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Maharashtra Gazette · Government of Maharashtra

Part VII Weakly (26th Sept. to 2nd Oct., 2019)

Published 26 September 2019

Type
Ordinary
Part
Part 7 (Hindi)
Division
CENTRAL SECTION
Identifier
in.gazette.maharashtra.2019-09-26.Ordinary_CENTRAL-SECTION_Part-7-Hindi-
Languages
English, Marathi

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महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ १

RNI No. MAHBIL /2009/31746

महाराष्ट्र शासन राजपत्र

भाग सात

वर्ष ५, अंक २१] गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ [पृष्ठे २१

किंमत : रुपये ३७.००

प्राधिकृत प्रकाशन

अध्यादेश, विधेयके व अधिनियम यांचा हिंदी अनुवाद (देवनागरी लिपी)

अनुक्रमणिका

पृष्ठे महाराष्ट्र अधिनियम क्रमांक ६३, सन २०१७.---- डी. वाय. पाटील अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, पुणे . . २ अधिनियम, २०१७।

भाग सात-१२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१

MAHARASHTRA ACT No. LXIII OF 2017.

D. Y. PATIL INTERNATIONAL UNIVERSITY PUNE,

ACT, 2017.

महाराष्ट्र विधानमंडल का निम्न अधिनियम, राज्यपाल की अनुमति दिनांक २६ दिसंबर, २०१७

को प्राप्त होने के बाद, इसके द्वारा सार्वजनिक सूचनार्थ प्रकाशित किया जाता है।

राजेंद्र ग. भागवत, प्रभारी सचिव, विधि तथा न्याय विभाग, महाराष्ट्र शासन।

MAHARASHTRA ACT No. LXIII OF 2017.

AN ACT TO PROVIDE FOR ESTABLISHMENT INCORPORATION AND REGULATION OF D. Y. PATIL INTERNATIONAL UNIVERSITY, PUNE FOR THE DEVELOPMENT AND ADVANCEMENT OF HIGHER EDUCATION IN THE STATE AND TO PROVIDE FOR MATTERS CONNECTED THEREWITH OR INCIDENTAL THERETO.

महाराष्ट्र अधिनियम क्रमांक ६३, सन् २०१७।

(जो कि राज्यपाल की अनुमति प्राप्त होने के पश्चात्, " महाराष्ट्र राजपत्र " में दिनांक २७ दिसंबर, २०१७ को प्रथम बार प्रकाशित हुआ।)

राज्य में उच्चतर शिक्षा, के विकास और उन्नति के लिए डी. वाय. पाटील अन्तराष्ट्रीय

विश्वविद्यालय पुणे की स्थापना, निगमन और विनियमन के लिए उपबंध तथा तत्संबंधी

या उससे आनुषंगिक मामलों के लिये उपबंध करने संबंधी अधिनियम।

क्योंकि इसमें आगे र्दशित प्रयोजनों के लिए, राज्य में उच्चतर शिक्षा के विकास और उन्नति के लिए डी. वाय. पाटील अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय पूणे स्वावित्तपोषित विश्वविद्यालय की स्थापना, निगमन और विनियमन के लिए उपबंध करने तथा तत्संबंधी या उससे आनुषंगिक मामलों के लिये उपबंध करना इष्टकर है ; इसलिए, भारत गणराज्य के अड़सठवें वर्ष में, एतद्द्वारा, निम्न अधिनियम बनाया जाता हैं :---

१. (१) यह अधिनियम डी. वाय. पाटील अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय पुणे, अधिनियम, २०१७ कहलाए। संक्षिप्त नाम तथा प्रारंभण।

(२) यह ऐसे दिनांक से प्रवृत्त होगा जिसे राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करें। २. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से, अन्यथा अपेक्षित न हो,-----

परिभाषाएँ।

(एक) " सहयोगी प्राध्यापक, सहयुक्त प्राध्यापक या सहयोगी प्राध्यापक " ता तात्पर्य, कोई व्यक्ति उद्योग, व्यापार, कृषि, वाणिज्य, समाजिक सांस्कृतिक, अकादमिक या किसी अन्य सहबद्ध क्षेत्र से है, जो इस प्रकार पदाभिहित किये जाने के दौरान विश्वविद्यालय के सहयोगी या सहयुक्त से है ;

(दो) " प्राधिकरण " ता तात्पर्य, इस अधिनियम के द्वारा या अधीन यथा विर्िनदिष्ट किये गये विश्वविद्यालय के प्राधिकरणों से है ;

महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ ३

(तीन) " प्रबंधन मंडल बोर्ड " का तात्पर्य, इस अधिनियम की धारा २२ के अधीन गठित किये गये प्रबंधन मंडल बोर्ड से है ;

(चार) " परिसर " का तात्पर्य, विश्वविद्याल का वह क्षेत्र जिसके अधीन यह स्थापित किया गया है ;

(पाँच) " उत्कर्षता केंद्र " ता तात्पर्य, छात्रों, सेवांतर्गत क्रमचारियों, कार्यरत व्यावसायिकों की सुसंगत कौशल के सभी प्रकार मुहैय्या करने के लिये, उद्योग से सहयोग में स्थापित अद्यावत प्रशिक्षण या अनुसंधान केंद्र या उद्योग या समाज के लाभ के लिये और संयुक्त परियोजना हाथ लेने के लिये स्थापित से है ;

(छह) " दूरस्थ शिक्षा " का तात्पर्य, संसूचना के किन्ही दो या अधिक साधनों के समुच्चयद्वारा, जैसे, प्रसारण, दूर्दर्शन प्रसारण, पत्राचार पाठयक्रम, सेमिनार, संपर्क कार्यक्रम तथा किन्हीं अन्य ऐसी प्रणाली विज्ञान द्वारा प्रदान की गई शिक्षा से है ;

(सात) " कर्मचारी " का तात्पर्य, विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति से है और इसमें विश्वविद्यालय के अध्यापक, अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारी शामिल होंगे ;

(आठ) " फीस " का तात्पर्य, विश्वविद्यालय या उसके महाविद्यालयों, संस्थाअों या, यथास्थिति, अध्ययन केद्रों, द्वारा किया गया धनीय संग्रहण, जिस किसी भी नाम से पुकारा जाए, छात्रों से किया गया से है, जो प्रत्यर्पणीय नहीं है ;

(नौ) " सरकार " या " राज्य सरकार " का तात्पर्य, महाराष्ट्र सरकार से है ;

(दस) " शासी निकाय " का तात्पर्य, इस अधिनियम की धारा २१ के अधीन गठित किये गये शासी निकाय से है ;

(ग्यारह) " उच्चतर शिक्षा " का तात्पर्य, विद्यालय शिक्षा के स्तर पर अध्ययन से परे ज्ञान का अनुसरण करने से है ;

(बारह) " छात्रावास " का तात्पर्य, विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए आवास का स्थान या विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित किये गये या मान्यताप्राप्त ऐसी उसकी संस्थाएँ तथा अध्ययन केंद्रों से है ;

(तेरह) " अधिसूचना " का तात्पर्य, राजपत्र में प्रकाशित की गई अधिसूचना से है ;

(चौदह) " राजपत्र " का तात्पर्य, महाराष्ट्र सरकार के राजपत्र से है ;

(पंद्रह) " विहित " का तात्पर्य, इस अधिनियम द्वारा बनाये गए या के अधीन परिनियमों या र्आडिनेन्सों, विनियमों या, यथास्थिति, नियमों द्वारा विहित किये गये से है ;

(सोलह) " विश्वविद्यालय का अध्यक्ष या कुलाधिपति " का तात्पर्य, विश्वविद्यालय के कुलाधिपति से है ;

(सतरह) " विनियमित निकाय " का तात्पर्य, उच्चतर शिक्षा के अकादमिक मानक सुनिश्चित करने के लिए मानक और शर्ते अधिकथित करने के लिए, केंद्र सरकार द्वारा स्थापित निकाय से है, जैसे कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद, राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद, भारतीय आयर्ुविज्ञान परिषद, भारतीय औषध परिषद, राष्ट्रीय निर्धारण तथा प्रत्यायन परिषद, भारतीय कृषक अनुसंधान परिषद, दूरस्थ शिक्षा परिषद, भारतीय वैज्ञानिक और अनुसंधान परिषद, आदि और इसमें सरकार भी सम्मिलित है ;

(अठारह) " नियम " का तात्पर्य, राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों से है ;

(उन्नीस) " धारा " का तात्पर्य, इस अधिनियम की धारा से है ;

भाग सात-१अ४ महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ (बीस) " प्रायोजक निकाय " का तात्पर्य, सन् १९९० में महाराष्ट्र लोक न्यास अधिनियम के अधीन सन् १९५० का २९। लोक न्यास के रुप में डा. डी. वाय. पाटील प्रतिष्ठान से है ;

(एकीस) " राज्य " का तात्पर्य, महाराष्ट्र राज्य से है ;

(बाईस) " परिनियम ", " र्आडिनन्सो " तथा " विनियमों " का तात्पर्य, क्रमश: इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विश्वविद्यालय के परिनियमों, र्आडिनन्सों तथा विनियमों से है ;

(तेईस) " छात्र " का तात्पर्य विश्वविद्यालय मे नामांकन किए गए व्यक्ति से है, जिसने विश्वविद्यालय द्वारा गठित उपाधि, डिप्लोमा या अन्य अकादमिक विशेषताअों के पाठयक्रम में प्रवेश लिया हो, इसमें अनुसंधान उपाधि भी सम्मिलित होगी ;

(चौबीस) " अध्ययन केंद्र " का तात्पर्य, विश्वविद्यालय द्वारा सलाह, परामर्श के प्रयोजन के लिए या दूरस्थ शिक्षा के संदर्भ में छात्रों द्वारा अपेक्षित कोई अन्य किसी सहायता देने के लिए स्थापित तथा पोषित या मान्यता प्राप्त केंद्र से है ;

(पच्चीस) " अध्यापक " का तात्पर्य, आचार्य, उपाचार्य, सहायक या कोई अन्य व्यक्ति जिससे विश्वविद्यालय की शिक्षा प्रदान करना या अनुसंधआन में मार्गदर्शन करना या पाठयक्रमानुसार अध्ययन करने के लिए छात्रों को किसी भी प्ररुप में मार्गदर्शन देना अपेक्षित है ;

(छब्बीस) " विश्वविद्यालय " का तात्पर्य, डी. वाय. पाटील अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, पुणे से है ;

३. (१) डी. वाय. पाटील अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, पुणे के नाम से एक विश्वविद्यालय स्थापित किया विश्वविद्यालय का निगमन।

जाएगा।

(२) अध्यक्ष, कुलपति, शासी निकाय, प्रबंधन बोर्ड, अकादमिक परिषद और अन्य समस्त व्यक्ति जो इसके बाद ऐसे अधिकारी या सदस्यत्व को बनेंगे या ऐसे पद को निरंतर धारण करेंगे या सभी एतद्द्वारा डी. वाय. पाटील अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, पूणे नाम द्वारा निगमित निगम से गठित और घोषित होंगे।

(३) विश्वविद्यालय का शाश्वत उत्तराधिकार तथा सामान्य मुद्रा होगी और उक्त नाम द्वारा वाद चलाएगी और उस पर वाद चलाया जाएगा।

(४) विश्वविद्यालय, इस अधिनियम के अधीन स्थापित किये गये असहबद्ध विश्वविद्यालय के रुप में कार्य करेगा और यह किसी अन्य महाविद्यालय या संस्था को उसमें प्रवेशित छात्रों को उपाधि, डिप्लोमा और उसकी उपाधि का प्रमाणपत्र प्रदान करने के लिए सहबद्ध नहीं होगा।

(५) विश्वविद्यालय और उसका मुख्यालय डी. वाय. पाटील अन्तराष्ट्रीय महाविद्यालय, सेक्टर-२९, निगडी-प्राधिकरण, अकुर्डी जिला-पुणे, महाराष्ट्र ४११ ०४४ में स्थित होगा।

४. विश्वविद्यालय के उद्देश्य निम्ननुसार होंगे,----

विश्वविद्यालय का उद्देश्य।

(क) उच्चतर तथा तकनीकी शिक्षा में अध्ययन, अध्यापन, क्षमता, सामथ्र्य तथा कुशलता विकास जिसमें लिबरल आर्ट, मानविकी सामाजिक विज्ञानों, जीव विज्ञानोत तथा जैवप्रौद्योगिकी, नॅनो-विज्ञानों और प्रौद्योगिकी, वृत्तिक शाखाअों, जैसे कि इंजिनिअरिंग, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, कारोबार तथा वाणिज्य, अनुप्रयुक्त तथा रचनात्मक कलाएँ, व्यावसायिक शिक्षा, मिडिया, सूचना एवं संसूचना, प्रौद्योगिकी तथा शिक्षा और उनकी आंतर-शाखीय पाठयक्रम और विकास का भी समावेश है, के उपबंध करना ;

(ख) उच्चतर तथा तकनिकी शिक्षा में अनुदेश, शिक्षण तथा प्रशिक्षण का उपबंध करना, कला, क्रीड़ा, संस्कृति, फिल्म, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, समुद्री, अनुसंधान तथा अनुसंधान के लिए उपबंध करना ;

महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ ५

(ग) ज्ञानात्मक, भाभात्मक तथा क्रियात्मक (दिमाग, दिल और हाथ) क्षमताअों का उच्चतर स्तर निर्माण करना ;

(घ) बौद्धिक क्षमताअों का उच्चतर सत्र निर्माण करना ;

(ङ) विकास के नए मार्गों के अविष्कार तथा सामाजिक पुर्ननिर्माण तथा स्थानांतरण के लिए नए शैक्षिक कार्यक्रमों की र्िनमिति तथा अभिनियोजित करना ;

(च) शिक्षा, तथा विकास के लिए अद्यतन सुविधाएँ स्थापित करना ;

(छ) अध्यापन तथा अनुसंधान कार्यान्वित करना तथा निरंतर गुणवत्ता शिक्षा कार्यक्रम प्रस्तावित करना ;

(ज) विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी और सामाजिक र्आथिक विकास में अनुसंधान और विकास के लिए उत्कर्ष केंद्रों की र्िनमिति करना तथा ज्ञान बाँटने और उसके उपयोजन के लिए ;

(झ) अध्ययन, अध्यापन, अनुसंधान, मूल्यांकन, विकास तथा संगठन के शासन और प्रबंधन के लिए आधुनिक और आधुनिकोत्तर प्रक्रियाएँ, यत्र-क्रिया तथा प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना तथा २१ वी सदी के लिए व्यक्तिगत तथा समाज के लिए सामाजिक-र्आथिक सम्पत्ति की र्िनमिति करना ;

(ञ) उद्योग तथा सार्वजनिक संगठन तथा समाज को वृत्तिक तथा विकासात्मक सेवाअों का उपबंध कराना ;

(ट) नवप्रवर्तक दृष्टिकोनों के साथ नए तथा प्रकट क्षेत्रो में उच्चतर शिक्षा कार्यक्रम, पाठयक्रम सुरू करना ;

(ठ) भारत और विदेश में के अन्य उच्चतर शिक्षा तथा अनुसंधान के साथ संबंध, सहयोग तथा भागीदारी संस्थित करना ;

(ड) परीक्षाएँ या अन्य किसी मूल्यांकन पद्धतियों के आधार पर उपाधियाँ, डिप्लोमाएँ, प्रमाणपत्र तथा अन्य अकादमिक विशेशताएँ गठित करना ;

(ढ) रचनात्मक तथा ठेकेदारी के पालन पोषण और परिष्कार के लिए अकादमिक संरचनाएँ, अध्ययन पद्धतियों का ढाँचा, और कामकाज तथा निरंतन मूल्यांकन प्रक्रियाअों में सीवनहीनता की र्िनमिती के लिए नवप्रवर्तक दृष्टिकोनों को संस्थित करना ;

(ण) सरकार द्वारा सुझाए गए कोई अन्य उद्देश्य जारी रखना;

सन् १९९३ का ७३। सन् १९५६ का ३। सन् १९४८ का ८। सन् १९६१ का २५। (त) विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त किए गए उपाधि, डिप्लोमाएँ, प्रमाणपत्र तथा अन्य अकादमिक विशेषताअों का स्तर अखिल भारतीय तकनिकी शिक्षा अधिनियम, १९८७ के अधीन स्थापित राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षण परिषद अधिनियम, १९९३ के अधीन स्थापित अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा या राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षण परिषद या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, १९६५ या आयर्ुविज्ञान अधिनियम, १९४८ के अधिन गठित भारतीय आयर्ुविज्ञान परिषद या अधिवक्ता अधिनियम, १९६१ के अधीन गठित भारतीय बार परिषद, या, यथास्थिति, किसी अन्य कानूनी निकाय द्वारा अधिकथित से कम नहीं है, सुनिश्चित करना।

५. विश्वविद्यालय की, निम्न शक्तियाँ और होंगे, अर्थात् :----

विश्वविद्यालय की शक्तियाँ और कृत्य। (एक) अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान संबंधी, परम्परागत के साथ नए नवप्रवर्तक पद्धतियों, जिनमें ऑनलाईन शिक्षा पद्धति सम्मिलित है, के माध्यम से दिए जानेवाले पाठयक्रमों से संबंधित उपबंध करना तथा सभी उपायों (जिसमें पाठयक्रम को अपनाना तथा अद्यतन करना सम्मिलित है) को अपनाना ;

(दो) उपाधियाँ, डिप्लोमाएँ, बक्षिस, श्रेणियाँ, प्रत्यय तथा अकादमिक विशेषताअों को संस्थित और प्रदान करना ;

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(तीन) परीक्षाएँ संचालित तथा धारण करना ;

(चार) अन्य मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालयों, बोर्डो या परिषदों की उपाधियाँ, डिप्लोमाएँ, प्रमाणपत्रों के समतुल्य तथा समरूप उपाधियों, डिप्लोमाअों, प्रमाणपत्रों के लिए उपबंध करना ;

(पाँच) परिसरों की स्थापना के लिए सभी आवश्यक उपाय करना ;

(छह) केंद्रीय पुस्तकालय, विभागीय पुस्तकालयों, संग्रहालयों तथा सहबद्ध विषयों की स्थापना करना ;

(सात) मानद उपाधियाँ, जैसा कि विहित किया गया है, को संस्थित करना और प्रदान करना ;

(आठ) विर्िनदिष्ट किए गए अनुसार फेलोशिप, छात्रावृत्ति, अध्येतावृत्ति संस्थित तथा अधिर्िनणित करना ;

(नौ) समाज के शैक्षणिक रूप से पिछड़े स्तर में, शैक्षणिक सुविधाअों को फैलाने के लिए विशेष उपाय करना ;

(दहा) क्रीड़ा तथा अन्य पाठयेतर क्रियाकलापों को बढ़ावा देना तथा प्रवर्तन करना ;

(गॅरह) तकनीकी, प्रशासनिक तथा अन्य आवश्यक पदों का सृजन करना तथा उसमें नियुक्तियाँ करना ;

(बारह) पारस्पारिक प्रतिग्रा शर्ते और निबंधनों पर अनुसंधान परियोजनाअों का जिम्मा लेना ;

(तेरह) परामर्शी सेवाअों का उपबंध करना ;

(चौदह) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को सम्पादित करने के लिए परिनियमों, र्आडिनन्सों, नियमों तथा विनियमों को विरचित करना ;

(पंद्रह) विश्वविद्यालय के शिक्षक, छात्र तथा कर्मचारियों के व्यक्तित्व विकास के लिए पाठयक्रमेतर गतिविधियों को बढ़ावा देना तथा प्रवर्तक करना ;

(सोलह) राज्य सरकार, भारत सरकार तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुदेशो के अनुसार व्यतिकारी के आधार पर देश के भीतर या बाहर अन्य विश्वविद्यालयों के मुकाबले में दोहरी उपाधियाँ, डिप्लोमाअों या प्रमाणपत्रों का उपबंध करना ;

(सत्रह) विश्वविद्यालय के शैक्षणिक कार्यक्रमों में विभिन्न शाखाअों में एकात्मिक पाठयक्रमों के लिए ऐसे उपबंधों की र्िनमिति करना ;

(अठराह) राज्य सरकार, केंद्र सरकार तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा समय-समय पर जारी किए गए निदेशों के अनुसार महाविद्यालयों, संस्थाअों, परिसर सुदूर केंद्रों, परदेशस्थ परिसर तथा अध्ययम केंद्रों की स्थापना करना ;

(उन्नीस) दान, बक्षिस, अनुदान, प्राप्त करना तथा किसी सम्पत्ति को जंगम को जंगम या स्थावर, जिसमें राज्य के भीतर या बाहर के न्यास या विन्यास सम्पत्ति सम्मिलित है, विश्वविद्यालय के प्रयोजनों तथा उद्देशों के लिए र्अजित, धारण, प्रबंध तथा निपटान करना तथा निधि निवेशित करना ;

(बीस) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार विभिन्न पाठयक्रमों के लिए, समय-समय से फीस संरचना विहित करना ;

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(इक्कीस) ऐसे फीसों तथा अन्य प्रभार जैसा कि समय-समय पर विर्िनदिष्ट किया गया हों, के भुगतान की माँग तथा प्राप्त करना ;

(बाइस) पारस्परिक ग्रा शर्तों और निबंधनों पर अन्य संस्थाअों से सहयोग लेना ;

(तेईस) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा अन्य विनियमित निकायों द्वारा विर्िनदिष्ट मानकों के अनुसार विश्वविद्यालय के शिक्षकों तथा कर्मचारियों का वेतन, पारिश्रामिक, मानदेय अवधारण करना ;

(चौबीस) अतिरिक्त बा अध्यापन तथा विस्तार सेवाअों का आयोजन करना और उपक्रमित करना ;

(पच्चीस) हॉल तथा छात्रावासों को स्थापित तथा पोषित करना ;

(छब्बीस) विश्वविद्यालय द्वारा रखरखाव न किये गये, हॉल और छात्रावासों को मान्यता देना, पर्यवेक्षण तथा नियंत्रण करना और छात्रों के आवास के लिए अन्य ऐसी मान्यता वापस लेना ;

(सताईस) विश्वविद्यालय के छात्रों और कर्मचारियों के बीच अनुशासन विनियमित तथा प्रर्वतित कराना और ऐसे अनुशासनात्मक उपाय करना जैसा वह आवश्यक समझें ;

(अठ्ठाईस) विश्वविद्यालय के छात्रों और कर्मचारियों के स्वास्थ्य तथा साधारण कल्याण को बढ़ावा देने के लिए व्यवस्था करना ;

(उनतीस) देश के भीतर के या बाहर के अन्य किसी विश्वविद्यालय, प्राधिकरण या संगठन या किसी सार्वजनिक या निजी निकाय से उस विश्वविद्यालय के उसी प्रकार के प्रयोजनों तथा उद्देश्यों को बढ़ावा देने की दृष्टि से, ऐसे प्रयोजनों के लिए, जैसी करार पायी जाए, तथा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो विर्िनदिष्ट की जाए, सहयोग करना ;

(तीस) विश्वविद्यालय द्वारा जारी किये गये अनुसंधान तथा अन्य कार्य, जिसमें पाठय-पुस्तकें सम्मिलित है, के मुद्रण पुनमर्ुद्रण तथा प्रकाशन के लिए उपबंध करना ;

(इकतीस) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (निजी विश्वविद्यालय में मानकों की स्थापना तथा रखरखाव) विनियमों, २००३ या अन्य किन्ही विनियमों के उपबंधों या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी किये गए निर्देशनों का समय-समय से अनुपालन तथा अनुरण करना ;

(बत्तीस) राज्य सरकार द्वारा, समय-समय पर जारी किये गए निदेशों का, विश्वविद्यालय की उपयर्ुक्त शक्तियाँ, कर्तव्यों तथा जिम्मेदारियों के संदर्भ में, अनुपालन करना तथा कार्यान्वित करना ;

(तेंतिस) ऐसी सभा कृत्य करना जो विश्वविद्यालय के सभी या किन्ही उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये आनुषंगिक या सहायक हो ;

विश्वविद्यालय सब के लिए खुला रहेगा। ६. (१) भारत का कोई भी नागरिक, सिर्फ लिंग, धर्म, पन्थ, वर्ग, जाति, जन्मस्थान, धर्ामिक मान्यता या व्यवसाय या राजनीतिक या अन्य मत के आधार पर विश्वविद्यालय के किसी पद या उसके किसी प्राधिकरणों, निकायों या समितियों के सदस्यत्व या किसी पद पर की नियुक्ति, या किसी डिप्लोमा, प्रमापत्र या अन्य अकादमिक विशेष योग्यता या अध्ययन के पाठयक्रम में प्रवेश पाने के लिए अपर्वजित नहीं किया जाएगा।

(२) विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय विभागों, और संस्थाअों में छात्रों के प्रवेश के प्रयोजनार्थ, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, निरधिसूचित जनजातियों, (विमुक्त जातियों)। खानाबदोष जनजातियों, अन्य पिछडे वर्गों अन्य पिछडे प्रवर्गों के आरक्षण के संबंध में सरकारी नीति तथा समय-समय पर जारी आदेशों को अंगीकृत करेगा।८ महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ (३) विश्वविद्यालय, राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर तथा निर्देशित, समाज के गरीब वर्गों तथा अल्पसंख्यकों के विभिन्न संवर्गों के कल्याण के संबंध में, राज्य सरकार की साधारण नीति को अंगीकृत करेगा। ७. विश्वविद्यालय, स्ववित्तपोषित होगा तथा सरकार से कोई अनुदान या अन्य वित्तीय सहायता पाने का हक्कदार नहीं होगा।

विश्वविद्यालय स्ववित्तपोषित होगा।

विन्यास निधि। ८. (१) प्रायोजक निकाय, विश्वविद्यालय के लिए, " विन्यास निधि " नामक एक स्थायी कानूनी निधि स्थापित करेगी, जिसमें कम से कम पाँच करोड़ रुपये समाविष्ट होंगे जिसे स्व-प्रेरणा से बढ़ाया जा सकेगा, परन्तु कम नहीं किया जायेगा।

(२) विन्यास निधि, इस अधिनियम, नियमों, विनियमों, परिनियमों या तद्धीन बनाये गये र्ऑडिनेन्स के उपबंधों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा निक्षेप के रुप में रखी जायेगी।

(३) सरकार को, इस अधिनियम के उपबंधों, नियमों, परिनियमों, र्ऑडिनेन्सों या तद्धीन बनाये गये विनियमों का उल्लघंन विश्वविद्यालय या प्रायोजक निकाय के मामले में, विन्यास निधि का अंशत: या संपूर्ण भाग विहितरित्या में समपत करने की शक्ति होगी।

(४) विन्यास निधि से आय, विश्वविद्यालय की मुलभूत सुविधा के विकास के लिए उपयोग में लाया जाएगा किंतु, विश्वविद्यालय के आवर्ती व्यय को पूरा करने के लिए उपयोग में नहीं लाया जाएगा।

(५) विन्यास निधि की राशि, विनिहित रखी जाएगी, जब तक विश्वविद्यालय का विघटन हो, सरकार द्वारा प्राप्त या प्रत्याभूत दीर्घकालिक सुरक्षा के रूप में शर्त के अध्यधीन की, यह निधि सरकार की अनुमति के बिना, नहीं निकाली जाएगी।

(६) दीर्घकालिक सुरक्षा के प्रमाणपत्र, सरकार की सुरक्षित अभिरक्षा में रखे जाएँगे ; तथा सरकार को, उप- धारा (३) में उल्लिखित प्रयोजनों के लिए, जमा राशि भूनाने का अधिकार होगा।

साधारण निधि। ९. विश्वविद्यालय, साधारण निधि के नाम से एक निधि स्थापित करेगा, जिसमें निम्न, जमा किया जाएगा, अर्थात् :----

(एक) विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त फीस और अन्य प्रभारी ;

(दो) प्रायोजक निकाय द्वारा किया गया कोई अंशदान ;

(तीन) विश्वविद्यालय द्वारा परामर्श तथा अन्य कार्य से प्राप्त कोई राशि ;

(चार) वसीयतों, दान, विन्यासों, तथा कोई अन्य अनुदान ; तथा ;

(पाँच) विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त सभी अन्य राशियाँ।

१०. सामान्य निधि का उपयोग, विश्वविद्यालय के कामकाज के संबंध में सभी व्यय जिसमें आवर्ती या सामान्य निधि का उपयोग। अनावर्ती व्यय पूरा करने के लिए किया जायेगा :

परन्तु, इस वर्ष के लिए कुल आवर्ती व्यय और कुल अनावर्ती व्यय के लिये सीमाअों के अधीक में व्यय विश्वविद्यालय द्वारा उपगत नहीं किया जायेगा, जिसे प्रबंधमंडल बोर्ड के पूर्वानुमोदन के बिना, प्रबंधनमंडल बोर्ड द्वारा नियत किया जा सकेगा।

११. विश्वविद्यालय के, अधिकारी निम्न होंगे, अर्थात् :----

विश्वविद्यालय के अधिकारी।

(एक) अध्यक्ष ;

(दोन) कुलपति ;

(तीन) संकायाध्यक्ष ;

(चार) रजिस्ट्रार ;

महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ ९

(पाँच) मुख्य वित्त तथा लेखाधिकारी ;

(छह) परीक्षा नियंत्रक ; और

(सात) विश्वविद्यालय सेवा में ऐसे अन्य अधिकारी जिन्हें परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के अधिकारी के रूप में घोषित किया जाए।

अध्यक्ष। १२. (१) अध्यक्ष, नियमोें द्वारा विहित किया जाए ऐसी रीत्या में सरकार के अनुमोदक से तीन वर्षों की अवधि के लिए प्रायोजित निकाय द्वारा नियुक्त किया जायेगा।

(२) अध्यक्ष के पद के लिए पात्रता और खर्ते, राज्य सरकार द्वारा जारी किये गये नियमों और विनियमों द्वारा विहित की जायेगी।

(३) अध्यक्ष, विश्वविद्यालय का प्रमुख होगा।

(४) अध्यक्ष, शासी निकाय की बैठकों और उपाधि, डिप्लोमा या अन्य अकादमिक विशिष्ट उपाधियाँ प्रदान करने के लिए होनेवाले विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह की अध्यक्षता करेगा।

(५) अध्यक्ष को, निम्न शक्तियाँ प्राप्त होंगी, अर्थात् :----

(क) विश्वविद्यालय के कामकाज से संबंधित विश्वविद्यालय किसी अधिकारी या प्राधिकारी से कोई जानकारी या अभिलेख मांगना ;

(ख) कुलपति की नियुक्ति करना ;

(ग) इस अधिनियम की धारा १४ की उप-धारा (७) के उपबंधों के अनुसार में, कुलपति को हटाना ;

(घ) ऐसी अन्य शक्तियाँ जैसा परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट की जाए ;

अध्यक्ष को हटाना। १३. अध्यक्ष को, प्रायोजक निकाय द्वारा उसके पद से हटाया जा सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि पदधारी,----

(क) विकृत चित्त है और समक्ष न्यायालय द्वारा, उसे इस प्रकार घोषित ठहराया गया है ;

(ख) नैतिक अधमता से अन्तर्ग्रस्त किसी अपराध के लिए न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध ठहराया गया है ;

(ग) अनुन्मोचित दिवालिया हो गया है और सक्षम न्यायालय द्वारा इस प्रकार घोषित किया गया है ;

(घ) शारीरिक रूप से अनुपयुक्त है और दीर्घकालिन बीमारी या शारीरिक विकलांगता के कारण कार्य या पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में असमर्थ है ; या ;

(ङ) इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने में जानबूझकर लोप या अस्वीकार करता है और सेवा संविदा के किन्ही निबन्धनों और शर्तों का या परिनियमों द्वारा अधिकथित किन्ही अन्य शर्तों का उल्लंघन करता है या उसमें निहित शक्तियों का दुरुपयोग करता है या अध्यक्ष को पद पर बनाए रखने से विश्वविद्यालय के हित पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है :

परन्तु, अध्यक्ष को, उक्त पद से हटाने के लिए, खंड (घ) और (ङ) के अधीन पुन:पाठयक्रम लेने के पूर्व प्रायोजक निकाय द्वारा कारण दर्शाने का युक्तियुक्त अवसर दिया जायेगा।

कुलपति। १४. (१) कुलपति, शासी निकाय द्वारा गठित किये गये तीन व्यक्तियों के पैनल परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जायेगा और उप-धारा (७) में अन्र्तविष्ट उपबंधों के अध्यधीन तीन वर्षों की अवधि के लिए पद धारण करेगा :

परन्तु, तीन वर्षों की अवधि के अवसान के बाद, कुलपति, अगली तीन वर्षों की अवधि के लिए पुर्ननियुक्ति के लिए पात्र होगा :

परन्तु आगे यह कि, कुलपति, अपने पद के अवसान के बाद भी, नवीन कुलपति के पदभार ग्रहण करने तक पद पर बना रहेगा, तथापि, किसी मामले में, यह अवधि, एक वर्षे से अधिक नहीं होगी।

भाग सात-२१० महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ (२) कुलपति, विश्वविद्यालय का प्रमुख कार्यपालक और अकादमिक अधिकारी होगा और उसकी विश्वविद्यालय के कामकाज पर संपूर्ण अधीक्षण की शक्तियाँ होगी नियंत्रण रखेगा और विश्वविद्यालय के विभिन्न प्राधिकरणों के विनिश्चयों का निष्पादित करेगा।

(३) कुलपति, अध्यक्ष की अनुपस्थिति में विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह की अध्यक्षता करेगा। (४) यदि, कुलपति की राय में, ऐसे किसी मामले में जिसके लिए इस अधिनियम द्वारा या के अधीन किसी अन्य प्राधिकरणों को शक्तियाँ प्रदान की गई है, सद्य कार्यवाही करना आवश्यक है तो, वह ऐसी कार्यवाही कर सकेगा जैसा कि वह आवश्यक समझे और तत्पश्चात्, शीघ्रतम अवसर पर अपनी कार्यवाही रिपोर्ट ऐसे अधिकारी या प्राधिकारणों को देगा जो सामान्यतया उस मामले का निपटान करता है :

परन्तु, यदि संबंधित अधिकारी या प्राधिकरण की राय में ऐसी कार्यवाही कुलपति द्वारा नहीं की गई थी तब ऐसे मामले में अध्यक्ष को र्िनदिष्ट किया जायेगा जिसपर उसका निर्णय अंतिम होगा।

(५) यदि, कुलपति की राय में, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारणों का निर्णय इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए परिनियमों, र्आडिनेन्स, विनियमों या नियमों द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उल्लंघन करता है या विश्वविद्यालय के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है तो वह अपने निर्णय का पुनरीक्षण करने के लिए संबंधित प्राधिकरण से अनुरोध करेगा और प्राधिकरण, निर्णय का पूर्णत: या अंशत: पुनरीक्षण करने के लिए इनकार करता है या पंद्रह दिनों के भीतर कोई निर्णय लेने में असफल रहता है तब ऐसी मामला, अध्यक्ष को र्िनदिष्ट किया जायेगा और जिसपर उसका निर्णय अंतिम होगा।

(६) कुलपति, ऐसी शक्तियाँ का प्रयोग करेगा और कर्तव्यों का पालन करेगा जैसा परिनियमों या र्आडिनेन्सों द्वारा विहित किया जाए।

(७) यदि किसी समय किये गये अभ्यावेदन पर या अन्यथा और ऐसी जाँच करने के बाद, जैसा आवश्यक समझा जाए, स्थिति इस प्रकार सर्मथित करे और यदि कुलपति का पद पर बने रहना विश्वविद्यालय के हित में नहीं है तो अध्यक्ष, शासी निकाय के अनुमोदन से, उसके लिए कारण दर्शाते हुए लिखित आदेश द्वारा आदेश में विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे दिनांक से उस प द को त्यागने के लिए कुलपति को कहेगा :

परन्तु, इस उप-धारा के अधीन कोई कार्यवाही करने के पूर्व, कुलपति को सुनवाई करने का युक्तियुक्त अवसर पर दिया जायेगा।

संकायाध्यक्ष। १५. (१) संकायाध्याक्ष, परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे रीत्या में और सेवा के ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जायेगा।

(२) संकायाध्यक्ष, विश्वविद्यालय के अकादमिक और अन्य कार्यकलापों के प्रबंध में कुलपति को सहायता करेगा और विनियमों द्वारा विहित की जाए ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे कृत्यों का अनुपालन करेगा या अध्यक्ष और कुलपति द्वारा सोंपेगा।

रजिस्ट्रार। १६. (१) रजिस्ट्रार, परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी रीत्या में और सेवा के ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर नियुक्त किया जायेगा।

(२) रजिस्ट्रार, विश्वविद्यालय का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी होगा। विश्वविद्यालय के प्राधिकरणों के निर्णय के अध्यधीन उसे करार करने, संविदा करने, दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने और विश्वविद्यालय की और से अभिलेख अधिप्रमाणित करने की शक्ति होगी, वह परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का अनुपालन करेगा।

(३) रजिस्ट्रार, शासी निकाय, प्रबंध बोर्ड और अकादमिक परिषद का सदस्य सचिव होगा किन्तु, उसे मत देने का अधिकार नहीं होगा।

(४) रजिस्ट्रार, विश्वविद्यालय के अभिलेख, सामान्य मुद्रा और ऐसी अन्य सम्पत्ति का अभिरक्षक होगा जैसा शासी निकाय उसके प्रभार में सुपुर्द करें।महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ ११ (५) रजिस्ट्रार, इस अधिनियम द्वारा या के अधीन विहित किया जाए या परिनियमों द्वारा उसे प्रदान किया जाए या कुलपति द्वारा समय-समय से उसे समनुदेशित किया जाए ऐसी शक्तियाँ का प्रयोग करेगा और ऐसे अन्य कार्यों का अनुपालन करेगा।

परिक्षा नियंत्रक। १७. (१) परीक्षा नियंत्रक, परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे रीत्या में और सेवा के ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाएगा।

(२) परीक्षा नियंत्रक, विश्वविद्यालय की परीक्षा और परीक्षण के संचालन और उनके परिणामों की घोषणा करनेवाला प्रभारी प्रधान अधिकारी होगा। वह कुलपति के अधीक्षण, निदेशन और मार्गदर्शन के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेगा।

(३) परीक्षा नियंत्रक, विश्वविद्यालय का पूर्ण समय वैतनक अधिकारी होगा और विश्वविद्यालय के कुलपति के निदेशन और नियंत्रण के अधीन सीधे कार्य करेगा। उसकी नियुक्ति, तीन वर्षों की अवधि के लिए की जाएगी और वह तीन वर्षों की केवल एक अवधि के लिए पुर्ननियुक्ति क लिए पात्र होगा। नियंत्रक के चयन के प्रयोजन के लिए अर्हत और अनुभव जैसा कि विहित किया जाए ऐसा होगा।

(४) परीक्षा नियंत्रक,----

(क) परीक्षाअों के कलैंडर तैयार करना और अग्रिम में घोषित करना ;

(ख) प्रश्नपत्रों के मुद्रण के लिए व्यवस्था करना ;

(ग) परीक्षाअों और अन्य परीक्षणों के परिणामों की समय पर प्रकाशन की व्यस्था करना ;

(घ) परीक्षाअों के संबंधित उम्मीदवारों, पेपर-सेटर्स, परीक्षकों, अनुसीमकों या किसी अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध और परीक्षाअों के संबंध में कदाचार का दोषी पाये जाने पर जहाँ आवश्यक हो अनुशासनात्मक कार्यवाही करेगा ;

(ङ) विश्वविद्यालय परीक्षाअों के परिणामों का समय-समय पर पुर्नविलोकन करेगा और अकादमिक परिषद को उसपर रिपोर्ट अग्रेषित करेगा।

(५) परीक्षाअों का नियंत्रक, ऐसी शक्तियाँ का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का अनुपालन करेगा जैसा कि वहित किया जाए या उसे समनुदेशित किया जाए।

१८. (१) मुख्य वित्त तथा लेखा अधिकारी, विश्वविद्यालय का प्रधान वित्त, लेखा और लेखा परीक्षा मुख्य वित्त तथा लेखा अधिकारी। अधिकारी होगा।

(२) मुख्य वित्त तथा लेखाधिकारी, परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे रीत्या और ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जायेगा।

(३) मुख्य वित्त तथा लेखाधिकारी, परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे कर्तव्यों का अनुपालन करेगा।

अन्य अधिकारी। १९. (१) मुख्य विश्वविद्यालय, उसके कर्तव्यों के लिए आवश्यक समझे जाये ऐसे अन्य अधिकारियों की नियुक्ति करेगा।

(२) विश्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति, ऐसे अधिकारियों के सेवा के निबंधन और शर्तें, उनकी शक्तियाँ और कृत्य परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किये जाए ऐसे होंगे।

२०. विश्वविद्यालय के प्राधिकरण निम्न, होंगे, अर्थात् :----

विश्वविद्यालय के प्राधिकरण। (क) शासी निकाय ;

(ख) प्रबंध मंडल बोर्ड ;

(ग) अकादमिक परिषद ;

(घ) परीक्षा बोर्ड ; और

(ङ) विश्वविद्यालय के प्राधिकरण के रूप में परिनियमों द्वारा घोषित किया जाए ऐसे अन्य प्राधिकरण।१२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ २१. (१) विश्वविद्यालय का शासी निकाय, निम्न सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :----

शासी निकाय।

(क) अध्यक्ष ;

(ख) कुलपति ;

(ग) प्रायोजक निकाय द्वारा नामर्िनदिष्ट पाँच व्यक्ति, जिनमें से दो प्रतिष्ठित शिक्षाविद् होंगे ;

(घ) अध्यक्ष द्वारा नामर्िनदिष्ट विश्वविद्यालय के बाहर से प्रबंधमंडल या सूचना प्रौद्योगिकी का एक विशेषज्ञ होगा ;

(ङ) राज्य सरकार द्वारा नामर्िनदिष्ट दो व्यक्ति ;

(च) अध्यक्ष द्वारा नामर्िनदिष्ट किये जानेवाले उद्योग के दो प्रतिनिधि ;

(छ) विश्वविद्यालय का रजिस्ट्रार, शासी निकाय का स्थायी आमंत्रिति होगा किन्तु, उसे मत देने का अधिकार नहीं होगा।

(२) शासी निकाय, विश्वविद्यालय का सर्वोच्च प्राधिकरण होगा।

(३) शासी निकाय को, निम्न शक्तियों होगी, अर्थात् :----

(क) इस अधिनियम या परिनियमों, र्आडिनेन्स, तद्धीन बनाए गए विनियमों या नियमों द्वारा यथा उपबंधित ऐसी सभी शक्तियों के उपयोग द्वारा, विश्वविद्यालय के कार्यों का सामान्य अधीक्षम और निदेशन और नियंत्रण का उपबंध करना ;

(ख) इस अधिनियम के उपबंधों या तद्धीन बनाए गए परिनियमों, र्आडिनेन्स, विनियमों या नियमों की पुष्टि नहीं है के मामले में, विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकरणों के निर्णयों का पुर्नविलोकन करना ;

(ग) विश्वविद्यालय के बजट और वर्ाषिक रिपोर्ट को अनुमोदित करना ;

(घ) विश्वविद्यालय द्वारा अपनायी जानेवाली नितियाँ अधिकथित करना ;

(ङ) विश्वविद्यालय के स्वैच्छिक परिनिर्धारण के बारे में सभी प्रयासों के बावजूद जब विश्वविद्यालय के सुचारू कार्यान्वयन करने की उद्भूत स्थिति शेष संभव नहीं होती हैं तब प्रायोजक निकाय को सिफारिशे करना ; और

(च) ऐसी अन्य शक्तियाँ जैसा कि परिनियमों द्वारा विहित किया जाए।

(४) शासी निकाय की, कलैन्डर वर्ष में कम से कम तीन बैठकें होंगी।

(५) शासी निकाय के बैठकों की गणपूर्ती, पाँच सदस्यों से होगी।

प्रबंधमंडल बोर्ड। २२. (१) प्रबंधमंडल बोर्ड, निम्न सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :----

(क) कुलपति ;

(ख) प्रायोजक निकाय द्वारा नामर्िनदिष्ट शासी निकाय के दो सदस्य ;

(ग) कुलपति से चक्रानुक्रम द्वारा नामर्िनदिष्ट किये जानेवाले विश्वविद्यालय के दो संकायाध्यक्ष ;

(घ) तीन व्यक्ति, प्रायोजक निकाय द्वारा नामर्िनदिष्ट जो शासी निकाय के सदस्य नहीं है ; और (ङ) प्रायोजक निकाय द्वारा नामर्िनदिष्ट अध्यापकों में से तीन व्यक्तियाँ ;

(२) कुलपति, प्रबंध मंडल का अध्यक्ष होगा।

(३) प्रबंध मंडल बोर्ड की शक्तियाँ और कृत्य, ऐसे होंगे जिसे परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट कया जाए। (४) प्रबंध मंडल बोर्ड, प्रत्येक दो महिनें में कम से कम एक बार बैठक लेगा।

(५) प्रबंध मंडल बोर्ड के बैठक की गणपर्ुति, पाँच सदस्यों से होगी।महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ १३ २३. (१) अकादमिक परिषद, कुलपति और ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगी जैसा कि परिनियमों अकादमिक परिषद। द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए।

(२) कुलपति, अकादमिक परिषद का पदेन अध्यक्ष होगा।

(४) अकादमिक परिषद, विश्वविद्यालय की प्रधान अकादमिक निकाय होगी, और इस अधिनियम के उपबंधों और तद्धीन बनाए गए नियमों, परिनियमों और र्आडिनेन्स के अध्यधीन विश्वविद्यालय के अकादमिक नितियों का समन्वयन और सामान्य पर्यवेक्षण करेगा।

(४) अकादमिक परिषद की बैठक के लिए गणपर्ूति, ऐसी होगी जैसा कि परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए।

परीक्षा बोर्ड। २४. (१) परीक्षा बोर्ड, परीक्षाअों के संचालन और परीक्षाअों का आयोजन और परीक्षा लेने के बारे में नीति संबंधी निर्णय लेने, परीक्षा पद्धति में सुधार लाने, पेपर-सेटरों, परीक्षककों, अनुसीमकों की नियुक्ति के लिए और परीक्षाअों और परिणामों की घोषणा करने के दिनांकों की अनुसूची भी तैयार करनेवाला विश्वविद्यालय का प्रधान प्राधिकरण होगा। परीक्षा बोर्ड, विश्वविद्यालय के अध्ययन केन्द्रों या विश्वविद्यालय से संबंधित किसी केंद्र में परीक्षाअों के संचालन का निरीक्षण और विनियमन भी करेगा।

स्पष्टीकरण.----इस धारा और धारा ३८ के प्रयोजनों के लिए, " परीक्षाअों की अनुसूची " की अभिव्यक्ति का तात्पर्य, प्रत्येक पेपर का समय, दिन और दिनांक के प्रारंभ्मण के बारे में दी गई ब्यौरेवार तालिका से हे, जो परीक्षा प्रणाली का हिस्सा है और जिनमें प्रात्यक्षिक परीक्षा के बारे में भी ब्यौरे सम्मिलित होंगे।

(२) परीक्षा बोर्ड, निम्न सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :----

(क) कुलपति

. . अध्यक्ष ;

(ख) प्रत्येक विषय के प्राध्यापक

. . सदस्य ;

(ग) परीक्षा बोर्ड द्वारा सहयोजित एक मूल्यांकन विशेषज्ञ . . सदस्य ;

(घ) परीक्षा नियंत्रक

. . सदस्य सचिव।

(३) परीक्षा बोर्ड की शक्तियाँ, और कृत्य ऐसे होंगे, जैसा कि परिनियमों द्वारा अधिकथित किया जाए।

अन्य प्राधिकरण। २५. विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकरणों का गठन, शक्तियाँ और कृत्य ऐसे होंगे जैसा कि परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाएँ।

निरर्हता। २६. कोई व्यक्ति, विश्वविद्यालय के किन्ही प्राधिकरणों या निकायों का सदस्य होने से नरर्ह होगा, यदि वह,----

(एक) विकृत चित्त का है और सक्षम न्यायालय द्वारा, इस प्रकार घोषित किया गया है ;

(दो) नैतिक अधमता से अन्तर्ग्रस्त किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है ;

(तीन) निजी कोचिंग वर्गों को स्वयं चलाता है या जुडा हुआ है ; या

(चार) कहीं भी, किसी भी रूप में किसी परीक्षा के संचालन में अनुचित व्यवहार करने में जुडे होने या बढ़ावा देने के लिए दंडित किया गया है।

२७. विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या निकाय के कार्य या कार्यवाहियाँ केवल किसी रिक्ति के या उसके गठन में त्रुटि के कारण द्वारा अविधिमान्य नहीं होगी।

विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या निकाय की रिक्तियाँ संबंधी कार्यवाहियाँ अविधिमान्य नहीं होगी। भाग सात-३१४ महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ अस्थायी रिक्तियाँ को भरना।

२८. किसी मामले में विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या निकाय में सदस्य की मृत्यु, इस्तीफा या हटाये जाने के कारण कोई अस्थायी रिक्ति पायी जाती है तो, यथासंभव शीघ्र, व्यक्ति या निकाय द्वारा जिसे ऐसी रिक्ति के स्थान में नियुक्त या सदस्य को नामनिर्देशित क्या गया और अवधि के शेष भाग के लिए अस्थायी रिक्ति को नियुक्त या नामर्िनदिष्ट व्यक्ति ऐसी संस्था या निकास का सदस्य होना चाहिए जिसके लिए व्यक्ति अस्थायी नियुक्ति के लिए नियुक्त किया गया या नामर्िनदिष्ट किया गया व्यक्ति जिस शेष पदावधि के लिए वह ऐसे प्राधिकरण या निकाय का सदस्य होगा, जिस स्थान के लिए रिक्ति भरी जाती है वह सदस्य के रूप में पद धारण करेगा। समितियाँ। २९. (१) विश्वविद्यालय के प्राधिकरणों तथा अधिकारी ऐसे संदर्भो के निबंधनों के साथ ऐसी समितियों द्वारा किये जानेवाले विर्िनदिष्ट कार्यों के लिए जैसा आवश्यक समझें समितियाँ गठित करेंगे।

(२) ऐसी समितियों का गठन, ऐसा होगा जिसे परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट किया जाए।

प्रथम परिनियम। ३०. (१) विश्वविद्यालय का प्रथम परिनियम, शासकीय निकाय द्वारा बनाये जायेंगे और उसके अनुमोदन के लिए सरकार को प्रस्तुत किये जायेंगे।

(२) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन और तद्धीन बनाए गए नियम, विश्वविद्यालय का प्रथम परिनियम निम्न सभी या किन्हीं मामलो के लिए उपबंध करेगा, अर्थात् :----

(क) विश्वविद्यालय के प्राधिकरणों तथा अन्य निकायों के गठन, शक्तियाँ और कृत्य समय-समय पर गठित किये जायेंगे ;

(ख) कुलपति की नियुक्ति के निबंधनों और शर्तों तथा उसकी शक्तियाँ और कृत्य ;

(ग) संकायाध्यक्ष, रजिस्ट्रार तथा मुख्य वित्त तथा लेखा अधिकारी की नियुक्ति की रीति तथा सेवा के निबंधनों और शर्तों तथा उनकी शक्तियाँ और कृत्य ;

(घ) कर्मचारियों के नियुक्ति की रीति तथा सेवा के निबंधनों और शर्तों तथा उनकी शक्तियाँ और कृत्य ;

(ङ) कर्मचारियों, छात्रों तथा विश्वविद्यालय के बीच विवादों के मामले में माध्यस्थम् के लिए प्रक्रिया ;

(च) सम्मानिक उपाधियों को प्रदान करना ;

(छ) छात्रों को अध्यापन फीस अदायगी से छूट देने तथा उन्हें छात्रवृत्ति और अध्येतावृत्ति प्रदान करने के संबंध में उपबंध ;

(ज) आरक्षित सीटों के विनियमन समेत विभिन्न पाठयक्रमों के प्रवेशों की नीति, सीटों की संख्या के संबंध मे उपबंध ; और

(झ) छात्रों से प्रभारित किए जानेवाले फीस के संबंध में उपंबध।

(३) सरकार, शासी निकाय द्वारा प्रस्तुत प्रथम परिनियम का विचार करेगी और यदि कोई हो, ऐसे उपांतरणों के साथ जैसा वह आवश्यक समझे, उसकी प्राप्ति की दिनांक से चार महिने के भीतर, उस पर उसका अनुमोदन देगी। (४) सरकार, राजपत्र में, अपने अनुमोदन द्वारा, प्रथम परिनियम प्रकाशित करेगी, उसके बाद, ऐसे प्रकाशन के दिनांक से प्रथम परिनियम प्रवृत्त होगा।

३१. (१) इस अधिनियम के उपबंधों तथा उसके अधीन बनाये नियमों के अध्यधीन, विश्वविद्यालय के पश्चात्वर्ती परिनियम। पश्चात्वर्ती परिनियम, निम्न सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध करेंगे, अर्थात् :----

(क) विश्वविद्यालय के नए प्राधिकरणों का सृजन करना ;

(ख) लेखा नीति और वित्तीय प्रक्रिया ;

(ग) विश्वविद्यालय के प्राधिकरणों में अध्यापकों का प्रतिनिधित्व करना ;

महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ १५

(घ) नए विभागों का निर्माण और विद्यमान विभाग का उत्सादन या पुन:संरचना करना ;

(ङ) पदकों तथा पुरस्कारों को संस्थित करना ;

(च) पदों के उत्सादन के लिए पदों तथा प्रक्रिया का सृजन करना ;

(छ) फीस का पुनरीक्षण ;

(ज) विभिन्न पाठयविवरण में सीटों की संख्या का परिवर्तन ; और

(झ) परिनियमों द्वारा विर्िनदिष्ट इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन जो सभी अन्य मामले है।

(२) विश्वविद्यालय के परिनियम, प्रथम परिनियम से अन्य शासी निकाय के अनुमोदन के साथ प्रबंध मंडल बोर्ड द्वारा बनाये जायेंगे।

(३) प्रबंध मंडल बोर्ड, समय-समय से नये या अतिरिक्त परिनियम बनाएगा या इस धारा में उपबंधित जिसे इसमें आगे ऐसी रीत्या बनाए गए परिनियमों में संशोधन या निरसन करेगा :

परंतु, प्रबंध मंडल बोर्ड, विश्वविद्यालय के किसी विद्यमान प्राधिकरण के किसी प्रतिष्ठा, शक्तियों या गठन पर प्रभाव डालने वाले कोई परिनियमों या परिनियम के किसी संशोधन नहीं बनाएगा जब तक ऐसा प्राधिकरण प्रस्ताव पर अपनी राय अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं देता है और इस प्रकार कोई राय लिखित में अभिव्यक्त नहीं करता है तब तक होगा तथा उसका शासी निकाय द्वारा विचार किया जाएगा।

(४) प्रत्येक ऐसे परिनियम या परिनियम में परिवर्धन या किसी संशोधन या परिनियम के निरसन सरकार के अनुमोदन के अध्यधीन होंगे :

परंतु, विद्या परिषद से परामर्श के बिना, विद्यर्ाथियों के अनुशासन और शिक्षा का स्तरमान, शिक्षा तथा परीक्षा पर प्रभाव ड़ालने वाले कोई परिनियम प्रबंध मंडल बोर्ड द्वारा नहीं बनाए जाएंगे।

प्रथम र्आडिनेन्स। ३२. (१) विश्वविद्यालय के प्रथन र्आडिनेेन्स, शासी निकाय द्वारा बनाये जायेंगे और उसके अनुमोदन के लिये राज्य सरकार को प्रस्तुत किये जायेंगे।

(२) इस अधिनियम के उपबंधों या तद्धीन बनाए गए नियमों या परिनियमों के अध्यधीन, विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए जैसे उसे उचित समझे शासी निकाय के अनुमोदन के साथ प्रबंध मंडल बोर्ड ऐसे प्रथम र्आडिनेन्सेस बनाएगा और ऐसे र्आडिनेन्सेस निम्न सभी या किन्हीं मामलों के लिए मुहैया कराएगा, अर्थात् :----

(क) विश्वविद्यालय में विद्यर्ाथियों के प्रवेश तथा उनके ऐसे नामांकन ;

(ख) विश्वविद्यालय की उपाधियों, डिप्लोमा और प्रमाणपत्रों के लिए अधिकथित किए जाने वाले अध्ययन पाठयक्रम ;

(ग) उपाधियों, डिप्लोमा, प्रमाणपत्रों तथा अन्य अकादमिक विशिष्टताअों को प्रदान करना, उनके लिए न्यूनतम अर्हताएँ वही होंगी तथा मंजूर करने और प्राप्त करने से संबंधित वही अर्थ होगा ;

(घ) अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति, वृत्तिका, पदक और पुरस्कारों को प्रदान करने के लिए शर्तें ;

(ङ) कार्यालय की शर्तें और नियुक्ति की रीति और परीक्षा निकाय के कर्तव्य, परिक्षकों तथा अनुसीमकों समेत परीक्षाअों का संचालन ;

(च) विश्वविद्यालय के विभिन्न पाठयचर्याअों, परीक्षाअों, उपाधियों तथा डिप्लोमाअों के लिए प्रभारित की जानेवारी फीस ;

(छ) विश्वविद्यालय के छात्रावास में विद्यर्ाथियों के आवास की शर्तें ;

(ज) छात्रों के विरूद्ध अनुशासनात्मक कारवाई करने संबंधी उपबंध ;

भाग सात-४१६ महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ (झ) विश्वविद्यालय के शैक्षणिक जीवन में सुधार करने के लिए किसी अन्य निकाय के सृजन, संरचना और कृत्य जो कि आवश्यक माने गए हैं ;

(ञ) उच्च शिक्षा के अन्य विश्वविद्यालय तथा संस्थाअों से सहकारिता और सहयोग की रीति ; और (ट) इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए परिनियमों द्वारा जो अन्य सभी मामले र्आडिनेन्सों द्वारा मुहैया करना अपेक्षित है।

(३) सरकार, उप-धारा (१) के अधीन कुलपति द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रथम र्आडिनेन्सों का विचार करेगी और ऐसे उपांतरण के साथ यदि कोई आवश्यक समझे तो, उसकी प्राप्ति के दिनांक से, चार महीनों के भीतर अनुमोदन देगी।

३३. (१) अकादमिक परिषद द्वारा बनाए गए प्रथम र्आडिनेन्स से अन्य सभी र्आडिनेन्स, प्रबंध मंडल पश्चात्वर्ती र्आडिनेन्स॥

बोर्ड द्वारा अनुमोदित किए जाने के बाद उसके अनुमोदन के लिए शासी निकाय को प्रस्तुत किए जाएँगे।

(२) अकादमिक परिषद, या तो प्रबंध मंडल बोर्ड और शासी निकाय के सुझावों को सम्मिलित करके र्आडिनेन्सेस उपांतरित करेगी या सुझावों को सम्मिलित न करने के लिए कारण देगी, यदि कोई हो, ऐसे कारणों के साथ र्आडिनेन्सेस लौटाएगी। प्रबंध मंडल बोर्ड और शासी निकाय अकादमिक परिषद के सुझाअों का विचार करेंगे और विश्वविद्यालय के र्आडिनेन्सेस ऐसे उपांतरणों के साथ या के बिना अनुमोदित किए जायेंगे और तत्पश्चात्, शासी निकाय द्वारा अनुमोदित रूप में र्आडिनेन्सेस प्रवृत्त होंगे।

विनियम। ३४. विश्वविद्यालय के प्राधिकरण प्रबंध मंडल बोर्ड के पूर्वानुमोदन के अध्यधीन, उसके स्वयं के कारोबार और उसके द्वारा नियुक्त समितियों को संचालित करने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों, नियमों, तद्धीन बनाए गए र्आडिनेन्स और परिनियमों से संगत विनियम बनाएँगे।

३५. (१) विश्वविद्यालय में प्रवेश गुणागुण के आधार पर कड़ाई से किये जायेंगे।

प्रवेश।

(२) विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए गुणागुण के आधार पर या प्रवेश के लिए अर्हता परीक्षा में प्राप्त किए गए श्रेणी के आधार पर और पाठयक्रमेतर तथा पाठयेतर गतिविधियों में प्राप्त उपलब्धि या राज्यस्तर पर संचालित प्रवेश परीक्षा में प्राप्त गुण या श्रेणी के आधार पर या विश्वविद्यालय के सहयोजन द्वारा या राज्य के किसी एजेंसी द्वारा होंगे :

परंतु, वृत्तिक तथा तकनीकी पाठयचर्याअों में प्रवेश केवल प्रवेश परीक्षा के जरिए होंगे।

(३) अनुसूचित-जाति, अनुसूचित जनजाति, विमुक्त जाति, खानाबदोष जनजाति, अन्य पिछड़े वर्गों, विशेष पिछड़े वर्गों तथा विकलांग छात्रों से संबंध रखनेवाले छात्रों के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए सीटें राज्य सरकार की नीति के अनुसार आरक्षित रखी जाएँगी :

परंतु, किसी मामले में कुल आरक्षण पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।

(४) महाराष्ट्र का अधिवास रखनेवाले छात्रों के लिए अनुमोदित कुल ग्रहण क्षमता में से सत्तर प्रतिशत सीटें आरक्षित रखी जायेगी।

फीस संरचना। ३६. (१) विश्वविद्यालय समय-समय से अपनी फीस संरचना तैयार करेगी और इस प्रयोजन के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित समिति को उसके अनुमोदन के लिए उसे भेजेगी।

(२) सरकार, विश्वविद्यालय से प्राप्त फीस संरचना प्रस्तावों के पुर्नविलोकन के लिए विहित रीत्या में फीस संरचना पुर्नविलोकन समिति गठित करेगी।

(३) उप-धारा (२) के अधीन उल्लेखित समिति के लिए अध्यक्ष, उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमर्ूति या किसी उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायमर्ूति होगा। जो व्यक्ति, समिति का अध्यक्ष होगा वह सन्माननीय उच्च न्यायालय, मुंबई द्वारा सिफारिश से होगा।महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ १७ (४) समिति, विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किए गए फीस संरचना का विचार करेगी, उसका पुर्नविलोकन करेगी और चाहे प्रस्तावित फीस-----

(क) के लिए पर्याप्त---

(एक) विश्वविद्यालय के आवर्ती व्यय की पर्ूति करने के लिए उत्पादन स्त्रोत ; और

(दो) विश्वविद्यालय के अधिकतर विकास के लिए आवश्यक बचत ; और

(ख) अनुचित रूप से अत्याधिक नहीं है, यह विचार में लेने के पश्चात् सरकार को उसकी सिफारिशें प्रस्तुत करेगी।

(५) उप-धारा (४) के अधीन सिफारिशों की प्राप्ति के बाद, यदि सरकार का समाधान हो जाता है, तो फीस संरचना का अमुमोदन करेगा। सरकार द्वारा अनुमोदित फीस संरचना, अगले पुनरीक्षण तक शेष वैध रहेगी।

(६) राज्य सरकार स्ववित्तपोषित विश्वविद्यालय में प्रवेश किए हुए पिछ़डे वर्गों से संबंधित छात्रों के लिए प्रतिपर्ूति फीस नहीं देगी या कोई र्आथिक दायित्व नहीं लेगी।

(७) विश्वविद्यालय, उप-धारा (५) के अधीन जिसके लिए वह हकदार है, उससे अन्य कोई फीस, चाहे किसी भी नाम से हो, प्रभारित नहीं करेगी।

प्रति व्यक्ति फीस का प्रतिशेध। ३७. (१) कोई प्रति व्यक्ति फीस विश्वविद्यालय द्वारा या की और से या कोई व्यक्ति जो ऐसी, संस्था के प्रबंधन के लिए प्रभारी है या जिम्मेवार है, के द्वारा, किसी छात्र से या उसके प्रवेश के प्रतिफलेन और ऐसी संस्था में किसी अध्ययन के पाठयक्रम या उच्चतर कक्षा या वर्ग में उसकी प्रोन्नति के लिए, संग्रहीत नहीं की जाएगी।

(२) उप-धारा (१) में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्रबंधन रोकड़ या किस्म में विहित रीत्या विन्यास निधि व्यक्तियों या संगठन या लोकन्यासों या किसी अन्य लोगों के संगठन से छात्रवृत्ति या पुरस्कार या जैसे प्रदान करने के लिए विन्यास निधि सृजन करने के लिए नए शिक्षण संस्थाअों को खोलने के लिए सद्भाव में दान संग्रह या प्राप्त करेगी लेकिन, ऐसे दान संग्रहीत या स्वीकारते समय प्रबंधन ऐसे दान के विचार में उसके द्वारा चलित किसी शैक्षणिक संस्था में कोई सीटें आरक्षित नहीं रखेगी। जहाँ ऐसे संदान की स्वीकृति के विचार में ऐसी संस्था में किसी छात्र के प्रवेश के लिए कोई जगह आरक्षित है तो दान के ऐसे प्रतिग्रहण, प्रतिव्यक्ति फीस, महाराष्ट्र शैक्षणिक संस्थान (प्रतिव्यक्ति फीस का प्रतिषेध) अधिनियम, १९८७ की धारा २ के खण्ड (क) के अर्थान्तर्गत समझे जाएँगे। सन् १९८८ का महा. ६।

परीक्षाअों की समय सारणी। ३८. प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के शुरुआत में और किसी मामले में, प्रत्येक कलैंडर वर्ष के ३० जून से पहले विश्वविद्यालय उसके द्वारा संचालित हर और प्रत्येक पाठयक्रम के लिए सत्रवार या, यथास्थिति, वर्ाषिक परीक्षाअों की समय-सारणी तैयार तथा प्रकाशित करेगा और ऐसे समय-सारणी का कड़ाई से पालन होगा :

परंतु, यदि चाहे जिस किसी भी कारण के लिए, विश्वविद्यालय यह समय-सारणी अनुसरण करने में असमर्थ है तो वह यथासंभव शीघ्र सरकार को प्रकाशित समय-सारणी से प्रस्थान तैयार करने के लिए विस्तृत कारणों को देने की रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। सरकार, उस पर भविष्य में अनुपालन के लिए जैसा कि उचित समझे, ऐसे निदेश जारी करेगी।

परिणामों की घोषणा। ३९. (१) विश्वविद्यालय, विशिष्ट पाठ्यक्रम के लिए उसके द्वारा संचालित प्रत्येक परीक्षा के परिणामों की घोषणा परीक्षा की अंतिम दिनांक से लेकर तीस दिनों के भीतर करने का प्रयास करेगी और किसी मामले में नवीनतम परिणाम ऐसे दिनांक से पैंतालीस दिनों के भीतर घोषित करेगा :

परंतु यदि, जो कोई भी कारण हो, विश्वविद्यालय किसी भी परीक्षा के परिणाम पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर, अंतिमत: घोषित करने में असमर्थ है, वह सरकार को ऐसे विलंब के विस्तृत कारणों में समाविष्ट रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। सरकार, उस पर, भविष्य में बेहतर अनुपालन के लिए, जैसा कि वह उचित समझे, ऐसे निर्देश जारी करेगा।

(२) कोई परीक्षा या परीक्षा के परिणाम, विश्वविद्यालय ने धारा ३८ में अनुबद्ध परीक्षा की अनुसूची का अनुसरण नहीं किया है या उप-धारा (१) में विर्िनदिष्ट अवधि के भीतर, विश्वविद्यालय परिणाम घोषित करने में असफल हुआ है सिर्फ इसी कारण के लिए अविधिमान्य नहीं होगी। भाग सात-४अ१८ महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ दीक्षांत समारोह। ४०. उपाधियाँ, डिप्लोमाएँ प्रदान करने के लिए या किसी अन्य प्रयोजनार्थ विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह परिनियमों द्वारा विहित रित्या में, प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष, में किया जाएगा।

विश्वविद्यालय का प्रत्यायन।

४१. विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय मूल्यांकन तथा प्रत्यायन परिषद नॅक (एनएएसी), बैंगलोर से उसके संस्थित होने से तीन वर्ष के भीतर, प्रत्यायन अभिप्राप्त करेगा तथा विश्वविद्यालय को नॅक द्वारा उपबंधित श्रेणी के बारे में सरकार तथा अन्य ऐसी विनियमित निकायों को जो विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जानेवाले पाठयक्रमों से संबंधित है, को जानकारी देगा। विश्वविद्यालय, तत्पश्चात्, ऐसे प्रत्यायन प्रत्येक पाँच वर्ष के अंतराल पर नवीकृत कर सकती है।

४२. इस अधिनियम में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, विश्वविद्यालय विनियमित निकायों के नियमों, विनियमों, मानकों आदि के पालन के लिए और ऐसे निकायों को उनके द्वारा उनके कर्तव्यों का निर्वहन तथा उनके कार्यों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक है, ऐसी सभी सुविधाअों और सहायता मुहैया करने के लिए बाध्यकारी होगी।

विश्वविद्यालय विनियमित निकायों के नियमों, विनियमों, मानकों आदि का अनुसरण करेगा।

वर्ाषिक रिपोर्ट। ४३. (१) विश्वविद्यालय का वर्ाषिक रिपोर्ट, प्रबंधन मंडल बोर्ड तैयार करेगा, जिसमें अन्य मामलों में विश्वविद्यालय द्वारा उसके उद्देश्यों को पूरा करने हेतु उठाए गए कदमों का समावेश होगा तथा शासी निकाय द्वारा अनुमोदित किया जाएगा तथा उसी की प्रति प्रायोजक निकाय को भेजी जाएगी।

(२) उप-धारा (१) के अधीन तैयार की गई वर्ाषिक रिपोर्ट की प्रतियाँ, सरकार को भी प्रस्तुत की जाएगी। (३) राज्य सरकार, ऐसी रिपोर्ट राज्य विधान मंडल के हर एक सदन के समक्ष रखेगी।

वर्ाषिक लेखा और संपरीक्षा।

४४. (१) तुलनपत्र समेत विश्वविद्यालय के वर्ाषिक लेखा, प्रबंध मंडल बोर्ड के निर्देशों के अधीन तैयार किए जाएँगे और इस प्रयोजन के लिए विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त लेखापरीक्षकों द्वारा प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार लेखापरीक्षा की जाएगी।

(२) लेखापरीक्षा रिपोर्ट के साथ वर्ाषिक लेखा की प्रति, शासी निकाय को प्रस्तुत की जाएगी।

(३) वर्ाषिक लेखाअों तथा शासी निकाय के संप्रेक्षणों के साथ जोड़ी गई लेखापरीक्षा रिपोर्ट प्रायोजक निकाय को प्रस्तुत की जाएगी।

(४) उप-धारा (१) के अधीन तैयार किए गए वर्ाषिक लेखाअों और तुलनापत्र की प्रतियाँ भी सरकार को प्रस्तुत की जाएगी।

(५) सरकार की सलाह, यदि कोई हो, विश्वविद्यालय के लेखा और लेखापरीक्षा की रिपोर्ट से उद्भूत होती है तो, शासी निकाय के सामने रखी जाएगी और शासी निकाय, जैसा उचित समझे ऐसे निदेश जारी करेगी और उसका अनुपालन सरकार को प्रस्तुत करेगी।

४५. (१) विश्वविद्यालय से संबंधित अध्यापन, परीक्षा और संशोधन या किसी अन्य मामले की श्रेणियाँ अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए, सरकार, कुलपति से परामर्श के बाद, जैसा वह उचित समझे ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा जैसा कि विहित किया जाए ऐसी रीति में मामला निर्धारण करेगी।

विश्वविद्यालय का निरीक्षण करने की सरकार की शक्तियाँ।

(२) सरकार, सुधारक कार्यवाही के लिए ऐसे निर्धारण के परिणामस्वरूप, संबंध में उसकी सिफारिशें विश्वविद्यालय को संसूचित करेगी और विश्वविद्यालय शिफारिशों के अनुपालन की सुनिश्चिति के लिए आवश्यकता के रूप में ऐसे सुधारक उपाय करेगी।

(३) यदि विश्वविद्यालय, उचित समय के भीतर, उप-धारा (२) के अधीन बनी सिफारिशों का अनुपालन करने में असफल रहती है तो सरकार, जैसा वह उचित समझे ऐसे निर्देश देगी जो विश्वविद्यालय पर बाध्यकारी होंगे।महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ १९ ४६. (१) प्रायोजक निकाय, विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और छात्रों को अग्रिम रूप में कम से कम एक वर्ष की इस प्रभाव की सूचना सरकार को देकर, विश्वविद्यालय विघटित करेगी :

प्रायोजक निकाय द्वारा विश्वविद्यालय का विघटन। परंतु, विश्वविद्यालय का विघटन, केवल उसके नियमित पाठयक्रम पूरे करनेवाले छात्रों की अंतिम बॅच का होगा और उन्हें उपाधि, डिप्लोमा या, यथास्थिति, पुरस्कारों से पुरस्कृत किये जाने पर ही प्रभावी होगा।

(२) विश्वविद्यालय के विघटन पर विश्वविद्यालय की सभी आस्तियाँ और दायित्व, प्रायोजक निकाय में निहित होंगी :

परंतु, विश्वविद्यालय उसकी स्थापना से पच्चीस वर्ष पहले प्रायोजक निकाय द्वारा विघटन किये जाने के मामले में विश्वविद्यालय की सभी आस्तियाँ, सभी ऋणभारों से मुक्त होकर सरकार में निहित होंगी।

कतिपय परिस्थितियों में राज्य सरकार की विशेष शक्तियाँ। ४७. (१) यदि, सरकार को यह प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालय इस अधिनियम या तद्धीन बनाये गये नियमों, परिनियमों या र्ऑडिनेन्स के किन्ही उपबंधों का उल्लंघन करता है या इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा जारी किन्ही निर्देशों का उल्लंघन हुआ है या इस अधिनियम, की धारा ५ के अधीन दिये गये किन्हीं उपक्रमों के निर्वहन से परिविरत होता है या विश्वविद्यालय में वित्तीय अव्यवस्था या कुप्रशासन की स्थिति उद्भूत होती है तो वह अपेक्षित विश्वविद्यालय को पैंतालिस दिनों के भीतर कारण बताअों नोटीस जारी करेगा क्यों न उसके समापन का आदेश बनाया जाये।

(२) यदि, सरकार का, उप-धारा (१) के अधीन जारी की गई सूचना पर विश्वविद्यालय के जबाब की प्राप्ति पर, समाधान हो जाता है कि प्रथमदृष्टया इस अधिनियम या तद्धीन बनाये गये नियमों, परिनियमों या र्ऑडिनेन्स के समस्त या किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन हुआ है या इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा जारी निर्देशों का उल्लंघन हुआ है या इस अधिनियम की धारा ५ के अधीन दिये गये किन्ही उपक्रमों के निर्वहन से परिविरत हुआ है या वित्तीय अव्यवस्था या कुप्रशासन हुआ है तो वह आवश्यक समझे ऐसी जाँच के आदेश बना सकेगी।

(३) सरकार, उप-धारा (२) के अधीन किसी जाँच के प्रयोजन के लिए, किन्हीं भी अभिकथनों में जाँच करने के लिए किसी जाँच अधिकारी या अधिकारियों को नियत करेगी उसपर रिपोर्ट बनायेगी।

सन १९०८ का ५।

(४) उप-धारा (३) के अधीन नियत किये गये जाँच अधिकारी या अधिकारियों को, सिविल प्रक्रिया संहिता, १९०८ के अधीन सिविल न्यायालय में जो शक्तियाँ निहित होती है वह निम्नलिखित मामलों के संबंध में वाद का विचारण करते समय होगी, अर्थात् :----

(क) किसी व्यक्ति को उपस्थित रहने के लिए, समन जारी करना और प्रवृत्त करना और शपथ पर उसका परीक्षण करना ;

(ख) साक्ष्य में प्रतिपादित किये गये अपेक्षित किसी से दस्तावेज या किसी अन्य सामग्री की खोज या निर्माण करना ;

(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी सार्वजनिक अभिलेख की अपेक्षा करना ; और

(घ) कोई अन्य मामला जिसे विहित किया जाये।

(५) जाँच अधिकारी या अधिकारियों की, इस अधिनियम के अधीन जाँच, दण्ड प्रक्रिया संहिता, १९७३ की सन १९७४ का २।

धारा १९५ और अध्याय २६ के प्रयोजनों के लिये सिविल न्यायालय समझा जायेगा।

(६) उप-धारा (३) के अधीन नियुक्त किये गये अधिकारी या अधिकारियों से जाँच रिपोर्ट की प्राप्ति पर, यदि सरकार का यह समाधान हो जाता है कि विश्वविद्यालय ने इस अधिनियम के सभी या किन्ही उपबंधों या तद्धीन बनाये गये नियमों, परिनियमों, या र्ऑडिनेन्स का उल्लंघन किया है या इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा जारी किन्ही निर्देशों का उल्लंघन किया है इस इस अधिनियम की धारा ५ के अधीन उसके द्वारा किये गये उपक्रमों को कार्यान्वित करने के लिये परिविरत है या विश्वविद्यालय के अकादमिक मानकों के संतर्जक से वित्तीय कु-प्रबंधन या कु-प्रशासन की स्थिति विश्वविद्यालय में उद्भूत हुई है तो विश्वविद्यालय के परिसमापन या प्रशासक की नियुक्ती के लिए प्रारंभिक आदेश जारी किये जायेंगे।२० महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ (७) उप-धारा (६) के अधीन नियुक्त किये गये प्रशासक को इस अधिनियम के अधीन शासी निकाय और प्रबंधन मंडल बोर्ड की सभी शक्तियाँ होंगी और सभी कर्तव्यों के अध्यधीन होगा और विश्वविद्यालय के कामकाज का प्रबंध तब तक करेगा जब तक नियमित पाठयक्रमों के छात्रों की अंतिम बॅच उनके पाठयक्रम को पूरा नहीं करती हैं और उपाधि, डिप्लोमा या, यथास्थिति, पुरस्कार प्रदान नही किया गया है।

(८) उपाधि, डिप्लोमा या, यथास्थिति पुरस्कार प्रदान करने के पश्चात्, नियमित पाठयक्रमों के छात्रों की अंतिम बॅच के लिये प्रशासक, सरकार को इस प्रभाव की रिपोर्ट करेगा।

(९) उप-धारा (८) के अधीन रिपोर्ट की प्राप्ति पर सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विश्वविद्यालय के विघटन के अंतिम आदेश जारी करेगी और ऐसी अधिसूचना के प्रकाशन के दिनांक से विश्वविद्यालय विघटित होगा और विश्वविद्यालय की सभी आस्तियाँ और दायित्व ऐसे दिनांक से प्रायोजक निकाय में निहित होगी।

४८. (१) इस अधिनियम के प्रारंभण के तुरंत पश्चात्, राज्य सरकार द्वारा, समय-समय पर विरचित स्व-वित्तपोषित विश्वविद्यालय की स्थापना से संबंधित मार्गदर्शक सिद्धांतो की आवश्यकताअों के अनुपालन के सचिव स्तरिय समिति और विश्वविद्यालय के परिचालन। सत्यापन और सुनिश्चित करने के क्रम में, सचिव स्तरिय समिति स्थापित की जायेगी और प्रायोजक निकाय को परिवचन प्रस्तुत करेगी। समिति, उच्चतर तथा तकनीकी शिक्षा विभाग, वित्त विभाग और नियोजन विभाग के प्रभारी सचिवों से मिलकर बनेगी।

(२) उप-धारा (१) के अधीन गठित समिति, उसकी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत करेगी।

(३) उप-धारा (२) के अधीन रिपोर्ट की प्राप्ति पर, राज्य सरकार, विश्वविद्यालय के परिचालन को अनुमति देते हुये राजपत्र में, अधिसूचना प्रकाशित करेगी।

(४) विश्वविद्यालय, उप-धारा (३) के अधीन जारी की गई सूचना के पश्चात् ही केवल छात्रों को प्रवेश देगा।

४९. (१) सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति।

नियम बना सकेगी।

(२) पूर्वगामी शक्तियाँ की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्न समस्त या किन्ही मामलों का उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :----

(क) धारा ४७ की, उप-धारा (४) के खंड (घ) के अधीन विहित किये जानेवाले मामले ;

(ख) कोई अन्य मामला जिसे नियमों द्वारा विहित करना आवश्यक है या किया जा सके। (३) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, उसके बनाए जाने के पश्चात् यथा संभव शीघ्र, राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिनों की अवधि के लिए रखा जाएगा जो कि चाहे वह एक सत्र में दो या अधिक अनुक्रमिक सत्रों में हो, और यदि, उस सत्र में जिसमें उसे रखा गया है, उसके ठीक बाद के सत्र या सत्रों के अवसान के पूर्व दोनों सदन नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत होते हों या दोनों सदन इस बात के लिए सहमत होते हों कि नियम न बनाया जाए तो नियम, अधिसूचना के प्रकाश के दिनांक से, केवल ऐसे परिर्वतित रुप में हों प्रभावी होगा, या, यथास्थिति, निष्प्रभावी हो जायेगा ; तथापि, ऐसा कोई परिवर्तन या बातिलिकरण, उस नियम के अधीन पहले की गई किसी बात या विलुप्ति की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी।महाराष्ट्र शासन राजपत्र भाग सात, गुरुवार ते बुधवार, सप्टेंबर २६-ऑक्टोबर २, २०१९/आश्विन ४-१०, शके १९४१ २१ ५०. (१) इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में यदि कोई कठिनाई उद्भूत होती है तो सरकार, जैसा अवसर उद्भूत हो, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों से अनसंगत कोई बात कर

कठिनाईयों के निराकरण की शक्ति। सकेगी, जो उसे कठिनाई के निराकरण के लिए आवश्यक या इष्टकर प्रतीत हों :

परंतु, ऐसा कोई भी आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभण के दिनांक से दो वर्षों की अवधि के अवसान के बाद, नहीं बनाया जायेगा।

(२) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया प्रत्येक आदेश उसके बनाए जाने के पश्चात् यथा संभव शीघ्र, राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के समक्ष रखा जायेगा।

(यथार्थ अनुवाद),

हर्षवर्धन जाधव,

भाषा संचालक, महाराष्ट्र राज्य।

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Cite this issue. Maharashtra Gazette, Government of Maharashtra, 26 September 2019. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.maharashtra.2019-09-26.Ordinary_CENTRAL-SECTION_Part-7-Hindi-/. Archive identifier in.gazette.maharashtra.2019-09-26.Ordinary_CENTRAL-SECTION_Part-7-Hindi-.