर विचार करना और संकल्प पारित करना ;
(ग) राज्य सरकार को किसी ऐसे मामले के संबंध में सलाह देना, जो उसे सलाह के
लिए निर्दिष्ट किया जाए; और
(घ) ऐसे अन्य कृत्य, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं, का पालन करना।
कार्य परिषद्। 18. (1) कार्य परिषद् विष्वविद्यालय का प्रमुख कार्यकारी निकाय होगा । (2) कार्य परिषद् का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि तथा इसकी शक्तियां तथा कृत्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
विद्या और गतिविधि परिषद्। 19. (1) विद्या और गतिविधि परिषद्, विष्वविद्यालय का प्रमुख शैक्षणिक निकाय होगा और इस अधिनियम, परिनियमों तथा अध्यादेषों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, विष्वविद्यालय की सभी षिक्षण नीतियों का समन्वय करेगी तथा उन पर सामान्य पर्यवेक्षण करेगी । (2) विद्या और गतिविधि परिषद् का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि तथा उसकी शक्तियां तथा कृत्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं : परन्तु विद्या और गतिविधि परिषद् में सदस्यों के रूप में ऐसे खिलाड़ी होंगे, जिन्होंने ओलंपिक/ राष्ट्रमण्डल/एशियाई खेलों में विशिष्टताएं प्राप्त की हैं।
खेलकूद अध्ययन बोर्ड। 20. खेलकूद अध्ययन बोर्ड का गठन, शक्तियां तथा कृत्य, ऐसे होेंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं। 21. वित्त समिति का गठन, शक्तियां तथा कत्र्तव्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं । वित्त समिति।
विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकरण। 22. ऐसे अन्य प्राधिकरणों, जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के प्राधिकरणों के रूप में घोषित किए जाएं, का गठन, शक्तियां और कृत्य, ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं।
परिनियम बनाने की शक्ति। 23. इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं मामलों के लिए उपबंध किया जा सकते हैं, अर्थात्ः-
(क) विष्वविद्यालय के प्राधिकरणों तथा अन्य निकायों, जो समय-समय पर गठित किए जाएं,
का गठन, शक्तियां तथा कृत्य;
(ख) उक्त प्राधिकरणों और निकायों के सदस्यों की नियुक्ति और उनका पदों पर बने रहना, सदस्यों की रिक्तियों को भरना, तथा उन प्राधिकरणों और अन्य निकायों से संबंधित अन्य सभी मामलों, जिनके लिए उपबंध करना आवश्यक या वांछनीय हो;
(ग) विष्वविद्यालय के अधिकारियों की नियुक्ति, शक्तियां तथा कर्तव्य तथा उनकी पारिश्रमिक; (घ) विष्वविद्यालय के शिक्षकों, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति, उनकी
पारिश्रमिक और सेवा की शर्तें ;
(ड.) किसी संयुक्त परियोजना को कार्यान्वित करने के लिए किसी अन्य विष्वविद्यालय या
संगठन में सेवारत शिक्षकों, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद की विनिर्दिष्ट अवधि के लिए नियुक्ति ;
(च) कर्मचारियों की सेवा की शर्तें, जिसमें पेंशन, बीमा, भविष्य निधि के उपबंध, सेवा समाप्ति
और अनुशासनिक कार्रवाई की रीति भी शामिल है ;
(छ) विष्वविद्यालय के कर्मचारियों की सेवा में ज्येष्ठता को शासित करने वाले सिद्धांत; (ज) कर्मचारियों या छात्रों और विष्वविद्यालय के बीच विवाद के मामलों में माध्यस्थम् की
प्रक्रिया;
(झ) विष्वविद्यालय के किसी अधिकारी या प्राधिकरण की कार्रवाई के विरूद्ध किसी कर्मचारी या
छात्र द्वारा कार्य परिषद् को अपील करने की प्रक्रिया;
(ञ) किसी महाविद्यालय या किसी संस्था या किसी विभाग को स्वायत प्रास्थिति प्रदान करना; (ट) विद्यापीठों, विभागों, केन्द्रों, हॉलों, महाविद्यालयों, संस्थाओं, क्षेत्रीय केन्द्रों और अध्ययन केन्द्रों
की स्थापना और समाप्ति;
204 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)(ठ) मानद उपाधियां प्रदान करना;
(ड) उपाधियों, उपाधि-पत्रों, प्रमाणपत्रों और अन्य शिक्षण संबंधी उपाधियों को प्रदान करना और उन्हें वापस लिया जाना;
(ढ) विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित और अनुरक्षित महाविद्यालयों, संस्थाओं, क्षेत्रीय केन्द्रों और अध्ययन केन्द्रों का प्रबन्धन;
(ण) विश्वविद्यालय के प्राधिकरणों या अधिकारियों में निहित शक्तियों का प्रत्यायोजन; (त) कर्मचारियों और छात्रों में अनुशासन बनाए रखना; और (थ) ऐसे सभी अन्य मामले, जो इस अधिनियम के अनुसार परिनियमों द्वारा उपबंधित किए जाने हैं या किए जा सकते हैं।
परिनियम कैसे बनाएं ।
24. (1) प्रथम परिनियम वे होंगे, जो इस अधिनियम की अनुसूची में दिए गए हैं। (2) कार्य परिषद्, समय-समय पर, उपधारा (1) में निर्दिष्ट, नये या अतिरिक्त परिनियम बना सकती है या किन्हीं परिनियमों का संषोधन अथवा निरसन कर सकती है : परन्तु कार्य परिषद् तब तक विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण की हैसीयत, शक्तियां या गठन को प्रभावित करने वाले कोई परिनियम नहीं बनाएगी, संषोधित या निरसित नहीं करेगी, जब तक ऐसे प्राधिकरण को प्रस्तावित परिवर्तनों पर लिखित में राय अभिव्यक्त करने का अवसर न दे दिया गया हो, और इस प्रकार अभिव्यक्त की गई किसी राय पर कार्य परिषद् द्वारा विचार किया जाए। (3) प्रत्येक नये परिनियम या विद्यमान परिनियम को संशोधित या निरसित करने वाले परिनियमों के लिए राज्य सरकार का अनुमोदन अपेक्षित होगा और जब तक ऐसा अनुमोदन नहीं कर दिया जाए, वे अविधिमान्य रहेंगे। (4) पूर्वगामी उपधाराओं में दी गई किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रारम्भ से ठीक बाद तीन वर्ष की अवधि के दौरान उपधारा (1) में निर्दिष्ट नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकती है या परिनियमों का संशोधन या निरसन कर सकती है : परन्तु राज्य सरकार, तीन वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति पर, ऐसी समाप्ति की तिथि से एक वर्ष के भीतर, ऐसे विस्तृत परिनियम, जो वह आवश्यक समझे, बना सकती है और ऐसे विस्तृत परिनियम राज्य विधानमण्डल के सम्मुख रखे जाएंगे। (5) इस धारा में दी गई किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार अपने द्वारा विनिर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में परिनियमों में उपबंध करने के लिए विश्वविद्यालय को निर्देष दे सकती है और यदि कार्य परिषद्, किसी ऐसे निर्देश की प्राप्ति के साठ दिन के भीतर निर्देश कार्यान्वित करने में असफल रहती है, तो राज्य सरकार, कार्य परिषद् द्वारा ऐसे निर्देश की अनुपालना में अपनी अक्षमता के लिए संसूचित कारण, यदि कोई हो, पर विचार करने के बाद, परिनियम उचित रूप से बना सकती है, संषोधित कर सकती है। अध्यादेष बनाने की शक्ति ।
25. (1) इस अधिनियम तथा परिनियमों के उपबंधों के अध्यधीन, अध्यादेषों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं मामलों के लिए उपबंध किया जा सकता है, अर्थात्ः-
(क) विष्वविद्यालय में छात्रों का दाखिला तथा उनका ऐसे रूप में पंजीयन; (ख) विष्वविद्यालय की सभी उपाधियों, उपाधि-पत्रों और प्रमाण-पत्रों के लिए अधिकथित
किए जाने वाले पाठ्यक्रम और उनकी अवधि;
(ग) शिक्षण तथा परीक्षा के माध्यम; (घ) उपाधियों, उपाधि-पत्रों और प्रमाण-पत्रों और अन्य शिक्षण संबंधी उपाधियों को प्रदान करने, उनके लिए अर्हताएं और उन्हें प्रदान करने और प्राप्त करने के बारे में किए जाने वाले उपाय;
(ङ) विष्वविद्यालय में पाठ्यक्रमों के लिए तथा विष्वविद्यालय की परीक्षाओं, उपाधियों,
उपाधि-पत्रों में दाखिले के लिए प्रभारित की जाने वाली फीस;
(च) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, पदक तथा पुरस्कार प्रदान करने की
शर्तें;
(छ) परीक्षाओं का संचालन, जिसमें परीक्षा निकायों, परीक्षकों तथा अनुसीमकों की पदावधि
तथा नियुक्ति की रीति और उनके कर्तव्य भी शामिल हैं;
(ज) विष्वविद्यालयों के छात्रों के निवास की शर्तें; (झ) विशेष व्यवस्था, यदि कोई हों, जो महिला छात्राओं के निवास और अध्यापन के लिए की जा सकती हों तथा उनके लिए विशेष अध्ययन के विशेष पाठ्यक्रम विहित करना; (ञ) अध्ययन केन्द्रों, अध्ययन बोर्ड, विशेष प्रयोगशालाओं और अन्य समितियों की स्थापना;
205 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)(ट) अन्य विष्वविद्यालयों, संस्थाओं और अन्य अभिकरणों, जिसमें विद्वत निकाय या
संगम भी शामिल हैं, के साथ समन्वय और सहयोग करने की रीति;
(ठ) किसी अन्य निकाय, जो विश्वविद्यालय के शैक्षणिक कार्यकाल में सुधार के लिए
आवश्यक समझा जाए, का सृजन, संरचना और कृत्य;
(ड) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, अध्ययनवृतियों, पदकों तथा पुरस्कारों को संस्थित
करना;
(ढ) कर्मचारियों तथा छात्रों की शिकायतों को दूर करने के लिए किसी तंत्र की स्थापना
करना; और
(ण) कोई अन्य मामला, जो अध्यादेशों के लिए इस अधिनियम अथवा परिनियमों द्वारा
उपबंधित किया जाना है या किया जा सकता है।
(2) प्रथम अध्यादेश, कार्य परिषद् के पूर्व अनुमोदन से कुलपति द्वारा बनाए जाएंगे और इस प्रकार बनाए गए अध्यादेश कार्य परिषद्् द्वारा ऐसी रीति, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए, में किसी समय संशोधित या निरसित भी किए जा सकते हैं।
विनियम। 26. विष्वविद्यालय के प्राधिकरण, अपने और अपने द्वारा नियुक्त समितियों, यदि कोई हों, के कार्य के संचालन के लिए, जिनका इस अधिनियम, परिनियमों तथा अध्यादेषों द्वारा उपबन्ध नहीं किया गया है, परिनियमों द्वारा विहित रीति में इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेषों से संगत विनियम बना सकते हैं।
वार्षिक रिपोर्ट। 27. (1) विष्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट, कार्य परिषद् के निर्देषों के अधीन तैयार की जाएगी, जिसमें अन्य विषयों के साथ-साथ, विश्वविद्यालय द्वारा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किए गए उपाय भी शामिल होंगे और वार्षिक रिपोर्ट को उस तिथि को या उससे पूर्व सभा को भेजा जाएगा, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए और सभा अपनी वार्षिक बैठक में उस रिपोर्ट पर विचार करेगी ।
(2) सभा, अपनी टिप्पणी, यदि कोई हो, सहित वार्षिक रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगी।
(3) राज्य सरकार, यथाशीघ्र, वार्षिक रिपोर्ट की प्रति राज्य विधानमण्डल के सम्मुख रखवाएगी।
वार्षिक लेखे। 28. (1) विष्वविद्यालय के वार्षिक लेखे तथा तुलन-पत्र, कार्य परिषद् के निर्देषों के अधीन तैयार किए जाएंगे और प्रति वर्ष कम से कम एक बार तथा पन्द्रह मास के अनधिक अन्तरालों पर, निदेषक, स्थानीय लेखा परीक्षा, हरियाणा या किसी अन्य लेखा परीक्षक, जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाये, द्वारा संपरीक्षित किए जाएंगे।
(2) वार्षिक लेखों की प्रति, उन पर संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ और कार्य परिषद् के संप्रेक्षणों सहित, सभा और राज्य सरकार को प्रस्तुत की जाएगी। (3) वार्षिक लेखों पर राज्य सरकार द्वारा किए गए कोई भी संप्रेक्षण, सभा के ध्यान में लाए जाएंगे और सभा के संप्रेक्षण, यदि कोई हो, कार्य परिषद् द्वारा विचार किए जाने के बाद, राज्य सरकार को प्रस्तुत किए जाएंगे।
(4) राज्य सरकार, यथाशीघ्र, संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ-साथ वार्षिक लेखों की प्रति राज्य विधानमण्डल के सम्मुख रखवाएगी। (5) संपरीक्षित वार्षिक लेखे राज्य विधानमण्डल के सम्मुख रखे जाने के पश्चात्, राजपत्र में प्रकाषित किए जाएंगे।
29. (1) विष्वविद्यालय की अपनी निधि होगी, जिसमें निम्नलिखित शामिल होंगे-
विष्वविद्यालय की निधि। (क) विष्वविद्यालय अनुदान आयोग या केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया कोई भी
अंशदान या अनुदान ;
(ख) राज्य सरकार द्वारा किया गया कोई अंशदान या अनुदान ; (ग) सरकार, अर्द्ध-सरकारी या स्वायत निकायों द्वारा किया गया कोई अंषदान ; (घ) कोई ऋण, उपहार, वसीयत, संदान, विन्यास या अन्य अनुदान, यदि कोई हो; (ङ) फीसों और प्रभारों से विष्वविद्यालय द्वारा प्राप्त आय; (च) विश्वविद्यालय के प्रायोजित पीठों, अध्येतावृत्तियों या अवसंरचना सुविधाओं की स्थापना के लिए विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच हुए सहमति-पत्र के उपबंधों के अनुसार विश्वविद्यालय द्वारा सहयोगी उद्योगों से प्राप्त धनराशि; तथा
(छ) किसी अन्य स्रोत से किसी अन्य रीति में प्राप्त राशि।
(2) विष्वविद्यालय की सभी निधियां, ऐसे बैंक में जमा की जाएंगी या ऐसी रीति में उनका निवेश किया जाएगा, जो बोर्ड, वित्त समिति की सिफारिशों पर विनिश्चित करे।206 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (3) विष्वविद्यालय की निधियों का उपयोग, विश्वविद्यालय के खर्चों के लिए किया जाएगा, इसमें इस अधिनियम द्वारा या के अधीन विश्वविद्यालय की शक्तियों के प्रयोग और उसके कृत्यों के निर्वहन में उपगत खर्चे भी शामिल हैं।
विवरणी और सूचना।
30. विष्वविद्यालय, राज्य सरकार को ऐसी अवधि के भीतर अपनी संपत्ति या क्रियाकलापों से संबंधित ऐसी विवरणी और अन्य सूचना प्रस्तुत करेगा, जिनकी राज्य सरकार, समय-समय पर, अपेक्षा करे। कर्मचारियों इत्यादि की सेवा की शर्तें।
31. (1) विष्वविद्यालय के अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति की रीति, शक्तियां तथा कर्तव्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं। (2) कुलपति के सिवाय, प्रत्येक वैतनिक अधिकारी तथा शिक्षक, लिखित संविदा के अधीन नियुक्त किया जाएगा, जो विष्वविद्यालय के पास रखी जाएगी और विश्वविद्यालय तथा किसी अधिकारी या शिक्षक के बीच संविदा से उत्पन्न कोई विवाद संबंधित शिक्षक या अधिकारी के अनुरोध पर या विष्वविद्यालय की प्रेरणा पर, कार्य परिषद्् द्वारा नियुक्त एक सदस्य, संबंधित अधिकारी या शिक्षक द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य तथा कुलाधिपति के एक नामनिर्देषिती से मिलाकर बनने वाले मध्यस्थता-अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा । अधिकरण के सदस्यों के बहुमत का निर्णय अंतिम होगा और अधिकरण द्वारा निर्णित विषय के संबंध में किसी सिविल न्यायालय में कोई वाद नहीं हो सकेगा । (3) प्रत्येक ऐसा अनुरोध, माध्यस्थम्् और सुलह अधिनियम, 1996 (1996 का केन्द्रीय अधिनियम संख्या 26), के अर्थ के भीतर मध्यस्थता के लिए निवेदन समझा जाएगा ।
छात्रों के विरूद्ध अनुशासनिक मामलों में अपील और माध्यस्थम् की प्रक्रिया।
32. किसी परीक्षा का कोई छात्र या अभ्यर्थी, जिसका नाम विष्वविद्यालय की नामावली से, कुलपति, अनुशासन समिति या परीक्षा समिति, जैसी भी स्थिति हो, के आदेशों या संकल्प द्वारा हटा दिया गया है और जिसे विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में बैठने हेतु एक वर्ष से अधिक अवधि के लिए विवर्जित कर दिया गया है, वह ऐसे आदेशों या ऐसे संकल्प की प्रति की प्राप्ति की तिथि से दस दिन के भीतर कार्य परिषद् को अपील कर सकता है और कार्य परिषद्, कुलपति या समिति, जैसी भी स्थिति हो, के विनिश्चय को पुष्ट, उपांतरित या उलट सकती है।
अपील का अधिकार।
33. इस अधिनियम में दी गई किसी बात के होते हुए भी, विष्वविद्यालय या विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित या अनुरक्षित किसी महाविद्यालय या किसी संस्था या किसी क्षेत्रीय केन्द्र या किसी अध्ययन केन्द्र के प्रत्येक कर्मचारी या छात्र को विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या प्राधिकारी अथवा किसी महाविद्यालय या संस्था या क्षेत्रीय केन्द्र या अध्ययन केन्द्र के प्राचार्य या प्रबन्धन के किसी विनिश्चय के विरूद्ध ऐसे समय के भीतर, जो परिनियमों द्वारा विहित किया जाए, कार्य परिषद् को अपील करने का अधिकार होगा और अपील पर, कार्य परिषद् उस विनिश्चय को, जिसके विरूद्ध अपील की गई है, पुष्ट, उपांतरित या उलट सकती है। भविष्य निधि, बीमा स्कीम, उपदान, अनुग्रहपूर्वक इत्यादि। श्
34. (1) विष्वविद्यालय अपने कर्मचारियों के लाभ के लिए ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी भविष्य निधि या उसी प्रकार की कोई अन्य निधि का गठन करेगा या ऐसी बीमा स्कीमों का उपबंध करेगा, जो वह ठीक समझे। (2) जहां ऐसी भविष्य निधि या उसी प्रकार की कोई अन्य निधि का इस प्रकार गठन किया गया है, वहां राज्य सरकार यह घोषित कर सकती है कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का केन्द्रीय अधिनियम संख्या 19), के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि हो। (3) विष्वविद्यालय, राज्य सरकार के पैटर्न पर अपने अधिकारियों, शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों के लाभ के लिए उपदान, अनुग्रहपूर्वक अनुदान इत्यादि का उपबन्ध करेगा।
प्राधिकरणों तथा निकायों के गठन के बारे में विवाद।
35. यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय के सदस्य के रूप में सम्यक् रूप से निर्वाचित या नियुक्त किया गया है या उसका सदस्य बनने का हकदार है, तो वह मामला राज्य सरकार को निर्देशित किया जाएगा, जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा।
आकस्मिक रिक्तियों का भरा जाना।
36. विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय के सदस्यों (पदेन सदस्यों से भिन्न) में से सभी आकस्मिक रिक्तियां, यथाशीघ्र, ऐसे व्यक्ति या निकाय से भरी जाएंगी, जिसने उस सदस्य को, जिनका स्थान रिक्त हुआ है, नियुक्त, निर्वाचित या सहयोजित किया था और आकस्मिक रिक्ति के लिए नियुक्त, निर्वाचित या सहयोजित व्यक्ति, ऐसे प्राधिकरण या निकाय का उस शेष अवधि के लिए सदस्य होगा, जिसके लिए वह व्यक्ति, जिसका स्थान वह भरता है, सदस्य रहता।
37. विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण से अविधिमान्य नहीं होगी कि उसके सदस्यों में कोई रिक्ति या रिक्तियां हैैं।
प्राधिकरणों या निकायों की कार्यवाहियों का रिक्तियों के कारण अविधिमान्य न होना।207 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण। 38. इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेषों के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आषयित किसी बात के लिए विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरूद्ध कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाहियां नहीं होंगी।
विश्वविद्यालय के अभिलेखों को साबित करने का ढंग। 39. विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय की किसी रसीद, आवेदन, सूचना, आदेश, कार्यवाही या संकल्प, या विश्वविद्यालय के कब्जे में किसी अन्य दस्तावेज, या विश्वविद्यालय द्वारा सम्यक्् रूप से रखे गए किसी रजिस्टर की किसी प्रविष्ट की प्रति, यदि कुलपति द्वारा प्रमाणित की गई है, तो उस दशा में, जिसमें उसकी मूल प्रति पेश किए जाने पर साक्ष्य में ग्राहय होती, ऐसी रसीद, आवेदन, सूचना, आदेश, कार्यवाही, संकल्प या दस्तावेज या रजिस्टर में विद्यमान प्रविष्टि साक्ष्य के रूप में प्राप्त की जाएगी और उसमें संबंधित मामलों और संव्यवहारों के साक्ष्य के रूप में ग्रहण की जाएगी।
कठिनाईयों को दूर करने की शक्ति। 40. (1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो राज्य सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के उपबन्धों से अन््असंगत ऐसे उपबन्ध कर सकती है, जो इसे कठिनाई दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हाें : परन्तु कोई भी ऐसा आदेश, इस अधिनियम के प्रारम्भ की तिथि से तीन वर्ष की समाप्ति के बाद नहीं किया जाएगा। (2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, इसके किए जाने के बाद, यथाशीघ्र, राज्य विधानमण्डल के सम्मुख रखा जाएगा।
परिनियमों, अध्यादेषों तथा विनियमों का राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और राज्य विधानमण्डल के सम्मुख रखा जाना। 41. (1) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, अध्यादेष या विनियम राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा। (2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, अध्यादेष या विनियम, इसके बनाए जाने के बाद, यथाशीघ्र, राज्य विधानमण्डल के सम्मुख रखा जाएगा। (3) परिनियम, अध्यादेष या विनियम बनाने की शक्ति में, परिनियमों, अध्यादेषों या विनियमों या उनमें से किसी को उस तिथि से, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ की तिथि से पूर्वोत्तर न हो, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति भी शामिल है, किन्तु किसी परिनियम, अध्यादेष या विनियम को भूतलक्षी प्रभाव इस प्रकार नहीं दिया जाएगा, जिससे कि किसी ऐसे व्यक्ति, जिसको ऐसा परिनियम, अध्यादेष या विनियम लागू हो, के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
अस्थाई उपबंध। 42. इस अधिनियम और परिनियमों में दी गई किसी बात के होते हुए भी,-
(क) प्रथम कुलपति, राज्य सरकार द्वारा ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा, जो वह उचित समझे और उक्त अधिकारी तीन वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेगा, जो राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ;
(ख) प्रथम कुलसचिव और प्रथम वित्त अधिकारी, राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे और
प्रत्येक उक्त अधिकारी तीन वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा ;
(ग) प्रथम सभा और प्रथम कार्य परिषद् क्रमशः इकतीस और ग्यारह से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा और तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे; और
(घ) प्रथम विद्या और गतिविधि परिषद् इक्कीस से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा और तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे :
परन्तु यदि उपरोक्त कार्यालयों या प्राधिकरणों में कोई रिक्ति होती है, तो उसे राज्य सरकार द्वारा, नियुक्ति या नामनिर्देशन, जैसी भी स्थिति हो, द्वारा भरा जाएगा और इस प्रकार नियुक्त या नामनिर्दिष्ट व्यक्ति तब तक पद धारण करेगा जब तक वह अधिकारी या सदस्य, जिसके स्थान पर उसकी नियुक्ति या नामनिर्देशन किया गया है, यदि ऐसी रिक्ति नहीं हुई होती, तो पद धारण करता।208 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)
अनुसूची
[देखिये धारा 24 (1)]
विश्वविद्यालय के परिनियम
कुलाधिपति । 1. राज्य के राज्यपाल, अपने पदाभिधान से विष्वविद्यालय के कुलाधिपति होंगे । कुलपति। 2. (1) कुलपति खोजबीन समिति द्वारा सिफारिष किए गए नामों के पैनल में से राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा : परन्तु यदि राज्य सरकार पैनल में सम्मिलित व्यक्तियों में से किसी का अनुमोदन नहीं करती है, तो यह विस्तारित नया पैनल मंगवा सकती है। (2) कुलपति खेलों के क्षेत्र में कोई प्रख्यात व्यक्ति होगा, जो या तो स्वयं अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त खिलाड़ी या कोई विख्यात खेल प्रषासक या विख्यात खेल अकादमीषियन होगा। (3) खोजबीन समिति, पांच व्यक्तियों से मिलकर बनेगी, जिनमें से एक कार्य परिषद् द्वारा, एक हरियाणा राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद्् द्वारा, दो राज्य सरकार द्वारा तथा एक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नामनिर्देषित किया जाएगा तथा राज्य सरकार का एक नामनिर्देषिती समिति का सदस्य-संयोजक होगाः परन्तु समिति का कोई भी सदस्य विष्वविद्यालय या विष्वविद्यालय द्वारा स्थापित या अनुरक्षित किसी महाविद्यालय या संस्था या क्षेत्रीय केन्द्र या अध्ययन केन्द्र का कर्मचारी या विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण का सदस्य नहीं होगा। (4) कुलपति विष्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा। (5) कुलपति तिथि, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, से तीन वर्ष की अवधि, या जब तक वह पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता तक, जो भी पहले हो, के लिए पद धारण करेगा, और वह दो से अधिक अवधियों के लिए पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगाः परन्तु उक्त तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के होते हुए भी, वह अपने पद पर तब तक बना रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया जाता है और अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है : परन्तु यह और कि राज्य सरकार, किसी कुलपति को उसकी पदावधि के अवसान के पश्चात् छह मास की कुल अवधि से अनधिक ऐसी अवधि के लिए, जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, पर बने रहने का निदेष दे सकती है : परन्तु यह और कि जब कुलपति का पद मृत्यु, त्यागपत्र के कारण या अन्यथा, जैसी भी स्थिति हो, या रुग्णता अथवा ऐसे अन्य कारण से रिक्त हो जाता है, तो कार्य परिषद् ज्येष्ठतम डीन को नए कुलपति की नियुक्ति तक या विद्यमान कुलपति द्वारा अपने कर्तव्यों को फिर से संभालने तक, जैसी भी स्थिति हो, कुलपति के कृत्यों का पालन करने के लिए नियुक्त कर सकती है। (6) खंड (4) में दी गई किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार, कुलपति द्वारा पद ग्रहण करने के पश्चात् किसी भी समय, लिखित आदेष द्वारा, कुलपति को असमर्थता, कदाचार या कानूनी उपबंधों के उल्लंघन के आधार पर पद से हटा सकती है : परन्तु राज्य सरकार द्वारा ऐसा आदेष तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कुलपति को उसके विरूद्ध की जाने वाली प्रस्तावित कार्रवाई के विरूद्ध कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो : परन्तु यह और कि राज्य सरकार, ऐसा आदेष करने से पहले किसी भी समय जांच लंबित रहने तक कुलपति को निलंबित कर सकती है।
कुलपति की शक्तियां और कर्तव्य।
3. (1) कुलपति, कार्य परिषद्, विद्या और गतिविधि परिषद् और वित्त समिति का पदेन अध्यक्ष होगा और कुलाधिपति की अनुपस्थिति मेें उपाधियां प्रदान करने के लिये आयोजित दीक्षान्त समारोहोें और सभा की बैठकों की अध्यक्षता करेगा। (2) कुलपति, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय की किसी बैठक मेें उपस्थित रहने और उसे सम्बोधित करने का हकदार होगा, किन्तु वह उसमें मत देने का तब तक हकदार नहीं होगा जब तक वह ऐसे प्राधिकरण या निकाय का सदस्य न हो। (3) यह देखना कुलपति का कर्तव्य होगा कि इस अधिनियम, परिनियमों, अध्यादेषों और विनियमों का सम्यक् रूप से पालन किया जाता है और उसे ऐसा पालन सुनिष्चित करने के लिए आवष्यक सभी शक्तियां प्राप्त होंगी। (4) कुलपति को विष्वविद्यालय में समुचित अनुषासन बनाए रखने के लिए आवष्यक सभी शक्तियां होंगी और वह किन्हीं ऐसी शक्तियों का किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों, जिन्हें वह ठीक समझे, को प्रत्यायोजन कर सकता है।209 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (5) कुलपति को कार्य परिषद्, विद्या और गतिविधि परिषद् और वित्त समिति की बैठक बुलाने या बुलवाने की शक्ति होगी।
विद्यापीठों के डीन। 4. (1) विद्यापीठ के प्रत्येक डीन की नियुक्ति, कुलपति द्वारा उस विद्यापीठ के आचार्यों में से ज्येष्ठता के क्रम में चक्रानुक्रम से दो वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी : परन्तु यदि विद्यापीठ में केवल एक आचार्य है या कोई आचार्य नहीं है, तो तत्समय डीन की नियुक्ति विद्यापीठ के आचार्य, यदि कोई हों और सह-आचार्यों में से ज्येष्ठता के क्रम में चक्रानुक्रम से की जाएगी। (2) जब डीन का पद रिक्त है या जब डीन रुग्णता, अनुपस्थिति के कारण या किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है, तो उसके कर्तव्यों का पालन, यथास्थिति, विद्यापीठ के ज्येष्ठतम आचार्य या सह-आचार्य, जैसी भी स्थिति हो, द्वारा किया जाएगा। (3) डीन, विद्यापीठ का मुखिया होगा और विद्यापीठ में अध्यापन और अनुसंधान के संचालन तथा उनका स्तर बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगा और उसके ऐसे अन्य कृत्य होंगे, जो अध्यादेषों द्वारा विहित किए जाएं। (4) डीन को खेलकूद अध्ययन बोर्डों या विद्यापीठ की समितियों, जैसी भी स्थिति हो, की किसी बैठक में उपस्थित होने और बोलने का अधिकार होगा, किन्तु जब तक वह उसका सदस्य नहीं है तब तक उसे उसमें मत देने का अधिकार नहीं होगा।
कुल-सचिव। 5. (1) कुल-सचिव की नियुक्ति राज्य सरकार की सलाह पर कुलाधिपति द्वारा की जाएगी। वह विष्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा तथा कुलपति के अधीक्षण, निदेषन और नियन्त्रणाधीन सीधे तौर पर कार्य करेगा। (2) कुल-सचिव की नियुक्ति तीन वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी और वह दो से अधिक अवधियों के लिए पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा। (3) जब कुल-सचिव का पद रिक्त है या जब कुल-सचिव रुग्णता, अनुपस्थिति के कारण या किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है, तो पद के कर्तव्यों का पालन ऐसे व्यक्ति, जिसे कुलपति प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, द्वारा किया जाएगा।
(4) (क) कुल-सचिव को षिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद को छोड़कर, ऐसे कर्मचारियों, जो कार्य परिषद् के आदेश में विनिर्दिष्ट किये जायेें, के विरूद्व अनुषासनिक कार्रवाई करने की शक्ति होगी, तथा जांच होने तक उन्हें निलंबित करने, उन पर छोटी शास्तियां अधिरोपित करने की शक्ति होगी :
परन्तु ऐसी कोई भी शास्ति तब तक अधिरोपित नहीं की जायेगी जब तक ऐसे व्यक्ति को उनके सम्बद्ध में की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई के विरूद्व कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो;
(ख) उपखंड (क) में विनिर्दिष्ट कोई शास्ति अधिरोपित करने के कुल-सचिव के किसी
भी आदेष के विरूद्ध अपील कुलपति को होगी;
(ग) ऐसे मामलें में, जहां जांच से यह प्रकट हो कि कुलसचिव की शक्ति के बाहर का कोई दंड अपेक्षित है वहां, कुल-सचिव, जांच के पूरा होने पर, कुलपति को अपनी सिफारिषों सहित रिपोर्ट देगा :
परन्तु कोई शास्ति अधिरोपित करने के कुलपति के आदेष के विरूद्ध
अपील, कार्य परिषद् को होगी।
(5) कुल-सचिव, कार्य परिषद् और विद्या और गतिवधि परिषद् का पदेन सचिव होगा, किन्तु उसे इन प्राधिकरणों में से किसी का भी सदस्य नहीं समझा जाएगा और वह सभा का पदेन सदस्य-सचिव होगा। (6) कुल-सचिव का यह कर्तव्य होगा कि वह -
(क) विश्वविद्यालय के अभिलेख, सामान्य मुद्रा और ऐसी अन्य सम्पत्ति, जो कार्य परिषद्
उसके प्रभार मेें सौंपे, का अभिरक्षक होना ;
(ख) सभा, कार्य परिषद्, विद्या और गतिविधि परिषद् और उन प्राधिकरणों द्वारा गठित
की गई समिति की बैठक बुलाने के सभी नोटिस जारी करना ;
(ग) सभा, कार्य परिषद्, विद्या और गतिविधि परिषद् तथा उन प्राधिकरणों द्वारा गठित
किन्हीं समितियों की सभी बैठकों का कार्यवृत्त रखना ;
(घ) सभा, कार्य परिषद्, विद्या और गतिविधि परिषद् के शासकीय पत्र-व्यवहार का
संचालन करना ;
210 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)(ड.) विश्वविद्यालय के प्राधिकरणोें की बैठकों की कार्यसूची की प्रतियां जारी होते ही तथा
ऐसी बैठकों के कार्यवृत्त यथाशीघ्र राज्य सरकार को उपलब्ध करवाना ;
(च) विष्वविद्यालय द्वारा या उसके विरूद्व वादों या कार्यवाहियों में विष्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करना, मुख्तारनामों पर हस्ताक्षर करना तथा अभिवचनों को सत्यापित करना या इस प्रयोजन के लिए अपना प्रतिनिधि प्रतिनियुक्त करना ; तथा (छ) ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करना, जो परिनियमों, अध्यादेषों या विनियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं अथवा जिनकी कार्य परिषद् द्वारा समय-समय पर अपेक्षा की जाए।
वित्त अधिकारी। 6. (1) वित्त अधिकारी इस प्रयोजन के लिए गठित चयन समिति की सिफारिशों पर, कार्य परिषद् द्वारा नियुक्त किया जायेगा और वह विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा। (2) जब वित्त अधिकारी का पद रिक्त हो जाता है या जब वित्त अधिकारी रुग्णता, अनुपस्थिति के कारण अथवा किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, तो उसके पद के कर्तव्य ऐसे व्यक्ति द्वारा किये जायेंगे, जिसे कुलपति इस प्रयोजन के लिये नियुक्त करे। (3) वित्त अधिकारी, वित्त समिति का पदेन सचिव होगा, किन्तु ऐसी समिति के सदस्य के रूप में नहीं समझा जायेगा । (4) वित्त अधिकारी-
(क) विश्वविद्यालय की निधियों का सामान्य पर्यवेक्षण करेगा तथा इसको इसकी वित्तीय
नीति के सम्बन्ध मेें परामर्श देगा; तथा
(ख) ऐसे अन्य वित्तीय कृत्यों का पालन करेगा, जो उसे कार्य परिषद् द्वारा सौंपे जायें या
जो परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा विहित किये जायेंं।
(5) कार्य परिषद् के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, वित्त अधिकारी-
(क) न्यास तथा दान की गई सम्पत्ति सहित विश्वविद्यालय की सम्पत्ति तथा निवेशों को
धारण करेगा तथा प्रबन्ध करेगा;
(ख) यह सुनिश्चित करेगा कि आवर्तक तथा अनावर्तक खर्च, कार्य परिषद् द्वारा किसी वर्ष के लिये नियत सीमाओं से अधिक न हो तथा कि सभी धन उसी प्रयोजनार्थ खर्च किये जाएं, जिनके लिये वे प्रदान अथवा आबंटित किए गए हैं ;
(ग) विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे तथा बजट तैयार करने के लिए और उन्हें कार्य
परिषद् को प्रस्तुत करने के लिये उत्तरदायी होगा ;
(घ) नकदी तथा बैंक बकायों की स्थिति पर और निवेशों की स्थिति पर लगातार नज़र
रखेगा;
(ड.) राजस्व के संग्रहण की प्रगति पर नज़र रखेगा तथा नियोजित किए जाने वाले
संग्रहण के ढंग पर परामर्श देगा;
(च) यह सुनिश्चित करेगा कि भवन, भूमि, फर्नीचर तथा उपकरणों के रजिस्टर अद्यतन रखे जाएं तथा कि सभी कार्यालयों, विभागों, केन्द्रों तथा विशेष प्रयोगशालाओं में उपकरण तथा अन्य उपभोज्य सामग्री के स्टॉक का निरीक्षण किया जाता है; (छ) किसी अप्राधिकृत खर्च तथा अन्य वित्तीय अनियमितताएं कुलपति के ध्यान में लाएगा तथा उसके लिये उत्तरदायी व्यक्ति के विरूद्ध की जाने वाली अनुशासनिक कार्रवाई के सुझाव देगा; और
(ज) विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित या अनुरक्षित किसी कार्यालय, विभाग, केन्द्र, प्रयोगशाला, महाविद्यालय, संस्था, क्षेत्रीय केन्द्र या अध्ययन केन्द्र से कोई सूचना या विवरणी, जो वह अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिये आवश्यक समझे, मंगवाएगा । परीक्षा नियंत्रक।
(6) वित्त अधिकारी अथवा कार्य परिषद् द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा विश्वविद्यालय को भुगतानयोग्य किसी धन के लिए दी गई कोई भी रसीद, ऐसे धन के भुगतान के लिये पर्याप्त रूप से उन्मोचन होगी । 7. (1) परीक्षा नियंत्रक की नियुक्ति कार्य परिषद् द्वारा इस प्रयोजन के लिए गठित चयन समिति की सिफारिशोें पर की जाएगी और वह विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा। (2) जब परीक्षा नियंत्रक का पद रिक्त हो जाता है या जब परीक्षा नियंत्रक रुग्णता, अनुपस्थिति के कारण अथवा किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, तो उसके कर्तव्य ऐसे व्यक्ति द्वारा किये जायेंगे, जिसे कुलपति इस प्रयोजन के लिये नियुक्त करे। (3) परीक्षा नियंत्रक, अध्यादेशों द्वारा विहित रीति में विश्वविद्यालय की परीक्षाएं करवाएगा और उनका अधीक्षण करेगा।211 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) पुस्तकाध्यक्ष। 8. (1) पुस्तकाध्यक्ष की नियुक्ति कार्य परिषद् द्वारा इस प्रयोजन के लिए गठित चयन समिति की सिफारिशोें पर की जाएगी और वह विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा।
(2) पुस्तकाध्यक्ष, ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कत्र्तव्यों का पालन करेगा जो उसे कार्य परिषद् द्वारा सौंपे जाएं।
9. (1) सभा मेें निम्नलिखित सदस्य हाेंगे जो तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे, अर्थात् :- सभा का गठन तथा बैठकें। (क) पदेन सदस्य -
(i) कुलाधिपति ; (ii) कुलपति ; (iii) प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, वित्त विभाग या उसका नामनिर्देशिती,
जो संयुक्त सचिव की पदवी सेे नीचे का न हो ;
(iv) प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, खेल तथा युवा मामले विभाग या
उसका नामनिर्देशिती, जो संयुक्त सचिव की पदवी से नीचे का न हो ;
(v) प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, उच्चतर शिक्षा विभाग या उसका
नामनिर्देशिती, जो संयुक्त सचिव की पदवी से नीचे का न हो ;
(vi) विधि परामर्शी एवं प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, विधि तथा विधायी विभाग या उसका नामनिर्देशिती, जो उप सचिव की पदवी से नीचे का न हो ;
(vii) निदेशक, खेल तथा युवा मामले विभाग ; (viii) निदेशक, उच्चतर शिक्षा विभाग ; (ix) कुलानुशासक ; (x) विद्यापीठों के डीन ; (xi) छात्र कल्याण के डीन ; (xii) वित्त अधिकारी ; (xiii) एक ज्येष्ठ वार्डन, चक्रानुक्रम से ; (xiv) विश्वविद्यालय का पुस्तकालयाध्यक्ष ; (xv) पूर्व छात्र संगम का अध्यक्ष ;
(ख) अन्य सदस्य -
(i) विभागाध्यक्ष या आचार्य, जो विद्या और गतिविधि परिषद् के सदस्य हैं ; (ii) विश्वविद्यालय द्वारा मान्यताप्राप्त प्रत्येक संस्था से एक प्रतिनिधि, जो संस्था के मुखिया की सिफारिशों पर कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाए ; (iii) ख्याति प्राप्त खेलकूद वैज्ञानिकों, खेलकूद अकादमीशियन और खेलकूद प्रशासकों में से चार से अनधिक सदस्य, जो राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएं ;
(iv) खेलकूद उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाले दो से अनधिक व्यक्ति, जो
राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएं ;
(v) ख्याति प्राप्त खिलाड़ियों और उच्च मान्यताप्राप्त कोचों में से दस से
अनधिक व्यक्ति, जो राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएं ;
(ग) कुलसचिव, जो पदेन सदस्य-सचिव होगा :
परन्तु इसकी सहबद्ध संस्थाओं सहित विश्वविद्यालय का कोई वैतनिक कर्मचारी उपखंड (i) तथा (ii) के सिवाय, खंड (ख) के किन्हीं पूर्ववर्ती उपखंडों के अधीन निर्वाचन या नामनिर्देशन के लिए पात्र नहीं होंगे और यदि उपखंड (ii) तथा (iii) के सिवाय, खण्ड (ख) के किन्हीं पूर्ववर्ती उपखंडों के अधीन निर्वाचित या नामनिर्देशित कोई व्यक्ति पश्चात्वर्ती विश्वविद्यालय या इसकी सहबद्ध सस्थाओं में किसी वैतनिक पद पर नियुक्त किया जाता है, तो वह सभा के सदस्य के रूप में नहीं रहेगा :
परन्तु यह और कि कोई भी व्यक्ति, उप-खंड (v) के सिवाय, तब तक सभा के लिए नामनिर्देशन या निर्वाचन हेतु पात्र नहीं होगा जब तक वह पच्चीस वर्ष की आयु पूर्ण नहीं कर लेता।212 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (2) सभा की कोई वार्षिक बैठक, कार्य परिषद् द्वारा नियत की जाने वाली तिथि को आयोजित की जाएगी जब तक कोई अन्य तिथि सभा द्वारा किसी वर्ष के संबंध में नियत नहीं की गई हो।
(3) सभा की वार्षिक बैठक में पूर्व वर्ष के दौरान विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली की रिपोर्ट, प्राप्तियों और व्यय के विवरण, संपरीक्षित तुलनपत्र और अगले वर्ष के लिए वित्तीय प्राक्कलनों सहित प्रस्तुत की जाएगी। (4) खण्ड (2) में निर्दिष्ट प्राप्तियों और व्यय का विवरण, तुलनपत्र और वित्तीय प्राक्कलनों की प्रति सभा के प्रत्येक सदस्य को वार्षिक बैठक की तिथि से कम से कम सात दिन पूर्व भेजी जाएगी। (5) सभा की विशेष बैठकें, कार्य परिषद् या कुलपति या यदि कोई कुलपति नहीं है, तो कुलसचिव द्वारा बुलाई जा सकती है।
(6) सभा की बैठक के लिए गणपूर्ति सभा के दो बटा पांच सदस्यों से होगी।
10. कार्य परिषद् की बैठक के लिए गणपूर्ति कार्य परिषद् के दो बटा पांच सदस्यों से होगी। कार्य परिषद् की बैठक के लिए गणपूर्ति।
11. (1) कार्य परिषद् राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
कार्य परिषद् का गठन, शक्तियां और कृत्य।
(क) पदेन सदस्य-
(i) कुलपति ; (ii) अपर मुख्य सचिव, हरियाणा सरकार, वित्त विभाग या उसका नामनिर्देशिती,
जो संयुक्त सचिव की पदवी सेे नीचे का न हो ;
(iii) प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, खेल तथा युवा मामले विभाग या उसका नामनिर्देशिती, जो संयुक्त सचिव की पदवी से नीचे का न हो ; (iv) प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, उच्चतर शिक्षा विभाग या उसका
नामनिर्देशिती, जो संयुक्त सचिव की पदवी से नीचे का न हो ;
(v) विधि परामर्शी एवं प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, विधि तथा विधायी विभाग या उसका नामनिर्देशिती, जो उप सचिव की पदवी से नीचे का न हो ;
(vi) निदेशक, खेल तथा युवा मामले विभाग ; (vii) कुलानुशासक ; (viii) छात्र कल्याण के डीन ; (ix) विद्यापीठों के डीन ;
(ख) अन्य सदस्य -
(i) तीन ज्येष्ठ आचार्य, चक्रानुक्रम से ; (ii) कुलपति की सिफारिश पर कुलाधिपति द्वारा नामनिर्दिष्ट खेलकूद वैज्ञानिकों और खेलकूद प्रशासकों, ख्यातिप्राप्त खिलाड़ियों तथा विशिष्ट कोचों में से चार व्यक्ति ;
(ग) कुलसचिव, जो कार्यकारी परिषद् का पदेन सचिव होगा।
(2) कार्य परिषद् के सदस्य, पदेन सदस्यों से भिन्न, दो वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे। (3) कोई सदस्य, जिसके आधार पर वह कार्य परिषद् के सदस्य के रूप में निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किया गया था, योग्यता धारण नहीं करता है, तो वह उसके सदस्य के रूप में नहीं बना रहेगा। (4) कार्य परिषद् को विश्वविद्यालय के राजस्व और सम्पत्ति के प्रबन्धन और प्रशासन तथा विश्वविद्यालय के सभी ऐसे प्रशासनिक कार्यकलापों के संचालन, जिनके लिए अन्यथा उपबन्ध नहीं किए गए हैं, की शक्ति होगी। (5) इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए कार्य परिषद् को, उसमें निहित अन्य सभी शक्तियों के अतिरिक्त, निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात् :-
(i) पीठ आचार्य पद सहित अध्यापन तथा अन्य शैक्षणिक पद सृजित करना, ऐसे पदोें की संख्या तथा पारिश्रमिक अवधारित करना और आचार्यों, सहआचार्यों, सहायक आचार्यों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के कर्तव्य तथा सेवा शर्तें परिनिश्चित करना : परन्तु शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद की संख्या और योग्यताओं के संबंध में कोई कार्यवाही कार्य परिषद् द्वारा विद्या और गतिविधि परिषद् की सिफारिशोें पर विचार किए बगैर नहीं की जाएगी।213 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (ii) पीठ आचार्य सहित ऐसे आचार्यों, सहआचार्यों, सहायक आचार्यों तथा अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंदों, जो आवश्यक हाें, इस प्रयोजन के लिये गठित चयन समिति की सिफारिश पर, को नियुक्त करना और उनमें अस्थायी रिक्तियां भरना ;
(iii) विभिन्न विद्यापीठों, विभागों और केन्द्रों में अध्यापन, कर्मचारिवृंद की संयुक्त
नियुक्तियां करके अंतर्मुखी अनुसंधान को प्रोन्नत करना ;
(iv) अध्यापन, प्रशासनिक, अनुसचिवीय तथा अन्य पदों का सृजन करना और उनके कर्तव्य परिनिश्चित करना तथा परिनियमोें द्वारा विहित रीति में उन पर नियुक्तियां करना :
परन्तु अतिरिक्त वित्तीय दायित्व वाले नए पदों के सृजन के मामले तभी लागू रहेंगे यदि प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, वित्त विभाग या उसका प्रतिनिधि, या प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, खेल तथा युवा मामले विभाग या उसका प्रतिनिधि, ऐसे निर्णय लेते समय उपस्थित है और उसने ऐसे निर्णय की सहमति दे दी हैः
परन्तु यह और कि शिक्षकों तथा शैक्षणिक कर्मचारिवृंद की संख्या, योग्यताएं तथा पारिश्रमिक के संबंध में, कार्य परिषद्, विद्या तथा गतिविधि परिषद् तथा वित्त समिति की सिफारिशों पर विचार करने के बाद, कार्यवाही करेगी :
(v) कुलाधिपति और कुलपति से भिन्न विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी को अनुपस्थिति छुट्टी देना, तथा ऐसे अधिकारी की अनुपस्थिति में उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक प्रबन्ध करना ;
(vi) परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार कर्मचारियों में अनुशासन का विनियमन करना
और उसका पालन कराना ;
(vii) विश्वविद्यालय के वित्त, लेखे, निवेशों, सम्पत्ति, कारबार तथा सभी अन्य प्रशासनिक कार्यकलापों का प्रबन्ध तथा विनियमन करना और उस प्रयोजन के लिये ऐसे अभिकर्ताओं को नियुक्त करना, जिन्हेें वह ठीक समझे ;
(viii) वित्त समिति की सिफारिश पर वर्ष के लिए कुल आवर्ती और कुल अनावर्ती की
सीमाएं नियत करना ;
(ix) विश्वविद्यालय से सम्बन्धित कोई भी धनराशि, इसमें ऐसे स्टॉकोें, निधियोें, शेयर या प्रतिभूतियोें में उपयोग में न लाई गई कोई आय भी शामिल है, जिन्हें वह समय-समय पर ठीक समझे या समय-समय पर ऐसे निवेशों में परिवर्तित करने की उसी प्रकार की शक्तियोें सहित भारत मेें अचल सम्पत्ति के क्रय मेें निवेेश करना ;
(x) विश्वविद्यालय की ओर से किसी चल तथा अचल सम्पत्ति का अन्तरण करना या
अन्तरण स्वीकार करना ;
(xi) विश्वविद्यालय के कार्य को चलाने के लिये निर्माणों, परिसरों, फर्नीचर तथा
उपकरणों तथा अन्य आवश्यक साधनोें की व्यवस्था करना ;
(xii) विश्वविद्यालय की ओर से संविदाएं करना, परिवर्तित करना, उन्हेें कार्याविन्त करना
अथवा रद्द करना ;
(xiii) विश्वविद्यालय के ऐसे कर्मचारियों और छात्रों, जो किसी भी कारण से व्यथित समझे, किन्हीं शिकायतों को ग्रहण करना, उनका न्यायनिर्णय करना और यदि ठीक समझे, तो उन शिकायतों को दूर करना ;
(xiv) विद्या और गतिविधि परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् परीक्षकों और अनुसीमकों को नियुक्त करना और यदि आवश्यक हो, तो उन्हें हटाना तथा उनकी फीसें, पारिश्रमिकों और यात्रा भत्ते तथा अन्य भत्ते नियत करना ;
(xv) विश्वविद्यालय के लिये सामान्य मुद्रा का चयन करना और ऐसी मुद्रा के उपयोग के
लिए व्यवस्था करना ;
(xvi) महिला विद्यार्थियों के निवास के लिए ऐसे विशेष प्रबन्ध करना, जो आवश्यक हों ; (xvii) अध्येतावृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, छात्रवृत्तियां, पदक तथा पुरस्कार संस्थित करना ; (xviii) अभ्यागत आचार्यों, प्रतिष्ठित आचार्यों, परामर्शदाताओं तथा विद्वानों की नियुक्ति की
व्यवस्था करना और ऐसी नियुक्तियों के निबंधनों और शर्तों का अवधारण करना ;
214 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA)(xix) ज्ञान की अभिवृद्धि के लिए उद्योगों और गैर-सरकारी अभिकरणों के साथ भागीदारी करना तथा ऐसी भागीदारी से हुए लाभ में से कायिक निधि की स्थापना करना ; और
(xx) ऐसी अन्य शक्तियोें का प्रयोग करना और ऐसे अन्य कृत्यों का पालना करना, जो इस अधिनियम या इन परिनियमोें द्वारा उसे प्रदत्त किए जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं।
(6) अतिरिक्त वित्तीय दायित्व वाले मामलों तथा उन मामलों, जो विश्वविद्यालय के वार्षिक बजट से संबंधित हैं, में कार्य परिषद् का कोई विनिश्चय केवल तब वैध होगा, यदि प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, वित्त विभाग या उसका प्रतिनिधि, या प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, खेल तथा युवा मामले विभाग या उसका प्रतिनिधि, ऐसा विनिश्चय करते समय उपस्थित है तथा उसने उस निर्णय पर अपनी सहमति दे दी है।
12. (1) विद्या और गतिविधि परिषद् निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) पदेन सदस्य-
विद्या और गतिविधि परिषद् के सदस्य और बैठक के लिए गणपूर्ति।
(i) कुलपति ; (ii) निदेशक, खेल तथा युवा मामले विभाग, हरियाणा या उसका नामनिर्देशिती,
जो उप निदेशक की पदवी से नीचे का न हो ;
(iii) कुल-सचिव ; (iv) विद्यापीठों के डीन ; (v) छात्र कल्याण के डीन ; (vi) विभागाध्यक्ष ; (vii) विश्वविद्यालय छात्रावासों का मुख्य वार्डन ; (viii) कुलानुशासक; (ix) परीक्षा नियन्त्रक ; (x) पुस्तकालयाध्यक्ष; (xi) विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित महाविद्यालयों के प्राचार्यों में से एक, चक्रानुक्रम
से, बशर्ते वह कार्य-परिषद् का सदस्य न हो ;
(ख) अन्य सदस्य -
(i) प्रत्येक विभाग से विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त एक आचार्य, वरिष्ठता के
आधार पर, चक्रानुक्रम से ;
(ii) कुलपति द्वारा विश्वविद्यालय के बाहर से नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले
अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त तीन खिलाड़ी ;
(ग) कुलसचिव, विद्या और गतिविधि परिषद् का सदस्य-सचिव होगा । (2) विद्या और गतिविधि परिषद् की बैठकों के लिए गणपूर्ति दो बटा पांच सदस्योें से होगी । (3) विद्या और गतिविधि परिषद् के सदस्य, पदेन सदस्योें से भिन्न, दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे।
13. (1) इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए विद्या और गतिविधि परिषद् को, उसमें निहित अन्य सभी शक्तियों के अतिरिक्त, निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात् :-
विद्या और गतिविधि परिषद् की शक्तियां और कृत्य।
(क) विश्वविद्यालय की शैक्षणिक नीतियोें पर सामान्य पर्यवेक्षण करना और महाविद्यालयों, संस्थाओं, क्षेत्रीय केन्द्रों तथा अध्ययन केन्द्रों के बीच में विद्या, अध्यापन के समन्वयन की पद्धतियों के संबंध में निर्देश देना, शैक्षणिक स्तरों में अनुसंधान और सुधारोें के मूल्यांकन के संबंध मेें निदेश देना ;
(ख) अन्तर्विद्यापीठ समन्वय स्थापित करना और प्रोन्नत करना या ऐसी समितियों और
बोर्डों की स्थापना या गठन करना, जो इस प्रयोजन के लिए आवश्यक समझे जाएं;
(ग) या तो अपनी पहल पर, या किसी विद्यापीठ या कार्य परिषद् के प्रतिनिर्देश से सामान्य शैक्षणिक हित के मामलों पर विचार करना तथा उन पर उचित कार्रवाई करना ;
(घ) विश्वविद्यालय के विद्या सम्बन्धी कृत्यों, अनुशासन, निवास प्रवेश, अध्येतावृत्तियोें, छात्रवृत्तियोें को प्रदान करने, फीसों, रियायतोें, सामूहिक कार्यकाल तथा उपस्थिति के सम्बन्ध मेें परिनियमों और अध्यादेशोें से संगत ऐसे विनियमों तथा नियमों को बनाना।215 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) अध्ययन विद्यापीठ और विभाग। 14. (1) विश्वविद्यालय में उतने अध्ययन विद्यापीठ होंगे, जितने परिनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं।
(2) प्रत्येक विद्यापीठ का विद्यापीठ बोर्ड होगा और प्रथम विद्यापीठ बोर्ड के सदस्य, कार्य परिषद् द्वारा तीन वर्ष की अवधि के लिए नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे।
(3) विद्यापीठ बोर्ड की संरचना, शक्तियां और कृत्य अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएंगे।
(4) विद्यापीठ बोर्ड की बैठकों का संचालन और ऐसी बैठकों के लिए अपेक्षित गणपूर्ति अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएगी।
(5) (क) प्रत्येक विद्यापीठ में उतने विभाग होंगे, जितने अध्यादेशों द्वारा उनमें रखे जाएं :
परन्तु कार्य परिषद्, विद्या और गतिविधि परिषद् की सिफारिश पर, ऐसे अध्ययन केन्द्र स्थापित कर सकती है, जिनमें विश्वविद्यालय के उतने शिक्षक लगाए जाएं, जितने कार्य परिषद् आवश्यक समझें।
(ख) प्रत्येक विभाग निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-
(i) विभाग के शिक्षक ; (ii) विभाग में अनुसंधान करने वाले व्यक्ति ;
(iii) विद्यापीठ का डीन ;
(iv) विभाग से जुड़े मानद आचार्य, यदि कोई हो; और
(v) ऐसे अन्य व्यक्ति, जो अध्यादेशों के उपबंधों के अनुसार विभाग के सदस्य
हों।
15. (1) प्रत्येक विभाग में खेलकूद अध्ययन बोर्ड होगा।
खेलकूद अध्ययन बोर्ड। (2) खेलकूद अध्ययन बोर्ड और उसके सदस्यों की पदावधि अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएगी। (3) विद्या और गतिविधि परिषद् के पूर्ण नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन रहते हुए, खेलकूद अध्ययन बोर्ड के कृत्य विभिन्न उपाधियों के लिए अनुसंधानार्थ विषयों और अनुसंधान उपाधियों की अन्य अपेक्षाओं का अनुमोदन करना तथा संबद्ध विद्यापीठ बोर्ड को अध्यादेशों द्वारा विहित रीति में निम्नलिखित के बारे में सिफारिश करना होगा-
(क) अनुसंधान उपाधियों को छोड़कर, अध्ययन पाठ्यक्रम और पाठ्यक्रमाें के लिए,
परीक्षकों की नियुक्ति;
(ख) अनुसंधान के लिए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति; और
(ग) अध्यापन और अनुसंधान के मानक केे सुधार के लिए उपाय :
परन्तु इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पश्चात् तीन वर्ष की अवधि के दौरान खेलकूद अध्ययन बोर्ड के उपर्युक्त कृत्यों का पालन विभाग द्वारा किया जाएगा।
वित्त समिति। 16. (1) वित्त समिति निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) पदेन सदस्य-
(i) कुलपति ; (ii) अपर मुख्य सचिव, हरियाणा सरकार, वित्त विभाग या उसका नामनिर्देशिती,
जो संयुक्त सचिव की पदवी सेे नीचे का न हो ;
(iii) प्रशासकीय सचिव, हरियाणा सरकार, खेल तथा युवा मामले विभाग या
उसका नामनिर्देशिती, जो संयुक्त सचिव की पदवी से नीचे का न हो ;
(iv) निदेशक, खेल तथा युवा मामले विभाग, हरियाणा ;
(ख) (i) कुलपति की सिफारिश पर कुलाधिपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला
वित्त में विशेषज्ञता रखने वाला एक बाह्य सदस्य ;
(ii) कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले संकायों के दो डीन;
(ग) कुलसचिव, जो वित्त समिति का पदेन सचिव होगा।
(2) वित्त समिति की बैठक के लिए गणपूर्ति चार सदस्यों से होगी, जिनमेें से कम से कम एक सदस्य सरकार का नामनिर्देशिती होगा। (3) वित्त समिति के पदेन सदस्यों से भिन्न, सभी सदस्य दो वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करेंगे।216 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (4) यदि वित्त समिति का कोई सदस्य, उसके किसी विनिश्चय से सहमत नहीं है, तो उसे असहमति का कार्यवृत्त अभिलिखित करने का अधिकार होगा। (5) लेखों की परीक्षा और व्यय के प्रस्तावों की समीक्षा करने के लिए वित्त समिति की बैठक प्रत्येक वर्ष में कम से कम तीन बार होगी। (6) पदों के सृजन से संबंधित सभी प्रस्तावों की और उन मदों की, जो बजट में सम्मिलित नहीं की गई हैं, कार्य परिषद् द्वारा उन पर विचार किए जाने से पूर्व, वित्त समिति द्वारा जांच की जाएगी। (7) वित्त अधिकारी द्वारा तैयार किए गए विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे और वित्तीय प्राक्कलन, वित्त समिति के समक्ष विचार तथा टिप्पणी के लिए रखे जाएंगे, तत्पश्चात् अनुमोदन के लिए कार्य परिषद् को प्रस्तुत किए जाएंगे। (8) वित्त समिति वर्ष के लिए कुल आवर्ती व्यय और कुल अनावर्ती व्यय के लिए सीमाओं की सिफारिश करेगी, जो उस विश्वविद्यालय की आय और उसके साधनों पर आधारित होगी (जिनके अन्तर्गत, उत्पादक कार्यों की दशा में, ऋणों के आगम भी हो सकते हैं)।
चयन समितियां। 17. (1) आचार्य, सह आचार्य, सहायक आचार्य, कुलसचिव, वित्त अधिकारी, परीक्षा नियंत्रक, पुस्तकालाध्यक्ष तथा विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित और अनुरक्षित महाविद्यालयों, संस्थाओं, क्षेत्रीय केन्द्रों और अध्ययन केन्द्रों के प्राचार्य के पदों पर नियुक्ति के लिए कार्य परिषद् को सिफारिश करने के लिए चयन समितियां होंगी। (2) नीचे दी गई सारणी के खाना 1 में विनिर्दिष्ट पदों पर नियुक्ति के लिए चयन समिति, कुलपति, राज्य सरकार का एक नामनिर्देशिती और उक्त सारणी के खाना 2 की तत्संबंधी प्रविष्टि में विनिर्दिष्ट व्यक्तियों से मिलकर बनेगी :
सारणी
1 2 आचार्य। (i) विद्यापीठ का डीन;
(ii) विभागाध्यक्ष, यदि वह कोई आचार्य है; (iii) तीन व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में न हों, कार्य परिषद् द्वारा उन नामों के पैनल में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे, जिनकी सिफारिश विद्या और गतिविधि परिषद् द्वारा उस विषय में, जिससे आचार्य संबंद्ध होगा, उनके विशेष ज्ञान या रूचि के कारण की गई हो।
सह आचार्य/सहायक आचार्य।
(i) विभागाध्यक्ष; (ii) कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट एक आचार्य; (iii) दो व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में न हों, कार्य परिषद् द्वारा उन नामों के पैनल में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे, जिनकी सिफारिश विद्या और गतिविधि परिषद् द्वारा उस विषय में, जिससे सह आचार्य या सहायक आचार्य संबंद्ध होगा, उनके विशेष ज्ञान या रूचि के कारण की गई हो।
(i) कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट उसके दो सदस्य; (ii) कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट ऐसा एक व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की
सेवा में न हो।
कुलसचिव/ वित्त अधिकारी/ परीक्षा नियंत्रक। पुस्तकाध्यक्ष। (i) कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट ऐसा एक व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में न हो, जिसे पुस्तकालय विज्ञान या पुस्तकालय प्रशासन के विषय का विशेष ज्ञान हो।
(ii) कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट ऐसा एक व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की
सेवा में न हो।
विश्वविद्यालय द्वारा अनुरक्षित महाविद्यालय या संस्था का प्राचार्य।
तीन व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में न हों, जिनमें से दो कार्य परिषद् द्वारा और एक विद्या और गतिविधि परिषद् द्वारा उनके ऐसे किसी विषय में विशेष ज्ञान या रूचि के कारण नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे, जिसमें उस महाविद्यालय या संस्था द्वारा शिक्षण दिया जा रहा हो।
टिप्पण 1ः जब नियुक्ति अंतर-शाखा परियोजना के लिए की जा रही हो, तब परियोजना के
मुखिया को संबद्ध विभागाध्यक्ष समझा जाएगा।
टिप्पण 2ः कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला प्राचार्य, उस विशिष्ट विषय से संबद्ध आचार्य होगा, जिसके लिए चयन किया जा रहा है और कुलपति, किसी आचार्य को नामनिर्दिष्ट करने से पूर्व विभागाध्यक्ष और विद्यापीठ के डीन से परामर्श करेगा।217 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (3) कुलपति, चयन समिति की बैठक बुलाएगा और उनकी अध्यक्षता करेगाः परन्तु चयन समिति की बैठक राज्य सरकार के नामनिर्देशिती और कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट विशेषज्ञों के पूर्व परामर्श के पश्चात् और उनकी सुविधा के अनुसार नियत की जाएगी : परन्तु यह और कि चयन समिति की कार्यवाहियां तब तक विधिमान्य नहीं होंगी, जब तक,-
(क) जहां राज्य सरकार के नामनिर्देशिती और कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों की कुल संख्या चार हो, वहां उनमें से कम से कम तीन बैठक में हाजिर न हों; और
(ख) जहां राज्य सरकार के नामनिर्देशिती और कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों
की कुल संख्या तीन हो, वहां उनमें से कम से कम दो बैठक में हाजिर न हों;
(4) चयन समिति द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया अध्यादेशों में अधिकथित की जाएगी। (5) यदि कार्य परिषद्, चयन समिति द्वारा की गई सिफारिशें स्वीकार करने में असमर्थ हो, तो वह अपने कारण अभिलिखित करेगी और मामले को अंतिम आदेश के लिए राज्य सरकार को भेजेगी।
नियुक्ति का विशेष ढंग। 18. (1) इन परिनियमों में दी गई किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से कार्य परिषद्, विद्या संबंधी उच्च विशेष उपाधि और व्यावसायिक योग्यता वाले किसी व्यक्ति को ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, विश्वविद्यालय में आचार्य या सह आचार्य का पद या कोई अन्य समकक्ष शैक्षणिक पद स्वीकार करने के लिए आमंत्रित कर सकती है और उस व्यक्ति के ऐसा करने के लिए सहमत होने पर वह उसे उस पद पर नियुक्त कर सकती है : परन्तु कार्य परिषद् ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति के लिए किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए अधिसंख्य पदों का सृजन भी कर सकती है : परन्तु यह और कि इस प्रकार सृजित अधिसंख्य पदों की संख्या विश्वविद्यालय में कुल पदों के पांच प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। (2) कार्य परिषद्, अध्यादेशों में अधिकथित रीति के अनुसार किसी संयुक्त परियोजना के लिए किसी अन्य विश्वविद्यालय या संगठन में कार्य करने वाले किसी शिक्षक या अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद को नियुक्त कर सकती है।
नियत अवधि के लिए नियुक्ति। 19. कार्य परिषद्, खंड 17 में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार चयन किए गए किसी व्यक्ति को किसी नियत अवधि के लिए ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, नियुक्त कर सकती है।
समितियां। 20. (1) विश्वविद्यालय का कोई प्राधिकरण, उतनी स्थायी या विशेष समितियों का गठन कर सकता है जितनी वह ठीक समझे और ऐसी समितियों में उन व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है, जो उस प्राधिकरण के सदस्य नहीं हैं। (2) खंड (1) के अधीन गठित समिति, इसे गठित करने वाले प्राधिकरण द्वारा बाद में पुष्टि के अध्यधीन किसी ऐसे विषय का निपटान कर सकती है, जो उसे प्रत्यायोजित किया जाए।
21. (1) विष्वविद्यालय के सभी शिक्षक और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद, परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों में यथा विनिर्दिष्ट सेवा के निबंधनों और शर्तों तथा आचार संहिता द्वारा शासित होंगे।
शिक्षकों इत्यादि की सेवा के निबंधन और शर्तें तथा आचार संहिता। (2) शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्यों की परिलब्धियां ऐसी होंगी, जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएं।
(3) विश्वविद्यालय का प्रत्येक शिक्षक और शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य को लिखित संविदा आधार पर नियुक्त किया जाएगा, जिसका प्ररूप अध्यादेशों द्वारा विहित किया जाएगा। (4) खंड (3) में निर्दिष्ट प्रत्येक संविदा की प्रति कुलसचिव के पास रखी जाएगी।
22. (1) शिक्षकों तथा अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद से भिन्न, विष्वविद्यालय के सभी कर्मचारी, परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों में यथा विनिर्दिष्ट सेवा के निबंधनों और शर्तों तथा आचार संहिता द्वारा शासित होंगे।
अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें तथा आचार संहिता। (2) शिक्षकों तथा अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद से भिन्न, कर्मचारियों की नियुक्ति की रीति और परिलब्धियां ऐसी होंगी, जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएं।
ज्येष्ठता सूची। 23. (1) जब कभी, इन परिनियमों के अनुसार, किसी व्यक्ति को ज्येष्ठता के अनुसार चक्रानुक्रम से विष्वविद्यालय का कोई पद धारण करता है या उसके किसी प्राधिकरण का सदस्य बनता है, तो ऐसी ज्येष्ठता उसके ग्रेड में ऐसे व्यक्ति के लगातार सेवाकाल और ऐसे अन्य सिद्धान्त, जो कार्य परिषद् समय-समय पर, विनिर्दिष्ट करे, के अनुसार अवधारित की जाएगी।218 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (2) कुलसचिव का यह कर्तव्य होगा कि वह व्यक्तियों के प्रत्येक वर्ग, जिनको इन परिनियमों के उपबंध लागू होते हैं, के संबंध में सम्पूर्ण और अद्यतन ज्येष्ठता सूची उपखण्ड (1) के उपबंधों के अनुसार तैयार और अनुरक्षण करेगा।
(3) यदि दो या अधिक व्यक्तियों का किसी विशिष्ट ग्रेड में लगातार सेवाकाल समान हो अथवा किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों की सापेक्ष ज्येष्ठता के विषय में अन्यथा संदेह हो, तो कुलसचिव, स्वप्ररेणा से, ऐसे किसी व्यक्ति के अनुरोध पर, मामला कार्य परिषद् को प्रस्तुत करेगा जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा।
विष्वविद्यालय के कर्मचारियों का हटाया जाना।
24. (1) जहां विष्वविद्यालय के किसी शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के किसी सदस्य या किसी अन्य कर्मचारी के विरूद्ध किसी अवचार का अभिकथन हो, वहां शिक्षक या शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य के मामले में कुलपति, और अन्य कर्मचारी के मामले में नियुक्ति करने के लिए सक्षम प्राधिकारी (जिसे, इसमें, इसके पश्चात, नियुक्ति प्राधिकारी कहा गया है), लिखित आदेश द्वारा, ऐसे शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी, जैसी भी स्थिति हो, को निलंबित कर सकता है और कार्य परिषद् को उन परिस्थितियों की तुरन्त रिपोर्ट देगा, जिनमें आदेश किया गया था :
परन्तु यदि कार्य परिषद् की यह राय है कि मामले की परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि शिक्षक या शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य का निलंबन होना चाहिए तो वह उस आदेश को प्रतिसंहृत कर सकती है। (2) कर्मचारियों की नियुक्ति की संविदा के अनुसार या सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में दी गई किसी बात के होते हुए भी, शिक्षकों तथा अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सम्बन्ध में कार्य परिषद्, और अन्य कर्मचारियों के संबंध में नियुक्ति प्राधिकारी को किसी शिक्षक या शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी को, जैसी भी स्थिति हो, व्यभिचार के आधार पर हटाने की शक्ति होगी।
(3) यथा उपरोक्त के सिवाय, कार्य परिषद् या नियुक्ति प्राधिकारी, जैसी भी स्थिति हो, किसी शिक्षक या शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी को किसी उपयुक्त कारण से तथा तीन मास का नोटिस देने के बाद या नोटिस के बदले में तीन मास के वेतन के भुगतान से अन्यथा हटाने के लिए हकदार नहीं होगा।
(4) किसी शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी को उपखंड (2) या उपखंड (3) के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उसे इस संबंध में की जाने वाली प्रस्तावित कार्रवाई के विरूद्ध कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो।
(5) किसी शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी का हटाया जाना उस तिथि से प्रभावी होगा, जिसको हटाए जाने का आदेश किया जाता है :
परन्तु जहां कोई शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद का सदस्य या अन्य कर्मचारी हटाए जाने के समय निलंबित है, वहां उसका हटाया जाना उस तिथि से प्रभावी होगा, जिसको वह निलंबित किया गया था। (6) परिनियमों के पूर्वगामी उपबंधों में दी गई किसी बात के होते हुए भी, कोई शिक्षक या शैक्षणिक कर्मचारिवृंद का सदस्य या अन्य कर्मचारी,-
(क) यदि वह स्थायी कर्मचारी है, तो कार्य परिषद् या नियुक्ति प्राधिकारी, जैसी भी स्थिति हो, को तीन मास का लिखित नोटिस देने या नोटिस के बदले में तीन मास के वेतन का भुगतान करने के पश्चात् त्यागपत्र दे सकता है;
(ख) यदि वह स्थायी कर्मचारी नहीं है, तो कार्य परिषद् या नियुक्ति प्राधिकारी, जैसी भी स्थिति हो, को केवल एक मास का लिखित नोटिस देने या नोटिस के बदले में एक मास के वेतन के भुगतान के पश्चात् त्यागपत्र दे सकता है :
परन्तु ऐसा त्यागपत्र केवल उस तिथि से प्रभावी होगा, जिसको कार्य परिषद्
या नियुक्ति प्राधिकारी, जैसी भी स्थिति हो, द्वारा त्यागपत्र स्वीकार किया जाता है। मानद उपाधियां। 25. (1) कार्य परिषद्, विद्या और गतिविधि परिषद् की सिफारिश पर और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित संकल्प द्वारा, राज्य सरकार से मानद उपाधियां प्रदान करने का प्रस्ताव कर सकती है :
परन्तु आपात्कालीन स्थिति में, कार्य परिषद्, स्वप्रेरणा से, ऐसे प्रस्ताव कर सकती है। (2) कार्य परिषद्, उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से पारित संकल्प द्वारा, राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से, विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त किसी मानद उपाधि को वापस ले सकती है।219 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) उपाधियों इत्यादि का वापस लिया जाना। 26. कार्य परिषद,् उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित संकल्प द्वारा किसी व्यक्ति को विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त किसी उपाधि या विद्या संबंधी विशेष उपाधि या दिए गए किसी प्रमाणपत्र या उपाधि-पत्र को उचित और पर्याप्त कारण से वापस ले सकती है :
परन्तु ऐसा कोई संकल्प तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक उस व्यक्ति को ऐसे समय के भीतर, जो नोटिस में विनिर्दिष्ट किया जाए, यह हेतुक दर्शित करने का लिखित नोटिस न दे दिया जाए कि ऐसा संकल्प क्यों न पारित कर दिया जाना चाहिए और जब तक कार्य परिषद् द्वारा उसके आक्षेपों, यदि कोई हों, पर और किसी ऐसे साक्ष्य पर, जो वह उनके समर्थन में प्रस्तुत करे, विचार नहीं कर लिया जाता है।
27. (1) विष्वविद्यालय के छात्रों के संबंध में अनुशासन बनाए रखने और अनुशासनिक कार्रवाई करने संबंधी सभी शक्तियां कुलपति में निहित होंगी।
विष्वविद्यालय के छात्रों के मध्य अनुशासन बनाए रखना। (2) उपखण्ड (1) में निर्दिष्ट शक्तियों का प्रयोग करने में कुलपति की सहायता करने के लिए विश्वविद्यालय का एक कुलानुशासक होगा, जिसकी नियुक्ति अध्यादेशों द्वारा विहित रीति में, आचार्यों और सह-आचार्यों में से कार्य परिषद् द्वारा की जाएगी।
(3) कुलपति उपखण्ड (1) में निर्दिष्ट सभी शक्तियों या उनमें से कोई, जो वह ठीक समझे, कुलानुशासक और ऐसे अन्य अधिकारियों, जिन्हें वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, को प्रत्यायोजित कर सकता है।
(4) कुलपति, अनुशासन बनाए रखने तथा ऐसी कार्रवाई करने, जो उसे अनुशासन बनाए रखने के लिए समुचित प्रतीत हो, की अपनी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसी शक्तियों के प्रयोग में आदेश द्वारा निदेश कर सकता है कि किसी छात्र या किन्हीं छात्रों को किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए निकाला या निष्कासित किया जाए अथवा विश्वविद्यालय के किसी महाविद्यालय, संस्था या क्षेत्रीय केन्द्र या विभाग या विद्यापीठ में किसी पाठ्यक्रम या पाठ्यक्रमों में कथित अवधि के लिए प्रवेश न दिया जाए अथवा उसे ऐसी राशि के जुर्माने सहित दण्ड दिया जाए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट है अथवा उसे विश्वविद्यालय या महाविद्यालय, संस्था या क्षेत्रीय केन्द्र या विभाग या किसी विद्यापीठ द्वारा संचालित परीक्षा या परीक्षाओं में सम्मिलित होने से एक या से अधिक वर्ष के लिए विवर्जित किया जाए अथवा संबंधित छात्र या छात्रों की, किसी परीक्षा या किन्हीं परीक्षाओं, जिसमें वह या वे सम्मिलित हुआ है या हुए हैं, का परिणाम रोक दिया जाए या रद्द कर दिया जाए।
(5) महाविद्यालय, संस्थाओं के प्राचार्यों, विद्यापीठों के डीनों तथा विश्वविद्यालय के अध्यापन विभागों के अध्यक्षों को अपने-अपने महाविद्यालयों, संस्थाओं, विद्यापीठों और विश्वविद्यालय के अध्यापन विभागों में छात्रों पर ऐसी सभी अनुशासनिक शक्तियों का प्रयोग करने का प्राधिकार होगा, जो ऐसे महाविद्यालयों, संस्थाओं, विद्यापीठों और अध्यापन विभागों के उचित संचालन के लिए आवश्यक हों।
(6) कुलपति तथा प्राचार्यों और उपखण्ड (5) में विनिर्दिष्ट अन्य व्यक्तियों की शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अनुशासन और उचित आचरण संबंधी विस्तृत नियम विश्वविद्यालय द्वारा बनाए जाएंगे और महाविद्यालयों, संस्थाओं के प्राचार्य, विद्यापीठों के डीन और विश्वविद्यालय के अध्यापन विभागों के अध्यक्ष ऐसे अनुपूरक नियम भी बना सकते हैं, जो उसमें कथित प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझे।
(7) दाखिले के समय, प्रत्येक छात्र से इस आशय की घोषणा पर हस्ताक्षर करने की अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने को कुलपति तथा विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकारियों की अनुशासनिक अधिकारिता के अधीन अर्पित करता है।
दीक्षांत समारोह। 28. उपाधियां प्रदान करने या अन्य प्रयोजनों के लिए विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह ऐसी रीति, जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाए, में आयोजित किए जाएंगे।
बैठकों का कार्यकारी अध्यक्ष। 29. जहां विष्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या ऐसे प्राधिकरण की किसी समिति की बैठक की अध्यक्षता करने हेतु किसी अध्यक्ष के लिए उपबंध नहीं किए गए हैं अथवा जब इस प्रकार उपबंधित अध्यक्ष अनुपस्थित है, तो उपस्थित सदस्य ऐसी बैठक की अध्यक्षता करने के लिए अपने में से एक सदस्य को निर्वाचित करेंगे।
त्यागपत्र। 30. सभा, कार्य परिषद्, विद्या और गतिविधि परिषद् या विश्वविद्यालय के किसी अन्य प्राधिकरण या ऐसे प्राधिकरण की किसी समिति के पदेन सदस्य से भिन्न, कोई सदस्य, कुलसचिव को संबोधित पत्र द्वारा त्यागपत्र दे सकता है और त्यागपत्र, ऐसा पत्र कुलसचिव को प्राप्त होने के यथाशीघ्र प्रभावी हो जाएगा।220 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) निरर्हता। 31. (1) कोई भी व्यक्ति, विश्वविद्यालय के प्राधिकरणों में से किसी का सदस्य चुने जाने और सदस्य बने रहने या विश्वविद्यालय का कोई अधिकारी नियुक्त किए जाने या बने रहने के लिये निरर्हित होगा, यदि-
(i) वह विकृत्तचित है; (ii) वह अनुन्मोचित दिवालिया है; या (iii) उसे नैतिक अधमता वाले किसी ऐसे अपराध के लिए किसी न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध
ठहराया गया है।
(2) यदि यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या कोई व्यक्ति उपखण्ड (1) में वर्णित निरर्हताओं में से किसी एक के अध्यधीन है या रहा है, तो प्रश्न राज्य सरकार को निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा और ऐसे विनिश्चय के विरूद्ध किसी सिविल न्यायालय में कोई वाद या अन्य कार्यवाही नहीं होगी।
सदस्यता और पद के लिए निवास की शर्तें।
32. परिनियमों में दी गई किसी बात के होते हुए भी, ऐसा कोई व्यक्ति, जो साधारणतया भारत का निवासी नहीं है, विश्वविद्यालय का कोई अधिकारी या विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण का कोई सदस्य बनने के लिए पात्र नहीं होगा।
अन्य निकायों की सदस्यता के आधार पर प्राधिकरणों की सदस्यता।
33. परिनियमों में दी गई किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, जो किसी विशिष्ट प्राधिकरण या निकाय के सदस्य के रूप में या विशिष्ट नियुक्ति के धारक के रूप में अपनी हैसियत में विश्वविद्यालय में कोई पद धारण करता है या विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या निकाय का सदस्य है, तो ऐसा पद केवल तब तक धारण करेगा या सदस्य बना रहेगा जब तक उस विशिष्ट प्राधिकरण या निकाय का सदस्य बना रहता है या उस विशिष्ट नियुक्ति का धारक, जैसी भी स्थिति हो, बना रहता है।
पूर्वछात्र संगम। 34. (1) विश्वविद्यालय के लिए पूर्वछात्र संगम होगा।
(2) पूर्वछात्र संगम की सदस्यता के लिए अंशदान अध्यादेशों द्वारा विहित किया जाएगा। (3) पूर्वछात्र संगम का कोई भी सदस्य तब तक मत देने या निर्वाचन में खड़े होने का हकदार नहीं होगा जब तक वह निर्वाचन तिथि से कम से कम एक वर्ष पूर्व संघ का सदस्य नहीं रहा हो और विश्वविद्यालय की कम से कम पांच वर्ष की अवधि वाली उपाधि का धारक न हो : परन्तु प्रथम निर्वाचन की दशा में, एक वर्ष की सदस्यता अवधि पूरी किए जाने की शर्त लागू नहीं होगी।
छात्र परिषद् । 35. (1) प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष के लिए विश्वविद्यालय में छात्र परिषद् गठित की जाएगी, जिसमें निम्नलिखित होंगे-
(i) छात्र कल्याण डीन, जो कि छात्र परिषद् का अध्यक्ष होगा; (ii) बीस छात्र, अध्ययन, खेल और पाठयेतर गतिविधियों में योग्यता के आधार पर विद्या
और गतिविधि परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे; तथा
(iii) बीस छात्र, जो छात्रों द्वारा उनके प्रतिनिधियों के रूप में निर्वाचित किए जाएंगेः
परन्तु विश्वविद्यालय के किसी छात्र, यदि अध्यक्ष द्वारा अनुज्ञात किया जाए, कोे छात्र परिषद् के समक्ष विश्वविद्यालय से संबंधित कोई मामला ले जाने का अधिकार होगा और जब किसी बैठक में उस मामले पर विचार किया जाए तो उसे विचार-विमर्श में भाग लेने का भी अधिकार होगा।
(2) छात्र परिषद् के कृत्य होंगे कि वह विश्वविद्यालय के समुचित प्राधिकरणों को अध्ययन के कार्यक्रमों, छात्र कल्याण और अन्य महत्वपूर्ण मामलों के संबंध में सामान्यतया विश्वविद्यालय के कार्य करने के संबंध में सुझाव दे और ऐसे सुझाव मतैक्यता के आधार पर दिए जाएंगे। (3) छात्र परिषद्, प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष में कम से कम दो बार बैठक करेगी और परिषद् की प्रथम बैठक शैक्षणिक सत्र के आरम्भ में आयोजित की जाएगी।
अध्यादेश कैसे बनाए जाएंगे।
36. (1) धारा 26 की उपधारा (2) के अधीन बनाए गए प्रथम अध्यादेश, कार्य परिषद् द्वारा निम्नलिखित उपखण्डों में विनिर्दिष्ट रीति में किसी भी समय संशोधित या निरसित किए जा सकते हैं। (2) अधिनियम की धारा 26 की उपधारा (1) में प्रगणित मामलों के संबंध में, कार्य परिषद् द्वारा कोई अध्यादेश तब तक नहीं बनाया जाएगा जब तक ऐसे अध्यादेशों का प्रारूप विद्या और गतिविधि परिषद् द्वारा प्रस्तावित नहीं किया गया हो। (3) कार्य परिषद् को उपखण्ड (2) के अधीन विद्या और गतिविधि परिषद् द्वारा प्रस्तावित किन्हीं अध्यादेशों के किन्हीं प्रारूपों को संशोधन करने की शक्ति नहीं होगी, किन्तु वह प्रस्ताव को अस्वीकार कर सकती है या विद्या और गतिविधि परिषद् के पुनर्विचार के लिए प्रारूप को या तो पूर्णतः या भागतः तथा किसी संशोधन, जिसका सुझाव कार्य परिषद् दे, के साथ वापस भेज सकती है।221 HARYANA GOVT. GAZ. (EXTRA.), AUG. 9, 2022 (SRVN. 18, 1944 SAKA) (4) जहां कार्य परिषद् द्वारा विद्या और गतिविधि परिषद् द्वारा प्रस्तावित किसी अध्यादेश के प्रारूप को अस्वीकृत कर दिया है या उसे वापस कर दिया है, वहां विद्या और गतिविधि परिषद् उस प्रश्न पर नए सिरे से विचार कर सकती है और उस दशा में, जब मूल प्रारूप उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई और विद्या और गतिविधि परिषद् के सदस्यों की कुल संख्या के आधे से अधिक सदस्यों के बहुमत से पुनः अभिपुष्ट कर दिया जाता है, तब प्रारूप कार्य परिषद् को वापस भेजा जा सकता है, जो या तो उसे अपनाएगी या उसे राज्य सरकार को निर्देशित करेगी, जिनका विनिश्चय अंतिम होगा। (5) कार्य परिषद् द्वारा बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश तुरन्त प्रभावी होगा। (6) कार्य परिषद् द्वारा बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश उसके अंगीकार किए जाने की तिथि से दो सप्ताह के भीतर राज्य सरकार को प्रस्तुत किया जाएगा। (7) राज्य सरकार को विश्वविद्यालय के किसी अध्यादेश के प्रवर्तन को निलंबित करने की शक्ति होगी। (8) राज्य सरकार, कार्य परिष्द को उपखण्ड (7) में निर्दिष्ट अध्यादेशों पर अपने आक्षेप के बारे में सूचित करेगी और विश्वविद्यालय से टिप्पणी प्राप्त करने के पश्चात्, या तो अध्यादेश का निलंबन करने वाले आदेश को वापस ले सकती है या अध्यादेश को अस्वीकृत कर सकती है और उसका विनिश्चय अंतिम होगा।
विनियम । 37. (1) विश्वविद्यालय के प्राधिकरण, इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों से संगत निम्नलिखित मामलों के लिए विनियम बना सकते हैं, अर्थात् :-
(i) उनकी बैठकों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और गणपूर्ति के लिए अपेक्षित सदस्यों
की संख्या अधिकथित करना;
(ii) उन सभी मामलों के लिए उपबंध करना, जो इस अधिनियम, परिनियमों या
अध्यादेशों द्वारा, विनियमों द्वारा विहित किए जाने अपेक्षित हैं; और
(iii) ऐसे सभी अन्य मामलों के लिए उपबंध करना, जो केवल ऐसे प्राधिकरणों या उनके द्वारा नियुक्त समितियों से संबंधित हों और जिनके लिए इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उपबन्ध न किया गया हो।
(2) विश्वविद्यालय का प्रत्येक प्राधिकरण, ऐसे प्राधिकरण के सदस्यों को बैठकों की तिथियों और उन बैठकों में विचारार्थ कार्य की सूचना देने और बैठकों की कार्यवाही का अभिलेख रखने के लिए विनियम बनाएगा। (3) कार्य परिषद्, इन परिनियमों के अधीन बनाए गए किसी विनियम का ऐसी रीति, जो वह विनिर्दिष्ट करे, में संशोधन करने या किसी ऐसे विनियम को निष्प्रभाव किए जाने का निदेश दे सकती है।
शक्तियों का प्रत्यायोजन। 38. इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विश्वविद्यालय का कोई अधिकारी या प्राधिकारी अपनी शक्तियों को अपने या उसके नियंत्रण में किसी अन्य अधिकारी या प्राधिकारी या व्यक्ति को इस शर्त के अधीन रहते हुए प्रत्यायोजित कर सकता है कि इस प्रकार प्रत्यायोजित शक्तियों के प्रयोग का संपूर्ण उत्तरदायित्व ऐसी शक्तियों का प्रत्यायोजन करने वाले अधिकारी या प्राधिकारी में निहित रहेगा।
बिमलेश तंवर, सचिव, हरियाणा सरकार, विधि तथा विधायी विभाग।
9817—L.R.—H.G.P., Pkl.