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Madhya Pradesh Gazette · Government of Madhya Pradesh

मध्यप्रदेश भू-राजस्‍व संहिता (संशोधन) विधेयक, 2018

Published 25 June 2018

Department
विधान सभा सचिवालय
Type
Extraordinary
Gazette no.
341
Identifier
in.gazette.madhya.2018-06-25.341.Extraordinary
Languages
English, Hindi
Published at
Original source ↗

मध्यप्रदेश शासन

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सत्यमेव जयते

मध्यप्रदेश राजपत्र

(असाधारण )

प्राधिकार से प्रकाशित

क्रमांक 341 ]

भोपाल , सोमवार , दिनांक 25 जून 2018- आषाढ़ 4, शक 1940

विधान सभा सचिवालय, मध्यप्रदेश

भोपाल , दिनांक 25 जून 2018

क्र. 13928 - वि.स. - विधान-2018 .- मध्यप्रदेश विधान सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन सम्बन्धी नियम 64 के उपबंधों के पालन में, मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) विधेयक, 2018 ( क्रमांक 22 सन् 2018 ) जो विधान सभा में दिनांक 25 जून 2018 को पुरःस्थापित हुआ है . जनसाधारण की सूचना के लिए प्रकाशित किया जाता है.

अवधेश प्रताप सिंह प्रमुख सचिव, मध्यप्रदेश विधान सभा.

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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

मध्यप्रदेश विधेयक

क्रमांक २२ सन् २०१८

मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) विधेयक, २०१८

विषय-सूची

खण्ड:

१. संक्षिप्त नाम तथा प्रारम्भ.

२. धारा २ का संशोधन.

३. धारा ४ का संशोधन.

४. धारा ७ का संशोधन.

५. धारा ११ का स्थापन.

६. धारा १३ का संशोधन.

७. धारा १३ -क का अंतःस्थापन.

८. धारा १ ९ का स्थापन .

९. धारा २१ का लोप .

१०. धारा २२ का स्थापन.

११. धारा २४ का स्थापन .

१२ . धारा २७ का संशोधन.

१३ . धारा २८ का संशोधन .

१४. धारा २ ९ का स्थापन.

१५ . धारा ३५ का संशोधन.

१६. धारा ४१ का लोप.

१७. धारा ४४ का स्थापन.

१८ . धारा ४५ का लोप.

१९. धारा ४६ का स्थापन.

२०. धारा ४७ का स्थापन .

२१ . धारा ४९ का संशोधन.

२२. धारा ५० का स्थापन.

२३ . धारा ५१ का संशोधन.

२४ . धारा ५४ का स्थापन.

२५. धारा ५५ का लोप .

२६. धारा ५६ का संशोधन.

२७. धारा ५७ का संशोधन.

२८ . धारा ५८ का संशोधन.

२९ . धारा ५८ -क का स्थापन .

३० . धारा ५८ -ख का लोप.

३१. धारा ५ ९ का स्थापन.

३२. धारा ६० का स्थापन .

३३. अध्याय सात तथा अध्याय आठ का स्थापन.

३४. धारा १०४ का स्थापन .

३५ . धारा १०५ का स्थापन.

३६. धारा १०६ का स्थापन.

३७. धारा १०७ का स्थापन

३८ . धारा १०८ का म्थापन 682( 1)

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

मध्यप्रदेश विधेयक

क्रमांक २२ सन् २०१८

मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) विधेयक, २०१८

मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता , १ ९ ५ ९ को और संशोधित करने लिए विधेयक.

भारत गणराज्य के उनहत्तरवें वर्ष में मध्यप्रदेश विधान - मंडल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

१. ( १ ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ है. संक्षिप्त नाम तथा प्रारम्भ.

(२ ) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जैसी कि राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा , नियत करे.

धारा २ का संशोधन २. मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता , १ ९ ५९ ( क्रमांक २० सन् १ ९ ५९ ) ( जो इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम के नाम से निर्दिष्ट है ) की धारा २ की उप - धारा ( १ ) में, -

(एक) खण्ड ( क) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" (क) " आबादी " से अभिप्रेत है किसी ग्राम में उसके निवासियों के निवास के लिए या उसके आनुषंगिक प्रयोजनों के लिए, समय - समय पर, आरक्षित क्षेत्र और इस अभिव्यक्ति के किसी अन्य सजातीय रूप भेद, जैसे ' ग्राम स्थल ' या ' गांव स्थान ' का अर्थ भी तद्नुसार लगाया जाएगा;";

(दो ) खण्ड (च ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अन्तः स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( च-1 ) " विकास योजना " का वही अर्थ होगा , जो कि मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, १ ९७३ ( क्रमांक २३ सन् १ ९७३ ) में उसके लिए दिया गया है ; " ;

(तीन) खण्ड ( झ ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( झ ) " खाता " से अभिप्रेत है , ऐसा भू- खण्ड जिस पर भू- राजस्व पृथक् रूप से निर्धारित किया गया है और जो एक ही भू- धृति के अधीन धारित है;" ;

(चार ) खण्ड ( ड ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अन्तः स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( ड-१ ) " भू- राजस्व " से अभिप्रेत है, धारित भूमि के लिए, राज्य सरकार को देय समस्त धन और इसमें सम्मिलित हैं प्रीमियम, लगान, पट्टाधन, प्रमुक्ति भाटक या इन अभिव्यक्तियों के कोई अन्य सजातीय रूप;";

( पांच ) खण्ड ( थ ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( थ ) " भू- खण्ड संख्याक " से अभिप्रेत है , इस संहिता के अधीन भू- खण्ड संख्यांक के रूप में विरचित किए गए या उस रूप में मान्य किए गए भूमि के किसी प्रभाग को समनुदेशित संख्यांक;":

(छह ) खण्ड ( न ) में, उपखण्ड ( एक ) में, शब्द " धारा १८८ के उपबंधों के अनुसार, मौसमी कृषक द्वारा अपने भूमिस्वामी को , या " लोप किया जाए:

(सात ) खण्ड ( फ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अन्तः स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( फ-1 ) " सेक्टर " मे अभिप्रेत है , नगरीय क्षेत्र में भूमि का कोई भू- भाग जो इस संहिता के उपबंधों के अधीन सेक्टर के रूप में विरचित या मान्य किया गया है:

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

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३९. धारा १० ९ का स्थापन.

४०. धारा ११० का स्थापन.

४१ . धारा ११२ का लोप.

४२ . धारा ११३ का स्थापन .

४३ . धारा ११४ का स्थापन .

४४. धारा ११४ - क का स्थापन.

४५ . धारा ११५ का स्थापन.

४६. धारा ११६ का लोप.

४७. धारा ११८ का लोप.

४८ . धारा ११ ९ का लोप.

४९. धारा १२० का संशोधन.

५०. धारा १२१ का लोप.

५१ . धारा १२४ का स्थापन.

५२ . धारा १२५ का संशोधन.

५३ . धारा १२६ का संशोधन.

५४. धारा १२७ का स्थापन.

५५ . धारा १२८ का संशोधन.

५६ . धारा १२ ९ का स्थापन.

५७. धारा १३० का संशोधन.

५८ . धारा १३१ का स्थापन.

५९ . धारा १३२ का लोप.

६०. धारा १३३ का स्थापन.

६१ . धारा १३६ का लोप.

६२ . धारा १३८ का संशोधन.

६३ . धारा १३ ९ का लोप.

६४. धारा १४० का स्थापन.

६५. धारा १४१ का स्थापन .

६६. धारा १४२ का स्थापन .

६७. धारा १४३ का स्थापन..

६८ . धारा १४४ का स्थापन .

६९ . धारा १४५ का संशोधन.

७०. धारा १४६ का स्थापन .

७१ . धारा १४७ का संशोधन.

७२ . धारा १४९ का संशोधन.

७३ . धारा १५० का स्थापन.

७४. धारा १५१ का संशोधन.

७५ . धारा १५३ का संस्थान.

७६ . धारा १५४ - क का संशोधन.

७७ . धारा १५५ का संशोधन.

७८ . धारा १५८ का संशोधन.

७९. धारा १६१ का संशोधन.

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मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

८० . धारा १६२ का लोप.

८१ . धारा १६३ का लोप .

८२. धार १६५ का संशोधन.

८३ . धारा १६८ का स्थापन .

८४ . धारा १६ ९ का लोप.

८५ . धारा १७१ का लोप .

८६. धारा १७२ का लोप.

८७. धारा १७४ का लोप.

८८ . धारा १७६ का लोप.

८९. धारा १७८- क का स्थापन .

९ ०. धारा १८१ - क का स्थापन.

९१. धारा १८२ का संशोधन.

९२ . धारा १८३ का स्थापन .

९३ . धारा १८४ का लोप.

९४. अध्याय चौदह का लोप तथा व्यावृत्ति.

९५. धारा २०३ का स्थापन.

९६. धार २१० का संशोधन.

९७. धार २२४ का संशोधन.

९८. धारा २२५ का लोप.

९९. धारा २२७ का संशोधन.

१००. धारा २२ ९ का संशोधन.

१०१. धारा २३० का संशोधन .

१०२. धारा २३१ का स्थापन,

१०३. धारा २३२ का लोप.

१०४. धारा २३३ का स्थापन .

१०५. धारा २३३ - क का अन्तः स्थापन.

१०६. धारा २३४ का स्थापन .

१०७ . धारा २३ ९ का संशोधन.

१०८ . धारा २४० का संशोधन.

१०९. धारा २४३ का संशोधन.

११०. धारा २४४ का स्थापन .

धारा २४५ का स्थापन.

११२. धारा २४६ का संशोधन.

११३. धारा २४८ का संशोधन .

११४. धारा २५०. का स्थापन .

११५. धारा २५० - क का लोप.

.११६. धारा २५२ का लोप.

११७. धारा २५३ का संशोधन.

११८ . धारा २५४ का लोप.

११ ९. धारा २५५ का लोप.

१२०. धारा २५७ का संशोधन .

१२१. धारा २५८ का संशोधन .

१२२. अनुसूची एक का संशोधन.

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

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(फ-2) " सेवा भूमि" से अभिप्रेत है, नगरेतर क्षेत्र में की ऐसी भूमि जो किसी कोटवार को उसकी पदावधि के दौरान कृषि प्रयोजन के लिए दी गयी हो ; " ;

(आठ) खण्ड ( भ ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( भ ) " सर्वेक्षण संख्याक " से अभिप्रेत है, इस संहिता के अधीन सर्वेक्षण संख्याक के रूप में विरचित किए गए या उस रूप में मान्य किए गए भूमि के ऐसे प्रभाग को दिया गया संख्याक और जिसकी प्रविष्टि भू- अभिलेखों में, खसरा क्रमांक नामक सूचक संख्यांक के अधीन की गयी है; ";

(नौ ) खण्ड ( म ) का लोप किया जाए;

(दस) खण्ड ( य-३ ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " ( य-३ ) " दखलरहित भूमि" से अभिप्रेत है, ऐसी भूमि जो आबादी या सेवाभूमि से या किसी भूमिस्वामी या सरकारी पट्टेदार द्वारा धारित भूमि से भिन्न है;" ;

(ग्यारह ) खण्ड ( य -५ ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " ( य-५) " ग्राम" से अभिप्रेत है , नगरेतर क्षेत्र में का कोई ऐसा भू- भाग जिसे संहिता के प्रवृत्त होने के पूर्व, तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसी विधि के उपबंधों के अधीन ग्राम के रूप में मान्य किया गया था या उस रूप में घोषित किया गया था तथा नगरेतर क्षेत्र में का कोई ऐसा अन्य भू- भाग जिसे किसी भू- सर्वेक्षण में ग्राम के रूप में मान्य किया गया या जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा , ग्राम के रूप में घोषित करे. ".

धारा ४ का संशोधन

३. मूल अधिनियम की धारा ४ में, उपधारा ( २ ) के स्थान पर , निम्नलिखित उपधारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

" ( २ ) उपधारा ( १ ) में किसी बात के होते हुए भी , मण्डल का अध्यक्ष तथा उसके सदस्य ऐसे अन्य स्थान या स्थानों पर भी बैठक करेंगे जैसा कि राज्य सरकार, मंडल के अध्यक्ष से परामर्श करने के पश्चात् अधिसूचित करे. ".

धारा ७ का संशोधन

४. मूल अधिनियम की धारा ७ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः- " ७. मण्डल की अधिकारिता मण्डल ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन उसे प्रदत्त की गई हैं अथवा ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करेगा जो किसी अधिनियमिति के अधीन अथवा उसके द्वारा उसे प्रदत्त किए गए हों या राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा , इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे.

५. मूल अधिनियम की धारा ११ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः- धारा ११ का स्थापन

" ११. राजस्व अधिकारी .- राजस्व अधिकारियों के निम्नलिखित वर्ग होंगे , अर्थात्ः- प्रमुख राजस्व आयुक्त;

आयुक्त;

अपर आयुक्त;

आयुक्त भू-अभिलेख;

अपर आयुक्त भू-अभिलेख

कलेक्टर;

अपर कलेक्टर;

जिला सर्वेक्षण अधिकारी;

उप -खण्ड अधिकारी ;

उप-सर्वेक्षण अधिकारी:

सहायक कलेक्टर;

संयुक्त कलेक्टर;

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मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

डिप्टी कलेक्टर;

तहसीलदार;

अपर तहसीलदार;

सहायक सर्वेक्षण अधिकारी;

भू-अभिलेख अधीक्षक;

नायब तहसीलदार;

सहायक भू- अभिलेख अधीक्षक.".

धारा १३ का ६. मूल अधिनियम की धारा १३ में, -

संशोधन (एक) उपधारा ( २ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः-

" ( २ ) राज्य सरकार, किसी भी जिले या उपखण्ड या तहसील की सीमाओं में परिवर्तन कर सकेगी और नवीन जिले या उपखण्ड या तहसील का सृजन कर सकेगी या विद्ययान जिलों या उपखण्डों या तहसीलों को समाप्त कर सकेगी :

परन्तु राज्य सरकार, ऐसी प्रस्थापनाओं के लिए, विहित प्ररूप में आपत्तियां आमंत्रित करेगी और प्राप्त की गई आपत्तियों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी. " ;

(दो) उपधारा ( ३ ) का लोप किया जाए.

धारा १३ -क का ७. मूल अधिनियम की धारा १३ के पश्चात्, निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाए, अर्थात्ः-

अन्तःस्थापन.

" १३ -क. प्रमुख राजस्व आयुक्त की नियुक्ति तथा उसकी शक्तियां एवं कर्तव्य.- राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा , एक प्रमुख राजस्व आयुक्त की नियुक्ति करेगी जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो राज्य सरकार द्वारा उसे प्रदत्त की जाएं तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो उस पर अधिरोपित किए जाएं. " .

धारा १ ९ का स्थापन.

८. मूल अधिनियम की धारा १ ९ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः-

" १ ९ . तहसीलदार, अपर तहसीलदार तथा नायब तहसीलदार की नियुक्ति.-

(१ ) राज्य सरकार, प्रत्येक जिले के लिए उतने व्यक्तियों को, जितने कि वह ठीक समझे-

तहसीलदार;

(क)

अपर तहलीदार तथा

(ख)

(ग) नायब तहसीलदार;

नियुक्त कर सकेगी जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति द्वारा या उसके अधीन उन्हें प्रदत्त की गई हैं तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे, जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति द्वारा या उसके अधीन उन पर अधिरोपित किए गए हैं.

(२) कलेक्टर , किसी तहसीलदार को तहसील का भारसाधक बना सकेगा जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियमिति द्वारा या उसके अधीन उन्हें प्रदत्त की गयी हों, तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति द्वारा अधिरोपित किए गये हैं.

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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(३) कलेक्टर, किसी तहसील में एक या एक से अधिक अपर तहसीलदार तथा नायब तहसीलदार नियुक्त कर सकेगा जो उसमें ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति द्वारा या उसके अधीन तहसीलदार को प्रदत्त की गयी हैं तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा , जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति द्वारा या उसके अधीन अधिरोपित किये गये हैं जैसा कि कलेक्टर, लिखित आदेश द्वारा निदेशित करे. ".

धारा २१ का लोप..

९. मूल अधिनियम की धारा २१ का लोप किया जाए.

धारा २२ का स्थापन.

१०. मूल अधिनियम की धारा २२ के स्थान पर , निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

" २२. उपखण्ड अधिकारी.-कलेक्टर, किसी सहायक कलेक्टर या संयुक्त कलेक्टर या डिप्टी कलेक्टर को जिले के एक या एक से अधिक उपखण्डों का भार - साधक बना सकेगा जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियमिति द्वारा या उसके अधीन उपखण्ड अधिकारी को प्रदत्त की गयी हैं या अधिरोपित किए गये हैं. ".

११. मूल अधिनियम की धारा २४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - धारा २४ का स्थापन .

" २४. राज्य सरकार द्वारा राजस्व अधिकारियों की शक्तियाँ किसी लोक सेवक या स्थानीय निकाय को प्रदत्त की जाना. - राज्य सरकार वे शक्तियां, जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन किसी राजस्व अधिकारी को प्रदत्त की गई हैं, किसी लोक सेवक या स्थानीय निकाय को प्रदत्त कर सकेगी :

परन्तु-

धारा ७२ , ११३ , १३५, १६५, २३७, २३८, २४३ एवं २५१ के अधीन कलेक्टर की शक्तियाँ;

(क)

(ख) धारा ५ ९, ११५, १७० , १७०क, १७०ख, २३४, २४१ , २४२ , २४८ (२ - क) एवं २५३ के अधीन उपखण्ड अधिकारी की शक्तियाँ;

(ग) धारा ४४ के अधीन अपील प्राधिकारी की शक्तियाँ, तथा

(घ) धारा ५० के अधीन पुनरीक्षण प्राधिकारी की शक्तियाँ;

किसी लोक सेवक या स्थानीय निकाय को प्रदत्त नहीं की जाएंगी.

स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजन के लिये " लोक सेवक " से अभिप्रेत है कोई व्यक्ति जो राज्य सरकार में या किसी शासी निकाय में या राज्य सरकार द्वारा स्थापित और नियंत्रित संस्था में पद धारण करता हो. ".

धारा २७ का

१२. मूल अधिनियम की धारा २७ में, परन्तुक के स्थान पर , निम्नलिखित परन्तुक स्थापित किया जाए, संशोधन.

अर्थात्: -

" परंतु उपखण्ड अधिकारी किसी मामले की जांच या सुनवाई जिले के भीतर किसी भी स्थान पर कर सकेगा. ".

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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

धारा २८ का

संशोधन.

१३. मूल अधिनियम की धारा २८ में, शब्द " समस्त राजस्व अधिकारी , राजस्व निरीक्षक, भू- मापक तथा पटवारी " के स्थान पर , शब्द " किसी राजस्व अधिकारी , राजस्व निरीक्षक , नगर सर्वेक्षक तथा पटवारी " स्थापित किए जाएं.

१४. मूल अधिनियम की धारा २ ९ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

धारा २ ९ का संशोधन.

" २ ९ . मामलों को अंतरित करने की शक्ति. ( १ ) जब कभी यह प्रतीत हो कि न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति

के लिये आदेश देना समीचीन है , तो मण्डल निदेश दे सकेगा कि कोई विशिष्ट मामला एक राजस्व अधिकारी के पास से समान पद श्रेणी के किसी अन्य राजस्व अधिकारी को अंतरित कर दिया जाए.

( २ ) आयुक्त, यदि उसकी राय हो कि न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिये यह समीचीन है, तो यह आदेश दे सकेगा कि कोई विशिष्ट मामला एक राजस्व अधिकारी के पास से उसी जिले के या उसी संभाग के किसी अन्य जिले के समान पद श्रेणी के किसी अन्य राजस्व अधिकारी को अंतरित कर दिया जाए. ".

१५. मूल अधिनियम की धारा ३५ में, -

धारा ३५ का

संशोधन.

(एक) उपधारा ( १ ) का लोक किया जाए;

उपधारा ( ३ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

(दो)

" ( ३ ) वह पक्षकार, जिसके विरुद्ध उपधारा ( २ ) के अधीन कोई आदेश पारित किया गया है, ऐसे आदेश की तारीख से या उस दशा में जब कि सूचना या समन की सम्यक् रूप से तामील न की गई हो, उस आदेश के जानकारी में आने की तारीख से तीस दिन के भीतर उसे अपास्त कराने के लिये आवेदन इस आधार पर कर सकेगा कि सुनवाई में उपसंजात होने से किसी पर्याप्त हेतुक से निवारित रहा था और राजस्व अधिकारी , उस विरोधी पक्षकार को, जो उस तारीख को उपस्थित था जिसको कि ऐसा आदेश पारित किया गया था , सूचना देने के पश्चात् तथा ऐसी जांच करने के पश्चात्, जैसी कि वह आवश्यक समझे, पारित किए गए आदेश को अपास्त कर सकेगा.".

धारा ४१ का लोप.

१६. मूल अधिनियम की धारा ४१ का लोप किया जाए.

धारा ४४ का स्थापन.

१७. मूल अधिनियम की धारा ४४ के स्थान पर , निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

" ४४. अपील तथा अपील प्राधिकारी. ( १ ) उस स्थिति को छोड़कर जहाँ कि अन्यथा उपबंधित किया गया है , इस संहिता या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन ऐसा आदेश पारित करने के लिये सक्षम किसी राजस्व अधिकारी के प्रत्येक मूल आदेश कीअपील-

(क) यदि ऐसा आदेश उपखण्ड अधिकारी के अधीनस्थ किसी राजस्व अधिकारी ने पारित किया है,- उपखण्ड अधिकारी को होगी;

(ख) यदि ऐसा आदेश उप सर्वेक्षण अधिकारी के अधीनस्थ राजस्व अधिकारी ने पारित किया है -उप सर्वेक्षण अधिकारी को होगी:

(ग) यदि ऐसा आदेश उपखण्ड अधिकारी ने पारित किया है- कलेक्टर को होगी;

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

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यदि ऐसा आदेश उप सर्वेक्षण अधिकारी ने पारित किया है . जिला सर्वेक्षण अधिकारी को होगी;

(घ)

(ङ) यदि ऐसा आदेश किसी सहायक कलेक्टर, संयुक्त कलेक्टर या डिप्टी कलेक्टर द्वारा पारित किया गया है, जिसे इस संहिता की धारा २४ के अधीन शक्तियाँ प्रदत्त की गई हैं.- कलेक्टर को होगी;

(च) यदि ऐसा आदेश किसी ऐसे राजस्व अधिकारी द्वारा पारित किया गया है जिसके कि संबंध में धारा १२ की उपधारा ( ३ ) के अधीन निदेश दिया गया हो ऐसे राजस्व अधिकारी को होगी जिसके कि बारे में राज्य सरकार निदेश दे;

यदि ऐसा आदेश कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी ने पारित किया है- आयुक्त को होगी;

(छ)

यदि ऐसा आदेश आयुक्त ने पारित किया है - मण्डल को होगी.

(ज)

( २ ) अन्यथा उपबंधित के सिवाय , इस संहिता या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन प्रथम अपील में.-

(क) उपखण्ड अधिकारी या उप सर्वेक्षण अधिकारी या कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा पारित किए गये प्रत्येक आदेश के विरुद्ध द्वितीय अपील आयुक्त को होगी;

(ख) आयुक्त द्वारा पारित किए गये प्रत्येक आदेश के विरुद्ध द्वितीय अपील मण्डल को होगी .

( ३ ) द्वितीय अपील.-

(क) यदि मूल आदेश को प्रथम अपील में खर्च के मामले में के अतिरिक्त अन्य मामले में फेरफारित किया गया हो या उलट दिया गया हो ; या

(ख) निम्नलिखित आधारों में से किसी भी आधार पर होगी, न कि किसी अन्य आधार पर, अर्थात्:-

यह कि आदेश विधि या विधि का प्रभाव रखने वाली प्रथा के प्रतिकूल है; या ( एक)

(दो) यह कि आदेश द्वारा विधि या विधि का प्रभाव रखने वाली प्रथा संबंधी किसी सारवान विवाद्यक का अवधारण नहीं हो सका हो; या

(तीन) यह कि इस संहिता द्वारा यथाविहित प्रक्रिया में ऐसी सारवान गलती या त्रुटि हुई है जिससे कि गुणागुण के आधार पर मामले के विनिश्चय में गलती या त्रुटि उत्पन्न हुई हो .

(४ ) पुनर्विलोकन में , किसी आदेश में फेरफार करते हुए या उससे उलटते हुए, पारित किया गया कोई आदेश उसी रीति में अपीलनीय होगा जिस रीति में कि मूल आदेश अपीलनीय होता है. ".

धारा ४५ का लोप.

१८. मूल अधिनियम की धारा ४५ का लोप किया जाए.

धारा ४६ का स्थापन.

१९ . मूल अधिनियम की धारा ४६ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

" ४६. कतिपय आदेशों के विरूद्ध कोई अपील नहीं होगी. धारा ४४ में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी. - 682(9)

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

(क) किसी भी ऐसे आदेश की. -

(एक ) जिसके द्वारा किसी आवेदन को परिसीमा अधिनियम, १ ९ ६३ ( १ ९६३ का ३६ ) की धारा ५ में विनिर्दिष्ट आधारों पर विलम्ब के विचारण के लिये मंजूर या नामंजूर किया गया है; या

(दो) पुनर्विलोकन के लिये किए गए किसी आवेदन को नामंजूर किया गया है; या

(तीन) आवेदन को, जो रोक ( स्टे ) के लिये मंजूर या नामंजूर किया गया है; या

(चार) जो अंतरिम स्वरूप का है ; या

(पांच) जो धारा २९ , ३० , १०४, १०६, ११४- क, १२७, १४६, १४७, १५०, १५२, १६१ , २०७, २०८ , २१० , २१२ , २१३ , २१५, २२० तथा २४३ के उपबंधों के अधीन पारित किया गया है,

कोई अपील नहीं होगी; और

(ख) धारा १३१ की उपधारा ( १ ) , धारा १३४, धारा १७३ , धारा २३४, धारा २३९ , धारा २४० , धारा २४१ , धारा २४२, धारा २४४ तथा धारा २४८ के उपबंधों के अधीन पारित किसी आदेश के विरुद्ध प्रथम अपील में पारित आदेश के विरुद्ध कोई द्वितीय अपील नहीं होगी . ".

धारा ४७ का स्थापन.

२०. मूल अधिनियम की धारा ४७ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

"४७. अपीलों की परिसीमा. प्रथम तथा द्वितीय अपील फाइल करने के लिए परिसीमा अवधि, अपील के लिए आदेश की तारीख से पैंतालीस दिन होगी

परन्तु जहां कोई आदेश, जिसके विरुद्ध अपील प्रस्तुत की जा रही है, मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता (संशोधन ) अधिनियम , २०१८ के प्रवृत्त होने के पूर्व किया गया था, वहाँ अपील करने की परिसीमा की अवधि, उक्त संशोधन अधिनियम के पूर्व, संहिता में यथा उपबंधित अनुसार होगी :

परन्तु यह और कि जहाँ किसी ऐसे पक्षकार को, जो उस पक्षकार से भिन्न हो जिसके कि विरुद्ध आदेश एकपक्षीय पारित किया गया है, उस तारीख की, जिसको कि आदेश पारित किया गया था , कोई पूर्व सूचना न रही हो, वहां परिसीमा की संगणना ऐसे आदेश के संसूचित किए जाने की तारीख से की जाएगी. " .

धारा ४९ का

संशोधन.

२१. मूल अधिनियम की धारा ४९ में, उपधारा ( ३ ) में, प्रथम परन्तुक के स्थान पर, निम्नलिखित परन्तुक स्थापित किया जाए, अर्थात्:-

" परन्तु अपील प्राधिकारी, उसके अधीनस्थ किसी राजस्व अधिकारी को मामले को निपटाने के लिये साधारणतया प्रतिप्रेषित नहीं करेगा. ".

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

682(10)

धारा ५० का स्थापन. २२. मूलं अधिनियम की धारा ५० के स्थान पर , निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

"५०. पुनरीक्षण.-( १ ) उपधारा ( २ ) , ( ३ ) , ( ४ ) तथा ( ५ ) के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, - (क) मण्डल, किसी भी समय , स्वप्रेरणा से या किसी पक्षकार द्वारा आवेदन किए जाने पर किसी ऐसे मामले का, जो कि विनिश्चित किया जा चुका हो या किन्हीं भी ऐसी कार्यवाहियों का, जिसमें आयुक्त द्वारा इस संहिता के अधीन आदेश पारित किया जा चुका हो, अभिलेख मंगा सकेगा;

(ख) आयुक्त, किसी भी समय , स्वप्रेरणा से या किसी पक्षकार द्वारा आवेदन किए जाने पर किसी ऐसे मामले का, जो कि विनिश्चित किया जा चुका हो या किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों का, जिसमें कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा इस संहिता के अधीन आदेश पारित किया जा चुका हो, अभिलेख मंगा सकेगा;

( ग) कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी , किसी भी समय, स्वप्रेरणा से या किसी पक्षकार के आवेदन किए जाने पर किसी ऐसे मामले का, जो कि विनिश्चित किया जा चुका हो या किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों का, जिनमें उसके अधीनस्थ किसी राजस्व अधिकारी द्वारा इस संहिता के अधीन आदेश पारित किया गया हो, अभिलेख मंगा सकेगा;

और यदि यह प्रतीत होता है कि अधीनस्थ राजस्व अधिकारी ने.-

(एक) ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो कि इस संहिता द्वारा उसमें निहित न की गई हो; या

इस प्रकार निहित की गई अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा हो; या (दो)

(तीन) अपनी अधिकारिता का अविधिपूर्ण प्रयोग किया है या सारवान अनियमितता की है ;

तो मण्डल या आयुक्त या कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी मामले में ऐसा आदेश कर सकेगा जैसा कि वह उचित समझे.

( २ ) पुनरीक्षण के लिए कोई आवेदन .-

इस संहिता के अधीन अपीलनीय किसी आदेश के विरुद्ध;

(क)

इस संहिता के अधीन द्वितीय अपील में पारित किसी आदेश के विरुद्ध;

(ख)

पुनरीक्षण में पारित किए गए किसी आदेश के विरुद्ध;

( ग)

(घ) धारा २१० के अधीन आयुक्त के किसी आदेश के विरुद्धः 682( 11)

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

(ङ) जब तक कि आदेश की तारीख से या पक्षकार को इसकी संसूचना की तारीख से पैंतालीस दिन , जो भी पश्चात् का हो , के भीतर प्रस्तुत नहीं किया गया हो,

ग्रहण नहीं किया जाएगा:

परन्तु जहां किसी आदेश , जिसके विरुद्ध पुनरीक्षण का आवेदन प्रस्तुत किया जा रहा है, मध्यप्रदेश भू राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ के प्रवृत्त होने के पूर्व किया गया था, पुनरीक्षण के लिये आवेदन प्रस्तुत करने के लिये परिसीमा अवधि उक्त संशोधन अधिनियम के पूर्व संहिता में उपबंधित किए गए अनुसार होगी.

(३) मण्डल या आयुक्त या कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी इस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश या कार्यवाही के अनुक्रम में किसी विवाद्यक का विनिश्चिय करने वाले किसी आदेश में फेरफार नहीं करेगा या उसे नहीं उलटेगा, सिवाय जहां कि.-

(क) ऐसा आदेश, यदि वह पुनरीक्षण का आवेदन करने वाले पक्षकार के पक्ष में किया गया हो, तो कार्यवाहियों का अंतिम रूप से निपटारा करता हो; या

(ख) ऐसा आदेश , यदि प्रवृत्त बना रहता है तो न्याय की विफलता का कारण बनेगा या उस पक्षकार को, जिसके कि विरुद्ध यह किया गया था अपूरणीय क्षति कारित करेगा.

(४) पुनरीक्षण का प्रभाव राजस्व अधिकारी के समक्ष किसी कार्यवाही को स्थगित करने वाला नहीं होगा, सिवाय जहां कि ऐसी कार्यवाही यथास्थिति, मण्डल या आयुक्त या कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा स्थगित की गई हो .

(५) किसी भी ऐसे आदेश को पुनरीक्षण में तब तक फेरफारित नहीं किया जाएगा या उलटा नहीं जायेगा जब तक कि हितबद्ध पक्षकार पर सूचना की तामील न कर दी गई हो और उसे सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो.

स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजन के लिये समस्त राजस्व अधिकारी मण्डल के अधीनस्थ समझे जाएंगे. ".

धारा ५१ का

संशोधन.

२३. मूल अधिनियम की धारा ५१ में , उपधारा ( १ ) तथा उपधारा ( २ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधाराएं स्थापित की जाएं, अर्थात्: -

" ( १ ) मण्डल या कोई राजस्व अधिकारी , या तो स्वप्रेरणा से या किसी हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर, उसके द्वारा या उसके किसी पूर्वाधिकारी द्वारा पारित आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगा और उसके संदर्भ में ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा कि वह उचित समझे :

परन्तु, मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

682( 12)

(एक ) यदि आयुक्त, कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी किसी ऐसे आदेश का, जो कि उसने स्वयं पारित न किया हो, पुनर्विलोकन करना आवश्यक समझता है, तो वह पहले मण्डल की मंजूरी अभिप्राप्त करेगा, और यदि कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी के अधीनस्थ कोई अधिकारी किसी ऐसे आदेश का, जो स्वयं उसके द्वारा या उसके किसी पूर्ववर्ती द्वारा पारित किया गया हो, पुनर्विलोकन करने की प्रस्थापना करता है तो वह पहले कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी की, ठीक जिसके कि वह अधीनस्थ है, लिखित मंजूरी अभिप्राप्त करेगा;

(दो) किसी भी आदेश को तब तक फेरफारित नहीं किया जाएगा या उल्टा नहीं जाऐगा जब तक कि हितबद्ध पक्षकारों को उपसंजात होने तथा ऐसे आदेश के समर्थन में उन्हें सुने जाने की सूचना न दे दी गई हो;

(तीन ) किसी भी ऐसे आदेश का, जिसकी कि अपील की गई है या जो किन्हीं पुनरीक्षण की कार्यवाहियों का विषय है, उस समय तक पुनर्विलोकन नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसी अपील या कार्यवाहियां लंबित रहती हैं ;

(चार) किसी भी ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन, जो निजी व्यक्तियों के बीच अधिकार संबंधी किसी प्रश्न पर प्रभाव डालता हो, कार्यवाहियों के किसी पक्षकार के आवेदन पर ही किया जाएगा अन्यथा नहीं और ऐसे आदेश के पुनर्विलोकन के लिए कोई आवेदन तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक कि वह उस आदेश के पारित किये जाने के पैंतालीस दिन के भीतर न किया गया हो.

(२) किसी भी आदेश का पुनर्विलोकन निम्नलिखित आधारों के सिवाय नहीं किया जाएगा, अर्थात्:-

(क) नए तथा महत्वपूर्ण विषय या साक्ष्य के पता चलने पर जो आवेदक की जानकारी में उसके सम्यक् तत्परता बरतने के पश्चात् भी नहीं था या उसके द्वारा उस समय जब आदेश पारित किया गया था, प्रस्तुत नहीं किया जा सका;

(ख) कोई भूल या गलती जो अभिलेख को देखने से ही प्रकट हो; या

(ग) कोई अन्य समुचित कारण. ".

२४. मूल अधिनियम की धारा ५४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा ५४ का स्थापन.

" ५४. पुनरीक्षण का लंबित रहना.- इस अध्याय में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी कार्यवाहियां जो मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम , २०१८ के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व पुनरीक्षण में लंबित हों,-

(क) यदि वे किसी आवेदक के आवेदन पर शुरू की गई हों, मण्डल या उपरोक्त संशोधन अधिनियम द्वारा यथा संशोधित धारा ५० की उपधारा ( १ ) के अधीन उन्हें सुने जाने तथा विनिश्चित किये जाने के लिए सक्षम राजस्व अधिकारी द्वारा सुनी जाएगी तथा विनिश्चित की जाएगी और यदि इस प्रयोजन के लिए अपेक्षित हो, तो ऐसे सक्षम राजस्व अधिकारी को अंतरित की जाएगी;

(ख) यदि वे मण्डल या किसी राजस्व अधिकारी द्वारा स्वप्रेरणा से शुरू की गई हों तो यथास्थिति, मण्डल या ऐसे राजस्व अधिकारी द्वारा उसी प्रकार सुनी तथा विनिश्चित की जाएंगी मानो कि यह संशोधन अधिनियम पारित नहीं किया गया हो;

(ग) यदि वे बंदोबस्त आयुक्त द्वारा शूरू की गई हों तो संबंधित संभाग के आयुक्त को अंतरित की जाएंगी, जो उन्हें सुनेगा और विनिश्चित करेगा;

(घ) यदि वे बंदोबस्त अधिकारी द्वारा शुरू की गई हों तो यथास्थिति, जिला सर्वेक्षण अधिकारी या कलेक्टर को अंतरित की जाएंगी , जो उन्हें सुनेगा और विनिश्चित करेगा . " .

682( 13)

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

धारा ५५ का लोप.

२५. मूल अधिनियम की धारा ५५ का लोप किया जाए.

धारा ५६ का

संशोधन २६. मूल अधिनियम की धारा ५६ में, शब्द " यथास्थिति इस कोड या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए " के स्थान पर, शब्द " इस संहिता के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए " स्थापित किए जाएं.

२७. मूल अधिनियम की धारा ५७ की उपधारा ( २ ) का लोप किया जाए.

धारा ५७ का संशोधन.

२८. मूल अधिनियम की धारा ५८ में, -

धारा ५८ का संशोधन.

(एक) उपधारा ( १ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा स्थापित की जाए, अर्थात् : -

" ( १ ) समस्त भूमि, चाहे वह किसी भी प्रयोजन के लिए उपयोजित की जाती हो और चाहे वह कहीं भी स्थित हो, राज्य सरकार को राजस्व के भुगतान के लिए दायित्वाधीन है सिवाय ऐसी भूमि के जिसे इस संहिता द्वारा या इसके अधीन या राज्य सरकार के विशेष अनुदान या राज्य सरकार के साथ की गई संविदा द्वारा या राज्य सरकार द्वारा , इस बाबत् जारी अधिसूचना द्वारा , ऐसे दायित्व से पूर्णतः या भागतः छूट दी गई है. ".

उपधारा ( २ ) का लोप किया जाए.

(दो)

२९ . मूल अधिनियम की धारा ५८ - क के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा ५८-क का स्थापन.

५८ -क. भू- राजस्व के भुगतान से छूट. इस संहिता में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, -

(क) अनन्यरूपेण कृषि के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाये गये दो हेक्टेयर तक किसी खाते;

(ख) गैर कृषि प्रयोजन के लिए उपयोग में लायी गयी ऐसी अन्य भूमि जैसी कि राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे,

के संबंध में, कोई भी भू- राजस्व देय नहीं होगा. " .

स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजन के लिए ' खाते ' से अभिप्रेत है संपूर्ण राज्य में किसी व्यक्ति द्वारा व्यक्तिशः धारित समस्त भूमि और संयुक्त रूप से उसके द्वारा धारित भूमियों में उसका हिस्सा, यदि कोई हो, का योग. ".

धारा ५८ -ख का ३०. मूल अधिनियम की धारा 5८ - ख का लोप किया जाए.

लोप.

धारा ५ ९ का स्थापन.

३१. मूल अधिनियम की धारा ५९ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

" ५ ९. जिस प्रयोजन के लिए भूमि उपयोग में लायी जा रही है, के अनुसार भू- राजस्व ( १ ) भूमि के निम्नलिखित उपयोग के संबंध में भू- राजस्व का निर्धारण ऐसी दरों पर किया जाएगा जैसी कि विहित की जाएं : -

कृषि के प्रयोजन के लिए, जिसमें उस पर किया गया कोई सुधार भी सम्मिलित है; (क)

(ख) निवास गृहों के प्रयोजन के लिए;

शैक्षणिक प्रयोजन के लिए;

(ग)

(घ) वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए;

(ङ) औद्योगिक प्रयोजन के लिए, जिसमें खान तथा खनिज भी सम्मिलित हैं;

(च) उपरोक्त मद ( क ) से ( ङ) में विनिर्दिष्ट किए गए प्रयोजन से भिन्न ऐसे प्रयोजन के लिए जैसा कि राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए.

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

682( 14)

(२) जहां कोई भूमि जिस पर किसी एक प्रयोजन के लिये उपयोग में लाया जाने हेतु निर्धारण किया गया हो, किसी अन्य प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित कर दी जाए, वहां ऐसी भूमि पर देय भू- राजस्व, इस बात के होते हुए भी कि उस अवधि का, जिसके लिए कि निर्धारण नियत किया गया हो, अवसान नहीं हुआ है, उस प्रयोजन के लिए विहित दर पर निर्धारण किये जाने के दायित्वाधीन होगा जिसके कि लिए वह व्यपवर्तित कर दी गयी है.

(३) जहां कोई भूमि जो किसी प्रयोजन के लिए उपयोग में लाए जाने की शर्त पर भू- राजस्व के भुगतान से मुक्त रूप से धारित है किसी अन्य प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित कर दी जाती है, वहां वह भूमि भू- राजस्व के भुगतान के दायित्वाधीन हो जाएगी और उस पर उस प्रयोजन के लिए विहित दर पर निर्धारण किया जाएगा जिसके कि लिए वह व्यपवर्तित की गयी है.

(४) जहां किसी एक प्रयोजन के लिए उपयोग में लाए जाने वाली भूमि किसी अन्य प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित कर दी जाती है और उस पर भू- राजस्व का निर्धारण इस धारा के उपबंधों के अधीन किया जाता है वहां ऐसे व्यपवर्तन पर प्रीमियम ऐसी दर पर संदेय होगा जो कि विहित की जाए.

(५) जब कभी भूमि का निर्धारण एक प्रयोजन के लिए किया गया है और उसे अन्य प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित किया जाता है, तो भूमि स्वामी प्रीमियम की गणना करेगा तथा देय भू- राजस्व का पुनर्निर्धारण करेगा और इस प्रकार गणना की गई रकम विहित रीति में जमा करेगा.

(६) भूमिस्वामी ऐसे व्यपवर्तन की उपखण्ड अधिकारी को उपधारा ( ५ ) के अधीन रकम जमा करने की पावती के साथ लिखित प्रज्ञापना करेगा और ऐसी प्रज्ञापना की तारीख से भूमि व्यपवर्तित मानी जाएगी .

(७) उपधारा ( ६ ) के अधीन प्रज्ञापना प्राप्त होने पर, उपखण्ड अधिकारी यथाशक्य शीघ्र भूमि स्वामी द्वारा की गई गणना की शुद्धता की जांच करेगा तथा भूमि स्वामी को या तो उपधारा ( ५ ) के अधीन गणना की पुष्टि करने की या देय प्रीमियम तथा भू- राजस्व की सही रकम की संसूचना देगा. उपधारा (५) के अधीन जमा की गई रकम के, उपखण्ड अधिकारी द्वारा की गई गणना की रकम से कम होने की दशा में अंतर की राशि भूमिस्वामी द्वारा ऐसी प्रज्ञापना की प्राप्ति की तारीख से साठ दिन के भीतर संदत्त की जाएगी:

परन्तु उपधारा ( ५ ) के अधीन जमा की गई रकम उपखण्ड अधिकारी द्वारा की गई गणना से अधिक होने की दशा में अंतर की राशि साठ दिन के भीतर भूमिस्वामी को वापस की जाएगी.

(८) यदि उपखण्ड अधिकारी उपधारा ( ६ ) के अधीन प्राप्त प्रज्ञापना की तारीख से पांच वर्ष के भीतर उपधारा (७ ) के अधीन भूमिस्वामी को संसूचित करने में असफल रहता है तो, पुनर्निर्धारित भू- राजस्व की बकाया पांच वर्ष से अधिक किसी अवधि के लिये देय नहीं होगी .

(९ ) यदि भूमिस्वामी उपधारा ( ६ ) के अधीन विहित अवधि के भीतर व्यपवर्तन की प्रज्ञापना देने में असफल रहता है तो उपखण्ड अधिकारी स्वप्रेरणा से या ऐसी जानकारी प्राप्त होने पर प्रीमियम की गणना तथा ऐसे व्यपवर्तन के मद्दे देय भू- राजस्व का पुनर्निर्धारण करेगा और देय कुल रकम के पचास प्रतिशत के बराबर शास्ति भी अधिरोपित करेगाः

परन्तु पुनर्निधारित भू- राजस्व अधिकतम पांच वर्ष की अवधि के अध्यधीन रहते हुए, ऐसे व्यपवर्तन की तारीख से देय होगाः

परन्तु यह और कि मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ के प्रारंभ होने की तारीख से एक वर्ष के लिए कोई शास्ति अधिरोपित नहीं की जाएगी .

(१० ) भूमि स्वामी केवल ऐसे प्रयोजन के लिए ही भूमि व्यपवर्तित करेगा जैसा कि तत्समय प्रवृत्त भूमि के उपयोग को विनियमित करने वाली विधि के अधीन अनुज्ञेय है:

परन्तु इस धारा के अधीन भूमिस्वामी या उपखण्ड अधिकारी की कोई कार्रवाई लागू विधि के उपबंधों के प्रतिकूल भूमि के उपयोग के परिवर्तन हेतु अनुज्ञा देने वाली नहीं समझी जाएगी:

682(15)

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

परन्तु यह और कि सक्षम प्राधिकारी इस धारा के अधीन की गई किसी दण्डात्मक कार्रवाई का विचार किए बिना तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबंधों के प्रतिकूल ऐसे व्यपवर्तन के लिए भूमिस्वामी के विरुद्ध कार्रवाई कर सकेगा.

(११ ) प्रीमियम तथा पुनर्निर्धारित भू- राजस्व की गणना, यथास्थिति, उपधारा ( ६ ) के अधीन भूमिस्वामी द्वारा प्रज्ञापना की तारीख या उपधारा ( ९ ) के अधीन उपखण्ड अधिकारी द्वारा आदेश पारित करने की तारीख को प्रचलित दरों पर की जाएगी.

(१२ ) मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम , २०१८ के प्रारंभ होने के पूर्व मण्डल या किसी राजस्व अधिकारी के समक्ष लंबित इस धारा के अधीन की समस्त कार्यवाहियां समाप्त हो जाएंगी तथा उपखण्ड अधिकारी इस धारा के उपबंधों के अनुसार व्यपवर्तन के मद्दे प्रीमियम अधिरोपित करेगा और भू- राजस्व का निर्धारण करेगा. ".

धारा ६० का स्थापन .

३२. मूल अधिनियम की धारा ६० के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

" ६०. भूमि जिस पर निर्धारण नहीं किया गया है, का निर्धारण

उन समस्त भूमियों पर जिन पर निर्धारण नहीं किया गया है, भूमि का निर्धारण इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार कलेक्टर द्वारा किया जाएगा. " .

३३. मूल अधिनियम की धारा ६१ से १०३ ( दोनों सम्मिलित हैं ) को अंतर्विष्ट करने वाले अध्याय - सात तथा अध्याय - आठ के स्थान पर, निम्नलिखित अध्याय स्थापित किया जाए, अर्थात् :-

अध्याय सात तथा अध्याय आठ का स्थापन.

" अध्याय-सात

भू-सर्वेक्षण

६१. भू- सर्वेक्षण की परिभाषा " भू- सर्वेक्षण " से अभिप्रेत है-

समस्त या निम्नलिखित क्रियाकलापों में से कोई क्रियाकलाप -

(क)

(एक) भूमि का सर्वेक्षण संख्यांकों में विभाजन , विद्यमान सर्वेक्षण संख्यांकों को मान्य करना, उन्हें पुनर्गठित करना या कृषि प्रयोजनों तथा उनसे आनुषांगिक क्रियाकलापों के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि में नवीन सर्वेक्षण संख्यांक विरचित करना;

(दो ) भूमि का भूखण्ड संख्यांकों में विभाजन , विद्यमान भूखण्ड संख्यांकों को मान्य करना , उन्हें पुनर्गठित करना तथा गैर कृषि प्रयोजनों तथा उनके आनुषांगिक क्रियाकलापों के लिए उपयोग में लायी जाने वाली भूमि में नये भू- खण्ड संख्यांक विरचित करना तथा उन्हें ब्लाक में समूहीकृत करना;

( तीन) नगरेत्तर क्षेत्रों में सर्वेक्षण संख्यांकों तथा ब्लाक को ग्रामों में तथा नगरीय क्षेत्रों में सेक्टर में समूहीकृत करना तथा उनके आनुषांगिक क्रियाकलाप;

(ख) यथास्थिति, प्रत्येक सर्वेक्षण संख्यांक , ब्लाक संख्यांक या भूखण्ड संख्यांक का क्षेत्रफल , वर्तमान भूमि उपयोग तथा अन्य विशेषताओं का वर्णन करने वाली क्षेत्र पुस्तिका ( फील्ड बुक ) तैयार करना;

(ग) यथास्थिति, खेत का नक्शा तैयार करना या उसका पुनरीक्षण करना या उसमें सुधार करना;

(घ) किसी स्थानीय क्षेत्र में भू- अभिलेखों को अद्यतन रखने के उद्देश्य से अधिकार अभिलेख तैयार करना;

( ङ) कोर्ड अन्य अभिलेख तैयार करना जैसा कि विहित किया जाए .

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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६२. आयुक्त , भू-अभिलेख की नियुक्ति.- राज्य सरकार, आयुक्त, भू- अभिलेख की नियुक्ति कर सकेगी जो राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में जारी किए गए निर्देश के अध्यधीन रहते हुए, भू- सर्वेक्षण तथा भू- अभिलेखों का प्रबंध करेगा.

६३. अपर आयुक्त, भू- अभिलेख की नियुक्ति तथा उनकी शक्तियां और कर्तव्य. - ( १ ) राज्य सरकार एक या उससे अधिक अपर आयुक्त, भू-अभिलेख की नियुक्ति कर सकेगी.

(२ ) अपर आयुक्त, भू- अभिलेख ऐसे मामलों में या मामले के ऐसे वर्ग में, जैसा कि राज्य सरकार या आयुक्त, भू-अभिलेख निदेशित करे , ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगा , जो इस संहिता या उसके अधीन बनाए गए नियमों द्वारा आयुक्त, भू-अभिलेख को प्रदत्त तथा उस पर अधिरोपित किए गए हैं और अपर आयुक्त, भू- अभिलेख के संबंध में जब कि वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो तथा ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा हो , यह समझा जाएगा कि वह इस संहिता या बनाए गए किसी नियम के प्रयोजनों के लिए आयुक्त, भू- अभिलेख नियुक्त किया गया है .

६४. प्रस्थापित भू- सर्वेक्षण की अधिसूचना. ( १ ) आयुक्त, भू-अभिलेख किसी तहसील क्षेत्र में भू- सर्वेक्षण , राजपत्र में उस आशय की एक अधिसूचना प्रकाशित करके प्रारंभ कर सकेगा.

( २ ) भू- सर्वेक्षण तहसील क्षेत्र में की समस्त भूमियों पर या उसके केवल ऐसे भाग पर हो सकेगा जैसा कि आयुक्त, भू- अभिलेख उपधारा ( १ ) के अधीन जारी अधिसूचना में निर्दिष्ट करे.

( ३ ) उपधारा ( १ ) के अधीन अधिसूचित भूमियां , उक्त अधिसूचना की तारीख से तब तक भू- सर्वेक्षण के अधीन धारित समझी जाएंगी जब तक कि ऐसे भू- सर्वेक्षण को बंद किए जाने की घोषणा करने वाली अधिसूचना जारी न कर दी जाए.

६५. जिला सर्वेक्षण अधिकारी , उप सर्वेक्षण अधिकारी तथा सहायक सर्वेक्षण अधिकारी.- ( १ ) ऐसी भूमियों के संबंध में जो कि भू- सर्वेक्षण के अधीन हैं,-

(क) जिले का कलेक्टर जिला सर्वेक्षण अधिकारी होगा;

उपखण्ड का उपखण्ड अधिकारी उसके उपखण्ड के लिए उप सर्वेक्षण अधिकारी होगा, (ख)

(ग) तहसीलदार, अपर तहसीलदार या नायब तहसीलदार उनके अपने-अपने क्षेत्राधिकार के भीतर सहायक सर्वेक्षण अधिकारी होंगे.

(२) समस्त जिला सर्वेक्षण अधिकारी आयुक्त, भू-अभिलेख के अधीनस्थ होंगे.

( ३ ) जिले में के समस्त उप सर्वेक्षण अधिकारी तथा सहायक सर्वेक्षण अधिकारी जिला सर्वेक्षण अधिकारी के अधीनस्थ होंगे .

(४) उपखण्ड में के समस्त सहायक सर्वेक्षण अधिकारी , उप सर्वेक्षण अधिकारी के अधीनस्थ होंगे.

६६. जिला सर्वेक्षण अधिकारी , उप सर्वेक्षण अधिकारी तथा सहायक सर्वेक्षण अधिकारी की शक्तियां.-( 1 ) ऐसी भूमियों के संबंध में, जो कि भू- सर्वेक्षण के अधीन हैं इस संहिता के अधीन कलेक्टर, उपखण्ड अधिकारी या तहसीलदार की शक्तियां क्रमशः जिला सर्वेक्षण अधिकारी , उप सर्वेक्षण अधिकारी या सहायक सर्वेक्षण अधिकारी में निहित होंगी .

(2 ) राज्य सरकार , इस संहिता के अधीन जिला सर्वेक्षण अधिकारी की समस्त या किन्हीं भी शक्तियों को उप सर्वेक्षण अधिकारी या सहायक सर्वेक्षण अधिकारी में निहित कर सकेगी .

682( 17)

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

६७. सर्वेक्षण संख्यांक, ब्लाक संख्यांक, भू- खण्ड संख्यांक की विरचना और उनको नगरेतर क्षेत्रों में ग्रामों में तथा नगरीय क्षेत्रों में सेक्टर में समूहीकृत करना.-इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों के अध्यधीन रहते हुए, जिला सर्वेक्षण अधिकारी-

(क) उस भूमि का, जिस पर भू- सर्वेक्षण किया जाना है , मापन कराएगा तथा उस पर ऐसी संख्या में सर्वेक्षण चिन्हों को संनिर्मित कर सकेगा जितनी कि आवश्यक हों;

(ख) ऐसी भूमि को सर्वेक्षण संख्यांकों में विभाजित कर सकेगा , विद्यमान सर्वेक्षण संख्यांकों को मान्य कर सकेगा, सर्वेक्षण संख्यांकों को पुनर्गठित कर सकेगा या कृषि प्रयोजन के लिए उपयोग में लाई जाने वाली भूमि में नवीन सर्वेक्षण संख्यांक विरचित कर सकेगा;

(ग) ऐसी भूमि को ब्लाक संख्यांकों में विभाजित कर सकेगा, विद्यमान ब्लाक संख्यांकों को मान्य कर सकेगा, ब्लाक संख्यांकों को पुनर्गठित कर सकेगा या गैर कृषि प्रयोजन के लिये उपयोग में लाई जाने वाली भूमि में नवीन ब्लाक संख्यांक विरचित कर सकेगा;

(घ) ब्लाक को भू- खण्ड संख्यांकों में विभाजित कर सकेगा, विद्यमान भू- खण्ड संख्यांकों को मान्य कर सकेगा, भू- खण्ड संख्यांकों को पुनर्गठित कर सकेगा या गैर कृषि प्रयोजन के लिए उपयोग में लायी जाने वाली भूमि में नवीन भू- खण्ड संख्यांक विरचित कर सकेगा;

(ङ) नगरेतर क्षेत्रों में सर्वेक्षण संख्यांकों तथा ब्लाक को ग्रामों में तथा नगरीय क्षेत्रों में सेक्टर के रूप में समूहीकृत कर सकेगाः

परन्तु मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, १ ९७३ ( क्रमांक २३ सन् १ ९७३ ) के अधीन अनुमोदित विन्यास की सीमाओं के भीतर आने वाली किसी भूमि के भू- खण्ड इस संहिता के अधीन भू- खण्ड समझे जाएंगे:

परन्तु यह और कि यहां इसमें इसके पश्चात् यथा उपबंधित के सिवाय और क्षेत्र की अनुमोदित विकास योजना, यदि कोई हो, के अध्यधीन रहते हुए, भविष्य में न्यूनतम विहित सीमा से कम का कोई सर्वेक्षण क्रमांक या भू- खण्ड क्रमांक निर्मित नहीं किया जाएगा .

६८. सर्वेक्षण संख्यांक , ब्लाक संख्यांक तथा भूखण्ड संख्यांक को पुनर्क्रमांकित करने या उपविभाजित या समामेलित करने की शक्ति. ( १ ) जिला सर्वेक्षण अधिकारी , सर्वेक्षण संख्यांकों को या तो पुनर्क्रमांकित कर सकेगा या उन्हें उतने उपखण्डों में उपविभाजित कर सकेगा जितने कि अपेक्षित हों या भूमि में अधिकारों के अर्जन की दृष्टि से या किसी अन्य कारण से एक या एक से अधिक सर्वेक्षण संख्यांकों को एकल सर्वेक्षण संख्यांक में समामेलित कर सकेगा.

(२ ) जिला सर्वेक्षण अधिकारी , ब्लाक संख्यांकों को तथा भू- खण्ड संख्यांकों को या तो पुनर्क्रमांकित या उन्हें इतने उपखण्डों में उप विभाजित कर सकेगा जितने कि अपेक्षित हों या भूमि में अधिकारों के अर्जन की दृष्टि से या किसी अन्य कारण से एक या एक से अधिक ब्लाक संख्यांकों तथा भू- खण्ड संख्यांकों को एकल ब्लाक संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक में समामेलित कर सकेगाः

परन्तु ऐसे ब्लाक संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक का विभाजन या समामेलन नहीं होगा जहां कि ऐसा ब्लाक या भू-खण्ड या उसका कोई भाग मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम , १ ९ ७३ ( क्रमांक २३ सन् १ ९७३ ) के अधीन अनुमोदित विन्यास की सीमाओं के भीतर आता हो.

( ३ ) किसी सर्वेक्षण संख्यांक, ब्लाक संख्यांक या भू-खण्ड संख्यांक का विभाजन या समामेलन तथा उनका निर्धारण इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार किया जाएगा.

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

682( 18)

(४) जिला सर्वेक्षण अधिकारी , एक या एक से अधिक भू- खण्ड संख्यांकों को किसी ब्लाक से निकालकर या एक या एक से अधिक भू- खण्ड संख्यांकों को उससे लगे हुए ब्लाक में जोड़कर किसी ब्लाक को परिवर्तित कर सकेगा.

( ५ ) जहां कोई खाता कई सर्वेक्षण संख्यांकों तथा भू- खण्ड संख्यांकों से मिलकर बना हो वहां जिला सर्वेक्षण अधिकारी, प्रत्येक सर्वेक्षण संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक के लिए देय भू- राजस्व का निर्धारण करेगा.

(६ ) जब कभी सर्वेक्षण संख्यांकों, ब्लाक संख्यांकों या भू- खण्ड संख्यांकों को पुनर्क्रमांकित किया जाए तो जिला सर्वेक्षण अधिकारी इस संहिता के अधीन तैयार किए गए या संधारित किए गए समस्त अभिलेखों में प्रविष्टियों की शुद्धि करेगा.

६९. भू- अभिलेख में सर्वेक्षण संख्यांकों, ब्लाक संख्यांकों तथा भू- खण्ड संख्यांकों तथा उनके उप खण्डों की प्रविष्टि.- सर्वेक्षण संख्यांकों और भू- खण्ड संख्यांकों तथा उनके उप खंडों के क्षेत्रफल तथा उनका निर्धारण और ब्लॉक संख्यांकों के क्षेत्रफल की प्रविष्टि भू-अभिलेख में ऐसी रीति में की जाएगी जैसी कि विहित की जाए.

७०. ग्राम की आबादी का अवधारण.-जिला सर्वेक्षण अधिकारी प्रत्येक बसे हुए ग्राम की दशा में भूमियों में के अधिकारों का सम्यक् ध्यान रखते हुए, निवासियों के निवास के लिए या उससे आनुषांगिक प्रयोजनों के लिए आरक्षित किए जाने वाला क्षेत्रफल अभिनिश्चित करेगा तथा अवधारित करेगा और ऐसे क्षेत्रफल को ग्राम की आबादी समझा जाएगा .

७१. ग्रामों और सेक्टर को विभाजित या सम्मिलित करने या उनमें से किसी क्षेत्र को अपवर्जित करने की जिला सर्वेक्षण अधिकारी की शक्ति. ( १ ) जिला सर्वेक्षण अधिकारी , इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार दो या अधिक ग्रामों का गठन करने के लिए किसी ग्राम को विभाजित कर सकेगा या दो या अधिक ग्रामों को सम्मिलित कर एक ग्राम गठित कर सकेगा या किसी ग्राम की सीमाओं को, उसमें किसी ऐसे ग्राम के , जो उसके सामीप्य में हो , किसी क्षेत्र को सम्मिलित करके अथवा उसमें समाविष्ट किसी क्षेत्र को उसमें से अपविर्जत करके, परिवर्तित कर सकेगा.

(२ ) जिला सर्वेक्षण अधिकारी इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार दो या दो से अधिक सेक्टर का गठन करने के लिए किसी सेक्टर को विभाजित कर सकेगा या दो या अधिक सेक्टरों को एक सेक्टर गठित करने के प्रयोजन से सम्मिलित कर सकेगा या किसी सेक्टर की सीमाओं को, उसमें किसी ऐसे सेक्टर के, जो कि उसके सामीप्य में हों, किसी क्षेत्र को सम्मिलित करके अथवा उसमें समाविष्ट किसी क्षेत्र को उसमें से अपवर्जित करके परिवर्तित कर सकेगा.

करेगा. ७२. निर्धारण.-जिला सर्वेक्षण अधिकारी प्रत्येक खाते पर, ऐसी दरों पर, जैसी विहित की जाएं, निर्धारण नियत ७३. समस्त भूमियां निर्धारण के दायित्वाधीन होंगी.- जिला सर्वेक्षण अधिकारी ऐसी समस्त भूमियों पर, जिन पर सर्वेक्षण विस्तारित होता है , निर्धारण करेगा, चाहे ऐसी भूमियां भू- राजस्व के भुगतान के दायित्वाधीन हों या न हों .

७४. नक्शे तथा अभिलेख रखने का जिला सर्वेक्षण अधिकारी का कर्तव्य. जब कोई क्षेत्र भूमि सर्वेक्षण के अधीन हो, तो , ऐसे क्षेत्र के नक्शे तथा अभिलेख रखने का कर्तव्य, कलेक्टर के पास से जिला सर्वेक्षण अधिकारी को अंतरित हो जायेगा जो इसके बाद अध्याय- नौ से अठारह के किन्हीं उपबंधों के अधीन कलेक्टर, को प्रदत्त की गई समस्त शक्तियों का प्रयोग करेगा.

७५. गलतियों को ठीक करने की उपखण्ड अधिकारी की शक्ति. उपखण्ड अधिकारी भू- सर्वेक्षण बंद हो जाने के पश्चात् किसी भी समय सर्वेक्षण में हुई गलती अथवा अंकगणितीय अशुद्ध गणना के कारण किसी सर्वेक्षण संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक अथवा ब्लाक संख्यांक के क्षेत्रफल अथवा निर्धारण में हुई किसी गलती को ठीक कर सकेगा:

परन्तु ऐसी गलती को ठीक करने के कारण भू- राजस्व का कोई बकाया देय नहीं होगा.

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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

७६. भू- सर्वेक्षण के अधीन न आने वाले क्षेत्रों में, इस अध्याय के अधीन उपबंधित शक्तियों का प्रयोग कलेक्टर, उपखण्ड अधिकारी तथा तहसीलदार द्वारा किया जाना. ऐसे क्षेत्र में, जो भू- सर्वेक्षण के अधीन नहीं है कलेक्टर, उपखण्ड अधिकारी या तहसीलदार अपनी-अपनी अधिकारिता के भीतर, इस अध्याय के अधीन उपबंधित क्रमशः जिला सर्वेक्षण अधिकारी, उप सर्वेक्षण अधिकारी, सहायक सर्वेक्षण अधिकारी की शक्तियों का प्रयोग करेंगे .

७७. नियम बनाने की शक्ति. - राज्य सरकार इस अध्याय के अधीन भू- सर्वेक्षण को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी . ".

३४. मूल अधिनियम की धारा १०४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः-

धारा १०४ का स्थापन.

" १०४. नगरेतर क्षेत्र में पटवारी हल्कों की विरचना तथा नगरीय क्षेत्रों में सेक्टरों की विरचना और पटवारियों तथा नगर सर्वेक्षकों की नियुक्ति.-

(१ ) आयुक्त, भू-अभिलेख , प्रत्येक तहसील के लिए ग्रामों को पटवारी हल्कों में विन्यस्त करेगा तथा प्रत्येक नगरीय क्षेत्र को सेक्टर में विभाजित करेगा और किसी भी समय विद्यमान पटवारी हल्कों या सेक्टर की सीमाओं में परिवर्तन कर सकेगा तथा नवीन पटवारी हल्कों या सेक्टरों का सृजन कर सकेगा या विद्यमान पटवारी हल्कों या सेक्टरों को समाप्त कर सकेगा.

(२ ) कलेक्टर, शुद्ध भू- अभिलेखों को रखने के लिए तथा ऐसे अन्य कर्तव्यों के लिए जैसे कि विहित किए जाएं, प्रत्येक पटवारी हल्के में एक पटवारी तथा प्रत्येक सेक्टर में एक नगर सर्वेक्षक की नियुक्तिकरेगा.

(३ ) उपधारा ( १ ) के अधीन नगरीय क्षेत्र में सेक्टर की विरचना होने तक मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम, २०१८ के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व इसमें विद्यमान प्रत्येक ग्राम एक सेक्टर के रूप में समझा जाएगा तथा ऐसे ग्राम के सुसंगत भू- अभिलेख ऐसे सेक्टर के भू-अभिलेख समझे जाएंगे. ".

३५ मूल अधिनियम की धारा १०५ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः-

धारा १०५ का स्थापन.

" १०५. नगरेतर क्षेत्र में राजस्व निरीक्षक वृत्तों की विरचना.-आयुक्त, भू-अभिलेख , किसी तहसील में के पटवारी हल्कों को, राजस्व निरीक्षक वृत्तों में विन्यस्त करेगा और किसी भी समय किसी वृत्त की सीमाओं में परिवर्तन कर सकेगा तथा नवीन वृत्तों का सृजन कर सकेगा या विद्यमान को समाप्त कर सकेगा. ".

३६. मूल अधिनियम की धारा १०६ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः-

धारा १०६ का स्थापन.

" १०६. नगरेतर क्षेत्रों में राजस्व निरीक्षकों की नियुक्ति.-कलेक्टर , प्रत्येक राजस्व निरीक्षक वृत्त में, भू- अभिलेखों को तैयार किए जाने तथा संधारण , पर्यवेक्षण करने तथा ऐसे अन्य कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए, जैसे कि विहित किए जाएं, राजस्व निरीक्षक को नियुक्त कर सकेगा. " .

३७. मूल अधिनियम की धारा १०७ के स्थान पर निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः-

धारा १०७ का स्थापन .

" १०७. ग्राम, आबादी, ब्लाक तथा सेक्टर के नक्शे. ( १ ) प्रत्येक ग्राम के लिए-

(क) सर्वेक्षण- संख्यांकों तथा ब्लाक संख्यांकों की सीमाओं को दर्शाने वाला एक नक्शा तैयार किया जाएगा जो कि " ग्राम का नक्शा " कहलाएगा;

(ख) आबादी के लिए धारकों द्वारा अधिभोग में रखा गया क्षेत्र तथा वह क्षेत्र जो ऐसे अधिभोग में न हो, दर्शाने वाला, पृथक् पृथक् भू- खण्ड संख्यांक तथा ऐसी अन्य विशिष्टयां देते हुए जैसी कि विहित की जाएं, एक नक्शा तैयार किया जाएगा जो कि " आबादी का नक्शा " कहलायेगाः मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

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(ग ) व्यवर्तित की गई भूमियों के लिए, धारकों द्वारा अधिभोग में रखा गया क्षेत्र, पृथक् पृथक् भू- खण्ड संख्यांक तथा ऐसी अन्य विशिष्टियां देते हुए जैसी कि विहित की जाएं, एक नक्शा तैयार किया जाएगा जो कि " ब्लाक का नक्शा " कहलाएगा.

( २ ) प्रत्येक नगरीय क्षेत्र में, धारकों द्वारा अधिभोग में रखा गया क्षेत्र तथा वह क्षेत्र जो ऐसे अधिभोग में न हो, दर्शाने वाला पृथक् पृथक् भू- खण्ड संख्यांक तथा ऐसी अन्य विशिष्टियां देते हुए, जैसी कि विहित की जाएं, प्रत्येक सेक्टर के लिए एक नक्शा तैयार किया जाएगा जो कि " सेक्टर का नक्शा " कहलाएगा.

(३ ) उपधारा ( १ ) तथा ( २ ) के अधीन नक्शा ऐसे पैमाने ( स्केल ) पर तैयार किया जाएगा जो कि विहित किया जाए. ".

धारा १०८ का

३८. मूल अधिनियम की धारा १०८ के स्थान पर , निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः- स्थापन

" १०८. अधिकार अभिलेख. ( १ ) प्रत्येक ग्राम क्षेत्र तथा प्रत्येक नगरीय क्षेत्र के प्रत्येक सेक्टर के लिए अधिकार अभिलेख इस संबंध में बनाए गए नियमों के अनुसार तैयार किया जाएगा तथा रखा जाएगा और ऐसे अभिलेख में निम्नलिखित विशिष्टियां सम्मिलित होगी:-

(क) समस्त भूमिस्वामियों के नाम, उनके द्वारा धारित सर्वेक्षण संख्यांकों या भू- खण्ड संख्यांकों तथा वह प्रयोजन जिसके लिए वे उपयोग किए जा रहे हों और उनके क्षेत्रफल तथा कृषि के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि की दशा में सिंचाई की स्थिति, सहित;

(ख ) समस्त सरकारी पट्टेदारों के नाम तथा पट्टेदारों के ऐसे वर्ग जो कि राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, उनके द्वारा धारित सर्वेक्षण संख्यांकों या भू- खण्ड संख्यांकों का तथा वह प्रयोजन जिसके लिए उनका उपयोग किया जा रहा हो तथा उनके क्षेत्रफल और कृषि प्रयोजन के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि की दशा में सिंचाई की स्थिति, सहित;

(ग) ग्राम की आबादी में अधिभोग रखने वाले समस्त व्यक्तियों या यथा स्थिति नगरीय क्षेत्र में की ऐसी भूमि में अधिभोग रखने वाले समस्त व्यक्तियों के नाम जो कि ऐसे नगरीय क्षेत्र के गठन के पूर्व ग्राम की आबादी थी , भूमि में उनके हित की प्रकृति, उनके द्वारा धारित भू- खण्ड संख्यांकों तथा वह प्रयोजन जिसके लिए भूमि उपयोग में लायी जा रही हो, सहित;

(घ) राज्य सरकार द्वारा या किसी अधिनियमिति के अधीन अधिकृत व्यक्ति द्वारा या राज्य सरकार या केन्द्र सरकार के निदेश के अधीन किसी व्यक्ति को समनुदेशित की गई या दी गई भूमि में हित की प्रकृति तथा उसकी सीमा, निम्न सहित-

( एक ) ऐसे व्यक्तियों के अपने-अपने हितों के प्रकार और शर्तें तथा दायित्व , यदि कोई हों;

(दो ) ऐसे व्यक्तियों द्वारा देय भू- राजस्व या भू- भाटक, यदि कोई हो; और

(तीन ) ऐसी अन्य विशिष्टियां जो कि विहित की जाएं.

(२ ) उपधारा ( १ ) में वर्णित अधिकार अभिलेख , राजस्व सर्वेक्षण के दौरान या जब कभी भी राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा , ऐसा निदेश दे, तैयार किया जाएगा. ".

धारा १० ९ का

३ ९. मूल अधिनियम की धारा १० ९ के स्थान पर निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए , अर्थात्ः- स्थापन

" १० ९ . अधिकारों के अर्जन की रिपोर्ट की जाएगी: - ( १ ) कोई भी व्यक्ति, जो भूमि में पूर्ण अधिकार हित विधिपूर्वक अर्जित करता है, अपने द्वारा ऐसा अधिकार अर्जित किए जाने की रिपोर्ट ऐसे अर्जन की तारीख से छह मास के भीतर विहित प्ररूप में देगा.- 682(21)

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

(

क) नगरेतर क्षेत्र में स्थित भूमि की दशा में पटवारी को या इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या तहसीलदार को,

(ख ) नगरीय क्षेत्र में स्थित भूमि की दशा में नगर सर्वेक्षक को या इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या तहसीलदार कोः

परन्तु जब अधिकार अर्जित करने वाला व्यक्ति अवस्यक हो या अन्यथा निरर्हित हो, तो उसका संरक्षक या ऐसा अन्य व्यक्ति, जो उसकी संपत्ति का भारसाधक हो, पटवारी या नगर सर्वेक्षक या. अधिकृत व्यक्ति या तहसीलदार को ऐसी रिपोर्ट करेगा.

"

स्पष्टीकरण एक : ऊपर वर्णित किए गए अधिकार के अन्तर्गत कोई सुखाचार या संपत्ति अन्तरण अधिनियम, १८८२ ( १८८२ का अधिनियम संख्यांक ४ ) की धारा १०० में विनिर्दिष्ट किए गए प्रकार का कोई ऐसा भार, जो कि बंधक की कोटि में नहीं आता है, नहीं है.

स्पष्टीकरण दो : कोई ऐसा व्यक्ति जिसके कि पक्ष में किसी बंधक का मोचन हो जाए या भुगतान कर दिया जाए या किसी पट्टे का पर्यवसान हो जाए, इस धारा के अर्थ के अंतर्गत् अधिकार अर्जित करता है.

स्पष्टीकरण तीन : इस धारा के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षित लिखित प्रज्ञापना या तो संदेशवाहक की मार्फत दी जा सकेगी या व्यक्तिशः सौंपी जा सकेगी या रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा भेजी जा सकेगी या ऐसी अन्य रीति में भेजी जा सकेगी जैसी कि विहित की जाए.

स्पष्टीकरण चार : इस धारा के प्रयोजन के लिए " अन्यथा निरर्हित " में सम्मिलित है निःशक्तजन अधिकार अधिनियम , २०१६ (२०१६ का ४९ ) की धारा २ के खण्ड ( ५ ) में यथा परिभाषित निःशक्तजन हैं.

(२ ) जब कोई ऐसा दस्तावेज जिसके कि द्वारा ऐसी भूमि, जो कृषि प्रयोजन के लिए उपयोग में लायी जाती है या जिसके संबंध में एक खसरा तैयार किया गया है, कोई हक या उस पर कोई भार सृजित किया जाना , समनुदेशित किया जाना या निर्वापित किया जाना तात्पर्यित हो , भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, १ ९ ०८ ( १ ९ ०८ का १६ ) के अधीन रजिस्ट्रकृत की जाती है तो रजिस्ट्रीकरण अधिकारी , उस क्षेत्र पर, जिसमें भूमि स्थित है , अधिकारिता रखने वाले तहसीलदार को ऐसे प्ररुप में तथा ऐसे समय पर, जैसी कि विहित किया जाए, प्रज्ञापना भेजेगा.

(३ ) ऐसा कोई व्यक्ति जिसके अधिकारों, हित या दायित्वों का इस अध्याय के अधीन किसी अभिलेख या रजिस्टर में प्रविष्ट किया जाना अपेक्षित हो या जो उसमें प्रविष्ट किये जा चुके हों किसी राजस्व अधिकारी, राजस्व निरीक्षक, नगर सर्वेक्षक या पटवारी की, जो अभिलेख या रजिस्टर का संकलन करने या उसको संशोधित करने में लगा हो, लिखित अध्यपेक्षा पर इस बात के लिए आबद्ध होगा कि वह उस अभिलेख या रजिस्टर के सही संकलन या संशोधन के लिए आवश्यक समस्त ऐसी जानकारी या दस्तावेज , जो उसकी जानकारी में या उसके कब्जे या अधिकार में हो, ऐसी अध्यपेक्षा की जाने की तारीख से एक मास के भीतर, उसके निरीक्षण के लिए दे या पेश करे. प्रस्तुत की गयी जानकारी या पेश किए गए दस्तावेज की लिखित अभिस्वीकृति व्यक्ति को दी जाएगी .

(४ ) कोई भी व्यक्ति, जो विनिर्दिष्ट की गयी कालावधि के भीतर उपधारा ( १ ) द्वारा अपेक्षित की गयी रिपोर्ट करने में या उपधारा ( ३ ) द्वारा अपेक्षित की गयी जानकारी देने में या दस्तावेज पेश करने की उपेक्षा करेगा तो वह तहसीलदार के स्वविवेक पर पांच हजार रुपये से अनधिक की शास्ति का दायी होगा.

(५ ) इस धारा के अधीन किसी अधिकार अर्जन से संबंधित किसी ऐसी रिपोर्ट के बारे में जो विनिर्दिष्ट की गयी कालावधि के पश्चात्, प्राप्त हुई हो, धारा ११० के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही की जाएंगी.".

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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४०. मूल अधिनियम की धारा ११० के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः- धारा ११० का स्थापन.

" ११०. भू- अभिलेखों में अधिकार-अर्जन बाबत् नामांतरण.-( १ ) पटवारी या धारा १० ९ के अधीन नगर सर्वेक्षक या अधिकृत व्यक्ति अधिकार के प्रत्येक ऐसे अर्जन के, जिसकी कि रिपोर्ट उसे धारा १० ९ के अधीन की गयी हो या जो किसी अन्य स्त्रोत से प्राप्त सूचना पर उसकी जानकारी में आये, उस रजिस्टर में दर्ज करेगा जो कि उस प्रयोजन के लिए विहित किया गया है .

( २ ) यथास्थिति, पटवारी या नगर सर्वेक्षक या अधिकृत व्यक्ति अधिकार - अर्जन संबंधी समस्त ऐसी रिपोर्ट जो कि उपधारा ( १ ) के अधीन उसे प्राप्त हुई हों, ऐसी रीति में तथा ऐसे प्ररूप में जो कि विहित किया जाए, उसके द्वारा उसे प्राप्त होने के तीस दिन के भीतर तहसीलदार को प्रज्ञापित करेगा.

(३ ) धारा १० ९ के अधीन प्रज्ञापना के प्राप्त होने पर या किसी अन्य स्रोत से ऐसे अधिकार अर्जन की प्रज्ञापना के प्राप्त होने पर, तहसीलदार पंद्रह दिन के भीतर, -

(क ) अपने न्यायालय में मामला पंजीकृत करेगा;

(ख) हितबद्ध समस्त व्यक्तियों को तथा ऐसे अन्य व्यक्तियों तथा प्राधिकारियों को, जो कि विहित किए जाएं, ऐसे प्ररूप में तथा विहित रीति में नोटिस जारी करेगा; और (ग) अपने कार्यालय के सूचना पटल पर प्रस्तावित नामांतरण से संबंधित नोटिस चस्पा करेगा तथा उसे संबंधित ग्राम या सेक्टर में विहित रीति में प्रकाशित करेगा;

(४ ) तहसीलदार हितबद्ध व्यक्तियों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, तथा ऐसी और जांच , जो वह आवश्यक समझे , करने के पश्चात्, नामांतरण से संबंधित आदेश मामला पंजीकृत होने की तारीख से अविवादित मामले की दशा में तीस दिवस में एवं विवादित मामले की दशा में पांच मास में पारित करेगा तथा यथास्थिति, ग्राम के खसरे या सेक्टर के खसरे में तथा ऐसे अन्य भू- अभिलेख में आवश्यक प्रविष्टि करेगा.

(५ ) तहसीलदार उपधारा ( ४ ) के अधीन पारित किये गये आदेश तथा अद्यतन भू- अभिलेखों की प्रमाणित प्रति विहित रीति में तीस दिन के भीतर पक्षकारों निःशुल्क प्रदाय करेगा और उसके पश्चात् मामले को बंद करेगा:

परन्तु यदि अपेक्षित प्रतियां विनिर्दिष्ट कलावधि के भीतर प्रदाय नहीं की जाती हैं तो तहसीलदार कारण अभिलिखित करेगा तथा उपखण्ड अधिकारी को रिपोर्ट देगा.

(६) धारा ३५ में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी , इस धारा के अधीन कोई मामला किसी पक्षकार की अनुपस्थिति में खारिज नहीं किया जाएगा तथा गुणागुण क्रम में निपटाया जाएगा.

(७ ) इस धारा के अधीन समस्त कार्यवाहियां पंजीकरण होने की तारीख से अविवादित मामले के संबंध में दो माह के भीतर पूर्ण की जाएगी तथा विवादित कार्यवाहियों के मामले के छह माह के भीतर पूरी की जाएंगी . उस दशा में , जहां कार्यवाहियां विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर निराकृत नहीं की जाती हैं, तो तहसीलदार, लंबित मामलों की जानकारी की रिपोर्ट ऐसे प्ररूप तथा रीति में, जैसा कि विहित किया जाए, कलेक्टर को देगा. ".

४१. मूल अधिनियम की धारा ११२ का लोप किया जाए.

धारा ११२ का लोप

४२. मूल अधिनियम की धारा ११३ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः- धारा ११३ का स्थापन.

" ११३. अधिकार अभिलेख में गलतियों का शुद्धिकरण. कलेक्टर, किसी भी समय , लेखन संबंधी किन्हीं भी गलतियों को तथा किन्हीं भी ऐसी गलतियों को जिनके कि संबंध में हितबद्ध पक्षकार यह स्वीकार करते हों, कि वे धारा १०८ के अधीन तैयार किए गए अधिकार अभिलेख में हुई हैं. शुद्ध कर सकेगा या शुद्ध करवा सकेगा. " .

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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

४३..-मूल अधिनियम की धारा ११४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः- धारा ११४ का स्थापन.

" ११४. भू- अभिलेख ( १ ) निम्नलिखित भू- अभिलेख प्रत्येक ग्राम के लिए तैयार किए जाएंगे , अर्थात्ः-

(क) ग्राम का नक्शा, आबादी का नक्शा तथा धारा १०७ के अधीन ब्लॉक का नक्शा;

(ख) धारा १०८ के अधीन अधिकार- अभिलेख;

(ग) ग्राम का खसरा या ग्राम की क्षेत्र पुस्तक ऐसे प्ररूप में , जैसा कि विहित की जाए;

(घ) धारा ११४- क के अधीन भू-अधिकार पुस्तिका;

(ङ) ( एक) धारा २३३ के अधीन समस्त दखल रहित भूमि के ब्यौरे ;

(दो) धारा २३४ के अधीन निस्तार पत्रक;

(तीन) धारा २४२ के अधीन वाजिब- उल-अर्ज, यदि कोई हो;

(च) व्यपवर्तित की गई भूमि के ब्यौरे ; और

(छ) कोई अन्य अभिलेख जो कि विहित किए जाएं.

( २ ) प्रत्येक नगरीय क्षेत्र में प्रत्येक सेक्टर के लिए निम्नलिखित भू-अभिलेख तैयार किए जाएंगे , अर्थात्ः-

(क) धारा १०७ के अधीन सेक्टर का नक्शा;

(ख ) धारा १०८ के अधीन अधिकारअभिलेख;

(ग ) सेक्टर का खसरा या सेक्टर की क्षेत्र पुस्तिका ऐसे प्ररूप में जो कि विहित की जाए;

(घ) धारा ११४ - क के अधीन भू-अधिकार पुस्तिका;

(ङ) ( एक) धारा २३३ के अधीन समस्त दखल रहित भूमि के ब्यौरे;

(दो) धारा २३३ - क के अधीन लोक प्रयोजनों के लिए आरक्षित भूमि;

(च) व्यपवर्तित की गयी भूमि के ब्यौरे ; और

(छ) कोई अन्य अभिलेख जो कि विहित किए जाएं. ".

धारा ११४- क का ४४. मूल अधिनियम की धारा ११४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्ः-

स्थापन.

" ११४- क. भू-अधिकार पुस्तिका. ( १ ) तहसीलदार, ऐसे प्रत्येक भूमिस्वामी को , जिसका नाम धारा

११४ के अधीन तैयार किए गए खसरे में प्रविष्ट है , यथास्थिति , किसी ग्राम में के या सेक्टर में के उसके समस्त खातों के बारे में एक भू- अधिकार पुस्तिका , ऐसे प्ररूप में तथा ऐसी फीस के, जो कि विहित की जाए, भुगतान करने पर उसे उपलब्ध कराएगा .

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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(२) भू- अधिकार पुस्तिका दो भागों से मिलकर एक पुस्तक के रूप में आबद्ध होगी जिसमें ऐसी विशिष्टयां अन्तर्विष्ट होंगी जो कि विहित की जाएं.

(३) तहसीलदार स्वप्रेरणा से या भूमिस्वामी के आवेदन पर, ऐसी जांच करने के पश्चात , जैसी कि वह उचित समझे, भू- अधिकार पुस्तिका में किसी गलत या अशुद्ध प्रविष्टि को शुद्ध कर सकेगा. ".

४५. मूल अधिनियम की धारा ११५ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - धारा ११५ का स्थापन .

" ११५. भू-अभिलेख में गलत या अशुद्ध प्रविष्टि का शुद्धिकरण: -( १ ) उपखण्ड अधिकारी स्वप्रेरणा से या व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर, भू- अधिकार पुस्तिका तथा अधिकार अभिलेख को छोड़कर धारा ११४ के अधीन तैयार किये गए भू- अभिलेखों में अप्राधिकृत प्रविष्टियों को सम्मिलित करते हुए गलत या अशुद्ध प्रविष्टि को, ऐसी जांच जैसी कि वह उचित समझे करने के पश्चात् शुद्ध कर सकेगा और ऐसी शुद्धियां उसके द्वारा अधिप्रमाणित की जाएंगी :

परन्तु कलेक्टर की लिखित मंजूरी के बिना पांच वर्ष की कालावधि के पूर्व की किसी प्रविष्टि को शुद्ध करने की कार्रवाई प्रारंभ नहीं की जाएगी.

उपधारा ( १ ) के अधीन कोई आदेश-

(२)

संबंधित तहसीलदार से लिखित रिपोर्ट प्राप्त किये; और

(क)

(ख) सभी हितबद्ध पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए; बिना पारित नहीं किया जाएगा :

परन्तु यदि सरकार का हित निहित है तो उपखण्ड अधिकारी , मामला कलेक्टर को प्रस्तुत करेगा.

(३) उपधारा ( २ ) के अधीन मामला प्राप्त होने पर कलेक्टर ऐसी जांच जैसी कि वह ठीक समझे, करेगा और ऐसा आदेश पारित करेगा जैसा कि वह उचित समझे. ".

धारा ११६ का लोप.

४६. मूल अधिनियम की धारा ११६ का लोप किया जाए.

धारा ११८ का लोप.

४७. मूल अधिनियम की धारा ११८ का लोप किया जाए.

४८. मूल अधिनियम की धारा ११ ९ का लोप किया जाए .

धारा ११ ९ का लोप.

४९ . मूल अधिनियम की धारा १२० में , शब्द " मापक " के स्थान पर, शब्द ' नगर सर्वेक्षक ' स्थापित किए जाएं.

धारा १२० का संशोधन.

५०. मूल अधिनियम की धारा १२१ का लोप किया जाए.

धारा १२१ का लोप.

५१. मूल अधिनियम की धारा १२४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - धारा १२४ का स्थापन.

" १२४. ग्रामों, सेक्टरों तथा सर्वेक्षण संख्यांकों या भू- खण्ड संख्यांकों के सीमा चिन्हों का संनिर्माण.- ( १ ) समस्त ग्रामों तथा सेक्टरों की सीमाएं नियत की जाएंगी तथा स्थायी सीमा चिन्हों द्वारा उनको सीमांकित किया जाएगा.

(२) राज्य सरकार, किसी भी ग्राम या सेक्टर के संबंध में , अधिसूचना द्वारा यह आदेश दे सकेगी कि किसी ग्राम या सेक्टर या उसके भाग के समस्त सर्वेक्षण संख्यांकों, ब्लाक संख्यांकों या भू-खण्ड संख्यांकों की भी सीमाएं नियत की जाएं तथा सीमा चिन्हों द्वारा उनको सीमांकित भी किया जाए.

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(३) ऐसे सीमा चिन्ह इसमें इसके पश्चात् अंतर्विष्ट उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए ऐसे विनिर्दिष्ट के होंगे तथा ऐसी रीति में सन्निर्मित तथा अनुरक्षित किए जाएंगे , जैसा कि विहित किया जाए.

(४) प्रत्येक भू- धारक, भूमि पर बनाए गए स्थायी सीमा- चिन्हों के अनुरक्षण तथा उनकी मरम्मत के लिए उत्तरदायी होगा. ".

५२. मूल अधिनियम की धारा १२५ में, -

धारा १२५ का संशोधन.

पार्श्व शीर्ष, और उपबंध में, शब्द " ग्रामों, सर्वेक्षण संख्यांकों तथा भू- खण्ड संख्यांकों " के स्थान पर, शब्द, " ग्रामों, सेक्टरों, सर्वेक्षण संख्यांकों, ब्लाक संख्यांकों तथा भू- खण्ड संख्यांकों " स्थापित किए जाएं.

५३. मूल अधिनियम की धारा १२६ में,-

धारा १२६ का संशोधन.

(एक) उपधारा ( १ ) में, शब्द " संक्षेपतः बेदखल " के स्थान पर , शब्द " विहित रीति में संक्षेपतः बेदखल " स्थापित किए जाएं;

(दो) उपधारा ( २ ) तथा ( ३ ) का लोप किया जाए.

५४. मूल अधिनियम की धारा १२७ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा १२७ का स्थापन.

" १२७. सीमांकन तथा सीमा पंक्तियों का अनुरक्षण :- ( १ ) ग्राम की सड़क या सेक्टर की सड़क या दखलरहित भूमि या सामुदायिक प्रयोजनों के लिए आरक्षित की गई भूमि से लगी हुई भूमि का प्रत्येक धारक, अपने स्वयं के खर्चे से तथा विहित रीति में-

(क) अपनी भूमि तथा उससे लगी हुई ग्राम की सड़क या सेक्टर की सड़क या दखलरहित भूमि अथवा सामुदायिक प्रयोजनों के लिए आरक्षित की गई भूमि के बीच सीमा चिन्ह लगाएगा; और

(ख) समय- समय पर ऐसे सीमा- चिन्हों की मरम्मत तथा उनका नवीकरण करेगा.

(२) यदि धारक, उपधारा ( १ ) द्वारा अपेक्षित किए गए अनुसार सीमा- चिन्ह नहीं लगाता है या सीमा चिन्हों की मरम्मत या उनका नवीकरण नहीं करता है तो तहसीलदार, ऐसी सूचना के पश्चात्, जैसा कि वह ठीक समझे , सीमा चिन्ह लगवा सकेगा या सीमा चिन्हों की मरम्मत या उनका नवीकरण करवा सकेगा तथा उपगत किया गया खर्च भू- राजस्व की बकाया के तौर पर वसूली कर सकेगा.

स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजनों के लिए " ग्राम की सड़क या सेक्टर की सड़क " से अभिप्रेत है कोई ऐसी सड़क जिस पर कोई उपदर्शक सर्वेक्षण संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक अंकित हो. ".

धारा १२८ का

संशोधन.

५५. मूल अधिनियम की धारा १२८ में, उपधारा ( १ ) में, शब्द " प्रतिवर्ष नवम्बर मास की समाप्ति के पश्चात्, ग्राम का पटेल " के स्थान पर, शब्द " पटवारी या नगर सर्वेक्षक " स्थापित किए जाएं.

५६. मूल अधिनियम की धारा १२ ९ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

धारा १२ ९ का स्थापन.

" १२ ९. सर्वेक्षण संख्यांक या सर्वेक्षण संख्यांक के उपखण्ड या ब्लाक संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक का सीमांकन.- ( १ ) तहसीलदार, किसी पक्षकार के आवेदन पर, राजस्व निरीक्षक अथवा नगर सर्वेक्षक को किसी सर्वेक्षण संख्यांक की या किसी सर्वेक्षण संख्यांक के उप खण्ड की, या किसी ब्लाक संख्यांक की या भू-खण्ड संख्यांक की सीमाओं का सीमांकन और उस पर सीमा चिन्ह संनिर्मित करने के लिए प्रतिनियुक्त कर सकेगा.

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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(२) इस प्रकार प्रतिनियुक्त किया गया राजस्व निरीक्षक या नगर सर्वेक्षक, पड़ोस के भूमि धारकों सहित हितबद्ध पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात्, सर्वेक्षण संख्यांक की या सर्वेक्षण संख्यांक के किसी उपखण्ड की या ब्लाक संख्यांक की या भू- खण्ड संख्यांक की सीमाओं का सीमांकन करेगा और उस पर सीमा चिन्ह सन्निर्मित करेगा तथा तहसीलदार को, ऐसी रीति में जैसी कि विहित की जाए, एक सीमांकन रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा. सीमांकन रिपोर्ट में सीमांकित की गई भूमि पर भूमिस्वामी से भिन्न किसी व्यक्ति के कब्जे से संबंधित विशिष्टयां भी सम्मिलित की जाएंगी.

(३) राजस्व निरीक्षक या नगर सर्वेक्षक सीमांकन के क्रियान्वयन के समय ऐसी एजेंसी की सहायता ऐसी रीति से ले सकेगा , जैसी कि विहित की जाए.

( ४) तहसीलदार, सीमांकन रिपोर्ट की प्राप्ति पर, हितबद्ध पक्षकारों सहित पड़ोस वाले भू- धारकों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, सीमांकन रिपोर्ट की पुष्टि कर सकेगा या ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह उचित समझे.

(५) उपधारा (४ ) के अधीन सीमांकन रिपोर्ट की पुष्टि से व्यथित पक्षकार निम्नलिखित आधारों में से किसी आधार पर उपखण्ड अधिकारी को अपास्त करने हेतु आवेदन कर सकेगा- (क) कि उसे उपधारा ( २ ) के अधीन अपेक्षित सूचना नहीं दी गयी थी या धारा ( ४ ) के अधीन सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था, या;

कोई अन्य पर्याप्त आधार :

(ख)

परन्तु ऐसा आवेदन , तहसीलदार द्वारा सीमांकन रिपोर्ट की पुष्टि की तारीख या ऐसे सीमांकन के ज्ञात होने की तारीख, इनमें जो भी बाद की हो, पैंतालीस दिनों के अवसान पश्चात् ग्रहण नहीं किया जाएगा.

(६) उपखण्ड अधिकारी , यदि वह उपधारा ( ५ ) के अधीन किए गए आवेदन को स्वीकृत करता है, तो वह हितबद्ध पक्षकारों सहित पड़ोस वाले भू- धारकों को सुनवाई का अवसर देने तथा ऐसी जांच करने, जैसा कि वह उचित समझे, के पश्चात् या तो वह उपधारा ( २ ) के अधीन प्रस्तुत किए गए सीमांकन प्रतिवेदन की पुष्टि करेगा या एक बार फिर से सीमांकन करने के लिए एक दल को प्रतिनियुक्त कर सकेगा जिसमें ऐसे व्यक्ति होंगे जैसे कि विहित किए जाएं.

(७) उपधारा ( ६ ) के अधीन प्रतिनियुक्त दल , हितबद्ध पक्षकारों सहित पड़ोस वाले भू- धारकों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, सर्वेक्षण संख्यांक की या सर्वेक्षण संख्यांक के किसी उपखण्ड की या ब्लाक संख्यांक अथवा भू- खण्ड संख्यांक की सीमाओं का सीमांकन करेगा, उस पर सीमा- चिन्ह सन्निर्मित करेगा और उपखण्ड अधिकारी को ऐसी रीति में, जैसी कि विहित की जाए, रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और उपखण्ड अधिकारी उस पर ऐसा आदेश , जैसा कि वह उचित समझे, पारित कर सकेगा.

( ८) धारा ४४ तथा ५० में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई अपील या पुनरीक्षण का आवेदन, पारित किए गए किसी आदेश के या इस धारा के अधीन की गई कार्यवाहियों के विरुद्ध नहीं होगा.

(९) राज्य सरकार, सर्वेक्षण संख्यांक की या सर्वेक्षण संख्यांक के किसी उपखण्ड की या ब्लाक संख्यांक की या भू- खण्ड संख्यांक का सीमांकन करने में तहसीलदार द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया का विनियमन करने के लिए नियम बना सकेगी जिनमें उन सीमा चिन्हों का, जो कि उपयोग में लाये जाएंगे, की प्रकृति को विहित करते हुए तथा सीमांकित सर्वेक्षण संख्यांक या उपखण्ड या ब्लाक संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक में की भूमि के धारकों से फीस के उद्धरण हेतु प्राधिकृत किया जाएगा. ".

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धारा १३० का संशोधन.

५७. मूल अधिनियम की धारा १३० में, शब्द " एक हजार " के स्थान पर, शब्द " पांच हजार " स्थापित किए जाएं तथा शब्द " तथा इत्तिला देने वाले को , यदि कोई हो , इनाम देने के " विलोपित किए जाएं.

५८. मूल अधिनियम की धारा १३१ के स्थान पर , निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

धारा १३१ का स्थापन.

" १३१. मार्गाधिकार तथा अन्य प्राइवेट सुखाचार संबंधी अधिकारी .-( १ ) इस बारे में कि कोई खेतिहर

अपने खेतों पर या दखलरहित भूमि पर या ग्राम की चरागाहों पर, मान्यता प्राप्त सड़कों, पथों या सार्वजनिक भूमि पर से जिसके अन्तर्गत वे सड़कें तथा पथ हैं जो धारा २४२ के अधीन तैयार किए गए ग्राम के वाजिब- उल-अर्ज में अभिलिखित हैं, न होकर अन्यथा किसी मार्ग द्वारा पहुंचेगा, या इस बारे में कि वह किस स्रोत से या किस जलसरणी से अपने लिए जल प्राप्त कर सकेगा या किस जलसरणी से अपने खेतों में जल निकासी कर सकेगा . कोई विवाद उद्भूत होने की दशा में, तहसीलदार, स्थानीय जांच करने के पश्चात्, प्रत्येक मामले विषयक पूर्व रूढ़ि के प्रति निर्देश करके तथा संबंधित समस्त पक्षकारों की सुविधा का सम्यक् ध्यान रखते हुए, उस मामले को, विनिश्चित कर सकेगा.

(२) तहसीलदार, जांच के किसी प्रक्रम पर, यदि उसकी राय में मामले के तथ्यों तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा अनुतोष प्रदान करना आवश्यक है तो वह उपधारा ( १ ) में के विवाद के अधीन किसी मामले के संबंध में तुरन्त अनुतोष प्रदान करने का अंतरिम आदेश पारित कर सकेगाः

परन्तु ऐसा अंतरिम आदेश , आदेश की तारीख से नब्बे दिन के अवसान हो जाने पर, यदि पूर्व में समाप्त नहीं किया गया है तो स्वतः समाप्त हो जाएगा. " .

धारा १३२ का लोप.

५९ . मूल अधिनिम की धारा १३२ का लोप किया जाए.

६०. मूल अधिनियम की धारा १३३ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात् : -

धारा १३३ का स्थापन.

" १३३. बाधा का हटाया जाना. ( १ ) यदि किसी तहसीलदार को यह प्रतीत होता है कि कोई अधिक्रमण या बाधा किसी ग्राम की किसी मान्यता प्राप्त सड़क या पथ जिसके अन्तर्गत वे सड़कें तथा वे पथ हैं जो ग्राम के वाजिब-उल-अर्ज में अभिलिखित हैं, अथवा किसी ग्राम की सार्वजनिक भूमि के अबाध उपयोग में अड़चन पैदा करती हैं या जिससे किसी ऐसी सड़क या जलसरणी या जलस्त्रोत या जल निकासी में अड़चन पैदा होती है, जो धारा १३१ के अधीन किसी विनिश्चिय से संबंधित हों तो , वह ऐसे अधिक्रमण या बाधा के लिए उसे उत्तरदायी व्यक्ति को हटाने के लिए आदेश दे सकेगा.

(२) यदि ऐसा व्यक्ति, उपधारा ( १ ) के अधीन पारित आदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है तो तहसीलदार उस अधिक्रमण या बाधा को हटवा सकेगा और उसके हटाये जाने का खर्च ऐसे व्यक्ति से वसूल कर सकेगा तथा वह व्यक्ति तहसीलदार के ऐसे लिखित आदेश के अधीन , जिसमें मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का कथन किया गया हो , ऐसी शास्ति का दायी होगा जो दस हजार रुपये तक की हो सकेगी.

(३) यदि कोई व्यक्ति उपधारा ( १ ) के अधीन ऐसे अधिक्रमण या बाधा , उसके हटाए जाने के आदेश की तारीख से सात दिवस से अधिक के पश्चात् भी हटाने में असफल रहता है, तो उपखण्ड अधिकारी , ऐसी शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जो कि उपधारा ( २ ) के अधीन अधिरोपित की जा सकेगी , उसकी गिरफ्तारी करा सकेगा और अधिक्रमण या बाधा के हटाए जाने संबंधी प्रथम आदेश की दशा में पन्द्रह दिन की कालावधि के लिए और अधिक्रमण या बाधा के हटाए जाने के द्वितीय या पश्चातवर्ती आदेश की दशा में छह मास की कालावधि के लिए सिविल कारागार में निरुद्ध किए जाने के वारन्ट के साथ भेजेगा :

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परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि ऐसे व्यक्ति को उपखण्ड अधिकारी के समक्ष सूचना में विनिर्दिष्ट किए गए दिवस पर उपस्थित होने के लिए और यह कारण दर्शाने की सूचना जारी न कर दी जाए कि क्यों न उसे सिविल कारागार के सुपुर्द कर दिया जाए :

परन्तु यह और कि यदि उपखण्ड अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि अधिक्रमण या बाधा हटा दी गई है, तो ऐसे व्यक्ति को वारन्ट में उल्लिखित कालावधि के अवसान होने के पूर्व कारागार से मुक्त करने का आदेश दे सकेगा :

परन्तु यह और भी कि इस धारा के अधीन किसी भी महिला को गिरफ्तार या निरुद्ध नहीं किया जाएगा. ".

धारा १३६ का लोप.

६१. मूल अधिनियम की धारा १३६ का लोप किया जाए.

६२. मूल अधिनियम की धारा १३८ में उपधारा ( १ ) में, शब्द " मुख्यतः " का लोप किया जाए.

धारा १३८ का संशोधन.

६३. मूल अधिनियम की धारा १३ ९ का लोप किया जाए.

धारा १३ ९ का लोप.

६४. मूल अधिनियम की धारा १४० के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - धारा १४० का स्थापन.

" १४०. तारीख, जिसको भू- राजस्व शोध्य होगा तथा देय होगा. ( १ ) किसी वर्ष के मद्दे देय भू- राजस्व उस वर्ष के अप्रैल मास के प्रथम दिन शोध्य हो जाएगा तथा उस वर्ष के जून मास के अंतिम दिन तक ऐसी रीति में, ऐसे व्यक्ति को तथा ऐसे स्थान पर, जैसा कि विहित किया जाए, भुगतान किया जाएगा :

परन्तु मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ के प्रवृत्त होने की तारीख को देय भू- राजस्व का बकाया १ अप्रैल २०१ ९ के पूर्व संदेय होगा .

(२) कोई भी व्यक्ति, स्वयं के विकल्प पर दस वर्ष का भू- राजस्व अग्रिम में जमा कर सकेगा :

परन्तु ऐसे अग्रिम भुगतान के लिए कोई छूट नहीं दी जाएगी :

परन्तु यह और कि यदि भू- राजस्व में वृद्धि बाद में की जाती है तो अंतर की रकम देय होगी. ".

६५. मूल अधिनियम की धारा १४१ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा , स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा १४१ का स्थापन.

" १४१. ' बकाया ' तथा ' बकायादार ' की परिभाषाएं. कोई भी भू- राजस्व, जो शोध्य हो और जिसका भुगतान धारा १४० में यथा विनिर्दिष्ट की गई कालावधि की समाप्ति पर्यन्त नहीं किया गया है , उस तारीख से ' बकाया ' हो जाता है और उसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति ' बकायादार ' हो जाते हैं. " .

६६. मूल अधिनियम की धारा १४२ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा १४२ का स्थापन.

" १४२. भू- राजस्व प्राप्त करने वाला व्यक्ति रसीद देने के लिए आबद्ध होगा. ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो भू- राजस्व के मद्दे या भू- राजस्व की बकाया के तौर पर वसूली योग्य किसी धनराशि के मद्दे कोई भुगतान प्राप्त करे, वहां वह ऐसी राशि के लिए भुगतानकर्ता को ऐसे प्ररूप में जैसा कि विहित किया जाए रसीद देगा. ".

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६७. मूल अधिनियम की धारा १४३ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात् :-

धारा १४३ का स्थापन.

" १४३. भू- राजस्व के विलंब से भुगतान के लिए दाण्डिक ब्याज. - यदि भू- राजस्व का भुगतान , धारा १४० में यथा विनिर्दिष्ट कालावधि की समाप्ति तक नहीं किया जाता है तो बकाया पर प्रथम बारह मास के लिये बारह प्रतिशत वार्षिक की दर से और उसके पश्चात्, पन्द्रह प्रतिशत वार्षिक की दर से साधारण ब्याज भुगतान की तिथि तक देय होगाः

परन्तु जहां की सरकार के आदेश से भू- राजस्व का कोई भुगतान निलंबित कर दिया गया है वहां भुगतान में विलंब के लिये ऐसा कोई ब्याज देय नहीं होगा . " .

६८. मूल अधिनियम की धारा १४४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात् : -

धारा १४४ का स्थापन .

" १४४. फसलों के मारे जाने पर भू- राजस्व की माफी या उसका निलंबन.- राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा , कारण अभिलिखित करते हुए उन वर्षों में जिनमें फसलें किसी क्षेत्र में मारी गयी हों या जिन वर्षों में किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा किसी विधि के अधीन किए गए किसी आदेश के परिणामस्वरूप, किसी क्षेत्र में फसलें नहीं उगाई जा सकी हों, भू- राजस्व की माफी या उसका निलंबन मंजूर कर सकेगी. ".

धारा १४५ का संशोधन.

६९. मूल अधिनियम की धारा १४५ में, उपधारा ( १ ) में, शब्द " कलेक्टर द्वारा या तहसीलदार द्वारा " के स्थान पर शब्द " तहसीलदार द्वारा " स्थापित किए जाएं .

७०. मूल अधिनियम की धारा १४६ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

धारा १४६ का स्थापन.

" १४६. मांग की सूचना. ( १ ) तहसीलदार, बकाया की वसूली के लिए धारा १४७ के अधीन कोई आदेशिका जारी करने के पूर्व, किसी बकायादार पर मांग की सूचना तामील करवाएगा.

(२) कोई बकायादार, तहसीलदार को यह आवेदन कर सकेगा कि कोई भी शोध्य बकाया नहीं है अथवा शोध्य रकम उस रकम से कम है, जिसके लिए मांग की सूचना की तामील की गयी है और तहसीलदार, इस प्रकार उठाई गई आपत्ति को विनिश्चित करेगा और उसके पश्चात् ही धारा १४७ के अधीन कोई आदेशिका जारी करने की कार्यवाही करेगा, यदि अपेक्षित हो. ".

७१. ( १ ) मूल अधिनियम की धारा १४७ को उसकी उपधारा ( १ ) के रूप में पुनर्क्रमांकित किया जाए और

धारा १४७ का संशोधन.

(एक) इस प्रकार पुनर्क्रमांकित उपधारा ( १ ) में, -

प्रारंभिक पैरा में आए शब्द " या ग्राम सभा " का लोप किया जाए; (क)

(ख) खण्ड ( ग ) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्;

(ग) बकायादार की किसी अन्य अचल सम्पत्ति की कुर्की या बिक्री द्वारा , जहां कहीं भी स्थित हो; ";

(दो) इस प्रकार पुनर्क्रमांकित उपधारा ( १ ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधाराएं जोड़ी जाएं, अर्थात्: - "(२) उपधारा ( १ ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, तहसीलदार, बकायादार की किन्हीं वित्तीय आस्तियों, जिनमें बैंक खाते या लॉकर सम्मिलित हैं. जहां कहीं भी स्थित हों, कुर्की करते हुए भू- राजस्व की बकाया वसूल कर सकेगा. बकायादार की वित्तीय आस्तियों की कुर्की जहां तक संभव हो , सिविल प्रक्रिया संहिता. १ ९ ०८ ( १ ९ ०८ का ५ ) की प्रथम अनुसूची में मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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अंतर्विष्ट आदेश २१ में अधिकथित रीति में वित्तीय आस्तियों के भारसाधक पर गार्निशी आदेश की तामीली करके की जाएगी . बकायादार द्वारा किराये पर लिए गए किसी लॉकर की दशा में, ऐसे भारसाधक की उपस्थिति में लॉकर को सीलबंद किया जाएगा जो इसके अंदर की वस्तुओं की विवरण सूची तैयार करने और उनका अंतिम रूप से निराकरण करने के लिए तहसीलदार के आगामी आदेश तक रुका रहेगा.

(३) उपखण्ड अधिकारी , पचास लाख रुपये से अधिक की भू- राजस्व की बकाया के भुगतान में चूक करने वाले किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करा सकेगा और उसे पन्द्रह दिन से अनधिक कालावधि के लिए सिविल कारागार में निरुद्ध किये जाने के वारंट के साथ भेजेगा जब तक कि बकाया का त्वरित भुगतान नहीं कर दिया जाता है :

परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि ऐसे व्यक्ति को उपखण्ड अधिकारी के समक्ष सूचना में विनिर्दिष्ट किये गये दिवस पर उपस्थित होने के लिए और यह कारण दर्शाने की सूचना जारी न कर दी जाए कि क्यों न उसे सिविल कारागार के सुपुर्द कर दिया जाए.

(४) उपधारा ( ३ ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी , किसी भी व्यक्ति को भू- राजस्व की बकाया के लिए गिरफ्तार नहीं किया जाएगा या उसे सिविल कारागार में निरुद्ध नहीं किया जाएगा जहां तक कि और जब तक कि ऐसा व्यक्ति

(क) अवयस्क है, या मानसिक रूप से बीमार या मंदबुद्धि व्यक्ति है;

(ख) सिविल प्रक्रिया संहिता, १ ९ ०८ ( १ ९ ०८ का ५ ) की धारा १३३ , १३५ या १३५ - क के अधीन छूट प्राप्त है.

( ५) गिरफ्तारी वारंट जारी करने वाला उपखण्ड अधिकारी ऐसा वारंट वापिस ले सकेगा यदि बकायादार संपूर्ण बकाया या उसके सारवान भाग का भुगतान कर देता है या भुगतान करने का वचन देता है और उसके लिए पर्याप्त प्रतिभूति प्रस्तुत कर देता है. ".

७२. मूल अधिनियम की धारा १४ ९ में, शब्द तथा कोष्ठक " के खण्ड ( क) तथा ( ग ) " का लोप किया जाए .

धारा १४ ९ का संशोधन.

७३. मूल अधिनियम की धारा १५० के स्थान पर , निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - धारा १५० का स्थापन .

" १५०. संपत्ति के विक्रय की बोली खत्म होने के पूर्व भुगतान कर दिया जाने पर कार्यवाही का रोक दिया जाना.- यदि भू- राजस्व की बकाया की वसूली के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाहियां इस अध्याय के अधीन की जाती हैं, तो वह व्यक्ति, सम्पत्ति के विक्रय की बोली खत्म होने के पूर्व किसी भी समय दावाकृत रकम का भुगतान कर सकेगा और तदुपरि कार्यवाहियां रोक दी जाएंगी.".

धारा १५१ का संशोधन.

७४. मूल अधिनियम की धारा १५१ में, उपधारा ( २ ) में , शब्द, अंक तथा कोष्ठक " धारा १४७ के खण्ड ( ग ) " के स्थान पर , शब्द, अंक तथा कोष्ठक " धारा १४७ की उपधारा ( १ ) के खण्ड ( ग ) " स्थापित किए जाएं.

७५. मूल अधिनियम की धारा १५३ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - धारा १५३ का स्थापन.

" १५३. क्रेता का हक. जहां स्थावर सम्पत्ति का विक्रय इस अध्याय के उपबंधों के अधीन किया जाता है और ऐसा विक्रय पूर्ण हो गया है, वहां वह सम्पत्ति क्रेता में उस समय से निहित हो गयी समझी जाएगी जबकि क्रेता द्वारा विक्रय पत्र में यथा विनिर्दिष्ट पूर्ण धन जमाकर दिया जाता है. ".

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मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

७६. मूल अधिनियम की धारा १५४ - क में, उपधारा ( १ ) में, -

धारा १५४- क का संशोधन.

(एक) शब्द, तथा अंक धारा १४७ के स्थान पर, शब्द, तथा अंक कोष्ठक धारा १४७ की उपधारा ( १ ) स्थापित किए जाएं;

(दो) प्रथम परन्तुक का लोप किया जाए ;

(तीन ) द्वितीय परन्तुक में, शब्द " और भी " का लोप किया जाए.

धारा १५५ का संशोधन.

७७. मूल अधिनियम की धारा १५५ में, खण्ड ( छ ) के परन्तुक में , पूर्ण विराम के स्थान पर, अर्ध विराम स्थापित किया जाए और तत्पश्चात् निम्नलिखित खण्ड जोड़ा जाए, अर्थात्:-

" (ज ) वे समस्त धन जो राज्य सरकार के स्वामित्व के और राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित ऐसी सत्ता के हों जो कि इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की जाए, देय होते हों :

परन्तु इस खण्ड में विनिर्दिष्ट की गई धनराशि की वसूली के लिए प्रस्तुत किए गए आवेदन पर तब तक कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी जब तक कि ऐसे आवेदन पत्र के साथ उक्त सत्ता जो किसी भी नाम से जानी जाती हो, के मुख्य कार्यपालक द्वारा हस्ताक्षरित किया गया इस आशय का प्रमाण - पत्र कि उक्त धनराशि की वसूली भू- राजस्व के बकाया की भांति की जानी चाहिए, संलग्न न कर दिया गया हो.".

धारा १५८ का संशोधन.

७८. मूल अधिनियम की धारा १५८ में, उपधारा ( ३ ) में, परन्तुक के स्थान पर , निम्नलिखित परन्तुक स्थापित किया जाए, अर्थात्: -

" परन्तु ऐसा कोई भी व्यक्ति, पट्टे या आवंटन की तारीख से दस वर्ष की कालावधि के भीतर ऐसी भूमि को अंतरित नहीं करेगा और तत्पश्चात् ऐसी भूमि का अंतरण , धारा १६५ की उपधारा ( ७ - ख ) के अधीन अनुज्ञा अभिप्राप्त करके कर सकेगा. ".

धारा १६१ का संशोधन.

७९. मूल अधिनियम की धारा १६१ में, पार्श्व शीर्ष तथा उपधारा ( १ ) में , शब्द " बंदोबस्त चालू रहने के दौरान " का लोप किया जाए.

धारा १६२ कालोप.

८०. मूल अधिनियम की धारा १६२ का लोप किया जाए.

धारा १६३ का लोप.

८१. मूल अधिनियम की धारा १६३ का लोप किया जाए.

धारा १६५ का संशोधन.

८२. मूल अधिनियम की धारा १६५ में उपधारा ( ४ ) में, द्वितीय परन्तुक के स्थान पर, निम्नलिखित परन्तुक स्थापित किया जाए, अर्थात्. -

परन्तुक यह और कि औद्योगिक प्रयोजन के लिए पूर्ववर्ती परन्तुक के खण्ड ( एक) के उपखण्ड ( क) के अधीन भूमि का अन्तरण, ऐसे अन्तरण के पूर्व धारा ५ ९ के अधीन भूमि व्यपवर्तित की जाएगी .

८३. मूल अधिनियम की धारा १६८ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

धारा १६८ का स्थापन.

" १६८. पट्टे. ( १ ) कोई भी भूमिस्वामी उसके खाते में समाविष्ट किसी ऐसी भूमि को, जिसे धारा ५ ९ के अधीन कृषि के प्रयोजन के लिए निर्धारित किया गया है. एक समय में पांच वर्ष से अनधिक की कालावधि के लिए पट्टे पर दे सकेगा.

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

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(२) पट्टेदार उस भूमि को ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर धारित करेगा जो कि उसके तथा भूमिस्वामी के बीच करार में तय पाई जाएं.

(३) भूमिस्वामी के आवेदन पर, तहसीलदार किसी सारवान निबंधन में या पटटे की शर्त के भंग के आधार पर या पट्टा प्रवृत्त न रहने के कारण भूमि का कब्जा भूमिस्वामी को देने का आदेश कर सकेगा.

(४) यदि कोई पट्टेदार, पट्टे के अवसान हो जाने पर या उपधारा ( ३ ) के अधीन तहसीलदार द्वारा पारित आदेश की तारीख से सात दिन के भीतर भूमिस्वामी को भूमि का कब्जा नहीं सौंपता है तो भूमिस्वामी के बारे में यह समझा जाएगा कि पट्टेदार द्वारा उसकी भूमि से उसे अनुचित रूप से बेदखल कर दिया गया है और वह धारा २५० के अधीन अनुतोष पाने का हकदार हो जाएगा.

स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजन के लिए-

(क) " पट्टा " से अभिप्रेत है किसी भूमि का उपभोग करने के अधिकार का ऐसा अन्तरण जो एक अभिव्यक्त या विवक्षित समय के लिए, किसी कीमत के, जो दी गई हो या जिसे देने का वचन दिया गया हो अथवा धन या किसी अन्य मूल्यवान वस्तु के, जो कालावधीय रूप से अन्तरिती द्वारा , जो उस अन्तरण को ऐसे निबंधनों पर प्रतिगृहीत करता है , अन्तरक को दी जानी है, प्रतिफल के रूप में किया गया हो;

(ख) किसी ऐसे ठहराव को , जिसके द्वारा कोई व्यक्ति भूमिस्वामी को भूमि की उपज का कोई विनिर्दिष्ट अंश देने की शर्त पर भूमिस्वामी की किसी भूमि पर खेती करता है, पट्टा समझा जाएगा;

(ग) उपधारा ( १ ) के अधीन पांच वर्ष से अधिक की किसी कालावधि के लिए दिया गया पट्टा, पांच वर्ष की कालावधि के लिए दिया गया समझा जाएगा;

(घ) केवल घांस काटने या पशु चराने या सिंघाड़ा उगाने या लाख का प्रजनन या संग्रहण करने या तेन्दु पत्ते को तोड़ने या उनका संग्रहण करने के अधिकार का दिया जाना भूमि का पट्टा नहीं समझा जाएगा. ".

८४. मूल अधिनियम की धारा १६ ९ का लोप किया जाए.

धारा १६ ९ का लोप.

धारा १७१ का लोप.

८५. मूल अधिनियम की धारा १७१ का लोप किया जाए.

धारा १७२ का लोप.

८६. मूल अधिनियम की धारा १७२ का लोप किया जाए.

धारा १७४ का लोप.

८७. मूल अधिनियम की धारा १७४ का लोप किया जाए.

८८. मूल अधिनियम की धारा १७६ का लोप किया जाए.

धारा १७६ का लोप.

८९. मूल अधिनियम की धारा १७८- क के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा १७८-क का स्थापन.

" १७८ - क. भूमिस्वामी के जीवन काल में भूमि का विभाजन.- ( १ ) यदि कोई भूमि स्वामी धारा ५९ के अधीन कृषि के प्रयोजन के लिए निर्धारित अपने खाते या उसके किसी भाग को अपने जीवनकाल के दौरान अपने विधिक वारिसों में विभाजित करना चाहता है तो वह ऐसे खाते या उसके भाग के विभाजन के लिए तहसीलदार को आवेदन कर सकेगा .

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मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

(२) तहसीलदार, विधिक वारिसों की सुनवाई करने के पश्चात्, उस खाते को या उसके भाग को विभाजित कर सकेगा और निर्धारण को इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार प्रभाजित कर सकेगा. ".

९ ० . मूल अधिनियम की धारा १८१ - क के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

धारा १८१- क का स्थापन.

" १८१ - क. फ्री होल्ड अधिकार रखने वाला व्यक्ति भूमिस्वामी होगा. राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ के प्रवृत्त होने के अधिकार रखता है, ऐसी भूमि का भूमिस्वामी होगा. ". प्रत्येक व्यक्ति, जो मध्यप्रदेश भू- अव्यवहित पूर्व भूमि में फ्री-होल्ड

धारा १८२ का संशोधन.

९ १. मूल अधिनियम की धारा १८२ में, उपधारा ( २ ) में , शब्द, " राजस्व अधिकारी " के स्थान पर, शब्द " कलेक्टर " स्थापित किया जाए.

९२ . मूल अधिनियम की धारा १८३ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: -

धारा १८३ का स्थापन.

" १८३. सेवा भूमि.-( १ ) कोटवार के रूप में सेवा करने की शर्त पर भूमि धारण करने वाला कोई व्यक्ति उस दशा में ऐसी भूमि का हकदार नहीं रह जाएगा जबकि वह ऐसी भूमि को कृषि से भिन्न प्रयोजनों के लिए व्यपवर्तित कर देता है .

(२) सेवा भूमि में किसी कोटवार को ऐसा अधिकार, किसी विक्रय, दान , बंधक, उप पट्टे द्वारा या अन्यथा एक वर्ष से अनधिक कालावधि तक के उप - पट्टे के सिवाय न तो अंतरित किया जाएगा और न ही अन्तरणीय होगा.

(३) यदि कोटवार की मृत्यु हो जाती है, पद त्याग देता है , या विधि पूर्वक पदच्युत कर दिया जाता है तो सेवा भूमि उसके उत्तरवर्ती को संक्रात हो जाएगी .

(४) किसी कोटवार का ऐसी भूमि पर अधिकार किसी डिक्री के निष्पादन में कुर्क नहीं किया जाएगा या बेचा नहीं जाएगा और न ही ऐसी भूमि का प्रबंध करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, १ ९ ०८

(१ ९ ०८ का संख्यांक ५ ) की धारा ५१ के अधीन कोई रिसीवर नियुक्त किया जाएगा.

(५) यदि कोई कोटवार उपधारा ( १ ) और ( २ ) के उपबंधों का उल्लंघन करता है या उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो इस संहिता या किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन उसके विरुद्ध की जा सकने वाली किसी कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसी सेवा भूमि तहसीलदार के आदेश द्वारा उससे वापस ली जा सकेगी और उस कोटवार या किसी अन्य किसी व्यक्ति को, जो अप्राधिकृत रूप से उस भूमि पर लगातार कब्जा बनाए रखता है , धारा २४८ के अधीन बेदखल किया जा सकेगा.

(६) ऐसी सेवा भूमियां जो-

(क) नगरीय क्षेत्र में;

(ख) ऐसे क्षेत्र में , जिसके लिए विकास योजना अनुमोदित की गई है ; या

(ग) ऐसे क्षेत्र में, जो राज्य सरकार द्वारा यथा अधिसूचित नगरीय क्षेत्र की बाह्य सीमा से बाहर अवस्थित हैं,

राज्य सरकार द्वारा यथा अधिसूचित तारीख से सेवा भूमि नहीं रह जाएंगी और तहसीलदार भू- अभिलेखों में आवश्यक परिवर्तन कराएगा. ".

धारा १८४ का लोप.

९ ३ . मूल अधिनियम की धारा १८४ का लोप किया जाए.

अध्याय चौदह का लोप और व्यावृति.

९४. मौरूसी कृषक से संबंधित मूल अधिनियम के अध्याय चौदह की धारा १८५ से २०२ तक ( दोनों धाराओं को मम्मिलित करते हुए ) का लोप किया जाए.

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018

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उक्त अध्याय का लोप होते हुए भी , मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ के प्रारंभ होने के पूर्व बोर्ड या किसी राजस्व अधिकारी या किसी प्राधिकारी के समक्ष मौरूसी कृषक से संबंधित कोई मामला या कार्यवाही लंबित है वे बोर्ड या राजस्व अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा ऐसे सुनी और विनिश्चित की जाएंगी मानो कि संशोधन अधिनियम पारित नहीं हुआ हो. ".

९५. मूल अधिनियम की धारा २०३ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्. - धारा २०३ का स्थापन.

" २०३. जलोढ़ तथा जल-प्लावन.( १ ) किसी तट पर बनी जलोढ़ भूमि राज्य सरकार में निहित होगी, किन्तु ऐसे तट से लगी हुई भूमि का भूमिस्वामी, यदि कोई हो, उसके खाते में इस प्रकार बढ़ गई जलोढ़ भूमि का उपयोग भू- सर्वेक्षण होने तक तब तक भू- राजस्व का भुगतान किए बिना करने का हकदार होगा जब तक कि उसके खाते में बढ़ गया क्षेत्रफल आधा हेक्टर से अधिक न हो जाए .

(२ ) जहां जल - प्लावन द्वारा किसी खाते के क्षेत्रफल में आधे हेक्टेयर से अधिक की कमी हो जाए, वहां ऐसे खाते के संबंध में देय भू- राजस्व कम कर दिया जाएगा. ".

धारा २१० का संशोधन.

९६. मूल अधिनियम की धारा २१० में, शब्द " बन्दोबस्त आयुक्त " के स्थान पर , शब्द " आयुक्त " स्थापित किया जाए.

९७. मूल अधिनियम की धारा २२४ में, खण्ड ( क ) के स्थान पर , निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, धारा २२४ का संशोधन.

अर्थात्: -

" (क) ऐसे वसूली प्रभार की कटौती करने के पश्चात्, जैसी कि राज्य सरकार, समय- समय पर, अवधारित करे, भू- राजस्व तथा अन्य संबंधित करों तथा उपकरों जो कि उसके मार्फत देय हैं, और अन्य शासकीय शोध्य को जो उसके द्वारा संग्रहित होना आदेशित हैं, संगृहीत करें तथा शासकीय कोषालय में जमा करें;" .

९८. मूल अधिनियम की धारा २२५ का लोप किया जाए.

धारा २२५ का लोप.

९९ . मूल अधिनियम की धारा २२७ में , शब्द तथा अंक " या २२५ " का लोप किया जाए.

धारा २२७ का संशोधन.

धारा २२ ९ का संशोधन.

१००. मूल अधिनियम की धारा २२ ९ में, शब्द तथा अंक " धारा २३२ " के उपबंधों के अनुसार गठित की गई" का लोप किया जाए.

१०१. मूल अधिनियम की धारा २३० में उपधारा ( १ ) के परन्तुक का लोप किया जाए.

धारा २३० का संशोधन.

१०२. मूल अधिनियम की धारा २३१ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा २३१ का स्थापन.

" २३१. कोटवारों का पारिश्रमिक. राज्य सरकार, साधारण आदेश द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों के, जो उस आदेश में वर्णित किए जाएं, अध्यधीन रहते हुए, समय - समय पर, कोटवारों को उनकी सेवाओं के लिये सेवा भूमि उपलब्ध कराने या उनका पारिश्रमिक या दोनों के लिये मापदण्ड नियत कर सकेगी. ".

धारा २३२ का लोप.

जाए. १०३. मूल अधिनियम के अध्याय १७ में , उप शीर्षक " ग - ग्राम सभा " और धारा २३२ का लोप किया 682(35)

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१०४. मूल अधिनियम की धारा २३३ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा २३३ का स्थापन .

" २३३. दखलरहित भूमि का अभिलेख.-प्रत्येक ग्राम तथा नगरीय क्षेत्र के लिये समस्त दखलरहित भूमि के अभिलेख इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार तैयार किए जाएंगे. ".

१०५. मूल अधिनियम की धारा २३३ के पश्चात्, निम्नलिखित धारा अन्तःस्थापित की जाए, अर्थात्: -

धारा २३३ - क का अन्तःस्थापन .

" २३३ -क. नगरीय क्षेत्र में लोक प्रयोजनों के लिये भूमि का पृथक् रखा जाना.- कलेक्टर, राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त समय- समय पर, जारी निदेशों के अनुसार ,

(क) दखलरहित भूमियों को, जो नगरीय क्षेत्र में स्थित हैं, लोक प्रयोजनों के लिये पृथक् रख सकेगा;

(ख) उस लोक प्रयोजन को परिवर्तित कर सकेगा जिसके लिए वह भूमि पृथक् से रखी गई है; या

(ग) किसी ऐसी भूमि के संबंध में खण्ड (क ) के अधीन की गई कार्रवाई खत्म कर सकेगाः

परन्तु इस धारा के अधीन कोई भूमि लोक प्रयोजनों के लिये पृथक् से नहीं रखी जाएगी जो कि अनुमोदित विकास योजना से असंगत है. ".

१०६. मूल अधिनियम की धारा २३४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

धारा २३४ का स्थापन.

" २३४. निस्तार पत्रक का तैयार किया जाना. उपखण्ड अधिकारी, इस संहिता तथा उसके अधीन बनाये गये नियमों के उपबंधों के अनुसार प्रत्येक ग्राम के लिये एक निस्तार पत्रक तैयार करेगा, जिसमें किसी ग्राम में की समस्त दखलरहित भूमि के प्रबंध की स्कीम तथा उससे आनुषांगिक समस्त विषयों और विशिष्टतः धारा २३५ में विनिर्दिष्ट विषयों का समावेश होगा. ".

१०७. मूल अधिनियम की धारा २३ ९ में, -

धारा २३ ९ का संशोधन.

(एक) उपधारा ( २ ) , ( ३ ) तथा ( ४ ) का लोप किया जाए;

(दो) उपधारा ( ५ ) तथा ( ६ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधाराएं स्थापित की जाएं, अर्थात्: -

" ( ५ ) यदि मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ के प्रारम्भ होने के पूर्व इस धारा के अधीन मंजूर किए गए वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र या वृक्ष पट्टे के किन्हीं निबन्धनों और शर्तों का भंग किया जाता है तो तहसीलदार, वृक्षारोपण अनुज्ञापन पत्र या वृक्ष पट्टा, धारक को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, रद्द कर सकेगा और यदि ऐसा व्यक्ति दखलरहित भूमि को अनधिकृत रूप से लगातार कब्जे में बनाए रखता है तो तहसीलदार धारा २४८ के अधीन उसके विरुद्ध कार्रवाई करने हेतु अग्रसर होगा .

(६) मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ के प्रारंभ होने के पूर्व दखलरहित भूमि जिस पर कोई वृक्षारोपण अनुज्ञापन पत्र या वृक्ष पट्टा दिया गया है , कलेक्टर के आदेश द्वारा किसी लोक प्रयोजन के लिए उपयोग में ली जा सकेगी . यदि ऐसे वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र या वृक्ष पट्टे के धारक का कोई हित या ऐसे उपयोग के कारण से प्रतिकूल प्रभावित होता है तो धारक ऐसे प्रतिकर का हकदार होगा जो ऐसी रीति में संगणित किया जाएगा जो कि विहित की जाए. ".

१०८. मूल अधिनियम की धारा २४० में, -

धारा २४० का संशोधन.

(एक) विद्यमान पार्श्व शीर्ष के स्थान पर , निम्नलिखित पार्श्व शीर्ष स्थापित किया जाए, अर्थात्: -

" ग्रामों में कतिपय वृक्षों के काटे जाने का प्रतिषेध ":

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उपधारा ( १ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-

(दो)

" ( १ ) राज्य सरकार , ग्रामों में भूमिस्वामी की भूमि पर या राज्य सरकार की भूमि पर खड़े ऐसे वृक्षों को काटे जाने का प्रतिषेध या विनियमन इस संबंध में बनाए गए नियमों द्वारा कर सकेगी , यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा प्रतिषेध या विनियमन लोकहित में या मिट्टी के कटाव को रोकने के लिये अपेक्षित है. ".

धारा २४३ का

संशोधन.

१०९. मूल अधिनियम की धारा २४३. में, उपधारा ( ३ ) में, शब्द, अंक तथा कोष्ठक " भूमि अर्जन अधिनियम , १८ ९४ ( १८ ९ ४ का संख्यांक १ ) " के स्थान पर, शब्द, अंक तथा कोष्ठक " भूमि अर्जन , पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम , २०१३ ( २०१३ का ३० ) " स्थापित किए जाएं. ".

११०. मूल अधिनियम की धारा २४४ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - धारा २४४ का स्थापन.

" २४४. आबादी स्थलों का आबंटन.- इस संबंध में बनाए गए नियमों के अध्यधीन रहते हुए, तहसीलदार आबादी क्षेत्र में पट्टे पर आबादी स्थलों का आबंटन करेगा. ".

१११. मूल अधिनियम की धारा २४५ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - धारा २४५ का स्थापन.

" २४५. भू- राजस्व दिए बिना गृह स्थल धारण करने का अधिकार.- आबादी में स्थित युक्तियुक्त माप (डायमेंशन ) का कोई भवन स्थल , जो मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम , २०१८ के प्रारंभ होने के समय किसी कोटवार द्वारा धारित है या किसी व्यक्ति द्वारा जो भूमि धारण करता है या ऐसे ग्राम में या उस ग्राम में जिसमें कि सामान्यतः ऐसे ग्राम में खेती की जाती है, या कृषि शिल्पी या कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करता है, भू- राजस्व के भुगतान के दायित्वाधीन नहीं होगा.".

धारा २४६ का

११२. मूल अधिनियम की धारा २४६ के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात्: - संशोधन.

" २४६. आबादी में गृहस्थल धारण करने वाले व्यक्तियों का अधिकार.- प्रत्येक ऐसा व्यक्ति जो मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २०१८ के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व आबादी में गृहस्थल के रूप में कोई भूमि विधिपूर्वक धारण करता है, भूमिस्वामी होगा. " .

धारा २४८ का संशोधन.

११३. मूल अधिनियम की धारा २४८ में, उपधारा ( १ ) में, शब्द " अप्राधिकृत दखल की कालावधि के लिये भूमि का लगान उस स्थान में ऐसी भूमि के लिये स्वीकार्य दर की दुगनी दर से चुकाने के तथा ऐसे जुर्माने के, जो ऐसी अधिक्रमित भूमि के बाजार मूल्य का बीस प्रतिशत तक का हो सकता है " के स्थान पर, शब्द " ऐसे जुर्माने से जो एक लाख रुपये तक का हो सकेगा " स्थापित किए जाएं.

११४. मूल अधिनियम की धारा २५० के स्थान पर, निम्नलिखित धारा स्थापित की जाए, अर्थात् :-

धारा २५० का स्थापन.

" २५०. अनुचित रूप से बेकब्जा किए गए भूमिस्वामी का पुनःस्थापन. -

(१ ) तहसीलदार, -

(क) किसी भूमिस्वामी या उसके हित उत्तराधिकारी के आवेदन पर जिन्हें अनुचित रूप से बेकब्जा किया गया है उसके कब्जे का आधार पर वर्णन कर भूमिस्वामी की भूमि पर कब्जा कर रहे व्यक्ति को कारण बताओ सूचना पत्र जारी करेगा और ऐसी जांच करेगा जैसी कि वह उचित समझेः या 682(37)

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(ख) यह ज्ञात होने पर कि भूमिस्वामी को अनुचित रूप से बेकब्जा किया गया है, स्वप्रेरणा से खण्ड ( क ) के अधीन कार्यवाहियां प्रारंभ करेगा.

(२) यदि जांच के पश्चात् तहसीलदार इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि भूमिस्वामी को अनुचित रूप से बेकब्जा किया गया है तो वह भूमिस्वामी को कब्जा वापस दिए जाने का आदेश देगा और फिर वह उसे भूमि का कब्जा भी दिलाएगा.

(३) तहसीलदार, जांच के किसी भी प्रक्रम पर, भूमिस्वामी को कब्जा दिए जाने के लिए अन्तरिम आदेश पारित कर सकेगा, यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उसे इस धारा के अधीन आवेदन प्रस्तुत किए जाने या स्वप्रेरणा से कार्यवाहियां प्रारंभ की जाने के पूर्व के छह मास के भीतर विरोधी पक्षकार द्वारा बेकब्जा कर दिया गया था.

(४) कोई व्यक्ति जिसके विरुद्ध उपधारा ( ३ ) के अधीन कोई अन्तरिम आदेश पारित कर दिया गया हो, तो तहसीलदार यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह तहसीलदार द्वारा अन्तिम आदेश पारित किए जाने तक उस भूमि का कब्जा लेने से विरत रहने के लिये ऐसी राशि का, जैसी कि तहसीलदार उचित समझे, बंधपत्र निष्पादित करे और यदि यह पाया जाए कि बंधपत्र निष्पादित करने वाले व्यक्ति ने बंधपत्र के उल्लंघन में उस भूमि में प्रवेश किया है या उसका कब्जा ले लिया है, तो तहसीलदार बंधपत्र को पूर्णतः या भागतः समपत कर सकेगा और ऐसी राशि भू- राजस्व के बकाया के तौर पर वसूल कर सकेगा.

(५) जहां तहसीलदार का उपधारा ( २ ) के अधीन भूमिस्वामी को कब्जा पुनः दिलाये जाने का आदेश हो वहां तहसीलदार उसके अप्राधिकृत किए गए कब्जे की कालावधि के लिये विरोधी पक्षकार से भूमिस्वामी को संदत्त किया जाने वाला प्रतिकर भी अधिनिर्णीत करेगा तथा ऐसा प्रतिकर उस दर पर संगणित होगा जो दस हजार रुपये प्रति हेक्टर प्रतिवर्ष के अनुपातिक हो. इस धारा के अधीन अधिनिर्णीत किया गया प्रतिकर भू- राजस्व के बकाया के तौर पर वसूली योग्य होगा.

(६) जब उपधारा ( २ ) के अधीन , भूमिस्वामी को पुनः कब्जा दिलाया जाने के लिए आदेश पारित कर दिया गया हो, वहां तहसीलदार विरोधी पक्षकार से इस बात के लिये अपेक्षा कर सकेगा कि वह आदेश के उल्लंघन में भूमि का कब्जा लेने से विरत रहने के लिये ऐसी राशि का, जैसी कि तहसीलदार उचित समझे , बंधपत्र निष्पादित करे.

(७) जहाँ उपधारा ( २ ) के अधीन, भूमिस्वामी को पुनः कब्जा दिलाये जाने के लिये आदेश पारित कर दिया गया हो , वहां विरोधी पक्षकार जुर्माने के, जो पचास हजार रुपये तक का हो सकेगा , लिए भी दायित्वाधीन होगा.

( ८) यदि कोई व्यक्ति उपधारा ( २ ) या उपधारा ( ३ ) के अधीन कब्जा वापस दे दिया जाने के आदेश की तारीख के पश्चात्, सात दिनों से अधिक कालावधि तक किसी भूमि पर अप्राधिकृत दखल या कब्जा किए रहता है, तो उक्त उपधारा ( ५ ) के अधीन देय प्रतिकर या उपधारा ( ७ ) के अधीन जुर्माने पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे भूमिस्वामी को कब्जा वापस दिए जाने के लिये किए गए प्रथम आदेश की दशा में, उपखण्ड अधिकारी उसे गिरफ्तार करवाएगा और पन्द्रह दिन की कालावधि के लिये परिरूद्ध किया जाने के लिए, उसे वारण्ट के साथ सिविल कारागार में भेजेगा, तथा ऐसे भूमिस्वामी को कब्जा वापस दिए जाने के लिए द्वितीय या पश्चात्वर्ती आदेश की दशा में, उपखण्ड अधिकारी उसे गिरफ्तार करवाएगा और तीन मास की कालावधि के लिए परिरूद्ध किया जाने के लिए, उसे वारण्ट के साथ सिविल कारागार में भेजेगा :

परन्तु इस धारा के अधीन कोई कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक की उस व्यक्ति से यह अपेक्षा करने वाली सूचना न जारी कर दी गई हो कि वह उपखण्ड अधिकारी के समक्ष ऐसी तारीख को , जो कि सूचना में विनिर्दिष्ट की जाएगी, उपसंजात हो और इस संबंध में कारण दर्शाए कि उसे सिविल कारागार के सुपुर्द क्यों न किया जाए :

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परन्तु यह और कि उपखण्ड अधिकारी ऐसे व्यक्ति को , वारण्ट में उल्लिखित कालावधि का अवसान होने के पूर्व, निरोध से छोड़े जाने का आदेश दे सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अप्राधिकृत कब्जा छोड़ दिया गया है.

स्पष्टीकरण-एक.- इस धारा के प्रयोजन के लिए, भूमिस्वामी में सम्मिलित है सरकारी पट्टेदार.

स्पष्टीकरण-दो.- इस धारा के प्रयोजन के लिये " अनुचित रूप से बेकब्जा किये गये भूमिस्वामी " से अभिप्रेत है ऐसे किसी भूमिस्वामी को भूमि से विधि के सम्यक् अनुक्रम में बेकब्जा न करके अन्यथा बेकब्जा कर दिया गया हो , या यदि कोई व्यक्ति भूमिस्वामी की किसी ऐसी भूमि पर, जिसके कि उपयोग के लिये ऐसा व्यक्ति हकदार न रह गया हो, अप्राधिकृत रूप से कब्जा किए रहे.".

११५. मूल अधिनियम की धारा २५० - क का लोप किया जाए.

धारा २५०-क का लोप.

११६. मूल अधिनियम की धारा २५२ का लोप किया जाए.

धारा २५२ का लोप.

११७. मूल अधिनियम का धारा २५३ में, उपधारा ( २ ) का लोप किया जाए.

धारा २५३ का संशोधन.

११८. मूल अधिनियम की धारा २५४ का लोप किया जाए.

धारा २५४ कालोप.

११ ९. मूल अधिनियम, मूल अधिनियम की धारा २५५ का लोप किया जाए.

धारा २५५ का लोप.

१२०. मूल अधिनियम की धारा २५७ में, -

धारा २५७ का संशोधन.

(एक) खण्ड ( ढ) , ( ण ) , ( त ) , ( थ ) , ( द ) , ( ध ) , (न ) तथा ( प ) का लोप किया जाए;

(दो) खण्ड ( भ ) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए-

" ( भ ) धारा २५० के अधीन अनुचित रूप से बेकब्जा किए गए भूमिस्वामी के पुनः स्थापन तथा सिविल कारगार में निरुद्ध के बारे में कोई विनिश्चय; ";

(तीन) खण्ड ( भ -१ ) का लोप किया जाए;

(चार) खण्ड ( य -१ ) का लोप किया जाए.

१२१. मूल अधिनियम की धारा २५८ में,

धारा २५८ का संशोधन.

(एक) उपधारा ( २ ) में, -

(क) खण्ड ( एक ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " ( एक -क ) धारा १३ ( २ ) के अधीन प्रस्थापना के प्रकाशन के लिए प्ररूप विहित किया जाना;" ;

(ख) खण्ड ( दो ) के स्थान पर , निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " ( दो) धारा २० ( २ ) के अधीन भू-अभिलेख अधीक्षकों तथा सहायक भू- अभिलेख अधीक्षकों के कर्तव्यों का विहित किया जानाः":

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(ग ) खण्ड ( तीन ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( तीन ) धारा ५ ९ के अधीन निर्धारण की दरें, प्रीमियम तथा निर्धारण का अधिरोपण तथा भू- राजस्व का पुनर्निर्धारण तथा व्यपवर्तन की प्रज्ञापना के लिए रीति; " ;

(घ ) खण्ड ( चार ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अंतःस्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" (चार - क) धारा ६१ ( ङ) के अधीन अन्य अभिलेख विहित करना;

(चार-ख ) प्रयोग की जाने वाली शक्तियां तथा कर्तव्य धारा ६३ ( २ ) के अधीन निर्वहन करेगा; ";

(ङ) खण्ड ( पांच ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किए जाएं, अर्थात्ः-

" ( पांच ) धारा ६७ के अधीन सर्वेक्षण संख्यांक, ब्लाक संख्यांक, भू- खण्ड संख्यांक की विरचना और उनको नगरेतर क्षेत्रों में ग्रामों में तथा नगरीय क्षेत्रों में सेक्टर में समूहीकृत करना;

" ( पांच-क ) धारा ६८ की उपधारा ( ३ ) के अधीन किसी सर्वेक्षण संख्यांक, ब्लाक संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक का विभाजन या समामेलन तथा उनका निर्धारण किया जाना; " ;

(च) खण्ड ( छह ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" (छह ) धारा ६ ९ के अधीन भू- अभिलेख में सर्वेक्षण संख्यांकों, ब्लाक संख्यांकों तथा भू- खण्ड संख्यांकों तथा उनके उप- खण्डों की प्रविष्टि किया जाना; ";

(छ) खण्ड ( सात ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( सात ) धारा ७१ के अधीन ग्राम या सेक्टर को विभाजित करना या ग्रामों या सेक्टरों को सम्मिलित करना;";

(ज ) खण्ड ( आठ ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" (आठ ) धारा ७२ के अधीन खातों पर नियत दरों पर निर्धारण किया जाना; " ;

(झ ) खण्ड ( नौ ) , ( दस ) और ( ग्यारह ) लोप का किया जाए;

(ञ) खण्ड ( बारह ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( बारह ) धारा ७७ के अधीन भू- सर्वेक्षण करने के लिए विनियमन;";

( ट) खण्ड ( पंद्रह ) , ( सोलह ), ( सत्रह ) तथा ( अट्ठारह ) का लोप किया जाए;

(ठ) खण्ड ( उन्नीस ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( उन्नीस ) धारा १०४ ( २ ) के अधीन पटवारी तथा नगर सर्वेक्षक के अन्य कर्तव्यों का विहित किया जाना;";

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 25 जून 2018-

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(ड) खण्ड ( इक्कीस ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " (इक्कीस ) धारा १०७ के अधीन नक्शों का माप तथा अन्य विशिष्टियों का विहित किया जाना; ";

(ढ) खण्ड ( तेईस ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " (तेईस ) धारा १० ९ तथा ११० के अधीन निम्नलिखित के लिए रीति तथा प्ररूपों का विहित किया जाना-

(क) अधिकार का अर्जन, प्रज्ञापना की रिपोर्ट करना;

(ख ) नामांतरण पूर्व का स्केच , यदि कोई हो;

(ग ) अभिस्वीकृति;

(घ) रजिस्टर;

(ङ) लिखित प्रज्ञापना या नोटिस को प्रदर्शित किया जाना;

(च) प्रतिलिपि का प्रदाय;

(छ) लंबित मामलों की जानकारी; और

(ज) फीस का विहित किया जाना. " ;

(ण ) खण्ड ( चौबीस ) का लोप किया जाए;

(त) खण्ड ( पच्चीस ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " (पच्चीस ) धारा ११४ के अधीन भू-अभिलेखों को तैयार करना तथा उन्हें विहित करना; " ;

( थ ) खण्ड ( पच्चीस ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अंतःस्थापित किया जाए, अर्थात्: - " ( पच्चीस - क ) उस फीस का विहित किया जाना जिसका कि भुगतान किये जाने पर धारा ११४ -क के अधीन भू- अधिकार पुस्तिका दी जाएगी तथा प्रविष्टियों के ब्यौरे विहित किए जाना;";

(द ) खण्ड ( अट्ठाईस ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " ( अट्ठाईस ) धारा १२४ के अधीन ग्रामों, सेक्टरों के तथा सर्वेक्षण संख्यांकों या भू- खण्ड संख्यांकों के सीमा चिन्हों संबंधी विनिर्देश तथा सन्निर्माण एवं अनुरक्षण की रीति; ";

(ध ) खण्ड ( उन्तीस ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः- " ( उन्तीस ) धारा १२७ के अधीन ग्राम की सड़क, ग्राम की बंजर भूमि या सामुदायिक प्रयोजनों के लिए आरक्षित भूमि तथा उससे लगी हुई भूमि के बीच सीमा चिन्हों को अंकित करने की रीति और वह रीति जिसमें वे सु- अवस्था में रखे जाएंगे तथा उनका नवीनीकरण किया जाएगा:":

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(न) खण्ड ( इकतीस ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्डं स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( इकतीस ) वह रीति, वे व्यक्ति जिन्हें तथा वह स्थान जहां भू- राजस्व धारा १४० के अधीन संदत्त किया जाएगा; " ;

(प) खण्ड ( छत्तीस ) में, शब्द " बंदोबस्त के चालू रहने के दौरान " का लोप किया जाए;

(फ) खण्ड ( सैंतीस ) का लोप किया जाए;

(ब) खण्ड ( इकतालीस ) का लोप किया जाए;

(भ) खण्ड ( तैंतालीस ) का लोप किया जाए;

(म) खण्ड ( चवालीस ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" (चवालीस- क) धारा १७८ क के अधीन भूमिस्वामी के जीवनकाल में विभाजन तथा निर्धारण के प्रभाजन का विनियमन;";

(य) खण्ड ( सैंतालीस ) से ( इक्यावन ) का लोप किया जाए;

(य-क) खण्ड ( छप्पन ) का लोप किया जाए;

(य-ख) खण्ड ( सतावन ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाए, अर्थात्. -

" (सतावन - क ) धारा २३३ - क के अधीन संधारित किए जाने वाले अभिलेख का विहित किया जाना;

(य -ग ) खण्ड ( साठ ) के स्थान पर, निम्नलिखित खण्ड स्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( साठ ) धारा २३ ९ ( ६ ) के अधीन प्रतिकर की संगणना करने की रीति; ";

(य -घ) खण्ड ( पैंसठ ) के पश्चात्, निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाए, अर्थात्ः-

" ( पैंसठ - क) धारा २५० के उपबंधों को प्रभावी बनाने के प्रयोजन के लिए; ";

(य-ङ) खण्ड ( सड़सठ ) का लोप किया जाए;

(दो) उपधारा ( २ ) के पश्चात्, निम्नलिखित उपधाराएं अन्तःस्थापित की जाएं, अर्थात्ः-

" ( २-क ) राज्य सरकार, समय - समय पर , मण्डल की पद्धति तथा प्रक्रिया को तथा अन्य राजस्व न्यायालयों द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया को विनियमित करते हुए , इस संहिता के उपबंधों से संगत नियम बना सकेगी तथा ऐसे नियमों द्वारा अनुसूची एक में से समस्त नियमों या उनमें से किसी भी नियम को बातिल कर सकेगी , परिवर्तित कर सकेगी या परिवर्धित कर सकेगी.

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 25 जून 2018

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(२ -ख ) विशिष्टतया तथा उपधारा ( २ - क ) द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित समस्त विषयों या उनमें से किसी भी विषय के लिए उपबंध हो सकेंगे , अर्थात्:-

(क) साधारणतया या किसी विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में समन , सूचनाओं तथा अन्य आदेशिकाओं की डाक द्वारा या किसी अन्य रीति में तामील और ऐसी तामील का सबूत;

(ख ) पक्षकारों तथा साक्षियों को समन करने की राजस्व अधिकारियों की शक्ति का विनियमन और साक्षियों के लिए व्ययों की मंजूरी;

(ग ) मान्यताप्राप्त अभिकर्ताओं का, इस संहिता के अधीन की कार्यवाहियों में उनके द्वारा की जाने वाली उपसंजातियों, किए जाने वाले आवेदनों तथा किए जाने वाले कार्यों के बारे में विनियमन;

(घ) वह प्रक्रिया जिसका अनुपालन जंगम तथा स्थावर सम्पत्तियों की कुर्की करने में किया जाएगा;

(ङ) विक्रयों को प्रकाशित करने , संचालित करने , अपास्त करने तथा उनकी पुष्टि करने के लिए प्रक्रिया तथा ऐसी कार्यवाहियों से संसक्त समस्त आनुषंगिक विषय;

(च) पशुधन तथा अन्य जंगम सम्पत्ति का, जबकि वह कुर्की के अधीन हो , अनुरक्षण तथा उसकी अभिरक्षा, ऐसे अनुरक्षण तथा ऐसी अभिरक्षा के लिए देय फीस, ऐसे पशुधन तथा संपत्ति का विक्रय और ऐसे विक्रय के आगम;

(छ ) अपील तथा अन्य कार्यवाहियों का समेकन;

(ज) ऐसे समस्त प्ररूप , रजिस्टर, पुस्तकें, प्रविष्टियां तथा लेखे जो कि राजस्व न्यायालयों के कामकाज के संपादन के लिए आवश्यक या वांछनीय हों;

( झ ) वह समय जिसके भीतर, किसी अभिव्यक्त उपबंध के अभाव में , अपीलें फाइल की जा सकेंगी या पुनरीक्षण के लिए आवेदन फाइल किए जा सकेंगे ;

(ञ ) किन्हीं भी कार्यवाहियों के तथा उनसे आनुषांगिक खर्चे;

(ट) कमीशन पर साक्षियों की परीक्षा तथा ऐसी परीक्षा पर आनुषंगिक व्ययों का भुगतान;

(ठ) अर्जी लेखकों का अनुज्ञापन और उनके आचरण का विनियमन.

(२- ग) ऐसे नियमों का प्रकाशन होने की तारीख से या ऐसी अन्य तारीख से, जो कि विनिर्दिष्ट की जाए, वही बल और प्रभाव होगा मानो कि वे अनुसूची- एक में अन्तर्विष्ट थे. " .

अनुसूची- एक का

संशोधन.

१२२. मूल अधिनियम की अनुसूची - एक में, शीर्ष में , कोष्ठक शब्द और अंक " ( धारा ४१ देखें ) " के स्थान पर, कोष्ठक , शब्द, अंक और अक्षर " ( धारा २५८ ) , ( २ क ) तथा ( २ ग ) देखें ) " स्थापित किए जाएं.

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उद्देश्यों और कारणों का कथन

राज्य के कृषकों एवं भूमिस्वामियों की समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए राज्य भूमि सुधार आयोग का गठन किया गया था. आयोग द्वारा अनुभव किया गया है कि मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता , १ ९ ५ ९ में अब तक किये गए संशोधन कई मुद्दों को हल करने में सक्षम नहीं है और नागरिकों की उम्मीदों की पूर्ति नहीं हो पा रही है. आयोग राज्य के विभिन्न संभागीय मुख्यालयों पर पहुंचकर जन प्रतिनिधियों तथा जिला अधिवक्ता संघ के सदस्यों से मिला एवं वर्तमान संहिता में आवश्यक विभिन्न संशोधनों पर उनके विचार तथा सुझाव प्राप्त किए. आयोग को संहिता में संशोधन के लिए १,७०० से अधिक सुझाव प्राप्त हुए हैं. आयोग ने राजस्व मण्डल के अध्यक्ष , उनके सदस्यों एवं राजस्व विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारियों से भी प्रस्तावित संशोधनों पर विस्तार से चर्चा की गई.

२. आयोग द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रतिवेदन के आधार पर तथा समय - समय पर विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तथा भूमि प्रबंधन में उद्भूत होने वाली कठिनाईयों को दूर करने की दृष्टि से यह संशोधन विधेयक प्रस्वावित किया जा रहा है. प्रस्तावित संशोधनों की प्रमुख बातें निम्नानुसार है: -

(१) संहिता के अध्याय -७ एवं ८ जो कि नगरेतर क्षेत्रों में राजस्व सर्वेक्षण तथा बन्दोबस्त और नगरीय क्षेत्रों में भूमि का निर्धारण तथा पुननिर्धारण से संबंधित हैं , के स्थान पर , अध्याय ७ भू- सर्वेक्षण प्रतिस्थापित किया जा रहा है. अब राजस्व सर्वेक्षण तथा बन्दोबस्त के स्थान पर भू- सर्वेक्षण का कार्य जिला कलेक्टर द्वारा आयुक्त भू- अभिलेख के सीधे नियंत्रण में संचालित किया जाएगा.

(2) भूमि प्रबंधन की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए अब नगरेतर क्षेत्रों में ग्राम होंगे तथा नगरीय क्षेत्रों में सेक्टर होंगे. ग्राम और सेक्टर में गैर कृषि भूमि में ब्लॉक तथा भू- खण्ड होंगे , जो कि बेहतर स्केल पर आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए नक्शे तैयार करने में समर्थ होंगे .

(३) संहिता की धारा ३५ आदेशिका फीस जमा न करने जैसे तुच्छ आधारों पर मामलों को खारिज होने से बचाने के लिए संशोधित की जा रही है. संहिता के वर्तमान अपील , पुनरीक्षण एवं पुनविर्लोकन के विद्यमान प्रावधानों को भी संशोधित किया जा रहा है. अब कलेक्टर के अधीन कार्य कर रहे राजस्व अधिकारियों के आदेशों का पुनरीक्षण कलेक्टर द्वारा किया जा सकेगा और कलेक्टर द्वारा पारित आदेश का पुनरीक्षण संभागायुक्त द्वारा किया जा सकेगा. संभागायुक्त द्वारा पारित आदेश का राजस्व मण्डल द्वारा किया जा सकेगा. अपील, पुनरीक्षण एवं पुनर्विलोकन के लिए समयावधि एक समान की गई है. कतिपय आदेशों के विरूद्ध कुछ विशिष्ट धाराओं के लिए प्रथम अपील या द्वितीय अपील बाधित की गई है जिसका संशोधन में स्पष्ट उल्लेख किया गया है.

(४) नामांतरण , सीमांकन एवं विभाजन की महत्वपूर्ण धाराओं में भी संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं. अविवादित नामांतरण एवं विवादित नामांतरण के प्रकरण में क्रमशः २ माह तथा ६ माह की समय सीमा उपबंधित की गई है. नामांतरण की प्रक्रिया तभी पूर्ण हो गई समझी जाएगी जब भू- अभिलेख में शुद्धिकरण तथा आदेश और अद्यतन भू- अभिलेख की प्रति आवेदकों को निःशुल्क उपलब्ध करा दी जाती है . सीमांकन के मामलों में यदि आवेदक संतुष्ट नहीं होता है तो उपखण्ड अधिकारी को आवेदन कर सकेगा , जो विशेष दल गठित कर एक बार फिर से सीमांकन करा सकेगा. सीमांकन की कार्यवाही के लिए निजी एजेंसी के पैनल की भी तैनाती की जाएगी.

(५) संहिता की धारा १४० में यह प्रावधान किया जा रहा है कि कोई भूमि धारक १० वर्ष का भू- राजस्व एक मुश्त जमा कर सकेगा. फसलों के नुकसान होने पर भू- राजस्व की माफी या उसके निलंबन के लिए राज्य सरकार को प्राधिकृत किया जा रहा है.

(६) मौरूसी कृषक से संबंधित अध्याय -१४ को विलोपित किया गया है क्योंकि अब यह सुसंगत नहीं रहा है तथा इस प्रयोजन के लिए मध्यप्रदेश भूमिस्वामी एवं बटाईदार के हितों का संरक्षण अधिनियम , २०१६ ( क्रमांक १३ सन् २०१८ ) इस विषय को ध्यान में रखकर पृथक अधिनियमित किया गया है.

(७) संहिता की धारा १७२ को विलोपित किया गया है जिससे भूमि के व्यपवर्तन के लिए पूर्व अनुज्ञा आवश्यक नहीं होगी . अब भूमिस्वामी अपना व्यपवर्तित भू- राजस्व का निर्धारण स्वयं कर सकेगा और अपेक्षित रकम जमा कर सकेगा और विद्यमान अन्य विधियों का पालन करते हुये व्यपवर्तन कर सकेगा अब उसे किसी भी प्रकार की लिखित अनुज्ञा प्राप्त करना आवश्यक नहीं होगा.

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(८) नगरीय क्षेत्रों में , दखलरहित सरकारी भूमि के बेहतर प्रबंधन हेतु तथा उसके उपयोगी सामुदायिक प्रयोजन के लिए विशिष्ट प्रयोजन हेतु कलेक्टर को भूमि आरक्षित रखे जाने के लिए सक्षम किये जाने के उपबंध किए गए हैं.

(९) नगरीय तथा नगरेतर क्षेत्रों में अधिकार अभिलेख पृथक् से तैयार किए जाएंगे और समस्त भूमिस्वामियों, सरकारी पटटेदारों एवं आबादी में निवासरत व्यक्तियों के अधिकार ऐसे अभिलेखों में अभिलिखित किए जाएंगे. भू- अभिलेखों में अशुद्ध प्रविष्टियों के शुद्धीकरण करने के प्रावधानों को भी उपांतरित किया जा रहा है. मार्गाधिकार तथा अन्य प्राइवेट सुखाचार संबंधी अधिकारों के प्रावधानों को भी अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है.

(१० ) उपरोक्त वृहद् संशोधनों के अतिरिक्त, अनेक प्रक्रियात्मक सुधार भी प्रस्तावित किए गए हैं जैसे कि परिभाषा खण्ड में सेक्टर, सेवा भूमि, विकास योजना आदि के लिए विशिष्ट परिभाषाएं सम्मिलित की गई हैं. नए उपखण्ड के सृजन की प्रक्रिया को भी नई तहसील के सृजन के पूर्ववर्ती उपबंधों के समान प्रस्तावित किया गया है . शोध्य भू- राजस्व की वसूली के लिए प्रभावी उपबंध किए गए हैं.

२. अतः यह विधेयक प्रस्तुत है .

उमाशंकर गुप्ता भोपाल :

भारसाधक सदस्य.

तारीख : २१ जून, २०१८ .

वित्तीय ज्ञापन

प्रस्तुत संशोधन विधेयक में किसी नई संरचना अथवा नये पद निर्माण का प्रस्ताव नहीं है और न ही किसी अन्य प्रकार से कोई व्यय अंतर्ग्रस्त है, इस कारण किसी भी प्रकार के नये वित्तीय भार का प्रस्ताव नहीं है.

प्रत्यायोजन विधायन का ज्ञापन

प्रस्तुत संशोधन विधेयक के जिन खण्डों द्वारा विधायिनी शक्तियों का प्रत्यायोजन किया जा रहा है , उनका विवरण निम्नानुसार है:-

धारा १३ ( २ ) के अधीन प्रस्थापना के प्रकाशन के लिए प्ररुप विहित किये जाने;

खण्ड (७)

धारा २० ( २ ) के अधीन भू अभिलेख अधीक्षकों तथा सहायक भू अभिलेख अधीक्षकों का विहित किये जाने; खण्ड (८)

धारा ५९ के अधीन निर्धारण की दरें, प्रीमियम तथा निर्धारण का अधिरोपण तथा भू- राजस्व का पुननिर्धारण तथा व्यपवर्तन की प्रज्ञापना के लिए रीति विहित किये जाने; खण्ड (३१)

धारा ६० के अधीन उस भूमि पर निर्धारण जिस पर निर्धारण नहीं हुआ हो का निर्धारण किये जाने; खण्ड (३२)

धारा ६१ ( ड़ ) के अधीन अन्य अभिलेख विहित किये जाने; खण्ड (३३)

धारा ६७ के अधीन सर्वेक्षण संख्यांकों, ब्लॉक संख्यांक, भू- खण्ड संख्यांक की विरचना और नगरेतर क्षेत्रों में उनको ग्रामों में तथा नगरीय क्षेत्रों में सेक्टर में समूहीकृत किये जाने; खण्ड (३३)

खण्ड (३३) धारा ६८ ( ३ )के अधीन किसी सर्वेक्षण संख्यांक, ब्लॉक संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक का विभाजन या समामेलन तथा उनका निर्धारण किये जाने;

खण्ड (३३) धारा ६ ९ के अधीन भू- अभिलेख में सर्वेक्षण संख्यांकों, ब्लॉक संख्यांकों और भू- खण्ड संख्यांकों तथा उनके उपखण्डों की प्रविष्टि किये जाने;

खण्ड (३३) धारा ७१ के अधीन ग्राम या सेक्टर को विभाजित करना या ग्रामों या सेक्टरों को सम्मिलित करना;

धारा ७२ के अधीन खातों पर नियत दरों पर निर्धारण किये जानेः

खण्ड ( ३३ )

खण्ड ( ३३ ) धारा ७७ के अधीन भू- सर्वेक्षण के लिए विनियमनः 682(45)

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खण्ड (३४) धारा १०४ (२ ) में पटवारी तथा नगर सर्वेक्षक के अन्य कर्तव्यों का विहित किये जाने;

खण्ड (३६) धारा १०६ के अधीन राजस्व निरीक्षक के कर्तव्य विहित किये जाने;

खण्ड (३७) धारा १०७ के अधीन आबादी नक्शों का माप तथा अन्य विशिष्टियों का विहित किये जाने;

खण्ड (३८ ) धारा १०८ के अधीन अधिकार अभिलेख में दर्ज करायी जाने वाली विशिष्टियां;

खण्ड (३९ ) धारा १० ९ के अधीन अधिकार के अर्जन की रिपोर्ट दिये जाने से संबंधित विभिन्न प्ररूप एवं रीति विहित किये जाने;

खण्ड

धारा ११० के अधीन भू- अभिलेखों में अधिकार अर्जन बावत् नामांतरण की प्रक्रिया, प्ररूप एवं रीति विहित किये जाने;

खण्ड

धारा ११४ के अधीन भू-अभिलेखों को तैयार करना तथा उन्हें विहित किये जाने;

(४० ) (४३ )

खण्ड (४४) उस फीस का विहित किया जाना जिसका की भुगतान किये जाने पर धारा ११४ - क के अधीन भू- अधिकार पुस्तिका दी जाएगी तथा प्रविष्टियों के ब्योरे विहित किये जाने;

खण्ड (५१ ) धारा १२४ के अधीन ग्रामों, सेक्टरों के तथा सर्वेक्षण संख्यांकों या भू- खण्ड संख्यांकों के सीमा चिन्हों के सीमा चिन्हों संबंधी विर्निदेश तथा संनिर्माण एवं अनुरक्षण की रीति;

धारा १२६ के अधीन संक्षेपतः बेदखल करने की रीति विहित किये जाने;

खण्ड (५३ )

खण्ड (५४) धारा १२७ के अधीन ग्राम की सड़क, ग्राम की बंजर भूमि या सामुदायिक प्रयोजन के लिये आरक्षित भूमि तथा उससे लगी हुई भूमि के बीच सीमा चिन्हों को अंकित करने की रीति और वह रीति जिसमें वह सु - अवस्था में रखे जाएंगे तथा उनका नवीनीकरण किये जाने;

खण्ड (५६) धारा १२९ के अधीन सर्वेक्षण संख्यांक या सर्वेक्षण संख्यांक के उपखण्ड या ब्लॉक संख्यांक या भू- खण्ड संख्यांक के सीमांकन की रीति;

खण्ड (६४) वह रीति, वे व्यक्ति जिन्हें तथा वह स्थान जहां भू- राजस्व धारा १४० के अधीन संदत्त किये जाने;

खण्ड (६६ ) धारा १४२ के अधीन भू- राजस्व प्राप्त करने वाले के द्वारा दी जाने वाली रसीद का प्ररूप विहित किये जाने;

खण्ड (८९ ) धारा १७८ क के अधीन भूमिस्वामी के जीवनकाल में विभाजन तथा निर्धारण के प्रभाजन का विनियमन;

खण्ड (१०५) धारा २३३ - क के अधीन संधारित किये जाने वाले एवं अभिलेख विहित किये जाने;

खण्ड (१०६ ) धारा २३४ के अधीन निस्तार पत्रक तैयार किये जाने;

खण्ड १०७) धारा २३ ९ (६ ) के अधीन प्रतिकर की संगणना करने की रीति;

(

खण्ड (१०८ ) धारा २४० के अधीन भूमिस्वामी या राज्य सरकार की भूमि पर खड़े वृक्षों को काटे जाने तथा वनोत्पाद के नियंत्रण , प्रबंध, काटकर गिराए जाने या हटाए जाने;

खण्ड (११० ) धारा २४४ के अधीन आबादी क्षेत्र में आबादी के आवंटन के लिए

खण्ड (११४) धारा २५० के उपबंधों को प्रभावी बनाने के प्रयोजन के लिए तथा;

खण्ड ( १२९ ) मंडल या राजस्व न्यायालयों द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया का विनियमन तथा कामकाज संबंधी; संबंध में राज्य सरकार नियम बना सकेगी जो सामान्य स्वरूप के होंगे.

अवधेश प्रताप सिंह

प्रमुख सचिव,

मध्यप्रदेश विधान सभा .

नियंत्रक, शासकीय मुद्रण तथा लेखन सामग्री, मध्यप्रदेश द्वाग शासकीय केन्द्रीय मुद्रणालय भोपाल से मुद्रित तथा प्रकाशित- 2018

Cite this issue. Madhya Pradesh Gazette, Government of Madhya Pradesh, 25 June 2018. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.madhya.2018-06-25.341.Extraordinary/. Archive identifier in.gazette.madhya.2018-06-25.341.Extraordinary.