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=2 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 4 जनवर(cid:15) 2010 [Ñç∫ä∫Ñç∫CNS]OMMV⁄ बिहार भूमि विवाद निराकरण विधेयक, 2009 प्रस्तावनाः-चूँकि, बिहार राज्य में स्वत्वाधिकार अभिलेखों, चौहद्दी, राजस्व अभिलेखों की प्रविष्टियों, रैयती भूमि के गैर-कानूनी दखल तथा सार्वजनिक भूमि के आंवटियों की जबरन बेदखली से समस्याएँ उद्भूत होती हैं और इससे सही आवंटी/बंदोबस्त-धारियों, रैयतों या दखलकारों को अनावश्यक परेशानी होती है ; चूँकि, रैयतों या आवंटियों की विभिन्न श्रेणियों के पक्ष में आवंटित लोक भूमि से सम्बन्धित विवाद अनावश्यक रूप से व्यवहार न्यायालयों तथा माननीय उच्च न्यायालय का अधिकांश कार्य क्षेत्र आच्छादित कर रहे हैं और जिनका अन्यथा निराकरण राजस्व प्राधिकारियों, जो क्षेत्रीय कार्यालयों में लगातार पदस्थापन तथा राजस्व प्रशासन में अपनी विशेषज्ञता की पृष्ठभूमि में, के द्वारा किया जाना चाहिए था। चूँकि, वृहत्तर सार्वजनिक हित में यह आवश्यक समझा जाता है कि ऐसे विवादों, जो तत्काल एवं प्रभावशाली ढंग से हल न होने की स्थिति में बड़े उथल-पुथल को जन्म देते हैं, के निराकरण के लिए प्रभावशाली तथा द्रुतगामी संयंत्र का प्रावधान किया जाए ; और, चूँकि, विवादों की प्रकृति से सम्बन्धित तथ्यों के विश्लेषण में ऐसा पाया गया है कि वे ज्यादातर स्वत्वाधिकार अभिलेखों से सम्बद्ध मामलों, जमाबन्दी के विभाजन, आवंटियों/रैयतों की जबरन बेदखली, सीमा-विवादों इत्यादि से सम्बन्धित है तथा इस प्रसंग में निम्नांकित अधिनियमों का प्रशासन समाविष्ट है : (1) बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950, (2) बिहार काश्तकारी अधिनियम, 1885, (3) बिहार प्रश्रय-प्राप्त व्यक्ति वासगीत काश्तकारी अधिनियम, 1947, (4) बिहार भूदान यज्ञ अधिनियम, 1954, (5) बिहार भूमि सुधार (अधिकतम सीमा निर्धारण एवं अधिशेष भूमि अर्जन) अधिनियम, 1961, (6) बिहार जोत समेकन एवं खण्डकरण निवारण अधिनियम, 1956, और, चूँकि, उपर्युक्त अधिनियमों के तहत विवादों के निराकरण के लिए विभिन्न मंच तथा प्रक्रियाएं उपबन्धित की गयी हैं तथा यह आवश्यक महसूस किया जा रहा है कि एक एकरूप तथा सामान्य मंच, प्रक्रिया एवं संयत्र का प्रावधान किया जाए जो विवादों के प्रभावशाली एवं दु्रत निराकरण के लक्ष्य को प्राप्त करेगा ; भारत गणराज्य के साठवें वर्ष में बिहार राज्य विधान मंडल द्वारा निम्नरूप में यह अधिनियमित हो :
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार एवं प्रारम्भ ।- (1) यह अधिनियम बिहार भूमि विवाद निराकरण अधिनियम, 2009 कहा जा सकेगा। (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण बिहार राज्य में होगा। (3) यह अधिनियम सरकार के द्वारा बिहार राजपत्र में यथा अधिसूचित तिथि से प्रवृत्त होगा। 2. परिभाषाएँ ।-इस अधिनियम में जबतक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न होः (क) "सक्षम प्राधिकार" से अभिप्रेत है उप-समाहर्त्ता, भूमि सुधार या अन्य कोई पदाधिकारी, जिसे अनुमंडल में उप-समाहर्त्ता, भूमि सुधार के कृत्यों तथा कर्त्तव्यों के निर्वहण का दायित्व दिया गया हो, सक्षम प्राधिकार होगा। (ख) ''समाहर्त्ता'' से अभिप्रेत है सम्बन्धित जिला के समाहर्त्ता। (ग) ''आयुक्त'' से अभिप्रेत है सम्बन्धित प्रमंडल के आयुक्त। (घ) "भूमि" से अभिप्रेत है सरकारी भूमि, रैयती भूमि, उस पर निर्मित संरचना यदि कोई हो। (ङ) ''आवंटित भूमि'' या ''बन्दोबस्त भूमि'' से अभिप्रेत ऐसी भूमि से है जो आवंटित या बन्दोबस्त की जाती है या जिसमें इस अधिनियम की अनुसूची-1 में वर्णित अधिनियमों के तहत रैयती अधिकार समाहित हो गए हों। (च) "आवंटी या बंदोबस्ती-धारी" से अभिप्रेत ऐसा व्यक्ति है जिसके साथ सक्षम प्राधिकार के द्वारा भूमि की बन्दोबस्ती की गयी है अथवा ऐसा व्यक्ति जिसने इस अधिनियम की अनुसूची-I में शामिल किसी अधिनियम में भूमि पर रैयती अधिकार प्राप्त कर लिया है। (छ) ''रैयत'' से अभिप्रेत है बिहार काश्तकारी अधिनियम, 1885 के प्रावधान के तहत परिभाषित रैयत। (ज) ''सरकार'' से अभिप्रेत है बिहार सरकार। (झ) इस अधिनियम में अपरिभाषित "शब्द या अभिव्यक्तियों" का वही अर्थ होगा जो इस अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल सम्बन्धित अधिनियमों में इन्हें दिया जाएगा। 3. इस अधिनियम के विहित प्रक्रिया का अध्यारोही-प्रभाव होना।-निम्नलिखित अधिनियमों, यथा- (i) बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950, (ii) बिहार काश्तकारी अधिनियम, 1885, (iii) बिहार प्रश्रय प्राप्त व्यक्ति वासगीत काश्तकारी अधिनियम, 1947, (iv) बिहार भूदान यज्ञ अधिनियम, 1954, (v) बिहार भूमि सुधार (अधिकतम सीमा निर्धारण एवं अधिशेष भूमि अर्जन) अधिनियम, 1961, (vi) बिहार जोत समेकन एवं खण्डकरण निवारण अधिनियम, 1956,3 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 4 जनवर(cid:15) 2010 में किसी बात के होते हुये भी इस अधिनियम में इसके अनन्तर विहित प्रक्रिया उपर्युक्त अधिनियमों के तहत उठनेवाले किसी विवाद के निराकरण में लागू होगी, चूँकि, इस अधिनियम में ऐसे विवादों को समाहित किया गया है और उनके समाधान के लिए मंच, प्रक्रिया तथा संयंत्र का प्रावधान किया है। 4. विवाद निराकरण हेतु क्षेत्राधिकार तथा प्राधिकार ।-(1) सक्षम प्राधिकार को किसी आवेदन या शिकायत पर अथवा किसी विहित प्राधिकार या पदाधिकारी द्वारा संदर्भित आवेदन पर अधोलिखित प्रकार के विवादों से उद्भूत किसी मुद्दे की सुनवाई तथा न्याय निर्णय करने का क्षेत्राधिकार तथा प्राधिकार होगा :- (क) इस अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल किसी अधिनियम के तहत किसी के साथ सक्षम प्राधिकार के द्वारा बन्दोबस्ती के दस्तावेज या पर्चा निर्गत के द्वारा बन्दोबस्त या आवंटित किसी भूमि या उसके अंश से किसी बन्दोबस्तीधारी या आवंटी की अनधिकृत तथा गैर-कानूनी बेदखली ; (ख) अनधिकृत तथा गैर-कानूनी बेदखली के न्याय निर्णय के उपरान्त विधितः सुयोग्य बन्दोबस्तीधारी या आवंटी के पक्ष में बंदोबस्त/आवंटित भूमि का दखल पुनः स्थापित करना ; (ग) किसी विधितः सुयोग्य बन्दोबस्तीधारी/आवंटी की आशंकित बेदखली ; (घ) रैयती भूमि से सम्बन्धित उपर्युक्त (क), (ख) तथा (ग) में उल्लिखित मामलों में कोई; (ङ) भू-खण्ड का विभाजन ; (च) मानचित्र/सर्वे मानचित्र सहित स्वत्वाधिकार अभिलेख में की गयी प्रविष्टि में संशोधन; (छ) किसी व्यक्ति के अधिकारों का प्रख्यापन; (ज) सीमा-विवाद; (झ) अनधिकृत संरचना निर्माण; तथा () सक्षम प्राधिकार में न्यायिक विचाराधीनता के दौरान अन्तरण।
(2) सक्षम प्राधिकार को अनुसूची-1 में शामिल किसी अधिनियम के तहत अन्तिम रूप से समाप्त एवं न्यायनिर्णीत कार्यवाही के पुनर्विलोकन या फिर से प्रारम्भ करने का क्षेत्राधिकार नहीं होगा। सक्षम प्राधिकार, अपने सामने लाए गए विवादों के निराकरण के लिए इस अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल अधिनियमों में अन्तिम आदेश पारित करने में सक्षम प्राधिकारों द्वारा पारित आदेश के आधार पर अपने अधिकारों का प्रयोग करेगा। (3) सक्षम प्राधिकार को आवंटी/बन्दोबस्तधारी या किसी रैयत के किन्हीं नए अधिकारों, जो अबतक निर्धारित नहीं हुए है तथा जिन्हें अनुसूची-1 में शामिल किसी अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित होना आवश्यक होता है, का न्याय निर्णय करने का अधिकार नहीं होगा।
परन्तु जहाँ आवंटी, बन्दोबस्तीधारी या रैयत के अधिकार अनुसूची-1 में शामिल अधिनियमों में किसी में पूर्व से निर्धारित हैं, सक्षम प्राधिकार को उप-धारा (1) में उल्लिखित मामलों से सम्बन्धित वादों को सुनने का क्षेत्राधिकार होगा।
(4) यथा उपर्युक्त उप-धारा (2) तथा (3) में किसी बात के होते हुए भी यदि अनुसूची-1 में शामिल अधिनियमों में से किसी में आवंटी/बन्दोबस्ती-धारी या रैयत के अधिकारों के निर्धारण का कोई प्रावधान नहीं किया गया है तथा दावा किये गये अधिकार को अब भी निर्धारित किया जाना है, सक्षम प्राधिकार ऐसे अधिकार को अन्तिम रूप से निर्धारित कर देगा।
(5) जहां कहीं भी सक्षम प्राधिकार को यह प्रतीत होता है कि उसके समक्ष दायर वाद में स्वत्त्व न्याय-निर्णीत करने का संश्लिष्ट प्रश्न निहित है, वह कार्यवाही बन्द कर देगा तथा पक्षकार उचित व्यवहार न्यायालय के समक्ष उपचारों की याचना के लिए स्वतन्त्र होंगे। 5. सक्षम प्राधिकार में व्यवहार न्यायालय की शक्तियां होना।-निम्नांकित मामलों में जांच कराने में सक्षम प्राधिकार को वही शक्तियां होगीं जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का V) के तहत किसी न्यायालय में विहित हैं :- (क) शपथ-पत्रों के द्वारा साक्ष्य की प्रविष्टि;
(ख) किसी व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित कराने के लिए सम्मन निर्गत करना और शपथ पर उसका परीक्षण करना;
(ग) दस्तावेजों का उपस्थापन बाध्यकारी बनाना; (घ) व्यय का आदेश पारित करना ; (ङ) किसी प्रतिवेदन की मांग करना और स्थानीय जांच का आदेश देना; तथा (च) स्थानीय जांच के लिए कमीशन निर्गत करना या साक्षियों के परीक्षण का आदेश देना। 6. कतिपय मामलों में राज्य का अनिवार्य पक्षकार होना ।-तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के किसी प्रावधान में किसी बात के अन्तर्विष्ट होने पर भी, सिविल प्रकृति के सभी मामलों में, जिसमें कोई भूमि या उसका अंश सम्बन्धित हो, और जिसमें वाद का एक पक्षकार अधिनियम की धारा-2 के तहत एक आवंटी या बन्दोबस्तीधारी हो, राज्य एक अनिवार्य पक्ष होगा। 7. कार्यवाही का संक्षिप्त निपटारा ।-इस अधिनियम के तहत सारी कार्यवाहियां अधिनियम के प्रावधानों तथा अधिनियम के अधीन निर्मित नियमों के अनुरूप सरसरी तौर पर निष्पादित की जाएंगी।4 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 4 जनवर(cid:15) 2010 8. अधिनियम के अधीन की गयी कार्रवाई का संरक्षण ।-(1) इस अधिनियम या इसके तहत निर्मित नियमों के अनुसरण में सदिच्छा पूर्वक किए गए या किए जाने के लिए अभीप्सित किसी कार्य के लिए किसी व्यक्ति के विरूद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य कानूनी कार्यवाही संधारित नहीं की जाएगी ।
(2) अधिनियम के किसी प्रावधान के कारण हुए नुकसान, या सम्भावित नुकसान या हो चुकी या सम्भावित किसी क्षति अथवा इस अधिनियम या इसके तहत निर्मित नियमों के अनुसरण में सदिच्छापूर्वक किए गए या किए जाने के लिए अभीप्सित किसी कार्य के लिए राज्य के विरूद्ध कोई वाद या कानूनी कार्यवाही संधारित नहीं की जाएगी। 9. विवादों का त्वरित निराकरण ।- (1) सक्षम प्राधिकार विवादों के त्वरित निराकरण के लिए हर संभव कदम उठाएगा और अपने समक्ष वाद दायर होने की तिथि से अधिकतम तीन माहों के अन्दर उसका अन्तिम न्याय-निर्णय सुनिश्चित करेगा। (2) सक्षम प्राधिकार पक्षकारों को बिना समुचित कारण बताए स्थगन की अनुमति नहीं देगा। (3) बिना समुचित कारण के विनिर्दिष्ट अवधि में निष्पादन की विफलता में उसके विरूद्ध अनुशासनिक कार्रवाई की जा सकेगी। 10. इस अधिनियम के अधीन दायर वादों का संज्ञान ।-(1) अनुसूची-2 में उल्लिखित न्यायालयोें के अतिरिक्त अन्य कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दायर किसी मामले का संज्ञान नहीं लेगा। (2) अनुसूची-2 में उल्लिखित न्यायालयों से भिन्न किसी न्यायालय में विचाराधीन कोई कार्यवाही तथा जिसमें उठाए गए मुद्दे इस अधिनियम के अधीन किसी वाद के मुद्दों के समान हों, उपशमित हो जाएगी। 11. दण्डाधिकारी को सन्दर्भन।- सक्षम प्राधिकार के समक्ष किसी कार्यवाही के दौरान यदि वह सन्तुष्ट है कि किसी पक्षकार ने कोई आपराधिक कृत्य किया है या शान्ति भंग होने की संभावना हो, वह उसे दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के तहत निष्पादनार्थ सक्षम दण्डाधिकारी के न्यायालय को सन्दर्भित कर सकेगा। 12. सक्षम प्राधिकार के ऊपर अधीक्षण, पर्यवेक्षण तथा नियंत्रण करने के लिए समाहर्त्ता की शक्ति।-(1) सक्षम प्राधिकार प्रति तीन माह पर समाहर्त्ता को, नियम में विहित आवधिक प्रतिवेदन समर्पित करेगा, जिसमें उसके द्वारा निराकरण किए गए विवादों की सूचनाएँ रहेंगी। (2) समाहर्त्ता किसी सक्षम प्राधिकार से उसके समक्ष दायर वादों के अन्तिम न्याय निर्णय के सम्बन्ध में समय-समय पर प्रतिवेदन की मांग कर सकेगा। (3) समाहर्त्ता सक्षम प्राधिकार के सम्बन्धित क्रियाकलापों की समीक्षा समय-समय पर करने के लिए स्वतन्त्र होगा तथा यदि समीक्षा से समाहर्त्ता सन्तुष्ट है कि वादों का बिना पर्याप्त कारण के त्वरित निष्पादन नहीं हो रहा है, तो वह आवश्यक कार्यार्थ तत्काल मामले की सूचना सरकार को देगा। 13. विवाद निराकरण की प्रक्रिया ।-(1) कोई व्यथित व्यक्ति सक्षम प्राधिकार, जिसके क्षेत्राधिकार में विवादित भूमि या संरचना अवस्थित है, के समक्ष आवेदन या शिकायत दर्ज कर सकेगा।
(2) आवेदन या शिकायत प्राप्त होने पर सक्षम प्राधिकार सम्बन्धित पक्षकारों को, नोटिस प्राप्ति की तिथि से उनका उत्तर या दस्तावेजी साक्ष्य, यदि कोई हो, दायर करने के लिए एक पक्ष का समय देते हुए, नोटिस निर्गत करेगा।
(3) प्रतिवादी द्वारा उत्तर दायर होने के बाद, सक्षम प्राधिकार आवेदक या शिकायतकर्त्ता को, उसका प्रत्युत्तर, दस्तावेजी साक्ष्य, यदि कोई हो तथा साक्षियों, यदि कोई हों, जिनका वह परीक्षण करना चाहता हो, की सूची दायर करने के लिए एक सप्ताह का समय देगा।
(4) अभिवचन की समाप्ति होने के उपरान्त, सक्षम प्राधिकार पक्षकारों की सुनवाई करेगा और यदि कोई अतिरिक्त साक्ष्य या स्थानीय जांच आवश्यक न हो, तो पक्षकारों की अभिवचनों के आधार पर वाद का निष्पादन करेगा।
(5) यदि स्थानीय जांच की आवश्यकता हो, सक्षम प्राधिकार स्वयं जांच कर सकेगा अथवा किसी अन्य लोक सेवक या अधिवक्ता को स्थानीय जांच संचालित करने और प्रतिवेदन समर्पित करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा। सक्षम प्राधिकार स्थानीय जांच के लिए कमीशन भी निर्गत कर सकेगा।
(6) यदि सक्षम प्राधिकार साक्षियों के परीक्षण को आवश्यक समझता है तो वह विवाद के पक्षकारों को आवेदन या शिकायत के पक्ष में तथा उसके खंडन में, साक्षियों को प्रस्तुत करने का अवसर उपलब्ध कराएगा। सक्षम प्राधिकार सुनिश्चित करेगा कि विवाद के पक्षकारों के द्वारा साक्षी बिना किसी अनुचित विलम्ब के प्रस्तुत किए जाएं तथा वह यह भी सुनिश्चित करेगा कि साक्षियों का परीक्षण दिन प्रतिदिन के आधार पर किया जाए।
(7) सक्षम प्राधिकार सुनवाई के समापन, स्थानीय जांच, यदि कोई हो, के अवलोकन तथा साक्षियों, यदि कोई हाें, के परीक्षण के बाद अन्तिम रूप से पक्षकारों को सुनेगा तथा विधि के अनुरूप उचित आदेश पारित करेगा।5 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 4 जनवर(cid:15) 2010 (8) सक्षम प्राधिकार, जहां वह वादों का संज्ञान किसी विहित प्राधिकार या पदाधिकारी द्वारा संदर्भन करने पर लेता है, वहां भी उपर्युक्त प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।
(9) सक्षम प्राधिकार आशंकित, अनधिकृत तथा गैर-कानूनी बेदखली अथवा विवादी भूमि पर निर्मित संरचना के अनधिकृत तथा गैर-कानूनी तोड़े जाने की स्थिति में, अन्तरिम निषेधाज्ञा पारित कर सकेगा।
(10) सक्षम प्राधिकार तर्कपूर्ण आदेश पारित कर वादों का निष्पादन करेगा। (11) विस्तृत विवाद निराकरण प्रक्रिया सरकार के द्वारा उपयुक्त नियम निर्मित करके विहित की जाएगी। 14. आयुक्त के समक्ष अपील ।-(1) सक्षम प्राधिकार के द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित कोई पक्षकार आदेश की तिथि से तीस दिनों की अवधि में, आयुक्त, जिसके क्षेत्राधिकार में आदेश पारित हुआ हो, के समक्ष अपील दायर कर सकेगा; परन्तु, आयुक्त, यदि वह सन्तुष्ट हो कि अपीलार्थी द्वारा तीस दिनों के अन्दर अपील दायर न कर पाने का समुचित आधार है तो, तीस दिनों की अवधि से ऊपर, पुनः तीस दिनों तक उसे विस्तारित करके अपील को प्राप्त तथा निष्पादित कर सकेगा। (2) अपील प्राप्त होने पर, आयुक्त विवादी पक्षाें को उपस्थिति तथा अपील का उत्तर, यदि कोई हो, समर्पित करने के लिए 15 दिनों का समय देते हुए नोटिस निर्गत करेगा। (3) तदुपरान्त आयुक्त, अपील सुनने की कार्रवाई करेगा तथा जैसा वह विधि के अनुरूप समझे, सक्षम प्राधिकार के आदेश को स्वीकृत, संशोधित, अस्वीकृत या सम्पुष्ट करने का आदेश, पारित करेगा। (4) आयुक्त के द्वारा पारित आदेश अन्तिम होगा तथा किसी अन्य प्राधिकार के समक्ष कोई और अपील या रिवीजन नहीं लाया जा सकेगा। 15. सक्षम प्राधिकार के द्वारा पारित आदेश का क्रियान्वयन।-अपील में पारित किसी आदेश, यदि कोई हो, के अध्यधीन, सक्षम प्राधिकार अपने द्वारा पारित आदेश का क्रियान्वयन कराएगा; परन्तु, यदि विहित अवधि के अन्तर्गत अपील दायर नही ंहुई हो तो वह कथित आदेश को या तो स्वयं क्रियान्वित करने की कार्रवाई करेगा, या किसी अन्य पदाधिकारी अथवा कर्मचारी को उसे क्रियान्वित करने के लिए प्राधिकृत करेगा। 16. विवादित भूमि पर खड़ी फसलों की कुर्की ।-(1) सक्षम प्राधिकार, यदि वह सन्तुष्ट हो, कि विवादित भूमि पर खड़ी फसल को न्याय के हित में जब्त किया जाना आवश्यक है, तो वह समुचित आदेश पारित करेगा और विवादित भूमि पर खड़ी फसल को जब्त कर लेगा। (2) सक्षम प्राधिकार अपने समक्ष कार्यवाही की लम्बितावस्था में खड़ी फसल के विक्रय का आदेश दे सकेगा तथा विक्रय से प्राप्त राशि वाद निष्पादन पर्यन्त सरकारी खाते में रखी जाएगी और वाद में, अपील में पारित आदेश, यदि कोई हो, के अध्यधीन उसकेे द्वारा पारित आदेश के अनुरूप पक्षकारोें को विक्रय से प्राप्त राशि परिदत्त कर दी जाएगी। 17. नियम बनाने की सरकार की शक्ति ।-(1) सरकार सरकारी राजपत्र में अधिसूचना के द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी। (2) विशेष रूप से तथा पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना निम्नलिखित सभी या किसी विषय के लिए नियम का प्रावधान कर सकेगी :- (i) कार्यवाही के सरसरी निष्पादन की रीति; (ii) सक्षम प्राधिकार के द्वारा प्रतिवेदन तथा रिटर्न समर्पित किए जाने की रीति; (iii) सक्षम प्राधिकार के द्वारा आवेदनों की सुनवाई करने की रीति; (iv) किसी धनराशि के सरकारी लेखा में जमा किए जाने की रीति; (v) स्थानीय जांच के लिए नियुक्त कमीशन की शक्तियां;
(vi) अभिलेखों एंव पंजियों के संधारण एवं नोटिसों का प्रदर्शन; (vii) दायर आवेदन या शिकायत दर्ज करने की रीति;
(viii) कोई अन्य मामला जिसे विहित किया जाना आवश्यक हो या जिसे विहित किया जा सकता हो।6 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 4 जनवर(cid:15) 2010
अनुसूची-1
1 बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 2 बिहार काश्तकारी अधिनियम, 1885 3 बिहार प्रश्रय प्राप्त व्यक्ति वासगीत काश्तकारी अधिनियम, 1947 4 बिहार भूदान यज्ञ अधिनियम, 1954 5 बिहार भूमि सुधार (अधिकतम सीमा निर्धारण एवं अधिशेष भूमि अर्जन) अधिनियम, 1961 6 बिहार जोत समेकन एवं खण्डकरण निवारण अधिनियम, 1956
अनुसूची-2
| क्रमांक | न्यायिक क्षेत्राधिकार का मूल न्यायालय | अपीलीय न्यायालय |
| 1 | 2 | 3 |
| 1 | उप समाहर्त्ता भूमि सुधार | आयुक्त्त |
उद्देश्य एवं हेतु
बिहार राज्य में स्वत्वाधिकार अभिलेखों, राजस्व अभिलेखों की प्रविष्टियों के प्रसंग में तथा चौहद्दी, रैयती भूमि के गैर-कानूनी दखल, सार्वजनिक भूमि के आवंटियों/बन्दोबस्ती-धारियों की जबरन बेदखली इत्यादि कारणों से समस्याएँ उद्भूत होती हैं और इससे सही आवंटियों/बन्दोबस्ती-धारियों, रैयतों या दखलकारों को अनावश्यक परेशानी होती है। विभिन्न वैधानिक एवं प्रशासनिक कारणों से वर्तमान प्रशासनिक संयंत्र के माध्यम से इस समस्या के निराकरण में कठिनाई प्रतीत हो रही है। विभिन्न प्रकार के भूमि विवादों के त्वरित एवं प्रभावशाली ढंग से निराकरण के प्रयोजन से, राज्य में, एक अधिकारिता सम्पन्न संयंत्र स्थापित करने हेतु बिहार भूमि विवाद निराकरण विधेयक, 2009 को अधिनियमित कराने का प्रस्ताव है ताकि भूमि विवादों का त्वरित समाधान सुनिश्चित किया जा सके। उपर्युक्त के लिए प्रावधानों को उपबंधित करना ही इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य है तथा इन्हें अधिनियमित कराना ही इस विधेयक का मुख्य अभीष्ट है।
(नरेन्द्र नारायण यादव) भार-साधक सदस्य। पटना : दिनांक 22 दिसम्बर, 2009
सुरेन्द्र प्रसाद शर्मा, सचिव, बिहार विधान-सभा।
——— अधी*क, सिचवालय मुिणालय,
(cid:18)बहार, पटना (cid:26)ारा ूकािशत एवं मु0ित। (cid:18)बहार गजट (असाधारण) 14-571+10-ड(cid:15)0ट(cid:15)0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in