RNI No. MAHBIL /2009/31730
महाराष्ट्र शासन राजपत्र
असाधारण भाग सात
वर्ष ४, अंक २८(३)] मंगळवार, नोव्हेंबर २०, २०१८/कर्ातिक २९, शके १९४० [पृष्ठे ५, किंमत : रुपये ४७.००
असाधारण क्रमांक ५८
प्राधिकृत प्रकाशन
अध्यादेश, विधेयके व अधिनियम यांचा हिंदी अनुवाद (देवनागरी लिपी)
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महाराष्ट्र विधानसभा में दिनांक २० नवम्बर २०१८ ई. को पुर:स्थापित निम्न विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा नियम ११७ के अधीन प्रकाशन किया जाता है :—
L. A. BILL No. LXVII OF 2018.
A BILL
FURTHER TO AMEND THE INDIAN PENAL CODE AND THE CODE OF CRIMINAL PROCEDURE, 1973, IN THEIR APPLICATION TO THE
STATE OF MAHARSHTRA.
विधानसभा का विधेयक क्रमांक ६७, सन् २०१८ ।
महाराष्ट्र राज्य में उसकी अपनी प्रयुक्ित में भारतीय दण्ड संहिता और दण्ड प्रक्रिया संहिता,
१९७३ में अधिकतर संशोधन करने संबंधी विधेयक।
क्योंकि इसमें आगे र्दशित प्रयोजनों के लिये, महाराष्ट्र राज्य में उसकी अपनी प्रयुक्ित में भारतीय दण्ड संहिता और दण्ड प्रक्रिया संहिता, १९७३ में अधिकतर संशोधन करना इष्टकर है ; इसलिए, भारत गणराज्य के उनहत्तरवें वर्ष में, एतद्द्वारा, निम्न अधिनियम अधिनियमित किया जाता है, अर्थात् :----
अध्याय एक
प्रारंभिक
संक्षिप्त नाम। १. (१) यह अधिनियम भारतीय दण्ड संहिता और दण्ड प्रक्रिया संहिता (महाराष्ट्र संशोधन) अधिनियम, २०१८ कहलाए।
(१) २ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २० २०१८/कर्ातिक २९, शके १९४० अध्याय दो
भारतीय दण्ड संहिता में संशोधन ।
२. महाराष्ट्र राज्य में उसकी अपनी प्रयुक्ित में भारतीय दण्ड संहिता जिसे इसमें आगे, इस अध्याय में, " दण्ड संहिता " कहा गया है की धारा २७२ में, " दोनों में से किसी भी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह सन् १८६० का अधि. क्र. ४५ की धारा २७२ में संशोधन ।
सन् १८६० का ४५। महीने तक बढ़ायी जा सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जो एक हजार रुपयों तक बढ़ाया जा सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा " शब्दोंे के स्थान में, निम्न रखा जायेगा, अर्थात : -----
" आजीवन कारावास से दण्डित किया जायेगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा :
परन्तु, न्यायालय न्यायनिर्णय में उल्लिखित किये जानेवाले पर्याप्त और विशेष कारणों के लिए कारावास का दण्डादेश जो आजीवन कारावास से कम है तो अधिरोपित कर सकेगा। "।
३. दण्ड संहिता की धारा २७३ में, " दोनो में से किसी भी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह महीने सन् १८६० का अधि. क्र. ४५ की धारा २७३ में संशोधन ।
तक बढ़ायी जा सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जो एक हजार रुपयों तक बढ़ाया जा सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा " शब्दों के स्थान में, निम्न रखा जायेगा, अर्थात् :----
" आजीवन कारावास से दण्डित किया जायेगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा :
परन्तु, न्यायालय न्यायनिर्णय में उल्लिखित किये जानेवाले पर्याप्त और विशेष कारणों के लिए कारावास का दण्डादेश जो आजीवन कारावास से कम है तो अधिरोपित कर सकेगा। "।
४. दण्ड संहिता की धारा २७४ में, " दोनो में से किसी भी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह सन् १८६० का अधि. क्र. ४५ की धारा २७४ में संशोधन ।
महीने तक बढायी जा सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जो एक हजार रुपयों तक बढ़ाया जा सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा " शब्दों के स्थान में, निम्न रखा जायेगा, अर्थात् :-----
" आजीवन कारावास से दण्डित किया जायेगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा :
परन्तु, न्यायालय के न्यायनिर्णय में उल्लिखित किये जानेवाले पर्याप्त और विशेष कारणों के लिए कारावास का दण्डादेश जो आजीवन कारावास से कम है तो अधिरोपित कर सकेगा । "
५. दण्ड संहिता की धारा २७५ में, " दोनो में से किसी भी भांति के कारावास के जिसकी अवधि छह सन् १८६० का अधि. क्र. ४५ की धारा २७५ संशोधन ।
महीने तक बढ़ायी जा सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जो एक हजार रुपयों तक बढ़ाया जा सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा " शब्दों के स्थान में, निम्न रखा जायेगा, अर्थात् :-----
" आजीवन कारावास से दण्डित किया जायेगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा :
परन्तु, न्यायालय, न्यायनिर्णय में उल्लिखित किये जानेवाले पर्याप्त और विशेष कारणों के लिए कारावास का दण्डादेश जो आजीवन कारावास से कम है तो अधिरोपित कर सकेंगी । "।
६. दण्ड संहिता की धारा २७६ में, " दोनो में से किसी भी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह सन् १८६० का अधि. क्र. ४५ की धारा २७६ में संशोधन ।
महीने तक बढ़ायी जा सकेगी, या ऐसे जुर्माने से जो एक हजार रुपयों तक बढ़ाया जा सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा " शब्दों के स्थान में, निम्न रखा जायेगा, अर्थात् :---
" आजीवन कारावास से दण्डित किया जायेगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा :
परन्तु, न्यायालय, न्यायनिर्णय में उल्लिखित किये जानेवाले पर्याप्त और विशेष कारणों के लिए कारावास का दण्डादेश जो आजीवन कारावास से कम है तो अधिरोपित कर सकेगा।"।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २० २०१८/कर्ातिक २९, शके १९४० ३ अध्याय तीन
दण्ड प्रक्रिया संहिता, १९७३ में संशोधन।
सन् १९७४ का २।
७. महाराष्ट्र राज्य में उसकी अपनी प्रयुक्ित में दण्ड प्रक्रिया संहिता, १९७३ की प्रथम अनुसूची में, " एक-भारतीय दण्ड संहिता के अधीन अपराध " शीर्षक के अधीन धारा २७२, २७३, २७४, २७५ और २७६ से संबंधित प्रविष्टियों के स्थान में निम्न प्रविष्टियाँ रखी जायेगी, अर्थात् :----
सन् १९७४ का अधि. क्र. २ की प्रथम अनुसूची में संशोधन। "२७२. विक्रय के लिए आशयित खाद्य या पेय आजीवन संज्ञेन अजमानतीय सेशन
न्यायालय जिसमें वह का ऐसा अपमिश्रण जिसमें कारावास वह अपायकर बन जाए। और
जुर्माना।
२७३. खाद्य और पेय के रुप में किसी खाद्य यथोक्त यथोक्त यथोक्त यथोक्त और पेय को, यह जानते हुए कि वह आपायकर है, बेचना।
२७४. विक्रय के लिए आशयित किसी औषधी यथोक्त यथोक्त यथोक्त यथोक्त या भेषजीय र्िनमित ऐसा अपमिश्रण जिससे उसकी प्रभावकरिता कम हो जाए या उसकी क्रिया बदल जाए या वह अपायकर हो जाए।
२७५. किसी औषधी या भेषजीय र्िनमिति को जिसके यथोक्त यथोक्त यथोक्त यथोक्त बारे में ज्ञात है कि वह अपमिश्रित है बेचने की प्रस्थापना करना या औषधालय से देना
२७६. किसी औषधी या भेषजीय र्िनमिति को भिन्न यथोक्त यथोक्त यथोक्त यथोक्त.".
औषधि या भेषजीय र्िनमिति के रुप में जानते हुए, बेचना या औषधालय से देना। ४ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २० २०१८/कर्ातिक २९, शके १९४०
उद्देश्यों और कारणों का व्यक्तव्य ।
दूध और अन्य असुरक्षित खाद्य पदार्थों में अपमिश्रण साथ ही साथ औषधियों में अपमिश्रण की व्यवसाय से आम लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा रहा हो रहा है और अंत में, लोगों के स्वास्थ्य की समग्र गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।
२. भारतीय दण्ड संहिता (सन् १८६० का ४५) की धाराएँ २७२ से २७६, खाद्य पदार्थ, पेय, या औषघि विर्िनमित पदार्थों के अपमिश्रण, जो उन्हें हानिकारक बनाते हैं और उनके विक्रय से संबंधित अपराधों के लिये उपबंध करती हैं। उक्त अपराधों के लिये उक्त धाराअों में, या तो अवधि जो छह महिने तक बढायी जा सकेगी के कारावास या, जुर्माना जो एक हजार रुपयों तक बढ़ाया जा सके, या दोनो से दण्डीत करना मुहैय्या किया गया हैं।
उक्त अपराध असंज्ञेय हैं और धारा २७४ के अधीन किसी औषधि या चिकित्सा विर्िनमित पदार्थ में अपमिश्रण से संबंधित अपराधों को छोडकर, धाराएँ २७२, २७३, २७५ और २७६ के अधीन अपराध जमानतीय हैं।
३. खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, २००६ (सन् २००६ का ३४) (जिसे इसमें आगे '' खाद्य सुरक्षा अधिनियम '' कहा गया हैं) की धारा ५९ उपरोक्त विर्िनदिष्ट भारतीय दण्ड संहिता के दाण्डिक उपबंधों के अतिरिक्त, मानवी उपभोग के लिये किन्ही खाद्य पदार्थ के विक्रय या भण्डारण के विनिर्माण या विक्रय या वितरण या आयात करने, जो सुरक्षित नहीं हैं, उनके द्वारा होनेवाले खतरे की गंभीरता के आधार पर, विभिन्न दण्ड के लिये भी उपबंध करती हैं। उक्त धारा ५९ के अधीन उपबंधित अधिकतम दण्ड, आजीवन कारावास हैं और तद्धीन अपराध संज्ञेय हैं।
औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, १९४० (सन् १९४० का २३) (जिसे इसमें आगे '' औषधि अधिनियम '' कहा गया हैं) की धारा २७ भी, किन्ही औषधियों, जो अपमिश्रित या नकली हैं के विक्रय या वितरण के लिये विनिर्माण या विक्रय या भण्डारण या वितरण के लिये दण्ड का उपबंध करती हैं। औषधि अधिनियम की उक्त धारा २७ के अधीन, दस वर्षों की अवधि के लिये कारावास से आजीवन कारावास और जुर्माने का उपबंध किया गया हैं और उक्त धारा २० के अधीन अपराध संज्ञेय हैं।
४. उस प्रकार, छह महिने का कारावास और जुर्माने की सौम्य शास्ति अंर्तविष्ट होनेवाली भारतीय दण्ड संहिता और आजीवन कारावास का सख्त दण्ड अंर्तविष्ट होनेवाले खाद्य पदार्थ अधिनियम और औषधि अधिनियम में खाद्य पदार्थ और औषधियों के अपमिश्रण से संबंधित अपराधों में अत्याधिक विभिन्नता विद्यमान हैं।
कई घटनाअों में पुलिस द्वारा छापा मारने के दौरान यह भी देखा गया हैं कि, अपमिश्रित या असुरक्षित खाद्य के अपराधों साथ-ही-साथ अपमिश्रित या नकली औषधियों के अपराध की शिनाख्त की गई है, जिसके संबंध में भारतीय दण्ड संहिता की उक्त धाराएँ २७२ से २७६ के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट रजिस्ट्रीकृत हैं। ऐसे मामलों में, पर्याप्त और प्रभावी अन्वेषण और समय से सबूतों के संग्रहण के प्रयोजन के लिये अभियुक्त को गिरफ्तार या निरोध करना आवश्यक हैं। भारतीय दण्ड संहिता की उक्त धाराअों के अधीन उक्त अपराध असंज्ञेय और जमानतीय होने के कारण, बडे पैमाने पर लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करनेवाले ऐसे महवपूर्ण मामलों में पुलिस साथ-ही-साथ खाद्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा प्रभावी अन्वेषण में कठिनाईयों का सामना करना पडता हैं। इसलिये, अपमिश्रित दूध या अन्य असुरक्षित खाद्य पदार्थों के साथ-ही-साथ अपमिश्रित और नकली औषधियों के विनिर्माण या विक्रय का व्यवसाय करनेवालो के विरुद्ध समान रुप से रोकथाम करने के लिये भारतीय दण्ड संहिता के अधीन उक्त अपराधों के लिये भी सक्त शास्ति करने की तत्काल आवश्यकता हैं।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २० २०१८/कर्ातिक २९, शके १९४० ५ तथापि, सरकार, भारतीय दण्ड संहिता की धाराएँ २७२ से २७६ तक और दण्ड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूचि में, तद्धीन उपबंधित आजीवन कारावास और जुर्माने को बढ़ाने के लिये और उक्त अपराधों को संज्ञेय और अजमानतीय बनाने के लिये, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार द्वारा किये गये संशोधनों की तर्ज पर, संशोधन करना इष्टकर समझती हैं।
५. प्रस्तुत विधेयक का आशय उपरोक्त उद्देश्यों को प्राप्त करना हैं।
मुंबई,
देवेंद्र फडणवीस,
दिनांकित १९ नवम्बर २०१८।
मुख्यमंत्री।
(यथार्थ अनुवाद), हर्षवर्धन जाधव, भाषा संचालक, महाराष्ट्र राज्य।
विधान भवन, मुंबई, दिनांकित २० नवम्बर २०१८।
डॉ. अनंत कळसे, प्रधान सचिव, महाराष्ट्र विधानसभा।