RNI No. MAHBIL /2009/31730
महाराष्ट्रट शास रापंत्र
असाराण भाग सात
षष ११, अका २५] गुरुारा, ोव्हांबंरा ६, २०२५/कावितषका १५, शकाे १९४७ [पंृष्ठे ५, विकांमत : रुपंयाे ४७.००
असाराण क्रमाका ३९
प्राविकाृत प्राकाश
अध्यादेश, विेयाकाे अविवियाम याचा विहादेी अुादे (देागराी विलापंी).
ग्राम विकास विभाग
मं
बांधकांम भवन, २५ मर्झबांन पथ, फोर्ट, बांई ४०० ००१, दिनंदिकात ३ नवम्बांर २०२५।
MAHARASHTRA ORDINANCE No. XII OF 2025.
AN ORDINANCE
Further to amend the Maharashtra Village Panchayats Act and the Maharashtra Zilla Parishads and Panchayat Samitis Act, 1961.
महाराष्ट्र अध्यादेश क्रमाका १२ सन् २०२५।
महाराष्ट्र ग्राम पंचायात अविवियाम औरा महाराष्ट्र विला पंरिराषदे तथा पंचायात सविमवित
अविवियाम, १९६१ मं अविकातरा सशो काराे सबंवि अध्यादेश।
क्यांविका रंज्य दिवधंनमडल काे ोनं सनं कां सत्र नहीं चल रहीं हींै ;
सन् १९५९ कां ३ | सन् १९६२ कां महीं. ५ |
औरा क्यांविका महींरंष्ट्र काे रंज्यपंल कां यहीं समंधंन हींो चंकां हींै दिका, ऐसी परिरस्थिथदितयं दिवद्यमंन हीं, दिनकाे कांरण उन्हीं इसमं आगे दिझत प्रयोनं काे दिलए, महींरंष्ट्र ग्रांम पचंयत अदिधदिनयम और महींरंष्ट्र दिलं परिरष तथं पचंयत सदिमदित अदिधदिनयम, १९६१ मं अदिधकातर सोधन कारने काे दिलए सद्य कांयझवंहींी कारनं आवश्यका हींआ हींै ;
२ महाराष्ट्रट शास रापंत्र असाराण भाग सात, ोव्हांबंरा ६, २०२५/कावितषका १५, शकाे १९४७अबं, इसविलाए, भंरत काे सदिवधंन काे अनंच्छे २१३ काे खण्ड (१) द्वांरं प्रत्त स्थितयं कां प्रयोगे कारते हींए, महींरंष्ट्र काे रंज्यपंल, एतद् द्वांरं, दिनम्न अध्यंे प्रख्यंदिपत कारते हीं, अथंझत् :—
अध्याया - एका
प्राराम्भिभाका
१. (१) यहीं अध्यंे महींरंष्ट्र ग्रांम पचंयत और महींरंष्ट्र दिलं परिरष तथं पचंयत सदिमदित सदिक्षाप्त नंम तथं प्रंरम्भण।
(सोधन) अध्यंे, २०२५ काहींलंए।
(२) यहीं तंरत प्रवृत्त हींोगें।
अध्याया - देो
महाराष्ट्र ग्राम पंचायात अविवियाम मं सशो।
सन१९५९ कां ३। सन १९५९ कां ३ काी धंरं १०-१का मं सोधन।
२. महींरंष्ट्र ग्रांम पचंयत अदिधदिनयम (दिसे इसमं आगे, इस अध्यंय मं, "महींरंष्ट्र ग्रांम पचंयत अदिधदिनयम " काहीं गेयं हींै), काी, धंरं १०-१का मं, दिवद्यमंन परन्तंकां काे थंन मं, दिनम्न परन्तंका, रखं ंयेगें, अथंझत् :—
"परतं, काोई व्यस्थित, दिसने नंमंकान पत्र ंदिखल कारने काे दिनंका काे पूवझ अपने ंदित प्रमंणपत्र काे सत्यंपन काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो आवेन दिकायं हींै परन्तं, दिसे नंमंकान पत्र काे ंदिखल कारने काे दिनंका पर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रंप्त नहीं हींआ हींै, तो वहीं नंमदिनेन पत्र काे संथ, दिनम्न प्रतंत कारेगें,—
(एका) दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र काो ंरी कारने काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो उसकाे द्वांरं प्रतंत दिकाए गेए आवेन काी एका सत्य प्रदितदिलदिप यं सवीक्षां सदिमदित काो ऐसं आवेन कारने कां काोई अन्य सबांूत ; और
(ो) यहीं वचनबांध दिका, वहीं, सवीक्षां सदिमदित द्वांरं ंरी दिकायं गेयं दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र दिस दिनंका काो वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर, प्रतंत कारेगें :
परतं यहीं और भी दिका, यदि ऐसं व्यस्थित दिस दिनंका से वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर, दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रतंत कारने काे दिलए असफोल हींोतं हींै तो, उसकां दिनवंझचन भूतलक्षाी प्रभंव से समंप्त हींआ समर्झं ंएगें और वहीं सय हींोने से दिनरहींझ हींो ंएगें।"।
३. महींरंष्ट्र ग्रांम पचंयत अदिधदिनयम काी धंरं ३०-१का मं, दिवद्यमंन परन्तंकां काे थंन मं, दिनम्न परन्तंका, रखं ंयेगें, अथंझत् :—
सन १९५९ कां ३ काी धंरं ३०-१का मं सोधन
"परतं, काोई व्यस्थित, दिसने नंमंकान पत्र ंदिखल कारने काे दिनंका काे पूवझ अपने ंदित प्रमंणपत्र काे सत्यंपन काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो आवेन दिकायं हींै परन्तं, दिसे नंमंकान पत्र काे ंदिखल कारने काे दिनंका पर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रंप्त नहीं हींआ हींै, तो वहीं नंमदिनेन पत्र काे संथ, दिनम्न प्रतंत कारेगें,—
(एका) दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र काो ंरी कारने काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो उसकाे द्वांरं प्रतंत दिकाए गेए आवेन काी एका सत्य प्रदितदिलदिप यं सवीक्षां सदिमदित काो ऐसं आवेन कारने कां काोई अन्य सबांूत ; औरमहाराष्ट्रट शास रापंत्र असाराण भाग सात, ोव्हांबंरा ६, २०२५/कावितषका १५, शकाे १९४७ ३ (ो) यहीं वचनबांध दिका, वहीं, सवीक्षां सदिमदित द्वांरं ंरी दिकायं गेयं दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र दिस दिनंका काो वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर, प्रतंत कारेगें :
परतं यहीं और भी दिका, यदि ऐसं व्यस्थित दिस दिनंका से वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रतंत कारने काे दिलए असफोल हींोतं हींै तो, उसकां दिनवंझचन भूतलक्षाी प्रभंव से समंप्त हींआ समर्झं ंएगें और वहीं सरापंचा हींोने से दिनरहींझ हींो ंएगें।"।
अध्याया - ती
महाराष्ट्र विला पंरिराषदे औरा पंचायात सविमवित अविवियाम, १९६१ मं सशो ।
सन १९६२ कां महीं. ५ काी धंरं १२का मं सोधन। सन् १९६२ कां महीं. ५ ।
४. महींरंष्ट्र दिलं परिरष और पचंयत सदिमदित अदिधदिनयम, १९६१ (दिसे इसमं आगे, इस अध्यंय मं, " महींरंष्ट्र विला पंरिराषदे और पंचायात सविमवित अदिधदिनयम " काहीं गेयं हींै) काी, धंरं १२का मं, दिवद्यमंन परन्तंका काे थंन मं, दिनम्न परन्तंका, रखं ंयेगें, अथंझत् :—
"परतं, काोई व्यस्थित, दिसने नंमंकान पत्र ंदिखल कारने काे दिनंका काे पूवझ अपने ंदित प्रमंणपत्र काे सत्यंपन काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो आवेन दिकायं हींै परन्तं, दिसे नंमंकान पत्र ंदिखल कारने काे दिनंका पर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रंप्त नहीं हींआ हींै तो, वहीं नंमदिनेन पत्र काे संथ, दिनम्न प्रतंत कारेगें,—
(एका) दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र काो ंरी कारने काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो उसकाे द्वांरं प्रतंत दिकाए गेए आवेन काी एका सत्य प्रदितदिलदिप यं सवीक्षां सदिमदित काो ऐसं आवेन कारने कां काोई अन्य सबांूत ; और
(ो) यहीं वचनबांध दिका, वहीं, सवीक्षां सदिमदित द्वांरं ंरी दिकायं गेयं दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र दिस दिनंका काो वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर, प्रतंत कारेगें :
परतं यहीं और भी दिका, यदि ऐसं व्यस्थित दिस दिनंका से वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रतंत कारने काे दिलए असफोल हींोतं हींै तो, उसकां दिनवंझचन भूतलक्षाी प्रभंव से समंप्त हींआ समर्झं ंएगें और वहीं पंाषषदे हींोने से दिनरहींझ हींो ंएगें।"।
५. महींरंष्ट्र विला पंरिराषदे और पंचायात सविमवित अदिधदिनयम, १९६१ काी, धंरं ४२ काी, उप-धंरं (६का) मं, दिवद्यमंन परन्तंका काे थंन मं, दिनम्न परन्तंका रखं ंयेगें, अथंझत् :—
सन् १९६२ कां महीं. ५ काी धंरं ४२ मं सोधन। "परतं, काोई व्यस्थित, दिसने नंमंकान पत्र ंदिखल कारने काे दिनंका काे पूवझ अपने ंदित प्रमंणपत्र काे सत्यंपन काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो आवेन दिकायं हींै परन्तं, दिसे नंमंकान पत्र काे ंदिखल कारने काे दिनंका पर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रंप्त नहीं हींआ हींै तो, नंमंकान पत्र काे संथ, दिनम्न प्रतंत कारेगें,—
(एका) दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र काो ंरी कारने काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो उसकाे द्वांरं प्रतंत दिकाए गेए आवेन काी एका सत्य प्रदितदिलदिप यं सवीक्षां सदिमदित काो ऐसं आवेन कारने कां काोई अन्य सबांूत ; और ४ महाराष्ट्रट शास रापंत्र असाराण भाग सात, ोव्हांबंरा ६, २०२५/कावितषका १५, शकाे १९४७ परतं यहीं और भी दिका, यदि ऐसं व्यस्थित दिस दिनंका से वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर, दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रतंत कारने काे दिलए असफोल हींोतं हींै तो, उसकां दिनवंझचन भूतलक्षाी प्रभंव से समंप्त हींआ समर्झं ंएगें और वहीं अध्यक्षा हींोने से दिनरहींझ हींो ंएगें।"।
६. महींरंष्ट्र दिलं परिरष और पचंयत सदिमदित अदिधदिनयम, १९६१ काी धंरं ६७ काी, उप-धंरं(७ का) मं, दिवद्यमंन परन्तंका काे थंन मं, दिनम्न परन्तंका रखं ंयेगें, अथंझत् :—
सन १९६२ कां महीं. ५ । सन १९६२ कां महीं. ५ काी धंरं ६७ मं सोधन
"परतं, काोई व्यस्थित, दिसने नंमंकान पत्र ंदिखल कारने काे दिनंका काे पूवझ अपने ंदित प्रमंणपत्र काे सत्यंपन काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो आवेन दिकायं हींै परन्तं, दिसे नंमंकान पत्र ंदिखल कारने काे दिनंका पर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रंप्त नहीं हींआ हींै तो, नंमंकान पत्र काे संथ, दिनम्न प्रतंत कारेगें,-
(एका) दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र काो ंरी कारने काे दिलए सवीक्षां सदिमदित काो उसकाे द्वांरं प्रतंत दिकाए गेए आवेन काी एका सत्य प्रदितदिलदिप यं सवीक्षां सदिमदित काो ऐसं आवेन कारने कां काोई अन्य सबांूत ; और
(ो) यहीं वचनबांध दिका, वहीं, सवीक्षां सदिमदित द्वांरं ंरी दिकायं गेयं दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र दिस दिनंका काो वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर, प्रतंत कारेगें :
परतं यहीं और भी दिका, यदि ऐसं व्यस्थित दिस दिनंका से वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींआ हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रतंत कारने काे दिलए असफोल हींोतं हींै तो, उसकां दिनवंझचन भूतलक्षाी प्रभंव से समंप्त हींआ समर्झं ंएगें और वहीं सभंपदित हींोने से दिनरहींझ हींो ंएगें।"।महाराष्ट्रट शास रापंत्र असाराण भाग सात, ोव्हांबंरा ६, २०२५/कावितषका १५, शकाे १९४७ ५
क्तव्या
महींरंष्ट्र ग्रांम पचंयत अदिधदिनयम (सन १९५९ कां ३) काी धंरं १०-१का और ३०-१का और महींरंष्ट्र विला पंरिराषदे तथं पंचायात सविमवित अदिधदिनयम, १९६१ (सन् १९६२ कां महीं. ५) काी धंरं १२का, ४२ और ६७ यहीं उपबांध कारती हींै दिका, अनंसूदिचत ंदित, अनंसूदिचत नंदित यं, यथंस्थिथत, नंगेरिरकां कां दिपछेडे वगें से सबांदिधत व्यस्थितयं काे दिलए आरदिक्षात रखे गेए सय, पंषझ, सरापंचा, अध्यक्षा यं सभंपदित काे प काी सीर्ट पर दिनवंझचन लडने इच्छेुका प्रत्येका व्यस्थित, नंमंकान पत्र काे संथ महींरंष्ट्र अनंसूदिचत ंदित, अनंसूदिचत नंदित, दिनरदिधसूदिचत नंदित (विमुक्त ावितयां), खंनंबांो नंदित और अन्य दिपछेडे वगें तथं दिवेष दिपछेडे प्रवगें (दिनगेझमन और सत्यंपन कां दिवदिनयमन) ंदित प्रमंणपत्र अदिधदिनयम, २००० (सन् २००१ कां महीं. २३) काे उपबांधं तथं तद् धीन बांनंए गेए दिनयमं काे अनंसरण मं, सक्षाम प्रंदिधकारण द्वांरं ंरी दिकाए गेए ंदित प्रमंणपत्र और सवीक्षां सदिमदित द्वांरं ंरी दिकाए गेए दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रतंत कारेगें।
२. वषझ २०२५-२०२६ मं, रंज्य मं बांडे पैमंने पर थंनीय दिनकांयं काे दिनवंझचन दिलए ंनेवंले हींै। आरदिक्षात सीर्टं पर ऐसे दिनवंझचन लडने काे दिलए इच्छेुका हींोनेवंले उमेवंरं से दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र ंरी कारने काे दिलए ंदित सवीक्षां सदिमदित काो बांडी सख्यं मं आवेन प्रंप्त हींो रहींे हीं। इसदिलए, ऐसे दिनवंझचनं काे दिलए नंमंकान पत्र ंदिखल कारने काे पूवझ ंदित सवीक्षां सदिमदितयं पर ऐसे आवेनं काी सवीक्षां कारने काे कांयझ कां अत्यंदिधका बांोर्झ पड सकाेगें तथं ऐसे दिनवंझचनं काे पूवझ प्रत्येका पंच वषं काे पश्चंत् ऐसी परिरस्थिथदित उद्भूत हींो सकाेगेी।
ंदित सदिवक्षां सदिमदित द्वांरं समय पर, ंदित दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र ंरी न दिकाए ंने काे कांरण काेवल आरदिक्षात सीर्टं पर ऐसे दिनवंझचन लडने काे अवसर से प्रत्यंदित उम्मीवंर वदिचत रहीं सकांगे। इसदिलए, सरकांर आरदिक्षात सीर्टं पर दिनवंझचन लडनेवंले और दिन्हींने ंदित दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रंप्त कारने काे दिलए ंदित सवीक्षां सदिमदित काो आवेन दिकायं हींै ऐसे व्यस्थितयं काो दिस दिनंका काो वहीं दिनवंझदिचत घोदिषत हींए हींै उस दिनंका से छेहीं महींीने काी अवदिध काे भीतर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रतंत कारने काी अनंमदित ेने काी ृस्थिष्र्ट से और यदि वहीं छेहीं महींीने काे भीतर दिवदिधमंन्यतं प्रमंणपत्र प्रतंत कारने मं दिवफोल रहींतं हींै तो उसकां दिनवंझचन भूतलक्षाी प्रभंव से समंप्त हींआ समर्झं ंएगें ऐसं उपबांध कारने काे दिलए महींरंष्ट्र ग्रांम पचंयत अदिधदिनयम और महींरंष्ट्र विला पंरिराषदे तथं पंचायात सविमवित अदिधदिनयम, १९६१ मं यथोदिचत सोधन कारनं इष्र्टकार समर्झती हींै।
३. चू दिका रंज्य दिवधंन मडल काे ोनं सनं कां सत्र नहींी चल रहीं हींै और महींरंष्ट्र काे रंज्यपंल कां यहीं समंधंन हींो चंकां हींै दिका, ऐसी परिरस्थिथदितयं दिवद्यमंन हीं दिनकाे कांरण उन्हीं, उपयं झत प्रयोनं काे दिलए, महींरंष्ट्र ग्रांम पचंयत अ दिधदिनयम और महींरं ष्ट्र विला पंरिराषदे तथं पंचायात सविमवित अदिधदिनयम,१९६१ मं अदिधकातर सोधन कारने काे दिलए सद्य कांयझवंहींी कारनं आवश्यका हींआ हींै, अत: यहीं अध्यंे प्रख्यंदिपत दिकायं ंतं हींै।
आचायाष देव्रत,
महींरंष्ट्र काे रंज्यपंल ।
बांई,
मं दिनंदिकात २ नवम्बांर २०२५ । महींरंष्ट्र काे रंज्यपंल काे आे तथं नंम से,
एकाथा डलाे,
सरकांर काे प्रधंन सदिचव ।
(यथंथझ अनंवं),
श्री. अरूण कामळाबंाई ाळाू विगते, प्रभंरी भंषं सचंलका, महींरंष्ट्र रंज्य ।
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