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Maharashtra Gazette · Government of Maharashtra

Nagpur 7 (26-12-2022) Publication of a bill to Provide for establishment of body of Lokayukta for the Inquiry of Administrative action taken by or on behalf of the Government of Maharashtra or certain public Authorities in the State of Maharashtra, in certain cases and to inquire into and investigate allegations of curruption against them and for matters connected therewith or incidental there to as L.A.Bill No. XXXVI of 2022.Ex. Ordinary. 39, no. 22

Published 26 December 2022

Type
Extra - Ordinary
Part
Part 7 (Hindi)
Division
NAGPUR DIVISION
Identifier
in.gazette.maharashtra.2022-12-26.Extra-Ordinary_NAGPUR-DIVISION_Part-7-Hindi-
Languages
English, Marathi
१

RNI No. MAHBIL/2009/31730

महाराष्ट्र शासन राजपत्र

असाधारण भाग सात

वर्ष ८, अंक २२ ] सोमवार, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ [पृष्ठे ३३, किंमत : रुपये ४७.००

असाधारण क्रमांक ३९

प्राधिकृत प्रकाशन

अध्यादेश, विधेयके व अधिनियम यांचा हिंदी अनुवाद (देवनागरी लिपी).

महाराष्ट्र विधानमंडळ सचिवालय

महाराष्ट्र विधानसभा में दिनांक २६ दिसंबर, २०२२ ई.को. पुर:स्थापित निम्न विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा नियम ११७ के अधीन प्रकाशन किया जाता है :-

L. A. BILL No. XXXVI OF 2022.

A BILL

TO PROVIDE FOR ESTABLISHMENT OF BODY OF LOKAYUKTA FOR THE INQUIRY OF ADMINISTRATIVE ACTION TAKEN BY OR ON

BEHALF OF THE GOVERNMENT OF MAHARASHTRA OR CERTAIN

PUBLIC AUTHORITIES IN THE STATE OF MAHARASHTRA, IN

CERTAIN CASES AND TO INQUIRE INTO AND INVESTIGATE

ALLEGATIONS OF CURRUPTION AGAINST THEM AND FOR

MATTERS CONNECTED THEREWITH OR INCIDENTAL THERETO.

विधानसभा का विधेयक क्रमांक ३६ सन् २०२२।

महाराष्ट्र राज्य में कतिपय मामलों में, और उनके कृत्यकारियों के विरूद्ध भ्रष्टाचार के अभिकथनों में

जाँच और छानबीन करने तथा तत्ससम्बन्धी मामलों के लिए महाराष्ट्र सरकार या कतिपय लोक

प्राधिकारियों द्वारा या के निमित कृत प्रशासकीय कार्यवाही की जाँच करने के लिए लोकायुक्त निकाय

की स्थापना करने और तत्संबंधी या उससे आनुषंगिक मामलों का उपबन्ध करने सम्बधी विधेयक।

(१)

रू-३९-१. द्र-१४६३-१.

२ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ २

सन् २०१४ का १। क्योंकि लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, २०१३ की धारा ६३ प्रत्येक राज्य को, कतिपय लोक कृत्यकारियों के विरूद्ध भ्रष्टाचार करने से संबंधित शिकायतों का निपटन करने के लिए, राज्य के लिए लोकायुक्त के रूप में जाने जानेवाला एक निकाय की स्थापना का उपबन्ध करती है ;

सन् २०१४ का १। सन् १९७१ का महा. ४६।

और क्योंकि लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, २०१३ की तर्ज पर महाराष्ट्र राज्य के लिए एक नया विधि अधिनियमित करना और विद्यमान महाराष्ट्र लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, १९७१ के परिधि का विस्तार करना तथा लोकायुक्त को अधिक शक्ितयाँ सौंपना इष्टकर है ;

क्योंकि महाराष्ट्र राज्य में कतिपय मामलों में और उनके कृत्यकारियों के विरूद्ध भ्रष्टाचार के अभिकथनों में जाँच और छानबीन करने तथा तत्सम्बन्धी मामलों के लिए महाराष्ट्र सरकार या कतिपय लोक प्राधिकारियों द्वारा या के निमित्त कृत प्रशासकीय कार्यवाही की जाँच करने के लिए लोकायुक्त निकाय की स्थापना करने और तत्संबंधी या उससे आनुषंगिक मामलों का उपबन्ध करना इष्टकार है ; इसलिये, भारत गणराज्य के तिहतरवें वषर्ं में, एतद्द्वारा, निम्न अधिनियम बनाया जाता है :----

अध्याय एक

प्रारम्भिक

१. (१) यह अधिनियम महाराष्ट्र लोकायुक्त अधिनियम, २०२२ कहलाए।

(२) इसका विस्तार सम्पूर्ण महाराष्ट्र राज्य में होगा।

संक्षिप्त नाम, विस्तार तथा प्रारम्भण।

(३) यह ऐसे दिनांक को प्रवृत्त जिसे राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करें ।

अध्याय दो

परिभाषाएँ ।

परिभाषाएँ। २. इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो :----

(क) "कार्यवाही" का तात्पर्य विनिश्चय, सिफारिश या विवरणी के तौर पर या किसी अन्य रीत्या में कृत कार्यवाही से है तथा इसमें कार्य की विफलता भी सम्मिलित है और कार्यवाही सम्बन्धी अन्य समस्त अभिव्यक्तियों का तद्नुसार वही अभिप्राय समझा जायेगा ;

(ख) " प्रशासकीय विभाग " का तात्पर्य, महाराष्ट्र कारोबर के सरकारी नियम के अधीन विर्िनदिष्ट विभाग से है ;

(ग) लोक-सेवक के सम्बन्ध में "आरोप" का तात्पर्य, ऐसी किसी अभिपुष्टि से है कि ऐसा लोक सेवक,-----

(एक) स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई लाभ प्राप्त करने या पक्षपात करने से या किसी अन्य व्यक्ति की अनावश्यक नुकसान या कठिनाई पैदा करवाने से अपने स्थान का दुरुपयोग किया है,

(दो) ऐसे लोक सेवक के रूप में अपने कृत्यों का पालन करने में स्वयं के हित या अनुचित या दुराचारपूर्ण प्रयोजनों से प्रेरित किया गया था, या

(तीन) दुराचरण का दोषी है, या लोक-सेवक जैसी उसकी क्षमता में शीलनिष्ठा का अभाव है ;

(घ) "न्यायपीठ" का तात्पर्य, लोकायुक्त की न्यायपीठ से है ; (ङ) "अध्यक्ष" का तात्पर्य, लोकायुक्त के अध्यक्ष से है ; (च) "सक्षम प्राधिकारी" के संबंध में,-----

(एक) मुख्यमंत्री का तात्पर्य, महाराष्ट्र विधानसभा से है ;

(दो) खण्ड (त) में र्िनदिष्ट मंत्री का तात्पर्य, राज्यपाल है ;

(तीन) मंत्री से भिन्न महाराष्ट्र राज्य विधानमंडल के किसी सदस्य के संबंध में,----

(क) महाराष्ट्र विधानपरिषद के किसी सदस्य की दशा में, परिषद के सभापति से है ; और (ख) महाराष्ट्र विधान सभा के किसी सदस्य की दशा में, उस सदन के अध्यक्ष से है ;

द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ ३ ३

(चार) धारा १२ की उप-धारा (१) के खण्ड के खण्ड (घ) में र्िनदिष्ट व्यक्ित संबंधित प्रशासकीय विभाग का मंत्री ;

(पाँच) अखिल भारतीय सेवा संवर्ग अधिकारियों, (जिसमें अखिल भारतीय सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय वन सेवा, अदि) का तात्पर्य मुख्यमंत्री से है ;

(छह) राज्य सरकार के विभाग के किसी अधिकारी के संबंध में, विभाग का, जिसके अधीन ऐसा अधिकारी सेवारत है, भारसाधक मंत्री से है :

परंतु, यदि ऐसा अधिकारी राज्य सरकार द्वारा घोषित विभाग का प्रमुख है तब सक्षम प्राधिकारी मुख्यमंत्री होगा ;

(सात) संसद या राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम के अधीन स्थापित या गठित या राज्य सरकार द्वारा पूर्णत: या भागत: वित्तपोषित या उसके द्वारा नियंत्रित किसी निकाय या बोर्ड या निगम या प्राधिकरण या कंपनी या सोसाइटी या स्वायत्त निकाय (चाहे व किसी भी नाम से ज्ञात हो) के किसी अध्यक्ष या सदस्यों के संबंध में ऐसे निकाय या बोर्ड या निगम या प्राधिकरण या कंपनी या सोसाइटी या स्वायत्त निकाय के प्रशासनिक मंत्रालय का भारसाधक मंत्री से है :

परंतु, यदि ऐसा अध्यक्ष या सदस्य अखिल भारतीय सेवा अधिकारी है तब सक्षम प्राधिकारी मुख्यमंत्री होगा ;

(आठ) संसद या राज्य विधानमंडल किसी अधिनियम के अधीन स्थापित या गठित या राज्य सरकार द्वारा पूर्णत: या भागत: वित्तपोषित या उसके द्वारा नियंत्रित किसी निकाय या बोर्ड या निगम या प्राधिकरण या कंपनी या सोसाइटी या स्वायत्त निकाय (चाहे व किसी भी नाम से ज्ञात हो) के किसी अधिकारी के संबंध में ऐसे निकाय या बोर्ड या निगम या प्राधिकरण या कंपनी या सोसाइटी या स्वायत्त निकाय का प्रधान से है ;

(नौ) उपयर्ुक्त उप-खंड (एक) से उप-खंड (आठ) के अधीन न आने वाले किसी अन्य मामलों में, ऐसा विभाग या प्राधिकरण, जो राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा विर्िनदिष्ट करे, से है :

परंतु, यदि उप-खंड (सात) या उप-खंड (आठ) में र्िनदिष्ट कोई व्यक्ति राज्य विधानमंडल का सदस्य भी है मुख्यमंत्री या मंत्रिपरिषद का सदस्य नहीं है तो,----

(क) ऐसे सदस्य के महाराष्ट्र विधानपरिषद का सदस्य होने की दशा में, उस सदन का सभापित ; और

(ख) ऐसे सदस्य के महाराष्ट्र विधानसभा का सदस्य होने की दशा में, उस सदन का अध्यक्ष, सक्षम प्राधिकारी होगा :

परंतु, इस खण्ड के प्रयोजन के लिए जहाँ किसी व्यक्ित द्वारा, भ्रष्टाचार के संबंध में, इस खण्ड में विर्िनदिष्ट किसी व्यक्ित के खिलाफ शिकायत की है, के मामले में, भ्रष्टाचार के अभिकथित कार्य के समय पर उक्त व्यक्ित के लिए, इस अधिनियम, में विर्िनदिष्ट सक्षम प्राधिकारी, इस अधिनियम के अधीन कार्यवाही करने के लिए सक्षम प्राधिकारी होगा :

परंतु आगे यह कि, यदि वह व्यक्ित जिसके खिलाफ शिकायत की गई है, ऐसे शिकायत के लिए सक्षम प्राधिकारी के रुप में कार्य करनेवाला भी वही व्यक्ित है, ऐसे मामलों में, राज्यपाल, इस अधिनियम के अधीन ऐसे व्यक्ित के लिए सक्षम प्राधिकारी होगा ;

(छ) "शिकायत" का तात्पर्य, इस अधिनियम के अधीन की गयी शिकायत से है ; (ज) " पूर्ण न्यायपीठ " का तात्पर्य, अध्यक्ष और सभी नियुक्त सदस्यों से मिलकर न्यायपीठ होगा, परन्तु, जिसमें अध्यक्ष समेत तीन से कम नहीं होंगे ;

(झ) "शिकायत" का तात्पर्य, किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे दावे से है कि कुप्रशासन के परिणाम स्वरूप उसके साथ अन्याय या असम्यक कष्ट हुआ है इसे है ;

(ञ) "अन्वेषण" का तात्पर्य, दंड प्रक्रिया संहिता, १९७३ की धारा २ के खंड (ज) के अधीन यथा परिभाषित कोई अन्वेषण से है ;

४ ४ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४

(ट) "न्यायिक सदस्य" का तात्पर्य, इस अधिनियम के अधीन नियुक्त लोकायुक्त का कोई ऐसा न्यायिक सदस्य से है ;

(ठ) "लोकायुक्त" का तात्पर्य धारा ३ के अधीन स्थापित निकाय से है ;

(ड) "कुप्रशासन" का तात्पर्य ऐसे किसी मामले में, प्रशासनिक कृत्यों का प्रयोग करने में कृत या करने के लिए तात्र्पयित कार्यवाही,----

(एक) जहाँ ऐसी कार्यवाही या प्रशासनिक प्रक्रिया या ऐसी कार्यवाही करने का उपाय युक्तियुक्त नहीं है, अन्यायपूर्ण है, पीडादायक या अनुचित रूप से विभेदकारी है ; या

(दो) जहाँ ऐसी कार्यवाही करने में उपेक्षा या अनावश्यक देरी हुई है, या

प्रशासनिक प्रक्रिया या ऐसी कार्यवाही करने के उपाय से अनावश्यक देरी हुई है ;

(ढ) "सदस्य" का तात्पर्य, लोकायुक्त का कोई सदस्य से है ;

(ण) " मंत्री " का तात्पर्य,----

(एक) कोई मंत्री परिषद सदस्य से है, किंतु इसके अंतर्गत मुख्यमंत्री नहीं है ;

(दो) इसमें कोई अन्य व्यक्ित शामिल है जिसे सरकार द्वारा मंत्री का दर्जा प्रदान

किया गया है ;

(त) " पदाधिकारी " का तात्पर्य महाराष्ट्र राज्य के कार्य के संबंध में लोक सेवा या पद के लिए नियुक्त व्यक्ति से है ;

(थ) "प्रारंभिक जाँच" का तात्पर्य लोकायुक्त द्वारा इस अधिनियम के अधीन की गई कोई जाँच से है ;

(द) "विहित" का तात्पर्य इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित से है ;

(ध) "लोक सेवक" का तात्पर्य धारा १२ की उप-धारा (१) में र्िनदिष्ट व्यक्ित से हे परन्तु इसमें----

सन् १९५० का ४६। सन् १९५० का ४५। सन् १९५७ का ६२। सन् १९७८ का ३०।

(एक) इसके अंतर्गत ऐसा कोई लोक सेवक नहीं है, जिसके संबंध में सेना अधिनियम, १९५०, वायु सेना अधिनियम, १९५०, नौसेना अधिनियम, १९५७ और तटरक्षक अधिनियम, १९७८ के अधीन किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा अधिकारिता प्रयोक्तव्य है या उन अधिनियमों के अधीन ऐसे लोक सेवक को प्रक्रिया लागू होती है ;

(दो) एक व्यक्ित जो राज्य सरकार के संवर्ग डी पद पर काम कर रहा है या सरकारी कंपनी, सरकारी निगम, सरकारी सोसायटी या सरकारी संघ में, उसके समकक्ष पदों पर काम कर रहा है ;

(न) "विनियमों " का तात्पर्य, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियम से है ;

(प) " नियमों " का तात्पर्य, इस अधिनियम की संलग्न अनुसूची से है ;

(फ) "अनुसूची" का तात्पर्य, इस अधिनियम से संलग्न कोई अनुसूची से है ;

(ब) "सचिव" का तात्पर्य, महाराष्ट्र सरकार के सचिव से है और उसमें मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव, और प्रधान सचिव शामिल है ;

(भ) "विशेष न्यायालय" का तात्पर्य, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ की धारा ३ सन् १९८८ का ४९। की उप-धारा (१) के अधीन नियुक्त किसी विशेष न्यायाधीश का न्यायालय से है।

(म) "राज्य अभिकरण" का तात्पर्य, किसी अपराघ को जाँच या अन्वेषण करने के लिये राज्य सरकार के किसी प्राधिकरणको सक्षम बनाने से है।

(२) इस अधिनियम में उपयोगी और परिभाषित न किये गये शब्दों और अभिव्यक्ितयों का वही अर्थ होगा जो सन् १९८८ का ४९। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ में परिभाषित हैं।५ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ ५

अध्याय तीन

लोकायुक्त की स्थापना

लोकपाल की ३. (१) इस अधिनियम के प्रारंभ से ही, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, " लोकायुक्त महाराष्ट्र राज्य " नामक एक निकाय की स्थापना की जाएगी।

स्थापना।

(२) लोकायुक्त निम्नलिखित से मिलकर बनेगा,-----

(क) एक अध्यक्ष, जो उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमर्ुति है या रहा है या उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश या बम्बई उच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश है या रहा है ; और

(ख) उतने सदस्य, जो चार से अधीक नहीं होंगे, जिनमें से दो प्रतिशत न्यायिक सदस्य होंगे :

(३) कोई व्यक्ति,-----

(क) किसी न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए पात्र होगा, यदि वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है ;

परंतु व्यक्ित जो न्यायाधीश है या रहा है जो मुख्य जिला न्यायाधीश के पद से निम्न नहीं हैं वो न्यायिक सदस्य के रुप में नियुक्त किया जा सकता है, यदि कोई व्यक्ित जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है, उपलब्ध नहीं है।

(ख) न्यायिक सदस्य से भिन्न किसी सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए पात्र होगा, यदि वह निर्दोष, सत्यनिष्ठा और उत्कृष्ट योग्यता वाला ऐसा व्यक्ति है, जिसके पास भ्रष्टाचार-विरोध नीति, लोक प्रशासन, सतर्कता, वित्त, जिसके अंतर्गत बीमा और बैंककारी भी हैं, विधि, वित्त प्रबंधन से संबंधित विषयों में विशेष ज्ञान और पच्चीस वर्ष से अनून की विशेषज्ञता है।

(४) अध्यक्ष या कोई सदस्य,-----

(एक) संसद का सदस्य या किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के विधान-मंडल का सदस्य नहीं होगा ; (दो) नैतिक अधमता से अंतर्वलित किसी अपराध का दोषसिद्ध व्यक्ति नहीं होगा ; (तीन) अध्यक्ष या, यथास्थिति, सदस्य के रूप में पद ग्रहण करने के दिनांक को पैंतालीस वर्ष से कम आयु का व्यक्ति नहीं होगा ;

(चार) किसी पंचायत, जिला परिषद, नगर पंचायत, नगर परिषद या नगर निगम का सदस्य नहीं होगा ; (पाँच) राज्य सरकार द्वारा निकाय, निगम या सोसायटी के पर्याप्त वित्त का सदस्य ; (छह) ऐसा व्यक्ति नहीं होगा, जिसको संघ या किसी राज्य की सेवा से हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है ; और वह न्यास या लाभ का कोई पद (अध्यक्ष या सदस्य के रूप में उसके पद से भिन्न) धारण नहीं करेगा या किसी राजनैतिक दल से सहबद्ध नहीं होगा या कोई कारोबार नहीं करेगा या कोई वृत्ति नहीं करेगा और तदनुसार, अपना पदग्रहण करने से पूर्व, अध्यक्ष या, यथास्थिति, किसी सदस्य के रूप में नियुक्त कोई व्यक्ति, यदि,----

(क) वह न्यास या लाभ का कोई पद धारण करता है तो ऐसे पद से त्यागपत्र देगा ; या (ख) वह कोई कारोबार कर रहा है, तो ऐसे कारोबार के संचालन और प्रबंधन से अपना संबंध समाप्त कर देगा ; या

(ग) वह कोई वृत्ति कर रहा है, तो ऐसी वृत्ति करने से प्रविरत हो जाएगा।

(५) अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति अपना पदग्रहण करने के पूर्व राज्यपाल के समक्ष या उनके द्वारा उस निमित्त नियुक्त कई व्यक्ति प्रथम अनुसूची में के प्रयोजनों के लिए उपर्वणित प्ररूप में शपथ या प्रतिज्ञान पर हस्ताक्षर करेगा।

सन् १९७१ का महा. ४६। (६) उप-धारा (१) या (२) में अन्र्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक व्यक्ित जो इस अधिनियम के प्रारम्भण के दिनांक पर महाराष्ट्र लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, १९७१ के अधीन लोकायुक्त या उप लोकायुक्त के रूप में तामील है तो ऐसे प्रारम्भण को या से उप-धारा (१) के अधीन स्थापित लोकायुक्त के अध्यक्ष या, यथास्थिति, सदस्य, होगा और जिस पर वह इस अधिनियम के प्रारम्भण के पूर्व उसका अवधि पूरा होने तक नियुक्त था तो उसके समान निबर्ंधनों और शर्तों पर धारण करना जारी रखेगा ।६ ६ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ ४. (१) अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति, राज्यपाल द्वारा निम्नलिखित से मिलकर बनने वाली चयन समिति की सिफारिशें प्राप्त होने के पश्चात् की जाएगी,-----

अध्यक्ष या सदस्यों की नियुक्ित ।

(क) मुख्यमंत्री----अध्यक्ष ;

(ख) उप-मुख्यमंत्री----उपध्यक्ष ;

(ग) महाराष्ट्र विधान परिषद का सभापति----सदस्य ;

(घ) महाराष्ट्र विधानसभा का अध्यक्ष----सदस्य ;

(ङ) महाराष्ट्र विधानपरिषद में विपक्ष का नेता----सदस्य ;

(च) महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष का नेता----सदस्य ;

(छ) बम्बई उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमर्ूति या उसके द्वारा नामर्िनदिष्ट बम्बई उच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश----सदस्य;

(२) अध्यक्ष या किसी सदस्य की कोई नियुक्त्ति, केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि चयन समिति में कोई रिक्त्ति है।

(३) चयन समिति, लोकायुक्त्त के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन के लिए उसकी संपूर्ण प्रक्रिया विनियमित करेगी जो पारर्दशि होगी ।

अध्यक्ष या

सदस्यों की

५. सरकार ऐसे अध्यक्ष या, यथास्थिति, सदस्य की पदावधि की समाप्ति के कम से कम तीन महिने पूर्व, इस अधिनियम मे अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार, नए अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्त्ति के लिए सभी आवश्यक उपाय करेगा या कराएगा।

रिक्त्तियों का भरा

जाना।

परंतु, जब अध्यक्ष या सदस्य के पद की रिक्ित्त हो जाती है तो ऐसी रिक्ित्त पाई जाने के दिनांक से तीन महिने की अवधि में यथासंभव शीघ्र, सुविधाजनक रूप से भरी जा सकेगी ।

अध्यक्ष या

सदस्यों की

पदावधि।

६. अध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य, चयन समिति की सिफारिशों पर, राज्यपाल द्वारा नियुक्त्त किया जाएगा और वह उस तारीख से, जिसको वह अपना पदग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि तक या उसके द्वारा सत्तर वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, उस रूप में पद धारण करेगा :

परंतु,----

(क) वह राज्यपाल को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा; या (ख) इस अधिनियम में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा।

७. (एक) अध्यक्ष का वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्ते वही होगी, जो उच्चतर न्यायालय के मुख्य न्यायमर्ूति की है;

(दो) अन्य सदस्यों का वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्ते वही होंगी, जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की है :

अध्यक्ष और सदस्यों का वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्ते।

परंतु, यदि अध्यक्ष या कोई सदस्य, अपनी नियुक्त्ति के समय, भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी पूर्व सेवा के संबंध में पेंशन (नि:शक्त्तता पेंशन से भिन्न) प्राप्त करता है तो अध्यक्ष या, यथास्थिति, सदस्य के रूप में सेवा के संबंध में उसके वेतन में से----

(क) उस पेंशन की रकम के ; और

(ख) यदि ऐसी नियुक्त्ति से पूर्व, ऐसी पूर्व सेवा के संबंध में उसको शोध्य पेंशन के किसी भाग के बदले उसका संराशीकृत मूल्य प्राप्त किया है तो पेंशन के उस भाग की रकम को, घटा दिया जाएगा :

परंतु यह और कि, अध्यक्ष या किसी सदस्य को संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन में तथा उसकी सेवा की अन्य शर्तों में उसकी नियुक्त्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकार रूप में परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।७ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ ७ ८. (१) अध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य, पद पर न रहने के पश्चात्---

(एक) लोकायुक्त के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में पुर्ननियुक्ित के लिए अपात्र होगा :

(दो) राज्य सरकार के अधीन लाभ के किसी अन्य पद पर आगे और नियोजन के लिए अपात्र

अध्यक्ष और सदस्यों द्वारा पद पर न रहने के पश्चात् नियोजन पर निबर्ंधन। होगा ;

(२) उप-धारा (१) में अन्र्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई सदस्य, अध्यक्ष के रूप में नियुक्त्त किए जाने के लिए पात्र होगा, यदि सदस्य और अध्यक्ष उसकी कुल पदावधि पांच वर्ष से अधिक नही है। स्पष्टीकरण----इस धारा के प्रयोजनों के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि जहां सदस्य को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त्त किया जाता है, वहाँ उसकी पदावधि, सदस्य और अध्यक्ष के रूप में कुल मिलाकर पांच वर्षों से अधिक की नहीं होगीं।

९. (१) अध्यक्ष की मृत्यु, त्यागपत्र के कारण या अन्यथा, उसके पद पर कोई रिक्त्ति होने की दशा में, राज्यपाल, अधिसूचना द्वारा ऐसी रिक्त्ति को भरने के लिए नए अध्यक्ष की नियुक्त्ति किए जाने तक, ज्येष्ठतम सदस्य को, अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा।

(२) जब अध्यक्ष, छुट्टी पर अनुपस्थिति के कारण या अन्यथा, अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है, तो उपलब्ध ऐसा वरिष्ठतम सदस्य, जिसको राज्यपाल अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, उस तारीख तक, जिसको अध्यक्ष, अपने कर्तव्यों की पुन:ग्रहण नहीं करता है, अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा।

कतिपय परिस्थितियों में सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन करना।

लोकायुक्त का १०. (१) लोकायुक्त्त का सचिव, राज्य सरकार के सचिव की पंक्त्ति का होगा, जिसको राज्य सरकार

सचिव, अन्य द्वारा भेजे गए नामों कें पैनल से अध्यक्ष द्वारा नियुक्त्त किया जाएगा ।

अधिकारी तथा (२) लोकायुक्त्त के अधिकारियों तथा कर्मचारिवृंद की नियुक्त्ति, लोकायुक्त्त द्वारा की जाएगा ।

कर्मचारीवृंद। परंतु, राज्यपाल नियम द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसे किसी पद या किन्ही पदों की बाबत, जो नियम में विर्िनदिष्ट किए जाएं, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग से परामर्श करने के पश्चात्, नियुक्त्ति की जाएगी। (३) राज्य विधानमंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, लोकायुक्त्त के अधिकारियों तथा कर्मचारिवृंद की सेवा की शर्ते ऐसी होगी, जो लोकायुक्त्त द्वारा तत्प्रयोजनार्थ जैसा कि विहित की जाएं :

(४) इस धारा में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक व्यक्ित, जो इस अधिनियम के प्रारम्भण के दिनांक पर लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त को सहायता करने के लिए कोई अधिकारी या कर्मचारिवृंद के रूप में सेवारत है, ऐसे प्रारम्भण पर और से, इस अधिनियम के अधीन लोकायुक्त को सहायता करने के लिए अधिकारी और कर्मचारिवंृद होंगे और वे उसी निबंधनों तथा शर्तों पर निरंतर अपना पद धारण करेंगे जिसपर वे इस अधिनियम के प्रारम्भण के पूर्व नियुक्त हुए थे ।

लोकायुक्त्त के व्ययों का राज्य की संचित निधि पर भारित होना। ११. निधि पर भारित होना लोकायुक्त्त के प्रशासनिक व्यय, जिनके अंतर्गत लोकायुक्त्त के अध्यक्ष, सदस्यों या सचिव या अन्य अधिकारियों या कर्मचारिवृंद को या उनके संबंध में संदेय सभी वेतन, भत्ते और पेंशन भी है, राज्य की संचित निधि पर भारित होंगे और लोकायुक्त्त द्वारा ली गई कोई फीस या अन्य धनराशियाँ राज्य के संचित निधि के भागरूप होंगी।

अध्याय चार

लोकायुक्त का अधिकारिता क्षेत्र

लोकायुक्त का सन् १९८८ का ४९।

अधिकारिता क्षेत्र। १२. (१) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन लोकायुक्त्त, निम्नलिखित के संबंध में किसी शिकायत में किए गए भ्रष्टाचार की रोकथाम अधिनियम, १९८८ के अधीन भ्रष्टाचार के किसी अभिकथन में अंतर्वलित या उससे उद्भूत होने वाले या उससे संबद्ध किसी मामले की जांच करेगा या जांच कराएगा अर्थात् :----

(क) ऐसा कोई व्यक्त्ति, जो मुख्यमंत्री है या रहा है :

परंतु, मुख्यमंत्री के विरूद्ध किसी जाँच का प्रारम्भ करने के पूर्व महाराष्ट्र विधानसभा का पूर्वानुमोदन प्राप्त करना होगा इसका प्रस्ताव महाराष्ट्र विधानसभा के ठीक अगले सत्र के समक्ष रखा जायेगा।८ ८ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ परंतु यह भी कि, जहांतक राज्य की आंतरिक सुरक्षा या लोक व्यवस्था, से संबधित है लोकायुक्त्त मुख्यमंत्री के विरुद्ध भ्रष्टाचार के किसी ऐसे अभिकथन में अंतर्वलित या उससे उद्भूत होने वाले या उससे संबद्ध किसी मामले की उस दशा में जाँच नही करेगा ;

(दो) जब तक राज्यपाल लिखित में अनुमोदन प्राप्त नहीं किया है और पदस्थ नेम उसका पद छोड दिया हो :---

परंतु यह भी कि, ऐसी कोई जाँच बंद कमरे में कराई जाएगी औैर यदि लोकायुक्त्त इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि शिकायत खारिज होने योग्य है तो जाँच के अभिलेख प्रकाशित नहीं किए जाएंगे या किसी को उपलब्ध नहीं कराए जाएगें ;

(ख) कोई व्यक्ति जो मंत्री है या रहा है ;

(ग) कोई व्यक्त्ति जो राज्य विधान मंडल का सदस्य है या रहा है ;

(घ) नगर निगम, नगर परिषद, नगर पंचायत, औद्योगिक नगरी, जिला परिषद, पंचायत समिति, या ग्रामपंचायत का महापौर, उप-महापौर, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति, उप-सभापति, सरपंच, और उप सरपंच तथा (उक्त स्थानिय प्राधिकरणों की किसी समिति, के सभापति, समेत) कोई सदस्य या पार्षद ;

(ङ) राज्य सरकार के कार्यकलाप के साथ सभी भारतीय सेवा काडर अधिकारी (भारतीय प्रशासकीय सेवा, भारतीय पुलीस सेवा, भारतीय वन सेवा आदि समेत)।

सन १९८८ का ४९। (च) राज्य सरकार के सभी अधिकारी और कर्मचारी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ की धारा २ के खंड (ग) के उप-खंड (एक) और उप-खंड (दो) में परिभाषित लोक सेवकों में से जब व्यक्ित जो समूह ' डी ' पदों पर कार्यरत है या रहा है को छोडकर राज्य के कार्यों के संबंध में सेवारत है या जिसने सेवा की है ;

(छ) खण्ड (च) में निर्देशित सभी अधिकारी और कर्मचारी समतुल्य जो संसद् के किसी अधिनियम द्वारा स्थापित या राज्य सरकार द्वारा पूर्णत: या भागत: वित्तपोषित या उसके द्वारा नियंत्रित किसी निकाय या बोर्ड या निगम या प्राधिकरण या कंपनी या संस्था या न्यास या स्वायत्त (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) का है या रहा है ;

(ज) ऐसा कोई व्यक्ित, जो राज्य सरकार या किसी स्थानिय प्राधिकरण या सरकारी कंपनी निगम, व्यक्ित द्वारा पूर्णत: या भागत: वित्तपोषित या सहायता प्राप्त प्रत्येक अन्य सोसाइटी या व्यक्ित-संगम या न्यास (चाहे तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत है या नहीं) का चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी है या रहा है ;

स्पष्टीकरण—खंड (छ) और खंड (ज) के प्रयोजन के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि,--- (एक) कोई इकाई या संस्था, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, निगम, सोसाइटी, न्यास, व्यक्ित-संगम, भागीदारी, एकल स्वत्वधारिता, सीमित दायित्ववाली भागीदारी (चाहे तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत है या नहीं), उन खंडों के अंतर्गत आनेवाली इकाइयां होंगी ;

(दो) व्यक्ितयों की संस्था या व्यक्ित-संगम या न्यास राज्य सरकार या स्थानिय प्राधिकणों द्वारा पूर्णत: या भागत: सहायता प्राप्त समझे जायेंगे यदि ऐसी कोई भूमि, सहायता अनुदान, कर्ज, शेअर पुंजी प्रत्याभूतिया उसको कोई प्ररुप में राज्य सरकार या स्थानिय प्राधिकरण द्वारा कोई सहायता प्राप्त की है :

परन्तु, इस खंड में र्िनदिष्ट किसी व्यक्ित को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ की धारा २ के सन १९८८ का ४९। खंड (ग) के अधीन लोक-सेवक समझा जाएगा और तद्नुसार, उस अधिनियम के उपबंध लागू होंगे।

सन १९८८ का ४९। (२) लोकायुक्त, उप-धारा (१) में र्िनदिष्ट व्यक्ितयों से भिन्न किसी व्यक्ित के किसी कार्य या आचरण के बारे में जांच कर सकेगा, यदि ऐसा व्यक्ित, उप-धारा (१) में र्िनदिष्ट किसी व्यक्ित के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ के अधीन भ्रष्टाचार के किसी अभिकथन से संबंधित दुष्प्रेरण करने, रिश्वत देने या रिश्वत लेने या षडयंत्र करने के कार्य में सम्मिलित है।९ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ ९ जाँच या अन्वेषण १३. (१) इस अधिनियम में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, लोकायुक्त, इस अधिनियम के

का वर्जन। अधीन ऐसी शिकायत पर कोई जाँच या अन्वेषण नहीं करेगा कि-----

(एक) जहाँ वही शिकायत या शिकायत से समरुप मद्दे, किसी न्यायालय के समक्ष लंबित है ;

(दो) भारत के संविधान के अनुच्छेद १९४ का खण्ड (२) में अंर्तविष्ट उपबंधों के अधीन समावेशित राज्य विधानमंडल या उसकी कोई समिति में, राज्य विधान मंडल के किसी सदस्य के कुछ बोलने या उसके द्वारा मत देने के संबंध में उसके खिलाप भ्रष्टाचार के कोई ऐसे अभिकथन से अंर्तविष्ट कोई मामला या उद्भूत या उससे संबंधित मामला होने पर ;

(तीन) ऐसे मामले के संबंध जिसको जाँच आयोग अधिनियम, १९५२ के अधीन जाँच के लिए सन् १९५२ का ६०। निर्देशित किए गए है :

परंतु यह कि, यदि राज्य सरकार ने जाँच आयोग द्वारा यथाधारित कोई भ्रष्टाचार के विरुद्ध की रिपोर्ट राज्य सरकार को सर्मपित करने के दिनांक से दो वर्षों की अवधि के भीतर कोई कार्यवाही नहीं की गई है, के मामले में, लोकायुक्त जाँच कर सकेगा ।

(चार) यदि किसी कार्यवाही के संबंध में परिवेदना अंतर्ग्रस्त होनेवाली शिकायत के मामले में,---

(क) यदि ऐसी कार्यवाही द्वितीय अनुसूची में उल्लिखित किसी मामले से सम्बधित है ; या

(ख) यदि फरियाद के लिए किसी अधिकरण या विधि न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों के तौर पर कोई उपचार है या था :

परंतु, लोकायुक्त इसके होते हुए भी कि फरियाद के लिए ऐसा उपचार था या है, छानबीन कर सकेगा जब कि लोकायुक्त का समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ित पर्याप्त कारणवश ऐसा उपचार नहीं कर सका है या नही कर सकता है ।

(पाँच) परिवेदना से अंतर्ग्रस्त कि कोई शिकायत, यदि, उस दिनांक पर जिस दिनांक को फरियाद कर्ता के विरूद्ध शिकायत कार्यवाही की गई है, से बारह महीने का अवधि अवसित हो जाने के पश्चात् शिकायत की है ;

परंतु यह कि, लोकायुक्त शिकायत को ग्रहण कर सकेगा यदि शिकायतकर्ता, उसका यह समाधान करता है, कि उसके पास इस खण्ड में विर्िनदिष्ट अवधि के भीतर शिकायत न करने का पर्याप्त कारण था।

(छह) किसी अभिकथन से अंतर्ग्रस्त कोई शिकायत है, यदि, उस दिनांक जिसपर अभिकथित के विरूद्ध शिकायत की कार्यवाही तामिल हुई है; से तीन वषार्ं की अवधि अवसित होने के पश्चात् शिकायत की गई है ।

(२) किसी अधिनियम में, अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी व्यक्ित द्वारा उसी मुद्दे या उसकी प्रकार के मुद्दे पर, ऐसे व्यक्ित के विरूद्ध लोकायुक्त के पास शिकायत की गई है तो भ्रष्टाचार की शिकायत पर किसी अधिनियम के अधीन किसी न्यायालय या किसी राज्य अभिकरण कोई जाँच या अन्वेषण नहीं करेगा, और किसी राज्य अभिकरण द्वारा, ऐसी शिकायत पर आयोजित की जानेवाली कोई जाँच या अन्वेषण या ऐसे अभिकरण द्वारा पूरी की गई कोई जाँच या अन्वेषण लोकायुक्त के निदेशन पर होगी :

परंतु, जहाँ लोकायुक्त के निदेशन पर, इस अधिनियम के अधीन न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया गया है, के मामलों में, ऐसे मामलों में, यदि आवश्यक हो, न्यायालय कोई जाँच या अन्वेषण कर सकेगा ।

(३) वह मामले जिसकी शिकायत इस अधिनियम के अधीन लोकायुक्त को की गई है, जाँच आयोग सन् १९५२ का ६०। अधिनियम, १९५२ के अधीन जाँच के लिए निर्देशित नहीं की जायेगी । रू-३९-२. द्र-१४६३-२.

१० १० द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४

स्पष्टीकरण.----संदेह का निराकरण करने के लिए, एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि, इस अधिनियम के अधीन कोई शिकायत केवल ऐसी अवधि से संबंधित होगी, जिसके दौरान लोक सेवक उस हैसियत में पद धारण कर रहा था या उसी क्षमता में सेवारत था ।

१४. (१) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन ऐसी शिकायत इस अधिनियम के अधीन लोकायुक्त को की जा सकेगी,---

इस अधिनियम के अधीन शिकायत करने की प्रक्रिया ।

(क) किसी व्यक्ित द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में ;

(ख) व्यथित व्यक्ित द्वारा शिकायत करने के मामलें में ;

(ग) लोक सेवक से अन्यथा किसी व्यक्ित द्वारा, किसी अभिकथन के मामले में ;

परंतु, जहाँ व्यथित व्यक्ित मृत है या किसी कारणवश स्वयं कार्य करने में असमर्थ है, तो किसी व्यक्ित द्वारा, जो उसकी संपदा का विधि में प्रतिनिधित्व करता है, या, यथास्थिति, किसी व्यक्ित द्वारा जिसे इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किया है, से शिकायत की जा सकेगी ।

(२) प्रत्येक शिकायत जैसा कि विहित किया जाए ऐसे प्ररुप में और ऐसे शपथपत्र द्वारा संलग्न होगी। (३) इस अधिनियम में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए पुलिस अभिरक्षा में, या जेल में या किन्ही पागल खाने में, या पागल व्यक्ितयों को रखने वाले अन्य स्थान में से एक व्यक्ित द्वारा लोकायुक्त को लिखे किसी पत्र को पुलिस अधिकारी या ऐसे जेल, पागलखाना या अन्य स्थान के प्रभारी अन्य व्यक्ित द्वारा पत्र को बंद रूप में तथा अविलंब प्रेषिति को अग्रेशित किया जायेगा और लोकायुक्त यदि समाधानी होता है या, यथास्थिति समाधानी हो सकेगा कि, इस प्रकार करना आवश्यक है, उप-धारा (२) के उपबंधों के अनुसरण में बनाए गए एक शिकायत के रूप में मानेगा ।

(४) परिवेदना से अंतर्ग्रस्त किसी शिकायत के मामले में, इस अधिनियम की कोई बात लोकायुक्त को, स्वविवेक के प्रयोग से अंतर्ग्रस्त किसी प्रशासनीक कार्यवाही पर प्रश्न के लिए सशक्त करनेवाली नहीं समझी जायेगी सिवाय इसके कि, जहाँ वह समाधानी होता है कि, स्वविवेक के प्रयोग में अंर्तविष्ट तत्व ऐसे किसी विस्तार तक अनुपस्थित है कि, स्वविवेक प्रथम दृष्टया अनुचित रुप से प्रयोग किया गया माना जा सकेगा । लोकायुक्त्त को १५. (१) राज्यपाल, शासकीय राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा, तथा लोकायुक्त से परामर्श अतिरिक्त कृत्यों

करने के बाद, लोकायुक्त को परिवेदनाअों के निवारण तथा भ्रष्टाचार के उन्मूलन के सम्बन्ध में ऐसे अतिरिक्त का प्रदत्त किया

कृत्यों को प्रदत्त कर सकेगा जैसा कि अधिसूचना में उल्लिखित किया जाए।

जाना।

(२) राज्यपाल लिखित आदेश द्वारा तथा राज्य सरकार की सिफारिश पर लोकायुक्त को, परिवेदनाअों के उपचार तथा भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिये राज्य सरकार द्वारा बिठाये गये, गठित या नियुक्त अभिकरणों, प्राधिकारियों या पदाधिकारियों पर पर्यवेक्षण सम्बन्धी शक्तियाँ प्रदत्त कर सकेगा।

(३) उप-धारा (१) के अधीन लोकायुक्त को कोई अतिरिक्त कृत्य प्रदत्त किये जाये, लोकायुक्त उन्ही शक्तियों का प्रयोग तथा उन्ही कृत्यों का निर्वहन करेगा जिनका कि वह परिवेदना या, यथास्थिति, अभियोग सम्बन्धी शिकायत के किये जाने पर प्रयोग या निर्वहन करता, तथा तद्नुसार इस अधिनियम के उपबन्ध लागू होंगे।११ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ ११ १६. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ के अधीन भ्रष्टाचार के अभिकथन के संबंधित कोई मामला सन् १९८८ का ४९।

या कार्यवाही इस अधिनियम के प्रारंभण के पूर्व, या इस अधिनियम के प्रारंभण के पश्चात्, किसी जाँच के प्रारंभण के पूर्व, किसी न्यायालय या राज्य विधानमंडल की समिति या किसी अन्य सांविधिक प्राधिकरण के

किसी न्यायालय या समिति या सांविधिक प्राधिकारी के समक्ष जांच के लिए लंबित मामलों से प्रभावित नही होंगे। समक्ष मामला लंबित है तो ऐसा मामला या प्रक्रिया ऐसे न्यायालय, समिति या सांविधिक प्राधिकरण के समक्ष जारी रहेगी।

१७. (१) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन,—

लोकायुक्त की न्यायपीठों का गठन। (क) लोकायुक्त की अधिकारिता का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा ;

(ख) कोई न्यायपीठ, अध्यक्ष, ऐसे दो या अधिक सदस्यों से, जो अध्यक्ष ठीक समझे, गठित की जा सकेगी ;

(ग) प्रत्येक न्यायपीठ में साधारणतया कम से कम एक न्यायिक सदस्य होगा ;

(घ) जहां कोई न्यायपीठ, अध्यक्ष से मिलकर बनती है, वहां ऐसी न्यायपीठ की अध्यक्षता अध्यक्ष द्वारा की जाएगी ;

(ङ) जहां कोई न्यायपीठ, न्यायिक सदस्य और ऐसे गैर-न्यायिक सदस्य से मिलकर बनती है जो अध्यक्ष नहीं है, वहां ऐसी न्यायपीठ की अध्यक्षता न्यायिक सदस्य द्वारा की जाएगी ;

(च) लोकायुक्त की न्यायपीठे साधारणतया मुंबई में और ऐसे अन्य स्थानों पर अधिविष्ट होंगी, जो राज्य सरकार विर्िनदिष्ट करे।

(२) लोकायुक्त ऐसे क्षेत्रों को अधिसूचित करेगा जिनके संबंध में लोकायुक्त की प्रत्येक न्यायपीठ अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगी।

(३) उप-धारा (२) में अन्र्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष को समय-समय पर, न्यायपीठों का गठन या पुनर्गठन करने की शक्ति होगी।

(४) यदि किसी मामले या विषय की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर अध्यक्ष या किसी सदस्य को यह प्रतीत होता है कि वह मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है कि उसकी सुनवाई तीन या अधिक सदस्यों से मिलकर बनने वाली न्यायपीठ द्वारा की जाने चाहिए तो उस मामले या विषय को अध्यक्ष द्वारा ऐसी न्यायपीठ को, जिसको अध्यक्ष ठीक समझे, यथास्थिति, अंतरित किया जा सकेगा या अंतरित किए जाने के लिए उसको र्िनदिष्ट किया जा सकेगा।

१८. जहां न्यायपीठें गठित की जाती हैं वहां अध्यक्ष, समय-समय पर, अधिसूचना द्वारा, न्यायपीठों के

न्यायपीठों के बीच कार्य का वितरण। बीच लोकायुक्त के कार्यों का वितरण करने के बारे में उपबंध कर सकेगा और ऐसे विषयों के लिए भी उपबंध कर सकेगा, जिन पर प्रत्येक न्यायपीठ द्वारा कार्रवाई की जा सकेगी।

१९. अध्यक्ष, शिकायतकर्ता या लोक सेवक द्वारा अंतरण के लिए किए गए किसी आवेदन पर, यथास्थिति, शिकायतकर्ता या लोक सेवक को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के पश्चात्, एक न्यायपीठ के समक्ष लंबित

अध्यक्ष की मामले अंतरित करने की शक्ति। किसी मामले को निपटारे के लिए किसी अन्य न्यायपीठ को अंतरित कर सकेगा।१२ १२ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ बहुमत द्वारा विनिश्चय किया जाना।

२०. यदि समसंख्या में सदस्यों से मिलकर बनी किसी न्यायपीठ के सदस्यों के बीच किसी प्रश्न पर मतभेद है तो वे उस प्रश्न या प्रश्नों का, जिन पर उनमें मतभेद है, कथन करेंगे और अध्यक्ष को निर्देश करेंगे, जो या तो स्वयं उस प्रश्न या उन प्रश्नों पर सुनवाई करेगा या लोकायुक्त के एक या अधिक अन्य सदस्यों द्वारा ऐसे प्रश्न या उन प्रश्नों पर सुनवाई के लिए मामले को निर्देशित करेगा और उस प्रश्न या उन प्रश्नों को लोकपाल के उन सदस्यों की बहुमत की राय के अनुसार विनिश्चित किया जाएगा, जिन्होंने मामले की सुनवाई की है, जिनके अंतर्गत वे सदस्य भी हैं, जिन्होंने उसकी पहले सुनवाई की थी।

अध्याय पाँच

लोकायुक्त द्वारा प्रारम्भिक जाँच और अन्वेषण

सन् १८८८ का ४९। २१. (१) लोकायुक्त, भ्रष्टाचार की रोकथाम अधिनियम, १९८८ के अधीन, धारा २ के खण्ड (ज) के अधीन यथा निर्धारित कोई शिकायत प्राप्त होनेपर, प्रथम वह चाहे मामले में प्रक्रिया करना है या उसे बंद करना है की विनिश्चय करेगा और यदि लोकायुक्त आगे कार्यवाही करने का विनिश्चय करता है तो वह यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या मामले में कार्यवाही के लिए कोई प्रथमदृष्टया मामला विद्यमान है उप-धारा (३) में यथा, उपबंधित रीत्या में किसी लोक सेवक के विरुद्ध प्रारंभिक जांच करने के का आदेश दे सकेगा।

भ्रष्टाचार की रोकथाम अधिनियम, १९८८ के अधीन शिकायतों से संबंधित उपबंध।

(२) लोकायुक्त अपने स्व निर्णय में, उप-धारा (१) में विर्िनदिष्ट किसी शिकायत या किसी जाँच करने से अस्वीकृत करता है या जाँच करने से परिविरत होता है तो अपनी राय के,---

(क) शिकायत तुच्छ या वीभत्स है, या सरभाव में नहीं बनायी गयी हैं ; (ख) जाँच या, यथास्थिति, जाँच जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं ; या (ग) अन्य उपाय शिकायतकर्ता के लिए उपलब्ध है और उस मामले की परिस्थिति में शिकायतकर्ता के लिए इस तरह के उपायों का लाभ उठाना अधिक उचित होगा। (३) लोकसेवकों के संबंध में, उप-धारा (१) के अधीन कोई प्रारम्भिक जाँच शुरु करने के पूर्व,---

(क) लोकायुक्त धारा १२ की, उप-धारा (१) के खण्ड (क) में, निर्देशित महाराष्ट्र विधान सभा का पूर्वानुमोदन प्राप्त करेगा ;

(ख) धारा १२ की, उप-धारा (१) के खण्ड (ख) में, लोकायुक्त, राज्यपाल का पूर्वानुमोदन प्राप्त करेगा और, राज्यपाल द्वारा जिसे नियुक्त किया जाए ऐसे मंत्रियों के समूह का अवलोकन प्राप्त करेगा, मंत्रियों का समूह तीन महीने, के भीतर उनका अवलोकन प्रस्तुत करेंगे लिखित में अभिलिखित किए जानेवाले कारणों के लिए लोकायुक्त द्वारा ऐसा अवधि एक महिने से बढ़ाया जा सकेगा तथापि, पूरा अवधि कुल मिलाकर चार महिनों से अनधिक होगा। स्पष्टीकरण.--- इस खण्ड के प्रयोजन के लिए, मंत्रिसमूह उनके द्वारा नामनिर्देशित मुख्य सचिव या अप्पर मुख्य सचिव द्वारा सहायता प्राप्त होंगे, जो ऐसे मंत्री समूह के सचिव के रुप में कार्य करेगा ;

(ग) धारा १२ की उप-धारा (१) के खण्ड (ग) में लोकायुक्त महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य के मामले में सभापति का पूर्वानुमोदन प्राप्त करेगा तथा महाराष्ट्र विधान सभा के सदस्य के मामले में, अध्यक्ष का अनुमोदन प्राप्त करेगा और सभापति, या, यथास्थिति, अध्यक्ष के द्वारा नियुक्त की गई समिति (यदि कोई हो) का अवलोकन प्राप्त करेगा ऐसा अनुमोदन, तीन महीने की अवधि के भीतर पहंूचाया जायेगा । लोकायुक्त द्वारा, ऐसा अवधि, लिखित में अभिलिखित किए जानेवाले कारणों के लिए एक महीने से बढाया जा सकेगा तथापि, कुल मिलाकर पूरा अवधि चार महीने से अनधिक होगा ;

(घ) धारा १२ की उप-धारा (१) के खण्ड (घ) में लोकायुक्त संबंधित मंत्रि का पूर्वानुमोदन प्राप्त करेगा और संबंधित मंत्रालय विभाग के सचिव का अवलोकन प्राप्त करेगा जो उसका अवलोकन तीन महीने की अवधि भीतर प्रस्तुत करेगा, ऐसा अवधि लिखित में अभिलिखित किए जानेवाले कराणों के लिए लोकायुक्त द्वारा एक महीने के लिए बढ़ाया जा सकेगा तथापि, कुल अवधि कुल मिलाकर चार महीने से अनधिक होगा ;

(ङ) धारा १२ की उप-धारा (१) के खण्ड (ड.) में मुख्यमंत्रि का पूर्वानुमोदन और मुख्य सचिव या उसके द्वारा नियुक्त समिति के अवलोकन, जो उनके अवलोकन तीन महीने की अवधि के भीतर प्रस्तुत करंगे ऐसा अवधि लिखित में अभिलिखित किए जानेवाले कारणों के लिए लोकायुक्त द्वारा एक महीने के लिए बढ़ाया जा सकेगा तथापि, संपूर्ण अवधि कुल मिलाकर चार महीने से अनधिक होगा ;

१३ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ १३

(च) धारा १२ की उप-धारा (१) के खण्ड (च) (छ) और (ज) में लोकायुक्त सक्षम प्राधिकारी का पूर्वानुमोदन प्राप्त कर सकेगा और जिसे वह ठीक समझे संबंधित विभाग के सचिव का अवलोकन प्राप्त करेगा जो मुख्य सचिव के जरिए या उसके द्वारा नामनिर्देशित अप्पर मुख्य सचिव के जरिए तीन महिने की अवधि के भीतर उसका अवलोकन प्रस्तुत करेगा ऐसा अवधि लिखित में अभिलिखित किए जानेवाले कारणों के लिए लोकायुक्त द्वारा एक महीने के लिए बढाया जा सकेगा तथापि, कुल मिलाकर संपूर्ण अवधि चार महीने से अनधिक का होगा । (४) सक्षम प्राधिकारी उसका अनुमोदन उप-धारा (३) में विर्िनदिष्ट अवधि के भीतर पहूँचाएगा : परंतु, यदि सक्षम प्राधिकारी विर्िनदिष्ट समय के भीतर उसका अनुमोदन पहूँचाने में असफल होता है तो लोकायुक्त जिसे वह ठीक समझे ऐसी कार्यवाही कर सकेगा :

परंतु आगे यह कि, इस उप-धारा के उपबंध मुख्यमंत्रि के विरुद्ध शिकायत के मामले में लागू नहीं होंगे । २२. (१) रिपोर्ट इस अधिनियम की धारा २१ के अधिन प्राप्त होगी,---

(क) मुख्यमंत्री और किसी मंत्रि से संबंधित रिपोर्ट लोकायुक्त के संपूर्ण न्यायपीठ द्वारा विचारार्थ

रिपोर्ट को विचारार्थ लिया जाना । ली जायेगी और

(ख) अन्य लोक सेवकों से संबंधित रिपोर्ट लोकायुक्त के दो से अनिम्न सदस्यों द्वारा विचार में ली जायेगी । (२) यदि उप-धारा (१) के अधिन प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार प्रथमदृष्टया मुकदमा नही बनता है तो न्यायपीठ उसके कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात मामला बंद कर देगा और उसे शिकायतकर्ता और संबंधित लोक सेवक को संसूचित करेगा : या यदि प्रथमदृष्टया मामले में कार्यवाही करने का मुकदमा है तो न्यायपीठ निम्न एक या अधिक कार्यवाहीयों की सिफारिश कर सकेगा अर्थात् :---

(क) कार्यवाहीयों के बंद करने के मामले में, धारा ५१ के अधिन शिकायतकर्ता के विरुद्ध आगे की कार्यवाही कर सकेगा ; या

(ख) सिफारिश किये गये मामले मे, कार्यवाही करने के बारे में, इस अधिनियम के उपबंध के अधिन प्रारंम्भिक जाँच के लिए निदेश दे सकेगा :

परंतु, संघराज्य के कार्य से संबंधित सेवा करनेवाले व्यक्ती के मामले में, केंद्र सरकार की सहमति के बिना इस धारा के अधिन कोई कार्यवाही नही की जायेगी ।

प्रारंम्भिक जाँच । २३. (१) धारा २२ की की उप-धारा (२) के खण्ड (ख) मे निर्देशित प्रत्येक प्रारंम्भिक जाँच सामान्यतया प्रारंम्भिक जाँच के आदेश के दिनांक से नब्बे दिनों की अवधि के भीतर पूरी की जायेगी तथा लिखित में अभिलिखित किए जानेवाले कारणों के लिए, नब्बे दिनों के अधिक अवधि भीतर पूरी की जायेगी प्रारंम्भिक जाँच का रिपोर्ट लोकायुक्त को प्रस्तुत किया जायेगा ।

(२) तत्समय प्रवृत्त्त किसी अन्य विधि में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, लोकायुक्त प्रारंम्भिक जाँच के आयोजन करने के प्रयोजन के लिए राज्य सरकार के संबंधित सचिव से सहायता लेगा ।

(३) इस अधिनियम के अधिन प्रारंम्भिक जाँच के आयोजन में, लोकायुक्त से सहायता करने के प्रयोजन के लिए, धारा २२ की उप-धारा (२) के खण्ड (ख) में यथा उपबंधित राज्य सरकार के संबंधित सचिव को, वही शक्तियाँ होंगी जो धारा ३५ के अधीन लोकायुक्त को प्रदत्त की है।

(४) उप-धारा (१) के अधीन प्राप्त प्रारंम्भिक जाँच रिपोर्ट धारा २२ में विर्िनदिष्ट न्यायपीठ द्वारा विचारार्थ लिया जायेगा ।

(५) यदि, उप-धारा (१) के अधीन प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार प्रथमदृष्टया मुकदमा नहीं बनता है तो उसके कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात मामला बंद कर दिया जायेगा और उसकी संसूचना शिकायतकर्ता और संबंधित लोक सेवक को दी जायेगी ; या यदि मामले में या अन्वेषण में मुकदमा कार्यवाही करने का प्रथमदृष्टया होता है तो न्यायपीठ निम्न एक या अधिक कार्यवाही करने की सिफारिश करेगा, अर्थात् :---

(क) मामले में आगे बढणे की सिफारिश के बारे में, राज्य सरकार के राज्य अभिकरण द्वारा अन्वेषण के लिए निदेश से सकेगा : या

(ख) कार्यवाहीयों के बंद करने के मामले में, धारा ५१ के अधिन शिकायतकर्ता के विरुद्ध आगे बढने की कार्यवाही न्यायपीठ कर सकेगी । (६) धारा २२ की उप-धारा (२) के खण्ड (ख) के अधिन प्रारंम्भिक जाँच का आदेश देने के पूर्व या इस धारा की उप-धारा (५) के खण्ड (क) के अधिन कोई अन्वेषण करने के पूर्व लोकायुक्त, लोकसेवक को स्पष्टीकरण देने के लिए बुलाएगा।१४ १४ द्धन्रु]क्ष् रू न् +रून् रू, ह्यरूदन् २६, २०२२/रु ५, ॅ १९४४ परंतु, कोई जाँच या अन्वेषण के पूर्व लोक सेवक से स्पष्टीकरण का माँग तलाशियाँ और अभिग्रहण से यदि कोई हो, इस अधिनियम के अधीन किसी राज्य अधिकरण द्वारा हाथ में लिए जाने की आवश्यकता में बाधा नहीं डालेगी ।

अन्वेषण ।

२४. (१) लोकायुक्त शिकायत में, अन्वेषण करने में आगे बढने का विनिश्चय करता है के मामले में वह किसी राज्य अभिकरण को यथासंभव शीघ्रता से अन्वेषण कार्यान्िवत करने के निदेश देगा और उसके आदेश के दिनांक से छह महीने की अवधि के भीतर अन्वेषण पूरा किया जायेगा ।

परंतु, लोकायुक्त उक्त अवधि एक समय पर छह महीने से अनधिक अधिक अवधि के लिए जो अवधि लिखित में अभिलखित किए जानेवाले कारणों के लिए, कुल मिलाकर चौबीस महीनों से अधिक नही होगा विस्तार कर सकेगा ।

(२) प्रत्येक ऐसी अन्वेषण असार्वजनिक रुप में और विशिष्टतया में आयोजित किया जायेगा शिकायतकर्ता की और अन्वेषण द्वारा बाधित लोक सेवक की पहचान चाहे अन्वेषण के पूर्व हो या के दौरान लोगों में या प्रेस में प्रकट नही की जायेगी ।

सन १९७४ का २। (३) दण्ड प्रक्रिया की संहिता, १९७३ की धारा १७३ में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी कोई राज्य अभिकरण लोकायुक्त द्वारा उसे निर्देशित किए गए मामलों के संबंध में अन्वेषण रिपोर्ट लोकायुक्त को प्रस्तुत करेंगे ।

(४) उप-धारा (३) के अधिन का रिपोर्ट दण्ड प्रक्रिया की संहिता, १९७३ की धारा १७३ में निर्देशित, सन १९७४ का २। अन्वेषण के पूरा हो जाने पर दाखिल किया जानेवाला रिपोर्ट समझा जायेगा ।

(५) धारा २२ की उप-धारा (१) में विर्िनदिष्ट न्यायपीठ किन्ही राज्य अभिकरण से उप-धारा (१) के अधीन उसके द्वारा प्राप्त प्रत्येक रिपोर्ट पर विचार करेगी, और

(क) धारा ३० के उपबंधो के अध्यधीन लोक सेवक के विरुद्ध विशेष न्यायलय के समक्ष आरोप पत्र दाखिल करे या रिपोर्ट को बंद करे;

(ख) संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा संबंधित लोक सेवक के विरुद्ध विभागीय कार्यवाहीयाँ या कोई अन्य समुचित कार्यवाही का प्रारंभ करने के बारे में सिफारिश कर सकेगा ।

(६) आरोपपत्र दाखिल करने पर उप-धारा (५) के अधिन विनिर्णय लेने के पश्चात्, लोकायुक्त,---

(क) किसी राज्य अभिकरण द्वारा अन्वेषित किए गए मामलों के संबंध में, विशेष न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल करने का संबंधित अन्वेषण प्राधिकारी को निदेश दे सकेगा ;

(ख) इस प्रकार दाखिल किए गए आरोपपत्र एक प्रति, अधिक्षण करने के प्रयोजन के लिए लोकायुक्त को अग्रेषित करने के संबंधित निदेश दे सकेगा ।

(७) लोकायुक्त, प्रारम्िभक जाँच या, यथास्थिति, अन्वेषण के दौरान प्रारभित जाँच या, यथास्थिति, अन्वेषण से संबंधित दस्तावेज की सुरक्षित अभिरक्षा के लिए जिसे वह ठीक समझे, समुचित आदेश पारित कर सकेगा । (८) लोकायुक्त की वेबसाईट, समय-समय से तथा विनियमों द्वारा जैसा कि विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी रीत्या में, उसके समक्ष लंबित या उसके द्वारा निपटान की गई शिकायतों की संख्या की स्थिति, जनता को प्रर्दशित करेगी ।

(९) लोकायुक्त, मूल अभिलेखों और साक्ष्यों को, जो प्रारम्िभक जाँच या अन्वेषण की प्रक्रिया में या उसके के द्वारा मुकदमा के आयोजन के लिए या विशेष न्यायालय द्वारा मुकदमा के आयोजन में आवश्यक होनेे पर है सुरक्षित रख सकेगा ।

(१०) यथा अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस अधिनियम के अवधि प्रारम्िभक जाँच या अन्वेषण के आयोजन की रीति तथा प्रक्रिया (लोक सेवक से उपलब्ध कराए गए ऐसी सामग्री और दस्तावेज समेत) विनियमों द्वारा जैसा कि विहित किया जाए ऐसी होगी ।

२५. यदि कार्यवाही के किसी प्रक्रम पर लोकायुक्त,---

उन व्यक्ितयों को सुना जाना जिन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है।

(क) अभियुक्त से भिन्न किसी व्यक्ित के आचरण की जाँच करना आवश्यक समझता है; या (ख) उसकी यह राय है कि, अभियुक्त से भिन्न किसी व्यक्ित की ख्याति पर प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण से प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है, तो लोकायुक्त, उस व्यक्ित को प्रारंभिक जाँच में सुनवाई का और अपनी प्रतिरक्षा में साक्ष्य प्रस्तुत करने का नैर्सगिक न्याय के सिद्धांतों से संगत युक्ितयुक्त अवसर प्रदान करेगा ।१५ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ १५ २६. इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन, किसी प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण के प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, लोकायुक्त या अन्वेषण अभिकरण, किसी लोक सेवक या किसी अन्य व्यक्ति से, जो उसकी राय में ऐसी प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण से सुसंगत सूचना देने या किसी ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करने में समर्थ है, ऐसी कोई सूचना देने या ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकेगा।

लोकायुक्त द्वारा किसी लोक सेवक या किसी अन्य व्यक्ति से सूचना आदि प्रस्तुत करने की अपेक्षा करना।

जानकारी की गोपनीयता । सन् १८७२ का १।

२७. (१) इस अधिनियम के अधीन किसी जाँच या अन्वेषण के अनुक्रम में, या प्रयोजनों के लिए, लोकायुक्त या उनके कर्मचारिवंृद के सदस्यों द्वारा, प्राप्त की गई जानकारी और ऐसी जानकारी के संबंध में अभिलिखित या संग्रहित सबूत, धारा (२४) की उप-धारा (२) के उपबंधों के अध्यधीन गोपनीय रखी जायेगी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, १८७२ में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय, लोकायुक्त या किसी लोक सेवक को ऐसी जानकारी से संबंधित सबूत देने या इस प्रकार अभिलिखित या संग्रहित सबूत प्रस्तुत करने के लिए बाध्य नहीं करेगा।

(२) उप-धारा (१) में कोई बात, किसी जानकारी या विशिष्टियों का प्रकटीकरण,----

(क) अन्वेषण के प्रयोजन के लिए या उसपर बनाए जानेवाले किसी रिपोर्ट में या ऐसे रिपोर्ट पर की जानेवाली कोई कार्यवाही या प्रयोजनों के लिए ; या

सन् १९२३ का १९ ।

(ख) शासकीय गुप्त बात, अधिनियम, १९२३ के अधीन किसी अपराध के लिए किसी प्रक्रियाअों के प्रयोजनों के लिए या भारतीय दण्ड संहिता के अधीन मिथ्या सबूत देने या गठने के अपराध या धारा ५१ के अधीन किसी कार्यवाही या प्रक्रिया के लिए ; या

सन् १८६० का ४५ ।

(ग) जैसा कि विहित किया जाए ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए, लागू होगी ।

सन् १९८८ का ४९ ।

२८. भ्रष्टाचार की रोकथाम अधिनियम, १९८८ या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, परन्तु इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन जहाँ किन्ही लोक के सक्षम प्राधिकारी का अनुमोदन प्राप्त हुआ है तो,--

(क) ऐसे लोक सेवक के विरुद्ध लोकायुक्त के निदेशन पर ऐसे अभिकरण द्वारा जाँच करने या

जहाँ अनुमोदन प्राप्त है, वहाँ अन्य अनुमोदन आवश्यक नहीं हैं। अन्वेषण करने ;

(ख) ऐसे लोक सेवक के विरुद्ध विशेष न्यायालय में अभियोजन के लिए मंजूरी या आरोपपत्र दाखिल करने, के प्रयोजन के लिए लोकायुक्त द्वारा किसी अन्य प्राधिकारी के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होगी । २९. इस अधिनियम में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए, किसी व्यक्ति के खिलाप उसी मुद्दों की या उसके समान मुद्दों की शिकायत में,

अभियोजन के लिए मंजूरी का वर्जन । (क) जहाँ मंजूरी प्राधिकारी ने, इस अधिनियम के अधीन या तो अभियोजन को मंजूरी प्रदान की है या ऐसी मंजूरी अस्वीकृत की गई है तो लोकायुक्त, इस अधिनियम के अधीन इस संबंध में विनिर्णय लेने से र्वजित करेगा : या

लोक सेवक के विरुद्ध, अन्वेषण पर कार्रवाई । सन् १९८८ का ४९ ।

(ख) जहाँ सक्षम प्राधिकारी या लोकायुक्त ने, इस अधिनियम के अधीन या तो अभियोजन को मंजूरी प्रदान की है या ऐसी मंजूरी अस्वीकृत की गई है तो इस अधिनियम के अधीन कोई अन्य प्राधिकारी इस संबंध में विनिर्णय लेने से र्वजित होगा । ३०. जहां अन्वेषण पूरा हो जाने के पश्चात् लोकायुक्त के निष्कर्षों से धारा १२ की उप-धारा (१) में र्िनदिष्ट किसी लोक सेवक द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ के अधीन किसी अपराध का किया जाना प्रकट होता है, वहां लोकायुक्त सक्षम प्राधिकारी का अनुमोदन प्राप्त करने के पश्चात्, विशेष न्यायालय में मामला दाखिल करने के लिए संबंधित अन्वेषक, प्राधिकारी को अनुदेश दे सकेगा और अपने निष्कर्षों के साथ रिपोर्ट की एक प्रति सक्षम प्राधिकारी को भेजेगा।

परंतु, सक्षम प्राधिकारी इस उप-धारा के अधीन उसका विनिर्णय लोकायु को तीन महीने की अवधि के भीतर जिसे ऐसे प्राधीकारी द्वारा लिखित में अभिलिखित किए जानेवाले कारणों के लिए एक महीने की अवधि से बढाया जा सकेगा, पहुंचाएगा।

परंतु, यदि सक्षम प्राधिकारी, उक्त समय सीमा के भीतर उसका विनिर्णय पहूँचाने में असफल होता है तो लोकायुक्त, जिसे वह ठीक समझे कार्यवाही कर सकेगा :

परंतु, मुख्यमंत्री के विरुद्ध शिकायत के मामलें में, प्रथम और द्वितीय परंतुक के उपबंध लागू नहीं होंगे ।१६ १६ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ सन १९७४ का २। सन १९८८ का ४९। (२) लोकायुक्त या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत कोई अधिकारी द्वारा अन्वेषण पूरा हो जाने पर आरोप पत्र दाखिल करने पर, दण्ड प्रक्रिया की संहीता १९७३ की धारा १९७ में भ्रष्टाचार की रोकथाम अधिनियम, १९८८ की धारा १९ में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, विशेष न्यायालय, किसी लोक सेवक द्वारा किए गए अपराध का संज्ञान ले सकेगा ।

(३) उप-धाराएँ (१) और (२) में अंर्तविष्ट कोई बात, संविधान के उपबंधों के अनुसरण में पदधारी व्यक्तियों के संबंध में और उस संबंध मे, जिसमें ऐसे व्यक्ति को हटा देने के लिए की प्रक्रिया उसमें विर्िनदिष्ट की गई है, को लागू नहीं होगी ।

(४) उप-धारा (१), (२) और (३) में अंर्तविष्ट उपबंध भारत के संविधान के अनुच्छेद ३११ और अनुच्छेद ३२० के खण्ड (३) के उप-खण्ड (ग) में अंर्तविष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना लागू होंगे ।

अध्याय छह

परिवेदना की शिकायत

३१. (१) लोकायुक्त, किसी लोक सेवक के विरुद्ध परिवेदना या कुप्रशासन से संबंधित शिकायत की परिवेदना की शिकायत । प्राप्ति पर प्रथम यह विनिश्चित करेगा कि मामले में आगे बढे या उसे बंद करे ।

(२) लोकायुक्त, उसके स्वविवेक में, धारा २१ की उप-धारा (२) में विर्िनदिष्ट आधारों पर उप-धारा (१) में विर्िनदिष्ट किसी शिकायत की कोई जाँच करना अस्वीकृत कर सकेगा ।

(३) यदि लोकायुक्त मामले में आगे बढ़ने का विनिश्चय करता है तो वह अभिनिश्चित करेगा कि मामले मे कार्यवाहीयों के लिए प्रथम दृष्टया मुकदमा अस्तित्व में हैं । लोकायुक्त, संबंधित लोक सेवक को, उसे कहे कि शिकायत अग्रेषित करे और शिकायत पर रिपोर्ट माँगने के लिए लोक सेवक के विभाग के सचिव या कार्यालय प्रमुख या, यथास्थिति, सक्षम प्राधिकारी को शिकायत अग्रेषित करेगा ।

(४) लोकायुक्त को, संदर्भ की प्राप्ति के दिनांक से लोक सेवक उसकी टिप्पणी और विभाग के सचिव या विभाग प्रमुख या सक्षम प्राधिकारी उनका रिपोर्ट नब्बे दिनों के भीतर भेजेंगे ।

(५) लोक सेवक की टिप्पणी और विभाग के सचिव या विभाग प्रमुख या, यथास्थिति, सक्षम प्राधिकारी के रिपोर्ट की प्राप्ति पर, यदि उप-धारा (४) के अधीन प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार प्रथम दृष्टया मुकदमा नहीं बनता है, तो लोकायुक्त, उसके कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात्, मामला बंद कर देगा तथा शिकायत कर्ता और संबंधित लोक सेवक को उसकी संसूचना देगा ; या यदि, मामलें में आगम करने का मुकदमा प्रथम दृष्टया अस्तित्व में है तो लोकसेवक, एक या अधिक आगम करने की सिफारिशे कर सकेगा अर्थात् :----

(क) लोकसेवक को प्रयुक्त सुसंगत सेवा नियमों के अनुसार संबंधित प्राधिकारी द्वारा, संबंधित लोक सेवकों के विरुद्ध विभागीय जाँच शुरू करने या समुचित कार्यवाही करने की सिफारिश करेगा ;

(ख) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन आगे की जाँच करने का विनिश्चय करेगा ।

लोकायुक्त की रिपोर्ट ।

३२. (१) लोकायुक्त की रिपोर्ट यदि जिसके संबंध में शिकायत में किसी कार्यवाही की जाँच के पश्चात्, कोई शिकायत शामिल है या हो सकती है या की जा सकती है तो लोकायुक्त का यह समाधान हो जाता है कि, ऐसी कार्यवाही के परिणामस्वरूप शिकायतकर्ता या कोई अन्य व्यक्ति के साथ अन्याय या असम्यक् कष्ट हुआ है तो लोकायुक्त, लिखित रूप में रिपोर्ट द्वारा सार्वजनिक सेवक और संबंधित प्राधिकारी को सिफारिश करते हैं कि ऐसा अन्याय, या असम्यक् कष्ट को रिपोर्ट में विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी रीत्या और समय के भीतर उपचार या प्रतितोष किया जायेगा।१७ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ १७ (२) उप-धारा (१) के अधीन जिसे रिपोर्ट भेजी जाती है वह प्राधिकारी रिपोर्ट में विर्िनदिष्ट अवधि के अवसान के एक महीने के भीतर, रिपोर्ट के अनुपालन के लिये की गयी कार्यवाही लोकायुक्त को संसूचित करेगा या संसूचित किये जाने का कारण बतायेगा।

(३) उप-धारा (१) और (३) में र्िनदिष्ट उसकी सिफारिशों या निष्कर्षों पर की गयी या करने के लिये प्रस्तावित कार्यवाही से लोकायुक्त का समाधान हो जाता है तो वह संबंधित लोकसेवक और प्राधिकारी की शिकायत की जानकारी के अधिन मामला बंद करेगा, परन्तु उनका इस प्रकार समाधान नहीं होता है और यदि वह यह समझता है की, इस प्रकार मामला योग्य है तो वह राज्यपाल को मामले पर विशेष रिपोर्ट दे सकेगा और संबंधित शिकायतकर्ता को सूचित भी करेगा ।

(४) लोकायुक्त, संबंधित पक्षकारों को, यदि आवश्यक है, व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दे सकेगा ।

अध्याय सात

लोकायुक्त की शक्तियाँ

लोकायुक्त की पर्यवेक्षी शक्ितयाँ। ३३. लोकायुक्त तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्र्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन ऐसे अभिकरण द्वारा जहाँ तक हो सकें जाँच संबंधी मामलों के संबंध में राज्य अभिकरण पर अधीक्षण करने और निदेश देने की शक्ितयाँ होंगी।

तलाशी और अभिग्रण। ३४. (१) यदि लोकायुक्त के पास यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसा कोई दस्तावेज, जो उसकी राय में, इस अधिनियम के अधीन किसी अन्वेषण के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत होगा, किसी स्थान में छिपाया गया है तो वह ऐसे किसी राज्य अभिकरण जिसको अन्वेषण कार्य सौंपा गया है, ऐसे दस्तावेजों की तलाशी लेने और उनका अभिग्रहण करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा।

(२) यदि लोकायुक्त का यह समाधान हो जाता है कि उप-धारा (१) के अधीन अभिग्रहीत किसी दस्तावेज का इस अधिनियम के अधीन प्रारंभिक जाँच या किसी अन्वेषण के प्रयोजन के लिए साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जा सकता है और यह कि ऐसे दस्तावेज को उसकी अभिरक्षा में या ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में, जिसको प्राधिकृत किया जाए, प्रतिधारित करना आवश्यक होगा तो वह ऐसी प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण पूरा हो जाने तक ऐसे दस्तावेज को इस प्रकार प्रतिधारित करेगा या ऐसे प्राधिकृत अधिकारी को, प्रतिधारित करने का निदेश दे सकेगा :

परंतु, जहां किसी दस्तावेज को वापस किया जाना अपेक्षित है, वहां लोकायुक्त या प्राधिकृत अधिकारी, ऐसे दस्तावेज की सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित प्रतियों को प्रतिधारित करने के पश्चात् उसको वापस कर सकेगा। सन् १९०८ का ५।

३५. (१) इस धारा के उपबंधों के अध्यधीन, किसी प्रारंभिक जाँच के प्रयोजन के लिए किसी वाद का विचारण करते समय निम्नलिखित विषयों के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता, १९०८ के अधीन सिविल न्यायालय की सभी शक्ितयाँ होंगी, अर्थात् :---

कतिपय मामले में लोकायुक्त को सिविल न्यायालय की शक्ितयाँ होना। (एक) किसी व्यक्ति को समन करना और उसको हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना ;

(दो) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना ;

(तीन) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना ;

(चार) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा करना ;

(पाँच) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना :

परंतु, किसी साक्षी की दशा में ऐसा कमीशन केवल वहां निकाला जाएगा, जहां लोकायुक्त की राय में साक्षी, लोकायुक्त के समक्ष कार्यवाहियों में हाजिर होने की स्थिति में नहीं है ; और

(छह) ऐसे अन्य विषय, जो विहित किए जाएं।

(२) लोकायुक्त के समक्ष कोई कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता की धारा १९३ के अथार्र्ंतर्गत न्यायिक सन् १८६० का ४५। कार्यवाही समझी जाएगी। भाग सात-३९-३. एचबी-१४६३-३.

१८ १८ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४

३६. (१) लोकायुक्त, कोई प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, राज्य सरकार के किसी अधिकारी या संगठन या राज्य अभिकरण की सेवाअों का उपयोग कर सकेगा।

राज्य सरकार के अधिकारियों की सेवाअों का उपयोग करने की लोकयुक्त की शक्ित।

(२) ऐसी जाँच या अन्वेषण से संबंधित किसी मामले में प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए ऐसा कोई अधिकारी या संगठन या राज्य अभिकरण, जिसकी सेवाअों का उपयोग उप-धारा (१) के अधीन किया जाता है, लोकायुक्त के निदेशन और नियंत्रण के अध्यधीन,---

(क) किसी व्यक्ति को समन कर सकेगा और हाजिर करा सकेगा तथा उनकी परीक्षा कर सकेगा ;

(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा कर सकेगा ; और (ग) किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उनकी प्रति की अध्यपेक्षा कर सकेगा। (३) वह अधिकारी या संगठन या राज्य अभिकरण, जिसकी सेवाअों का उपयोग उप-धारा (२) के अधीन किया जाता है, प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण से संबंधित किसी मामले की जाँच या, यथास्थिति, अन्वेषण करेगा और लोकायुक्त को, ऐसी अवधि के भीतर, जो इस निमित्त उसके द्वारा विर्िनदिष्ट की जाए, उस पर रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।

३७. (१) जहां लोकायुक्त या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्वेषण अधिकारी के पास, उसके कब्जे में की सामग्री के आधार पर ऐसे विश्वास के कारण लेखबद्ध करते हुए यह विश्वास करने का कारण है कि,---

(क) किसी व्यक्ति के कब्जे में भ्रष्टाचार के कोई आगम हैं ;

आस्तियों के अन्यसंक्रामण के लिए प्रतिषेध करने की प्रक्रिया ।

(ख) ऐसा व्यक्ति भ्रष्टाचार से संबंधित कोई अपराध करने का अभियुक्त है ; और

(ग) अपराध के ऐसे आगमों को छिपाने, अंतरित करने या ऐसी रीति से संव्यवहार किए जाने की संभावना है, जिसके परिणामस्वरूप अपराध के ऐसे आगमों के अधिहरण से संबंधित कोई कार्यवाहियाँं विफल हो सकती हैं ;

लोकायुक्त, विशेष न्यायालय के समक्ष आस्तियों के अन्यसंक्रामण का प्रतिषेध करने के लिए तथ्थों का कथनवाला कोई आवेदन दाखिल कर सकेगा और विशेष न्यायालय में लोक सेवक के विरुद्ध की कार्यवाहीयाँ पूरी होने तक ऐसी आस्तियों के अन्यसंक्रामण के प्रतिषेध करने के लिए अनुरोध कर सकेगा । (२) विशेष न्यायालय, यदि उसका यह मत है कि आवेदन में उल्लिखित सम्पत्ति भ्रष्ट साधन के जरिए र्अजित की गई है तो वह विशेष न्यायालय में लोक सेवक विरुद्ध की कार्यवाहीयाँ के पूरा होने तक ऐसी सम्पत्ति के अन्यसंक्रामण का प्रतिषेध करने का आदेश बना सकेगा ।

(३) यदि लोकसेवक, उसके विरुद्ध विरचित आरोपों के तत्पश्चात् दोषमुक्त होता है तो विशेष न्यायालय, सम्पत्ति के अन्य संक्रामण का प्रतिषेध का आदेश विखंडीत करेगा ।

सन् १९८८ का ४९। (४) यदि लोकसेवक, भ्रष्टाचार के आरोपों के तत्पश्चात् दोषसिध्द पाया जाता है तो भ्रष्टाचार की रोकथाम अधिनियम, १९८८ के अधीन अपराध से संबंधित आगम का अधिहरण किया जायेगा और राज्य सरकार में निहित होगी ।

३८. (१) धारा ३७ के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां विशेष न्यायालय के पास, प्रथमदृष्टया साक्ष्य के आधार पर, यह विश्वास करने का कारण है या उसका यह समाधान हो गया है कि आस्तियां, आगम, प्राप्तियां और फायदे, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हों, लोक सेवक द्वारा भ्रष्टाचार के साधनों द्वारा उद्भूत या उपाप्त किए गए हैं, वहां वह उसके दोषमुक्त किए जाने तक ऐसी आस्तियों, आगमों, प्राप्तियों और फायदों के अधिहरण को प्राधिकृत कर सकेगा ।

विशेष परिस्थितियों में भ्रष्टाचार के साधनों द्वारा उद्भूत या उपाप्त आस्तियों, आगमों, प्राप्तियों और फायदों का अधिहरण।१९ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ १९ (२) जहां उप-धारा (१) के अधीन किया गया अधिहरण का कोई आदेश, उच्च न्यायालय द्वारा उपांतरित या बातिल कर दिया जाता है या जहां लोक सेवक को विशेष न्यायालय द्वारा दोषमुक्त कर दिया जाता है, वहा उप-धारा (१) के अधीन अधित आस्तियों, आगमोंे, प्राप्तियों और फायदों को ऐसे लोक सेवक को वापस कर दिया जाएगा और यदि किसी कारण से आस्तियों, आगमों, प्राप्तियों और फायदों को वापस किया जाना संभव नहीं है तो ऐसे लोक सेवक को इस प्रकार अधित किए गए धन सहित उसकी कीमत का, अधिहरण की तारीख से उस पर पांच प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से परिकलित व्याज के साथ संदाय किया जाएगा ।

३९. (१) जहां लोकायुक्त का, भ्रष्टाचार के अभिकथनों की प्रारंभिक जाँच करते समय, उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर प्रथमदृष्टया यह समाधान हो जाता है, कि----

(क) प्रारंभिक जांच करते समय धारा १२ की उप-धारा (१) के खंड (ङ) या खंड (च) या (छ) में र्िनदिष्ट लोक सेवक के अपने पद पर बने रहने से ऐसी प्रारंभिक जांच पर प्रतिकूल प्रभाव पडने की संभावना है ; या

भ्रष्टाचार के अभिकथन से संबद्ध लोक सेवक के स्थानांतरण या निलंबन की सिफारिश करने की लोकायुक्त की शक्ितयाँ । (ख) खण्ड (क) में र्िनदिष्ट लोक सेवक से साक्ष्य को नष्ट करने या किसी रूप में बिगाडने या साक्षियों को प्रभावित करने की संभावना है, तो----

लोकायुक्त, ऐसे लोक सेवक को, ऐसी अवधि तक, जो आदेश में विर्िनदिष्ट की जाए, उसके द्वारा धारित पद से स्थानांतरित या निलंबित करने की राज्य सरकार को सिफारिश कर सकेगा।

(२) राज्य सरकार, सामान्यतया, उप-धारा (१) के अधीन की गई लोकायुक्त की सिफारिश को, ऐसे किसी मामले में जहां प्रशासनिक कारण से ऐसा करना साध्य नहीं है, वहा कारणों को लेखबद्ध करते हुए, स्वीकार करेगी, अन्यथा नहीं ।

४०. लोकायुक्त, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में लोक सेवक को, जिसको किसी दस्तावेज या अभिलेख को तयार करने या उसकी अभिरक्षा रखने का कार्य सौंपा गया है, समुचित निदेश जारी कर सकेगा----

(क) ऐसे दस्तावेज या अभिलेख को नष्ट किए जाने या नुकसान पहुंचाने से उसकी संरक्षा करना ; या

प्रारंभिक जाच के दौरान अभिलेखों के नष्ट किए जाने को रोकने के लिए निदेश देने की लोकायुक्त की शक्ित। (ख) लोक सेवक को ऐसे दस्तावेज या अभिलेख में परिवर्तन करने या उसे छिपाने से रोकना ; या (ग) लोक सेवक को भ्रष्ट साधनों के माध्यम से उसके द्वारा अभिकथित रूप से र्अजित किन्ही आस्तियों को अंतरित करने या उनका अन्यसंक्रामित करने से रोकना ।

प्रत्यायोजन की शक्ित। ४१. लोकायुक्त, साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा और ऐसी शर्तों और परिसीमाअों के अधीन रहते हुए, जो उसमें विनिदिष्ट की जाएं, यह निदेश दे सकेगा कि उसको प्रदत्त किसी प्रशासनिक या वित्तीय शक्ित का, उसके ऐसे सदस्यों या अधिकारियों या कर्मचारियों द्वारा भी, जो उस आदेश में विर्िनदिष्ट किए जाएं, प्रयोग या निर्वहन किया जा सकेगा ।

पुर्नविलोकन की शक्ति। ४२. लोकायुक्त, स्वप्रेरणा से या व्यथित पक्षकार द्वारा किए गए आवेदन पर, इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा पारित किसी आदेश का पुर्नविलोकन कर सकेगा ताकि आदेश में की विधिया तत्थों की प्रत्यक्ष गलती या भारी गलती ठीक की जाए, या नए साक्ष्य जिसने न्याय के न हो पाने में परिणामि हुआ था की खोज की जाए :

परंतु, ऐसे आदेश के या आवेदन की प्राप्ति के दिनांक से नब्बे दिनों के भीतर और ऐसे आदेश के विरुद्ध कोई अपील या अन्य उपाय न करने अध्यधीन ऐसी शक्ति का प्रयोग किया जायेगा :

परंतु आगे यह कि, संबंधित व्यक्ति को, सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिये बिना ऐसा कोई आदेश पारित नही होगा। " ।२० २० महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४

अध्याय आठ

विशेष न्यायालय

४३. विशेष न्यायालय, न्यायालय में मामले के फाइल किए जाने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के विशेष न्यायालय ।

भीतर प्रत्येक विचारण का पुरा किया जाना सुनिश्चित करेंगे :

परंतु, यदि विचारण एक वर्ष की अवधि के भीतर पूरा नहीं किया जा सकता है तो विशेष न्यायालय उसके कारणों को अभिलिखित करेगा और उन कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएं तीन महीने से अनधिक की और अवधि के भीतर या ऐसी और अवधियों के भीतर जो तीन महीने से अधिक की नहीं होंगी, ऐसी प्रत्येक तीन महीने की अवधि की समाप्ति से पूर्व, किन्तु दो वर्ष से अनधिक की कुल अवधि के भीतर विचारण को पूरा करेगा।

सन् १९८८ का ४९। विशेष न्यायालय द्वारा हानि का निर्धारण और उसकी वसूली।

४४. विशेष न्यायालय द्वारा हानि का निर्धारण और उसकी वसूली-यदि कोई लोक सेवक, विशेष न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है, तो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के होते हुए भी और उस पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, वह, ऐसे लोक सेवक द्वारा सद्भावपूर्वक न किए गए कार्यों या विनिश्चयों के कारण और जिनके लिए उसको सिद्धदोष ठहराया गया है, राजकोष को हुई हानि का, यदि कोई हो, निर्धारण कर सकेगा तथा इस प्रकार सिद्धदोष ठहराए गए ऐसे लोक सेवक से, ऐसी हानि की, यदि संभव या परिमाणीय हो, वसूली का आदेश कर सकेगा :

परंतु, यदि विशेष न्यायालय, उन कारण से, जो लेखबद्ध किए जाएं, इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि कारित हानि, इस प्रकार सिद्धदोष ठहराए गए लोक सेवक के कार्य या विनिश्चयों के हिताधिकारी या हिताधिकारियों के साथ षडयंत्र के अनुसरण में हुई थी, तो ऐसी हानि, यदि इस धारा के अधीन निर्धारित की गई है और परिमाणीय है, आनुपातिक रूप से ऐसे हितधिकारी या हिताधिकारियों से भी वसूल की जा सकेगी।

अध्याय नौ

लोकायुक्त और सदस्यों को हटाना

४५. (१) लोकायुक्त्त, अध्यक्ष या किसी सदस्य के विरुद्ध की कोई शिकायत में जाँच नही करेगा। अध्यक्ष और सदस्यों को हटाने और निलंबन करने।

(२) उप-धारा (४) के उपबंधों के अध्यधीन, अध्यक्ष या कोई सदस्य को उच्च न्यायालय के उसके निम्न दिए जानेवाले निर्देश पर, कदाचार के आधार पर, राज्यपाल के आदेश द्वारा उसके पद से हटाया जायेगा । उस निमित्त विहित प्रक्रिया के अनुसरण में, की गई जाँच पर प्रतिवेदन यह कि, अध्यक्ष या, यथास्थिति, ऐसे सदस्य को ऐसे आधार पर हटाया जाना जाहिए था ; महाराष्ट्र विधानमंडल कम से कम पचहत्तर प्रतिशत सदस्यों के हस्ताक्षर से की जानेवाली याचिका पर राज्यपाल द्वारा उसके पद से हटाया जायेगा।

(३) राज्यपाल, अध्यक्ष या किसी सदस्य को, इस संबंध में, उच्च न्यायालय द्वारा सिफारिश या किये गये आदेश की प्राप्ति पर उप-धारा (२) के अधीन उच्च न्यायालय, को निर्देश दिए गए है, जब राज्यपाल ने ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय की अंतिम रिपोर्ट की प्राप्ति पर आदेश पारित किया है तो पद से निलंबित कर सकेगा ।

(४) उप-धारा (२) में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्यपाल आदेश द्वारा अध्यक्ष या किसी सदस्य को उसके पद से हटायेगा यदि अध्यक्ष या, यथास्थिति, ऐसा सदस्य,---

(क) न्यायर्िनणित दिवालिया घोषित किया है ; या (ख) राज्यपाल के मतानुसार यदि नैतिक अधमता से अंतर्ग्रस्त अपराध में दोषसिद्ध पाया गया है ; (ग) उसके पदीय कर्तव्यों से बा किसी प्रदत्त रोजगार में उसकी पदावधि के दौरान जुडा हुआ है ; या

(घ) राज्यपाल की राय में, मानसिक या शारीरिक दौर्बल्य के कारण पद पर नियमित होने के लिए असमर्थ है।

(५) यदि अध्यक्ष या कोई सदस्य, राज्य सरकार द्वारा या कि और से किए गए किसी संविदा या करार में किसी मार्ग से संबंधित या हितबद्ध है या उसके लाभ में या उससे उद्भूत किसी फायदें में, सदस्य के रुप में से अन्यथा निर्गमित कंपनी के अन्य सदस्यों की तरह भागीदार है या होनेवाला है तो वह उप-धारा (२) के प्रयोजनो के लिए, वह कदाचार का दोषी माना जाएगा।२१ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ २१ सन् १९८८ का ४९।

लोकायुक्त के पदाधिकारियों के विरुद्ध शिकायतें। ४६. (१) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८, के अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए लोकायुक्त के अधीन या उससे सहयुक्त किसी अधिकारी या कर्मचारी या राज्य अभिकरण के विरुद्ध किए गए अभिकथन या दोषपूर्ण कार्य के संबंध में प्रत्येक शिकायत पर इस धारा के उपबंधों के अनुसार कारवाई की जाएगी।

(२) लोकायुक्त, शिकायत या अभिकथन की जांच, उसकी प्राप्ति की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर पूरी करेगा।

(३) लोकायुक्त या लोकायुक्त में नियुक्त या उससे सहयुक्त राज्य अभिकरण के किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध शिकायत की जांच करते समय यदि, उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर उसका प्रथमदृष्टया यह समाधान हो जाता है, कि----

(क) जांच करते समय लोकायुक्त या उसमें नियुक्त या उससे सहयुक्त अभिकरण के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी के अपने पद पर बने रहने से ऐसी जाँच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

(ख) लोकायुक्त या उसमें नियुक्त या उससे सहयुक्त अभिकरण का कोई अधिकारी या कर्मचारी द्वारा साक्ष्य को नष्ट करने या किसी रूप में बिगाडने या साक्षियों को प्रभावित करने की संभावना है तब लोकायुक्त, आदेश द्वारा, लोकायुक्त के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी को निलंबित कर सकेगा या लोकायुक्त में नियुक्त या उससे सहयुक्त राज्य अभिकरण को उसके द्वारा इससे पूर्व प्रयोग की गई सभी शक्ितयों और उत्तरदायित्व से र्िननिहित कर सकेगा।

सन् १९८८ का ४९।

(४) जांच के पुरा हो जाने पर, यदि लोकायुक्त का यह समाधान हो जाता हैे कि भष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ के अधीन किसी अपराध या किसी दोषपूर्ण कार्य के किए जाने का प्रथमदृष्टया साक्ष्य है, तो वह ऐसी जांच के पूरा हो जाने की पंद्रह दिन की अवधि के भीतर लोकायुक्त के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी या लोकायुक्त में नियुक्त या उससे सहयुक्त ऐसे अधिकारी, कर्मचारी, राज्य अभिकरण को अभियोजित करने का आदेश करेगा और संबंधित पदधारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाहिया आरंभ करेगा :

परंतु, ऐसा कोई आदेश, लोकायुक्त के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी या उसमें नियुक्त या उससे सहयुक्त ऐसे अधिकारी, कर्मचारी, राज्य अभिकरण को सुनवाई का युक्ितयुक्त अवसर दिए बिना, पारित नहीं किया जाएगा।

अध्याय दस

वित्त लेखा और बजट

बजट । ४७. लोकायुक्त, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाएं, अगले वित्तीय वर्ष के लिए, लोकायुक्त की प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय को दर्शाते हुए अपना बजट तैयार करेगा और उसको राज्य सरकार को सूचनार्थ और आवश्यक कार्यवाही के लिए अग्रेषित करेगा।

राज्य सरकार द्वारा अनुदान । ४८. राज्य सरकार, इस निमित्त विधि द्वारा, राज्य विधानमंडल द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात, लोकायुक्त को ऐसी धनराशियां अनुदत्त कर सकेगी, जो अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन तथा भत्तों और प्रशासनिक खर्चों के लिए, जिनके अंतर्गत लोकायुक्त के अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों को या उनके संबंध में संदेय वेतन और भत्ते तथा पेंशन भी हैं, संदत्त की जानी अपेक्षित हैं।

लेखाअों का वर्ाषिक विवरण । ४९. (१) लोकायुक्त, उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख बनाए रखेगा और ऐसे प्ररूप में, जो राज्य सरकार द्वारा राज्य के महालेखाकार के परामर्श से विहित किया जाए, लेखाअों का वर्ाषिक विवरण तैयार करेगा ।

(२) लोकायुक्त के लेखाअों की संपरीक्षा, राज्य के महालेखाकार द्वारा ऐसे अंतरालों पर की जाएगी, जो उसके द्वारा विर्िनदिष्ट किए जाएं ।२२ २२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ (३) राज्य के महालेखाकार को इस अधिनियम के अधीन लोकायुक्त के लेखाअों की संपरीक्षा करने के संबंध में या उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ित को ऐसी संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार प्राप्त होंगे, जो सरकारी लेखा की संपरीक्षा के संबंध में साधारणतया राज्य के महालेखाकार को प्राप्त हैं और विशिष्टतया बहियों, लेखाअों, संबंधित वाउचरों और अन्य दस्तावेजों तथा कागजपत्रों को प्रस्तुत करने की मांग करने और लोकायुक्त के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार प्राप्त होगा ।

(४) राज्य के महालेखाकार या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ित द्वारा यथा प्रमाणित लोकायुक्त के लेखाअों को, उन पर संपरीक्षा रिपोर्ट सहित, प्रतिवर्ष राज्य सरकार को अग्रेषित किया जाएगा और राज्य सरकार उसको राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के समक्ष रखा जायेगा ।

५०. (१) इस अधिनियम के अधीन जब कोई जाँच कर रहे है तब जो भी लोकायुक्त्त के अध्यक्ष या सदस्यों का जानबुझकर अपमान करता है, बाधा डालने का कारण बनता है, उसे दोषसिध्दि पर साधारण कारावास से जिसकी छह महीने तक बढाई जा सकेगी या जुर्माने से, या दोनो, से दण्डित किया जायेगा । (२) जो कोई शब्दों का बोलकर या उनके पढे जाने के आशय से कोई कथन करता है या उसके लोकायुक्त का जानबूझकर, अपमान करना, बाधा डालना या उन्हें बदनाम करना।

बयान को प्रकाशित करता है या कोई अन्य कार्य करता है, जिसका हेतु लोकायुक्त्त के अध्यक्ष या सदस्यों को बदनामी करना है उसे दोषसिध्दि पर, साधारण कारावास से छह महीने तक बढाई जा सकेगी या, जुर्माने से, या दोनों से दंण्डित किया जायेगा।

(३) दण्ड प्रक्रिया की संहिता, १९७३ की धारा १९९ख की उप-धारा (२) से (५) के उपबंध, सन् १९७४ का २।

उप-धारा (१) या उप-धारा (२) के अधीन किसी अपराध के संबंध में लागू होगें, जैसे कि वे, उक्त्त धारा १९९ की उप-धारा (१) में र्िनदिष्ट किसी अपराध के संबंध में लागू होते हैं परन्तु उपांतरणों के अध्यधीन, कि, राज्यपाल को लोकायुक्त्त के अध्यक्ष या सदस्य के विरुद्ध किसी अपराध के मामले में, पूर्ववर्ित धारा को छोडकर लोक अभियोजक द्वारा ऐसे अपराध के संबंध में कोई शिकायत नहीं की जायेगी ।

५१. (१) इस अधिनियम में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, जो कोई इस अधिनियम के अधीन कोई मिथ्या और तुच्छ या तंग करने वाली शिकायत करेगा,----

(क) लोकायुक्त, दो लाख रुपयों तक के जुर्माने से दण्डित करेगा :

मिथ्या शिकायत के लिए अभियोजन और लोक सेवक को प्रतिकर आदि का संदाय।

परंतु, इस धारा के अधीन कोई आदेश पारित करने के पूर्व लोकायुक्त संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देगा ।

(ख) लोकायुक्त शिकायतकर्ता का अभियोजन करने का निर्देश दे सकेगा दोषसिद्धि होनेपर कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो दो लाख रुपयों तक हो सकेगा से दण्डित किया जायेगा ।

(२) किसी विशेष न्यायालय के सिवाय, कोई भी न्यायालय उप-धारा (१) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान नहीं करेगा।

(३) कोई भी विशेष न्यायालय, किसी ऐसे व्यक्ित द्वारा, जिसके विरुद्ध मिथ्या, तुच्छ या तंग करने वाली शिकायत की गई थी, या लोकायुक्त द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा शिकायत किए जाने पर उप-धारा (१) के खंड (ख) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान लेगा अन्यथा नहीं।

(४) उप-धारा (१) के खण्ड (ख) के अधीन किसी अपराध के संबंध में अभियोजन, लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा और ऐसे अभियोजन से संबंधित सभी व्यय को राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।२३ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ २३ (५) ऐसे किसी व्यक्ित की [जो कोई व्यष्टि या सोसाइटी या व्यक्ित-संगम या न्यास है (चाहे वह रजिस्ट्रीकृत है अथवा नहीं)], इस अधिनियम के अधीन मिथ्या शिकायत करने के लिए, दोषसिद्धि के मामले में, ऐसा व्यक्ित, ऐसे लोक सेवक को, जिसके विरुद्ध उसने मिथ्या शिकायत की थी, ऐसे लोक सेवक द्वारा मुकदमा लड़ने संबंधी विधिक व्ययों के अतिरिक्त, जो विशेष न्यायालय अवधारित करे प्रतिकर का संदाय करने के लिए दायी होगा।

(६) इस धारा में अंर्तविष्ट कोई बात, सद्भावपूर्वक की गई शिकायतों के मामले में लागू नहीं होगी ।

स्पष्टीकरण.---- इस उप-धारा के प्रयोजन के लिए, "सद्भावपूर्वक" पद से भारतीय दंड संहिता की धारा सन् १९६० का ४५। ५२ में समनुदेशित अर्थ से है।

सोसाइटी या व्यक्ितयोंे के संगम या न्यास द्वारा मिथ्या शिकायत किया जाना। ५२. (१) जहां धारा ५१ की उप-धारा (१) के अधीन कोई अपराध किसी सोसाइटी या व्यक्ितयों के संगम या न्यास (चाहे वह रजिस्ट्रीकृत है या नहीं) द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ित, जो अपराध के किए जाने के समय ऐसी सोसाइटी या व्यक्ितयों के संगम या न्यास के कारोबार या कार्यों या क्रियाकलापों के संचालन के लिए उस सोसाइटी या व्यक्ितयों के संगम या न्यास का प्रत्यक्ष रूप से भारसाधक या उत्तरदायी था और साथ ही ऐसी सोसाइटी या व्यक्ितयों का संगम या न्यास भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के दायी होंगे :

परंतु, इस उप-धारा में अन्र्तविष्ट कोई बात, ऐसे किसी व्यक्ित को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्य्क तत्परता बरती थी।

(२) उप-धारा (१) में अन्र्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी सोसाइटी या व्यक्ितयों के संगम या न्यास (चाहे वह रजिस्ट्रीकृत है या नहीं) द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध, ऐसी सोसाइटी या व्यक्तियों के संगम या न्यास के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार, अपने विरुद्ध कार्यावही किए जाने और दंडित किए जाने का दायी होगा।

अध्याय ग्यारह

विविध

राज्य सरकार को विवरणियाँ, आदि प्रस्तुत करना। ५३. लोकायुक्त, राज्य सरकार को ऐसी विवरणियाँ और विवरण तथा लोकायुक्त की अधिकारिता के अधीन किसी विषय के संबंध में ऐसी विशिष्टियाँ, जिनकी राज्य सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे, ऐसे समय पर और ऐसे प्ररूप तथा रीति से, जो विहित की जाए या जैसा राज्य सरकार द्वारा अनुरोध किया जाए, प्रस्तुत करेगा । ५४. (१) लोकायुक्त, इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के कार्यप्रदर्शन पर व्यवस्थित और जैसा लोकायुक्त की वर्ाषिक रिपोर्ट । कि आवश्यक कानूनी सुधार से संबंधित मामलों समेत वर्ाषिक रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपेगा ।

(२) उप-धारा (१) के अधीन विशेष रिपोर्ट की प्राप्ित पर राज्यपाल के किसी स्पष्टीकारक ज्ञापन के साथ राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के समक्ष उसकी प्रती रखेगा।

(३) धारा २४ की, उप-धारा (२) के उपबंधों के अध्यधीन लोकायुक्त उसके स्वनिर्णय में, समय-समय से, मामले को बंद करेगा या अन्यथा उसके द्वारा निपटाया जायेगा या उसकी बेंच को उपलब्ध करेगा, ऐसी रीत्या और ऐसे व्यक्ति को जैसा वह समुचित समझे आम लोगों, अकादमिक या वृतिक हीत के लिये प्रतित हो।

५५. इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावनापूर्वक कृत या करने के लिए आशयित किस बात के संबंध में धारा १० में र्िनदिष्ट लोकायुक्त के विरुद्ध या किसी अधिकारी कर्मचारी, राज्य अभिकरण या किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाहियाँ नहीं की जायेगी।

किसी लोक सेवक द्वारा सद्भावपूर्वक की गई कारवाई के लिए संरक्षण ।२४ २४ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ सन् १८६० का ४५। ५६. लोकायुक्त के अध्यक्ष, सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के बारे में, जब वे इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में कोई कार्य कर रहे हैं या उनका कार्य करना तात्र्पयित है, यह समझा जाएगा की वे, भारतीय दंड संहिता की धारा २१ के अर्थ के भीतर, लोक सेवक हैं।

लोकायुक्त के सदस्यों, अधिकारीयों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना।

५७. किसी सिविल न्यायालय को, किसी ऐसे विषय के संबंध में अधिकारिता नहीं होगी, जिसका अधिकारीता का वर्जन। लोकायुक्त इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अवधारण करने के लिए सशक्त हैं।

विधिक सहायता ।

सन् १९८७ का ३९। ५८. लोकायुक्त, प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को, जिसके विरुद्ध विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, १९८७ के उपबंधों, तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपबंधों अनुसार उसके समक्ष कोई शिकायत जो ऐसी विधि सहायता के लिए पात्र है तो शिकायत की विविध सहायता उपलब्ध कराएगा।

५९. इस अधिनियम के उपबंध, इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति या इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति के कारण प्रभाव रखनेवाली किसी लिखत में अंर्तविष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे।

६०. इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे न कि उसके अल्पीकरण में।

इस अधिनियम के उपबंधों का अन्य विधियों के अतिरिक्त होना।

६१. राज्य सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में नियम बनाने की शक्ति । अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी।

(२) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ित की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमो में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :----

(क) धारा २ की उप-धारा (१) के खंड (ज) में र्िनदिष्ट शिकायत का प्ररूप ; (ख) ऐेसा पद या ऐसे पदों, जिनके संबंध में धारा १० की उप-धारा (३) के अधीन नियुक्ित की जाएगी ;

(ग) ऐेसे अन्य विषय, जिनके लिए लोकपाल को, धारा ३५ की उप-धारा (१) के खंड (छह) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्ितयाँ होंगी ;

(घ) धारा ३७ की उप-धारा (२) के अधीन विशेष न्यायालय को सामग्री के साथ कुर्की का आदेश भेजने की रीति ;

(ङ) धारा ४७ के अधीन लोकायुक्त की प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय र्दशित करते हुए प्रत्येक वित्तीय वर्ष में आगामी वित्तीय वर्ष के लिये बजट तैयार करने का प्ररूप और समय ;

(च) धारा ४९ की उप-धारा (१) के अधीन लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख बनाए रखने के लिये प्ररूप और वर्ाषिक लेखा विवरणों की प्रारूप ;

(छ) धारा ५३ के अधीन विशिष्टियों सहित विवरणियां और विवरण तैयार करने का प्ररूप और रीति तथा समय ;

(ज) ऐसा कोई अन्य विषय, जिसको विहित किया जाना है या जिसको विहित किया जाए। विनियम बनाने की लोकायुक्त की शक्ित।

६२. (१) लोकायुक्त, इस अधिनियम के उपबंधों और उसके अधीन बनाए गए नियमोंे के अध्यधीन शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधोंे को कार्यान्वित करने के लिए विनियम बना सकेगा।

(२) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ित की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :---

(क) लोकायुक्त की वेबसाइट पर धारा २४ की उप-धारा (८) के अधीन लंबित या निपटाई गई सभी शिकायतों की प्रास्थिति, उनके प्रतिनिर्देश से अभिलेखों और साक्ष्य सहित, प्रर्दशित करने की रीति ;

२५ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ २५

(ख) धारा २४ की उप-धारा (१०) के अधीन प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण करने की रीति और प्रक्रिया ;

(ग) ऐसा कोई अन्य विषय, जिसको इस अधिनियम के अधीन विर्िनदिष्ट किया जाना अपेक्षित है या विर्िनदिष्ट किया जाए।

नियमों और विनियमों का रखा जाना। ६३. इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिनों की अवधि के लिए रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिर्वतित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा। किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिर्वतित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडेगा।

कठिनाइयोंे को दूर करने की शक्ित। ६४. (१) इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में यदि कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न होंे और उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हो :

परंतु, इस धारा के अधीन बनाया कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारम्भण से दो वर्षोर्ं की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा।

(२) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक आदेश, उसके बनाये जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।

संदेह का निवारण। ६५. संदेह निवारणार्थ एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि इस अधिनियम की किसी बात का अर्थ यह नहीं लगाया जायेगा कि वह लोकायुक्त को किसी ऐसे कार्य की जाँच करने का प्राधिकार देती है जो कि निम्न द्वारा या के अनुमोदन से किया गया हो----

(क) भारतीय दण्ड संहिता की धारा १९ में यथा परिभाषित कोई न्यायाधीश ;

सन् १८६० का ४५।

(ख) किसी न्यायालय के कोई पदाधिकारी या कर्मचारी ;

(ग) महालेखापाल, महाराष्ट्र ;

(घ) महाराष्ट्र राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष या सदस्य ;

(ङ) मुख्य निर्वाचन आयुक्त, निर्वाचन आयुक्त तथा प्रादेशिक आयुक्त जो कि संविधान के अनुच्छेद ३२४ में र्िनदिष्ट हैं, तथा मुख्य निर्वाचन अधिकारी, महाराष्ट्र राज्य ;

(च) महाराष्ट्र विधानसभा का अध्यक्ष या महाराष्ट्र विधानपरिषद का सभापति ;

(छ) विधानमण्डल के दोनों सदनों के सचिवालयीन कर्मचारिवृन्द के किसी सदस्य।

६६. (१) इस अधिनियम के प्रारम्भण पर, महाराष्ट्र लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, १९७१ निरसन और व्यावृत्ति। सन् १९७१ का ४६। (सन् १९७१ का महा. ४६) ऐसे प्रारम्भण से निरसित होगा ।

(२) परन्तु, ऐसे निरसन के होते हुए भी,----

(क) उक्त अधिनियम के अधीन सभी आवेदन, वाद और अन्य कार्यवाहियाँ किसी न्यायालय, सक्षम प्राधिकारी या अन्य अधिकारी या प्राधिकारी के समक्ष इस अधिनियम के प्रारम्भण के दिनांक पर लम्बीत है तो इस प्रकार निरसित अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में जारी रखेगी और निपटायी जायेगी मानो कि, उक्त अधिनियम प्रवृत्त होने से जारी था और यह अधिनियम पारित नहीं हुआ था ;

भाग सात-३९-४. एचबी-१४६३-४.

२६ २६ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४

(ख) निरसित अधिनियम के अधीन की गयी या जारी की गयी किसी नियुक्तियाँ, नियम और अधिसूचना इस अधिनियम के प्रारम्भण के दिनांक पर प्रवृत्त है तो जहाँ तक हो सके इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है तो इस अधिनियम के अधीन की गयी या जारी की गई समझी जायेगी और अधिनियम के अधीन की गयी या जारी की गयी कोई नियुक्तियाँ, नियम या अधिसूचना द्वारा अतिष्ठित या उपांतरिम होने तक प्रवर्तमान में जारी रहेगा ;

(ग) निरसित अधिनियम के उपबंधों के अधीन संस्थित सभी अभियोजन प्रभावी होंगे और विधि के अनुसरण में निपटाये जायेंगे ।२७ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ २७

प्रथम अनुसूची

[धारा ३ (५) देखिए]

मैं ...................................................... जिसे लोक आयुक्त के अध्यक्ष/सदस्य के पद पर नियुक्त किया गया है सत्य-निष्ठा से भगवान को साक्षी मान कर प्रतिज्ञा करता हूँ/शपथ लेता हूँ कि विधि द्वारा यथा स्थापित भारत के संविधान के प्रति विश्वास तथा निष्ठा रखूंगा तथा मैं सम्यक्तया तथा ईमानदारी के साथ तथा अपनी पुरी योग्यता, ज्ञान तथा निर्णय के अनुसार अपने पद के कर्तव्यों का भय या पक्षपात, अनुराग या दुर्भावना के बिना पालन करूंगा।२८ २८ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४

द्वितीय अनुसूची

[धारा १३ (१) (पाँच) देखिए]

(क) अपराध की जाँच या राज्य की सुरक्षा के संरक्षण के प्रयोजनार्थ कृत कार्यवाही।

(ख) यह अवधारित करने के लिये कि क्या कोई मामला न्यायालय के समक्ष जाना चाहिए या नही, शक्ितयों का प्रयोग करते हुए कृत कार्यवाही।

(ग) ऐसे मामलों में कृत कार्यवाही जो ग्राहक या प्रदायकों के साथ प्रशासन के शुद्धत: वाणिज्यक सम्बन्धों से उपस्थित होते हैं, सिवाय ऐसी बातों के जहाँ शिकायत कर्ता निविदा सम्बन्धी आभारों को पूरा करने में परेशानी या भारी विलम्ब का अभियोग लगाता है।

(घ) लोक कर्मचारियों कीं नियुक्ित, हटाये जाने, वेतन, अनुशासन अधिवर्ाषिकी के बारे में या सेवा सम्बन्धी प्रतिबन्धों सम्बन्धी अन्य मामलों के बारे में कृत कार्यवाही परन्तु इसमें निवृत्ति वेतन, उपदान, भविष्य निधि के लिये दावों के बारे में या सेवा-निवृत्ति, हटाये जाने या सेेवा के अवसान पर उपस्थित होने वाले किन्हीं दावों के बारे में कृत कार्यवाही सम्मिलित नहीं है।

(ङ) पारिश्रामिक और मानदेय निधि ।२९ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ २९

उद्देश्यों तथा कारणों का वव्य ।

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, २०१३ (सन् २०१४ का १)कतिपय लोक कृत्यकारियों के विरूद्ध भ्रष्टाचार के अभिकथन में जाँच करने के लिए तथा अन्य संबंधित मामलों के लिए, संघ राज्य के लिए लोकपाल और राज्यों के लिए लोकायुक्त निकाय की स्थापना करने के लिए उपबंध करने के लिए संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है ।

उक्त अधिनियम की धारा ६३ यह उपबंध करती है कि, इस अधिनियम के प्रारम्भण के दिनांक से एक वर्ष की अवधि के भीतर,कतिपय लोक कृत्यकारियों के विरूद्ध भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों का निपटाना करने के लिए राज्य विधानमंडल द्वारा की गयी एक विधि द्वारा राज्य के लिये लोकायुक्त के रूप में ज्ञात एक निकाय यदि इस प्रकार स्थापित, गठित या नियुक्त नहीं किया गया है तो प्रत्येक राज्य उसे स्थापित करेगा ।

२. महाराष्ट्र लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, १९७१ (सन् १९७१ का महा. ४६) राज्य में प्रवृत्त्त है । उक्त अधिनियम, लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त की नियुक्ित के लिए उपबंध करता है। उक्त अधिनियम के अधीन लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त, लोक सेवकों के विरूद्ध परिवेदना और अभिकथन की शिकायतों के संबंध में जाँच करने के लिए सशक्त है । लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त शिकायतों पर जाँच करते है और उसकी रिपोर्ट कार्यवाही करने के लिए सरकार को सौंपते है । उक्त अधिनियम के अधीन लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त को शिकायतों पर कार्यवाही करने की सीमित शाक्ितयाँ है ।

३. लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, २०१३ की धारा ६३ के उपबंधों को देखते हुए राज्य में, भ्रष्टाचार के अभिकथनों से संबंधीत शिकायतों को प्राप्त करने के लिए अधिक प्रभावी यंत्रणा बनाने और विद्यमान विधिक और संस्थागत यंत्रणा मजबूत करने के लिए उपबंध करने के लिए लोकपाल अधिनियम की तर्ज पर एक व्यापक विधि अधिनियमित करने के लिए सरकार द्वारा प्रारूप विधेयक तैयार करने के लिए समिति गठित की गई थी । समिति ने, महाराष्ट्र लोकायुक्त विधेयक का प्रारूप तैयार किया है और उसकी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी गयी है । सरकार ने, समिति की रिपोर्ट और प्रारूप विधेयक पर विचार किया और एक विधि अधिनियमित करने का विनिश्चय किया है ।

४. प्रस्तावित विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ यथा निम्न है :----

(क) लोक सेवकों के विरूद्ध भ्रष्टाचार के अभिकथन और परिवेदना की शिकायतों लोकायुक्त को की जा सकेगी ;

(ख) लोक सेवकों के विभिन्न प्रवर्गो के लिए विभिन्न सक्षम प्राधिकारी मुहैय्या किए जाते है ;

(ग) लोकायुुक्त, मुख्यमंत्री, मंत्रीयों, राज्य मंत्रीयों, महाराष्ट्र राज्य विधानमंडल सदस्यों, अखिल भारतीय सेवाअों के अधिकारी,राज्य सरकार के कर्मचारी (समूह ' डी ' को छोडकर), राज्य सरकार द्वारा पूर्णत: या भागत: वित्तपोषित या सरकार द्वारा नियंत्रित स्थानिय प्राधिकरणों के सदस्य, बोर्ड के अधिकारियों और कर्मचारियों, निगमों प्राधिकारणों या संस्थाअों के अधिकारियों के विरूद्ध शिकायतों की जाँच कर सकेगा ;

(घ) लोकायुुक्त के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन के लिए चयन समिति, निम्न से मिलकर बनेगी,---

(एक) मुख्यमंत्री,

(दो) उप-मुख्यमंत्री,

(तीन) विधान परिषद के सभापति और विधान सभा के अध्यक्ष,

(चार) दोनों सदनों के विपक्ष नेता,

(पाँच) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधिश या उच्च न्यायलय के न्यायाधिश ;

(ड़) लोकायुक्त पाँच सदस्यों से मिलकर बनेगा, अध्यक्ष के रूप में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिश या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधिश या बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायाधिश, और चार अन्य सदस्य होंगे, जिसमें से दो न्यायिक सदस्य होंगे ;

३० ३० महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४

(च) शिकायतों का प्रतितोष करने और भ्रष्टाचार का उन्मूलन करने के संबंध में लोकायुक्त को अतिरिक्त कृत्य करने के लिए राज्यपाल की शक्ित प्रदान की गई है ;

(छ) लोकायुक्त के न्यायपीठ का गठन, संपूर्ण न्यायापीठ अध्यक्ष समेत तीन से अनिम्न सदस्यों से मिलकर बनेगा ;

(ज) लोक सेवक के विरूद्ध भ्रष्टाचार की शिकायत के मामले में लोकायुक्त द्वारा प्रथम प्रारम्भिक जाँच की जायेगी और बाद में राज्य अभिकरण द्वारा अन्वेषण किया जायेगा ;

(झ) प्रथम दृष्टया मामले में अन्वेषण रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात्, विशेष न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र दाखिल करने के निदेश देने की लोकायुक्त की शक्ित ;

(ञ) लोक सेवक के विरूद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों के मामले में, सक्षम प्राधिकारी को अभियोजन के लिए मंजूरी देने के लिए समय सीमा उपबंधित की जायेगी ;

(ट) कतिपय मामलों में, तलाशियाँ और अभिग्रहण की शक्ित ;

(ठ) अन्वेषण अभिकरण पर पर्यवेक्षण करने की लोकायुक्त की शक्ितयाँ ;

(ड) भ्रष्टाचार के मामले में, कतिपय परिस्थितियों में, भ्रष्टाचार के माध्यम से उद्भूत या उपाप्त आस्तियों, आगमों, प्रप्तियाँ और लाभों का अधिहरण करने की विशेष न्यायालय की शक्ित ;

(ढ) लोकायुक्त द्वारा पारित आदेश के पुर्नविलोकन की शक्ित ;

(ण) लोकायुक्त के विरूद्ध शिकायतों और उसका निलंबन और उसे हटाना ;

(न) गलत शिकायतों के लिए अभियोजन और क्षतिपर्ूति की अदायगी ;

(थ) महाराष्ट्र लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, १९७१ का निरसन ।

५. प्रस्तुत विधेयक का आशय उपयर्ुक्त उद्देश्यों को प्राप्त करना है ।

नागपूर, दिनांकित २२ दिसंबर, २०२२ ।

एकनाथ शिंदे, मुख्यमंत्री ।३१ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ ३१

प्रत्यायुक्त विधानसंबंधी ज्ञापन ।

प्रस्तुत विधेयक में विधायी शक्ति के प्रत्यायोजन के लिए निम्म प्रस्ताव अंतर्ग्रस्त है, अर्थात् :----

खण्ड १(३).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, जिस दिनांक पर अधिनियम प्रवृत्त होगा, वह दिनांक शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड २(छ)(नौं).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विभाग या प्राधिकरण विर्िनदिष्ट करने की शक्ति प्रदान की गई हैं ;

खण्ड ३(१).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, लोकायुक्त महाराष्ट्र राज्य के रूप में ज्ञात होनेवाला एक निकाय स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई है । खण्ड १०(३).----इस खण्ड के अधीन, लोकायुक्त को, लोकायुक्त के अधिकारी और कर्मचारीवृन्द के सेवा की शर्ते विहित करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड १४(२).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, शिकायत करने के लिए प्रारूप विहित करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड २७(२)(ग).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, यह प्रयोजनों को, जिसके लिए, उक्त खण्ड का उप-खण्ड (१) किसी जानकारी के प्रकटीकरण के लागू नही होगा, विहित करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड ३५(१)(छह).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, वह मामले, जिसके लिए लोकायुक्त को, जाँच आयोजित करने के लिए वाद के विचारण के समयपर सिविल न्यायालय की शक्तियाँ होंगी, विहित करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड (४७).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, अगले वित्तीय वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियाँ और व्यय दिखानेवाला लोकायुक्त का बजट तैयार करने के लिए प्रत्येक वित्तीय वर्ष में प्रारूप और समय विहित करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड ४९(१).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, वह प्रारूप जिसमें लोकायुक्त, उचित लेखों और अन्य सुसंगत अभिलेखों को बनाए रखेगा तथा राज्य के महा लेखाकार से विचार विमर्श में लेखाअों का वर्ाषिक विवरण तैयार करेगा, विहित करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड ५३.----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, वह समय, प्रारूप और रीति जिसमें लोकायुक्त की अधिकारिता के अधीन किसी मामले के संबंध में लोकायुक्त द्वारा विवरणीयाँ, कथन और विशिष्ठियाँ राज्य सरकार विरचित की जायेगी, विहित करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड ६१(१).----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड ६२.----इस खण्ड के अधीन, लोकायुक्त को, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है ।

खण्ड ६४.----इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, कोई कठिनाई जो अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में उद्भूत हो सके, का निराकरण करने के लिए राजपत्र में काई आदेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई है ।

२. विधायी शक्ति के प्रत्यायोजन के लिए उपरोल्लिखित प्रस्ताव सामान्य स्वरूप के है ।३२ ३२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४

वित्तीय ज्ञापन ।

प्रस्तुत विधेयक का खंड ३, महाराष्ट्र राज्य के लोकायुक्त निकाय की स्थापना के लिये उपबंध करता है । विधेयक का खंड ११, लोकायुक्त के अध्यक्ष, सदस्य या सचिव या अन्य अधिकारियों या कर्मचारीवृँद को या में देय सभी वेतन, भत्ता और पेंशन समेत लोकायुक्त के प्रशासनिक व्यय के लिये उपबंध करता है ।

यथा उल्लिखित उक्त व्यय के संबंधी करीबन छह करोड़ आवश्यक आवर्ती तथा अनावर्ती व्यय, इसके राज्य विधानमंडल के अधिनियम के रूप में अधिनियमित होने पर, राज्य की समेकित निधि में से, देय विनियोग के पश्चात् आवश्यक बनाये जायेंगे ।

(यथार्थ अनुवाद), विजया ल. डोनीकर, भाषा संचालक, महाराष्ट्र राज्य।३३ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, डिसेंबर २६, २०२२/पौष ५, शके १९४४ ३३

भारत संविधान के अनुच्छेद २०७ के अधीन राज्यपाल की अनुशंसा ।

(महाराष्ट्र शासन, विधी व न्याय विभाग, आदेश की प्रत)

भारत संविधान के अनुच्छेद २०७ के खंड (३) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हूए, महाराष्ट्र लोकायुक्त विधेयक, २०२२ ई. पर पुर:स्थापना करने की अनुशंसा करते है ।

विधान भवन, नागपूर, दिनांकित २६ दिसंबर, २०२२ ।

राजेन्द्र भागवत, प्रधान सचिव, महाराष्ट्र विधानसभा ।

भाग सात-३९-५. एचबी-१४६३-५.

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Cite this issue. Maharashtra Gazette, Government of Maharashtra, 26 December 2022. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.maharashtra.2022-12-26.Extra-Ordinary_NAGPUR-DIVISION_Part-7-Hindi-/. Archive identifier in.gazette.maharashtra.2022-12-26.Extra-Ordinary_NAGPUR-DIVISION_Part-7-Hindi-.