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Uttarakhand Daily Gazette · Government of Uttarakhand

NOTIFICATION

Published 13 August 2025

Department
Finance Department
Type
Daily
Notification no.
47/XXVII(7)32(1)/2025
Identifier
in.gazette.uttarakhand_daily.2025-08-13.3295-291025222310
Languages
English, Hindi
Published at
Original source ↗

उत्तराखण्ड शासन

वित्त (वे ० आ ०- सा ०नि०) अनुभाग -7

अधिसूचना

प्रकीर्ण

13 अगस्त, 2025 ई ०

संख्या -47 / XXVII ( 7 ) 32 ( 1 ) / 2025 - ' भारत का संविधान' के अनुच्छेद 166 द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करके और इस विषय पर विद्यमान समस्त नियमों और आदेशों को अधिक्रमित करके श्री राज्यपाल , अवस्थापना एवं सेवा परियोजनाओं के लिए सामग्री , निर्माण कार्य , सेवाओं की अधिप्राप्ति और लोक निजी सहभागिता की व्यवस्था करने के प्रयोजन और उनसे सम्बन्धित या उनके आनुषंगिक विषयों के विनियमन के लिए उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति (ऍक्योरमेंट) नियमावली , 2025 (संलग्नक-01 ) प्रख्यापित किये जाने की सहर्ष स्वीकृति प्रदान करते है ।

(2)

संख्या-47 / XXVII ( 7 ) 32 ( 1 ) / 2025 , दिनांक 13 अगस्त , 2025 का संलग्नक -1

उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली , 2025

वित्त विभाग

उत्तराखण्ड शासन

( 3)

विषय-सूची

8 संक्षिप्ताक्षर एवं परिवर्णी शब्द.

9-13 अधिप्राप्ति शब्दावली..

अध्याय 1ः प्रस्तावना-उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली , 2025 14

14

1.1 नियमावली की प्रयोज्यता.

1.2 अधिप्राप्ति हेतु सक्षम प्राधिकारी एवं परिसीमायें . 14 अध्याय 2: अधिप्राप्ति के सामान्य सिद्धांत 15 2.1 लोक अधिप्राप्ति के मौलिक सिद्धांत 15-16

2.2 पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा, निष्पक्षता तथा स्वेच्छाचारिता का निर्मूलन 16-19 2.3 लोक अधिप्राप्ति हेतु सत्यनिष्ठा संहिता . 20 2.3.1निषेध 20 2.3.2 सक्रिय (Proactive) प्रकटीकरण की बाध्यता.. 21 2.3.3 दण्डात्मक कार्यवाही 21 2.4 आवश्यकता मूल्यांकन एवं अधिप्राप्ति नियोजन 22 2.5 निविदादाताओं की सहभागिता 23-25 2.6 निविदा-पूर्व सम्मेलन 25-26 2.7 गवर्नमेन्ट ई- मार्केट प्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन कय 26 2.8 इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली के माध्यम से ई-अधिप्राप्ति 26-27 2.9 मानक निविदा दस्तावेज़. 27 2.10 निविदा प्रस्तुत करने हेतु न्यूनतम समयावधि व निविदा प्रक्रिया समय- सारणी 27-28 2.11 निविदा संवीक्षा (Scrutiny) समिति 28-29 2.12 निविदा खोलने की प्रक्रिया 29 2.13 प्रतिक्रियाशील (Responsive) बोली का निर्धारण 29-31 2.14 न्यूनतम मूल्यांकित मूल्य का अवधारण 31-32 2.15 प्रदत्त संविदा का प्रकाशन 32

32-33 2.16 विवर्जन (Debarment )

2.17 सूचीबद्ध / पंजीकृत सूची से निष्कासन.. 33 2.18 संविदा प्रबंधन 33-34 अध्याय 3: सामग्री की अधिप्राप्ति 35 3.1 आपूर्तिकर्ताओं का पंजीकरण .35-36 (4)

36-37 3.2 निविदा प्रणाली

37-38 3.2.1 एकल चरण निविदा

38-39 3.2.2 द्वि चरण निविदा प्रणाली

40 3.3 अधिप्राप्ति की विधियाँ

3.3.1 बिना दर-सूची (कोटेशन) के सामग्री का क्रय 40

40-41 3.3.2 क्रय समिति के माध्यम से सामग्री का क्रय

3.3.3 गवर्मेन्ट ई- मार्केट (GeM) पोर्टल के माध्यम से ऑनलाईन क्रय 41

41-42 3.3.4 सीमित निविदा पृच्छा (एल.टी.ई.) .

42-43 3.3.5 विज्ञापित / खुली निविदा पृच्छा (ओ.टी.ई. ) .

43-44 3.3.6 वैश्विक निविदा पृच्छा ( Global Tender Enquiry) .

3.3.7 एकल स्रोत पृच्छा (एस.एस.ई. ). 44.

3.3.8 पुनरादेश (Repeat Order) .. 45

45-47 3.3.9 दर संविदा (rate contract) के अंतर्गत सीधे सामग्री का क्रय...

47-49 3.3.10 विशिष्ट विशेषताओं के साथ अधिप्राप्ति

49 3.4 निविदा/ बोली दस्तावेज तैयार करना, सूचना प्रकाशन, निविदा प्राप्ति एवं खोलना

..49-50 3.4.1 बोली दस्तावेजों की विषय वस्तु.

3.4.2 निविदाओं की प्राप्ति एवं अभिरक्षा.. 50

50 3.4.3 निविदा खोलना

3.5 निविदा का मूल्यांकन एवं संविदा प्रदत्त करना.. 51

3.5.1 गैर - प्रतिक्रियाशील निविदाएँ .. 51

3.5.2 निविदा का स्पष्टीकरण / दस्तावेजों की कमी . 51

51 3.5.3 समान दर वाली निविदाएं

51-52 3.5.4 असामान्य रूप से न्यून दर वाली निविदाएं

52 3.5.5 परक्रामण

3.5.6 सफल निविदादाता को अधिनिर्णय पत्र . -52

52

3.6 प्रतिभूतियाँ एवं भुगतान की शर्तें..

52-54 3.6.1 निविदा प्रतिभूति या धरोहर धनराशि

54-55 3.6.2 कार्यपूर्ति प्रतिभूति

3.6.3 आपूर्तिकर्ता को अग्रिम भुगतान 55

55-56 3.6.4 आपूर्तिकर्ता को आंशिक भुगतान (5)

56-57 3.7 संविदा को बंद करना ( closing of Contract) .

57-60 3.8 स्क्रैप , निष्प्रयोज्य वाहन, पुराने वृक्ष एवं अन्य अनुपयोगी सामग्रियों का निस्तारण

अध्याय 4: निर्माण कार्यों की अधिप्राप्ति 61 4.1 संविदाकारों का सूचीबद्धिकरण .61-62 4.2संविदा के प्रकार 62 4.2.1 भदवार दर संविदा 62 4.2.2 प्रतिशत आधारित दर संविदा ( Item Rate Contract) 63 4.2.3 एकमुश्त संविदा (lumpsum contract ) . 63-64 4.2.4 आंशिक कार्य दर (पीस वर्क) संविदा 64-65 4.2.5 अभियांत्रिकी, अधिप्राप्ति एवं निर्माण (ई.पी.सी. ) संविदा 65-67 4.3 निविदा प्रणालियाँ 67 4.3.1 एकल चरण एकल लिफाफा प्रणाली 67 4.3.2 एकल चरण दो-लिफाफा प्रणाली 67-68 4.3.3 पूर्व-योग्यता निविदा के साथ एकल चरण बहु लिफाफा प्रणाली 68-69

69-71 4.3.4 द्वि-चरण निविदा प्रणाली

71 4.4 निविदा की विधि

4.4.1 विज्ञापित/ खुली निविदा पृच्छा (ओ.टी.ई. ).. 71-72 4.4.2 सीमित निविदा पृच्छा (एल.टी.ई.) . 72 4.4.3 नामांकन द्वारा एकल स्रोत अधिप्राप्ति या चयन.... 72-73

73-74 4.4.4 कोटेशन के आधार पर अधिप्राप्ति

4.4.5 बिना दर सूची (कोटेशन ) के कार्यों की अधिप्राप्ति 74

74 4.5 निविदा दस्तावेज़ तैयार करना, निविदाओं का मूल्यांकन एवं कार्य प्रदत्त करना

4.5.1 समान दर वाली निविदा ( Identical Bids ) . 74-75

75-76 4.6 प्रतिभूतियों का विवरण

76-77 4.7 कार्यों का निष्पादन

4.7.1 कार्यों के चरण 77

77-79 4.7.2 कार्यों के निष्पादन हेतु मानदण्ड

79 4.7.3 दरों की अनुसूची

79-80 4.7.4 विभाग द्वारा स्वयं कार्यों के निष्पादन की प्रक्रिया ( 6 )

4.7.5 लोक निर्माण संगठन (पी.डब्ल्यू.ओ .) द्वारा कार्यों के निष्पादन की प्रक्रिया 80-81 4.8 कार्यों का अनुश्रवण एवं गुणवत्ता आश्वासन 81 4.8.1 कार्यों का निरीक्षण/ गुणवत्ता नियंत्रण 81-83 4.8.2 सामयिक अनुश्रवण (Time Monitoring) 83-85 4.8.3 वित्तीय अनुश्रवण 85-87 4.8.4 विवाद समाधान 87-88 4.8.5 संविदा का उल्लंघन एवं समापन 88-90

91 अध्याय 5: परामर्शी सेवाओं की अधिप्राप्ति

5.1 परामर्शी सेवाएँ 91

5.2 संविदा के प्रकार . 91

5.2.1 एकमुश्त (निश्चित मूल्य) संविदा 92 5.2.2 समय आधारित (रिटेनर- शिप) संविदा 92

5.2.3 प्रतिशत आधारित (सफलता शुल्क) संविदा 93

5.2.4 रिटेनर- शिप एवं सफलता (आकस्मिकता) शुल्क संविदा . 93

5.2.5 अनिश्चित संवितरण संविदा (मूल्य करार) 93

5.3 निविदा प्रणालियाँ . 93-94

5.4 निविदा की विधियाँ . 94

5.4.1 गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन (क्यू.सी.बी.एस. ) 94-101

5.4.2 मूल्य आधारित चयन- न्यूनतम लागत चयन (एल.सी.एस ) 101-103

103 5.4.3 प्रत्यक्ष चयन (Direct selection): एकल स्रोत चयन (एस.एस.एस)

104 5.5 निविदा दस्तावेजों की तैयारी, निविदाओं की प्राप्ति एवं मूल्यांकन..

5.5.1 निविदा दस्तावेजों की तैयारी 104-106

5.5.2 प्रस्तावों की प्राप्ति 106-107

5.5.3 निविदा प्रस्तावों का मूल्यांकन .107-108

5.5.4 परक्रामण एवं संविदा प्रदत्त करना 108

108 5.6 प्रतिभूतियों का विवरण

5.6.1 निविदा प्रतिभूति (ई.एम.डी) 108

108 5.6.2 निष्पादन प्रतिभूति

5.6.3 संचालन अग्रिम (Mobilisation Advance). 109 ( 7)

5.7 विशेष प्रकार के अनुबन्ध. 109 5.7.1 वैयक्तिक परामर्शदातों/ सेवा प्रदाताओं का चयन 109-110

5.7.2 विशिष्ट एजेंसियों/ संस्थाओं का चयन

111 5.8 परामर्शी सेवा संविदा का अनुश्रवण .

अध्याय 6: अन्य (गैर-परामर्शी) सेवाओं की अधिप्राप्ति/ वाह्य स्रोत से सेवायें प्राप्त किया जाना . 112 6.1 संविदाओं के प्रकार 112

112 6.2 चयन हेतु प्रक्रिया

112-114 6.3 अधिप्राप्ति हेतु प्रक्रिया

114 6.4 संविदाओं का अनुश्रवण

115 अध्याय 7: लोक निजी सहभागिता

116

अध्याय 8: विविध

8.1 नियमित प्रशिक्षण 116 8.2 आस्तियों का भौतिक सत्यापन 116 8.3 अभिलेखों का अनुरक्षण 116

116- 8.4 स्पष्टीकरण

116-117 8.5 शिकायत एवं अपील

8.6 सूचना प्रौद्योगिकी, हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर से संबंधित समस्त अधिप्राप्तियाँ . 117 8.7 राज्य अधिप्राप्ति नियमावली का गैर-अनुपालन .. 117

117 8.8 नियमों का अध्यारोही प्रभाव

117 8.9 मानक निविदा प्रपत्र....

117 8.10 व्यावृत्ति एवं निरसन

118 अनुलग्नक.

118-119 अनुलग्नक I: क्रय- मूल्य वरीयता...

अनुलग्नक II: अभिरुचि की अभिव्यक्ति पात्रता मानदंड (प्रारूप ) 120 अनुलग्नक III: अधिप्राप्ति रजिस्टर का प्रारूप 121 अनुलग्नक IV: पुस्तकों की अधिप्राप्ति पर दिशा-निर्देश 122

122 1. क्रय समिति के माध्यम से पुस्तकों का क्रय..

॥. निविदा/ सूचीबद्धता के माध्यम से पुस्तकों का क्रय.. 122-123

123 III . चयन मानदंड.

123-125 IV . सामान्य शर्तें...

125-126 v. प्रतिभूतियों के प्रपत्र..

( 8 )

संक्षिप्ताक्षर एवं परिवर्णी शब्द

बी जी            बैंक गारंटी                     Bank Guarantee
बी ओ क्यू        मात्राओं का देयक                Bill ofQuantities
सी एम सी          संविदा प्रबंधन समिति           Contract Management Committee
डी एस आर         दिल्ली दर अनुसूची               Delhi Schedule of Rates
ई एफ सी           व्यय वित्त समिति               Expenditure Finance Committee
ई एम डी           बयाना राशि निक्षेप             Earnest Money Deposit
 ई ओ आई           अभिरुचि की अभिव्यक्ति          Expression of Interest
 ईपीसी            अभियांत्रिकी, अधिप्राप्ति एवं निर्माण Engineering, Procurement and Construction
जी ओ आई           भारत सरकार                     Government of India
जीसीसी            संविदा की सामान्य शर्ते        General Condition of Contract
जी ई एम           सरकारी ई- बाज़ार               Government e Marketplace
 एल 1            लघुतम निविदाकर्ता                Lowest Bidder
 एल सी एस         न्यूनतम लागत चयन                Least Cost Selection
 एल डी            परिनिर्धारित हानि               Liquidated Damage
 एल ओ ए          स्वीकृति पत्र                    Letter of Acceptance
एम एस एम ई        सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम    Micro Small and Medium Enterprises
ओटीई              खुली निविदा पृच्छा              Open Tender Enquiry
 पीएसी            स्वामित्वधारी वस्तु प्रमाण पत्र Proprietary Article Certificate
पीपीपी            लोक निजी सहभागिता               Public Private Partnership
पी एस यू          सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम     Public Sector Undertakings
 पी डब्लूडी       लोक निर्माण विभाग               Public Works Department
 पी डब्ल्यूओ      लोक निर्माण संगठन               Public Works Organisation
 क्यूए सी         गुणवत्ता आष्वासन प्रकोष्ठ       Quality Assurance Cell
 क्यूसी बी एस     गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन    Quality & Cost Based Selection
 आर एफ पी         प्रस्ताव हेतु अनुरोध            Request for Proposal
 आर एफ क्यू       अहर्ता हेतु अनुरोध              Request for Qualification
 एस बी डी         मानक निविदा दस्तावेज़           Standard Bidding Documents
 एस एल ए          सेवा स्तर अनुबंध                Service Level Agreement
 एस ओ आर          दरों की अनुसूची                 Schedule of Rates
 एस एस एस         एकल स्रोत चयन                   Single Source Selection
 टी ओ आर          विचारार्थ विषय                  Terms of Reference
 वी एफ एम         धन का यथोचित मूल्य              Value for Money

( 9 )

अधिप्राप्ति शब्दावली

उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली , 2025 में , जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न होः

i . " बोली" ( कतिपय संदर्भों में ' निविदा' , 'पेशकश (ऑफर)' , ' दर सूची ' या ' प्रस्ताव' शब्दावली सहित) से , किसी अधिप्राप्ति इकाई द्वारा प्रस्ताव के आमंत्रण के अनुसरण में सामग्रियों , सेवाओं की आपूर्ति या कार्यों के निष्पादन का प्रस्ताव अभिप्रेत है तथा इसमें निविदा, प्रस्ताव या दर सूची सम्मिलित हैं;

ii . "बोलीदाता" (कतिपय संदर्भों में ' निविदादाता' , ' परामर्शदाता' या ' सेवा प्रदाता' शब्दावली सहित) से किसी भी पात्र व्यक्ति या फर्म या कंपनी अभिप्रेत है, जिसमें समूह (जो कि कई व्यक्तियों, या फर्मों या कंपनियों का एक संघ है) भी सम्मिलित है , जो अधिप्राप्ति इकाई के साथ अधिप्राप्ति प्रक्रिया में प्रतिभाग करता है;

iii . " निविदादाता पंजीकरण दस्तावेज़" से अधिप्राप्ति इकाई द्वारा निर्गत दस्तावेज़ अभिप्रेत है, जिसमें इसके अतिरिक्त संशोधन सम्मिलित हैं, जो पंजीकरण कार्यवाही के नियम एवं शर्तें निर्धारित करता है तथा इसमें पंजीकरण हेतु आमंत्रण भी सम्मिलित है;

iv . " मानक निविदा दस्तावेज" (' निविदा दस्तावेज़' या ' प्रस्ताव हेतु अनुरोध दस्तावेज़' या " आर.एफ.पी " शब्दावली सहित ) से अधिप्राप्ति इकाई द्वारा निर्गत दस्तावेज ( संशोधनों सहित) अभिप्रेत है , जिसमें अधिप्राप्ति के नियम एवं शर्तें निर्धारित की जाती हैं तथा बोली लगाने हेतु आमंत्रण भी सम्मिलित है । एक मानक (मॉडल) निविदा दस्तावेज़ विशिष्ट अधिप्राप्ति हेतु उपयुक्त परिवर्तन करने के पश्चात निविदा दस्तावेज़ तैयार किये जाने हेतु मानकीकृत टेम्पलेट है;

V. "निविदा प्रतिभूति" (कतिपय संदर्भ में ' बयाना राशि निक्षेप' (ई.एम.डी.) शब्दावली सहित) से वह वित्तीय प्रतिभूति अभिप्रेत है जो निविदाकर्ता से प्राप्त की जाती है जिससे कि संभावित संविदा प्रदत्त होने के परिणामस्वरूप उससे संबद्ध दायित्वों को सुरक्षित रखा जा सके एवं उसके द्वारा निविदा संबंधी दस्तावेजों को प्रस्तुत करने की समय सीमा के पश्चात् निविदा की वैधता के अंतर्गत किसी प्रस्ताव की वापसी या संशोधन या अनुबंध पर हस्ताक्षर करने में विफलता या प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के पश्चात् अनुबंध के निष्पादन हेतु आवश्यक प्रतिभूति प्रदान करने में विफलता या आग्रह दस्तावेज़ों में निर्दिष्ट अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से पूर्व किसी अन्य शर्त के अनुपालन में विफलता से बचा जा सके;

vi . " सक्षम प्राधिकारी" से ऐसा प्राधिकारी अभिप्रेत है जो वित्तीय हस्त पुस्तिकाओं, नियमों, प्रक्रियाओं, शासनादेशों द्वारा वित्तीय संव्यवहार, क्रय , अधिप्राप्ति तथा शासकीय संपत्ति के विक्रय या निस्तारण हेतु अधिकृत है;

vii. " परामर्शी सेवाएँ" में सेवाओं का एक विस्तृत कार्यक्षेत्र सम्मिलित है जो परामर्शी या पेशेवर प्रकृति की होती हैं तथा परामर्शदाताओं द्वारा प्रदान की जाती हैं । इन सेवाओं में सामान्यतः (10)

विशेषज्ञ या रणनीतिक सलाह प्रदान करना सम्मिलित है, जैसे प्रबंधन सलाहकार, नीति सलाहकार या संचार सलाहकार । साथ ही परियोजनाओं से संबंधित परामर्श सेवाएँ जिनमें सम्मिलित हैं, उदाहरणार्थ- व्यवहार्यता अध्ययन, परियोजना प्रबंधन, इंजीनियरिंग सेवाएँ , वास्तुकला सेवाएँ, वित्त लेखांकन और कराधान सेवाएँ, प्रशिक्षण और विकास । इसमें छोटे काम या माल की आपूर्ति या गैर-परामर्श सेवाएँ हो सकती हैं जो ऐसी सेवाओं हेतु प्रासंगिक या आनुषंगिक हैं ।

viii. "संविदा मूल्य" से संविदा के अंतर्गत निविदाकर्ता को उसके संविदात्मक दायित्वों के पूर्ण एवं यथोचित निष्पादन हेतु देय राशि अभिप्रेत है, जिसमें वस्तु एवं सेवा कर (GST) भी सम्मिलित है;

ix. " इलेक्ट्रॉनिक रिवर्स नीलामी " या ' रिवर्स नीलामी' से समस्त प्राप्त बोलियों के स्वचालित मूल्यांकन के पश्चात सर्वोत्तम बोली के चयन हेतु अधिप्राप्तिकर्ता इकाई की एक ऑनलाइन वास्तविक समय की क्रय तकनीक अभिप्रेत है जिसमें एक निर्धारित अवधि के दौरान बोलीदाताओं द्वारा क्रमिक रूप से अधिक अनुकूल बोलियों की प्रस्तुति एवं स्वचालित मूल्यांकन सम्मिलित होता है ।

"ई-प्रोक्योरमेंट" से पारदर्शी प्रक्रियाओं के माध्यम से खुली, गैर- भेदभावपूर्ण एवं कुशल अधिप्राप्ति के उद्देश्य से सामग्रियों (आपूर्ति) , कार्यों तथा सेवाओं के अर्जन हेतु बोलीदाताओं के साथ अपनी - अधिप्राप्ति प्रक्रियाओं के संचालन में अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (विशेष रूप से इंटरनेट) का उपयोग करना अभिप्रेत है; Χ.

xi. "सामग्री" से सभी वस्तुएं, उत्पाद, पदार्थ, पशुधन, दवाइयां, फर्नीचर, फिक्स्चर, कच्चा माल, उपभोग्य वस्तुएं, कल पुर्जे, उपकरण , मशीनरी, औद्योगिक संयंत्र, वाहन, हवाई जहाज, पोत, रेलवे रोलिंग स्टॉक असेंबली , उप-असेंबली , सहायक उपकरण , मशीनों का एक समूह जिसमें एक एकीकृत उत्पादन प्रक्रिया या सामग्री की अन्य श्रेणियां या प्रौद्योगिकी हस्तांतरण , लाइसेंस , पेटेंट या अन्य बौद्धिक संपदा (परन्तु पुस्तकालय हेतु पुस्तकें, प्रकाशन, पत्रिकाएँ आदि नहीं हैं) जैसे अमूर्त उत्पाद अभिप्रेत हैं, जो एक अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा अधिप्राप्त या अन्यथा अर्जित किए जाते हैं । सामग्री की अधिप्राप्ति में कतिपय लघु कार्य या सेवाएँ सम्मिलित हो सकती हैं, जो ऐसे सामग्री की आपूर्ति हेतु प्रासंगिक या आनुषंगिक हैं, जैसे परिवहन, बीमा, स्थापना, कमीशनिंग , प्रशिक्षण एवं अनुरक्षण । इस नियमावली के प्रयोजन हेतु स्क्रैप को सामग्री माना जाएगा , जिसमें ऐसी सामग्रियां सम्मिलित हैं जो टूटने, कटने, घिसने तथा ऐसे अन्य कारणों से उपयोग हेतु उपयुक्त नहीं हैं;

xii . "राज्यपाल" से उत्तराखण्ड के राज्यपाल अभिप्रेत हैं;

xiii . " इंडेंटर " (या कतिपय संदर्भों में ' विभाग' शब्द) से वह इकाई तथा उसके अधिकारी अभिप्रेत हैं, जो एक अधिप्राप्ति इंडेंट (मांग पत्र) आरम्भ करते हैं जो कि उसमें निर्दिष्ट सामग्रियों, कार्यों या सेवाओं की अधिप्राप्ति हेतु अधिप्राप्तिकर्ता इकाई से एक अनुरोध है ;

xiv . "इन्वेंटरी" से कोई भी सामग्री, घटक या उत्पाद अभिप्रेत है जिसे बाद में उपयोग हेतु संघटित कर रखा जाता है;

(11)

XV . "(पूर्व) अर्हता हेतु आमंत्रण" से संभावित बोलीदाताओं की पूर्व योग्यता हेतु प्रस्ताव आमंत्रित करने वाली अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा प्रकाशित दस्तावेज व उसके संशोधन अभिप्रेत है;

xvi . "पंजीकरण हेतु आमंत्रण" से संभावित बोलीदाताओं से बोलीदाताओं के पंजीकरण हेतु प्रस्ताव आमंत्रित करने वाली अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा इस हेतु प्रकाशित दस्तावेज व उसके संशोधन अभिप्रेत है ;

xvii . " पट्टा" का वही अर्थ होगा जो संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 105 में इस हेतु निर्दिष्ट है । तदनुसार, पट्टे को अचल संपत्ति का उपयोग करने के अधिकार के ऐसे हस्तांतरण के रूप में परिभाषित किया गया है, जो एक निश्चित समय के लिए स्पष्ट रूप से प्रदान किया गया हो तथा भुगतान की गई या वादा की गई कीमत, या समय- समय पर या निर्दिष्ट अवसरों पर अंतरिती द्वारा अंतरणकर्ता को स्वीकार की गयी शर्तों पर प्रदान की जाने वाली धनराशि, के प्रतिफल के रूप में किया गया हो;

xviii . "अनुज्ञप्ति" (License ) का वही अर्थ होगा जो भारतीय सुखाचार अधिनियम, 1882 (The Indian Easements Act , 1882) की धारा 52 में इस हेतु निर्दिष्ट है । तदनुसार, अनुज्ञप्ति को अनुदानकर्ता द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को अनुदत्त अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है , जो अनुदानकर्ता की स्थावर संपत्ति में या उस पर कोई ऐसी बात करने या करते रहने हेतु है जो ऐसे अधिकार के अभाव में विधिविरुद्ध होगी और ऐसा अधिकार संपत्ति में सुखाधिकार या हित के बराबर नहीं है;

xix . " गैर- परामर्श सेवाएं " (विशिष्ट संदर्भों में "अन्य सेवाएं" सहित) को उन सेवाओं के अपवर्जन के रूप में परिभाषित किया जाता है जिन्हें परामर्श सेवाओं के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है । इनमें भौतिक एवं प्रक्रियात्मक प्रकृति की सेवाएँ जैसे, परिवहन सेवायें, लॉजिस्टिक , कोरियर सेवायें, कार्यालय / भवन का रख - रखाव एवं अनुरक्षण ( सिविल तथा विद्युत कार्यों को छोड़कर) , ड्रिलिंग , हवाई फोटोग्राफी, उपग्रह चित्रण, मानचित्रण एवं समान प्रकार के संचालन सम्मिलित हैं जिनके लिए मात्रा और प्रदर्शन मानकों को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है और लगातार लागू किया जा सकता है और इस आधार पर बोली लगाई जाती है और अनुबंध किया जाता है । इसमें लघु कार्य या वस्तुओं की आपूर्ति सम्मिलित हो सकती है जो ऐसी सेवाओं हेतु प्रासंगिक या आनुषंगिक हैं;

XX. "सेवाओं का बहिःस्रोतन" से, उन सेवाओं (सुरक्षा सेवाएँ, बागवानी सेवाएँ, छात्रावासों एवं अतिथि गृहों हेतु चौकीदार / रसोइया/ खानपान/ प्रबंधन सेवाएं, सफाई/ गृह- व्यवस्था सेवाएँ, चपरासी / संदेशवाहक सेवाएँ इत्यादि) के संपादन हेतु नियोजन अभिप्रेत है जो कतिपय मामलों में पारंपरिक रूप से विभागों के कर्मचारियों द्वारा आन्तरिक रूप से ही सम्पादित की जाती थीं;

xxi . " निविदा आमंत्रण सूचना" (कतिपय संदर्भों में ' बोली हेतु आमंत्रण' या ' प्रस्तावों हेतु अनुरोध' शब्दावली सहित) से एक दस्तावेज़ एवं अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा प्रकाशित या इसके अतिरिक्त (12)

अधिसूचित कोई भी संशोधन अभिप्रेत है जो संभावित बोलीदाताओं को सूचित करता है कि वह वस्तुओं , सेवाओं और या कार्यों की अधिप्राप्ति हेतु आशयित है ;

xxii . " पूर्व-अर्हता (बोली) प्रक्रिया " से बोलियां आमंत्रित करने से पूर्व, अधिप्राप्ति में प्रतिभाग करने हेतु योग्य बोलीदाताओं के अभिनिर्धारण के लिए निर्धारित प्रक्रिया अभिप्रेत है;

xxiii . " पूर्व- अर्हता दस्तावेज़ " से संशोधनों सहित अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा निर्गत ऐसा दस्तावेज़ अभिप्रेत है, जो पूर्व- अर्हता बोली के नियमों एवं शर्तों को निर्धारित करता है तथा इसमें पूर्व-अर्हता प्राप्त करने का आमंत्रण सम्मिलित है;

xxiv. " अधिप्राप्ति अनुबंध" (कतिपय संदर्भों के अंतर्गत ' क्रय आदेश' या ' आपूर्ति आदेश' या ' निकासी आदेश ' या ' कार्यादेश' या 'परामर्श अनुबंध' या ' अन्य सेवाओं हेतु अनुबंध' शब्दावली सहित) से अधिप्राप्ति के विषय से संबंधित लिखित रूप में एक औपचारिक विधिक अनुबंध अभिप्रेत है, जो अधिप्राप्तिकर्ता इकाई तथा आपूर्तिकर्ता, सेवा प्रदाता या ठेकेदार के मध्य पारस्परिक रूप से स्वीकार्य नियमों एवं शर्तों पर किया जाता है तथा जो राष्ट्र के विधिक सिद्धांतों के समस्त प्रासंगिक प्रावधानों के अनुरूप होते हैं । "अनुबंध " शब्द में " दर संविदा' भी सम्मिलित होगी;

XXV . "अधिप्राप्ति अधिकारी / क्रय अधिकारी " से ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जिसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा सामग्री एवं सेवाएं अधिप्राप्त करने हेतु प्राधिकृत किया गया है;

xxvi . " अधिप्राप्ति प्रक्रिया " से आवश्यकता निर्धारण से लेकर, यथास्थिति पूर्व -अर्हता प्राप्त करने या सूचीबद्ध करने या बोली हेतु आमंत्रण निर्गत करने , अधिप्राप्ति अनुबंध प्रदत्त करने , अनुबंध के समापन तक अनुबंध का निष्पादन करने तक की अधिप्राप्ति प्रक्रिया अभिप्रेत है;

xxvii . "अधिप्राप्तिकर्ता इकाई " से ऐसा शासकीय विभाग या अधीनस्थ कार्यालय, राज्य सरकार का उपक्रम, स्थानीय प्राधिकरण या बोर्ड , निकाय या निगम अभिप्रेत है जो विधि द्वारा या उसके अंतर्गत स्थापित किया गया हो तथा शासन के स्वामित्व एवं नियंत्रण में हो; और जिसे अधिप्राप्ति संबंधी शक्तियां प्रतिनिधानित हों;

xxviii. "लोक निजी सहभागिता" से सार्वजनिक संपत्तियों या सार्वजनिक सेवाओं या उनके संयोजन के प्रावधान हेतु निजी क्षेत्र के निकाय द्वारा किए जा रहे निवेश या प्रबंधन के माध्यम से एक निश्चित अवधि हेतु केंद्र, राज्य, सांविधिक निकाय या अन्य शासकीय स्वामित्व निकाय एवं निजी क्षेत्र के निकाय के मध्य स्थापित व्यवस्था अभिप्रेत है , जहां निजी क्षेत्र एवं सार्वजनिक निकाय के मध्य जोखिम का स्पष्ट आवंटन होता है तथा निजी क्षेत्र को निष्पादन से जुड़े भुगतान प्राप्त होते हैं जो सार्वजनिक निकाय या उसके प्रतिनिधि द्वारा परिमेय निर्दिष्ट एवं पूर्व निर्धारित निष्पादन मानकों, प्रदेय उत्पादों या सेवा स्तर अनुबंधों के अनुरूप (या मानदण्ड़ित किए गए हैं ) होते हैं;

xxix. " लोक अधिप्राप्ति" या ' अधिप्राप्ति' (या कतिपय सन्दर्भों में ' क्रय ' , या ' शासकीय अधिप्राप्ति/ क्रय' ) से किसी अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा चाहे प्रत्यक्षतः या किसी अभिकरण जिसके साथ अधिप्राप्ति सेवाओं हेतु अनुबंध किया गया है , के माध्यम से लोक निजी सहभागिता परियोजनाओं के प्रदत्त (13)

होने सहित क्रय, पट्टे, अनुज्ञप्ति या अन्यथा, सार्वजनिक निधि या निधि के किसी अन्य स्रोत (जैसे अनुदान, ऋण, उपहार, निजी निवेश आदि) का उपयोग करके सामग्रियों, कार्यों या सेवाओं या तत्संबंधी संयोजन के माध्यम से अधिग्रहण अभिप्रेत है परन्तु इसमें बिना प्रतिफल के वस्तुओं, कार्यों या सेवाओं का कोई भी अर्जन सम्मिलित नहीं है;

"दर संविदा" से दर अनुबंध द्वारा आच्छादित अवधि के दौरान निर्दिष्ट मूल्य एवं नियमों तथा शर्तों (जैसा कि अनुबंध में सम्मिलित है) पर निर्दिष्ट वस्तुओं (और संबद्ध सेवाएँ, यदि कोई हो) की आपूर्ति हेतु सक्षम प्राधिकारी तथा आपूर्तिकर्ता के मध्य अनुबंध अभिप्रेत है;

xxxi . "सेवा" को अपवादस्वरूप वस्तुओं या कार्यों के अलावा अधिप्राप्ति की किसी विषय के रूप में परिभाषित किया गया है, सिवाय उन वस्तुओं या कार्यों के जो सेवा हेतु प्रासंगिक या आनुषंगिक हों । इसमें भौतिक , अनुरक्षण, पेशेवर, बौद्धिक, प्रशिक्षण, परामर्शी एवं सलाहकारी सेवाएं या अधिप्राप्ति इकाई द्वारा इस रूप में वर्गीकृत या घोषित कोई अन्य सेवा भी सम्मिलित हैं । परन्तु इसमें किसी विधि, नियम, विनियम या इस संबंध में जारी आदेश के अंतर्गत की गई किसी व्यक्ति की नियुक्ति सम्मिलित नहीं है । इसमें ' परामर्श सेवाएँ' तथा 'अन्य (गैर- परामर्श सेवाएँ)' सम्मिलित हैं;

xxxii , "कार्य" किसी भी गतिविधि को संदर्भित करता है, जो किसी आर्थिक या तकनीकी प्रकार्य (function) को पूर्ण करने हेतु पर्याप्त है, जिसमें निर्माण , फैब्रिकेशन , मरम्मत, जीर्णोद्धार , नवीनीकरण , सजावट, स्थापना, उत्थापन, उत्खनन, तलमार्जन इत्यादि सम्मिलित हैं, जो एक या अधिक अभियांत्रिकी डिजाइन, वास्तुशिल्प डिजाइन, सामग्री एवं प्रौद्योगिकी, श्रम, मशीनरी तथा उपकरण के संयोजन का उपयोग करते हैं । कुछ सामग्रियों या कुछ सेवाओं की आपूर्ति ऐसे कार्यों के अंश हेतु प्रासंगिक या आनुषंगिक हो सकती है । " कार्य " शब्द में- (i ) सड़क, रेलवे, हवाई अड्डे , नौपरिवहन- बंदरगाह, सेतु, भवन , सिंचाई प्रणाली , जलापूर्ति, सीवरेज सुविधाएं , बांध , सुरंग एवं उत्खनन हेतु सिविल कार्य , आदि; तथा (ii) मशीनरी एवं संयंत्रों से संबंधित यांत्रिक या विद्युत प्रकृति के निर्माण, स्थापना, उत्थापन, मरम्मत एवं अनुरक्षण से सम्बद्ध यांत्रिक तथा विद्युत कार्य सम्मिलित हैं ।

(14)

अध्याय 1ः प्रस्तावना-उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली, 2025

1.1 नियमावली की प्रयोज्यता

1.1.1. इस नियमावली का संक्षिप्त नाम " उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली, 2025" है ।

1.1.2. यह तुरन्त प्रवृत्त होगी ।

1.1.3. यह नियमावली अवस्थापना एवं सेवा परियोजनाओं हेतु सामग्री, निर्माण कार्यों तथा सेवाओं की अधिप्राप्ति करने के प्रयोजन हेतु समस्त शासकीय विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) , सांविधिक प्राधिकरणों, पंचायतीराज संस्थानों, नगर पालिकाओं / नगरीय स्थानीय निकायों, सहकारी समितियों तथा ऐसी इकाइयों पर लागू होगी , जो राज्य सरकार के नियंत्रणाधीन हों । केन्द्र पोषित परियोजनाओं में भी, जब तक कि उस परियोजना विशेष के संदर्भ में अन्यथा कोई प्रावधान न हो , यह नियमावली प्रभावी होगी ।

स्पष्टीकरण- यह नियमावली किसी सार्वजनिक अथवा निजी स्वायत्तशासी या सांविधिक निकाय को राज्य सरकार द्वारा दिए गए सहायक अनुदान या वित्तीय सहायता पर भी लागू होगी ।

1.1.4. यह नियमावली निम्नलिखित पर लागू नहीं होगी;-

i. बाह्य सहायतित परियोजनाओं के अंतर्गत की जाने वाली अधिप्राप्तियां , जहां ऋण अनुबंध की शर्तों के अनुसार बाह्य सहायता एजेंसी के अधिप्राप्ति नियमों का पालन किया जाना प्राविधानित हो,

ii . सुरक्षा उद्देश्यों हेतु या सामरिक महत्व संबंधी अधिप्राप्ति, जिसे राज्य सरकार द्वारा , सामान्य या विशेष आदेश से विनिर्दिष्ट किया गया हो,

iii . कोई अन्य अधिप्राप्ति, जिसे सरकार द्वारा विशिष्ट रुप से अधिसूचित किया जाये ।

1.1.5. इस नियमावली के उपबंधों का, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य नियमावली , दिशा-निर्देशों या आदेशों में या इस नियमावली से अन्यथा किसी नियमावली या आदेशों के आधार पर प्रभाव रखने वाले किसी दस्तावेज में किसी बात के असंगत होते हुए भी, प्रभाव होगा ।

1.2 अधिप्राप्ति हेतु सक्षम प्राधिकारी एवं परिसीमायें

उत्तराखण्ड वित्तीय हस्त पुस्तिका भाग- 1 ( वित्तीय अधिकारों का प्रतिनिधायन) , वित्तीय हस्त पुस्तिका खण्ड 5 भाग 1 , वित्तीय हस्त पुस्तिका खण्ड-6 एवं वित्तीय हस्त पुस्तिका खण्ड-7 में निर्दिष्ट परिसीमाओं तक यथास्थिति कार्यालयाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष एवं प्रशासकीय विभाग अधिप्राप्ति संबंधी स्वीकृति दे सकेंगे । इस संबंध में उत्तराखण्ड बजट मैनुअल के प्रस्तर-12 व्यय के प्राधिकार (Authorisation of expenditure ) तथा वित्तीय औचित्य के मानकों (Standards of financial propricty) का अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा ।

(15)

अध्याय 2: अधिप्राप्ति के सामान्य सिद्धांत

2.1 लोक अधिप्राप्ति के मौलिक सिद्धांत

2.1.1 . समस्त अधिप्राप्ति प्रक्रियाओं में दक्षता , मितव्ययिता, पारदर्शिता , प्रतिस्पर्धात्मकता, तथा निष्पक्षता एवं जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि अधिप्राप्तिकर्ता इकाई हेतु धनराशि का सर्वोत्तम मूल्य सुनिश्चित किया जा सके ।

2.1.2. जब तक कि इस नियमावली अथवा राज्य सरकार के विशिष्ट आदेशों के अधीन छूट न दी जाए, समस्त अधिप्राप्तियाँ निविदाओं के माध्यम से की जाएंगी ।

2.1.3. जब तक कि नियमों में अन्यथा विनिर्दिष्ट या सक्षम प्राधिकारी द्वारा विशेष रूप से प्रतिबंधित न किया गया हो, समस्त प्रतिभागियों को बोलियों में भाग लेने हेतु आमंत्रित किया जाएगा ।

2.1.4. अधिप्राप्ति की विषय वस्तु का विवरण उद्देश्यपूर्ण , कार्यात्मक, सामान्य तथा यथासंभव परिमेय हो और तकनीकी, गुणात्मक एवं निष्पादन विशेषताओं को निर्दिष्ट करे । अधिप्राप्तिकर्ता संगठन की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए , अधिप्राप्त की जाने वाली सामग्री की गुणवत्ता, प्रकार, मात्रा आदि विशिष्टताएं स्पष्ट रूप से सूचित की जानी चाहिए ताकि अतिरिक्त और अनावश्यक लक्षणों को सम्मिलित किए बगैर इस प्रकार तैयार की गई विशिष्टताओं द्वारा संगठन की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके, जिससे अवांछित व्यय न हो और भंडारण लागत में अनावश्यक वृद्धि न हो । जहाँ तक संभव हों, तकनीकी विशिष्टताओं में प्रासंगिक भारतीय मानकों का उल्लेख होना चाहिए और यह राष्ट्रीय तकनीकी विनियमों के अनुरूप होनी चाहिए ।

2.1.5. जिन उत्पादों के लिए भारतीय मानक उपलध हों, उनकी खरीद के निविदा दस्तावेजों में मानक संख्या के साथ भारतीय मानकों का संदर्भ सम्मिलित किया जाय । भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा प्रमाणित मानक चिन्ह वाले उत्पादों (जैसे आई.एस.आई मार्क, पंजीकरण मार्क, हॉलमार्क आदि) की खरीद को प्राथमिकता दी जाय । भारतीय मानकों के अभाव में , प्रासंगिक अंतर्राष्ट्रीय मानकों को अपनाया जा सकता है । भारतीय मानकों से किसी भी विचलन के लिए या बेहतर प्रदर्शन के लिए कोई भी अतिरिक्त मापदण्ड जोड़े जाने के लिए , सक्षम प्राधिकारी के अनुमोदन के साथ विचलन / संशोधन के विशिष्ट कारणों को विधिवत दर्ज किया जाना चाहिए ।

2.1.6. अधिप्राप्तिकर्ता इकाई यह सुनिश्चित करेगी कि चयनित वस्तु समस्त प्रकार से आवश्यकता को पर्याप्त रूप से पूर्ण करती है ।

2.1.7. अन्य शर्तें समान होने पर, सामान्यतः न्यूनतम दर वाली निविदा स्वीकार की जाए अन्यथा उन कारणों को सर्वथा अभिलिखित किया जाए जिनके कारण अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा न्यूनतम दर वाली निविदा अस्वीकृत की गयी है ।

2.1.8 . अधिप्राप्तिकर्ता इकाई को स्वयं का यह समाधान करना होगा कि प्रस्तावित दरें युक्तियुक्त हैं तथा गुणवत्ता के अनुरूप हैं ।

(16)

2.1.9. अधिप्राप्तिकर्ता इकाई अधिप्राप्ति के प्रत्येक स्तर पर आधिकारिक दस्तावेजों की सुरक्षित अभिरक्षा सुनिश्चित करेगी ।

2.1.10. बोलीदाता के चयन में, यदि दो या दो से अधिक बोलीदाता समान राशि उद्धृत करते हैं, तो अधिप्राप्तिकर्ता इकाई समान बोलियों हेतु इस नियमावली के अध्याय-3 एवं 4 में निर्धारित प्रक्रिया अपनायी जाएगी ।

2.1.11. एकरूपता बनाए रखने तथा कार्य की पुनरावृत्ति एवं संभावित त्रुटियों से बचने के लिए अधिप्राप्ति हेतु मानक निविदा दस्तावेजों का उपयोग किया जाना चाहिए ।

2.1.12. निविदा की वैधता, राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोलियों हेतु 90 दिनों तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोलियों हेतु 120 दिनों से अधिक नहीं होनी चाहिए । अधिप्राप्तिकर्ता / सक्षम प्राधिकारी द्वारा निविदा की मूल वैधता अवधि के भीतर अनुबंध सम्पादित कर लिया जाना चाहिए । निविदा वैधता अवधि के विस्तार को हतोत्साहित किया जाना चाहिए । केवल असाधारण परिस्थितियों में ही अधिकतम एक बार निविदा आमंत्रण प्राधिकारी से वरिष्ठ प्राधिकारी के लिखित अनुमोदन से निविदा की वैधता अवधि का विस्तार किया जा सकता है ।

2.1.13. इस नियमावली में अन्यथा उपबंधों के होते हुए भी भारत के साथ सीमा साझा करने वाले राष्ट्र/ राष्ट्रों के निविदाकर्ताओं हेतु, राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों के कारण भारत सरकार द्वारा General Financial Rule , 2017 के नियम 144(xi ) में विहित प्रावधान तथा इस संबंध में समय-समय पर जारी दिशा- निर्देशों के अन्तर्गत अध्यारोपित प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रतिबंध लागू होंगे ।

2.2 पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा, निष्पक्षता तथा स्वेच्छाचारिता का निर्मूलन

2.2.1 निविदा दस्तावेज का विषय स्वयं में पूर्ण, विशद, स्वतः स्पष्ट हो । निविदादाता द्वारा प्रभावी निविदा प्रस्तुत करने हेतु समस्त आवश्यक सूचनाएं जो निविदादाता को स्पर्धात्मक निविदा प्रस्तुत करने हेतु आवश्यक हों, सरल भाषा में स्पष्ट रूप से लिखी जाए । निविदा विषयक दस्तावेज़ों में अन्य बातों के साथ साथ निम्नलिखित बिंदु अंतर्निहित होने चाहिए: -

2.2.1.1 निविदादाताओं हेतु आवश्यक अर्हता तथा पात्रता के मापदंड जैसे न्यूनतम स्तर का अनुभव कितना है, विगत कार्यपूर्ति (परफॉरमेंस) , तकनीकी कार्यक्षमता, विनिर्माण की सुविधाएं , वित्तीय स्थिति आदि जिनका निविदादाता द्वारा पूर्ण किया जाना आवश्यक होगा ।

2.2.1.2 सामग्री हेतु अर्हताओं का मापदंड जिसमें सामग्रियों के उद्गम आदि विषयक विधिक प्रतिबंध / शर्तें दर्शाई गई हों, जिन्हें सफल निविदादाता द्वारा पूर्ण करना आवश्यक होगा ।

2.2.1.3 निविदाएं भेजने की प्रक्रिया के साथ- साथ तिथि, समय एवं स्थान ।

2.2.1.4 निविदाएं खोलने की तिथि, समय एवं स्थान ।

2.2.1.5 निविदादाता द्वारा आपूर्ति हेतु शर्तें ।

2.2.1.6 अन्य विशिष्ट शर्तें, जो कार्यपूर्ति को प्रभावित करती हों ।

(17)

2.2.1.7 निविदादाता की सुविधा के लिए निविदा दस्तावेज में इस आशय का उपयुक्त प्रावधान रखा जाए कि निविदादाता निविदा की शर्तों, प्रक्रिया तथा/ अथवा उसकी निविदा की अस्वीकृति पर प्रश्न उठा सके । (ई-अधिप्राप्ति पोर्टल से संबंधित शिकायतें राज्य सरकार के अधिप्राप्ति शिकायत समाधान पोर्टल https://pgrm.uk.gov.in/ के माध्यम से दर्ज की जा सकती हैं । )

2.2.1.8 निविदा प्रपत्रों में यह भी उल्लिखित होना चाहिए कि " यदि कोई निविदादाता शून्य शुल्क (निल चार्जेज) अंकित करता है तो उस निविदा को गैर-प्रतिक्रियाशील मानते हुए स्वीकार नहीं किया जायेगा" । मैनपावर निविदा के संदर्भ में सर्विस चार्जेज की दर, सेवाओं के मूल्य का न्यूनतम 2.50 प्रतिशत अथवा राज्य सरकार द्वारा समय- समय पर यथासंशोधित, होनी चाहिए ।

2.2.1.9 किसी निविदा के अन्य प्रासंगिक पहलुओं के अतिरिक्त , निविदा आमंत्रित करने वाले नोटिस में आवश्यक रूप से (i ) अधिप्राप्तिकर्ता इकाई का नाम एवं पता (ii ) अधिप्राप्ति की विषय वस्तु/ परियोजना का नाम, (iii ) निविदा दस्तावेज प्राप्त करने की तिथि एवं विधि, (iv) देय बयाना राशि निक्षेप (v ) बोली पूर्व सम्मेलन का विवरण, तथा (vi) निविदा प्रस्तुत करने की नियत तिथि एवं समय सम्मिलित होना चाहिए ।

2.2.1.10 परिणामी अनुबंध / संविदा से उत्पन्न होने वाले विवादों, यदि कोई हो, के निस्तारण हेतु उपयुक्त प्रावधान निविदा दस्तावेज़ में अंतर्निहित होने चाहिए ।

2.2.1.11 निविदा दस्तावेजों में यह स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए कि परिणामी अनुबंध की व्याख्या भारतीय कानूनों के अधीन की जाएगी ।

निविदादाताओं को निविदा प्रेषित करने हेतु पर्याप्त समय दिया जाएगा ।

2.2.3 निविदा को पूर्व निर्धारित दिनांक एवं स्थान पर खोला जाए । यदि निविदादाता / उनके अधिकृत प्रतिनिधि निविदा खोलते समय उपस्थित रहना चाहें, तो उपस्थित रह सकते हैं ।

2.2.4 अपेक्षित सामग्रियों की विशिष्टियों का उल्लेख , बिना किसी अस्पष्टता के, साफ- साफ किया जाए जिससे कि इच्छुक निविदादाता अर्थपूर्ण निविदाएं प्रेषित कर सकें । पर्याप्त संख्या में निविदादाताओं को आकृष्ट करने हेतु विभिन्न विशिष्टियां, जहाँ तक साध्य हों, वृहद् आधार पर होनी चाहिए । यह भी प्रयास किया जाए कि विभिन्न विशिष्टियों के मानकों का उल्लेख उसी स्वरूप में किया जाए, जो सामान्यतः उद्योग में प्रचलित हो ।

2.2.5 विशिष्टताओं में किसी विशेष ट्रेडमार्क , व्यापार नाम या ब्रांड हेतु किसी भी आवश्यकता का संकेत नहीं दिया जाना चाहिए , सिवाय इसके कि जहां सामग्रियों की अधिप्राप्ति विद्यमान वस्तुओं के अनुरूप होनी आवश्यक हो । जहां यह अपरिहार्य हो जाता है, ब्रांड नाम के साथ वाक्यांश "या समकक्ष" जोड़ दिया जायेगा । तथापि ऐसे विनिर्देशों में व्यावहारिक रूप से प्रदान किए जाने वाले उत्पादन (output ) या सेवा स्तर को विनिर्दिष्ट कर दिया जाना चाहिए (18)

2.2.6 निविदाओं के प्रतिक्रियाशील (rcsponsive ) होने का निर्धारण करने, समान मंच पर निविदाओं का मूल्यांकन करने तथा न्यूनतम निविदादाताओं को संविदा प्रदत्त (अवार्ड) करने सम्बन्धी बिंदुओं व कारकों का निविदा अभिलेखों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाये ।

2.2.7 प्राप्त निविदाओं का मूल्यांकन उन्हीं शर्तों पर किया जाए जो शर्तें पहले से निविदा दस्तावेजों में दी गई हों । कोई ऐसी नई शर्त पर, जो निविदा दस्तावेजों में सम्मिलित नहीं हों, निविदा के मूल्यांकन के समय विचार नहीं किया जाए ।

2.2.8 प्राप्त निविदाओं के प्रतिक्रियाशील ( responsive) / उपयुक्त होने का निर्धारण बिना किसी बाह्य साक्ष्य अथवा किसी मौखिक विचार विमर्श के, निविदा दस्तावेजों की अंतर्वस्तु पर ही आधारित हो । निविदा के मूल्यांकन के समय यदि निविदा समिति यह पाती है कि प्राप्त निविदाओं में से किन्हीं में ऐसे अभिलेख अपूर्ण हैं अथवा ऐसे बिन्दु / अभिलेख के संबंध में अतिरिक्त सूचना की आवश्यकता प्रतीत होती हो जोकि ऐतिहासिक प्रकृति ( historic nature) (अर्थात, निविदा खुलने से पूर्व मौजूद दस्तावेज या तथ्य, जिन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जा सकता है) का है तो ऐसे अभिलेख / सूचनायें, संबंधित निविदादाता से युक्तियुक्त समय सीमा के भीतर, जैसा कि समिति अवधारित करे, प्राप्त की जा सकती हैं । यदि इस प्रकार निर्धारित समय- सीमा के भीतर वांछित अभिलेख / सूचना संबंधित निविदादाता द्वारा उपलब्ध नहीं करायी जाती है तो निविदा समिति उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर निर्णय ले सकती है ।

2.2.9 निविदाओं की प्राप्ति हेतु निर्धारित दिनांक एवं समय के पश्चात निविदादाता को निविदाओं में किसी भी प्रकार के परिवर्तन या संशोधन की अनुमति नहीं होगी ।

2.2.10 निविदा खुलने के बाद सामान्यतः निविदादाताओं के साथ किसी भी प्रकार के परक्रामण ( negotiation ) की अनुमति नहीं है । परन्तु अपरिहार्य स्थितियों में, इसे 'न्यूनतम दर देने वाले निविदादाता' ( L1 ) के साथ इस शर्त पर किया जा सकता है कि परक्रामण ( negotiation ) के कारणों को अभिलिखित किया जाये ।

यदि अधिप्राप्ति GeM पोर्टल अथवा राज्य के ई - निविदा पोर्टल पर निविदा सह रिवर्स नीलामी के माध्यम से की जा रही हो तो संबंधित पोर्टल में निर्धारित प्रक्रियानुरूप परक्रामण (negotiation) संबंधी कार्यवाही सक्षम प्राधिकारी / अधिप्राप्तिकर्ता प्राधिकारी की स्वीकृति उपरांत की जा सकती है ।'

2.2.11 शासन की विशिष्ट अनुज्ञा से दर संविदा प्रणाली के अंतर्गत जहाँ एक ही सामग्री हेतु अनेक फर्मों से दर अनुबंध किया गया हो, वहाँ परक्रामण (negotiation ) तथा निविदादाताओं को दरों के प्रत्ति प्रस्ताव (counter offer ) प्रस्तुत करने की अनुमति दी जा सकती है ।

2.2.12 संविदा सामान्यतः न्यूनतम दर प्रस्तुत करने वाले ऐसे निविदादाता को प्रदत्त (अवार्ड) की जाए जो निविदा से संबंधित दस्तावेजों में निहित सभी शर्तों तथा प्रतिबंधों के अधीन संविदा को संतोषजनक रूप से पालन करने हेतु अर्ह , पात्र तथा योग्य हो । फिर भी जहाँ न्यूनतम ( 19)

स्वीकृत निविदादाता सामग्री की पूर्ण मात्रा को आपूर्ति करने की स्थिति में न हो तो शेष सामग्री की मात्रा, जहाँ तक संभव हो , उससे ठीक उच्च दर वाले पात्र निविदादाता को आपूर्ति आदेश देकर न्यूनतम निविदा दरों पर की जा सकती है ।

2.2.13 सफल निविदादाता एवं संविदा राशि विषयक सूचना का उल्लेख अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के 10 दिनों की अवधि के भीतर ई- अधिप्राप्ति पोर्टल (www.uktenders.gov.in) /विभागीय वेबसाइट / नोटिस बोर्ड / बुलेटिन में किया जाना चाहिए ।

2.2.14 निविदाओं में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा का मूल्यांकन व उनका स्वीकार किया जाना निम्न प्रतिबंधों के अधीन रहेगा-

2.2.14.1 यदि केवल एक ही निविदा प्राप्त होती है तो प्राप्त निविदा को निरस्त करते हुए निविदा शर्तों की विशिष्टियों का पुनर्परीक्षण करते हुए पुनः निविदा आमंत्रित की जाए । स्पष्टीकरण- एक से अधिक निविदाएं प्राप्त होने पर भी यदि तकनीकी बिड मूल्यांकन में एक ही निविदा अर्ह पाई जाती है तो उसे एक प्रतिक्रिया ( single response ) /निविदा माना जाए तथा पुनः निविदा आमंत्रित की जाए ।

2.2.14.2 यदि पुनः एक निविदा प्राप्त होती है तो उस पर निम्न प्रतिबंधों के अधीन विचार किया जा सकता है :-

i . निविदा का पर्याप्त प्रचार- प्रसार किया गया हो तथा निविदा प्रस्ताव देने हेतु पर्याप्त समय उपलब्ध कराया गया हो ।

ii . निविदा की शर्तें / विशिष्टियां अनावश्यक रूप से प्रतिबंधात्मक (restrictive) न रही हो ।

iii . अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा प्राप्त दरें बाजार भाव की तुलना में उचित हों ।

2.2.15 बिना कोई कारण अभिलिखित किए कोई एक अथवा समस्त निविदाएं अस्वीकृत नहीं की जानी चाहिए । समस्त निविदाओं की अस्वीकृति यथोचित है जब-

2.2.15.1 प्रभावी प्रतिस्पर्धा का अभाव हो (प्रस्तर 2.2.14 के अधीन रहते हुए) , या

2.2.15.2 प्राप्त सभी निविदायें निविदा की आवश्यकताओं के अनुसार पर्याप्त रूप से प्रतिक्रियाशील (responsive ) न हों, या

2.2.15.3 प्राप्त निविदायें अद्यतन अनुमानित लागत अथवा उपलब्ध बजट से काफी अधिक हों, या 2.2.15.4 कोई भी निविदा न्यूनतम तकनीकी अर्हता अंक प्राप्त न करती है , या

2.2.15.5 ई- निविदा पोर्टल पर तकनीकी समस्याओं के कारण , या

2.2.15.6 अन्य कारण , जिसे निविदाकर्ता अधिकारी / सक्षम प्राधिकारी द्वारा अभिलिखित किया जाए ।

( 20)

2.3 लोक अधिप्राप्ति हेतु सत्यनिष्ठा संहिता

किसी अधिप्राप्तिकर्ता इकाई का कोई भी अधिकारी या कर्मचारी या अधिप्राप्ति प्रक्रिया में प्रतिभाग करने वाला निविदादाता निम्नलिखित सत्यनिष्ठा संहिता के उल्लंघन में कोई कार्य नहीं करेगा ।

2.3.1 निषेधः

i. भ्रष्ट आचरण अधिप्राप्ति प्रक्रिया में अनुचित लाभ के आदान-प्रदान हेतु प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी उपकार , रिश्वत , इनाम , या उपहार, या किसी भी तात्विक लाभ का प्रस्ताव करना, याचना करना या स्वीकार करना अथवा अधिप्राप्ति प्रक्रिया या दूसरे पक्ष की कार्यवाही को अन्यथा प्रभावित करना सम्मिलित है;

ii. कपटपूर्ण आचरण - कोई भी विलोपन ( omission ) , जिसमें मिथ्या प्रस्तुति ( misrepresentation ) भी सम्मिलित है जो वित्तीय या अन्य लाभ प्राप्त करने या किसी बाध्यता से बचने हेतु गुमराह (mislead) करता है या गुमराह करने का प्रयत्न करता है । इसमें किसी निविदा प्रक्रिया में भाग लेने या किसी संविदा को सुरक्षित करने या संविदा के निष्पादन में झूठी घोषणा करना या गलत जानकारी प्रदान करना सम्मिलित है;

iii . प्रतिस्पर्धा-विरोधी व्यवहार- अधिप्रप्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता , निष्पक्षता और प्रगति का हास करने हेतु कोई भी दुरभिसंधि ( collusion) , बोली छल (bid rigging ) या प्रतिस्पर्धा- विरोधी व्यवहार;

iv. प्रतिरोधी आचरण (coercive practice ) - अधिप्राप्ति प्रक्रिया में उनकी सहभागिता को प्रभावित करने या संविदा के निष्पादन को प्रभावित करने हेतु किसी पक्षकार का या उसकी संपत्ति का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से , हास या हानि या ऐसा करने की धमकी देना (threatening ) ;

V. हितों का टकराव - किसी निविदाकर्ता फर्म या उसके किसी सहयोगी द्वारा सहभागिता जो या तो उस परामर्श अनुबंध में शामिल है जिससे यह अधिप्राप्ति सम्बद्ध है ; या यदि वे अधिप्राप्ति में एक से अधिक बोली का हिस्सा हैं ; या यदि निविदाकर्ता फर्म या उनके कर्मियों के अधिप्राप्ति इकाई के किसी भी अधिकारी के साथ संबंध या वित्तीय या व्यावसायिक संव्यवहार हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निविदा या संविदा की निष्पादन प्रक्रिया से संबंधित हैं; या अधिप्राप्ति प्रक्रिया में अनुचित लाभ या व्यक्तिगत लाभ के आशय से अधिप्राप्तिकर्ता इकाई तथा (संभावित) बोलीदाता द्वारा साझा की गयी सूचना का अनुचित उपयोग ;

vi . अवरोधक आचरण उपरोक्त उल्लिखित निषिद्ध आचरणों में से एक या अधिक आरोपों में अधिप्राप्तिकर्ता इकाई की जांच को जानबूझकर नष्ट करने , मिथ्या ठहराने, परिवर्तन करके भौतिक रूप से बाधित करना; या जांच से संबंधित साक्ष्यों को छिपाकर ; या जांचकर्ताओं को मिथ्या कथन द्वारा और / या किसी भी पक्ष को जांच से संबंधित मामलों के सम्बन्ध में अपनी जानकारी का प्रकटीकरण करने या अग्रिम जांच को अवरुद्ध करने हेतु भयभीत करना; या अधिप्राप्तिकर्ता इकाई के लेखा परीक्षा या अन्वेषण के अधिकारों में प्रतिषेध;

(21)

2.3.2 सक्रिय ( Proactive ) प्रकटीकरण की बाध्यताः

निम्नलिखित दृष्टांतों के प्रकटन में विफलता, इस सत्यनिष्ठा संहिता का उल्लंघन मानी जाएगीः i. अधिप्राप्ति प्राधिकारियों के साथ - साथ निविदा प्रक्रिया में भाग लेने वाले समस्त निविदादाता, आपूर्तिकर्ता, संविदाकार एवं परामर्शदातां लोक अधिप्राप्ति हेतु सत्यनिष्ठा संहिता के अंतर्गत किसी अधिप्राप्ति प्रक्रिया या संविदा के निष्पादन में हितों के किसी भी टकराव की स्वतः घोषणा करने हेतु उत्तरदायी होंगे ।

ii . निविदा प्रक्रिया के प्रारम्भ से पूर्व के 02 वर्षों के दौरान उत्तराखण्ड अथवा किसी भी अन्य राज्य या किसी अन्य देश में किसी भी अधिप्राप्तिकर्ता इकाई के साथ किसी पूर्ववर्ती नियम भंग करने के सम्बन्ध में या किसी अन्य अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा निविदा प्रक्रिया में भाग लेने से रोके जाने (debar ) के सम्बन्ध में चाहे पूछा गया हो या नहीं, प्रकटन करना होगा ।

iii . घोषित प्रकटीकरणों का मूल्यांकन किया जाएगा तथा युक्तियुक्त निर्णय अधिप्राप्तिकर्ता/ सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिया जाएगा ।

2.3.3 दण्डात्मक कार्यवाहीः

अधिप्राप्तिकर्ता इकाई सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करने के पश्चात , यह निष्कर्ष निकालती है कि निविदादाता या संभावित निविदादाताओं ने सत्यनिष्ठा संहिता का उल्लंघन किया है, तो उस दशा में निम्नलिखित सहित समुचित कार्यवाही कर सकती है:-

2.3.3.1 यदि निविदाएँ विचाराधीन हैं-

i . निविदा प्रतिभूति राशि को जब्त करना ( forfeiture) ;

ii . किसी भी संविदा - पूर्व वार्ता को रद्द करना; तथा

iii . अधिप्राप्ति प्रक्रिया से बोलीदाता की अस्वीकृति एवं विवर्जन (rejection & exclusion ) ।

2.3.3.2 यदि कोई संविदा पूर्व में ही प्रदत्त की जा चुकी है-

i. अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा सुसंगत संविदा का रद्दकरण तथा उपगत हानि हेतु प्रतिकर की वसूली;

ii . अधिप्राप्ति से सम्बंधित किसी अन्य प्रतिभूति या संविदा को जब्त करना ( forfeiture) ;

अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा किए गए अग्रिम भुगतान, यदि कोई हो , सहित प्रचलित दर पर ब्याज सहित संदाय की वसूली

2.3.3.3 उपरोक्त के अतिरिक्त अधिप्राप्ति इकाई की आगामी अधिप्राप्तियों में निविदादाता को पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं की सूची से हटाना तथा अधिकतम आगामी 02 वर्ष की अवधि हेतु प्रतिभाग करने पर रोक लगाना ।

(22)

2.4 आवश्यकता मूल्यांकन एवं अधिप्राप्ति नियोजन

समस्त विभागों को भविष्य में सामग्रियों, सेवाओं एवं कार्यों की आवश्यकता का पूर्वानुमान लगाने हेतु वार्षिक आधार पर अधिप्राप्ति योजना तैयार करनी चाहिए और अपनी वेबसाईट पर इसे प्रदर्शित करना चाहिए ।

2.4.1 समस्त अधिप्राप्तियाँ निम्नानुसार, आधार स्थापित करने के पश्चात् आरम्भ की जाएंगीः i. अधिप्राप्ति की विषय वस्तु या कार्य क्षेत्र एवं मात्रा का निर्धारण;

ii. अधिप्राप्ति की अनुमानित लागत का निर्धारण,

यह सुनिश्चित करना कि कतिपय व्यक्तियों या संगठनों को लाभ पहुंचाने के आशय से आवश्यकता न तो कृत्रिम रूप से सृजित की गई है एवं न ही अतिशयोक्तिपूर्ण हो;

iv. पारदर्शिता सुनिश्चित करना तथा केवल कुछ ही व्यक्तियों या संगठनों के साथ आवश्यकता हेतु विशिष्टियां/ समाधान निर्धारित करने के लिए वार्ता न करना , जिससे उन्हें आंतरिक सूचना तक पहुंच के माध्यम से अनुचित लाभ प्राप्त हो जो अन्य को विलम्ब से सूचित हो या प्रकट नहीं की गई हो;

V. नियम 2.5 के संदर्भ में निविदादाताओं की सहभागिता पर सीमा, यदि कोई लागू हो, तथा उसका औचित्य; तथा

vi. कोई अन्य मामला जो निर्धारित जाय ।

2.4.2 अधिप्राप्तिकर्ता इकाई उपनियम 2.4.3 (ii) के अंतर्गत अधिप्राप्ति की आवश्यकता के निर्धारण से संबंधित दस्तावेजों को अनुरक्षित रखेगी ।

अधिप्राप्ति नियोजन

2.4.3

i. प्रत्येक अधिप्राप्तिकर्ता इकाई को एक वित्तीय वर्ष हेतु वार्षिक बजटीय आवंटन के अपने प्रस्ताव के साथ एक अधिप्राप्ति योजना तैयार करनी होगी तथा योजना को उसके अनुमोदित वार्षिक बजट आवंटन के अनुसार अद्यतन किया जाएगा । विभागाध्यक्ष द्वारा अद्यतित वार्षिक अधिप्राप्ति प्लान 30 अप्रैल तक तैयार कर प्रशासकीय विभाग को उपलब्ध कराया जाएगा । अनुपूरक बजट इत्यादि के संदर्भ इस प्लान को तद्नुरूप समय- समय पर अद्यतन किया जाएगा ।

ii . अधिप्राप्ति योजना, इसके अद्यतन सहित, निम्नलिखित बिंदु निर्धारित करेगीः- क. सामग्रियों, कार्यों एवं/ या सेवाओं का संक्षिप्त विवरण जिनके लिए अधिप्राप्ति कार्यवाही संबंधित वित्तीय वर्ष के दौरान सम्पादित होनी है;

ख. इस नियमावली के अनुसार अधिप्राप्ति की प्रस्तावित विधियाँ;

ग. नियम 2.5 के अनुसार प्राथमिकता का कोई प्रावधान,

घ. प्रमुख अधिप्राप्ति गतिविधियों हेतु समय - सूची; तथा ( 23 )

ड़. अन्य कोई सूचना ।

2.5 निविदादाताओं की सहभागिता

2.5.1 अधिप्राप्तिकर्ता इकाई सिवाय इसके कि जब इस नियमावली या इसके अंतर्गत बनाए गए दिशानिर्देशों या तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि के उपबंधों द्वारा ऐसा करने हेतु अधिकृत या अपेक्षित हो, अधिप्राप्ति प्रक्रिया में निविदादाताओं की सहभागिता को सीमित करने के उद्देश्य से ऐसी कोई आवश्यकता / विशिष्टता स्थापित नहीं करेगी जो निविदादाताओं के मध्य या उसकी किसी भी श्रेणी के विरुद्ध विभेद करती हो ।

2.5.2 क्रय / मूल्य वरीयता

राज्य सरकार इस निमित्त पूर्व से लागू व्यवस्थाओं के अतिरिक्त अधिसूचना द्वारा निविदादाताओं के किसी वर्ग ( category ) से अधिप्राप्ति के किसी भी विषय वस्तु की अनिवार्य अधिप्राप्ति हेतु तथा निविदादाताओं के किसी वर्ग से अधिप्राप्ति में क्रय या मूल्य वरीयता हेतु निम्नलिखित आधारों पर उपबंध कर सकती है-

i. घरेलू उद्योग की अभिवृद्धि;

ii . केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीति;

iii . केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार की सम्यक रूप से अधिसूचित नीति को अग्रसर करने में लोकहित के निमित्त;

परन्तु ऐसी किसी भी अधिसूचना में ऐसी अनिवार्य या अधिमानी अधिप्राप्ति, चयनित आपूर्तिकर्ताओं के वर्ग (category) तथा उपबंधित अधिमान की प्रकृति का युक्तियुक्त औचित्य अंतर्विष्ट होगा ।

राज्य के भौगोलिक क्षेत्र के सीमान्तर्गत स्थापित एवं विनिर्मित ( Manufactuer) करने वाले सूक्ष्म व लघु उद्यमों ( कुटीर, खादी, हथकरघा, हस्तशिल्प तथा स्टार्टप्स सहित) द्वारा उत्पादित उत्पादों और प्रदत्त सेवाओं को शासकीय अधिप्राप्ति में क्रय वरीयता तथा मेक इन इण्डिया को प्राथमिकता दिये जाने संबंधी प्रावधान अनुलग्नक-1 में दिये गये हैं । सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को अनुमन्य छूट केवल तभी प्रदान की जाएंगी जब ऐसे उद्यमों का पंजीकरण उस श्रेणी में हो जो समनुदेशित कार्य हेतु प्रासंगिक हो । सह उद्यम निविदादाताओं (JV) के प्रकरण में छूट अनुमन्य नहीं होगी ।

2.5.3 इस नियम में किसी भी बात का अर्थ, राज्य सरकार या किसी भी अधिप्राप्तिकर्ता इकाई को निम्नलिखित कारणों से प्रतिभागिता को सीमित करने के उपाय अधिरोपित करने या प्रर्वतन करने से रोकने के रूप में नहीं लगाया जाएगाः-

i. सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार या सुरक्षा;

ii. मानव, पशु या वनस्पति जीवन या उनका स्वास्थ्य;

बौद्धिक सम्पदा;

(24)

iv. भारत की आवश्यक सुरक्षा एवं सामरिक हित ।

2.5.4 अधिप्राप्तिकर्ता इकाई, अधिप्राप्ति प्रक्रिया में निविदादाताओं की सहभागिता को आमंत्रित करते समय, यह घोषणा करेगी कि क्या निविदादाताओं को नियम 2.5.2 के अंतर्गत किसी प्रकार की कय/ मूल्य वरीयता दी जाएगी अथवा नियम 2.5.3 के अंतर्गत किसी वर्ग (category) को निविदा हेतु सीमित किया जाएगा ।

2.5.5 पात्रता शर्तेंः

2.5.5.1 प्रत्येक अधिप्राप्ति हेतु निविदादाताओं की पात्रता का मूल्यांकन करने के लिए अधिप्राप्तिकर्ता इकाई निविदा दस्तावेज में प्रासंगिक शर्तों को सम्मिलित कर सकती है । निविदादाताओं की पात्रता का मूल्यांकन निम्नलिखित मापदंडों के आधार पर किया जा सकता है:

i. समान संविदाओं के क्रियान्वयन में प्रासंगिक अनुभव एवं विगत कार्यपूर्ति इस हेतु समान प्रकृति के कार्यों / सेवाओं को निविदा दस्तावेज में स्पष्ट रुप से उल्लिखित किया जाना चाहिए ।

ii. तकनीकी क्षमताः यथास्थिति, कर्मियों, सामग्रियों एवं उपकरणों के विनिर्माण एवं आपूर्ति, निर्माण के कार्य तथा इसके परिचालन एवं अनुरक्षण के संबंध में निविदादाता की क्षमताएं ।

वित्तीय क्षमताः अधिप्राप्ति विशिष्ट की आवश्यकता के आधार पर, निविदा दस्तावेजों में टर्नओवर (turnover ) तथा / या शुद्ध संपत्ति ( net worth) मानदंड , तरल परिसम्पत्तियों ( liquid assests) , ऋण चुकाने की क्षमता (solvency) आदि के लिए दिशानिर्देश सम्मिलित होंगे ।

2.5.5.2 अधिप्राप्तिकर्ता इकाई पारदर्शिता एवं सत्यनिष्ठा संहिता का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु, अधिप्राप्ति प्रक्रिया में प्रतिभाग करने हेतु निविदादाताओं के लिए उचित पात्रता शर्तों का निर्धारण कर सकती है, जोकि पूर्व योग्यता मानदंड (pre qualification criteria) में निर्धारित किसी भी तकनीकी या वित्तीय योग्यता मानदंड से भिन्न हो सकती हैं । यथा- क. उनके पास अधिप्राप्ति विषयक संविदा करने हेतु समुचित विधिक हैसियत हो, ख. वे देयताधीन ( receivership ) , दिवालिया न हो या उनके कारोबार का समापन न किया गया हो अथवा किसी न्यायालय या न्यायिक अधिकारी की निगरानी में न किया जा रहा हो, निलम्बन की स्थिति में न हो या इनमें से किसी भी प्रकरण में उन पर विधिक वाद न चल रहा हो ,

ग. वे करों तथा सामाजिक सुरक्षा के दायित्व अंशदानों की देयता को पूर्ण करते हों, ( 25 )

घ. वे अधिप्राप्ति प्रक्रिया के प्रारम्भ के पूर्ववर्ती तीन वर्ष की किसी कालावधि के भीतर अपने वृत्तिक आचरण या कोई अधिप्राप्ति संविदा किये जाने हेतु अपनी अर्हताओं के सम्बन्ध में मिथ्या कथन करने या दुर्व्यपदेशन (misrepresentation ) सम्बन्धी किसी दांडिक अपराध के सम्बन्ध में न तो स्वयं , और न उनके निदेशक और अधिकारी दोषसिद्ध हुए हों, या विवर्जन (debarment) कार्यवाहियों के अनुसरण में अन्यथा निरर्हित (disqualified) हुए हों;

ड़. ऐसे हित, जो पूर्व-अर्हता के दस्तावेजों, निविदादाता पंजीकरण दस्तावेजों या निविदा दस्तावेजों में विहित और विनिर्दिष्ट किये जायें , के प्रति किसी ऐसे हितों के विरूद्ध नहीं हो , जो उचित प्रतियोगिता को तात्विक रूप में प्रभावित करें ।

च. कोई भी अन्य अहर्ताएं , जो विहित की जाएं ।

2.6 निविदा-पूर्व सम्मेलन

i . अधिप्राप्ति प्रक्रिया के दौरान , निविदादाता निविदा प्रस्तुत करने की अंतिम दिनांक से युक्तियुक्त समय पूर्व निविदा दस्तावेज के नियमों एवं शर्तों के सम्बन्ध में अधिप्राप्तिकर्ता इकाई से स्पष्टीकरण का अनुरोध कर सकता है । ऐसे किसी भी अनुरोध के क्रम में अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा आवश्यक स्पष्टीकरण युक्तियुक्त समय के भीतर ई - अधिप्राप्ति पोर्टल (www.uktenders.gov.in) पर प्रकाशित किया जाएगा । इसके अतिरिक्त , इसे विभागीय वेबसाइट पर भी प्रकाशित किया जा सकता है तथा समस्त संभावित निविदादाताओं को प्रेषित किया जा सकता है ।

ii . अधिक मूल्य अथवा जटिल प्रकृति के समस्त कार्यों हेतु एक निविदा पूर्व बैठक (pre bid meeting ) की व्यवस्था निविदा प्रपत्र में रखी जायेगी । यदि अधिप्राप्तिकर्ता इकाई संभावित निविदादाताओं का सम्मलेन आयोजित करती है , तो उन्हें पूर्व लिखित प्रश्न प्रस्तुत करने के लिए कहा जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त , अधिप्राप्तिकर्ता इकाई ऐसी बैठक के कार्यवृत तैयार करेगी जिसमें सक्षम प्राधिकारी द्वारा तैयार एवं अनुमोदित प्रश्नों एवं प्रत्युत्तरों को सम्मिलित किया जाएगा, जिसमें निविदादाताओं को निविदा शर्तों पर स्पष्टीकरण प्रदान किया जाएगा । कार्यवृत्त ई - अधिप्राप्ति पोर्टल (www.uktenders.gov.in) पर प्रकाशित किए जाएंगे । इसके अतिरिक्त, इसे विभागीय .वेबसाइट पर भी प्रकाशित किया जा सकता है ।

iii . निविदा प्रस्तुत करने के लिए अन्तिम दिनांक से पूर्व किसी भी समय , अधिप्राप्तिकर्ता इकाई किसी कारण से चाहे स्वप्रेरणा पर या निविदादाता के द्वारा स्पष्टीकरण हेतु किसी अनुरोध के परिणामस्वरूप, अनुपूरक सूचना (addendum) जारी करके निविदा दस्तावेजों को उपान्तरित कर सकेगी । ऐसी स्थिति में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ( 26)

अनुपूरक सूचना (addendum ) / शुद्धिपत्र (corrigendum) जारी होने के पश्चात् निविदादाताओं को निविदा तैयार / जमा करने हेतु पर्याप्त समय मिल सके ।

2.7 गवर्नमेन्ट ई -मार्केट प्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन क्रय

i. जो वस्तुयें एवं सेवाएँ गवर्नमेन्ट ई- मार्केट प्लेस (GeM) पोर्टल पर उपलब्ध हैं, अनिवार्य रूप से GeM पोर्टल के माध्यम से क्रय किया जाएगा, तथापि रु 50,000 /-(रू ० पचास हजार मात्र) मूल्य तक की सामग्री एवं सेवाओं की अधिप्राप्ति GeM पोर्टल से अथवा इस नियमावली के सुसंगत नियमों के अधीन किए जाने का विकल्प क्रयकर्ता अधिकारी के पास होगा ।

ii . यदि कोई सामग्री एवं सेवायें GeM पर उपलब्ध नहीं हैं तो उनकी अधिप्राप्ति संबंधी कार्यवाही इस नियमावली के उपबंधों के अंतर्गत सम्पादित की जाए ।

क्रय विभाग से यह अपेक्षा की जाती है कि इस हेतु GeM पोर्टल पर उपलब्ध बिजनेस एनालिटिक्स टूल का उपयोग करके क्रय की जाने वाली सामग्री एवं सेवाओं की दरों की युक्तियुक्तता सुनिश्चित की जाएगी ।

iv. GeM पोर्टल पर सामग्री क्रय की जाने वाली प्रक्रिया भारत सरकार के सामान्य वित्तीय नियम, 2017 (समय- समय पर यथासंशोधित ) के अनुसार होगी ।

2.8 इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली के माध्यम से ई-अधिप्राप्ति

2.8.1 इलेक्ट्रॉनिक अधिप्राप्ति अथवा ई- अधिप्राप्ति का तात्पर्य वस्तुओं, सेवाओं तथा कार्यों की अधिप्राप्ति से संबंधित सम्पूर्ण निविदा प्रक्रिया, संविदा गठन तथा संविदा प्रबंधन को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया जाना है, जोकि सूचनाओं के सुरक्षित आदान-प्रदान, अभिलेखों की प्रामाणिकता तथा सभी प्रकार की कार्यवाही को सम्प्रेक्षा हेतु उपलब्ध रखने में सहायक होती है ।

2.8.2 निम्नलिखित के संबंध में शासकीय ई-अधिप्राप्ति पोर्टल (www.uktenders.gov.in ) का उपयोग करके इलेक्ट्रॉनिक अधिप्राप्ति पद्धति का पालन करना समस्त अधिप्राप्तिकर्ता इकाइयों हेतु अनिवार्य होगा-

i. रु. 5,00,000 (पांच लाख रुपये) से अधिक मूल्य की समस्त सामग्रियों तथा सेवाओं की अधिप्राप्ति ।

ii . रु. 25,00,000 (पच्चीस लाख रुपये) से अधिक मूल्य के समस्त निर्माण कार्यों की अधिप्राप्ति ।

2.8.3 ई - अधिप्राप्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रक्रिया का अनुपालन किया जाएगा-

i. संभावित निविदादाता तथा कार्यदायी संस्था के मध्य निविदा प्रकाशन से निविदा निस्तारण तक किसी भी पत्र, फैक्स अथवा अन्य लिखित अभिलेख / सूचनाओं का आदान - प्रदान इलेक्ट्रॉनिक ( 27 )

माध्यमों से ही होगा । संभावित निविदादाता एवं कार्यदायी संस्था के मध्य दूरभाष से सूचना का आदान- प्रदान वर्जित होगा ।

ii . निविदा जांच समिति/ प्राधिकारी निर्धारित दिनांक एवं समय पर ही दिए गए लॉग- इन/ पासवर्ड का प्रयोग कर तकनीकी निविदा खोल पायेंगे , जिससे निर्धारित दिनांक व समय से पूर्व में इसका विवरण अनाधिकृत व्यक्ति देख न सकें ।

अधिप्राप्तिकर्ता इकाई यह सुनिश्चित करेगी कि निविदा प्राप्त करने के उपरांत निविदा खोलने की प्रक्रिया निविदा जांच समिति अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिकृत न्यूनतम दो व्यक्तियों द्वारा संचालित की जाएगी ।

iv. निविदादाता निविदा प्रक्रिया के अंतर्गत निविदा प्राप्ति की अंतिम समयसीमा के भीतर अपनी निविदा / प्रस्ताव में परिवर्तन, पूर्व प्रेषित निविदा/ प्रस्ताव की वापसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से कर सकेंगे ।

V. लोक अधिप्राप्ति पोर्टल पर प्राप्त तकनीकी एवं वित्तीय निविदाओं के मूल्यांकन के आधार पर ही अंतिम रूप से आपूर्ति करने वाले निविदादाताओं का चयन किया जाएगा ।

vi . ई-अधिप्राप्ति के अंतर्गत निविदा प्राप्ति की कार्यवाही उत्तराखण्ड राज्य के लोक अधिप्राप्ति पोर्टल (www.uktenders.gov.in) से विहित प्रक्रिया के अनुसार की जाएगी । अधिप्राप्ति पोर्टल के माध्यम से केवल ऑनलाइन निविदाएं ही प्राप्त की जाएगी । किसी भी दशा में हार्ड कॉपी मान्य नहीं होगी ।

2.9 मानक निविदा दस्तावेज

2.9.1 समस्त अधिप्रप्तियाँ सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित मानक निविदा दस्तावेजों का उपयोग करके की जाएंगी ।

2.9.2 एकरूपता सुनिश्चित करने हेतु मानक निविदा दस्तावेजों में निर्धारित शर्तों को अपरिवर्तित रखा जाना चाहिए । अधिप्राप्ति विशेष की विशिष्ट आवश्यकता के अनुरूप कोई भी संशोधन निविदादाताओं हेतु निर्देशों या अनुबंध की विशेष शर्तों के परिशिष्ट के रूप में अलग से किया जाना चाहिए । निविदा दस्तावेजों को जारी करने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदन प्राप्त किया जाना चाहिए ।

2.9.3 निविदा दस्तावेज़ बिना किसी अस्पष्टता के स्व- निहित (self contained) एवं व्यापक (comprehensive) होने चाहिए । निविदादाता को अनुक्रियात्मक निविदा ( responsive bid) प्रस्तुत करने हेतु आवश्यक सभी सूचनाएं सरल भाषा में स्पष्ट रूप से लिखी जाएं ।

2.10 निविदा प्रस्तुत करने हेतु न्यूनतम समयावधि व निविदा प्रक्रिया समय-सारणी

2.10.1 निविदादाताओं को निविदा प्रेषित करने हेतु पर्याप्त समय दिया जाए । सामान्यतः , निविदा प्रस्तुत करने के लिए न्यूनतम समय , निविदा सूचना के प्रकाशन की दिनांक से अथवा निविदा (28)

दस्तावेजों के बिक्री के लिए उपलब्ध होने की दिनांक, इनमें से जो भी बाद में हो, से न्यूनतम 14 दिन दिया जाए । यदि विभाग विदेशों से भी निविदायें प्राप्त करने की अपेक्षा करता है तो देशी और विदेशी दोनों निविदाओं के लिए न्यूनतम अवधि 21 दिन होगी । असाधारण /अपरिहार्य परिस्थितियों में , यह अवधि निविदा आमंत्रण प्राधिकारी से वरिष्ठ प्राधिकारी की पूर्व लिखित स्वीकृति के साथ लघुतर अवधि हेतु हो सकती है ।

2.10.2 निविदा जारी होने की दिनांक से लेकर अनुबंध निर्गत होने की दिनांक तक अधिप्राप्ति चक्र की एक सम्पूर्ण समय- सारणी, निविदा जारी होने पर बोली दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से उल्लिखित होनी चाहिए । समय - सारणी में विभिन्न चरणों हेतु अधिकतम समयावधि सामान्यतः निम्नानुसार रखी जाए और इसमें किसी भी प्रकार के विचलन को कारण सहित अभिलिखित किया जाए-

विवरण

क. सं.

राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी निविदा National Competitive Bidding

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी निविदा International Competitive Biding

T

T

1. निविदा प्रकाशन की दिनांक

T+ 1

T+1

2. प्रलेख डाउनलोड करने की दिनांक

T+2

T+ 2

3. पृच्छा प्रारम्भ करने की दिनांक (Clarification Start Date)

T+13

T+13

4. पृच्छा समाप्ति की अंतिम दिनांक (Clarification end Date)

T+14

T+ 14

5. निविदा पूर्व बैठक की दिनांक

T+21

T+21

6. पृच्छाओं का उत्तर

T+21

T+ 21

7. निविदा जमा करने की प्रारम्भिक दिनांक

T+35

T+42

8. निविदा जमा करने की अंतिम दिनांक

T+36

T+43

9. निविदा खोलने की दिनांक

T+52

T+59

10. निविदा मूल्यांकन समाप्ति की दिनांक (तकनीकी और वित्तीय)

T+80

T+87

11. कार्य आवंटन

T+90

T+97

12. ई- पोर्टल में कार्य आवंटन अनुबंध का प्रकाशन

2.11 निविदा संवीक्षा (Scrutiny) समिति

सामग्रियों, निर्माण कार्यों एवं सेवाओं की अधिप्राप्ति के सम्बन्ध में, अधिप्राप्तिकर्ता इकाई निविदाओं के मूल्यांकन के उद्देश्य से निविदा संवीक्षा समिति का गठन करेगी ; जिसमें अधिप्राप्ति विशेषज्ञ के रूप में विभाग में वित्त सेवा सवंर्ग, सहायक लेखाधिकारी संवर्ग अथवा लेखा परीक्षा सेवा संवर्ग के वरिष्ठतम अधिकारी को और इन सेवा संवर्गों के अधिकारी उपलब्ध न होने की स्थिति में उसके (29 )

प्रतिनिधि के रुप में एक ऐसा अधिकारी , जिसने अधिप्राप्ति नियमों में प्रशिक्षण प्राप्त किया हो, को सम्मिलित किया जायेगा । इसके अतिरिक्त विषय वस्तु विशेषज्ञ तथा अन्य ऐसे उपयुक्त अधिकारी सम्मिलित होंगे , जैसा कि अधिप्राप्तिकर्ता इकाई उचित समझे । निविदा संवीक्षा समिति द्वारा निविदाएं खोलने , प्रारंभिक जांच तथा प्राप्त निविदाओं के विस्तृत मूल्यांकन का अनुश्रवण किया जायेगा एवं अधिप्राप्तिकर्ता इकाई के विचारार्थ निविदा मूल्यांकन आख्या तैयार की जाएगी।

एकल स्रोत से अधिप्राप्ति की स्थिति में उक्त समिति "अधिप्राप्ति समिति" के रूप में कार्य करेगी, जिसकी संस्तुतियों के अनुरूप अधिप्राप्तिकर्ता अधिकारी द्वारा निर्णय लिया जायेगा ।

2.12 निविदा खोलने की प्रक्रिया

निविदा खोले जाने हेतु निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाएगी-

i. प्राप्त सभी निविदाएं अभिलिखित की जाएंगी , किन्तु विलम्ब से प्राप्त निविदाओं पर अग्रेत्तर कोई विचार नहीं किया जाएगा ।

ii. समय पर प्राप्त समस्त निविदाओं में यह तथ्य कि 'निविदा प्रतिभूति अथवा धरोहर राशि तथा अन्य दस्तावेज' मैनुअली अथवा ई - मोड से, जैसा भी निविदा दस्तावेज में प्रावधान किया गया हो , जमा किए गए हैं अथवा नहीं' अभिलिखित किया जाएगा ।

निर्धारित समयान्तर्गत प्राप्त निविदाओं को खोला जाएगा और इसके कार्यवृत्त को अभिलिखित किया जाएगा ।

iv. तकनीकी मूल्यांकन का सार यथाशीघ्र ई -अधिप्राप्ति पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा ।

2.13 प्रतिक्रियाशील (Responsive) बोली का निर्धारण

2.13.1 प्रतिक्रियाशीलता (responsiveness ) का निर्धारण

i. निविदा संवीक्षा समिति द्वारा किसी निविदा की प्रतिक्रियाशीलता का निर्धारण निविदा प्रपत्र में अंकित शर्तों /प्रावधानों पर आधारित होना चाहिए । कोई प्रतिक्रियाशील निविदा वह है जो बिना किसी सारवान् विचलन, रोक या लोप (omission) के निविदा दस्तावेजों की अपेक्षाओं की पूर्ति करती है । यहां-

क. "विचलन " निविदा दस्तावेजों में विनिर्दिष्ट अपेक्षाओं से हटना है ;

ख. "रोक " निविदा दस्तावेजों में विनिर्दिष्ट अपेक्षाओं को सीमित करने वाली शर्तें लगाना या उनकी पूर्ण स्वीकृति से रोके रखना है ; और

ग . "लोप " निविदा दस्तावेजों में अपेक्षित समस्त सूचना या दस्तावेजों या उसके किसी भाग को प्रस्तुत करने में विफलता है ।

ii. कोई सारवान् विचलन, रोक या लोप वह है , जो,

क. यदि स्वीकार किया जाता है तो, - ( 30)

(i) निविदा दस्तावेजों में विनिर्दिष्ट अधिप्राप्ति की विषयवस्तु की परिधि, गुणवत्ता या सम्पादन को किसी सारभूत रूप से प्रभावित करेगा ; अथवा

(ii) निविदा दस्तावेजों से असंगत , प्रस्तावित संविदा के अधीन अधिप्राप्तिकर्ता इकाई के अधिकारों या निविदादाता की बाध्यताओं को किसी सारभूत रूप से सीमित करेगा : अथवा

ख. यदि परिशोधित (rectified) किया जाता है तो प्रतिक्रियाशील निविदाएं प्रस्तुत करने वाले अन्य निविदादाताओं की प्रतियोगी स्थिति को अनुचित रूप से प्रभावित करेगा ।

iii . निविदा संवीक्षा समिति, यह पुष्टि करने हेतु कि निविदा दस्तावेज की समस्त अपेक्षाओं को बिना किसी सारवान् विचलन, रोक या लोप के पूर्ण कर लिया गया है, विशिष्ट रूप से निविदा के तकनीकी पहलुओं का परीक्षण करेगी ।

iv. अधिप्राप्ति इकाई किसी निविदा को प्रतिक्रियाशील निविदा के रूप में मानेगी यदि वह निविदा दस्तावेजों में वर्णित समस्त अपेक्षाओं के अनुरूप है ।

V. अधिप्राप्तिकर्ता इकाई किसी निविदा को प्रतिक्रियाशील निविदा के रूप में मान सकती है , भले ही इसमें लघु विचलन अन्तर्विष्ट है जिससे निविदा दस्तावेजों में वर्णित लक्षणों, बंधनों, शर्तों और अन्य अपेक्षाओं में सारभूत परिवर्तन या विचलन नहीं होता है, या यदि इसमें कोई त्रुटि या कमी रह गयी है तो उसे निविदा के सार को प्रभावित किए बिना सही किया जा सकता है ।

2.13.2 गैर- सारवान् (non - material) विचलनों से व्यवहार

i. यदि कोई निविदा सारभूत रूप से प्रतिक्रियाशील है तो निविदा संवीक्षा समिति

क. निविदा में किन्हीं गैर- अनुरूपताओं पर छूट प्रदान कर सकती है जिसके कारण कोई तात्विक विचलन , रोक या लोप न होता हो;

ख. निविदा में अभिलेखीकरण आवश्यकताओं से संबंधित गैर- सारवान लोप या अन्य गैर- अनुरूपताओं को परिशोधित करने हेतु, निविदादाता को आवश्यक सूचना या दस्तावेज जैसे कि- संपरीक्षित लेखा विवरण , जीएसटी पंजीकरण प्रमाणपत्र , पैन इत्यादि, युक्तियुक्त कालावधि के भीतर प्रस्तुत करने का अनुरोध कर सकेगी । ऐसी गैर-अनुरूपताओं पर सूचना या अभिलेखीकरण आवश्यकताओं का अनुरोध निविदा मूल्य के किसी भी पहलू से संबंधित नहीं होगा । निविदादाता के अनुरोध का पालन करने में असफल होने के परिणामस्वरूप उसकी निविदा को अस्वीकार किया जा सकेगा;

ग. निविदादाता से प्राप्त सूचना या दस्तावेजों के आधार पर गैर- सारवान , गैर-अनुरूपताओं या चूक का परिशोधन कर सकेगी ।

इस संबंध में प्रस्तर 2.2.8 में वर्णित प्रावधानों का अनुपालन किया जाएगा ।

( 31)

निविदाओं को अमान्य करना

2.13.3

i. कोई अधिप्राप्तिकर्ता इकाई किसी निविदा को अमान्य करेगी यदि-

क. निविदादाता निविदा दस्तावेजों में निर्धारित अहर्ताओं के अनुसार अर्ह नहीं है;

ख. निविदा सारवान् रूप से , निविदा दस्तावेजों में विनिर्दिष्ट अपेक्षाओं से अलग है या इसमें मिथ्या सूचना अन्तर्विष्ट है;

ग. निविदा प्रस्तुत करने वाला निविदादाता, उसका अभिकर्ता या उसके निमित्त कार्यरत कोई भी व्यक्ति, अधिप्राप्तिकर्ता इकाई या अन्य शासकीय प्राधिकारी के किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को कोई परितोषण , किसी भी रूप में, या किसी मूल्यवान वस्तु के रूप में, देता है या देने की सहमति देता है, ताकि अधिप्राप्ति प्रक्रिया को अनुचित रूप से प्रभावित किया जा सके;

घ. अधिप्राप्तिकर्ता इकाई की राय में , निविदादाता के हितों में टकराव (conflict of interest) है जो निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा को सारवान रूप से प्रभावित कर रहा है, ii. कोई निविदा अमान्य की जायेगी, जैसे ही उसके अमान्य होने के कारण का पता चलता है ।

iii. अधिप्राप्तिकर्ता इकाई द्वारा किसी निविदा को अमान्य करने का कारण लेखबद्ध किया जाएगा ।

iv. अधिप्राप्तिकर्ता इकाई के उपरोक्त उपखण्ड (iii ) के अधीन लिए गए प्रत्येक विनिश्चय को संबंधित निविदादाता को ई -अधिप्राप्ति पोर्टल (www.uktenders.gov.in) पर प्रकाशित करके संसूचित किया जाएगा । इसके अतिरिक्त , इसे विभागीय वेबसाइट पर भी प्रकाशित किया जा सकता है ।

2.14न्यूनतम मूल्यांकित मूल्य का अवधारण

i. प्रारंभिक परीक्षण के बाद सारभूत रूप से प्रतिक्रियाशील निविदाओं में से, जिस निविदाकर्ता ने निम्नतम मूल्यांकित मूल्य की बोली लगाई है, उसे मूल्यांकन मानदंडों के अनुसार सफल बोलीदाता घोषित किया जाएगा । मूल्यांकन में वस्तु एवं सेवा कर को छोड़कर लागू समस्त कर एवं शुल्क सम्मिलित होंगे ।

ii . न्यूनतम मूल्यांकित मूल्य निर्धारित करने में, निम्नलिखित कारकों पर विचार किया जाएगा- क. अंकगणितीय त्रुटियों हेतु उद्धृत मूल्य में सुधार किया जाएगा;

यदि कोई निविदा सारभूत रूप से प्रतिक्रियाशील है, तो निविदा संवीक्षा समिति निम्नलिखित आधार पर अंकगणितीय त्रुटियों में सुधार करेगी:

i . इकाई मूल्य और कुल मूल्य, जो इकाई मूल्य और भात्रा को गुणा करने पर प्राप्त होता है के मध्य यदि कोई विसंगति हो तो इकाई मूल्य प्रभावी होगा और कुल मूल्य में सुधार किया जायेगा । यदि निविदा संवीक्षा समिति की राय में इकाई मूल्य में ( 32)

दशमलव बिन्दु की स्थिति में स्पष्ट गलती रह गयी हो तो ऐसे मामले में इंगित कुल मूल्य प्रभावी होगा तथा इकाई मूल्य में तदनुसार सुधार किया जायेगा;

ii . यदि योग के घटकों को जोड़ने या घटाने के कारण योग में त्रुटि रह गयी है तो घटक अभिभावी होंगे और योग में सुधार किया जायेगा; तथा

iii . यदि शब्दों एवं अंकों के मध्य कोई विसंगति है, तो शब्दों में व्यक्त की गयी राशि प्रभावी होगी ।

ख . यदि किसी प्रस्ताव में ऐसी कोई विसंगति है, तो उसे उपरोक्त पंक्तियों के अनुसार लक्षित दिनांक के साथ निविदादाता को संसूचित किया जाना चाहिए एवं यदि निविदादाता क्रेता के अवलोकन से सहमत नहीं है, तो निविदा को अनदेखा (ignore ) कर दिया जाएगा ।

2.15 प्रदत्त संविदा का प्रकाशन

यदि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था, सक्षम प्राधिकारी के अनुमोदन के साथ , निविदा स्वीकृत करने का निर्णय लेती है, तो वह ई -अधिप्राप्ति पोर्टल पर संविदा प्रदत्त किए जाने सम्बन्धी दस्तावेज प्रकाशित करेगी । वित्त विभाग द्वारा समय - समय पर अधिसूचित एक सीमा मूल्य से ऊपर किए गए सभी संविदाओं / क्रयों का विवरण संबंधित अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की वेबसाइट पर भी प्रकाशित किया जाएगा ।

2.16 विवर्जन (Debarment)

2.16.1 किसी निविदादाता को विवर्जित (debar) कर दिया जाएगा, यदि उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का अधिनियम संख्या 49) के अधीन; या भारतीय न्याय संहिता, 2023 (2023 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 45) या तत्समय प्रवृत्त किसी भी अन्य विधि के अधीन, लोक अधिप्राप्ति संविदा के निष्पादन में जीवन या सम्पत्ति की हानि कारित करने या लोक स्वास्थ्य को खतरा कारित करने के, किसी अपराध हेतु दोषसिद्ध किया गया है ।

2.16.2 उपनियम 2.16.1 के अधीन विवर्जित निविदादाता उस दिनांक, जिसको वह विवर्जित किया गया था, से प्रारम्भ होने वाली दो वर्ष की अवधि हेतु किसी अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की अधिप्राप्ति प्रक्रिया में भाग लेने के योग्य नहीं होगा ।

2.16.3 यदि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था यह पाती है कि निविदादाता सत्यनिष्ठा संहिता भंग कर रहा है , तो वह निविदादाता को दो वर्ष की अवधि हेतु विवर्जित कर सकेगी;

2.16.4 जहाँ किसी निविदादाता की सम्पूर्ण निविदा प्रतिभूति या सम्पूर्ण कार्य संपादन प्रतिभूति या, यथास्थिति, उसका कोई भी प्रतिस्थापन ( substitute ) किसी अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा किसी भी अभिप्राप्ति प्रक्रिया या अभिप्राप्ति संविदा में जब्त (forfeit ) कर लिया गया है तो निविदादाता को अभिप्राप्ति संस्था द्वारा उपक्रमित किसी भी अभिप्राप्ति प्रक्रिया में भाग लेने से दो वर्ष से अनधिक की कालावधि हेतु विवर्जित किया जा सकेगा ।

( 33 )

2.16.5 राज्य सरकार या, यथास्थिति, कोई अधिप्राप्तिकर्ता संस्था इस धारा के अधीन किसी निविदादाता को तब तक विर्वजित नहीं करेगी, जब तक कि ऐसे निविदादाता को सुनने का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया हो ।

2.17 सूचीबद्ध / पंजीकृत सूची से निष्कासन

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा किसी पैनलबद्ध / सूचीबद्ध परमार्शदाता या आपूर्तिकर्ता या संविदाकर्ता को निम्नलिखित आधारों पर पंजीकृत पैनल / सूची से हटाया जा सकता है

i. निम्नानुसार सूचीबद्ध किसी भी निष्पादन संबंधी मुद्दे में कमी के मामले मेंः

क. ऐसा व्यक्ति (परामर्शदाता/ आपूर्तिकर्ता / संविदाकर्ता आदि) जो नियमों एवं शर्तों के अनुपालन या आवश्यक तकनीकी / परिचालन कर्मचारियों/ उपकरणों के अनुरक्षण में विफल रहता है या इसके उत्पादन/ सेवा श्रृंखला में परिवर्तन होता है जो इसके निष्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, या पंजीकरण हेतु समीक्षा में सहयोग करने या अर्हता प्राप्त करने में विफल रहता है;

ख. फर्म का अस्तित्व समाप्त हो जाता है या किसी अन्य फर्म द्वारा उसका अधिग्रहण कर लिया जाता है या उसके साथ विलय कर दिया जाता है, या उन आवश्यकताओं की श्रेणी में परिचालन बंद कर देता है जिसके लिए वह पंजीकृत है;

ग. आपूर्तिकर्ता को न्यायालय द्वारा दिवालिया या शोधन अक्षम घोषित कर दिया गया हो;

घ. ऐसे व्यक्ति/ फर्म को किसी मंत्रालय / विभाग या किसी अन्य सरकारी एजेंसी द्वारा प्रतिबंधित / काली सूची में डाल दिया गया है;

ड. अप्रत्याशित घटना (Force Mejeure) की स्थितियों को छोड़कर, वित्तीय निविदाएं खुलने के बाद, आपूर्तिकर्ता/ परामर्शदाता / संविदाकर्ता अधिप्राप्ति प्रक्रिया से पृथक हो जाता है;

च. सफल निविदादाता घोषित किये जाने के बादः (1 ) प्रक्रिया से हट जाता है; या (2) अधिप्राप्ति एजेंसी के साथ संविदा में प्रवेश करने में विफल रहता है; या (3 ) निष्पादन प्रतिभूति या निविदा दस्तावेजों के संदर्भ में आवश्यक कोई अन्य दस्तावेज या प्रतिभूति प्रदान करने में विफल रहता है ।

ii . किसी अन्य आधार पर, जहां पंजीकरण प्राधिकारी यह मानता है कि पंजीकरण / सूचीबद्धिकरण को जारी रखना सार्वजनिक हित में नहीं है ।

2.18 संविदा प्रबंधन

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को किये गये संविदा के प्रबंधन में संपूर्ण रूप से सम्मिलित होना चाहिए । यह सुनिश्चित करने हेतु कि अधिप्राप्ति का निष्पादन अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के उद्देश्यों के अनुरूप ( 34)

हो रहा है , अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निम्नलिखित पद्धति के माध्यम से संविदाकर्ता के प्रदर्शन / कार्य का निरंतर अनुश्रवण करेगीः

i. संविदा के क्रियान्वयन का सख्ती से अनुश्रवण किया जाना चाहिए , एवं उपबंधों के उल्लंघन होने पर त्वरित नोटिस जारी किया जाना चाहिए ।

ii . बैंक गारंटी या अन्य लेखपत्रों की सुरक्षित अभिरक्षा एवं अनुश्रवण हेतु यथोचित प्रक्रिया का निर्धारण किया जाना चाहिए ।

iii . अनुश्रवण में आपूर्ति या कार्य प्रगति की समीक्षा के साथ- साथ तीन माह के पश्चात समाप्त होने वाली समस्त बैंक गारंटियों या अन्य लेखपत्रों की मासिक समीक्षा सम्मिलित होनी चाहिए ।

iv. बैंक गारंटियों या अन्य लेखपत्रों का विस्तार, जहां आवश्यक हो, तुरंत मांगा जाना चाहिए । (इसमें बीमा, श्रम कानूनों का अनुपालन आदि सम्मिलित है , लेकिन यह इन्हीं तक सीमित नहीं है ।)

v. पर्याप्त सुरक्षा की दृष्टि से सफल निविदादाता द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाली बैंक गारंटी/ एफडीआर आदि का सत्यापन भी संबंधित निर्गमनकर्ता बैंक/ पोस्ट ऑफिस आदि से उच्चतर / नियंत्रक इकाई से करवाया जाना चाहिए ।

( 35 )

अध्याय 3: सामग्री की अधिप्राप्ति

3.1 आपूर्तिकर्ताओं का पंजीकरण

i. सामान्य रूप से उपयोग में आने वाली सामग्री की अधिप्राप्ति के लिए विश्वसनीय सामग्री अधिप्राप्ति के स्रोतों को स्थापित करने हेतु सम्बन्धित प्रशासनिक विभाग अथवा विभागाध्यक्ष द्वारा सामग्रीवार पात्र एवं सक्षम आपूर्तिकर्ताओं की सूचियां तैयार कर रखी जायेंगी । सम्बन्धित विभाग इन सूचियों का आवश्यकतानुसार उपयोग कर सकेंगे । इस प्रकार के अनुमोदित आपूर्तिकर्ताओं को पंजीकृत आपूर्तिकर्ता कहा जायेगा । इस प्रकार के पंजीकृत आपूर्तिकर्ता ही सीमित निविदा प्रक्रिया के माध्यम से संबंधित सामग्री की अधिप्राप्ति हेतु प्रथम दृष्टया पात्र होंगे । ऐसे पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं को निविदा प्रस्तुत करने हेतु वांछित धरोहर धनराशि में कोई छूट प्रदान नहीं की जायेगी ।

ii . नवीन फर्मों के पंजीकरण की विस्तृत प्रक्रिया विभागीय वेबसाइट / ई- अधिप्राप्ति पोर्टल पर अपलोड की जा सकती है तथा आपूर्तिकर्ताओं की सूचना हेतु एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित की जा सकती है , जिसमें नवीन आपूर्तिकर्ताओं के पंजीकरण हेतु समय- सीमा एवं मानदंड स्पष्ट रूप से विनिर्दिष्ट किये जायेंगे;

iii . सामग्री की किसी भी श्रेणी / वर्ग हेतु संभावित स्रोतों का चिन्हांकन आंतरिक एवं बाह्य संदर्भों के आधार पर किया जा सकता है । नवीन आपूर्तिकर्ताओं संबंधी सूचनाऐं विभागीय वेबसाइटों, प्रदर्शनियों, क्रेता-विक्रेता बैठकों, व्यापार संघों आदि के स्तर पर की गयी पूछताछ के क्रम में आपूर्तिकर्ताओं से प्राप्त प्रतिक्रिया, खुली निविदा विज्ञापनों , पूर्व-योग्यता निविदाओं , अभिरुचि की अभिव्यक्ति (ई.ओ.आई.) आदि के आधार पर प्राप्त की जा सकती हैं;

iv. नवीन आपूर्तिकर्ता (आपूर्तिकर्ताओं) पर वर्ष के दौरान किसी भी समय पंजीकरण के प्रयोजनों हेतु विचार किया जा सकता है , बशर्ते वे अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा निर्धारित समस्त अपेक्षित शर्तों को पूर्ण करते हों । किसी भी वृहद पैमाने पर किए जाने वाले महत्वपूर्ण पंजीकरण या नवीन आपूर्तिकर्ताओं के पंजीकरण हेतु, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को ऐसी आपूर्ति के स्रोतों की पहचान करने की आवश्यकता को प्रचारित करते हुए अभिरुचि की अभिव्यक्ति आमंत्रित करने की सूचना प्रकाशित करनी चाहिए ;

V. फर्मों को पंजीकृत करते समय उनसे एक शपथ पत्र प्राप्त किया जा सकता है कि वे आवेदन के साथ संलग्न " लोक अधिप्राप्ति की सत्यनिष्ठा संहिता " का पालन करेंगे , इस स्पष्ट चेतावनी के साथ कि उल्लंघन के मामले में उनके नाम पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं की सूची से हटा दिए जाने की संभावना है , इसके अतिरिक्त अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा कोई अन्य शास्ति या यथोचित अधिक गंभीर कार्यवाही भी की जा सकती है;

vi . नवीन पंजीकरण/ पंजीकरण के नवीनीकरण आवेदन के साथ , आपूर्तिकर्ताओं को यह घोषित करना होगा कि, यदि किसी सीमित निविदा पृच्छा ( एल.टी.ई. ) में संविदा प्रदत्त की जाती है, ( 36 )

जिसमें वे प्रतिभाग करते हैं, तो वे अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की संविदा की सामान्य शर्तों (जी.सी.सी. ) के अनुपालन हेतु बाध्य होंगे । संविदा की ऐसी सामान्य शर्तें आवेदन का हिस्सा होनी चाहिए ।

आवेदन प्रपत्र, सभी प्रकार से पूर्ण तथा अपेक्षित प्रोसेसिंग शुल्क एवं निर्धारित दस्तावेजों के साथ फर्मों द्वारा पंजीकरण प्राधिकारी को प्रस्तुत किया जाएगा । आवेदकों से विधिवत भरा हुआ पंजीकरण आवेदन पत्र प्राप्त होने पर उनकी सामान्य ख्याति, विनिर्माण क्षमता , गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली , विगत कार्यपूर्ति, विक्रय पश्चात सेवा सुविधाओं (जिस सामग्री की आपूर्ति की जानी हो के लिए) , वित्तीय पृष्ठभूमि, आदि सहित फर्मों के सामर्थ्य एवं क्षमता का मूल्यांकन करने हेतु सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए ;

vii . आपूर्तिकर्ताओं का पंजीकरण सक्षम प्राधिकारी के अनुमोदन से किया जाना चाहिए;

viii . पंजीकरण एक निर्धारित अवधि (सामान्यतः एक से तीन वर्ष) हेतु किया जायेगा तथा पंजीकरण की अवधि के दौरान पंजीकृत आपूर्तिकर्ता के संतोषजनक प्रदर्शन के आधार पर ही विस्तारण हेतु विचार किया जाएगा । वैधता अवधि की समाप्ति के पश्चात पंजीकरण की औपचारिकताएं नये सिरे से अपनाई जाएंगी;

ix. विभिन्न वस्तुओं की अधिप्राप्ति हेतु पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं की सूची राज्य के लोक अधिप्राप्ति पोर्टल एवं अधिप्राप्तिकर्ता संस्था / विभाग की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जानी चाहिए :

Χ. प्रत्येक पंजीकृत आपूर्तिकर्ता के कार्य निष्पादन, आचरण आदि की निगरानी संबंधित अधिप्राप्तिकर्ता संस्था/ विभाग द्वारा की जानी चाहिए। पंजीकृत आपूर्तिकर्ता (आपूर्तिकर्ताओं) को पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं की सूची से हटाया जा सकेगा, यदिः

क. वे पंजीकरण के नियमों एवं शर्तों का अनुपालन करने में विफल रहते हैं, या ख. वे सामग्री की समय पर आपूर्ति करने में विफल रहते हैं या निर्धारित मानक से निम्नस्तरीय सामग्री की आपूर्ति करते हैं, या

ग. किसी भी सरकारी एजेंसी को कोई मिथ्या घोषणा/ तथ्य प्रस्तुत करते हैं , या घ. कोई भी अन्य आधार हेतु जो सरकार की दृष्टि में लोक हित में नहीं है ।

xi. अधिप्राप्तिकर्ता विभाग / संस्था के पास किसी भी पंजीकृत आपूर्तिकर्ता की वर्तमान वित्तीय सुदृ ढ़ता/ ऋण पात्रता, उपलब्ध सुविधाओं तथा ऐसे अन्य मामलों के सम्बन्ध में स्वयं के समाधान हेतु किसी भी तिथि को पुनर्मूल्यांकन करने का विकल्प सुरक्षित रहेगा, जो एक पंजीकृत आपूर्तिकर्ता के पंजीकरण के निरंतर स्थिति में रहने हेतु प्रासंगिक हो सकते हैं ।

3.2 निविदा प्रणाली

निविदा प्रणालियों को विभिन्न जटिलताओं / तकनीकी आवश्यकताओं की विवेचनात्मकता तथा अधिप्राप्ति मूल्य के अंतर्गत उचित गुणवत्ता, उचित स्रोत एवं युक्तिसंगत मूल्य के मध्य संतुलन सुनिश्चित करने हेतु प्रारूपित किया गया है । तकनीकी आवश्यकता की जटिलता एवं महत्व, स्रोत ( 37)

की क्षमता की गंभीरता तथा अधिप्राप्ति मूल्य के आधार पर , निम्नलिखित प्रकार की निविदा प्रणालियों का उपयोग किया जा सकता है:

1. एकल चरण (single stage) निविदा प्रणाली

2. द्वि चरण ( two stage ) निविदा प्रणाली

3.2.1 . एकल चरण निविदा प्रणाली

एकल चरण निविदा प्रणाली का आशय है- " सीधे निविदा आमंत्रित किया जाना, अर्थात् इसमें मुख्य निविदा आमंत्रण से पूर्व ' ई० ओ०आई०' का चरण सम्मिलित नहीं होता। " एकल चरण निविदा प्रणाली में सभी प्रकार की निविदाएं एक या एकाधिक लिफाफों में एक साथ आमंत्रित की जाती हैं । इस प्रकार की निविदा उन अधिप्राप्तियों के लिए उपयुक्त है जहाँ तकनीकी आवश्यकताएँ सरल या औसत दर्जे की हों तथा आपूर्ति के स्रोत की क्षमता अत्यंत निर्णायक न हो । एकल चरण निविदा के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं -

i . एकल चरण एकल लिफाफा प्रणालीः उन सामग्रियों की अधिप्राप्ति हेतु जिनमें गुणात्मक आवश्यकताएं एवं तकनीकी विशिष्टताएं सरल एवं स्पष्ट हों, वहां रु० 10,00,000 (दस लाख रुपये) की क्रय सीमा तक एकल लिफाफा प्रणाली का विकल्प अपनाया जा सकता है । इस प्रणाली में पात्रता, तकनीकी/ व्यावसायिक एवं वित्तीय विवरण सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्गत निर्धारित प्रपत्र में एक ही लिफाफे में एक साथ जमा किये जाते हैं । निविदा दस्तावेजों में निर्धारित पात्रता मानदंड, तकनीकी एवं वाणिज्यिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाली न्यूनतम मूल्य वाली प्रतिक्रियाशील निविदा को सफल घोषित किया जाता है तथा ऐसे निविदादाता को संविदा प्रदत्त की जाती है ।

ii . एकल चरण दो- लिफाफा प्रणालीः जटिल एवं तकनीकी प्रकृति के महंगे उपस्कर, मशीनों आदि की अधिप्राप्ति हेतु निविदायें दो भागों/ दो लिफाफों में आमंत्रित की जायेंगी-

क. तकनीकी निविदाएंः इसमें वाणिज्यिक शर्तों एवं निबंधनों के साथ समस्त तकनीकी विवरण सम्मिलित होंगे ,

ख. वित्तीय निविदाएंः इसमें तकनीकी निविदा में उल्लिखित मदों हेतु मदवार मूल्य का उल्लेख होगा ।

तकनीकी एवं वित्तीय निविदाओं को अलग -अलग लिफाफों में अच्छी तरह से बंद किया जाना चाहिए /निविदा आमंत्रण सूचना में उल्लिखित अधिप्राप्ति का नाम सम्यक रूप से अंकित किया जाना चाहिए । इन दोनों लिफाफों को एक बड़े लिफाफे में रखा जाना चाहिए जिसे पुनः अच्छी तरह से बंद किया जाना चाहिए एवं निविदा आमंत्रण सूचना में निर्दिष्ट अधिप्राप्ति के नाम के साथ सम्यक रूप से अंकित किया जाना चाहिए । इस प्रणाली में सर्वप्रथम तकनीकी निविदाओं को अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा निर्दिष्ट तिथि एवं समय पर खोला जायेगा । इनके द्वारा ( 38 )

पूर्व- परिभाषित विशिष्टताओं/ प्रतिमानों के आधार पर तकनीकी निविदा का मूल्यांकन एवं श्रेणीकरण किया जायेगा तथा तकनीकी दृष्टि से अर्ह निविदादाताओं की एक सूची तैयार की जाएगी । इसके पश्चात् अगले चरण (step ) में, केवल तकनीकी रूप से योग्य निविदादाताओं की वित्तीय निविदाएं अग्रेतर परीक्षण, मूल्यांकन , श्रेणीकरण तथा संविदा स्थापन हेतु पूर्व घोषित दिनांक पर खोली जाती हैं तथा जो निविदादाता तकनीकी रूप से योग्य नहीं हैं उनकी वित्तीय निविदा (लिफाफे) संबंधित निविदादाताओं को पंजीकृत डाक / कूरियर या डिलीवरी के प्रमाण के साथ किसी अन्य माध्यम से, बिना खोले वापस कर दी जाएगी । ई-अधिप्राप्ति में, तकनीकी रूप से गैर-अनुपालक ( non responsive) प्रस्तावों की वित्तीय निविदाएं नहीं खोली जाएंगी ।

iii . पूर्व-योग्यता सहित एकल चरण बहु लिफाफा प्रणालीः जहां अधिप्राप्ति जटिल है, वहां अधिप्राप्ति इकाई द्वारा एकल चरण - द्वि लिफाफा प्रणाली के अतिरिक्त एकल चरण- बहु लिफाफा प्रणाली का भी प्रयोग किया जा सकता है । इसके अंतर्गत पूर्व-योग्यता निविदा के एक पृथक चरण के स्थान पर , निविदादाताओं से एक अलग लिफाफे में स्पष्ट सफल- असफल योग्यता मानदंड (निविदा प्रतिभूति एवं अन्य अर्हता दस्तावेज भी शामिल हैं) पर सूचनाएं प्रस्तुत करने हेतु कहा जाता है । निविदा खोलने की दिनांक पर, सर्वप्रथम केवल इसी लिफाफे को खोला जाएगा । सफल- असफल योग्यता मानदंड के आधार पर पूर्व-योग्यता संबंधी परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले प्रतिक्रियाशील निविदादाताओं के लघु सूचीयन हेतु मूल्यांकन किया जाएगा । इसके पश्चात, केवल योग्य निविदादाताओं हेतु दो- लिफाफा प्रणाली के समान मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाई जायेगी । अयोग्य निविदादाताओं के शेष दो लिफाफे संबंधित निविदादाताओं को पंजीकृत डाक / कूरियर या किसी अन्य माध्यम से डिलीवरी के प्रमाण के साथ बिना खोले वापस कर दिए जाएंगे ।

3.2.2. द्वि-चरण निविदा प्रणालीः

द्वि-चरण निविदा प्रणाली का आशय निविदा की उस प्रणाली से है जिसके अंतर्गत मुख्य निविदा आमंत्रित किए जाने से पूर्व अधिप्राप्ति इकाई द्वारा ई ०ओ०आई० आमंत्रित कर संभावित स्रोतों की पहचान एवं विशिष्टियों का निर्धारण किया जाता है ।

i . अधिप्राप्तिकर्ता इकाईयां निम्नलिखित परिस्थितियों में द्वि- चरण निविदा प्रक्रिया द्वारा अधिप्राप्ति कर सकती हैं

क. अधिप्राप्ति की विषय वस्तु हेतु, निविदादाताओं से इसके तकनीकी पहलुओं से संबंधित इनपुट प्राप्त किये बिना, विस्तृत विशिष्टियों को बनाना या विनिर्दिष्ट लक्षणों की पहचान करना साध्य न हो; या

ख. अधिप्राप्ति की विषय- वस्तु के लक्षण / विशिष्टियां त्वरित प्रौद्योगिकी विकास या बाजार के उतार-चढ़ाव या दोनों के अध्यधीन हों; या ( 39 )

ग. विभाग अनुसंधान, प्रयोग , अध्ययन या विकास के प्रयोजन के लिए कोई संविदा करना चाहता हो,

निविदादाता से अपेक्षित है कि वह विस्तृत सर्वेक्षण या जाँच करे तथा किसी विशिष्ट अधिप्राप्ति से संबंधित जोखिमों, लागत एवं बाध्यताओं के व्यापक निर्धारण का दायित्व ले ।

ii. द्वि-चरण निविदा प्रक्रिया में निम्नलिखित सोपान (steps ) सम्मिलित होंगेः

क. प्रथम चरणः निविदा प्रक्रिया के प्रथम चरण में, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था प्रस्तावित अधिप्राप्ति के व्यापक उद्देश्यों, तकनीकी एवं वित्तीय पात्रता मानदंड को अंतर्विष्ट करने वाली ' अभिरुचि की अभिव्यक्ति' बिना निविदा मूल्य के आमंत्रित करेगी । अभिरुचि की अभिव्यक्ति प्राप्त होने पर, लघु- सूचीबद्ध विनिर्माताओं / आपूर्तिकर्ताओं के साथ तकनीकी विमर्श/ प्रस्तुति आयोजित की जा सकती है, जो प्रथम दृष्टया सामग्री की आपूर्ति करने या प्रस्तावित आपूर्ति को निष्पादित करने में तकनीकी एवं वित्तीय रूप से सक्षम माने जाते हैं । ऐसे समस्त निविदादाताओं को विमर्श में भाग लेने का समान अवसर प्रदान किया जायेगा ।

प्रथम चरण की समस्त निविदाओं का, जो अन्यथा पात्र हैं, का मूल्यांकन विभाग द्वारा गठित निविदा संवीक्षा समिति के माध्यम से किया जाएगा । यदि अधिप्राप्ति के सुसंगत नियम एवं शर्तों के पुनरीक्षण की आवश्यकता है, तो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था अधिप्राप्ति के मौलिक स्वरूप को रुपांतरित नहीं करेगी , किन्तु अधिप्राप्ति की विषय- वस्तु के विनिर्देशों ( specifications ) को या मूल्यांकन की कसौटी को जोड़, संशोधित या विलोपित कर सकेगी ।

ख. द्वितीय चरणः निविदा प्रक्रिया के द्वितीय चरण में अधिप्राप्तिकर्ता संस्था, उन समस्त निविदादाताओं से, जिनकी निविदा प्रथम चरण में अस्वीकृत नहीं हुई थी, अधिप्राप्ति के पुनरीक्षित नियम एवं शर्तों के प्रत्युत्तर में कीमतों के साथ, अंतिम निविदाएं आमंत्रित करेगी । यदि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के विचार में अभिरुचि की अभिव्यक्ति चरण के बाद, अन्य निविदादाताओं द्वारा और अधिक सहभागिता की संभावना है और साथ ही वह एक परंपरागत प्रौद्योगिकी में फंसने से बचना चाहे तो द्वितीय चरण की निविदा केवल अभिरुचि की अभिव्यक्ति चरण के लघु- सूचीबद्ध निविदादाताओं तक ही सीमित नहीं रखी जायेगी और इसे आरम्भतः अभिरुचि की अभिव्यक्ति दस्तावेज़ में ही घोषित किया जायेगा ।

कोई भी निविदादाता, जिसे द्वितीय चरण की निविदा प्रक्रिया में प्रतिभाग हेतु आमंत्रित किया गया है , किन्तु जो विनिर्देशों अथवा नियमों एवं शर्तों में संशोधन के कारण अधिप्राप्ति की विषय वस्तु की आपूर्ति की स्थिति में नहीं है, यथोचित औचित्य के साथ पीछे हटने के अपने आशय की घोषणा करके निविदा प्रक्रिया से हट सकता है; ऐसा करने पर निविदादाता द्वारा जमा की गई किसी भी निविदा प्रतिभूति का न तो संपहरण किया जायेगा तथा न ही ऐसे निविदादाता को किसी भी प्रकार से दंडित किया जाएगा ।

(40)

3.3 अधिप्राप्ति की विधियां

3.3.1 बिना दर- सूची (कोटेशन) के सामग्री का क्रय

किसी भी औपचारिक दर- सूची के बिना सामग्री की प्रत्यक्ष अधिप्राप्तिः केवल छोटे मूल्य के अनुबंधों हेतु की जाएगी । अधिप्राप्ति योजना में सम्मिलित नहीं किए गए सामग्रियों के संबंध में और यदि आवश्यकता तत्काल हो तो इस पद्धति को अपनाया जाना चाहिए । यह विधि प्रत्येक अवसर पर रु 0 50,000 ( पचास हजार रुपये) तक की सामग्री के क्रय हेतु लागू होगी । ऐसी अधिप्रप्तियाँ कोटेशन / निविदाएं आमंत्रित किए बिना, किन्तु खुले बाजार के दरों के आधार पर की जा सकती है । इसमें स्पष्ट एवं मानक विशिष्टताओं जैसे कार्यालय और क्षेत्र इकाइयों की रोजमर्रा की आवश्यकताओं हेतु तैयार रुप में उपलब्ध (off- the-shelf) सामग्रियां आच्छादित होंगी । यह सक्षम प्राधिकारी द्वारा निम्नांकित प्रारूप में अभिलिखित किए जाने वाले प्रमाण पत्र पर आधारित होगाः

"मैं सामग्री (मद एवं मात्रा) ...व्यक्तिगत रूप से संतुष्ट हूं कि ..जिसका कुल मूल्य सेक्रय की गयी है , अपेक्षित विशिष्टियों तथा गुणवत्ता के अनुरूप हैं तथा इसे विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता से उचित दरों पर क्रय किया गया है ।"

सक्षम प्राधिकारी द्वारा क्रमांक .. दिनांक.................. के माध्यम से अनुमोदित हस्ताक्षर ..

अधिकारी का नाम

पदनाम .......

3.3.2 क्रय समिति के माध्यम से सामग्री का क्रय

प्रत्येक अवसर पर रु 0 50,000 (पचास हजार रुपये) से अधिक तथा रु 0 5,00,000 (पांच लाख रुपये) तक लागत की सीमा में क्रय की जाने वाली सामग्री का क्रय , सक्षम प्राधिकारी द्वारा सम्यक रूप से गठित समुचित स्तर के तीन सदस्यों की स्थानीय क्रय समिति की संस्तुतियों पर किया जा सकता है ।

इस क्रय समिति में एक सदस्य अनिवार्य रूप से वित्त सेवा सवंर्ग , सहायक लेखाधिकारी संवर्ग अथवा लेखा परीक्षा सेवा संवर्ग के वरिष्ठतम अधिकारी को और इन सेवा संवर्गों के अधिकारी उपलब्ध न होने की स्थिति में एक ऐसा अधिकारी , जिसने अधिप्राप्ति नियमों में प्रशिक्षण प्राप्त किया हो , को सम्मिलित किया जायेगा । यह समिति दरों की युक्तियुक्तता, गुणवत्ता तथा विशिष्टता सुनिश्चित करने हेतु बाजार का सर्वेक्षण करेगी एवं उपयुक्त आपूर्तिकर्ता चिन्हित करेगी । क्रय आदेश देने की संस्तुति से पूर्व समिति के सदस्य संयुक्त रूप से निम्नानुसार एक प्रमाण पत्र अभिलिखित करेंगेः (41)

(2) (3)

प्रमाणित किया जाता है कि हमारा (1 )

(क्रय समिति के सदस्य) व्यक्तिगत एवं संयुक्त रूप से समाधान हो गया है कि जिस सामग्री के क्रय की संस्तुति की गयी है , वह अपेक्षित विशिष्टताओं एवं गुणवत्ताओं के अनुरूप है । उसका मूल्य वर्तमान बाजार दरों के अनुसार है तथा अनुशंसित आपूर्तिकर्ता प्रश्नगत सामग्री की आपूर्ति करने हेतु विश्वसनीय एवं सक्षम है" ।

मैसर्स

द्वारा क्रय करने की सामग्री (मद एवं मात्रा)

अनुशंसा की जाती है , जिसका मूल्य है।

हस्ताक्षर (1 )

(2)

(3)

नाम..

नाम..

पदनाम..

..पदनाम..

गवर्मेन्ट ई-मार्केट (GeM) पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन क्रय

इसके अंतर्गत की जाने वाली अधिप्राप्ति में अध्याय-2 के नियम 2.7 के प्रावधान लागू होंगे ।

3.3.4 सीमित निविदा पृच्छा (एल.टी.ई)

i. सीमित निविदा पृच्छा (एल.टी.ई.) एक सीमित प्रतिस्पर्धा अधिप्राप्ति प्रणाली है, जहां बोली लगाने हेतु विक्रेताओं की पूर्व चयनित सूची से प्रत्यक्ष रूप में सम्पर्क किया जाता है । यह एक छोटी और सरल प्रक्रिया है , परन्तु यह खुली निविदा जैसा धन का यथोचित मूल्य (value for money ) प्रदान नहीं कर सकती है । अतः सीमित निविदा पृच्छा प्रक्रिया को अपनाने हेतु कारण अभिलिखित किये जाएं ।

ii . सीमित निविदा पृच्छा (एलटीई) को तब अपनाया जा सकता है जब अधिप्राप्त की जाने वाली सामग्री की अनुमानित लागत अधिकतम रुपये 25,00,000 /-(रुपये पच्चीस लाख) तक हो । इसके अतिरिक्त , समय - समय पर राज्य सरकार द्वारा निर्दिष्ट प्रतिबंधों के अधीन इस नियमावली की अधिसूचना की दिनांक से पूर्व राज्य सरकार के ग्राम्य विकास विभाग के तहत पंजीकृत स्वयं सहायता समूहों/ सहकारी / संगठनों से रु 0 5,00,000 (पांच लाख रुपये) तक के मूल्य की हस्तशिल्प , हथकरघा वस्त्र, किराना एवं भोजन- भंडार, कार्यालय लेखन सामग्री , तथा व्यक्तिगत देखभाल एवं स्वच्छता की वस्तुओं जैसी पांच श्रेणियों के अंतर्गत आने वाली सामग्रियों की अधिप्राप्ति सीमित निविदा पृच्छा के माध्यम से की जा सकती है । परन्तु ऐसी अधिप्राप्ति में प्राप्त सामग्री की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जायेगा ।

जहां अधिप्राप्ति का अनुमानित मूल्य रु. 25,00,000 /- (पच्चीस लाख रुपये) से अधिक हो, वहां भी निम्नलिखित परिस्थितियों में सीमित निविदा पृच्छा पद्धति अपनायी जा सकती है:-

(42)

क. यदि विभाग प्रमाणित करता है कि मांग अत्यावश्यक है तथा विभागाध्यक्ष/ कार्यालयाध्यक्ष द्वारा अत्यावश्यकता की प्रकृति तथा अधिप्राप्ति का पूर्वानुमान न लगाए जाने के कारण भी अभिलिखित किये जाने चाहिए ।

ख. जब सक्षम प्राधिकारी के पास पर्याप्त कारण हों, और साथ ही उन्हें अभिलिखित किया जाए कि विज्ञापन के माध्यम से निविदा पृच्छा द्वारा सामग्री की अधिप्राप्ति लोक हित में नहीं होगी ।

ग. जब आपूर्ति के स्रोत ज्ञात हों तथा जिन स्रोतों का उपयोग किया जा रहा है, उनके अतिरिक्त नए स्रोत की संभावना बहुत कम है ।

iv. निविदा प्रपत्र की प्रतियां स्पीड पोस्ट/ कूरियर / ईमेल आदि के माध्यम से सीधे पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं को निःशुल्क (जहां निर्धारित विशिष्टियों / डिजाइन का कोई मूल्य निर्धारित हो के अतिरिक्त) प्रेषित कर दी जानी चाहिए ।

v. विस्तृत निविदा प्रपत्र के स्थान पर सरलीकृत प्रपत्र प्रयोग में लाया जा सकता है, परन्तु जहां अधिप्राप्ति का अनुमानित मूल्य रु. 25,00,000 /- (पच्चीस लाख रुपये) से अधिक हो , वहां "खुली निविदा हेतु निर्धारित निविदा प्रपत्र" उपयोग में लाये जाएं ।

vi . अच्छी प्रतिस्पर्धा हेतु अधिक से अधिक प्रतिक्रियाशील निविदाएं प्राप्त करने हेतु यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अधिकतम संभव अनुमोदित आपूर्तिकर्ताओं से संपर्क किया जाए और उनके साथ निविदा प्रपत्र साझा किया जाए ।

vii . सीमित निविदा पृच्छा में कम से कम तीन प्रतिक्रियाशील निविदायें प्राप्त होने पर ही निविदा प्रक्रिया सफल मानी जाएगी ।

viii . सीमित निविदा पृच्छा में निविदाएं प्रस्तुत करने हेतु निविदा सूचना की दिनांक से कम से कम दो सप्ताह का समय सामान्यतः दिया जाना चाहिए । अपरिहार्य परिस्थितियों में, यह अवधि निविदा आमंत्रण प्राधिकारी से वरिष्ठ प्राधिकारी की पूर्व लिखित स्वीकृति के साथ लघुतर अवधि हेतु हो सकती है ।

3.3.5 विज्ञापित/खुली निविदा पृच्छा (ओ.टी.ई. )

i. इस नियमावली के अंतर्गत अपवाद स्वरुप , जिन मामलों में छूट दी गयी हो , को छोड़कर सामग्री एवं निर्माण कार्यों की अधिप्राप्ति हेतु समस्त निविदाएं निम्नलिखित रीति से समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापनों के माध्यम से आमंत्रित की जाएंगी;

क. रु. 5,00,00,000/- (पांच करोड़ रुपये) तथा उससे अधिक अनुमानित मूल्य की सामग्री की अधिप्राप्ति हेतु कम से कम दो व्यापक रूप से प्रसारित राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन के प्रकाशन के माध्यम से निविदाएं आमंत्रित की जायें ।

(43)

ख. रु. 25,00,000/- (पच्चीस लाख रुपये) से अधिक तथा रु. 5,00,00,000 /- (पांच करोड़ रुपये) से कम मूल्य की निविदाएं व्यापक रूप से प्रसारित एक राष्ट्रीय समाचार पत्र एवं एक राज्य स्तरीय समाचार पत्र में विज्ञापन के प्रकाशन के माध्यम से आमंत्रित की जायें ।

ग. रु. 25,00,000 /- (पच्चीस लाख रुपये) तक मूल्य की निविदाएं किसी राज्य स्तरीय समाचार पत्र एवं स्थानीय रूप से प्रकाशित समाचार पत्रों में विज्ञापन के प्रकाशन के माध्यम से आमंत्रित की जायें ।

घ. समाचार पत्र के विज्ञापन का आकार छोटा रखा जाना चाहिए , जिसमें केवल निविदा के बारे में आवश्यक सूचना दी जाए तथा इच्छुक निविदादाताओं से अनुरोध किया जाए कि वे विभाग की वेबसाइट / ई-अधिप्राप्ति पोर्टल पर जाकर निविदा पृच्छा के सम्पूर्ण विवरण का अवलोकन कर लें ।

समस्त निविदा प्रक्रियाएं केवल ' www.uktenders.gov.in' के माध्यम से ही निष्पादित की जाएं । तथापि, व्यापक प्रचार - प्रसार हेतु निविदा सूचना विभागीय वेबसाइट पर भी अपलोड की जा सकती है ।

ii . निविदा पृच्छा से संबंधित सभी दस्तावेज, जिनमें निविदा के नियम एवं शर्तें, अनुबंध का प्रारूप , सामग्री का विवरण, उनकी मात्रा एवं अपेक्षित गुणवत्ता तथा ऐसी अन्य प्रासंगिक सूचनाएं , आदि सम्मिलित होगी , पहले से ही तैयार किए जाएं । दस्तावेज़ अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की वेबसाइट पर अपलोड किए जा सकते हैं तथा संभावित निविदादाताओं द्वारा वेबसाइट से डाउनलोड किए गए दस्तावेज़ का उपयोग किया जा सकता है । यदि वेबसाइट पर अपलोड किए गए निविदा दस्तावेज़ का कोई मूल्य हो तो निविदादाताओं हेतु स्पष्ट निर्देश होने चाहिए कि निविदाएं प्रस्तुत करते समय उस मूल्य का भुगतान डिमांड ड्राफ्ट या सरकार की उपलब्ध ई - चालान/ ई- बैंकिंग सुविधाओं ( यदि कोई हो ) द्वारा किया जाये ।

3.3.6 वैश्विक निविदा पृच्छा (Global Tender Enquiry)

यदि विभाग को प्रतीत हो कि अपेक्षित गुणवत्ता, विशिष्टताओं की सामग्री देश में उपलब्ध नहीं हो सकेगी और विदेश से उपयुक्त प्रतिस्पर्धात्मक प्रस्तावों पर विचार करना आवश्यक है , तो वैश्विक निविदा पृच्छा के माध्यम से अधिप्राप्ति किए जाने पर विचार किया जा सकता है । ऐसी अधिप्राप्ति अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उचित विज्ञापन के प्रकाशन द्वारा की जा सकती है । विदेशी विक्रेता को ऐसी अधिप्राप्ति हेतु भुगतान साख पत्र के माध्यम से किया जा सकेगा । निविदा सूचना प्रकाशन, लेटर ऑफ क्रेडिट आदि के संबंध में भारत सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा ।

( 44 )

वैश्विक निविदा पृच्छा के माध्यम से अधिप्राप्ति निम्नलिखित परिस्थितियों में अपनायी जा सकती है:-

i . यदि तकनीकी विशिष्टताओं में विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुपालन की आवश्यकता है परन्तु अपेक्षित गुणवत्ता, विशिष्टताओं आदि की सामग्री देश में उपलब्ध नहीं है तथा देश में उपलब्ध वैकल्पिक सामग्री इस उद्देश्य हेतु उपयुक्त नहीं हैं;

आवश्यक तकनीकी विशिष्टताओं का अनुपालन करने वाले सक्षम घरेलू बोलीदाताओं की पर्याप्त संख्या का अभाव है तथा स्वदेशी बोलीदाताओं के मध्य आपूर्ति नियंत्रण समूह (cartel formation) के गठन का संदेह है । ii.

3.3.7 एकल स्रोत पृच्छा (एस.एस.ई.)

एकल स्रोत से अधिप्राप्ति/ क्रय निम्नलिखित परिस्थितियों में किया जा सकेगा:-

i. उपभोक्ता विभाग को इस बात की जानकारी है कि अपेक्षित सामग्रियों का विनिर्माण किसी एक विशेष फर्म द्वारा ही किया जाता है;

ii. मशीनों या ऐसे कल-पुर्जों के मानकीकरण के लिए जो विद्यमान उपकरणों में उपयोग किये जाने हेतु उपयुक्त हैं; किसी सक्षम तकनीकी विशेषज्ञ के परामर्श तथा सक्षम प्राधिकारी के अनुमोदन से केवल एक विशेष फर्म से खरीदी जा सकती हैं ।

सरकार द्वारा अधिसूचित किसी आपदा, महामारी , या अन्य मौजूदा या संभावित आपात स्थिति के मामले में, 25.00 लाख रुपये तक की तात्कालिक आवश्यक वस्तुओं की अधिप्राप्ति किसी विशेष स्रोत से एकल निविदा के आधार पर की जा सकती है । ऐसे एकल स्रोत पर आधारित अधिप्राप्ति, यथासम्भव पंजीकृत / सूचीबद्ध फर्मों से की जाएगी ।

iv. अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निष्पक्षता एवं समानता तथा कीमतों की युक्तियुक्तता सुनिश्चित करेगी तथा यह भी सुनिश्चित करेगी कि क्रय की जा रही सामग्री का मूल्य समान प्रकृति के कार्यों हेतु बाजार दरों के अनुरूप हैं ।

V. ऐसे निर्णय लेने के कारण अभिलिखित करने होंगे तथा सक्षम प्राधिकारी से अनुमोदन प्राप्त करना होगा ।

vi . ऐसे क्रय हेतु सक्षम प्राधिकारी द्वारा निम्नलिखित प्रमाणपत्र अभिलिखित किया जाना होगाः-

"अभीष्ट सामग्री/ सेवाएं मैसर्स ..द्वारा विनिर्मित/निष्पादित की जाती हैं । निम्नलिखित कारणों से कोई अन्य मेक या मॉडल स्वीकार्य नहीं है:

पत्र/ पत्रावली संख्या.....

...दिनांक. पर सक्षम प्राधिकारी की सहमति प्राप्त कर ली गई है । "

अधिप्राप्ति प्राधिकारी के हस्ताक्षर

नाम

पदनाम (45 )

3.3.8 पुनरादेश ( Repeat Order)

अधिप्राप्ति के विषय वस्तु हेतु खुली प्रतिस्पर्धी निविदा के परिणामस्वरूप गठित अनुबंध की सीमा तक ही वस्तुओं या सेवाओं की मात्रा आपूर्तिकर्ता से क्रय की जा सकती है । तथापि यदि किसी अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता बाद में आती है तो विशेष परिस्थितियों में अतिरिक्त मात्रा की आपूर्ति हेतु पुनरादेश मूल आपूर्तिकर्ता को समान दरों तथा समान नियमों एवं शर्तों पर दिए जा सकते हैं, इस संबंध में निम्न प्रावधानों का अनुपालन किया जाना चाहिए:

i. अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को समाधान कर लिया जाए कि नवीन अधिप्राप्ति प्रक्रिया प्रारम्भ करने से अपेक्षाकृत उन्नत प्रतिस्पर्धी मूल्य प्राप्त नहीं होगा तथा ऐसे समाधान को लिखित में अभिलेखित किया जाएगा;

ii . अतिरिक्त आपूर्ति संबंधी प्रावधान निविदा शर्तों में होना चाहिए ,

iii . वितरण / पूर्णता अवधि भी आनुपातिक रूप से बढ़ाई जा सकती है ,

iv. पुनरादेश की सीमा मूल रूप से निविदाकृत एवं अंतिम संविदाकृत सामग्री के मूल्य के 20% (बीस प्रतिशत) से अधिक नहीं होगी ।

v. पुनरादेश मूल आपूर्ति की पूर्णता के 3 माह अथवा उसी वित्तीय वर्ष की समय- सीमा तक ही दिए जा सकेंगे ।

vi . मूल अनुबंध एवं इस प्रकार अतिरिक्त मात्रा के क्रय की लागत की कुल राशि के संबंध में वित्तीय अधिकारों के प्रतिनिधायन संबंधी प्रावधानों का अनुपालन किया जाएगा ।

3.3.9 दर संविदा (rate contract) के अंतर्गत सीधे सामग्री का क्रय

i . ऐसी सामग्री और मदों के लिए , जिन्हें सामान्य उपयोग की मदों के रूप में चिन्हित किया गया है और जिनकी सरकारी विभागों और एजेन्सियों को बार- बार आवश्यकता होती है, उनके लिए राज्य सरकार या राज्य सरकार के प्रशासनिक विभागों की पदनामित 'केन्द्रीय क्रय समिति ' द्वारा ' दर संविदा' की जा सकती है ।

ii . ऐसी दर संविदाओं का विवरण विभाग/ शासन की वेबसाइट पर रखा जाना चाहिए ।

iii . विभाग / शासन यह सुनिश्चित करेगा कि दर संविदा के मूल्य बाजार भाव या अन्य संगठनों में समान दर संविदाओं में दिए गए मूल्य से अधिक न हो ।

iv. दर संविदा आपूर्तिकर्ता फर्म की ओर से एक स्थायी प्रस्ताव होता है, जिसके सापेक्ष दिया गया क्रयादेश संबंधित फर्म हेतु बाध्यकारी होता है ।

( 46)

V. दर संविदा में किसी विशिष्ट मात्रा का उल्लेख नहीं किया जाता है एवं न ही किसी न्यूनतम आपूर्ति आदेश की गारंटी होती है ।

vi. सामान्यतः दर संविदा विशिष्ट एवं अभियांत्रिक सामग्रियों हेतु लागू होगी, किन्तु इसमें स्वास्थ्य , कृषि, खाद्य, पशुपालन, जेल विभाग, एकीकृत बाल विकास सेवाएं (बाल विकास) आदि भी सम्मिलित होंगे । सामान्य उपभोग की वस्तुओं जैसे कंप्यूटर, प्रिंटर , फोटोकॉपियर, कागज एवं लेखन सामग्री, फर्नीचर आदि जैसी अन्य कार्यालयी प्रयोज्य सामग्रियों हेतु दर संविदा निष्पादित करने की आवश्यकता नहीं है, जिन्हें Gem पोर्टल के माध्यम से क्रय किया जा सकता है ।

vii . दर संविदाओं हेतु लागू विशेष नियमों एवं शर्तों के अधीन दर संविदाएं तय करने हेतु प्रत्येक बार मानक निविदा प्रपत्रों (एस.बी.डी.) का उपयोग किया जाएगा । मानक निविदा दस्तावेज़ प्रकाशित होने तक, विभाग भारत सरकार द्वारा अनुमोदित मानक निविदा दस्तावेज़ों का उपयोग कर सकता है ।

viii . यदि यह पाया जाता है कि एकल आपूर्तिकर्ता किसी सामग्री की पूर्ण मात्रा की आपूर्ति करने की स्थिति में न हो , तो विभाग द्वारा एक ही वस्तु के लिए अलग-अलग आपूर्तिकर्ताओं के साथ दर अनुबंध संपन्न किए जा सकते हैं । ऐसी संविदाओं को समानांतर संविदा के रूप में जाना जाता है । प्रथमतः , दर संविदा न्यूनतम प्रतिक्रियाशील निविदादाता (एल1 ) को प्रदत्त किया जाना चाहिए । तथापि, सामग्री की प्रत्याशित मांग , उपयोगकर्ताओं के स्थान, प्रतिक्रियाशील निविदादाताओं ( responsive bidders ) की क्षमता, आदि के दृष्टिगत अन्य फर्मो के साथ भी न्यूनतम दर पर ही "समानांतर दर संविदा " की जा सकती है । ऐसी समस्त समानांतर दर संविदाएं समकालिक रूप से निर्गत की जाएंगी ।

दर संविदाओं की अवधि एवं नवीनीकरणः

i. दर संविदा की अवधि सामान्यतः एक वर्ष होनी चाहिए । विशेष मामलों में, इसे दो वर्ष की अवधि हेतु किया जा सकता है । तथापि , ऐसी सामग्री के विषय में जिनके मूल्य में निरंतर उतार- चढ़ाव होता रहता है या जहाँ दर संविदा की वैध अवधि में मूल्यों के कम होने की प्रवृत्ति हो , अल्पअवधि हेतु दर संविदा की जाए तथा ऐसी सामग्री के बाजार भाव पर कड़ी निगरानी रखी जाए । फर्म और राज्य सरकार के नामित केंद्रीय क्रय संगठन या राज्य सरकार के प्रशासनिक विभाग एक - दूसरे को संविदा के नियम एवं शर्तों में निर्धारित कालावधि का समुचित नोटिस देकर दर संविदा को रद्द करने के हकदार हांगे ।

ii. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नवीन दर संविदाएँ समस्त दर संविदाकृत सामग्रियों हेतु बिना किसी विलम्ब के विद्यमान दर संविदाओं की समाप्ति के तुरन्त पश्चात् प्रभावी हो जायें । तथापि, यदि अपरिहार्य कारणों से नवीन दर संविदाओं का तय किया जाना संभव नहीं हो तो संविदा धारकों की सहमति से विद्यमान दर संविदाएं को समान मूल्य, नियमों (47)

एवं शर्तों पर उपयुक्त अवधि के लिए बढ़ाने हेतु समयोचित कदम उठाए जाने चाहिए । जो फर्म / कंपनियां इस प्रकार के विस्तार हेतु सहमत नहीं हैं , उनके साथ आगे दर संविदा संव्यवहार नहीं किया जायेगा । इस प्रकार के विस्तार की अवधि 3 (तीन) माह से अधिक नहीं होनी चाहिए । विशेष परिस्थितियों में अग्रेत्तर विस्तार, संबंधित प्रशासकीय विभाग द्वारा वित्त विभाग की सहमति के उपरांत दिया जा सकेगा । विद्यमान दर संविदाओं का विस्तार करते समय यह सुनिश्चित किया जायेगा कि दर संविदा के अधीन कय की जाने वाली सामग्री या उसके घटकों का बाजार मूल्य इस कालावधि के दौरान कम न हो गया हो ।

3.3.10 विशिष्ट विशेषताओं के साथ अधिप्राप्ति

3.3.10.1 इलेक्ट्रॉनिक रिवर्स नीलामी

i . इलेक्ट्रॉनिक रिवर्स नीलामी एक प्रकार की नीलामी है जहां ऑनलाइन रिवर्स नीलामी प्रारम्भ होने से पूर्व आरम्भिक मूल्य, निविदा ह्रास , नीलामी की अवधि, स्वचालित विस्तारण की अधिकतम संख्या की घोषणा की जाती है । यदि आवश्यक हो तो इलेक्ट्रॉनिक रिवर्स नीलामी के प्रारम्भ से पूर्व ई- अधिप्राप्ति प्रक्रिया के माध्यम से निविदादाताओं की पात्रता/ पूर्व- योग्यता के आधार पर सक्षम निविदादाताओं को लघुसूचीबद्ध किया जा सकता है, जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक रिवर्स नीलामी में भाग लेने की अनुमति दी जा सकती है । ऐसे लघुसूचीबद्ध किए गए बोलीदाता इलेक्ट्रॉनिक रिवर्स नीलामी प्रक्रिया के आरम्भ के बाद पुनरावृत्तीय प्रक्रिया में ऑनलाइन बोली लगाना शुरू कर सकते हैं, जिसमें किसी भी समय सबसे कम बोली लगाने वाले को नीलामी के दौरान प्रतिस्पर्धी बोली लगाने वाले की और भी कम बोली से विस्थापित किया जाता है । यदि समापन समय के अंतिम कुछ मिनटों (उदाहरणार्थ दो मिनट) के भीतर एक नई निचली बोली प्राप्त होती है, तो अन्य प्रतिभागियों के प्रतिक्रिया देने हेतु समापन समय स्वचालित रूप से कुछ मिनटों (उदाहरणार्थ पांच मिनट) तक बढ़ाया जा सकता है । ऐसे विस्तारणों की अधिकतम संख्या रिवर्स नीलामी आरम्भ होने से पूर्व निर्धारित की जानी चाहिए । निर्धारित या विस्तारित समय के अंत में सबसे अनुकूलतम बोली उद्धृत करने वाले बोलीदाता को सफल बोलीदाता घोषित किया जाता है ।

ii . यह प्रणाली उन विषयों की अधिप्राप्ति में प्रयोग में लायी जा सकती है जहां बोलीदाताओं का एक प्रतिस्पर्धात्मक बाजार होना इस प्रकार संभावित हो कि प्रभावी प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित हो सके ।

iii. इलेक्ट्रॉनिक रिवर्स नीलामी हेतु आमंत्रण में, ई-अधिप्राप्ति प्रक्रिया में विनिर्दिष्ट सूचना के अतिरिक्त, नीलामी हेतु अभिगम ( access ) एवं पंजीकरण, नीलामी खोलने तथा बंद करने और नीलामी के परिचालन के मानक सम्बन्धी विवरण सम्मिलित होंगे ।

(48 )

iv. निविदा आमंत्रण प्राधिकारी नीलामी हेतु वित्त विभाग की पूर्वानुमति से एन.आई.सी. द्वारा विकसित भारत सरकार के अधिप्राप्ति पोर्टल " ई-ऑक्शन इंडिया " प्लेटफॉर्म का भी उपयोग कर सकते हैं ।

3.3.10.2 स्वामित्वधारी (Proprietary) वस्तु प्रमाणपत्र सामग्री की अधिप्राप्ति में, कतिपय वस्तुएं केवल मूल उपकरण विनिर्माताओं (ओ.ई.एम.) या स्वामित्वधारी अधिकार वाले विनिर्माताओं (या उनके अधिकृत डीलरों/ भण्डारकों) से समुचित प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित स्वामित्वधारी वस्तु प्रमाणपत्र के सापेक्ष अधिप्राप्त की जाती हैं । एक बार निर्दिष्ट स्तर पर स्वामित्वधारी वस्तु प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर हो जाने के पश्चात् अधिप्राप्ति के अधिकार शक्तियों के प्रतिनिधायन के अनुसार सामान्य परिस्थितियों के समान ही होती हैं ।

i. इंडेंटर द्वारा अपने मांग पत्र के साथ एक स्वामित्वधारी वस्तु प्रमाण पत्र संलग्न करना चाहिए, जो मूल उपकरण निर्माता या स्वामित्वधारी वस्तु प्रमाण पत्र धारक फर्मों से क्रय किए जाने के औचित्य एवं उस वस्तु के क्रय हेतु वित्तीय अधिकारों के प्रतिनिधायन के अनुसार उचित स्तर पर अनुमोदन दर्शाता है;

ii. स्वामित्वधारी सामग्रियां केवल नामांकित विनिर्माता या उनके अधिकृत डीलर के माध्यम से ही क्रय की जाएंगी जैसा कि स्वामित्वधारी वस्तु प्रमाण पत्र में अभिलिखित है; जहां तक संभव हो, फर्म को यह प्रमाणित करने हेतु कहा जाएगा कि उनके द्वारा उद्धृत दरें सही हैं तथा अन्य शासकीय, सार्वजनिक क्षेत्र या निजी संगठनों को विगत 01 वर्ष में प्रस्तुत की गई दरों से अधिक नहीं हैं;

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा स्वामित्वधारी लेख प्रमाण पत्र/ एकल निविदा अधिप्राप्ति के सम्बन्ध में संविदा प्रदत्त किये जाने से संबंधित प्रतिवेदन प्रशासकीय विभाग को प्रस्तुत किया जाए । ऐसे मामलों में, ऐसी स्वामित्वधारी लेख प्रमाण पत्र/ एकल निविदा अधिप्राप्ति की जांच हेतु आंतरिक लेखापरीक्षा की आवश्यकता हो सकती है । ऐसी संविदाओं का विवरण अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की वेबसाइट पर भी संविदा प्रदत्त किये जाने के 30 दिनों के भीतर प्रकाशित किया जाना चाहिए ।

3.3.10.3 वर्तमान सामग्री के बदले आपूर्ति प्रस्ताव (बाय बैक ऑफर) यदि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से यह निर्णय लिया जाए कि वर्तमान में उपलब्ध पुरानी सामग्री को नई तथा बेहतर गुणवत्ता वाली सामग्री से बदला जाए तो विभाग वर्तमान पुरानी सामग्री का नई सामग्री के क्रय करते समय व्यापार कर सकता है । इस उद्देश्य हेतु वर्तमान पुरानी वस्तुओं का मूल्यांकन एक अधिकृत मूल्यांकनकर्ता द्वारा किया जाए तथा इसके आधार पर निविदा दस्तावेजों में यथोचित प्रस्ताव रखा जाए ताकि भावी एवं इच्छुक निविदादाता तद्नुसार अपनी निविदा को संरचित कर सकें । इस प्रकार व्यापार की जाने वाली सामग्री के (49)

सफल निविदादाता को हस्तांतरण का समय व तरीका आदि महत्वपूर्ण विवरणों को यथोचित रूप से निविदा दस्तावेजों में सम्मिलित किया जाए । निविदा दस्तावेजों के प्रावधानों में इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख किया जाए कि क्रेता नई सामग्री क्रय करते समय पुरानी सामग्री का व्यापार करें या न करे, यह उसका निर्णय होगा ।

3.3.10.4 वार्षिक अनुरक्षण संविदा

अधिप्राप्ति की लागत एवं प्रकृति के आधार पर, सामग्री के आपूर्तिकर्ता या आपूर्तिकर्ता के अतिरिक्त किसी अन्य सक्षम फर्म के साथ नियत अवधि हेतु अनुरक्षण संविदा निष्पादित करना आवश्यक हो सकता है ।

जटिल एवं वृहत अनुरक्षण संविदाओं के संबंध में एक सेवा स्तर अनुबंध (एस.एल.ए.) को समाविष्ट किया जा सकता है । सेवा स्तर अनुबंध में सेवा मापदंडों, जैसे- उपकरण के माध्यम से सुनिश्चित किये जाने वाला अपटाइम प्रतिशत व निष्पादन उत्पादन (performance output) स्तर ; सेवा अनुरोध पंजीकरण प्रणाली; अनुरोध समाधान हेतु प्रतिक्रिया समय , अनुरोध के विलंब या असंतोषजनक समाधान के प्रकरण में सेवा अनुरोध वर्धन प्रणाली, सेवा स्तरों का अनुश्रवण , आदि के प्रत्याभूत स्तरों को उपदर्शित किया जाना चाहिए । इसमें हेल्प लाइन का प्रावधान, शिकायत पंजीकरण एवं वृद्धि प्रक्रियाएं, प्रतिक्रिया समय, अद्यतन प्रतिशत तथा उपस्करों की उपलब्धता, अनुरक्षण पश्चात् निष्पादन स्तर में ह्रास न होना, सामान्य पुर्जों की सूची का अनुरक्षण , प्रामाणिक पुर्जों का उपयोग आदि शामिल होंगे । अनुरक्षण संविदा में समाप्ति के उपबंधों सहित प्रतिक्रिया में अवांछनीय विलम्ब, मशीनों के निष्पादन में कमी हेतु शास्तियां (परिनिर्धारित क्षति) भी सम्मिलित हो सकती है ।

3.4 निविदा / बोली दस्तावेज तैयार करना, सूचना प्रकाशन, निविदा प्राप्ति एवं खोलना

3.4.1 बोली दस्तावेजों की विषय वस्तु

i. बोली दस्तावेज़ स्व- निहित (self- contained) एवं व्यापक (comprehensive ) होने चाहिए । सामग्री की विशिष्टियां, मात्रा, वितरण का स्थान एवं समय , दंडात्मक धाराएं एवं न्यायालय के क्षेत्राधिकार आदि को बिना किसी अस्पष्टता के विनिर्दिष्ट किया जाना चाहिए ।

ii. निविदा सम्बन्धी प्रस्ताव के दस्तावेज़ को, जिसमें समस्त निबंधन, शर्तें, पूर्वापेक्षाएं एवं सूचनाएं निहित हों, निम्नानुसार उपयुक्त अध्यायों में दर्शाया जायेगाः

क. निविदा आमंत्रण सूचना

ख. निविदादाताओं हेतु निर्देश

ग. निविदादाताओं हेतु निर्देशों का परिशिष्ट-डेटा शीट

घ. पात्रता एवं अर्हता मानदंड

ड. संविदा की सामान्य शर्तें ( 50)

च. संविदा की विशेष शर्तें

छ. आवश्यकताओं की अनुसूची

ञ. तकनीकी विशिष्टताएँ (चित्रों सहित) संबद्ध तकनीकी विवरण तथा गुणवत्ता आश्वासन (निरीक्षण एवं परीक्षण)

ट. वितरण/ पूर्णता की शर्तें

ढ. विवादों के निस्तारण हेतु प्रावधान

ड मूल्य सारिणी (सूची) , (निविदादाताओं द्वारा मूल्य प्रस्तुत / इंगित करने के प्रयोगार्थ) ढ. अनुबंध / संविदा का प्रारूप /प्रपत्र

ण. क्रेता एवं निविदादाताओं के उपयोग हेतु निविदा व्याख्या पत्र, मूल्य सूची, बैंक गारंटी एवं संविदा प्रारूप अथवा अन्य मानक प्रपत्र, यदि कोई हो।

3.4.2 निविदाओं की प्राप्ति एवं अभिरक्षा

ई-अधिप्राप्ति में , निविदादाताओं द्वारा अपलोड की गई समस्त निविदाएं ई- अधिप्राप्ति पोर्टल पर ही ऑनलाइन प्राप्त कर खोली जायेंगी । सम्परीक्षा के समय इनकी मांग किए जाने पर सम्प्रेक्षा दल को इनकी सॉफ्ट कॉपी अथवा हार्ड कॉपी , जैसा कि उधृत किया गया हो, उपलब्ध करायी जाएगी ।

3.4.3 निविदा खोलना

i. निविदादाताओं के प्राधिकृत प्रतिनिधि, जो निविदा खोलने की प्रक्रिया में प्रतिभाग करने के इच्छुक हों, उन्हें अपने साथ संबंधित निविदादाता से प्राधिकार पत्र लाना होगा ।

ii. पूर्व निर्धारित दिनांक एवं समय पर तकनीकी संवीक्षा समिति द्वारा ई -अधिप्राप्ति पोर्टल पर निविदाएं खोली जायेंगी ।

तकनीकी संवीक्षा समिति द्वारा निविदा खोलने की प्रक्रिया में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों की सूचना हेतु कुल प्राप्त निविदाओं, उनमें धरोहर राशि प्रस्तुत की गयी है या नहीं, तथा निविदा से संबंधित अन्य कोई विशेष तथ्य हो, तो उसकी घोषणा करनी चाहिए ।

iv. निविदा खोलने संबंधी कार्यवृत्त को जिसमें निविदादाताओं के नाम (क्रमांकवार) , निविदाओं की मुख्य विशेषताएं, जैसा कि निविदाओं के सार्वजनिक विवृति के दौरान पढ़ा जाएगा, निविदा खोलने वाले अधिकारियों द्वारा तैयार किया जाएगा, तथा दिनांक एवं समय के साथ उनके द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित किया जाएगा ।

V. विज्ञापित निविदा पृच्छा अथवा सीमित निविदा पृच्छा के मामले में, विलम्ब से प्राप्त बोलियों (अर्थात बोलियां प्राप्त करने हेतु निर्दिष्ट दिनांक एवं समय के पश्चात प्राप्त बोलियां) के सन्दर्भ में मूल्यांकन हेतु विचार नहीं किया जाएगा ।

( 51 )

3.5 निविदा का मूल्यांकन एवं संविदा प्रदत्त करना

3.5.1 गैर- प्रतिक्रियाशील निविदाएँ

जो निविदाएं निविदा दस्तावेजों में निर्दिष्ट बुनियादी आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं करती हैं उन्हें गैर - प्रतिक्रियाशील मानते हुए अनदेखा कर दिया जाएगा । प्राप्त समस्त निविदाओं की सर्वप्रथम तकनीकी संवीक्षा समिति द्वारा जांच की जाएगी ताकि यह देखा जा सके कि क्या निविदाएं निविदा दस्तावेज़ में सम्मिलित बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं अथवा नहीं तथा यदि कोई गैर- प्रतिक्रियाशील निविदाएं हैं तो उन्हें चिन्हित किया जायेगा ।

3.5.2 निविदा का स्पष्टीकरण / दस्तावेजों की कमी

निविदाओं के मूल्यांकन एवं तुलना के दौरान, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था स्वविवेक से निविदादाता से निविदा के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण मांग सकती है । स्पष्टीकरण हेतु अनुरोध पंजीकृत डाक / स्पीड पोस्ट या ई - मेल द्वारा लिखित रूप में दिया जाना चाहिए, जिसमें निविदादाता को एक निर्दिष्ट दिनांक तक प्रत्युत्तर देने हेतु कहा जाएगा तथा उसमें यह भी उल्लिखित किया जाएगा कि यदि निविदादाता नियत दिनांक तक अनुपालन या प्रत्युत्तर नहीं देता है, तो वह निविदा के अस्वीकरण हेतु उत्तरदायी होगा । प्राप्त स्पष्टीकरण के आधार पर, ऐसी निविदाओं को अनदेखा कर दिया जाएगा या इन पर आगे विचार किया जाएगा । निविदा की लागत या सार में किसी प्रकार के परिवर्तन की मांग , प्रस्ताव या अनुमति नहीं दी जाएगी ।

अनुपलब्ध सूचना / दस्तावेजों को केवल उन ऐतिहासिक / पूर्ववर्ती दस्तावेजों के प्रकरण में ही मंगाया जाना चाहिए जो निविदा जमा करने के समय पहले से मौजूद थे, जिन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जा सकता है और जिनमें तब से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है । ऐसी सूचनाएं / दस्तावेज निविदा संवीक्षा समिति की संस्तुतियों के आधार पर ही मंगाये जाने चाहिए ।

3.5.3 समान दर वाली निविदाएं

सामग्री की अधिप्राप्ति के सम्बन्ध में , यदि दो या दो से अधिक निविदादाता समान राशि उद्वत करते हैं, तो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निविदा दस्तावेजों में परिभाषित शर्तों के अनुसार निविदादाता का चयन करेगी , जो निम्न पर आधारित हो सकता है:

क. टर्नओवर के आधार पर निर्धारित उच्चतम वित्तीय क्षमता या

ख . तकनीकी क्षमता को दर्शाने वाला कोई मानक या

ग . अन्य कोई मानक, जैसा कि निविदा दस्तावेज़ में विनिर्दिष्ट किया गया हो ।

3.5.4 असामान्य रूप से न्यून दर वाली निविदाएं

असामान्य रूप से न्यून दर वाली निविदा वह होती है जिसमें निविदा के अन्य तत्वों के साथ संयोजन में निविदा का मूल्य इतना न्यून प्रतीत होता है कि यह प्रस्तावित मूल्य पर संविदा निष्पादित करने हेतु निविदादाता की क्षमता के सम्बन्ध में ठोस चिंताएं एवं संशय पैदा करती ( 52)

है । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था ऐसे प्रकरणों में निविदादाता से लिखित स्पष्टीकरण मांग सकती है, जिसमें निविदा के विस्तार, जोखिमों एवं दायित्वों के आवंटन तथा निविदा दस्तावेज़ की किसी भी अन्य आवश्यकताओं के संबंध में उसके निविदा मूल्य का विस्तृत मूल्य विश्लेषण शामिल है । यदि, मूल्य विश्लेषण का मूल्यांकन करने के पश्चात् अधिप्राप्तिकर्ता संस्था यह निर्धारित करती है कि निविदादाता प्रस्तावित मूल्य पर संविदा वितरण की अपनी क्षमता प्रदर्शित करने में सारभूत रूप से विफल रहा है , तो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निविदा / प्रस्ताव को अस्वीकृत कर सकती है ।

3.5.5 परक्रामण ( Negotiation)

एकल स्रोत अधिप्राप्ति पद्धति के सिवाय, जहां तक संभव हो, किसी प्रकार का परक्रामण प्रवर्तित नहीं किया जायेगा । निविदा संवीक्षा समिति की संस्तुतियों के आधार पर सबसे कम बोली लगाने वाले के साथ परक्रामण करने का निर्णय लिया जा सकता है । परक्रामण की अनुशंसा करने वाले प्राधिकारी द्वारा यथार्थपूर्ण कारण अभिलिखित किए जाने चाहिए । सक्षम प्राधिकारी को किसी निविदा को स्वीकार करते समय या परक्रामण का आदेश देते समय या पुनः निविदा हेतु बुलाते समय यथोचित विवेक (due diligence ) का प्रयोग करना चाहिए तथा अग्रिम कार्यवाही हेतु एक निश्चित कालावधि उपदर्शित करनी चाहिए ।

3.5.6 सफल निविदादाता को अधिनिर्णय पत्र

निविदा की वैधता समाप्त होने से पूर्व, सफल निविदादाता को निविदा स्वीकृति सम्बन्धी अधिनिर्णय पत्र (letter of award ) निर्गत किया जाएगा , जिसमें मात्रा, सामग्री की विशिष्टता, मूल्य, आदि सुसंगत विवरण संक्षेप में उपदर्शित किये जाएंगे । इसे पंजीकृत डाक या संचार के किसी अन्य स्वीकार्य एवं विश्वसनीय पद्धति द्वारा प्रेषित किया जाना चाहिए । संविदा प्रदत्त करने सम्बन्धी विवरण एवं सफल निविदादाता का नाम तथा अधिनिर्णय पत्र ई-अधिप्राप्ति पोर्टल तथा संबंधित विभाग के सूचना पट्ट/विज्ञप्ति/ वेबसाइट में उल्लिखित किया जाना चाहिए ।

सफल निविदादाता को यह अधिसूचित किए जाने के पश्चात् कि उसकी निविदा स्वीकार कर ली गई है , उसे हस्ताक्षर एवं वापसी हेतु अनुबंध प्रेषित किया जाएगा, जिसमें पक्षकारों के मध्य सहमति हेतु समस्त निबंधन एवं शर्तें सम्मिलित होंगी । आपूर्तिकर्ता को संविदा निर्गत होने की दिनांक से 14 (चौदह) दिनों के भीतर अनुबंध को अप्रतिबंधित रूप से स्वीकृत , हस्ताक्षरित एवं तददिनांकित करते हुए वापस करना चाहिए ।

3.6 प्रतिभूतियां एवं भुगतान की शर्तें

3.6.1 निविदा प्रतिभूति या धरोहर धनराशि

i. विज्ञापित या सीमित निविदा पृच्छा के प्रकरण में निविदा जमा करने के बाद निविदादाता द्वारा निविदा वापस लेने या वैधता अवधि में निविदा में परिवर्तन करने के सापेक्ष सुरक्षा ( 53)

प्रदान करने की दृष्टि से निविदादाताओं से, उन्हें छोड़कर जिन्हें विधि एवं नियमों के विशिष्ट प्रावधानों के अंतर्गत छूट प्रदान की गयी हो, निविदा प्रतिभूति ( जिसे धरोहर धनराशि भी कहा जाता है) ली जाएगी । निविदा प्रतिभूति सामान्यतः अधिप्राप्ति के अनुमानित मूल्य के 2 से 3 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए । निविदा प्रतिभूति को निकटतम हज़ार रुपये तक पूर्णांकित किया जाना चाहिए , जिसे अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा विनिर्दिष्ट निविदा दस्तावेजों में उपदर्शित किया जाना चाहिए । प्रतिशत का निर्धारण सामग्री के संपूर्ण मूल्य पर निम्नानुसार निर्धारित किया जाएगाः

क. रू 25,00,000 तक अनुमानित निविदा मूल्य का 3 प्रतिशत ,

ख. रू 25,00,000 रुपये से ऊपर निविदा मूल्य का 2 प्रतिशत । रु 75,000 + रु 25,00,000 से अधिक अनुमानित ii. इन दरों का शासन द्वारा समय- समय पर पुनरीक्षण किया जा सकता है । निविदा प्रतिभूति को शासन / प्राधिकरण के नाम पर बैंक ड्राफ्ट, सावधि जमा रसीद या बैंक गारंटी (ई- बैंक गारंटी सहित ) आदि के रूप में बंधक रखा जायेगा अथवा ई- बैंकिंग (यदि कोई हो) के माध्यम से जैसा भी सक्षम प्राधिकारी की संतुष्टि तथा क्रेता के हितों की सभी प्रकार से सुरक्षा हेतु आवश्यक हो, जमा किया जा सकेगा । सामान्यतः निविदा प्रतिभूति की वैधता निविदा की अंतिम वैध अवधि के पश्चात् 45 दिन होगी परंतु इस अवधि को आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकता है ।

असफल निविदादाताओं की निविदा प्रतिभूति उसकी अंतिम वैधता अवधि की समाप्ति पर यथाशीघ्र , परन्तु संबंधित अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा संविदा प्रदत्त करने के उपरांत 30 दिनों के अंतर्गत ही सम्बंधित निविदादाताओं को लौटा देनी चाहिए ।

iv. वित्त विभाग की सहमति से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एम.एस.एम.ई.) विभाग द्वारा जारी राज्य एम.एस.ई. अधिप्राप्ति नीति में परिभाषित या शासन द्वारा समय- समय पर प्राथमिकता के आधार पर अधिसूचित सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (एम.एस.ई. ) को निविदा प्रतिभूति प्रस्तुत करने से छूट प्रदान की जा सकेगी ।

V.

केंद्र सरकार या राज्य सरकार के संस्थानों , राज्य सरकार के विभागों , राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों को निविदा प्रतिभूति जमा करने से छूट प्राप्त है ।

vi. राज्य सरकार समय- समय पर अधिसूचित कर सकती है कि, निविदा प्रतिभूति के स्थान पर निविदादाताओं को "बिड सिक्योरिंग डिक्लेरेशन" (Bid Securing Decleration) पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता होगी, जिसमें यह स्वीकार किया जायेगा कि यदि वे निविदा प्रस्तुत करने हेतु विधिमान्य कालावधि से पूर्व निविदा को प्रत्याहरित या उपान्तरित करते हैं, या यदि संविदा प्रदत्त होने पर संविदा पर हस्ताक्षर करने , अथवा निविदा दस्तावेज़ के अनुरोध में परिभाषित समय सीमा से पूर्व निष्पादन हेतु अपेक्षित प्रतिभूति जमा करने में विफल रहते हैं, ( 54)

तो उन्हें अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा निर्दिष्ट समय अवधि हेतु भविष्य की निविदाएं जमा करने के पात्र होने से निरर्हित कर दिया जायेगा ।

vii . धरोहर राशि जमा करने की छूट प्रदान करने की दशा में निविदादात्ताओं से बिड सिक्योरिंग डिक्लेरेशन (Bid Securing Decleration) प्राप्त की जानी चाहिए ।

निविदा प्रतिभूति का समपहरण (Forfeiture) :

निविदादाता से ली गई निविदा प्रतिभूति निम्नलिखित मामलों में समपहृत कर दी जायेगीः-

क. जब निविदादाता निविदा जमा करने की नियत दिनांक एवं समय के पश्चात् निविदा की वैधता अवधि के दौरान अपनी निविदा वापस लेता है ,

ख. जब सफल निविदादाता निविदा पूर्व दस्तावेज़ों में निर्दिष्ट निष्पादन प्रतिभूति जमा करने में विफल रहता है ,

ग . जब सफल निविदादाता निविदा दस्तावेज़ के अनुसार संविदा पर हस्ताक्षर करने में विफल रहता है,

घ. यदि निविदादाता सत्यनिष्ठा संहिता के किसी भी उपबंध का उल्लंघन करता है ।

3.6.2 कार्यपूर्ति प्रतिभूति

i. संविदा के सम्यक रूप से निष्पादन को सुनिश्चित करने हेतु सफल निविदादाता जिसके पक्ष में संविदा प्रदत्त की गई हो, से कार्यपूर्ति प्रतिभूति (धरोहर) ली जाएगी । कार्यपूर्ति धरोहर प्रत्येक सफल निविदादाता से, उनके पंजीकरण की प्रास्थिति आदि पर ध्यान दिए बगैर ली जाएगी । संविदा में निहित धनराशि के मूल्य को दृष्टि में रखते हुए कार्यपूर्ति प्रतिभूति संविदा के मूल्य की 3 % से 10 % होनी चाहिए ।

ii. कार्यपूर्ति प्रतिभूति वाणिज्यिक बैंक से निर्गत आदाता के नाम (एकाउंट पेई) डिमांड ड्राफ्ट, सावधि जमा रसीद या बैंक गारंटी आदि , जिस स्वरूप में विभाग/ सक्षम प्राधिकारी के हित सभी प्रकार से सुरक्षित करने हेतु आवश्यक हो, ली जाये एवं उसकी सत्यता को सत्यापित करा लिया जाए ।

कार्यपूर्ति प्रतिभूति बोली दस्तावेजों में परिभाषित एक विशिष्ट दिनांक तक प्रस्तुत की जायेगी और इसे आपूर्तिकर्ताओं / निविदादाताओं के संविदात्मक दायित्वों, जिनमें वारंटी सम्बन्धी दायित्व भी सम्मिलित हैं , की पूर्ति करने की अवधि के 60 दिनों बाद तक की अवधि के लिए वैध होना चाहिए । यदि संविदा की अवधि में वृद्धि की जाती है तो कार्यपूर्ति प्रतिभूति विस्तारित अवधि से 60 दिन बाद की वैधता तक लिया जाना वांछित होगा ।

iv. सफल निविदादाता द्वारा कार्यपूर्ति प्रतिभूति प्राप्त होने के 30 दिनों के अंतर्गत उसकी निविदा प्रतिभूति वापस कर दी जानी चाहिए ।

( 55 )

V. संविदा के सम्यक रूप में विधिवत निष्पादित होने एवं वारंटी सहित ऐसे समस्त दायित्वों की पूर्ति होने के पश्चात् 60 दिनों के भीतर यह प्रतिभूति ठेकेदार को बिना किसी ब्याज के वापस कर दी जाएगी ।

vi. ठेकेदार द्वारा संविदा भंग की स्थिति में कार्यपूर्ति प्रतिभूति जब्त कर ली जाएगी तथा अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के खाते में जमा कर दी जाएगी ।

3.6.3 आपूर्तिकर्ता को अग्रिम भुगतान

i. सामान्यतः आपूर्ति / सेवाएं पूर्ण करने के पश्चात ही भुगतान किया जाना चाहिए । परन्तु निम्नलिखित परिस्थितियों में अग्रिम भुगतान की व्यवस्था की जा सकती है:

क. एयर कंडीशनर, कंप्यूटर या अन्य कीमती उपकरणों आदि के अनुरक्षण हेतु सम्बन्धित अनुरक्षणकर्ता अनुबंधित फर्म द्वारा अग्रिम भुगतान की मांग करने पर ।

ख . ऐसी फर्म जो निर्माण संविदा (फैब्रिकेशन) पर हो , आद्योपांत संविदा (टर्न की) पर हो द्वारा अग्रिम भुगतान की मांग करने पर ।

ii . इस प्रकार के अग्रिम भुगतान निम्नलिखित सीमा से अधिक नहीं होने चाहिएः

क. निजी फर्मों को अनुबंध मूल्य का 30%

ख. राज्य/ केंद्र सरकार की इकाई / संस्था अथवा राज्य / केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों को अनुबंध मूल्य का 40 %

ग . अनुरक्षण / रखरखाव संविदा के प्रकरण में संविदा की शर्तों के अधीन अग्रिम धनराशि छह माह में देय धनराशि से अधिक नहीं होनी चाहिए ।

वित्त विभाग की पूर्व सहमति से अधिप्राप्तिकर्ता संस्था उपरोक्त दरों को शिथिल कर सकती है ।

iii . उपरोक्तानुसार किसी भी प्रकार के अग्रिम स्वीकृत करते समय पर्याप्त सुरक्षा की दृष्टि से आपूर्तिकर्ता / फर्म से बैंक गारंटी आदि प्राप्त की जाए ।

iv. तथापि, राज्य/ केंद्र सरकार की एजेंसी / संस्था या सार्वजनिक उपक्रमों को ऐसी अग्रिम राशि बिना किसी बैंक गारंटी के प्रदान की जा सकती है ।

3.6.4 आपूर्तिकर्ता को आंशिक भुगतान

जहां निविदा की शर्तों में गंतव्य/ स्थल पर वितरण का प्रावधान है, वहां सामान्य प्रेषिती द्वारा सामग्री की प्राप्ति एवं स्वीकृति तथा आपूर्तिकर्ता द्वारा सभी आवश्यक दस्तावेजों के उपलब्ध कराने पर ही 100 प्रतिशत भुगतान किया जा सकता है । तथापि, निम्नलिखित प्रकरणों में आंशिक भुगतान की अनुमति दी जा सकती हैः

i. जहां आपूर्तिकर्ता द्वारा आपूर्ति की जाने वाली सामग्रियों के प्रतिस्थापन एवं प्रवर्तन (Instalation and Commisioning) की भी आवश्यकता होती है, वहां सामग्री की प्राप्ति एवं ( 56 )

स्वीकृति पर आंशिक भुगतान किया जा सकता है । संविदा में भुगतान शर्तों में भुगतान प्रतिशत का स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए जो 80 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा (यदि निविदा दस्तावेजों में उल्लेख किया गया है) और प्रतिस्थापन व प्रवर्तन के पश्चात् अनुबंध में निर्धारित सभी अपेक्षित परीक्षणों/ दस्तावेज़ों के संपन्न/ प्राप्त हो जाने के उपरान्त अंतिम भुगतान किया जायेगा । ऐसी भुगतान शर्तों को निविदा दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए ।

ii. एक नियम के रूप में सामग्री की आपूर्ति हेतु भुगतान तब तक स्वीकार्य नहीं है जब तक कि सामग्री प्राप्त न हो जाए, सत्यापित न हो जाए तथा भण्डारण में न ले ली जाए । सामान्यतः इस नियम के अनुपालन हेतु सामग्री की आपूर्ति के लिए समस्त संविदाओं में उपबंध किया जाना चाहिए ।

सामग्री की मात्रा एवं गुणवत्ता के सत्यापन से पूर्व भुगतान की अनुमति केवल असाधारण मामलों में ही अत्यावश्यकता के आधार पर प्रदान की जाएगी । अधिप्राप्तिकर्ता अधिकारी द्वारा अपने से उच्च प्राधिकारी से अनुमोदन प्राप्त किया जाएगा और अतिआवश्यकता की स्थिति को लिखित रूप में अभिलिखित किया जाएगा । आंशिक भुगतान के उपबंध संविदा के हिस्सा होंगे ।

3.7 संविदा को बंद करना (Closing of Contract)

सामग्री की अधिप्राप्ति, जिस पर समस्त कार्यवाही पूर्ण हो चुकी है, तथा अग्रिम कोई कार्यवाही अपेक्षित नहीं है, बंद कर दी जानी चाहिए । संविदा बंद करने के समय समस्त बकाया प्रकरणों को निस्तारित किया जायेगा । संविदा को बंद करने से पूर्व निम्नलिखित कारकों पर विचार किया जाना चाहिए:

i. सामग्री की आपूर्ति निर्धारित अवधि के अंतर्गत विनिर्देशों एवं निबंधनों के अनुसार सम्पूर्ण मात्रा में की गयी है एवं अनुबंध की शर्तों के अनुसार आपूर्ति एवं अन्य विनिर्दिष्ट कार्य की पूर्णता के संबंध में इस हेतु गठित समिति की आख्या प्राप्त हो गयी हो,

ii . आपूर्ति के दौरान हुई हानि, टूट-फूट एवं दोषों को सही किया गया है ।

iii . वारंटी अवधि समाप्त हो गई है ।

iv. संविदा में मूल्य भिन्नता खंड, यदि कोई हो, के अंतर्गत आपूर्तिकर्ताओं द्वारा किए गए दावों का निस्तारण किया जा चुका है ।

v. प्रेषिती (Consignee) से अधियाचित प्रमाणपत्र प्राप्त हो गया है ।

vi . चूककर्ता फर्म / कंपनी से जोखिम क्रय के संबंध में वास्तविक पुनर्प्राप्ति की जा चुकी है ।

vii . परिनिर्धारित क्षति के संबंध में कोई दावा लंबित नहीं है ।

viii . जुर्माना माफी का कोई प्रस्ताव लंबित नहीं है ।

ix. निविदा के नमूने, यदि कोई हों, निविदाकर्ता को वापस कर दिये गये हैं ।

( 57 )

x. प्रतिभूति निक्षेप वापस कर दिया गया है / समायोजित कर दिया गया है ।

xi . संविदा अनुबंध / कार्यादेश को ई-अधिप्राप्ति पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया है:

परन्तु यह कि, यदि संपरीक्षा सम्बन्धी आपत्तियां एवं विधिक विवाद हों तो ऐसे प्रकरणों को किसी भी परिस्थिति में बंद नहीं किया जाना चाहिए । ऐसी संविदाओं से संबंधित फाइलें सुरक्षित अभिरक्षा हेतु कार्यालयाध्यक्ष/ विभागाध्यक्ष द्वारा अधिकृत अधिकारी को हस्तगत कर दी जानी चाहिए ।

3.8 स्क्रैप, निष्प्रयोज्य वाहन, पुराने वृक्ष एवं अन्य अनुपयोगी सामग्रियों का निस्तारण

i. जब भी ऐसा प्रतीत होता है कि भण्डारण जनित सामग्री, या मोटर वाहनों सहित उपस्कर एवं संयंत्र या तो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की आवश्यकता से अधिक हैं या निष्प्रयोज्य हो गए हैं तथा आगे उपयोग हेतु अनुपयुक्त हैं, तो प्रकरण को सक्षम प्राधिकारी को सूचित किया जाना चाहिए , जिनके द्वारा सामग्रियों के निरीक्षण की व्यवस्था की जाय तथा नीलामी हेतु यथायोग्य निर्णय लिया जाये ।

ii. यदि नीलाम की जाने वाली प्रस्तावित वस्तुएं सेवा योग्य हैं या उचित मरम्मत/ सुधार के बाद सेवा योग्य होने की संभावना है एवं अधिशेष होने के कारण नीलाम की जा रही हैं, तो ऐसी वस्तुओं की एक सूची सर्वप्रथम अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के अन्य कार्यालयों में प्रसारित की जानी चाहिए , जिनके लिए अधिशेष वस्तुओं की सम्भवतः आवश्यकता हो सकती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि क्या उनमें से किसी के द्वारा उनका उपयोग किया जा सकता है । सूची में प्रत्येक वस्तु की स्थिति, बही मूल्य तथा द्वासित मूल्य भी उपदर्शित किया जाना चाहिए । निर्दिष्ट अवधि में अन्य विभागों द्वारा कोई उत्तर नहीं दिए जाने या उनकी आवश्यकता न होने संबंधी सूचना प्राप्त होने पर नीलामी की जा सकेगी । ज्ञासित मूल्य के आधार पर ही अग्रेत्तर वर्णित नीलामी की निर्धारित प्रक्रियानुरूप कार्यवाही सम्पादित की जाएगी ।

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था, जिलाधिकारी एवं लोक निर्माण विभाग कार्यालय के सूचना पट्ट पर अधिसूचित करने के पश्चात् 25,000 रुपये (पच्चीस हजार रुपए) मूल्य तक के छोटे मूल्य के स्क्रैप जैसे कि रद्दी कागज या औद्योगिक अपशिष्ट, संक्षिप्त कोटेशन के आधार पर स्थानीय स्क्रैप डीलरों को सीधे बेचा जा सकता है । कोटेशन (दर सूची) आमंत्रित करने की सूचना अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की वेबसाइट पर भी अपलोड की जाएगी ।

iv. उन सामग्रियों के निस्तारण हेतु नीलामी के माध्यम से स्क्रैप प्रक्रिया का सहारा लिया जा सकता है जिनका कुल मूल्य 25,000 रुपये से 5,00,000 रुपये के बीच है ।

V. जिन सामग्रियों का कुल मूल्य 5,00,000 रुपये (पांच लाख रुपये) से अधिक है , उनके निस्तारण हेतु निविदा अथवा निविदा सह नीलामी प्रक्रिया का सहारा लिया जा सकता है ।

( 58 )

vi. नीलामी तथा निविदा सह नीलामी के प्रयोजन हेतु स्थानीय स्तर पर व्यापक रूप से प्रसारित हिंदी समाचार पत्र में विज्ञापन के माध्यम से व्यापक प्रचार- प्रसार किया जाना चाहिए ।

vii . सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित मूल्य (स्क्रैप वस्तु के मूल्यांकन के अनुसार ) तथा नीलामी की दिनांक, समय एवं स्थान को निविदा दस्तावेज़ में उपदर्शित किया जाना चाहिए । सुसंगत श्रेणी के स्क्रैप डीलरों को निविदा दस्तावेज़ में निर्दिष्ट प्रारूप में अपनी निविदाएं प्रस्तुत करनी होंगी । नीलामी का आयोजन राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में की जानी चाहिए जो यह देखेगा कि समस्त निविदाओं को यथोचित रूप से अभिलिखित किया गया है ।

viii. नीलामी में सभी स्क्रैप वस्तुओं हेतु, वस्तुओं के मूल्यांकन या न्यूनतम मूल्य की पहचान विशेषज्ञ मूल्यांकनकर्ता के माध्यम से की जाएगी । मूल्यांकनकर्ता द्वारा निर्धारित मूल्य (न्यूनतम मूल्य) से कम पर किसी भी स्क्रैप वस्तु की नीलामी नहीं की जानी चाहिए ।

ix. स्क्रैप वस्तु की निविदा से प्राप्त बोलियां नीलामी प्रक्रिया के पूर्ण होने के ठीक बाद उसी दिन खोली जाएंगी तथा निविदा या नीलामी (जो भी उच्चतम हो) के माध्यम से प्राप्त उच्चतम कोटेशन (दर सूची) प्रदाता को सफल निविदादाताओं के रूप में घोषित किया जाएगा ।

Χ. नीलामी या निविदा या निविदा सह नीलामी प्रक्रिया में भाग लेने हेतु, समस्त निविदादाताओं को सक्षम प्राधिकारी द्वारा विनिश्चित प्रतिदेय / प्रवेश शुल्क का भुगतान करना होगा ।

xi. नीलाम सामग्री हेतु बोली बंद होने पर उच्चतम बोलीदाता द्वारा बोली की राशि का पच्चीस प्रतिशत नकद में अग्रिम भुगतान के रूप में जमा किया जाएगा । विशेष परिस्थितियों में नीलामी का संचालन करने वाला अधिकारी बिना कोई कारण बताए अग्रिम भुगतान के रूप में उच्च प्रतिशत (निविदा की सम्पूर्ण राशि तक) की मांग कर सकता है । यदि सफल बोलीदाता अग्रिम भुगतान करने में विफल रहता है, तो उसका प्रवेश शुल्क जब्त कर लिया जाएगा । अग्रिम भुगतान के पश्चात् शेष राशि के भुगतान में चूक की स्थिति में, उसका अग्रिम भुगतान जब्त कर लिया जाएगा । इस प्रकार जब्त की गई राशि एवं अगले उच्चतम बोलीदाता द्वारा दी गई बोली का योग, उच्चतम बोलीदाता की बोली के समतुल्य होने की स्थिति में नीलामी ठीक अगले उच्चतम बोलीदाता के पक्ष में स्वीकृत की जा सकती है अन्यथा पुनः नीलामी प्रक्रिया प्रारम्भ की जाएगी ।

xii. किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति के निमित्त नीलामी में बोली लगाने की अनुमति नहीं दी जाएगी , जब तक कि उसके पास ऐसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा लिखित प्राधिकार न हो जो नीलामी में उपस्थित हो तथा उसकी ओर से लगाई गई बोली को अधिकृत या अनुसमर्थित करता हो ।

xiii.

जब किसी वस्तु को लॉट के आधार के बजाए वजन या संख्या के आधार पर नीलाम करने का प्रस्ताव किया जाता है, तो उस वस्तु को नीलामी में रखे जाने से पूर्व इस आशय की घोषणा की जाएगी । ऐसे प्रकरणों में निविदाएं प्रत्येक संख्या या इकाई या वजन के लिए ( 59 )

होंगी । प्रभारित किये जाने वाले मूल्य की गणना वितरित वास्तविक वजन या संख्या के आधार पर की जाएगी ।

xiv. नीलामी आयोजित करने वाले अधिकारी के पास बिना कोई कारण बताए विज्ञापित या परिसर में रखी किसी भी वस्तु के नीलामी को प्रत्याहरित करने का अधिकार सुरक्षित रहेगा ।

XV. बोली लगाने वाले प्रत्येक व्यक्ति की बोली पर विचार किया जाएगा चाहे वह उच्चतम हो या नहीं , और यह स्पष्ट रूप से समझा जाएगा कि किसी भी परिस्थिति में बोली की राशि में छूट पर विचार नहीं किया जाएगा ।

xvi . सक्षम प्राधिकारी या नीलामीकर्ता संस्था द्वारा स्वीकृत नीलामी की बोली के अनुमोदन के पश्चात् शेष राशि को पंजीकृत सूचना की प्राप्ति के सात दिनों के भीतर नीलामीकर्ता संस्था के पक्ष में जमा कराया जाना होगा ।

xvii. नीलाम की गई सामग्री का परिदान नीलामीकर्ता संस्था द्वारा पूर्ण एवं अंतिम भुगतान प्राप्त होने के बाद किया जायेगा तथा उसके बाद ही इसे हटाने की अनुमति सक्षम प्राधिकारी द्वारा दी जाएगी । सामग्री को सक्षम प्राधिकारी , या उसके द्वारा अधिकृत किसी अन्य राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में हटाया जाएगा ।

xviii . यदि यथास्थिति सक्षम प्राधिकारी या नीलामीकर्ता संस्था द्वारा स्वीकृत निविदा को अनुमोदन प्रदान नहीं किया जाता है , तो सफल बोलीदाता द्वारा जमा की गई राशि उसे वापस कर दी जाएगी एवं उसके पक्ष में नीलामी को अमान्य माना जाएगा ।

xix. मोटर वाहनों की नीलामी के संबंध में पंजीकरण प्रमाणपत्र वैध होने पर सफल निविदादाता को दिया जाएगा । यदि कतिपय कारणों से इसे नीलामीकर्ता संस्था द्वारा नवीनीकृत नहीं किया जा सका तो निविदादाता को इसे स्व लागत पर नवीनीकृत करना होगा तथा इस संबंध में कोई दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा ।

XX. पूर्व निहित निबंधनों एवं शर्तों के संबंध में किसी भी विवाद की स्थिति या उसके अनुसरण में की गई या प्रस्तावित किसी भी कार्यवाही के प्रकरण में, उसे शासन के सचिव /विभागाध्यक्ष/ नीलामीकर्ता संस्था द्वारा नामित व्यक्ति के माध्यस्थ्म हेतु निर्दिष्ट किया जाएगा, जिसका निर्णय अंतिम होगा एवं पक्षकारों पर बाध्यकारी होगा ।

xxi . नीलामी के दौरान, यदि नीलामीकर्ता की राय है कि बोलीदाताओं द्वारा समूहन किया जा रहा है तथा नीलाम की जा रही सामग्री का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हो रहा है, तो प्रक्रिया को अविलंब रोका जा सकता है ।

xxii. सक्षम प्राधिकारी उस निविदादाता के विरुद्ध ऐसी कार्यवाही करने का अधिकार सुरक्षित रखेगा जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित अग्रिम भुगतान जमा करने में विफल रहा है । इस संबंध में विधिक प्रावधान भी लागू होंगे ।

( 60 )

xxiii . ई-अपशिष्ट का निस्तारण भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा ई -अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली, 2016 एवं आगामी संशोधनों के अनुसार होगा ।

xxiv . वाहनों की नीलामी हेतु उत्तराखण्ड शासन के परिवहन

XXV.

विभाग द्वारा निर्गत प्रासंगिक शासनादेशों का भी संज्ञान लिया जाएगा ।

xxvi . नीलामी में बोली लगाने की अनुमति देने से पूर्व समस्त निविदादाताओं से इस नियमावली में निहित निबंधनों एवं शर्तों की स्वीकृति लिखित रूप में प्राप्त की जानी चाहिए ।

नोट- जहां किसी वस्तु / सेवा उपलब्ध कराए जाने हेतु फर्म/ ठेकेदार का चयन (जिसके अंतर्गत अधिप्राप्ति इकाई को आय प्राप्त होती है) अथवा सम्पत्ति को लीज पर दिए जाने के संबंध पट्टेदार का चयन, उच्चतम बोलीदाता के आधार पर किया जाना हो तो वहां पर उपरोक्त प्रावधानों के सुसंगत भाग का संज्ञान ऐसी प्रकिया में ले लिया जाए ।

( 61 )

अध्याय 4: निर्माण कार्यों की अधिप्राप्ति

इस अध्याय में जहाँ विशिष्ट प्रक्रिया निर्धारित है उसे छोड़कर, कार्य विषयक अधिप्राप्ति के सामान्य सिद्वांत वही होंगे, जैसे अध्याय1 , 2 एवं 3 में दिए गए हैं ।

प्रत्येक विभाग को विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों के निष्पादन हेतु एक भावी दीर्घकालिक योजना तैयार करनी चाहिए । यदि आवश्यक हो , तो भावी योजना में परिर्वतन एवं सुधारों को समाविष्ट करने हेतु वार्षिक समीक्षा का भी प्रावधान होना चाहिए ।

4.1 संविदाकारों का सूचीबद्धिकरण

i. विश्वसनीयता एवं क्षमता सुनिश्चित करने हेतु संविदाकारों के पंजीकरण हेतु निम्नलिखित नियम एवं शर्तें लागू होंगीः

क. संविदा के क्रियान्वयन हेतु संविदाकार के पास आवश्यक तकनीकी योग्यता, वित्तीय संसाधन, उपकरण एवं अन्य भौतिक सुविधाएं, प्रबंधकीय क्षमता, विश्वसनीयता, अनुभव, प्रतिष्ठा तथा कार्मिकों की उपलब्धता हो ।

ख. उनके पास अधिप्राप्ति विषयक संविदा करने हेतु समुचित विधिक हैसियत हो ।

ग. वे देयताधीन ( receivership ) , दिवालिया न हों या उनके कारोबार का समापन न किया गया हो अथवा किसी न्यायालय या न्यायिक अधिकारी की निगरानी में न किया जा रहा हो, निलम्बन की स्थिति में न हो या इनमें से किसी भी प्रकरण में उन पर विधिक वाद न चल रहा हो ।

घ. वे करों तथा सामाजिक सुरक्षा के दायित्व अंशदानों की देयता को पूर्ण करते हों, तथा ड. अधिप्राप्ति प्रक्रिया प्रारम्भ होने के पूर्ववर्ती तीन वर्ष की किसी कालावधि के भीतर अपने वृत्तिक आचरण या कोई अधिप्राप्ति संविदा किये जाने हेतु अपनी अर्हताओं के सम्बन्ध में मिथ्या कथन करने या दुर्व्यपदेषन (misrepresentation) सम्बन्धी किसी दांडिक अपराध के सम्बन्ध में न तो स्वयं , और न उनके निदेशक और अधिकारी दोषसिद्ध हुए हों, या विवर्जन ( debarment) कार्यवाहियों के अनुसरण में अन्यथा निरर्हित (disqualify) हुए हों;

ii . प्रत्येक वर्ष पंजीकृत संविदाकारों की कार्यपूर्ति क्षमता की समीक्षा की जाए तथा पंजीकरण करने वाले विभाग / एजेंसी द्वारा कार्यपूर्ति समीक्षा की प्रक्रियाओं का निर्धारण किया जाए । यदि कोई संविदाकार पंजीकरण हेतु निर्धारित मानदण्ड पूर्ण नहीं करते है तब ऐसे संविदाकारों को किसी भी कार्य को क्रियान्वित करने से मना किया जा सकता है तथा उनका पंजीकरण निरस्त किया जा सकता है ।

iii . संबंधित विभागों / एजेंसियों द्वारा संविदाकारों को नवीनतम निर्माण तकनीकों, मानक कोड एवं प्रौद्योगिकी , आदि के सम्बन्ध में उन्मुख करने हेतु क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित ( 62)

करने का प्रयास करना चाहिए ताकि प्रतिस्पर्धात्मकता एवं गुणवत्ता- आधारित कार्य सुनिश्चित किये जा सकें ।

iv . सुसंगत वर्ग (category) में विभिन्न मौद्रिक सीमाओं के संविदा आदेशों को क्रियान्वित्त करने की क्षमता के आधार पर फर्मों का निम्नलिखित श्रेणियों में सूचीकरण किया जाए-

श्रेणी

निविदा की सीमा

कोई सीमा नहीं

श्रेणी-ए

श्रेणी-बी

5 करोड़ रुपए तक

श्रेणी-सी

3 करोड़ रुपए तक

श्रेणी-डी

1 करोड़ रुपए तक

श्रेणी-ई

50 लाख रुपए तक

संविदाकारों के पंजीकरण की प्रक्रिया एवं अन्य युक्तियुक्त नियम, इस नियमावली के नियम -3.1 के अनुरुप होंगे , यदि वह इस अध्याय में उल्लिखित किसी भी बात से असंगत नहीं है ।

4.2 संविदा के प्रकार

4.2.1 . मदवार दर (इकाई दर) संविदा ( Item Rate Contract)

मदवार दर निविदाओं हेतु, संविदाकारों को अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा प्रदान किए गए मात्रा के देयक (बिल ऑफ क्वान्टिटी ) के आधार पर कार्य की प्रत्येक सामग्री हेतु अलग से दरें उद्धृत करने की आवश्यकता होती है । मदवार दर संविदा में-

i. अनुबंध के निष्पादन के दौरान मात्राओं में परिवर्तन (बढोतरी ) की अनुमति सक्षम प्राधिकारी द्वारा वित्तीय हस्तपुस्तिका खण्ड-1 (वित्तीय अधिकारों का प्रतिनिधायन) , खण्ड-6 एवं खण्ड-7 के अधीन उसे प्रदत्त वित्तीय अधिकारों की सीमा तक दी जा सकेगी ।

ii. मापी गई मात्रा हेतु भुगतान संविदा में निर्धारित दर के अनुसार किया जायेगा ।

इस प्रकार की संविदा समस्त प्रकार के प्रमुख निर्माण कार्यों जैसे भवनों, पुलों, पुलियों, सड़कों, मल -जल प्रवाह नालियों (सीवर लाइनों) , सिंचाई कार्यों हेतु उपयुक्त है तथा पक्षकारों हेतु अनिश्चितता का न्यूनतम जोखिम वहन करती है ।

iv. आंतरिक विसंगतियों, फेरबदल (variations ) तथा संविदा विफलता सम्बन्धी दावों / विवादों की स्थितियों के न्यूनीकरण हेतु, अधिप्राप्ति प्रक्रिया प्रारम्भ होने से पूर्व विनिर्देशों, प्रारूप , रेखाचित्र एवं संविदा शर्तों (भूमि की उपलब्धता, वन विभाग की अनुमति, सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन, जहाँ लागू हो सहित) का गंभीर रूप से मूल्यांकन किया जाना चाहिए ।

( 63 )

4.2.2 . प्रतिशत आधारित दर संविदा (Item Rate Contract)

प्रतिशत दर पर आधारित निविदा के अंतर्गत संविदाकारों को कुल अनुमानित लागत के सापेक्ष प्रतिशत के रूप में उच्च अथवा निम्न प्रतिशत दर इंगित / उधृत करनी होती है । इस प्रकार की संविदा तब सबसे प्रभावशाली होती है जब निर्माण कार्यों में वृहद प्रारूपण प्रक्रिया एवं दिशा सम्मिलित नहीं होते हैं, तथा सरल चित्र कार्य निष्पादन हेतु पर्याप्त होते हैं । यह अधिप्राप्ति प्रक्रिया, पूर्व विस्तृत प्रारूपण के समय एवं प्रयास की बचत करती है । इस किस्म की निविदा का उपयोग अनुरक्षण कार्य, समतलीकरण तथा विकास कार्य जिसमें ऐसे कार्य जैसे बाढ़ , बरसात के जल की निकासी , जल सम्पूर्ति तथा मल जल प्रवाह नालियां (सीवर लाइन) सम्मिलित हैं , हेतु किया जा सकता है । इस प्रकार की प्रतिशत दर विषयक संविदा मात्र रु. 10,00,000 (रु. दस लाख) तक मूल्य के अनुरक्षण कार्य तक सीमित होगी ।

प्रतिशत दर आधारित संविदाओं हेतु बिल, मदवार अनुमानित दरों पर तैयार किए जाएंगे तथा बिल की सकल राशि में निविदा में इंगित प्रतिशत दर , अधिक या कम, जोड़ा या घटाया जाएगा । भुगतान मापी गई मात्रा हेतु किया जाता है । दरों की अनुसूची में सम्मिलित नहीं की गई सामग्रियों के मूल्य अवधारण हेतु संविदा में उपबंध बनाए जाएंगें ।

4.2.3. एकमुश्त संविदा ( lum sum contract)

इस प्रकार की संविदा के अधीन संविदाकारों से यह अपेक्षा की जाती है कि निर्धारित डिजाइन, विशिष्टता तथा वांछित कार्यविधि के अनुरूप एकमुश्त धनराशि कार्य पूर्ण करने हेतु उद्धृत करें । इस प्रकार की संविदा में-

i. यह माना जाता है कि निविदादाता द्वारा उद्धृत मूल्य में लागत के सभी तत्व सम्मिलित हैं । मूल्यांकन एवं निष्पादन के दौरान किसी अंकगणितीय सुधार या मूल्य समायोजन की अनुमति नहीं है। एकमुश्त संविदाओं को प्रशासित करना सरल है क्योंकि यह एक निश्चित कार्य क्षेत्र हेतु एक निश्चित मूल्य होता है तथा भुगतान स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट उत्पादन /उपलब्धि (output/milestone) से सम्बद्ध होते हैं;

ii. संविदाकार द्वारा नियोजित संसाधनों पर बचत करके कार्य की गुणवत्ता एवं विस्तार में घटतौली करने की प्रवृत्ति हो सकती है । कार्य की गुणवत्ता एवं विस्तार की विभिन्न संभावित व्याख्याओं के कारण विवाद उत्पन्न हो सकते हैं । अतः संविदा के अधीन कार्य की गुणवत्ता एवं विस्तार के मूल्यांकन के स्पष्ट प्रावधान सम्मिलित होने चाहिए तथा इसकी स्वीकार्यता हेतु प्रमाणपत्र अभिलिखित किया जाना चाहिए ;

भुगतान के समय से संबद्ध नहीं होने के कारण संविदाकार के पास संसाधनों के परिनियोजन पर बचत करने की प्रवृत्ति हो सकती है जिसके परिणामस्वरूप समय- सीमा बढ़ सकती है । अतः यह सुनिश्चित करने हेतु प्रति माह समनुदेशित कार्य का अनुश्रवण किया (64)

जाना चाहिए कि प्रति माह कार्य प्रगति योजनाबद्ध एवं अनुमानित समय-सीमा के अनुरूप है ।

iv. एकमुश्त सेवा संविदाओं का उपयोग प्रमुख रूप से उन कार्यों हेतु किया जाना चाहिए जिनमें कार्य की गुणवत्ता, विस्तार एवं कालावधि स्पष्ट रूप से परिभाषित हो। एकमुश्त संविदाओं का उपयोग वहां किया जा सकता है जहां कार्यों को उनकी पूर्ण भौतिक एवं गुणात्मक विशेषताओं में परिभाषित किया जा सकता है तथा मात्रा या विनिर्देश (specifications ) में परिवर्तन एवं स्थल की स्थितियों (उदाहरणार्थ, छुपी हुई बुनियाद संबंधी समस्याएं) में अप्रत्याशित समस्याओं का जोखिम न्यूनतम होता है;

V. यह परंपरागत (sterotype) या दोहराव वाले आवासीय भवनों या अन्य संरचनाओं हेतु उपयुक्त है जिनके लिए मानक चित्र सामान्य रूप से उपलब्ध हैं । यह छोटे पुल निर्माण कार्यों, चिमनी , गोदाम / कोष्ठागार (bins / silos ) , ओवरहेड टैंक आदि के लिए भी उपयुक्त है । डिजाइन विभाग द्वारा या ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराया गया हो सकता है । ठेकेदार द्वारा डिजाइन तैयार किये जाने की दशा में, विभाग ठेकेदार को समस्त आवश्यक विवरण उपलब्ध कराएगा, ताकि ठेकेदार तद्‌नुसार अपने डिजाइन एवं चित्र तैयार कर निर्माण पूर्व अनुमोदन प्राप्त करने हेतु अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को प्रस्तुत कर सके ।

vi . संविदा में सम्मिलित रेखाचित्रों , डिज़ाइनों एवं विनिर्देशों में परिवर्धन तथा परिवर्तन के कारण पूर्व निर्धारित अनुबंध राशि में जोड़ी जाने वाली या कटौती की जाने वाली राशि को विनियमित करने हेतु दरों की अनुसूची ( एस.ओ.आर.) निर्दिष्ट की जाएगी;

vii . ठेकेदार को संविदा में निर्दिष्ट सारणी के अनुसार समय - समय पर या कार्य पूर्ति पर सम्पूर्ण राशि का भुगतान किया जाएगा । बिलिंग सारणी वास्तविक सम्पादित कार्य के अनुरूप होगी तथा फ्रंट-लोडिंग (प्रारंभिक लाभ) के जोखिम से सख्ती से बचाव किया जाएगा;

viii. एकमुश्त संविदा के अधीन सम्पादित कार्य में परिवर्धन एवं विलोपन के अतिरिक्त विस्तृत माप को अभिलखित करने की आवश्यकता नहीं होगी ।

4.2.4. आंशिक कार्य दर (पीस वर्क) संविदा

छोटे कार्य या किसी बड़े कार्य के एक छोटे भाग हेतु इस प्रकार की संविदा का उपयोग किया जा सकता है । यह विशेषकर रु.1,00,000 (रु. एक लाख ) तक के अनुरक्षण कार्यों हेतु उपयोगी होती है । इसका उपयोग उन मामलों में किया जाता है, जिनमें संविदा की औपचारिक स्वीकृति की प्रत्याशा में कार्य प्रारम्भ करना आवश्यक होता है । आंशिक कार्य दर संविदा पर एक अनुबंध किया जा सकता है तथा नियमित संविदा पर हस्ताक्षर होते ही अनुबंध रद्द किया जा सकता है । दूरस्थ क्षेत्रों / दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में बादल फटने, भूस्खलन, सड़क अवरूद्ध आदि की स्थिति में, तात्कालिक एवं अत्यावश्यक कार्यों हेतु मौके पर क्रय या एकल स्रोत निविदा के सिद्धांतों के आधार पर भी संविदा प्रदान की जाती है । तथापि, इस मामले में , दरें या तो अनुबंध की दरों या ( 65 )

खुले बाजार की दरों पर आधारित होनी चाहिए, तथा भुगतान माप करके माप पुस्तिका में प्रविष्टि के बाद ही किया जाना चाहिए । आंशिक कार्य दर संविदाओं हेतु, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था किसी भी समय अपनी इच्छानुसार अनुबंध समाप्त कर सकती है ।

4.2.5. अभियांत्रिकी, अधिप्राप्ति एवं निर्माण (ई.पी.सी.) संविदा

i.

अभियांत्रिकी, अधिप्राप्ति एवं निर्माण संविदा को डिजाइन एवं निर्माण अनुबंध पद्धति के रूप में भी जाना जाता है । इसमें प्रतिस्पर्धात्मक निविदा के माध्यम से निर्धारित एकमुश्त मूल्य हेतु ठेकेदार को अन्वेषण, डिजाइन एवं निर्माण के समस्त दायित्व निर्दिष्ट किये जाते हैं । इसका उद्देश्य निर्माण आधारित जोखिमों को ठेकेदार को हस्तांतरित करते हुए लागत एवं समय से संबंधित समुचित निश्चितता के साथ निर्दिष्ट मानकों के अनुसार कार्यों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है ;

ii.

निर्माण विशिष्टताओं की सामान्य परिपाटी के विपरीत , ई.पी.सी. संविदा में तकनीकी मानदंड मुख्यतः उत्पादन ( आउटपुट) विशिष्टताओं या निष्पादन मानकों (performance standards ) पर आधारित होते हैं । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था परियोजना के डिजाइन एवं निर्माण की केवल मुख्य आवश्यकताओं को निर्दिष्ट करती है, जिसका आस्तियों की गुणवत्ता, स्थायित्व, विश्वसनीयता, अनुरक्षण एवं सुरक्षा पर असर पड़ता है तथा ठेकेदार के लिए मूल्य वर्धन (value addition) हेतु पर्याप्त अवसर की सम्भावना रहती है । परियोजना जोखिम जैसे कि मिट्टी की स्थिति तथा मौसम या डिजाइन एवं निर्माण से संबंधित वाणिज्यिक और तकनीकी जोखिम ठेकेदार को समनुदेशित किये जाते हैं । भूमि हस्तांतरण , स्थानीय अधिकारियों से अनुमोदन, लागू कानूनों के अनुसार पर्यावरण मंजूरी, उपयोगिताओं के स्थानांतरण एवं अभियांत्रिक योजनाओं के संबंध में अनुमोदन में किसी भी विलम्ब हेतु जोखिम अधिप्राप्तिकर्ता संस्था उठाती है ।

संविदाकार का चयन खुली प्रतिस्पर्धात्मक निविदा के आधार पर होता है । समस्त परियोजना मानदंड जैसे अनुबंध अवधि, मूल्य समायोजन एवं तकनीकी मानदंड प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर दिये जाते हैं तथा लघु- सूचीबद्ध निविदादाताओं को कार्यों हेतु केवल एकमुश्त मूल्य निर्दिष्ट करना होता है । समय- समय पर यथासंशोधित भारत सरकार के निर्माण कार्यों की अधिप्राप्ति नियमावली (manual ) में निर्धारित नियम एवं शर्तें वित्त विभाग की सहमति से ईपीसी परियोजनाओं पर लागू होंगी ।

iv. कार्य हेतु निम्नतम भुगतान चाहने वाले निविदादाता को संविदा प्रदत्त की जाती है । अनुबंध अवधि के दौरान मूल्य भिन्नता के कारण संविदा का मूल्य निर्दिष्ट सूत्र के अनुसार समायोजन के अधीन रहेगा । परियोजना के विस्तारण ( scope ) में किसी भी परिवर्तन की पूर्ति हेतु संविदा मूल्य की दस प्रतिशत की सीमा निर्धारित की जानी चाहिए , जिसकी लागत अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा वहन की जाएगी;

( 66 )

V. चयनित ठेकेदार कार्यक्षेत्र पर जाकर आवश्यक सर्वेक्षण एवं जाँच करता है तथा अनुबंध में निर्धारित विशिष्टताओं एवं मानकों के अनुरूप डिजाइन एवं रेखाचित्र भी विकसित करता है । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के अभियंता डिजाइन एवं रेखाचित्र की समीक्षा करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये परियोजना के विस्तार, डिजाइन मानकों एवं विशिष्टताओं की पुष्टि करते हैं । ठेकेदार द्वारा प्रस्तुत डिज़ाइन प्रस्तावों पर अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की किसी भी टिप्पणी को अनुसूची में विनिर्दिष्ट समयानुसार एक बार समग्र रूप से संसूचित किया जाना चाहिए । यदि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा कोई टिप्पणी या मंजूरी नहीं दी जाती है, तो ठेकेदार निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के पश्चात् निर्माण कार्य करने हेतु स्वतंत्र होगा;

vi. ठेकेदार कार्य पूर्ति की निर्दिष्ट सीमा से परे विलम्ब के प्रत्येक दिवस हेतु परिनिर्धारित हानि (liquidated damages ) का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है । तथापि, ठेकेदार कार्य क्षेत्र में परिवर्तन तथा अप्रत्याशित घटनाओं अथवा अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा विलम्ब के कारण होने वाली देरी के कारण समय विस्तार का हकदार होगा । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था ठेकेदार को निर्धारित समापन दिनांक से पूर्व परियोजना की पूर्णता हेतु बोनस (सामान्य रूप से कुल अनुबंध मूल्य का दस प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए) का भुगतान करने हेतु भी उत्तरदायी होगा, यदि ऐसा अनुबंध दस्तावेजों में निर्दिष्ट किया गया हो;

vii . निर्माण का अनुश्रवण एवं पर्यवेक्षण अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के अभियांत्रिकी प्रभाग अथवा किसी बाह्य एजेंसी के माध्यम से किया जाएगा जिसका चयन पारदर्शी अधिप्राप्ति प्रक्रिया के माध्यम से किया गया हो ।

viii .

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा चयनित अभियंता (परामर्शदाता) को डिजाइन, परियोजना पर्यवेक्षण एवं कार्य प्रबंधन में अच्छा अनुभव होना चाहिए । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के पास एक अनुभवी दल (कार्य समिति) होना चाहिए जो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के अभियंता द्वारा किए गए पर्यवेक्षण की गुणवत्ता की जांच कर सके , जिसमें डिजाइन समीक्षा की गुणवत्ता, स्थल पर्यवेक्षण , गुणवत्ता संपरीक्षा आदि शामिल हैं । यह सुनिश्चित करने के लिए कि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के अभियंता अपने कार्यों को वृत्तिक (professional ) रीति से निष्पादित करते हैं, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के अभियंता की कार्य पद्धति की आवधिक लेखा परीक्षा वांछनीय है ।

ix. कार्य के प्रत्येक मद को आगे के चरणों में उप - विभाजित किया जाता है तथा कार्य के प्रत्येक पूर्ण चरण हेतु उत्पादन विनिर्देशों (output specifications ) एवं निष्पादन मानकों (performance indicators ) के आधार पर भुगतान निर्धारित किया जाना होता है । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था एवं ठेकेदार के मध्य अनुबंध में दोष / अपूर्णता की देयता अवधि (defect libility period) दो वर्ष निर्दिष्ट की जा सकती है ।

( 67 )

Χ. जटिल परियोजनाओं में, डिज़ाइन एवं रेखाचित्र, पर्यावरणीय, सामाजिक, कार्यों की गुणवत्ता , सुरक्षा मानकों आदि के लेखा परीक्षण सम्बन्धी विशिष्ट कार्यों हेतु एक तृतीय - पक्षीय परामर्शदाता भी नियोजित किया जाना चाहिए ताकि निर्माण एवं अनुरक्षण में अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के अभियंता/ परामर्शदाता के परिश्रमशीलता की जांच की जा सके ।

4.3 निविदा प्रणालियाँ

अधिप्राप्ति की तकनीकी आवश्यकताओं की जटिलताओं / गंभीरता तथा अधिप्राप्ति मूल्य के अधीन उचित गुणवत्ता, समुचित स्रोत एवं उपयुक्त मूल्य की आवश्यकताओं के मध्य युक्तियुक्त संतुलन प्राप्त करने हेतु विभिन्न निविदा प्रणालियां संरचित की गयी हैं । इन कारकों के आधार पर, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निम्नलिखित में से किसी भी प्रकार की निविदा प्रणाली को अपना सकती है ।

4.3.1. एकल चरण एकल लिफाफा प्रणाली

i.

एकल चरण निविदा प्रणाली उन निर्माण कार्यों में लागू किया जाये जहां मात्राओं की अनुसूची तथा उनकी विस्तृत विशिष्टियों का विवरण निर्धारित किया जाना संभव हो तथा अधिप्राप्ति मूल्य न्यून या मध्यम हो । यह अधिप्राप्ति की अत्यंत सरल एवं त्वरित निविदा प्रणाली है , जिसमें न्यूनतम प्रतिक्रियाशील मूल्य निविदा जो निविदा दस्तावेजों में विहित अहर्ता मानदंडों, तकनीकी एवं व्यावसायिक आवश्यकताओं को पूर्ण करती है , को सफल घोषित किया जाता है एवं उसे संविदा प्रदत्त की जाती है ।

ii.

निविदा के मूल्यांकन तथा संविदा प्रदान करने की प्रक्रिया को सभी निविदादाताओं को अवगत कराया जाना चाहिए , जिसमें किसी भी प्रकार की स्वेच्छारिता ना हो ।

4.3.2. एकल चरण दो-लिफाफा प्रणालीः

तकनीकी रूप से जटिल आवश्यकताओं में दो- लिफाफा प्रणाली का अनुपालन किया जाएगा । इस प्रणाली में-

i.

यदि आवश्यक हो , तो निविदा पूर्व सम्मेलन के पश्चात् तकनीकी विशिष्टियों तथा तकनीकी- वाणिज्यिक शर्तों को संशोधित किया जा सकता है । निविदा पूर्व सम्मेलन हेतु नियम 2.6 में उल्लिखित प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक होगा ।

ii. निविदादाताओं को अपनी प्रस्तुति को दो लिफाफों में विभाजित करने हेतु कहा जायेगा । प्रथम लिफाफे , जिसे तकनीकी- वाणिज्यिक बोली कहा जाता है, में निविदादाता की अहर्ता, तकनीकी गुणवत्ता एवं निष्पादन पहलुओं, वाणिज्यिक निबंधनों एवं शर्तों तथा निविदा में मांगे गए दस्तावेजों का विवरण सम्मिलित होगा । इस लिफाफे में मूल्य प्रस्ताव तथा उसके सुसंगत अन्य वित्तीय विवरण सम्मिलित नहीं होंगे । दूसरे लिफाफे में, जिसे वित्तीय बोली कहा जाता है, अन्य वित्तीय विवरण के साथ मूल्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाना चाहिए । दोनों लिफाफों को एक बाहरी लिफाफे में एक साथ जमा करना होगा । तकनीकी-वाणिज्यिक ( 68 )

निविदाएं खोलने के पश्चात् पृथक से वित्तीय निविदाएं आमंत्रित करने की आवश्यकता नहीं होगी ।

सर्वप्रथम तकनीकी- वाणिज्यिक निविदाएं निविदा खुलने की दिनांक एवं समय पर खोली जाएंगी । उसके उपरांत निविदा दस्तावेजों में विहित मापदंडों के संदर्भ में निविदा संवीक्षा समिति द्वारा संवीक्षा एवं मूल्यांकन किया जायेगा तथा उत्तरदायी , अर्ह एवं तकनीकी रूप से स्वीकार्य निविदादाताओं की घोषणा की जायगी ।

iv. इसके पश्चात् केवल तकनीकी- वाणिज्यिक रूप से योग्य निविदादाताओं की वित्तीय निविदाएं अग्रेतर संवीक्षा, मूल्यांकन, क्रमसूची तैयार करने तथा संविदा स्थापन हेतु पूर्व घोषित दिनांक पर खोली जाएं । ई -अधिप्राप्ति में, तकनीकी रूप से गैर -अनुपालक प्रस्तावों की वित्तीय निविदाएं नहीं खोली जाएं ।

4.3.3. पूर्व-योग्यता निविदा के साथ एकल चरण बहु लिफाफा प्रणाली

i.

जहां अधिप्राप्ति सामान्य रूप से जटिल है, वहां अधिप्राप्ति इकाई द्वारा एकल चरण-द्वि लिफाफा प्रणाली के अतिरिक्त एकल चरण- बहु लिफाफा प्रणाली का भी प्रयोग किया जा सकता है । पूर्व -योग्यता निविदा के एक पृथक चरण के स्थान पर, एक स्पष्ट सफल -असफल योग्यता मानदंड निर्धारित किया जा सकता है । ऐसे मामलों में , निविदादाता को तीन लिफाफे वाली एकल चरण निविदा के अंतर्गत एक लिफाफे में योग्यता विवरण , दूसरे लिफाफे में तकनीकी प्रस्ताव तथा अंतिम लिफाफे में वित्तीय प्रस्ताव प्रस्तुत करने हेतु कहा जाता है । इस प्रणाली में, यदि किसी निविदादाता द्वारा समुचित ध्यान रखा जाता है , तो योग्यता के आधार पर उसकी निविदा अस्वीकार होने का जोखिम न्यूनतम होता है । निविदा खोलने की दिनांक पर प्रथमतः केवल पहला लिफाफा जिसमें सफल-असफल योग्यता मानदंड (निविदा प्रतिभूति एवं अन्य अहर्ता दस्तावेज भी शामिल हैं) को खोला जाता है तथा पूर्व- योग्यता परीक्षण उत्तीर्ण करने वाले प्रतिक्रियाशील निविदादाताओं के लघु सूचीयन हेतु मूल्यांकन किया जाता है । इसके पश्चात् मूल्यांकन में जो प्रक्रिया अपनाई जाती है वह केवल योग्य निविदादाताओं हेतु दो- लिफाफा प्रणाली के समान है । अयोग्य निविदादाताओं के संबंध में, उनके तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्तावों वाले दो लिफाफे नहीं खोले जाएंगे ।

ii . निविदा दस्तावेजों में पूर्व- योग्यता के साथ- साथ मूल्यांकन प्रणाली हेतु पात्रता मानदंड का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए । अन्य आवश्यकताओं के अतिरिक्त, जिन्हें अधिप्राप्तिकर्ता संस्था आवश्यक समझ सकती है, निम्नलिखित को स्पष्ट रूप से वर्णित किया जाना चाहिए;

क. विगत तीन से पांच वर्षों के दौरान निष्पादित समान कार्यों पर अनुभव , तथा मौद्रिक मूल्य, कार्यों के संतोषजनक समापन का प्रमाण आदि जैसे विवरण ।

( 69 )

ख. पात्रता मानदंड का मूल्यांकन करने हेतु निर्दिष्ट विभागों/ संगठनों के साथ पंजीकरण यदि कोई हो , पंजीकरण के प्रकार वर्ग / श्रेणी आदि सहित ।

ग. अनुबंध राशि के किसी निर्दिष्ट भाग के अनुरुप पर्याप्त वित्तीय स्थिति के दस्तावेजी साक्ष्य ।

4.3.4. द्वि-चरण निविदा प्रणाली

ऐसे कार्यों में जहाँ उच्च कोटि के तकनीकी कौशल और / या जटिल अथवा नवपरिवर्तनशील तकनीकी सम्मिलित हो या जहां अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के पास उपलब्ध तकनीकी समाधानों का सम्पूर्ण ज्ञान न हो या कार्यों हेतु उपयुक्त ठेकेदारों की उपलब्धता के बारे में अनिश्चितता हो, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था ठेकेदारों का चयन अभिरुचि की अभिव्यक्ति (ई.ओ.आई. ) या योग्यता हेतु अनुरोध (आर.एफ.क्यू. ) पद्धति के माध्यम से कर सकती है । ऐसे मामलों में, अधिप्राप्ति आवश्यकताओं हेतु सर्वथा संतोषजनक समाधान प्राप्त करने के लिए द्वि- चरण निविदा प्रणाली अपनाई जाएगी ।

i.

प्रथम चरणः अधिप्राप्तिकर्ता संस्था प्रस्तावित अधिप्राप्ति के व्यापक उद्देश्यों, तकनीकी एवं वित्तीय पात्रता मानदंड, नियमों तथा शर्तों आदि को अंतर्विष्ट करने वाली अभिरुचि की अभिव्यक्ति (ईओआई) / योग्यता हेतु अनुरोध (आरएफक्यू) बिना निविदा मूल्य के आमंत्रित करेगी । निविदा दस्तावेज़ निविदादाताओं को प्रथम चरण में बिना किसी वित्तीय प्रस्ताव के अपनी प्रारंभिक निविदाएँ प्रस्तुत करने हेतु आमंत्रित करेंगे । निविदा दस्तावेज़ कार्यों की तकनीकी, गुणवत्ता या अन्य विशेषताओं के साथ - साथ अनुबंध संबंधी नियमों एवं शर्तों से संबंधित प्रस्तावों की अभ्यर्थना कर सकते हैं । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा प्राप्त निविदाओं का मूल्यांकन पूर्व - निर्धारित मानदंडों के अनुसार किया जाएगा तथा जो निविदादाता सभी मानदंडों को पूरा करते हैं , उन्हें तकनीकी रूप से योग्य माना जाएगा तथा अन्य को अस्वीकार कर दिया जाएगा ।

पूर्व -योग्यता के उद्देश्य से वांछित सूचना को सामान्यतः परियोजना हेतु सुसंगत तकनीकी एवं वित्तीय क्षमताओं तक सीमित रखा जाये । ऐसी सूचनाएँ स्पष्ट एवं मात्राकृत होनी चाहिए ताकि लघुसूचीबद्ध (shortlisting ) करने की प्रक्रिया में निष्पक्षता एवं पारदर्शिता सुनिश्चित हो तथा सरकार को किसी विवाद अथवा विरोधाभास का सामना न करना पड़े । आवश्यक सहायक दस्तावेज़ों का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए । अभिरुचि की अभिव्यक्ति पात्रता मानदंड का एक उदाहरण अनुलग्नक- II में दर्शाया गया है । तथापि, कार्यों के विशिष्ट उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त पात्रता मानदंड तैयार किए जाने चाहिए । उपयोग किए जाने वाले मानदंड मापने योग्य और सत्यापन योग्य दस्तावेजों पर आधारित होने चाहिए । प्रत्येक मानदंड हेतु परिभाषाएँ तथा व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ प्रदान की (70)

जाएंगी जो सरल एवं स्पष्ट हों । संदेह होने पर इन दस्तावेजों को पुनः जांचने एवं सत्यापित करने का परामर्श भी दिया जा सकता है ।

लघुसूचीबद्ध करने हेतु निविदादाताओं का मूल्यांकन अन्य बातों के साथ-साथ समान संदर्भ में उनके कार्य निष्पादन के अनुभव, वित्तीय सामर्थ्य एवं तकनीकी क्षमताओं के आधार पर किया जाना चाहिए । प्रत्येक निविदादाता को प्रत्येक मानदंड हेतु प्राप्त अंकों के योग को उस मानदंड को दिए गए भारांक से गुणा करने के आधार पर अंक दिया जाना चाहिए । न्यूनतम आवश्यक अंक (सामान्यतः साठ प्रतिशत) प्राप्त करने वाले समस्त निविदादाताओं को लघुसूचीबद्ध किया जाना चाहिए । न्यूनतम योग्यता अंक अभिरुचि की अभिव्यक्ति दस्तावेज़ में निर्दिष्ट किए जाने चाहिए । वैकल्पिक रूप से, भारित मूल्यांकन के स्थान पर, अभिरुचि की अभिव्यक्ति दस्तावेज़ एक सफल असफल मानदंड निर्दिष्ट कर सकता है, जिसमें प्रत्येक मानदंड हेतु न्यूनतम आवश्यकताएं, जैसे अनुभव के न्यूनतम वर्ष, निष्पादित कार्यों की न्यूनतम संख्या तथा न्यूनतम वित्तीय कारोबार, आदि न्यूनतम अहर्ताएं निर्धारित की जाएं । ऐसी परिस्थितियों में , समस्त निविदादाता जो ई.ओ.आई. में निर्दिष्ट न्यूनतम आवश्यकताओं को पूर्ण करते हों, उन्हें लघुसूचीबद्ध किया जाना चाहिए । लघुसूची में सामान्यतः न्यूनतम चार फर्म सम्मिलित होने चाहिए ।

लघु- सूचीबद्ध ठेकेदारों, जो प्रथम दृष्टया प्रस्तावित कार्य को निष्पादित करने में तकनीकी एवं वित्तीय रूप से सक्षम माने जाते हैं, के साथ तकनीकी प्रस्तुतिकरण /चर्चा आयोजित की जा सकती है, जिससे ऐसे सभी बोलीदाताओं को चर्चा में भाग लेने का समान अवसर मिले । इस प्रकार हुई चर्चाओं / प्रस्तुतियों के आधार पर , प्रत्येक स्वीकार्य तकनीकी समाधान हेतु, गुणवत्ता मानक, वारंटी आवश्यकताओं, कार्य प्रगति की विभिन्न उपलब्धियों (milestones ) , आदि हेतु विस्तृत तकनीकी विशिष्टताओं को पारदर्शी अधिप्राप्ति उद्देश्यों के अनुरूप रखते हुए एक या अधिक स्वीकार्य तकनीकी समाधान तय किए जा सकते हैं । विशिष्टताओं को संरचित करने में, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निविदा दस्तावेजों में मूल रूप से निर्धारित किसी भी पहलू, प्रस्तावित कार्यों की समस्त तकनीकी या गुणवत्ता विशेषताओं तथा निविदाओं के मूल्यांकन एवं तुलना हेतु उन दस्तावेजों में मूल रूप से निर्धारित किसी भी मानदंड को विलोपित या उपान्तरित कर सकती है तथा सफल निविदा सुनिश्चित करने हेतु नव विशेषताएं या मानदंड जोड़ सकती है । ऐसे किसी भी विलोपन, उपान्तरण या परिवर्धन की सूचना ठेकेदारों को अंतिम निविदा प्रस्तुत करने के आमंत्रण द्वारा दी जाएगी । जो ठेकेदार अंतिम निविदा प्रस्तुत करने को इच्छुक नहीं है , वह बयाना राशि सम्पृहत किए बिना निविदा से हट सकता है , जिसे ठेकेदार को अभिरुचि की अभिव्यक्ति (ईओआई) / योग्यता हेतु अनुरोध (आरएफक्यू) चरण के दौरान प्रदान करना आवश्यक हो सकता है ।

( 71 )

ii. द्वितीय चरणः इस चरण को प्रस्ताव हेतु अनुरोध चरण ( आरएफपी) भी कहा जाता है । निविदा प्रक्रिया के द्वितीय चरण में अधिप्राप्तिकर्ता संस्था, उन समस्त निविदादाताओं से, जिनकी निविदा प्रथम चरण में अस्वीकृत नहीं हुई थी, अधिप्राप्ति के पुनरीक्षित नियमों एवं शर्तों के प्रत्युत्तर में प्रस्तावित कार्य की कीमतों के साथ, अंतिम निविदा प्रस्तुत करने हेतु आमंत्रित करेगी । यदि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के विचार में अभिरुचि की अभिव्यक्ति / प्रस्ताव हेतु अनुरोध (आर.एफ.पी.) चरण के बाद, अधिक निविदादाताओं द्वारा और अधिक सहभागिता की संभावना है तथा वह एक ही प्रौद्योगिकी के स्थान पर और अधिक संभावित विकल्प प्राप्त करना चाहते हैं , तो द्वितीय चरण की निविदा केवल अभिरुचि की अभिव्यक्ति / प्रस्ताव हेतु अनुरोध (आर.एफ.पी.) चरण के लघु- सूचीबद्ध निविदादाताओं तक ही सीमित नहीं रहेगी । ऐसा आरम्भतः अभिरुचि की अभिव्यक्ति / प्रस्ताव हेतु अनुरोध (आर. एफ.पी.) दस्तावेज़ में ही घोषित कर दिया जायेगा ।

4,4 निविदा की विधि

4.4.1. विज्ञापित / खुली निविदा पृच्छा (ओ.टी.ई. )

इस प्रकार की अधिप्राप्ति प्रक्रिया में , निविदा सूचना को निर्दिष्ट वेबसाइटों एवं प्रेस ( समाचार पत्रों तथा व्यापार पत्रिकाओं ) में एक साथ प्रकाशित करके व्यापक प्रतिस्पर्धा को आकर्षित करने का प्रयास किया जाता है । यह अधिप्राप्ति प्रक्रिया की सबसे सामान्य (default ) पद्धति है तथा सर्वोत्तम मूल्य प्रदान करती है । नियम 4.4.3 में वर्णित विशेष परिस्थितियों को छोड़कर रु.10,00,000 (दस लाख रुपये) से अधिक मूल्य की अधिप्राप्ति हेतु अनिवार्य रूप से खुली निविदा पृच्छा प्रक्रिया अपनाई जायेगी ।

i. अधिप्राप्ति हेतु समस्त निविदाएं नियम-3.3.5 के अन्तर्गत निर्धारित व्यवस्था के अनुसार विज्ञापित की जायें तथा अधिप्राप्ति नियम-2.8 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ई-अधिप्राप्ति मंच के माध्यम से की जाये ।

ii. निविदा दस्तावेज़ अधिप्राप्ति की श्रेणी हेतु सुसंगत अनुमोदित मानक. बोली दस्तावेज़ के आधार पर तैयार किए जायें ।

व्यापक सहभागिता एवं बोली लगाने में सहजता की अभिवृद्धि हेतु, निविदा दस्तावेजों की डाउनलोडिंग प्रतिबंधित नहीं होगी तथा स्वतंत्र रूप से उपलब्ध होगी । निविदा दस्तावेज निविदाएं प्रस्तुत करने की अंतिम दिनांक तक निःशुल्क डाउनलोड हेतु उपलब्ध रहेंगे ।

iv. जहां अपेक्षित तकनीक / विनिर्देश/ गुणवत्ता देश में उपलब्ध नहीं है तथा देश में उपलब्ध विकल्प इस उद्देश्य हेतु उपयुक्त नहीं हैं ; एक वैश्विक निविदा जारी की जा सकती है तथा साख पत्र के माध्यम से विदेशी मुद्रा में भुगतान का प्रावधान किया जा सकता है । वैश्विक निविदा केवल वहीं व्यवहार्य है, जहां;

क. देश में आवश्यक प्रौद्योगिकी/ गुणवत्ता उपलब्ध नहीं है, या

( 72)

ख. पर्याप्त संख्या में सक्षम घरेलू निविदादाताओं का अभाव है, या

ग . अनुबंधों का मूल्य एक निर्धारित सीमा, जिसे समय - समय पर वित्त विभाग द्वारा निर्धारित किया जाएगा, से ऊपर है ।

4.4.2. सीमित निविदा पृच्छा (एल.टी.ई. )

सीमित निविदा पृच्छा (एल.टी.ई.) एक सीमित प्रतिस्पर्धा अधिप्राप्ति प्रणाली है, जहां प्रस्ताव प्रस्तुत करने हेतु अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा निविदादाताओं की पूर्व चयनित सूची (अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के साथ सूचीबद्ध) से प्रत्यक्षतः संपर्क किया जाता है । यह पद्धति चयन हेतु एक अल्प एवं सरल प्रक्रिया प्रदान करती है । रू 0 10,00,000 / - (रू० दस लाख मात्र) तक के कार्यों की अधिप्राप्ति हेतु सीमित निविदा पृच्छा का विकल्प अपनाया जा सकता है ।

व्यय का सर्वोत्तम संभव मूल्य प्राप्त करने हेतु , विशिष्ट श्रेणी के अंतर्गत अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के साथ सूचीबद्ध समस्त पंजीकृत निविदादाताओं से निविदा दरें दिए जाने हेतु संपर्क किया जाएगा ।

पंजीकृत ठेकेदारों को निविदा दस्तावेजों की प्रतियां सीधे स्पीड पोस्ट/ कूरियर /ई-मेल द्वारा निःशुल्क (ऐसे विनिर्देशों/ चित्रों, जिनका मूल्य निर्धारित हो, के मामले को छोड़कर) भेजी जानी चाहिए । विस्तृत निविदा दस्तावेज़ के स्थान पर एक सरलीकृत निविदा दस्तावेज़ का उपयोग किया जाना चाहिए । अधिप्राप्ति इकाई उस विशिष्ट श्रेणी में आने वाले सभी सूचीबद्ध निविदादाताओं को निविदा प्रक्रिया में प्रतिभाग किए जाने हेतु आमंत्रित करेगी ।

4.4.3. नामांकन द्वारा एकल स्रोत अधिप्राप्ति या चयन

सामान्यतया नामांकन द्वारा एकल स्रोत आधारित चयन, से बचना चाहिए क्योंकि इसमें स्पर्धा का लाभ नहीं मिलता, पारदर्शिता का अभाव होता है और अवांछनीय रीति को प्रोत्साहन मिलता है , किन्तु निम्नलिखित विशेष मामलों में इसे अपनाया जा सकता है -

i. किसी क्षेत्र विशेष को आपदा ग्रस्त घोषित किए जाने की स्थिति में उस क्षेत्र में तात्कालिक और अत्यावश्यक कार्यों के लिए एकल स्रोत के आधार पर संविदा की जा सकती है, परंतु दरें, अनुबंध की दरों या खुले बाजार की दरों पर आधारित हों ।

ii . ऐसी स्थिति जहां कार्य के निष्पादन में स्वामित्वधारी (propritary) तकनीकी निपुणता का उपयोग शामिल हो ।

रु. 25 लाख की समग्र सीमा के अंतर्गत निम्नलिखित मामलों में, (विभागाध्यक्ष की पूर्वानुमति के उपरांत)- (73)

क. किसी अत्यावश्यक कार्य हेतु, जहां प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया से गुजरना अव्यावहारिक हो , परन्तु तात्कालिकता को जन्म देने वाली परिस्थितियाँ न तो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा पूर्वानुमानित थीं और न ही अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की ओर से विलंबित आचरण के कारण थीं;

ख. ऐसे कार्य जो किसी फर्म द्वारा सम्पादित विगत कार्य की स्वाभाविक निरंतरता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जब मूल अधिप्राप्ति एवं मूल्य की युक्तियुक्तता के संबंध में अतिरिक्त कार्य के सीमित आकार पर विचार किया जाता है, तो एकल स्रोत अधिप्राप्ति का आश्रय लेना लागत प्रभावी होगा । तथापि, वृद्धिशील कार्य मूल अनुबंध मूल्य के पच्चीस प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए ;

नोट-

i . उपरोक्त सभी मामलों में, अधिप्राप्ति अधिकारी लिखित रूप में उपयुक्त कारण अभिलिखित करेगा तथा एकल स्रोत अधिप्राप्ति का आश्रय लेने से पूर्व क्रय हेतु सक्षम प्राधिकारी का पूर्वानुमोदन प्राप्त करेगा । संबंधित कार्यदायी संस्था के विभागाध्यक्ष द्वारा ऐसी अनुमति प्रदान किए जाने हेतु कारणों को सुस्पष्ट रूप से अभिलिखित किया जाएगा ।

ii . अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निष्पक्षता एवं समता सुनिश्चित करेगी तथा मूल्यों की युक्तियुक्तता सुनिश्चित करने हेतु एक प्रक्रिया अपनाएगी जो समान प्रकृति के कार्यों के लिए बाजार दरों के अनुरूप हो ।

iii . ठेकेदार को भुगतान माप एवं भाप पुस्तिका में प्रविष्टि के बाद किया जायेगा ।

4.4.4. कोटेशन के आधार पर अधिप्राप्ति

i . सक्षम प्राधिकारी प्रत्येक अवसर पर रु. 2,50,000/- (रू दो लाख पचास हजार) तक के लागत के कार्य कम से कम तीन पंजीकृत ठेकेदारों से कोटेशन प्राप्त कर करा सकता है ।

ii. तत्काल आवश्यकता/ आपात स्थिति में अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा कारणों को अभिलिखित करने तथा सक्षम प्राधिकारी का अनुमोदन प्राप्त करने के पश्चात् रु. 5,00,000 /- (पांच लाख रुपये) की अनुमानित लागत तक के निर्माण कार्य दर सूची (कोटेशन) के आधार पर निष्पादित किए जा सकते हैं । अपने निर्णय में, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को दर सूची (कोटेशन) के माध्यम से अधिप्राप्ति की परिस्थिति का उल्लेख करते हुए यह प्रमाणित करना होगा कि कार्य तात्कालिक था, तथा निविदा आमंत्रित किया जाना संभव नहीं था । सर्वप्रथम निकटस्थ क्षेत्रों के न्यूनतम तीन पंजीकृत निविदादाताओं (74)

से कोटेशन के सम्बन्ध में पूछताछ की जानी चाहिए । यदि पंजीकृत निविदादाता उपलब्ध नहीं हैं, तो अन्य स्थानीय ठेकेदारों से कोटेशन प्राप्त की जा सकती हैं ।

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था समान प्रकृति के कार्यों के साथ - साथ डी.एस.आर. या एस.ओ.आर. , जो भी लागू हो, के अनुसार दरों की निष्पक्षता, समानता एवं युक्तियुक्तता सुनिश्चित करेगी तथा उसका विश्लेषण किया जाएगा ।

4.4.5. बिना दर सूची (कोटेशन) के कार्यों की अधिप्राप्ति

आकस्मिक प्रकृति के कार्य जो छोटे कार्यों (petty works ) की श्रेणी में आते हैं, उदाहरणर्थ -छोटी - मोटी मरम्मत, प्रतिस्थापन, यातायात खोलने हेतु भूस्खलित मलबा हटाना आदि कार्य सक्षम प्राधिकारी के समुचित अनुमोदन के साथ, बिना किसी दर सूची के 50,000 /- रुपये (पचास हजार रुपये) तक के मूल्य पर सम्पादित किए जा सकते हैं । इस हेतु प्राधिकृत अधिकारी निम्नलिखित प्रमाणपत्र अभिलिखित करेंगेः

"मैं ..व्यक्तिगत रूप से संतुष्ट हूं कि..... ...कार्य (कार्य का विवरण) ..के माध्यम से सम्पादित किया गया है , जिसकी कुल राशि ..है, अपेक्षित विशिष्टियों तथा गुणवत्ता के अनुरूप हैं तथा इसे विश्वसनीय संविदाकार द्वारा उचित दरों पर सम्पादित किया गया है "

हस्ताक्षर..

दिनांक..

पदनाम...

अधिकारी का नाम..

4.5 निविदा दस्तावेज़ तैयार करना, निविदाओं का मूल्यांकन एवं कार्य प्रदत्त करना

निविदा दस्तावेज़ तैयार करने, मूल्यांकन एवं कार्य प्रदत्त करने के विवरण हेतु नियामवली के नियम-3.4 तथा 3.5 का संदर्भ लिया जा सकता है, यदि इसकी प्रत्यक्ष सुसंगता है एवं इस अध्याय में उल्लिखित किसी भी व्याख्या से असंगत नहीं है ।

4.5.1 . समान दर वाली निविदा (Identical Bids )

कार्यों की अधिप्राप्ति के सम्बन्ध में यदि दो या दो से अधिक निविदादाता समान राशि उद्धृत करते हैं, तो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निविदा दस्तावेजों में परिभाषित व्यवस्था के अनुसार निविदादाता का चयन करेगी, जो निम्नलिखित में से किसी एक विकल्प पर आधारित हो सकता है:

( 75)

i. ऐसे निविदादाता का चयन करें जिसकी वित्तीय आवर्त (turnover ) के रुप में निर्धारित उच्चतम वित्तीय क्षमता हो; या

ii. उस निविदादाता का चयन करें जिसके पास समान प्रकार के कार्य निष्पादित करने की उच्चतम तकनीकी क्षमता हो ।

अन्य कोई मानक , जैसा कि निविदा दस्तावेज़ में विनिर्दिष्ट किया गया हो ।

4.6 प्रतिभूतियों का विवरण

धरोहर धनराशि, कार्यपूर्ति प्रतिभूति, बोनस तथा परिनिर्धारित क्षति की राशि विनिश्चित करने हेतु निम्नानुसार विचार किया जा सकता है । तथापि, वास्तविक राशि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा कार्य के प्रकार, कार्य की मात्रा तथा अनिवार्यताओं के आधार पर विनिश्चित की जा सकती है ।

i. निविदा प्रतिभूति अथवा धरोहर धनराशि निक्षेप (Earnest Money Deposit)-

मानदंड

राशि

अनुमानित लागत का 02 प्रतिशत

रु. 25,00,00,000 /- (पच्चीस करोड़ रुपये) तक की अनुमानित लागत वाले कार्यों हेतु

रु. 25,00,00,000 /- (पच्चीस करोड़ रुपये) रु. 50,00,000/- (पचास लाख रुपये) + से अधिक की अनुमानित लागत वाले कार्यों हेतु

रु. 25,00,00,000 (पच्चीस करोड़ रुपये) से अधिक अनुमानित लागत का 01 प्रतिशत

धरोहर धनराशि निक्षेप के सम्बन्ध में अन्य विवरणों का सन्दर्भ नियमावली के नियम- 3.6.1 से लिया जा सकता है , जिनका कार्यों की अधिप्राप्ति से प्रत्यक्ष संबंध है ।

ii . निष्पादन या कार्यपूर्ति प्रतिभूति (Performance Security) - रु. 5,00,00,000/- (पांच करोड़ रुपये ) तक के अनुबंधों हेतु संविदा मूल्य का 5 प्रतिशत तथा रु. 5,00,00,000 /- (पांच करोड़ रुपये ) से अधिक के अनुबंधों हेतु संविदा मूल्य का 3 प्रतिशत ।

निष्पादन प्रतिभूति के सम्बन्ध में अन्य विवरणों का सन्दर्भ नियमावली के नियम-3.6.2 द्वारा लिया जा सकता है , जिसका कार्यों की अधिप्राप्ति से प्रत्यक्ष संबंध है ।

iii . प्रतिभूति निक्षेप / प्रतिधारण राशि (Retention Money)- प्रतिधारण राशि कुल अनुबंध मूल्य के पांच (5) प्रतिशत से कम और सात (7) प्रतिशत से अधिक नहीं होगी ।

किसी भी दशा में, निष्पादन प्रतिभूति एवं प्रतिधारण राशि का योग कुल अनुबंध मूल्य के दस (10) प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए ।

iv. अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति (Additional Performance Security )-किसी कार्य हेतु आमंत्रित निविदा में अत्यधिक न्यून दरें प्राप्त होने की दशा में नियोक्ता, वित्तीय हानि की (76 )

संभावना से बचाव के लिए निष्पादन प्रतिभूति को पर्याप्त स्तर तक बढ़ा सकता है । अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति की राशि निम्न विवरण के अनुसार विनिश्चित की जाएगी:-

1) प्रतिशत आधारित दर संविदा

क. अनुमानित लागत (आगणन) से 5 प्रतिशत कम तकः कोई अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति नहीं;

ख. अनुमानित लागत (आगणन) से 5 प्रतिशत कम से 15 प्रतिशत कम तकः प्रत्येक 1 प्रतिशत कम होने पर अनुमानित लागत का 0.5 प्रतिशत अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति, ग. अनुमानित लागत से 15 प्रतिशत से अधिक कम होने परः अनुमानित लागत से प्रत्येक 1.0 प्रतिशत कम होने पर अनुमानित लागत का 1 प्रतिशत अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति ।

2) मदवार दर ( item rates ) संविदा

क. अनुमानित मद (item) दर से 5 प्रतिशत कम तकः कोई अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति नहीं;

ख. अनुमानित मद दर से 5 प्रतिशत कम से 15 प्रतिशत कम तकः अनुमानित दर से प्रत्येक 1 प्रतिशत कम होने पर संबंधित आईटम की आगणित राशि का 0.5 प्रतिशत अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति,

ग . अनुमानित मद दर से 15 प्रतिशत से अधिक कम होने परः अनुमानित लागत से प्रत्येक 1.0 प्रतिशत कम होने पर संबंधित आईटम की आगणित राशि का 1 प्रतिशत अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति ।

यदि अनुमानित लागत से अंतर का प्रतिशत पूर्ण संख्या नहीं है, तो 0.5 प्रतिशत या उससे ऊपर का कोई भी प्रतिशत अगली उच्चतर पूर्ण संख्या में पूर्णांकित किया जाएगा और 0.5 प्रतिशत से नीचे का कोई भी प्रतिशत निम्नतर पूर्ण संख्या में पूर्णांकित किया जाएगा । कार्य संपन्न हो जाने तथा अधिप्राप्ति प्राधिकारी द्वारा कार्य की गुणवत्ता संतोषजनक पाए जाने पर अतिरिक्त निष्पादन प्रतिभूति ठेकेदार को वापस लौटा दी जाएगी ।

4.7 कार्यों का निष्पादन

4.7.1 . कार्यों के चरण

किसी निर्माण कार्य के क्रियान्वयन, जिसमें अधिप्राप्ति की योजना भी सम्मिलित है, में सामान्यतः निम्नलिखित चरणों का पालन किया जाए:-

(एक) प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट (प्रिलिमिनरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट) बनाया जाना ।

(77)

(दो) आवश्यकताओं की स्वीकारोक्ति

(तीन) प्रशासनिक अनुमोदन,

(चार) वित्तीय संस्वीकृति (फेज -1 ) ,

( पाँच ) विस्तृत परियोजना आख्या (डी.पी.आर.) एवं विस्तृत प्राक्कलन तैयार करना ।

(छः ) तकनीकी संस्वीकृति (जैसा वित्तीय अधिकारों के प्रतिनिधायन के अनुसार आवश्यक हो ), (सात ) वित्तीय संस्वीकृति (फेज-2) एवं धनराशि का विनियोग ,

(आठ) निविदा दस्तावेजों को तैयार करना,

(नौ) निविदाएं आमंत्रित करना एवं कार्य प्रदत्त (अवार्ड) करना ।

(दस) निर्माण कार्य का क्रियान्वयन ।

(ग्यारह) निर्माण कार्य का अनुश्रवण, गुणवत्ता एवं विश्वसनीयता सुनिश्चित करना ।

(बारह) संतोषजनक कार्य पूर्ण होना तथा

(तेरह) निर्मित आस्तियों का अनुरक्षण ।

टिप्पणीः- रु. 5,00,000/- (पांच लाख रुपये) तक के मरम्मत कार्यों की स्वीकृति प्रारंभिक परियोजना विवरण के आधार पर ही दी जा सकेगी ।

4.7.2. कार्यों के निष्पादन हेतु मानदण्ड

निर्दिष्ट कार्य के निष्पादन हेतु निम्नलिखित मानदंडों का पालन किया जाना चाहिए ;

i. इस अध्याय में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए अधिप्राप्तिकर्ता संस्था 15,00,000 /- रुपये (पंद्रह लाख रुपये) तक के मूल निर्माण कार्य / मरम्मत कार्यों को स्वयं क्रियान्वयित कर सकती है ।

ii. रु.15,00,000 (पंद्रह लाख रूपए) से अधिक अनुमानित लागत के समस्त मूल निर्माण तथा मरम्मत कार्य लोक निर्माण संगठन द्वारा ही क्रियान्वित किए जाएंगे ।

विभाग अपने स्वविवेक से मूल / मरम्मत कार्यों को जिनकी अनुमानित लागत रु.15,00,000 (पंद्रह लाख रूपए) से अधिक हो, किसी लोक निर्माण संगठन को जिसमें राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार के सिविल एवं विद्युत कार्य करने हेतु अधिकृत उपक्रम शामिल हैं, निर्दिष्ट कर सकता है ।

iv. यदि विभागीय अनुदान , आदेश तथा आय - व्ययक प्राविधानों में स्पष्ट रूप से किसी एजेंसी को कार्य आवंटित ना किया गया हो तो ऐसा कार्य राज्य के लोक निर्माण विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जाएगा ।

( 78 )

V. किसी विशेष विभाग को आवंटित कार्यों का प्रारंभ, प्राधिकृत किया जाना या क्रियान्वयन करने का आदेश उस विभाग में लागू विस्तृत नियमों, विनियमों एवं विशिष्ट आदेशों से विनियमित होंगे , परन्तु प्रतिबन्ध यह होगा कि ये विभागीय नियम, विनियम या आदेश इन नियमों से असंगत न हों ।

vi . राज्यान्तर्गत विभिन्न विभागों द्वारा रु0 10,00,00,000 /- (दस करोड़ रुपये) मूल्य तक के निर्माण कार्यों की अधिप्राप्ति स्थानीय व्यक्तियों/ स्थानीय रूप से पंजीकृत फर्मों (जिनमें स्थानीय व्यक्तियों का अंश 51 प्रतिशत या उससे अधिक हो) के माध्यम से सम्पादित किये जायेंगे । परन्तु यदि प्रथम बार की गयी निविदा में किसी स्थानीय व्यक्ति / फर्म द्वारा निविदा नहीं डाली जाती है अथवा प्रथम बार की गयी निविदा में कोई निविदादाता अर्ह नहीं पाया जाता है तो द्वितीय बार की गयी निविदा में उक्त प्रावधान को शिथिल समझा जायेगा ।

vii . तात्कालिकता के आधार अथवा किसी अन्य प्रशासनिक अनिवार्यता के कारण यदि यह आवश्यक हो जाए कि उपरोक्त उपनियम (i ) का पालन करना संभव न हो, संबंधित विभागाध्यक्ष/ कार्यकारी अधिकारी अपने निर्णय एवं दायित्व के अधीन ऐसे कार्यों का क्रियान्वयन करा सकेंगे तथा उन्हें ऐसा करने के कारणों को अभिलिखित करना होगा । इसके साथ ही , उनके द्वारा ऐसा करने की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए अविलम्ब सक्षम प्राधिकारी / प्रशासनिक विभाग से कार्योत्तर अनुमोदन प्राप्त करना होगा ।

viii.

कार्य / परियोजना को निर्धारित समय एवं मूल्य / लागत की सीमा में पूरा किया जाना चाहिए । कोई भी नई देयता सृजित होने से पूर्व ही प्रशासनिक विभाग से अतिरिक्त कार्यों हेतु अनुमोदन प्राप्त किया जाना चाहिए । यदि किसी परियोजना में जबकि कार्य प्रगति में हो, कोई ऐसे अतिरिक्त कार्य आवश्यक समझे जाएं , जो पहले से स्वीकृत आकलन में सम्मिलित नहीं थे, तो उन्हें सम्मिलित करने हेतु अनुपूरक आकलन तैयार किया जाएगा । परियोजना आवश्यकताओं में संशोधन अथवा खराब परियोजना प्रबंधन द्वारा होने वाले विलम्ब के कारण परियोजना लागत में वृद्धि की प्रवृत्ति से बचा जाना चाहिए ।

ix. राज्याधीन विभागों/ लोक निर्माण संगठनों द्वारा सम्पादित किये जाने वाले निर्माण कार्यों की दरों में एकरूपता सुनिश्चित करने हेतु दरों की अनुसूची (SoR) लागू होगी;

X.

राज्याधीन विभागों / कार्यदायी संस्थाओं/ निगमों / लोक निर्माण संगठनों द्वारा निष्पादित भवन निर्माण कार्यों हेतु डी.एस.आर. लागू होगा ।

xi . जिन कार्यस्थलों हेतु केंद्रीय लोक निर्माण विभाग द्वारा दर सूचकांक निर्धारित नहीं किया गया है , उन स्थलों के समीपस्थ स्थित रेल हैड तक केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की दरें लागू होंगी । रेल हैड से निर्धारित कार्य स्थल हेतु लोक निर्माण विभाग द्वारा समय- समय पर जारी निर्मित क्षेत्रफल दरों में दिए गए पक्के, कच्चे मोटर मार्ग , अश्व मार्ग तथा पैदल दूरी हेतु निर्धारित दूरी एवं ऊँचाई इंडेक्स के अनुसार दरें लागू होंगी ।

(79)

xii. विभागीय विशेषज्ञता वाले ऐसे मद ( यथा सीवरेज, नलकूप संबंधी कार्य) जिसके संबंध में Delhi Schedule of Rates ( DSR) / Schedule of Rates ( SoR ) में दरें उपलब्ध नहीं है, के संबंध में दर विश्लेषण एवं दर निर्धारण संबंधित विशेषज्ञ विभाग (यथा सीवरेज कार्य के संबंध में पेयजल निगम एवं नलकूप के संबंध में सिंचाई विभाग ) द्वारा ही तैयार कर जारी की जाएगी तथा प्रतिवर्ष उसे पुनरीक्षित किया जाएगा । तथापि, इस प्रक्रिया के अंतर्गत भी श्रम संसाधन एवं संयंत्र (Labour, Resources and Machines) की मूल दरें लोक निर्माण विभाग द्वारा यथा मुद्रित SoR में उपलब्ध संसाधनों की मूल दरों से ही ली जाएंगी ।

4.7.3. दरों की अनुसूची

i. सामान्य रूप से प्रयोग होने वाली सामग्री / वस्तुओं हेतु नियमित अंतराल पर लोक निर्माण विभाग की मानक दरों की अनुसूची प्रकाशित की जाए । जिसकी प्रति संबंधित समस्त विभागों के विभागाध्यक्षों को उपलब्ध कराई जाए । दरों की ये अनुसूची भवन निर्माण कार्यों के अलावा सभी निर्माण कार्यों पर लागू होगी । भवन निर्माण कार्यों हेतु डीएसआर दरें लागू होंगी ।

ii. इस प्रकार के दरों के अनुसूची के आधार पर ही मात्रा विवरण (बिल ऑफ क्वांटिटी) तैयार किया जाए ताकि उसी आधार पर निविदादाताओं से निविदाएं प्राप्त की जाए ।यदि ऐसी दरों में परिवर्धन या कोई अतिरिक्त सामग्री आवश्यक हो तो उसका उल्लेख निविदा में स्पष्ट रूप से किया जाए ।

दरों की अनुसूची दर विश्लेषण पर आधारित होगी, अतः इसका उचित दस्तावेजीकरण आवश्यक है । पारदर्शिता बनाए रखने हेतु दरों की अनुसूची विभाग की वेबसाइट पर अपलोड की जानी चाहिए ।

iv. दरों की अनुसूची राज्य लोक निर्माण विभाग के प्रमुख द्वारा अनुमोदित की जाए ।

V. बाजार में सामग्री की दरों में जब भी विशेष उतार- चढ़ाव हो तो दरों की अनुसूची पुनरीक्षित की जाए । साधारणतः इसे कम से कम प्रत्येक वर्ष में एक बार अद्यावधिक किया जाए ।

4.7.4. विभाग द्वारा स्वयं कार्यों के निष्पादन की प्रक्रिया

इस नियमावली के नियम 4.7.2 में दिए गए प्रतिनिधायन के अधीन , यदि किसी विभाग द्वारा स्वयं किसी कार्य को किए जाने का निर्णय लिया जाए, तब निम्नलिखित व्यवस्था सुनिश्चित की जाएः

i. संपादित किए जाने वाले ऐसे कार्यों पर संबंधित व्यय की विस्तृत प्रक्रिया विभागीय नियमों में वित्त विभाग के परामर्श से बनायी जाए । ऐसे कार्यों हेतु वित्तीय एवं लेखा के वहीं नियम होंगे जो लोग निर्माण विभाग में समान कार्य हेतु लागू किए जा रहे हों ।

( 80 )

ii. ऐसे कार्यों की स्वीकृति प्रदान करने से पूर्व विस्तृत डिजाइन तथा प्राक्कलन तैयार किया जाए ।

कार्य को तब तक प्रारंभ न किया जाए जब तक कि सक्षम प्राधिकारी से प्राक्कलन के आधार पर प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति प्राप्त ना कर ली गई हो ।

iv. जिन कार्यों की लागत रु. 10,00,000 (दस लाख रूपए) से अधिक हो , उसमें खुली निविदा आमंत्रित कर ही कार्य संपादित कराया जाए ।

V. जिन कार्यों की लागत. रु. 10,00,000 (दस लाख रूपए) तक हो, उन प्रकरणों में सीमित निविदा की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है ।

vi. कार्य प्रारंभ करने से पूर्व संविदा संबंधी अनुबंध करना तथा कार्य करने का आदेश दिया जाना अनिवार्य होगा ।

vii. किसी भी प्रकार की संविदा का अंतिम भुगतान केवल तभी किया जाएगा जब प्रभारी अधिकारी द्वारा कार्य पूर्ण होने का प्रमाण पत्र निम्नलिखित प्रारूप में दे दिया गया होः

"मै.. अधिशासी अधिकारी का नाम एवं पदनाम.......

योजना (योजना का नाम) के अधिशासी अधिकारी के रूप में व्यक्तिगत रूप से संतुष्ट हूँ कि सम्पूर्ण कार्य अनुबंध में निर्धारित विशिष्टियों के अनुरूप किया गया है तथा कार्य की गुणवत्ता और शिल्प (वर्कमैनशिप ) इस कार्य हेतु निर्धारित विशिष्टताओं एवं मानको के अनुरूप है । " हस्ताक्षर...

दिनांक..........

पदनाम ..

अधिकारी का नाम...........

4.7.5. लोक निर्माण संगठन (पी.डब्ल्यू.ओ. ) द्वारा कार्यों के निष्पादन की प्रक्रिया यदि कोई मूल कार्य अथवा मरम्मत/ अनुरक्षण / रखरखाव कार्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा लोक निर्माण संगठन को सौंपे गए हों तो संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा इन नियमों और वित्तीय शक्तियों के प्रतिनिधायन के अनुसार प्रशासकीय अनुमोदन एवं वित्तीय स्वीकृति दी जाएगी तथा कार्य के संपादन हेतु समय से धनराशियाँ उपलब्ध कराई जाएंगी । लोक निर्माण संगठन द्वारा स्थापित नियमों एवं प्रक्रिया का समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा, ताकि कार्य निर्धारित समयावधि एवं प्राक्कलित धनराशि की सीमा में पूरा किया जा सके । लोक निर्माण (81 )

संगठन सुनिश्चित करेंगे कि उनके नियम एवं प्रक्रियाएं उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली (समय समय पर यथासंशोधित) से असंगत न हों । तथापि, किसी भी संदेह को दूर करने हेतु, यह स्पष्ट किया जाता है कि यदि लोक निर्माण संगठन तथा उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली के नियमों एवं प्रक्रियाओं के मध्य कोई विरोधाभास है, तो उन्हें समनुदेशित कार्यों के संबंध में उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली के नियम ही मान्य होंगे ।

4.8 कार्यों का अनुश्रवण एवं गुणवत्ता आश्वासन

4.8.1 . कार्यों का निरीक्षण/ गुणवत्ता नियंत्रण

i. पर्यवेक्षक अभियंता द्वारा कार्य का निरंतर निरीक्षण किया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो कि कार्य संविदा में विहित विशिष्टताओं के अनुसार क्रियान्वयन किया जा रहा है । निरीक्षण का उद्देश्य यह भी है कि परियोजना के क्रियान्वयन में गतिरोध को चिन्हित कर उसका निवारण किया जाए ।

ii. राज्य में कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने हेतु, सरकार में नियोजन / वित्त विभाग के अंतर्गत प्रमुख सचिव, नियोजन/ वित्त विभाग के समग्र पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण के अधीन एक गुणवत्ता विश्वसनीयता प्रकोष्ठ (क्वालिटी एश्योरेंस सेल) बनाया जाएगा ।

गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करने हेतु राज्य के प्रत्येक जनपद में भी एक गुणवत्ता विश्वसनीयता प्रकोष्ठ (क्वालिटी एश्योरेंस सेल) बनाया जाएगा जिसमें अनुभवी तकनीकी कार्मिक/ अभियंता होंगे और जो निष्पादित किये जा रहे निर्माण कार्य व सामग्री की गुणवत्ता का अनुपालन सुनिश्चित करेंगे । इस प्रकोष्ठ का प्रमुख (हेड) एक वरिष्ठ अधिकारी होगा जो कार्य पूर्ण होने के तीन माह के भीतर सीधे सम्बंधित प्रमुख सचिव /सचिव /विभागाध्यक्ष को अपनी आख्या प्रस्तुत करेगा । यह प्रकोष्ठ रु. 1,00,00,000 (एक करोड़ रूपए ) से अधिक लागत के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करेगा । रु. 1,00,00,000 (एक करोड़ रूपए) से कम लागत के कार्य को समय से एवं गुणवत्तायुक्त पूर्ण कराने का दायित्त्व विभागीय अधिकारी का होगा । सड़क के कार्य को छोड़कर रु. 25,00,000 (पच्चीस लाख रूपए) से कम लागत के कार्यों की गुणवत्ता को उक्त कार्य के क्रियान्वयन करने वाली निर्माण एजेंसी के तकनीकी अधिकारी तथा विभाग के स्थानीय अधिकारी सुनिश्चित करेंगे ।

iv. ऐसे कार्य हेतु जिनकी लागत रु. 5,00,00,000 (पांच करोड़ रूपए ) से अधिक हो, विभागाध्यक्ष सुनिश्चित करेंगे कि अनुभवी एवं ख्याति प्राप्त बाह्य सलाहकार या विशेषज्ञों से युक्त एक स्वतंत्र "तृतीय निरीक्षण प्राधिकारी " (थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन) नियुक्त किया जाए । यदि विभागाध्यक्ष के पास ऐसे तृतीय निरीक्षण प्राधिकारी गठन करने के संसाधन उपलब्ध न हों तो रु. 5,00,00,000 (पांच करोड़ रूपए) से अधिक के कार्य हेतु राज्य स्तरीय तकनीकी ( 82)

संपरीक्षा प्रकोष्ठ द्वारा उन कार्यों का स्थलीय निरीक्षण कम से कम वर्ष में एक बार तथा निर्माण कार्य की निरंतरता के दौरान कम से कम दो बार अवश्य किया जाए ।

V. परियोजना अनुश्रवण प्रणाली

क. कार्य प्रारंभ करने के पूर्व प्रत्येक कार्य की अधिप्राप्ति हेतु एक परियोजना अनुश्रवण प्रणाली तैयार की जाए जिसे कार्यस्थल पर उपलब्ध होना चाहिए । गुणवत्ता विश्वसनीयता प्रकोष्ठ (क्यू.ए.सी.) द्वारा प्रत्येक त्रैमास / मास के अंतराल पर अनुश्रवण किया जाएगा तथा संबंधित विभाग के सचिव तथा विभागाध्यक्ष को विश्वसनीयता प्रास्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी ।

ख. अत्यधिक लागत के कार्यों की संविदा में यह भी प्रावधान किया जाए कि ठेकेदार द्वारा कम्प्यूटरीकृत रूप में निर्धारित मासिक प्रगति आख्या प्रस्तुत की जाए । प्रगति आख्या में अन्य अपेक्षित विशिष्टताओं के अतिरिक्त निम्नलिखित विवरणों का उल्लेख किया जाए- 1. परियोजना संबंधी सूचना, जिसमें संविदा की प्रमुख विशिष्टताओं का उल्लेख हो ।

2. संविदा के अधीन होने वाले कार्य की प्रमुख संरचनाओं एवं अन्य विषयों का सूक्ष्म परिचय एवं विषय वस्तु (स्कोप) ।

3. स्तंभ तालिका (बार चार्ट) के माध्यम से कार्य के विभिन्न घटकों के लिए अगले तीन त्रैमासों की समयसारिणी, जिसमें माइलस्टोन, सभी घटकों के लक्ष्य तथा अद्यावधिक प्रगति दर्शित हो ।

4. तालिका में कार्य के विभिन्न घटकों का माह में तथा माह तक जो लक्ष्य निर्धारित था और वास्तव में किया गया एवं विचलन, यदि कोई हो, के कारणों सहित प्रगति तालिका चार्ट ।

5. संयंत्र तथा मशीनों का विवरण जो कार्य में लगाई गई हो तथा उनकी कार्यशीलता की प्रास्थिति ।

6. जनशक्ति विषयक विवरण में कार्य में तैनात प्रत्येक कर्मचारी का नाम तथा पदनाम ।

7. वित्तीय विवरण, जिसमें प्रमुख विवरण यथा सभी चालू खातों का अद्यावधिक भुगतान, जिसमें किए गए कार्य का सकल मूल्य , लिया गया अग्रिम, की गई वसूलियां, रोकी गई धनराशि, शुद्ध भुगतान, चेक द्वारा प्राप्त भुगतान आदि दर्शाया जाए ।

8. ठेकेदार द्वारा प्रस्तुत किए गए अतिरिक्त या प्रतिस्थापित वस्तुएं तथा उनके सापेक्ष प्राप्त किए , भुगतान , बैंक गारंटी का विवरण तथा उसकी वैधता की दिनांक, ठेकेदार द्वारा ली गई बीमा योजना (यदि कोई हो) , अग्रिम के रूप में प्राप्तियां तथा विभाग द्वारा उसका समायोजन, आदि ।

( 83)

9. विभिन्न वस्तुओं / कार्यों / घटकों का रंगीन फोटो, जो अद्यावधिक किए गए कार्य की प्रगति दर्शाता हो ।

10. माह में गुणवत्ता , विश्वसनीयता तथा गुणवत्ता नियंत्रक विषयक, किए गए परीक्षण तथा उनका परिणाम ।

11. किसी भी प्रकार की रुकावट का उल्लेख , तथा

12. यदि कोई विवाद हो, उसका उल्लेख ।

4.8.2. सामयिक अनुश्रवण (Time Monitoring)

निर्माण कार्यों संबंधी निविदाएं पूर्व निर्धारित पूर्णता अवधि के साथ आमंत्रित की जायेंगी, साथ ही कार्य का ससमय निष्पादन सुनिश्चित किए जाने हेतु निविदा प्रपत्रों में निम्नलिखित बिंदुओं के सम्बन्ध में स्पष्ट प्रावधान किए जाएंगे-

i. अप्रत्याशित घटना (Force Majeure)

अप्रत्याशित घटनाएँ उन असाधारण परिस्थितियों को संदर्भित करती हैं जो संविदात्मक दायित्वों के समुचित निष्पादन को रोकती हैं तथा अनुबंध के पक्षकारों के नियंत्रण से परे होती हैं । किसी भी पक्ष के नियंत्रण से परे स्थितियाँ जैसे युद्ध, शत्रुता, अत्यधिक प्रतिकूल मौसम की स्थिति, सार्वजनिक शत्रु के कार्य , नागरिक विद्रोह, अंतर्ध्वंस , आग से गंभीर हानि या क्षति, विस्फोट, महामारी , हड़ताल, कानूनों में बदलाव, तालाबंदी या दैवीय कृत्य, आदि अप्रत्याशित घटना की विधिक अवधारणा के अंतर्गत आती हैं । अनुबंध की शर्तों में यह निर्धारित किया जाएगा कि अनुबंध के अंतर्गत अपने दायित्वों की पूर्ति में पक्षकारों की विफलता को चूक नहीं माना जाएगा यदि ऐसी विफलता अनुबंध की शर्तों में यथापरिभाषित अप्रत्याशित घटना का परिणाम है । किसी भी अप्रत्याशित घटना के परिणामस्वरूप संविदात्मक दायित्वों का स्थगन हो जाता है एवं इस प्रकार, सेवाओं की पूर्ति के लिये निर्धारित दिनांक को बिलंबित कर दिया जाता है । लगातार अप्रत्याशित घटना की स्थिति में, अनुबंध को समाप्त करने का प्रावधान किया जाता है ।

ii. निष्पादन में विलम्बः

समय विस्तार हेतु ठेकेदार के अनुरोध की जांच करते समय , अभियंता समस्त परिस्थितियों पर विचार करेगा एवं विलम्ब के प्रकार को निम्नानुसार वर्गीकृत करेगाः

क. क्षमायोग्य विलम्ब बाढ़ , इत्यादि; अप्रत्याशित घटना, अर्थात् दैवीय कृत्य, असामान्य मौसम,

ख. पूर्तियोग्य विलम्ब- क्षतिपूर्ति घटनाएँ, जो अनुबंध की सामान्य शर्तों (GCC) में सम्मिलित हों और अधिप्राप्तिकर्ता संस्था पर दायित्व का सम्पूर्ण भार डालती हों;

(84)

ग. अक्षम्य विलम्ब (ठेकेदार का स्व - दोष) , जो दायित्व का सम्पूर्ण भार ठेकेदार पर डाल देती है; तथा

घ. समवर्ती विलंब- जब विलंब हेतु उत्तरदायी दो या दो से अधिक घटनाएं परस्पर व्याप्त (overlap) होती हैं । विलम्ब हेतु अधिप्राप्तिकर्ता संस्था या ठेकेदार या कोई भी उत्तरदायी हो सकता है । ऐसा विलंब भी उपरोक्त श्रेणियों में से किसी के अधीन आएगा ।

विलम्ब के वर्गीकृत कर दिए जाने के पश्चात, न केवल यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि क्या ठेकेदार समय विस्तार और/ या मौद्रिक राहत हेतु पात्र है , बल्कि यह भी निर्धारित किया जाना चाहिए कि क्या ठेकेदार पर परिनिर्धारित क्षति (LD ) या चूक आधारित समापन (default termination) जैसे दण्ड आरोपित किए जा सकते हैं ।

परिनिर्धारित क्षति (Liquidated Damage): रु. 10,00,000/- (दस लाख रुपए ) तक की लागत वाले मरम्मत कार्यों हेतु प्रति सप्ताह अनुबंध मूल्य का 1 % परिनिर्धारित क्षति तथा अन्य सभी निर्माण कार्यों हेतु, विलंब के प्रति सप्ताह अनुबंध मूल्य का 0.5% (आधा प्रतिशत), होगा । इसकी अधिकतम सीमा का अंकन निविदा प्रपत्र में किया जाएगा । उसके पश्चात् ग्राहक को अनुबंध रद्द करने का अधिकार होगा ।

iv. बोनस- कार्य पूर्ति हेतु निविदाएं, पूर्व निर्धारित अवधि के साथ आमंत्रित की जाएंगी । कार्य के समयोपूर्व सम्पादन हेतु निविदाओं में प्रोत्साहन धनराशि का प्रावधान किया जा सकता है । प्रतिमाह संविदा मूल्य का 1 प्रतिशत परंतु अधिकतम संविदा मूल्य के 5 प्रतिशत तक की प्रोत्साहन धनराशि पर निम्नलिखित को दृष्टिगत रखते हुए विचार किया जा सकता है- क. अप्रत्याशित आकस्मिक परिस्थितियों, अतिरिक्त प्रयास या अधिप्राप्तिकर्ता संस्था या निविदादाता के नियंत्रण से परे कारणों से कोई कार्य समय से पूर्व पूर्ण हो सकता है या उसमें विलम्ब भी हो सकता है । ऐसी स्थितियों में कार्य के समय से पूर्व पूर्ण होने हेतु श्रेय देने या विलम्ब हेतु दायित्व का निर्धारण करना कठिन हो जाता है । लाभों अतः, समयोपूर्व सम्पादित कार्य हेतु प्रोत्साहन एवं विलम्ब हेतु शास्ति सम्बन्धी उपबंधों को अनुबंध में अत्यंत विवेकपूर्ण ढंग से समाविष्ट किया जाना चाहिए ।

ख. समयोपूर्व सम्पादित कार्य हेतु प्रोत्साहन का प्रावधान शीघ्र पूर्ण होने के वास्तविक के सावधानीपूर्वक मूल्यांकन के पश्चात किया जाना चाहिए तथा निविदा दस्तावेजों में स्पष्ट मौद्रिक निबंधनों (monetary terms ) में बोनस का प्रकटन किया जाना चाहिए ।

V. समय विस्तार (ई.ओ.टी. ):

यदि कोई ठेकेदार समय विस्तार हेतु आवेदन करता है तो इसे अनुबंध की अवधि के अंत तक नहीं छोड़ा जाना चाहिए , बल्कि इस पर अनुबंध की वैधता के दौरान त्वरित विचार ( 85 )

किया जाना चाहिए । अविरत (ongoing ) गंभीर विलंब हेतु अंतरिम समय विस्तार दिया जा सकता है । अभियंता, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था एवं ठेकेदार के साथ उचित परामर्श के बाद , इस प्रकार के विस्तार की अवधि निर्धारित करेंगे तथा अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को एक प्रति उपलब्ध करने के साथ तदनुसार ठेकेदार को सूचित करेंगे ।

4.8.3. वित्तीय अनुश्रवण

i. मात्रा परिवर्तन / अतिरिक्त / प्रतिस्थापित मदें (Variations/ Extra /Substitute Items ) मात्रा परिवर्तन का अर्थ हैः

(क) अनुबंध के मात्रा देयक में सम्मिलित किसी भी कार्य की मात्रा में वृद्धि या कमी;

(ख ) ऐसे किसी भी कार्य का लोप (लेकिन तब नहीं जब विलोपित कार्य को अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के माध्यम से किसी अन्य ठेकेदार द्वारा सम्पादित किया जाना हो) ;

(ग) ऐसे किसी भी कार्य के चरित्र या गुणवत्ता या प्रकार में परिवर्तन;

(घ ) कार्यों के किसी भी भाग के स्तर, रेखाओं, स्थिति एवं आयामों में परिवर्तन;

(ङ) कार्यों की पूर्ति हेतु आवश्यक किसी भी प्रकार के अतिरिक्त कार्य; तथा

(च) कार्यों के किसी भाग या निर्माण के निर्दिष्ट क्रम या समय में परिवर्तन । मात्रा परिवर्तन के परिणामस्वरूप ठेकेदार को अतिरिक्त या कम भुगतान करना पड़ सकता है या ऐसा भी हो सकता है कि कीमत में किसी प्रकार का बदलाव नहीं हो । मात्रा परिवर्तन की स्थिति को प्रशासित करने एवं निगरानी हेतु मात्रा परिवर्तन रजिस्टर का उपयोग किया जाएगा । आम तौर पर, ठेकेदार सकारात्मक परिवर्तनों का दावा करने की प्रवृत्ति रखता है और नकारात्मक परिवर्तनों की रिपोर्ट नहीं करता । हालांकि, अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को ऐसे नकारात्मक परिवर्तनों पर नजर रखनी चाहिए और समय पर पत्र जारी करना चाहिए ।

ii. मूल्य परिवर्तनः

क. मूल्य में परिवर्तन संबंधी यह प्रावधान निर्माण सामग्री/ श्रमिकों के मूल्यों की कम या अधिक होने की स्थिति से संबंधित है । परंतु यह उन संविदाओं पर लागू नहीं होगा जिनके पूर्ण होने की अवधि 18 माह या उससे कम हो । ऐसे मामलों में मूल्य परिवर्तन पर विचार नहीं किया जाएगा जब मूल अनुबंध, जिसके पूर्ण होने की समयसीमा 18 माह से कम थी, किन्तु समय का विस्तार इस प्रकार प्राप्त हुआ है कि कार्य पूर्ति की कुल समयसीमा 18 माह से अधिक हो जाती है ।

ख. श्रमिकों, पेट्रोल / तेल, निर्माण सामग्री के मूल्यों में कमी या वृद्धि होने की स्थिति में ठेकेदार को देय धनराशि समायोजित की जाएगी , जिसके लिए उपयुक्त सूत्र (फॉर्मूला) निर्धारित किया जाएगा ।

( 86 )

ग. यदि संविदा के प्रावधानों में लागत के कम या ज्यादा होने पर पूर्णतः क्षतिपूर्ति आच्छादित होने का प्रावधान न हो तो इकाई दरें या मूल्य, जो संविदा में उल्लिखित हों , में ऐसे आकस्मिक उतार- चढ़ाव की क्षतिपूर्ति की राशि को सम्मिलित माना जाएगा । इसके लिए सूत्र सामग्री/ श्रमिक/ पेट्रोल एवं तेल , लागत सूचकांक/ आधारभूत मूल्य आदि पर आधारित हो सकता है । सूचकांक प्रस्तावित कार्य हेतु उपयुक्त हों तथा उन्हें उन स्रोतों से जोड़ा जाय जिनके आधार पर आगणन गठित किया गया हो ।

घ. निविदा प्रस्तुत करने के बाद यदि किसी सांविधिक विनियम या उपनियम के प्रभावी होने से ठेके के क्रियान्वयन के दौरान लागत में कमी या बढ़ोतरी होती है तो लागत में ऐसी अभिवृद्धि या कमी (जो मूल्य सूचकांक में सम्मिलित हो, को छोड़कर) को संविदा मूल्य में जोड़ा या उससे घटाया जाएगा ।

माप पुस्तिका

संविदा के सापेक्ष किये गए अधिकतर निर्माण कार्यों का भुगतान माप पुस्तिका में अंकित माप के आधार पर किया जाए । इस प्रकार की माप पुस्तिकाओं को नियत अवधि पर अद्यावधिक किया जाए तथा विहित मानकों के अनुसार माह में कम से कम एक बार भुगतान किया जाए । माप पुस्तिका का रख रखाव सामान्यतः कनिष्ठ अभियंता या अन्य प्राधिकृत प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा जिनका यह दायित्व होगा कि वे इस समय सीमा के अधीन उसे पूर्ण करें, तथा तद्‌नुसार देयकों ( बिलों) को तैयार करें । देयक ठेकेदार द्वारा हस्ताक्षरित किया जाए तथा माप पुस्तिका एवं देयकों का परीक्षण सहायक अभियन्ता या अन्य सक्षम अधिकारी द्वारा किया जाए, जिसका पुनः परीक्षण लेखा प्राधिकारी द्वारा किया जाए एवं अधिशासी अभियंता द्वारा भुगतान किया जाए । अधिशासी अभियंता के लिए देयक भुगतान स्वीकृत करने से पूर्व कार्य की प्रगति या अन्य विवरणों से संतुष्ट होना आवश्यक होगा । इस प्रकार के देयकों से यदि विधि अनुसार कोई कर, शुल्क अथवा अग्रिम की कटौती की जानी हो तो ऐसे देयकों से कटौती की जाए । चालू देयकों में दिखाए गए भुगतान संपूर्ण कार्य के अंतिम भुगतान के सापेक्ष क्रमिक भुगतान (रनिंग पेमेंट ) माना जाएगा ।

भुगतान संविदा में निहित शर्तों एवं प्रतिबंधों के अधीन सोपानों में किया जाए तथा सक्षम प्राधिकारी प्रत्येक सोपान (स्टेप) के भुगतान का प्रमाणीकरण करेगा ।

iv. ठेकेदारों को निर्माण कार्य हेतु अग्रिम

साधारणतया ठेकेदारों को अग्रिम दिया जाना वर्जित है तथा किए गए वास्तविक कार्य के सापेक्ष ही भुगतान किया जाए । शासन अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्थापित नियमों तथा ( 87 )

प्रक्रियाओं के अधीन कुछ पूर्व से परिभाषित उपयोगों में अपवादस्वरुप अग्रिम अनुमन्य किए जा सकते हैं । इस प्रकार के कुछ उदाहरणों में निम्नलिखित को सम्मिलित कर सकते हैं:

क. संचालन अग्रिमः अनुबंध राशि के 10 प्रतिशत तक । अग्रिम को सुरक्षित करने हेतु बैंक गारंटी ली जाएगी । यदि बैंक गारंटी ली गई है तो अग्रिम स्वीकृति से पूर्व उसकी प्रामाणिकता एवं वैधता अवधि की जांच कर लेनी चाहिए । जब तक अग्रिम राशि की कटौती या समायोजन नहीं किया जाता, तब तक अग्रिम ब्याज के भुगतान के अधीन रहेगा । अग्रिम भुगतान पर ब्याज दर का उल्लेख निविदा दस्तावेजों में किया जाएगा ।

ख. कच्चे माल के सापेक्ष अग्रिमः यह केवल ऐसे कच्चे माल के सापेक्ष दिया जाएगा जिसका उपयोग अगले 3 माह के अंतर्गत निर्माण हेतु किया जाएगा ।

4.8.4. विवाद समाधान

i. निविदा दस्तावेज में विवाद निवारण की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से इंगित की जानी चाहिए । यदि दोनों पक्षों के मध्य कोई विवाद की स्थिति बनती है तो प्रथमतः इसे परस्पर सहमति से सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए । ऐसा विवाद समाधान बोर्ड (डिस्प्यूट रेज़ोल्यूशन बोर्ड) के माध्यम से किया जा सकता है ।

ii. यदि अनुबंध या कार्यों के निष्पादन के संबंध में या उससे उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार का कोई विवाद, चाहे कार्यों के निष्पादन के दौरान हो या उनके पूरा होने के बाद और चाहे अनुबंध के अस्वीकार या समाप्ति से पहले या बाद में, जिसमें अभियंता की किसी कार्रवाई, निष्क्रियता, राय, निर्देश, निर्धारण , प्रमाण पत्र या मूल्यांकन के साथ किसी भी पक्ष की असहमति है तो विवादित मामले को, सबसे पहले, विवाद समाधान बोर्ड को भेजा जाएगा ।

माध्यस्थम् या मध्यस्थता (Arbitration):

ऐसे सभी प्रश्न या विवाद , जो कार्य विशिष्टियों, डिजाइन, रेखाचित्र (ड्रॉइंग ) एवं अनुदेश से संबंध रखते हों या कारीगरी या कार्य में उपयोग की गयी सामग्री की गुणवत्ता या कोई अन्य प्रश्न, दावा, या अधिकार, जो संविदा, डिजाइन, ड्रॉइंग , मानकीकरण, प्राक्कलन, अनुदेश , आदेश या इनकी शर्तों से संबंधित हों या कार्य से जुड़े विषय जो क्रियान्वयन की असफलता, कार्य की प्रगति या निरस्तीकरण , समापन , पूर्णता, या त्यागने से उत्पन्न हाते हों, को प्राधिकृत मध्यस्थ (ऑर्बिट्रेटर) की मध्यस्थता के माध्यम से न्याय निर्गत किए जाने हेतु संदर्भित किया जाए। मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का संचालन माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम (Arbitration and Conciliation Act) , 1996 (समय- समय पर यथासंशोधित) के प्रावधानों या तद्विषयक सांविधिक संशोधन, पुनर्धिनियमितीकरण तथा उसके अधीन बनाई गई प्रभावी नियमावली के अनुसार माध्यस्थम की कार्यवाही की जाए ।

( 88 )

इस प्रयोजन हेतु मानक निविदा दस्तावेजों में एक मानक मध्यस्थता (माध्यस्थम्) खंड शामिल किया जा सकता है जो पालन की जाने वाली मध्यस्थता प्रक्रिया को दर्शाता हो । यह आवश्यक है कि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के परियोजना संगठन तथा अभियंता को संभावित मध्यस्थता खंडों के सम्बन्ध में जानकारी होनी चाहिए एवं यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महत्वपूर्ण दस्तावेज अनुरक्षित रखे जाएं ।

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (समय-समय पर यथासंशोधित) के अनुसार सरकार द्वारा तैयार किए गये मध्यस्थों के पैनल में से एक अधिकारी को मध्यस्थ के रूप में ऐसे नियुक्ति प्राधिकारी, जिनका स्तर शासन में सचिव स्तर से कम न हो , द्वारा नियुक्त किया जा सकता है । निविदा दस्तावेज़ में मध्यस्थ के नियुक्ति प्राधिकारी को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए ।

4.8.5. संविदा का उल्लंघन एवं समापन (Breach of Contract and Termination)

यदि ठेकेदार अनुबंध की महत्वपूर्ण पूर्वापेक्षाओं का सम्मान करने में असमर्थ है या सम्मान न करने के अपने आशय सूचित करता है या ऐसी शर्त का सम्मान करने में असमर्थता रखता है, तो अनुबंध का उल्लंघन हुआ माना जाता है । अधिकतर, ऐसे उल्लंघन अनुबंध के निष्पादन के संबंध में निर्धारित समय के अंतर्गत कार्य पूर्ण करने में असमर्थता के संदर्भ में होते हैं ।

यदि ठेकेदार की ओर से अनुबंध के मौलिक उल्लंघन/ दिवालियापन के कारण कार्य का समापन होता है, तो अभियंता (i) अग्रिम भुगतान; (ii ) किसी वसूली योग्य धनराशि; (iii) देय कर; तथा (iv) अनुबंध में निर्दिष्ट व्यवस्था के अनुसार अपूर्ण कार्यों पर लागू होने वाले प्रतिशत के संबंध में आवश्यक कटौती करने के पश्चात् ठेकेदार द्वारा संतोषजनक विधि से पूर्ण किए गए कार्य का मूल्य आंकलित करेगा । यदि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को देय कुल राशि ठेकेदार को देय राशि से अधिक हो जाती है, तो अंतर अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा वसूल किया जाएगा ।

i. ठेकेदार की चूक पर अनुबंध रद्द करना

अनुबंध के उल्लंघन हेतु किसी भी अन्य उपाय पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जैसे कि सूचीबद्ध ठेकेदारों की सूची से हटाना , ठेकेदार की चूक की लिखित सूचना भेजकर, अनुबंध को पूर्ण या आंशिक रूप से समाप्त किया जा सकता है, यदि :

1 ) ठेकेदार ने गंभीर रूप से या बार- बार अनुबंध का उल्लंघन किया है , जिसमें निम्नलिखित है:-

क. अनुबंध में निर्दिष्ट समयावधि, या दिए गए किसी भी विस्तार के अंतर्गत कार्य पूर्ण करने में विफलता;

ख. उसकी प्रगति या दोषपूर्ण कार्य , सामग्री या संयंत्र के संबंध में निर्देशों की अवज्ञा करना;

( 89 )

ग. उप-संविदाकारी के विरुद्ध निषेध का उल्लंघन;

घ. कार्य योजना में प्रस्तावित निर्माण संयंत्र , अस्थायी कार्य, श्रमिकों तथा सामग्री की पर्याप्त एवं उपयुक्त आपूर्ति में विफलता;

ङ. अभियंता के प्राधिकार के बिना निर्दिष्ट कालावधि से अधिक समय तक कार्य को पर्याप्त रूप से निलंबित करना तथा अभियंता द्वारा नोटिस प्राप्त होने के निर्दिष्ट दिनों के भीतर कार्य को आगे बढ़ाने में विफलता;

च. संयुक्त उद्यमों के संबंध में आवश्यकताओं का अनुपालन करने में विफलता ।

2) ठेकेदार ने प्रवंचना (fraud ) की है;

3) ठेकेदार अनुबंध में निर्दिष्ट अवधि या उसके द्वारा दिए गए किसी विस्तार के अंतर्गत अनुबंध के अधीन किसी भी अन्य दायित्व को पूर्ण करने में विफल रहता है;

यदि अनुबंध पूर्ण या आंशिक रूप से समाप्त होता है , तो निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक कार्यवाहियों का सहारा लिया जा सकता है:

क. निष्पादन प्रतिभूति का समपहरण ( forfeiture);

ख. ऐसी शर्तों पर तथा ऐसी विधि से जो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था उचित समझे, स्थल का अधिकार ग्रहण करना तथा कार्यों को स्वयं या किसी अन्य ठेकेदार (जोखिम क्रय ) के माध्यम से पूर्ण करना एवं ठेकेदार की सामग्री, उपकरण, अस्थायी कार्यों का उपयोग करना जैसा वह उचित समझे । छोटे मूल्य अनुबंधों में, जोखिम क्रय (risk purchase ) के स्थान पर, मानक निविदा दस्तावेजों में एक निश्चित प्रतिशत वसूली का प्रावधान किया जा सकता है;

ग. तथापि, ठेकेदार उस सीमा तक अनुबंध का निष्पादन जारी रखेगा जब तक कि उसे समाप्त नहीं किया जाता है ।

ii. दिवालिया ( insolvent ) होने पर अनुबंध की समाप्ति

यदि ठेकेदार किसी भी समय दिवालिया हो जाता है या अन्यथा ऋणशोधनाक्षम (insolvent ) हो जाता है या परिसमापन (liquidation) से गुजरता है या तकनीकी या वित्तीय क्षमता को सारभूत रूप से गँवा देता है, तो ठेकेदार को बिना प्रतिकर दिए एक लिखित नोटिस के माध्यम से अनुबंध समाप्त किया जा सकता है, परन्तु इस प्रकार से समापन की कार्यवाही से अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के किसी भी अधिकार या उसे प्राप्त उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा या प्रभावित नहीं होगा जो कि अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को अर्जित हुआ है या उसके बाद प्राप्त होगा ।

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की सुविधानुसार अनुबंध की समाप्ति

अनुबंध के गठन के पश्चात् ऐसी अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो सकती है जो अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को अनुबंध रद्द करने हेतु बाध्य कर सकती है । ऐसे मामले में , अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की सुविधा हेतु, अन्य बातों के सिवाय, अनुबंध को पूर्ण या आंशिक रूप से रद्द करने के ( 90 )

लिए ठेकेदार को एक उपयुक्त नोटिस वह दिनांक दर्शित करते हुए भेजा जाना चाहिए , जिससे समाप्ति प्रभावी हो जाएगी । ठेकेदार को संदत्त किए जाने वाले प्रतिकर, यदि कोई हो, के निर्धारण हेतु अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाएगा । विशेषज्ञ समिति में एक तकनीकी विशेषज्ञ, वित्तीय विशेषज्ञ एवं विधि विशेषज्ञ सम्मिलित होंगे जो ठेकेदार को देय प्रतिकर का मूल्यांकन करेंगे । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था इस संबंध में आवश्यक अनुमोदन प्राप्त करने के बाद , ठेकेदार को देय प्रतिकर जारी करेगी । इस आशय के उपयुक्त प्रावधानों को निविदा दस्तावेज़ के साथ- साथ परिणामी अनुबंध में भी समाविष्ट किया जाना चाहिए ।

(91)

अध्याय 5: परामर्शी सेवाओं की अधिप्राप्ति

5.1 परामर्शी सेवाएं

i . अधिप्राप्ति की कोई भी विषय वस्तु, जिसमें मुख्य रूप से गैर- भौतिक परियोजना-विशिष्ट, बौद्धिक और कार्यविधि संबंधी प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं और जहाँ परिणाम (outcome) / प्रदेय वस्तु (deliverable) एक परामर्शदाता से दूसरे परामर्शदाता में भिन्न हो सकते हैं, परामर्शी सेवाओं के अंतर्गत वर्गीकृत की जाती हैं । इन सेवाओं में आमतौर पर विशेषज्ञ या रणनीतिक सलाह प्रदान करना सम्मिलित होता है । विभाग / सक्षम प्राधिकारी किसी विशिष्ट कार्य के लिए वाह्य व्यवसायिक विशेषज्ञों, परामर्श देने वाली फर्मों / परामर्शी आदि की सेवाएं विहित शर्तों एवं समय सारणी के अधीन कार्य पूर्ण करने के लिए ले सकता है ।

ii. परामर्शी सेवाओं की अधिप्राप्ति उन स्थितियों में की जा सकती है, जिनमें उच्च गुणवत्ता वाली ऐसी सेवाओं की आवश्यकता होती है, जिसके लिए अधिप्राप्ति करने वाली संस्था के पास अपेक्षित विशेषज्ञता नहीं होती है ।

iii . परामर्शी सेवाओं की अधिप्राप्ति हेतु विभाग / सक्षम प्राधिकारी संक्षेप व सरल भाषा में, दिये गये कार्यों के सम्बन्ध में आवश्यकता, उद्देश्य तथा विषय वस्तु तैयार करेंगे । साथ ही परामर्शियों द्वारा पूर्ण की जाने वाली अर्हता एवं पूर्व निर्धारित योग्यता के मानक भी स्पष्टतः चिन्हित किए जायेंगे ।

iv. सम्बन्धित विभाग / सक्षम प्राधिकारी द्वारा , जो परामर्शदाताओं की सेवाएं लेना चाहते हैं, खुले बाजार की दरों तथा अन्य संस्थाओं से , जो इस प्रकार के कार्य करती हों, विचार- विमर्श कर युक्तियुक्त व्यय का आगणन तैयार कर अधिप्राप्ति हेतु आवश्यक कार्यवाही की जायेगी ।

5.2 संविदा के प्रकार

परामर्शदाताओं को भुगतान किए जाने की विभिन्न व्यवस्थाओं के साथ परामर्शी सेवाओं की अधिप्राप्ति प्रकृति में विशिष्ट है । वह आधार जिस पर परामर्शदाता को किया जाने वाला भुगतान उसके द्वारा दी जाने वाली सेवाओं के निष्पादन से सम्बद्ध हो, विचार का मुख्य विषय होता है । प्रत्येक प्रकार के परामर्श अनुबंध में विभिन्न जोखिमों की परिकल्पना की गई है एवं उचित शमन तंत्र प्रदान किया गया है । परामर्शी सेवाओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के अनुबंध निम्नानुसार हैं:

i. एकमुश्त (निश्चित मूल्य) संविदा (lum sum contract) ,

ii . समय-आधारित (रिटेनर- शिप) संविदा,

iii. प्रतिशत आधारित ( सफलता शुल्क) संविदा,

iv . रिटेनर- शिप एवं सफलता शुल्क (आकस्मिकता) आधारित संविदा, तथा

v. अनिश्चित संवितरण संविदा (मूल्य करार) (indefinite delivery contract)

( 92)

5.2.1 एकमुश्त (निश्चित मूल्य) संविदा

अधिकांश परामर्शी सेवाओं हेतु यह अनुबंध का अधिमानी (preferred ) रूप है । इस प्रकार के अनुबंध में, परामर्शी के प्रस्ताव में समस्त लागतें सम्मिलित मानी जाती हैं तथा मूल्यांकन के दौरान किसी अंकगणितीय सुधार या मूल्य समायोजन की अनुमति नहीं होती है । इस प्रकार के अनुबंध को संचालित करना सरल है क्योंकि सेवाओं के एक निश्चित कार्य क्षेत्र हेतु एक निश्चित मूल्य होता है तथा भुगतान स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट उत्पादन (आउटपुट) / लक्ष्य (माइलस्टोन) /प्रदेय वस्तु, जैसे परामर्शी द्वारा अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को प्रस्तुत किए गए लिखित प्रत्यावेदन , दस्तावेज, रेखाचित्र , सॉफ्टवेयर प्रोग्राम आदि से सम्बद्ध होते हैं । इस अनुबंध के अंतर्गत , परामर्शी द्वारा नियोजित संसाधनों पर बचत करके उत्पादन (आउटपुट) /प्रदेय वस्तु की गुणवत्ता एवं विस्तार में घटतौली करने की प्रवृत्ति हो सकती है । इस जोखिम को कम करने हेतु, अनुबंध में प्रदेय वस्तु की गुणवत्ता एवं विस्तार के मूल्यांकन के लिए एक प्रावधान शामिल होना चाहिए तथा इसकी स्वीकार्यता हेतु प्रमाण पत्र अभिलिखित किया जाना चाहिए । केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रदेय वस्तु की स्वीकृति के प्रमाण पत्र के सापेक्ष ही भुगतान किया जाना चाहिए । इस प्रकार के अनुबंधों का उपयोग आम तौर पर सरल नियोजन एवं व्यवहार्यता अध्ययन, पर्यावरणीय अध्ययन, मानक या सामान्य संरचनाओं के विस्तृत डिजाइन, डेटा संसाधन प्रणाली की तैयारी, आदि हेतु किया जा सकता है ।

5.2.2 समय-आधारित (रिटेनर शिप) संविदा

इस प्रकार के अनुबंध में, परामर्शी की सेवाओं को पूर्व- निर्धारित अवधि हेतु प्रतिधारित (retain ) रखा जाता है । अनुबंध भुगतान परामर्शी द्वारा प्रतिनियुक्त व्यक्तियों द्वारा सहमत प्रति घंटा, दैनिक, साप्ताहिक या मासिक दरों पर सेवाएं प्रदान करने पर आधारित होते हैं । प्रतिपूर्ति योग्य वस्तुओं ( items ) हेतु सहमत इकाई दरों पर वास्तविक व्यय का भुगतान अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा किया जाता है । इस प्रकार का अनुबंध तब उपयुक्त होता है जब सेवाओं के विस्तार एवं अवधि को परिभाषित करने में कठिनाइयों के कारण एकमुश्त अनुबंध संभव नहीं होता है क्योंकि ये सेवाएं प्रायः तृतीय पक्ष द्वारा बाह्य अनिवार्यताओं या गतिविधियों से संबद्ध होती हैं । इस प्रकार के अनुबंध का उपयोग आम तौर पर जटिल प्रकृति के अध्ययनों , लेखांकन सेवाओं, निर्माण पर्यवेक्षण , विधिक या चिकित्सा आदि संबंधी परामर्शी सेवाओं हेतु किया जाता है । इनमें अनुबंध में प्रदेय वस्तु की गुणवत्ता एवं विस्तार के मूल्यांकन के लिए एक प्रावधान सम्मिलित होना चाहिए तथा इसकी स्वीकार्यता हेतु प्रमाण पत्र अभिलिखित किया जाना चाहिए । केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रदेय वस्तु की स्वीकृति के प्रमाण पत्र के सापेक्ष ही भुगतान किया जाना चाहिए । अधिप्राप्तिकर्ता इकाई को यह सुनिश्चित करना होगा कि समनुदेशित कार्य की प्रगति प्रयुक्त समय के अनुरूप हो । पर्यवेक्षण को सक्षम करने हेतु परामर्शदाताओं द्वारा भुगतान एवं कार्य की मात्रा की आवधिक ( periodic ) रिपोर्टिंग की एक प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए ।

( 93 )

5.2.3 प्रतिशत आधारित (सफलता शुल्क) संविदा

इस प्रकार के अनुबंधों में, परामर्शी सेवाओं को भुगतान किया जाने वाला शुल्क प्रत्यक्षतः परियोजना की अनुमानित या वास्तविक लागत, या उपार्जित अथवा निरीक्षित सामग्रियों की लागत से संबंधित होती है । चूंकि, भुगतान उद्देश्यों की सफलतापूर्वक प्राप्ति के बाद किया जाता है, इसे सफलता (या आकस्मिकता) शुल्क अनुबंध भी कहा जाता है । अंतिम चयन तकनीकी रूप से योग्य परामर्शियों के बीच से किया जाता है जिन्होंने न्यूनतम प्रतिशत उद्धृत किया है जबकि परिसंपत्तियों का अनुमानित मूल्य तय हो । अनुबंध में प्रदेय वस्तु की गुणवत्ता एवं विस्तार के मूल्यांकन के लिए एक प्रावधान सम्मिलित होना चाहिए तथा इसकी स्वीकार्यता हेतु प्रमाण पत्र अभिलिखित किया जाना चाहिए । भुगतान केवल प्रदेय सामग्री की स्वीकृति के प्रमाण पत्र के सापेक्ष ही किया जाना चाहिए ।

5.2.4 रिटेनर- शिप एवं सफलता (आकस्मिकता) शुल्क संविदा

इस प्रकार का अनुबंध समय आधारित और प्रतिशत अनुबंधों का संयोजन है । प्रतिधारक एवं सफलता (आकस्मिकता) शुल्क अनुबंध में परामर्शी के पारिश्रमिक में एक प्रतिधारण (समय आधारित , मासिक भुगतान) तथा एक सफलता शुल्क (प्रतिशत आधारित भुगतान) सम्मिलित होता है । सफलता शुल्क को सामान्यतः अनुमानित या वास्तविक परियोजना लागत के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है ।

5.2.5 अनिश्चित संवितरण संविदा (मूल्य करार)

इन अनुबंधों का उपयोग तब किया जाता है जब अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को "ऑन कॉल " विशेष सेवाओं की आवश्यकता होती है , जिसकी सीमा एवं समय को पहले से परिभाषित नहीं किया जा सकता है । सेवाएँ प्रदान करने हेतु परामर्शी को समनुदेशित कार्य की मात्रा के लिए अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की ओर से कोई प्रतिबद्धता नहीं है । यह सामग्री की अधिप्राप्ति में प्रयुक्त होने वाली " दर संविदा " पद्धति के समान है । इसमें अधिप्राप्तिकर्ता संस्था तथा परामर्शदाता भुगतान की जाने वाली इकाई दरों पर सहमत होते हैं एवं भुगतान अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा उपयोग की गई सेवा के समय / मात्रा के आधार पर किया जाता है । परामर्शदाता का चयन सेवाएँ प्रदान करने हेतु उद्धृत इकाई दर के आधार पर किया जाता है । इनका उपयोग सामान्यतः "परामर्शदाताओं " को बनाए रखने या "ऑन- कॉल " सेवाओं का लाभ उठाने हेतु किया जाता है , उदाहरण के लिए विवाद समाधान पैनल हेतु निर्णायक, संस्थागत सुधार, अधिप्राप्ति सलाह, तकनीकी समस्या निवारण आदि हेतु विशेषज्ञ सेवायें प्राप्त करना ।

5.3 निविदा प्रणालियाँ

परामर्शी सेवाओं की अधिप्राप्ति में निम्नलिखित निविदा प्रणालियों का उपयोग किया जा सकता है-

i. एकल चरण दो- लिफाफा प्रणाली (94)

ii. एकल चरण बहु- लिफाफा प्रणाली

iii . द्वि-चरण निविदा प्रणाली

निविदा प्रणालियों पर अधिक विवरण हेतु इस नियमावली के नियम -4.3 का संदर्भ लें, यदि वह इस अध्याय में उल्लिखित किसी भी भाग से असंगत नहीं है ।

5.4 निविदा की विधियां

परामर्शी के चयन हेतु प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर निम्नलिखित विधियों में से किसी एक उपयुक्त विधि का पालन करना होगा-

i. गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन (क्यू.सी.बी.एस. )

ii. मूल्य आधारित चयन न्यूनतम लागत चयन (एल.सी.एस.)

प्रत्यक्ष- चयन ( Direct selection)

एकल स्रोत चयन (एस.एस.एस.)

5.4.1 गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन (क्यू.सी.बी.एस. )

i . जहाँ अधिप्राप्ति विषयक कार्यवाही , मानक या सामान्य प्रकृति के बजाय , जटिल एवं अति विशिष्ट प्रकार की हो , जिसमें उच्च कोटि की विद्वता का अंश अधिक हो, तथा विभाग की अपेक्षाओं के अनुसार परामर्शी द्वारा अपने प्रस्ताव में नव परिवर्तनशीलता (इनोवेशन) एवं रचनात्मकता प्रदर्शित करना आवश्यक हो , तो ऐसे प्रकरण हेतु प्रशासनिक विभाग / सक्षम प्राधिकारी गुणवत्ता एवं लागत पर आधारित चयन (क्यू.सी.बी.एस.) को अपना सकता है । प्रदेय उत्पाद (deliverables ) की जटिलता एवं महत्व, स्रोत की क्षमता की गंभीरता तथा अधिप्राप्ति मूल्य के आधार पर एकल चरण या द्वि-चरण निविदा प्रणाली अपनायी जा सकती है ।

ii . क्यू.सी.बी.एस. में , तकनीकी प्रस्ताव की गुणवत्ता सुनिश्चित करने हेतु न्यूनतम योग्यता अंक (सामान्यतः अधिकतम 100 अंक में से 70 से 80) निर्धारित किए जाते हैं तथा विभिन्न तकनीकी मानदंडों / विशेषताओं हेतु अंक आबंटन के लिए योजना प्रस्ताव के अनुरोध (RfP ) में निर्धारित की जाती है । तकनीकी प्रस्ताव के मूल्यांकन के दौरान, प्रस्ताव के अनुरोध (RfP ) में निर्धारित योजना के अनुसार , प्रत्येक निविदा को अधिकतम 100 (सौ) अंकों में से गुणवत्ता अंक दिये जाएंगे । जो परामर्शी/ सेवा प्रदाता तकनीकी मूल्यांकन मानदंड के अनुसार अर्हता प्राप्त करेंगे , उन्हें तकनीकी रूप से प्रतिक्रियाशील ( responsive ) माना जाएगा । शेष तकनीकी रूप से गैर - प्रतिक्रियाशील (non - responsive) प्रस्तावों को सूची से हटा दिया जाएगा । वित्तीय प्रस्ताव केवल तकनीकी रूप से पात्र एवं प्रतिक्रियाशील (responsive ) प्रस्तावों हेतु खोले जायेंगे ।

iii . इस चयन प्रणाली के अंतर्गत परामर्शी का चयन उसकी तकनीकी गुणवत्ता तथा उसके द्वारा प्रस्तावित लागत के आधार पर किया जाता है । प्रस्तावित कार्य की जटिलता तथा गुणवत्ता के महत्व के आधार पर तकनीकी और वित्तीय स्कोर हेतु भारांक निर्धारित किए जाते हैं । तकनीकी (95 )

प्रस्तावों को सामान्यतः 70 % ( सत्तर प्रतिशत) और वित्तीय प्रस्तावों को 30 % (तीस प्रतिशत) या RfP में घोषित कोई अन्य निर्धारित भार (उदाहरणार्थः 60:40 ,75:25 , लेकिन तकनीकी प्रस्तावों को अधिकतम 80 %) दिया जाएगा । गुणवत्ता और लागत के लिए प्रस्तावित भार RfP में निर्दिष्ट किए जाएंगे । सबसे कम लागत वाले प्रस्ताव को 100 (सौ) का वित्तीय स्कोर दिया जाएगा और अन्य प्रस्तावों को उतना वित्तीय स्कोर दिया जाएगा जो कि सबसे कम प्रस्ताव के संबंध में उनकी कीमतों के व्युत्क्रमानुपाती है । इसी तरह, उच्चतम तकनीकी अंक (जैसा कि मूल्यांकन समिति द्वारा आबंटित किया गया हो) वाले प्रस्ताव को 100 (सौ) का तकनीकी स्कोर दिया जाएगा और अन्य प्रस्तावों को उतना तकनीकी स्कोर दिया जाएगा जो कि उनके अंकों के संबंध में आनुपातिक हैं ।

iv . तकनीकी और वित्तीय दोनों तरह के स्कोर को उनके अपने-अपने भारांकों से गुणा कर, गुणवत्ता और लागत के भारित अंकों की गणना की जाएगी , और उन्हें जोड़कर गुणवत्ता और लागत के लिए संयुक्त भारित अंक प्राप्त किए जाएंगे । परामर्शदाता को प्राप्त कुल अंकों के आधार पर क्रमबद्ध (rank) किया जाएगा । गुणवत्ता और लागत के मूल्यांकन में उच्चतम संयुक्त भारित अंक प्राप्त करने वाले प्रस्ताव को H - 1 क्रम दिया जाएगा, उसके बाद कम अंक प्राप्त करने वाले प्रस्तावों को H - 2 , H- 3 आदि क्रम दिया जाएगा । उच्चतम संयुक्त अंक प्राप्त करने वाले (H- 1) प्रस्ताव को, यदि आवश्यक हो , तो बातचीत के लिए आमंत्रित किया जाएगा और अनुबंध प्रदान करने के लिए अनुशंसित किया जाएगा । यदि दो या अधिक बोलियों का अंतिम रैंकिंग में समान अंक है , तो उच्चतम तकनीकी अंक वाली बोली H- 1 होगी ।

V. ऐसे मामले में , प्रत्येक उत्तरदायी बोली के लिए कुल मूल्यांकित बोली स्कोर (B) की गणना निम्नलिखित सूत्र का उपयोग करके की जाएगी , जो प्रत्येक बोली के बोली मूल्य और तकनीकी खूबियों का व्यापक मूल्यांकन करने की अनुमति देता है:

Clow T B = X (100 X) C T high

जहां-

C = मूल्यांकित की जा रही बोली का बोली मूल्य ,

C low = सभी प्रतिक्रियात्मक मूल्यांकित बोली मूल्यों में से सबसे कम मूल्यांकित बोली मूल्य ,

T = मूल्यांकित की जा रही बोली को दिये गये कुल तकनीकी अंक, (96 )

T high = सभी प्रतिक्रियात्मक बोलियों में उच्चतम तकनीकी अंक वाली बोली के तकनीकी अंक, तथा

X = RFP में घोषित मूल्य के लिए निर्दिष्ट भार (weightage) -% में ।

प्रतिक्रियात्मक बोलियों में से उच्चतम मूल्यांकित बोली स्कोर (B) वाली बोली सबसे अधिमान्य (preferential) बोली होगी ।

यदि परामर्शी सेवा की अनुमानित लागत रु० 1,00,00,000 (एक करोड़ रूपए) तक हो तो चयन की इस प्रणाली को अपनाने के पूर्व सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रशासकीय विभाग से अनुमति प्राप्त की जाएगी परंतु जहाँ लागत रु० 1,00,00,000 (एक करोड़ रूपए) से अधिक हो, प्रशासकीय विभाग द्वारा वित्त विभाग का परामर्श/ सहमति प्राप्त की जायेगी ।

vi . प्रशासकीय विभाग द्वारा गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन (क्यू.सी.बी.एस. ) के प्रस्ताव व उसके अंतर्गत प्रस्तावित अभिरुचि की अभिव्यक्ति (EoI) और / या प्रस्ताव हेतु अनुरोध (RfP ) की जांच निम्नलिखित न्यूनतम मानदंडों पर की जायेगी । वित्त विभाग की सहमति प्राप्त करने हेतु भेजे जाने वाले प्रस्ताव में भी इन मानदंडों पर एक स्पष्ट एवं विशिष्ट अनुशंसा की जायेगी तथा इसे प्रस्ताव के साथ जाँच सूची (checklist) के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा ।

क. चयन की विधि की उपयुक्तता, अर्थात् चयन प्रक्रिया के रूप में न्यूनतम लागत चयन (एल.सी. एस. ) के स्थान पर गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन (क्यू.सी.बी.एस.) को चुनने के कारण ।

ख. तकनीकी अंकों के भारांक को चुनने का औचित्य दिया जाय, यदि ऐसे चयन हेतु तकनीकी अंकों के भारांक को 70 से अधिक लिया गया हो ।

ग. परामर्शी अधिप्राप्ति के लागत प्राक्कलन यथोचित विवेक ( due diligence ) का प्रयोग कर तैयार किए गये हैं, अर्थात् प्राक्कलन तैयार करने में लागतों के मानदंड उद्योग या बाजार के मानकों पर आधारित हों ।

घ. प्रयोजन का औचित्य एवं आबंटित बजट की पर्याप्तता; इस बात की संतुष्टि है कि प्रयोजन के औचित्य सहित आबंटित बजट, प्रस्तावित कार्यों एवं प्रदेय वस्तु के अनुरूप है अर्थात् इस हेतु पर्याप्त बजट का प्रावधान है ।

ङ. उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली के साथ- साथ लागू सरकारी आदेशों के प्रावधानों का अनुपालन हो तथा यदि कोई भिन्नता हो तो विशेष रूप से उसके औचित्य का उल्लेख किया जाय ।

च. विभाग की घोषणा कि चिन्हित किये गये कार्य विशेष एवं तकनीकी प्रकृति के हैं तथा विभाग इन कार्यों का संपादन स्वयं नहीं कर सकता है ।

छ. संपूर्ण अभिरुचि की अभिव्यक्ति, प्रस्ताव हेतु अनुरोध तथा संविदा अनुबंध का अंतिम प्रारूप प्रस्ताव के साथ संलग्न है ।

( 97)

इन अनुपालनों के साथ, मामले को जांच एवं टिप्पणियों हेतु वित्त विभाग को भेजा जाएगा । इसके बाद ही प्रस्ताव वित्त विभाग की राय / परामर्श के साथ विचार एवं अनुमोदन हेतु विभागीय व्यय समिति / वित्त व्यय समिति को प्रस्तुत किया जाएगा ।

5.4.1.1 गुणवत्ता मूल्यांकन हेतु अंकों का निर्धारण-

क. द्वि- चरण चयन पद्धति अर्थात अभिरुचि की अभिव्यक्ति (EoI ) तथा प्रस्ताव हेतु अनुरोध (RfP) के मामले में अंकों का निर्धारण

चरण 1: लघुसूचीबद्धिकरण हेतु अभिरुचि की अभिव्यक्ति चरण में अंकों की सीमा के साथ मूल्यांकन मानदंडः

क्र.सं.

मानदंड

उप-मानदंड

1 परामर्शदाता का विगत अनुभव (ट्रैक रिकॉर्ड)

सुसंगत अनुभव के वर्षों की संख्या समान प्रकृति के अध्ययनों का विगत अनुभव अध्ययनों (Studies) का विगत अनुभव

संबंधित सेक्टर में अध्ययन

क्षेत्र में किए गए अध्ययन 2

भारांक

कुल मानदंड उप-मानदंड

60%

20%

50%

20%

10% 25%

योग्यता, अनुभव और प्रमुख कर्मचारियों की संख्या का सामान्य विवरण (व्यक्तिगत आत्मवृत्त नहीं) योग्यताएँ

सुसंगत अनुभव

3

30%

70% 15%

टर्नओवर , लाभप्रदता एवं नकदी प्रवाह (liquid assets) की स्थिति के संदर्भ में परामर्शी की समग्र वित्तीय ताकत

विगत तीन वर्षों का टर्न ओवर आंकड़ा

विगत तीन वर्षों का शुद्ध लाभ आंकड़ा

कुल

50%

50%

100% ( 98 )

चरण 2: प्रस्ताव हेतु अनुरोध (RfP) चरण में अंकों की सीमा के साथ मूल्यांकन मानदंडः

क्र.सं. मानदंड

अंकों की सीमा

1

5-10

कार्य हेतु सुसंगत विगत अनुभव

2

वित्तीय सामर्थ्य

0

3

दृष्टिकोण एवं कार्यप्रणाली

25-30

4

प्रमुख विशेषज्ञ

50-65

5

ज्ञान का हस्तांतरण

0-5

ख. एकल चरण चयन विधि (अर्थात बिना लघुसूचीबद्धिकरण के सीधे आर.एफ.पी.) में अंकों की सीमा के साथ मूल्यांकन मानदंडः

क्र.सं. मानदंड

अंकों की सीमा

1

5-15

कार्य हेतु सुसंगत विगत अनुभव

2

वित्तीय सामर्थ्य

5-10

3

दृष्टिकोण एवं कार्यप्रणाली

25-30

4

प्रमुख विशेषज्ञ

50-65

5

ज्ञान का हस्तांतरण

0-5

5.4.1.2 मूल्यांकन मानदंड निर्धारित करने हेतु सुझाव-

प्रस्ताव हेतु अनुरोध ( RfP ) चरण में विभिन्न मूल्यांकन मानदंडों हेतु अंकों का निर्धारण निम्नलिखित मार्गदर्शक सुझावों के अनुरुप किया जा सकता है-

क्र.सं.

मूल्यांकन मानदंड

अंकों की सीमा

1.

परामर्शी का प्रासंगिक अनुभव जोकि समान प्रकृति के प्रोजेक्ट में हो-

5-10/ 15

(नियम 5.4.1.1 के अनुसार

जैसी भी स्थिति हो) क. प्रत्येक प्रोजेक्ट जिसकी लागत आमंत्रित निविदा की अनुमानित लागत के बराबर या उससे अधिक हो, के लिए- 3 अंक

ख. प्रत्येक प्रोजेक्ट जिसकी लागत आमंत्रित निविदा की ( 99 )

अनुमानित लागत के 50 प्रतिशत से अधिक किन्तु आमंत्रित निविदा की अनुमानित लागत से कम हो , के लिए 2 अंक

ग . प्रत्येक प्रोजेक्ट जिसकी लागत आमंत्रित निविदा की अनुमानित लागत के 40 प्रतिशत से अधिक किन्तु आमंत्रित निविदा की अनुमानित लागत के 50 प्रतिशत से कम हो, के लिए 1 अंक

2- परामर्शी का वित्तीय सामर्थ्य-

5-10 या 0 (शून्य) (नियम 5.4.1.1 के अनुसार जैसी भी स्थिति हो) औसत टर्नओवर विगत 3 वित्तीय वर्ष (यदि नवीनतम वित्तीय वर्ष का लेखा परीक्षण समाप्त नहीं हुआ है, तो नवीनतम वित्तीय वर्ष सहित 4 में से कोई भी सर्वश्रेष्ठ 3 वित्तीय वर्ष समनुदेशित कार्य (proposed assignment ) हेतु अनुमानित राशि (जीएसटी रहित ) का 3 गुना तक हो सकता है ।

यदि औसत टर्नओवर प्रस्तावित समनुदेशित कार्य हेतु अनुमानित राशि से कम हो शून्य, तथा

प्रत्येक अतिरिक्त उपयुक्त स्लैब (जैसा कि प्रस्ताव हेतु अनुरोध (RfP) दस्तावेज़ में परिभाषित किया गया हो) हेतु 2 अंक, अधिकतम 10 अंक तक ।

(यदि पुनःनिविदा या बाजार की स्थिति से पता चलता है कि ऐसी स्थिति के लिए पर्याप्त प्रतिभागी नहीं हैं, तो निविदा स्वीकार करने वाले प्राधिकारी के पूर्वानुमोदन के साथ समनुदेशित कार्य हेतु अनुमानित राशि (जीएसटी रहित ) को एक या दो गुना तक कम किया जा सकता है । )

नवीनतम लेखापरीक्षित वित्तीय वर्ष की अंतिम तिथि पर धनात्मक निवल मूल्य (net worth) होना चाहिए ।

3

25-30

दृष्टिकोण एवं कार्यप्रणाली ( Approch and Methedology )-

(i) विचारणीय विषय (टीओआर) की समझ 10अंक तक

(ii) प्रस्तावित कार्यप्रणाली (फर्म के प्रमुख कर्मियों से अपेक्षित योगदान सहित) 10अंक तक

(iii ) कार्य योजना (Work Plan ) -10 अंक तक

चिन्हांकन के समय , गुणवत्ता एवं प्रदेय वस्तु (deliverable) से समझौता किए बिना कम समय में समनुदेशित कार्य पूर्ण ( 100 )

करने हेतु प्रस्तावित पद्धति एवं कार्य योजना को भी उचित महत्व दिया जाएगा ।

4 प्रमुख विशेषज्ञ- टीम लीडर / अन्य विशेषज्ञः

50-65

{(i) से (iii) के लिए संबंधित विशेषज्ञ के लिए अधिकतम 20% ] (i) सुसंगत योग्यता (जैसे, किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से वित्त / आईटी / अधिप्राप्ति / पर्यावरण आदि विषय में स्नातक उपाधि के रूप में या बाजार की स्थिति के आधार पर एक प्रमुख विषय के रूप में)

(ii) स्नातकोत्तर योग्यता के मामले में, विशेषज्ञता निर्दिष्ट करें जिसकी अवधि न्यूनतम एक वर्ष हो ।

(iii) सीए / आर्किटेक्ट/ कंपनी सचिव जैसी वैधानिक आवश्यकता के मामले में उचित संस्थान सदस्यता निर्दिष्ट करें ।

(iv) प्रासंगिक अनुभव पूर्ण किए गए कार्य न्यूनतम दो। प्रत्येक अतिरिक्त समनुदेशित कार्य पर दो अंक (इसलिए, वर्षों के अनुभव के लिए कोई अंक नहीं) ।

(v) समनुदेशित कार्य के आधार पर केवल प्रमुख विशेषज्ञों (कोई अन्य सुझाए गए या आवश्यक कर्मचारी नहीं) को सूचीबद्ध किया जाना है , जिनकी संख्या सामान्यतः 6 से अधिक न हो ।

(vi) यदि उत्तराखण्ड में कार्य अनुभव टीम लीडर या किसी विशेषज्ञ हेतु प्रासंगिक है , तो इस हेतु भी संबंधित विशेषज्ञ के कुल अंकों का 10 % की सीमा तक रखे जा सकते हैं ।

टीम लीडर को छोड़कर प्रत्येक विशेषज्ञ के लिए प्रस्तावित व्यक्ति घंटों/दिनों (man के आनुपातिक पर अंक hours /days ) अनुसार आधार आबंटित किए जाएंगे । टीम लीडर को अन्य विशेषज्ञों के बीच उच्चतम अंकों से 25 से 50 % अधिक अंक आबंटित किए जाएंगे ।

5 ज्ञान का हस्तांतरण- यदि लागू हो

0-5

100

कुल

टिप्पणीः

1. आवेदक फर्म/ संगठन के लिए पिछला 3 या 5 वर्ष का अनुभव केवल लघुसूचीबद्धिकरण हेतु अभिरुचि की अभिव्यक्ति चरण के पात्रता मानदंड के रूप में माना जाएगा । 3 या 5 वर्षों की संख्या के आधार पर RfP चरण में कोई अंक नहीं दिये जायेंगे ।

2. समनुदेशित कार्य की जटिलता को देखते हुए विभाग द्वारा कंसोर्टियम की अनुमति दी जा सकती है ।

(101 )

3. यदि कार्य क्षेत्र जटिल है तथा एक इकाई द्वारा समस्त कार्यों/ प्रदेय वस्तुओं (deliverables ) को पूर्ण करने की संभावना नहीं है या ऐसी इकाइयां अत्यंत सीमित हों, तो अधिकतम तीन भागीदारों के साथ संयुक्त उद्यम (joint venture) की अनुमति दी जा सकती है । लेकिन केवल वित्तीय टर्नओवर मानदंड या पिछले अनुभव की पात्रता को पूर्ण करने के लिए ऐसी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए ।

4. फर्म और प्रमुख विशेषज्ञों के अनुभव संबंधी अर्हता हेतु विचार किए जाने योग्य समनुदेशित कार्य (assignments ) वही होंगे जो पूर्ण किए जा चुके हों, वर्तमान कार्य / सेवा के अनुमानित मूल्य से तुलना योग्य हों और सम्बन्धित ग्राहक (client) या आवेदक के सी.ए./ सी.एस. द्वारा प्रमाणित किए गये हों । गतिमान कार्यों के मामले में भी वह कार्य गणना में लिये जा सकते हैं जिनमें प्रस्ताव हेतु अनुरोध (RfP) दस्तावेज में निर्दिष्ट राशि, यदि कोई हो, का कार्य संतोषजनक तरीके से पूर्ण किया जा चुका हो ।

5. किसी भी विशेषज्ञ और/ या टीम लीडर के प्रत्येक प्रतिस्थापन पर जुर्माना लगाया जाएगा । पहली बार प्रतिस्थापन पर उस विशेष विशेषज्ञ के पारिश्रमिक का 10 % , दूसरी बार 15 % और तीसरी बार 20 % का जुर्माना लगाया जाएगा । इसके बाद , ग्राहक अनुबंध को रद्द करने का अधिकार सुरक्षित रखता है । प्रतिस्थापन के मामलों में, प्रतिस्थापक विशेषज्ञ का पूर्व निर्धारित मापदण्डों के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा और किसी भी स्थिति में कम स्कोरिंग वाले विशेषज्ञ / टीम लीडर को स्वीकार नहीं किया जाएगा । इस प्रकार प्रतिस्थापन शुरू में प्रस्तावित विशेषज्ञ / टीम लीडर के समान (समान स्कोर) या बेहतर (उच्च स्कोर ) होना चाहिए ।

6. यदि अंतिम मूल्यांकन के बाद किसी फर्म का चयन किया जाता है और यह पाया जाता है कि टीम लीडर सहित कोई भी विशेषज्ञ न्यूनतम शैक्षिक या अनुभव आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहता है , तो उन्हें अनिवार्य रूप से योग्य उम्मीदवारों के साथ प्रतिस्थापित किया जाएगा तथा प्रथम प्रतिस्थापन हेतु लागू 10 % जुर्माना लगाया जाएगा ।

7. प्रस्तावित टीम लीडर और प्रमुख विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकन समिति के समक्ष दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली की प्रस्तुति की जाएगी ताकि यह पुष्टि हो सके कि उन्होंने प्रस्तुत प्रस्ताव को समझ लिया है ।

8. इसके अलावा, समनुदेशित कार्य की प्रासंगिकता के लिए प्रस्तुत आत्मवृत (CVs ) को सत्यापित करने के लिए टीम लीडर और प्रमुख विशेषज्ञों का साक्षात्कार होगा ।

5.4.2 मूल्य आधारित चयन न्यूनतम लागत चयन (एल.सी.एस.)

एल.सी.एस. , खुली निविदा प्रणाली अथवा लघुसूचीबद्ध किए गए परामर्शदाताओं के बीच एक प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत सफल परामर्शदाता / फर्म का चयन प्रस्ताव की (102)

गुणवत्ता एवं सेवाओं की लागत को ध्यान में रखकर किया जाता है । एल.सी.एस. सामान्यतः मानक या नियमित प्रकृति के परामर्शी कार्यों (जैसे गैर- जटिल कार्यों के अभियांत्रिकी डिजाइन आदि) के लिए उपयुक्त है, जिसके लिए सुस्थापित प्रथाएं एवं मानक मौजूद हैं ।

चयन की इस पद्धति में , परामर्शी/ सेवा प्रदाता तकनीकी प्रस्ताव और वित्तीय प्रस्ताव दोनों एक ही समय में प्रस्तुत करते हैं । इस पद्धति में निविदा की तकनीकी बिड का मूल्यांकन निम्नलिखित दो में से किसी एक प्रकार से किया जा सकता है-

i . विभिन्न तकनीकी मानदंडों / विशेषताओं के लिए अंक आवंटित करने की योजना तथा तकनीकी प्रस्ताव की गुणवत्ता के लिए न्यूनतम अर्हक अंक (सामान्यतः अधिकतम 100 में से 75) निर्धारित कर प्रस्ताव के अनुरोध (RfP ) में दर्शाये जाते हैं । गुणवत्ता के मूल्यांकन हेतु अंकों का निर्धारण क्यू.सी.बी.एस. पद्धति की ही भांति किया जा सकता है । निर्धारित न्यूनतम अर्हक अंक प्राप्त करने वाले निविदादाताओं को तकनीकी रूप से अर्ह माना जाता है । अथवा,

ii . तकनीकी प्रस्ताव के मूल्यांकन हेतु निर्धारित मापदण्डों के सापेक्ष निविदादाता द्वारा उपलब्ध कराए गए अभिलेखों का मूल्यांकन किया जाता है, और उसके आधार पर उसे तकनीकी मूल्यांकन के विभिन्न मापदण्डों पर सफल / असफल घोषित किया जाता है । सभी मापदण्डों पर सफल पाए गए निविदादाता को तकनीकी रूप से अर्ह माना जाता है ।

सर्वप्रथम तकनीकी प्रस्तावों को खोला जाता है तथा उनका मूल्यांकन किया जाता है और जो प्रस्ताव निर्धारित तकनीकी मूल्यांकन मानदंडों के अनुसार योग्य होंगे उन्हें ही तकनीकी रूप से प्रतिक्रियाशील माना जाता है । शेष को तकनीकी रूप से गैर- प्रतिक्रियाशील माना जाएगा और सूची से बाहर कर दिया जाएगा । इसके पश्चात केवल योग्य एवं प्रतिक्रियाशील प्रस्तावों हेतु ही वित्तीय प्रस्ताव खोले जाते हैं और उन्हें उनके द्वारा उद्धृत मूल्य के आधार पर क्रमांकित किया जाता है । तकनीकी रूप से योग्य परामर्शदाताओं में से सबसे कम कुल मूल्य (एल 1) वाले परामर्शदाता का चयन किया जाता है ।

कई बार परामर्शी सेवाओं की छोटे मूल्य की अधिप्राप्तियों में खुली निविदा प्रक्रिया अधिप्राप्तिकर्ता संस्था हेतु लागत प्रभावी प्रक्रिया नहीं होती है । अतः रु0 20,00,000 (बीस लाख रूपए) या उससे कम लागत की परामर्शी सेवाओं हेतु सक्षम प्राधिकारी द्वारा सूचीबद्ध संभावित परामर्शियों / फर्मों/ संस्थाओं से सीमित निविदा सूचना के माध्यम से निर्धारित तिथि व समय पर प्रस्ताव मांगे जाएं । इस हेतु सक्षम प्राधिकारी द्वारा विभाग की आवश्यकतानुसार ऐसे संगठनों/ विभागों/ चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एन्ड इंडस्ट्री आदि से, जो समान कार्य - कलापों में संलिप्त हों, सूचनायें एकत्र कर संबंधित विषय में पारंगत सक्षम परामर्शियों/ फर्मों / संस्थाओं की सूची औपचारिक/ अनौपचारिक पृच्छा के आधार पर तैयार की जाए । यह सूचना विज्ञापनों, ( 103 )

व्यावसायिक पत्रिकाओं, वेबसाइट आदि के माध्यम से भी प्राप्त की जा सकती है । इस प्रकार चिन्हित परामर्शियों/ संस्थाओं / संगठन की संख्या चार से कम नहीं होनी चाहिए ।

5.4.3 प्रत्यक्ष चयन ( Direct Selection) - एकल स्रोत चयन (एसएसएस)

कतिपय विशेष परिस्थितियों में, किसी विशेष परामर्शी / सेवा प्रदाता का चयन करना आवश्यक हो सकता है , जहां अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के समग्र हित के संदर्भ में ऐसे एकल स्रोत चयन हेतु पर्याप्त औचित्य उपलब्ध है । ये परिस्थितियाँ निम्नवत हो सकती हैं:

i. ऐसे कार्य जो किसी परामर्शी द्वारा सम्पादित विगत कार्य की स्वाभाविक निरंतरता का प्रतिनिधित्व करते हैं;

ii. आपातकालीन स्थिति, महामारी , प्राकृतिक आपदा के कारण उत्पन्न होने वाली स्थितियों में , जहां कार्य को समय पर पूरा करना अत्यधिक महत्वपूर्ण है , तथा iii . ऐसी स्थिति जहां किसी समनुदेशित कार्य हेतु स्वामित्वधारी तकनीकों, अनुज्ञप्ति, एल्गोरिदम के उपयोग की आवश्यकता हो सकती है या केवल एक परामर्शी के पास अपेक्षित विशेषज्ञता हो ।

एकल चयन द्वारा ऐसी अधिप्राप्ति की ओर ले जाने वाली परिस्थितियों का पूर्ण औचित्य और इससे पूर्ण होने वाला विशेष हित या उद्देश्य , प्रस्ताव का अभिन्न अंग बनेगा । रु 0 10 लाख तक एकल स्रोत चयन का आश्रय लेने से पूर्व क्रय हेतु विभागाध्यक्ष की स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिए । रु ० 10 लाख से अधिक और रु 0 25 लाख तक की अधिप्राप्ति हेतु प्रशासनिक विभाग की स्वीकृति आवश्यक होगी और रु0 25 लाख से ऊपर की अधिप्राप्ति हेतु वित्त विभाग का परामर्श / सहमति प्राप्त की जायेगी ।

परन्तु, इस नियमावली में निहित किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त सरकारी संस्थानों या सार्वजनिक उपक्रमों को उनकी विशेषज्ञता के कार्यों हेतु अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा नामित किया जा सकता है । ऐसे मामलों में रू0 25 लाख तक की परामर्शी सेवाओं हेतु संबंधित विभागाध्यक्ष, रू0 50 लाख तक संबंधित प्रशासकीय विभाग द्वारा कार्याबंटन किया जा सकता है । इससे अधिक मूल्य की सेवाओं के संदर्भ में प्रशासकीय विभाग द्वारा वित्त विभाग का परामर्श / सहमति प्राप्त की जायेगी ।

एकल स्रोत चयन हेतु अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निष्पक्षता एवं समानता सुनिश्चित करेगी; तथा यह सुनिश्चित करने हेतु एक प्रक्रिया होगी कि परामर्शी/ सेवा प्रदाता द्वारा प्रस्तावित मूल्य समान प्रकृति के कार्यों के लिए समुचित एवं बाजार दरों के अनुरूप हों और यदि आवश्यक हो, तो लागत की युक्तियुक्तता की जांच करने के लिए परामर्शदाताओं के साथ परक्रामण (negotiation ) भी किया जा सकता है ।

( 104 )

5.5 निविदा दस्तावेजों की तैयारी , निविदाओं की प्राप्ति एवं मूल्यांकन

चूंकि किसी परामर्शी कार्य की गुणवत्ता एवं विस्तार स्पष्ट रूप से पहचाने जाने योग्य एवं सिलसिलेवार ढंग से (consistently) मापने योग्य नहीं होते हैं, अतः परामर्शदाताओं की तकनीकी एवं वित्तीय क्षमता निष्पादित किए जाने वाले कार्य की गुणवत्ता तथा कार्य क्षेत्र (scope ) हेतु अप्रत्यक्ष निर्धारक होते हुए भी महत्वपूर्ण पक्ष बन जाती हैं । ऐसी स्थिति में, समान रूप से सक्षम परामर्शदाताओं के बीच प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करके व्यय की जाने वाली धनराशि का सर्वोत्तम मूल्य (best value for money ) प्राप्त किया जा सकता है । इस प्रकार, परामर्शदाताओं का चयन सामान्यतः दो- चरणीय प्रक्रिया में किया जाता है । प्रथम चरण में, यदि आवश्यक हो तो अभिरुचि की अभिव्यक्ति / योग्यता हेतु अनुरोध के माध्यम से संभावित सक्षम स्रोतों को लघुसूचीबद्ध किया जाता है । द्वितीय चरण में, लघुसूचीबद्ध किए गए परामर्शदाताओं को अलग-अलग मुहरबंद लिफाफे में अपने तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्ताव प्रस्तुत करने हेतु आमंत्रित किया जाता है । तकनीकी प्रस्ताव का मूल्यांकन वित्तीय प्रस्ताव खोले बिना किया जाता है । जो निविदादाता तकनीकी रूप से योग्य हैं उनके वित्तीय प्रस्ताव खोले जाते हैं ।

चयन प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण सम्मिलित हैः-

i. विचारणीय विषय (टी.ओ.आर. ) तैयार करना;

ii . समनुदेशित कार्य हेतु अनुमानित लागत तैयार करना तथा परामर्शी को भुगतान दायित्वों की पूर्ति हेतु बजट की उपलब्धता सुनिश्चित करना;

iii . निविदा आमंत्रण सूचना का प्रकाशन

iv. अभिरुचि की अभिव्यक्ति / प्रस्ताव हेतु अनुरोध तैयार कर निर्गत करना,

v. प्रस्तावों की प्राप्ति एवं उसका मूल्यांकन,

vi . वित्तीय प्रस्तावों का सार्वजनिक उद्घाटन,

vii . वित्तीय प्रस्ताव का मूल्यांकन,

viii . सफल निविदादाता की घोषणा

ix . परक्रामण एवं सफल निविदादाता को संविदा प्रदत्त करना

5.5.1 निविदा दस्तावेजों की तैयारी

i. विचारणीय विषय (टी.ओ.आर.) तैयार करना

विभाग / सक्षम प्राधिकारी का दायित्व है कि कार्य आवंटन हेतु विचारणीय विषय (टर्म्स ऑफ रेफरेंस या टी.ओ.आर.) तैयार करें । विचारणीय विषय में उद्देश्य , लक्ष्य तथा कार्य की विषय वस्तु को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए तथा पृष्ठभूमि विषयक सूचनाएं (जिसमें वर्तमान में प्रासंगिक अध्ययनों एवं प्राथमिक आंकड़े सम्मिलित हों) परामर्शदाता को सुविधापूर्वक प्रस्ताव तैयार करने हेतु उपलब्ध हो ।

(105 )

टी.ओ.आर. में निम्नलिखित सम्मिलित है:-

क. अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की संगठन पृष्ठभूमि एवं परियोजना पृष्ठभूमि;

ख. समनुदेशित कार्य का उद्देश्य और सेवा परिणाम विवरण

ग. समनुदेशित कार्य पूर्ति की समय - सारणी सहित कार्य विवरण का विस्तृत दायरा;

घ. प्रमुख वृत्तिकों (professionals) एवं विशेषज्ञता के प्रकार की अपेक्षित आवश्यकता;

ङ. क्षमता निर्माण कार्यक्रम एवं ज्ञान का हस्तांतरण, यदि कोई हो;

च. प्रदेयता (deliverables ) - प्रतिवेदनों की सूची (या दस्तावेज़ , डेटा, मानचित्र, सर्वेक्षण , डिज़ाइन, रेखाचित्र) ,

छ. परिदान की अनुसूची (schedule ofdeliveries) एवं निष्पादन की अवधि;

ज. पृष्ठभूमि सामग्री , डेटा , रिपोर्ट, पिछले सर्वेक्षणों के अभिलेख आदि, जो उपलब्ध हैं और परामर्शदाता को प्रदान किए जाने हैं;

झ. स्थानीय परिवहन, कार्यालय स्थान, कार्यालय मशीनें , आदि जैसी सुविधाएं;

ञ. उपयोगिताएँ (utilities ) , स्थानीय सेवाएँ, आदि, जो परामर्शदाता को अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा प्रदान की जाएंगी;

ट. संस्थागत एवं संगठनात्मक व्यवस्था; तथा

ठ. अनुबंध प्रदत्त किये जाने के पश्चात परामर्शदाता के कार्य की समीक्षा की प्रक्रिया ।।

ii. विज्ञापनः

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था राष्ट्रीय समाचार पत्र, वेबसाइट एवं ई - अधिप्राप्ति पोर्टल में विज्ञापन एवं सूचना के माध्यम से अभिरुचि की अभिव्यक्ति / प्रस्ताव हेतु अनुरोध/ योग्यता हेतु अनुरोध आमंत्रित करेगी ।

iii . अभिरुचि की अभिव्यक्ति (ई.ओ.आई) /प्रस्ताव हेतु अनुरोध (आर.एफ.पी. ) तैयार कर निर्गत करनाः

कार्य की प्रकृति/ जटिलता के अनुसार उसे एकल - चरण निविदा प्रणाली अथवा द्वि - चरण निविदा प्रणाली के माध्यम से करवाये जाने पर निर्णय लिया जायेगा और तदनुसार अभिरुचि की अभिव्यक्ति (ई.ओ.आई) और / या प्रस्ताव के अनुरोध (आर.एफ.पी. ) तैयार किये जायेंगे । ऐसे कार्यों में जहाँ उच्च कोटि के तकनीकी कौशल और / या नवपरिवर्तन की जटिल अथवा शोधात्मक तकनीकी शामिल हो या जहां अधिप्राप्तिकर्ता संस्था के पास उपलब्ध तकनीकी समाधानों का सम्पूर्ण ज्ञान न हो , अधिप्राप्तिकर्ता संस्था परामर्शी का चयन अभिरुचि की अभिव्यक्ति (ई.ओ.आई) / प्रस्ताव के अनुरोध (आर.एफ.पी. ) प्राप्त करते हुए द्वि - चरण निविदा (106 )

प्रणाली के माध्यम से कर सकती है । कम जटिल प्रकृति के कार्यों / सेवाओं हेतु सीधे प्रस्ताव के अनुरोध (आर.एफ.पी. ) आमंत्रित किये जा सकते हैं ।

द्वि-चरण निविदा के प्रथम चरण- अभिरुचि की अभिव्यक्ति (ई.ओ.आई) में इच्छुक व्यक्तियों हेतु जो विवरण तैयार किया जाय उसमें संक्षेप में कार्यों / सेवाओं का वृहद विषय क्षेत्र , पात्रता, पूर्व निर्धारित योग्यता, समान कार्यों / सेवाओं का पूर्व में अनुभव आदि जैसी शर्तों का स्पष्ट उल्लेख कर दिया जायेगा । परामर्शियों से यह भी कहा जा सकता है कि वह अपने प्रस्ताव में सन्दर्भित निविदा सूचना के परामर्श विषयक उद्देश्यों तथा विषय क्षेत्र (स्कोप) पर भी टिप्पणी भेजें । इच्छुक परामर्शियों से प्राप्त प्रस्तावों (प्रतिक्रियाओं) के आधार पर ऐसे परामर्शदाताओं में से, जो आवश्यकताओं को पूर्ण करते हों, आगे विचार हेतु लघु सूची (शार्ट लिस्ट) बनाई जाएगी । लघुसूची में सामान्यतः उच्चतम अंक प्राप्त करने वाली चार से आठ फर्मे सम्मिलित होनी चाहिएं ।

प्रस्ताव के अनुरोध (आर.एफ.पी.) में आमंत्रण पत्र , परामर्श हेतु सूचना , विचारणीय विषय तथा प्रस्तावित निविदा/ संविदा की शर्तें सम्मिलित होंगी । अधिप्राप्तिकर्ता इकाई परियोजना के विशिष्ट मुद्दों को संबोधित करने हेतु आवश्यक न्यूनतम परिवर्तनों के साथ लागू मानक आर.एफ. पी. प्रपत्र का उपयोग करेगी । तकनीकी मूल्यांकन मापदण्ड आर.एफ.पी. दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से परिभाषित किए जाएंगे । प्रस्ताव के अनुरोध (आर.एफ.पी.) प्रपत्र तैयार करने में आवश्यकतानुसार लघु- सूचीबद्ध फर्मों से प्राप्त सुझावों को भी दृष्टिगत रखा जायेगा और इस प्रकार तैयार किये गये प्रस्ताव के अनुरोध (आर.एफ.पी.) प्रपत्र पर अपने प्रस्ताव प्रस्तुत करने हेतु परामर्शियों को आमंत्रित किया जायेगा ।

5.5.2 प्रस्तावों की प्राप्ति

विभाग / सक्षम प्राधिकारी, परामर्शियों को अपने प्रस्ताव तैयार करने हेतु पर्याप्त समय देगा । यह समय कार्य की प्रकृति पर आधारित होगा। इस अंतराल में परामर्शी प्रस्ताव के अनुरोध (आर. एफ.पी.) में दी गई सूचना के विषय में स्पष्टीकरण मांग सकता है । विभाग / सक्षम प्राधिकारी ऐसे स्पष्टीकरण पर लिखित रूप में स्थिति स्पष्ट करेगा तथा उसकी प्रति सभी सूचीबद्ध फर्मो , जो प्रस्ताव हेतु इच्छुक हों को प्रेषित करेगा । यदि आवश्यक हो तो विभाग /सक्षम प्राधिकारी प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अंतिम दिनांक बढ़ा सकता है । तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्ताव एक ही समय प्रस्तुत किये जायंगे । निर्धारित अंतिम दिनांक के बाद प्रस्ताव में कोई परिवर्तन स्वीकार नहीं किया जाएगा । पूरी प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने हेतु तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्तावों को अलग-अलग लिफाफों में प्रस्तुत किया जाएगा । सुसंगत विभागीय पदाधिकारियों (तकनीकी, वित्त, न्याय आदि जैसा उपयुक्त हो) से बनी मूल्यांकन समिति द्वारा प्राप्त प्रस्तावों को ( 107 )

पूर्व निर्धारित समय पर परीक्षण / मूल्यांकन हेतु खोला जाएगा । निर्धारित समय समाप्त होने के बाद प्राप्त प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जाएगा ।

5.5.3 निविदा प्रस्तावों का मूल्यांकन

प्रस्तावों का मूल्यांकन दो चरणों में किया जाएगा । प्रथम चरण में गुणवत्ता का मूल्यांकन व उसके बाद के चरण में लागत का मूल्यांकन किया जाएगा । तकनीकी प्रस्ताव के मूल्यांकनकर्ताओं को वित्तीय प्रस्ताव तब तक उपलब्ध नहीं होने चाहिए जब तक तकनीकी मूल्यांकन पूर्ण न कर लिया जाए । वित्तीय प्रस्ताव उसके बाद ही खोला जाएगा । प्रस्ताव हेतु अनुरोध (आरएफपी ) में दिए गए प्रावधानों के अनुरूप ही मूल्यांकन किया जाएगा ।

विभाग / सक्षम प्राधिकारी , मूल्यांकन समिति जिसमें तीन या उससे अधिक विशेषज्ञ होंगे , का उपयोग कर प्रत्येक तकनीकी प्रस्ताव का मूल्यांकन करेंगे । तकनीकी मूल्यांकन, प्रस्ताव हेतु अनुरोध में निर्धारित मापदण्डों के आधार पर किया जायेगा । ऐसे प्रस्ताव जो टी.ओ.आर. के महत्वपूर्ण पहलुओं को सम्मिलित न करता हो अथवा प्रस्ताव हेतु अनुरोध में स्पष्ट किये गए तकनीकी मूल्यांकन हेतु निर्धारित न्यूनतम अंक ना प्राप्त करे उनको अनुपयुक्त मानते हुए अस्वीकार कर दिया जाएगा ।

गुणवत्ता के मूल्यांकन पूर्ण होने के उपरांत उस पर सक्षम प्राधिकारी का अनुमोदन प्राप्त कर , विभाग प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाले परामर्शियों को सूचित करेगा कि प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाले प्रत्येक परामर्शी को कितने कितने तकनीकी अंक प्राप्त हुए तथा अधिसूचित करेगा कि किन- किन परामर्शियों के प्रस्तावों ने तकनीकी न्यूनतम अपेक्षित अर्हक अंक प्राप्त नहीं किए अथवा प्रस्ताव हेतु अनुरोध (RFP ) के सापेक्ष गैर- प्रतिक्रियाशील पाये गये । अनर्ह परामर्शियों के वित्तीय प्रस्ताव बिना खोले वापस किए जाएंगे । इसके साथ-साथ विभाग / सक्षम प्राधिकारी अधिसूचित करेगा कि किन परामर्शियों ने न्यूनतम योग्यता अंक प्राप्त किए और वित्तीय प्रस्ताव किस सुनिश्चित तिथि, समय एवं स्थान पर खोला जाएगा ।

परामर्शदाता या उनके प्रतिनिधि जो वित्तीय प्रस्तावों के खुलने के समय व्यक्तिगत रुप से या ऑनलाइन उपस्थित होना चाहते हों, को ऐसा करने की अनुमति दी जाएगी ।

परामर्शदाताओं का चयन निविदा प्रक्रिया हेतु पूर्व निर्धारित विधि यानी क्यू.सी.बी.एस. या एल.सी.एस. के अनुसार किया जाएगा । क्यू.सी.बी.एस. चयन के अंतर्गत, तकनीकी प्रस्तावों को वित्तीय प्रस्तावों की तुलना में अधिक भारांक आवंटित किया जाएगा । तकनीकी प्रस्तावों हेतु संबंधित भारांक सामान्यतः 70 % से कम और 80 % से अधिक नहीं होगा । तकनीकी प्रस्ताव और वित्तीय प्रस्ताव हेतु निर्धारित दोनों भारांक 100 % तक जोड़ दिए जाएंगे तथा तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्ताव के लिए प्रस्तावित भारांक प्रस्ताव हेतु अनुरोध (RfP) में निर्धारित किए जाएंगे । उच्चतम भारित संयुक्त अंक प्राप्त करने वाली फर्म को कार्य प्रदत्त किया जाएगा । एल.सी.एस.

( 108 )

प्रणाली के तहत, अनुबंध प्रदत्त करने हेतु न्यूनतम लागत के प्रस्ताव (एल -1 ) पर विचार किया जाएगा ।

5.5.4 परक्रामण एवं संविदा प्रदत्त करना

सामान्यतः परकामण से बचा जाए, किन्तु विशेष परिस्थितियों में आवश्यक होने पर परक्रामण किया जा सकेगा । वित्तीय परक्रामण केवल तभी किया जायेगा जब, परक्रामण के कारण, कार्य क्षेत्र में कोई ऐसा परिवर्तन होता है जिसका अंतिम मूल्यों पर वित्तीय प्रभाव पड़ता है या यदि उद्धृत लागत / लागत तत्व युक्तियुक्त नहीं पाए जाते हैं । ऐसे परक्रामण में , चयनित फर्म को यह बताने और प्रदर्शित करने के लिए भी कहा जा सकता है कि अनुबंध में प्रस्तावित कीमतें अन्य समान कार्यों हेतु परामर्शी द्वारा प्रभारित की जाने वाली दरों के अनुरूप नहीं हैं । सफल निविदादाता को कार्य प्रदत्त करने तथा उसे लिखित रूप से संसूचित करने के बाद सफल निविदादाता का नाम लागत , आदि के विवरण के साथ ई- अधिप्राप्ति पोर्टल पर प्रकाशित किया जाएगा ।

समस्त प्रस्तावों की अस्वीकृति एवं पुनः आमंत्रण

विभाग / सक्षम प्राधिकारी के पास सभी प्रस्तावों को अस्वीकार करने का अधिकार होगा । तथापि , इस प्रकार की अस्वीकृतियों पर सुविचार किया जाना चाहिए तथा अभिलिखित की जानी चाहिए । ऐसा सामान्यतः उन मामलों में हो सकता है जहां सभी निविदाएं या तो विचारणीय विषयों से सारभूत रूप से भिन्न होती हैं या लागत में अनुचित रूप से उच्च मानी जाती हैं तथा, बाद वाले मामले में, परक्रामण के दौरान न्यूनतम योग्य बोली लगाने वाला लागत को उचित स्तर तक कम करने में विफल रहता है । यदि निविदाओं को पुनः आमंत्रित करने का निर्णय लिया जाता है, तो निविदा हेतु पूर्व आमंत्रण में किसी भी स्वीकार्य निविदा के प्राप्त न होने के कारणों का पता लगाने हेतु विज्ञापन, निविदा- पूर्व प्रश्न एवं सम्मेलन, बोली लगाने का समय, योग्यता और मूल्यांकन मानदंड, विचारणीय विषय आदि सहित सम्पूर्ण प्रक्रिया की गंभीरता से समीक्षा की जानी चाहिए ।

5.6 प्रतिभूतियों का विवरण

5.6.1 निविदा प्रतिभूति (ई.एम.डी. ):

अनुमानित अनुबंध मूल्य का 2% 3% । अधिक विवरण हेतु नियम 3.6.1 का संदर्भ लिया जा सकता है, जहां तक वह इस अध्याय में उल्लिखित किसी बात से असंगत न हो ।

5.6.2 निष्पादन प्रतिभूतिः

कुल अनुबंध मूल्य का 3%-10% । अधिक विवरण के लिए नियम 3.6.2 का संदर्भ लिया जा सकता है, जहां तक वह इस अध्याय में उल्लिखित किसी बात से असंगत न हो ।

( 109 )

5.6.3 संचालन अग्रिमः (Mobilisation Advance)

कतिपय मामलों में , जहां परामर्शी को समनुदेशित कार्य के आरम्भ में भारी खर्च वहन करना पड़ता है (उदाहरण के लिएः सर्वेक्षण के लिए टीम जुटाना) , संचालन अग्रिम दिया जा सकता है । हालाँकि, संचालन अग्रिम कुल अनुबंध मूल्य का 15% से अधिक नहीं होगा, लेकिन सरकारी संस्थाओं के लिए यह 30 % तक हो सकता है ।

पर्याप्त सुरक्षा आदि को दृष्टि में रखते हुए वित्त विभाग की सहमति से अधिप्राप्तिकर्ता संस्था उपरोक्त दरों को शिथिल कर सकती है । उपरोक्तानुसार किसी भी प्रकार का संचालन अग्रिम स्वीकृत करते समय पर्याप्त सुरक्षा की दृष्टि से परामर्शदाता / फर्म से बैंक गारंटी आदि प्राप्त की जाए । तथापि, राज्य/ केंद्रीय एजेंसी / संस्था या राज्य / केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों को दी गई अग्रिम संचालन राशि बिना किसी बैंक गारंटी के प्रदान की जा सकती है ।

5.7 विशेष प्रकार के अनुबन्ध

5.7.1 वैयक्तिक परामर्शदाताओं/ सेवा प्रदाताओं का चयन

i. वैयक्तिक परामर्शदाताओं या सेवा प्रदाताओं को उन कार्यों हेतु नियोजित किया जाता है जहाँः क. कार्मिकों के दल की आवश्यकता नहीं है,

ख. किसी अतिरिक्त बाह्य वृत्तिक (professional ) सहायता की आवश्यकता नहीं है, ग. व्यक्ति का अनुभव एवं योग्यता सर्वोपरि आवश्यकता है,

वैयक्तिक परामर्शदाताओं या सेवा प्रदाताओं को सामान्यतः परियोजना क्रियान्वयन, पर्यवेक्षण, उच्च तकनीकी विषय पर विशिष्ट विशेषज्ञ सलाह, नीति मार्गदर्शन , विशेष अध्ययन, अनुपालन पर्यवेक्षण, या कार्यान्वयन/ गुणवत्ता अनुश्रवण हेतु नियोजित किया जाता है ।

ii.

वैयक्तिक परामर्शदाताओं / सेवा प्रदाताओं के चयन की प्रक्रिया वैसी ही होगी, जैसी किसी फर्म से परामर्शदाताओं / सेवा प्रदाताओं के दलों के चयन की होती है । वैयक्तिक परामर्शदाताओं / सेवा प्रदाताओं के चयन की प्रक्रिया में निम्नलिखित सोपान शामिल हैं;

क. विचारणीय विषय , समय सीमा, व्यक्ति- माह (person months ) की संख्या , बजट, अभिरुचि की अभिव्यक्ति लघुसूचीयन मानदंड सहित परामर्शीय एवं अन्य सेवा पैकेज तैयार करना और इसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित करना ।

ख. विज्ञापनः आवश्यकता को अधिप्राप्तिकर्ता संस्था की वेबसाइट तथा ई-अधिप्राप्ति पोर्टल पर अपलोड करने के साथ- साथ कम से कम एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में अधिसूचित किया जाएगा ।

ग. चयन की विधिः व्यैक्तिक परामर्शदाताओं का चयन उन लोगों में से कम से कम तीन उम्मीदवारों की योग्यता की तुलना के माध्यम से किया जाएगा जिन्होंने समनुदेशित कार्य में रुचि व्यक्त की है या जिनसे अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा सीधे संपर्क किया गया है ।

( 110 )

क्षमता का आकलन शैक्षणिक पृष्ठभूमि, अनुभव और यदि उचित हो तो स्थानीय परिस्थितियों, प्रशासनिक प्रणाली एवं शासकीय संगठन के ज्ञान के आधार पर किया जा सकता है । चयन की अनुशंसा निविदा संवीक्षा समिति द्वारा की जाएगी जो किसी समनुदेशित कार्य के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार के चयन हेतु शैक्षिक योग्यता एवं अनुभव के आधार पर अंक देगी । निविदा संवीक्षा समिति उम्मीदवारों का साक्षात्कार भी कर सकती है और साक्षात्कार में उनके प्रदर्शन हेतु अंक प्रदान कर सकती है और भुगतान किए जाने वाले पारिश्रमिक की अनुशंसा कर सकती है ।

घ. प्रत्यक्ष परक्रामणः असाधारण मामलों में उचित औचित्य के साथ वैयक्तिक परामर्शदाता/सेवा प्रदाता का चयन प्रत्यक्ष परक्रामण के आधार पर किया जा सकता है । उदाहरण के लिए- (i ) ऐसे कार्य जो परामर्शदाता के पिछले कार्य की निरंतरता हैं; (ii ) प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न आपात्कालीन परिस्थितियाँ; और (iii) जब व्यक्ति इस कार्य हेतु एकमात्र योग्य परामर्शदाता / सेवा प्रदाता हो । वैयक्तिक परामर्शदाता स्वतंत्र परामर्शदाता, फर्मों के माध्यम से या शिक्षा जगत से, या राष्ट्रीय / अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भर्ती किए गए परामर्शदाता हो सकते हैं ।

ङ. तथापि, वैयक्तिक परामर्शदाता के चयन हेतु वित्तपोषण करते समय यह सुनिश्चित करने का ध्यान रखा जाना चाहिए कि पारिश्रमिक उचित हो तथा समान प्रकृति के कार्यों हेतु बाजार दरों के अनुरूप हो ।

5.7.2 विशिष्ट एजेंसियों/ संस्थानों का चयन

i. समय-समय पर, विभागों को किसी विशिष्ट कार्य को सम्पादित करने हेतु किसी विशेष अभिकरण या संस्थान को नियुक्त करने की आवश्यकता हो सकती है जिसके लिए वह विशेष रूप से उपयुक्त है । ऐसे अभिकरण शासकीय / अर्ध-शासकीय अभिकरण, राज्य या केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पी.एस.यू.), विश्वविद्यालय एवं वृत्तिक संस्थान हो सकते हैं । ऐसी एजेंसियों/ संस्थानों का नामांकन नियम 5.4.3 में दी गयी सीमाओं के अधीन किया जा सकता है ।

ii. अधिप्राप्तिकर्ता संस्था किसी गैर- सरकारी संगठन (NGO) का चयन गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन विधि या न्यूनतम लागत चयन विधि का उपयोग करके कर सकती है , लेकिन एक दूरस्थ क्षेत्रों में अत्यंत छोटे कार्यों हेतु एकल स्रोत चयन को अपनाया जा सकता है जहां केवल एक गैर- सरकारी संगठन उपलब्ध है और प्रतिस्पर्धा अव्यावहारिक है । गैर-सरकारी संगठन का उपयोग ऐसी परियोजनाओं में विशिष्ट लाभ दे सकता है, जिनमें सामुदायिक भागीदारी में अनुभव और गहन स्थानीय ज्ञान पर जोर दिया जाता है । गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन के मामले में , प्रस्तावों के मूल्यांकन मानदंड में गैर- सरकारी संगठन की विशिष्ट योग्यताएं प्रतिबिंबित होनी चाहिए, जैसे निम्नलिखित हैः (111 )

क. जमीनी स्तर के समुदायों के साथ कार्य का इतिहास और संतोषजनक प्रदर्शन का प्रमाण;

ख. सहभागी विकास दृष्टिकोण और कम लागत वाली प्रौद्योगिकियों से परिचित होना;

ग. अनुभवी कर्मचारी लाभार्थियों के सांस्कृतिक और सामाजिक आर्थिक आयामों से परिचित हैं;

घ. समर्पित नेतृत्व और पर्याप्त प्रबंधन;

ङ. लाभार्थियों की भागीदारी को सहयोजित करने की क्षमता ।

5.8 परामर्शीय सेवा संविदा का अनुश्रवण

अधिप्राप्तिकर्ता संस्था कार्य की प्रगति के अनुश्रवण हेतु उपयोगकर्ता के प्रतिनिधि सहित समुचित स्तर पर कम से कम तीन सदस्यों वाली एक परामर्श अनुश्रवण समिति (सी.एम.सी. ) का गठन करेगी । सी.एम.सी. कार्य की प्रगति का अनुश्रवण करने, यह देखरेख करने हेतु कि कार्य अनुबंध के अनुसार किया गया है, प्रदेय सामग्री की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने, कार्य के किसी भी हिस्से को स्वीकार/ अस्वीकार करने, तथा यदि कार्य अनुबंध के अनुसार पूर्ण नहीं किया गया है और यदि सेवाओं की गुणवत्ता निम्न स्तर पाई जाती है अथवा कार्य पूर्ति से संबंधित ऐसी किसी भी कमी हेतु उचित परिनिर्धारित क्षति या शास्ति लगाने के लिए उत्तरदायी होगा।

कार्य की प्रगति के अनुश्रवण में निम्नलिखित गतिविधियाँ शामिल हैं:

i . कार्य प्रारम्भ करने हेतु नोटिस जारी करना;

ii . आरंभिक चरण की समीक्षा;

iii . कार्य के क्षेत्र में संभावित संशोधनों पर निर्णय लेना तथा अनुबंध भिन्नताएं (variations) जारी करना;

iv. कार्य की प्रगति का अनुश्रवण करना, यह निगरानी करना कि प्रमुख विशेषज्ञ वास्तव में कार्यरत हैं , प्रतिवेदन एवं उनकी समीक्षा जिसमें प्रारूप अंतिम रिपोर्ट और अंतिम रिपोर्ट की समीक्षा शामिल है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कार्य (चाहे समय-आधारित या एकमुश्त) अनुबंध के अनुसार पूरा हो गया है;

v. बिलिंग , भुगतान और प्रगति की तुलना में व्यय की निगरानी करना;

vi . परामर्शदाताओं / सेवा प्रदाताओं के समक्ष आने वाली समस्याओं का समाधान करना और विवादों और मध्यस्थता के प्रकरणों से निपटना;

vii . अनुबंध समाप्त होने से पूर्व सेवाएँ समाप्त करना;

viii . अंतिम भुगतान और गारंटी (यदि कोई हो) निर्गत करना और अनुबंध समाप्त करना;

ix . अनुबंध के बाद का मूल्यांकन (112)

अध्याय 6: अन्य (गैर- परामर्शी) सेवाओं की अधिप्राप्ति / वाह्य स्त्रोत से सेवायें

प्राप्त किया जाना

6.1 संविदाओं के प्रकार

सेवाओं की प्रकृति के आधार पर अन्य (गैर- परामर्शी) सेवाओं की अधिप्राप्ति/ बहिःस्रोतन निम्नानुसार हो सकती है:

i . एकमुश्त अनुबंध, जैसा कि नियम 5.2.1 में निर्धारित है; या

ii. समय आधारित अनुबंध , जैसा कि नियम 5.2.2 में निर्धारित है; या

समय या इकाई आधारित दर अनुबंध, जैसा कि नियम 5.2.5 में निर्धारित है; या iv. i. , ii. और iii . का मिश्रण ।

6.2 चयन हेतु प्रक्रिया

इस अध्याय में निर्धारित विशिष्ट प्रक्रिया को छोड़कर अन्य (गैर- परामर्शी) सेवाओं की अधिप्राप्ति के सामान्य सिद्वांत वही होंगे , जैसे अध्याय-5 में दिए गए हैं ।

विभाग / सक्षम प्राधिकारी अपने संगठन की कार्यक्षमता बढ़ाने एवं मितव्ययता की दृष्टि से कतिपय सेवाएं बाह्य स्रोतों से ले सकते हैं । इस हेतु निम्नलिखित प्रणाली व प्रक्रिया का अनुपालन अनिवार्य होगाः-

i. विभाग / सक्षम प्राधिकारी द्वारा निहित कार्य में सक्षम पारंगत फर्मों/ ठेकेदारों / संस्थाओं की सूची औपचारिक /अनौपचारिक पृच्छा के आधार पर तैयार की जाए । यह सूचना विज्ञापनों, व्यावसायिक पत्रिकाओं, वेबसाइट आदि के माध्यम से भी प्राप्त की जा सकती है ।

ii. विभाग /सक्षम प्राधिकारी द्वारा बाह्य स्रोतों से सेवाएँ प्राप्त करने हेतु निविदा पृच्छा निम्नलिखित विवरण के साथ तैयार की जानी चाहिए: -

क. कार्य/ सेवाओं का विवरण जो ठेकेदार, फर्म, संस्था द्वारा किया जाना हो,

ख. विभाग/ सक्षम प्राधिकारी द्वारा ठेकेदार को दी जाने वाली सुविधाएं तथा अन्य सहयोग का विवरण ।

ग. पात्रता एवं योग्यता के मानदंड जो अपेक्षित कार्य सेवाओं के निष्पादन हेतु ठेकेदार को पूर्ण करने हों, तथा

घ. सांविधिक तथा संविदात्मक दायित्वों का विवरण जिनका ठेकेदार द्वारा अनुपालन किया जाना हो ।

6.3 अधिप्राप्ति हेतु प्रक्रिया

i. छोटे मूल्य की गैर परामर्शी सेवाओं की अधिप्राप्तिः

अन्य (गैर-परामर्शी) सेवाओं की कई छोटे मूल्य की अधिप्राप्तियों में , सेवा प्रदाता न तो निविदा प्रक्रिया को संभालने में सक्षम हो सकता है, न ही यह अधिप्राप्तिकर्ता संस्था हेतु लागत प्रभावी (113 )

प्रक्रिया होती है । अतः रु0 50,000 (पचास हजार रुपये ) तक की अधिप्राप्ति हेतु, सामग्री की अधिप्राप्ति में उपयोग की जाने वाली अधिप्राप्ति की 'बिना दर सूची के प्रत्यक्ष अधिप्राप्ति' पद्धति का उपयोग किया जा सकता है । इसी प्रकार रू0 5,00,000 (रू पांच लाख) तक की सेवाओं की अधिप्राप्ति हेतु, सामग्री की अधिप्राप्ति अध्याय में निर्दिष्ट ' क्रय समिति के माध्याम से अधिप्राप्ति' वाली पद्धति को अपनाया जा सकता है ।

ii. 10 लाख रुपये तक की अधिप्राप्ति प्रक्रियाः रु.10,00,000 (दस लाख रूपए) या उससे कम लागत की गैर - परामर्शी सेवाओं हेतु विभाग सक्षम प्राधिकारी द्वारा औपचारिक / अनौपचारिक पृच्छा के आधार पर सूचीबद्ध संभावित ठेकेदारों /फर्मों / संस्थाओं से सीमित निविदा पृच्छा के माध्यम से निर्धारित दिनांक व समय पर प्रस्ताव मांगे जाएं । इस प्रकार चिन्हित ठेकेदारों / संस्थाओं / संगठन की संख्या चार से कम नहीं होनी चाहिए ।

iii . उच्च मूल्य की अधिप्राप्ति हेतु प्रक्रियाः

रु.10,00,000 (दस लाख रूपए) से अधिक लागत के कार्यों/ सेवा की अधिप्राप्ति के लिए संबंधित विभाग/ सक्षम प्राधिकारी द्वारा कम से कम एक व्यापक परिचालन वाले राष्ट्रीय समाचार पत्र में विज्ञापन एवं संगठन की वेबसाइट के माध्यम से प्रस्ताव प्राप्त करने की निर्धारित दिनांक तथा समय तक प्रस्ताव प्रस्तुत करने हेतु निविदा सूचना निर्गत की जायेगी । इस प्रकार की सेवाओं की अधिप्राप्ति में, इन नियमों के नियम अध्याय 3.2 में निर्धारित प्रणाली का पालन किया जाएगा ।

सामान्यतः तकनीकी रूप से उत्तरदायी प्रस्तावों में से सेवा प्रदाता का चयन, वस्तुओं की अधिप्राप्ति की भांति , न्यूनतम मूल्य (एल-1 ) के आधार पर किया जाएगा , परन्तु जहां गैर- परामर्शी सेवाएं / कार्य अत्यधिक तकनीकी और जटिल प्रकृति के हों, गुणवत्ता महत्वपूर्ण हो तथा खरीद का अनुमानित मूल्य (सभी करों सहित ) रू 0 10.00 करोड़ रुपये से अधिक न हो अथवा सरकारी विभागों के मामले में प्रशासकीय विभाग या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के मामले में उसके निदेशक मंडल द्वारा विशेषज्ञ समिति की संस्तुति पर अधिप्राप्ति को गुणवत्ता उन्मुख अधिप्राप्ति (Quality Oriented Procurement ) घोषित किया गया हो तो सेवा प्रदाता का चयन गुणवत्ता एवं लागत आधारित चयन (क्यू.सी.बी.एस. ) पद्वति से किया जा सकता है ।

गुणवत्ता उन्मुख अधिप्राप्ति (Quality Oriented Procurement) घोषित किये जाने हेतु प्रशासकीय विभाग अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के निदेशक मंडल द्वारा विशेषज्ञ समिति का गठन निम्नवतः किया जायेगाः-

i. प्रश्नगत अधिप्राप्ति संबंधी विशेषज्ञता रखने वाला अनुभवी अधिकारी, (114)

ii . विभागीय वित्त अधिकारी / वित नियंत्रक एवं

प्रश्नगत अधिप्राप्ति से संबंधित अधिकारी ।

गैर - परामर्शी सेवाएं/ कार्य की अधिप्राप्ति में क्यू.सी.बी.एस. की व्यवस्था सामान्यतः अध्याय-5 में दिये गये सिद्धांत के समान ही होगी । हालांकि ऐसी अन्य (गैर- परामर्श) सेवाओं की अधिप्राप्ति के किसी भी मामले में गैर- वित्तीय मापदंडों का अधिकतम भार किसी भी मामले में 30 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा ।

iv. एकल विकल्प/ नामांकन द्वारा चयनः

यदि असाधारण परिस्थिति में किसी कार्य को विशेष रूप से चुने गए सेवा प्रदाता से कराना आवश्यक हो तो ऐसी अधिप्राप्ति की ओर ले जाने वाली परिस्थितियों का पूर्ण औचित्य और इससे पूर्ण होने वाला विशेष हित या उद्देश्य, अंकित किया जाएगा । रु0 10 लाख तक के क्रय के लिए एकल स्रोत चयन का आश्रय लेने से पूर्व क्रय हेतु विभागाध्यक्ष की स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिए । रु० 10 लाख से अधिक और रु0 25 लाख तक की अधिप्राप्ति हेतु प्रशासनिक विभाग की स्वीकृति आवश्यक होगी और रु0 25 लाख से ऊपर की अधिप्राप्ति हेतु वित्त विभाग का परामर्श/ सहमति प्राप्त की जायेगी ।

इन नियमों में निहित किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त सरकारी संस्थानों या सार्वजनिक उपक्रमों को उनकी विशेषज्ञता के कार्यों हेतु अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा नामित किया जा सकता है । ऐसे मामलों में रू 0 25 लाख तक की सेवाओं हेतु संबंधित विभागाध्यक्ष तथा रू0 50 लाख तक संबंधित प्रशासकीय विभाग द्वारा कार्याबंटन किया जा सकता है । इससे अधिक मूल्य की सेवाओं के संदर्भ में प्रशासकीय विभाग द्वारा वित्त विभाग का परामर्श / सहमति प्राप्त की जायेगी ।

एकल स्रोत चयन हेतु अधिप्राप्तिकर्ता संस्था निष्पक्षता एवं समानता सुनिश्चित करेगी; तथा यह सुनिश्चित करने हेतु एक प्रक्रिया होगी कि सेवा प्रदाता द्वारा प्रस्तावित मूल्य समान प्रकृति के कार्यों के लिए समुचित एवं बाजार दरों के अनुरूप हों । यदि आवश्यक हो, तो लागत की युक्तियुक्तता की जांच करने के लिए सेवा प्रदाताओं के साथ परक्रामण (negotiation ) भी किया जा सकता है ।

6.4 संविदाओं का अनुश्रवण

जिन कार्यों को बाह्य स्रोतों से कराया जाए , ऐसे कार्यों, सेवाओं का निरंतर अनुश्रवण किया जाए ताकि निष्पादन हेतु समयबद्धता एवं गुणवत्ता से किसी प्रकार का समझौता संभव न हो ।

(115 )

अध्याय 7: लोक निजी सहभागिता

ऐसे अनुबंधों हेतु पृथक से अधिसूचना जारी की जाएगी । इस बीच, राज्य के विद्यमान नियम, विनियम एवं दिशानिर्देश लागू होंगे । तथापि, यदि निविदा आमंत्रण प्राधिकारी या लोक निजी सहभागिता प्रकोष्ठ भारत सरकार के दिशानिर्देशों, प्रारूपों , नियमों को अपनाने को प्राथमिकता देता है, तो वित्त विभाग के परामर्श से इस पर भी विचार किया जा सकता है ।

(116)

अध्याय 8: विविध

8.1 नियमित प्रशिक्षण

अधिप्राप्ति/ क्रय प्रक्रिया से संबंधित समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों को नियमित प्रशिक्षण दिया जाए ।

8.2 आस्तियों का भौतिक सत्यापन

प्रत्येक कार्यालय / संगठन के भण्डार पंजिकाओं में उल्लिखित आस्तियों/ सामग्रियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा पुरानी एवं निष्प्रयोज्य सामग्री के निस्तारण हेतु कार्यालयाध्यक्ष / सक्षम प्राधिकारी या उनके नामिति द्वारा 31 मार्च की स्थिति को सत्यापित करने हेतु 30 अप्रैल तक वार्षिक सत्यापन किया जाये । भौतिक सत्यापन के उपरांत आस्तियों को निम्न 3 प्रकार से वर्गीकृत किया जाएगा-

i . प्रयोज्य आस्तियां

ii . मरम्मत योग्य आस्तियां

iii . गैर- मरम्मत योग्य एवं निष्प्रयोज्य आस्तियां

8.3 अभिलेखों का अनुरक्षण

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए , अधिप्राप्ति / क्रय से संबंधित दस्तावेजों को कम से कम अधिनियम में आज्ञापित अवधि हेतु रखा जाये, तथा अधिप्राप्ति के उद्धरण अनुलग्नक -'III' में दिए गए प्रारूप में रखे जायें । यह रजिस्टर विभिन्न प्रावधानों के अधीन विहित भंडार खाते , लेखन सामग्री रजिस्टर आदि से भिन्न होगा ।

8.4 स्पष्टीकरण

i. यदि इस नियमावली के किसी उपबंध के निर्वचन के सम्बन्ध में कोई संदेह उत्पन्न होता है, तो मामले को अंतिम निर्णय हेतु वित्त विभाग को निर्दिष्ट किया जाएगा ।

ii . इस नियमावली द्वारा स्थापित पद्धतियां ( systems ) एवं प्रक्रियाएँ सामान्य या विशेष अनुदेशों / आदेशों के अधीन होंगी, जिन्हें वित्त विभाग समय - समय पर जारी कर सकता है ।

8.5 शिकायत एवं अपील

i. ई-अधिप्राप्ति पोर्टल से संबंधित शिकायत राज्य सरकार के अधिप्राप्ति शिकायत समाधान पोर्टल https://pgrm.uk.gov.in/ के माध्यम से दर्ज की जा सकती हैं ।

ii . इस पोर्टल का उपयोग राज्य के उन सभी विभागों/ संस्थाओं को करना अनिवार्य होगा जिन पर यह नियमावली लागू है । समस्त प्रकार की ई -निविदाएं जिनका संभावित मूल्य रू. 1.00 करोड़ ( रू. एक करोड़) या इससे अधिक है, उनकी प्रविष्टि अनिवार्य रूप से इस पोर्टल पर की जाएगी ।

(117)

iii . जब भी कोई विभागीय अधिकारी कोई ई- निविदा, जिसका अनुमानित मूल्य रू. 1.00 करोड़ (रू. एक करोड़) या इससे अधिक है, ई- निविदा पोर्टल पर प्रकाशित करेगा, तो उसके द्वारा सम्बन्धित निविदा का आवश्यक विवरण अनिवार्य रूप से इस पोर्टल पर भी अपलोड भी किया जाएगा । इससे सम्बन्धित ई- निविदा की निविदा आईडी एवं अन्य विवरण पोर्टल पर प्रदर्शित होने लगेंगे ।

iv. शिकायत / सुझाव दर्ज कराने वाला व्यक्ति अधिप्राप्ति शिकायत समाधान पोर्टल पर अपना पंजीकरण करवा कर निर्धारित समय के अंतर्गत अपनी शिकायत/ सुझाव दर्ज कर सकेगा ।

v. अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा पारित आदेश / कृत कार्यवाही से व्यथित कोई भी निविदादाता इस पोर्टल हेतु विनिर्दिष्ट सिद्धांतो के अधीन पदाभिहित अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील दाखिल कर सकेगा ।

8.6 सूचना प्रौद्योगिकी हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर से संबंधित समस्त अधिप्राप्तियाँ वित्त विभाग के परामर्श से सूचना प्रौद्योगिकी विभाग , उत्तराखण्ड शासन या इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा समय- समय पर संरचित नीतियों एवं विनियमों के अनुसार की जायेंगी ।

8.7 राज्य अधिप्राप्ति नियमावली के गैर-अनुपालन की दशा में प्रशासनिक प्राधिकारी तथा वित्त विभाग संयुक्त रूप से जांच करेंगे एवं उसके आधार पर समुचित कार्यवाही की संस्तुति करेंगे ।

8.8 नियमों का अध्यारोही प्रभाव

यह नियमावली किसी सार्वजनिक अथवा निजी स्वायत्तशासी या सांविधिक निकाय को राज्य सरकार द्वारा दिये गए सहायक अनुदान या वित्तीय सहायता पर भी लागू होगी ।

8.9 मानक निविदा प्रपत्र

वित्त विभाग कार्यकारी आदेश द्वारा अधिप्राप्ति की समस्त श्रेणियों हेतु उपयुक्त मानक निविदा दस्तावेज निर्गत करेगा तथा वह समय- समय पर इसमें आवश्यक संशोधन भी जारी कर सकता है ।

8.10 व्यावृत्ति एवं निरसन

उत्तराखण्ड अधिप्राप्ति नियमावली, 2017 (समय-समय पर यथासंशोधित) सिवाय लोक निजी सहभागिता परियोजनाओं से संबंधित नियमों के, जब तक कि उस संबंध में एक अलग अधिसूचना जारी न हो जाए , एतदद्वारा निरसित की जाती है ।

(118 )

अनुलग्नक

अनुलग्नक I: क्रय / मूल्य वरीयता

राज्य के भौगोलिक क्षेत्र की सीमान्तर्गत स्थापित एवं विनिर्मित (Manufactuer) करने वाले सूक्ष्म व लघु उद्यमों ( कुटीर, खादी, हथकरघा, हस्तशिल्प तथा स्टार्टअप्स सहित) द्वारा उत्पादित उत्पादों और प्रदत्त सेवाओं को शासकीय अधिप्राप्ति में क्रय वरीयता दिये जाने के उद्देश्य से सामग्री / वस्तुओं की कुल वार्षिक अधिप्राप्ति में से 25 प्रतिशत का लक्ष्य प्रदेश के सूक्ष्म व लघु उद्यमों (कुटीर, खादी, हथकरघा, हस्तशिल्प तथा स्टार्टअप्स सहित) के लिए निर्धारित किया जायेगा । इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्रदेश के सूक्ष्म व लघु उद्यमों ( कुटीर, खादी, हथकरघा, हस्तशिल्प तथा स्टार्टअप्स सहित) को प्रदेश के मध्यम व वृहत तथा प्रदेश से बाहर के सभी श्रेणी के उद्यमों की तुलना में निविदा के समय क्रय वरीयता दी जाएगी , यदि प्राप्त निविदाओं में प्रदेश के सहभागी सूक्ष्म व लघु उद्यमों (स्टार्टअप्स सहित) की निविदा दरें L1 + 10 प्रतिशत ( सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम नीति-2015 में वर्गीकृत श्रेणी- ए व बी में सम्मिलित / आच्छादित क्षेत्र में स्थित इकाईयों के लिए L1 + 15 प्रतिशत ) की सीमा में हों । ऐसा होने पर उन्हें L1 मूल्य के स्तर पर लाकर प्रत्येक निविदा में अंकित सामग्री / सेवाओं की कुल मात्रा में से 40 प्रतिशत तक के आपूर्ति आदेश दिये जायेंगे ।

परन्तु यह कि सूक्ष्म व लघु उद्यमों (कुटीर, खादी, हथकरघा, हस्तशिल्प तथा स्टार्टअप्स सहित) को L1 + 10 प्रतिशत एवं (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम नीति-2015 में वर्गीकृत श्रेणी - ए व बी में सम्मिलित / आच्छादित में स्थित इकाईयों के लिए L1 + 15 प्रतिशत) से अधिक मूल्य की निविदा हेतु कोई क्रय वरीयता प्रदान नहीं की जायेगी ।

परन्तु यह और कि प्रदेश के सूक्ष्म और लघु उद्यमों ( कुटीर, खादी, हथकरघा , हस्तशिल्प तथा स्टार्टअप्स सहित) से कुल वार्षिक खरीद के 25 प्रतिशत तक के लक्ष्य में से महिलाओं के स्वामित्व वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों से खरीद के लिए 3 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के स्वामित्व वाले सूक्ष्म व लघु उद्यमों से खरीद के लिए 4 प्रतिशत का लक्ष्य निर्दिष्ट किया जायेगा । निर्दिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति हेतु, यदि निविदा में महिलाओं तथा अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के स्वामित्व वाले सूक्ष्म व लघु उद्यमों (स्टार्टअप्स सहित) द्वारा दी गयी दरें, न्यूनतम दर (L1 ) के 15 प्रतिशत मूल्य बैण्ड (L1 + 15 प्रतिशत ) के भीतर हों, तो ऐसी दशा में उक्त सूक्ष्म व लघु उद्यमों (स्टार्टअप्स सहित ) को L1 के स्तर पर लाकर आपूर्ति आदेश दिये जायेंगे । इसके अतिरिक्त-

(क) संव्यवहार लागत में कमी लाने के लिए प्रदेश के सूक्ष्म और लघु उद्यमों (स्टार्टअप्स सहित) को निशुल्क निविदा प्रपत्र उपलब्ध कराकर निविदा हेतु अग्रिम धरोहर राशि (EMD) में पूर्ण छूट दी जायेगी ।

(119 )

(ख) निविदा में सफल प्रदेश के सूक्ष्म व लघु उद्यमों (स्टार्टअप्स सहित) से इस नियमावली के नियम-3. 6.2 में निर्धारित की गयी कार्यपूर्ति प्रतिभूति (Performance Security) के सापेक्ष 50 प्रतिशत अथवा निविदा मूल्य की 2.5 प्रतिशत , जो भी कम हो , कार्यपूर्ति प्रतिभूति ली जायेगी ।

(ग) प्रदेश के सूक्ष्म व लघु उद्यमों (स्टार्टअप्स सहित) को सामग्री/ सेवाओं की अधिप्राप्ति में गुणवत्ता से समझौता किये बिना निविदा में रखी गयी औसत सालाना टर्नओवर विनिर्माण / सेवा का अनुभव , आपूर्ति की मात्रा, परिचालन अनुभव / प्रदर्शन की पूर्व अर्हता (Pre- qualification ) /मानदण्ड में निविदा मूल्य के आधार पर निम्नानुसार छूट दी जायेगीः

(एक) रू. 25 लाख तक की मूल्य निविदायें पूर्ण रूप से छूट ।

(दो) रू. 25 लाख से रू. 1 करोड़ तक की मूल्य निविदायें निविदा में अंकित टर्नओवर तथा पूर्व अनुभव में 50 प्रतिशत छूट ।

विशेष परिस्थितियों में , जैसे- सार्वजनिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, महत्वपूर्ण सुरक्षा ऑपरेशन और उपकरण आदि की खरीद में उत्पाद / सेवा की विशेषज्ञता एवं तकनीकी, विनिर्माण/ सेवा अनुभव, आपूर्ति की मात्रा व परिचालन का अनुभव / प्रदर्शन के संबंध में प्रमाण- पत्र प्राप्त किया जाना आवश्यक होगा तथा औसत सालाना टर्नओवर एवं पूर्व अनुभव की शर्त में कोई शिथिलता प्रदान नहीं की जायेगी ।

गुणवत्ता एवं लागत पर आधारित चयन ( QCBS ) प्रक्रिया में उक्त उपबन्ध लागू नहीं होंगे ।

राज्य में सरकारी अधिप्राप्ति में मेक इन इण्डिया को प्राथमिकता दिये जाने हेतु भारत सरकार द्वारा General Financial Rule , 2017 के नियम 153 (iii) में विहित प्रावधान तथा इस संबंध में समय - समय पर जारी दिशा-निर्देशों के अन्तर्गत राज्य सरकार के विभागों / उपक्रमों/ संस्थाओं / निकायों तथा सार्वजनिक निजी सहभागिता (PPP) परियोजनाओं, जिन्हें राज्य सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त होती है, द्वारा किये जाने वाले सार्वजनिक अधिप्राप्ति में, जैसा कि भारत सरकार द्वारा अपने आदेशों में उस उद्देश्य के लिए स्थानीय सामग्री तथा स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को परिभाषित किया गया है, को प्राथमिकता दी जायेगी ।

उक्त उपबन्धों के क्रियान्वयन हेतु सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग मानक संचालन प्रक्रिया /विस्तृत दिशा-निर्देश वित्त विभाग की सहमति से जारी करेगा।

(120 )

अनुलग्नक IIः अभिरुचि की अभिव्यक्ति पात्रता मानदंड (प्रारूप)

भारांक

उप-मानदंड

भारांक का ब्रेक-अप

A

मानदंड समान आवश्यकताओं वाले कार्यों हेतु फर्म का अनुभव

तकनीकी क्षमताएँ

D*

निविदादाता का वित्तीय सामर्थ्य

B *

B1 *

पिछले तीन वर्षों के टर्नओवर

के आंकड़े

B2*

पिछले तीन वर्षों के शुद्ध लाभ

के आंकड़े

C*

गुणवत्ता प्रमाणन, अनुज्ञप्ति आवश्यकताएँ

* संभावित बोलीदाताओं के आवश्यक प्रोफाइल के आकलन के आधार पर रुचि की अभिव्यक्ति दस्तावेजों में भारांक (weightage) (100 में से) पूर्वनिर्धारित और घोषित किया जाना चाहिए । विभिन्न मापदंडों के लिए (100 में से) अंक आवंटित करने के लिए अंकन/ ग्रेडिंग योजना भी निर्धारित की जानी चाहिए ।

(121 )

अनुलग्नक- IIIः अधिप्राप्ति रजिस्टर का प्रारूप

(कृपया नियम 8.3 का संदर्भ लें)

वित्तीय वर्षः

वस्तुओं/ सेवाओं

आपूर्ति/ कार्य टिप्पणी-

क्र. सं.

आदेश की तिथि

आपूर्ति/ कार्य समापन तिथि की लागत

का संक्षिप्त विवरण

फर्म का नाम,

जिससे अधिप्राप्ति

की गई

उदाहरणार्थ आपूर्ति में विलम्ब/कार्य गुणवत्ता संबंधी समस्याए (122)

अनुलग्नक-IVः पुस्तकों की अधिप्राप्ति पर दिशानिर्देश

पुस्तकें, जर्नल , पत्रिकाएँ एवं अन्य सुसंगत अध्ययन सामग्री समय- समय पर सरकार द्वारा अपने कार्यालयों, शासकीय स्वामित्व वाले विद्यालयों, कॉलेजों एवं पुस्तकालयों में शैक्षिक उद्देश्यों, शैक्षणिक पाठ्यक्रमों, अनुसंधान गतिविधियों आदि के लिए उपयोग हेतु अधिप्राप्त की जाती है । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था इस अनुबंध में विनिर्दिष्ट दिशानिर्देशों के अनुसार निम्नानुसार अधिप्राप्ति करेगीः

1. क्रय समिति के माध्यम से पुस्तकों का क्रय

रु० 50,000 (रू ० पचास हजार मात्र) मूल्य तक की पुस्तकों की अधिप्राप्ति हेतु क्रय इकाई, दरों की युक्तियुक्तता के अधीन कम से कम एक विषय विशेषज्ञ वाली अधिप्राप्ति समिति की बाजार सर्वेक्षण के आधार पर की गयी संस्तुति पर सीधे क्रय कर सकती है ।

II . निविदा / सूचीबद्धता के माध्यम से पुस्तकों का क्रय

जब पुस्तकों के क्रय का अनुमानित मूल्य रु0 50,000 (रू० पचास हजार मात्र) से अधिक हो, तो अधिप्राप्ति निविदा प्रक्रिया के माध्यम से की जाएगी । अधिप्राप्तिकर्ता संस्था या तो सूचीबद्ध एजेंसियों (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ताओं) से सीमित निविदा के माध्यम से या खुली/ विज्ञापित निविदा पृच्छा के माध्यम से पुस्तकें क्रय कर सकती है । ऐसी अधिप्राप्ति मानक निविदा दस्तावेजों के अनुसार की जाएगी ।

एजेंसियों (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) का सूचीबद्ध होना-

पैनल में सम्मिलित होने का अर्थ पुस्तकों, जर्नल, पत्रिकाओं , शोध रिपोर्टों, मोनोग्राफ और इसी प्रकार के प्रकाशनों (इसके बाद अध्ययन सामग्री) की आपूर्ति के लिए अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा आदेश प्राप्त करने के लिए एक एजेंसी की पात्रता है ।

i. चयनित एजेंसी (प्रकाशक/ आपूर्तिकर्ता) को केंद्रीय / राज्य विश्वविद्यालयों / अन्य यूजीसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों / मेडिकल कॉलेजों / सरकारी विभागों को विदेशी और भारतीय अध्ययन सामग्री की आपूर्ति में कम से कम तीन वर्ष का अनुभव होना चाहिए ।

ii . बोलीदाताओं को एक शपथ पत्र देना होगा कि न तो वे और न ही उनके प्रमुख प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता किसी भी राज्य/ केंद्र सरकार के विभाग / अन्य शैक्षणिक संस्थानों द्वारा काली सूची ( black listed) में डाले गए हैं ।

iii . एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) को सरकारी / अन्य शैक्षणिक संस्थानों की एक सूची प्रस्तुत करनी चाहिए , जिन्हें उसने पिछले तीन वर्षों में अध्ययन सामग्री की आपूर्ति दस्तावेजी प्रमाण ( आपूर्ति आदेश) के साथ की है ।

iv. सूचीबद्धीकरण प्रारंभिक अवधि एक वर्ष के लिए होगी जिसे अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा तय की गई आगे की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है ।

(123)

V. अधिप्राप्तिकर्ता संस्था एक से अधिक एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) को सूचीबद्ध कर सकती है और उन्हें उनमें से किसी एक या अधिक से अध्ययन सामग्री खरीदने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए । हालाँकि, पैनल में सम्मिलित होने से अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को पैनल में सम्मिलित एजेंसियों के अतिरिक्त अन्य माध्यमों से सीधे किताबें और जर्नल खरीदने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकेगा ।

III . चयन मानदंड

i . आवेदन दिनांक से पिछले तीन वर्षों के दौरान एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) का औसत कारोबार (turn over ) आपूर्ति आदेश का न्यूनतम तीन गुना या खरीद इकाई द्वारा तय की गई किसी भी उचित राशि के बराबर होना चाहिए ।

ii . एजेंसी (प्रकाशक/ आपूर्तिकर्ता) को केंद्रीय / राज्य विश्वविद्यालयों/ अन्य यूजीसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों/ मेडिकल कॉलेजों/ सरकारी विभागों को विदेशी और भारतीय पुस्तकों की आपूर्ति करने का कम से कम तीन वर्ष का अनुभव होना चाहिए ।

iii. एजेंसी (प्रकाशक/ आपूर्तिकर्ता) के पास पिछले 3 वर्षों में अधिप्राप्तिकर्ता संस्था द्वारा दिए जाने वाले आपूर्ति आदेश के समान या आधे मूल्य के कम से कम दो कार्य आदेशों के संतोषजनक आपूर्ति का अनुभव होना चाहिए ।

iv . पुस्तकों की खरीद के लिए मानक निविदा दस्तावेजों में निर्धारित अन्य नियम एवं शर्तें लागू होंगी ।

v . अधिप्राप्तिकर्ता संस्था को एक ऐसी एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) को अनुबंध सौंपना चाहिए , जिसकी पेशकश सबसे कम मूल्यांकित बोली के रूप में निर्धारित की गई हो और बोली दस्तावेज़ के प्रति पर्याप्त रूप से उत्तरदायी हो ।

IV. सामान्य शर्तें

i . एक एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) को खरीद आदेश में निर्दिष्ट अवधि ( भारतीय प्रकाशन के लिए 30 दिन और विदेशी प्रकाशन के लिए 90 दिन) के भीतर सभी ऑर्डर की गई अध्ययन सामग्री की आपूर्ति करनी चाहिए । यदि आपूर्ति निर्धारित समय के भीतर प्राप्त नहीं होती है, तो खरीद इकाई के पास बिना किसी नोटिस / अनुस्मारक के पूरे ऑर्डर या उसके हिस्से को रद्द करने का अधिकार सुरक्षित है । यदि किसी एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) को आपूर्ति के लिए अधिक समय की आवश्यकता हो, तो उसे आपूर्ति तिथि समाप्त होने से कम से कम एक सप्ताह पहले ठोस आधार पर लिखित रूप में अनुरोध करना चाहिए । यदि इस अनुरोध के क्रम में विस्तारित की गयी अवधि के भीतर अध्ययन सामग्री की आपूर्ति नहीं की जाती है या इसकी उपलब्धता के बारे में कोई रिपोर्ट या अन्यथा प्राप्त नहीं होती है, तो उक्त आदेश को रद्द माना जाना चाहिए ।

(124)

ii . सभी अध्ययन सामग्री को एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) द्वारा प्रामाणिक मूल्य प्रमाण के साथ आपूर्ति की जानी चाहिए और आपूर्ति बाजार में उपलब्ध नवीनतम संस्करण या ग्राहक द्वारा निर्दिष्ट संस्करण के लिए की जानी चाहिए ।

iii . एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) को बिल पर अपनी घोषणा में यह संलग्न करना चाहिए कि-

क. केवल अध्ययन सामग्री के नवीनतम संस्करण या ग्राहक द्वारा निर्दिष्ट संस्करण ही उपलब्ध कराये गये हैं ।

ख. अध्ययन सामग्री पुरानी अवशेष / गायब पृष्ठों के साथ क्षतिग्रस्त सामग्री नहीं है ।

ग. अध्ययन सामग्री के भारतीय / कम मूल्य वाले संस्करण (यदि विदेशी प्रकाशन हो) भारत में उपलब्ध नहीं हैं ।

iv. किसी विशिष्ट लेखक/ प्रकाशक की अध्ययन सामग्री खरीदने के मामले में, भले ही विभिन्न लेखकों/प्रकाशनों के कुछ अन्य कम कीमत वाले संस्करण उपलब्ध हों, ऐसी खरीद के लिए खरीद इकाई द्वारा पर्याप्त कारण दिए जाने चाहिए ।

v. गायब पृष्ठों वाली क्षतिग्रस्त अध्ययन सामग्री एजेंसी (प्रकाशक / आपूर्तिकर्ता) को वापस कर दी जानी चाहिए, भले ही उन पर परिग्रहण के लिए मुहर लगा दी गई हो ।

vi . क्रय इकाई को प्राप्त किसी भी दोषपूर्ण या क्षतिग्रस्त अध्ययन सामग्री को, एजेंसी (प्रकाशक/ आपूर्तिकर्ता) द्वारा अपनी लागत पर बदला जाना चाहिए । निविदा दस्तावेज़ों में निर्दिष्ट प्रतिबंधों के अनुसार खरीद इकाई जुर्माना भी लगा सकती है

vii . कोई भी एजेंसी (प्रकाशक/ आपूर्तिकर्ता) पुरानी और बची हुई अध्ययन सामग्री की आपूर्ति करके धोखाधड़ी करती हुई पाई गई और उचित आधार के बिना विस्तारित समय सीमा पर भी अध्ययन सामग्री की आपूर्ति करने में चूक गई , तो उसे काली सूची में डालने के अलावा जुर्माना भी लगाया जा सकता है, जैसा कि खरीद इकाई उचित समझे ।

viii . प्रकाशक की वास्तविक कीमत से अधिक वसूलने जैसी किसी भी गड़बड़ी के पाए जाने पर, एजेंसी (प्रकाशक/ आपूर्तिकर्ता) को ब्लैकलिस्टिंग अथवा कार्यपूर्ति प्रतिभूति जब्ती या दोनों प्रकार से दंडित किया जा सकता है ।

ix . जब तक अन्यथा उल्लेख न किया गया हो, नवीनतम पेपरबैक संस्करण ही उपलब्ध कराए जाने चाहिए । यदि उपलब्ध हो तो भारतीय पुनर्मुद्रण/ संस्करण की भी आपूर्ति की जा सकती है ।

(125)

x. बोली लगाने के दौरान , एक एजेंसी (प्रकाशक/ आपूर्तिकर्ता) को एक वचन देना होगा कि वह बोली दस्तावेज़ से जुड़ी सूची के अनुसार विदेशी और भारतीय प्रकाशनों की आपूर्ति करने में सक्षम होगी ।

xi . बोलीदाताओं को कार्टेल नहीं बनाना चाहिए और कुछ अन्य एजेंसियों के लिए समर्थन कोटेशन नहीं डालना चाहिए । ऐसे तरीकों का सहारा लेते हुए पाए जाने पर एजेंसी को बोली प्रक्रिया में भाग लेने से रोक दिया जाएगा और भविष्य के लिए भी वंचित कर दिया जाएगा।

xii . यदि अध्ययन सामग्री की कीमत का भुगतान विदेशी मुद्रा में किया जाना है, तो आर.बी. आई. द्वारा घोषित मौजूदा रूपांतरण दरें या तो खरीद आदेश की तारीख पर या जैसा निविदा दस्तावेजों में परिभाषित हो, के अनुसार होनी चाहिए ।

xiii . विदेशी और भारतीय अध्ययन सामग्री पर समग्र छूट, यदि कोई हो , बोली प्रस्ताव के नियमों और शर्तों में स्पष्ट रूप से उल्लिखित की जानी चाहिए ।

xiv. अध्ययन सामग्री के लिए भुगतान की शर्तें और वित्तरण कार्यक्रम को निविदा दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए ।

xv . खरीद इकाई द्वारा अध्ययन सामग्री के आयात के मामले में, साख पत्र के आधार पर भुगतान के लिए प्रासंगिक खंड को बोली दस्तावेज में शामिल किया जाना चाहिए ।

V. प्रतिभूतियों के प्रपत्रः

i . विक्रेता को खरीद इकाई द्वारा बोली गई अध्ययन सामग्री के मूल्य के 2% से 5 % (जैसा कि बोली दस्तावेजों में परिभाषित है) तक की बोली सुरक्षा (ईएमडी) जमा करनी होगी । बोली सुरक्षा उपर्युक्त सीमा के भीतर होगी और बोली दस्तावेजों में परिभाषित के अनुसार होगी ।

ii . विक्रेता खरीद इकाई को प्रदर्शन सुरक्षा के रूप में आपूर्ति आदेश के मूल्य के 3 % से 10% (बोली दस्तावेजों में परिभाषित) तक की बैंक गारंटी जमा करेगा । खरीद इकाई की संतुष्टिके लिए अध्ययन सामग्री की सफल डिलीवरी के बाद बैंक गारंटी दस्तावेज़ वापस कर दिए जाएंगे । किसी विक्रेता द्वारा असंतोषजनक सेवाओं के मामले में , प्रदर्शन सुरक्षा जब्त की जा सकती है ।

iii . यदि विक्रेता डिलीवरी शेड्यूल के अनुसार अध्ययन सामग्री की आपूर्ति नहीं करता है, तो प्रति सप्ताह 1 % की दर से जुर्माना लगाया जाएगा, जो अनुबंध मूल्य के 10 % की (126)

अधिकतम कटौती तक सीमित होगा या बोली दस्तावेजों में परिभाषित किया जाएगा। यदि विक्रेता दस्तावेजी साक्ष्य के साथ अध्ययन सामग्री की आपूर्ति न करने के लिए वैध और संतोषजनक कारण बताता है तो कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा । जुर्माने से बचने के लिए अध्ययन सामग्री की आपूर्ति न होने से संबंधित दस्तावेज काफी पहले ही जमा कर दिए जाने चाहिए ।

आज्ञा से ,

दिलीप जावलकर, सचिव ।

टिप्पणी - राजपत्र , दिनांक 30-08-2025 , भाग 1 में प्रकाशित ।

[प्रतिलिपि सूचनार्थ प्रेषित--]

पी ० एस ० यू० ( आर ० ई ० ) 56 वित्त / 409-23-09-2025-100 प्रतियां (कम्प्यूटर / रीजियो) ।

Cite this issue. Uttarakhand Daily Gazette, Government of Uttarakhand, 13 August 2025. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.uttarakhand_daily.2025-08-13.3295-291025222310/. Archive identifier in.gazette.uttarakhand_daily.2025-08-13.3295-291025222310.