महाराष्ट्र शासन राजपत्र
असाधारण भाग सात
वर्ष ४, अंक ३१ ] गुरुवार, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० [पृष्ठे १५, किंमत : रुपये ४७.००
असाधारण क्रमांक ६४
प्राधिकृत प्रकाशन
अध्यादेश, विधेयके व अधिनियम यांचा हिंदी अनुवाद (देवनागरी लिपी)
महाराष्ट्र विधानमंडळ सचिवालय
महाराष्ट्र विधानसभा में दिनांक २९ नवम्बर, २०१८ ई. को. पुर:स्थापित निम्न विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा नियम ११७ के अधीन प्रकाशन किया जाता है :----
L. A. BILL No. LXXVIII OF 2018.
A BILL
TO PROVIDE FOR RESERVATION OF SEATS FOR ADMISSION IN EDUCATIONAL INSTITUTIONS IN THE STATE AND FOR RESERVATION OF POSTS FOR APPOINTMENTS IN PUBLIC SERVICES AND POSTS UNDER THE STATE, TO SOCIALLY AND EDUCATIONALLY BACKWARD CLASSES OF CITIZENS (SEBC) IN THE STATE OF MAHARASHTRA FOR THEIR ADVANCEMENT AND FOR MATTERS CONNECTED THEREWITH OR INCIDENTAL THERETO.
विधानसभा का विधेयक क्रमांक ७८, सन् २०१८।
महाराष्ट्र राज्य में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों के वर्गों (एसइबीसी) को
उनकी उन्नति के लिये राज्य की शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश के लिए सीटों का आरक्षण और
राज्य के अधीन लोकसेवा में नियुक्तियों और पदों में आरक्षण के लिये और तत्संबंधी या उससे
आनुषंगिक मामलों का उपबंध करने संबंधी विधेयक।
क्योंकि महाराष्ट्र राज्य में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों के वर्गों (एसइबीसी) की उन्नति के लिए राज्य में शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश के लिये सीटों का आरक्षण और राज्य के अधीन लोक
(१)
भाग सात ६४----१महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० २ सेवाअों में नियुक्तियों और पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने और तत्संबंधी या उसके आनुषंगिक मामलों का उपबंध करना इष्टकर है ; इसलिए, भारत गणराज्य के उनहतरवें वर्ष में, एतद्द्वारा, निम्न अधिनियम अधिनियमित किया जाता है :---
संक्षिप्त नाम औऱ प्रारम्भण।
१. (१) यह अधिनियम, महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसइबीसी) के लिए (राज्य में शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश तथा राज्य के अधीन लोक सेवाअों में नियुक्तियों और पदों के लिए सीटों का) आरक्षण अधिनियम, २०१८ कहलाए।
(२) यह राजपत्र में इस अधिनियम के प्रकाशन के दिनांक से प्रवृत्त होगा ।
परिभाषाएँ। २. (१) इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,------
(क) शैक्षणिक संस्थाअों के प्रवेश के संबंध में "प्रवेश प्राधिकरण" का तात्पर्य, विशिष्ट शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश देने के लिए जिम्मेवार शैक्षणिक संस्थाअों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण करने की शक्तियाँ रखनेवाले प्राधिकरण से है ;
(ख) लोक सेवाअों तथा पदों के संबंध में, "नियुक्ति प्राधिकरण" का तात्पर्य, ऐसी सेवाअों या पदों की नियुक्ति करने के लिए सशक्त किये गये प्राधिकरण से है ;
(ग) "सक्षम प्राधिकारी" का तात्पर्य, धारा ६ के अधीन नियुक्त किये गये सक्षम प्राधिकारी से है ;
(घ) "शैक्षणिक संस्था" का जिसमें, महाराष्ट्र राज्य में शैक्षणिक संस्था सम्मिलित है जो सरकार द्वारा स्वामित्व और नियंत्रणाधीन है जिसमें भारत के संविधान के अनुच्छेद ३० के खण्ड (१) में र्िनदिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाअों से अन्य निजी शैक्षणिक संस्थाअों समेत, चाहे वह राज्य द्वारा सहायता प्राप्त हो या न हो, सुसंगत महाराष्ट्र अधिनियमों द्वारा या के अधीन स्थापित विश्वविद्यालय समेत सरकार से सहायता अनुदान प्राप्त करनेवाले से है ;
स्पष्टीकरण.---इस खंड के प्रयोजनों कि लिए, "निजी शैक्षणिक संस्थाअों " अभिव्यक्ति का तात्पर्य, उन संस्थाअों से है जिन्हें या तो इस अधिनियम में प्रवृत्त होने के पूर्व या उसके पश्चात्, सरकार द्वारा रियायती दरों या किसी अन्य र्आथिक रियायतों में सरकारी भूमि के प्ररूप में सहायता दी जाती है या जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त, अनुज्ञा प्राप्त, पर्यवेक्षणाधीन या नियंत्रणाधीन है ;
(ङ) "स्थापना" का तात्पर्य, तत्समय प्रवृत्त राज्य विधान मंडल के किसी अधिनियम के अधीन गठित किसी सरकारी कार्यालय या स्थानीय प्राधिकरण या सांविधिक प्राधिकरण या विश्वविद्यालय या कंपनी, या निगम या सहकारी संस्था जिसमें, सरकार या किसी सरकारी सहायता प्राप्त किसी संस्था द्वारा पूंजी शेयर धारण किया गया है से है।
स्पष्टीकरण.---इस खंड के प्रयोजनों कि लिए, "सरकारी सहायता प्राप्त संस्थाअों " की अभिव्यक्ति में संस्थाअों या उद्योगों जिन्हें या तो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने से पूर्व या के पश्चात्, सरकार द्वारा रियायती दरों या अन्य किसी र्आथिक रियायतों में सरकारी भूमि के प्ररूप में सहायता दी जाती है या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त, अनुज्ञप्ति प्राप्त, पर्यवेक्षणाधीन या नियंत्रणाधीन है वह भी सम्मिलित होगा ;
(च) "सरकार" या "राज्य सरकार" का तात्पर्य, महाराष्ट्र सरकार से है।
(छ) "विहित" का तात्पर्य, इस अधिनियम के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा विहित से है ;
(ज) "लोक सेवाअों तथा पदों " का तात्पर्य, राज्य के कार्यों के साथ जुड़े हुए सेवाअों और पदों से है तथा इसमें सेवाअों और पदों समेत,-----
(एक) स्थानीय प्राधिकऱण ;
महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० ३(दो) महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम, १९६० के अधीन स्थापित सहकारी संस्था जिसमें सरकार शेयर धारक है ;
(तीन) केंद्र या राज्य अधिनियम के द्वारा या के अधीन स्थापित बोर्ड या निगम या सांविधिक निकाय जो सरकार द्वारा स्वामित्व और नियंत्रणाधीन है या कंपनी अधिनियम, १९५६ या कंपनी अधिनियम, २०१३ में परिभाषित सरकारी कंपनी है ;
सन् १९६१ का महा. २४। सन् १९५६ का १। सन् २०१३ का १८।
(चार) सरकार द्वारा स्वामित्व और नियंत्रणाधीन शैक्षणिक संस्था जो सरकार समेत महाराष्ट्र अधिनियम द्वारा या के अधीन स्थापित विश्वविद्यालय से सहायता अनुदान प्राप्त करती है ; और
(पाँच) इस अधिनियम के प्रारंभण के दिनांक पर, सरकारी आदेशों द्वारा जो आरक्षण लागू था और जो उप-खंड (एक) से (चार) के अधीन आवृत्त नहीं है के विषय में कोई अन्य स्थापना शामिल होंगी ;
(झ) "आरक्षण" का तात्पर्य, राज्य में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों के वर्गोंे (एसईबीसी) के सदस्यों के लिए शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश के लिए सीटों और लोक सेवाअों में नियुक्तियों और पदों के लिए आरक्षण से है।
सन् २०१५ का महा. १।
(त्र) "सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों के वर्गों (एसइबीसी)" जिसमें महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछडे प्रवर्ग (इएसबीसी) (राज्य में शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश या राज्य के अधीन लोक सेवाअों में नियुक्तियाँ या पदों के लिये सीटों का) आरक्षण अधिनियम, २०१४ के अनुसरण में, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े प्रवर्ग (इएसबीसी) के रूप में घोषित किया गया मराठा समुदाय सम्मिलित है ;
सन् २००४ का महा. ८।
(२) इस अधिनियम में प्रयुक्त किन्तु परिभाषित न किये गये शब्दों और अभिव्यक्तियों, का वही अर्थ होगा, जो महाराष्ट्र राज्य लोक सेवा आयोग [अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, निरधिसूचित जनजाति (विमुक्त जाति), खानाबदोश जनजाति, विशेष पिछड़े प्रवर्ग और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण ] अधिनियम, २००१ में क्रमश: उनके समनुदेशित अर्थ से होगा।
लागू होना। ३. (१) यह अधिनियम निम्न को छोड़कर, राज्य के अधीन लोक सेवाअों में की जानेवाली सभी नियुक्तियों और पदों की, सीधी भरती को लागू होगा,-----
(क) चिकित्सा, तकनीकी और शैक्षणिक क्षेत्रों में उच्च विशेषित पदों ;
(ख) स्थानांतरण या प्रतिनियुक्ति द्वारा भरे जानेवाले पदों ;
(ग) पैंतालीस दिनों की अवधि से कम न हो अस्थायी नियुक्तियाँ ; और
(घ) किसी संवर्ग या श्रेणी में जो एकल (एकाकी) पद है।
(२) यह अधिनियम, भारत के संविधान के अनुच्छेद ३० के खंड (१) में र्िनदिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाअों से अन्य निजी शैक्षणिक संस्थाअों चाहे वह राज्य द्वारा सहायता प्राप्त हो या न हो, शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश के लिये लागू होगा।
(३) राज्य सरकार, क्रमश: धारा २ के खंड (घ) और (च) के स्पष्टीकरण में यथा उपबंधित किसी सहायता देने के लिए किसी शैक्षणिक संस्था या किसी स्थापना के साथ करार करने या नवीकरण करते समय ऐसी शैक्षणिक संस्था या स्थापना के द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अनुपालन के लिए शर्त सम्मिलित करेगी। सन् २००४ का महा. ८। सन् २००६ का महा. ३०।
(४) संदेह के निराकरण के लिए एतद्द्वारा, यह घोषित किया जाता है कि इस अधिनियम की कोई भी बात महाराष्ट्र राज्य लोक सेवाअों (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, निरधिसूचित जनजाति (विमुक्त जाति), खानाबदोश, जनजाति, विशेष पिछड़े प्रवर्ग और अन्य पिछड़े वर्गों के लिये आरक्षण) अधिनियम, २००१ और महाराष्ट्र निजी वृत्तिक शिक्षा संस्था [ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, निरधिसूचित जनजाति (विमुक्त जाति), खानाबदोश जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के प्रवेश के लिए सीटों का आरक्षण ] अधिनियम, २००६ के अधीन अन्य पिछड़े वर्गों को उपबंधित आरक्षण प्रभावित नहीं होगा । भाग सात ६४------१अमहाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० ४ ४. (१) किसी न्यायालय या किसी अन्य प्राधिकरण के किसी न्यायनिर्णय, डिक्री या के आदेश में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन,----
(क) भारत के संविधान के अनुच्छेद ३० के खण्ड (१) में र्िनदिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाअों से अन्य निजी शैक्षणिक संस्थाअों समेत, शैक्षणिक संस्थाअों में, चाहे वह सरकार द्वारा सहायता प्राप्त हो या न हो, कुल सीटों के सोलह प्रतिशत; और
(ख) राज्य के अधीन लोकसेवाअों में सीधी भर्ती में कुल नियुक्तियाँ और पदों के सोलह प्रतिशत, मराठा समुदाय समेत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के लिए स्वतंत्र रूप से आरक्षित रखे जायेंगे :
सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े प्रवर्ग (एसईबीसी) के लिए शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश के लिए राज्य के अधीन लोकसेवा में नियुक्ति और पदों के लिए सीटोंका आरक्षण।
परंतु, उपयर्ुक्त आरक्षण, भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अधीन इस निमित्त ९ जून २०१४ को जारी की गई अधिसूचना के अनुसार, राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति उम्मीदवारों के पक्ष में आरक्षित पदों के लिए लागू नहीं होगा।
(२) नवोन्नत वर्ग का सिद्धांत इस अधिनियम के अधीन सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) को लागू होगा और इस अधिनियम के अधीन आरक्षण उन व्यक्त्तियों को लागू होगा जो निम्न नवोन्नत वर्ग के है ।
स्पष्टीकरण.----इस उप-धारा के प्रयोजनों के लिए, "नवोन्नत वर्ग" की अभिव्यक्ति का तात्पर्य, सरकार के सामाजिक न्याय तथा विशेष सहायता विभाग द्वारा, जो व्यक्ति नवोन्नत वर्ग में आते हैं उसे इस निमित्त समय- समय पर, जारी साधारण या विशेष आदेशों द्वारा यथा घोषित नवोन्नत वर्ग से है।
५. धारा ४ में अंर्तविष्ट किसी भी बात के होते हुए भी, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गोर्ं आरक्षण प्रभावित नहीं होगा।
(एसईबीसी) से संबंधित छात्रों या सदस्यों के दावे, लोक सेवाअों में अनारक्षित सीटें, और नियुक्तियाँ तथा पदों के लिए जो जिसे गुणागुण के आधार पर भरे जाएँगे, वह भी विचार विमर्श में लिये जायेंगे, और जहाँ ऐसे प्रवर्गों से संबंधित छात्र या सदस्य जिसेे गुणागुण के आधार पर चयनित किये गए हैं, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के लिए आरक्षित सीटों और नियुक्तियाँ की संख्या किसी भी मार्ग से प्रभावित नहीं होंगी।
६. (१) सरकार, राजपत्र में, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों और तद्धीन बनाए गये सक्षम प्राधिकारी।
नियमों को कार्यान्वित करने के प्रयोजनों के लिए ऐसी अधिसूचना में विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे क्षेत्र के लिये सक्षम प्राधिकारी के रूप में जिला समाज कल्याण अधिकारी की श्रेणी से अनिम्न श्रेणी के किसी अधिकारी को नियुक्त करेगी।
(२) सक्षम प्राधिकारी, विहित किया जाए ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कृत्यों का अनुपालन करेगा। ७. (१) यदि किसी भर्ती वर्ष के संबंध में, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े प्रवर्गों (एसईबीसी) आरक्षित रिक्ितयों का अग्रनयन।
के व्यक्तियों के लिए कोई आरक्षित रिक्ति भरी जानी बाकी है तो, ऐसी रिक्ति सीधी भर्ती के मामले में पाँच वर्षों तक अग्रनीत की जायेगी :
परंतु, इस अधिनियम के प्रारंभण के दिनांक को पदों को भरने के संबंध में यदि कोई सरकारी आदेश, संकल्प, परिपत्र और कार्यालयीन ज्ञापन प्रवृत्त है तब, वही सरकार द्वारा उपान्तरित या प्रतिसंत किये जाने तक, प्रवृत्त बने रहेंगे :
महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० ५परंतु यह और भी कि, यदि मंजूर पदों को हर प्रत्येक आरक्षित प्रवर्ग के लिये कम से कम एक पद आबंटित करना पर्याप्त नहीं होता है तब, आरक्षित पद, इस निमित्त विहित या उपांतरित किये गये सरकारी रोस्टर आदेशों या नियमों के अनुसरण में, मूल चक्रानुक्रम द्वारा लागू करके भरे जायेंगे ।
(२) जब, कोई रिक्ति उप-धारा (१) में यथा उपबंधित अग्रनयीत की गई है तो, वह उस भर्ती वर्ष में जिसमें वह अग्रनयीत की गई है, संबंधित व्यक्तियों के वर्गों के लिये आरक्षित रिक्तियों के कोटे के सामने नहीं गिनी जायेगी :
परंतु, नियुक्ति प्राधिकारी, किसी भी समय, ऐसी अपूरित रिक्तियों को भरने के लिये, विशेष भर्ती मुहिम शुरू कर सकता है और यदि ऐसी रिक्तियाँ ऐसी विशेष भर्ती मुहिम शुरू करने के बाद भी भरी नहीं जाती है तो, जैसा कि सरकार द्वारा विहित किया जाए ऐसी रीत्या में भरी जायेंगी।
८. (१) सरकार, लिखित में आदेश द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के दायित्व के साथ, प्रत्येक प्रवेश प्राधिकारी या नियुक्ति प्राधिकारी या ऐसे प्राधिकारी के अधीन किसी अधिकारी को सौंपेगी।
अधिनियम का अनुपालन करने का दायित्व और शक्तियाँ । (२) सरकार, उसी रीत्या में, प्रवेश प्राधिकारी या नियुक्ति प्राधिकारी या अधिकारी को ऐसी शक्तियाँ या प्राधिकार विनिहित कर सकेगी, जो ऐसी प्राधिकारी या अधिकारी को समनुदेशित किये गये ऐसे कर्तव्य का प्रभावी रुप से निर्वहन करने के लिये, ऐसे प्राधिकारी या अधिकारी को आवश्यक हो।
शास्ति । ९. (१) कर्तव्य या दायित्व सुपुर्द किया गया कोई प्रवेश प्राधिकारी या नियुक्ति प्राधिकारी या अधिकारी या कर्मचारी जो जानबूझकर इस अधिनियम के प्रयोजन के उल्लंघन करता है या उसे विफल करने के आशय से कार्य करता है, तो दोषसिद्धि पर, नब्बे दिनों तक बढ़ाये जा सकने वाले कारावास या पाँच हजार रुपये तक बढ़ाये जा सकनेवाले जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जायेगा।
(२) कोई भी न्यायालय सरकार द्वारा इस निमित्त सरकार या प्राधिकृत अधिकारी की पूर्व मंजूरी को छोड़कर, इस धारा के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान नहींं करेगा।
अभिलेख मंगाने की शक्ति । १०. जब सरकार के ध्यान में यह बात आती है या ध्यान में लायी जाती है कि, सामाजिक और शैक्षणिक रुप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) से संबंधित किसी व्यक्ति पर प्रवेश प्राधिकारी या नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों या तद्धीन र्िनमित नियमों या इस निमित्त जारी सरकारी आदेशों के अनुपालन के फलस्वरुप, प्रतिकूल प्रभाव पडता है तो वह, किसी प्रवेश प्राधिकारी या नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा ऐसा अभिलेख मंगा सकेगा और ऐसा समुचित आदेश पारित कर सकेगा जो वह उचित समझे।
चयन समिति में प्रतिनिधित्व । ११. सरकार, आदेश द्वारा, लोक सेवाअों और पदों की नियुक्ति के लिये चयन किये गये व्यक्तियों के प्रयोजनार्थ, चयन, जाँच और विभाग समिति में सामाजिक और शैक्षणिक रुप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) से संबंधित अधिकारियों के नामनिर्देशन का उपबंध कर सकेगी।
१२. इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में किये गये कोई भी प्रवेश या नियुक्तियाँ शून्य होंगी। अनियमित प्रवेश तथा नियुक्तियाँ शून्य होंगी । १३. धारा ६ के अधीन नियुक्त सक्षम प्राधिकारी, भारतीय दंड संहिता की धारा २१ के अथार्ंतर्गत लोक सन् १८६० का ४५ । सेवक समझा जाएगा।
सक्षम प्राधिकारी लोक सेवक होगा । सन् १८६० का ४५ ।
सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण । १४. इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या आदेशों के अधीन सद्भावपूर्वक कृत या किए जाने के लिए आशयित किसी भी बात के लिए, सक्षम प्राधिकारी या उसके अधिकारियों के विरुद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाहियाँ नहीं की जाएँगी।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० ६ १५. (१) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित नियम बनाने की शक्ति। करने के लिए नियम बना सकेगी।
(२) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, उसके बनाए जाने के पश्चात्, यथा संभव शीघ्र, राज्य विधान मंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिनों की अवधि के लिए रखा जाएगा, जो कि चाहे एक सत्र में हो या दो या अधिक अनुक्रमिक सत्रों में हो, और यदि जिसमें यह रखा गया है उस सत्र में या ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व, दोनों सदन किसी नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत होते हों या दोनों सदन इस बात के लिए सहमत होते हों कि नियम न बनाया जाये, और उस आशय का अपना विनिश्चिय, राजपत्र में अधिसूचित करते हैं तो नियम, ऐसे विनिश्चिय की अधिसूचना के प्रकाशन के दिनांक से, ऐसे परिर्वतित रूप में ही प्रभावी होगा, या, यथास्थिति, निष्प्रभाव हो जायेगा ; तथापि, ऐसा कोई परिवर्तन या बातिलीकरण उस नियम के अधीन पहले की गई या किये जाने से छोड़ी गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।
व्यावृत्ति। १६. (१) इस अधिनियम के उपबंध, ऐसे मामलों को लागू नहीं होंगे जिसमें, चयन प्रक्रिया इस अधिनियम के प्रारम्भण से पहले ही शुरू की गई है, और ऐसे मामलों का निपटान विधि के उपबंधों और सरकारी आदेशों के अनुसार उसी प्रकार किया जायेगा जैसा कि वे ऐसे प्रारम्भण के पूर्व स्थित थे।
स्पष्टीकरण.---इस धारा के प्रयोजनों के लिये, चयन प्रक्रिया शुरू की गई समझी जायेगी, जहाँ सुसंगत सेवा नियमों के अधीन,------
(एक) केवल लिखित परीक्षा या साक्षात्कार के आधार पर भर्ती की जानी है और ऐसी लिखित परीक्षा या, यथास्थिति, साक्षात्कार शुरू हो चुका है; या
(दो) लिखित परीक्षा और साक्षात्कार दोनों के आधार पर भर्ती की जानी है और ऐसी लिखित परीक्षा शुरू हो चुकी है।
(२) इस अधिनियम के उपबंध इस अधिनियम के प्रारम्भण से पूर्व शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेशों और जिसमें प्रवेश प्रक्रिया पहले से ही शुरू की गई है ऐसे मामलों को लागू नहीं होंगे और ऐसे मामले ऐसे प्रारम्भण के पूर्व स्थित विधि के उपबंधों और सरकारी आदेशों के अनुसार बरते जायेंगे।
स्पष्टीकरण.----इस धारा के प्रयोजन के लिये, प्रवेश प्रक्रिया शुरू की गई समझी जायेगी जहाँ,-----
(एक) किसी प्रवेश परीक्षा के आधार पर प्रवेश दिया जाना है, और ऐसी प्रवेश परीक्षा के लिये प्रक्रिया, शुरू हो चुकी है ; या
(दो) प्रवेश परीक्षा के आधार पर से अन्य प्रवेश के मामले में आवेदन पत्र भरने के लिये अंतिम दिनांक व्यपगत हो चुका है।
कठिनाई के निराकरण की शक्ति ।
१७. (१) इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावित करने में यदि कोई कठिनाई उद्भूत होती है, तो सरकार, जैसा अवसर उद्भूत हो, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हो ऐसी बात कर सकेगी जो उसे कठिनाई के निराकरण के प्रयोजन के लिए आवश्यक या इष्टकर प्रतीत हो:
परंतु, ऐसा कोई भी आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभण के दिनांक से दो वर्षों की अवधि के अवसान के पश्चात् नहीं बनाया जायेगा।
(२) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया प्रत्येक आदेश, उसके बनाये जाने के पश्चात्, यथासंभव शीघ्र राज्य विधान मंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।
निरसन और व्यावृत्ति।
सन् २०१५ का महा. १ । १८. (१) इस अधिनियम के प्रारम्भण पर महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक और सामाजिक रुप से पिछड़े प्रवर्ग (ईएसबीसी) के लिए (राज्य की शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश तथा राज्य के अधीन लोकसेवाअों में नियुक्तियों या पदों के लिए सीटों का) आरक्षण अधिनियम, २०१४ एतद्द्वारा, निरसित किया जाता है।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० ७ (२) उक्त अधिनियम के निरसन, प्रभावी नहीं होंगे,----
(एक) इस प्रकार निरसित अधिनियम के अधीन जारी किसी नियम, अधिसूचना, आदेश, परिपत्रक या निदेशन समेत कृत कोई बात या की गई कोई कार्यवाही या कृत या करने के लिए तात्र्पयित कोई बात या कार्यवाही ; या
(दो) इस प्रकार निरसित अधिनियम के अधीन की गई किसी नियुक्ितयाँ शुरू की गई किसी चयन प्रक्रिया शैक्षणिक संस्था में किये गये प्रवेश, किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या र्अजित, प्रोद्भूत या उपगत दायित्व ; या
(तीन) इस प्रकार निरसित अधिनियम के अधीन किसी उल्लंघन के संबंध में उपगत किसी शास्ति, अधिहरण या दण्ड ; या
(चार) इस अधिनियम के प्रारम्भण के पूर्व, किसी जाँच, विधिक कार्यवाहियाँ या उपाय जारी या प्रवृत्त रखा जा सकेगा, मानो कि यह अधिनियम अधिनियमित नहीं हुआ है।
सन् २०१५ का महा. १ ।
(पाँच) शैक्षणिक और सामाजिक रुप से पिछड़े प्रवर्ग (इएसबीसी) अधिनियम, २०१४ के लिये महाराष्ट्र राज्य (राज्य में शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश और राज्य के अधीन लोक सेवाअों में नियुक्तियाँ या पदों के लिये सीटों का) आरक्षण के उपबंधों के अनुसरण में की गई किसी घोषणा और ऐसी घोषणा प्रवृत्त जारी रहेगी मानो कि, इस अधिनियम के अधीन की गई है ।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० ८
उद्देश्यों और कारणों का वक्तव्य
महाराष्ट्र राज्य, पददलित समाज से व्यक्तियों का उन्नयन करनेवाला अग्रणी राज्य है और पिछड़े वर्गों के नागरिकों के सामाजिक और शैक्षणिक उन्नयन के लिये, राज्य में शैक्षणिक संस्थाओ में प्रवेश और राज्य के अधीन लोकसेवाओ में नियुक्ितयाँ या पदों के लिये आरक्षण की नीति, महाराष्ट्र राज्य के निर्माण से ही महाराष्ट्र राज्य में कार्यन्वित है।
२. भारत की आरक्षण संकल्पना के जनक के रूप में जानेवाले राजश्री. शाहू महाराज ने १९०२ वर्ष में सार्वजनिक रोजगार में सीटों का आरक्षण करने के लिए प्रारंभिक दो अधिसूचनाएँ जारी की गई थी। सन् १९०२ की उक्त अधिसूचनाअों में मराठा समुदाय को पिछड़े वर्ग के रूप में आरक्षण मुहैय्या किया गया था। बम्बई सरकार द्वारा जारी किये गये दिनांक २३ अप्रैल, १९४२ के संकल्प में, लगभग २२८ समुदायों को मध्यमवर्ग और पिछड़े वर्ग के रूप में घोषित किया गया था जिसमें उसकी संलग्न सूची में क्रम संख्या १४९ पर मराठा समुदाय को दर्शाया गया है। महाराष्ट्र राज्य में, मराठा समुदाय संख्यात्मक रूप से बडे पैमाने पर है, किन्तु, राज्य की शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश के अवसर कम होने के कारण और राज्य की अधीन की लोक सेवाअों में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के कारण समुदाय बडे पैमाने में शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा रहा है।
३. भारत संविधान के अनुच्छेद १५ का खण्ड (४), किसी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिकों के उन्नयन के लिए कोई विशेष उपबंध बनाने के लिए राज्य को समर्थ बनाता है और उक्त अनुच्छेद १५ का खण्ड (५), किसी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिकों के उन्नयन के लिए जहाँ तक ऐसे विशेष उपबंध संविधान के अनुच्छेद ३० का खण्ड (१) में र्िनदिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाअों से अन्य निजी शैक्षणिक संस्थाअों चाहे वह राज्य द्वारा सहायता प्राप्त या न हो समेत शैक्षणिक संस्थाअों में उनके प्रवेश से संबंधित हो, विधि द्वारा किसी विशेष, उपबंध करने के लिये राज्य को समर्थ करता है। संविधान के अनुच्छेद १६ का खण्ड (४) यह राज्य की राय में राज्य के अधीन की सेवाअों में प्रर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं है ऐसे पिछड़े वर्ग के नागरिकों के पक्ष में नियुक्ितयाँ या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने के लिए राज्य को समर्थ करता है। ४. महाराष्ट्र राज्य ने महाराष्ट्र राज्य लोकसेवा [अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, निरधिसूचित जनजाति (विमुक्त जाति), खानाबदोश जनजाति, विशेष पिछड़े प्रवर्ग और अन्य पिछड़े प्रवर्ग के लिये आरक्षण] अधिनियम, २००१ (सन् २००४ का महा.८) अधिनियमित किया है। राणे समिति द्वारा संग्रहित सामग्री और डाटा के आधार पर, महाराष्ट्र सरकार का यह राय थी कि, मराठा समुदाय यह सामाजिक, शैक्षणिक और र्आथिक रूप से पिछड़े थे और उनका राज्य के अधीन की लोक सेवाअों में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व था और उनके उन्नयन के लिए विशेष उपबंध करने की आवश्यकता थी। राज्य सरकार ने, सतर्कतापूर्वक विचार करने के बाद, यह नीति निर्णय लिया है कि, राज्य में लागू विद्यमान बावन प्रतिशत आरक्षण को बाधा डाले बिना, संविधान के अनुच्छेद ३० के खण्ड (१) में र्िनदिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाअों से अन्य निजी शैक्षणिक संस्थाअों चाहे राज्य द्वारा सहायता प्राप्त हो या न हो समेत, शैक्षणिक संस्थाअों के प्रवेशों में उम्मेद्वारों और राज्य के अधीन की लोकसेवाअों में की नियुक्ितयाँ या पदों में, भारत के संविधान की पाँचवी अनुसूचीत के अधीन इस निमित्त, दिनांक ९ जून २०१४ को जारी की गई अधिसूचना के अनुसार, राज्य के अधीन अनुसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति उम्मीद्वारों के पक्ष में के आरक्षण को छोड़कर जिसमें मराठा समुदाय को शामिल किया गया था शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े प्रवगों (ईएसबीसी) के लिये अलग सोलह प्रतिशत आरक्षण होगा। ५. इसलिए, महाराष्ट्र के राज्यपाल द्वारा, ९ जुलाई, २०१४ को महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े प्रवर्ग (एसईबीसी) के लिये (राज्य में शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश और राज्य के अधीन लोकसेवाअों में नियुक्ितयाँ या पदों के लिये सीटों के) आरक्षण, अध्यादेश, २०१४ (सन् २०१४ का महा. अध्या. क्र. १३) प्रख्यापित किया गया था।
६. तत्पश्चात्, उक्त अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के अधिनियम में बदलने के लिये, महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से विछड़े प्रवर्ग (एसईबीसी) के लिये (राज्य में शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश और राज्य के अधीन लोकसेवाओ में नियुक्ितयाँ या पदों के लिये सीटों के) आरक्षण अधिनियम, २०१४ (सन् २०१५महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० ९ का महा. १) ९ जनवरी, २०१५ को अधिनियमित किया गया था। तथापि, उक्त अधिनियम की संविधानात्मक विधिमान्यता को माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौति दी गयी है। माननीय उच्च न्यायालय ने, उक्त अधिनियम के कार्यान्वयन पर ७ अप्रेल, २०१५ को रोक लगाई है।
तत्पश्चात्, राज्य सरकार ने, महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग को, जून २०१७ में,----
(एक) न्यायालयों के विभिन्न न्यायनिर्णयो, आरक्षण विधियों और संविधानात्मक अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुये, संविधानात्मक उपबधों के अधीन, आरक्षण के लाभों के विस्तार के लिये, मराठाअों के सामजिक, शैक्षणिक और र्आथिक पिछडेपन को विनिश्िचत करने में अपनाये जाने वाले समकालीन निकष और मापदण्डों को अभिनिर्धारित करने ;
(दो) समकालीन दृश्य में आरक्षण के लाभों के लिये लागू अपवादात्मक परिस्थितियों और असाधारण स्थिति को परिभाषित करने ;
(तीन) मराठा समुदाय के पिछडेपन का अन्वेषण करने के लिये मान. न्यायालय को प्रस्तुत की जानेवाली परिणाम निर्धारित करने योग्य डाटा और अन्य जानकारी की संवीक्षा करने और निरीक्षण करने ;
(चार) राज्य लोकसेवा रोजगार में मराठाअों का प्रतिनिधित्व निर्धारित करने ;
(पाँच) विभिन्न स्त्रोतों के अधीन उपलब्ध सूचना के संग्रहण द्वारा मराठा समुदाय की जनसंख्या का अनुपात सुनिश्चित करने की सुनिश्चिति की थी।
७. मराठा पिछड़ा वर्ग आयोग ने राज्य विभागों, सरकारी अभिकरणों, महाराष्ट्र पिछडा वर्ग आयोग के पहले से गठित संघटकों द्वारा उपक्रमित अन्य समकालीन सर्वेक्षण के साथ, साथ ही पत्र में संलग्नित उनके संदर्भ की शर्ते में राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित ऐतिहासिक डाटा, व्यक्त्ति-अभ्यास, समुचित उपयोग के तथ्यों क्रमवार लगाने, नमूना सर्वेक्षण डाटा और सूचना का विश्लेषण तथा अर्थान्वयन करने के लिये सरकार और विश्वविद्यालय से विशेषज्ञ, सामाजिक वैज्ञानिकों, सांखिकीविदों और विश्वविद्यालय से विशेषज्ञों, सामाजिक वैज्ञानिकों, सांख्यिकीविदों और समाजशास्त्रियों का पैनल भी नियुक्त किया है।
८. आयोग ने, १५ नवंबर, २०१८ को अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत की हैं। आयोग, अन्य बातों के साथ निम्न निष्कर्षों और तथ्यों पर आया हैं :----
(क) पिछडापन,---
(१) राज्य में मराठा वर्ग के नागरिक, समुदाय के अधिकतम २५ में से २१.५ अंक प्राप्त करते हुये, समुदाय सामाजिक, शैक्षणिक और र्आथिक रूप से पिछडे हैं।
(२) मराठा समुदाय के नागरिक, उनके पिछडेपन के आधार पर पिछडा वर्ग प्रवर्ग में सम्मिलित होने के लिये अर्ह हैं।
(ख) सार्वजनिक रोजगार में प्रतिनिधित्व,---
राज्य सार्वजनिक रोजगार में क, ख, ग और घ के उच्चतर श्रेणी में मराठाअों का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त पाया गया हैं न केवल उनके राज्य जनसंख्या के लगभग ३० प्रतिशत अनुपात के रूप कारण में, साथ ही स्नात की अपयार्ंप्त संख्या के कारण थी, जो लोक पदों की श्रेणी के लिये न्यूनतम शैक्षणिक अर्हता हैं।
(ग) अध्यापक और विद्यार्थीयों के रूप में उच्चतर तथा तकनीकी, अकादमिक संस्थाअोंे
में उपस्थिति :---
(१) प्राध्यापक के रूप में अकादमिक पेशे के अनुसरण में और अकादमिक उत्कर्ष के ऐसे अन्य पदों पर मराठा समुदाय की उपस्थिति बहुत ही कम हैं। संपूर्ण राज्य की ३० प्रतिशत मराठा समुदाय की जनसंख्या के व्यक्त्तियों द्वारा औसतन ४.३० प्रतिशत अकादमिक और अध्यापन पद ग्रहण किये गये है।
भाग सात ६४------२महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० १० (२) पारंपरिक उपाधि स्तरिय शिक्षा की कमी उनमें निम्न स्तर श्रम रोजगार, जैसे कि- माथाडी, हमाल, डबेवाला आदीं.... में उतार रहीं है।
(३) कम अर्जन और मौसमी स्वरुप के जीवनमान के लिये नगरी बस्ती में अस्थायी या स्थायी स्थानांतरण की आवश्यकता हैं, जिससे उनके बालकों के निर्बाध शिक्षण और विद्यालयीन उपस्थिति पर प्रभाव पडेगा।
(घ) मराठा जनसंख्या की परिगणना :----
विभिन्न जनसंख्या जनगणना के आधार पर मराठा जनसंख्या अनुपात, राज्य के नियोजन विभाग द्वारा किया गया एक विशेष सर्वेक्षण (३२.१४%), राज्य सरकार के ग्राम विकास विभाग द्वारा किया गया विशेष सर्वेक्षण, भारत सरकार के ग्राम विकास विभाग के सामाजिक, र्आथिक और जाति सर्वेक्षण सूचना (२७ प्रतिशत) और महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के नमूना सर्वेक्षण के तथ्य, कुल राज्य जनसंख्या में से औसत ३० प्रतिशत मराठा जनसंख्या हैं की पुष्टी करते हैं। (ङ) मराठाअों की सामाजिक स्थिति :----
(१) लगभग ७६.८६ प्रतिशत मराठा परिवार, उनके जीवनयापन के लिये कृषि और कृषि संबंधि श्रम से जुडे हुये हैं।
(२) लगभग ६ प्रतिशत मराठा सरकारी या अर्र्ध-सरकारी सेवाअों में हैं। इनमें से कई पद राज्य सेवाअों के वर्ग-घ की हैं।
(३) लगभग ७० प्रतिशत मराठा परिवार कच्चे आवास में रहते पाये गये हैं।
(४) केवल ३५.३९ प्रतिशत मराठा परिवारों के पास पानी के नल लगवाए गये हैं। (५) लगभग ३१.७९ प्रतिशत परिवार, घरेलू उपयोग में खाना पकाने के लिए, इंधन के रूप में लकडी, गोबर और कृषि कचरे के पारंपरिक स्त्रोतों पर निर्भर रहते हैं, देखा गया हैं। (६) सन् २०१३-१८ की अवधि के भीतर, कुल १३,३६८ किसनों ने आत्महत्या की थी, जिनमें से कुल २१५२ (२३.५६ प्रतिशत) मराठा किसानों ने आत्महत्या की थी।
(७) सामाजिक विशेषताअों, प्रथाअों, रुढीयों और परंपराअों को जतन करने का मराठा समुदाय में प्रभाव प्रचलित हैं।
(८) पिछड़ेपन के विभिन्न प्रकारों की और अवबोधन करने पर, ७३ प्रतिशत मराठाअों को महसूस होता हैं कि, वह, सभी ३ प्रकारों के पिछडेपन से, जैसा कि, सामजिक, शैक्षणिक और र्आथिक।
(९) मराठाअों का ग्रामीण से शहरी तक का स्थलांतरण विगत दस वर्षों में अधिक बढ गया हैं, ऐसा महाराष्ट्र राज्य पिछडा वर्ग आयोग के सर्वेक्षण से सामने आया हैं। लगभग २१ प्रतिशत मराठा परिवार के सदस्य जीवनयापन की खोज में शहरी क्षेत्रों में स्थलांतरित हुये हैं, जिससे वह अत्याधिक निम्न श्रेणी के कामों में, जैसे कि माथाडी, हमाल, डब्बेवाला, घरेलु कामगार, पत्तन कामगार आदि... से जुडे हैं।
(१०) समुदाय में महिलाअों की स्थिति, सामजिक पिछडेपन या समाजिक वर्ग के अग्रसर होने का एक महत्वपूर्ण मापदण्ड हैं। इस संबंध में, समुदाय के सामाजिक पिछडेपन को ढंूढने के लिये, जीवनयापन कमाई के लिये शारीरिक श्रम की गतिविधियाँ या व्यवसाय या रोजगार की धारणा, एक प्रबल घटक हैं। सर्वेक्षण में यह पाया गया हैं कि, ८८.८१ प्रतिशत मराठा महिलाएँ, जीवनयापन के लिये शारीरिक श्रम में जुडी है, पर इसमें अपने परिवार के लिये किये जाने वाले घरेलु कार्य बिल्कुल भी सम्मिलित नहीं हैं।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० ११ समुदाय के सामाजिक पिछड़ेपन को आँकने में जीवनयापन के लिये शारीरिक श्रम, रोजगार या व्यवसाय या रोजगार में जुड़ी समुदाय की महिलाअों के इस महत्वपूर्ण मापदण्ड को देखते हुये, महाराष्ट्र राज्य पिछडा वर्ग आयोग में, इस मापदण्ड को तीन अंक दिये हैं, जो शारीरिक श्रम में जुडी महिलाअों के राज्य औसत प्रतिशत के कम से कम ५ प्रतिशत विर्िनदिष्ट की गई हैं।
(च) मराठाअों की शैक्षणिक स्थिति :----
महाराष्ट्र राज्य पिछडा वर्ग आयोग मे, नमूना सर्वेक्षण के जरिए मराठाअों के शैक्षणिक स्थिति को आँका और मूल्याकंन किया हैं और समुदाय के शैक्षणिक पिछडेपन के लिये कुल २५ अंकों मेंे से ८ अंक दिये थे। मराठा समुदाय मे १३.४२ प्रतिशत निरक्षर, ३५.३१ प्रतिशत प्रथामिक साक्षर, ४३.७९ प्रतिशत एस. एस. सी और एच. एस. सी., ६.७१ स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर और ०.७७ प्रतिशत तकनीकी और व्यावसायिक अर्हताधारी हैं।
(छ) मराठाअों की र्आथिक स्थिति :----
(१) लगभग ९३% मराठा परिवारों की वर्ाषिक आय १,००,००० रुपये हैं, जो मध्यमवर्गीय परिवारों की औसत आय से कई कम हैं। यह मराठा समुदाय की गिरती हुई र्आथिक स्थिति को दर्शाता हैं।
(२) गरिबी रेखा के (बी.पी.एल) नीचे के परिवार जो मराठा परिवारों में से है, सर्वेक्षण के अनुसार राज्य औसतन २४.२% के समान ३७.२८% पाया गया है।
(३) मराठा परिवारों में से लगभग ७१% तक भूमिहीन और सीमान्त किसान (भू-स्वामित्व २.५ एकर से कम है) पाये गये है क्योंकि लगभग १० एकर भूमि धारण करनेवाले बडे किसानों का प्रतिशत केवल २.७% है।
(ज) असाधारण स्थितियों और परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा ५०% से भी अधिक हो गई है :---
(१) महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग इस निष्कर्ष तक आया है कि आरक्षण नियत करने और असाधारण परिस्थतियों को प्रकट करने के संबंध में राज्य में एक असाधारण स्थिति विकसित हुई है, विशेषत: राज्य की जनसंख्या के अनुपात में ३०% मराठा समुदाय को परिमाणवाचक डाटा के आधार पर और परिणामस्वरुप हकदारी के रुप में संविधानिक आरक्षण हेतु सामजिक और शैक्षणिक रुपसे पिछड़ा घोषित किये जाने के पश्चात् यह हुआ है। राज्य सेवा रोजगार में और राज्य शैक्षणिक संस्थाअों के प्रवेश में ५०% की विद्यमान आरक्षण सीमा का असाधारण स्थिति और अपवादात्मक परिस्थितियों की पाश्र्वभूमि पर पुनर्:विचार करना होगा।
(२) मराठाअों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछडे वर्ग के नागरिकों को घोषित करने के पश्चात्, संविधानिक लाभ और सुविधा को हकदारी मिलने वाली राज्य जनसंख्या का कुल प्रतिशत अनुच्छेद १५(४) और अनुच्छेद १६(४) के अधीन यथा सूचित अनुसार लगभग ८५% हो गया है। इससे सांविधानिक ढँाचेगत कार्य के भीतर असाधारण विकल्प की माँग करने की असाधारण स्थिति बाध्यकर हो जाती है।
यह भी जोड़ा जा रहा है कि न्यायिक अभिमत, प्रवर्गवार निर्णय दिया है की एससी और एसटी के संबंध में आरक्षण नीति विरचित की गई है और सांविधानिक आदेश उलंघनीय है कि वहाँ परिमाणवाचक डाटा या उसके सत्यापन जों भी कोई हो, जरुरत नहीं है। अनुपात में यह भी है कि उनकी जनसंख्या को अन्य पिछडे वर्ग के नागरिकों के आरक्षण के मामले में पर्याप्त अनुपात के मुकाबले के संबंध में विभेद बनाने की जरुरत नही हैं। इसलिये दृश्यविधान यह प्रकट होगा कि शेष ६३% (८५%-२२%) पिछडे वर्ग जनसंख्या में शेष २९% आरक्षण आबंटन सम्मिलित करके यथा शर्त द्वारा ५०% की अधितम सीमा हुई है। यह एक असाधारण स्थिति और अपवादात्मक परिस्िथति राज्य में प्रकट हुई है।
भाग सात ६४------२अमहाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० १२ (३) नविनतम जनगणना आँकडों के अनुसार लोक सेवाअों में प्रति १०० युवा को ४.६२% नौकरियाँ उपलब्ध है। प्रति वर्ष राज्य में भर्ती का औसात कुल नौकरियों के ५% से अधिक नहीं है, १०० पात्र युवाअों के प्रति १ नोकरी से कम उपलब्धता अनुपात ०.२३% नीचे आया हैं। यदि यह नौकरी परिदृश्य निबर्ंधित रीत्या में यह हुआ है कि केवल (२३% का) ५०% अर्थात् ०.१२ नौकरियाँ प्रति भर्ती वर्ष में ९५% जनसंख्या को उपलब्ध होगी और शेष ०.१२ नौकरीयाँ उन्नत नागरिकों के युवाअों के अनारक्षित वर्ग की ५% जनसंख्या के लिए होकर राज्य सेवा रोजगार में आरक्षण सिद्धांत की विडंबना होकर, लोक सेवा रोजगारों के लिय पिछडे वर्ग के युवाअों में कटुता के साथ सांविधानिक बेईमानी होगी। यह असाधारण स्िथति वारंट ५०% से परे आरक्षण प्रतिशत में वृद्धि करेगी।
(४) ५०% अधिकतम सीमा अक्षत रखी जाये किंतु ५०% में अधिक से अधिक नागरिकों के वर्ग सम्मिलित किये जाये बल्कि केवल २७% आरक्षण कोटा में समाज के उन्नत वर्ग को मामूली अनुकूलता का मार्ग होकर उनके पुराने सामाजिक आयु और शैक्षणिक शाश्वतता में प्रधानता के जनसंख्या के बहुसंख्याक वर्ग के विरुद्ध होगा।
(५) मराठा ५०% आरक्षण सीमा के उल्लंघन के कारण एक तरफ अधिक प्रभावित हो रहे है और दुसरी तरफ उन्हें असमान प्रतियोगिता का सामना करने के लिये उन्नत वर्ग के नागरिकों के साथ रखा जा रहा है। वे, वास्तविकत: स्वंतत्रता के पूर्व पिछडे प्रवर्ग में सिम्मिलित किये गये थे और वर्ष १९५२ तक स्वतंत्रता के बाद मध्यवर्ती जाति प्रवर्ग में सम्मिलित भी किया गया था, जो एक पुरानी व्याख्या सामाजिक और शैक्षणिक पिछडे वर्ग के नागरिकों (एसईबीसी) के नवीन अवतरण की थी।
(६) जब अधिकांश अन्य जाति समूहों को मध्यवर्ती जाति प्रवर्गों में मराठाअों के साथ सम्मिलित किया गया था या जिन्हें मध्यवर्ती जाति प्रवर्ग में स्थान नहीं मिला या उन्हें भी तब पिछड़े वर्गों की विद्यमान सूची में सम्मिलित करके, मराठाअों को किसी भी कारण के बिना अपर्वज़ित करके सख्त असमान प्रतियोगिता का सामना करने के लिये उन्नत वर्ग के नागरिकों के साथ टंगा गया था। परिणामस्वरुप, वहाँ मराठा ना तो राज्य लोकसेवा रोजगार पदों पर अधिक पर्याप्त अनुपात पाने में या उच्चतर तथा तकनीकी शिक्षा संस्थाअों में पर्याप्त संख्या में प्रवेश पाने में सक्षम हुये, ज्यादातर उन्हें उन्नत वर्गों द्वारा और गुणागुण कोटा के लिये आरक्षित प्रवर्गो द्वारा भी नजर अंदाज किया गया। अब बडे अंतराल के बाद व्यथित मराठा समुदाय पिछड़े वर्ग में पुन:समावेश होने की सीमा तक पहुँचा है। तथापि, पिछडा वर्ग समुदाय पहले से ही ओबीसी सूची में सम्मिलित होकर, आकस्मिक रूप से पूछा जाये कि उनकी सु-स्थापित हकदारी ३०% मराठा नागरिकों के साथ बाँटे तो असाधारण स्थिति का भयंकर परिदृश्य सृजित होगा और अपवादात्मक परिस्थीतीयाँ जो यदि तेजी से और न्यायिक रूप से संबोधित नहीं की गई तो राज्य के सु-स्थापित सहयोगी संस्कृति में अवांछित प्रतिघात हो सकता है।
अत:, सम्यक् रुप से मान्यताप्राप्त नवीन पिछडे वर्ग को तत्काल न्याय देने के लिऐ; मराठा जो पहलेसेही एक दशक से दोहरे संकट का सामना कर रहे है और अब न्याय की अपेक्षा कर रहे है और उन्हे पिछड़े समुदायों में सम्मिलित करने की सुनिश्चिति करके उन्हें असाधारण परिस्थितियों में भी उनके आरक्षण के फायदे और लाभ से वंचित नहीं रखा जाये और जो सुसंवाद से हल नहीं किया जा सकता है ऐसी सृजित हुई अपवादात्मक परिस्थिति में ५०% की अधिरोपित की गई आरक्षण की अधिकतम सीमा का पुनर्िवचार करने की जरुरत है। इस समकालिन स्थिति में राज्य द्वारा सामना की जानेवाली अपवादात्मक परिस्थिति में यह प्रश्न सुसंवाद से हल करने का मार्ग बचा है।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० १३ उक्त आयोग द्वारा निकाले गये निष्कर्ष के आधार पर साथ ही अन्य नितीयों के आधार पर, आयोग ने निम्न सिफारिशें की है :---
(१) मराठा वर्ग के नागरिकों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिकों (एसईबीसी) के रूप में घोषित किया गया है और राज्य के अधीन की सेवाअों में उनका अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है।
(२) मराठा वर्ग के नागरिकों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिकों के रूप में घोषित किया गया है जो भारत के संविधान के अनुच्छेद १५(४) और १६(४) प्रतिष्ठापित किये गये आरक्षण के लाभ और फायदे के हकदार है।
(३) मराठा वर्ग के नागरिकों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े के रूप में घोषित किये जाने पर निर्माण हुई अपवादात्मक परिस्थिति और असाधारण स्थिति को देखते हुऐ, सरकार राज्य में प्रोद्भूत परिदृश्य का हल निकालने के लिये संविधानिक उपबंधों के भीतर समुचित निर्णय ले सकती है।
९. महाराष्ट्र सरकार ने, उक्त आयोग की रिपोर्ट, निष्कर्ष, निर्णय और सिफारिशों का विचार किया है। सार्वजनिक रोजगार, शिक्षा, सामाजिक हैसियत, र्आथिक हैसियत, जनसंख्या का अनुपात, जीवनमान शर्ते, परिवारों द्वारा धारित भूमि के छोटे टुकड़े, राज्य में किसानों की आत्महत्या का प्रतिशत, जीवनमान के लिये, लिये जानेवाले काम काज का प्रराक, परिवारों का स्थानांतरण आदि का मराठाअों के संबंध में विभिन्न पहलूअों का उक्त आयोग द्वारा किऐ गऐ संपूर्ण अध्ययन के आधार पर, सरकार की राय यह है कि,----
(क) संविधान के अनुच्छेद १५(४) और (५) और अनुच्छेद १६(४) के प्रयोजनों के लिए, उक्त आयोग द्वारा प्रस्तुत किये गये पिछड़ेपन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व दर्शानेवाला संख्यात्मक डाटा के आधार पर मराठा समुदाय सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग है और एक पिछड़ा वर्ग है।
(ख) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े के रूप में मराठा को घोषित किये जाने पर निर्माण हुई अपवादात्मक परिस्थितियों और असाधारण स्थिति और उसके परिणामस्वरूप आरक्षण के लाभ हेतु हकदार होने को ध्यान में रखने के संबंध में और ओ.बी.सी. सूची में पिछड़ा वर्ग समुदाय पहले से ही सम्मिलित करने के संबंध में, यदि उन्हें अचानक उनके प्रस्थापित आरक्षण की हकदारी में ३०% मराठा नागरिकों के लिये हिस्सा देने को कहा जाये तो, निश्चित रूप से एक असाधारण स्थिति और अपवादात्मक परिस्थिति निर्माण होने का परिदृश्य दिखेगा और उसके शीघ्रता से और न्यायिक रूप से समाधान नहीं किया गया तो, राज्य के वर्तमान सांस्कृतिक जीवन पर गहरा परिणाम होगा इसे ध्यान में रखकर राज्य में विद्यमान लागू ५२% आरक्षण से छेडछाड न करके उसमें वृद्धि करने के लिये, जो उन्नत और प्रगतिशील प्रवर्ग के नहीं है केवल उन्हें ही ५०% की अधिकतम सीमा बढ़ाकर आरक्षण के प्रतिशत् हेतु उपबंध करना इष्टकर समझा गया है ;
(ग) ऐसे प्रवर्गों के लिए १६ प्रतिशत आरक्षण का उपबंध करना इष्टकर समझा गया है ;
(घ) यह इष्टकर समझा गया है कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाअों से भिन्न अन्य शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश से संबंधित होने तक वहाँ किसी भी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों की उन्नति के लिये, विधि द्वारा, एक विशेष उपबंध करना इष्टकर समझा गया है किंतु, ऐसे विशेष उपबंधों में, ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद, नगर परिषद, नगर निगम आदि में निर्वाचन के लिये सीटों का आरक्षण सम्मिलित नहीं है ;
(ङ) संविधान के अनुच्छेद ३० के खंड (१) में विर्िनदिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाअों से भिन्न, निजी शैक्षणिक संस्थाअों समेत शैक्षणिक संस्थाअों में प्रवेश हेतु ऐसे प्रवर्ग को आरक्षण देने के लिये उपबंध करना इष्टकर है ; और इस निमित्त ९ जून, २०१४ को जारी की गई अधिसूचना अनुसार, भारतमहाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० १४ के संविधान की पाँचवी अनुसूची के अधीन राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों मे अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के पक्ष में आरक्षणों को छोडकर, राज्य के अधीन की लोक सेवाअों में नियुक्तियाँ और पदों के लिये होगा ;
(च) मराठा समुदाय को आरक्षण प्रदान करने द्वारा, प्रशासन की कारगरता प्रभावित नहीं होगी चँूकि सरकार ने इस प्रवर्ग के लिये सीधी भर्ती के लिये शैक्षणिक अहर्ता का दर्जा कम नही किया है और इससे ऐसी भर्ती के लिये उनमें निश्चित रूप से प्रतियोगिता निर्माण होगी ; और
(छ) उक्त प्रयोजनों के लिए यथोचित विधि अधिनियमित करना।
उक्त दृष्टि से, राज्य सरकार की राय यह है कि उन्नत एवं प्रगत प्रवर्ग में के व्यक्तियों को वर्तमान में आगे बढ़ाने के लिये विशेष सहायता की जरुरत है। जिससे उनके समाज के प्रगत घटकों के साथ समानता की स्थिति में आना संभव होगा, जहाँ से उन्हें आगे बढ़ना साध्य होगा।
१०. प्रस्तुत विधेयक का आशय उपयर्ुक्त उद्देश्यों को प्राप्त करना है।
मुंबई,
देवेंद्र फडणवीस,
दिनांकित २९ नवम्बर २०१८ ।
मुख्यमंत्री।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, नोव्हेंबर २९, २०१८/अग्रहायण ८, शके १९४० १५
प्रत्यायुक्त विधान संबंधी ज्ञापन।
प्रस्तुत विधेयक में, विधायी शक्ति के प्रत्यायोजनार्थ निम्न प्रस्ताव अंतर्ग्रत है, अर्थात् :---
खण्ड ६.----- (क) उप-खण्ड (१) के अधीन राज्य सरकार को, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अधिनियमों के उपबंधांे और तद्धीन बनाने गये नियमों के कार्यान्वयन के प्रयोजनों के लिये सक्षम प्राधिकारी के रूप में जिला समाज कल्याण अधिकारी से अनून श्रेणी के किसी अधिकारी को नियुक्त करने की शक्ित प्रदान की गई हैं।
(ख) उप-खण्ड (२) के अधीन, राज्य सरकार को, सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्वहन की जानेवाली शक्तियाँ और अनुपालन किये जानेवाले कृत्यों को नियमों द्वारा विहित करने की शक्ति प्रदान की गई है। खण्ड ७ (२).-----इस खण्ड के अधीन, परंतुक में, राज्य सरकार को, रीति, जिसमें, विशेष भरती मुहिम के पश्चात् रिक्त्त रहीं रिक्ितयाँ भरी जाये, नियमों द्वारा विहित करने की शक्ति प्रदान की गई हैं। खण्ड १६ (१).-----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, राजपत्र मेंं अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिये, नियम बनाने की शक्ित प्रदान की गई हैं।
खण्ड १८ (१).-----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, राजपत्र मेंं प्रकाशित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में उद्भूत होनेवाली कठिनाईयों का निराकरण करने की शक्ति प्रदान की गई हैं।
२. विधायी शक्ति के प्रत्यायोजन के लिये उपरोल्लिखित प्रस्ताव सामान्य स्वरूप के हैं।
(यथार्थ अनुवाद),
हर्षवर्धन जाधव, भाषा संचालक, महाराष्ट्र राज्य।
विधान भवन : मुंबई, दिनांकित २९ नवम्बर २०१८।
डॉ. अनंत कळसे, प्रधान सचिव, महाराष्ट्र विधानसभा।
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