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बिहार भूमि न्यायाधिकरण विधेयक, 2009
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प्रस्तावना - बिहार भूमि न्यायाधिकरण के लिए प्रावधान करने हेतु विधेयक। चूँकि बिहार राज्य में विभिन्न न्यायालयों के समक्ष बड़ी संख्या में भूमि विवाद लम्बित हैं तथा भूमि से सम्बन्धित बड़ी संख्या में लम्बित विवादों के कारण व्यवहार न्यायालय सहित वर्त्तमान संयंत्र अत्यधिक बोझिल है; चूँकि भूमि पर अधिकार, स्वामित्व तथा दखल बिहार राज्य में प्रचलित विभिन्न भूमि विधियों के द्वारा विनियमित होता है; चूँकि विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए विभिन्न भूमि विधियों में विभिन्न न्यायालयों का प्रावधान किया गया है; चूँकि राज्य सरकार के सामने न्यायिक संयंत्र की बहुलता एवं विवादों के समाधान में विलम्ब से उत्पन्न संश्लिष्टताएँ आ रही हैं; चूँकि राज्य सरकार विभिन्न भूमि अधिनियमों के तहत विवादों का त्वरित निष्पादन सुनिश्चित कराने के लिए प्रयत्नशील है; चूँकि एक सामान्य न्यायनिर्णयन संकाय के अभाव में राज्य की जनता को अपनी शिकायतों के निराकरण में अकारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है; चूँकि बिहार भूमि सुधार (अधिकतम सीमा निर्धारण एवं अधिशेष भूमि अर्जन) अधिनियम, 1961 के अध्याय XIII में बिहार भूमि सुधार न्यायाधिकरण के गठन से सम्बन्धित प्रावधानों में वैसे संशोधन तथा क्षेत्राधिकार में वैसे विस्तार की आवश्यकता है, जैसा उपयुक्त समझा जाए; चूँकि भारत के संविधान ने अनुच्छेद 323 बी के तहत उपयुक्त विधानमंडल को खण्ड (2) में विनिर्दिष्ट सभी या किसी मामले से सम्बन्धित किसी विवाद, शिकायत या अपराध पर न्यायाधिकरणों के द्वारा न्यायनिर्णय या विचारण का विधि द्वारा प्रावधान करने का क्षेत्राधिकार सौंपा है; चूँकि व्यापक सार्वजनिक हित में तथा राज्य की जनता के हित में, यह आवश्यक समझा जाता है कि बिहार राज्य में भूमि से सम्बन्धित सभी विवादों के न्यायनिर्णय का एक समेकित न्यायिक मंच सृजित किया जाय; चूँकि विवादों के न्यायनिर्णय के लिए एक सामान्य तथा एकरूप मंच का प्रावधान करने के दृष्टिकोण से सोपान श्रृंखला के उच्चतम स्तर पर एक न्यायाधिकरण का सृजन आवश्यक है; भारत गणराज्य के साठवें वर्ष में बिहार राज्य विधानमंडल द्वारा निम्न लिखित रूप में यह अधिनियमित होः- 1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ ।- (1) यह अधिनियम बिहार भूमि न्यायाधिकरण अधिनियम, 2009 कहा जा सकेगा। (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण बिहार राज्य में होगा। (3) यह उस तिथि से प्रवृत्त होगा जो सरकार अधिसूचना द्वारा नियत करे। 2. परिभाषाएं ।- इस अधिनियम में, जबतक प्रसंगवश अन्यथा आवश्यक न हो, धारा- 9 (1) में सन्दर्भित अधिनियमों/हस्तकों में उपबन्धित परिभाषाएं लागू रहेंगी। ़ 3. विशेष परिभाषाएं ।- इस अधिनियम में, जबतक प्रसंगवश अन्यथा आवश्यक न हो :- (क) "अध्यक्ष" से अभिप्रेत है बिहार भूमि न्यायाधिकरण के अध्यक्ष। (ख) "सदस्य" से अभिप्रेत है बिहार भूमि न्यायाधिकरण के सदस्य। (ग) ''न्यायाधिकरण'' से अभिप्रेत है इस अधिनियम की धारा-4 के तहत गठित न्यायाधिकरण। 4. बिहार भूमि न्यायाधिकरण का गठन ।- (1) सरकारी राजपत्र में अधिसूचना के द्वारा, राज्य सरकार राज्य के लिए, इस अधिनियम के प्रयोजनों से, बिहार भूमि न्यायाधिकरण (जिसे एतद् अनन्तर न्यायाधिकरण कहकर सन्दर्भित किया जाएगा) के नाम से एक न्यायाधिकरण गठित करेगी। (2) न्यायाधिकरण में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक अध्यक्ष एवं अन्य सदस्य होंगे जिनकी संख्या चार से अधिक नहीं होगी :
परन्तु राज्य सरकार सरकारी राजपत्र में अधिसूचना द्वारा न्यायाधिकरण के कुल सदस्यों की संख्या कम या ज्यादा कर सकती है। 5. अध्यक्ष अथवा अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए अर्हताएं ।- (1) कोई व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक योग्य नहीं होगा जब तक वह किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नहीं हो, या नहीं रह चुका हो, या उसके लिए योग्य नहीं हो, या उसने लगातार कम से कम बीस वर्षों तक अधिवक्ता के रूप में वकालत नहीं की हो। (2) कोई व्यक्ति न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक योग्य नहीं होगा जब तक वह; (क) जिला न्यायाधीश नहीं हो, या नहीं रह चुका हो तथा समकक्ष पद को कम से कम तीन वर्षो तक धारित नहीं किया हो; या उसने लगातार कम से कम पन्द्रह वर्षों तक अधिवक्ता के रूप में वकालत नहीं की हो, या
(ख) किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के योग्य नहीं हो ।3 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 12 अगःत 2009 (3) कोई व्यक्ति प्रशासनिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक योग्य नहीं होगा जब तक उसने या तो (क) अथवा (ख) में कुल मिलाकर कम से कम एक वर्ष की अवधि के लिएः-
(क) सदस्य/अपर सदस्य, राजस्व पर्षद, बिहार का पद धारित नहीं किया हो, या (ख) बिहार सरकार के प्रधान सचिव/सचिव के अन्यून पद धारित नहीं किया हो तथा बिहार सरकार में अपने सेवा काल में अपीलीय/रिवीजनल न्यायिक हैसियत में भूमि सुधार मामलों का निष्पादन नहीं किया हो।
(4) अध्यक्ष या किसी सदस्य के पद में हुई कोई रिक्ति सरकार के द्वारा इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप भरी जाएगी।
6. अध्यक्ष तथा सदस्यों की सेवा शर्तें ।- (1) कोई ऐसा व्यक्ति जिसने 70 वर्षों की आयु प्राप्त कर ली है अध्यक्ष या सदस्य के पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है, अथवा कार्यरत नहीं रह सकता है। अध्यक्ष तथा किसी सदस्य का कार्यकाल पाँच साल या उनकी 70 वर्षों की आयु, जो भी पहले हो, होगा। (2) अध्यक्ष तथा सदस्यों को यथाविहित वेतन तथा भत्तों का भुगतान किया जा सकेगा। (3) अध्यक्ष तथा सदस्यों की अन्य सेवा शर्तें यथा विहित रहेंगी। 7. पदत्याग एवं हटाया जाना ।- (1) अध्यक्ष या अन्य सदस्य, राज्य सरकार को सम्बोधित स्वलिखित लिखित सूचना के द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है : परन्तु, अध्यक्ष या सदस्य, जब तक उसको राज्य सरकार द्वारा पहले पदत्याग करने की अनुमति नहीं दी जाए, ऐसी सूचना प्राप्ति के तीन माह व्यतीत होने तक पद पर बना रहेगा या जब तक उसके उत्तराधिकारी के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति उसका पद धारित करता है, या उसकी पदावधि जब तक रहे, जो भी पहले हो।
(2) अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के द्वारा जाँच, जिसमें ऐसे अध्यक्ष या अन्य सदस्य को आरोपों की सूचना दे दी गयी थी और सुनवाई का समुचित अवसर दिया गया था, के बाद सिद्ध दुव्र्यवहार या अक्षमता के आधार पर राज्य सरकार के आदेश के बिना, अपने पद से हटाया नहीं जा सकेगा।
(3) राज्य सरकार उप-धारा (2) में संदर्भित अध्यक्ष या अन्य सदस्य के दुव्र्यवहार या अक्षमता की जाँच की प्रक्रिया को नियमों/अनुदेशों के द्वारा विनियमित कर सकेगी।
8. न्यायाधिकरण का सेविवर्ग ।- (1) राज्य सरकार न्यायाधिकरण के कार्यो के निष्पादन में सहायता देने के लिए आवश्यक पदाधिकारियों और अन्य कर्मियों की प्रकृति और श्रेणियों को निर्धारित कर सकेगी तथा जैसा वह उचित समझे ऐसे पदाधिकारी और अन्य कर्मी न्यायाधिकरण को उपलब्ध कराएगी।
(2) न्यायाधिकरण के पदाधिकारी तथा अन्य कर्मी अध्यक्ष के सामान्य अधीक्षण के अन्तर्गत अपने कार्यो का निर्वाह करेंगे।
(3) न्यायाधिकरण के पदाधिकारियों तथा अन्य कर्मियों के वेतन, भत्ते तथा सेवा की शर्त्तें वैसी होंगी जैसा राज्य सरकार द्वारा निर्मित नियमों में विनिर्दिष्ट किया जा सके।
9. न्यायाधिकरण की शक्तियाँ ।- (1) न्यायाधिकरण को निम्नांकित अधिनियमों/हस्तकों के सम्बन्ध में उचित अधिकारियों द्वारा पारित अन्तिम आदेश के विरूद्ध, ऐसा आदेश पारित होने के 90 दिनों के अन्दर, आवेदन प्राप्त करने की शक्ति होगी :
(i) बिहार भूमि सुधार (अधिकतम सीमा निर्धारण एवं अधिशेष भूमि अर्जन) अधिनियम, 1961 (ii) बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (iii) बिहार काश्तकारी अधिनियम, 1885 (iv) बिहार जोतों की चकबन्दी एवं विखंडन निवारण अधिनियम, 1956 (v) बिहार अभिधारी होल्डिंग (अभिलेखों का अनुरक्षण) अधिनियम, 1973 (vi) बिहार भूदान यज्ञ अधिनियम, 1954 (vii) बिहार प्रिविलेज्ड पर्सन्स होमस्टेड टिनेन्सी एक्ट, 1947 (viii) बिहार गर्वेनमेंट इस्टेट्स हस्तक, 1953 (ix) बिहार बन्दोबस्त हस्तक
राज्य सरकार यथा उपर्युक्त सूची में अथवा सूची से किसी भी अधिनियम को जोड़ या हटा सकेगी। (2) इसके अतिरिक्त, न्यायाधिकरण बिहार सरकार अथवा, पटना उच्च न्यायालय के स्तर से स्थानान्तरित किसी अन्य प्रचलित राजस्व या भूमि सुधार अधिनियम/हस्तक से सम्बन्धित वाद का न्यायनिर्णयन भी कर सकेगा।
(3) न्यायाधिकरण में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का अधिनियम v) के तहत अवमानना के लिए दण्डन की अनुशंसा सहित व्यवहार न्यायालय की शक्तियाँ विहित होंगी।
10. न्यायाधिकरण की प्रक्रिया ।- (1) इस अधिनियम के प्रावधानों या इसके तहत बने नियमों के अध्यधीन, न्यायाधिकरण, आदेश के द्वारा, अपनी कार्यपद्धति तथा प्रक्रिया को नियमित कर सकेगा।4 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 12 अगःत 2009 (2) न्यायाधिकरण के कृत्यों का निष्पादन :- (i) अध्यक्ष तथा न्यायिक तथा प्रशासनिक सदस्य की पीठ के द्वारा, या (ii) अध्यक्ष द्वारा गठित न्यायिक तथा प्रशासनिक सदस्य की पीठ के द्वारा, या (iii) ऐसे मामले, जहाँ अध्यक्ष उचित समझे, अध्यक्ष द्वारा नामित एकल सदस्य, के द्वारा; किया जाएगा।
स्पष्टीकरण ।- खंड (iii) में सन्दर्भित एकल सदस्य या तो अध्यक्ष या कोई और सदस्य हो सकते हैं : परन्तु यदि किसी एकल सदस्य (जो अध्यक्ष नहीं हैं) या किसी पीठ (जिसमें अध्यक्ष सदस्य नहीं हैं), के समक्ष विचाराधीन, ऐसे किसी मामले में जिसमें विधि का प्रश्न निहित है, तब ऐसा एकल सदस्य या पीठ अपने स्वविवेक से एक ऐसी पीठ जिसके सदस्य अध्यक्ष होंगे के द्वारा विचारण के लिए वैसे मामले को सुरक्षित कर सकेगा। (3)(क) जहाँ किसी आवेदन की सुनवाई अध्यक्ष तथा दो अन्य सदस्यों की पीठ के द्वारा की गयी हो तथा किसी विन्दु पर सदस्यों के विचार भिन्न-भिन्न हों, तब उक्त विन्दु को बहुमत विचार के अनुसार निर्णीत किया जाएगा।
(ख) यदि किसी आवेदन की सुनवाई दो सदस्यों की एक पीठ के द्वारा की गई हो तथा किसी विन्दु पर अपनी धारणा में सदस्य विभाजित हों, वह विन्दु निर्णय हेतु अध्यक्ष को सन्दर्भित किया जायेगा जो या तो स्वयं सुनवाई एवं न्यायनिर्णय कर सकेगा या किसी अन्य सदस्य को सुनवाई एवं न्यायनिर्णय के लिए प्रदत्त करेगा एवं ऐसे न्यायनिर्णय पर अध्यक्ष या सदस्य, जिसे अध्यक्ष ने वह विन्दु प्रदत्त किया है, का विचार, उस मूल आदेश में, जिसमें धारणा का मतान्तर उठा है, बहुमत विचार बनेगा। 11. न्यायाधिकरण के आदेश के पुनर्विलोकन की शक्ति ।- न्यायाधिकरण को अपने आदेश में कोेई शुद्धि करने की शक्ति और क्षेत्राधिकार रहेगा : परन्तु न्यायाधिकरण को अपने आदेश के पुनर्विलोकन या पुनर्विचारण का तथा नया आदेश पारित करने की शक्ति नहीं रहेगी। 12. न्यायाधिकरण के आदेशों के उल्लंघन के लिए शास्ति ।- कोई व्यक्ति न्यायाधिकरण द्वारा निर्गत या दिए गए सम्मन, बाध्यता, निदेश या आदेश का अनुपालन करने में जानबूझकर विफल रहता है, तो वह 6 माह तक विस्तारित कारावधि या 5,000/-(पाँच हजार) रूपए तक के अर्थदंड या दोनों स,े दण्डनीय होगा। 13. संज्ञान तथा अपराधों की सुनवाई ।- (1) न्यायाधिकरण के द्वारा एतदर्थ प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा दर्ज शिकायत के अभाव में कोई भी न्यायालय धारा - 12 में दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा। (2) प्रथम श्रेणी का न्यायिक दण्डाधिकारी इस धारा के तहत अपराधों की सुनवाई करेगा। 14. अभिलेख मँगाने की न्यायाधिकरण की शक्ति ।- (1) न्यायाधिकरण, स्वतः या आवेदन पत्र मिलने पर, इस अधिनियम से सम्बन्धित अधिनियमों/हस्तकों में विहित मूल, अपीलीय या रिवीजनल प्राधिकार द्वारा निष्पादित किसी कार्यवाही के अभिलेख को मँगा सकेगा तथ उसे ऐसी कार्यवाही की नियमितता या उसमें लिए गए किसी निर्णय या पारित किसी आदेश की परिशुद्धता, वैधता या औचित्य की जांच कर सकेगा एवं यदि न्यायाधिकरण को ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा कोई निर्णय या आदेश संशोधित या निरस्त होना चाहिए या पुनर्विचारण के लिए सुरक्षित या प्रत्यावर्तित कर दिया जाना चाहिए, वह तदनुसार आदेश पारित कर सकेगा :
परन्तु न्यायाधिकरण अपने स्वतः पे्ररणा के क्षेत्राधिकार का प्रयोग आदेश के तीन वर्षों के बाद की अवधि में नहीं करेगाः परन्तु किसी क्षुब्ध पक्ष के द्वारा दायर आवेदन पत्र पर उपधारा (1) के तहत न्यायाधिकरण के क्षेत्राधिकार का प्रयोग तभी उपलब्ध रहेगा जब ऐसा आवेदन आदेश की अभिप्रमाणित प्रति प्राप्त करने के समय को छोड़कर, आदेश की तिथि से 90 दिनों के अन्दर दायर किया गया हो : परन्तु, यह भी कि न्यायाधिकरण विहित अवधि व्यतीत हो जाने पर भी किसी आवेदन को प्रविष्ट कर सकेगा, यदि वह सन्तुष्ट हो कि सम्बन्धित पक्षकार के द्वारा विहित अवधि में उसे दायर न कर सकने का पर्याप्त कारण है।
(2) उपधारा (1) के तहत किसी व्यक्ति के हितों के विरूद्ध कोई आदेश तब तक पारित नहीं किया जा सकेगा, जबतक उसे सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया हो।
15. पटना उच्च न्यायालय/राज्य सरकार में लम्बित कार्यवाहियों का न्यायाधिकरण में स्थानान्तरण ।- इस अधिनियम की धारा-9 में उल्लिखित अधिनियमों/हस्तकों से सम्बन्धित सारे वाद, जो पटना उच्च न्यायालय में विचाराधीन हों परन्तु जिनमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 तथा 227 के तहत दायर रिट याचिकाएँ शामिल नहीं हों, तथा राज्य सरकार के समक्ष लम्बित वाद जो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पूर्व से, ऐसा मानते हुए कि वे इस न्यायाधिकरण के क्षेत्राधिकार में हो सकते थे, तथा ऐसे वाद जो यह अधिनियम प्रवृत्त होने के बाद इसी न्यायाधिकरण के क्षेत्राधिकार में होते, यथोक्त प्रवृत्त होने की तिथि से, न्यायाधिकरण में स्थानान्तरित हो जाएंगे।5 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 12 अगःत 2009 परन्तु यह भी कि अपने समक्ष किसी रिट कार्यवाही में न्यायनिर्णय के लिए लम्बित विवाद को न्यायाधिकरण के न्यायनिर्णय के लिए अन्तरित करने के लिए पटना उच्च न्यायालय स्वतन्त्र रहेगा।
16. अधिनियम का अन्य विधियों पर अभिभावी होना ।- इस अधिनियम के प्रावधान, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि या परम्परा या प्रचलन, जिन्हें विधि की अनुशक्ति हो, संविदा या किसी न्यायालय या किसी अन्य प्राधिकार के निर्णय, आज्ञप्ति या आदेश में, इन प्रावधानों से अननुकूल कुछ भी होने के बावजूद, अभिभावी होंगे।
17. निदेश देने की शक्ति ।- राज्य सरकार इस अधिनियम को प्रभावी करने के प्रयोजन से सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी, प्राधिकार या व्यक्ति को यथोचित निदेश निर्गत करने में सक्षम होगी।
18. अधिकारिता का वर्जन ।-इस अधिनियम में जहाँ स्पष्टतया अन्यथा उपबन्धित न हो, पटना उच्च न्यायालय तथा भारत के उच्चतम न्यायालय को छोड़कर कोई भी न्यायालय इस अधिनियम या इसके अध्यधीन निर्मित नियमों के तहत किसी प्राधिकार द्वारा पारित किसी आदेश या लिए गए निर्णय को निरस्त, संशोधित या उसकी वैधता को प्रश्नगत करने वाले या न्यायाधिकरण के दायरे में पड़ने वाले किसी मामले से सम्बन्धित किसी वाद या कार्यवाही पर विचारण नहीं करेगा।
19. सद्भाव से किए गए कार्यों का संरक्षण ।- इस अधिनियम के तहत या इसके अध्यधीन निर्मित नियमों के तहत सद्भावना पूर्वक किए गए या किए जाने के लिए अभीप्सित किसी बात के लिए किसी व्यक्ति के विरूद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य कानूनी कार्यवाहियाँ दायर नहीं की जाऐगी।
20. कठिनाइयाँ दूर करने की शक्ति ।- यदि इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो राज्य सरकार बिहार राजपत्र में आदेश के द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों और प्रावधानों के अननुकूल, यथोक्त कठिनाई को दूर करने लिए आवश्यक तथा उपयुक्त प्रतीत होने वाले प्रावधान कर सकेगी। 21. नियमावली निर्मित करने की शक्ति ।- इस अधिनियम के सभी प्रयोजनों या किसी प्रयोजन को क्रियान्वित करने के लिए सरकार अधिसूचना के द्वारा नियमावली निर्मित कर सकेगी।
22. निरसन ।- इस अधिनियम के प्रावधानों के आलोक में बिहार भूमि सुधार (अधिकतम सीमा निर्धारण एवं अधिशेष भूमि अर्जन) अधिनियम, 1961 अध्याय-xiii के सम्बन्धित प्रावधानों को एतद् द्वारा निरसित किया जाता है।6 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 12 अगःत 2009
वित्तीय संंलेख
बिहार राज्य में बड़ी संख्या में भूमि विवाद लंबित हैं, जिसके कारण व्यवहार न्यायालय सहित वर्त्तमान न्यायिक संयंत्र अत्यधिक बोझिल है। राज्य सरकार विभिन्न भूमि अधिनियमों के तहत विवादों का त्वरित निष्पादन सुनिश्चित कराने के लिए प्रयत्नशील है। व्यापक सार्वजनिक हित में यह आवश्यक समझा जाता है कि बिहार भूमि न्यायाधिकरण अधिनियम पारित होने से बिहार राज्य में भूमि से संबंधित सभी विवादों के न्यायानिर्णयन का एक समेकित न्यायिक मंच सृजित होगा।
उपर्युक्त प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए यह विधेयक प्रस्तुत किया गया है। विधेयक प्रारूप के संलेख में वित्त विभाग की सहमति प्राप्त है।
(नरेन्द्र नारायण यादव)
भार साधक सदस्य7 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 12 अगःत 2009
उद्देश्य एवं हेतु
भूमि पर अधिकार, स्वामित्व तथा दखल बिहार राज्य में प्रचलित विभिन्न भूमि अधिनियमों के द्वारा विनियमित होता है। विवादों के न्यायनिर्णय के लिए विभिन्न भूमि अधिनियमों मेंं विभिन्न न्यायालयों का प्रावधान किया गया है। राज्य सरकार के सामने न्यायिक संयंत्र की बहुलता एवं विवादों के समाधान में विलम्ब से उत्पन्न संश्लिष्टताएँ आ रही हैं। एक सामान्य न्यायनिर्णयन संकाय के अभाव में राज्य की जनता को अपनी शिकायतों के निवारण में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
भूमि विवादों के न्यायनिर्णयों के लिए एक सामान्य तथा एकरूप मंच का प्रावधान करने के दृष्टिकोण से बिहार भूमि न्यायाधिकरण विधेयक, 2009 को अधिनियमित कराने का प्रस्ताव है ताकि भूमि विवादों का त्वरित समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
उपर्युक्त के लिए प्रावधानों को उपबंधित करना ही इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य है तथा इन्हें अधिनियमित कराना ही इस विधेयक का मुख्य अभीष्ठ है।
(नरेन्द्र नारायण यादव)
भार साधक सदस्य
सुरेन्द्र प्रसाद शर्मा, पटनाः
दिनांक 28 जुलाई, 2009
सचिव,
बिहार विधान-सभा।
———— अधी*क, सिचवालय मुिणालय,