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Madhya Pradesh Gazette · Government of Madhya Pradesh

श्री सचिन बिरला. सदस्‍य मध्‍यप्रदेश विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र क्रमांक 182-बड़वाह को निरर्ह घोषित करने के संबंध में....

Published 05 April 2022

Department
विधान सभा सचिवालय
Type
Extraordinary
Gazette no.
155
Identifier
in.gazette.madhya.2022-04-05.155.Extraordinary
Languages
English, Hindi
Published at
Original source ↗

मध्यप्रदेश शास

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सत्यमेव जयते

मध्यप्रदेश राजपत्र

(असाधारण )

प्राधिकार से प्रकाशित

भोपाल , मंगलवार , दिनांक 5 अप्रैल 2022- चैत्र 15, शक 1944

क्रमांक 155 ]

मध्यप्रदेश विधान सभा सचिवालय

मंगलवार, दिनांक 5 अप्रैल , 2022 ( चैत्र 15, 1944) क्रमांक 6138/मप्रविस-15/विधान/2022.- श्री गिरीश गौतम , अध्यक्ष , मध्यप्रदेश विधान सभा ने भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 6( 1 ) के अधीन प्राप्त शक्तियों के अनुसरण में श्री रवि रमेश जोशी , सदस्य, मध्यप्रदेश विधान सभा की ओर से, मध्यप्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता ) नियम , 1986 के अंतर्गत श्री सचिन बिरला, सदस्य, मध्यप्रदेश विधान सभा, निर्वाचन क्षेत्र क्रमांक 182-बड़वाह को निरर्ह घोषित करने के संबंध में प्राप्त अर्जी के परिप्रेक्ष्य में, प्रकरण में समस्त तथ्यों पर विचारोपरांत यह विनिश्चय किया है कि -

1. माननीय विधायक श्री रवि रमेश जोशी द्वारा मध्यप्रदेश विधानसभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता ) नियम, 1986 (आगामी अनुक्रम पर नियम 1986 से संबोधित किया जायेगा) के नियम 6 के अंतर्गत श्री सचिन बिरला, विधायक, क्षेत्र क्रमांक 182-बड़वाह को दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता से ग्रस्त होने की घोषणा हेतु अर्जी प्रस्तुत की गई है। अर्जी की कंडिका 1 लगायत 3 में मुख्यतः यह अभिवचन किया गया है, कि मध्यप्रदेश विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 182 -बड़वाह, जिला खरगोन से निर्वाचित विधानसभा सदस्य श्री सचिन बिरला , इंडियन नेशनल कांग्रेस के टिकट से निर्वाचित सदस्य हैं एवं इंडियन नेशनल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह का प्रयोग कर मध्यप्रदेश विधान सभा के सदस्य के तौर पर निर्वाचित हुए हैं ।

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2. अर्जी में आरोप लगाया गया है कि खंडवा लोकसभा उपचुनाव के दौरान दिनांक 24/12/2021 को चुनावी प्रचार के लिए माननीय मुख्यमंत्री के आयोजित सभा में श्री सचिन बिरला ने भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की सार्वजनिक घोषणा की जिसकी जानकारी अर्जीदार को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रकाशित समाचार द्वारा ज्ञात हुआ । अर्जी में यह अभिवचित किया गया है कि उक्त आयोजित सभा में श्री सचिन बिरला द्वारा भारतीय जनता पार्टी का अंगवस्त्र ओढ़कर स्वागत ग्रहण किया एवं कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा की । इसके अतिरिक्त सचिन बिरला ने सोशल मीडिया और ट्विटर में अपना प्रोफाइल परिवर्तन किया, जनता का सेवक बड़वाह विधानसभा- 182 भारतीय जनता पार्टी उल्लेखित किया है.

3. उक्त अभिवचनों के आधार पर अर्जीदार द्वारा यह प्रार्थना की गई है कि श्री सचिन बिरला द्वारा इंडियन नेशनल कांग्रेस राजनीतिक दल की अपनी सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी है जो भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची की कंडिका 2 ( 1 )( क ) के अंतर्गत मध्यप्रदेश विधानसभा का सदस्य होने के लिए , निरर्हित हो गए हैं, अतः नियम 8 के तहत अर्जी स्वीकार कर श्री सचिन बिरला को सदस्य से निरर्हित घोषित किया जावे । अर्जी के समर्थन में सूची अनुसार दस्तावेज प्रस्तुत किये गये हैं, उक्त सूची के अनुसार विभिन्न समाचार पत्रों की web edition से प्राप्त की गई न्यूज़ रिपोर्ट URL के साथ प्रकाशन की तिथि और इलेक्ट्रॉनिक्स साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत पेन ड्राइव की फाइल के नाम का विवरण दिया गया है । साक्ष्य सूची अनुसार समाचार पत्र राज एक्सप्रेस के समाचार के संबंध में यूआरएल नहीं दिया गया है, प्रकाशन तिथि एवं फाइल का नाम नहीं दिया गया है, अन्य साक्ष्य के रूप में न्यूज़ एजेंसी ANI , श्री प्रभु राम चौधरी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट एवं श्री जगदीश देवड़ा के ट्विटर अकाउंट से कथित रूप से प्राप्त वीडियो फाइल संलग्न की गई है । इसके अतिरिक्त श्री सचिन बिरला को इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा विधान सभा निर्वाचन में अभ्यर्थी के रूप में खड़े किये जाने संबंधी प्ररूप A-B संलग्न किया गया है ।

4. अर्जी के साथ में संलग्न की गई पेन ड्राइव खोलने पर श्री सचिन बिरला के नाम से एक फोल्डर है, जिसमें अंदर News और Tweets नाम के दो फाइल फोल्डर हैं, न्यूज़ फोल्डर के अंतर्गत 9 फाइल हैं, जिनका विवरण दस्तावेज सूची के न्यूज़ कॉलम की कंडिका 1 लगायत 9 में दिया गया है और इन्हीं प्रिंटआउट पर अर्जीदार द्वारा हस्ताक्षर करते हुए संलग्न किया गया है परंतु इन अनुलग्नकों का सत्यापन नहीं है। पेन ड्राइव के दूसरे फोल्डर Tweets में 7 फाइलें हैं, 6 फाइल इमेज फाइलें हैं जिनमें 4 फाइल अर्जीदार के अनुसार न्यूज़ एजेंसी ANI द्वारा ट्विट किये गये छायाचित्र हैं, पांचवी फाइल अर्जीदार के अनुसार श्री प्रभु राम चौधरी द्वारा किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट है एवं छठवीं फाइल श्री जगदीश देवड़ा के ट्विटर अकाउंट से लिया गया छायाचित्र है, सातवीं फाइल एक वीडियो है जिसमें अर्जीदार के अभिवचन अनुसार सचिन बिरला माननीय मुख्यमंत्री के साथ नजर आ रहे है परंतु उक्त वीडियो आवाज रहित है ।

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5. अर्जी के साथ संलग्न दस्तावेज के अवलोकन से स्पष्ट है कि समस्त दस्तावेज इंटरनेट में उपलब्ध विभिन्न स्रोतों से डाउनलोड किये गये हैं लेकिन इन दस्तावेजों की प्रमाणिकता स्थापित करने के लिए धारा 65 - बी साक्ष्य अधिनियम का प्रमाण पत्र संलग्न नहीं किया गया है । समाचार पत्रों की खबरें जिनका प्रिंटआउट अर्जी के साथ सूची अनुसार प्रस्तुत किया गया है उनका पृथक से कोई सत्यापन नियम -1986 के नियम 6 (7 ) के अनुपालन में अर्जीदार द्वारा प्रथम दृष्ट्या नहीं किया गया है ।

6. अर्जी के प्रचलनशीलता के संबंध में अर्जीदार को एवं उनके अधिवक्ता श्री जेपी धनोपिया को दिनांक 24/03/2022 को सुना गया एवं ग्राह्यता पर नियम 1986 के नियम 6 के अनुपालन के संबंध में प्रश्न किए गए, जिस पर तर्क हेतु उनके द्वारा समय लिया गया । प्रकरण में उक्त तिथि पर उठाए गए तीन बिंदुओं के संबंध में तर्क हेतु दिनांक 30/03/2022 को नियत किया गया ।

7. दिनांक 30-3-2022 को अर्जीदार एवं उनके विद्वान अधिवक्ता को विस्तृत रूप से सुना गया। अर्जीदार के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क किया गया कि नियम 1986 के नियम 6 का अनुपालन " directory" है "mandatory " नहीं है और उक्त नियम प्रक्रियात्मक है जिसके अनुपालन के लिए अभियोजनों के संशोधन के समक्ष कड़ा रुख़ नहीं अपनाया जा सकता । अर्जी के सत्यापन और उसके साथ संलग्न शपथ पत्र में विरोधाभास के सम्बंध में तर्क किया गया कि अर्जीदार को अर्जी के चरण 1 लगायत 12 निजी जानकारी एवं ज्ञान पर सत्य है जो विभिन्न समाचार पत्रों से प्राप्त हुई है जिनकी प्रति अर्जी के साथ संलग्न है । साक्ष्य अधिनियम की धारा 65- B के अनुपालन के सम्बंध में यह तर्क किया गया की समाचार पत्रों की भौतिक पेपर कटिंग लगायी गयी है, अतः उनके लिए धारा 65-B साक्ष्य अधिनियम के certificate की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम न्यायदृष्टांत के अनुसार वह आवश्यक नहीं है परंतु उनके द्वारा न्याय दृष्टांत का विवरण प्रस्तुत नहीं किया गया है। अर्जीदार के अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि क्योंकि विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार का श्री सचिन बिरला ने खंडन नहीं किया है अतः समाचार पत्र में प्रकाशित खबर ग्राह्य योग्य है । अर्जीदार एवं उनके विद्वान अधिवक्ता ने अर्जी की सुनवाई के दौरान विधान सभा के विधिक सलाहकार एवं अधिवक्ता की उपस्थिति एवं अर्जी की ग्राह्यता के सम्बंध में उनसे अभिमत लेने पर भी आपत्ति और तर्क किए ।

8. अर्जीदार एवं उसके अधिवक्ता द्वारा विधान सभा के विधिक सलाहकार श्री प्रकाश उपाध्याय , अधिवक्ता के उपस्थित रहने एवं अध्यक्ष द्वार अर्जी पर उनका विधिक अभिमत लेने पर इस आधार पर आपत्ति की कि उनके अभिमत के आधार पर अध्यक्ष द्वारा अर्जी की ग्रह्यता पर आपत्ति ली गई जिस कारण श्री उपाध्याय को "सह- निर्णायक " का स्थान दिया गया है, यह तर्क पूर्णतः निराधार है और विधि द्वारा स्थापित न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत है । विधान सभा के विधिक सलाहकार ने अपना अभिमत दिनांक 24/03/2022 की सुनवाई के दौरान अर्जी की मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 5 अप्रैल 2022

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ग्राह्यता के सम्बंध में, विधि की स्थिति को स्पष्ट करने के उद्देश्य से अपना अभिमत मेरे समक्ष रखा जिस पर अंतिम निर्णय मेरे द्वारा अर्जीदार और उनके विद्वान अधिवक्ता के तर्क के उपरांत अपेक्षित किया गया । विधान सभा के विधिक सलाहकार ने सुनवाई के दौरान अध्यक्ष के विधिक सहायक के रूप में कार्य किया है, ना की "सह- निर्णायक" का जो विधि अनुरूप है क्योंकि विधान सभा के विधिक सलाहकार ने अर्जी में किसी पक्षकार की तरफ़ से नहीं बल्कि अपना निष्पक्ष अभिमत अर्जी के विधि अनुरूप निष्पादन में सहायता के उद्देश्य से दिया था । माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने State of Punjab and another vs Brijeshwar Singh Chahal ' में निष्पक्ष विधि अधिकारी/ सलाहकार के महत्व को निम्न्न शब्दों में व्यक्त किया है: -

"38. While dealing with the nature of office the Government Counsel hold , this Court in Johri Mal case [ State of U.P. v . Johri Mal, (2004) 4 SCC 714 ] declared that the State Government Counsel holds an office of great importance . They are not only officers of the court but also the representatives of the State and that courts repose a great deal of confidence in them . They are supposed to render independent , fearless and non -partisan views before the court irrespective of the result of litigation which may ensue... "2

अतः अर्जीदार द्वारा इस सम्बंध में की गई आपत्ति भी विधि अनुरूप ना होने से ग्राह्य योग्य नहीं है ।

9. मध्यप्रदेश विधानसभा सदस्य ( दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1986 का नियम 6 लगायत 8 किसी भी सदस्य की भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता ग्रस्त होने के संबंध में घोषणा किए जाने के लिए प्रक्रिया निर्धारित करता है । नियम 6 ( 1 ) के तहत कोई भी सदस्य दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता से ग्रसित हो गया है कि नहीं इस प्रश्न का निर्देश निरर्हता नियम -1986 के उपबंध के अनुसार ही दिया जा सकेगा अन्यथा नहीं । नियम 6(2) के अंतर्गत किसी सदस्य के संबंध में कोई अर्जी किसी अन्य सदस्य द्वारा अध्यक्ष को लिखित रूप से दिया जाना उपबंधित है, वर्तमान अर्जी विधायक श्री रवि रमेश जोशी जो कि विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र 185 जिला खरगोन से निर्वाचित हैं, प्रस्तुत की गई है अतः नियम 6(2) का पालन किए जाने पर कोई विवाद नहीं है । नियम 6(3 ) इस अर्जी पर लागू नहीं होता क्योंकि वह अध्यक्ष के स्वयं की निरर्हता से सम्बंधित है । नियम 6(4 ) अर्जी देने वाले सदस्य से यह अपेक्षित करता है कि किसी सदस्य के संबंध में अर्जी देने के पूर्व अर्जीदार अपना समाधान करेगा की यह विश्वास करने के युक्तियुक्त आधार हैं कि प्रश्न उठता है कि क्या यह सदस्य दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता से ग्रसित हो गया है या नहीं ?

(2016 )6 SCC 1

2This extract is taken from State of Punjab v . Brijeshwar Singh Chahal , (2016)6 SCC 1 : (2016) 2 SCC (CRI ) 475 :(2016) 3 SCC (Civ ) 1 : (2016) 2 SCC (L& S ) 1 : 2016 SCC OnLine SC 285 at page 28 310 (3)

मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 5 अप्रैल 2022

10. विचारणीय प्रश्न यह है की क्या अर्जी नियम 6(4 ) का अनुपालन करती है या नहीं ? अर्जी में किए गए अभिवचन एवं उसके साथ संलग्न दस्तावेज से स्पष्ट है कि अर्जीदार द्वारा यह अर्जी सिर्फ तथाकथित समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार एवं सोशल मीडिया में प्रचारित अप्रमाणित खबरों के आधार पर प्रस्तुत की गई है, अर्जीदार द्वारा इन प्रकाशित खबरों की सत्यता के संबंध में न तो स्वयं के द्वारा किसी भी तरह के सत्यापन करने का लेख किया गया है और ना ही खबरों के प्रकाशन और उसकी सत्यता के संबंध में समाचार प्रकाशित करने वाले समाचार पत्रों से उनके प्रमाणिकता के संबंध में कोई पत्राचार/प्रमाण पत्र प्राप्त. किया है । अर्जी में किए गए अभिवचन एवं मौखिक तथा लिखित तर्क के माध्यम से अर्जीदार द्वारा यह कहा गया है कि श्री सचिन बिरला के खंडवा लोक सभा उपचुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का समाचार विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है जो कि श्री सचिन बिरला द्वारा अपने राजनैतिक दल की सदस्यता को स्वेच्छा से त्याग किए जाने का प्रमाण है । अतः स्वीकृत तौर पर समाचार पत्रों एवं सोशल मीडिया में प्रकाशित खबरों की सत्यता के संबंध में अर्जीदार द्वारा स्वयं कोई समाधान नहीं किया गया है। अर्जी के साथ समाचार को प्रकाशित करने वाले रिपोर्टर/पत्रकार का ना तो नाम है और ना ही इस सम्बंध में कोई शपथ पत्र प्रस्तुत किया गया है, जिससे उक्त समाचार पत्र में प्रकाशित खबर को प्रथम दृष्टया प्रमाणित मानकर साक्ष्य के रूप में ग्रहण किया जा सके। विधि का सुस्थापित सिद्धांत है कि समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार अनुश्रुत साक्ष्य की श्रेणी में आता है, अतः जब तक प्रकाशित समाचार का विधि अनुसार प्रमाणीकरण ना किया जावे, इस आधार पर समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के आधार पर विधिक प्रक्रिया प्रारंभ नहीं की जा सकती है । सामंत एवं बालकृष्ण विरुद्ध जॉर्ज फर्नांडिस के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्णीत किया है कि समाचार पत्र में प्रकाशित खबरें साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं की जा सकती जब तक संबंधित रिपोर्टर से सत्यता के संबंध में समाधान ना किया जावे, उक्त न्याय दृष्टांत को एहसान विरुद्ध भजनलाल एवं अन्य में अनुसरण करते हुए अभिनिर्णीत किया है कि समाचार पत्र में प्रकाशित खबरों के सत्यापन के बिना अप्रमाणित खबर को प्रथम दृष्टया सत्य मानते हुए साक्ष्य के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता, उक्त न्याय सिद्धांत को माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा W.P. (CIVIL) No.4129 / 2022 अंजलि भरद्वाज विरुद्ध CPIO में अपने निर्णय दिनांक 30/03/2022 में यह स्पष्ट किया है की विधि का स्थापित सिद्धांत है कि न्यूज़पेपर रिपोर्ट साक्ष्य नहीं हो सकते, समाचार में प्रकाशित अप्रमाणित खबरों के आधार पर विधिक प्रक्रिया के अंतर्गत संज्ञान नहीं लिया जा सकता है ।

11. प्रस्तुत प्रकरण में अर्जीदार द्वारा प्रकाशित समाचार की सत्यता के संबंध में समाधान नहीं किया है, इसके अतिरिक्त इलेक्ट्रानिक साक्ष्य के संबंध में धारा 65- बी भारतीय साक्ष्य अधिनियम का प्रमाण पत्र संलग्न नहीं किया है। यद्यपि तर्क के दौरान अर्जीदार के अधिवक्ता द्वारा तर्क किया गया है कि 65- B का प्रमाण पत्र आवश्यक नहीं है, परंतु मेरे मत में निरर्हता अर्जी के साथ संलग्न 3(1969) 3 SCC 238

(1993 ) 3 SCC 151 मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 5 अप्रैल 2022

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इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज 65- बी साक्ष्य अधिनियम के प्रमाण पत्र के अभाव में ग्राह्य योग्य नहीं है, क्योंकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B के अनुसार " electronic record" दस्तावेज (document) के रूप में तभी मान्य है जब वह साक्ष्य अधिनियम की धारा 65- B में निर्देशित शर्तों का पालन करता हो । अतः धारा 65B(4) में निर्दिष्ट प्रमाण पत्र के अभाव में प्रस्तुत अर्जी के साथ संलग्न " electronic record " दस्तावेज़ी साक्ष्य के रूप ग्रहण नहीं किया जा सकता । एक निर्वाचित सदस्य के निरर्हता जैसी गम्भीर अर्जी के साथ संलग्न pen- drive में electronic evidence के ना तो स्रोत का विवरण है और ना ही उनको विधि अनुसार प्रमाणित करने का प्रयास ही अर्जीदार द्वारा किया गया है । माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushamraos के प्रकरण में इलेक्ट्रानिक् साक्ष्य के संबंध में विस्तृत दिशानिर्देश जारी किया गया है जिसका पालन अर्जी में नहीं किया गया है । यद्यपि अर्जीदार के विद्वान अधिवक्ता के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम फ़ैसले का आधार लेकर तर्क किया गया है की अगर इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सम्बंधित व्यक्ति के आधिपत्य में न हो तब धारा -65 बी के प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती है, लिखित तर्क में यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय में नवीनतम न्याय दृष्टांत का Vague Reference किया गया है, जिसका नाम , अन्य विवरण नहीं दिया गया है, अतः स्वीकार्य योग्य नहीं है । लेकिन जिस विधि एवं सिद्धांत का तर्क के दौरान सहारा लिया गया है, सम्भवतः अर्जीदार के विद्वान अधिवक्ता माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Safi Mohd v State of AP ' के प्रकरण पर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं लेकिन उक्त सिद्धांत की वैधता के संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वयं ही शंका व्यक्त की गई और अर्जुन पंडित राव (supra) के प्रकरण में Overrule कर दिया गया । अतः इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए 65- B का प्रमाण पत्र अत्यंत आवश्यक है जो की वैधता एवं प्रमाणिकता का प्रथम दृष्ट्या समाधान करता है।

12. अर्जीदार द्वारा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से प्रकाशित समाचार के संबंध में 65 - B का प्रमाण पत्र ना देना ना सिर्फ साक्ष्य अधिनियम बल्कि निरर्हता नियम 1986 के नियम 6(5) का भी पालन नहीं किया जाना प्रतीत होता है। अर्जी के साथ प्रस्तुत किए गए अनुलग्नक दस्तावेज साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं जो की न्यूज़ रिपोर्ट है। स्वीकृत तौर पर न्यूज़ रिपोर्ट का प्रकाशन अर्जीदार द्वारा नहीं किया गया है ना ही अर्जीदार खंडवा उपचुनाव की उक्त सभा में स्वयं उपस्थित था , अतः अर्जीदार द्वारा समाचार पत्रों एवं सोशल मीडिया की छाया चित्र के आधार पर अर्जी प्रस्तुत की है, अन्य स्रोत और व्यक्तियों से प्राप्त जानकारी " निजी ज्ञान" की परिधि में नहीं आती है, निरर्हता नियम 1986 नियम 6(5) (ख) के तहत यदि अर्जीदार किसी व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी पर निर्भर करता है तो वह उन व्यक्तियों का नाम पते सहित विवरण जानकारी का सारांश संलग्न करेगा। प्रस्तुत प्रकरण में समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के संबंध में पत्रकार का

$(2020) 7 SCC 1

6 (2018 ) 5 SCC 311 310(5)

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 5 अप्रैल 2022

नाम, उसका पता, सोशल मीडिया में प्रकाशित या प्रसारित छाया चित्रों के संबंध में व्यक्ति के नाम , पते के संबंध में कोई अभिवचन नहीं किए गए हैं, अतः इस नियम का भी अनुपालन होना नहीं पाया जाता है ।

13. नियम 1986 के नियम 6 के उपनियम 6 के अनुसार अर्जीदार द्वारा अर्जी पर किए गए अभिवचनों का सत्यापन सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश -6 नियम -15 के प्रावधान के अंतर्गत करने की अपेक्षा है । यद्यपि अर्जी का सत्यापन तो किया गया है लेकिन सत्यापन सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 6 नियम -15 के प्रावधान अनुरूप नहीं है । सत्यापन के अनुसार अर्जी के चरण क्रमांक 1 लगायत 5 तथा 9 लगायत 12 तक के वर्णित तथ्य अर्जीदार की निजी जानकारी के आधार पर एवं आवेदन के साथ संलग्न दस्तावेजों एवं अभिलेखों के आधार पर सही एवं सत्य होने का कहा गया है , परन्तु यदि अर्जी की कण्डिका 3 लगायत 5 का अवलोकन किया जाय , तो इससे स्पष्ट है कि उपरोक्त अभिवचन अर्जीदार अपनी निजी जानकारी के आधार पर नहीं दे रहा है , बल्कि वह समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार के आधार पर दे रहा है । अतः सत्यापन के अभिवचन , अर्जी में दिए गए अभिवचनों से मेल नहीं खाते हैं । इसके अतिरिक्त अर्जी में दिए गए सत्यापन के अनुसार अर्जी के चरण 1 लगायत 5 तथा 9 लगायत 12 तक के वर्णित तथ्य निजी जानकारी सिविल दस्तावेजों एवं अभिलेखों के आधार पर तथा 1 , 6 लगायत 9 में पूर्ण / आंशिक रूप से वर्णित विधिक सलाहकार के आधार पर सत्य होना बताया गया है । परंतु सत्यापन के समर्थन में अर्जी के समस्त चरण जो कि चरण क्रमांक 1 लगायत 12 तक में वर्णित तथ्य अर्जीदार की निजी जानकारी तथा ज्ञान के आधार पर तथा संलग्न दस्तावेजों के आधार पर सही एवं सत्य होना बताया गया है । अतः शपथ पत्र में किए गए अभिवचन अर्जी के सत्यापन में किए गए अभिवचनों से मेल नहीं खाते हैं , जो कि एक सारवान त्रुटि है ।

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा स्टेट बैंक ऑफ बॉम्बे , विरूद्ध पुरुषोत्म नाईक AIR , 1952 SC 317 में यह प्रतिपादित किया है कि शपथ पत्र में किए गए अभिवचन शपथ पत्र की कण्डिकाओं से मेल नहीं खाते हैं तथा शपथ पत्र त्रुटिपूर्ण है और ग्राह्य नहीं किया जा सकता है । इसी तरह बलदेव सिंह बनाम सिंदरपाल सिंह ( 2007 ) 1 SCC 341 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया है कि सत्यापन में शपथकर्ता को स्पष्ट करने की अपेक्षा है कि कौन सी कण्डिका उसके व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर और कौन सी कण्डिका उसकी अर्जी के आधार पर आधारित है और यह कहा गया है कि तथ्यात्मक अभिवचन व्यक्तिगत ज्ञान और प्राप्त जानकारियां दोनों के आधार पर कभी भी आधारित नहीं हो सकते हैं । अर्जी की कण्डिका 1 लगायत 5 और शपथ पत्र एवं उसके सत्यापन में किए गए अभिवचनों से स्पष्ट है कि अर्जीदार ने उक्त शपथ पत्र और अर्जी का सत्यापन विधि अनुसार नहीं किया है । अतः अर्जी इस आधार पर प्रचलनीय नहीं है । निरर्हता नियम 1986 के नियम 6 के उपनियम 7 अर्जीदार से अपेक्षा करता है कि अर्जी के प्रत्येक उपबंध पर भी अर्जीदार के हस्ताक्षर होंगे और उसे अर्जी मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 5 अप्रैल 2022

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समान रीति से ही सत्यापित किया जायेगा । प्रस्तुत अर्जी के साथ उपबंध के रूप में समाचार पत्रों के URL एवं Printout संलग्न किए गए हैं । उक्त संलग्नकों में अर्जीदार के हस्ताक्षर तो हैं , लेकिन इन उपबंधों को अर्जी के समान सत्यापित नहीं किया गया है ।

इस तरह अर्जीदार द्वारा प्रस्तुत अर्जी में नियम 1986 के नियम 6(6) एवं 6(7) का भी अनुपालन नहीं किया गया है।

14. अर्जीदार के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है की नियम 6 का पालन "directory " है लेकिन नियम 1986 के नियम 7 (2 ) के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि नियम 6 " mandatory " है और नियम 6 का अनुपालन नहीं किये जाने की स्थिति में अर्जी निरस्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर के द्वारा Laxman Jaideo Satpathy v Union of India ' के प्रकरण में नियम -1986 के नियम 6 एवं 7 की व्याख्या की गई और यह निर्णय किया गया है कि नियम 1986 के नियम 7 (1 )(2) आज्ञापक प्रावधान है, नियम 6 के उपबंध का अर्जीदार पालन नहीं करता है, तो अध्यक्ष के पास अर्जी खारिज करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है, माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से नियम 7(2 ) की व्याख्या करते हुए ऐसा निर्णय किया है कि अध्यक्ष को अर्जी प्रस्तुत होने के बाद में आई हुई त्रुटियों को सुधार करने की अनुमति देने का क्षेत्राधिकार नहीं है उक्त प्रकरण में तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा अर्जी में आई कमी को अर्जीदार द्वारा सुधार करने की अनुमति दी थी जिसको माननीय उच्च न्यायालय द्वारा क्षेत्राधिकार से परे मानते हुए निर्णय पारित किया की नियम 6 का शब्दशः अनुपालन न होने पर नियम 7 ( 2) के तहत अर्जी ख़ारिज करने के अलावा अध्यक्ष के पास कोई विकल्प नहीं है। माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय के संदर्भित अंश नियमानुसार हैं:

" 7. The State of Madhya Pradesh framed the Rules known as Madhya Pradesh Legislative Assembly Members (Disqualification on Ground of Defection ) Rules , 1986 for disposing of such kind of petitions . Detailed rules have been framed in order to adjudicate such rights of the MLAs in the event they change parties . We need not go into the question of scheme of the rules because we are only concerned with regard to procedure for filing petition and its adjudication . Rule 6 of the Rules of 1986 deals with the manner in which a petition is to be filed. Rule 6 of the Rules of 1986 reads thus :-

"6. (1 ) No reference of any question as to whether a member has become subject to disqualification under the Tenth Schedule shall be made except by a petition in relation to such member made in accordance with the provisions of this rule .

(2 A petition in relation to a member may be made in writing to the Speaker by any other member ;

7 1997 (2) MPLJ 346 310 (7)

मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 5 अप्रैल 2022

Provided that a petition in relation to the Speaker shall be addressed to the Secretary;

(3) The Secretary shall:

(a) as soon as may be after the receipt of a petition under the proviso to sub- rule (2) make a report in respect thereof to the House and

(b) as soon as may be after the House has elected a member in pursuance of the proviso to sub -paragraph ( 1 ) of paragraph 6 of the Tenth Schedule place the etition before such member .

(4) Before making any petition in relation to any member, the petitioner shall satisfy himself that there are reasonable grounds for believing that a question has arisen as to whether such member has become subject to disqualification under the Tenth Schedule .

(5) Every petition;

(a) shall contain a concise statement of the material facts on which the petitioner relies ; and

(b) shall be accompanied by copies of the documentary evidence , if any, on which the petitioner relies and where the petitioner relies on any information furnished to him by any person , a statement containing the names and addresses of such persons and the gist of such information as furnished by each such person .

(6) Every petition shall be signed by the petitioner and verified in the manner laid down in the Code of Civil Procedure , 1908 ( 5 of 1908) , for the verification of pleadings .

(7) Every annexure to the petition shall also be signed by the petitioner and verified in the same manner as the petition."

Rule.7 of the Rules of 1986 is also relevant here . Rule 7 reads as under:-

"7. (1 ) On receipt of petition under Rule 6 , the Speaker shall consider whether the petition complies with the requirements of that rule .

(2) If the petition does not comply with the requirements of rule 6 , the Speaker shall dismiss the petition and intimate the petitioner accordingly .

(3) If the petition complies with the requirements of rule 6, the Speaker shall cause copies of the petition and of the annexures thereto to be forwarded ,-

(a) to the member in relation to whom the petition has been made ; and मध्यप्रदेश राजपत्र, दिनांक 5 अप्रैल 2022

310 ( 8 )

(b) where such member belongs to any legislature party and such petition has not been made by the leader thereof also to such leader, and such member or leader shall , within seven days of the receipt of such copies , or within such further period as the speaker may for sufficient cause allow, forward his comments in writing thereon to the speaker.

(4) After considering the comments , if any , in relation to the petition , received under sub- rule (3 ) within the period allowed (whether originally or on extension under that sub - rule ), if he is satisfied , having regard to the nature and circumstances of the case that it is necessary or expedient so to do, refer the petition to the Committee for making a preliminary inquiry and submitting a report to him .

(5) The Speaker shall , as soon as may be after referring a petition to the Committee under sub - rule (4) , intimate the petitioner accordingly and make an announcement with respect to such reference in the House or , if the House is not then in session , cause the information as to the reference to be published in the Bulletin .

(6) Where the speaker makes a reference under rule (4 ) to the Committee , he shall proceed to determine the question as soon as may be after receipt of the report from the Committee.

(7) The procedure which shall be followed by the Speaker for determining any question and the procedure which shall be followed by the Committee for the purpose of making a preliminary inquiry under sub -rule (4 ) shall be , so far as may be , the same as the procedure for enquiry and determination by the Committee of any question as to breach of privilege of the House by a member, and neither the Speaker nor the Committee shall come to any finding that a member has become subject to disqualification under the Tenth Schedule without affording a reasonable opportunity to such member to represent his case and to be heard in person .

(8) The provisions of sub - rules ( 1 ) to (7) shall apply with respect to petition in relation to the Speaker as they apply with respect to a petition in relation to any other member and for this purpose, reference to the Speaker in these sub - rules shall be construed as including reference to the Member elected by the House under the proviso to sub -paragraph ( 1 ) of paragraph 6 of the Tenth Schedule . "

Rule 8 of the Rules of 1986 deals with recording of the conclusions of the Speaker or the member under the proviso to paragraph 6 of Tenth Schedule in the order dismissing the petition , or declaring that the member in relation to whom the petition has been made has become subject to disqualification under the Tenth Schedule.

8. We have gone through the order passed by the Speaker dated 1st May, 1991. By his detailed order dated 1st May, 1991 , the Speaker has found that all the six petitioners had become disqualified as per Tenth Schedule and accordingly he has given this declaration . Shri Tankha, learned counsel for the petitioners submits that the order of the Speaker is without jurisdiction for the simple reason that the procedures prescribed under Rule 6 of the Rules of 1986 in regard to presentation of a petition has not been followed. Sub- rule (6) of Rule 6 of the Rules of 1986 says that every petition - shall be signed by the petitioner and verified in the manner laid down in the Code of Civil Procedure , 1908 for the verification ofpleadings . It is also pointed out that on the petition being filed under Rule 6 , the Speaker shall consider whether the petition complies with the requirements of that rule , vide sub - rule ( 1 ) of Rule 7 of the Rules of 1986. Sub - rule (2 ) of Rule 7 says that if the petition does not comply with the requirements of Rule 6 , the Speaker shall dismiss the petition and intimate the petitioner accordingly . Learned counsel for the petitioners submits that the petition which was filed before the Speaker did not 310( 9)

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contain a proper verification as required under sub - rule ( 6) of Rule 6 which requires that the petition shall be duly signed and verified according to the provisions of Code of Civil Procedure , 1908. It is submitted by the learned counsel that the petition which was filed initially with the Speaker did not contain any due verification as per the Civil Procedure Code . This is also apparent from the order passed by the Speaker . When this preliminary objection was raised before the Speaker , then it was observed by the Speaker that he got the petition properly verified. The Speaker observed as follows:

//

"19 .

Yet, since Rule 6 (7) is mandatory , that every paragraph or annexures should be verified by the complainant, hence this was got done by the applicant (complaint) . Now , there remains no strength on this technical objection . Looking to this , the applications (complaints ) filed by Smt . Neha Singh and Shri Shailendra Pradhan under rule (6) as a whole are treated to be according to Rules ."

From this , it appears that the original petition which was filed before the Speaker did not contain due verification as required under sub -rule (6) of Rule 6 of the Rules of 1986. For not presenting a properly constituted petition before the Speaker , effect has been provided in sub - rule (2 ) of Rule 7 of the Rules of 1986 that in such a situation the Speaker shall dismiss the petition and intimate the petitioner accordingly. The effect of non- compliance of sub- rule (6) of Rule 6 of the Rules of 1986 is that the petition would have to be rejected under sub - rule (2 ) of Rule 7 by the Speaker. Rule 7 (2 ) of the Rules of 1986 leaves no room for discretion to the Speaker to get the incompetent and incomplete petition corrected during the course of hearing. If the petition filed before the Speaker is incompetent, then it cannot be made competent by amending or correcting the same . Since the requirement of filing a correct and competent petition is a mandatory provision and effect of non - compliance thereof has been made mandatory, there was no option to the Speaker to permit any amendment at a later stage . The Speaker had no jurisdiction to permit amendment in the petition so as to bring it in order as required by Rule 6(6) of the Rules of 1986. The only option which was available to the Speaker was to dismiss the incompetent petition as there was no rule permitting any amendment in the so called defective petition .

9. In the present case , as is clear from the order of the Speaker himself, the initial petition filed by Smt . Neha Singh and Shailendra Pradhan were defective and the Speaker permitted both the petitioners to amend the petitions in order to bring them in line with sub - rule (6) of Rule 6 of the Rules of 1986 proceeded to decide the same on merits . This approach of the Speaker was absolutely illegal and without jurisdiction . The Speaker had no jurisdiction to permit any kind of correction or modification in the petition. If the petitions were not filed in terms of sub - rule ( 6) of Rule 6 of the Rules of 1986, there was no option left to the Speaker but to dismiss the petitions . Unfortunately the Speaker permitted the amendment which was not warranted in law . The Speaker should have dismissed the petitions on the preliminary objection filed by petitioners and not to have addressed himself on the merit of the petitions . Hence , the order passed by the Speaker is illegal and deserves to be quashed. "

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है की अर्जीदार द्वारा मध्यप्रदेश विधान सभा सदस्य ( दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1986 के नियम 6 (4) , नियम 6(5)(ख) , नियम 6(6) एवं नियम 6 (7) का अनुपालन नहीं किया गया है अतः अर्जी नियम 7(2 ) के अंतर्गत प्रचलन योग्य नहीं है ।

15. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची की कंडिका 6 सहपठित नियम- 1986 के नियम 6 के अनुसार विधान सभा अध्यक्ष की भूमिका एक स्वतंत्र निर्णायक की होती है और यह अपेक्षा नहीं की जाती की वह अर्जी में किए गए अभिवचन और अप्रमाणिक साक्ष्य की प्रमाणिकता स्थापित करने हेतु अन्वेषण करे । अर्जी के समर्थन में प्रस्तुत साक्ष्य को प्रमाणित करने का भार अर्जीदार पर ही है।

* This extract is taken from Laxman Jaideo Satpathy v . Union Of India, 1997 SCC OnLine MP 86 : (1997) 2 MPLJ 346 : AIR 1998 MP 185 at page 352 मध्यप्रदेश राजपत्र , दिनांक 5 अप्रैल 2022

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16. नियम-1986 के नियम 6(4) के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि विधि की यह मंशा है की अर्जी पर कार्यवाही के पूर्व अध्यक्ष यह समाधान कर ले की अर्जीदार द्वारा पूर्ण ज़िम्मेदारी एवं गम्भीरता के साथ अर्जी प्रस्तुत की गई है और विधि की यह व्याख्या उचित भी है क्योंकि जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि के विरुद्ध कार्यवाही अत्यंत सतही और अनुश्रित साक्ष्य के आधार पर प्रारम्भ नहीं की जा सकती । माननीय उच्चतम न्यायालय ने Zunjarrao BhiKaji Nagarkar v . Union of India' में एक कर्मचारी के विरुद्ध दीर्घ शास्ति अधिरोपित करने के लिए विभागीय जाँच संस्थित करने के विभागीय फ़ैसले को चुनौती देने की याचिका में यह अभिनिर्णीत किया की "vague or indefinite " सूचना और " suspicion " के आधार पर विभागीय जाँच प्रारंभ नहीं की जा सकती और इस आधार पर प्रारम्भ की गयी सम्पूर्ण विभागीय जाँच को निरस्त कर दिया। अगर संविधान के अनुच्छेद 310 के तहत महामहिम राष्ट्रपति/ राज्यपाल के प्रसाद पर्यंत (pleasure of President/Governer ) तक कार्य करने वाले अधिकारी के विरूद्ध " vague or indefinite " सूचना और " suspicion " के आधार पर विभागीय जाँच प्रारम्भ की जा सकती तो इस प्रकार के साक्ष्य के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 172/190 के तहत सुरक्षित कार्यकाल वाले सदस्य के निरर्हता से ग्रस्त होने की कार्यवाही नहीं प्रारम्भ की जा सकती । अपने राजनैतिक दल की सदस्यता त्यागने का ना तो कोई पत्र है और ना ही सदन के अंदर उनके आचरण से यह आभास होता है की उन्होंने अपने राजनैतिक दल कि सदस्यता को त्याग दिया है । सदन के बाहर श्री सचिन बिरला द्वारा किए गए कृत्य सम्बंधित राजनैतिक दल के आंतरिक अनुशासन का विषय वस्तु तो हो सकते हैं लेकिन विधान सभा की सदस्यता की निरर्हता का आधार नहीं हो सकता है।

उक्त समस्त विवेचना एवं विश्लेषणों से स्पष्ट है कि अर्जीदार द्वारा प्रस्तुत अर्जी मध्यप्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता ) नियम , 1986 के अंतर्गत प्रचलन योग्य नहीं है। अतः इस अर्जी को प्रचलन योग्य नहीं होने से नियम 7 (2) के अधीन अर्जी को एतद् द्वारा निरस्तकिया गया है.

ए.पी.सिंह, प्रमुख सचिव,

मध्यप्रदेश विधान सभा.

9 ( 1999 ) 7 SCC 409

नियंत्रक, शासकीय मुद्रण तथा लेखन सामग्री , मध्यप्रदेश द्वारा शासकीय केन्द्रीय मुद्रणालय, भोपाल से मुद्रित तथा प्रकाशित- 2022.

Cite this issue. Madhya Pradesh Gazette, Government of Madhya Pradesh, 05 April 2022. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.madhya.2022-04-05.155.Extraordinary/. Archive identifier in.gazette.madhya.2022-04-05.155.Extraordinary.