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मध्य प्रदे श शासन
सत्यमेव जयते
मध्यप्रदेश राजपत्र
(असाधारण )
प्राधिकार से प्रकाशित
क्रमांक 275]
भोपाल , मंगलवार , दिनांक 9 जुलाई 2019- आषाढ़ 18 शक 1941
विधान सभा सचिवालय, मध्यप्रदेश
भोपाल , दिनांक 9 जुलाई 2019
क्र. 8783 - मप्रविस - 15- विधान- 2019.- मध्यप्रदेश विधान सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन सम्बन्धी नियम-64 के उपबंधों के पालन में दण्ड विधि ( मध्यप्रदेश संशोधन ) विधेयक, 2019 ( क्रमांक 14 सन् 2019 ) जो विधान सभा में दिनांक 9 जुलाई, 2019 को पुरःस्थापित हुआ है. जनसाधारण की सूचना के लिए प्रकाशित किया जाता है.
ए. पी. सिंह, प्रमुख सचिव.
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मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 9 जुलाई 2019
मध्यप्रदेश विधेयक क्रमांक १४ सन् २०१ ९
दण्ड विधि ( मध्यप्रदेश संशोधन ) विधेयक, २०१ ९
विषय-सूची
खण्ड:
अध्याय- एक
प्रारंभिक
१. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ .
अध्याय-दो
दण्ड प्रक्रिया संहिता , १ ९ ७३ का संशोधन
२. मध्यप्रदेश राज्य को लागू हुए रूप में केन्द्रीय अधिनियम, १ ९ ७४ का संख्यांक २ का संशोधन.
३. धारा १२६ का संशोधन.
४. धारा २७३ का संशोधन.
५. धारा २७८ का संशोधन.
६. धारा २८१ का संशोधन.
७. धारा २ ९ १ का संशोधन.
८. धारा ३०५ का संशोधन.
९. धारा ३१७ का संशोधन.
१० . धारा ३२० का संशोधन.
११. धारा ३५३ का संशोधन.
१२. धारा ३ ९ ० का संशोधन.
१३. धारा ४५१ का संशोधन.
१४. धारा ४५७ का संशोधन.
१५. प्रथम अनुसूची का संशोधन.
अध्याय-तीन
भारतीय साक्ष्य अधिनियम , १८७२ का संशोधन
१६. मध्यप्रदेश राज्य को लागू हुए रूप में केन्द्रीय अधिनियम, १८७२ का १ का संशोधन.
१७. धारा ६५ ख का संशोधन .
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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 9 जुलाई 2019
मध्यप्रदेश विधेयक
क्रमांक १४ सन् २०१ ९
दण्ड विधि ( मध्यप्रदेश संशोधन ) विधेयक , २०१ ९
मध्यप्रदेश राज्य को लागू हुए रूप में दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९ ७३ और भारतीय साक्ष्य अधिनियम , १८७२ को और संशोधित करने हेतु विधेयक.
भारत गणराज्य के सत्तरवें वर्ष में मध्यप्रदेश विधान- मंडल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
अध्याय- एक
प्रारंभिक
१. (१ ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दण्ड विधि ( मध्यप्रदेश संशोधन ) अधिनियम, २०१ ९ है.
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ.
(२ ) यह राजपत्र में इसके प्रकाशन का तारीख से प्रवृत्त होगा.
अध्याय-दो
दण्ड प्रक्रिया संहिता , १ ९ ७३ का संशोधन
२. मध्यप्रदेश राज्य को लागू हुए रूप में दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९ ७३ ( १ ९ ७४ का २ ) ( जो इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम के नाम से निर्दिष्ट है ) को इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति में संशोधित किया जाए.
लागू हुए रूप में केन्द्रीय अधिनियम,
मध्यप्रदेश राज्य को १९७४ का संख्यांक २ का संशोधन.
धारा १२६ का संशोधन.
३. मूल अधिनियम की धारा १२६ में, उपधारा ( १ ) में, खण्ड ( ग ) में, पूर्ण विराम के स्थान पर, अल्प विराम स्थापित किया जाए और तत्पश्चात् निम्नलिखित खण्ड जोड़े जाएं, अर्थात्:-
" (घ) जहां धारा १२५ की उपधारा ( १ ) के खण्ड ( ग ) में निर्दिष्ट ऐसा व्यक्ति या उसकी धर्मज या अधर्मज संतान सामान्यतः निवास करता है। निवास करती है,
(ङ) जहां धारा १२५ की उपधारा ( १ ) के खण्ड ( घ ) में निर्दिष्ट ऐसा व्यक्ति या उसके पिता या माता सामान्यतः निवास करता है/निवास करते हैं,
(च) जहां धारा १२५ की उपधारा ( १ ) के खण्ड ( ङ) में निर्दिष्ट ऐसा व्यक्ति या उसके पितामह या मातामह सामान्यतः निवास करता है। निवास करते हैं. ".
४. मूल अधिनियम की धारा २७३ में, -
धारा २७३ का संशोधन.
(एक) पार्श्व शीर्ष के स्थान पर, निम्नलिखित पार्श्व शीर्ष स्थापित किया जाए, अर्थात्:-
"विचारण या अन्य कार्यवाही में साक्ष्य का लिया जाना";
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(दो) प्रारंभिक पैराग्राफ को उपधारा ( १ ) के रूप में क्रमांकित किया जाए तथा इस प्रकार क्रमांकित उपधारा ( १ ) के प्रारंभिक पैराग्राफ के स्थान पर, निम्नलिखित पैराग्राफ स्थापित किया जाए, अर्थात्: - " ( १ ) अभिव्यक्त रूप में जैसा उपबंधित है के सिवाय, विचारण या अन्य कार्यवाही के अनुक्रम में लिया गया सब साक्ष्य , साक्षी की वैयक्तिक उपस्थिति में या श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से और अभियुक्त की वैयक्तिक उपस्थिति में, या श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से या, जब उसे वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्त कर दिया गया है तब उसके अधिवक्ता की उपस्थिति में अभिलिखित किया जाएगा." ;
(तीन) उपधारा ( १ ) के पश्चात्, निम्नलिखित नई उपधारा जोड़ी जाए, अर्थात्:-
" ( २ ) उपधारा ( १ ) में निर्दिष्ट साक्ष्य, उच्च न्यायालय द्वारा समय - समय पर विरचित नियमों और दिशानिर्देशों के अनुसार अभिलिखित किए जाएंगे. ".
५. मूल अधिनियम की धारा २७८ में , उपधारा ( १ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा स्थापित की जाए, धारा २७८ का संशोधन.
अर्थात्:-
" ( १ ) जैसे- जैसे प्रत्येक साक्षी का साक्ष्य जो धारा २७५ या धारा २७६ के अधीन लिया जाए, पूरा होता जाता है, वैसे - वैसे वह, यदि अभियुक्त हाजिर हो तो उसकी उपस्थिति में, या यदि वह अधिवक्ता द्वारा हाजिर हो तो उसके अधिवक्ता की उपस्थिति में, या जब अभियुक्त की उपस्थिति धारा २७३ के अधीन श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से हो , तो साक्षी को पढ़कर सुनाया जाएगा और यदि आवश्यक हो तो शुद्ध किया जाएगा. ".
६. मूल अधिनियम की धारा २८१ में, -
धारा २८१ का संशोधन.
(एक) उपधारा ( २ ) में, शब्द " जब कभी अभियुक्त की परीक्षा महानगर मजिस्ट्रेट से भिन्न किसी मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय द्वारा की जाती है " के स्थान पर, शब्द " जब कभी अभियुक्त की परीक्षा उसकी वैयक्तिक उपस्थिति में या श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से उसकी उपस्थिति में महानगर मजिस्ट्रेट से भिन्न किसी मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय द्वारा की जाती है " स्थापित किए जाएं;
(दो) उपधारा ( ५ ) में, पूर्ण विराम के स्थान पर, कोलन स्थापित किया जाए और तत्पश्चात् निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाए, अर्थात्: -
" परन्तु यदि अभियुक्त की परीक्षा श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से की जाती है तो अभियुक्त के हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होगी. ".
धारा २ ९ १ का संशोधन.
७. मूल अधिनियम की धारा २९ १ में, उपधारा ( १ ) में, शब्द " अभियुक्त की उपस्थिति में, " के स्थान पर, शब्द " अभियुक्त की वैयक्तिक उपस्थिति में या श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से उसकी उपस्थिति में " स्थापित किए जाएं.
८. मूल अधिनियम की धारा ३०५ में, -
धारा ३०५ का संशोधन.
(एक) उपधारा ( ३ ) में , शब्द " प्रतिनिधि की हाजिरी में " के स्थान पर, शब्द " प्रतिनिधि की वैयक्तिक उपस्थिति में या श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से उसकी उपस्थिति में " स्थापित किए जाएं;
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(दो) उपधारा ( ४ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा स्थापित की जाए, अर्थात्:-
" (४ ) जहां निगम का कोई प्रतिनिधि या तो वैयक्तिक रूप से या श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से उपस्थित नहीं होता है , वहां कोई ऐसी अपेक्षा , जो उपधारा ( ३ ) में निर्दिष्ट है , लागू नहीं होगी , किन्तु यदि वह श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से उपस्थित होता है, वहां कोई ऐसी अपेक्षा, जो उपधारा ( ३ ) में निर्दिष्ट है, लागू होगी. ".
९. मूल अधिनियम की धारा ३१७ में, निम्नलिखित स्पष्टीकरण जोड़ा जाए, अर्थात्: -
धारा ३१७ का संशोधन.
" स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजन के लिये " अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी " में श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से उसकी हाजिरी सम्मिलित होगी.".
१०. मूल अधिनियम की धारा ३२० में, उपधारा ( २ ) के नीचे सारणी में, -
धारा ३२० का संशोधन.
(एक) कालम १ , २ और ३ में, धारा ३१२ तथा उससे संबंधित प्रविष्टियों के पहले निम्नलिखित धाराएं तथा उनसे संबंधित प्रविष्टियां अन्तःस्थापित की जाएं, अर्थात्:-
३
२
१
" बलवा
१४७
वह व्यक्ति, जिसके विरूद्ध अपराध कारित करते समय बल या हिंसा का प्रयोग किया गया है ;
परन्तु अभियुक्त ऐसे अन्य अपराध के लिए आरोपित नहीं किया गया है, जो शमनीय नहीं है.
अश्लील कार्य या
२९४
अश्लील शब्दों का प्रयोग
वह व्यक्ति, जिसे क्षोभ कारित करने हेतु अश्लील कार्य किए गए थे या अश्लील शब्दों का प्रयोग किया गया था. ";
(दो) कालम १ , २ और ३ में, धारा ४९४ तथा उससे संबंधित प्रविष्टियों के पश्चात् , निम्नलिखित धारा तथा उससे संबंधित प्रविष्टियां अन्तःस्थापित की जाएं, अर्थात्:-
३
१
२
४९८ -क
" किसी स्त्री के पति या
जिस स्त्री के साथ क्रूरता हुई : -
पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना.
परन्तु अपराध के शमन के लिए आवेदन के दिनांक से न्यूनतम छह माह की कालावधि व्यपगत हो गई हो और न्यायालय का, यदि यह समाधान हो जाता है कि शमन उस महिला के हित में है, तो वह आवेदन स्वीकार कर सकेगा जबकि कोई भी पक्षकार अनावर्ती कालावधि के भीतर ऐसे आवेदन को वापस नहीं ले लेता.";
(तीन ) कालम १ , २ और ३ में , धारा ५०० तथा उससे संबंधित प्रविष्टियों के पश्चात् , निम्नलिखित धारा तथा उससे संबंधित प्रविष्टियां अन्तःस्थापित की जाएं, अर्थात्:-
३
२
१
धारा ५०६ का भाग -दो
" आपराधिक अभित्रास, यदि
वह व्यक्ति, जिसके विरूद्ध आपराधिक अभित्रास का अपराध कारित किया गया था. ".
धमकी, मृत्यु या घोर उपहति
इत्यादि कारित करने की हो.
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११. मूल अधिनियम की धारा ३५३ में, उपधारा ( ५ ) के स्थान पर, निम्नलिखित उपधारा स्थापित की जाए, धारा ३५३ का संशोधन.
अर्थात्:-
" ( ५) यदि अभियुक्त अभिरक्षा में है, तो यथास्थिति, व्यक्तिगत रूप से या श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से निर्णय सुनने के लिये उसे लाया जाएगा . " .
१२. मूल अधिनियम की धारा ३ ९ ० में, -
धारा ३ ९ ० का संशोधन.
(एक) पार्श्व शीर्ष में, शब्द " दोष मुक्ति से " का लोप किया जाए;
(दो) शब्द तथा अंक " जब धारा ३७८ के अधीन अपील उपस्थित की जाती है तब उच्च न्यायालय " के स्थान पर, शब्द तथा अंक " जब धारा ३७२ के परन्तुक या धारा ३७८ के अधीन अपील उपस्थित की जाती है तब उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय " स्थापित किए जाएं.
धारा ४५१ का संशोधन.
१३. मूल अधिनियम की धारा ४५१ उसकी उपधारा ( १ ) के रूप में क्रमांकित की जाए और इस प्रकार क्रमांकित की गई उपधारा ( १ ) के पश्चात्, निम्नलिखित नई उपधाराएं जोड़ी जाएं, अर्थात् :-
" (२ ) उपधारा ( १ ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी न्यायालय किसी ऐसी दुर्घटना जिसका परिणाम मृत्यु या शारीरिक रूप से उपहति या संपत्ति की क्षति हो, में अंतर्वलित मोटर यान को तब तक मुक्त नहीं करेगा जब तक कि ऐसा यान पंजीकृत स्वामी के नाम पर ली गई तृतीय पक्ष जोखिम के विरूद्ध बीमा पालिसी से आवृत्त नहीं हो या जब कि अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी द्वारा मांगे जाने के बावजूद पंजीकृत स्वामी ऐसी बीमा पालिसी को प्रस्तुत करने में असफल रहता है जब तक कि पंजीकृत स्वामी न्यायालय के संतोषप्रद रूप से प्रतिकर या भुगतान करने के लिए ऐसी पर्याप्त प्रतिभूति प्रस्तुत न कर दे जो कि ऐसी दुर्घटना से उद्भूत दावा प्रकरण में अवार्ड की जा सके.
(३ ) जहां मोटर यान , तृतीय पक्ष जोखिम के विरूद्ध बीमा पालिसी से आवृत्त नहीं है, या जब मोटर यान का पंजीकृत स्वामी उपधारा ( २ ) में उल्लिखित परिस्थितियों में ऐसी पालिसी की प्रति प्रस्तुत करने में असफल रहता है, तो मोटर यान , अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी द्वारा यान कब्जे में लिए जाने की तारीख से तीन माह के समाप्त होने पर विहित रीति में, लोक नीलाम में विक्रय कर दिया जाएगा और उसके आगम , ऐसी दुर्घटना से उद्भूत होने वाले दावा प्रकरण में उस प्रतिकर के भुगतान के लिये जो दिया जा सकता है या दिया जा सकेगा , प्रश्नगत क्षेत्र में अधिकारिता रखने वाले दावा अभिकरण में पंद्रह दिन के भीतर जमा किए जाएंगे." .
१४. मूल अधिनियम की धारा ४५७ में, उपधारा ( २ ) के पश्चात्, निम्नलिखित नई उपधाराएं जोड़ी जाएं, धारा ४५७ का संशोधन.
अर्थात्:-
" (३ ) उपधारा ( १ ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी न्यायालय किसी ऐसी दुर्घटना जिसका परिणाम मृत्यु या शारीरिक रूप से उपहति या संपत्ति की क्षति हो, में अंतर्वलित मोटर यान को तब तक मुक्त नहीं करेगा जब तक कि ऐसा यान पंजीकृत स्वामी के नाम पर ली गई तृतीय पक्ष जोखिम के विरूद्ध बीमा पालिसी से आवृत्त नहीं हो या जब कि अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी द्वारा मांगे जाने के बावजूद पंजीकृत स्वामी ऐसी बीमा पालिसी को प्रस्तुत करने में असफल रहता है जब तक कि पंजीकृत स्वामी न्यायालय के संतोषप्रद रूप में प्रतिकर का भुगतान करने के लिए ऐसी पर्याप्त प्रतिभूति प्रस्तुत न कर दे जो कि ऐसी दुर्घटना से उद्भूत दावा प्रकरण में अवार्ड की जा सके.
(४) उपधारा ( २ ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां मोटर यान, तृतीय पक्ष जोखिम के विरूद्ध बीमा पालिसी से आवृत्त नहीं है, या जब मोटर यान का पंजीकृत स्वामी उपधारा ( ३ ) में उल्लिखित परिस्थितियों में ऐसी पालिसी की प्रति प्रस्तुत करने में असफल रहता है, तो मोटर यान, अन्वेषणकर्ता पुलिस अधिकारी द्वारा यान कब्जे में लिए जाने की तारीख से तीन माह के समाप्त होने पर विहित रीति में, लोक नीलामी में विक्रय कर दिया जाएगा और उसके आगम, ऐसी दुर्घटना से उद्भूत होने वाले दावा प्रकरण में उस प्रतिकर के भुगतान के लिये जो दिया जा सकता है या दिया जा सकेगा, प्रश्नगत क्षेत्र में अधिकारिता रखने वाले दावा अधिकरण में पंन्द्रह दिन के भीतर जमा किए जाएंगे. " .
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संशोधन. प्रथम अनुसूची का १५. मूल अधिनियम की प्रथम अनुसूची में, शीर्षक " १. भारतीय दंड संहिता के अधीन अपराध, " के अधीन, कॉलम ६ में, धारा ३१७, ३१८ , ३ ९ २, ३ ९३ , ३ ९४ तथा ४३५ के समक्ष, शब्द " सत्र न्यायालय " के स्थान पर, शब्द " प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट " स्थापित किए जाएं" .
स्पष्टीकरण.- इस संशोधन के प्रयोजन हेतु, यह स्पष्ट किया जाता है कि यह संशोधन सेशन न्यायालय के समक्ष लंबित मामलों के विचारण को प्रभावित नहीं करेगा.
अध्याय-तीन
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, १८७२ का संशोधन.
१६. मध्यप्रदेश राज्य को लागू हुए रूप में भारतीय साक्ष्य अधिनियम , १८७२ ( १८७२ का १ ) ( जो इसमें इसके पश्चात् मूल अधिनियम को नाम से निर्दिष्ट है ) को इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति में संशोधित किया जाएगा.
मध्यप्रदेश राज्य को लागू हुए रूप में केन्द्रीय अधिनियम , १८७२ का १ का संशोधन
धारा ६५ - ख का संशोधन.
१७. मूल अधिनियम की धारा ६५ ख में, उपधारा ( ४ ) में, पूर्ण विराम के स्थान पर, कोलन स्थापित किया जाए और तत्पश्चात् निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाए, अर्थात्: -
" परंतु यदि न्यायालय श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधन , कम्प्यूटर या किसी अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरण के माध्यम से साक्ष्य अभिलिखित करता है, तो इस उपधारा के उपबंध लागू नहीं होंगे . ".
उद्देश्यों और कारणों का कथन
दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९ ७३ ( १ ९ ७४ का २ ) की धारा १२६ की उपधारा ( १ ) , दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९७३ की धारा १२५ के अधीन कार्यवाही संस्थित करने के स्थान का उपबंध करती है , किन्तु इसमें यह उपबंधित नहीं है कि धारा १२५ की उपधारा ( १ ) के खण्ड ( ग ) , (घ) और ( ङ) के अधीन आने वाले व्यक्ति को किस स्थान पर कार्यवाहियां संस्थित करना होंगी. अतएव, संहिता की धारा १२६ में यथोचित संशोधन प्रस्तावित है.
२. दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९७३ के कतिपय उपबंधों में अभियुक्त ( विचाराधीन ) अथवा उसके अधिवक्ता की भौतिक उपस्थिति साक्ष्य अभिलिखित करने अथवा अन्य कार्यवाहियों के लिये आज्ञापक है. यह देखा गया है कि पुलिस बल की कमी के कारण , कई बार अभियुक्त (विचाराधीन ) नियत सुनवाई पर न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किए जाते हैं . परिणामस्वरुप प्रकरण स्थगित हो जाता है. सूचना प्रौद्योगिकी की उन्नति के कारण यह वांछनीय है कि साक्षियों के अभिसाक्ष्य तथा अभियुक्त का परीक्षण तथा अन्य कार्यवाहियां वैकल्पिक रूप से न्यायालय में उनकी भौतिक उपस्थिति आज्ञापक उपबंध के बजाए, श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से की जाए. यह सुविधा पुलिस बल की कमी की समस्या का सामना करने में तथा प्रकरणों के त्वरित विचारण के लिये भी प्रभावी होगा. अतएव, उक्त संहिता की धारा २७३ , २७८, २८१ , २९ १ , ३०५, ३१७ तथा ३५३ में यथोचित संशोधन प्रस्तावित हैं .
३. श्रव्य - दृश्य इलेक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से साक्ष्य अभिलिखित करना विफल हो जाएगा यदि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, १८७२ (१८७२ का १ ) की धारा ६५ ख को संशोधित नहीं किया जाता. परिणामतः भारतीय साक्ष्य अधिनियम, १८७२ ( १८७२ का १ ) की धारा ६५-ख में संशोधन किया जाना प्रस्तावित है , जिससे कि यदि विचारण न्यायालय श्रव्य दृश्य इलेक्ट्रानिक साधन, कम्प्यूटर अथवा किसी अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरण के माध्यम से साक्ष्य अभिलिखित करता है तो ऐसे इलेक्ट्रानिक अभिलेख की पहचान के संबंध में उक्त धारा की उपधारा (४ ) के उपबंध लागू नहीं होंगे.
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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 9 जुलाई 2019
४. मध्यप्रदेश संशोधन अधिनियम क्रमांक १७ सन् १ ९९९ के द्वारा भारतीय दण्ड संहिता ( १८६० का ४५ ) की धारा १४७, २ ९ ४ तथा ५०६ भाग दो के अधीन के अपराध शमनीय बनाए गये थे . किन्तु दण्ड प्रक्रिया संहिता ( संशोधन ) अधिनियम, २००८ ( २०० ९ का ५ ) द्वारा केन्द्र सरकार ने दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९ ७३ की धारा ३२० की उपधारा ( २ ) की सारणी को प्रतिस्थापित किया है जिसमें भारतीय दण्ड संहिता , १८६० की उक्त धाराओं को शमनीय नहीं बनाया गया है , परिणामस्वरुप संविधान के अनुच्छेद २५४ के खण्ड ( २ ) के उपबंध के अधीन मध्यप्रदेश अधिनियम क्रमांक १७ सन् १ ९९९ द्वारा किए गए संशोधन का कोई प्रभाव नहीं है. इसका परिणाम यह है कि प्रशमन के पश्चात् उक्त अपराधों के न्यायनिर्णयन के लिये मुख्य अपराधों के प्रकरण अनावश्यक रूप से लम्बे समय से न्यायालय में लंबित हैं. अतएव, उपरोक्त प्रकरणों को शमनीय बनाने के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९७३ की धारा ३२० को पुनः संशोधित किया जाना वांछनीय है.
५. धारा ४९ ८क के अधीन अपराध को इस कारण से शमनीय बनाया जाना भी प्रस्तावित है क्योंकि ऐसे अपराधों में परिवाद वैवाहिक विवादों का परिणाम होता है और क्षणिक आवेश में प्रथम रिपोर्ट दाखिल कर दी जाती है . कई अवसरों पर ऐसे अपराध का संज्ञान लेने के पश्चात्, पत्नी ऐसे अपराध में समझौता करना चाहती है , किन्तु उपबंध के अभाव में, उन्हें उच्च न्यायालय तक जाना होता है , जो वैवाहिक विवाद का निराकरण करने में बाधा उत्पन्न करता है . अतः कुछ निर्बन्धनों के अध्यधीन रहते हुए दण्ड प्रक्रिया संहिता , १ ९ ७३ की धारा ३२० की उपधारा ( २ ) में संशोधन प्रस्तावित है .
६. वर्ष २००५ के पूर्व दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील केवल उच्च न्यायालय में होती थी. अतएव दण्ड प्रक्रिया संहिता , १ ९७३ की धारा ३९ ० के अधीन, अभियुक्त को पेश करने के लिये वारंट जारी करने की शक्ति उच्च न्यायालय को दी है . वर्ष २००५ में , दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९७३ में संशोधन किया गया और तद्नुसार कुछ प्रकरणों में दोषमुक्ति के विरूद्ध अपील सत्र न्यायालय में भी होने लगी . वर्ष २००९ में 'दोबारा दण्ड प्रक्रिया संहिता , १ ९७३ को संशोधित किया गया और पीड़ित को भी कतिपय आकस्मिकता के अधीन दण्ड प्रक्रिया संहिता , १ ९ ७३ की धारा ३७२ के परन्तुक के अधीन अपील करने का अधिकार प्राप्त हुआ. किन्तु धारा ३ ९ ० को तद्नुसार संशोधित नहीं किया गया है. अब भी सत्र न्यायालय को अभियुक्त की उपस्थिति निश्चित करने के लिये वारंट जारी करने हेतु सशक्त नहीं किया गया है. अतएव दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा ३ ९ ० में समुचित संशोधन प्रस्तावित है.
७. सर्वोच्च न्यायालय ने सिविल अपील क्रमांक ९९ ३६ - ९९ ३७ सन् २०१६ ऊषा देवी और अन्य विरूद्ध पवन कुमार एवं अन्य में, आदेश दिनांक १३ सितम्बर, २०१८ में सरकार को दुर्घटना में अंतर्ग्रस्त मोटर यान, और जिसका तृतीय पक्षकार का बीमा नहीं है , की अभिरक्षा तथा जब्ती के संबंध में समुचित निर्देश दिये हैं . अतएव, दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९ ७३ की धारा ४५१ एवं ४५७ में यथोचित संशोधन करने का विनिश्चय किया गया है.
८. दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९ ७३ की प्रथम अनुसूची में , मध्यप्रदेश संशोधन अधिनियम क्रमांक २ सन् २००८ द्वारा , भारतीय दण्ड संहिता , १८६० की धारा ३१७ , ३१८, ३९ २, ३ ९३ , ३ ९ ४ तथा ४३५ के अधीन अपराधों को सेशन न्यायालय द्वारा सुनवाई योग्य बनाया गया है . अब सेशन न्यायालय पर मामलों का अत्यधिक भार है और अब न्यायिक मजिस्ट्रेट संवर्ग को व्यापक संख्या से समुत्थापित किया गया है तथा मजिस्ट्रेट के न्यायालयों में सेशन न्यायालयों से कम संख्या में मामले हैं. अतएव, उपरोक्त अपराधों को प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारण योग्य बनाने के लिये प्रथम अनुसूची में यथोचित संशोधन किया जाना प्रस्तावित है.
९. अतः यह विधेयक प्रस्तुत है .
पी. सी. शर्मा भारसाधक सदस्य .
भोपाल :
तारीख ४ जुलाई , २०१ ९ .
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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 9 जुलाई 2019
प्रत्यायोजित विधि निर्माण के संबंध में ज्ञापन
प्रस्तावित दण्ड विधि ( मध्यप्रदेश संशोधन ) विधेयक , २०१ ९ के जिन खण्डों द्वारा विधायनी शक्तियों का प्रत्यायोजन किया जा रहा है, उनका विवरण निम्नानुसार है :-
१. खण्ड- १३- दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९ ७३ की धारा ४५१ में अंतःस्थापित की जा रही उपधारा ( ३ ) में मोटरयान के विहित रीति में लोक नीलाम कर विक्रय करने के संबंध में, तथा
२. खण्ड-१४ दण्ड प्रक्रिया संहिता, १ ९ ७३ की धारा ४५७ में अंतःस्थापित की जा रही उपधारा ( ४) में मोटरयान के विहित रीति में लोक नीलाम कर विक्रय करने के संबंध में,
नियम बनाये जाएंगे , जो सामान्य स्वरुप के होंगे .
ए. पी. सिंह प्रमुख सचिव, मध्यप्रदेश विधान सभा.
नियंत्रक, शासकीय मुद्रण तथा लेखन सामग्री , मध्यप्रदेश द्वारा शासकीय केन्द्रीय मुद्रणालय , भोपाल से मुद्रित तथा प्रकाशित-2019.