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(सुरेन्द्र प्रसाद शर्मा) सचिव, बिहार विधान सभा2 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 6 माच. 2009
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बिहार विशेष न्यायालय विधेयक, 2009
प्रस्तावना--अपराधों के कतिपय वर्ग के त्वरित विचारण के लिए तथा अन्तग्रस्त सम्पत्ति के अधिहरण (जब्ती) के लिए विशेष न्यायालयों के गठन हेतु उपबंध करने के लिए विधेयक ।
चूँंकि, बिहार राज्य में सार्वजनिक पदों को धारण करने वाले व्यक्तियों, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 2(ग) के अंतर्गत लोक सेवक भी हैं, में भ्रष्टाचार की व्याप्ति मानी जाती है ; और चूँकि, सरकार को यह विश्वास करने के पर्याप्त कारण है कि सार्वजनिक पदों को धारण कर चुके या धारण कर रहे व्यक्तियों की बड़ी संख्या जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 2(ग) के अर्थ अंतर्गत लोक सेवक भी हैं, अकूत सम्पत्ति भ्रष्ट माध्यमों से अर्जित कर ली है जो उनके आय के ज्ञात स्रोतों से असंगत है ; और चूँकि, ऐसे भ्रष्ट आचरण में संलिप्त व्यक्तियों को अभियोजित करना, उनके द्वारा अवैध ढंग से अर्जित आस्तियों को अधिहृत करना राज्य का दायित्व है ; और चूँकि, विशेष न्यायाधीशों के वर्त्तमान न्यायालयों से उन अभियोजनों के त्वरित समापन की युक्तियुक्त रूप से आशा नहीं की जा सकती और संसदीय लोकतंत्र तथा भारत के संविधान द्वारा या उसके अधीन सृजित संस्थानों के कुशल कार्य संचालन के लिए यह अनिवार्य है कि उपर्युक्त अपराधियों का विचारण भरसक शीघ्रता से की जाय ; और चूँकि, उक्त प्रयोजन के लिए यह आवश्यक है कि विशेष न्यायालयों की स्थापना ऐसे व्यक्तियों की अध्यक्षता में की जाय जो सत्र न्यायाधीश/अपर सत्र न्यायाधीश हों या रहे हों और यह भी समीचीन है कि कुछ प्रक्रियात्मक परिवर्तन किये जाएं जिससे कि जिन व्यक्तियोें का विचारण किया जाना है उनके दोषी होने या निर्दोष होने का अन्तिम अवधारण में, ऋजु विचारण के अधिकार में हस्तक्षेप किये बिना, परिहार्य विलंब को दूर किया जाय; भारत गणराज्य के साठवें वर्ष में बिहार राज्य विधान-मंडल द्वारा यह निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय-I प्रारंभिक।
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार एवं आरम्भ।-(1) यह अधिनियम बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009 कहा जा सकेगा।
(2) यह संपूर्ण बिहार राज्य में लागू होगा। (3) यह तुरत प्रवृत्त होगा।
2. परिभाषाएँ। -इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो :-
(क) ''अधिनियम'' से अभिप्रेत है, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 ; (ख) ''प्राधिकृत पदाधिकारी'' से अभिप्रेत है बिहार वरिष्ठ न्यायिक सेवा का ऐसा कोई सेवारत पदाधिकारी जो सत्र न्यायाधीश/अपर सत्र न्यायाधीश हो या रहा हो और जिसे धारा-13 के प्रयोजनार्थ उच्च न्यायालय की सहमति से राज्य सरकार द्वारा नाम निर्दिष्ट किया जाय ;
(ग) ''संहिता'' से अभिप्रेत है दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (2 of 1974) (घ) अपराध के संबंध में ''घोषणा'' से अभिप्रेत है ऐसे अपराध के संबंध में धारा-5 के अधीन की गई घोषणा ;
(ङ) ''अपराध'' से अभिप्रेत है आपराधिक अवचार का अपराध, जो अधिनियम की धारा-13(1)(ङ) के अधीन स्वतंत्र रूप से या अधिनियम (49 of 1988) के किसी अन्य उपबन्ध या भारतीय दण्ड संहिता के किसी उपबन्ध के साथ संयुक्त रूप से लागू किये जाने योग्य हो ;
(च) ''विशेष न्यायालय'' धारा-3 के अधीन स्थापित विशेष न्यायालय ; और (छ) इसमें प्रयुक्त किन्तु अपरिभाषित शब्दों एवं अभिव्यक्तियों से क्रमशः वही अभिप्रेत होंगे जो उनके लिए संहिता या अधिनियम में दिये गये हों। अध्याय-II विशेष न्यायालयों की स्थापना 3. विशेष न्यायालयों की स्थापना। -(1) अपराध के त्वरित विचारण के प्रयोजनार्थ राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, यथा यथेष्ट संख्या में न्यायालयों की स्थापना करेगी जिन्हें विशेष न्यायालय कहा जायगा। (2) विशेष न्यायालय की अध्यक्षता पटना उच्च न्यायालय की सहमति से राज्य सरकार द्वारा नाम निर्दिष्ट न्यायाधीश द्वारा की जायगी।
(3) ऐसा कोई भी व्यक्ति किसी विशेष न्यायालयों के न्यायाधीश के रूप में नाम निर्दिष्ट किए जाने के लिए अर्हित नही होगा जब तक कि वह बिहार वरिष्ठ न्यायिक सेवा का सदस्य न हो और जो राज्य में सत्र न्यायाधीश/अपर सत्र न्यायाधीश न हो या न रहा हो। 4. विशेष न्यायालयों द्वारा मामलों का संज्ञान।-विशेष न्यायालय ऐसे मामलों का संज्ञान लेगा और उनका विचारण करेगा जो उसके समक्ष संस्थित किया जाए या धारा-10 के अधीन उसे अंतरित किया जाए।3 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 6 माच. 2009 5. इस अधिनियम के अधीन विचार किये जाने वाले मामलों की घोषणा। -(1) यदि राज्य सरकार की राय में प्रथम दृष्टया साक्ष्य हो कि बिहार राज्य में लोक पद धारण करने वाले या धारण कर चुके किसी व्यक्ति, जो भ्रष्टाचार अधिनियम, 1988 की धारा-2(ग) के अर्थ के अन्तर्गत लोकसेवक हो, द्वारा अभिकथित अपराध किया गया हो तो राज्य सरकार ऐसे हरेक मामले में, जिसमें उसकी उपर्युक्त राय हो, उस आशय की घोषणा करेगी। (2) ऐसी घोषणा को किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जायगा।
6. घोषणा का प्रभाव। - (1) ऐसी घोषणा की जाने पर, संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध की बाबत कोई अभियोजन किसी विशेष न्यायालय में ही संस्थित किया जायगा।
(2) जहाँ धारा-5 के अधीन की गई घोषणा उस अपराध से सम्बद्ध हो जिसकी बाबत पहले ही अभियोजन संस्थित किया जा चुका हो तथा इससे संबंधित कार्यवाही इस अधिनियम के अधीन विषेष न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय में लंबित हो वहाँ इस अधिनियम के अनुसार, अपराध के विचारण के लिए ऐसी कार्यवाही, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन विशेष न्यायालय में अन्तरित हो जाएगी।
7. अपराधों के विचारण के संबंध में विशेष न्यायालयों की अधिकारिता। -विशेष न्यायालय को उस अपराध के किए जाने के लिए अभिकथित किसी व्यक्ति का विचारण करने की अधिकारिता होगी जिसकी बाबत धारा-5 के अधीन मुख्य आरोपी, दुष्प्रेरक या षड्यंत्रकर्त्ता के रूप में घोषणा की गई हो तथा उन सभी का उसके साथ संयुक्त रूप से विचारण संहिता के अनुसार एक ही विचारण में किया जा सकता है।
8. विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियाँ। -(1) ऐसे मामलों के विचारण में विशेष न्यायालय मजिस्टे्रट के समक्ष वारण्ट वाले मामलों के विचारण के लिए संहिता में विहित प्रक्रिया का पालन करेगा।
(2) इस अधिनियम में स्पष्टतः यथा उपबंधित के सिवाय, संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (49, 1988) के उपबंध, जहाँ तक वे इस अधिनियम के उपबंधों के असंगत न हों, विशेष न्यायालय की कार्यवाही पर लागू होंगे तथा उक्त उपबंधों के प्रयोजनार्थ विषेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन संचालित करने वाले व्यक्ति लोक अभियोजक माने जाएंगे।
(3) विशेष न्यायालय, उसके द्वारा किसी व्यक्ति को दोषसिद्ध ठहराए जाने पर, उसे उस अपराध, जिसके लिए ऐसा व्यक्ति दोषसिद्ध ठहराया गया हो, के लिए विधि द्वारा जो भी दंड प्राधिकृत हो उसका दण्डादेश पारित कर सकेगा।
9. विशेष न्यायालयों के आदेशों के विरूद्ध अपील।-(1) संहिता में किसी बात के होते हुए भी, विशेष न्यायालय के किसी निर्णय और दण्डादेश के विरूद्ध उच्च न्यायालय पटना में, तथ्यों एवं विधि दोनों आधार पर, अपील की जायगी।
(2) यथा उपर्युक्त के सिवाय, विशेष न्यायालय के किसी निर्णय, दण्डादेश या आदेश के विरूद्ध किसी न्यायालय में कोई अपील अथवा पुनरीक्षण संस्थित नहीं होगा।
(3) इस धारा के अधीन हरेक अपील विषेष न्यायालय के निर्णय और दण्डादेश की तारीख से तीस दिनों के भीतर की जाएगी परन्तु, उच्च न्यायालय उक्त तीस दिनों की समाप्ति के पश्चात् भी अपील स्वीकार कर सकेगा, यदि अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से उसका समाधान हो जाता हो कि अपीलार्थी को निर्धारित अवधि के भीतर अपील नहीं करने का पर्याप्त कारण था।
10. मामलों का अन्तरण। - इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के होते हुए भी, उच्च न्यायालय पटना, मामलों को एक विशेष न्यायालय से दूसरे विशेष न्यायालय में अन्तरित कर सकेगा।
11. किसी विचारण को स्थगित करने के लिए विशेष न्यायालय का आबद्ध नहीं होना। -(1) विशेष न्यायालय किसी विचारण को किसी प्रयोजन से तबतक स्थगित नहीं करेगा जब तक कि, उसकी राय में तथा अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से, न्याय के हित में ऐसा स्थगन आवश्यक न हो,
(2) विशेष न्यायालय मामले के विचारण को, यथास्थिति, इसके संस्थित किए जाने अथवा अंतरण की तारीख से एक वर्ष के भीतर निपटाने का प्रयास करेगा।
12. अपने पूर्ववर्ती द्वारा अभिलिखित साक्ष्य पर पीठासीन न्यायाधीश कार्रवाई कर सकेगा।-विशेष न्यायालय में पीठसीन होने के लिए धारा-3 के अधीन नियुक्त कोई न्यायाधीश अपने पूर्ववर्ती या पूर्ववर्तियों द्वारा अथवा अपने पूर्ववर्त्ती या पूर्ववर्त्तियों द्वारा आंशिक रूप से तथा आंषिक रूप से अपने द्वारा अभिलिखित साक्ष्य के आधार पर कार्रवाई कर सकेगा।
अध्याय III
संपत्ति का अधिहरण
13. अधिहरण के लिए आवेदन। -(1) जहाँ प्रथम द्रष्टया साक्ष्य के आधार पर राज्य सरकार को विश्वास करने का कारण हो कि लोक (सार्वजनिक) पद धारण कर चुके या धारण कर रहे किसी व्यक्ति ने अपराध किया है और वह लोक सेवक हो या रहा हो तो विशेष न्यायालय ने अपराध का संज्ञान लिया हो या ना लिया हो, राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन लोक अभियोजक को प्राधिकृत पदाधिकारी के समक्ष उस धन और अन्य संपत्ति, जो राज्य सरकार के विश्वास में उक्त व्यक्ति द्वारा अपराध के जरिए उपाप्त किया गया हो, के अधिहरण हेतु आवेदन करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी।4 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 6 माच. 2009 (2) उप धारा (1) के अधीन आवेदन-
(क) एक या अधिक शपथ पत्रों के साथ होगा, जिसमें उन आधारों का उल्लेख होगा जिन पर यह विश्वास किया गया हो कि उक्त व्यक्ति ने अपराध किया है तथा उस धन की रकम और अन्य संपत्ति का मूल्य, जिसके लिए यह विश्वास किया गया हो कि अपराध के माध्यम से उपाप्त किया गया है, और
(ख) ऐसे किसी धन एवं अन्य संपत्ति की तत्समय अवस्थिति के संबंध में उपलब्ध कोई सूचना भी अन्तर्विष्ट होगी तथा यदि आवश्यक हो तो, इस संदर्भ में सुसंगत समझी जाने वाली अन्य विशिष्टियां भी दी जाएंगी।
14. अधिहरण के लिए नोटिस। -(1) इस अधिनियम की धारा-13 के अधीन कोई आवेदन प्राप्त होने पर, प्राधिकृत पदाधिकारी नोटिस में यथाविनिर्दिष्ट समय, जो सामान्यतः तीस दिनों से कम की नहीं होगी, के अन्तर्गत आकर अपनी आय, उपार्जन या आस्तियों का वह स्रोत्, जिसके द्वारा या जिसके माध्यम से उसने ऐसा धन या संपत्ति अर्जित की है, जिस साक्ष्य पर वह निर्भर करता है तथा अन्य सुसंगत सूचना और विशिष्टियाँ देने और यह कारण बताने का कि क्यों नहीं ऐसा सारा या कोई धन या संपत्ति या दोनों अपराध के माध्यम से अर्जित किया जाना घोषित किया जाय, तथा क्यों नहीं उन्हें राज्य सरकार द्वारा अधिगृहित कर लिया जाय से संबंधित नोटिस उस व्यक्ति (इसमें इसके बाद प्रभावित व्यक्ति के रूप में निर्दिष्ट) को तामिल करेगा जिसके संबंध में आवेदन किया गया हो।
(2) जहाँ उप धारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को दी गई नोटिस में किसी धन या संपत्ति या दोनों को ऐसे व्यक्ति के निमित्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा धारण किये जाने का विनिदेश हो वहाँ नोटिस की प्रति ऐसे अन्य व्यक्ति को भी तामिल की जायगी।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, प्रभावित व्यक्ति या राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष अभिलिखित कराये गये साक्ष्य, सूचना और विशिष्टियाँ विशेष न्यायालय के समक्ष विचारण में खण्डन किये जाने योग्य होगा ;
परन्तु, ऐसा खण्डन इस अधिनियम के अधीन विषेष न्यायालय द्वारा अपराधी के दोष के अवधारण और न्याय निर्णयन के विचारण तक सीमित होगा।
15. कतिपय मामलों में संपत्ति का अधिहरण। - (1) धारा-14 के अधीन जारी कारण पृच्छा नोटिस के स्पष्टीकरण, यदि कोई हो, तथा उसके समक्ष उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद और प्रभावित व्यक्ति (तथा यदि प्रभावी व्यक्ति नोटिस में विनिर्दिष्ट कोई धन या सम्पत्ति किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से धारण करता हो तो ऐसा अन्य व्यक्ति को भी) सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर प्रदान करने के बाद, प्राधिकृत पदाधिकारी, आदेश द्वारा, अपना निष्कर्ष अभिलिखित करेगा कि क्या प्रश्नगत सभी या कोई अन्य धन या सम्पत्ति विधि विरुद्ध ढग से अर्जित की गई है।
(2) जहाँ प्राधिकृत पदाधिकारी यह विनिर्दिष्ट करता हो कि कारण-पृच्छा नोटिस में निर्दिष्ट धन या सम्पत्ति या दोनों अपराध के माध्यम से अर्जित किए गए हैं, किन्तु ऐसे धन या सम्पत्ति को विनिर्दिष्टतः चिन्हित करने में समर्थ न होता हो वहाँ प्राधिकृत पदाधिकारी द्धारा यह विनिर्दिष्ट करना विधि पूर्ण होगा कि, उसकी सर्वोत्तम विवेक बुद्धि के अनुसार, वह धन या सम्पत्ति या दोनों अपराध के माध्यम से अर्जित किए गए हैं और उपधारा (1) के अधीन तद्नुसार निष्कर्ष अभिलिखित करेगा।
(3) जहाँ, प्राधिकृत पदाधिकारी इस धारा के अधीन इस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करता हो कि कोई धन या सम्पत्ति या दोनों अपराध के माध्यम से अर्जित किया गया है वहाँ वह घोषित करेगा कि ऐसा धन या सम्पत्ति या दोनों, इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन, सभी ऋणभार से मुक्त राज्य सरकार को अधिहृत माने जायेंगे, परन्तु यदि अधिहृत संपत्ति का बाजार मूल्य प्राधिकृत पदाधिकारी के पास जमा कर दिया जाता हो तो संपत्ति का अधिग्रहण नहीं किया जायगा।
(4) जहाँ इस अधिनियम के अधीन, किसी कम्पनी का कोई शेयर राज्य सरकार को अधिहृत किया जाता हो वहाँ, कम्पनी अधिनियम, 1956(1 of 1956) में अथवा कम्पनी के संगम अनुच्छेदों में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, कम्पनी तुरत ऐसे शेयर का अंतरिती के रूप में राज्य सरकार को रजिस्टर में दर्ज करेगी।
(5) इस अध्याय के अधीन धन या संपत्ति या दोनों का अधिग्रहण (जब्ती) की हरेक कार्यवाही का निष्पादन धारा-14 की उपधारा (1) के अधीन नोटिस तामिल किये जाने की तारीख से छह माह की अवधि के अन्तर्गत कर दिया जायगा।
(6) इस धारा के अधीन पारित अधिहरण का आदेश, धारा-17 के अधीन अपील, यदि कोई हो, में पारित आदेश के अध्यधीन, अंतिम होगा और किसी विधि न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जायगा।
16. अन्तरण का अकृत और शून्य होना। -जहाँ, धारा-14 के अधीन, नोटिस जारी किये जाने के बाद, उक्त नोटिस में निर्दिष्ट किसी धन या संपत्ति या दोनों का किसी भी तरीके से अन्तरण किया जाता हो, वहाँ ऐसा अन्तरण, इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के प्रयोजनार्थ, शून्य होगा और यदि ऐसा धन या संपत्ति या दोनों धारा-15 के अधीन बाद में राज्य सरकार को अधिहृत किया जाता हो तो ऐसा धन या संपत्ति या दोनों का अन्तरण अकृत और शून्य माना जायगा।5 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 6 माच. 2009 17. अपील। - (1) इस अध्याय के अधीन प्राधिकृत पदाधिकारी के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति उस आदेश की तारीख से तीस दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में अपील कर सकेगा जिसके विरूद्ध अपील किया जाता हो।
(2) इस धारा के अधीन कोई अपील किए जाने पर उच्च न्यायालय ऐसे पक्षकारों को, जो वह उचित समझे, सुनवाई का अवसर प्रदान करने के पश्चात् यथोचित आदेश पारित कर सकेगा।
(3) उप धारा (1) के अधीन की गई कोई अपील किए जाने की तारीख से अधिमानतः छह माह की अवधि के भीतर निष्पादित कर दी जाएगी और यदि किसी अपील में कोई स्थगन आदेष पारित किया जाता हो तो अपील के निष्पादन की विहित अवधि के बाद वह लागू नहीं रह जाएगी।
18. कब्जा में लेने की शक्ति। -(1) जहाँ इस अधिनियम के अधीन, कोई धन या सम्पत्ति या दोनों राज्य सरकार को अधिहृत किया गया हो वहां सम्बद्ध प्राधिकृत पदाधिकारी प्रभावित व्यक्ति के साथ-साथ किसी अन्य व्यक्ति को, जिसके कब्जे में धन या सम्पत्ति या दोनों हो, आदेष देगा कि वह आदेष तामील किये जाने के तीस दिनाें के भीतर उसे संबद्ध प्राधिकृत पदाधिकारी को या इस निमित्त उसके द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति को अभ्यर्पित कर दे अथवा उसका कब्जा दे दे परन्तु, इस निमित्त आवेदन किए जाने पर तथा अपना समाधान कर लेने पर कि प्रभावित व्यक्ति प्रष्नगत सम्पत्ति में निवास कर रहा है, प्राधिकृत पदाधिकारी उसे उससे तत्काल बेकब्जा करने के बदले ऐसे व्यक्ति को विनिर्दिष्ट सीमित अवधि के लिए राज्य सरकार को बाजार दर पर किराया का भुगतान कर उसका कब्जा रखने की अनुमति दे सकेगा और उसके बाद वह व्यक्ति उस सम्पत्ति का कब्जा सौंप देगा।
(2) यदि कोई व्यक्ति, उपधारा-(1) के अधीन किए गए आदेष का पालन करना अस्वीकार करता हो या पालन करने में विफल रहता हो तो प्राधिकृत पदाधिकारी उस सम्पति को कब्जा में ले सकेगा और तत् प्रयोजनार्थ, यथावयक बल का प्रयोग कर सकेगा।
(3) उपधारा (2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकृत पदाधिकारी, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी धन या सम्पति या दोनों का कब्जा लेने के प्रयोजन से, सहायता केे लिए किसी पुलिस पदाधिकारी की सेवा की अध्यपेक्षा कर सकेगा और ऐसी अध्यपेक्षा का अनुपालन करना उस पदाधिकारी का अबद्धकारी कत्र्तव्य होगा। 19. अधिहृत (जब्त) धन और संपत्ति की वापसी। -जहाँ, धारा-15 के अधीन किए गये अधिहरण आदेष को अपील में उच्च न्यायालय द्वारा उपान्तरित या निष्प्रभावी कर दिया जाता हो या जहाँ प्रभावित व्यक्ति विषेष न्यायालय द्वारा दोषमुक्त कर दिया जाता हो, वहाँ धन या सम्पत्ति या दोनों प्रभावित व्यक्ति को वापस कर दिया जाएगा और यदि किसी कारण से सम्पत्ति वापस करना संभव न हो तो उस व्यक्ति को इस प्रकार अधिहृत, सम्पत्ति की कीमत के साथ-साथ अधिहरण की तारीख से पांच प्रतिषत की दर से परिगणित ब्याज सहित धन का भुगतान किया जाएगा।
अध्याय - IV
प्रकीर्ण
20. विवरण में गलती के लिए नोटिस या आदेश का अविधिमान्य नहीं होना। -इस अधिनियम के अधीन जारी या तामिल कोई नोटिस, की गई कोई घोषणा और पारित कोई आदेष, उसमें उल्लिखित सम्पत्ति या व्यक्ति के विवरण में किसी गलती के कारण अविधिमान्य नहीं माना जाएगा, यदि यथा उल्लिखित विवरण से ऐसी सम्पत्ति या व्यक्ति की पहचान करने योग्य हो।
21. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होना।- इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे न कि उसका अल्पीकरण करने वाला और इसमें अन्तर्विष्ट कोई भी बात किसी लोक सेवक को ऐसी किसी कार्यवाही से, जो उसके विरूद्ध इस अधिनियम के अलावा संस्थित की जा सकती हो, विवर्जित नहीं करेगी।
22. अन्य कार्यवाहियों का वर्जन। -धारा-9 और 17 में यथा उपबंधित के सिवाय तथा किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, धारा-15 के अधीन किसी धन या सम्पत्ति या दोनों को अधिहृत (जब्त) किए जाने के आदेष की बाबत किसी न्यायालय में कोई वाद या विधिक कार्यवाही चलाने योग्य नहीं होगी। 23. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई से संरक्षा। -इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए किसी व्यक्ति के विरूद्ध कोई वाद या कोई अभियोजन या कोई विधिक कार्यवाही नहीं होंगी।
24. नियम बनाने की शक्ति। - राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, यथावश्यक नियमावली, यदि कोई हो, बना सकेगी।
25. धारा-3 के अधीन अधिसूचनाओं को तथा धारा-5 के अधीन घोषनाओं को पटल पर रखना। -धारा-3 की उपधारा (1) के अधीन जारी हरेक अधिसूचना तथा धारा-5 की उपधारा (1) अधीन की गई हरेक घोषणा, जारी किए जाने या बनाये जाने के बाद, यथाशीघ्र, राज्य विधान मंडल के समक्ष रखी जायगी। 26. अध्यारोही प्रभाव। -भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और दंड विधि संशोधन अध्यादेश, 1944 अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी असंगता की स्थिति में इस अधिनियम के उपबंध अभिभावी होंगे।6 (cid:18)बहार गजट, (असाधारण)] 6 माच. 2009
उद्देश्य एवं हेतु
राज्य सरकार के पास इस प्रकार की सूचना है कि सार्वजनिक पदों को धारण कर चुके या धारण कर रहे व्यक्ति, जो भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा-2(ब) के अधीन लोक सेवक हैं, की बड़ी संख्या में आकूत संपत्ति भ्रष्ट माध्यमों से अर्जित कर ली है, जो उनके आय के ज्ञात श्रोतों से असंगत है। अभी इस प्रकार से अर्जित संपत्ति के राज्यसात् किये जाने के संबंध में कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। राज्य सरकार का मानना है कि ऐसी व्यवस्था की जा सके कि लोक सेवक भविष्य में अवैध माध्यमों से धनार्जन करने के लिये हतोत्साहित हों, जिससे भ्रष्टाचार से मुक्ति कार्यक्रम में सफलता मिले। राज्य सरकार यह भी चााहती है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-13(1)(ई) के अन्तर्गत स्वतंत्र रूप से अथवा अधिनियम के किसी उपबंध या भारतीय दंड संहिता के किसी उपबंध के साथ किये गये अपराधों का त्वरित विचारण हो और अपराधियों को एक समय-सीमा के अधीन दंडित किया जा सके। इसके लिये सरकार एक विधेयक लाना चाहती है जो भ्रष्टाचार से अर्जित अवैध संपत्ति को राज्यसात् करने तथा कतिपय विचारणों को त्वरित गति से निष्पादित करने में सहायक हो। उपर्युक्त प्रावधानों को शामिल करना ही इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य है, जिसे अधिनियमित कराना ही इस विधेयक का अभीष्ठ है।
(नीतीश कुमार) भार-साधक सदस्य। पटना, दिनांक-03 मार्च, 2009
सुरेन्द्र प्रसाद शर्मा, सचिव, बिहार विधान-सभा।
———— अधी/क, सिचवालय मुिणालय,