Servants of Knowledge
Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 02 March 2009

Published 02 March 2009

Type
Extra Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2009-03-02.50
Languages
English, Hindi

िनबंधन सं(cid:8)या पी0ट(cid:15)0-40 (cid:18)बहार गजट(cid:18)बहार गजट(cid:18)बहार गजट(cid:18)बहार गजट

असाधारण अंकअसाधारण अंकअसाधारण अंकअसाधारण अंक (cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत 11111111 फा गुफा गुफा गुफा गुनननन 1930 1930 1930 1930 ((((शशशश0000)))) ((((संसंसंसं0000 पपपपटना टना टना टना 50505050)))) पपपपटनाटनाटनाटना, , , , सोमवारसोमवारसोमवारसोमवार,,,, 2222 माच-माच-माच-माच- 2002002002009999 समाहरणालय,जहानाबाद

;जिला स्थापना शाखाद्ध

---------

आदेश

9 सितम्बर 2008 la0 1044&जिला कोषागार जहानाबाद से अवैध् निकासी के संबध् में संलिप्त्तत्ता पाये जाने के बाद वित्त विभागीय संकल्प सं0-47/को0,दिनांक-25.1.1999 के आलोक में इस कार्यालय के ज्ञापांक-1536/गो0,दिनांक- 22.11. 2004 के द्वारा श्री उमाशंकर प्रसाद,सहायक लेखापाल,जिला केाषागार जहानाबाद को निलंबित करते हूए विभागीय कार्यवाही संचालित करने का आदेश दिया गया।जहानाबाद थाना कांड सं0-424/04 दिनांक- 04.11.2004 से दर्ज प्राथमिकी के अनुसार इन्हें अप्राथमिकी अभियुक्त बनाया गया है।

बिहार सरकारी सेवक नियमावली,2005 के भाग-4 के नियम-09 एवं 10 के आलोक में सात माह के अंदर आरोप पत्रा गठित नहीं होने के कारण उक्त श्री उमाशंकर प्रसाद,सहायक लेखापाल के द्वारा दिये गये अभ्यावेदन के आधर पर इस कार्यालय के आदेश ज्ञापांक-419/स्था,दिनांक-26.7.2006 से विभागीय कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव के बिना निलंबन से मुक्त किया गया है।

कोषागार पदाध्किारी, जहानाबाद के पंत्रााक-362/जि0को0,दिनांक-04.5.2006 के द्वारा श्री उमाशंकर प्रसाद,सहायक लेखापाल के विरूद्व आरोप पत्रा प्राप्त हुआ र्है। प्राप्त आरोप पत्रा के अनुमोदन के पश्चात्‌ श्री अनिल कुमार वर्मा,अपर समाहर्त्ता;नक्सलद्ध को इस कार्यालय का पंत्रााक-22/मु0 स्था0, दिनांक-07.8.2006 से संचालन पदाध्किारी नियुक्त किया गया और अभियोजन पक्ष प्रस्तुत करने हेतु कोषागार पदाध्किारी,जहानाबाद को उपस्थापन पदाध्किारी के रूप कार्य करने का आदेश दिया गया।

गठित आरोपों पर आरोपी श्री उमाशंकर प्रसाद, सहायक लेखापाल द्वारा स्पष्टीकरण दिया गया और सभी बिन्दुओं पर सम्यक्‌ विचारोंपरांत संचालन पदाध्किारी का जॉच प्रतिवेदन भी प्राप्त हुआ है। जो निम्न प्रकार हैः-2 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 (1द्ध आरोप सं0ः-01

उपादान प्राध्किार-पत्रा मो0-3,50,000=00(तीन लाख पचास हजारद्धरूपया श्री राजेन्द्र प्रसाद राय,सुपुत्रा-स्व0 सकलदीप सिंह,मो0-2,72,894=00 (दो लाख बहत्तर हजार आठ सौ चौरानवेद्धरूपया श्री राजेन्द्र प्रसाद राय,पोैत्रा-स्व0 रामाधर राय तथा मो0-1,70,412=00(एक लाख सत्तर हजार चार सौ बारहद्ध रूपया श्री राजेन्द्र प्रसाद राय,सुपुत्रा स्व0 शांति देवी के नाम से भुगतान हेतु विपत्रा सहायक लेखापाल के रूप मे आरोपी द्वारा हस्ताक्षर कर पारित किया गया है, जबकि तीनो प्राध्किार पत्रा पर कटिंग एवं ओभर राइटिंग है।

अतएव आरोपी द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वहन सही ढंग से नही किया गया है।पफलस्वरूप मो0-7,93,306=00 ;सात लाख तीरानबे हजार तीन सौ छःद्ध रूपये की पफर्जी निकासी की गयी।

आरोपी का स्पष्टीकरणः- इस आरोप के संबध् में आरोपी सहायक लेखापाल के द्वारा कारण पृच्छा दिया गया है :-

(i) कोषागार संहिता मे वर्णित विपत्रा पारित करने के प्रावधनों एवं प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद ही आरोपी द्वारा इन विपत्राों को पारित करने हेतु वरीय लेखापाल के माघ्यम से कोषागार पदाध्किारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।

(ii) निर्गत प्राध्किार पत्राो में जितने कटिंग ;इन्टरपोलेशनद्ध हंैं । वे सभी महालेखाकार,बिहार,पटना से निर्गत प्राध्किार पत्रा मे ही हैं।कोषागार कार्यालय के स्तर से कटिंग या इन्टरपोलेशन नही किया गया है।

(iii) कटिंग पर महालेखाकार,बिहार,पटना के वरीय लेखा पदाध्किारी का लध्ु हस्ताक्षर है।

(iv) ऐसा निदेश नही है कि कटिंग या इंटरपोलेशन हो तो विपत्रा पारित नही किया जाय।

(v) जहानाबाद कोषागार मे हुए घोटाला के प्रकाशित होने के बाद वित्त विभाग ने अपने पंत्रााक- 4038;वि0द्ध/ दिनांक 17.11.2004 से राज्य के सभी कोषागार को यह निदेश निर्गत किया कि यदि कटिंग या इन्टरपोलेशन के मामले हों तो इनका सत्यापन कराया जाय।

(vi) सेवा-निवृति लाभ के मामले में राज्य सरकार द्वारा पंत्रााक-3433 ;वि0द्ध/दिनांक-18.8.2002 से विलम्ब नही किये जाने का निदेश दिया गया है।

(vii) प्राध्किार पत्रा पफर्जी है।

उपस्थापन पदाध्किारी-सह-कोषागार पदाध्किारी,जहानाबाद ने आरोपी के कारण पृच्छा पर अपने मंतव्य मे उल्लेख किया हैकि स्पष्टीकरण स्वीकार्य है क्योंकि कार्यालय मे संधरित नमूना हस्ताक्षर से मिलान के बाद ही विपत्राो को पारित किया गया है। कटिंग पर लघु हस्ताक्षर है।अतः सहायक लेखापाल की हैसियत से आरोपी द्वारा नियमानुसार दायित्वों का निर्वहन किया गया है।

संचालन पदाध्किारी का मंतव्यः- आरोपी के दावे पर समीक्षोपरांत यह पाया गया कि 3,50,000=00 (तीन लाख पचास हजारद्धरूपया का प्राध्किार-पत्रा, जो श्री राजेन्द्र प्रसाद राय,पिता-स्व0 सकलदीप सिंह के नाम से प्राप्त हुआ था, उस पर सहायक लेखा पदाध्किारी,महालेखाकार कार्यालय, बिहार,पटना का हस्ताक्षर है। इनके हस्ताक्षर का नमूना कोषागार कार्यालय जहानाबाद मे उपलब्ध् नही है। इस प्राध्किार पत्रा को वरीय लेखा पदाध्किारी द्वारा अभिप्रमाणित किया गया है परंतु कोषागार कार्यालय मे संधरित वरीय लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर के नमूना से प्राध्किार पत्रा को अभिप्रमाणित करने वाले वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर भिन्न है। कोषागार कार्यालय को प्राध्किार पत्रा वरीय लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर से प्राप्त होता है परंतु इस प्राध्किार पत्रा पर सहायक लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर है। अतःआरोपी को विपत्रा पारित करने के पूर्व इसका सत्यापन कराना चाहिए था, जो नही किया गया। यहांॅ तक कि इस प्राध्किार पत्रा को जिस वरीय लेखा पदाध्किारी द्वारा अभिप्रमाणित किया गया है उनका हस्ताक्षर भी कोषागार में रक्षित हस्ताक्षर के नमूने से मेल नही खाता है। इसके अलावा प्राध्किार पत्रा पर कटिंग एवं ओभर राइंटिग है, अतः विपत्रा पारित करने के पूर्व प्राध्किार पत्रा का सत्यापन कराना आवश्यक था, जो नही कराया गया। इसी प्रकार 2,72,894=00 (दो लाख बहत्तर हजार आठ सौ चौरानबेद्धरूपया का प्राध्किार पत्रा जो श्री राजेन्द्र प्रसाद राय,पोैत्रा-स्व रामाधर राय के नाम पर निर्गत है,पर कटींग एवं ओवर राइटिंग है जिस पर लध्ु हस्ताक्षर है। किसी भी वरीय लेखा पदाध्किारी के लध्ु हस्ताक्षर का नमूना महालेखाकार कार्यालय,बिहार,पटना द्वारा कोषाागर कार्यालय जहानाबाद को नही भेजा गया है। अतः इस लध्ु हस्ताक्षर का मिलान कोषागार कार्यालय स्तर पर किये जाने का प्रश्न ही नही उठता है। इस प्राध्किार पत्रा पर कोषागार पदाध्किारी पटना को काटकर हाथ से जहानाबाद लिखा गया है।3 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 इस प्राध्किार पत्रा मे श्री राजेन्द्र प्रसाद राय को स्व0 रामाधर राय का पौत्रा बताया गया है जबकि किसी भी व्यक्ति की निश्चित पहचान उसके पिता के नाम के साथ की जाती है। इस प्रध्किार पत्रा में पिता का नाम नही दर्ज कर दादा का नाम दर्ज किया जाना अपने आप मे इस प्राध्किार पत्रा की प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करता है एवं जैसे ही इस प्रकार का प्राध्किार पत्रा पारित करने हेतु आरोपी के समक्ष लाया गया था उसी समय उन्हें सर्तक हो जाना चाहिए था तथा प्राध्किार पत्रा की प्रामणिकता की जॉच की जानी चाहिए थी, जो नही किया गया। आरोपी सहायक लेखापाल, जिन पर विपत्राों को पारित करने की कार्यालय स्तर पर जिम्मेदारी है, के द्वारा लापरवाही पूर्ण कार्य किया गया है। इसके अलावे प्राध्किार पत्रा में कोषागार पदाध्किारी पटना केा काटकर जहानाबाद लिखा जाना इसे और भी संदिग्ध् बना देता है। अतः प्राध्किार पत्रा का सत्यापन कराया जाना जरूरी था जिसे नही कराया गया।

तीसरा प्राध्किार-पत्रा-1,70,412=00(एक लाख सतर हजार चार सौ बारहद्ध रूपया का है जिसका विपत्रा श्री राजेन्द्र प्रसाद राय,पुत्रा-स्व0 शांति देवी के नाम से है। इस प्राध्किार पत्रा पर भी कटींग एवं ओभर राइटिंग है। कटिंग तथा ओभर राइटिंग करके कोषागर पदाध्किारी जहानाबाद लिखा गया है।

आरोपी द्वारा यह सत्यापित कराये जाने का प्रयास नही किया गया कि शांति देवी के पति का क्या नाम है अर्थात्‌ श्री राजेन्द्र प्रसाद राय के पिता का क्या नाम है । अतःसंदेह की गुजाइश थी तो भी आरोपी द्वारा बिना सत्यापित कराये विपत्रा पारित की गयी जो उनके कार्यो के प्रति लापरवाही का परिचायक है।

अतः तीनो प्रध्किार पत्राों को संदेह की श्रेणी मे रखकर इनके सत्यापन की कार्रवाई करना आवश्यक था जो आरोपी द्वारा नही किया गया एवं बिना सत्यापित कराये विपत्रा पारित की गयी जिसके पफलस्वरूप पफर्जी भुगतान हुआ। आरोपी सहायक लेखापाल द्वारा अपने कारण पृच्छा में यह उल्लेख किया गया है कि जहानाबाद कोषागार मे हुए घोटाला के प्रकाशित होने के बाद वित्त विभाग ने अपने पंत्रााक- 4038;वि0द्ध/ दिनांक 17.11.2004 से राज्य के सभी कोषागार को यह निदेश निर्गत किया कि यदि कटिंग या इन्टरपोलेशन के मामले हो तो इनका सत्यापन कराया जाय। अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि सहायक लेखापाल की हैसियत से कार्यालय के जिम्मेदार कर्मचारी के रूप इन संदिग्ध् प्राध्किार पत्राों का सत्यापन कराना आरोपी की जिम्मेवारी थी, परंतु लापरवाही पूर्ण आचरण के कारण इनके द्वारा इन संदिग्ध् प्राध्किार पत्राों ;जिन्हें आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा मे जाली बतलाया गया हैद्धका सत्यापन नहीं कराया गया है। यही कारण है कि वित्त विभाग को ऐसे संदिग्ध् प्राध्किार पत्राो का सत्यापन कराने हेतु बाद मे निदेश निर्गत करना पड़ा।

आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा मे यह उल्लेख किया गया है कि वित्त विभाग के पंत्रााक-3433;वि0द्ध/ दिनांक-16.8.2002 के आलोक मे सेवान्त लाभों के भुगतान मेंं विलंब नही किया जाना चाहिए, परंतु वित्त विभाग का प्रासांगिक पत्रा आरोपी को यह अध्किार नहीं देता है कि प्राध्किार पत्रा की समुचित जॉच या सत्यापन कराये बिना पफर्जी भुगतान किया जाय।

उपरोक्त परिपेक्ष्य में स्पष्ट है कि आरोपी द्वारा उपर वर्णित तीनों प्राध्किार पत्राों का सत्यापन सम्यक रूप से नही कराया गया जिसके पफलस्वरूप पफर्जी भुगतान हुआ। अतः आरोपी द्वारा 7,93,306=00 ;सात लाख तीरानबे हजार तीन सौ छःद्धरूपया का विपत्रा पारित कर भुगतान किया जाना अवैध् है। आरोपी एवं उपस्थापन पदाध्किारी का तर्क स्वीकार करने योग्य नही है। यह आरोप आरोपी पर पुरी तरह से प्रमाणित होता है।

;2द्ध-आरोप सं0ः-02

आरोपी द्वारा पूर्व अंकेक्षित विपत्रा मो0 2,69,662=00 ;दो लाख उनहत्तर हजार छ सौ बारसठद्धरूपया श्री राजेन्द्र प्रसाद राय, पिता-स्व0 सकलदीप सिंह के नाम से भुगतान हेतु लेखापाल के रूप मे पारित किया गया है,जिसे महालेखाकार बिहार,पटना द्वारा अवैध् निकासी माना गया है।

आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा मे कहा गया है कि इस विपत्रा को पारित करने में उनकी भूमिका लेखापाल की थी एवं कोषागार संहिता भाग-1 के नियम-60 का पालन करते हुए उनके द्वारा विपत्रा पारित करने की अनुशंसा की गयी है। आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा मे यह भी उल्लेख किया गया है कि इस प्राध्किार पत्रा पर श्री एस0डब्लू0रज्जा, वरीय लेखा पदाध्किारी,बिहार,पटना का हस्ताक्षर है जिसे उनके द्वारा श्री यू0एस0प्रसाद,उप महालेखाकार,बिहार,पटना के समक्ष पहचान कर संपुष्टि की गयी।4 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 उपस्थापन पदाध्किारी द्वारा आरोपी के कारण पृच्छा पर यह मंतव्य दिया गया है कि स्पष्टीकरण स्वीकार्य है क्योंकि कार्यालय में संधरित नमूना हस्ताक्षर से मिलान करने के बाद अग्रेतर कारवाई की गयी। प्राध्किार पत्रा मे कतिपय त्राृटियों के निराकरण हेतु महालेखाकार,बिहार,पटना से पत्रााचार किया गया जिसका निराकरण करते हुए महालेखाकार के द्वारा जहानाबाद कोषागार को पत्रा भेजा गया। तदोपरांत पूर्ण संतुष्टि के उपरांत नियमानुसार इनके द्वारा संबध्ति विपत्रा पारित किया गया।

संचालन पदाध्किारी का मंतव्यः- कोषागार कार्यालय जहानाबाद द्वारा दिखलाये गये कागजातों के समीक्षोपरांत यह पाया गया कि तीन प्राध्किार पत्राों के द्वारा कुल-2,69,662=00 ;दो लाख उनहत्तर हजार छः सौ बासठद्धरूपया श्री राजेन्द्र प्रसाद राय, पिता-स्व0 सकलदीप सिंह के नाम से प्राप्त हुआ था।इनमे से 1,70,930=00 ;एक लाख सत्तर हजार नौ सौ तीसद्ध रूपया के प्राध्किार पत्रा पर विकलनीय लेखा शीर्ष अंकित नही रहने के कारण कोषागार पदाध्किारी,जहानाबाद द्वारा अपने पंत्रााक-53/को0,दिनांक 20.1.2003 से महालेखाकार,बिहार के कार्यालय से पृच्छा की गयी जिसके आलोक मे महालेखाकार कार्यालय,पटना द्वारा क्रमांक जी.ई.5-1999,दिनांक-22.01.2003 से विकलनीय शीर्ष की जानकारी दी गयी, परंतु इस पत्रा पर जिस वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर हिन्दी मे है, उसे कोषाागार कार्यालय मे रक्षित हस्ताक्षर के नमूना से मिलान करने पर पाया गया कि यह हस्ताक्षर भिन्न है। इसके अलावा 72,412=00 ;बहत्तर हजार चार सौ बारहद्धरूपया एवं 26,320=00 ;छबीस हजार तीन सौ बीसद्धरूपया का अन्य दो प्राध्किार पत्राों पर वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर कोषागार कार्यालय मे रक्षित हस्ताक्षर के नमूना से भिन्न पाया गया। अतः आरोपी लेखापाल को इन तीनों प्राध्किार पत्राो को संदेह के दायरे में रख कर इनका सत्यापन कराना चाहिए था परंतु आरोपी द्वारा ऐसा नहीं किया गया। आरोपी द्वारा यह कहा जाना कि वरीय लेखा पदाध्किारी श्री एस0डब्लू0रज्जा ने अपने हस्ताक्षर की पहचान कर संपुष्टि की स्वीकार नही किया जा सकता है क्योकि इस संबध् में इनकी स्वीकारोक्ति से संबध्ति साक्ष्य आरोपी द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सका है।

अतः इन प्राध्किार पत्राो के आधर पर 2,69,662=00 ;दो लाख उनहतर हजार छः सौ बारसठद्धरूपया का भुगतान किया गया जिसे पफर्जी भुगतान पाया गया। इसके लिए आरोपी लेखापाल दोषी हैं। अतः यह आरोप इन पर प्रमाणित होता हैं।

आरोप सं0ः-03

उपादान प्राध्किार पत्रा 3,38,712=00 ;तीन लाख अड़तीस हजार सात सौ बारहद्ध रूपया, लध्ुकरण प्राध्किार पत्रा 3,71,790=00;तीन लाख एकहत्तर हजार सात सौ नब्बेद्धरूपया एवं पेंशन मद में 6,13,235=00 ;छःलाख तेरह हजार दो सौ पेैतीसद्धरूपया का श्री हंसराज सिंह,कार्यपालक अभियंता केे नाम से भुगतान हेतु सहायक लेखापाल के रूप में आरोपी द्वारा विपत्रा पारित किया गया है जबकि उपादान प्राध्किार पत्रा पर कटींग एवं ओभर राइटिंग है तथा लध्ुकरण एवं पेंशन प्राध्किार पत्रा पर वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर महालेखाकार, बिहार,पटना द्वारा जाली करार दिया गया है।

अतः आरोपी द्वारा सहायक लेखापाल के रूप में कर्तत्य का निर्वहन ठीक से नही किया गया है जिसके पफलस्वरूप मो0 13,23,737=00;तेरह लाख तेइस हजार सात सौ सैतीसद्धरूपया का पफर्जी भुगतान हुआ।

आरोपी का स्पष्टीकरणः- इस संबध् में आरोपी ने कारण पृच्छा दिया है कि इनके द्वारा सभी नियमों का पालन करते हूए विपत्रा पारित करने की अनुशंसा की गयी है। आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा में आगे यह उल्लेख किया गया है कि श्री हंसराज सिंह के पक्ष मे निर्गत 3,38,712 =00 ;तीन लाख अडतीस हजार सात सौ बारहद्ध रूपया के उपादान प्राध्किार पत्रा की मूल प्रति कोषागार सचिवालय को जाना चाहिए था,लेकिन महालेखाकार बिहार के कार्यालय मे रचे गये षंडयत्रा के कारण इसे अन्य प्राध्किार पत्राों के साथ निर्गमन की सम्पूष्टि पत्रा के साथ जहानाबाद कोषागार को भेज दिया गया। यहॉं तक कि जब कोषागार पदाध्किारी, सचिवालय निर्माण भवन द्वारा महालेखाकार,बिहार को संबध्ति प्राध्किार पत्रा प्राप्त नहीं होने संबध्ी पत्रा प्रेषित किया गया तो महालेखाकार कार्यालय द्वारा इस प्राध्किार पत्रा के गुम होने की सूचना राज्य के अन्य कोषागारों को दी जानी चाहिए थी,ताकि उसके भुगतान पर रोक लगायी जा सके।

आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा में आगे यह उल्लेख किया गया हैकि हंस राज सिंह के पेंशन प्राध्किार पत्रा के साथ एक अभ्युक्ति पत्रा भेजा गया जिसमें यह कहा गया था कि power failure के कारण हस्तलिखित प्राध्किार पत्रा भेजा जा रहा है एवं मामला माननीय उच्च न्यायालय से संबध्ति है अतः तुंरत भुगतान किया जाय।5 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 उपस्थापन पदाध्किारी द्वारा आरोपी के कारण पृच्छा पर अपना मंतव्य दिया गया है कि इनका स्पष्टीकरण को स्वीकार्य है क्याेंकि कार्यालय मे संधरित नमूना हस्ताक्षर से मिलान करने के बाद ही संबध्ति विपत्रााें को पारित किया गया।

संचालन पदाध्किारी का मंतव्यः- कोषागार कार्यालय की संचिका में रखे गये प्राध्किार पत्राों का अवलोकन करने पर पाया गया कि 3,38,712=00 ;तीन लाख अडतीस हजार सात सौ बारहद्धरूपया के उपादान प्राध्किार पत्रा में कटींग एवं ओभर राइटिंग है। इस उपादान प्राध्किार पत्रा में अंकित कोषागार को काटकर हाथ से जहानाबाद लिख गया है तथा इसमें अन्य कई जगह कटिंग एंव ओभर राइटिंग है जिससे इस उपादन प्राध्किार पत्रा की प्रमाणिकता संदिग्ध् हो जाती है। अतः सहायक लेखापाल के रूप में आरोपी के लिए इस प्राध्किार पत्रा का सत्यापन कराना आवश्यक था परंतु उनके द्वारा इसका सत्यापन नही कराया गया। यदि इस प्राध्किार पत्रा का सत्यापन कराया गया होता तो इससे संबध्ति वास्तविकता सामने आ जाती। अतः इस उपादान प्राध्किार पत्रा के संदर्भ मेें आरोपी सहायक लेखापाल द्वारा कारण पृच्छा में जो तर्क दिया गया है, वह स्वीकार करने योग्य नही है।

यहॉं यह भी उल्लेखनीय है कि इस उपादान प्राध्किार पत्रा पर अंकित है " As per W.R.D. letter no- 336/dated 05.5.2003 Pension is not sanctioned and not admissible to shri H.R.Singh,Retd.EX.Eng,W.R.D, patna." जब श्री हंसराज सिंह को पेंशन प्रदान करने योग्य नहीं था तो उनके लिए उपादान मद में 3,38,712=00 ;तीन लाख अड़तीस हजार सात सौ बारहद्धरूपया, लध्ुकरण मद में 3,71,790=00 ;तीन लाख एकहतर सात सौ नब्बेद्धरूपये एवं पेंशन मद मे 6,13,235=00 ;छःलाख तेरह हजार दौ पैतीसद्ध रूपया का प्राध्किार पत्रा प्राप्त होना स्वतः संदेह उत्पन्न करता है जिसका सत्यापन कराना आवश्यक था। अतः इन तीनों प्राध्किार पत्राों का सत्यापन कराने के बाद ही इससे संबध्ति पारित किया जाना चाहिए था जो आरोपी सहायक लेखापाल द्वारा नही किया गया।

इसके अलावा उल्लेखनीय है कि 3,71,790=00 ;तीन लाख एकहतर सात सौ नब्बेद्धरूपया का लध्ुकरण प्राध्किार पत्रा तथा 6,13,235=00 ;छःलाख तेरह हजार दौ पैतीसद्ध रूपया का पेंशन प्राध्किार पत्रा पर जिस वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर है,उनके हस्ताक्षर का नमूना महालेखाकार, बिहार,पटना के जिस पत्रा से भेजा गया है ,उस पत्रा पर जिस वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर है, उनके हस्ताक्षर का नमूना कोषागार कार्यालय, जहानाबाद मे उपलब्ध् नहीं है। यहॉ यह भी उल्लेखनीय है कि इस पत्रा को जिस उप महालेखाकार;प्रशासनद्ध द्वारा अभिप्रमाणित किया गया है ,उनके हस्ताक्षर का भी नमूना कोषागार कार्यालय जहानाबाद मे उपलब्ध् नहीं है। अतः आरोपी द्वारा प्राध्किार पत्रा पर मौजूद वरीय लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर का मिलान जिस रक्षित हस्ताक्षर से किया गया, उसकी प्रामणिकता ही संदिग्ध् है। ऐसी स्थिति मे आरोपी द्वारा प्राध्किार पत्राो पर वरीय लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर को सहज रूप से सही मान लेना उनके द्वारा अपने कार्यो के संपादन मे लापरवाही का परिचायक है।

लध्ुकरण एवं पेंशन प्राध्किार पत्राों पर वरीय लेखा पदाध्किारीके हस्ताक्षर को महालेखाकार बिहार,पटना द्वारा जाली करार दिया गया है।

आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा में यह उल्लेख किया गया है कि हंसराज सिंह के पेंशन प्राध्किार पत्रा के साथ एक अभ्युक्ति पत्रा भेजा गया था जिसमें यह कहा गया था कि power failure के कारण हस्तलिखित प्राध्किार पत्रा भेजा जा रहा है एवं मामला माननीय उच्च न्यायालय से संबध्ति है, अतः तुंरत भुगतान किया जाय। इस संदर्भ में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि लध्ुकरण एवं पेंशन प्राध्किार पत्रा पर जिस वरीय लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर को महालेखाकार,बिहार,पटना द्वारा जाली करार दिया गया है, उसी वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर इस पत्रा पर अंकित है,अतः इस हस्ताक्षर की प्रमाणिकता भी संदिग्ध् हो जाती है। इसके अलावा इसके उपर हाथ से केवल Court case लिखा हुआ है,इसका अर्थ यह नही हो सकता हैकि यह मामला माननीय उच्च न्यायालय से संबध्ति है,अतः तुरंत भुगतान किया जाय। यदि यह मामला माननीय उच्च न्यायालय से संबध्ति भी रहता तब भी बिना समुचित जॉंच एवं सत्यापन के पफर्जी भुगतान करना गलत होता।

अतः उपरोक्त परिपेक्ष्य से यह स्पष्ट है कि आरोपी द्वारा तीनों प्राध्किार पत्राों की जॉंच सम्यक रूप से नही की गयी तथा इनका सत्यापन भी नही कराया गया,जिसके पफलस्वरूप पफर्जी भुगतान हुआ।अतः आरोपी द्वारा पारित मेा06 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 13,23,737=00 ;तेरह लाख तैइस हजार सात सौ सैतीसद्धरूपया की पफर्जी निकासी की गयी। आरोपी एवं उपस्थापन पदाध्किारी का तर्क स्वीकार करने योग्य नही है।

अतः यह आरोप आरोपी पर पुरी तरह प्रमाणित होता है।

आरोप संख्याः-04

आरोपी द्वारा सहायक लेखापाल के रूप मे उपादान प्राध्किार पत्रा मो0 3,50,000त्र00 ;तीन लाख पचास हजारद्धरूपया एवं पेशन प्राध्किार पत्रा मो0 1,03,069त्र00 ;एक लाख तीन हजार उनहत्तरद्धरूपया श्रीमती इन्द्रपड़ी देवी,सुपुत्राी स्व0 महेन्द्र झा,भूतपूर्व शिक्षक के नाम से भुगतान हेतु विपत्रा पारित किया गया।

श्रीमती इन्द्रपड़ी देवी का पेंशन प्राध्किार पत्रा पी0पी0ओ0 एवं उपादान प्राध्किार पत्रा पर वरीय लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर को महालेखाकार कार्यालय, बिहार द्वारा जाली करार दिया गया है। पफलस्वरूप मो0 4,53,069=00 ;चार लाख तीरपन हजार उनहत्तरद्ध रूपया की पफर्जी निकासी की गयी है। अतएव आरोपी द्वारा सहायक लेखापाल के रूप मे कर्तव्य का निर्वहन ठीक से नही किया गया है।

आरोपी का स्पष्टीकरणः- आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा मे यह उल्लेख किया गया है कि इन्द्रपड़ी देवी के उपादान एवं पेशन संबध् िकागजातों के भुगतान संबध् िसभी प्रक्रिया अपनाने के बाद पैतृक विभाग से प्राप्त प्रमाण-पत्रा में कतिपय त्राुटियां पाये जाने के बाद पैतृक विभाग से पत्रााचार किया गया एवं त्राुटियों के निराकरण के बाद ही विपत्रा पारित करने की प्रक्रिया प्रारंभ की गयी।इसी बीच महालेखाकार कार्यालय ने अपने वरीय लेखा पाल श्री राजेन्द्र बिन्द के माघ्यम से इन्द्रपड़ी देवी के संपूर्ण पेंशन कागजातों को मॅंगा लिया। बाद में उन्हीें लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर से श्रीमती इन्द्रपड़ी देवी के पेंशन आदि भुगतान संबध्ी आदेश प्राप्त हुआ। जब कोषागार कार्यालय ने महालेखाकार कार्यालय को पेंशन संबध् ि कागजात अनुपलब्ध् रहने की जानकारी दी,,तब महालेखाकार कार्यालय द्वारा श्रीमती इन्द्रपड़ी देवी के पेंशन संबध् िप्राध्किार पत्रा की द्वितीयक प्रति भेजी गयी जिसका सत्यापन कराने के बाद भुगतान की कारवाई की गयी।

आरोपी के कारण पृच्छा पर उपस्थापन पदाध्किारी द्वारा यह मंतव्य दिया गया है कि स्पष्टीकरण स्वीकार्य है क्योंकि संबध्ति पेंशनर के प्राध्किार पत्रा की जॉंच करायी गयी एवं महालेखाकार,बिहार,पटना द्वारा पुष्टि किये जाने के बाद ही विपत्रा को पारित किया गया है।

संचालन पदाध्किारी का मंतव्य-इन दोनों प्राध्किार पत्राों की समीक्षा के दौरान आरोपी या उपस्थापन पदाध्किारी द्वारा आरोपी के कारण पृच्छा में वर्णित तथ्यों की संपुष्टि हेतु कोई कागजात नहीें दिखलाया गया।

इन दोनो प्राध्किार पत्राों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि इन पर जिस वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर है उनके हस्ताक्षर का नमूना महालेखाकार बिहार,पटना के जिस पत्रा से भेजा गया है उस पत्रा पर जिस वरीय लेखा पदाध्किारी का हस्ताक्षर है,उनके हस्ताक्षर का नमूना कोषागार कार्यालय जहानाबाद मे उपलब्ध् नहीं है। यहांॅ यह भी उल्लेखनीय है कि इस पत्रा को जिस उप महालेखाकार;प्रशासनद्ध द्वारा अभिप्रमाणित किया गया है, उनके हस्ताक्षर का भी नमूना कोषागार कार्यालय जहानाबाद मे उपलब्ध् नहीं है। अतः आरोपी द्वारा प्राध्किार पत्रा पर मौजूद वरीय लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर का मिलान जिस रक्षित हस्ताक्षर से किया गया उसकी प्रामणिकता ही संदिग्ध् है। ऐसी स्थिति मे आरोपी द्वारा प्राध्किार पत्रााें पर वरीय लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर को सहज रूप से सही मान लेना उनके द्वारा अपने कार्यो के संपादन मे लापरवाही का परिचायक है।

अतः उपर वर्णित तथ्यो से स्पष्ट होता हेै कि आरोपी द्वारा प्राध्किार पत्राोें का सत्यापन समुचित रूप से नही कराया गया जिसके पफलस्वरूप 4,53,069=00 ;चार लाख तीरपन हजार उनहत्तरद्धरूपया का पफर्जी भुगतान हुआ। आरोपी एवं उपस्थापन पदाध्किारी का तर्क स्वीकार करने योग्य नही है। अतः यह आरोप आरोपी पर पूरी तरह प्रमाणित होता है। ;5) आरोप सं0 05

आरोपी द्वारा सहायक लेखापाल के रूप मे उपादान प्राध्किार पत्रा 2,50,000=00;दो लाख पचास हजारद्धरूपया का विपत्रा श्री राजेश कुमार,सुपुत्रा स्व0 नंदकिशोर प्रसाद के नाम से भुगतान हेतु पारित किया गया जिसमे कटिंग एंव ओभर राइटिंग है, जिसे महालेखाकार,बिहार द्वारा पफर्जी निकासी करार दिया गया है।

अतएव आरोपी द्वारा सहायक लेखापाल के रूप मे अपने कर्तव्य का निर्वहन ठीक से नही किया गया है जिसके पफलस्वरूप 2,50,000=00 ;दो लाख पचास हजारद्धरूपया की पफर्जी निकासी की गयी है।7 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 आरोपी दिनांक 13.11.2004 से अपने कार्यालय से अनाध्किृत रूप से अनुपस्थित रहे तथा आलमारियों की चाभी एवं बज्रगृह ;स्टाम्पद्ध की चाभी कार्यालय को समर्पित नहीं किये जिससे कार्यालय कार्य संपादन मे बाध हुई। इस आरोप के संबध् मे आरोपी द्वारा कारण पृच्छा दिया गया है कि पूरी प्रक्रिया अपना कर ही आरोपी द्वारा विपत्रा को पारित करने की अनुशंसा की गयी है।

जहॉं तक 13.11.2004 से अनाध्किृत रूप से अनुपस्थित रहने का आरोप है इस संबध् में आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा मेें यह उल्लेख किया गया है कि इनके द्वारा दिनांक 13.11.2004 से 21.11.2004 तक अपने अस्वस्थता के कारण आवेदन पत्रा कार्यालय में समर्पित किया गया था तथा उक्त अवध् िका कार्य अवध् िका वेतन का भुगतान इन्हें कोषागार कार्यालय द्वारा किया जा चुका है।

आरोपी द्वारा अपने कारण पृच्छा में आगे यह उल्लेख किया गया है कि यह आरोप निराधर एंव भ्रामक है कि इनके द्वारा बज्रगृह की चाभी नही सौपी गयी। इन्होनें अपने कारण पृच्छा मेें यह उल्लेख किया है कि इनके द्वारा अपनी अस्वस्थता के कारण बज्रगृह की चाभी अपने पुत्रा के माघ्यम से भेजी गयी,परंतु तत्कालीन जिला पदाध्किारी के निवास पर कार्यरत O.S.D. श्री अरविंद कुमार झा एवं तत्कालीन केाषागार पदाध्किारी श्री अक्षय कांत झा द्वारा अध्विक्ता श्री प्रभु कुमार सिन्हा के समक्ष इसे प्राप्त करने से इनकार किया गया।

आरोपी के कारण पृच्छा पर उपस्थापन पदाध्किारी द्वारा यह मंतव्य दिया गया कि स्पष्टीकरण स्वीकार्य है क्योंकि पेंशनर के प्राध्किार पत्रा पर उपलब्ध् लेखा पदाध्किारी के हस्ताक्षर का मिलान कार्यालय में संधरित नमूना हस्ताक्षर से करने के बाद ही विपत्रा को पारित किया गया। इन्होंने अपने मंतव्य में आगे यह उल्लेख किया है कि तत्कालीन कार्यालय कर्मियों से पूछ-ताछ के उपरांत ज्ञात हुआ कि श्री उमाशंकर प्रसाद द्वारा अपने अस्वस्थता के कारण अपने घर से चाभी कोषागार में भेजी गयी थी जिसे तत्कालीन कोषागार पदाध्किारी द्वारा प्राप्त करने से इनकार कर दिया गया था। उपस्थापन पदाध्किारी द्वारा आगे यह उल्लेख किया गया है कि श्री उमाशंकर प्रसाद के स्पष्टीकरण से ज्ञात होता है कि अपने दायित्वों के निर्वाहन हेतु पुनः इनके द्वारा संबध्ति चाभी अपने पुत्रा के माघ्यम से तत्कालीन जिला पदाध्किारी के निवास पर कार्यरत O.S.D. श्री अरविंद कुमार झा के पास भेजी गयी जिसे प्राप्त करने से इन्होेंने भी इनकार कर दिया।

उपस्थापन पदाध्किारी द्वारा अपने मंतव्य में आगे यह उल्लेख किया गया है कि उपरोक्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधर पर सामान्य सुझ-बुझ ;Common parlanceद्ध से निष्कर्ष सहजता से प्राप्त किया जा सकता है कि जब श्री प्रसाद द्वारा चाभी को कोषागार में भेजा जाना प्रमाणित है तब यह भी स्वीकार योग्य है कि उनके द्वारा तत्कालीन जिलाध्किारी के निवास पर कार्यरत O.S.D. श्री अरविंद कुमार झा के पास चाभी अवश्य भेजी गयी होगी एवं वहॉं भी इनकार किये जाने के कारण चाभी समर्पित नही की जा सकी होगी। ज्ञातव्य है कि कार्यालय की चाभी महत्वपूर्ण संपत्ति है जिसे बिना प्राप्ति रसीद प्राप्त किये किसी अन्य कर्मी को नही दी जा सकती है,अतः इस परिपेक्ष्य में भी श्री प्रसाद का स्पष्टीकरण स्वीकार्य योग्य है।

समीक्षोपरांत यह पाया गया कि इस प्राध्किार पत्रा पर भी कटिंग एवं ओभर राइटिंग है पिफर भी बिना इसका सत्यापन कराये इसे पारित किया गया जिसके पफलस्वरूप पफर्जी भुगतान हुआ।

यहॉं यह भी उल्लेखनीय है कि इस प्राध्किार पत्रा पर हाथ से लिखा गया हैं कि राजेश कुमार इस विपत्रा की राशि प्राप्त करने के बाद आध्ी राशि अपने छोटे भाई श्री राकेश कुमार को दे देंगें। हाथ से इस तरह की अभियुक्ति अंकित करना प्राध्किार पत्रा की प्रामणिकता संदिग्ध् बना देता हैं। अतः प्राध्किार पत्रा का सत्यापन कराना आवश्यक था।उपर वर्णित तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी द्वारा पफर्जी भुगतान में सहभागिता दी गयी जिसके लिए वे पूर्णतः दोषी है।

अतः यह आरोप भी इन पर प्रमाणित होता है।

जहॉ तक 13.11.2004 से अनाध्किृत अनुपस्थिति तथा आलमारियों की चाभी एवं बज्रगृह ;स्टाम्पद्ध की चाभी कार्यालय में समर्पित नहीं करने का आरोप हैं इस संबध् में आरोपी के कारण पृच्छा पर उपस्थापन पदाध्किारी के मंतव्य से सहमत हुआ जा सकता हैं। अतः यह आरोप प्रमाणित नही होता है। संचालन पदाध्किारी से जॉच प्रतिवेदन प्राप्त होने पर इस कार्यालय के ज्ञापांक-401/स्था0, दिनांक 5.4.2008 से संचालन पदाध्किारी से प्राप्त जॉच प्रतिवेदन की छाया प्रति संलग्न करते हूए एक पक्ष के अंदर द्वितीय कारण पृच्छा की मॉंग की गयी।8 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 आरोपी द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा समर्पित किया गया जिसमें निम्नलिखित बिन्दुओं का उल्लेख किया गया हैः-

संचालन पदाध्किारी द्वारा आरोपी को अपने कक्ष मे सुनवाई के समय डॉंट-डपट कर मानसिक रूप से विचलित कर दिया गया तथा आरोपी को अपना पक्ष सही ढंग से रखने नही दिया गया।

संचालन पदाध्किारी द्वारा उपस्थापन पदाध्किारी के मंतव्य पर कोई घ्यान नहीं दिया गया।

संचालन पदाध्किारी द्वारा Speaking Order नही दिया गया है।

संचालन पदाध्किारी द्वारा अपने जॉच प्रतिवेदन मे Judicious mind का apply नही किया गया है।आरोप के संबध् में सतही निष्कर्ष निकाला गया है।

संचालन पदाध्किारी द्वारा इस बिन्दु पर घ्यान नही दिया गया है कि स्वयं कोषागार पदाध्किारी ,जहानाबाद ने अपने पंत्रााक 1451 दिनांक-8.11.2004 से महालेखाकार,बिहार,पटना का घ्यान इस पफर्जीवाड़ की ओर आकृष्ट किया है। संचालन पदाध्किारी द्वारा कई हस्ताक्षर को मूल हस्ताक्षर से भिन्न मान लिया गया,जबकि वे हस्ताक्षर मिलाने के विशेषज्ञ;EXpert)नही माने जा सकते है। उन्होंने मात्रा संशय के आधर पर अपना प्रतिवेदन दिया है।

आरोप सं0-01 के संबध् में कहा गया है कि आरोपी द्वारा अपेक्षित कार्रवाई के पश्चात ही विपत्रा का भुगतान की कारवाई की गयी।

आरोप सं0-02 के संबध् में आरोपी का कहना है कि इनकी भूमिका लेखापाल की है परंतु संचालन पदाध्किारी ने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया गया कि विपत्रा को पारित करने में सहायक लेखापाल की भूमिका किसने निभाई है। दावाकर्ता का पहचान सुनिश्चित करने हेतु अपेक्षित कारवाई की गई है। विपत्रा को पारित करने में कोषागार संहिता के भाग-01 के नियम-60 में दिये निदेशों का पालन किया गया है। आरोप सं0-3 के संबध् में कहा गया है कि हंसराज सिंह के पफोटो की अभिप्रमाणित प्रति प्राप्त की गयी है। उनके हस्ताक्षर एवं पफोटो को प्र0 पशुपालन पदाध्किारी,घोसी द्वारा प्रमाणित किया गया है। संचालन पदाध्किारी ने महालेखाकार ,बिहार,पटना के द्वारा दिये गये मंतव्य पर विश्वास कर लिया गया है। महालेखाकार द्वारा भेजे गये पेंशन एवं प्राध्किार पत्रा को जाली मान लिया गया।

आरोप सं0-4 में श्री मति इन्द्रपडी देवी को 4,53,069.00 रूपये का पफर्जी भुगतान कर दिया गया हैै।इस संबध् में पैतृक विभाग एवं महालेखाकार कार्यालय से पृच्छा किया गया है एवं इन्द्रपडी देवी की P.P.O के निर्गम की संपुष्टि भी की गयी है। इसी तरह अपेक्षित कार्रवाई की गयी है।

आरोप सं0-5 श्री राजेश कुमार,सुपुत्रा-स्व0 राजेश प्रसाद को मो0-2,50,000.00 रू0 की जॉच की पुरी प्रक्रियाअपनायी गयी है। अंत में इनके द्वारा अनुरोध् किया गया है कि पूरे प्रकरण को न्यायिक प्रक्रिया को छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि यह मात्रा विभागीय मामला नहीं है। इन पूरे प्रकरण की पीछे घोखाध्ड़ी का मामला होने की पुरी संभावना है जिसका निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के अध्ीन ही किया जा सकता है। श्री उमाशंकर प्रसाद,सहायक लेखापाल के द्वारा दिये गये द्वितीय कारण पृच्छा पर संचालन पदाध्किारी से इस कार्यालय के पंत्रााक 551 दिनांक-10.5.2008 एवं 646, दिनांक 03.06.08 से आत्मभारित मंतव्य की मॉग की गई है । संचालन पदाध्किारी द्वारा अपने पंत्रााक 123/नजा0,दिनांक 5.7.08 से आत्मभारित मंतव्य दिया गया है। संचालन पदाध्किारी द्वारा दिये गये मंतव्य के आलोक में आरोपी के विरूद्व गठित आरोपों की समीक्षा की गयी।

संचालन पदाध्किारी द्वारा मंतव्य दिया गया है कि संचालन पदाध्किारी के रूप में आरोपी के विरूद्व विभागीय कार्यवाही का पुलिस अनुसंधन एवं न्यायिक कार्रवाई के तहत की गयी कारवाई से कुछ लेना-देना नही है।

संचालन पदाध्किारी ने अपने मंतव्य में यह उल्लेख किया है कि प्रमाणित आरोपों से बचने के लिए आरोपी द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने का प्रयास किया जा रहा है। यदि वे संचालन पदाध्किारी के व्यवहार एवं कार्यशैली से विक्षुब्ध् थे तो इसकी जानकारी तुंरत जिला पदाध्किारी का देनी चाहिए थी।

उपस्थापन पदाध्किारी-सह कोषागार पदाध्किारी,जहानाबाद के द्वारा प्रथम कारण पृच्छा पर दिया गया मंतव्य बिल्कुल टेबुल रिपोर्ट है यदि उपस्थापन पदाध्किारी का मंतव्य तथ्य से या प्रमाणिकता से परे है तो उसे स्वीकार करना संचालन पदाध्किारी की बाघ्यता नही है।9 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 Speaking Order नही देने के तथा Judicious mind apply नही के संबध् में संचालन पदाध्किारी द्वारा मंतव्य दिया गया है कि प्राप्त सभी समपिर्त कारण पृच्छा पर संचालन पदाध्किारी द्वारा दिये गये मंतव्य के विश्लेषण के समीक्षोंपरांत उपस्थापित साक्ष्य के अनुरूप स्पष्ट जॉच प्रतिवेदन दिया गया है।

संचालन पदाध्किारी द्वारा यह मंतव्य दिया गया है कि आरोपों मे काट-कुट ;Over Writingद्ध वाले प्राध्किार पत्राों को महालेखाकार बिहार,पटना द्वारा पफर्जी माना गया है।

अतः इन प्राध्किार पत्राों का समुचित सत्यापन कराने के पश्चात्‌ ही पारित कराने अथवा भुगतान कराने की कारवाई की जानी थी।

कोषागार पदा0 के पत्राांक 1451 दिनांक 8.11.2004 से महालेखाकार, पटना का घ्यान इस पफर्जीवाडों के संबंध् में आकृष्ट करने के संबंध् में संचालन पदा0 द्वारा यह मंतव्य दिया गया कि कोषागार पदा0 के द्वारा यह पत्रा तब लिखा गया जब महालेखाकार द्वारा इस घोटाले का पर्दापफाश किया जा चुका था तथा प्राथमिकी दर्ज किये जाने की स्थिति थी। अतः घोटाले को रोकने की नीयत से नहीं, अपने को घोटाले से Shield करने के नियत से यह पत्रा लिखा गया है। संचालन पदाध्किारी द्वारा यह मंतव्य दिया गया है कि प्राध्किार पत्रा पर महालेखाकार के पदाध्किारी के हस्ताक्षर का नमूना से मिलान करना आरोपी का मुख्य कर्तव्य था जिसे वे किसी भी कीमत पर Ignore नही कर सकते है। जिस पदाध्किारी के हस्ताक्षर से निर्गत प्राध्किार पत्रा से लाखाें रूपये का भुगतान किया जाना है,उस पदाध्किारी का हस्ताक्षर सही है अथवा नही,इस संबध् में आरोपी को आश्वस्त हो लेना आवश्यक था। प्राध्किार पत्राो पर पदाध्किारी के हस्ताक्षर को महालेखाकार द्वारा जाली करार दिया गया है।

आरोपी द्वारा संचालन पदाध्किारी को हस्ताक्षर मिलाने के विशेषज्ञ;EXpert)कहे जाने पर संचालन पदाध्किारी द्वारा मंतव्य में उल्लेख किया गया है कि जॉच के क्रम में प्रथम दृष्टया हस्ताक्षर के नमूना से मिलान करने पर भिन्न पाया गया। स्वंय महालेखाकार द्वारा प्राध्किार पत्राो पर पदाध्किारी के हस्ताक्षर को जाली करार दिया गया है।

अतः ऐसे स्थिति में आरोपी का तथ्य महत्वहीन हो जाता है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

संचालन पदाध्किारी द्वारा पुनः आरोपवार मंतव्य दिया गया जिसका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार हैः- आरोपः-1 के संबध् में आरोपी द्वारा दिये गये प्रथम कारण पृच्छा तथा उस पर उपस्थापन पदाध्किारी के मंतव्य को घ्यान में रखते हूए तथ्यात्मक एवं विस्तृत जॉच प्रतिवेदन के समर्पित किया गया है। महालेखाकार द्वारा तीनो प्राध्किार पत्रा के आधर पर मो0-7,93,306.00 ;सात लाख तिरानवे हजार तीन सौ छःद्ध रूपये के भुगतान के संबध् मेे स्वीकार किया गया है कि पफर्जी भ्ुागतान हुआ है। राशि का भुगतान खाता के माघ्यम से न करके नगद किया जाना आरोपी के विरूद्व पफर्जी भुगतान में संलिप्तता के आरोप को और ठोस बनाता है।

आरोप सं0-02ः- आरोप सं0-2 मे वर्णित जाली प्राध्किार पत्राों के आधर पर 2,69,662.00 ;दो लाख उनहतर हजार छः सौ बासठद्ध रूपये का पफर्जी भुगतान किया गया है इन प्राध्किार पत्राों को पारित करने में आरोपी की भूमिका लेखापाल की रही है। इन्होने अपनी भूमिका लेखापाल की बताकर अपने आप को अप्रत्यक्ष रूप में निर्दोष प्रमाणित करने का प्रयास किया है लेकिन अन्य आरोपों जिसमें वर्णित जाली प्राध्किार पत्राों को पारित करने में आरोपी की भूमिका सहायक लेखापाल की रही है उसमें भी आरोपी द्वारा अपने को निर्दोष बतलाने का प्रयास किया गया है। लेखापाल हो या सहायक लेखापाल हो, दोनों की जिम्मेवारी होती है कि प्राध्किार पत्राों की सघन जांच कर पूर्ण रूप से आश्वस्त होने की बाद ही विपत्रा पारित करे ताकि पफर्जी भुगतान नहीं हो। महालेखाकार द्वारा आरोप संख्या दो में वर्णित प्राध्किार पत्राों के आधर पर भुगतान की गयी राशि को अवैध् माना गया है।

आरोप सं0- 3 :- इस संबंध् में तथ्यात्मक एवं विस्तृत जांच प्रतिवेदन पूर्व में दिया जा चूका है। आरोपी द्वारा अपने कर्तव्य का सही ढंग से र्निवहन नहीं करने के कारण 13,23,737.00 ;तेरह लाख तेइस हजार सात सौ सैंतीस रू0 मात्राद्ध का पफर्जी भुगतान किया गया। आरोपी द्वारा अपने दूसरे कारण पृच्छा के आरोप सं0 3 में उल्लेख किया गया है कि श्री हंसराज सिंह,से0नि0 कार्यापालक अभियंता,जलसंसाध्न विभाग को पेंशन मद की राशि उपादान मद की राशि के भुगतान के बाद की तिथि में की गयी है। अतः पेंशन के लिए प्राप्त प्राध्किार पत्रा को पारित करने के पूर्व आरोपी द्वारा इसकी सघन जॉच एवं सत्यापन करना चाहिए थी जो आरोपी द्वारा नही किया गया जिसके पफलस्वरूप मेा0 13,23,737.00 ;तेरह लाख तैइस हजार सात सौ सैतीसद्धरूपया की पफर्जी भुगतान किया गया।10 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 2 माच- 2009 आरोप सं0-04- इस संबध् में तथ्यात्मक एवं विस्तृत जॉच प्रतिवेदन पूर्व में दिया जा चुका है। आरोपी के द्वारा प्राध्किार पत्राों का सत्यापन समुचित रूप से नहीं कराने के कारण 4,53069.00 रूपये का पफर्जी भुगतान हुआ। अतः आरोपी स्पष्ट रूप से दोषी है।

आरोप सं0-5 पूर्व में तथ्यात्मक एवं विस्तृत प्रतिवेदन दिया जा चुका है। 2,50000.00;दो लाख पचास हजार द्ध रूपये के उपादान प्राध्किार पत्रा पर कटिग एवं ओभर रांइटिग रहने के वाबजूद आरोपी द्वारा इसकी गहन जॉच एवं सत्यापन नहीं किया गया। जिसके कारण पफर्जी भुगतान हुआ महालेखाकार,बिहार द्वारा इसे पफर्जी करार दिया गया है। इसके अलावा इस प्राध्किार पत्रा पर हाथ से लिखा गया है कि राजेश कुमार इस विपत्रा की राशि प्राप्त करने के बाद आदि राशि अपने छोटे भाई श्री राकेश कुमार को दे देगे। हाथ से इस तरह की अभियुक्ति अंकित करना प्राध्किार पत्रा की प्रामणिकता को संदिग्ध् बना देता है। प्राध्किार पत्रा का सत्यापन कराना आवश्यक था जो नही कराया गया।

इस प्रकार उक्त विवेचना से स्पष्ट है कि आरोपी के विरूद्व लगाये गये सभी आरोप प्रमाणित पाये गये है। कोषागार द्वारा अवैध् रूप से निकासी में इनकी सहभागिता परिलक्षित होती है। यदि ये अपने कर्तव्य के प्रति सचेत एवं जागरूक रहते तो इतनी बड़ी राशि कोषाागार से निकासी संभव नहीं होती।

अतः उपरोक्त आरोप इतने गंभीर है कि इन्हें यदि कठोरतम दंड नहीं दिया जाता है तो इस तरह के ककृत्य को रोकना संभव नहीं है।

बोर्ड प्रकीर्ण नियमावली के नियम 165के तहत स्पष्ट किया गया है कि ''कपट और बेइमानी,लगातार और जानबूझकर की जाने वाली उपेक्षा और नैतिक कलंक के सभी अपराधें का समुचित दंड ''बरखास्तगी'' है।

अतः सभी तथ्यों पर सम्यक विचारोपरांत श्री उमाशंकर प्रसाद,सहायक लेखापाल को कठोरतम दंड देने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता है।

अतः सम्यक्‌ विचारोंपरांत मैं संजय कुमार अग्रवाल,भा0प्र0 से0,जिला पदाध्किारी एवं समाहर्ता,जहानाबाद श्री उमाशंकर प्रसाद,सहायक लेखापाल ,जिला कोषागार ,जहानाबाद को बिहार सरकारी सेवक वर्गीकरण ;नियंत्राण एवं अपीलद्ध के नियमावली,2005 के नियम 14 ;X) के तहत बर्खास्त (DISMISS) करता हॅंॅू ।

श्री प्रसाद से संबध्ति पूर्ण विवरण निम्न प्रकार हैः-

नामः- श्री उमाशंकर प्रसाद

पिता का नामः-

पदनामः- सहायक लेखापाल ;जिला कोषागार कार्या0,ज0बादद्ध

जन्मतिथिः- 06-08-1951

नियुक्ति की तिथिः- 12-12-1973

वेतनमानः- 5000-150-8000

वर्तमान पताः- न्यु कॉंलनी डेल्हा, गया ।

स्थायी पताः- 129 ;बीद्ध राजेन्द्र पथ तेल बिगहा, पोस्ट आर.एस.गया ।

जिला पदाध्किारी,

जहानाबाद।

———— अधी.क, सिचवालय मुिणालय,

(cid:18)बहार, पटना (cid:26)ारा ूकािशत एवं मु2ित।

(cid:18)बहार गजट (असाधारण) 50-571+10-ड(cid:15)0ट(cid:15)0पी0।

Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 02 March 2009. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2009-03-02.50/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2009-03-02.50.