महाराष्ट्र शासन राजपत्र
असाधारण भाग सात
वर्ष ११, अंक १] बुधवार, मार्च ५, २०२५/फाल्गुन १४, शके १९४६ [पृष्ठे ३, किंमत : रुपये ४७.००
असाधारण क्रमांक १
प्राधिकृत प्रकाशन
अध्यादेश, विधेयके व अधिनियम यांचा हिंदी अनुवाद (देवनागरी लिपी).
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महाराष्ट्र विधानमंडळ सचिवालय
महाराष्ट्र विधानसभा में दिनांक ५ मार्च, २०२५ ई.को. पुर:स्थापित निम्न विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा नियम ११७ के अधीन प्रकाशित किया जाता है :----
L. A. BILL No. I OF 2025.
A BILL FURTHER TO AMEND THE MAHARASHTRA LAND REVENUE
CODE, 1966.
विधानसभा का विधेयक क्रमांक १ सन् २०२५।
महाराष्ट्र भू-राजस्व संहिता, १९६६ में अधिकतर संशोधन करने संबंधी विधेयक।
सन् १९६६ का महा. ४१।
क्योंकि इसमें आगे र्दशित प्रयोजनों के लिए, महाराष्ट्र भू-राजस्व संहिता, १९६६ में अधिकतर संशोधन करना इष्टकर है ; अत: भारत गणराज्य के छिहत्तरवें वर्ष में, एतद्द्वारा, निम्न अधिनियम अधिनियमित किया जाता है :---
संक्षिप्त नाम। १. यह अधिनियम महाराष्ट्र भू-राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम, २०२५ कहलाए।
२. महाराष्ट्र भू-राजस्व संहिता, १९६६ की धारा २२० के, द्वितीय परंतुक के पश्चात् निम्न परंतुक और स्पष्टीकरण जोड़ा जायेगा, अर्थात् :------
सन् १९६६ का महा. ४१।
सन् १९६६ का महा. ४१ की धारा २२० में संशोधन। " परंतु यह भी कि, यदि सम्पत्ति राज्य सरकार की ओर से खरीद करने के दिनांक से बारह वर्षों की अवधि के भीतर चूककर्ता को यथा उपयर्ुक्त तत्पश्चात् बेची नहीं जाती है या वापस नहीं दी जाती है या सेवाधृति पर अनुदत्त नहीं की जाती है तो जिलाधिकारी, चूककर्ता या उसके कानूनी वारिस को सूचना
(१)
भाग सात--१-----१२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च ५, २०२५/फाल्गुन १४, शके १९४६ द्वारा, वह भूमि उसे वापस देने की उसकी रजामंदी अभिनिश्चित कर सकेगा, और यदि चूककर्ता या उसका कानूनी वारिस फिर से ऐसी भूमि वापस करने की उनकी रजामंदी देते है और इसनिमित्त जिलाधिकारी द्वारा जारी सूचना में विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसी अवधि के भीतर, जो नब्बे दिनों से अनधिक हो ऐसी भूमि के बाजार मूल्य के पच्चीस प्रतिशत की रकम का भूगतान करती है तो, राज्य सरकार की पूर्वानुमति के बिना अंतरण के अधिकार पर निबर्ंधनों के अध्यधीन चूककर्ता या उसके कानूनी वारिस को भूमि वापस दी जायेगी और अनुदत्त की जायेगी ।
स्पष्टीकरण.----इस धारा के प्रयोजनों के लिए " ऐसी भूमि का बाजार मूल्य " का तात्पर्य, महाराष्ट्र स्टाम्प (सम्पत्ति के सही बाजार मूल्य का निर्धारण) नियम, १९९५ के उपबंधों या सुसंगत वर्ष के लिए इस संबंध में तत्समय प्रवृत्त किन्ही अन्य नियमों के अधीन प्रकाशित वर्ाषिक दरों के विवरण में विर्िनदिष्ट ऐसी भूमि के मूल्य, से है ; और जहाँ ऐसा दरों का वर्ाषिक विवरण तैयार नहीं है या उपलब्ध नहीं है तो इसका तात्पर्य संबंधित जिले के नगर योजना विभाग के सहायक निदेशक द्वारा यथा निर्धारित ऐसी भूमि के मूल्य से है । "।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च ५, २०२५/फाल्गुन १४, शके १९४६ ३
उद्देश्यों और कारणों का वक्तव्य।
महाराष्ट्र भू-राजस्व संहिता, १९६६ (सन् १९६६ का महा. ४१) का अध्याय ग्यारह के उपबंधों के अधीन उस चूककर्ता किसानों की भूमि जो किसान भू-राजस्व के बकाया का भुगतान करने में असफल हुआ है, से बकाया या भू-राजस्व की वसुली के लिये सरकार के प्रबंधन के अधीन या सरकार की ओर से बिक्री की गई या खरीद की गई भूमि कुर्क की गई है। ऐसी भूमि ""आकारी पड़"" शिर्षक के अधीन जिला कलक्टर के प्रबंधन के अधीन आती है। २. उक्त संहिता की धारा २२० यह उपबंध करती है कि, जहाँ पर उक्त संहिता के अध्याय ग्यारह के उपबंधों के अधीन कोई विक्री की है, वहाँ पर बोली लगाने वाला कोई नहीं है या की जानेवाली बोली अपर्याप्त है या नाममात्र है, तो जिलाधिकारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि, ऐसी बोली उसी रूप में अधिनस्थ करने के लिए राज्य सरकार की ओर से ऐसी सम्पत्ति खरीद कर उसके किन्ही अधिनस्थों को प्राधिकृत करेगी।
उक्त धारा २२० का प्रथम परंतुक यह उपबंध करता है कि, यदि इसप्रकार विक्रय की गई सम्पत्ति विक्रय के बारह वर्षों के भीतर राज्य सरकार द्वारा पश्चातवर्ती बिक्री की गई है तब सरकार के देयों और शास्ति की कटौती करने के पश्चात्, अधिशेष रकम चूककर्ता को अदा की जायेगी। उक्त धारा २२० का द्वितीय परंतुक यह उपबंध करता है कि, यदि सम्पत्ति की पश्चातवर्ती बिक्री नहीं की गई है तो उसे, राज्य सरकार की ओर से विक्रय किए गए दिनांक से बारह वर्षों की अवधि के भीतर किसी भी समय पर, सरकार को देयों और शास्ति की अदायगी करने के पश्चात् चूककर्ता को वापस की जा सकेगी।
तथापि, ऐसी कई भूमियाँ है जो भू-राजस्व के बकाए की अत्यल्प रक़म की अदायगी में चूक के कारण जिला कलक्टर के प्रबंधन के अधीन है, या तो उक्त धारा २२० के अधीन सरकार की ओर से ऐसी भूमि के खरीद करने से तीस से चालीस वर्ष बीत जाने के पश्चात् भी जिला कलक्टर के प्रबंधन के अधीन है। दिन प्रतिदिन ऐसी भूमि का प्रबंधन करना यह सरकार के लिए संभव नहीं है, अतिक्रमणों से ऐसी भूमियों को संरक्षित रखना एक बहुत ही कठिन कार्य हो गया है। भूमिधारकों और उनके कानूनी वारिसों ने भी समय-समय पर, ऐसी भूमि को उन्हे वापस देने की माँग की है।
तथापि, उक्त धारा २२० के द्वितीय परंतूक के उपबंधों को देखते हुए ऐसी भूमियाँ, राज्य सरकार की ओर से उसकी खरीद की जाने के दिनांक से बारह वर्षों की अवधि के बीत जाने के पश्चात्, चूककर्ता भूमि स्वामियों को वापस नहीं की जायेगी या फिर से अनुदत्त नहीं की जा सकेगी।
यदि ऐसी भूमियाँ सरकार को देयों की अदायगी पर चूककर्ता भूमि धारकों को वापस दी जाती है तो उनके निर्वाह या आजीविका की समस्या हल हो जायेगी, ऐसी भूमियाँ शेष बंजर भूमि नहीं होगी और राष्ट्रीय प्रवाह में भी आयेगी तथा सरकार को बढ़ा हुआ राजस्व भी प्राप्त हो सकेगा।
इसलिए, सरकार ने उक्त संहिता की धारा २२० में यथोचित संशोधन करना इष्टकर समझा है कि, सरकार को चूककर्ता भूमि धारकों को या उनके कानूनी वारिसों को उस वर्ष जिसमें चूककर्ता या उसके कानूनी वारिसों को भूमि वापस दी गई है या अनुदत्त की गई है के लिए ऐसी भूमि के बाजार मूल्य के पच्चीस प्रतिशत की कोई रकम सरकार को देय बकाया देयों की अदायगी पर ऐसे आकारि पड वापस या अनुदत्त करने के लिए सरकार को समर्थ बनाना है। ३. प्रस्तुत विधेयक का आशय उपयर्ुक्त उद्देश्यों को प्राप्त करना है।
मुंबई, दिनांकित २५ फरवरी, २०२५।
राजस्व मंत्री।
(यथार्थ अनुवाद), श्रीमती विजया ल. डोनीकर, भाषा संचालक, महाराष्ट्र राज्य।
विधान भवन : मुंबई, दिनांकित ५ मार्च, २०२५।
जितेंद्र भोळे, सचिव (१) (कार्यभार), महाराष्ट्र विधानसभा।
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