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ध्य प्रदेश शासन
सत्यमेव जयते
मध्यप्रदेश राजपत्र
( असाधारण )
प्राधिकार से प्रकाशित
क्रमांक 506]
भोपाल, शुक्रवार , दिनांक 20 दिसम्बर 2019- अग्रहायण 29 शक 1941
विधान सभा सचिवालय, मध्यप्रदेश
भोपाल, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
क्र. 20876- मप्रविस- 15 - विधान-2019 .- मध्यप्रदेश विधान सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन सम्बन्धी नियम -64 के उपबंधों के पालन में , मध्यप्रदेश विनिर्दिष्ट मंदिर विधेयक, 2019 ( क्रमांक 42 सन् 2019 ) जो विधान सभा में दिनांक 20 दिसम्बर, 2019 को पुरःस्थापित हुआ है. जनसाधारण की सूचना के लिए प्रकाशित किया जाता है.
ए. पी. सिंह प्रमुख सचिव, मध्यप्रदेश विधान सभा.
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मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
मध्यप्रदेश विधेयक क्रमांक ४२ सन् २०१ ९
मध्यप्रदेश विनिर्दिष्ट मंदिर विधेयक , २०१ ९
विषय-सूची
खण्ड:
अध्याय-एक
प्रारंभिक
१. संक्षिप्त नाम तथा प्रारंभ.
२. इस विधेयक का कतिपय अधिनियमों पर अध्यारोही प्रभाव होगा.
३. परिभाषाएं.
अध्याय-दो
संपत्ति का निहित होना तथा समिति का गठन
४. संपत्ति का निहित होना.
५. प्रशासन समिति में निहित होगा.
६. समिति का गठन.
७. सदस्यों की पदावधि, उनका त्यागपत्र तथा उनका हटाया जाना.
८. रिक्तियों का भरा जाना.
९. समिति के सम्मिलन.
१०. रिक्तिआदि के कारण कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना .
११ . समिति के कर्तव्य.
१२. संपत्तियों का अन्य संक्रामण.
१३. उधार लेने की शक्ति की सीमा.
१४. रिपोर्ट.
१५. 'शक्तियों का प्रत्यायोजन.
अध्याय-तीन
प्रशासक तथा स्थापना
१६. प्रशासक की नियुक्ति.
१७. पदों का सृजन तथा अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति.
१८. पुजारियों आदि का नियंत्रण तथा उनकी नियुक्ति.
१९. कलक्टर या प्रशासक के आदेश के विरुद्ध अपील.
२०. अध्यक्ष की आपात शक्तियां.
अध्याय-चार
कोष, बजट , लेखे तथा संपरीक्षा
२१. मंदिर कोष.
२२. बजट.
२३ . लेखे.
२४. संपरीक्षा.
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अध्याय-पांच
नियंत्रण
२५. जानकारी तथा लेखे मंगाने तथा निदेश देने की राज्य सरकार या आयुक्त की शक्ति.
निरीक्षण.
२६.
अध्याय-छह
मंदिर की भूमि, उसके भवनों या अन्य संपत्ति पर अप्राधिकृत रूप से कब्जा करना २७. मंदिर की भूमि या उसके भवनों पर व्यक्तियों द्वारा अप्राधिकृत कब्जा.
२८. धारा २७ के अधीन तहसीलदार के आदेशों के विरुद्ध अपील.
अध्याय-सात
प्रकीर्ण
२९. मध्यप्रदेश स्थान नियंत्रण अधिनियम , १ ९६१ के उपबंधों का लागू न होना.
३०. मंदिर को देय शोध्य धन, भू- राजस्व के बकाया की तरह वसूली योग्य होगा.
३१ . सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण.
३२. अधिसूचनाएं, आदेश आदि न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किये जायेंगे.
३३ . भूमि का अर्जन.
३४. मंदिर के संरक्षण , और पुनर्विकास हेतु राज्य सरकार की शक्ति.
३५. अनुज्ञप्तियां मंजूर करने की शक्ति.
३६. अनुज्ञप्तियां रद्द करने या उन्हें निलंबित करने की शक्ति.
३७. अपील.
३८ . विनिर्दिष्ट मंदिर और उसकी सम्पत्तियां समिति की अभिरक्षा में होंगी.
अध्याय- आठ
अपराध
३९. अपराध .
४०. अपराधों का संज्ञान .
४१ . अपराधों का प्रशमन.
४२ . जुर्माने की रकम मंदिर कोष में जमा की जाएगी.
अध्याय-नौ
नियम
४३. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति.
४४. समिति की उपविधियां बनाने की शक्ति.
४५ . कठिनाइयों का दूर किया जाना.
४६. मंदिरों को अधिनियम में जोड़ने या हटाने की शक्ति.
४७. निरसन एवं व्यावृत्ति.
४८. अभिमुक्ति.
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मध्यप्रदेश विधेयक
क्रमांक ४२ सन् २०१ ९
मध्यप्रदेश विनिर्दिष्ट मंदिर विधेयक, २०१ ९
मध्यप्रदेश के प्रमुख मंदिरों एवं उनके विन्यासों के अधिक अच्छे अनुरक्षण, परिरक्षण, प्रबंध तथा प्रशासन के लिये और उनसे आनुषंगिक या उनसे संसक्त विषयों के लिये उपबंध करने हेतु विधेयक.
भारत गणराज्य के सत्तरवें वर्ष में मध्यप्रदेश विधान- मंडल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय-एक
प्रारंभिक
( १ ) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मध्यप्रदेश विनिर्दिष्ट मंदिर अधिनियम , २०१ ९ है.
१.
संक्षिप्त नाम तथा प्रारंभ.
(२ ) इसका विस्तार सम्पूर्ण मध्यप्रदेश राज्य पर होगा.
( ३ ) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे.
इस अधिनियम का कतिपय अधिनियमों परअध्यारोही प्रभाव होगा.
२. ( १ ) यह अधिनियम, धार्मिक विन्यास अधिनियम, १८६३ ( १८६३ का २० ) , पूर्त विन्यास अधिनियम, १८९ ० ( १८ ९ ० का संख्यांक ६ ) , पूर्त और धार्मिक न्यास , अधिनियम, १९ २० (१९ २० का १४ ) या मध्यप्रेश पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, १ ९ ५१ ( क्रमांक ३० सन् १ ९५१ ) में या किसी प्रबंध स्कीम में या किसी डिक्री , लिखत, रूढि या प्रथा में अंतर्विष्ट किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, प्रभावी होगा.
(२ ) विनिर्दिष्ट मंदिर के कार्यकलापों तथा इसके विन्यासों के प्रबन्ध से संबंधित समस्त विधियां, विनियम तथा अन्य अधिनियमितियां या आदेश और इस अधिनियम के प्रारंभ होने के पूर्व उक्त प्रयोजन के लिए निष्पादित किए गए समस्तविलेख तथा उक्त प्रयोजन के लिए किसी पुजारी या किसी अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के साथ किए गए समस्त ठहराव, जहां तक कि ऐसी अधिनियमितियां , विलेख या ठहराव इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत हों, प्रभावहीन हो जाएंगे .
परिभाषाएं.
३. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) " प्रशासक " से अभिप्रेत है, धारा १६ की उपधारा ( १ ) के अधीन नियुक्त किया गया विनिर्दिष्ट मंदिर का प्रशासक;
(ख) " नियत तारीख " से अभिप्रेत है, धारा १ की उपधारा ( ३ ) के अधीन नियत की गई तारीख;
(ग) "अध्यक्ष" से अभिप्रेत है , समिति का अध्यक्ष;
(घ) " कलक्टर " से अभिप्रेत है, उस जिले का कलक्टर जहाँ विनिर्दिष्ट मंदिर स्थित है;
(ङ) " आयुक्त" से अभिप्रेत है, उस संभाग का आयुक्त जहाँ विनिर्दिष्ट मंदिर स्थित है;
(च) " समिति" से अभिप्रेत है , इस अधिनियम के अधीन गठित की गई विनिर्दिष्ट मंदिर समिति;
(छ) "न्यायालय " से अभिप्रेत है, उस जिले के जिला न्यायाधीश का न्यायालय जहाँ विनिर्दिष्ट मंदिर स्थित है;
मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
1012(3) (ज) " विन्यास " से अभिप्रेत है , ऐसी समस्त जंगम या स्थावर संपत्ति जो विनिर्दिष्ट मंदिर की है या जो विनिर्दिष्ट मंदिर के अनुरक्षण या सुधार के लिए या उसमें परिवर्तन के लिए या उसमें पूजा के लिए या उसकी संभाल के लिये या उससे संबंधित कोई सेवा या खैरात की जाने के लिए अथवा मंदिर में आने वाले तीर्थ यात्रियों की प्रसुविधा, सुविधा या आराम के लिए, किसी भी नाम से दी गई है या विन्यस्त की गई है और उसके अंतर्गत आते हैं:-
( एक) मंदिर में रखी गई मूर्तियां;
(दो) मंदिर के परिसर;
(तीन) जंगम या स्थावर संपत्ति, चाहे वह कहीं भी स्थित हो, के समस्त दान और किसी भी स्त्रोत से व्युत्पन्न समस्त आय जो किसी भी नाम से अंकित हो और जो मंदिर को अथवा समिति के अधीन के किन्हीं स्थानों को धार्मिक, पवित्र या पूर्त प्रयोजनों के लिए समर्पित हो , अथवा कोई भी ऐसी जंगम या स्थावर संपत्ति जिसका क्रय विनिर्दिष्ट मंदिर कोष में से किया गया हो तथा समस्त चढ़ावे जिनके अन्तर्गत ऐसी चढ़ोत्री आती है जो मंदिर के लिए की गई हो और मंदिर के लिए तथा मंदिर की ओर से प्राप्त की गई हो;
(झ) " आय " से अभिप्रेत है मंदिर की संपत्तियों एवं अन्य स्त्रोतों जैसे दान, चढ़ावा से प्राप्त आय ;
" अनुज्ञप्तिधारी " से अभिप्रेत है, कोई ऐसा व्यक्ति जिसे इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञप्ति दी गई है ; (ञ)
(ट) " मंदिर या विनिर्दिष्ट मंदिर " से अभिप्रेत है, प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट मंदिर तथा उसकी प्रसीमाओं में आने वाले भवन तथा अन्य स्थल , मंदिर के रजिस्टर में उल्लिखित समस्त भूमियां साथ ही उनमें स्थित मंदिर, भवन तथा अन्य संरचनाएं तथा अन्य संबद्ध और गौण मंदिर तथा प्राधिकृत रूप से किए गए कोई ऐसे परिवर्धन जो इस अधिनियम के प्रारंभ होने के पश्चात् उनमें किए जाएं;
(ठ) " पंडा" से अभिप्रेत है , ऐसा कोई व्यक्ति जो पूजा में अथवा इससे संबद्ध अन्य किसी विषय में तीर्थ यात्रियों को दिशा- निर्देश और सहायता करने के लिए प्राधिकृत किया गया है;
(ड) " पुजारी " से अभिप्रेत है, ऐसा कोई व्यक्ति जो समिति द्वारा पूजा अर्चना अथवा इससे संबद्ध अन्य धार्मिक कार्य में सहायता करने के लिए प्राधिकृत किया गया है;
(ढ) " प्रतिनिधि" से अभिप्रेत है, ऐसे अवैतनिक परंपरागत व्यक्ति जो प्रमुख पुजारी, पुजारी अथवा पुरोहित के साथ या ऐवज में प्रातिनिधिक पूजन कार्य संपादन करता है;
(ण) " सेवक" से' अभिप्रेत है, ऐसा कोई व्यक्ति जो पुजारी को उसके कृत्यों के सम्यक संपादन में सहायता देने के लिए और विनिर्दिष्ट मंदिर के गृह कक्ष को साफ और अच्छी तरह संरक्षित करने के लिए प्राधिकृत किया गया है ;
(त) " राज्य शासन " से अभिप्रेत है , मध्यप्रदेश शासन का अध्यात्म विभाग.
अध्याय-दो
संपत्ति का निहित होना तथा समिति का गठन
संपत्ति का निहित होना.
४. किसी न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश में या किसी रूढ़ि या प्रथा या संविदा , सनद, लिखत, विलेख या संपत्ति वचनबंध में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, -
(एक) विनिर्दिष्ट मंदिर तथा उन समस्त विन्यासों का स्वामित्व जो मंदिर के लाभ के लिए किसी भी व्यक्ति के नाम से या तीर्थयात्रियों की सुविधा, आराम या प्रसुविधा के लिए किए गए हैं अथवा इसके पश्चात् किए जाएं, और मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 20 दिसम्बर 2019
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(दो) समस्त चढ़ावे , जिसमें " चढ़ौत्री " भी सम्मिलित हैं,
विनिर्दिष्ट मंदिर के देवता में निहित होंगे .
प्रशासन समिति में निहित होगा.
५. ( १ ) किसी न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश में या किसी रूढ़ि या प्रथा या संविदा, सनद, लिखत, विलेख या वचनबंध में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, मंदिर और उसके विन्यासों का कब्जा, प्रशासन, नियंत्रण तथा प्रबंध विनिर्दिष्ट मंदिर समिति में निहित होगा.
( २ ) समिति एक निगमित निकाय होगी , जिसका शाश्वत उत्तराधिकार होगा और जिसकी एक सामान्य मुद्रा होगी और उसे संपत्ति अर्जित करने, धारण करने तथा उसका व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी तथा वह उक्त नाम से वाद चला सकेगी तथा उक्त नाम से उसके विरुद्ध वाद चलाया जा सकेगा.
समिति का गठन.
६. ( १ ) समिति निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी,-
(क) विनिर्दिष्ट मंदिर के जिले का कलक्टर या उस दशा में और उस समय जब तक कि कलक्टर उपधारा ( ३ ) के अधीन सदस्यता के लिए पात्र न हो , कोई अपर कलक्टर जो कलक्टर द्वारा नामनिर्दिष्ट किया गया हो;
(ख) विनिर्दिष्ट मंदिर के जिले का पुलिस अधीक्षक;
(ग) विनिर्दिष्ट मंदिर के क्षेत्र के स्थानीय नगरीय निकाय का आयुक्त अथवा मुख्य नगरपालिक अधिकारी;
(घ) जिले में कार्यरत चार अधिकारी जो द्वितीय श्रेणी से निम्न न हो, कलक्टर द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ;
(ङ) मंदिर का एक पुजारी/सेवक जो कलक्टर द्वारा जारी आदेश के माध्यम से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाने वाले दो पुजारी;
(च)
(छ) राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट मंदिर के लिए नामनिर्दिष्ट दो ऐसे अशासकीय व्यक्ति जो मंदिर में की जाने वाली पूजा के स्वरूप से संबंधित धार्मिक कृत्यों व रूढ़ि के विशेष जानकार हों;
(ज) राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट विशेष आमंत्रिती.
(२) कलक्टर अथवा उपधारा ( १ ) के खण्ड ( क ) के अधीन नामनिर्दिष्ट किया गया व्यक्ति समिति का अध्यक्ष होगा और प्रशासक समिति का सचिव होगा.
( ३ ) कोई भी ऐसा व्यक्ति जो हिन्दू धर्म को न मानता हो तथा मंदिर में की गई जाने वाली पूजा के स्वरूप को स्वीकार न करता हो, समिति की सदस्यता के लिए पात्र नहीं होगा.
(४) सदस्यों का नामनिर्देशन राज्य सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा.
की सदस्यों पदावधि, उनका त्यागपत्र तथा उनका हटाया जाना.
७. ( १ ) धारा ६ की उपधारा ( १ ) के खण्ड ( घ ) और खण्ड ( ङ) के अधीन नामनिर्दिष्ट किया गया कोई सदस्य ऐसी कालावधि के लिए जैसी कलक्टर उचित समझे, पद धारण करेगा , धारा ६ की उपधारा ( १ ) के खण्ड ( च ) , ( छ) और (ज ) के अधीन राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट कोई सदस्य अपने नामनिर्देशन के दिनांक से तीन वर्ष के लिए पदधारण करेगा तथा वह पुनः नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा.
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(२ ) उपधारा ( १ ) में निर्दिष्ट किया गया कोई सदस्य उसे नामनिर्दिष्ट करने वाले प्राधिकारी को अपने पद का त्याग करने की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और उस प्राधिकारी द्वारा उसका त्यागपत्र स्वीकार कर लिए जाने पर वह सदस्य नहीं रह जाएगा.
(३ ) राज्य सरकार, आदेश द्वारा, उपधारा ( १ ) में निर्दिष्ट किए गए किसी सदस्य को हटा सकेगी यदि, -
(क) वह विकृत चित्त का है तथा किसी सक्षम न्यायालय द्वारा इस रूप में घोषित किया गया है ; या
(ख) उसने दिवालिया न्यायनिर्णीत किए जाने हेतु आवेदन किया है अथवा वह अनुमोचित दिवालिया है; या
(ग) वह किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जा चुका है, जिसमें नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या
(घ) वह मंदिर के प्रशासन के संबंध में भ्रष्टाचार या अवचार का दोषी रहा है; या
(ङ) वह समिति के तीन से अधिक क्रमवर्ती सम्मिलनों में अनुपस्थित रहा है और ऐसी अनुपस्थिति के लिए समिति के समाधानप्रद रूप में स्पष्टीकरण करने में असमर्थ है ; या
(च) समिति के सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट किए जाने के पश्चात् उसने विधि व्यवसायी होते हुए किन्हीं विधिक कार्यवाहियों में किसी व्यक्ति की ओर से समिति के विरुद्ध कार्य किया है या वह किन्हीं विधिक कार्यवाहियों में किसी व्यक्ति की ओर से समिति के विरुद्ध उपसंजात हुआ है ; या
(छ) उसने हिन्दू धर्म को मानना बंद कर दिया है या मंदिर की पूजा में उसका विश्वास नहीं रह गया है; या
(ज) उसने अस्पृश्यता प्रथा को प्रोत्साहन देने या उसे अग्रसर करने में कोई कार्य किया है या ऐसे किसी कार्य के किए जाने का दुष्प्रेरण किया है ; या
(झ) यदि उसके क्रियाकलाप मंदिर के हित में नहीं हैं.
(४) उपधारा ( ३ ) के अधीन किसी सदस्य को तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे उसके हटाए जाने के विरुद्ध सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो.
८. समिति में हुई कोई भी रिक्ति उसी रीति में भरी जाएगी जैसी कि धारा ६ की उपधारा ( १ ) में उपबंधित है. रिक्तियों का भरा जाना.
समिति सम्मिलन. का ९. (१ ) समिति, अपने कामकाज के संपादन के लिए आवश्यकतानुसार कितनी ही बार किन्तु तीन कैलेण्डर मास की कालावधि में कम से कम एक बार सम्मिलन करेगी.
(२ ) समिति के सम्मिलन के लिए गणपूर्ति आठ सदस्यों से होगी.
(३ ) यदि निर्धारित समय में गणपूर्ति नहीं होती है तो समिति का अध्यक्ष आधे घंटे के लिए गणपूर्ति की प्रतीक्षा में बैठक स्थगित कर सकेगा और उसके बाद उसे इस तरह से जारी रख सकेगा कि गणपूर्ति हो गई है. लेकिन ऐसी स्थागित बैठक में पूर्व से वितरित एजेंडे के अतिरिक्त कोई नया विमर्श बिन्दु विचारित नहीं किया जाएगा और वित्तीय मामलों में भी कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा.
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(४) समिति के सम्मिलन में उद्भूत होने वाले प्रश्न का विनिश्चय उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा और प्रत्येक ऐसे मामले में जिसमें कि मत बराबर- बराबर हों, अध्यक्ष या अध्यक्षता करने वाले व्यक्तिका निर्णायक मत होगा.
(५ ) समिति का सचिव , कार्यवाहियों के कार्यवृत्त के, जो यथास्थिति, अध्यक्ष या अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति द्वारा सम्यक् रूप से प्रतिहस्ताक्षरित किया जाएगा , उचित अभिलेखन तथा उसे बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगा और उक्त कार्यवृत्त की एक प्रति आयुक्त को सूचनार्थ भेजेगा.
( ६ ) राज्य सरकार या आयुक्त, समिति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह समिति के कारबार तथा मंदिर के प्रबंध और उसके कार्यकलाप से संबंधित किसी मामले के बारे में रिपोर्ट प्रस्तुत करे.
(७ ) समिति अपने कारबार तथा मंदिर के प्रबंधन संबंधी कार्यकलाप के सभी मामलों का त्रैमासिक प्रतिवेदन आयुक्त के माध्यम से राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगी.
१०. समिति का कोई भी कार्य या कोई भी कार्यवाही केवल इस कारण से अविधिमान्य नहीं होगी कि,- रिक्ति आदि से कार्यवाहियों का अविधिमान्यन होना.
(क) उसमें कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या
(ख) या उसके अध्यक्ष या सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है;
(ग) उसकी प्रक्रिया में मामले के गुणागुण पर प्रभाव न डालने वाली कोई अनियमितता है.
समितिके कर्तव्य.
११. इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, समिति का यह कर्तव्य होगा कि वह, -
(एक) मंदिर की पूजा, " पूजा-अर्चना " और दैनिक तथा नियतकालिक कर्मकाण्डों के समुचित निष्पादन के लिए व्यवस्था करे;
(दो) भक्तों द्वारा पूजा की जा सके इस हेतु सुविधाएं उपलब्ध कराए;
(तीन) मंदिर में निहित निधियों, मूल्यवान वस्तुओं तथा आभूषणों की सुरक्षित अभिरक्षा और संपत्तियों का परिरक्षण तथा प्रबंध सुनिश्चित करे;
(चार) मंदिर में व्यवस्था तथा अनुशासन और समुचित स्वास्थ्यकर परिस्थितियां तथा मंदिर के चढ़ावों में सफाई एवं शुद्धता का समुचित स्तर बनाए रखना सुनिश्चित करे;
(पांच) यह सुनिश्चित करे कि मंदिर के विन्यासों की निधियां, दाताओं की इच्छाओं, जहां तक कि वे ज्ञात हो सकें , के अनुसार व्यय की जाती हैं;
(छह ) समस्त ऐसी बातें करे, जो मंदिर के कार्यकलापों के दक्षतापूर्ण प्रबंध तथा पूजा करने वाले व्यक्तियों की सुविधा से आनुषंगिक तथा उसमें सहायक हों; और
सात) किन्ही अन्य धार्मिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक या पूर्त क्रियाकलापों को अभिप्रेरित करे;
(
(आठ ) मंदिर और इसके परिसर की स्थापत्यगत या ऐतिहासिक अखण्डता की रक्षा करे.
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संपत्तियों का अन्य संक्रामण.
१२. (१ ) अविनश्वर प्रकृति की कोई भी चल संपत्ति जो कि समिति के आधिपत्य में है और जिसका मूल्य रु. एक लाख से अधिक है व बहुमूल्य आभूषणों को अत्यावश्यक होने पर विक्रय करने, गिरवी रखने अथवा अन्य संक्रमित करने हेतु आयुक्त की अनुमति लेना अनिवार्य होगा.
(२ ) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय , किसी भी ऐसी स्थावर संपत्ति को , जो समिति द्वारा रक्षित की गई है , आयुक्त के अनुमोदन के बिना पट्टे पर नहीं दिया जाएगा या बंधक नहीं रखा जाएगा, बेचा नहीं जाएगा या उसका अन्यथा अन्य संक्रामण नहीं किया जाएगा. आयुक्त, प्रस्तावित संव्यवहार से संबंधित विशिष्टियों को राजपत्र में प्रकाशित करने तथा उनके संबंध में आपत्तियां तथा सुझाव आमंत्रित करने के पश्चात् प्राप्त समस्त आपत्तियों तथा सुझावों पर विचार करने के पश्चात् ऐसी मंजूरी प्रदान कर सकेगा जहां कि उसका यह विचार हो कि संव्यवहार-
(एक) विवेकपूर्ण है तथा मंदिर के लिए आवश्यक और लाभप्रद है;
(दो) अचल संपत्ति के मामले में मंदिर के लिए अलाभकारी है;
(तीन) पर्याप्त एवं उचित प्रतिफल के लिए है.
(३ ) आयुक्त द्वारा मंजूर की गई किसी ऐसी अचल संपत्ति का प्रत्येक विक्रय सार्वजनिक निविदाएं आमंत्रित कर एक पारदर्शी तरीके से किया जाएगाः
परन्तु किसी ऐसी भूमि या भवन का, जो मंदिर की हो या उससे सम्बद्ध हो या जो मंदिर से या मंदिर से सम्बद्ध किसी टैंक, कुंआ, जल स्त्रोत या जलमार्ग से, चाहे वह मंदिर परिसर के भीतर स्थित हो अथवा उसके बाहर, सटी हुई हो, पट्टेदार, सकब्जा बंधकदार अथवा अनुज्ञप्तिधारी , भूमि, भवन या स्थान का ऐसा उपयोग नहीं करेगा जिससे कि मंदिर की सौंदर्यमूलक दिखावट या दर्शन या धार्मिक वातावरण विकृत हो.
(४) आयुक्त, आदेश द्वारा तथा उसमें अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से, किसी ऐसे व्यक्ति की, जो उपरोक्त उपबंध का उल्लंघन करता है, ऐसे व्यक्ति को प्रस्तावित रद्दकरण या समाप्ति के विरुद्ध सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् यथास्थिति, पट्टा, बंधक या अनुज्ञप्ति को समाप्त या रद्द कर देगा और ऐसे व्यक्ति से यह अपेक्षा करेगा कि वह भूमि, भवन या स्थान का कब्जा, आदेश में विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व समिति के किसी सदस्य को सौंप दे.
जहां कहीं ऐसा व्यक्ति विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व यथा उपरोक्त कब्जा सौंपने में असफल रहता है तो आयुक्त, प्रशासक को, अचल सम्पत्ति का कब्जा ले लेने का निदेश दे सकेगा.
(५) जब उपधारा ( २ ) के अनुसार बेची गई कोई मंदिर भूमि किसी क्रेता के द्वारा इस प्रकार से उपयोग में लाई जाती है कि जिससे आयुक्त के विनिश्चय अनुसार मंदिर की सौंदर्यमूलक दिखावट या दर्शन या धार्मिक वातावरण विकृत हो, तब ऐसी बिक्री शून्य समझी जाएगी.
उधार लेने की शक्ति कीसीमा.
१३. समिति को आयुक्त के पूर्व अनुमोदन के सिवाय धन उधार लेने की शक्ति नहीं होगी. और राज्य शासन को पूर्व सूचना दिया जाना अनिवार्य होगा.
रिपोर्ट.
१४. समिति, मंदिर के कार्यकलापों के प्रशासन के संबंध में एक वार्षिक प्रतिवेदन आयुक्त को प्रस्तुत करेगी जो उसे तदुपरांत अपनी टिप्पणी के साथ राज्य सरकार को प्रेषित करेगा.
शक्तियों का १५. समिति अपने कृत्यों में से कोई भी कृत्य अपने अध्यक्ष या सचिव को प्रत्यायोजित कर सकेगी.
प्रत्यायोजन.
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अध्याय-तीन
प्रशासक तथा स्थापना
की
प्रशासक नियुक्ति.
१६. ( १ ) राज्य सरकार किसी ऐसे सेवारत अधिकारी को जो उप जिलाधीश के पद से अन्यून श्रेणी का हो तथा जो हिन्दू धर्म को मानता हो, मंदिर का प्रशासक नियुक्त कर सकेगी और प्रशासक, समिति का सचिव होगा.
(२ ) समिति, मंदिर के प्रशासन , नियंत्रण तथा प्रबंध संबंधी अपनी शक्तियों का प्रयोग प्रशासक की मार्फत करेगी .
१७. ( १ ) समिति के अधधिकारियों तथा कर्मचारियों के पदों का निर्माण, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया तथा उनकी सेवा शर्तें वैसी होंगी जैसी इस हेतु नियमों में विहित की जाए.
पदों का सृजन तथा अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति.
(२ ) प्रशासक के अलावा मंदिर के सभी अधिकारियों तथा कर्मचारियों की नियुक्ति समिति द्वारा की जाएगी.
१८. ( १ ) वे समस्त पण्डा, " पुजारी ", " सेवक " , " प्रतिनिधि " तथा कर्मचारी जो मंदिर से संबद्ध हैं या जिन्हें मंदिर से कोई उपलब्धियां, परिलब्धियां प्राप्त होती हैं तथा समस्त अनुज्ञप्तिधारी , प्रशासक के नियंत्रण के अधीन होंगे.
पुजारियों आदि का नियंत्रण तथा उनकी नियुक्ति.
(२ ) इस अधिनियम के तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों और उपविधियों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए प्रशासक न्यास भंग, असमर्थता , विधिपूर्ण आदेश की अवज्ञा या उपेक्षा के लिये या कर्तव्य से जानबूझकर अनुपस्थित रहने के लिए या ऐसा विच्छंखल व्यवहार या आचरण करने के लिये जो कि मंदिर के अनुशासन या मंदिर की प्रतिष्ठा का अल्पीकरण करता हो या किसी अन्य पर्याप्त कारण से उसके सामने दर्शाए गए निम्नलिखित में से कोई भी दण्ड दे सकेंगे, अर्थात्: -
(एक) पद से हटाया जाना;
(दो) उपेक्षा, आदेश के भंग या विच्छृंखल व्यवहार या आचरण के कारण मंदिर को कारित धन संबंधी किन्हीं हानियों का पूर्णतः या अंशतः उपलब्धियों या परिलब्धियों में से वसूल किया जानाः
परंतु यथापूर्वोक्त कोई भी दण्ड तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया जाता.
( ३ ) उस दशा में, जबकि किसी पुजारी , सेवक या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपना कार्य त्याग दिए जाने के कारण या उसकी मृत्यु हो जाने , उसे हटा दिए जाने या किसी भी अन्य कारण से कोई रिक्ति हो जाती है तो समिति का अध्यक्ष , जब तक वह उस रिक्ति को भरना आवश्यक नहीं समझता है , तो ऐसे नियमों के, जो कि इस संबंध में बनाए जाएं, अध्यधीन रहते हुए, उस रिक्ति को भरने के लिये किसी पुजारी , सेवक या ऐसे अन्य व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगा.
प्रशासक के आदेश के विरूद्ध अपील.
१९ . ( १ ) कोई भी व्यक्ति, जो प्रशासक द्वारा पारित किए गए किसी आदेश से व्यथित हो, उस तारीख से जब धारा १८ के अधीन या आदेश उसे संसूचित किया गया हो, तीस दिन के भीतर समिति के समक्ष अपील प्रस्तुत कर सकेगा.
( २ ) समिति, संबंधित पक्षकारों को सुने जाने का उचित अवसर देने के पश्चात्, ऐसे आदेश पारित कर सकेगी जैसे कि वह ठीक समझे और इस प्रकार पारित किया गया आदेश अंतिम और निश्चयात्मक होगा और किसी विधि न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा.
(३ ) उपधारा ( १ ) में यथा निर्दिष्ट प्रशासक द्वारा अथवा उपधारा ( २ ) के अधीन समिति द्वारा किया गया कोई भी आदेश किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो, कि उस आदेश से व्यथित हो अपना अधिकार, यदि कोई हो, सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय में सिद्ध करने से विवर्जित नहीं करेगा, किन्तु किसी भी न्यायालय को यह शक्ति नहीं होगी कि वह उक्त आदेश के कार्यान्वयन को, ऐसे न्यायालय के समक्ष की कार्यवाहियों का या उससे या उसके संबंध में उद्भूत होने वाली किसी अपील या आदेश का अंतिम निपटारा होने तक रोक दे.
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अध्यक्ष की आपात शक्तियां.
२०. अध्यक्ष, आपात मामलों में कोई ऐसा कार्य किए जाने या कोई ऐसा कृत्य किए जाने का निदेश दे सकेगा जिसके लिए उस वर्ष के बजट में प्रावधान नहीं किया गया है और जिसका कि उसकी राय में तुरन्त निष्पादन किया जाना या मंदिर की संपत्तियों तथा उसके विन्यासों के परिरक्षण के लिए या मंदिर में आने वाले यात्रियों की सेवा या सुरक्षा के लिए या मंदिर में कर्मकाण्ड के सम्यक् संपादन के लिये उसका कियया जाना आवश्यक है, और वह यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा संकर्म निष्पादित किए जाने का या ऐसा कार्य किए जाने का व्यय मंदिर के कोष में से चुकाया जाए. कलक्टर, इस धारा के अधीन की गई कार्रवाई तथा उसके कारणों की रिपोर्ट समिति को तुरंत देगा . सभी मामलों में अध्यक्ष की वित्तीय शक्तियां वैसी होंगी जैसी कि विहित की जाएं.
अध्याय-चार
मंदिर कोष, बजट लेखें तथा संपरीक्षा
मंदिर कोष.
२१. ( १ ) एक निधि गठित की जाएगी जो मंदिर कोष कहलाएगी और वह मंदिर में निहित होगी तथा समिति द्वारा उसका प्रशासन किया जाएगा और वह निम्नलिखित से मिलकर बनेगी :-
(क) मंदिर की जंगम तथा स्थावर संपत्तियों से व्युत्पन्न आय;
(ख ) कोई चढ़ावा, दान, संदान या अभिदाय; और
प्राप्त किए गए अन्य समस्त धन.
(ग)
(२ ) कोष का उपयोग धारा ११ में प्रमाणित किए गए समिति के समस्त या किन्हीं भी कृत्यों और कर्तव्यों को क्रियान्वित करने में किया जा सकेगा;
परंतु कोष का उपयोग किसी ऐसे धार्मिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक या पूर्त क्रियाकलाप के, जो प्रत्यक्षतः मंदिर की पवित्रता और उसकी धार्मिक प्रथाओं की भावना से संबंधित न हो, संवर्धन के लिए नहीं किया जाएगा .
बजट .
२२. समिति, अपने पद भार ग्रहण करने के तीन मास के भीतर तथा उसके पश्चात् प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारंभ होने के कम से कम एक मास पूर्व, उत्तरवर्ती वर्ष के लिये बजट तैयार करेगी या तैयार करवाएगी तथा उस वर्ष के प्रारंभ होने के पूर्व उस पर सम्मिलन में विचार करेगी और उसे पारित करेगी.
(२ ) इस प्रकार पारित बजट की प्रतिलिपि अनुमोदन हेतु आयुक्त को भेजी जाएगी , जो इसे ऐसी दुरुस्तियों के साथ अनुमोदन कर सकेगा , जो वह आवश्यक समझे.
२३. समिति, प्रत्येत वित्तीय वर्ष के प्रथम छह मास के भीतर पूर्ववर्ती वर्ष के लिये मंदिर के प्रशासन के संबंध लेखे . में प्राप्तियों तथा व्यय के सही लेखे तैयार करेगी . पूर्व वर्ष के वार्षिक लेखों की एक प्रति आयुक्त के माध्यम से राज्य सरकार को अधिकतम ३१ जुलाई तक भेजेगी और उसे मंदिर की वेबसाइट पर प्रदर्शित किया जाएगा.
संपरीक्षा.
२४. आयुक्त, मंदिर तथा उसके विन्यासों के लेखाओं की संपरीक्षा करने के लिये प्रतिवर्ष एक संपरीक्षक की नियुक्ति करेगा और उसका पारिश्रमिक नियत करेगा जिसका कि संदाय , ऐसे संपरीक्षक को कोष में से किया जाएगा. संपरीक्षक, अपनी रिपोर्ट समिति को प्रस्तुत करेगा और उसकी एक प्रति आयुक्त को भेजेगा. आयुक्त, उस पर ऐसे निदेश दे सकेगा जैसे कि वह उचित समझे और समिति ऐसे निदेशों का पालन करेगी .
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अध्याय-पांच
नियंत्रण
तथा लेखे मंगाने तथा निदेश देने की राज्य सरकार या आयुक्त की शक्तियां.
२५. राज्य सरकार या आयुक्त को यह शक्ति होगी कि वह समस्त ऐसी जानकारी तथा लेखे मंगवाए जो कि उसकी में उसका युक्तियुक्त रूप से यह राय समाधान करने के लिये आवश्यक हों कि मंदिर का अनुरक्षण समुचित रुप से किया जाता है, उसके विन्यासों का प्रशासन समुचित रूप से किया जाता है तथा उसकी निधियों का विनियोजन सम्यक् रूप से उन प्रयोजनों के लिये किया जाता है जिनके कि लिए वे स्थापित की गई थीं या जिनके कि लिए वे अस्तित्व में हैं और समिति, उसके ऐसी अध्यपेक्षा की जाने पर, ऐसी जानकारी तथा लेखे यथास्थिति, राज्य सरकार या आयुक्त को तत्काल देगी. राज्य सरकार या आयुक्त, समिति को ऐसे निदेश दे सकेगा जो कि वह उचित समझे और समिति उनका पालन करेगी.
निरीक्षण
२६. ( १ ) राज्य सरकार या आयुक्त किसी अधिकारी को मंदिर से संबंधित किसी जंगम या स्थावर संपत्ति, अभिलेखों, पत्र-व्यवहार, रेखांकों ( प्लान्स) , लेखाओं तथा अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण करने के लिए प्रतिनियुक्त कर सकेगा. समिति तथा उसके कर्मचारी ऐसे अधिकारी को निरीक्षण के लिये सुविधाएं देने के लिये आबद्ध होंगे.
( २ ) आयुक्त, यदि वह ऐसा करना आवश्यक समझता है , तो वह उपधारा ( १ ) के अधीन स्वयं निरीक्षण कर सकेगा.
अध्याय- छह
मंदिर की भूमि, उसके भवनों या अन्य संपत्ति पर अप्राधिकृत रूप से कब्जा करना मंदिर की भूमि या उसके भवनों पर व्यक्तियों द्वारा अप्राधिकृत कब्जा.
२७. ( १ ) जहां प्रशासक के पास यह विश्वास करेन का कारण है कि किसी ने मंदिर की किसी भूमि या भवन या पवित्र तालाब , कुएं, झरने या जल सरणी पर, चाहे वह मंदिर की प्रसीमाओं के भीतर स्थित हों या उनके बारह, अप्राधिकृत रूप से कब्जा कर लिया है या उन पर अप्राधिकृत रूप से उसका कब्जा बना हुआ है, वहां प्रशासक उस तथ्य की रिपोर्ट सुसंगत प्रांसगिक ब्यौरे के साथ अधिकारिता रखने वाले तहसीलदार को करेगा.
( २ ) तहसीलदार, उसका यह समाधान हो जाने पर कि अधिक्रमण किया गया है, अधिक्रामक पर एक ऐसी सूचना तामील करवा सकेगा जिसमें अधिक्रमण की विशिष्टियां की जाएगी और उससे यह अपेक्षा की जाएगी कि वह एक निश्चित तारीख के पूर्व इस बात का कारण दर्शित करे कि ऐसा आदेश क्यों न कर दिया जाए जिसमें उससे सूचना में विनिर्दिष्ट की गई तारीख के पूर्व अधिक्रमण हटाने की अपेक्षा की जाए. सूचना की एक प्रति प्रशासक को भी भेजी जाएगी.
(३ ) उपधारा ( २ ) में निर्दिष्ट की गई सूचना की तामील ऐसी रीति में की जाएगी जैसी कि विहित की जाए.
(४) उपधारा ( २ ) में निर्दिष्ट सूचना में विनिर्दिष्ट की गई कालावधि के भीतर प्राप्त हुई अधिक्रामक की आपत्तियां, यदि कोई हों, तथा प्राप्त हुए प्रशासक के उत्तर, यदि कोई हों, पर विचार करने के पश्चात् तहसीलदार उस दशा में जब किवह यह विनिश्चित करता है कि कोई अधिक्रमण किया गया है, अधिक्रामक से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह अधिक्रमण को हटा ले और उस भूमि या भवन , जिस पर अधिक्रमण किया गया है, का कब्जा प्रशासक को ऐसी तारीख के पूर्व परिदत्त कर दे जो कि आदेश में विनिर्दिष्ट की गई है.
(५ ) तहसलीलदारं का आदेश लिखित में होगा और उसमें वे आधार अंतर्विष्ट होंगे जिन पर कि उसने ऐसा आदेश पारित किया है.
२८. (१ ) धारा २७ के अधीन तहसीलदार द्वारा पारित किए गए आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसा आदेश प्राप्त होने की तारीख से तीस दिन के भीतर अधिकारिता रखने वाले उपखण्ड अधिकारी को लिखित में अपील कर सकेगा.
धारा २७ के अधीन तहसीलदार के आदेशों के विरुद्ध अपील.
(२ ) ऐसी अपील की जाने पर उपखण्ड अधिकारी यह आदेश दे सकेगा कि उस मामले में आगे की कार्यवाहियां अपील का विनिश्चय होने तक रोकी दी जाएं.
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(३ ) उपखण्ड अधिकारी , तहसीलदार से मामले के अभिलेख मंगवाएगा और अपीलार्थी तथा प्रशासक को विहित रीति में सूचना देने के पश्चात् और यदि आवश्यक हो, तो ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात् जैसी कि वह उचित समझे , अपील को विनिश्चित करेगा.
(४) तहसीलदार का विनिश्चय , उपखण्ड अधिकारी के विनिश्चय के अध्ययधीन रहते हुए अंतिम होगा और अतिक्रमण का निश्चायक साक्ष्य होगाः
परंतु इस धारा में की कोई भी बात अधिक्रामक को, इस आधार पर कि भूमि या भवन पर मंदिर का कोई हक नहीं है, अधिकारिता रखने वाले सिविल न्यायालय में कोई वाद, संस्थित करने से निवारित नहीं करेगी.
(५ ) जहां तहसीलदार के आदेश के विरुद्ध उपधारा ( १ ) के अधीन कोई अपील नहीं की गई है या जहां अपील की गई है और खारिज कर दी गई है, वहां तहसीलदार अतिक्रमण को हटा सकता है और उस भूमि या भवन का, जिस पर कि अतिक्रमण किया गया है , कब्जा अभिप्राप्त कर सकेगा. कोई भी पुलिस या राजस्व अधिकारी , जिसकी कि मदद की अपेक्षा इस प्रयोजन के लिये की जाये, तहसीलदार को आवश्यक मदद देने के लिये आबद्ध होगा. किसी अतिक्रमण को हटाने का व्यय अतिक्रमणकर्ता से भू- राजस्व के बकाया के तौर पर वसूली योग्य होगा. ऐसा व्यक्ति, अनधिकृत अधिभोग की अवधि के लिए उस स्थान पर ऐसी भूमि के लिए अनुज्ञेय दर की दोगुनी दर से भूमि के किराए का तथा ऐसे किसी जुर्माने का जो भूमि के मूल्य के 20 प्रतिशत तक का हो सकेगा तथा ऐसे और जुर्माने का जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिये , जिसको कि प्रथम आदेश की तारीख के पश्चात् ऐसा अनधिकृत अधिभोग या कब्जा बना रहता है, रुपये एक हजार तक का हो सकेगा, भुगतान करने का भी दायी होगा. प्रशासक इस प्रकार वसूल किया गया जुर्माना कोष में जमा होगा.
अध्याय-सात
प्रकीर्ण
२९ . मध्यप्रदेश स्थान नियंत्रण अधिनियम, १ ९६१ ( क्रमांक ४१ सन् १ ९ ६१ ) के उपबंध धारा ४ के अधीन विनिर्दिष्ट मंदिर के देवता में निहित होने वाली किसी संपत्ति को लागू होंगे .
मध्यप्रदेश स्थान नियंत्रण अधिनियम, १९ ६१ के उपबंधों का लागू न होना.
मंदिर का देय शोध्य धन भू-राजस्व के बकाया की तरह वसूली योग्य होना.
३०. इस अधिनियम के अधीन या किसी ऐसे करार, जिसमें कि तद्धीन देय किसी रकम की वसूली भू- राजस्व के बकाया के तौर पर की जाने बावत् उपबंध हो , के अधीन मंदिर को शोध्य समस्त धन , प्रशासक द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे प्रशासक इस निमित्त प्राधिकृत करें, हस्ताक्षरित प्रमाण - पत्र दिए जाने पर, भू- राजस्व के बकाया के तौर पर तहसीलदार द्वारा वसूली योग्य होंगे.
सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण.
३१. राज्य सरकार के या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या समिति या उसके किसी सदस्य, आयुक्त या प्रशासक या समिति के अनुदेशों के अधीन कार्य करने वाले या समिति द्वारा प्राधिकृत किए गए किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध किसी भी ऐसी बात के संबंध में, जो कि इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या उपविधियों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो या जिसका सद्भावपूर्वक किया जाना आशयित हो, कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी .
अधिसूचनाएं , आदेश आदि न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किये जायेंगे .
३२. इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, राज्य सरकार द्वारा या राज्य सरकार के किसी अधिकारी या समिति या उसके किसी सदस्य या प्रशासक द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन जारी की गई कोई अधिसूचना, पारित किया गया कोई आदेश, किया गया कोई विनिश्चय , की गई कार्यवाही या की गई कोई बात न्यायालय में प्रश्नगत किये जाने के दायित्वधीन नहीं होगी और इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त की गई किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली कार्यवाही के संबंध में किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा कोई व्यादेश नहीं दिया जायेगा. अधिसूचनाएं, आदेश आदि न्यायालय में प्रश्नगत् नहीं किये जायेंगे.
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भूमि का अर्जन.
३३. जब कोई भूमि या भवन, चाहे वह मंदिर की सीमाओं के भीतर हो या उनके बाहर, मंदिर के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित है और समिति उसे करार के द्वारा अर्जित करने में असमर्थ है तो राज्य सरकार, समिति के अनुरोध पर, भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुन व्र्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम , २०१३ ( २०१३ का ३० ) के उपबंधों के अधीन ऐसी भूमि या भवन को अर्जित करने हेतु अग्रसर हो सकेगी और मंदिर के लिये किए गए किसी भूमि या भवन के ऐसे अर्जन को उस अधिनियम के अर्थ के अंतर्गत लोक प्रयोजन समझा जाएगा और उस अधिनियम के अधीन अधिनिर्णीत किए गए प्रतिकर का तथा किन्हीं अन्य ऐसे प्रभारों का, जो कि उस भूमि या भवन के अर्जन के संबंध में राज्य सरकार द्वारा उपगत किए गए हैं, समिति द्वारा संदाय कर दिए जाने पर ऐसे निबंधनों और शर्तों के अध्ययधीन रहते हुए, जो कि राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, समिति में निहित हो जाएगा.
३४. मंदिर के संरक्षण, सर्निमाण , जीर्णोद्धार और पुर्नविकास के प्रस्तावित निर्माण कार्य हेतु राज्य सरकार पुरातत्वविदों, वास्तुविदों और विरासत संरक्षकों का एक पैनल गठित कर उससे विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन प्राप्त कर सकेगी.
मंदिर के संरक्षण और पुर्नविकास हेतु राज्य सरकार की शक्ति.
अनुज्ञप्तियां मंजूर करने की शक्ति.
३५. ( १ ) कोई भी ऐसा व्यक्ति , जो मंदिर के परिसर के भीतर तथा उसके आसपास फूल, प्रसाद, पुस्तकें तथा अन्य साहित्य, पेंटिंग्स और समिति द्वारा अनुमोदित कोई अन्य सामग्री, बेचने या मंदिर के परिसर के भीतर तथा उसके आसपास वाहन, जूते, छाते या अन्य वैयक्तिक चीज वस्तु की देखभाल करने की वांछा करता है, अनुज्ञप्ति की मंजूरी या उसके नवीकरण हेतु आवेदन, प्रशासक को ऐसी रीति में तथा ऐसी कालावधि के भीतर करेगा, जैसी कि उपविधियां द्वारा विहित की जाए.
( २ ) ऐसे प्रत्येक आवेदन के साथ ऐसी फीस संलग्न की जाएगी जो कि समिति, विहित सीमाओं के अध्ययधीन रहते हुए, इस संबंध में विनिर्दिष्ट करे.
(३ ) प्रशासक अनुज्ञप्ति मंजूर कर सकेगा या उसे नवीकृत कर सकेगा या अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से अनुज्ञप्ति मंजूर करने या उसे नवीकृत करने से इंकार कर सकेगा.
(४ ) इस धारा के अधीन मंजूर की गई या नवीकृत की गई समस्त अनुज्ञप्तियां इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों और बनाई गई उपविधियों के उपबंधों के अध्ययधीन होंगी .
३६. ( १ ) उपधारा ( २ ) के उपबंधों के अध्ययधीन रहते हुए, प्रशासक, लिखित में अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से किसी अनुज्ञप्ति को निलंबित या रद्द कर सकेगा : -
अनुज्ञप्तियां रद्द करने या उन्हें निलंबित करने की शक्ति.
(क) यदि अनुज्ञप्ति जानबूझकर दुर्व्यपदेशन या कपट द्वारा अभिप्राप्त की गई है;
(ख) यदि अनुज्ञप्ति का धारक या कोई सेवक या कोई व्यक्ति, जो उसकी अभिव्यक्त या विवक्षित अनुज्ञा से उसकी ओर से कार्य कर रहा है, अनुज्ञप्ति के किन्हीं निबन्धनों तथा शर्तों को भंग करता है; या (ग) यदि अनुज्ञप्ति का धारक दिवालिया हो गया है ; या
(घ) यदि अनुज्ञप्ति के धारक को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किकसी अपराध का सिद्दोष ठहरा दिया जाता है.
(२ ) इस धारा के अधीन किसी अनुज्ञप्ति को तब तक निलंबित या रद्द नहीं किया जाएगा तब तक कि अनुज्ञप्ति के धारक को ऐसे निलंबन या रद्दकरण के विरुद्ध कारण दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया हो .
अपील.
३७. ( १ ) धारा ३३ की उपधारा ( ३ ) या धारा ३४ की उपधारा ( १ ) के अधीन प्रशासक के आदेश से व्यथित कोई भी व्यक्ति समिति के अध्यक्ष को अपील कर सकेगा.
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( २ ) उपधारा ( १ ) के अधीन अपील , आदेश प्राप्त होने की तारीख से तीस दिन के भीतर, ऐसी रीति में की जाएगी जो कि उपविधियों द्वारा विहित की जाए.
३८. ( १ ) समिति, मंदिर की समस्त जंगम तथा स्थावर संपत्तियों, जिनके अंतर्गत निधियां , आभूषण , अभिलेख , दस्तावेज तथा अन्य आस्तियां भी सम्मिलित हैं, को रक्षित करने और उन्हें अपनी रक्षा में रखने के लिए हकदार होगी .
विनिर्दिष्ट मंदिर और उसकी संपत्तियां समितिकीअभिरक्षा में होंगी.
( २ ) यदि ऐसा कब्जा अभिप्राप्त करने में, समिति या समिति द्वारा इस निमित प्राधिकृत किए गए किसी व्यक्ति का, किसी भी व्यक्ति द्वारा प्रतिरोध किया जाता है या उसे बाधा पहुंचाई जाती है, तो वह ऐसे तहसीलदार से, जिसकी कि अधिकारिता के भीतर कोई ऐसी संपत्ति स्थित है, विहित प्रारूप में इस बात के लिए अध्यपेक्षा कर सकेगा कि वह समिति को उसका कब्जा परिदत्त करवाए और ऐसी अध्यपेक्षा प्राप्त होने पर वह तहसीलदार मामले के तथ्यों की संक्षिप्त जांच करेगा , और यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा प्रतिरोध या बाधा बिना किसी न्यायसंगत हेतु के थी, तो वह उक्त अध्यपेक्षा का अनुपालन करेगा और इस धारा के अधीन शक्ति का प्रयोग करने में तहसीलदार, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा मार्गदर्शित होगा.
(३ ) समिति या उसके अनुदेश के अधीन कार्य करने वाले या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी भी ऐसी बात के लिए जो कि उपधारा ( २ ) के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो, कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधि कार्यवाही नहीं होगी.
(४) ऐसे समस्त लोक अधिकारी, जिनकी कि अभिरक्षा में मंदिर या उसकी किसी जंगम या स्थावर संपत्ति से संबंधित कोई अभिलेख , रजिस्टर, रिपोर्ट या अन्य दस्तावेज हों, उनकी ऐसी प्रतियां या उनमें से ऐसे उद्धरण देंगे , जैसे कि प्रशासक द्वारा अपेक्षित किए जाएं,
अध्याय- आठ
अपराध
अपराध ३९ . जो कोई ,-
(क) जिसका कि कर्तव्य मंदिर के कर्मकाण्डों का संपादन करना या देवता की पूजा- अर्चना करना है यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि उक्त कर्तव्यों के अपालन से कर्मकाण्डों का या पूजा अर्चना का संपादन करने में विलम्ब होगा या जनता या उसके किसी वर्ग को, जो कि मंदिर में पूजा करने का हकदार है, असुविधा होगी या उसका उत्पीड़न होगा , कोई दावा करता है या विवाद उठाता है और ऐसे कर्तव्यों का पालन करने में असफल रहता है या पालन करने से इंकार करता है और प्रशासक के ऐसे आदेशों की, जिनके कि द्वारा उसे यह निदेश दिया गया है कि वह ऐसे दावे या विवाद के उचित न्यायनिर्णयन के परिणाम पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना , अपने कर्तव्यों का पालन करे, जानबूझकर अवज्ञा करेगा या उनका पालन नहीं करेगा , वह व्यक्ति या कोई अन्य ऐसा व्यक्ति, जो ऐसे आचरण का दुष्प्रेरण करता है; या.
(ख) मंदिर के परिसर के भीतर किसी देवता से संबंधित कोई कर्मकाण्ड या पूजा अर्चनाअप्राधिकृत रूप से करता है; या
(ग) किसी पुजारी या सेवक को उसके द्वारा कर्तव्यों का सम्यक रूप से संपादन करने में बल प्रयोग द्वारा या अन्यथा स्वेच्छा से बाधा पहुंचाता है; या
(घ) जानबूझकर कोई ऐसा कार्य करता है जिससे कोई " भोग " या मंदिर अपवित्र हो जाए; या
(ङ) अप्राधिकृत रूप से किसी " थाली " या अन्य पात्र को ऐसी रीति में प्रदर्शित करता है जिससे कोई व्यक्ति उस " थाली " या अन्य पात्र में कोई चढ़ावा चाहे वह नगद में हो या वस्तु के रूप में, चढ़ाने के लिए युक्तियुक्त रूप से उत्प्रेरित हो जाए या किसी भी अन्य रीति में धन की याचना करता है; या मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
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(च) समिति या प्रशासक द्वारा इस बात के लिए प्राधिकृत न होते हुए भी मंदिर के परिसर के भीतर व्यक्तियों के आवागमन में या उससे संबंधित विनियामक उपायों में हस्तक्षेप करता है; या (छ) मंदिर के भीतर के किसी स्थान में बलपूर्वक प्रवेश करता है जबकि ऐसा प्रवेश किसी विधि या रूढ़ि के अधीन या समिति या प्रशासक द्वारा पारित किए गए किसी विधिपूर्ण आदेश के अधीन प्रतिषिद्ध है; या
(ज) मंदिर के परिसर के भीतर कोई वस्तु यह जानते हुए ले जाता है कि मंदिर के परिसर के भीतर ऐसी वस्तु का ले जाना किसी विधि या रूढ़ि के अधीन या किसी ऐसी घोषणा द्वारा प्रतिषिद्ध है जो कि समिति द्वारा प्रचलित रूढ़ि, लोक स्वास्थ्य, नैतिकता या जनता की धार्मिक भावना का सम्यक् ध्यान रखते हुए विहित रीति में की गई है तथा प्रकाशित की गई है,
दोषसिद्धि पर, वह किसी ऐसी अन्य कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जो इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन उसके विरुद्ध की जा सकती है, ऐसे कारावास से जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डनीय होगा.
अपराध का संज्ञान.
४०. कोई भी न्यायालय कलक्टर की पूर्वानुमति के बिना इस अधिनियम के अंतर्गत किये गये किसी भी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा.
अपराधों प्रशमन. का
४१. ( १ ) प्रशासक, किसी भी ऐसे व्यक्ति से , जिसके कि विरुद्ध यह युक्तियुक्त संदेह विद्यमान हो कि उसने इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया है, ऐसी धनराशि जो-
(क) धारा ३९ के खण्ड ( घ ) के अधीन आने वाले मामलों में मूल्य की पांच गुनी रकम, और (
ख) किन्हीं अन्य मामलों में, उस अपराध की बाबत् अधिरोपित किए जा सकने वाले जुर्माने की अधिकतम रकम से अधिक नहीं होगी , उस अपराध के प्रशमन के रूप में प्रतिगृहीत कर सकेगा.
(२) ऐसी धनराशि का भुगतान कर दिए जाने पर, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कोई और कार्यवाहियां नहीं की जाएंगी.
रकम ४२. वे समस्त रकमें, जो इस अधिनियम के अधीन के अपराध के लिए दोषसिद्धि पर जुर्माने के मुद्दे या प्रशमन जमा के परिणामस्वरूप वसूल की गई हों, मंदिर कोष में जमा की जाएंगी.
जुर्माने की मंदिर कोष में कीजाएंगी.
अध्याय-नौ
नियम
४३. (१ ) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा , इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिये नियम बना राज्य सरकार की नियम बनाने की सकेगी. शक्ति.
(२ ) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए समस्त नियम विधान सभा के पटल पर रखे जाएंगे .
४४. ( १ ) समिति, आयुक्त के पूर्व अनुमोदन से, मंदिर तथा उसके विन्यासों के प्रबंध एवं प्रशासन के लिए ऐसी उपविधियां बनाने उपविधियां बना सकेगी जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या किसी अन्य विधि से असंगत न हों.
की समिति की शक्ति.
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(२ ) विशिष्टतया तथा पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना , ऐसी उपविधियों में निम्नलिखित के लिए उपबंध हो सकेंगे:-
(क) समिति के अध्यक्ष तथा सचिव के बीच कर्तव्यों का विभाजन;
(ख) वह रीति जिसमें किसी विषय पर विनिश्चय सम्मिलनों में न किया जाकर अन्यथा किया जा सकेगा;
(ग) समिति के सम्मिलनों के कामकाज की प्रक्रिया और उसका संचालन;
(घ) समिति के कार्यकाल में रखी जाने वाली पुस्तकें तथा लेखे ;
(ङ) समिति की निधियों की अभिरक्षा और उसका विनिधान;
(च) समिति के बजट में सम्मिलित किए जाने वाले या उसमें से अपवर्जित किए जाने वाले ब्यौरे;
(छ) समिति के सम्मिलनों का समय और स्थान;
(ज) वह रीति जिसमें समिति के सम्मिलनों की सूचना दी जाएगी ;
(झ) सम्मिलनों में व्यवस्था बनाए रखना और उनमें कार्यवाहियों का संचालन तथा वे शक्तियां जिनका कि प्रयोग अध्यक्ष, समिति के विनिश्चय को प्रवर्तित कराने के प्रयोजनों के लिए कर सकेगा;
(ञ) वह रीति जिसमें समिति के सम्मिलन की कार्यवाहियों को अभिलिखित किया जाएगा ;
(ट) वे व्यक्तिजिनके द्वारा उन धनों के लिए, जो कि समिति को संदत्त किए गए हों, रसीदें दी जा सकेंगी;
(ठ) मंदिर के भीतर व्यवस्था बनाए रखना और मंदिर में व्यक्तियों के प्रवेश तथा मंदिर में से उनके निकास का विनियमन करना;
वह रीति जिसमें " पर्वों ", " मेलों " और उत्सवों " के दौरान मंदिर में पूजा की जाएगी; (ड)
(ढ़) मंदिर के " पुजारी " , " पंडा " तथा " सेवक " के रुप में नियुक्त किए जाने के लिए उपयुक्त व्यक्तियों की सूची, शैक्षणिक अर्हता, धर्म संबधी ज्ञान, आचरण , प्रशिक्षण तथा अनुभव एवं तदानुषंगिक अन्य बातों जैसे मंदिर में प्रचलित प्रथाओं, विश्वासों और परम्पराओं पर विचार करने के पश्चात् तैयार करना;
(ण) धारा १७ के अधीन अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया तथा उनकी सेवा के निबंधन एवं शर्तें;
(त) वह रीति जिसमें तथा वह कालावधि जिसके भीतर धारा ३५ की उपधारा ( १ ) के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन किया जा सकेगा;
(थ) वह रीति जिसमें धारा ३७ की उपधारा ( २ ) के अधीन अपील की जा सकेगी;
(द) कोई अन्य विषय जिसके कि लिए इस अधिनियम के अधीन उपविधियां बनाई जाना हों या इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपविधियां बनाना आवश्यक हों.
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(३) कीजाएंगी. समस्त उपविधियां, आयुक्त द्वारा उनकी पुष्टि कर दिए जाने के पश्चात् मंदिर के सूचना पटल पर लगाई कठिनाइयों का दूर किया जाना.
४५. ( १ ) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावशील करने में कोई कठिनाई उद्भूत हो, तो राज्य सरकार, राजपत्र में प्रकाशित किए गए असाधारण या विशेष आदेश द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न होने वाले ऐसे उपबंध कर सकेगी जो कि ऐसी कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:
परंतु, कोई भी ऐसा आदेश नियत तारीख से एक वर्ष का अवसान हो जाने के पश्चात् नहीं किया जाएगा.
(२ ) उपधारा ( १ ) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश विधान सभा के पटल पर रखा जाएगा.
४६. राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा जब उपयुक्त समझे तब, प्रथम अनुसूची में किसी मंदिर को जोड़ अथवा हटा सकेगी.
मंदिरों को अधिनियम में जोड़ने या हटाने की शक्ति.
४७. मध्यप्रदेश सामान्य प्रखण्ड अधिनियम, १ ९ ५७ की धारा ( १० ) में निहित प्रावधानों के अध्यधीन रहते हुए, निरसन तथा व्यावृत्ति.
इस अधिनियम की द्वितीय अनुसूची में निहित समस्त अधिनियम धारा १ की उपधारा ( २ ) के अनुसार निरसित हो जाएंगे.
अभिमुक्ति.
४८. राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा , ऐसे अधिसूचना में अभिमुक्ति के कारणों को विनिर्दिष्ट करते हुए किसी मंदिर को इस अधिनियम के किन्हीं प्रावधानों से, ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जिन्हें कि राज्य सरकार अधिरोपित करना उचित समझे , अभिमुक्ति प्रदान कर सकेगी.
अनुसूची- एक ( धारा ४६ देखिए )
मंदिर का नाम, अधीनस्थ मंदिर, भवन तथा अन्य संरचनाएं
(२)
अनुक्रमांक (१)
१. श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन
(१) श्री ओंकारेश्वर मंदिर
(२) श्री सभा-मंडप के मंदिर -
(एक) चन्द्रादित्येश्वर मंदिर.
(दो) वीरभद्र गजानन.
अन्नपूर्णा मूर्ति देवीजी.
(तीन)
श्री राम मंदिर.
(चार)
अवन्तिका देवी.
(पांच)
(छह) घुवेश्वर महादेव.
(३) श्री कोटितीर्थ.
श्री कोटेश्वर व रामेश्वर.
(४)
कोटितीर्थ के आस - पास के श्री महादेव मंदिर.
(५)
महादेव ८४.
(६) 1012( 17)
मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
(७) इन्द्रेश्वर मंदिर.
(८) देवासवालों की धर्मशाला.
(९) गोविन्देश्वर महादेव मंदिर.
(१० ) गणपति मंदिर.
(११ ) किबे साहब की धर्मशाला.
(१२ ) सिद्धि विनायक मंदिर.
(१३ ) महादेव मंदिर.
(१४) विष्णु मंदिर.
(१५) श्री महाकालेश्वर मंदिर के ऊपर ओंकारेश्वर चौक के मंदिर :-
(एक) नवग्रह
(दो) मारूति मंदिर
(तीन ) गणपति मंदिर
(चार ) नीलकण्ठेश्वर मंदिर
(पांच) श्री रामेश्वर
(छह) गणपति मंदिर दूसरा
(सात) महाकालेश्वर मंदिर का प्राचीन शिलालेख
(आठ) त्रिविश्वेश्वर महादेव
(नौ) एकादशरुद्र
(दस ) सिद्धेश्वरं
(ग्यारह ) सप्तेश्वर
(बारह) दास मारूति
(तेरह ) साक्षी गोपाल
(चौदह ) गणपति मंदिर तीसरा
(१६ ) श्री महाकालेश्वर धर्मशाला व उसमें के मंदिर : -
(एक) बिट्ठल मंदिर
(दो) मंगलेश्वर
(तीन ) सिद्धेश्वर
(चार) गणपति
(पांच) नरसिंह
(छह) राम मंदिर
(1७) वृद्धकालेश्वर मंदिर तथा उसके पार्श्वस्थ मंदिर :-
(एक) वृद्धकालेश्वर मंदिर
(दो) सप्तऋषि मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
1012( 18)
(तीन) अनादि कल्पेश्वर
(चार) १ ९ माफी मंदिर
(पांच) ओंकारेश्वर
(छह ) गणपति
(सात) कल्पवृक्ष, कामधेनु आदि मूर्तियां महादेव सहित
(आठ) काशी विश्वनाथ
(नौ) महादेव
(दस) मनमानकेश्वर महादेव
(ग्यारह ) महादेव मंदिर
(बारह) हनुमानजी मंदिर
(तेरह ) गुरू भेरूपुरी की समाधि
(चौदह ) गोवर्द्धन मंदिर.
२. श्री गणेश मंदिर, खजराना, इंदौर
(१) श्री गणेश मंदिर,
(२) श्री दुर्गामाता मंदिर,
(३) श्री शिव मंदिर,
(४) श्री क्षिप्रेश्वर महादेव मंदिर,
(५) श्री कृष्ण मंदिर,
(६) श्री कैलामाता मंदिर,
(७) श्री भादवामाता मंदिर,
(८) श्री हंसी देवी मंदिर,
(९) श्री चिंतामन गणेश मंदिर
(१० ) श्री महाकाल मंदिर,
( ११ ) श्री वेदमाता मंदिर,
(१२ ) श्री सिद्ध भैरव मंदिर,
(१३ ) श्री नरसिंह मंदिर, श्री पीपलेश्वर महादेव मंदिर, श्री सीतलामाता मंदिर ,
(१४) श्री जय संतोषी माता मंदिर
(१५) श्री हनुमान मंदिर,
(१६ ) श्री गणेश मंदिर कालेगणेश,
(१७) श्री शनि मंदिर,
(१८ ) श्री सांई बाबा मंदिर,
(१ ९ ) श्री वैंकटेश मंदिर
(२०) श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर,
(२१ ) श्री इच्छामन गणेश मंदिर, 1012( 19)
मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
(२२ ) श्री महावीर हनुमान मंदिर,
(२३ ) श्री दत्तात्रेय मंदिर,
(२४) श्री राम दरबार मंदिर
(२५) श्री राधाकृष्ण मंदिर,
(२६) श्री महालक्ष्मी मंदिर,
(२७) श्री गोपेश्वर महादेव मंदिर,
(२८) श्री प्रचंड भैरव मंदिर,
(२९ ) श्री भैरव मंदिर,
(३० ) श्री सूर्य मंदिर
(३१ ) श्री गंगा माता मंदिर,
(३२ ) श्री दक्षिणी हनुमान मंदिर
(३३ ) श्री संतोषीमाता मंदिर.
३. श्री जाम सांवली हनुमान मंदिर, छिंदवाड़ा
चमत्कारिक श्री हनुमान मंदिर (१)
(२) श्री शिव पंचायतम् मंदिर
(३) श्री राम मंदिर
(एक) श्री गणेश जी
(दो) श्री विठ्ठल रूकमणी
(तीन) श्री रामजी, लक्ष्मणजी, सीताजी, हनुमानजी
(चार) श्री शिवजी
(पांच) माँ दुर्गा जी
(४) ध्यान कक्ष ( संत दरबार)
(एक) गोदावरी माता
(दो) श्री उपासनी बाबा
(तीन ) श्री साई बाबा
(चार) श्री ज्ञानेश्वर महाराज
(पांच) श्री गजानन महाराज
(छह) श्री तुकडोजी महाराज
(सात) श्री गाडगे बाबा
(५) यज्ञशाला ( यज्ञकुण्ड)
(६) भक्त निवास क्र. १
(७) भक्त निवास क्र. २
(८) भक्त निवास क्र. ३
(९) सामुदायिक भवन
(१०) पाकशाला भवन ( भोजन कक्ष ) 1012(20)
मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
(११ ) स्टोर रूम
(१२ ) गौ-शाला
4. श्री दादाजी दरबार, खण्डवा
(१) गौशाला, बगीचा, बड़ा कुआ
(२) हरीहर भवन, सेवादारों के कमरे
(३) छोटे दादाजी एवं बड़े दादाजी के मंदिर
(४) प्रज्वलित धूनीमाई
(५) नर्मदा मंदिर
(६) ठंडी धूनी एवं गंगाचरी
(७) अमूल्य दर्शन
(८) रथ गृह
(९) ट्रस्ट कार्यालय, भोजन प्रसादी गृह
(१० ) सेवादारों के कमरे गेट के पास उत्तर दिशा
(११ ) सुविधा गृह ( स्नानागारा एवं शौचालय )
चल संपत्ति- सोने के तीन छत्र, चांदी की परत चढ़ी दो टेबले , चांदी की कलश, चांदी की थाली , (१२)
चांदी की बाल्टी, चांदी की कटोरी , चांदी की घंटी, चांदी के गिलास, चांदी के छत्र, चांदी का दंड, चांदी के चंवर इत्यादि.
(१३ ) रथ गृह में स्थित दो विन्टेज कारें, दो बध्घियां, ग्रामोफोन एवं छोटे एवं बड़े दादाजी से संबंधित अन्य वस्तुएं, कपड़े, छड़ी, हार्मोनियम, छत्री, चरणपादुकाएं, पंखा, घंटी इत्यादि.
५. माँ शारदा देवी मंदिर, मैहर
(१ ) श्री नरसिंह भगवान
(२) श्री हनुमान जी
(३) श्री काली देवी
(४) श्री शंकर भगवान
(५) श्री हंथा पुजारी ( मां शारदा देवी जी के मुख्य मंदिर के पीछे वाला भाग )
(६) श्री चबूतरा ब्रम्हदेव
(७) श्री चबूतरा घन्टा
(८) श्री काल भैरव
(९) श्री जवारा ठंडे करने का स्थान
(१० ) श्री देवी गद्दी
(११ ) श्री स्थान हवन कुण्ड
(१२ ) श्री दुर्गा देवी ( देवी गद्दी के पीछे )
(१३ ) श्री शेषनाग भगवान
(१४) श्री मरही माता 1012( 21)
मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
(१५) श्री जालपा देवी
(१६) श्री फूलमती देवी
(१७) श्री अद्धी माता
(१८ ) श्री ड्योढ़ी ( प्रथम ड्योढ़ी )
(१ ९ ) श्री भैनासोर
(२० ) श्री नीलकण्ठ स्वामी का चबूतरा
( २१ ) श्री मौनी बाबा की कुटिया
(२२ ) श्री दुर्गा देवी शंकर भगवान ( मेला कार्यालय के पीछे पहाड़ी के डलान पर)
(२३ ) श्री दूल्हादेव
(२४) श्री यज्ञशाला ( मेला कार्यालय भवन के पास )
(२५) श्री यज्ञशाला पुरानी
(२६) श्री शंकर भगवान का मंदिर ( नई बाउली के पास )
(२७) श्री भारती बाबा की कुटिया
(२८ ) श्री चबूतरा बाबा की समाधि
(२९ ) श्री शंकर भगवान मंदिर ( बाजार क्षेत्र में )
(३० ) श्री हनुमान जी मंदिर ( पुलघाट के पास )
(३१ ) श्री दुर्गा माता मंदिर ( आल्हा तलैया के पास )
(३२) गुफा की श्री अखण्ड ज्योति
(३३ ) श्री शारदा भवन ( शहर में भवन ) ( मैहर शहर के वार्ड नं. १४ में स्थित )
(३४) मैहर शहर के वार्ड नं. १८ में श्री भवन क्रमांक २८३/४
६. माँ सलकनपुर देवी मंदिर, सलकनपुर, जिला सीहोर
(१) ९० एकड़ भूमि
(२) मंदिर परिसर
(३) मंदिर धर्मशाला तथा विद्यालय
द्वितीय अनुसूची- दो
(धारा ४७ देखिए)
मंदिर से संबंधित निरसित अधिनियमों के नाम (२)
अनुक्रमांक (१ )
१. मध्यप्रदेश महाकालेश्वर मंदिर अधिनियम, १ ९ ८२ ( क्रमांक २१ सन् १ ९८३ )
२. मध्यप्रदेश गणपति मंदिर खजराना , ( इन्दौर ) अधिनियम , २००३ ( क्रमांक २ सन् २००४)
३. मध्यप्रदेश मां शारदा देवी मंदिर अधिनियम, २००२ ( क्रमांक ५ सन् २००३ )
४. राज्य सलकनपुर मंदिर अधिनियम, ( भोपाल क्षेत्र ) , १ ९ ५६ (क्रमांक ४ सन् १ ९ ५६ ) मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 20 दिसम्बर 2019
1012( 22)
उद्देश्यों और कारणों का कथन
वर्तमान में विनिर्दिष्ट मंदिर और इसके विन्यासों के समुचित, अनुरक्षण , परिरक्षण, बेहतर प्रशासन और प्रबंध के लिए कोई अधिनियमित नहीं है. अतएव, मंदिर और देवता की गरिमा के समुचित अनुरक्षण का समुचित प्रबंध करने के लिए श्रद्धालुओं को सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए विधि को अधिनियमित करने का विनिश्चय किया गया है.
२. अतः यह विधेयक प्रस्तुत है.
पी. सी. शर्मा भोपाल :
भारसाधक सदस्य.
तारीख १८ दिसम्बर, सन् २०१ ९.
प्रत्यायोजित विधि निर्माण के संबंध में ज्ञापन
प्रस्तावित विधेयक के जिन खण्डों द्वारा राज्य शासन को विधायनी शक्तियों का प्रत्यायोजन किया जा रहा है, उनका विवरण निम्नानुसार है :-
खण्ड १ : अधिनियम के विभिन्न उपबंधों को विभिन्न तारीखों को अधिसूचना जारी करके लागू करने के लिए राज्य सरकार को शक्तियां दी जा रही हैं;
खण्ड १५ : समिति को अपने कर्तव्यों के संबंध में अध्यक्ष सचिव को शक्तियां प्रत्यायोजित की जा रही हैं ;
खण्ड २० : अध्यक्ष को वित्तीय शक्तियां देने के बारे प्रत्यायोजन है;
खण्ड ३५ : अनुज्ञप्ति मंजूरी के संबंध में रीति एवं कालावधि के बारे में प्रत्यायोजन किया जा रहा है;
खण्ड ३७ : अपील करने के विषय में रीति एवं उपविधियाँ निर्मित करने के बारे में प्रत्यायोजन किया जा रहा है ;
खण्ज ४३ : इस खण्ड के द्वारा राज्य सरकार को नियम बनाने की शक्तियां दी जा रही हैं, तथा
खण्ड ४८ : इस खण्ड के द्वारा राज्य सरकार को अधिसूचना जारी करके किसी मंदिर को इस अधिनियम किन्हीं प्रावधानों से अभिमुक्ति प्रदान करने हेतु,
शक्तियां प्रत्यायोजित की जा रही हैं . उक्त प्रत्यायोजन सामान्य स्वरूप के होंगे.
ए. पी. सिंह
प्रमुख सचिव.
मध्यप्रदेश विधानसभा.
नियंत्रक, शासकीय मुद्रण तथा लेखन सामग्री , मध्यप्रदेश द्वारा शासकीय केन्द्रीय मुद्रणालय , भोपाल से मुद्रित तथा प्रकाशित-2019.