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Madhya Pradesh Gazette · Government of Madhya Pradesh

मध्‍यप्रदेश राष्‍ट्रीय विधि संस्थान विश्‍वविद्यालय विधेयक 2018

Published 25 June 2018

Department
विधान सभा सचिवालय
Type
Extraordinary
Gazette no.
325
Identifier
in.gazette.madhya.2018-06-25.325.Extraordinary
Languages
English, Hindi
Published at
Original source ↗

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मध्यप्रदेश शासन•

सत्यमेव जयते

मध्यप्रदेश राजपत्र

(असाधारण )

प्राधिकार से प्रकाशित

भोपाल, सोमवार , दिनांक 25 जून 2018- आषाढ़ 4, शक 1940

क्रमांक 325 ]

विधान सभा सचिवालय, मध्यप्रदेश

भोपाल, दिनांक 25 जून 2018

क्र. 13943 - वि.स. - विधान-2018 .-मध्यप्रदेश विधान सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन सम्बन्धी नियम 64 के उपबंधों के पालन में, मध्यप्रदेश राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय विधेयक, 2018 ( क्रमांक 6 सन् 2018 ) जो विधान सभा में दिनांक 25 जून 2018 को पुरःस्थापित हुआ है. जनसाधारण की सूचना के लिए प्रकाशित किया जाता है.

अवधेश प्रताप सिंह प्रमुख सचिव, मध्यप्रदेश विधान सभा.

649 मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

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मध्यप्रदेश विधेयक

क्रमांक ६ सन् २०१८

मध्यप्रदेश राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय विधेयक , २०१८

विषय-सूची

अध्याय- एक

प्रारंभिक

खण्ड :

१. संक्षिप्त नाम तथा प्रारम्भ.

२. परिभाषाएं.

अध्याय -दो

विश्वविद्यालय की स्थापना , उसके उद्देश्य तथा कृत्य

राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय की स्थापना तथा निगमन. ३.

४. विश्वविद्यालय के उद्देश्य.

५. विश्वविद्यालय की शक्तियां तथा उसके कृत्य.

६. अध्यापन और छात्रों का निवास तथा विश्वविद्यालय द्वारा विधि उपाधि , पत्रोपाधि आदि का प्रदान किया जाना.

अध्याय-तीन

कुलाध्यक्ष और कुलाधिपति की शक्तियां तथा कृत्य

७. कुलाध्यक्ष.

८. कुलाधिपति.

अध्याय- चार

विश्वविद्यालय के प्राधिकारीगण और उनकी शक्तियां तथा कृत्य

९. विश्वविद्यालय के प्राधिकारीगण.

१०. साधारण परिषद् और उसकी पदावधि.

११ . अध्यक्ष तथा सचिव.

१२. साधारण परिषद् की शक्तियां.

१३ . साधारण परिषद् का सम्मिलन.

१४. कार्य परिषद्‌

१५. कार्य परिषद् के सदस्य.

१६ . कार्य परिषद की पदावधि.

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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

१७ . कार्य परिषद् की शक्तियां तथा कृत्य.

१८ . स्थानों का आरक्षण.

१९. कार्य परिषद् का सम्मिलन .

२०. स्थायी समिति का गठन और तदर्थ समितियों की नियुक्ति.

२१. विद्या परिषद्.

२२. विद्या परिषद् की सदस्यता.

२३. विद्या परिषद् की शक्तियां तथा कर्तव्य.

२४. विद्या परिषद् के सम्मिलन.

२५. वित्त समिति.

अध्याय-पांच

विश्वविद्यालय के अधिकारीगण

२६. विश्वविद्यालय के अधिकारीगण .

अध्याय-छह

परिनियम, अध्यादेश और विनियम

परिनियम, अध्यादेश और विनियम. २७ .

कतिपय परिस्थितियों में विश्वविद्यालय के बेहतर प्रशासन के लिए विशेष उपबंध. २८.

कुलपति. २९ .

कुलपति की परिलब्धियां तथा सेवा की शर्तें , कुलपति की पदावधि तथा उसके पद में रिक्ति. ३०.

३१ . कुलपति की शक्तियां तथा कर्तव्य.

३२ . विभागाध्यक्ष.

३३ . कुलसचिव.

३४. चयन समिति

अध्याय-सात

पुनर्विलोकन आयोग

३५.. पुनर्विलोकन आयोग की नियुक्ति.

३६. भविष्य निधि एवं उपदान.

३७. विश्वविद्यालय की निधि.

३८ . प्रायोजित योजना तथा स्ववित्तीय योजना .

३९ . वार्षिक लेखें तथा संपरीक्षा.

४० . वित्तीय प्राक्कलन.

४१ . वार्षिक रिपोर्ट .

४२ . संविदाओं का निष्पादन .

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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४३ . मानद् उपाधियां.

४४. उपाधि या पत्रोपाधि का प्रत्याहरण .

४५. राज्य सरकार की निदेश देने की शक्तियां.

४६. संपत्ति का अंतरण.

४७. रिक्तियों के कारण प्राधिकारियों या निकायों की कार्यवाहियां अविधिमान्य नहीं होंगी.

अध्याय- आठ

विविध

४८. प्रारंभ पर कठिनाइयों का दूर किया जाना.

४९ . अस्थायी उपबंध.

५०. संरक्षण.

५१. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होगा.

५२. निरसन तथा व्यावृत्ति.

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मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

मध्यप्रदेश विधेयक

क्रमांक ६ सन् २०१८

मध्यप्रदेश राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय विधेयक , २०१८

विधिक शिक्षा के विकास और उन्नति के लिए और विधि के छात्रों तथा प्रशासनिक, न्यायिककल्प कृत्यों का निर्वहन और विधि पद्धति में गवेषणा करने वाले अधिकारियों को विशिष्ट और व्यवस्थित शिक्षण तथा प्रशिक्षण प्रदान करने के प्रयोजन के लिए और उससे संसक्त या उसके आनुषंगिक विषयों के लिये उपबंध करने हेतु मध्यप्रदेश राज्य के भोपाल में एक शिक्षण और आवासीय " राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय " स्थापित तथा निगमित करने से संबंधित विधि समेकित करने तथा संशोधित करने हेतु विधेयक.

भारत गणराज्य के उनहत्तरवें वर्ष में मध्यप्रदेश विधान- मण्डल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय- एक

प्रारंभिक

१. ( १ ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मध्यप्रदेश राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम , २०१८ है. संक्षिप्त नाम , तथा प्रारंभ.

(२ ) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जैसी कि राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे.

परिभाषाएं.

२. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) " विद्या परिषद्" से अभिप्रेत है , धारा २१ के निबंधनों के अनुसार गठित विश्वविद्यालय की विद्या परिषद्;

(ख) " भारतीय विधिज्ञ परिषद्" से अभिप्रेत है , अधिवक्ता अधिनियम, १ ९ ६१ ( १ ९ ६१ का २५ ) के अधीन गठित भारतीय विधिज्ञ परिषद्;

(ग) " कुलाधिपति" से अभिप्रेत है, धारा ८ के निबंधनों के अनुसार विश्वविद्यालय का कुलाधिपति;

(घ) " मुख्य न्यायमूर्ति " से अभिप्रेत है , मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति और इसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति सम्मिलित है;

(ङ) " कार्य परिषद्" से अभिप्रेत है, धारा १४ के निबंधनों के अनुसार गठित विश्वविद्यालय का कार्य परिषद्;

(च) " वित्त समिति " से अभिप्रेत है, धारा २५ के निबंधनों के अनुसार गठित विश्वविद्यालय की वित्त समिति;

(छ) " साधारण परिषद्" से अभिप्रेत है , धारा १० के निबंधनों के अनुसार गठित विश्वविद्यालय की साधारण परिषद्;

(ज) " विहित " से अभिप्रेत है, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए परिनियमों, अध्यादेशों अथवा विनियमों द्वारा विहित;

(झ) " कुलसचिव " मे अभिप्रेत है. धारा ३३ के निबंधनों के अनुसार नियुक्त विश्वविद्यालय का कुलसचिवः मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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(ञ) " राज्य विधिज्ञ परिषद्" से अभिप्रेत है, अधिवक्ता अधिनियम , १ ९ ६१ ( १ ९ ६१ का २५ ) के अधीन गठित मध्यप्रदेश विधिज्ञ परिषद्;

(ट) " राज्य सरकार " से अभिप्रेत है , मध्यप्रदेश शासन;

(ठ) " अध्यापक" से अभिप्रेत है, राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय द्वारा संचालित महाविद्यालय अथवा संस्थान में शिक्षा प्रदान करने और अनुसंधान संचालित करने के लिए विद्या परिषद् के अनुमोदन से नियुक्त आचार्य , सह- आचार्य , सहायक आचार्य, तथा ऐसे अन्य व्यक्ति चाहे वे किसी भी नाम से जाने जाते हों;

(ड) " विश्वविद्यालय " से अभिप्रेत है, राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम, १ ९९ ७ ( क्रमांक ४१ सन् १ ९९७ ) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय , भोपाल , जो इस अधिनियम द्वारा स्थापित तथा शासित समझा जाएगा;

(ढ) " कुलपति" से अभिप्रेत है, धारा २ ९ के निबंधनों के अनुसार नियुक्त विश्वविद्यालय का कुलपति; और

(ण) " कुलाध्यक्ष " से अभिप्रेत है, धारा ७ के निबंधनों के अनुसार पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष.

अध्याय-दो

विश्वविद्यालय की स्थापना, उसके उद्देश्य तथा कृत्य

३. ( १ ) राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम, १ ९९ ७ ( क्रमांक ४१ सन् १ ९९ ७ ) के अधीन " राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय " के नाम से स्थापित एक विश्वविद्यालय जो अब इस अधिनियम के निबंधनों के अनुसार शासित होता.

राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय की स्थापना तथा निगमन.

( २ ) विश्वविद्यालय , उपधारा ( १ ) में विनिर्दिष्ट नाम से निगमित निकाय होगा , जिसका शाश्वत् उत्तराधिकार होगा और सामान्य मुद्रा होगी . इसे जंगम तथा स्थावर दोनों सम्पत्ति अर्जित करने, धारण करने और व्ययन करने , संविदा करने की शक्ति होगी और वह उक्त नाम से वाद चलाएगा तथा उक्त नाम से उसके विरूद्ध वाद चलाया जाएगा.

(३ ) विश्वविद्यालय , भोपाल , मध्यप्रदेश में स्थापित होगा.

(४ ) विश्वविद्यालय द्वारा या उसके विरुद्ध समस्त वादों और अन्य विधिक कार्यवाहियों में अभिवचन कुलसचिव या इस प्रयोजन के लिये उसके द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि या उसके द्वारा नामनिर्देशित किसी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित तथा सत्यापित किए जाएंगे और ऐसे वादों तथा कार्यवाहियों में समस्त आदेशिकाएं कुल सचिव को जारी की जाएंगी और उस पर तामील की जाएंगी .

(५ ) राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम , १ ९९७ ( क्रमांक ४१ सन् १ ९९७ ) के निबंधनों के अनुसार अर्जित समस्त आस्तियां तथा दायित्व , जारी अधिसूचनाएं तथा आदेश और की गई कार्रवाईयां जारी रहेंगी , तथा समस्त आस्तियां तथा दायित्व विश्वविद्यालय में निहित होंगे और समस्त अधिसूचनाएं, आदेश तथा कार्रवाईयां , इस अधिनियम के अधीन जारी तथा की गई समझी जाएंगी .

४. विश्वविद्यालय के उद्देश्य निम्नलिखित होंगे .-

विश्वविद्यालय के उद्देश्य.

( एक) राष्ट्रीय विकास में इसकी समुचित भूमिका को सुनिश्चित करने की दृष्टि से उत्कृष्टता अर्जित करने के लिये सभी स्तरों पर दूरस्थ तथा सतत् विधिक शिक्षा के माध्यम से व्यापक विधिक शिक्षा, विद्या तथा ज्ञान की अभिवृद्धि करना , प्रसार करना और उसे प्रदान करना , छात्रों तथा अनुसंधानविद् में. वकालत, न्यायिक तथा अन्य विधिक सेवाओं. विधायन, विश्वि सुधार तथा सदृश विषय में , कौशल का विकास करके विधि के क्षेत्र में समाज की सेवा करना तथा वृत्तिक रीति में विधिक शिक्षा की अभिवृद्धि करनाः 650( 5)

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(दो) उच्च अध्ययन आयोजित करना और विधि की विभिन्न शाखाओं में अनुसंधान को बढ़ावा देना;

(तीन ) व्याख्यान , विचारगोष्ठी , परिसंवाद, कार्यशाला , सम्मेलन आदि का आयोजन करके विधिक ज्ञान तथा विधिक प्रक्रियाओं तथा राष्ट्रीय विकास में उनकी भूमिका का प्रसार करना;

(चार ) विधि सम्मत शासन को बढ़ावा देने तथा उसका पोषण करने की दृष्टि से सांस्कृतिक, विधिक तथा नैतिक मूल्यों तथा भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित उद्देश्यों को बढ़ावा देना;

(पाँच) लोक सरोकार के समसामयिक मुद्दों तथा उनकी विधिक विवक्षा के विश्लेषण की योग्यता में अभिवृद्धि करना;

(छह) भारत तथा विदेश में की उच्च शिक्षा तथा अनुसंधान संस्थाओं के साथ संपर्क करना;

(सात) विधि से संबंधित सभी विषयों पर नियतकालिक पत्रिकाएं, पुस्तकें , अध्ययन पुस्तिकाएं, रिपोर्ट, जनरल तथा अन्य साहित्य प्रकाशित करना.

(आठ) परीक्षाएं आयोजित करना तथा उपाधि , टाईटल्स, पत्रोपाधि अथवा प्रमाण - पत्र तथा अन्य विद्या संबंधी विशिष्टताएं प्रदान करना;

(नौ) सामाजिक तथा आर्थिक न्याय को प्राप्त करने के लिये समुदाय में विधिक जागरूकता को बढ़ावा देना;

(दस) न्यायिक अधिकारियों के लिये अनुसंधान , अध्ययन, कार्यशाला अथवा प्रशिक्षण तथा विधि, विधायन तथा न्यायिक संस्थाओं आदि के संबंधित प्रशिक्षण परियोजनाओं की जिम्मेदारी लेना;

(ग्यारह ) विधिक विषयों तथा सामाजिक महत्व पर प्रशासनिक अधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा अनुसंधान आयोजित करना; तथा

(बारह ) ऐसे समस्त कार्य करना जो विश्वविद्यालय के समस्त उद्देश्यों या उनमें से किसी भी उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये आनुषंगिक, आवश्यक या सहायक हों.

विश्वविद्यालय की शक्तियां तथा कृत्य.

५. विश्वविद्यालय की निम्नलिखित शक्तियां तथा कृत्य होंगे जो कि उसके द्वारा या उसके विभिन्न अधिकारियों तथा प्राधिकारियों के माध्यम से प्रयोग तथा पालन किए जाएंगे, अर्थात् :-

(एक) विश्वविद्यालय का और अध्ययन, गवेषणा , प्रशिक्षण, शिक्षा और शिक्षण के ऐसे केन्द्रों का, जो विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करने हेतु आवश्यक है , प्रशासन तथा प्रबंध करना;

(दो) विधि तथा सहबद्ध विषयों संबंधी ज्ञान या विद्या की ऐसी समस्त शाखाओं में, जैसी कि विश्वविद्यालय उचित समझे, शिक्षण का उपबंध करना;

(तीन ) बहिर्वर्ती अध्ययन तथा विस्तारी सेवाओं को आयोजित करना तथा उसकी जिम्मेदारी लेना;

(चार) गवेषणा , प्रशिक्षण तथा दूरस्थ विद्या तथा सतत् शिक्षा कार्यक्रम के माध्यम से विधि के ज्ञान की अभिवृद्धि तथा प्रसार के लिये उपबंध करना;

(पांच) ऐसी शर्तों के अध्ययीन रहते हुए जैसी कि विश्वविद्यालय विहित करे, परीक्षाएं आयोजित करना और व्यक्तियों को उपाधि, टाईटल्स, पत्रोपाधि, प्रमाण- पत्र तथा अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां प्रदान करना या प्रदत्त करना और ऐसी किन्हीं उपाधियों, टाईटल्स, पत्रोपाधि तथा अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियों का प्रत्याहरण करना;

(छह) यथा विहित फीस तथा अन्य प्रभार नियत करना, उनकी मांग करना और प्राप्त करना;

(सात) छात्र निवास ( हाल ) तथा छात्रावास स्थापित करना तथा बनाये रखना , तथा विश्वविद्यालय के छात्रों के निवास के लिये म्थानों को मान्यता देना और ऐसी मान्यता का प्रत्याहरण करना;

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(आठ) परिसर में ऐसी गवेषणा तथा शिक्षण के लिये जैसी विश्वविद्यालय की राय में उसके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिये आवश्यक हो विशेष केन्द्र , विशेषित अध्ययन केन्द्र या अन्य इकाइयां स्थापित करना;

(नौ) विश्वविद्यालय के छात्रों तथा कर्मचारिवृंद के अनुशासन को विनियमित करना तथा उनके स्वास्थ्य एवं व्यापक कल्याण के संवर्धन के लिए व्यवस्थाएं करना;

(दस) छात्रों, जिनमें महिला छात्र भी सम्मिलित हैं, के शिक्षण तथा निवास के संबंध में व्यवस्था करना;

(ग्यारह ) शैक्षणिक, तकनीकी, प्रशासनिक, लिपिकीय तथा अन्य पद सृजित करना और उन पर नियुक्ति करना;

(बारह ) विश्वविद्यालय के छात्रों, अध्यापक , कर्मचारिवृंद तथा अन्य कर्मचारियों में अनुशासन को बनाए रखना तथा विनियमित करना एवं लागू करना तथा ऐसे अनुशासनात्मक उपाय करना जैसे कि आवश्यक समझे जाएं;

(तेरह) विश्वविद्यालय द्वारा अपेक्षित आचार्य , सह आचार्य , सहायक आचार्य , और कोई अन्य अध्यापन , विद्या या गवेषणा पदों को संस्थित करना;

(चौदह ) विश्वविद्यालय के आचार्य , सह आचार्य, सहायक आचार्य , अनुसंधानकर्ता तथा अन्य कर्मचारियों के रूप में व्यक्तियों को नियुक्त करना;

(पन्द्रह) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, पुरस्कार तथा पदक संस्थित करना तथा प्रदान करना;

(सोलह) गवेषणा तथा अन्य कार्यों के मुद्रण , प्रत्युत्पादन तथा प्रकाशन के लिये उपबंध करना और प्रदर्शनियां आयोजित करना;

(सत्रह ) विधि, न्याय तथा सामाजिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों में गवेषणा को प्रायोजित करना तथा उसकी जिम्मेदारी लेना;

(अठारह ) ऐसे प्रयोजनों के लिये , जिन पर परस्पर सहमति हो, ऐसे निबंधनों तथा शर्तों पर जो कि विश्वविद्यालय समय- समय पर अवधारित करे, विधि, न्याय , सामाजिक विकास और सहबद्ध विषयों में शिक्षा, प्रशिक्षण तथा गवेषणा के मामले में किसी अन्य संस्था या संगठन के साथ सहयोग करना;

(उन्नीस ) अध्यापकों तथा विद्वानों के आदान- प्रदान द्वारा विश्वविद्यालय के पूर्णतः या अन्यथा सदृश उद्देश्यों वाली विश्वके किसी भी भाग की उच्च शिक्षा की संस्थाओं के साथ सहयोग करना और ऐसा सामान्यतः ऐसी रीति में करना जैसा कि विश्वविद्यालय के सामान्य उद्देश्यों के लिये सहायक हो;

(बीस) विश्वविद्यालय के व्ययों का विनियमन करना तथा उसके लेखाओं का प्रबंध करना;

(इक्कीस ) विश्वविद्यालय के परिसर के भीतर ऐसे विद्यापीठ, तथा अध्ययन कक्ष स्थापित करना तथा उनका अनुरक्षण करना जैसा कि विश्वविद्यालय आवश्यक समझे तथा उन्हें पर्याप्त रूप से सुसज्जित करना;

( बाईस ) ऐसे पुस्तकालयों तथा वाचनालयों को स्थापित करना तथा उनका अनुरक्षण करना जो कि विश्वविद्यालय के लिए सुविधापूर्ण अथवा आवश्यक प्रतीत हों;

(तेईस ) विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये अनुदान, आर्थिक सहायता, अभिदान , संदान तथा दान प्राप्त करना;

(चौबीस ) कोई ऐसी भूमि. भवन या संकर्म, जो विश्वविद्यालय के प्रयोजन के लिये आवश्यक या सुविधाजनक हो तथा ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर जो कि वह आवश्यक तथा उचित समझे, क्रय करना, पट्टे पर प्राप्त करना या दान के रूप में या अन्यथा स्वीकार करना और ऐसी किसी भूमि तथा भवन या संकर्म का सन्निर्माण करना या उसमें परिवर्तन करना और उसे बनाए रखना;

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(पच्चीस) विश्वविद्यालय की जंगम या स्थावर समस्त सम्पत्तियों या उनके किसी भाग को, ऐसे निबन्धनों तथा शर्तों पर , जो वह आवश्यक तथा उचित समझे तथा विश्वविद्यालय के हितों तथा कार्यकलापों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, विक्रय करना, विनिमय करना, पट्टे पर देना या उनका अन्यथा व्ययन करना;

(छब्बीस) वचन- पत्रों ( प्रामिसरी नोट ) , विनिमय- पत्रों, चैकों या अन्य परक्राम्य लिखतों का आहरण तथा प्रतिगृहीत करना, लिखना और पृष्ठांकन करना, बट्टा ( डिस्काउंट ) देना और परक्रामण ( नेगोशिएट ) करना;

(सत्ताईस) जंगम या स्थावर सम्पत्ति के संबंध में, जिसमें विश्वविद्यालय की या विश्वविद्यालय के प्रयोजन के लिये अर्जित की जाने वाली राज्य सरकार की प्रतिभूतियां ( गवर्नमेन्ट सिक्यूरिटीज ) सम्मिलित हैं, हस्तांतरण - पत्र , अन्तरण, पुनर्हस्तांतरण पत्र, बंधक, पट्टे, अनुज्ञप्तियां तथा करार निष्पादित करना;

(अट्ठाईस) विश्वविद्यालय की ओर से कोई लिखत निष्पादित करने या उसके विश्वविद्यालय के किसी कारबार का संचालन करने के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को जिसे वह उचित समझे, नियुक्त करना;

विश्वविद्यालय की किन्हीं कक्षाओं या विभागों को समाप्त करना या तथा उनका चलाना बंद करना; (उन्तीस)

केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या किसी अन्य प्राधिकारियों के साथ अनुदान प्राप्त करने के लिये कोई करार करना या सहभागिता करना; (तीस)

(इकत्तीस ) ऐसे निबंधनों तथा शर्तों पर जैसी कि समीचीन समझी जाएं, मुद्रा अनुदान ( ग्रान्ट्स ऑफ मनी ) , प्रतिभूतियां या किसी प्रकार या भांति की संपत्ति स्वीकार करना;

(बत्तीस) विश्वविद्यालय की समस्त या किन्हीं भी सम्पत्तियों या आस्तियों के आधार पर या उन पर आधारित बन्ध- पत्रों, बन्धकों, वचन- पत्रों या अन्य बाध्यताओं या प्रतिभूतियों पर या किन्ही प्रतिभूतियों के बिना और ऐसे निबन्धनों तथा शर्तों पर, जैसा कि वह उचित समझें, धन प्राप्त करना तथा उधार लेना और धन प्राप्त करने से आनुषंगिक समस्त व्ययों का भुगतान विश्वविद्यालय की निधियों में से करना और उधार लिये गये किसी धन या किए गए ऋण का प्रतिदाय तथा मोचन करना;कर

(तैंतीस) विश्वविद्यालय की निधियां या विश्वविद्यालय को सौपे गए धन , ऐसी प्रतिभूतियों या निक्षेपों में या पर तथा ऐसी रीति में, जो वह उचित समझे , विनिहित करना और किन्हीं विनिधानों का समय- समय पर अन्तर्विनिमय ( ट्रांस्पोज ) करना;

(चौंतीस) ऐसे परिनियम, अध्यादेश विनियम तथा अन्य लिखत बनाना, जो समय - समय पर विश्वविद्यालय तथा उसकी संपत्तियों के कार्यकलापों तथा प्रबंध का विनियमन करने के लिये आवश्यक समझे जाएं और उनमें परिवर्तन, उपान्तरण करना तथा उन्हें विखंडित करना;

(पैंतीस) विद्या संबंधी तकनीकी, प्रशासनिक और अन्य कर्मचारिवृन्द के फायदे के लिये, ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए जो कि विहित की जाएं, बीमा, भविष्य निधि, उपदान और अन्य योजनाएं जैसा कि वह उचित समझे , निधि गठित करना और विश्वविद्यालय के किन्हीं कर्मचारिवृन्द के फायदे के लिये ऐसा अनुदान देना जैसा कि वह उचित समझे और ऐसी संथाओं , संस्थाओं, निधियों और न्यासों के स्थापित किये जाने में सहायता करना , और उनका संवर्धन करना जो कि विश्वविद्यालय के कर्मचारिवृन्द तथा छात्रों के फायदे के लिये आशयित हों;

(छत्तीस) विनियमों में विहित रीति में, मानद उपाधियां तथा अन्य विशिष्टिताएं प्रदान करना;

(सैंतीस) अपनी समस्त या किन्हीं शक्तियों को कुलपति या किसी समिति या अपने निकाय के किसी एक या अधिक सदस्यों को या अपने अधिकारियों को प्रत्यायोजित करनाः

(अड़तीस) अध्यापन तथा गवेषणा के लिये विश्वविद्यालय की प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, संग्रहालयों तथा अन्य उपकरण को आयोजित करनाः मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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(उनतालीस ) अध्यापन विभागों, विद्या शाखा , अध्ययन केन्द्रों तथा सभा कक्षों को स्थापित करना , अनुरक्षण करना और प्रबंध करना;

(चालीस) ऐसे व्यक्तियों को जो विश्वविद्यालय में नामांकित नहीं हैं, ऐसे व्याख्यान तथा निदेश उपलब्ध कराना , तथा ऐसी पत्रोपाधियां तथा प्रमाण- पत्र प्रदान करना जैसा कि विश्वविद्यालय अवधारित करे;

( इकतालीस ) जनता के कमजोर वर्गों और विशिष्टतया अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक हितों को विशेष सावधानी से अग्रसर करना;

( बयालीस ) विश्वविद्यालय के अध्यापकों तथा पूर्व छात्रों को पुनश्चर्या तथा व्यवसाय पाठ्यक्रमों की सुविधाएं उपलब्ध कराना , जैसा कि विश्वविद्यालय उचित समझे;

(तैंतालीस ) अन्य विश्वविद्यालयों तथा प्राधिकारियों के साथ ऐसी रीति में तथा ऐसे प्रयोजनों के लिए जैसा कि विश्वविद्यालय अवधारित करे, सहकार तथा सहयोग करना;

(चवालीस ) निम्न के लिये उपबंध करनाः

पाठ्यक्रम अतिरिक्त अध्यापन तथा विस्तारी सेवाएं;

(क)

(ख) पत्राचार पाठ्यक्रम;

(ग) शारीरिक प्रशिक्षण;

खेल एवं एथलेटिक क्रियाकलाप;

(घ)

सामाजिक सेवा योजनाएं;

(ङ)

(च) उपाधि पत्र पाठ्यक्रम; तथा

(छ) प्रमाण- पत्र पाठ्यक्रम;

( पैंतालीस ) निम्नलिखित संस्थित करना तथा उसका प्रबंध करना :

सूचना ब्यूरो;

(क)

रोजगार ब्यूरो; तथा

(ख)

मुद्रण तथा प्रकाशन विभाग तथा अनुवाद ब्यूरो;

(ग)

(छियालीस ) विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिये मानक अवधारित करना, जिसमें परीक्षा , मूल्यांकन या परीक्षण का कोई अन्य तरीका सम्मिलित हो सकेगा;

(सैंतालीस ) महिला छात्रों के संबंध में विशेष व्यवस्थाएं करना, जैसा कि विश्वविद्यालय वांछनीय समझे;

(अड़तालीस) कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं व्यापक कल्याण के लिये व्यवस्थाएं करना;

(उनन्चास ) ऐसे समस्त अन्य कार्य तथा बातें करना, चाहे वह उपरोक्त शक्तियों के आनुषंगिक हों अथवा नहीं, जैसा कि विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करने के उद्देश्य से आवश्यक हों.

अध्यापन और छात्रों

का निवास तथा

६. ( १ ) उपाधि, पत्रोपाधि तथा प्रमाण पत्रों के संबंध में समस्त मान्यता प्राप्त अध्यापन, परिनियमों , अध्यादेशों और विनियमों के उपबंधों के अनुसार साधारण परिषद् के नियंत्रण के अधीन संचालित किया जाएगा.

विश्वविद्यालय द्वारा

विधि उपाधि,

पत्रोपाधि आदि का

प्रदान किया जाना.

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( २ ) पाठ्यक्रम तथा पाठ्यचर्या और ऐसा अध्यापन आयोजित करने के लिये उत्तरदायी प्राधिकारी ऐसे होंगे जैसा कि विहित किया जाए.

(३ ) विश्वविद्यालय के सभी छात्र विश्वविद्यालय द्वारा संधारित या मान्यता प्राप्त छात्रावास में या ऐसी शर्तों के अधीन, जैसी की विहित की जाएं, निवास करेंगे.

(४ ) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, विश्वविद्यालय , यथाविहित परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों के उपबंधों के निबंधनों के अनुसार इस अधिनियम के अधीन विधि उपाधियां, पत्रोपाधियां, प्रमाण पत्र और अन्य अकादमिक विशेषताओं और टाईटल्स प्रदान करने की शक्ति रखेगा.

अध्याय-तीन

कुलाध्यक्ष और कुलाधिपति की शक्तियां तथा कृत्य

कुलाध्यक्ष.

७. ( १ ) भारत के उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति या भारत के उच्चतम न्यायालय के पीठासीन न्यायमूर्तियों में से उसका नामनिर्देशिती, विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष ( विजिटर ) होगा.

( २ ) कुलाध्यक्ष , जब उपस्थित हो विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करेगा .

कुलाधिपति. ८: (१ ) मध्यप्रदेश के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति विश्वविद्यालय का कुलाधिपति होगा .

(२ ) कुलाधिपति, अधिनियम में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति करेगा.

(३ ) कुलाधिपति, कुलाध्यक्ष की अनुपस्थिति में, विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करेगा.

(४) कुलाधिपति साधारण सभा की बैठकों की अध्यक्षता करेगा .

(५ ) (क) कुलाधिपति की निम्नलिखित शक्तियां होंगी :-

(एक) इस अधियिनम के उपबंधों और परिनियमों विनियमों या अध्यादेशों के अधीन यथाअपेक्षित निदेश देना, कार्रवाई करना या अन्य कोई कार्य करना;

(दो) ऐसे व्यक्ति द्वारा , जैसा कि वह निदेश दे , विश्वविद्यालय या गवेषणा केन्द्रों, संभागीय केन्द्रों के किसी कार्य , कार्यकलाप या परीक्षा का निरीक्षण करवाना;

(तीन ) ऐसे मामलों में जहां खण्ड ( क ) के उप - खण्ड ( दो ) के अधीन निरीक्षण किया गया है कुलपति को अपने दृष्टिकोण या सलाह देना .

(ख ) जहां खण्ड ( क) के उपखण्ड ( दो ) के अधीन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ने निरीक्षण का आदेश दिया है, वहां विश्वविद्यालय ऐसे निरीक्षण में अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए, उसके अधिकारियों में से एक को प्रतिनियुक्त करेगा.

(ग) कुलाधिपति निरीक्षण का परिणाम तथा अपनी सलाह कुलपति को संसूचित करेगा.

(घ) खण्ड ( ग ) में संदर्भित परिणाम और सलाह कुलपति द्वारा कार्य परिषद् को अपनी टिप्पणियों के साथ ऐसी कार्रवाई के लिए, जैसी कि कार्य परिषद् द्वारा प्रस्तावित की जाए, संसूचित की जाएगी और इस प्रकार की गई कार्रवाई कुलपति के माध्यम से कुलाधिपति को संसूचित की जाएगी .

(ङ) जहां कार्य परिषद्, युक्तियुक्त समय के भीतर कुलाधिपति के समाधानप्रदरूप में कार्रवाई नहीं करती है , वहां कार्य परिषद्, द्वारा प्रस्तुत किए गए किसी स्पष्टीकरण अथवा किए गए अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात्, कुलाधिपति ऐसे निदेश जारी कर सकेगा जैसे कि वह उपयुक्त समझे और कार्य परिषद् ऐसे निदेशों का पालन करेगी.

( ६ ) कुलाधिपति. विश्वविद्यालय को ऐसी सलाह दे सकेगा जैसी कि वह उपयुक्त समझे.

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(७ ) किसी मामले में विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों या अधिकारियों के बीच विवाद की दशा में , जो अन्यथा सुलझाया नहीं जा सकता , कुलाधिपति का विनिश्चय अंतिम होगा.

(८ ) कुलाधिपति, विश्वविद्यालय के कार्यों के संबंध में विश्वविद्यालय को सलाह देने के लिए, जैसा और जब आवश्यक समझे , विधि और विधिक शिक्षा में विख्यात व्यक्ति या व्यक्तियों को आमंत्रित कर सकेगा.

अध्याय-चार

विश्वविद्यालय के प्राधिकारीगण और उनकी शक्तियां तथा कृत्य

९. विश्वविद्यालय के निम्नलिखित प्राधिकारीगण होंगे , अर्थात्:-

विश्वविद्यालय के प्राधिकारीगण.

(एक) साधारण परिषद्;

(दो) कार्य परिषद्;

(तीन ) विद्या परिषद्;

(चार) वित्त समिति; और

(पाँच) ऐसे अन्य प्राधिकारी जो परिनियमों द्वारा समय - समय पर गठित किए जाएं.

१०. ( १ ) विश्वविद्यालय की एक साधारण परिषद् होगी जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् : - साधारण परिषद् और उसकी पदावधि.

(एक) विश्वविद्यालय का कुलाधिपति;

(दो) मध्यप्रदेश सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग का भारसाधक मंत्री;

(तीन) मध्यप्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग का भारसाधक मंत्री;

(चार ) मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नामनिर्देशित किए गए मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीश जिनमें से एक मध्यप्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी का भारसाधक न्यायाधीश होगा;

(पांच ) मध्यप्रदेश सरकार का मुख्य सचिव या उसका नामनिर्देशिती;

(छह ) महाधिवक्ता, मध्यप्रेदश;

(सात ) मध्यप्रदेश सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग का प्रमुख सचिव;

(आठ ) मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग का अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव;

(नौ ) मध्यप्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग का प्रमुख सचिव;

(दस) मध्यप्रदेश राज्य विधिज्ञ परिषद् का अध्यक्ष या उसका नामनिर्देशिती;

(ग्यारह ) राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी भोपाल का निदेशक;

(बारह ) किसी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय का कुलपति जैसा कि कुलाधिपति द्वारा नामनिर्देशित किया जाए;

(तेरह ) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष या उसका नामनिर्देशिती;

(चौदह ) कुलाधिपति द्वारा नामनिर्देशित किए गए तीन विख्यात अधिवक्ता; और

(पन्द्रह ) विश्वविद्यालय का कुलपति.

( २ ) जहां कोई व्यक्ति उसके द्वारा धारित पट या नियुक्ति के कारण साधारण परिषद् का सदस्य हो जाता है वहां उसकी सदस्यता तब समाप्त हो जाएगी, जबकि यथास्थिति, उसक ऐसा पद धारण करना या उसकी ऐसी नियुक्ति समाप्त हो जाए.

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( ३ ) साधारण परिषद् के नामनिर्देशित सदस्यों की पदावधि तीन वर्ष होगी.

(४ ) साधारण परिषद् का कोई सदस्य उस दशा में सदस्य नहीं रह जाएगा यदि वह पद त्याग देता है या विकृत- चित्त या दिवालिया हो जाता है या वह नैतिक अधमता अंतर्वलित करने वाली किसी दाण्डिक अपराध के लिए सिद्धदोष ठहरा दिया जाता है. कुलपति से भिन्न कोई सदस्य, सदस्य नहीं रह जाएगा , यदि वह विश्वविद्यालय में पूर्णकालिक नियुक्ति स्वीकार कर लेता है या वह पदेन सदस्य न होकर भी कुलाधिपति से अनुमति प्राप्त किए बिना साधारण परिषद् के लगातार तीन सम्मिलनों में अनुपस्थित रहता है.

(५ ) पदेन सदस्य से भिन्न साधारण परिषद् का कोई सदस्य, कुलाधिपति को सम्बोधित पत्र द्वारा अपना पद त्याग सकेगा और ऐसा त्यागपत्र जैसे ही उसके द्वारा उसे स्वीकार कर लिया जाता है, प्रभावी हो जाएगा.

(६ ) साधारण परिषद् में नामनिर्देशित सदस्यों की कोई रिक्ति नामनिर्देशित प्राधिकारी द्वारा नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और रिक्ति की कालावधि के अवसान पर ऐसा नामनिर्देशन समाप्त माना जाएगा.

(७ ) राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम, १ ९९ ७ ( क्रमांक ४१ सन् १ ९९७ ) के अधीन साधारण परिषद् के लिए नामनिर्दिष्ट सदस्य उनकी पदावधि की शेष कालावधि के लिये शासी परिषद् के सदस्य के रूप में बने रहेंगे.

अध्यक्ष तथा सचिव.

११. (१ ) कुलाधिपति या उसका नामनिर्देशिती साधारण परिषद् का अध्यक्ष होगा.

(२ ) विश्वविद्यालय का कुलपति, साधारण परिषद् का सचिव होगा.

साधारण परिषद्की १२. ( १ ) साधारण परिषद् को निम्नलिखित शक्तियां होंगी , अर्थात्: -

शक्तियां.

(एक) धारा ५ में अधिकथित विश्वविद्यालय की शक्तियों का प्रयोग करना तथा कृत्यों का निर्वहन करना , सिवाय ऐसी शक्तियों के जो विश्वविद्यालय के किसी अन्य प्राधिकारी या अधिकारी को दी गई है .

समय - समय पर विश्वविद्यालय की व्यापक नीतियों तथा कार्यक्रमों का पुनर्विलोकन करना और विश्वविद्यालय के सुधार तथा विकास के लिये उपाय करना; (दो)

(तीन) वार्षिक रिपोर्ट , वित्तीय प्राक्कलन , वार्षिक लेखे और ऐसे लेखाओं की संपरीक्षा रिपोर्ट पर विचार करना और संकल्प पारित करना , जैसा कि उचित समझा जाए;

(चार) कुलपति या किसी समिति या उपसमिति या उसके किसी एक या अधिक सदस्यों को अपनी समस्त शक्तियों या उनमें से कोई शक्ति प्रत्यायोजित करना; और

(पांच ) ऐसे अन्य कृत्य करना जो विश्वविद्यालय के दक्ष कार्यकरण तथा प्रशासन के लिये वह आवश्यक समझे.

(२ ) साधारण परिषद्, विश्वविद्यालय की सर्वांगीण प्राधिकारी होगी और समय - समय पर विश्वविद्यालय की व्यापक नीतियां तथा कार्यक्रम तैयार करेगी और उनका पुनर्विलोकन करेगी तथा विश्वविद्यालय में सुधार तथा विकास के लिये उपाय सुझाएगी तथा उसके निम्नलिखित शक्तियां तथा कृत्य होंगे , अर्थात् : -

(एक) कार्य परिषद्, द्वारा तैयार किए गए वार्षिक रिपोर्ट , वित्तीय अभिकथन तथा बजट प्राक्कलन पर विचार करना और उन्हें पास करना तथा किन्हीं उपांतरणों के साथ या उनके बिना उन्हें अंगीकृत करना; और

(दो) विश्वविद्यालय के कार्यकलापों के प्रशासन से संबंधित परिनियम बनाना जिसमें विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों और अधिकारियों द्वारा उनके कृत्यों के निर्वहन में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया विहित हो, सम्मिलित होगी.

साधारण परिषद् का

सम्मिलन.

१३. ( १ ) साधारण परिषद् वर्ष में कम से कम एक बार सम्मिलन करेगी और उसके सम्मिलनों के लिए कम से कम पन्द्रह दिन की सूचना दी जाएगी .

( २ ) अध्यक्ष , सम्मिलन की अध्यक्षता करेंगे और उनकी अनुपस्थिति में उनका नामनिर्देशिती सम्मिलन की अध्यक्षता करेगा.

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(३ ) साधारण परिषद् के सदस्यों की कुल संख्या के एक तिहाई सदस्यों से सम्मिलन की गणपूर्ति होगी.

(४) प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार होगा और यदि साधारण परिषद् द्वारा अवधारित किए जाने वाले किसी प्रश्न पर बराबर - बराबर मत हैं तो अध्यक्ष या सम्मिलन की अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का , उसके अतिरिक्त एक निर्णायक मत होगा.

(५ ) यदि साधारण परिषद् द्वारा तुरन्त कार्रवाई की जाना आवश्यक हो तो अध्यक्ष , साधारण परिषद् के सदस्यों में कागज पत्रों के परिचालन द्वारा कामकाज का संचालन किया जाना अनुज्ञात कर सकेगा. की जाने के लिये प्रस्तावित कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि साधारण परिषद् के सदस्यों के बहुमत द्वारा उसकी सहमति नहीं दे दी जाती है . इस प्रकार की गई कार्रवाई की सूचना साधारण परिषद् के समस्त सदस्यों को तुरन्त दी जाएगी और संबंधित कागज- पत्र साधारण परिषद् के आगामी सम्मिलन में उसकी पुष्टि के लिये रखे जाएंगे .

( ६ ) विगत वर्ष के दौरान विश्वविद्यालय के कार्यकरण की एक रिपोर्ट और उसके साथ प्राप्तियों तथा व्यय का कथन, यथा संपरीक्षित तुलनपत्र और वित्तीय प्राक्कलन , कुलपति द्वारा उसके वार्षिक सम्मलिन में साधारण परिषद् के समक्ष रखे जाएंगे.

१४. ( १ ) कार्य परिषद् विश्वविद्यालय की मुख्य कार्यकारी निकाय होगी.

कार्य परिषद्,

( २ ) विश्वविद्यालय का प्रशासन , प्रबन्ध तथा नियंत्रण और उसकी आय कार्य परिषद् में निहित होगी जो विश्वविद्यालय की सम्पत्ति तथा निधियों को नियंत्रित और प्रशासित करेगी.

१५. ( १ ) कार्य परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे , अर्थात्:-

कार्य परिषद् के सदस्य.

(एक) कुलपति;

(दो) महाधिवक्ता, मध्यप्रदेश;

(तीन) मध्यप्रदेश सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग का प्रमुख सचिव;

(चार) मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग का अपर मुख्य सचिव;

(पांच ) मध्यप्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग का अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव;

(छह) राज्य विधिज्ञ परिषद् मध्यप्रदेश का अध्यक्ष;

(सात ) विश्वविद्यालय का छात्र कल्याण का संकायाध्यक्ष;

(आठ ) विश्वविद्यालय के दो पूर्णकालिक अध्यापक जो चक्रानुक्रम से ज्येष्ठता के आधार पर होंगे .

(नौ) विश्वविद्यालय का कुलसचिव, जो कार्यपरिषद् का सचिव होगा.

(२ ) कुलपति, कार्य परिषद् का अध्यक्ष होगा.

कार्य परिषद् की पदावधि.

१६. ( १ ) जहां कोई व्यक्ति उसके द्वारा धारित पद या नियुक्ति के कारण कार्य परिषद् का सदस्य हो जाता है वहां उसकी सदस्यता तब समाप्त हो जाएगी जबकि उसका ऐसा पद धारण करना या उसकी ऐसी नियुक्ति समाप्त हो जाए.

( २ ) कार्य परिषद् का कोई सदस्य उस दशा में सदस्य नहीं रह जाएगा यदि वह पद त्याग देता है या विकृत- चित्त या दिवालिया हो जाता है या नैतिक अधमता अन्तर्वलित करने वाले किसी दाण्डिक अपराध के लिये सिद्धदोष ठहरा दिया जाता है या यदि कुलपति या संकाय के किसी सदस्य से भिन्न कोई सदस्य विश्वविद्यालय में पूर्णकालिक नियुक्ति स्वीकार कर लेता है या यदि वह कार्य परिषद् के लगातार तीन सम्मिलनों में कार्य परिषद् के अध्यक्ष की अनुमति के बिना अनुपस्थित रहता है या विश्वविद्यालय के हितों के विरूद्ध कार्य करता है.

( ३ ) जब तक कि कार्य परिषद् के सदस्य के रूप में उनकी सदस्यता उपधारा ( १ ) या ( २ ) में यथा उपबन्धित किए गए अनुसार पूर्व में ही ममाप्त नहीं हो जाती है , कार्य परिषद् के सदस्य उस तारीख से. जिसको कि वे कार्य परिषद् के सदस्य हो जाते हैं. तीन वर्ष समाप्त हो जाने पर अपनी सदस्यता त्याग देंगे किन्तु वे यथास्थिति पुनर्नामनिर्देशन या पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र होंगे.

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(४) कार्य परिषद् के पदेन सदस्य से भिन्न कार्य परिषद् का कोई सदस्य कार्य परिषद् के अध्यक्ष को संबोधित पत्र द्वारा अपना पद त्याग सकेगा और ऐसा त्याग- पत्र, जैसे ही कार्य परिषद् के अध्यक्ष द्वारा उसे स्वीकार कर लिया जाता है , प्रभावी हो जाएगा.

(५ ) कार्य परिषद् में कोई रिक्ति उसे भरने के लिये हकदार संबंधित प्राधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति की यथास्थिति नियुक्ति या नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और रिक्ति की कालावधि समाप्त हो जाने पर ऐसी नियुक्ति या नामनिर्देशन प्रभावी नहीं रह जाएगा.

(६ ) राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम , १ ९९ ७ ( क्रमांक ४१ सन् १ ९९७ ) के अधीन कार्य परिषद् के लिए नामनिर्दिष्ट सदस्य उनकी पदावधि की शेष कालावधि के लिये कार्य परिषद् के सदस्य के रूप में बने रहेंगे .

कार्य परिषद् की शक्तियां तथा कृत्य.

१७. धारा १२ के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना , कार्य परिषद् की निम्नलिखित शक्तियां और कृत्य होंगे :-

(एक) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात् राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से विश्वविद्यालय में अध्यापन पदों को सृजित करना, समाप्त करना या वर्गीकृत करना और उनसे संलग्न अर्हताएं, उपलब्धियां तथा कर्तव्य अवधारित करना;

(दो) समय- समय पर कुलसचिव , पुस्तकालयाध्यक्ष , आचार्य , सह- आचार्य , सहायक आचार्य और अध्यापन कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य, जैसा कि आवश्यक हो, विनियमों द्वारा इस प्रयोजन के लिए गठित की गई चयन समिति की सिफारिशों पर नियुक्त करनाः

परन्तु-

(क) किसी अधिसंख्य पद ( सुपरन्यूमरी पोस्ट) , पर; या

उच्च विद्या संबंधी विशिष्टता, विख्यात तथा वृत्तिक कुशलता प्राप्त व्यक्ति की आचार्य के पद पर, (ख)

नियुक्ति करने के लिये कोई चयन समिति गठित करना आवश्यक नहीं होगी ;

(तीन ) राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से प्रशासनिक, लिपिकीय तथा अन्य आवश्यक पद सृजित करना , ऐसे पदों की न्यूनतम अर्हताएं तथा उनकी उपलब्धियां अवधारित करना;

(चार) विश्वविद्यालय के वित्त , लेखाओं, विनिधानों, संपत्ति, कामकाज और अन्य समस्त प्रशासनिक कार्यकलापों की व्यवस्था करना और विनियमित करना और ऐसे प्रयोजन के लिये ऐसे अभिकर्ता नियुक्त करना, जैसा कि वह उचित समझे;

( पांच ) विश्वविद्यालय के किसी धन का, जिसके अन्तर्गत कोई अनुपयोजित धन भी आता है, ऐसे स्टाक , निधियों, अंशों या प्रतिभूतियों में , जैसा कि वह समय - समय पर उचित समझे या भारत में स्थावर समप्ति के क्रय में विनिधान करना और ऐसे विनिधानों में इसी प्रकार की शक्ति के साथ समय - समय पर फेरफार करना;

(छह ) विश्वविद्यालय की ओर से किसी जंगम या स्थावर सम्पत्ति का अन्तरण करना या अन्तरण प्रतिगृहीत करना;

(सात) विश्वविद्यालय की ओर से संविदाएं करना, उनमें फेरफार करना , उसका कार्यान्वयन करना और उन्हें रद्द करना और उस प्रयोजन के लिये ऐसे अधिकारी नियुक्त करना, जैसा कि वह उचित समझे .

(आठ ) विश्वविद्यालय का कार्य क्रियान्वित करने के लिये आवश्यक भवन, परिसर, फर्नीचर तथा उपकरण और अन्य साधन की व्यवस्था करना;

(नौ) विश्वविद्यालय के ऐसे अधिकारियों, अध्यापकों, छात्रों और संस्थान के कर्मचारियों की जो कि किसी कारण से व्यथित अनुभव करते हैं , उनकी व्यथाएं ग्रहण करना, उन्हें न्यायनिर्णीत करना और उन्हें दूर करना:

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( दस ) विद्या परिषद् के परामर्श से परीक्षक तथा अनुसीमक ( मॉडरेटर ) नियुक्त करना, और यदि आवश्यक हो तो उन्हें हटाना और उनकी फीस , उपलब्धियां तथा यात्रा और अन्य भत्ते नियत करना;

(ग्यारह ) विश्वविद्यालय के लिये सामान्य मुद्रा का चयन करना और उस मुद्रा की अभिरक्षा की व्यवस्था करना;

(बारह ) अपनी शक्तियों में से किसी शक्ति को, सिवाय विनियम बनाने की शक्ति के, किसी अधिकारी या प्राधिकारी को या तो अस्थायीरूप से या स्थायीरूप से प्रत्यायोजित करना; और

(तेरह ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और ऐसे अन्य कर्त्तव्यों का निर्वहन करना जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उसे प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं.

स्थानों का आरक्षण.

१८. कार्य परिषद्, विनियम द्वारा मध्यप्रदेश राज्य के निवासियों, महिलाओं और अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के स्थानों के आरक्षण हेतु उपबंध कर सकेगीः

परन्तु ५० प्रतिशत स्थान ऐसे विद्यार्थियों के लिये आरक्षित रखे जाएंगे , जो मध्यप्रदेश के मूल निवासी हैं.

स्पष्टीकरण.- शब्द " अनुसूचित जातियों ", अनुसूचित जनजातियों " तथा " अन्य पिछड़े वर्गों " का वही अर्थ होगा जो मध्यप्रदेश लोक सेवा ( अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियो और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण ) अधिनियम १९९ ४ ( क्रमांक २१ सन् १ ९९ ४ ) में उनके लिए यथा समनुदेशित है.

९. ( १ ) कार्य परिषद् का सम्मिलन तीन माह में कम से कम एक बार होगा .

१

कार्य परिषद् का सम्मिलन.

(२ ) कार्य परिषद् का अध्यक्ष कार्य परिषद् के सम्मिलन की अध्यक्षता करेगा , और उसकी अनुपस्थिति में, उपस्थित सदस्य, सम्मिलन की अध्यक्षता करने के लिये अपने में से एक व्यक्ति को निर्वाचित करेंगे.

(३ ) कार्य परिषद् के सम्मिलन में उसके चार सदस्यों से गणपूर्ति होगी.

(४) कार्य परिषद् के प्रत्येक सदस्य का एक मत होगा और यदि कार्य परिषद् द्वारा अवधारित किए जाने वाले किसी प्रश्न पर बराबर - बराबर मत है तो कार्य परिषद् के अध्यक्ष को या यथास्थिति, अध्यक्षता करने वाले सदस्य का उसके अतिरिक्त , एक निर्णायक मत होगा.

( ५ ) यदि कार्य परिषद् द्वारा तुरन्त कार्रवाई की जाना आवश्यक हो तो कुलपति , कार्य परिषद् के सदस्यों में कागज- पत्रों के परिचालन द्वारा कामकाज का संचालन किया जाना अनुज्ञात कर सकेगा . प्रस्तावित कार्यवाही तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि कार्य परिषद् के सदस्यों के बहुमत द्वारा उसकी सहमति नहीं दे दी जाती है. इस प्रकार की गई कार्यवाही कार्य परिषद् के समस्त सदस्यों को तुरन्त दी जाएगी . संबंधित कागज पत्र कार्य परिषद् के आगामी सम्मिलन में उसकी पुष्टि के लिये रखे जाएंगे.

स्थायी समिति का गठन और तदर्थ समितियों नियुक्ति.

२०. ( १ ) इस अधियिनम के या इस संबंध में बनाए गए विनियमों के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए कार्य परिषद् संकल्प द्वारा , ऐसे प्रयोजनों के लिये तथा ऐसी शक्तियों सहित , जैसा कार्य परिषद् उचित समझे, विश्वविद्यालय की की किसी शक्ति का प्रयोग करने या किसी कृत्य का निर्वहन करने के लिये या विश्वविद्यालय से संबंधित किसी विषय में जांच करने, उस पर रिपोर्ट देने या सलाह देने के लिये स्थायी समिति गठित कर सकेगी.

( २ ) कार्य परिषद्, किसी स्थायी समिति या किसी तदर्थ समिति के लिये ऐसे व्यक्ति सहयोजित कर सकेगी जैसा कि वह उपयुक्त समझे और उन्हें कार्य परिषद् के सम्मिलनों में उपस्थित रहने के लिए अनुज्ञात कर सकेगी.

विद्या परिषद्,

२१. विद्या परिषद्, विश्वविद्यालय की विद्या संबंधी निकाय होगी और इस अधिनियम और विनियमों के उपबन्धों के अध्ययीन रहते हुए उसे विश्वविद्यालय के शिक्षण , शिक्षा और परीक्षा मानकों पर नियंत्रण तथा सामान्य विनियमन करने की शक्ति होगी और वह उन्हें बनाए रखने के लिये भी उत्तरदायी होगी और वह ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे अन्य कर्तव्यों का निर्वहन करेगी जो उसे इस अधिनियम या विनियमों द्वारा प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं. उसे यह अधिकार होगा कि वह समस्त विद्या संबंधी मामलों पर कार्य परिषद् को सलाह दे.

२२. ( १ ) विद्या परिषद्, में निम्नलिखित सदस्य होंगे , अर्थात् :-

विद्या परिषद् की सदस्यता.

(एक) कुलपति, जो उसका अध्यक्ष होगा;

(दो) विख्यात शिक्षाविद या साहित्यिक व्यक्ति ( मेन आफ लेटर्स ) या विद्वत वृत्तियों के सदस्यों या प्रख्यात सामाजिक व्यक्तियों में से तीन व्यक्ति जो विश्वविद्यालय की सेवा में नहीं हैं, साधारण परिषद् के परामर्श से अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे:

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(तीन) मध्यप्रदेश सरकार के विधि और विधायी कार्य विभाग का प्रमुख सचिव;

( चार ) मध्यप्रदेश राज्य विधिज्ञ परिषद् का एक नामनिर्देशिती;

(पाँच ) विश्वविद्यालय के समस्त विभागाध्यक्ष ;

(छह ) विभागाध्यक्षों से भिन्न समस्त आचार्य;

(सात) अध्यापन कर्मचारिवृन्द के दो सदस्य जो सह - आचार्यों का प्रतिनिधित्व करेंगे कुलाधिपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे.

(२ ) पदेन सदस्यों से भिन्न, सदस्यों की पदावधि तीन वर्ष होगी.

२३. इस अधिनियम के या विनियमों के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, विद्या परिषद् को उसमें विनिहित की गई अन्य समस्त शक्तियों के अतिरिक्त निम्नलिखित शक्तियां होंगी , अर्थात् :-

विद्या परिषद् की शक्तियां कर्तव्य. तथा (एक) साधारण परिषद् या कार्य परिषद् द्वारा उसे निर्दिष्ट या प्रत्यायोजित किसी विषय पर , रिपोर्ट करना;

(दो) विश्वविद्यालय में अध्यापन पदों के सृजन , समाप्ति या वर्गीकरण और उनसे सम्बद्ध अर्हताओं, उपलब्धियों तथा कर्तव्यों के संबंध में कार्य परिषद् को सिफारिशें करना;

(तीन) संकायों के गठन के लिये स्कीमें बनाना तथा उनको उपान्तरित करना या पुनरीक्षित करना और ऐसे संकायों को उनके अलग - अलग संबंधित विषय सौंपना और किसी संकाय को समाप्त या उपविभाजित करने या एक संकाय को दूसरे संकाय के साथ संयोजित करने की समीचीनता के संबंध में भी कार्य परिषद् को रिपोर्ट करना;

(चार) विश्वविद्यालय में नामांकित किए गए व्यक्तियों से भिन्न व्यक्तियों के शिक्षण तथा परीक्षा के लिये विनियमों के माध्यम से व्यवस्था करना;

(पांच ) विश्वविद्यालय के भीतर गवेषणा को प्रोन्नत करना और ऐसी गवेषणा पर, समय - समय पर , रिपोर्ट दिए जाने की अपेक्षा करना;

(छह ) संकायों द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्तावों पर विचार करना;

(सात) विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु समितियां नियुक्त करना;

(आठ) अन्य विश्वविद्यालयों तथा संस्थाओं के पत्रोपाधियों तथा उपाधियों को मान्यता देना और उनकी समतुल्यता विश्वविद्यालय के पत्रोपाधियों तथा उपाधियों के संबंध में अवधारित करना;

(नौ) साधारण परिषद् द्वारा स्वीकृत किन्हीं शर्तों के अध्यधीन रहते हुए अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति तथा अन्य पुरस्कारों के लिये प्रतियोगिता के समय , ढंग तथा शर्तें नियत करना तथा उन्हें प्रदान करना;

(दस) परीक्षकों की नियुक्ति तथा यदि आवश्यक हो तो उनके हटाए जाने और उनकी फीस , उपलब्धियां तथा यात्रा तथा अन्य व्यय नियत करने के बारे में कार्य परिषद् को सिफारिशें करना;

(ग्यारह ) परीक्षाएं संचालन करने हेतु व्यवस्था करना और उनके आयोजन के लिये तारीखें नियत करना;

( बारह ) विभिन्न परीक्षाओं के परिणाम घोषित करना या ऐसा करने के लिये समितियां या अधिकारी नियुक्त करना और उपाधियां , सम्मान, पत्रोपाधियां, अनुज्ञा पत्र ( लायसेंस ) , अभिधान ( टाईटल्स ) और सम्मान के प्रतीक प्रदान किए जाने के संबंध में सिफारिशें करना;

(तेरह ) वृत्तिका, छात्रवृत्ति, पदक तथा पुरस्कार देना और अन्य अवार्ड ( पुरस्कार ) जो विनियमों तथा ऐसी अन्य शर्तों के अनुसार देना जो अवार्ड ( पुरस्कार ) से सम्बद्ध की जाए, प्रदान करना;

( चौदह ) विहित की गई या सिफारिश की गई पाठ्य पुस्तकों की सूची प्रकाशित करना और विहित किए गए अध्ययन पाठ्य- विवरण प्रकाशित करनाः

( पन्द्रह ) ऐसे प्ररूप तथा रजिस्टर तैयार करना जो विनियमों द्वारा समय समय पर , विहित किए जाएं, और मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

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(सोलह ) विद्या संबंधी मामलों के संबंध में समस्त ऐसे कर्तव्यों का पालन करना और ऐसे समस्त कार्य करना जो इस अधिनियम तथा विनियमों के उपबंधों के उचित कार्यान्वयन के लिए आवश्यक हैं.

२४. ( १ ) विद्या परिषद्, उतनी बार, जितनी कि आवश्यक हो, सम्मिलन करेगी किन्तु किसी एक शैक्षणिक वर्ष के दौरान कम से कम दो बार सम्मिलन करेगी.

विद्या परिषद् के सम्मिलन.

(२ ) विद्या परिषद् का अध्यक्ष , विद्या परिषद् के सम्मिलन की अध्यक्षता करेगा और उसकी अनुपस्थिति में सम्मिलन की अध्यक्षता करने के लिए उपस्थित सदस्य अपने में से एक व्यक्ति को निर्वाचित करेंगे .

(३ ) विद्या परिषद् के सम्मिलन के लिए विद्या परिषद् के सदस्यों की कुल संख्या के आधे सदस्यों से गणपूर्ति होगी .

(४ ) विद्या परिषद् के प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार होगा और यदि विद्या परिषद् द्वारा अवधारित किए जाने वाले किसी प्रश्न पर बराबर- बराबर मत है तो विद्या परिषद् के अध्यक्ष को यथास्थिति, सम्मिलन की अध्यक्षता करने वाले सदस्य को, उसके अतिरिक्त, एक निर्णायक मत होगा.

( ५ ) यदि विद्या परिषद् द्वारा तुरन्त कार्रवाई की जाना आवश्यक हो जाता है तो कुलपति , विद्या परिषद्, के सदस्य में कागज पत्रों के परिचालन द्वारा कामकाज का संचालन किया जाना अनुज्ञात कर सकेगा, की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि इस पर विद्या परिषद् के सदस्यों के बहुमत द्वारा उसकी सहमति नहीं दे दी जाती है , इस प्रकार की गई कार्रवाई की संसूचना विद्या परिषद् के समस्त सदस्यों को तुरन्त दी जाएगी , संबंधित कागज - पत्र विद्या परिषद् के आगामी सम्मिलन में उसकी पुष्टि के लिए रखे जाएंगे.

वित्त समिति.

२५. (१ ) एक वित्त समिति होगी जिसमें निम्नलिखित होंगे , अर्थात्ः-

(एक) कुलपति;

(दो ) एक सदस्य, जो कार्य परिषद् द्वारा अपने सदस्यों में से नामनिर्देशित किया जाएगा;

(तीन) मध्यप्रदेश शासन के वित्त विभाग और उच्च शिक्षा विभाग के ( उप सचिव से अनिम्न पद श्रेणी ) एक- एक अधिकारी जो राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे;

(चार) एक सदस्य जो साधारण परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा.

(२ ) वित्त समिति के सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे .

(३ ) वित्त समिति की शक्तियां, कर्तव्य तथा कृत्य निम्नानुसार होंगे , अर्थात्ः-

(एक ) विश्वविद्यालय के वार्षिक बजट का परीक्षण और समीक्षा करना और वित्तीय मामलों में कार्य परिषद् को सिफारिशें करना;

(दो ) नवीन व्ययों के लिए समस्त प्रस्तावों पर विचार करना और कार्य परिषद् को सिफारिश करना;

(तीन ) लेखाओं के नियतकालिक विवरणों पर विचार करना और विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति का समय- समय पर पुनर्विलोकन करना, पुनर्विनयोजन विवरणों तथा संपरीक्षा रिपोर्टों पर विचार करना, कार्य परिषद् को सिफारिश करना;

(चार ) विश्वविद्यालय पर प्रभाव डालने वाले वित्तीय विषय पर या तो स्वप्रेरणा से या कार्य परिषद् या कुलपति द्वारा निदेश किये जाने पर अपने विचार प्रस्तुत करना और कार्य परिषद् को सिफारिशें करना;

(४ ) वित्त समिति छह मास में कम से कम एक बार अपने सम्मिलन करेगी , वित्त समिति के तीन सदस्यों से गणपूर्ति होगी .

(५ ) कुलपति, वित्त समिति के सम्मिलनों की अध्यक्षता करेगा तथा उसकी अनुपस्थिति में सम्मिलन की अध्यक्षता करने के लिए, उपस्थिति सदस्य अपने में से एक व्यक्ति को निर्वाचित करेंगे .

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अध्याय- पांच

विश्वविद्यालय के अधिकारीगण

२६. विश्वविद्यालय के निम्नलिखित अधिकारी होंगे , अर्थात्ः-

विश्वविद्यालय के अधिकारीगण.

(एक ) कुलाधिपति;

(दो) कुलपति;

(तीन) संकायों के संकायाध्यक्ष;

(चार) कुलसचिव;

(पांच ) परीक्षा नियंत्रक;

(छह) छात्र कल्याण का संकायाध्यक्ष; और

(सात ) विश्वविद्यालय की सेवा में के ऐसे अन्य अधिकारी जैसे की विश्वविद्यालय के अधिकारी होने के लिए परिनियमों द्वारा घोषित किए जाएं.

अध्याय- छह

परिनियम, अध्यादेश और विनियम

२७. ( १ ) परिनियम-

परिनियम , अध्यादेश और विनियम.

(क) विश्वविद्यालय के परिनियम कार्य परिषद् द्वारा तैयार किए जाएंगे और इसमें विश्वविद्यालय के विभिन्न निकायों के गठन तथा कृत्यों के उपबंध, नियुक्तियां तथा नियुक्तियों के निबंधन, विश्वविद्यालय के विभिन्न पदधारियों की सेवा शर्तें तथा शक्तियां और विश्वविद्यालयों की निधि का गठन तथा उसका अभिनियोजन समाविष्ट होंगे .

(ख) परिनियम, विश्वविद्यालय के समस्त प्राधिकारियों, अधिकारियों, अध्यापकों तथा कर्मचारियों और विश्वविद्यालय से संबंधित व्यक्तियों पर बाध्यकारी होंगे .

(ग ) प्रत्येक नया परिनियम या परिनियम में कुछ जोड़ा जाना या कोई संशोधन या परिनियम का निरसन , साधारण परिषद् के अनुमोदन से किया जाएगा.

(२ ) अध्यादेश-

(क) इस अधिनियम और समय- समय पर यथा संशोधित परिनियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, विश्वविद्यालय के अध्यादेश निम्नलिखित समस्त या उनमें से किसी एक विषय के लिए कार्यपरिषद् द्वारा बनाए जा सकेंगे, अर्थात्:-

(एक ) पाठ्यक्रम , विद्यार्थियों के प्रवेश , शुल्क , उपाधि, पत्रोपाधि या प्रमाण- पत्र के लिए अपेक्षित अर्हताएं तथा अध्येतावृत्ति प्रदान करना;

(दो) परीक्षा का संचालन जिसमें परीक्षकों की नियुक्ति तथा उनके निबंधन तथा शर्तें सम्मिलित हैं; और

(तीन) परिनियमों द्वारा अपेक्षित कोई अन्य मामला विश्वविद्यालय के अध्यादेशों द्वारा निराकृत किया जाएगा.

(ख ) विश्वविद्यालय में प्रवेश या इसकी परीक्षाएं, पाठ्यक्रम परीक्षाओं की स्कीम, परीक्षकों की उपस्थिति और नियुक्ति संबंधी किसी अध्यादेश पर कार्य परिषद् द्वारा तब तक विचार नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसे अध्यादेश का प्रारूप विद्या परिषद् द्वारा प्रस्तावित नहीं किया जाता..

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(ग ) कार्य परिषद्, विद्या परिषद् द्वारा प्रस्तावित अध्यादेश के प्रारूप को तब तक संशोधित नहीं करेगी जब तक कि विद्या परिषद् उक्त संशोधन पर स्वीकृति नहीं दे देती किन्तु कार्य परिषद् को विद्या परिषद् के प्रारूप को, पुनर्विचार के लिए या तो पूर्णतः या अशंतः , किन्हीं संशोधनों के साथ जो कि कार्य परिषद् द्वारा सुझाए जाएं, रद्द करने या वापस करने की शक्ति होगी.

(घ ) कार्य परिषद् द्वारा बनाए गए अध्यादेश के प्रारूप , साधारण परिषद् को प्रस्तुत किए जाएंगे और साधारण परिषद् द्वारा उसके आगामी सम्मिलन में विचार किया जाएगा और उस दिनांक को प्रवृत्त होंगे जिसको साधारण परिषद् संकल्प द्वारा उन्हें अनुमोदित कर दें.

(ङ) साधारण परिषद् को, उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई से अन्यून के बहुमत द्वारा पारित संकल्प द्वारा, कार्य परिषद् द्वारा बनाए गए ऐसे प्रस्तावित अध्यादेश को अनुमोदित , उपांतरित या विखंडित करने की शक्ति होगी . ऐसे अध्यादेश साधारण परिषद् के अनुमोदन के पश्चात् प्रवृत्त होंगे.

(३ ) विनियम-

(क) इन अध्यादेशों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, कार्य परिषद् को उसमें विनिहित की गई अन्य समस्त शक्तियों के अतिरिक्त, विश्वविद्यालय के कार्यकलापों के प्रशासन तथा प्रबंध के लिए उपबंध करने हेतु विनियम बनाने की शक्ति भी होगी:

परन्तु कार्य परिषद् ऐसा कोई विनियम जो विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी की हैसियत , शक्तियों का उसके गठन को प्रभावित करता है तब तक नहीं बनाएगी जब तक कि ऐसे प्राधिकारी को प्रस्तावित तब्दीलियों पर लिखित में राय अभिव्यक्त करने का एक अवसर नहीं दे दिया गया है और इस प्रकार अभिव्यक्त की गई किसी राय पर कार्य परिषद् द्वारा विचार किया जाएगाः परन्तु यह और भी कि कार्य परिषद् निम्नलिखित समस्त या किन्हीं विषयों पर प्रभाव डालने वाला कोई विनियम विद्या परिषद् की पूर्व सहमति के बिना नहीं बनाएगी , और न ही उसे संशोधित या निरसित करेगी , अर्थात्ः-

(एक) विद्या परिषद् का गठन, उसकी शक्तियां तथा कर्तव्य;

(दो ) विश्वविद्यालय के संबंध में अध्यापन पाठ्यक्रम तथा विद्या संबंधी कार्यक्रमों को आयोजित करने के लिए जिम्मेदार प्राधिकारी;

(तीन) उपाधियों, पत्रोपाधियों, प्रमाण- पत्रों और विद्या संबंधी अन्य विशिष्टताओं का प्रत्याहरण;

(चार) संकायों, विभागों , सभागृहों तथा संस्थाओं की स्थापना और उनका समाप्त किया जाना;

( पांच ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, छात्र- सहायतावृत्तियां , पदक और पारितोषिक संस्थितकरना;

(छह) परीक्षकों की नियुक्ति की शर्तें तथा ढंग या परीक्षाओं या अन्य अध्ययन पाठ्यक्रमों का संचालन या उसके मानक;

(सात) छात्रों के नामांकन या प्रवेश का ढंग;

(आठ) अन्य परीक्षाओं को विश्वविद्यालय की परीक्षाओं के समतुल्य मान्यता प्रदान करना.

(ख ) विद्या परिषद् को यह शक्ति होगी कि वह खण्ड ( क) के द्वितीय परन्तुक के खण्ड ( एक ) से (आठ) तक में विनिर्दिष्ट समस्त मामलों पर और उससे संसक्त या आनुषंगिक मामलों पर विनियम प्रस्तावित करे:

( ग ) जहां विद्या परिषद् द्वारा प्रस्तावित किसी विनियम का प्रारूप कार्य परिषद् ने नामंजूर कर दिया हो , वहाँ विद्या परिषद्, कुलाधिपति को अपील कर सकेगी और कुलाधिपति, आदेश द्वारा , यह निदेश दे सकेगा कि प्रस्तावित विनियम. साधारण परिषद् के आगामी सम्मिलन के समक्ष उसके अनुमोदन के लिए रखे और साधारण परिषद् का ऐसा अनुमोदन लंबित रहने तक वह विनियम ऐसी तारीख से जो ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, प्रभावी होगा:

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परन्तु ऐसे विनियम को यदि साधारण परिषद् के ऐसे सम्मिलन में अनुमोदित नहीं किया जाता है तो वह प्रभावी नहीं रह जायेगा.

(घ) कार्य परिषद् द्वारा बनाए गए समस्त विनियम साधारण परिषद् के समक्ष उसके आगामी सम्मिलन में प्रस्तुत किए जाएंगे और साधारण परिषद् को यह शक्ति होगी कि वह कार्य परिषद् द्वारा बनाए गए किसी विनियम को संशोधित या रद्द कर देः

परन्तु ऐसे विनियम , जहां तक कि वे धारा ३६ में प्रगणित किए गए अनुसार भविष्य निधि तथा उपदान , साधारण परिषद् द्वारा अनुमोदन के पश्चात् ही प्रवृत्त होंगे .

कतिपय परिस्थितियों में विश्वविद्यालय के बेहतर प्रशासन के लिए विशेष उपबंध.

२८. ( १ ) यदि कुलाधिपति का किसी रिपोर्ट के प्राप्त होने पर या अन्यथा यह समाधान हो जाए कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें विश्वविद्यालय का प्रशासन छात्रों के हितों का अपाय किए बिना , इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता और यह कि ऐसा करना विश्वविद्यालय के हित में समीचीन है , तो वह अधिसूचना द्वारा , उसमें वर्णित किए जाने वाले कारणों से यह निदेश दे सकेगा कि धारा १० से २४ तक तथा उपधारा ( २ ) , ( ३ ) , ( ४ ) और ( ५ ) के उपबंध अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की गई तारीख से ( जो इसमें इसके पश्चात् इस धारा में नियत तारीख के रूप में निर्दिष्ट है ) विश्वविद्यालय को लागू होंगे.

(२ ) उपधारा ( १ ) के अधीन जारी की गई अधिसूचना ( जो इसमें इसके पश्चात् अधिसूचना के नाम से निर्दिष्ट है ) , नियत तारीख से एक वर्ष की कालावधि तक के लिए प्रवर्तन में रहेगी और कुलाधिपति, समय- समय पर, उस कालावधि में ऐसी और कालावधि की वृद्धि, जैसा कि वह उचित समझे , इस प्रकार कर सकेगा कि अधिसूचना के प्रवर्तित रहने की कुल कालावधि तीन वर्ष से अधिक न हो.

( ३ ) कुलाधिपति, अधिसूचना के जारी होने के साथ - साथ कुलपति को नियुक्त करेगा जो अधिसूचना के प्रवर्तन में रहने की कालावधि के दौरान पद धारण करेगा;

परन्तु कुलपति, अधिसूचना के प्रवर्तन की कालावधि का अवसान होने पर भी तब तक पद धारण किए रह सकेगा, जब तक कि उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण न कर ले, किन्तु यह कालावधि एक वर्ष से अधिक नहीं होगी.

(४) नियत तारीख से निम्नलिखित परिणाम होंगे:-

(एक) कुलपति, जो नियत तारीख के अव्यवहित पूर्व पदधारण करता है , इस बात के होते हुए भी कि उसकी पदावधि का अवसान नहीं हुआ है, पद पर नहीं रह जाएगा .

(दो ) प्रत्येक व्यक्ति जो नियत तारीख के अव्यवहित पूर्व यथास्थिति कार्य परिषद् या विद्या परिषद् के सदस्य के रूप में पद धारण किए हुए हो, उस पद पर नहीं रह जाएगा;

(तीन ) जब तक यथास्थिति , कार्य परिषद् या विद्या परिषद् का पुनर्गठन न हो जाए तब तक उपधारा (३ ) के अधीन नियुक्त किया गया कुलपति, उन शक्तियों का प्रयोग करेगा तथा उन कर्तव्यों का पालन करेगा, जो कि कार्य परिषद् या विद्या परिषद् को इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त की गई हों या उन पर अधिरोपित किए गए हों:

परन्तु कुलाधिपति यदि वह ऐसा करना आवश्यक समझे, तो इस प्रकार नियुक्त किए गए कुलपति को ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने में तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करने में सहायता देने के लिए ऐसी समिति की नियुक्ति कर सकेगा, जिसमें कि एक शिक्षाविद्, एक प्रशासनिक विशेषज्ञ तथा एक वित्त विशेषज्ञ होंगे .

(५ ) अधिसूचना के प्रवर्तन की कालावधि का अवसान होने के पूर्व या उसके अव्यवहित पश्चात् यथासाध्यशीघ्र , कुलपति , अधिनियम के उपबंधों के अनुसार कार्य परिषद् तथा विद्या परिषद् का गठन करने के लिए कार्रवाई करेगा और इस प्रकार गठित की गई कार्य परिषद् तथा विद्या परिषद्, अधिसूचना के प्रवर्तन की कालावधि का अवसान होने की तारीख के अव्यवहित पश्चात् आने वाली तारीख को या उस तारीख को , जिसको कि संबंधित निकायों का इस प्रकार गठन हो जाए, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, कार्य करने प्रारंभ कर देगीः

परन्तु यदि कार्य परिषद्, तथा विद्या परिषद्, अधिसूचना के प्रवर्तन की कालावधि का अवसान होने के पूर्व गठित न हो जाए तो कुलपति . ऐसा अवसान हो जाने पर, इन प्राधिकारियों में से प्रत्येक प्राधिकारी की शक्तियों का प्रयोग. कुलाधिपति के पूर्व अनुमोदन के अध्यधीन रहते हुए उस समय तक करेंगा, जब तक कि यथास्थिति कार्य परिषद् या विद्या परिषद् का इस प्रकार गठन न हो जाए.

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कुलपति.

२९ . ( १ ) कुलाधिपति द्वारा कुलपति की नियुक्ति चयन समिति की अनुशंसाओं पर की जाएगीः परन्तु राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम, १ ९९७ ( क्रमांक ४१ सन् १ ९९ ७ ) के अधीन नियुक्ति की प्रक्रिया पूर्व में गठित चयन समिति की अनुशंसाओं के आधार पर जारी रहेगी , विश्वविद्यालय का कुलपति , ऐसे निबंधन और शर्तों पर जैसी कि विनिर्दिष्ट की जाएं, कुलाधिपति द्वारा , आदेश द्वारा नियुक्त किया जाएगा.

( २ ) कुलपति, विधि के क्षेत्र में विख्यात शिक्षाविद जिसके पास विश्वविद्यालय प्रणाली में विधि के आचार्य के रूप में न्यूनतम १० वर्षों का अनुभव हो या प्रख्यात न्यायविद जो जिला न्यायाधीश से निम्न श्रेणी का न हो या कोई प्रशासक, जो भारत सरकार के सचिव से निम्न श्रेणी का न हो, और जो ७० वर्ष की आयु से अधिक का नहीं होगा, कुलाधिपति द्वारा उसकी नियुक्ति, उपधारा ( ३ ) तथा ( ७ ) के अधीन गठित चयन समिति द्वारा अनुशंसित तीन व्यक्तियों से अनिम्न व्यक्तियों के पेनल में से की जाएगी:

परन्तु यदि चयन समिति द्वारा अनुशंसित किए गए व्यक्तियों में से कुलाधिपति द्वारा अनुमोदित किए गए व्यक्ति या व्यक्तिगण नियुक्ति स्वीकार करने के इच्छुक नहीं हैं तो कुलाधिपति ऐसी समिति से नई अनुशंसाएं मंगा सकेगा.

(३ ) कुलाधिपति एक चयन समिति नियुक्त करेगा , जिसमें निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात्ः- (एक) कार्य परिषद् द्वारा निर्वाचित किया गया एक व्यक्ति;

(दो) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया गया एक व्यक्ति;

(तीन ) कुलाधिपति द्वारा विख्यात विद्वान या न्यायविद के साथ ही मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय या मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश में से नामनिर्दिष्ट एक व्यक्ति,

कुलाधिपति इन तीन व्यक्तियों में से एक को समिति का अध्यक्ष नियुक्त करेगा.

(४) उपधारा ( ३ ) के अधीन समिति गठित करने के लिए कुलाधिपति, कुलपति की अवधि का अवसान होने के छह मास पूर्व , कार्य परिषद् तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष कोअपने-अपने नामनिर्देशितियों को चुनने के लिए अपेक्षा करेगा और यदि उनमें से कोई एक या दोनों इस बारे में कुलाधिपति की संसूचना प्राप्त होने के एक मास के भीतर ऐसा करने में असफल रहते हैं , तो कुलाधिपति, यथास्थिति, किसी एक या दोनों व्यक्तियों को आगे नामनिर्दिष्ट कर सकेगा .

( ५) किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जो विश्वविद्यालय का कर्मचारी हो, उपधारा ( ३ ) के अधीन गठित समिति के लिए निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट नहीं किया जाएगा.

(६) समिति अपने गठन की तारीख से छह सप्ताह के भीतर या चार सप्ताह से अनधिक ऐसे और समय के भीतर, जो कि कुलाधिपति द्वारा बढ़ाया जाए, तालिका ( पेनल ) प्रस्तुत करेगी.

(७ ) यदि किसी कारण से उपधारा ( ३ ) के अधीन गठित की गई समिति उपधारा ( ६ ) में विनिर्दिष्ट की गई कालावधि के भीतर तालिका ( पेनल ) प्रस्तुत करने में असफल रहे , तो कुलाधिपति एक अन्य समिति गठित करेगा जिसमें ऐसे तीन व्यक्ति होंगे , जो विश्वविद्यालय से संसक्त न हों, जिनमें से एक को अध्यक्ष के रूप में पदाभिहित किया जाएगा और इस प्रकार गठित की गई समिति, अपने गठन की तारीख से छह सप्ताह की कालावधि के भीतर या ऐसी लघुतर कालावधि, जैसी कि विनिर्दिष्ट की जाए, के भीतर तीन व्यक्तियों की तालिका (पेनल) प्रस्तुत करेगी .

( ८ ) यदि उपधारा ( ७ ) के अधीन गठित समिति, उसमें विनिर्दिष्ट की गई कालावधि के भीतर तालिका (पेनल) प्रस्तुत करने में असफल रहे , तो कुलाधिपति किसी भी ऐसे व्यक्ति को. जिसे वह उपयुक्त समझे , कुलपति नियुक्त कर सकेगा.

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३०. ( १ ) कुलपति, विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा और उसकी परिलब्धियां एवं सेवा के अन्य निबंधन तथा शर्तें परिनियमों द्वारा विहित की जाएंगी.

(२ ) कुलपति पांच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा और वह दो से अधिक पदावधियों के लिए नियुक्ति का पात्र नहीं होगाः

कुलपति की परिलब्धियां तथा सेवा की शर्तें , की पदावधि तथा उसके पद में रिक्ति. कुलपति परंतु उसकी अवधि का अवसान हो जाने पर भी, वह पद पर तब तक बना रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी नियुक्त न कर दिया जाए और वह अपना पद ग्रहण न कर ले, किन्तु यह कालावधि किसी भी दशा में छह मास से अधिक नहीं होगी.

(३ ) यदि किसी समय अभ्यावेदन किया जाने पर या अन्यथा और ऐसी जांच , जो कि आवश्यक समझी जाए, करने के पश्चात् कुलाधिपति को यह प्रतीत हो कि कुलपति ने-

(एक) इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उस पर अधिरोपित किए गए किसी कर्तव्य का पालन करने में व्यतिक्रम किया है ; या

(दो ) विश्वविद्यालय के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली रीति में कार्य किया है; या

(तीन) विश्वविद्यालय के कार्यकलापों का प्रबंध करने में असमर्थ है,

तो कुलाधिपति, इस तथ्य के होते हुए भी कि कुलपति की पदावधि का अवसान नहीं हुआ है, लिखित आदेश द्वारा जिसमें कारणों का विवरण रहेगा, कुलपति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसी तारीख से, जो कि आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, अपना पद त्याग दे.

(४ ) उपधारा ( ३ ) के अधीन कोई आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि उन आधारों की विशिष्टियां, जिन पर कि ऐसी कार्रवाई का किया जाना प्रस्तावित है, कुलपति को संसूचित नहीं कर दी गई हों तथा उसे प्रस्तावित आदेश के विरुद्ध कारण दर्शाने का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया है.

(५) उपधारा ( ३ ) के अधीन आदेश में विनिर्दिष्ट की गई तारीख से यह समझा जाएगा कि कुलपति ने पद त्याग दिया है और कुलपति का पद रिक्त हो जाएगा.

(६ ) कुलपति की मृत्यु, उसके पदत्याग , छुट्टी, रूग्णता या अन्य कारण से उसका पद रिक्त होने की दशा में जिसमें अस्थायी रिक्ति भी सम्मिलित है , तो कुलाधिपति द्वारा उस प्रयोजन के लिए नामनिर्देशित किया गया किसी भी संकाय का संकायाध्यक्ष या विश्वविद्यालय के अध्यापन विभाग का वरिष्ठतम आचार्य, कुलपति के रूप में उस तारीख तक कार्य करेगा जब तक कि धारा २ ९ की उपधारा ( १ ) या उपधारा ( ८ ) के अधीन नियुक्त किया गया कुलपति अपना पद यथास्थिति, ग्रहण या पुनःग्रहण न कर लेः

परन्तु इस उपधारा के अधीन अनुध्यात किया गया इंतजाम छह मास से अधिक की कालावधि के लिए निरन्तर नहीं रहेगा.

कुलपति की शक्तियां तथा कर्तव्य.

३१. ( १ ) कुलपति, विश्वविद्यालय का प्रधान प्रशासनिक तथा विद्या विषयक अधिकारी होगा और वह कार्य परिषद् का तथा विद्या परिषद् का पदेन सदस्य एवं अध्यक्ष होगा तथा विश्वविद्यालय के ऐसे अन्य प्राधिकारियों, समितियों तथा निकायों का, जिनका कि वह सदस्य है, अध्यक्ष होगा . वह विश्वविद्यालय के किसी भी प्राधिकारी समिति या अन्य निकाय के किसी सम्मिलन में उपस्थित होने तथा बोलने का हकदार होगा, किन्तु वह उसमें मत देने का तब तक हकदार नहीं होगा जब तक कि वह संबंधित प्राधिकारी , समिति या निकाय का सदस्य न हो.

(२ ) यह सुनिश्चित करना कुलपति का कर्तव्य होगा कि इस अधिनियम तथा परिनियमों का निष्ठापूर्वक अनुपालन किया जाता है और उसे इस प्रयोजन के लिए समस्त आवश्यक शक्तियां प्राप्त होंगी.

(३ ) कुलपति को कार्य परिषद्, विद्या परिषद् के तथा विश्वविद्यालय के ऐसे अन्य प्राधिकारियों, समितियों तथा निकायों के, जिनका कि वह अध्यक्ष है, सम्मिलन बुलाने की शक्ति होगी. वह विश्वविद्यालय के किसी अन्य अधिकारी को यह शक्ति प्रत्यायोजित कर सकेगा.

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(४) यदि कुलपति की राय में कोई ऐसी आपात स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें तुरन्त कार्रवाई की जाना अपेक्षित है तो कुलपति ऐसी कार्रवाई करेगा जैसी कि वह आवश्यक समझे और तत्पश्चात् यथाशीघ्र , अपनी कार्रवाई की रिपोर्ट ऐसे अधिकारी , प्राधिकारी , समिति या अन्य निकाय को करेगा , जो कि साधारण अनुक्रम में उस मामले के संबंध में कार्रवाई करताः

परन्तु कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई से विश्वविद्यालय तीन मास से अधिक कालावधि के लिए किसी भी आवर्ती व्यय हेतु वचनबद्ध नहीं होगाः

परन्तु यह और कि जहां कुलपति द्वारा की गई ऐसी कोई कार्रवाई विश्वविद्यालय की सेवा में के किसी व्यक्ति पर प्रभाव डालती है वहां ऐसा व्यक्ति, उस तारीख से, जिसको कि उसे ऐसी कार्रवाई की संसूचना दी गई है , तीस दिन के भीतर कार्य परिषद् को अपील प्रस्तुत करने का हकदार होगा:

परन्तु यह भी कि इस शक्ति का विस्तार विनियमों में संशोधन या नियुक्तियों से संबंधित किसी मामले पर नहीं होगा.

(५) उपधारा ( ४ ) के अधीन रिपोर्ट प्राप्त होने पर, यदि संबंधित प्राधिकारी , समिति या निकाय, कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई का अनुमोदन नहीं करता है, तो वह मामले को कुलाधिपति को निर्दिष्ट करेगा जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा.

(६ ) उपधारा ( ४ ) के अधीन कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई समुचित प्राधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई समझी जाएगी जब तक कि वह उपधारा ( ५ ) के अधीन दिए गए निर्देश के प्राप्त होने पर कुलाधिपति द्वारा अपास्त नहीं कर दी गई है या उपधारा ( ४ ) के द्वितीय परंतुक के अधीन अपील किए जाने पर कार्य परिषद् द्वारा अपास्त नहीं कर दी गई है.

(७ ) यदि कुलपति की राय में विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी , समिति या अन्य निकाय की किसी भी कार्यवाही से विश्वविद्यालय के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना संभाव्य है, तो वह अपने कारण अभिलिखित करेगा तथा मामला कुलाधिपति को निर्दिष्ट करेगा और तद्नुसार उसकी इत्तिला संबंधित प्राधिकारी, समिति या अन्य निकाय को भी देगा जिस पर संबंधित विनिश्चय तब तक प्रभावशील नहीं किया जाएगा जब तक कि मामला कुलाधिपति द्वारा विनिश्चित नहीं कर दिया जाता है.

(८ ) कुलपति, विश्वविद्यालय के कार्यकलापों पर सामान्य नियंत्रण रखेगा और विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों के विनिश्चयों को प्रभावशील करेगा .

( ९ ) विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच अनुशासन बनाए रखने के लिए कुलपति अंतिम प्राधिकारी होगा. इस हेतु उसके निर्देश विभागाध्यक्षों, छात्रावासों तथा संस्थाओं के प्रमुखों द्वारा क्रियान्वित किए जाएंगे.

(१० ) उपधारा ( ९ ) में अन्तर्विष्ठ किसी बात के होते हुए भी, किसी छात्र को किसी परीक्षा से, विवर्जित करने या विश्वविद्यालय या छात्रावास या संस्था से निष्कासित करने का दण्ड, कुलपति के प्रतिवेदन पर कार्य परिषद् के द्वारा विचारित एवं अधिरोपित किया जाएगाः

परंतु ऐसा कोई दण्ड, संबंधित छात्र को उसके विरुद्ध की जाने वाली प्रस्तावित कार्रवाई के विरुद्ध, सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिए बिना अधिरोपित नहीं किया जाएगा.

(११ ) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ठ किसी बात के होते हुए भी , कुलपति को छात्रों का पाठ्यक्रम प्रदान करने हेतु संविदा आधार पर उच्च अकादमिक विशिष्टता , श्रेष्ठ तथा व्यावसायिक उपलब्धियों वाले व्यक्ति को अध्यापक के रूप में, जैसा कि वह उचित समझे. संलग्न करने की शक्ति होगी.

(१२ ) विश्वविद्यालय के कुलपति का यह कत्र्तव्य होगा कि इस अधिनियम के प्रारंभ होने की तारीख से दो वर्ष की कालावधि के भीतर इस अधिनियम, परिनियमों , अध्यादेशों तथा विनियमों के निबंधनों के अनुसार विश्वविद्यालय की कार्य परिषद्, विद्या परिषद् तथा अन्य प्राधिकारियों का गठन करे तथा उक्त प्राधिकारियों का गठन किए जाने तक, राष्ट्रीय विधि संम्थान विश्वविद्यालय अधिनियम, १ ९९७ ( क्रमांक ४१ सन् १ ९९ ७ ) के अधीन बनाए गए विनियम प्रवृत्त बने रहेंगे.

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(१३ ) कुलपति ऐसी अन्य शक्तियों विनियमों द्वारा जैसी कि विहित की जाएं, प्रयोग करेगा.

३२. ( १ ) विश्वविद्यालय में प्रत्येक विभाग के लिए एक विभागाध्यक्ष होगा .

विभागाध्यक्ष.

( २ ) विभागाध्यक्ष की शक्तियां , कृत्य, नियुक्ति तथा सेवा की शर्तें वहीं होगी जैसी कि विनियमों द्वारा विहित की जाएं.

कुलसचिव.

३३. ( १ ) कुलसचिव , विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक अधिकारी होगा.

(२ ) कुलसचिव , कार्य परिषद् द्वारा, कुलाधिपति का अनुमोदन प्राप्त करने के पश्चात् आचार्यों, सह- आचार्यों, राज्य प्रशासनिक सेवा, राज्य विश्वविद्यालय सेवा या मध्यप्रदेश उच्च न्यायिक सेवा के संवर्ग में से नियुक्त किया जाएगा.

(३ ) कुलसचिव की पदावधि तथा सेवा - शर्तें ऐसी होंगी , जैसी कि विनियमों द्वारा विहित की जाए.

(४) कुलसचिव, कार्य परिषद्, विद्या परिषद्, वित्त समिति तथा संकायों का पदेन सचिव हेगा.

(५ ) कुलसचिव, -

(एक) कार्य परिषद् तथा कुलपति के समस्त निदेशों और आदेशों का पालन करेगा;

(दो) विश्वविद्यालय के अभिलेखों, सामान्य मुद्रा और ऐसी अन्य सम्पत्तियों का, जो कि कार्य परिषद् उसके सुपुर्द करे, अभिरक्षक होगा;

(तीन ) किसी आपात स्थिति में जबकि कुलपति और सम्यकरूप से प्राधिकृत अधिकारी दोनों ही कार्य करने में समर्थ नहीं हैं तो वह तुरन्त कार्य परिषद् का सम्मिलन बुलाएगा और विश्वविद्यालय का कार्य करने हेतु उसके निदेश प्राप्त करेगा;

(चार ) अपने कर्तव्यों और कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए कुलपति के प्रति सीधे ही उत्तरदायी होगा;

( पांच ) विश्वविद्यालय द्वारा या उसके विरुद्ध वादों या कार्यवाहियों में विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करेगा, मुख्तारनामें पर हस्ताक्षर करेगा और अभिवचनों को सत्यापित करेगा या इस प्रयोजन के लिए प्रतिनिधियों को प्रतिनियुक्त करेगा; और

(छह) ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो कार्य परिषद् या कुलपति द्वारा , समय- समय पर उसे समनुदेशित किए जाएं.

( ६) कुलसचिव का पद किसी कारण से रिक्त रहने की दशा में कुलपति, विश्वविद्यालय की सेवा में किसी अधिकारी को कुलसचिव की ऐसी शक्तियों, कृत्यों तथा कर्तव्यों का जैसा कि कुलपति उचित समझे , प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा .

परन्तु ऐसा कोई व्यक्ति छह मास से अधिक की कालावधि के लिए पद धारण नहीं करेगा .

३४. ( १ ) कार्य परिषद्, विश्वविद्यालय में आचार्यों, सह -आचार्यों तथा अन्य अध्यापकों के पद पर नियुक्ति करने के लिए कार्य परिषद् को सिफारिशें करने हेतु एक चयन समिति गठित करेगी. चयन समिति.

( २ ) चयन समिति में निम्नलिखित सदस्य होंगे:-

( एक) कुलपति या कुलाधिपति का नामनिर्देशिती. जो समिति का अध्यक्ष होगा;

( दो) संबंधित विभाग का विभागाध्यक्ष परन्तु वह उस पद से , जिस पद के लिए चयन किया जाना है, निम्न पद धारण नहीं करता होः मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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(तीन ) आचार्यों , सह - आचार्यों तथा सहायक आचार्यों का चयन करने के लिए तीन विशेषज्ञ , जो विद्या परिषद् द्वारा सिफारिश की गयी तथा कार्य परिषद् द्वारा अनुमोदित की गई नामों की तालिका में से कुलपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे .

(३ ) चयन समिति का सम्मिलन, जब कभी आवश्यक हो, कुलपति द्वारा बुलाया जाएगा . तीन सदस्यों से गणपूर्ति होगी.

अध्याय-सात

पुनर्विलोकन आयोग

३५. ( १ ) कुलाधिपति , प्रत्येक पांच वर्ष में कम से कम एक बार विश्वविद्यालय के कार्यकरण का पुनर्विलोकन करने और उस पर अपनी सिफारिशों करने के लिए एक आयोग गठित करेगा.

पुनर्विलोकन आयोग कीनियुक्ति.

(२ ) आयोग में कम से कम तीन प्रख्यात शिक्षाविद् होंगे जिनमें से एक ऐसे आयोग का अध्यक्ष होगा जो कुलाधिपति द्वारा राज्य सरकार के परामर्श से नियुक्त किया जाएगा.

( ३ ) सदस्यों की नियुक्ति के निबंधन तथा शर्तें ऐसी होंगी जैसी कि कुलाधिपति अवधारित करे .

(४) आयोग , ऐसी जांच करने के पश्चात् जैसी कि वह उचित समझे, अपनी सिफारिशें कुलाधिपति को करेगा;

परन्तु पुनर्विलोकन समिति के लिए यह आज्ञापक होगा कि कुलाधिपति को कोई अभ्यावेदन करने के पूर्व प्रत्येक बैच या वर्ष के विद्यार्थियों से पृथक् पृथक् चर्चा करे या उनके विचार जाने.

(५ ) कुलाधिपति ऐसी सिफारिशों पर ऐसी कार्रवाई कर सकेगा जैसी कि वह उचित समझे.

भविष्य निधि एवं उपदान.

३६. विश्वविद्यालय के समस्त स्थायी कर्मचारी , ऐसे विनियमों के अनुसार, जो इस निमित्त बनाए जाएं, भविष्य निधि तथा उपदान के फायदे के लिए हकदार होंगे .

३७. ( १ ) विश्वविद्यालय के लिए, एक विश्वविद्यालय निधि होगी जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित होंगे , - विश्वविद्याल की निधि.

( एक) राज्य सरकार द्वारा दिया गया कोई अभिदाय या अनुदान;

(दो) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या केन्द्र सरकार द्वारा दिए गया कोई अभिदाय या अनुदान;

(तीन) किसी राज्य के राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा दिया गया कोई अभिदाय;

(चार) कोई वसीयत , दान , विन्यास ( एण्डाउमेण्ट्स) या अन्य अनुदान जो गैर सरकारी व्यक्तिों या संस्थाओं द्वारा किए गए हैं ;

(पांच ) विश्वविद्यालय द्वारा फीस तथा प्रभारों से प्राप्त आय; और

(छह) किसी अन्य स्त्रोत से प्राप्त रकमें.

(२) राज्य सरकार , अपने बजट में विश्वविद्यालय के लिए वार्षिक अनुदान उपलब्ध कराएगी .

(३ ) उक्त निधि में क़ी रकम. भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, १ ९ ३४ ( १ ९ ३४ का २ ) में यथा परिभाषित किसी अनुसूचित बैंक में रखी जाएगी या ऐसी प्रतिभूतियों में विनिहित की जा सकेगी जो कि भारतीय न्यास अधिनियम, १८८२ ( १८८२ का २ ) द्वारा प्राधिकृत की गई है जैसा कि कार्य परिषद् द्वारा विनिश्चिय किया जाए.

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650 (25) (४) उक्त निधि विश्वविद्यालय के ऐसे प्रयोजन के लिए और ऐसी रीति में उपयोग की जा सकेगी जैसा विनियमों द्वारा विहित किया जाए.

प्रायोजित योजना तथा स्ववित्तीय योजना.

३८. ( १ ) जब कभी भी विश्वविद्यालय , किसी सरकार से, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या योजना को प्रायोजित करने वाली किसी अन्य एजेंसी से कोई निधि प्राप्त करता है जो विश्वविद्यालय द्वारा निष्पादित की जानी है, इस अधिनियम या विनियमों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी-

(एक) प्राप्त रकम विश्वविद्यालय द्वारा विश्वविद्यालय निधि से पृथक् रखी जाएगी और केवल योजना- के प्रयोजन के लिए ही उपयोजित की जाएगी; और

(दो) योजना के निष्पादन के लिए अपेक्षित कर्मचारिवृंद, प्रायोजित संस्थान ( संगठन ) द्वारा अधिकथित निबंधनों तथा शर्तों के अनुसार भर्ती किए जाएंगेः

परन्तु ऐसे कोई कर्मचारिवृंद चाहे शैक्षणिक या गैर - शैक्षणिक को उक्त योजना के पूर्ण हो जाने के पश्चात् नियमित विश्वविद्यालय कर्मचारी के रूप में आमेलित होने नियुक्त होने का तब तक अधिकार नहीं होगा, जब तक कि विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्ति के प्रारंभिक प्रक्रम में स्पांसरशिप की शर्तों पर आधारित , ऐसा कोई अभिव्यक्त वचन ( कमिटमेंट ) न किया हो.

( २ ) विश्वविद्यालय की स्ववित्तीय योजना ऐसी रीति में संचालित की जाएगी जैसी कि विनियमों द्वारा विहित की जाए.

३ ९. ( १ ) विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे , कार्य परिषद् के निदेशों के अधीन तैयार किए जाएंगे .

वार्षिक लेखे तथा संपरीक्षा.

( २) विश्वविद्यालय के लेखाओं की संपरीक्षा कार्य परिषद् द्वारा नियुक्त संपरीक्षकों द्वारा एक वर्ष में कम से कम एक बार की जाएगी:

परन्तु जब कभी आवश्यक समझा जाए, राज्य सरकार को यह निदेश देने की शक्ति होगी कि विश्वविद्यालय के और उसके साथ ऐसी संस्थाओं के, जिनका प्रबंध उसके द्वारा किया जाता है, लेखाओं की संपरीक्षा ऐसे संपरीक्षकों द्वारा , जिन्हें वह विनिर्दिष्ट करें, कराई जाए.

(३ ) लेखे, जब उनकी संपरीक्षा कर ली जाए, कार्य परिषद द्वारा प्रकाशित किए जाएंगे और लेखाओं की और उसके साथ , संपरीक्षा रिपोर्ट की एक- एक प्रति साधारण परिषद् के समक्ष रखी जाएगी और राज्य सरकार को भी प्रस्तुत की जाएगी.

(४) वार्षिक लेखाओं पर, साधारण परिषद् द्वारा अपने वार्षिक सम्मिलन में विचार किया जाएगा. साधारण परिषद् उनके संदर्भ में संकल्प पारित कर सकेगी और उसे कार्य परिषद् को संसूचित करेगी. कार्य परिषद्, साधारण परिषद् द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करेगी और उन पर ऐसी कार्रवाई करेगी जैसी कि वह उचित समझे. कार्य परिषद् उसके द्वारा की गई समस्त कार्रवाई या कार्रवाई न किये जाने के कारणों की जानकारी साधारण परिषद् को उसके आगामी सम्मिलन में देगी.

वित्तीय प्राक्कलन.

४०. (१ ) कार्य परिषद् ऐसी तारीख के पूर्व , जो विनियमों द्वारा विहित की जाए, आगामी वर्ष के लिए वित्तीय प्राक्कलन तैयार करेगी और उन्हें साधारण परिषद् के समक्ष रखेगी.

( २ ) कार्य परिषद् उस दशा में जहां ऐसी रकम से जिसका बजट में प्रावधान किया गया है अधिक व्यय किया जाना है या अत्यावश्यकता की दशा में व्यय किया जाता है , लिखित में अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से और विनियमों में विनिदिष्ट निर्बंधनों तथा शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, व्यय कर सकेगी जहां ऐसे अधिक व्यय के संबंध में बजट में कोई प्रावधान नहीं किए गए हैं वहां एक रिपोर्ट साधारण परिषद् को उसके आगामी सम्मिलन में की जाएगी.

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650 (26)

वार्षिक रिपोर्ट . ४१. ( १ ) कार्य परिषद् एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी जिसमें ऐसी विशिष्टयां होंगी जो विहित की जाएं या जिसे साधारण परिषद् अपने संकल्प द्वारा विनिर्दिष्ट करे और कार्य परिषद् उसके अनुसार वार्षिक लेखों और संपरीक्षा में कार्रवाई करेगी. की गई कार्रवाई साधारण परिषद् को संसूचित की जाएगी.

( २ ) वार्षिक रिपोर्ट की प्रतियां और उसके साथ साधारण परिषद् का संकल्प , राज्य सरकार को प्रस्तुत किया जाएगा. राज्य सरकार उसे यथाशक्य शीघ्र राज्य विधानसभा के पटल पर रखवाएगी.

संविदाओं निष्पादन. का

४२. विश्वविद्यालय के प्रबंध तथा प्रशासन से संबंधित समस्त संविदाएं, जिनका मूल्य एक निश्चित राशि से अधिक है, जैसा कि विनियमों द्वारा विहित किया जाए , कुलपति द्वारा निष्पादित की जाएगी और विहित मूल्य से कम की शेष संविदाएं कुलसचिव द्वारा निष्पादित की जाएंगी.

मानद्उपाधियां.

४३. यदि विद्या परिषद् के सदस्यों में से कम से कम दो तिहाई सदस्य सिफारिश करें कि किसी व्यक्ति को इस आधार पर कि वह विशिष्ट उपलब्धियों तथा हैसियत के कारण उनकी राय में ऐसी उपाधि या विद्या संबंधी विशिष्टता प्राप्त करने के लिए उपयुक्त या उचित व्यक्ति है, सम्मानद् उपाधि या विद्या संबंधी विशिष्टता प्रदान की जाए तो साधारण परिषद् संकल्प द्वारा यह विनिश्चिय कर सकेगी कि सिफारिश किए गए व्यक्ति को ऐसी सम्मानद् उपाधि या विद्या संबंधी विशिष्टता प्रदान की जाए.

उपाधि या पत्रोपाधि का प्रत्याहरण.

४४. ( १ ) कार्य परिषद् विद्या परिषद की सिफारिश पर , कार्य परिषद के कुल सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित संकल्प द्वारा प्रदान की गई या दी गई किसी विशिष्टता , उपाधि, पत्रोपाधि या विशेषाधिकार को प्रत्याहृत कर सकेगी.

(२ ) किसी व्यक्ति के विरुद्ध इस धारा के अधीन कोई कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि उस व्यक्ति को, की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई के विरुद्ध कारण दर्शाने का अवसर प्रदान नहीं कर दिया है.

(३ ) कार्य परिषद् द्वारा पारित संकल्प की एक प्रति संबंधित व्यक्ति को तुरंत भेजी जाएगी .

(४ ) कार्य परिषद् द्वारा किए गए विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे संकल्प की प्राप्ति की तारीख से ३० दिन के भीतर कुलाधिपति को अपील कर सकेगा.

(५) ऐसी अपील में कुलाधिपति का विनिश्चिय अंतिम होगा.

४५. राज्य सरकार को आपवादिक परिस्थितियों में विश्वविद्यालय के प्रशासन तथा प्रबंधन से संबंधित मामलों में विश्वविद्यालयों को निदेश देने की शक्ति होगी .

राज्य सरकार की निदेश देने की शक्तियां.

संपत्ति का अंतरण.

४६. राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए विश्वविद्यालय को भवन, भूमि या कोई अन्य संपत्ति, चाहे वह जंगम हो या स्थावर, विश्वविद्यालय द्वारा उसके उपयोग और प्रबंध किये जाने के लिए ऐसी शर्तों पर और सीमाओं के अध्यधीन रहते हुए जैसा कि राज्य सरकार उचित समझे, अंतरित कर सकेगी .

४७. (१ ) इस बात के होते हुए भी कि साधारण परिषद्, कार्य परिषद्, विद्या परिषद् या विश्वविद्यालय के किसी अन्य प्राधिकारी या निकाय का गठन सम्यक् रूप से नहीं हुआ है या किसी समय इसके गठन या पुनर्गठन में कोई त्रुटि है और इस बात के होते हुए भी कि विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी , समिति या निकाय का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि-

रिक्तियों के कारण प्राधिकारियों या निकायों की कार्यवाहि यां अविधिमान्य नहीं होंगी.

(क) उसके गठन में कोर्ड रिक्ति या त्रुटि है: या 650 (27)

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(ख ) उसके सदस्य के रूप में कार्य कर रहे किसी व्यक्ति के निर्वाचन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या

(ग ) उसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है.

( २ ) विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या निकाय का कोई संकल्प इस कारण अविधिमान्य नहीं समझा जाएगा कि उसके किसी सदस्य पर सूचना की तामील में कोई अनियमितता हुई है बशर्तें ऐसा प्राधिकारी या निकाय की कार्यवाहियां ऐसी अनियमितता के कारण प्रतिकूलतः प्रभावित नहीं हुई हों.

अध्याय- आठ

विविध

प्रारंभ पर कठिनाईयों कादूर किया जाना.

४८. यदि विश्वविद्यालय के कार्यकलापों के संक्रमण के संबंध में या विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी के सम्मिलन के संबंध में या इस अधिनियम तथा विनियमों के उपबंधों को प्रथम बार प्रभावी बनाने में अन्यथा कोई कठिनाई उद्भूत होती है तो कुलाधिपति, किसी भी समय आदेश द्वारा कोई नियुक्ति कर सकेगा या कोई ऐसी बात , जो जहां तक हो सके वह इस अधिनियम और विनियमों के उपबंधों से सुसंगत हो, कर सकेगा जो उसे ऐसी कठिनाई को दूर करने हेतु आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो और ऐसे किसी भी आदेश का यह प्रभाव होगा मानों ऐसी नियुक्ति या कार्रवाई इस अधिनियम तथा विनियमों में उपबंधित की गई रीति में की गई है:

परन्तु कुलाधिपति ऐसा कोई आदेश करने के पूर्व, कुलपति की और विश्वविद्यालय के ऐसे समुचित प्राधिकारी की जो गठित किया जा चुका हो, राय सुनिश्चित करेगा तथा उस पर विचार करेगा.

अस्थायी उपबंध.

४९. इस अधिनियम और विनियमों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कुलपति, साधारण परिषद् के अध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से और निधियों की उपलब्धता के अध्यधीन रहते हुए, इस अधिनियम और विनियमों के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए विश्वविद्यालय के समस्त या किन्हीं भी कृत्यों का निष्पादन कर सकेगा और इस प्रयोजन के लिए ऐसे समय तक ऐसी किन्हीं भी शक्तियों का प्रयोग या किन्हीं भी कर्तव्यों का पालन कर सकेगा जिनका इस अधिनियम तथा विनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी द्वारा प्रयोग या पालन किया जाना है , जब तक कि इस अधिनियम तथा विनियमों द्वारा उपबंधित किए गए अनुसार ऐसा प्राधिकारी अस्तित्व में नहीं आ जाता है .

संरक्षण.

५०. विश्वविद्यालय , कुलपति, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या अधिकारी या अन्य किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी ऐसी बात के संबंध में, जो कि इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी विनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई है या जिसका इस प्रकार सद्भावपूर्वक किया जाना तात्पर्यित रहा है, कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्रवाई नहीं होगी और न ही उनसे कोई नुकसानी का दावा किया जाएगा.

का अधिनियम अध्यारोही प्रभाव होगा.

५१. इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए विनियम के उपबंध , तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी अन्य विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में अंतर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे .

निरसन तथा व्यावत्ति.

५२. ( १ ) इस अधिनियम के प्रारंभ होने से राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय अधिनियम, १ ९९ ७ (क्रमांक ४१ सन् १ ९९ ७ ) निरसित हो जाएगा .

( २ ) उक्त अधिनियम के निरसन होते ही राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय, भोपाल कार्यपालिक तथा सेवा विनियम, २०१२ द्वारा तथा उक्त अधिनियम के अधीन जारी किए गए समस्त आदेश , निदेश तथा अधिसूचनाएं उस समय तक प्रवृत्त रहेंगी जब तक कि इस अधिनियम के अधीन परिनियम, अध्यादेश तथा विनियम बनाए तथा प्रकाशित नहीं कर दिए जाते हैं.

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उद्देश्यों और कारणों का कथन

विधि के क्षेत्र में व्यापक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए सन् १ ९९ ७ में मध्यप्रदेश अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय विधि संस्थान, विश्वविद्यालय , भोपाल स्थापित किया गया था. समय की आवश्यकतानुसार अधिनियम को वर्ष १ ९९ ८ और २०११ में और संशोधित किया गया था.

२. वर्ष २०१७ में कतिपय अनियमितताओं के विरुद्ध छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि में, राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय , भोपाल के कामकाज की समीक्षा करते समय यह महसूस किया गया था और वर्तमान संकट से निपटने और विधिक शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ रही चुनौतियों को दूर करने के लिए राष्ट्रीय विधि संस्थान, विश्वविद्यालय भोपाल को समर्थ बनाने के लिए एक सहमति बनी थी और १ ९९७ के अधिनियम में कई संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं . समस्त हितधारकों के हितों पर विचार करने के पश्चात् बजाए इसके कि १९९७ के पुराने अधिनियम में बड़ी संख्या में संशोधन किए जाएं, वर्तमान अधिनियम को नए अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित करने का विनिश्चय किया गया था.

३. अतः यह विधेयक प्रस्तुत है.

भोपाल

जयभान सिंह पवैया तारीख १६ मार्च , २०१८

भारसाधक सदस्य.

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वित्तीय ज्ञापन

नहीं है. मध्यप्रदेश राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय भोपाल में अधिनियम, १ ९९ ७ के तहत् पूर्व से स्थापित है, इसमें कोई नवीन व्यय अंतर्ग्रस्त प्रत्यायोजित विधि निर्माण के संबंध में ज्ञापन

प्रस्तावित मध्यप्रदेश राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय विधेयक , २०१८ के जिन खण्डों द्वारा विधायनी शक्तियों का प्रत्यायोजन किया जा रहा है , उनका विवरण निम्नानुसार है: -

खण्ड ५- विश्वविद्यालय द्वारा अध्ययन, गवेषणा, प्रशिक्षण, शिक्षा और शिक्षण केन्द्रों के प्रबंध, विधि तथा सहबद्ध विषयों हेतु शिक्षण की व्यवस्था, बहिर्वर्ती अध्ययन तथा विस्तारी सेवाओं का आयोजन, गवेषणा, प्रशिक्षण तथा दूरस्थ विद्या तथा सतत् शिक्षा कार्यक्रम के माध्यम से विधि के ज्ञान की अभिवृद्धि तथा प्रसार, परीक्षाएं आयोजित किये जाने , व्यक्तियों को उपाधि, टाईटल्स, पत्रोपाधि, प्रमाण - पत्र तथा अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां प्रदान किये जाने , फीस तथा अन्य प्रभार विहित किये जाने , विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिये आवश्यक विशेष केन्द्र, अध्ययन केन्द्र अन्य इकाईयां स्थापित किये जाने, विश्वविद्यालय के छात्रों तथा कर्मचारीवृंदों के अनुशासन को विनियमित करने, विश्वविद्यालय में शिक्षण, अनुसंधान तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं हेतु पदों को संस्थित करने तथा नियुक्ति करने, विश्वविद्यालय के प्रयोजन के लिए अनुदान, आर्थिक सहायता, अभिदान , संदान , भूमि, भवन लेने तथा क्रय करने , विश्वविद्यालय की समस्त या किन्हीं संपत्तियों के आधार पर धन प्राप्त करने , ऋण का प्रतिदाय तथा मोचन करने , तथा विद्या संबंधी तकनीकी, प्रशासनिक और अन्य कर्मचारीवृंद के हितार्थ निधि गठित किये जाने;

खण्ड ६- अध्यापन और छात्रों का निवास तथा विश्वविद्यालय द्वारा विधि उपाधि, पत्रोपाधि आदि प्रदान किये जाने,

खण्ड ९ -विश्वविद्यालय के प्राधिकारीगण संस्थित किये जाने.

खण्ड १० - साधारण परिषद् और उसकी पदावधि संस्थित किये जाने,

खण्ड ११ - अध्यक्ष एवं सचिव नियुक्त किये जाने,

खण्ड १२ - साधारण परिषद् की शक्तियां विनिर्दिष्ट किये जाने,

खण्ड १३ - साधारण परिषद् का सम्मिलन आयोजित किये जाने,

खण्ड १४ - कार्य परिषद् बनाये जाने,

खण्ड १५ -कार्य परिषद् के सदस्य निर्दिष्ट किये जाने,

खण्ड १६ - कार्य परिषद् की पदावधि नियत किये जाने,

खण्ड १७ कार्य परिषद् की शक्तियां तथा कृत्य निर्दिष्ट किये जाने .

खण्ड १ ९ कार्य परिषद् का मम्मिन्नन आयोजित किये जाने, 650 (30)

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

खण्ड २० - स्थायी समिति का गठन और तदर्थ समिति की नियुक्ति किये जाने ,

खण्ड २१ - विद्या परिषद् का गठन किये जाने,

खण्ड २२ - विद्या परिषद् की शक्तियां तथा कर्त्तव्य निर्दिष्ट किये जाने ,

खण्ड २३ - विद्या परिषद् के सम्मिलन आयोजित किये जाने,

खण्ड २४ - वित्त समिति गठित किये जाने,

खण्ड २७ - परिनियम , अध्यादेश और विनियम जारी किये जाने ,

खण्ड २८ - कतिपय परिस्थितियों में विश्वविद्यालय के बेहतर प्रशासन के लिए विशेष उपबंध किये जाने ,

खण्ड ३० - कुलपति की परिलब्धियां तथा सेवा की शर्तें विहित किये जाने ,

खण्ड ३१ - कुलपति की शक्तियां तथा कर्त्तव्य विनिर्दिष्ट किये जाने,

खण्ड ३२ -विभागाध्यक्ष की नियुक्ति, शक्तियां एवं सेवा शर्तें विहित किये जाने ,

खण्ड ३३ -कुलसचिव की नियुक्ति, शक्तियां, सेवा शर्तें एवं पदावधि विहित किये जाने,

खण्ड ३५ - पुनर्विलोकन आयोग का गठन किये जाने,

खण्ड ३७ -विश्वविद्यालय निधि गठित किये जाने,

खण्ड ३ ९ -विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे तैयार किये जाने तथा उनकी संपरीक्षा किये जाने,

खण्ड ४० - वित्तीय प्राक्कलन तैयार किये जाने,

खण्ड ४१ - विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट तैयार किये जाने,

खण्ड ४२ - संविदाओं का निष्पादन किये जाने,

खण्ड ४३ - मानद् उपाधियां प्रदान किये जाने,

खण्ड ४४ - उपाधि या पत्रोपाधि का प्रत्याहरण किये जाने,

खण्ड ४६ -संपत्ति का अंतरण किये जाने , तथा

खण्ड ४८ - विश्वविद्यालय के प्रारंभ पर कठिनाइयों को दूर किये जाने ,

के संबंध में विश्वविद्यालय अथवा राज्य सरकार द्वारा नियम बनाये जाएंगे . जो सामान्य स्वरूप के होंगे.

अवधेश प्रताप सिंह

प्रमुख मचिव,

मध्यप्रदेश विधान सभा.

नियंत्रक शासकीय मुद्रण तथा लेखन सामग्री, मध्यप्रदेश द्वारा शासकीय केन्द्रीय मुद्रणालय, भोपाल में मुटिन तथा पकाशित- 2018

Cite this issue. Madhya Pradesh Gazette, Government of Madhya Pradesh, 25 June 2018. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.madhya.2018-06-25.325.Extraordinary/. Archive identifier in.gazette.madhya.2018-06-25.325.Extraordinary.