RNI No. MAHBIL/2009/31730
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L. A. BILL No. XXXIII OF 2022.
A BILL
FURTHER TO AMEND THE MAHARASHTRA INDUSTRIAL RELATIONS ACT, THE MAHARASHTRA LABOUR WELFARE FUND ACT, THE MAHARASHTRA MATHADI, HAMAL AND OTHER MANUAL WORKERS (REGULATION OF EMPLOYMENT AND WELFARE) ACT, 1969, THE MAHARASHTRA PRIVATE SECURITY GUARDS (REGULATION OF EMPLOYMENT AND WELFARE) ACT, 1981 AND THE MAHARASHTRA WORKMEN'S MINIMUM HOUSE-RENT ALLOWANCE ACT, 1983.
विधानसभा का विधेयक क्रमांक ३३ सन् २०२२ ।
महाराष्ट्र औद्योगिक संबंध अधिनियम, महाराष्ट्र श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम, महाराष्ट्र
माथाडी, हमाल और अन्य शारीरिक श्रम करनेवाले कर्मकार (रोजगार का विनियमन और
कल्याण) अधिनियम, १९६९, महाराष्ट्र निजी सुरक्षा रक्षक (रोजगार का विनियमन और
कल्याण) और महाराष्ट्र कर्मकारों का न्यूनतम मकान-किराया भत्ता अधिनियम, १९८३ में
अधिकतर संशोधन करने संबंधी विधेयक ।
(१)
भाग सात-३४-१. एचबी--२४८०-(१)२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २१, २०२२/अग्रहायण ३०, शके १९४४ सन १९४७ का बम्बई ११। सन १९५३ का मुंबई ४०। सन १९६९ का महा. ३०। सन १९८१ का महा. ५८। सन १९८८ का महा. २३। क्योंकि इसमें आगे र्दशित प्रयोजनों के लिए, महाराष्ट्र औद्योगिक संबंध अधिनियम, महाराष्ट्र श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम, महाराष्ट्र माथाडी, हमाल और अन्य शारीरिक श्रम करनेवाले कर्मकार (रोजगार का विनियमन और कल्याण) अधिनियम, १९६९, महाराष्ट्र निजी सुरक्षा रक्षक (रोजगार का विनियमन और कल्याण) अधिनियम, १९८१ और महाराष्ट्र कर्मकारों का न्यूनतम मकान किराया भत्ता अधिनियम, १९८३ में अधिकतर संशोधन करना इष्टकर है ; अत: भारत गणराज्य के तिहत्तरवें वर्ष में, एतद्द्वारा, निम्न अधिनियम अधिनियमित किया जाता है :----
अध्याय एक
प्रारम्भिक ।
संक्षिप्त नाम। १. यह अधिनियम महाराष्ट्र श्रमिक विधि (संशोधन) अधिनियम, २०२२ कहलाए ।
अध्याय दो
महाराष्ट्र औद्योगिक संबंध अधिनियम में संशोधन ।
सन् १९४७ का मुंबई ११ की धारा १०४ में संशोधन।
सन् १९४७ का मुंबई ११। २. महाराष्ट्र औद्योगिक संबंध अधिनियम (जिसे इसमें आगे, इस अध्याय में ""औद्योगिक संबंध अधिनियम"" कहा गया है) की धारा १०४ में, " दोनों में से किसी भी भ्रांति के कारावास जिसकी अवधि तीन महिने तक बढायी जा सकेगी, या जुर्माने से या दोनो सहित"" शब्दों स्थान में, ""ऐसे जुर्माने से जो पाँच लाख रुपयों से कम नहीं होगी परंतु जिसे दस लाख रुपयों तक बढ़ाया जा सकेगा"" शब्द रखे जायेंगे ।
सन् १९४७ का मुंबई ११ की धारा १०६ में संशोधन।
३. औद्योगिक संबंध अधिनियम की धारा १०६ की, उप-धारा (२) में, ""ऐसे कारावास से जिसे तीन महीने तक बढ़ाया जा सके या जिसपर उल्लंघन जारी रहा है प्रत्येक दिन के लिए जुर्माने जिसे पाँच हजार रुपयों तक बढ़ाया जा सके या दोनों से दण्डित किया जायेगा"" शब्दों, अक्षरों और अंकों के स्थान पर ""पाँच लाख रुपयों के जुर्माने से या प्रत्येक दिन के लिए जिसपर उल्लंघन जारी रहा है के जुर्माने से जिसे पाँच हजार रुपयों तक बढ़ाया जा सके"" शब्द रखे जायेंगे ।
अध्याय तीन
महाराष्ट्र श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम में संशोधन ।
४. महाराष्ट्र श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम (जिसे इसमें आगे, इस अध्याय में ""श्रमिक कल्याण निधि सन् १९५३ का ४०। अधिनियम"" कहा गया है) की धारा १७क में,------
सन् १९५३ का ४० की धारा १७क में संशोधन।
(१) खण्ड (क) और (ग) के स्थान में, निम्न खण्ड रखा जाएगा, अर्थात :----
"" (क) प्रथम अपराध के लिए ऐसे जुर्माने से जिसे एक लाख रुपयों तक बढाया जा सकेगा "" ;
(ब) द्वितीय या पश्चातवर्ती अपराध के लिए जुर्माने से जिसे दो लाख रुपयों तक बढाया जा सकेगा "" ;
परन्तुक में, "" पचास हजार रुपयों "" शब्दों के स्थान में, ""पाँच हजार रुपयों "" शब्द रखे जायेंगे।
५. श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम की धारा १७ख पश्चात् निम्न धारा निविष्ट की जायेगी, अर्थात् :---
सन् १९५३ का ४०में नई धारा १७ग का निवेशन।
अपराधों का प्रशमन।
"" १७ग (१) धारा १७क के खण्ड (क) के अधिन दण्डनीय अपराध, अभियुक्त व्यक्ति के किसी आवेदन पर, या तो कोई अभियोजन संस्थित करने के पूर्व या के पश्चात, जैसा कि विहित किया जाए ऐसी रीत्या में, ऐसे अपराध के लिए उपबंधित जुर्माने की राशि के लिए कल्याण आयुक्त द्वारा प्रशमित किया जा सकेगा।
(२) उप-धारा (१) में अंर्तविष्ट कोई बात,-----
(क) एक समान अपराध, जो पहले प्रशमित किया गया था, के करने के ; या
(ख) समान अपराध जिसके लिए ऐसा व्यक्ति पहले दोषसिद्ध हुआ था, के करने के दिनांक से पाँच वर्षों की अवधि के भीतर द्वितीय समय के लिए या के तत्पश्चात् के लिए व्यक्ति द्वारा किए गए किसी अपराध के लिए लागू नहीं होगी।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २१, २०२२/अग्रहायण ३०, शके १९४४ ३ (३) कल्याण आयुक्त, राज्य सरकार के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन किसी अपराध का प्रशमन करने की शक्ितयों का प्रयोग करेगा।
(४) किसी अपराध का प्रशमन करने के लिए प्रत्येक आवेदन जैसा कि विहित किया जाए ऐसे प्ररुप तथा रित्या में किया जाएगा।
(५) जहाँ कोई अपराध, कोई अभियोजन संस्थित करने के पूर्व प्रशमित किया गया है तो जिस अपराध को इसप्रकार प्रशमित किया है, के संबंध में अपराधि के विरुद्ध ऐसे अपराध के संबंध कोई अभियोजन संस्थित नहीं किया जायेगा।
(६) किसी अभियोजन के संस्थित होने के पश्चात् जहाँ किसी अपराध का प्रशमन किया गया है, तो ऐसा प्रशमन लिखित में कल्याण आयुक्त द्वारा जिस न्यायालय के समक्ष अभियोजन विलंबित है, को ध्यान में लाया जायेगा और अपराध के प्रशमन की ऐसी सूचना दिए जाने पर व्यक्ित, जिसके विरुद्ध के अपराध को इसप्रकार प्रशमित किया है, उन्मोचित होगा।
(७) इस धारा के उपबंधो के अधीन और के अनुसरण में के अपराधों के सिवाय इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन दण्डनीय कोई अपराध प्रशमित नहीं किया जायेगा।
अध्याय चार
महाराष्ट्र माथाडी, हमाल और अन्य शारिरिक श्रम करनेवाले कर्मकार
(रोजगार का विनियमन और कल्याण) अधिनियम, १९६९ में संशोधन ।
सन् १९६९ का महा. ३०।
सन् १९६९ का महा. ३० की धारा ३ में संंशोधन। ६. महाराष्ट्र माथाडी, हमाल और अन्य शारीरिक श्रम करनेवाले कर्मकारों (रोजगार का विनियोजन और कल्याण) अधिनियम, १९६९ (जिसे इसमें आगे, इस अध्याय में, "" माथाडी, हमाल और अन्य शारिरिक श्रम करनेवाले कर्मकार अधिनियम "" कहा गया है) की धारा ३, की उप-धारा (३) के स्थान में, निम्न उप-धारा रखी जायेगी अर्थात् :----
"" (३) योजना में आगे यह की,----
(एक) उसके किसी उपबंधों के प्रथम उल्लंघन के लिए जुर्माने से, जिसे, जैसा कि विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी रकम तक बढायी जा सकेगी (परंतु पाँच हजार रुपयों से अधिक के मामले में नही) से दण्डित किया जायेगा ;
(दो) उसके किसी उपबंधों के द्वितीय या पश्चातवर्ती उल्लंघन के लिए, जैसा कि विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे अवधि के कारावास से (परंतु तीन महीनों से अत्यधिक के मामले में नही) दोषसिद्धी पर ऐसे जुर्माने से, जिसे, जैसा कि विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी रकम तक बढाया जा सकेगा (परन्तु, दस लाख रुपयों से अधिक नहीं होगा) ; और
(तीन) दोषसिद्धि के पश्चात् यदि उल्लंघन निरंतर किया जाता है तो जिसने इसप्रकार का उल्लंघन निरंतर किया गया है, जिसे ऐसे प्रत्येक दिन के लिए पाँच हजार रुपयों तक बढाया जा सके ऐसे अधिक जुर्माने से दण्डित किया जायेगा।
७. माथाडी, हमाल और अन्य शारिरिक श्रम करनेवाले कर्मकार अधिनियम की धारा २७ में,----- सन् १९६९ का महा. ३० की धारा २७ में संशोधन। (१) "" पाँच सौ रुपए "" शब्दों के स्थान में, "" पाँच लाख रुपए "" शब्द रखे जायेंगे ;
(२) "" सौ रुपए "" शब्दों के स्थान में, "" पाँच हजार रुपए "" शब्द रखे जायेंगे ।४ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २१, २०२२/अग्रहायण ३०, शके १९४४ ८. माथाडी, हमाल और अन्य शारिरिक श्रम करनेवाले कर्मकार अधिनियम की धारा २७ के पश्चात्, निम्न धारा निविष्ट की जायेगी, अर्थात् :------
सन् १९६९ का महा. ३० में नई धारा २७-१क का निवेशन।
अपराधों का प्रशमन।
"" २७-१क. योजना के अधीन दण्डनीय किसी योजना के किन्हीं उपबंधो के उल्लंघन का कोई अपराध, अभियुक्त व्यक्ति के किसी आवेदन पर, अभियोजन के संस्थित होने के या तो पूर्व या के बाद में, संबंधित बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा केवल जुर्माने से दण्डनीय ऐसे अपराध के लिए उपबंधित अधिकतम जुर्माने के पचास प्रतिशत की एक राशि के लिए और जैसा कि विहित किया जाए ऐसी रित्या में ऐसे जुर्माने से जो तीन महीने से अधिक नहीं होगा के लिए कारावास से, या जुर्माने से, दण्डनीय ऐसे अपराध के लिए उपबंधित अधिकतम जुर्मानेे के पचहत्तर प्रतिशत की राशि से प्रशमित किया जा सकेगा।
परंतु, प्रशमन की ऐसी रकम उस बोर्ड के प्रशासन के प्रयोजन के लिए स्थापित संबंधित बोर्ड के प्रशासकीय खाते में जमा की जायेगी।
(२) उप-धारा (१) में अंर्तविष्ट कोई बात,---
(क) एक समान अपराध जो पहले प्रशमित किया गया था, के करने के ; या
(ख) समान अपराध जिसके लिए ऐसा व्यक्ति पहले दोषसिद्ध हुआ था, के करने के दिनांक से तीन वर्ष की अवधि के भीतर द्वितीय समय या के तत्पश्चात् के लिए व्यक्ति द्वारा किए गए किसी अपराध को लागू नहीं होगी।
(३) जहाँ कोई अपराध कोई अभियोजन संस्थित करने के पूर्व प्रशमित किया गया है, तो जिस अपराध का इसप्रकार प्रशमित किया गया है, के संबंध में अपराधी के विरुद्ध ऐसे अपराध से संबंधित कोई अभियोजन संस्थित नहीं किया जायेगा।
(४) किसी अभियोजन के संस्थित होने के पश्चात् जहाँ किसी अपराध का प्रशमन किया गया है तो ऐसा प्रशमन लिखित में उप-धारा (१) में निर्देशित, संबंधित बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा श्रमिक न्यायालय या औद्योगिक न्यायालय जिसके समक्ष अभियोजन विलंबित है, को ध्यान में लाया जायेगा और अपराध के प्रशमन की ऐसी सूचना दिए जाने पर वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध के अपराध का इसप्रकार प्रशमन किया गया है, उन्मोचित होगा।
(५) इस धारा के उपबंधों के अधीन और के अनुसरण में के अपराधों को छोडकर सिवाय योजना के अधीन दण्डनीय कोई अपराध प्रशमित नहीं किया जायेगा।""।
अध्याय पाँच
महाराष्ट्र निजी सुरक्षा रक्षक (रोजगार का विनियमन और कल्याण)
अधिनियम, १९८१ में संशोधन ।
सन् १९८१ का महा. ५८। सन् १९८१ का महा. ५८ की धारा ३ में संशोधन।
९. महाराष्ट्र निजी सुरक्षा रक्षक (रोजगार का विनियमन और कल्याण) अधिनियम, १९८१ (जिसे इसमें आगे, इस अध्याय में, "" निजी सुरक्षा रक्षक अधिनियम "" कहा गया है) की धारा ३, की उप-धारा (३) के स्थान में, निम्न उप-धारा रखी जायेगी अर्थात् :----
"" (३) योजना में अधिक यह कि,----
(एक) उसके किसी उपबंध के प्रथम उल्लंघन के लिए दोषसिद्धि पर जुर्माने से, जिसे, जैसा कि विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी रकम तक बढाया जा सकेगा (परंतु पाँच लाख रुपयों से अधिक के मामले में नही) ;
महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २१, २०२२/अग्रहायण ३०, शके १९४४ ५(दो) उसके किसी उपबंधों के द्वितीय या पश्चातवर्ती उल्लंघन के लिए, जैसा कि विर्िनदिष्ट किया जाए दोषसिद्धि पर, अवधि के कारावास से दस लाख रुपयों या जुर्माने से, जिसे, जैसा कि विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी रकम तक बढाया जा सके, या कारावास और जुर्माने दोनो से दण्डित किया जायेगा (परंतु तीन महीनों से अत्यधिक के मामले में नही) ; और
(तीन) दोषसिद्धि के पश्चात् यदि उल्लंघन निरंतर किया जाता है तो जिसे ऐसे प्रत्येक दिन जिसने इसप्रकार का उल्लंघन निरंतर किया गया है, जिसे ऐसे प्रत्येक दिन के लिए पाँच हजार रुपयों तक बढाया जा सके ऐसे अधिक जुर्माने से दण्डित किया जायेगा।""।
१०. निजी सुरक्षा रक्षक अधिनियम की धारा २७ में,------
सन् १९८१ का महा. ५८ की धारा २७ में शंशोधन। (१) "" पाँच सौ रुपए "" शब्दो के स्थान में, "" पाँच लाख रुपए "" शब्द रखे जायेंगे ;
(२) "" सौ रुपए "" शब्दों के स्थान में, "" पाँच हजार रुपए "" शब्द रखे जायेंगे ।
सन् १९८१ का महा. ५८ मे नई धारा २७क का निवेशन। ११. निजी सुरक्षा रक्षक अधिनियम की धारा २७ के पश्चात्, निम्न धारा निविष्ट की जायेगी, अर्थात् :----
अपराधों का प्रशमन। "" २७क (१) योजना के अधीन दण्डनीय किसी योजना के किन्ही उपबंधों के उल्लंघन का कोई अपराध, अभियुक्त व्यक्ति के किसी आवेदन पर, किसी अभियोजन के संस्थित होने के पूर्व या के बाद में, संबंधित बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा केवल जुर्माने से दण्डनीय ऐसे अपराध के लिए उपबंधित अधिकतम जुर्माने के पचास प्रतिशत की राशि के लिए और जैसा कि विहित किया जाए ऐसी रित्या में ऐसी अपराध के लिए उपबंधित अधिकतम जुर्माने के पचहत्तर प्रतिशत की एक राशि से प्रशमित किया जा सकेगा :
परंतु, प्रशमन की ऐसी रकम उस बोर्ड के प्रशासन के प्रयोजन के लिए स्थापित संबंधित बोर्ड के प्रशासकीय खाते में जमा की जायेगी।
(२) उप-धारा (१) में अंर्तविष्ट कोई बात,---
(क) एक समान अपराध जो पहले प्रशमित किया गया था, के करने के ; या
(ख) समान अपराध जिसके लिए ऐसा व्यक्ति पहले दोषसिद्ध हुआ था, के करने के दिनांक से तीन वर्ष की अवधि के भीतर द्वितीय समय या के तत्पश्चात् के लिए व्यक्ति द्वारा किए गए किसी अपराध को लागू नहीं होगी।
(३) जहाँ कोई अपराध कोई अभियोजन संस्थित करने के पूर्व प्रशमित किया गया है, तो जिस अपराध को इस प्रकार प्रशमित किया गया है, के संबंध में अपराधि के विरुद्ध ऐसे अपराध से संबंधित कोई अभियोजन संस्थित नहीं किया जायेगा।
(४) किसी अभियोजन के संस्थित होने के पश्चात जहाँ किसी अपराध का प्रशमन किया गया है तो ऐसा प्रशमन, लिखित में, उप-धारा (१) में निर्देशित संबंधित बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा न्यायालय जिसके समक्ष अभियोजन विलंबित है, को ध्यान में लाया जायेगा और अपराध के प्रशमन की ऐसी सूचना दिए जाने पर वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध के अपराध का इसप्रकार प्रशमन किया गया है, उन्मोचित होगा।
(५) इस धारा के उपबंधो के अधीन और के अनुसरण में अपराधों को छोडकर योजना के अधीन दण्डनीय कोई अपराध प्रशमित नहीं किया जायेगा।""।६ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २१, २०२२/अग्रहायण ३०, शके १९४४
अध्याय छह
महाराष्ट्र कर्मकारों का न्यूनतम मकान-किराया भत्ता अधिनियम, १९८३ में संशोधन ।
१२. महाराष्ट्र कर्मकारों का न्यूनतम मकान-किराया भत्ता अधिनियम, १९८३ की धारा १० की,---- सन् १९८८ का महा. २३। सन् १९८८ का महा. २३ की धारा १० में संशोधन।
(१) उप-धारा (१) में "" ऐसी अवधि के कारावास से, जिसे एक वर्ष तक बढाया जा सके या ऐसे जुर्माने से, जिसे दो हजार रुपयों तक बढाया जा सके, या दोनों से "" शब्दों के स्थान में, "" जुर्माने से, जिसे दस लाख रुपयों तक बढाया जा सके "" शब्द रखे जायेंगे ;
(२) उप-धारा (२) में, "" ऐसी अवधि के कारावास से जिसे छह महीनों तक बढाया जा सके या ऐसे जुर्माने से जिसे एक हजार रुपयों तक बढाया जा सके या दोनों से दण्डित किया जायेगा "" शब्दों के स्थान में, "" ऐसे जुर्माने से, जिसे दस लाख रुपयों तक बढाया जा सके "" शब्द रखे जायेंगे ।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २१, २०२२/अग्रहायण ३०, शके १९४४ ७
उद्देश्यों और कारणों का वक्तव्य ।
राज्य सरकार ने, भारत सरकार के अनुरोध पर कारोबार करना सुलभ करने और नागरिकों के जीवनस्तर में सहजता लाने के उद्देश्य से, छोटे अपराध के लिए नागरिकों को कारावास होने की जोखिम हटाने के लिए सभी राज्य अधिनियमों और तद्धीन विरचित नियमों का एक व्यापक पुर्नविलोकन करना हाथ में लिया है। २. उपयर्ुक्त प्रयोजनों के लिए, राज्य सरकार ने, संबंधित प्रशासकीय विभाग और तद्धीन प्राधिकरणों या संस्थाअों से विचार विमर्श करने के पश्चात्, महाराष्ट्र राज्य अधिनियमों में विद्यमान कारावास के उपबंधोंे को हटाने या कम करने या अपराधों के प्रशमन के लिए उपबंध करने की सिफारिश करने के लिए अप्पर मुख्य सचिव (उद्योग) की अध्यक्षता के अधीन एक सचिव समिति गठित की गई है।
तद्नुसार, ऐसे पुर्नविलोकन के पश्चात्, सरकार, महाराष्ट्र औद्योगिक संबंध अधिनियम (सन् १९४७ का ११) की धारा १०४ और १०६, महाराष्ट्र श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम (सन् १९५३ का ४०) की धारा १७क, महाराष्ट्र माथाडी, हमाल और अन्य शारीरिक श्रम करनेवाले कर्मकार (रोजगार का विनियमन और कल्याण) अधिनियम, १९६९ (सन् १९६९ का महा. ३०) की धारा ३ और २७, महाराष्ट्र निजि सुरक्षा रक्षक (रोजगार का विनियमन और कल्याण) अधिनियम, १९८१ (सन् १९८१ का महा. ४८) की धारा ३ और २७ और महाराष्ट्र कर्मकार न्युनतम मकान-किराया भत्ता अधिनियम, १९८३ (सन् १९८८ का महा. २३) की धारा १० में संशोधन करना तथा केंद्र सरकार द्वारा अधिनियमित श्रमिक संहिताअों में अंर्तविष्ट उपबंधों की तर्जपर अपराधों के प्रशमन करने के लिए उपबंध करना इष्टकर समझती है।
३. प्रस्तुत विधेयक का आशय उपयर्ुक्त उद्देश्यों को प्राप्त करना है।
मुंबई,
सुरेश खाडे,
दिनांकित १९ दिसंबर, २०२२।
श्रम मंत्री।८ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २१, २०२२/अग्रहायण ३०, शके १९४४
प्रत्यायुक्त विधान संबंधी ज्ञापन
प्रस्तुत विधेयक में, विधायीशक्ति के प्रत्यायोजनार्थ निम्न प्रस्ताव अंतर्गस्त है, अर्थात् :--
खण्ड ५. इस खण्ड के अधीन जिसका आशय महाराष्ट्र श्रमिक कल्याण निधि अधिनियम में नई धारा १७ग का निवेशन करना है, धारा १७ग की उप-धारा (१) और (४) में, किसी अपराध का प्रशमन करने का आवेदन और उसकी रीति विहित करने की, शक्ति राज्य सरकार को प्रदान की गई है।
खण्ड ८. इस खण्ड के अधीन, जिसका आशय महाराष्ट्र माथाडी, हमाल और अन्य शारीरिक श्रम करनेवाले कर्मकार (रोजगार का विनियमन और कल्याण) अधिनियम, १९६९ में नई धारा २७-१क का निवेशन करना है, धारा २७-१क की उप-धारा (१) में किसी अपराध के प्रशमन की रीति विहित करने की, शक्ति राज्य सरकार को प्रदान की गई है।
खण्ड ११. इस खण्ड के अधीन, जिसका आशय महाराष्ट्र निजी सुरक्षा रक्षक (रोजगार का विनियमन और कल्याण) अधिनियम, १९८१ में एक नई धारा २७क का निवेशन करना है, धारा २७क की उप-धारा (१) में, किसी अपराध के प्रशमन एक करने की रीति विहित करने की, शक्ति राज्य सरकार को प्रदान की गई है।
२. विधायीशक्ति के प्रत्यायोजन के लिए उपरोल्लिखित प्रस्ताव सामान्य स्वरुप के है।
(यथार्थ अनुवाद) विजया ल. डोनीकर, भाषा संचालक, महाराष्ट्र राज्य.
विधान भवन, नागपूर, दिनांकित २१ दिसंबर, २०२२।
राजेन्द्र भागवत, प्रधान सचिव, महाराष्ट्र विधानसभा ।
ON BEHALF OF GOVERNMENT PRINTING, STATIONERY AND PUBLICATION, PRINTED AND PUBLISHED BY DIRECTOR, RUPENDRA DINESH MORE, PRINTED AT GOVERNMENT PRESS AND BOOK DEPOT, CIVIL LINES, NAGPUR-440 001 AND PUBLISHED AT DIRECTORATE OF GOVERNMENT PRINTING, STATIONERY AND PUBLICATIONS, 21-A, NETAJI SUBHASH ROAD, CHARNI ROAD, MUMBAI 400 004, EDITOR : DIRECTOR, RUPENDRA DINESH MORE.