महाराष्ट्र शासन राजपत्र
असाधारण भाग सात
वर्ष ९, अंक ४ ] शुक्रवार, मार्च १०, २०२३/फाल्गुन १९, शके १९४४ [पृष्ठे ७, किंमत : रुपये ४७.००
असाधारण क्रमांक ७
प्राधिकृत प्रकाशन
अध्यादेश, विधेयके व अधिनियम यांचा हिंदी अनुवाद (देवनागरी लिपी).
महाराष्ट्र विधानमंडळ सचिवालय
महाराष्ट्र विधानसभा में दिनांक १० मार्च, २०२३ ई.को. पुर:स्थापित निम्न विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा नियम ११७ के अधीन प्रकाशन किया जाता है :----
L. A. BILL NO. VIII OF 2023.
A BILL TO PROVIDE FOR THE MAINTENANCE OF CERTAIN ESSENTIAL SERVICES AND THE NORMAL LIFE OF THE COMMUNITY; AND TO PROVIDE FOR THE MATTERS CONNECTED THEREWITH OR
INCIDENTAL THERETO.
विधानसभा का विधेयक क्रमांक ८ सन् २०२३।
कतिपय अत्यावश्यक सेवाअों और समुदाय के सामान्य जीवन को बनाए रखने; और
तत्संबंधी या उससे आनुषंगिक मामलों का उपबन्ध करने संबंधी विधेयक ।
क्योंकि कतिपय अत्यावश्यक सेवाअों और समुदाय के सामान्य जीवन को बनाए रखने ; और तत्संबंधी या उससे आनुषंगिक मामलों के लिए उपबंध करना इष्टकर है; इसलिए, भारत गणराज्य के अड़सठवें वर्ष में, एतद्द्वारा, निम्न अधिनियम अधिनियमित किया जाता है :---
१. (१) यह अधिनियम, महाराष्ट्र अत्यावश्यक सेवायें अधिनियम, २०२३ कहलाए। संक्षिप्त नाम, सन् १९०४ का १।
विस्तार, प्रारम्भण और कालावधि।
(१)
भाग सात-७—१२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १०, २०२३/फाल्गुन १९, शके १९४४ (२) इसका विस्तार संपूर्ण महाराष्ट्र राज्य में होगा।
(३) यह ऐसे दिनांक को प्रवृत्त होगा जिसे राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करें और इस अधिनियम के कार्यान्वयन की ऐसी समाप्ति के पूर्व संबंधित की गई या किये जाने से छोडी गई बातों के संबंध में को छोडकर, उक्त दिनांक से पाँच वर्षों के अवसान पर प्रभावी होने से परिविरत हो जायेंगी; और महाराष्ट्र साधारण खण्ड अधिनियम की धारा ७ इस अधिनियम के प्रवर्तन की ऐसी समाप्ति को इस प्रकार लागू होंगे मानों कि वह महाराष्ट्र अधिनियम द्वारा तब निरसित किया गया था।
परिभाषाएँ। २. इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,----
(क) '' अत्यावश्यक सेवा " का तात्पर्य,----
(एक) भूमि या जल मार्ग से सवारी या माल ढ़ोने के लिए किसी परिवहन सेवा से है, जिसके संबंध में राज्य विधानमंडल को विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है ;
(दो) गैस या दूध या पानी या विद्युत आपर्ूति से संबंधित किसी सेवा से है जिसके संबंध में राज्य विधानमंडल को विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है ;
(तीन) अस्पतालों और दवाखानों समेत लोकस्वास्थ्य और स्वच्छता बनाए रखने से संबंधित किसी सेवा से है ;
(चार) राज्य के कामकाज से संबंधित किसी लोक सेवा, पर तथा रोजगार और राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के सचिविय कर्मचारिवृन्द के लिए नियुक्त किये गये व्यक्तियों और उच्च न्यायालय के अधिकारियों और कर्मचारियों से भी है ;
(पाँच) स्थानिय प्राधिकरणों के कामकाज से संबंधित किसी सेवा या पद ;
(छह) किसी अन्य सेवा, पद, रोजगार या उसके वर्ग से है, जिससे संबंधित मामलों के संबंध में राज्य विधानमंडल को विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है और जब राज्य सरकार की यह राय होती है की ऐसी सेवा, पद, रोजगार या उसके वर्ग की हड़ताल, लोक सुरक्षा या समुदाय के जीवन के जीवन के लिए आवश्यक आपर्ूति या सेवाअों को बनाए रखने पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी या जिसके परिणामस्वरुप समुदाय को घोर कष्ट होगा और जिसे राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों हेतु, राजपत्र, में अधिसूचना द्वारा, अत्यावश्यक सेवा घोषित करती है ;
(ख) '' हड़ताल " का तात्पर्य, किसी अत्यावश्यक सेवाअों में नियोजित व्यक्तियों के किसी निकाय द्वारा काम बन्द करना या कितनी भी संख्या में व्यक्तियों की जो इस प्रकार नियोजित हैं या रहें हंै, सामान्य समझ से काम जारी रखने या रोजगार स्वीकार करने से सम्मिलित रूप से इंकार या इंकार करने से है, और इसमें,----
(एक) अतिकाल कार्य से इंकार करना, जहाँ ऐसा कार्य किसी अत्यावश्यक सेवा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है ;
(दो) ऐसा कोई अन्य आचरण जिसके परिणाम स्वरूप किसी अत्यावश्यक सेवा में काम बन्द करने या काम में पर्याप्त विलंब होने की संभावना है ;
(ग) धारा ५ और ६ में उपयर्ुक्त परन्तु उसमें परिभाषित नहीं किये गये शब्द और पर, परन्तु, सन् १९४७ का १४। जिन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम, १९४७ में परिभाषित किया गया है का, उस अधिनियम में उन्हें क्रमश:
समनुदेशित अर्थ होगा।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १०, २०२३/फाल्गुन १९, शके १९४४ ३ राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष अधिसूचना रखना। ३. (१) धारा २ के खण्ड (क) के उप-खण्ड (छह) के अधीन जारी प्रत्येक अधिसूचना, उसके बनाए जाने के तुरन्त बाद में, राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष, यदि उसका सत्र चल रहा है और यदि सत्र नहीं चला रहा हो तो सदन के अगले सत्र के प्रारम्भण के प्रथम दिन रखी जायेगी और इस प्रकार रखे जाने या यथास्थिति, राज्य विधानमंडल के पुन:समवेत होने के दिनांक से, चालीस दिनों की अवधि अवसित होने पर प्रवृत्त होने से परिविरत हो जायेगी, जब तक कि उस अवधि के अवसान के पूर्व, अधिसूचना जारी किये जाने को अनुमोदित करनेवाला प्रस्ताव, राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा पारित नहीं किया जाता है।
(२) जहाँ उप-धारा (१) द्वारा या के अधीन कोई अधिसूचना प्रवृत्त होने से परिविरत हुई है वहाँ वह, ऐसी समाप्ति से पूर्व की गई या करने से विलुप्त ऐसी किसी बात पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना समाप्त होगी।
स्पष्टीकरण.----जहाँ राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों को अलग-अलग दिनांकों पुन: समवेत होने के लिए समन किया गया है, चालीस दिनों की अवधि को उन दिनांकों के बाद से गिनवा की जायेगी।
४. (१) यदि राज्य सरकार का यह समाधान हो जाता है कि, लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या इष्टकर है तो वह, उप-धारा (५) के उपबन्धों के अध्यधीन, सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, ऐसे दिनांक से, जैसा वह आदेश में विर्िनदिष्ट करे ऐसी आवश्यक सेवा में हड़ताल प्रतिषिद्ध कर सकेगी।
कतिपय नियोजन में हड़ताल प्रतिषिद्ध करने की शक्ति। (२) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया कोई आदेश ऐसी रित्या प्रकाशित किया जायेगा जैसा कि राज्य सरकार आदेश द्वारा, उसके प्रभावित होनेवाले व्यक्तियों के ध्यान में लाने के लिए सर्वोतम अनुमानित करती है। (३) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया कोई आदेश उसमें विर्िनदिष्ट दिनांक से केवल छह महीने के लिए प्रवृत्त होगा, परन्तु राज्य सरकार का यदि समाधान हो जाता है कि ऐसा करना लोकहित में आवश्यक या इष्टकर है तो उसी रीत्या प्रकाशित उसी के सदृश्य आदेश द्वारा और उप-धारा (५) के उपबंधों के अध्यधीन उसे छह महीने से अनधिक अधिकतर अवधि के लिए बढ़ा सकेगी।
(४) उप-धारा (१) या उप-धारा (३) के अधीन कोई आदेश जारी करने पर,----
(क) ऐसी किसी अत्यावश्यक सेवा, जिससे आदेश संबंधित है, में नियोजित कोई व्यक्ति हड़ताल पर नहीं जायेगा या रहेगा ;
(ख) ऐसी सेवा में नियोजित व्यक्तियों द्वारा चाहे आदेश जारी होने के पूर्व या के पश्चात्, घोषित या शुरू की गई कोई भी हड़ताल अवैध होगी। ;
(५) उप-धारा (१) या उप-धारा (३) के अधीन कोई भी आदेश,----
(क) विधान परिषद के सभापति और विधानसभा के अध्यक्ष के अनुरोध को छोड़कर राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के सचिवालयीन कर्मचारिवृन्दों के लिए नियुक्त व्यक्तियो ;
(ख) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अनुरोध को छोड़कर उच्च न्यायालय के अधिकारियों और कर्मचारियों, के संबंध में नहीं बनाया जायेगा। ;
कतिपय स्थापनाअों में तालाबन्दी प्रतिषिद्ध करने की शक्ति। ५. (१) यदि राज्य सरकार का यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या इष्टकर है तो, वह सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, आदेश में, विर्िनदिष्ट किसी आवश्यक सेवा से सम्बन्धित किसी स्थापना में तालाबन्दी प्रतिषिद्ध कर सकेगी।
(२) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया आदेश, ऐसी रीत्या प्रकाशित किया जायेगा जैसा कि राज्य सरकार आदेश द्वारा, उससे प्रभावित होने वाले व्यक्तियों के ध्यान में के लिए सर्वोत्तम अनुमानित करती है।
(३) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया आदेश, केवल छह माह के लिए प्रवृत्त होगा, परन्तु राज्य सरकार का यदि समाधान हो जाता है कि, ऐसा करना लोकहित में आवश्यक है तो उसी के सदृश्य आदेश द्वारा उसे छह महीने से अनधिक अधिकार अवधि के लिए बढ़ा सकेगी।
भाग सात-७—१अ४ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १०, २०२३/फाल्गुन १९, शके १९४४ (४) उप-धारा (१) या उप-धारा (३) के अधीन आदेश जारी होने पर,----
(क) किसी स्थापना, जिसे आदेश लागू होता है, के सम्बन्ध में कोई नियोजक किसी तालाबन्दी की घोषणा या प्रारम्भ नहीं करेगा ;
(ख) किसी स्थापना के सम्बन्ध में जिसे आदेश लागू होता है, किसी नियोजक द्वारा आदेश जारी होने से पूर्व या के पश्चात् घोषित या शुरू की गई कोई भी तालाबन्दी अवैध होगी ;
(५) किसी स्थापना के सम्बन्ध में कोई नियोजक, जो इस धारा के अधीन अवैध तालाबन्दी शुरू करता है, जारी रखता है, या अन्यथा उसे अग्रसर करने के लिए कोई कार्य करता है, तो दोषासिद्धि पर, छह महीने तक के कारावास से या तीन हजार रुपये तक के जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
कतिपय स्थापनाअों में कामबन्दी प्रतिषिद्ध करने की शक्ति।
६. (१) यदि राज्य सरकार का समाधान हो जाता है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या इष्टकर है तो वह, सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, बिजली की कमी या प्राकृतिक विपत्ति से अन्य आधार पर, किसी कर्मकार के (बदली कर्मकार या नैमित्तिक कर्मकारों से अन्य) जिसका नाम, आदेश में विर्िनदिष्ट किसी अत्यावश्यक सेवा से सम्बन्धित किसी स्थापना के मस्टर रोल में है, की कामबन्दी प्रतिषद्ध कर सकेगी।
(२) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया कोई आदेश, ऐसी रीत्या प्रकाशित किया जायेगा जैसा कि राज्य सरकार आदेश द्वारा, उससे प्रभावित होने वाले व्यक्तियों के ध्यान में लाने के लिए सर्वोत्तम अनुमानित करती है। (३) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया कोई आदेश, केवल छह माह के लिए प्रवर्तमान होगा, परन्तु राज्य सरकार का यदि समाधान हो जाता है, कि ऐसा करना लोकहित में आवश्यक या इष्टकर है तो, उसी के सदृश्य आदेश द्वारा, उसी रीत्या उसे छह महिने से अनधिक अवधि के लिए बढ़ा सकेगी।
(४) उप-धारा (१) या उप-धारा (३) के अधीन कोई आदेश जारी होने पर,----
(क) किसी स्थापना, जिसे आदेश लागू होता है, के संम्बन्ध में, कोई नियोजक, किसी कर्मकार की (बदली कर्मकार या नैमित्तिक कर्मकार से अन्य) जिसका नाम ऐसी स्थापना के मस्टर रोल में है, तब तक कामबन्दी कर या कामबन्दी जारी रख नहीं सकेगा, जब तक कि ऐसी कामबन्दी बिजली की कमी या किसी प्राकृतिक विपत्ती के परिणामस्वरूप न की हो और बिजली की कमी या प्राकृतिक विपत्ति के कारण की गई कामबन्दी या, जारी रखी गई कामबन्दी को छोड़कर की गई कोई कामबन्दी या जारी रखी गई कामबन्दी अवैध होगी ;
(ख) कोई कर्मकार जिसकी कामबंन्दी खण्ड (क) के अधीन अवैध है तो वह, तत्समय प्रवर्तमान किसी भी विधि के अधीन सभी प्रसुविधाअों का हकदार होगा मानों की उसकी कामबन्दी नहीं की गई हो। (५) किसी स्थापना के सम्बन्ध में कोई नियोजक जो, किसी कर्मकार की कामबन्दी करता है या कामबन्दी जारी रखता है, यदि ऐसी कामबन्दी या कामबन्दी जारी रखना इस धारा के अधीन अवैध है तो, दोषासिद्धि पर, वह छह महीने तक के कारावास से या तीन हजार रुपयों तक के जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा। अवैध हड़ताल के लिए शास्ति।
७. कोई व्यक्ति जो, इस अधिनियम के अधीन अवैध हड़ताल शुरू करता है, या पर जाता है, या रहता है, अन्यथा ऐसी कोई हड़ताल में भाग लेता है, दोषसिद्धि पर, एक वर्ष तक कारावास से, या तीन हजार रुपये तक के जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
उकसाने के लिए शास्ति।
८. कोई व्यक्ति जो अन्य व्यक्तियों को ऐसी हड़ताल में भाग लेने, जो इस अधिनियम के अधीन अवैध है, के लिए उकसाता है या उद्दीप्त करता है, या अन्यथा उसे अग्रसर करने के लिए कोई कार्य करता है, दोषसिद्धि पर, एक वर्ष तक के कारावास से या तीन हजार रुपयों तक के जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
९. कोई व्यक्ति जो जानबूझकर, इस अधिनियम के अधीन अवैध हड़ताल को अग्रसर करने लिए या समर्थन के लिए कोई रकम खर्च करता है, या उसकी आपर्ूति करता है, दोषसिद्धि पर, एक वर्ष तक के कारावास से या तीन हजार रुपयों तक के जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
अवैध हड़ताल के लिए र्आथिक सहायता देने के लिए शास्ति।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १०, २०२३/फाल्गुन १९, शके १९४४ ५ १०. धारा ७, ८ या ९ के अधीन की गई कोई कार्यवाही, किसी अनुशासनात्मक स्वरुप की कार्यवाही या किन्ही परिणामों पर, जो उसके परिणामस्वरूप होंगे और जिससे कोई भी व्यक्ति अपनी, सेवा या नियोजन के निबन्धनों और शर्तों द्वारा दायी होगा, प्रभाव नहीं डालेगी, और उनके अतिरिक्त होगी।
अनुशासनात्मक कार्यवाही के अतिरिक्त धारा ७, ८ या ९ के अधीन कार्यवाही। ११. (१) दण्ड प्रक्रिया संहिता, १९७३ में अन्र्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी पुलिस अधिकारी, वारंट के बिना, ऐसे किसी भी व्यक्ति को, जिस पर इस अधिनियम के अधीन अपराध करने का उचित रूप से संदेह है, गिरफ्तार कर सकेगा।
वारंट के बिना गिरफ्तार करने की शक्ति और अपराध अजमानतीय होंगे।
अन्य विधियों पर अधिनियम का अध्यारोही होना। सन् १९४७ का बम्बई ११।
(२) इस अधिनियम के अधीन सभी अपराध अजमानतीय होंगे। १२. महाराष्ट्र औद्योगिक संबंध अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, १९४७ या तत्समय प्रवर्तमान किसी अन्य विधि में अन्र्तविष्ट किसी बात से असंगत होते हुए भी, इस अधिनियम के उपबन्ध या तद्धीन जारी कोई आदेश प्रभावी होगा।
सन् १९४७ का १४।
१३. (१) महाराष्ट्र अत्यावश्यक सेवायें अधिनियम, २०१७ (जिसे इसमें आगे " मूल अधिनियम " कहा गया है, एतद्द्वारा निरसित किया जाता है ।
सन् २०१८ का महा. १८ निरसन तथा व्यावृत्ति। सन् २०१८ का महा. १८।
(२) मूल अधिनियम के के निरसन का निम्न पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा---
(क) मूल अधिनियम के उपबंधों के अधीन की गई कोई बातया कोई कार्यवाही (जारी किसी अधिसूचना या आदेश समेत) या
(ख) मूल अधिनियम के अधीन र्अजित, प्रोद्भूत या उपगत कोई अधिकार, विशेषाधिकार या बाध्यतोमं या दायित्व, या
(ग) मूल अधिनियम के अधीन किसी अपराध के संबंध मेंे उपगत कोई शास्ति या दण्ड, या
(घ) यथा उपरोक्त किसी ऐसे अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, दायित्व, शास्ति या दण्ड के संबंध में कोई अन्वेषण, कानूनी कार्यवाही या उपचार और किसी ऐसे किसी अन्वेषण कानूनी कार्यवाही या या उपचार संहिता किने जाते, निरंतर रखने या प्रवृत्त करने और ऐसी कोई शास्ति या दण्ड यथा अधिरोपित करना यदि मूल अधिनियम निरसित किया गया है ।६ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १०, २०२३/फाल्गुन १९, शके १९४४
उद्देश्यों तथा कारणों का वक्तव्य।
महाराष्ट्र सरकार ने हमेशा से ही उसके कर्मचारी और स्थानिय प्राधिकरणों के कर्मचारी और अत्यावश्यक सेवाअों में के कर्मचारी की न्यायसंगत माँगे, समस्याअों और शिकायतों पर विचार करते समय यथार्थवादी और सहानुभूति का दृष्टिकोन अपनाया है और यथासंभव हमेशाही शांतिपूर्वक और तत्परतापूर्वक सुलझाने के प्रयास किये है। वहाँ पर तथापि, भूतकाल में कतिपय प्रसंगों में और भविष्यकाल में वहाँ पर के कुछ प्रसंगों में, जब ऐसे कर्मचारियों की सभी माँगे पूरी करना सरकार के लिए संभव नहीं होगा जो उनमें से कुछ समयों पर अनुचित और अकारणवश होगी। ऐसे समयों पर, सरकार को ऐसे कर्मचारियों की धमकी का सामना करना पडता है और ऐसे नियोजकों के कर्मचारी जो अत्यावश्यक सेवाअों के बनाये रखने के साथ जुड़े है, अनिश्चित हड़ताल पर चले जाते है जिससे समुदाय के जीवन के लिए आवश्यक आपर्ूति या सेवाअों को बनाये रखने पर प्रतिकूल प्रभाव होगा या जिसके परिणामस्वरूप समुदाय को घोर कष्ट होगा। २. महाराष्ट्र अत्यावश्यक सेवायें बनाये रखना अधिनियम, १९७० (सन् १९७१ का महा. ४) और संसद के अत्यावश्यक सेवायें बनाये रखना अधिनियम, १९८१ (सन् १९८१ का ४०) के अवसान के पश्चात्, वहाँ अत्यावश्यक सेवायें बनाये रखने के साथ जुड़े हुए ऐसे कर्मचारियों द्वारा किसी प्रकार के हड़ताल द्वारा सृजित किसी स्थिति का सामना करने के लिए जिसे बल देने हेतु राज्य सरकार को समर्थ बनाने के लिए कोई कानून नहीं है। इसलिए, किसी ऐसी स्थिति का सामना करने और इस बात को सुनिश्चिति करने की दृष्टि से कि हड़ताल पर जानेवाले अत्यावश्यक सेवाअों के बनाये रखने के उत्पादन या आपर्ूति के साथ जुड़े हुए कर्मचारियों या किन्हीं ऐसे नियोजकों द्वारा '' ताला बंदी " या यथास्थिति, '' कामबंदी " घोषित की जाकर जिससे समुदाय के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव होगा या घोर कष्ट होगा इसलिए, महाराष्ट्र अत्यावश्यक सेवायें बनाने रखना अधिनियम, १९९४ (सन् १९९४ का महा. ५३) तब कतिपय अत्यावश्यक सेवायें बनाये रखने और समुदाय के सामान्य जीवन की सुरक्षा के लिए उपबंध करने हेतु संसद द्वारा अधिनियमित, अत्यावश्यक सेवायें अधिनियम, १९८१ (सन् १९८१ का ४०) तर्ज पर अधिनियमित किया गया था। सन् १९९४ के उक्त अधिनियम के अवसान के पश्चात समय समय से महाराष्ट्र राज्य विधानमंडल द्वारा महाराष्ट्र अत्यावश्यक सेवायें अधिनियम अधिनियमित किया था। महाराष्ट्र अत्यावश्यक सेवायें अधिनियम, २०१७ (सन् २०१८ का महा. १८), अधिनियमित किया गया था जो पाँच वर्षों की अवधि के लिए उसके प्रारम्भण की दिनांक से अर्थात् १ मार्च २०१८ से पाँच वर्ष की अवधि के लिये प्रवृत्त था और २८ फरवरी २०२३ को अवसित हुआ था। इसलिए, २८ फरवरी २०२३ के बाद, वहाँ यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है तो उसका सामना करने के लिए सरकार के पास कोई सशक्त कानून नहीं है।
सरकार की राय यह है कि उन परिस्थितियों में उक्त उपबंधों को जारी रखकर उसे विद्यमान जारी रखना न्यायसंगत होगा। इसलिए, कतिपय अत्यावश्यक सेवायें बनाये रखने की सुनिश्चिति और समुदाय के सामान्य जीवन की सुनिश्चिति के लिए उक्त महाराष्ट्र अत्यावश्यक सेवायें अधिनियम, २०१७ के उपबंधों को पुन:अधिनियमित करना इष्टकर समझा गया है।
३. ऐसा कानून केवल उपाय के लिए सशक्त होगा। परिगणना की तुलना में कतिपय अत्यावश्यक सेवाअों में जो '' हड़ताल " या '' तालाबंदी " या '' कामबंदी " प्रतिषेध है और वह गैरकानूनी है, राज्य सरकार को राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, कोई अन्य सेवा, पद या नियोजन, आदि; घोषित करने की शक्ति भी प्रदान की गई है जिस संबंधी जिसमें राज्य विधानमंडल को विधियों बनाने की शक्ति होगी और राज्य सरकार की राय में यह कि ऐसी सेवा, पद या विनियोजन, आदि; का हड़ताल लोगों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा या आपर्ूतियों को बनाये रखना या समुदाय के जीवन को अत्यावश्यक सेवाएँ, ऐसे विधि के प्रयोजनों के लिए एक अत्यावश्यक सेवा हांेगी।
४. प्रस्तुत विधेयक का आशय उपयर्ुक्त उद्देश्यों को प्राप्त करना हैं।
मुंबई, दिनांकित ६ मार्च, २०२३।
एकनाथ शिंदे, मुख्यमंत्री।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १०, २०२३/फाल्गुन १९, शके १९४४ ७
प्रत्यायुक्त विधान संबंधी ज्ञापन।
प्रस्तुत विधेयक में, विधायी शक्ति के प्रत्यायोजनार्थ निम्नलिखित प्रस्ताव अन्तर्र्ग्रस्त हैं, अर्थात् :----
खण्ड १ (३).----यह खण्ड, जिस दिनांक को यह अधिनियम प्रवृत्त होगा वह दिनांक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करने हेतु राज्य सरकार को सशक्त करता है।
खण्ड २ (क) (छह).----यह खण्ड, राज्य सरकार को, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, कोई सेवा, पद, रोजगार या उसमें का प्रवर्ग घोषित करने के लिए सशक्त करता है जिस संबंधी जिसमें इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक अत्यावश्यक सेवा के रूप में राज्य विधानमंडल को विधियाँ बनाने की शक्ति होगी।
खण्ड ४.----यह खण्ड, राज्य सरकार को, आदेश द्वारा उसमें विर्िनदिष्ट किये गये दिनांक से किसी अत्यावश्यक सेवा के हड़ताल पर प्रतिषेध करने के लिए सशक्त करता है।
खण्ड ५.----यह खण्ड, राज्य सरकार को, आदेश द्वारा, उसमें विर्िनदिष्ट किसीे सेवा के लिए किसी स्थापना से संबंधित तालाबन्दी का प्रतिषेध करने के लिए सशक्त करता है।
खण्ड ६.----यह खण्ड, राज्य सरकार को, आदेश द्वारा, उसमें विर्िनदिष्ट किसीे अत्यावश्यक सेवा के लिए किसी स्थापना के कर्मकार से संबंधित कामबन्दी का प्रतिषेध करने के लिए सशक्त करता है।
२. विधायी शक्ति के प्रत्यायोजन के लिए उपर-ऊलिखित प्रस्ताव सामान्य स्वरूप के है।
(यथार्थ अनुवाद), विजया ल. डोनीकर, भाषा संचालक, महाराष्ट्र राज्य। विधान भवन : मुंबई, दिनांकित १० मार्च, २०२३।
राजेन्द्र भागवत, प्रधान सचिव, महाराष्ट्र विधानसभा।
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