महाराष्ट्र शासन राजपत्र
असाधारण भाग सात
वर्ष ११, अंक ३] सोमवार, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ [पृष्ठे १६, किंमत : रुपये ४७.००
असाधारण क्रमांक ३
प्राधिकृत प्रकाशन
अध्यादेश, विधेयके व अधिनियम यांचा हिंदी अनुवाद (देवनागरी लिपी).
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महाराष्ट्र विधानमंडळ सचिवालय
महाराष्ट्र विधानसभा मेंे दिनांक १७ मार्च, २०२५ ई. को. पुर:स्थापित निम्न विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा नियम ११७ के अधीन प्रकाशन किया जाता है :----
L. A. BILL No. XXI OF 2025.
A BILL
TO PROVIDE FOR SETTLEMENT OF ARREARS OF TAX,
INTEREST, PENALTY OR LATE FEE TO PUBLIC SECTOR
UNDERTAKEN COMPANIES WHICH WERE
LEVIED, PAYABLE OR IMPOSED, RESPECTIVELY,
UNDER VARIOUS ACTS ADMINISTERED BY GOODS
AND SERVICES TAX DEPARTMENT AND FOR
THE MATTERS CONNECTED THEREWITH
OR INCIDENTAL THERETO.
विधानसभा का विधेयक क्रमांक २१ सन् २०२५।
माल और सेवा कर विभाग द्वारा कार्यान्वित किए गए विभिन्न अधिनियमों के अधीन
सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमित कम्पनियों को कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस के बकायों का
निपटान करने के लिए क्रमश: वह उद्ग्रहीत, देय या अधिरोपित थे, का उपबंध करने तथा
तत्संबंधी
या उससे आनुषंगिक मामलों का उपबंध करने संबंधी विधेयक।
क्योंकि केंद्रीय विक्रय कर अधिनियम, १९५६, मुंबई विक्रय कर अधिनियम, १९५९, महाराष्ट्र मूल्यर्वधित कर अधिनियम, २००२, मुंबई मोटर स्पिरीट विक्रय कराधान अधिनियम, १९५८, महाराष्ट्र गन्नों पर विक्रय कर अधिनियम, १९६२, महाराष्ट्र राज्य वृत्ति, व्यापार, आजीविका और नियोजन पर कर अधिनियम, १९७५, महाराष्ट्र सन् १९५६ का ७४। सन् १९५८ का मुंबई ६६। सन् १९५९ का मुंबई ५१।
(१)
भाग सात----३--१२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ किसी प्रयोजन के लिए किसी वस्तू के उपयोग करने के अधिकार के अंतरण पर विक्रय कर अधिनियम, १९८५, महाराष्ट्र सुख-साधन पर कर अधिनियम, १९८७, महाराष्ट्र स्थानीय क्षेत्रों में मोटार वाहनों के प्रवेश पर कर अधिनियम, १९८७, महाराष्ट्र संकर्म संविदा के निष्पादन में अन्तर्ग्रस्त वस्तुअों मेंे संपत्ति के अंतरण पर विक्रय कर (पुन: अधिनियमिति) अधिनियम, १९८९ महाराष्ट्र स्थानीय क्षेत्रो में वस्तुअों के प्रवेश पर कर अधिनियम, २००२, और महाराष्ट्र मूल्यर्वधित कर अधिनियम, २००२ के अधीन कर, ब्याज, शास्ति या, विलंबित फ़ीस के बकायों का निपटान करने और तत्संबंधी या उससे आनुषंगिक मामलों का उपबंध करना इष्टकर है ; अत: भारत गणराज्य के छिहत्तरवें वर्ष में, एतद्द्वारा, निम्न अधिनियम अधिनियमित किया जाता है :---
सन् १९६२ का महा. ९। सन् १९७५ का महा. १६। सन् १९८५ का महा. १८। सन् १९८७ का महा. ४१। सन् १९८७ का महा. ४२। सन् १९८९ का महा. ३६। सन् २००३ का महा. ४। सन् २००५ का महा. ९। संक्षिप्त नाम । १. (१) यह अधिनियम महाराष्ट्र कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस के बकायों का निपटान (सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमित कम्पनियों द्वारा देय) अधिनियम, २०२५ कहलाए।
परिभाषाएँ। २. (१) इस अधिनियम में, जब तक की संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हों,-----
(क) '' उपाबंध '' का तात्पर्य, इस अधिनियम से संलग्न उपाबंध से है ;
(ख) '' अपीलीय प्राधिकारी '' का तात्पर्य, इस अधिनियम की धारा १४ की उप-धारा (१) में विर्िनदिष्ट प्राधिकारियों से है ;
(ग) '' आवेदक '' का तात्पर्य, एक व्यक्ित जो सुसंगत अधिनियम के अधीन उद्ग्रहीत या उद्ग्रहणीय कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस का बकाया अदा करने का दायी है या जो इस अधिनियम के अधीन, शर्तों के अनुपालन द्वारा निपटान का लाभ उठाना चाहता है, से है ;
स्पष्टीकरण.--''सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमित कम्पनियों '' का तात्पर्य कंपनी अधिनियम, २०१३ के सन् २०१३ का १८। अधीन सरकारी कम्पनियों के रूप मे रजिस्ट्रीकृत किसी कम्पनि से है ;
(घ) '' बकाया '' का तात्पर्य कर, ब्याज, शास्ति या, यथास्थिति, विलंबित फ़ीस की बकाया रक़म या, यथास्थिति,----
(एक) सुसंगत अधिनियम के अधीन किसी कानूनी आदेश के अनुसार किसी निर्धारिती द्वारा देय ; या
(दो) सुसंगत अधिनियम के अधीन दाखिल विवरणी या, यथास्थिति, पुनरीक्षित विवरणी में मान्य की गई और जिसका संपूर्ण या भाग के रूप में भुगतान नहीं किया गया है ; या
(तीन) मूल्यर्वधित कर अधिनियम की धारा ६१के अनुसार प्रस्तुत की गयी संपरीक्षा रिपोर्ट में, संपरीक्षक द्वारा निर्धारित की गई और भुगतान किए जाने के लिए सिफारिश की गई चाहे मूल्यर्वधित कर अधिनियम की धारा ३२ या ३२क के अधीन सूचना जारी की गई है या नहीं ;
और विर्िनदिष्ट अवधि से संबंधित कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस का ऐसा बकाया, और विर्िनदिष्ट अवधि के लिये सुसंगत अधिनियम के अधीन स्वीकार्य कर पर देय ब्याज भी सम्मिलित है से है ;
महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ ३(ङ) '' आयुक्त्त '' का तात्पर्य, माल और सेवा कर अधिनियम की धारा ३ के खण्ड (क) के अधीन राज्य कर आयुक्त के रूप में नियुक्त किए गए किसी अधिकारी से है और इसमें मूल्यर्वधित कर अधिनियम की धारा १० की, उप-धारा (१) के अधीन नियुक्त विक्रय कर आयुक्त सम्मिलित है, से है ;
(च) '' पदाभिहित प्राधिकारी '' का तात्पर्य, इस अधिनियम की धारा ३ के अधीन नियुक्त किसी प्राधिकारी से है ;
(छ) '' विवादित कर '' का तात्पर्य, खण्ड (थ) में यथा परिभाषित अविवादित कर से अन्यथा कर, से है ;
(ज) '' माल और सेवा कर अधिनियम '' का तात्पर्य, महाराष्ट्र वस्तु और सेवा कर अधिनियम, २०१७ से है ;
सन् २०१७ का महा. ४३।
(झ) '' सरकार '' या '' राज्य सरकार '' का तात्पर्य, महाराष्ट्र सरकार, से है ;
(ञ) '' निपटान का आदेश '' का तात्पर्य, कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस के बकायों के निपटान के लिए, इस अधिनियम के अधीन जारी किसी आदेश, से है ;
(ट) '' सुसंगत अधिनियम '' का तात्पर्य, निम्न अधिनियमों से है, अर्थात् :----
(एक) केंद्रीय विक्रय कर अधिनियम, १९५६ ;
सन् १९५६ का ७४।
(दो) बम्बई मोटर स्पिरिट विक्रय कर पर कराधान अधिनियम, १९५८ ;
(तीन) मुंबई विक्रय कर अधिनियम, १९५९ ;
(चार) महाराष्ट्र गन्ने पर विक्रय कर अधिनियम, १९६२ ;
सन् १९५८ का मुंबई ६६। सन् १९५९ का मुंबई ५१। सन् १९६२ का महा. ९।
(पाँच) महाराष्ट्र राज्य वृत्ति, व्यापार, आजीविका और नियोजन पर कर अधिनियम, १९७५ ;
सन् १९७५ का महा. १६।
(छह) महाराष्ट्र किसी प्रयोजन के लिए किसी वस्तु के उपयोग करने के अधिकार के अंतरण पर विक्रय कर अधिनियम, १९८५ ;
सन् १९८५ का महा. १८।
(सात) महाराष्ट्र सुख-साधन पर कर अधिनियम, १९८७ ;
सन् १९८७ का महा. ४१।
(आठ) महाराष्ट्र स्थानीय क्षेत्रों में मोटर वाहनों के प्रवेश पर कर अधिनियम, १९८७ ;
(नौ) महाराष्ट्र संकर्म संविदा के निष्पादन में अन्तर्ग्रस्त वस्तुअों में सम्पत्ति के अंतरण पर विक्रय कर (पुन: अधिनियमिति) अधिनियम, १९८९ ; और
सन् १९८७ का महा. ४२। सन् १९८९ का महा. ३६।
(दस) महाराष्ट्र स्थानीय क्षेत्रों में वस्तुअों के प्रवेश पर कर अधिनियम, २००२ ; और
सन् २००३ का महा. ४।
(ग्यारह) महाराष्ट्र मूल्यर्वधित कर अधिनियम, २००२ ;
सन् २००५ का महा. ९।
और तद्धीन बनाए गए नियमों या जारी की गई अधिसूचनायें भी सम्मिलित है ;
भाग सात----३--१अ४ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ (ठ) '' आवश्यक रक़म '' का तात्पर्य, इस अधिनियम के अधीन आवेदक द्वारा भुगतान की जानेवाली कोई आवश्यक रक़म से है और इस अधिनियम की धारा १० में दी गई तालिका में विर्िनदिष्ट अवधि के दौरान-----
(एक) अविवादित कर की रक़म, और
(दो) विवादित कर, ब्याज, शास्ति और विलंबित फ़ीस, की रक़म चाहे वह उद्ग्रहीत हो या न हो ;
इस अधिनियम की धारा ८ और ९ के अधीन यथा निर्धारित और इस अधिनियम के संलग्न उपाबंध-क या उपाबंध-ख में यथा विर्िनदिष्ट से है ;
(ड) '' विवरणी के अनुसार देयों '' का तात्पर्य, विर्िनदिष्ट अवधि के संबंध में सुसंगत अधिनियम के अधीन दाखिल विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी में प्रवेशित, परंतु इस अधिनियम की धारा १० में दी गई तालिका में यथा विर्िनदिष्ट आवश्यक रक़म के भूगतान के लिए अंतिम दिनांक पर या के पूर्व किसी समय पर या तो पूर्णत: या भागत: शेष अभुक्त कर, ब्याज या विलंबित फ़ीस की रक़म, से है ;
(ढ) '' विर्िनदिष्ट अवधि '' का तात्पर्य, ३० जून २०१७ को या के पूर्व समाप्त होनेवाली कोई अवधि ;
(ण) '' सांविधानिक आदेश '' का तात्पर्य, आवेदक द्वारा अदा किया जानेवाला कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस की माँग बढ़ाने के सुसंगत अधिनियम के अधीन पारित किसी आदेश से है ;
(त) '' प्रवेश पर कर अधिनियम '' का तात्पर्य, महाराष्ट्र स्थानीय क्षेत्रों में मालों के प्रवेश पर कर अधिनियम, २००२ से है ;
सन् २००५ का महा. ४। (थ) '' अविवादित कर '' का तात्पर्य,----
(एक) सुसंगत अधिनियम के अधीन अलग रूप से संग्रहीत किये गये करों ; या
(दो) सुसंगत अधिनियम के अधीन विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी में दर्शाया गया देय कर ; या (तीन) मूल्यर्वधित कर नियम के नियम ५७ या अन्य सुसंगत अधिनियम के अधीन बनाए गए उसी प्रकार के नियमों के अनुसार कटौती के रूप में ब्यौहारी द्वारा दावा की गई कोई रक़म ; या (चार) सुसंगत अधिनियम के अधीन सांविधानिक आदेश के अधीन समपत की गई या प्रस्तुत की गई विवरणी, पुनरीक्षित विवरणी या, यथास्थिति, लेखा-परीक्षा रिपोर्ट में दर्शाये गये अधिक कर संग्रहण की रक़म ; या
(पाँच) मूल्यर्वधित कर अधिनियम की धारा ६१ के अनुसार प्रस्तुत की गई लेखा-परीक्षा रिपोर्ट में, लेखा परीक्षक द्वारा निर्धारित और अदा किए जाने के लिए सिफारिश की गई और निर्धारिती द्वारा या तो संपूर्णत: या भागत: स्वीकृत की गई कर की कोई रक़म ; या
(छह) मूल्यर्वधित कर अधिनियम के अधीन नियोक्ता द्वारा स्रोत पर कटौती किया कर (टीडीएस) ; या
(सात) मूल्यर्वधित कर अधिनियम की धारा ३१क के अधीन किया गया कर संग्रहण ;
(आठ) महाराष्ट्र राज्य वृत्ति, व्यापार, आजीविका और नियोजन पर कर अधिनियम, १९७५ के अधीन नामांकन प्रमाणपत्र धारक द्वारा देय कर ; या
सन् १९७५ का महा. १६। (नौ) महाराष्ट्र राज्य वृत्ति, व्यापार, आजीविका तथा नियोजन पर कर अधिनियम, १९७५ के अधीन नियोक्ता द्वारा कटौति किया गया कर ; या
सन् १९७५ का महा. १६।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ ५ (दस) मूल्यर्वधित कर नियमों के नियम ५२क या ५२ख के अधीन बढ़ाने से अस्वीकृत की गई रक़म जो पश्चातवर्ती अवधि में के दावा किए जाने के लिए पात्र है ; और
सुसंगत अधिनियम के अधीन किसी कानूनी आदेश द्वारा, गलती से या अधिक में अनुदत्त किसी प्रदाय और उसपर अनुदत्त ब्याज सम्मिलत होगा।
(द) '' मूल्यर्वधित कर अधिनियम '' का तात्पर्य, महाराष्ट्र मूल्यर्वधित कर अधिनियम, २००२ से है ;
सन् २००५ का महा. ९।
(ध) '' मूल्यर्वधित कर नियम '' का तात्पर्य, मूल्यर्वधित कर अधिनियम के अधीन बनाया गया महाराष्ट्र मूल्यर्वधित कर नियम, २००५ से है ।
(२) इस अधिनियम में उपयोग किए गए परंतु इसमें परिभाषित न किए गए शब्दों और अभिव्यक्ितयों का वही अर्थ होगा जो सुसंगत अधिनियम के अधीन यथा क्रमश: समनुदेशित से है।
३. (१) राज्य कर आयुक्त, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आयुक्त होगा।
पदाभिहित प्राधिकारी। (२) मूल्यर्वधित कर अधिनियम की धारा १० की, उप-धारा (२) में या, यथास्थिति, वस्तु और सेवा कर अधिनियम की धारा ३ के अधीन विर्िनदिष्ट अधिकारी इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए पदाभिहित प्राधिकारी होगा। उक्त पदाभिहित प्राधिकरियों के अधिनस्थ होना मूल्यर्वधित कर नियमों के नियम ५ के अनुसार होगा। (३) आयुक्त, राजपत्र में प्रकाशित, अधिसूचना द्वारा, उप-धारा (२) में यथा विर्िनदिष्ट, अपनी शक्ितयाँ पदाभिहित प्राधिकारी और ऐसे पदाभिहित प्राधिकरियों को प्रत्यायोजित कर सकेगा और ऐसा प्राधिकारी, समय- समय से, मूल्यर्वधित कर अधिनियम की धारा १० के अधीन या, यथास्थिति, वस्तु और सेवा कर अधिनियम की धारा ४ की उप-धारा (२) और धारा ५ के अधीन यथा अधिसूचित उनके अधिकारिता के ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों के भीतर की शक्ितयों का प्रयोग करेगा।
निपटान के लिए पात्रता। ४. (१) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन, कोई आवेदक, चाहे वह सुसंगत अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत है या नहीं है, विर्िनदिष्ट अवधि के संबंध में कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस के बकायों के निपटान के लिए चाहे ऐसा बकाया सुसंगत अधिनियम के अधीन अपील में विवादग्रस्त है या नहीं है, निपटान के लिए आवेदन करने के लिए पात्र होगा।
(२) आवेदक, जिसने किसी सरकारी संकल्प के अधीन, सरकार द्वारा यथा घोषित किसी सर्वमाफी योजना या महाराष्ट्र विवादों मे बकायों का निपटान अधिनियम, २०१६ या महाराष्ट्र कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस का निपटान अधिनियम, २०१९ या महाराष्ट्र कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस के बकायों का निपटान अधिनियम, २०२२ या महाराष्ट्र कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस अधिनियम, २०२३ (जिसे इसमें आगे, "निपटान कर अधिनियम, २०२३" कहा गया है) के अधीन लाभ प्राप्त किया है तो वह इस अधिनियम के अधीन आवेदन करने के लिए भी पात्र होगा।
सन् २०१६ का महा. १६। सन् २०१९ का महा. ११। सन् २०२२ का महा. २९। सन् २०२३ का महा. १८।
(३) इस अधिनियम के अधीन निपटान करने के लिए, इस अधिनियम की धारा ११ और अन्य उपबंधों में विवरणित शर्तों का अनुपालन किया जायेगा।६ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ राज्य द्वारा मुकदमे के मामले भी निपटान के लिए पात्र होंगे।
५. जहाँ माल और सेवा कर विभाग ने महाराष्ट्र विक्रय कर अधिकरण या न्यायालयों के समक्ष सन्दर्भ या कोई अपील दाखिल की है तो वह उक्त विभाग द्वारा कर, ब्याज, शास्ति, या विलंबित फ़ीस समेत विवादित माँग आवेदक द्वारा बकायों के निपटान के लिए विचारार्थ ले जा सकेगी और निपटान के लिए आवेदन तद्नुसार, दाखिल किया जा सकेगा। उक्त विभाग द्वारा विवादित रक़म का एक बार इस अधिनियम के अधीन भुगतान किया है के मामले में, इस अधिनियम के अधीन पहले से ही अनुदत्त अधित्यजन का इस प्रकार भुगतान की गई या वहाँ वसूल की गई रक़म का प्रतिदाय या समायोजन नहीं किया जायेगा।
६. (१) सुसंगत अधिनियम में या इस अधिनियम के अधीन अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी,----
(क) इस अधिनियम के प्रारम्भण पर या के पूर्व सांविधिक आदेश के संबंध में या तो अपील में या अन्यथा किया गया कोई भुगतान प्रथम कर की रक़म के ज़रिए समायोजित किया जाएगा और उसके पश्चात्, ब्याज के ज़रिए समायोजित किया जायेगा और शेष असमायोजित शेष रक़म क्रमश: शास्ति और विलंबित फ़ीस के ज़रिए समायोजित की जायेगी ;
निपटान के लिए पात्र कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस यदि कोई हो, के बकायों का समायोजन या निर्धारण।
(ख) किसी सांविधिक आदेश या अपील आदेश या न्यायालय आदेश में आवेदक को देय प्रतिदाय की कोई रक़म जो आवश्यक रक़म की अदायगी करने के दिनांक पर शेष असमायोजित रह गई है, वह कर, ब्याज, शास्ति और विलंबित फ़ीस के बकायों के ज़रिए समायोजित की गई समझी जायेंगी,-----
(एक) ऐसा प्रतिदाय इस अधिनियम के अधीन अंर्तनिहित अवधि के कालानुक्रमिक अनुक्रम में उसी अधिनियम के अधीन अन्य अवधियों के लिए किन्ही असाधारण बकायों के ज़रिए समायोजित की जायेगी और सभी बकायों की संतुुष्टि के पश्चात् इस अधिनियम की धारा २ (१) (ट) में यथा विर्िनदिष्ट क्रमानुसार शेष अधिनियम के बकायों के ज़रिए समायोजित की जायेगी ;
(दो) उप-खण्ड १ के उपबंधों के अध्यधीन ऐस प्रतिदाय प्रथम अविवादित कर और बाद में विवादित कर की रक़म के ज़रिए समायोजित किया जायेगा और तत्पश्चात् ब्याज के ज़रिए समायोजित किया जायेगा और शेष असमायोजित शेष रक़म बाद में क्रमानुसार शास्ति और विलंबित फ़ीस के ज़रिए समायोजित किया जायेगा।
(२) ऐसे समायोजन को प्रभावी बनानेवाला निपटान आदेश से संलग्न आवश्यक समायोजन आदेश पदाभिहित प्राधिकारी द्वारा जारी किया जा सकेगा।
(३) इस अधिनियम के प्रारम्भण के या विर्िनदिष्ट अवधि तो पूर्व या धारा १० में दी गई तालिका में विर्िनदिष्ट अवधि के दौरान के पारित सांविधिक आदेश के अनुसार कोई माँग उप-धारा (१) में विर्िनदिष्ट रक़म घटाकर और बाद में किसी समय के पूर्व या आवश्यक रक़म की अदायगी के समय पर इस अधिनियम के अधीन निपटान के प्रयोजनों के लिए कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस के बकायों के रूप में विचारार्थ ली जायेगी।
(४) अदा की गयी रक़म या देय कोर प्रतिदाय और बकायों के निर्धारण के समायोजन के संबंध में पूर्ववर्ती खण्डों के उपबंध विवरणी के अनुसार देयों या, यथास्थिति, लेखा संपरीक्षक द्वारा संपरीक्षा रिपोर्ट में कर, ब्याज या विलंबित फ़ीस के संबंध में, की गई सिफारिशों के अनुसार यथावश्यक परिवर्तन समेत लागू होंगे।
कतिपय रक़मों के संबंध में बट्टे-खाते में डालना।
७. सुसंगत अधिनियम, में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी निर्धारणोत्तर ब्याज या, यथास्थिति, निर्धारणोत्तर शास्ति, यदि लागू हो, निर्धारणोत्तर ब्याज या शास्ति जो उद्ग्रहणी है परंतु आवेदक के मामले में उद्ग्रहीत नहीं है, जहाँ किसी सांविधिक आदेश के अनुसार देय कर का किसी समय पर या इस अधिनियम के प्रारम्भण के दिनांक पर या के पूर्व भुगतान हो गया है के मामले में अधित्यजन होगा ।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ ७ ८. (१) धारा ६ के अधीन यथा अवधारित बकायों के निपटान के ज़रिए देय आवश्यक रक़म यथा निम्न होगी,--- जहाँ कर का शेष बकाया ब्याज या शास्ति था, निर्धारणोत्तर ब्याज या शास्ति या विलंबित फ़ीस के संबंध में उपाबंध-क या, यथास्थिति, उपाबंध-ख में यथा विर्िनदिष्ट अधित्यजन लागू होगा ।
आवश्यक रक़म का अवधारण और अधित्यजन बढ़ाना। (२) इस धारा के अधीन यथा अवधारित आवश्यक रक़म की अदायगी सुसंगत अधिनियम के अधीन विहित चालान के प्ररूप में या, यथास्थिति, मूल्यर्वधित कर नियमों के अधीन विहित एमटीआर-६ प्ररूप में की जायेगी और इस अधिनियम की धारा १० की, उप-धारा (२) में दी गई तालिका के खण्ड (ख) में विर्िनदिष्ट अंतिम दिनांक पर या के पूर्व आवेदक द्वारा चूने गए विकल्प को यथा प्रयुक्त बनाई जायेगी।
(३) (क) इस अधिनियम के प्रारम्भण पर या के पूर्व पर या के पूर्व किसी लेखा पर की गई अदायगी आवश्यक रक़म के ज़रिए एक अदायगी के रूप में विचारार्थ नहीं ली जायेगी।
(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भण के दिनांक पर या के पूर्व या इस अधिनियम की धारा १० में दी गई तालिका में आवश्यक रक़म की अदायगी के लिए विर्िनदिष्ट अवधि के दौरान किसी बकायों को समायोजित प्रतिदाय की कोई रक़म समायोजित की गई समझी गई कोई बकाया रक़म आवश्यक रक़म के ज़रिए भूगतान के रूप में विचारार्थ नहीं ली जायेगी।
(४) किन्ही परिस्थितियों के अधीन, आवेदक, अविवादित कर के संबंध में किसी अधित्यजन का हकदार नहीं होगा।
(५) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन आवेदक उपाबंध-क या, यथास्थिति, उपाबंध-ख में यथाविहित विवादित कर, ब्याज, शास्ति, या विलंबित फ़ीस बढ़ाने के अधित्यजन का हकदार होगा।
(६) जहाँ आवेदक ने अदायगी की है जो इस धारा के अधीन यथा अवधारित आवश्यक रक़म से कम है तब पदाभिहित प्राधिकारी, आवेदक द्वारा अदा कि गई आवश्यक रक़म से आनुपातिकता में, आवेदन द्वारा चूने गए विकल्प के अधीन ग्रा अधित्यजन की आनुपातिक रक़म परिगणित करेगा :
परंतु यह कि, इस प्रकार अदा की गई रक़म प्रथम अविवादित कर के ज़रिए समायोजित की जायेगी और ऐसे समायोजन के पश्चात् शेष रक़म, यदि कोई है तो, विवादित कर, ब्याज, शास्ति और विलंबित फ़ीस के ज़रिए अनुपात में समायोजित की जायेगी ।
(७) कोई आवेदन, केवल इस आधार पर अस्वीकृत नहीं किया जायेगा कि, इस अधिनियम की धारा १० में दी गई तालिका में यथा विर्िनदिष्ट अवधि के दौरान आवेदक द्वारा किया गया भुगतान आवश्यक रक़म से कम है ।
९. आवेदक, जो सांविधिक आदेश में यथा अवधारीत प्रवेश पर कर अधिनियम के अधीन प्रवेश कर की अदायगी के लिए दायी है तब इस अधिनियम या सुसंगत अधिनियम में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन निपटान के प्रयोजनों के लिए,-----
प्रवेश पर कर अधिनियम के अधीन आवश्यक रक़म का निर्धारण और अधित्यजन का विस्तार। (क) आवश्यक रक़म, सांविधिक आदेश में अवधारित प्रवेश कर की रक़म से समतुल्य रक़म होगी, या मूल्यर्वधित कर नियम या, यथास्थिति, मुंबई विक्रय कर नियम, १९५९ के अधीन क्रमश: नियम ५३ या ५४ के अधीन यथा उपबंधित प्रवेश कर की मुज़राई की गई रक़म द्वारा घटाई गई, या छोडी गई, जो भी कम है, रक़म होगी ;
(ख) उक्त आवेदक ने, इस अधिनियम की धारा १० में दी गई तालिका में विर्िनदिष्ट अंतिम दिनांक पर या के पूर्व, खंड (१) के अधीन विकल्प को देखते हूए जिसमें निपटान करना चाहता है तो अदा की जानेवाली शेष कर की शेष रक़म इस अधिनियम के अधीन आदेश पारित करने द्वारा अधित्यजित की जायेगी और उक्त आवेदक, मूल्यर्वधित कर नियम या, यथास्थिति, मुंबई विक्रय कर नियम, १९५९ के अधीन इस अधिनियम के प्रारम्भण पर या के पूर्व अदा की गई रक़म समेेत कोई रक़म मुजराई की गई कोई रक़म का दावा करने का हकदार नहीं होगा ;
(ग) किसी संविधिक आदेश के अनुसार ब्याज उपाबंध-क या, यथास्थिति, उपाबंध-ख के अनुसरण में उसके संबंध में आवश्यक रक़म और अधित्यजन के अवधारण करने के लिए विचारार्थ लिया जाएगा ;
८ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६(घ) किसी सांविधिक आदेश के अनुसरण में अधिरोपित शास्ति के संबंध में आवश्यक रक़म और अधित्यजन उपाबंध-क, या, यथास्थिति, उपाबंध-ख के अनुसरण में अवधारित किया जायेगा ;
(ङ) धारा ८ की उप-धारा (२), (३), (६) और (७) के उपबंध, इस धारा को यथावश्यक परिवर्तन समेत लागू होंगे ।
१०. इस अधिनियम के अधीन आवश्यक रक़म के भुगतान, का अवधि निम्न तालिका में दिये गये अनुसार होगा :----
तालिका
आवश्यक रक़म की अदायगी के लिए विकल्प और अवधि।
अ.क्र. विशिष्टियाँ (१) (२)
प्रारम्भ दिनांक अंतिम दिनांक (३) (४)
(क) वह अवधि जिसमें आवश्यक इस अधिनियम के ३१ दिसम्बर २०२५ रक़म आवेदक द्वारा अदा प्रारम्भण का दिनांक की जानेवाली है।
निपटान के लिए शर्ते।
११. (१) सुसंगत अधिनियम के किन्ही उपबंधों में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी सांविधिक आदेश के संबंध में, सुसंगत अधिनियम के अधीन अपिलिय प्राधिकरण या अधिकरण या न्यायालय के समक्ष, यदि कोई, अपिल लम्बित है, तो आवेदक द्वारा पूरी तरह से और बिना शर्तों से वापस लिया जायेगा।
(२) जहाँ मूल्यर्वधित कर अधिनियम या, यथास्िथति, मुंबई विक्रय कर अधिनियम, १९५९ के अधीन अधिक मुजराई या प्रतिदाय केंद्रिय विक्रय कर अधिनियम, १९५६ या प्रवेश पर कर अधिनियम के अधीन दायित्व के समक्ष समायोजित है और जहाँ मुजराई या प्रतिदाय का ऐसा समायोजन मूल्यर्वधित कर अधिनियम या, यथास्थिति, मुंबई विक्रय कर अधिनियम, १९५९ के अधीन निर्धारण में घटाई या कम की गई है, तो केंद्रिय विक्रय कर अधिनियम, १९५६ या प्रवेश पर कर अधिनियम के अधीन देय समायोजित करने के उद्देश में, मूल्यर्वधित कर अधिनियम या, यथास्थिति, मुंबई विक्रय कर अधिनियम, १९५९ के अधीन दायर अपील, केंद्रिय विक्रय कर अधिनियम, १९५६, या, यथास्थिति, प्रवेश पर कर के अधीन अपील के साथ पूरी तरह से और बिना शर्तों के साथ वापस लेने की जरुरत है ।
सन् १९५९ का मुंबई ५१। सन् १९५६ का ७४। सन् १९५९ का मुंबई ५१। सन् १९५६ का ७४। सन् १९५९ का मुंबई ५१। सन् १९५६ का ७४। (३) निपटान के लिए किए गये आवेदन के साथ पदाभिहित प्राधिकारी को अपील को वापस लेने के लिए किए गए आवेदन की प्राप्ति की प्रस्तुती उक्त अपील के वापस लेने के प्रति पर्याप्त सबूत के रूप में माना जायेगा। बकायों के निपटान के लिए आवेदन।
१२. (१) आवेदक, सुसंगत अधिनियम के अधीन, धारा २ की उप-धारा (१) के खण्ड (घ) में दिए गए बकायों के प्रत्येक वर्ग के लिए अलग से, इस अधिनियम के प्राम्भण के दिनांक के पश्चात् किसी समय में प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए धारा १० में दी गई तालिका में विर्िनदिष्ट अंतिम दिनांक पर या के पूर्व आवेदन करेगा :
परंतु यह कि, आवेदक ने, इस अधिनियम की धारा १० में दी गई तालिका में विर्िनदिष्ट समय के भीतर, आवश्यक रक़म का भुगतान किया है, परंतु, समय के भीतर आवेदन नहीं किया जा सका है तब, विलंब के लिए कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात्, पदाभिहित प्राधिकारी द्वारा तीस दिनों तक के विलंब के लिये माफ किया जा सकेगा।
(२) पदाभिहित प्राधिकारी को, आयुक्त के किसी आदेश द्वारा जैसा की विर्िनदिष्ट किया जाए ऐसे प्ररूप में तथा ऐसी रीत्या, आवेदन किया जायेगा।
(३) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन जहाँ कोई आवेदन विर्िनदिष्ट अवधि के संबंध में, सुसंगत अधिनियम के अधीन विवरणी देयों के बकायों का निपटान करना चाहता है, तो वह प्रत्येक सुसंगत अधिनियम के अधीन ऐसी प्रत्येक विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी के लिए अलग से आवेदन प्रस्तुत करेगा :
महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ ९परंतु, जहाँ कोई आवेदक, एक वित्तीय वर्ष के संबंधित एक से अधिक विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी के संबंध में विवरणी देयों का निपटान करना चाहता है तो वह एकल आवेदन कर सकेगा।
(४) प्रत्येक ऐसा आवेदन, धारा ८ और ९ के अधीन यथा अवधारित पूर्ण आवश्यक रक़म की अदायगी के सबूत तथा आवेदन प्रारूप में अभिकथित दस्तावेजों के साथ होगा।
निपटान का आदेश। १३. (१) यदि आवेदक ने धारा ८ और ९ के अनुसरण में अवधारित आवश्यक रक़म का भुगतान किया है तो पदाभिहित प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता हैं कि, पदाभिहित प्राधिकारी, कोई आदेश पारित करेगा और आवेदन के दिनांक से दो महीने के भीतर आवेदक को उक्त आदेश की प्रतिलिपि देगा और तदुपरांत, सुसंगत अधिनियम में अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसा आवेदक, निपटान के आदेश में विर्िनदिष्ट अधित्यजन की रक़म की सीमा के उसके दायित्व से मुक्त करेगा।
(२) जहाँ, कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फ़ीस के बकायों का निपटान करने के लिए किया गया आवेदन, इस अधिनियम के उपबंधोंे के अनुसरण में नहीं है तो पदाभिहित प्राधिकारी, आवेदक को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, लिखित में किसी आदेश द्वारा, आवेदन को अस्वीकृत करेगा। ऐसे आवेदन की अस्वीकृति पर और यदि आवेदक ने, निपटान के लिए आवेदन अपील को प्रत्यात किया है, तब सुसंगत अधिनियम के अधीन उक्त मूल अपील धारा इस अधिनियम की १४ के उपबंधों के अध्यधीन सुसंगत अधिनियम के अधीन इस निमित्त अपीलीय प्राधिकारी को किए गए आवेदन पर पुन:स्थापित किया जायेगा।
(३) पदाभिहित प्राधिकारी, अपनी स्वप्रेरणा से या आवेदक के आवेदन पर, आवेदक द्वारा निपटान के आदेश की प्राप्ति के दिनांक से छह महीने के भीतर अभिलेख से प्रकट कोई गलती को सुधार सकेगा :
परंतु, परिशोधन के लिए आवेदन, आवेदक द्वारा निपटान के आदेश की प्राप्ति के दिनांक से साठ दिनों के भीतर किया जायेगा :
परंतु यह और भी, आवेदक को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करनेवाला कोई आदेश उसे सुनवाई का युक्ितयुक्त अवसर दिए बिना पारित नहीं किया जायेगा ।
१४. (१) इस अधिनियम के अधीन पारित किसी आदेश के विरुद्ध कोई अपील,----
(क) यदि प्राधिकारी द्वारा उसके अधिनस्थ को आदेश पारित किया है तो संबंधित राज्य कर उपायुक्त (प्रशासन या नोडल) को ;
इस अधिनियम के अधीन पारित आदेश के विरुद्ध अपील। (ख) यदि राज्य कर उपायुक्त द्वारा आदेश पारित किया गया है तो संबंधित राज्य कर संयुक्त आयुक्त (प्रशासन या नोडल) को ;
(ग) यदि, राज्य कर संयुक्त आयुक्त द्वारा आदेश पारित किया है तो संबंधित राज्य कर अतिरिक्त आयुक्त को, कर सकेगा।
(२) इस अधिनियम के अधीन पारित किसी आदेश की प्राप्ति के दिनांक से साठ दिनों के भीतर अपील दाखिल किया जायेगा और तत्पश्चात् दाखिल किसी अपील का स्वीकार नहीं किया जायेगा।
(३) इस धारा की, उप-धारा (१) में यथा विर्िनदिष्ट अपीलिय प्राधिकरण, ऐसी अधिकतर जाँच करने के पश्चात्, जो आवश्यक हो, जिसे वह न्याय संगत और उचित समझे, ऐसे आदेश पारित करेगा।
(४) इस धारा की उप-धारा (३) के अधीन पारित कोई आदेश के विरूद्ध द्वितीय अपील नहीं किया जायेगा। १५. (१) इस अधिनियम के अधीन पारित किसी आदेश का, आयुक्त द्वारा अपनी स्वप्रेरणा से, आदेश की तामिल के दिनांक से बारह महीने के भीतर किसी समय पर, पुनरीक्षण किया जा सकेगा।
इस अधिनियम के अधीन पारित आदेश का पुनरीक्षण। (२) ऐसे आदेश में कोई गलती पाए जाने के पश्चात्, राजस्व के हित में जहाँ तक यह न्यायसंगत हो आयुक्त आवेदक पर सूचना की तामिल कर सकेगा और जहाँ उप-धारा (१) में विहित समय सीमा के भीतर आवश्यक है, उसकी विवेक बुद्धि से कोई आदेश पारित कर सकेगा।
(३) आवेदन को प्रभावी होनेवाला कोई आदेश उसे सुनवाई का युक्ितयुक्त अवसर दिये बिना पारित नहीं किया जायेगा ।
भाग सात----३--२१० महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ सुसंगत अधिनियम के अधीन निपटान मामलों को फिर से शुरू करने का वर्जन।
१६. इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन, इस अधिनियम के अधीन जारी निपटान का कोई आदेश, उस आदेश के अधीन सम्मिलित बकायों के निपटान से संबंधित निर्णायक होगा, और निपटान के ऐसे आदेश द्वारा सम्मिलित मामला, भारत के नियंत्रक और महा-लेखा परीक्षक द्वारा किए गए किसी विशिष्ट विर्िनदिष्ट निरीक्षणों के संबंध में किसी कार्यवाहियों को छोडकर सुसंगत अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में या पूर्नविलोकन या पुनरीक्षण या कोई अन्य कार्यवाहियाँ फिर से शुरू नहीं की जायेगी।
अधिनियम के निपटान का आदेश प्रतिसंत करना।
१७. (१) धारा १६ में अन्र्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहाँ पदाभिहित प्राधिकारी को यह प्रतीत होता है कि, आवेदक ने किसी महवपूर्ण जानकारी छिपाई है या विशिष्ट या किसी गलत या मिथ्या जानकारी के प्रस्तुति द्वारा निपटान के लाभ प्राप्त किये है या सुसंगत अधिनियम के अधीन तलाशी या जब्ती और तलाशी से संबंधित कार्यवाहीयों में महवपूर्ण तथ्योंे का छिपाव, किसी विशिष्टियों का छिपाव पाया गया है तो पदाभिहित प्राधिकारी, आवेदक का कारणों को लिखित में अभिलिखित करने और उसे सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, वित्तीय वर्ष की समाप्ति से दो वर्षों के भीतर जिसमें निपटान का आदेश तामिल किया गया है, तो धारा १३ की उप-धारा (१) के अधीन जारी उक्त्त आदेश प्रतिसंत करेगा।
(२) उप-धारा (१) के अधीन, यदि निपटान आदेश प्रतिसंत किया गया है तो, निपटान के ऐसे आदेश द्वारा सम्मिलित सुसंगत अधिनियम के अधीन निर्धारण, पुर्ननिर्धारण, परिशोधन, पुनरीक्षण, पुर्नविलोकन या, यथास्थिति, अपील धारा ११ और १६ में अन्र्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसे प्रतिसंत पर तत्काल पुनरुज्जीवित या पुन:स्थापित होगा, और ऐसा निर्धारण पुर्ननिर्धारण, परिशोधन, पुनरीक्षण, पुर्नविलोकन या, यथास्थिति, अपील पर मानों कि, कर, ब्याज, शास्ति या विलम्बित फ़ीस के बकायों के निपटान का आदेश नहीं किया गया है तो सुसंगत अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में विनिश्चय किया जायेगा :
परन्तु, जहाँ सुसंगत अधिनियम के अधीन पुर्ननिर्धारण, परिशोधन, पुर्नविलोकन या पुनरीक्षण के लिए परिसीमा का अवधि, प्रतिसंहरण के आदेश के दिनांक से दो वर्ष के भीतर अवसित हुआ है, तब सुसंगत अधिनियम में, अंर्तविष्ट किसी बात के होते हुए भी, सुसंगत अधिनियम के अधीन पुर्ननिर्धारण, परिशोधन, पुर्नविलोकन या पुनरीक्षण ऐसे प्रतिसंहरण के आदेश के दिनांक से दो वर्ष के भीतर संबंधित प्राधिकरणों द्वारा किया जायेगा :
परन्तु सुसंगत अधिनियम के अधीन मूल अपील इस निमित्त किये गये आवेदन पर अपील सुसंगत अधिनियम के अधीन अपील प्राधिकारी को पुन:स्थपित किया जायेगा।
१८. किसी परिस्थितियों के अधीन, आवेदक, इस अधिनियम के अधीन अदा की गई कोई रक़म प्राप्त करने के लिए हकदार नहीं होगा :
इस अधिनियम के अधीन प्रतिदाय न करना।
परन्तु इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन निपटान के आदेश के प्रतिसंहृरण या अस्वीकृति के मामले में इस अधिनियम के अधीन आवेदक द्वारा अदा की गई रक़म सुसंगत अधिनियम के अधीन अदा की गई समझी जायेगी :
परन्तु आगे यह कि, निपटान का आदेश इस अधिनियम की धारा १५ के अधीन पूनरीक्षित है और आवेदक द्वारा अदा की गई रक़म पूनरीक्षण प्राधिकारी द्वारा निर्धारित आवश्यक रक़म के अधिक में अदा की जानेवाली दिखाई देता है तब ऐसी अधिक रक़म सुसंगत अधिनियम के अधीन अदा की गई है ऐसा समझा जायेगा।
१९. (१) आयुक्त, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, पदाभिहित प्राधिकारियों को, जैसा वह उचित समझे ऐसे अनुदेशों और निदेशों को समय-समय से जारी कर सकेगा।
इस अधिनियम के अधीन आयुक्त की शक्तियाँ।
(२) आयुक्त, आदेश द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्ररूपों और जिस रीति में प्रस्तुत किया जाएगा वह रीति, विहित कर सकेगा।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ ११ कठिनाई के निराकरण की शक्ति। २०. (१) इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में, यदि कठिनाई उद्भूत होती है तो, सरकार जैसा अवसर उद्भूत हो, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो किसी बात को कर सकेगी, जो उसे कठिनाई के निराकरण के प्रयोजनों के लिए आवश्यक या इष्टकर प्रतीत हो :
परन्तु, इस अधिनियम के प्रारम्भण के दिनांक से एक वर्ष की अवधि के पश्चात् ऐसा कोई आदेश नहीं बनाया जायेगा ।
(२) उप-धारा (१) के अधीन बनाया गया प्रत्येक आदेश, उसके बनाए जाने के पश्चात्, यथा- संभव शीघ्र, राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जायेगा।
परिशिष्ट--क
(देखिए धारा ८ और ९)
(१ अप्रैल २००५ पर या के पश्चात् प्रारम्भ होनेवाली और ३० जून २०१७ पर या के पूर्व समाप्त होनेवाली अवधि के लिए)
क्रम बकायों के प्रकार अदा की जानेवाली रक़म अधित्यजन की रक़म संख्या
(क) (ख)
(ग)
(घ) (१) अविवादित कर।
स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ शून्य प्रतिशत।
(२) विवादित कर।
स्तंभ (ख) में के रक़म के पचास स्तंभ (ख) में की रक़म के पचास प्रतिशत।
प्रतिशत।
(३) सुसंगत अधिनियम के अधीन भुगतान शून्य
स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ प्रतिशत।
की जानेवाली ब्याज या किसी सांविधिक आदेश या विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी के अनुसार भुगतान की जानेवाली ब्याज की रक़म।
(४) किसी सांविधिक आदेश के अनुसार बकाया शून्य
शास्ति।
स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ प्रतिशत।
स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ प्रतिशत।
(५) सुसंगत अधिनियम के अधीन ब्यौहारी द्वारा शून्य किए गए आवेदन के दिनांक तक उद्ग्रहणीय परंतु उद्ग्रहीत न की गई निर्धारणोत्तर ब्याज या शास्ति या दोनों की रक़म।
(६) इस अधिनियम की धारा १० में विर्िनदिष्ट शून्य
स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ प्रतिशत।
भूगतान के लिए अंतिम दिनांक पर या के पूर्व दाखिल विवरणी के संबंध में भुगतान योग्य विलंबित फ़ीस।
भाग सात----३--२अ१२ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६
परिशिष्ट--ख
(देखिए धारा ८ और ९)
( ३१ मार्च २००५ पर या के पूर्व समाप्त होनेवाली अवधि के लिए )
क्रम- बकायों के प्रकार अदा की जानेवाली रक़म अधित्यजन की रक़म संख्या
(क) (ख)
(ग)
(घ) (१) अविवादित कर की रक़म । स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ शून्य
प्रतिशत।
(२) विवादित कर की रक़म स्तंभ (ख) में की रक़म के तीस स्तंभ (ख) में की रक़म सत्तर प्रतिशत।
प्रतिशत।
(३) सुसंगत अधिनियम के अधीन भुगतान- शून्य
स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ प्रतिशत।
योग्य ब्याज या किसी आदेश या विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी के अनुसार भुगतान योग्य ब्याज की रक़म।
(४) किसी सांविधानिक आदेश के अनुसार बकाया शून्य
शास्ति की रक़म।
स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ प्रतिशत।
स्तंभ (ख) में की रक़म के सौ प्रतिशत।
(५) सुसंगत अधिनियम के अधीन ब्यौहारी द्वारा शून्य किए गए आवेदन के दिनांक तक उद्ग्रहणीय परंतु उद्ग्रहीत न की गई निर्धारणोत्तर ब्याज या शास्ति या दोनों की रक़म।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ १३
उद्देश्यों और कारणों का वक्त्तव्य।
सन २०२५ - २०२६ के लिए बजट अभिभाषण में अंर्तविष्ट प्रस्तावों को प्रभावी बनाने की दृष्टि से सरकार सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमित कम्पनियों को वस्तु और सेवा कर विभाग, महाराष्ट्र शासन द्वारा प्रशासित विभिन्न अधिनियमों के अधीन कर, ब्याज, शास्ति या विलम्बित फ़ीस जिसमें उद्ग्रहीत, देय या अधिरोपित बकायों के निपटान करने के लिए इष्टकर समझती है।
२. १ जुलाई २०१७ से वस्तु और सेवा कर के अधिनियम, २०१७ (सन् २०१७ का महा. ४३) के कार्यान्वयन के पूर्व राज्य में विभिन्न कर विधि प्रवर्तन में थे। ऐसे स्तर के अधीन मुकदमेबाजी में वसूली की बड़ी राशि अवरुद्ध हुई थी। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र विधि उपक्रमों कम्पनी द्वारा वसूली का काफ़ी बड़ा हिस्सा मुकदमे में जा रहा है।
३. इसलिये, बकाया देयों में शामिल रक़म मुक्त्त करने और पुराने लंम्बित मुकदमों को कम करने के लिये सरकार कर, ब्याज, शास्ति या विलम्बित फ़ीस के बकायों के निपटान के लिए एकमुश्त भुगतान विकल्प देने और सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमित कम्पनियों, जो भुगतान द्वारा उनके बकायों का निपटान करने के लिये संतुष्ट है तो पुराने विलंबित मुकदमे बंद करने के लिए उपबंध करन के लिए एक विधि अधिनियमित करना इष्टकर समझती है।
४. यह योजना, प्रस्तावित विधि, अविवादित कर के संबंध में राजस्व की सुरक्षा करेगी और विवादित कर की आंशिक छूट और ब्याज, शास्ति या विलम्बित फ़ीस की पूर्ण छूट के लिए प्रोत्साहन देगी।
५. प्रस्तुत विधेयक का आशय उपयर्ुक्त्त उद्देश्यों को प्राप्त करना है।
मुंबई,
दिनांकित ११ मार्च, २०२५।
उप-मुख्यमंत्रि (वित्त)।१४ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६
प्रत्यायुक्त विधान संबंधी ज्ञापन ।
प्रस्तुत विधेयक में, विधाय शक्ति के प्रत्यायोजन के लिए, निम्न प्रस्ताव अन्तर्ग्रस्त हैं, अर्थात् :----
खंड ३ (३).---इस खण्ड के अधीन, आयुक्त्त को राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उसकी शक्त्तियां उप-धारा (२) में यथा विर्िनदिष्ट पदाभिहित प्राधिकारी को प्रत्यायोजित करने की, शक्त्ति प्रदान की गई है। खंड १२ (२).---इस खण्ड के अधीन, आयुक्त्त को, पदाभिहित प्राधिकारी के लिए आवेदन का प्रारूप और उसे तैयार करने की रीति, आदेश द्वारा विर्िनदिष्ट करने की, शक्त्तियां प्रदान की गई है। खंड १९.---इस खण्ड के अधीन, आयुक्त्त को, जिसे वह ठिक समझे ऐसे अनुदेश और निदेशन पदाभिहित प्राधिकारी को जारी करने और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्ररुपों की विहित करने तथा वह रीति जिसमें प्ररूप प्रस्तुत किये जाने की, शक्त्ति प्रदान की गई है।
खंड २० (१).---इस खण्ड के अधीन, राज्य सरकार को, अधिनियम के प्रकाशन के दिनांक से एक वर्ष की अवधि के भीतर, कोई कठिनाई का जो इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी बनाने में उद्भूत होती है, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा निराकरण करने की, शक्त्ति प्रदान की गई है। २. विधायी शक्ति के प्रत्यायोजन के लिए उपरोलिखित प्रस्ताव सामान्य स्वरूप के है।महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६ १५
वित्तीय ज्ञापन ।
प्रस्तुत विधेयक, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमित कम्पनीयों के लिए, वस्तु और सेवा कर विभाग द्वारा प्रशासित विभिन्न अधिनियमों के अधीन बकायों के निपटान के उपबंध करने के लिये प्रस्तावित करता है, ताकि वित्तीय वर्ष २०२५-२०२६ के लिए बज़ट अभिभाषण में अंर्तविष्ट प्रस्तावों को प्रभावी बनाया जा सके। विधेयक में, राज्य विधानमंडल के अधिनियम के रूप में उसकी अधिनियमिति होने पर कोई उपबंध नहीं है। राज्य की समेकित निधि में से आवर्ती या अनावर्ती व्यय को सम्मिलित होने संबंधी कोई भी प्रावधान नहीं है।
(यथार्थ अनुवाद),
विजया ल. डोेनीकर, भाषा संचालक, महाराष्ट्र राज्य।१६ महाराष्ट्र शासन राजपत्र असाधारण भाग सात, मार्च १७, २०२५/फाल्गुन २६, शके १९४६
भारत के संविधान के अनुच्छेद २०७ के अधीन राज्यपाल की अनुशंसा
(महाराष्ट्र शासन, विधि व न्याय विभाग, आदेश कि प्रत)
भारत के संविधान के अनुच्छेद २०७ के खण्ड (१) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, महाराष्ट्र राज्यपाल महोदय, महाराष्ट्र कर, ब्याज, शास्ति या विलंबित फीस के बकायों का निपटान (सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमित कम्पनियों द्वारा देय) विधेयक, २०२५ ई. पर पुर:स्थापना करने की अनुशंसा करते है।
विधान भवन :
जितेंद्र भोळे,
मुंबई,
सचिव (१) (कार्यभार),
दिनांकित १७ मार्च, २०२५।
महाराष्ट्र विधानसभा।
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