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अध्याय-1
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार एवं प्रारम्भ।-(1) यह नियमावली "बिहार भूमि न्यायाधिकरण नियमावली, 2010" कही जा सकेगी। (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण बिहार राज्य में होगा। (3) यह तुरत के प्रभाव से प्रवृत्त होगी।
2. परिभाषाएँ।- इस नियमावली में, जबतक संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो :-
(i) "अधिनियम" से अभिप्रेत है बिहार भूमि न्यायाधिकरण अधिनियम, 2009 (बिहार अधिनियम 9, 2009);
(ii) "धारा" से अभिप्रेत है बिहार भूमि न्यायाधिकरण अधिनियम, 2009 (बिहार अधिनियम-9,2009) की धारा;
(iii) "अध्यक्ष" से अभिप्रेत है बिहार भूमि न्यायाधिकरण के अध्यक्ष; (iv) "सदस्य" से अभिप्रेत है बिहार भूमि न्यायाधिकरण के न्यायिक अथवा प्रशासनिक सदस्य; (v) "अधिवक्ता" से अभिप्रेत वही होगा जो अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (25,1961) में उसके प्रति समनुदेशित किया गया हो;
(vi) "विधिक प्रतिनिधि" से अभिप्रेत है वह व्यक्ति जो विधि में मृत व्यक्ति की संपदा का प्रतिनिधित्व करता हो;
(vii) "निबंधक" से अभिप्रेत है न्यायाधिकरण के प्रतिनिर्देश में, निबन्धक, जो न्यायाधिकरण में नियुक्त हो तथा इसमें कोई अधिकारी, जिसे इन नियमों के अध्यधीन निबन्धक की शक्तियाँ और कार्य प्रत्यायोजित किए गए हों, शामिल है;
(viii) "अंतरित आवेदन" से अभिप्रेत है अधिनियम की धारा-9 की उप-धारा (2) तथा धारा-15 के अनुसार न्यायाधिकरण को अंतरित कार्यवाही या आवेदन;
2 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 17 माच. 2010(ix) "न्यायाधिकरण" से अभिप्रेत है अधिनियम की धारा-4 की उप-धारा (1) के अध्यधीन स्थापित भूमि न्यायाधिकरण;
(x) "अभिवचन" से अभिप्रेत है मूल आवेदन अथवा आवेदन का प्रत्युत्तर; तथा (xi) ऐसे शब्द जो इन नियमों में प्रयुक्त और अपरिभाषित हैं, के वही अर्थ होंगे जो उनके लिए अधिनियम में हैं या अधिनियम की धारा-9 की उप-धारा (1) में निर्देशित अधिनियमों या हस्तकों में अभिव्यक्त किये गये हों।
अध्याय-2
3. न्यायाधिकरण की अवस्थिति तथा न्यायाधिकरण के क्रियाकलाप से संबंधित अन्य विषय।-(1) राज्य सरकार के द्वारा यथा-अधिसूचित स्थान पर न्यायाधिकरण का कार्यालय अवस्थित होगा।
(2) शनिवार, रविवार तथा अन्य सार्वजनिक अवकाशों के अतिरिक्त, न्यायाधिकरण का कार्यालय, अध्यक्ष के किसी आदेश के अध्यधीन पूर्वाह्न 9.30 बजे से अपराह्न 6.00 बजे तक खुला रहेगा।
(3) न्यायाधिकरण का कार्यालय मुद्रा तथा संप्रतीक वही होंगे जो राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किये जाएंगे।
(4) न्यायाधिकरण की कोई कार्रवाई या कार्यवाही मात्र इस कारण से अवैध नहीं होगी कि इसके सदस्यों के बीच कोई रिक्ति थी या इसके गठन में कोई त्रुटि थी।
4. आवेदन दायर करने की प्रक्रिया।-(1) न्यायाधिकरण को आवेदन, आवेदक द्वारा स्वयं या किसी अभिकर्त्ता या किसी सम्यक रूप से प्राधिकृत अधिवक्ता के द्वारा निबन्धक या निबन्धक के द्वारा लिखित रूप से आवेदन प्राप्त करने के लिए प्राधिकृत किसी अन्य पदाधिकारी को समर्पित किया जा सकेगा।
(2) उप-नियम (1) के अधीन आवेदन तीन प्रतियों में पेपर-बुक आकार में समर्पित किया जाएगा। (3) न्यायाधिकरण एकाधिक व्यक्तियों को एक साथ मिलकर एक ही आवेदन देने की अनुमति दे सकता है, यदि वाद-कारण तथा प्रार्थित सहायता की प्रकृति समान हो अथवा विषय में इनका समान हित हो।
5. आवेदनों की संवीक्षा।-(1) निबन्धक अथवा नियम 4 के उप-नियम (1) के अधीन उसके द्वारा प्राधिकृत पदाधिकारी प्रत्येक आवेदन पर आवेदन को प्रस्तुत करने या प्रस्तुत करने की मानी गयी तिथि को अंकित करेगा तथा अंकन को हस्ताक्षरित करेगा।
(2) यदि संवीक्षोपरान्त, आवेदन सही पाया जाता है, तब यह सम्य्क रूप से निबंधित होगा तथा इसे एक क्रम संख्या दी जाएगी।
(3) यदि संवीक्षोपरान्त, आवेदन त्रुटिपूर्ण पाया जाता है तथा पायी गयी त्रुटि प्रकृति में औपचारिक पाई जाए, निबंधक संबंधित पक्षकार को इसका निराकरण करने की अनुमति दे सकेगा तथा यदि त्रुटि प्रकृति में औपचारिक नहीं हो तो निबंधक आवेदक को, जितना वह आवश्यक समझेे, त्रुटि का निराकरण करने के लिए समय दे सकेगा।
(4) यदि उप-धारा (3) के अधीन अनुमान्य समय के भीतर त्रुटि निराकरण करने में आवेदक विफल रहता है तो निबन्धक आदेश द्वारा तथा लिखित रूप में अभिलिखित किये जाने वाले कारणों से आवेदन को निबंधित करने से इन्कार कर सकेगा तथा तदनुसार आवेदक को सूचित कर सकेगा।
(5) व्यथित व्यक्ति के द्वारा उप-धारा (4) के अधीन पारित आदेश के विरूद्ध, आदेश की तिथि से तीस दिनों के भीतर अध्यक्ष के समक्ष अपील दायर की जा सकेगी तथा ऐसी अपील का विचारण एवं निष्पादन अध्यक्ष के द्वारा या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्ष के द्वारा विशेष या सामान्य आदेश के अधीन प्राधिकृत किसी सदस्य के द्वारा किया जा सकेगा; जिसका उसपर निर्णय अन्तिम होगा।
(6) अधिनियम की धारा-15 के प्रावधानों के अनुसार पटना उच्च न्यायालय या राज्य सरकार से अंतरित होकर प्राप्त मामलों को भी नए क्रमांक दिए जाएंगे।
6. आवेदन दायर करने का स्थान।-आवेदन सामान्यतया आवेदक के द्वारा या उसकी ओर से न्यायाधिकरण के निबन्धक के समक्ष दायर किए जाएंगे।
7. आवेदन फीस।-(1) निबंधक के समक्ष दायर प्रत्येक आवेदन के साथ एक सौ रूपये की फीस संलग्न रहेगी :
परन्तु यदि ऐसा आवेदन राज्य सरकार की ओर से दायर किया जाता है, तब उसपर कोई न्यायालय फीस देय नहीं होगी ।
परन्तु और कि यदि न्यायाधिकरण का समाधान हो जाय कि अति दरिद्रता के आधार पर आवेदक विहित न्यायालय फीस का भुगतान करने में असमर्थ है तब वह न्यायालय फीस के भुगतान से ऐसे आवेदक को छूट दे सकेगा।
(2) यदि किसी अधिवक्ता के माध्यम से आवेदन दायर किया जाता है तब उसके साथ स्टांप तथा पाँच रूपए के कल्याण स्टांंप युक्त समुचित वकालतनामा संलग्न होना चाहिए। यदि आवेदन प्रतिनिधि के माध्यम से दायर किया जाता है तब उसके साथ आवेदक के द्वारा समुचित प्राधिकार संलग्न होनी चाहिए।3 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 17 माच. 2010 8. आवेदन की अंतर्वस्तु।-(1) नियम 3 के अधीन दायर प्रत्येक आवेदन में संक्षिप्त रूप से तथ्य तथा आवेदन में प्रार्थित राहत के आधार दिये जाएंगे। ऐसे आधारों को अनुवर्ती रूप से संख्या दी जाएगी।
(2) प्रत्येक आवेदन डबल स्पेस में अच्छी गुणवत्ता के मोटे कागज पर एक तरफ टंकित होंगे। (3) अन्तरिम आदेश अथवा निदेश प्राप्त करने के लिए एक पृथक आवेदन प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं होगा, यदि उसके लिए प्रार्थना मूल आवेदन में की गयी हो।
(4) कोई आवेदक, आवेदन दायर करने के उपरान्त, किसी अन्तरिम आदेश या निदेश के लिए आवेदन दायर कर सकता है। ऐसा आवेदन, यथा सम्भव, विहित प्रपत्र में रहेगा।
(5) आवेदन के साथ निम्नलिखित दस्तावेज संलग्न होंगे :-
(क) (i) जिस आदेश के विरूद्ध आवेदन दायर किया गया है, उसकी अभिप्रमाणित सच्ची प्रतिलिपि;
(ii) आवेदक जिसपर विश्वास करता हो तथा आवेदन में निर्देशित दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ; (iii) दस्तावेजों की एक अनुक्रमणी ।
(ख) उप-धारा (5) (क) में निर्देशित दस्तावेज किसी अधिवक्ता या किसी राजपत्रित पदाधिकारी के द्वारा अभिप्रमाणित किए जाएंगे और हर दस्तावेज अनेक्सचर के रूप में क्रमवार अंकित होगा। (ग) जहाँ किसी प्रतिनिधि के द्वारा आवेदन दायर किया जाता है, वहाँ उसे ऐसे प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत करने वाला दस्तावेज आवेदन के साथ संलग्न करना होगा : परन्तु जहां आवेदन किसी अधिवक्ता के द्वारा दायर किया जाय वहाँ, उसके साथ सम्यक रूप से निष्पादित "वकालतनामा" संलग्न होना चाहिए।
(6) अभिवचन को उस रीति से सत्यापित किया जाएगा जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश VI नियम-15 में विहित की गयी हो।
9. सूचना या आदेश के तामील करने का ढंग।-(1) किसी व्यक्ति पर तामील किये जाने के लिए अपेक्षित कोई सूचना या आदेश जिस व्यक्ति पर उसका तामील किया जाना है, उसे या उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत प्रतिनिधि या उस सूचना या आदेश से सम्बन्धित भूमि या उसके अंश के प्रभारी उसके सम्यक रूप से प्राधिकृत अभिकर्त्ता को, उसकी सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित तथा मुहरबन्द प्रति देकर या उपलब्ध कराकर तामील करायी जायगी।
(2) जहाँ जिस व्यक्ति को सूचना या आदेश तामील किया जाना हो, वह या सूचना या आदेश से सम्बन्धित भूमि का प्रभारी उसका अभिकर्त्ता नहीं मिल रहा हो या सूचना या आदेश का तामील उसकी ओर से प्राप्त करने के लिए कोई अभिकर्त्ता सम्यक रूप से प्राधिकृत नहीं हो, तब उस व्यक्ति के साथ रहनेवाले उसके परिवार के किसी वयस्क सदस्य को तामील किया जा सकेगा।
(3) जब तामील करने वाला अधिकारी, जिस व्यक्ति को सूचना या आदेश दिया जाना है, उसे व्यक्तिगत रूप से या उसके लिए किसी निमित्त या उसके निमिा किसी अन्य व्यक्ति को, सूचना या आदेश की प्रति देता या उपलब्ध कराता है, वह जिस व्यक्ति को प्रति दी या उपलब्ध करायी जाती है, उसका हस्ताक्षर मूल सूचना या आदेश के ऊपर तामील की स्वीकृति के रूप में प्राप्त करेगा।
(4) जहाँ जिस व्यक्ति या उसके अभिकर्त्ता या यथा उपर्युक्त ऐसे किसी अन्य व्यक्ति जिसे सूचना या आदेश तामील किया जाना है, अभिस्वीकृति हस्ताक्षरित करने से इन्कार कर देता है, या जहाँ, तामील करनेवाला अधिकारी, सभी सम्यक् एवं युक्तियुक्त तत्परता का प्रयोग करने के बाद भी सूचना या आदेश तामील करने हेतु व्यक्ति का पता नहीं लगा सके तथा उसकी ओर से सूचना या आदेश का तामील स्वीकार करने के लिए कोई प्रतिनिधि प्राधिकृत नहीं हो या अन्य कोई व्यक्ति जिसको तामील किया जा सके, नहीं हो तब सूचना या आदेश की प्रति जिस घर में व्यक्ति, जिससे सूचना या आदेश सम्बन्धित हो, सामान्य तौर पर रहता हो, या लाभ के लिए व्यवसाय या कार्य करता हो उसके बाहरी दरवाजे या घर के किसी सहज दृश्य भाग पर, या उस व्यक्ति के कार्यालय, अगर कोई हो, के बाहरी दरवाजे पर सूचना या आदेश की प्रति चिपका कर तामील किया जा सकेगा। (5) तामील करनेवाला अधिकारी ऐसे सभी मामलों में जहाँ सूचना या आदेश का तामील उप-नियम (2) (3) अथवा (4) के अधीन किया गया हो, मूल सूचना या आदेश पर एक प्रतिवेदन अंकित या संलग्न करेगा या कराएगा, जिसमें सूचना या आदेश के तामील होने की तिथि और वह रीति जिस रीति से सूचना या आदेश तामील किया गया हो एवं तामील को देखनेवाले दो व्यक्तियों के नाम तथा पता रहेंगे।
(6) पूर्वगामी उप-नियमों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, न्यायाधिकरण उप-नियम (4) के अधीन सूचना या आदेश के तामील होने के मामलों में या अन्य मामलों में भी यदि उचित समझे तो आदेश कर सकता है कि सूचना या आदेश की सम्यक् हस्ताक्षरित तथा मुहरबन्द प्रति जिस व्यक्ति को ऐसी सूचना या आदेश का तामील किया जानेवाला है, को पावती देय निबन्धित डाक से भेज सकेगा तथा सूचना या आदेश का डाक-प्रेषण सम्बन्धित व्यक्ति को ऐसी सूचना या आदेश के तामील का पर्याप्त सबूत होगा।4 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 17 माच. 2010 (7) जहाँ अधिनियम के अधीन जिस व्यक्ति को सूचना या आदेश का तामील किया जाना हो, वह अवयस्क या विकृत चित्त का व्यक्ति हो तब पूर्वोक्त रीति से यथास्थिति, ऐसे अवयस्क या विकृत चित्त के व्यक्ति, के अभिभावक को तामील किया जाएगा।
10. विरोधी पक्षकार के द्वारा उत्तर एवं अन्य दस्तावेजों का दाखिल किया जाना।-(1) मामले में प्रतिवाद करने का आशयित प्रत्येक विरोधी पक्षकार तीन प्रतियों में आवेदन पर अपना उत्तर तथा अपने द्वारा जिस दस्तावेज पर विश्वास करता है उसे पेपर बुक आकार में निबन्धक के समक्ष उसको आवेदन की सूचना के तामील होने के एक माह के भीतर दायर करेगा।
(2) उप-नियम (1) के अधीन दायर उत्तर में, विरोधी पक्षकार आवेदक द्वारा अपने आवेदन में अधिकथित तथ्यों तथा लिए गए आधारों को विनिर्दिष्ट रूप से स्वीकार, अस्वीकार या स्पष्ट करेगा और ऐसे अतिरिक्त तथ्य भी अधिकथित कर सकेगा जो मामले के न्यायसंगत विनिश्चय के लिए आवश्यक पाया जाय।
(3) विरोधी पक्षकार उप-नियम (1) में यथा निर्देशित दस्तावेजों के साथ उत्तर की एक प्रति आवेदक या उसके अधिवक्ता, यदि कोई हो, को तामील करेगा तथा उत्तर के साथ ऐसे तामीले का सबूत दायर करेगा। (4) विहित अवधि व्यतीत होने के बाद भी न्यायाधिकरण उत्तर दायर करने हेतु अनुज्ञात किया जा सकेगा। (5) अभिवचन को उसी रीति से सत्यापित किया जाएगा जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश VI नियम-15 में विहित की गयी हो।
11. अभिलेखों का निरीक्षण।-(1) किसी मामले के पक्षकारों या उनके अधिवक्ताओं को, निबन्धक को लिखित आवेदन करने पर मामले के अभिलेख का निरीक्षण करने हेतु अनुज्ञात किया जा सकेगा।
(2) ऐसे निबंधन और शर्त्तों के अधीन रहते हुए, जिन्हें सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, अध्यक्ष द्वारा विहित किये जायं, किसी व्यक्ति, जो कार्यवाही में पक्षकार नहीं हो, को भी निबन्धक की लिखित रूप में अनुज्ञा प्राप्त करने के बाद, मामले का अभिलेख का निरीक्षण करने हेतु अनुज्ञात किया जा सकेगा।
12. सुनवाई की तिथि तथा स्थान अधिसूचित किया जाना।- न्यायाधिकरण पक्षकारों को आवेदन की सुनवाई करने के लिए तिथि एवं स्थान अध्यक्ष द्वारा सामान्य या विशेष आदेश द्वारा यथा निदेशित रीति से अधिसूचित करेगा या पक्षकारों को जानकारी के लिए आदेशफलक में सुनवाई की तिथि नियत कर सकेगा। 13. अधिनियम के अधीन अधिकारियों को व्यवहार न्यायालय की शक्तियाँ होना।-भूमि न्यायाधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन मामलों के न्याय निर्णयन में जाँच-पड़ताल के प्रयोजनार्थ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन कार्यरत किसी न्यायालय की शक्तियाँ, होंगी, यथा :-
(i) शपथ-पत्रों के द्वारा साक्ष्य का ग्रहण। (ii) किसी व्यक्ति को सम्मन करना, उसकी उपस्थिति अनिवार्य करना और शपथ पर उसका विचारण करना।
(iii) दस्तावेजों का समर्पण अनिवार्य करना। (iv) खर्च के संबंध में आदेश पारित करना।
14. अधिनियम के अधीन जाँच-पड़ताल तथा कार्यवाहियों का न्यायिक होना।-अधिनियम के अधीन न्यायाधिकरण की सभी जाँच-पड़ताल या कार्यवाहियाँ भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का XLV) की धारा-193, 196 तथा 228 के अधीन न्यायिक कार्यवाहियाँ मानी जाएंगी।
15. अपराधों के संज्ञान तथा सुनवाई के प्रयोजनार्थ शक्तियों का प्रत्यायोजन।-अधिनियम की धारा-13 के प्रावधानों के प्रयोजनार्थ न्यायाधिकरण का अध्यक्ष न्यायाधिकरण के किसी पदाधिकारी को, न्यायाधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों में अंतगर््रस्त भूमि या उसका भाग, जिस मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी की अधिकारिता में अवस्थित हो, के समक्ष शिकायत दायर करने, या यदि ऐसी भूमि या उसका भाग एक से अधिक मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारियों की अधिकारिता में अवस्थित हो तो वह किसी एक मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी के समक्ष शिकायत दायर करने हेतु ऐसा पदाधिकारी प्राधिकृत कर सकेगा।
16. मामलों की डायरी।-(1) मामलों की सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण एक डायरी तैयार करेगा और जहाँ तक सम्भव हो, डायरी के अनुसार मामलों की सुनवाई तथा उसका विनिश्चय करेगा।
(2) प्रत्येक आवेदन तथा अंतरित होकर प्राप्त मामलों एवं कार्यवाहियों की सुनवाई तथा विनिश्चय जहाँ तक संभव हो, निबन्धन की तिथि से छह महीनों के भीतर किया जाएगा।
(3) न्यायाधिकरण को स्थगन की प्रार्थना को इन्कार करने तथा मौखिक बहस का समय सीमित करने की भी शक्ति होगी।
17. आवेदक के व्यतिक्रम पर कार्रवाई।-(1) जहाँ आवेदन की सुनवाई के लिए नियत तिथि को या किसी अन्य तिथि के जिसके लिए ऐसी सुनवाई स्थगित की जाय, आवेदन की सुनवाई के लिए पुकार होने पर आवेदक उपस्थित न हो वहाँ न्यायाधिकरण स्वविवेक से या तो व्यतिक्रम के लिए आवेदन को खारिज कर सकेगा या गुणागुण के आधार पर उसका विनिश्चय कर सकेगा।
(2) जहाँ व्यतिक्रम के लिए आवेदन खारिज कर दिया गया है और खारिज करने की तिथि से तीस दिनों के भीतर आवेदक मामले के प्रत्यावर्तन के लिए आवेदन दायर करता है तथा न्यायाधिकरण का समाधान हो जाता है5 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 17 माच. 2010 कि सुनवाई के लिए आवेदन पुकारे जाने के समय उसकी गैर-हाजिरी के लिए पर्याप्त कारण था, वहाँ न्यायाधिकरण आवेदन की खारिजी के आदेश को अपास्त करने का आदेश पारित करेगा और उसका प्रत्यावर्तन करेगा :
परन्तु तथापि, जहाँ मामले का निपटारा गुणागुण के आधार पर किया गया हो, वहाँ विनिश्चय पुनर्विलोकन के रूप में होगा।
18. आवेदन की एक पक्षीय सुनवाई तथा निपटारा।-(1) जहाँ आवेदन की सुनवाई के लिए नियत तिथि को या किसी अन्य ऐसी तिथि को, जिसके लिए ऐसी सुनवाई स्थगित की गयी हो, सुनवाई के लिए आवेदन की पुकार होने पर आवेदक उपस्थित होता है, तथा विरोधी पक्षकार उपस्थित नहीं होता है, वहाँ न्यायाधिकरण, स्वविवेक से, या तो सुनवाई स्थगित कर सकेगा, या एक पक्षीय आवेदन की सुनवाई तथा विनिश्चय कर सकेगा। (2) जहाँ आवेदन को विरोधी पक्षकार के विरूद्ध एक पक्षीय सुनवाई के लिए नियत किया गया हो, वहाँ वह विरोधी पक्षकार न्यायाधिकरण से एक पक्षीय सुनवाई के आदेश को अपास्त करने के लिए आवेदन कर सकेगा तथा यदि वह विरोधी पक्षकार न्यायाधिकरण का समाधान कर देता है कि उसको सूचना सम्यक रूप से तामील नहीं हुई या सुनवाई के लिए आवेदन का पुकार किए जाने के समय वह उपस्थित होने से पर्याप्त कारणवश निवारित हुआ, तो न्यायाधिकरण उसके विरूद्ध एकपक्षीय सुनवाई के आदेश को अपास्त करते हुए आदेश, उन शर्त्तों पर जिन्हें वह उचित समझे, पारित कर सकेगा तथा आवेदन पर आगे कार्यवाही के लिए एक तिथि नियत करेगा : परन्तु जहाँ आवेदन की एक पक्षीय सुनवाई का आदेश ऐसी प्रकृति का हो कि इसे मात्र एक विरोधी पक्षकार के विरूद्ध अपास्त नहीं किया जा सके, वहाँ न्यायाधिकरण उसे सभी या किसी अन्य विरोधी पक्षकार के विरूद्ध भी अपास्त कर सकेगा। 19. तीस दिनों के भीतर पुनर्विलोकन आवेदन का दायर किया जाना।-पुनर्विलोकन आवेदन का विचारण तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक उस आदेश, जिसके लिए पुनर्विलोकन इच्छित हो, की तिथि से तीस दिनों के भीतर वह दायर नहीं किया गया हो।
20. अन्तरिम आदेश पारित करने की शर्तें।-बिहार भूमि न्यायाधिकरण अधिनियम या अधिनियम की धारा-9 में यथा निर्देशित किसी अन्य अधिनियम या हस्तक के किसी प्रावधान या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी न्यायाधिकरण, यदि उसका लिखित रूप में अभिलिखित किये जाने वाले कारणों से समाधान हो जाय कि उसके समक्ष आवेदन या कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान आवेदक को किसी हानि या नुकसान को रोकने हेतु या किसी अन्य आपवादिक परिस्थिति में, ऐसा करना आवश्यक है तो अपवाद स्वरूप अन्तरिम आदेश पारित कर सकेगा।
21. आदेश का संसूचन।-किसी आवेदन पर पारित प्रत्येक अन्तरिम या अन्तिम आदेश, सम्बन्धित पदाधिकारी को, जिसके आदेश को चुनौती दी गयी हो, आवश्यक अनुपालन के लिए संसूचित किया जाएगा। 22. बहुमत से विनिश्चय।-यदि किसी बिन्दु पर न्यायाधिकरण के सदस्यों के बीच मतान्तर हों, तो वह बिन्दु बहुमत के अनुसार विनिश्चित किया जायगा।
23. विधिक प्रतिनिधियों का प्रतिस्थापन।-(1) कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान किसी पक्षकार की मृत्यु होने की स्थिति में, मृतक पक्षकार के विधिक प्रतिनिधि ऐसी मृत्यु के नब्बे दिनों के भीतर अभिलेख पर आवश्यक पक्षकार बनाए जाने के लिए आवेदन दे सकेंगे।
(2) यदि उप-नियम (1) में विनिर्दिष्ट अवधि में विधिक प्रतिनिधियों से कोई आवेदन प्राप्त नहीं होता है, तब मृतक पक्षकार के विरूद्ध कार्यवाही उपशमित हो जाएगी :
परन्तु युक्तियुक्त एवं पर्याप्त कारणों के आधार पर न्यायाधिकरण, किसी आवेदन पर, न्यायाधिकरण के उपशमन के आदेश को अपास्त कर सकेगा तथा विधिक प्रतिनिधि को प्रतिस्थापित कर सकेगा। 24. सुनवाई का स्थगन।-न्यायाधिकरण, पर्याप्त कारण दर्शाये जाने पर, कार्यवाहियों के किसी भी चरण में, पक्षकारों या उनमें से किसी को समय दे सकेगा तथा आवेदन की सुनवाई स्थगित कर सकेगा। न्यायाधिकरण, जैसा वह उचित समझे, स्थगन के कारण खर्च के सम्बन्ध में आदेश पारित कर सकेगा।
25. आदेश का हस्ताक्षरित तथा मुद्रांकित होना।-(1) न्यायाधिकरण का प्रत्येक आदेश लिखित होगा तथा आदेश पारित करने वाले अध्यक्ष/सदस्य या पीठ गठित करनेवाले सदस्यों के द्वारा हस्ताक्षरित होगा और मुद्रांकित होगा।
(2) खुले न्यायालय में आदेश सुनाया जायगा। 26. कतिपय मामलों में आदेश तथा निदेश।-न्यायाधिकरण ऐसा आदेश या ऐसा निदेश पारित कर सकेगा जो न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आवश्यक या समीचीन हो।
27. आदेशों तथा दस्तावेजों की प्रतिलिपियों की आपूर्ति।-(1) आवेदन या कार्यवाही का कोई भी पक्षकार आदेश और/अथवा अभिलेख पर स्थित दस्तावेजों की प्रतिलिपि प्राप्त करने के लिए आवेदन दे सकेगा। (2) प्रतिलिपि के लिए आवेदन अभिलेख हस्तक में तदर्थ विहित प्रपत्र में पाँच रूपए की न्यायालय फीस मुद्रांक के साथ दायर किया जायगा।
(3) प्रतिलिपि शाखा अपेक्षित कागजातों की निबन्धक के कार्यालय से अध्यपेक्षा करेगी तथा उसके बाद आवेदित प्रतिलिपि की आपूर्ति के लिए अपेक्षित फोलियो अधिसूचित करेगी और अपेक्षित फोलियो जमा हो जाने पर,6 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 17 माच. 2010 आदेश तथा/अथवा दस्तावेज फोलियों पर प्रतिलिपिकृत होंगे तथा उनकी समुचित मिलान करने के उपरान्त और प्रतिलिपि सहायक, मिलानकर्त्ता लिपिक के हस्ताक्षर सहित, सच्ची प्रतिलिपि के लिए अभिप्रमाणित मुहर एवं उसपर प्रभारी पदाधिकारी के हस्ताक्षर सहित, अंकित होगी और तदुपरान्त उसकी आपूर्ति प्रतिलिपि के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति को की जाएगी।
(4) प्रतिलिपि की आपूर्ति हो जाने के बाद कागजात एवं अभिलेख निबन्धक के कार्यालय को वापस लौटा दिए जाएंगे :
परन्तु अपेक्षित संख्या में फोलियो की आपूर्ति अधिसूचना की तिथि के सात दिनों के भीतर की जाएगी और उक्त अवधि में फोलियो जमा नहीं किए जाने की स्थिति में, प्रतिलिपि के लिए आवेदन अस्वीकृत कर दिया जाएगा।
28. निबन्धक के अधिकार एवं कृत्य।-(1) निबन्धक के पास न्यायाधिकरण के अभिलेखों की अभिरक्षा रहेगी तथा वह ऐसे अन्य कार्यों का अनुपालन करेगा जो उसे इन नियमों के अधीन या अध्यक्ष के द्वारा समनुदेशित किए गए हों।
(2) निबन्धक, अध्यक्ष के अनुमोदन से इन नियमों द्वारा निबंधक द्वारा अनुपालन किए जानेवाले या प्रयोग की जानेवाली किसी कृत्य या शक्ति को न्यायाधिकरण के किसी अधिकारी को प्रत्यायोजित कर सकेगा।
(3) सरकारी मुहर निबन्धक के अभिरक्षण में रखी जाएगी। (4) अध्यक्ष के सामान्य तथा विशेष निदेश के अध्यधीन न्यायाधिकरण की मुहर निबन्धक के लिखित प्राधिकार बिना किसी आदेश, सम्मन या किसी प्रक्रिया पर नही लगायी जाएगी।
(5) निबन्धक के लिखित प्राधिकार के बिना न्यायाधिकरण की मुहर न्यायाधिकरण के द्वारा निर्गत किसी अभिप्रमाणित प्रतिलिपि पर नहीे लगाई जाएगी।
29. निबन्धक की अतिरिक्त शक्तियाँ तथा कर्तव्य।-इन नियमों में अन्यत्र प्रदत्त शक्तियों के अतिरिक्त, अध्यक्ष के सामान्य या विशेष आदेश के अध्यधीन निबन्धक की निम्नांकित शक्तियां तथा कर्तव्य होंगेः- (i) स्थानान्तरित कार्यवाहियों या आवेदन सहित सभी आवेदनों तथा अन्य दस्तावेजों को प्राप्त करना; (ii) आवेदनों की संवीक्षा में उठे सभी प्रश्नों को, उन्हें निबन्धित किए जाने के पूर्व, विनिश्चित करना; (iii) न्यायाधिकरण को समर्पित, किसी आवेदन में अधिनियम तथा नियमों के अनुरूप संशोधन की अपेक्षा करना;
(iv) सम्बन्धित पीठों के निदेश के अध्यधीन आवेदनों या अन्य कार्यवाहियों की पहली सुनवाई की तिथि निर्धारित करना और उसकी सूचनाएं निर्गत करना;
(v) अभिलेखों में किसी औपचारिक संशोधन का निदेश देना; (vi) कार्यवाहियों के पक्षकारों को प्रतिलिपियां उपलब्ध कराने का आदेश देना;
(vii) सूचनाओं या अन्य प्रक्रियाओं की तामील, नयी सूचनाएं निर्गत करने हेतु आवेदनों तथा ऐसे आवेदनों को दायर करने की समय सीमा का विस्तार करने से संबंधित सभी विषयों का निपटारा करना तथा किसी उत्तर या प्रत्युत्तर, यदि कोई हो, के दायर करने में तीस दिनों से अनधिक समय देना, तथा उक्त अवधि के समापन के उपरान्त पीठ के समक्ष समुचित आदेशार्थ विषय का उपस्थापन करना।
(viii) न्यायाधिकरण के अभिलेख के निरीक्षण की अनुमति देना।
(ix) किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकार के अभिरक्षण से अभिलेखों की अध्यपेक्षा करना। (x) आवेदन के लंबित रहने के दौरान मृतक पक्षकारों के विधिक प्रतिनिधियों के प्रतिस्थापन के लिए मृत्यु की तिथि से नब्बे दिनों के भीतर आवेदन प्राप्त करना।
(xi) दस्तावेजों की वापसी के लिए पक्षकारों के आवेदनों को प्राप्त एवं निपटारा करना।
30. अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल, वेतन, भत्ते तथा सेवा की शर्त्तें।-(1) अध्यक्ष उस तारीख से, जिस तारीख को वह अपना पद ग्रहण करता है, पाँच वर्ष की अवधि या अपनी 70 (सत्तर) वर्ष की आयु की प्राप्ति तक के लिए पद-धारण करेगा।
(2) प्रत्येक सदस्य, उस तारीख से, जिस तारीख को वह अपना पद ग्रहण करता है, पाँच वर्ष की अवधि या अपनी 70 (सत्तर) वर्ष की आयु की प्राप्ति तक के लिए पद-धारण करेगा।
(3) अध्यक्ष या कोई भी सदस्य किसी समय सचिव/प्रधान सचिव, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग बिहार सरकार, को सम्बोधित अपनी हस्ताक्षरित संसूचना के द्वारा अपना पद-त्याग कर सकेगा।
(4) अध्यक्ष या किसी सदस्य को अधिनियम की धारा-7 में विहित प्रक्रिया अपनाकर हटाया जा सकेगा। (5)(क) अध्यक्ष के वेतन, भत्ते और सेवा की शर्त्तें वही होंगी जो पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की हैंः परन्तु, वेतन तथा भत्ते न्यायाधिकरण में नियुक्ति के ठीक पूर्व अध्यक्ष द्वारा धारित पद के विरूद्ध अनुमान्य वेतन तथा भत्तों से न्यून नहीं होंगे ;
(ख) सदस्य के वेतन, भत्ते और सेवा की शर्त्तें वही होंगी जो बिहार सरकार के प्रधान सचिव की होंगी :
7 (cid:18)बहार गजट (असाधारण)] 17 माच. 2010परन्तु, वेतन तथा भत्ते न्यायाधिकरण में नियुक्ति के ठीक पूर्व सदस्य द्वारा धारित पद के विरूद्ध अनुमान्य वेतन तथा भत्ते से न्यून नहीं होंगे ।
31. न्यायाधिकरण के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति, वेतन, भत्ते तथा सेवा की शर्त्तें।-(1) न्यायाधिकरण के लिए आवश्यकता आधारित पदों का सृजन राज्य सरकार द्वारा किया जायेगा। आवश्यकता आधारित पदों में निम्नलिखित पद सम्मिलित हो सकते हैं :- सचिव, विशेष सचिव, अपर सचिव, संयुक्त सचिव, उप-सचिव, अवर सचिव, प्रशाखा पदाधिकारी, सहायक, उच्चवर्गीय लिपिक, निम्नवर्गीय लिपिक, पेशकार, लेखापाल, दफ्तरी, प्रोसेस पियुन, अनुसेवक, स्वीपर आदि।
(2) न्यायाधिकरण के लिए सृजित पदों के विरूद्ध पदाधिकारियों एवं कर्मियों की सेवा राज्य सरकार द्वारा न्यायाधिकरण को उपलब्ध करायी जायेगी।
(3) न्यायाधिकरण के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों की सेवाशर्त्तें तथा वेतन, भत्ते सहित सभी अनुशासन एवं अपील आदि से सम्बन्धित विषय सम्बन्धित पदाधिकारी/कर्मी से संबंध रखने वाले तत्समय प्रवृत्त वेतनमानों/नियमावलियों/संहिताओं आदि से शासित होंगे।
(4) राज्य सरकार द्वारा न्यायाधिकरण को उपलब्ध कराये गये पदाधिकारी एवं कर्मचारी न्यायाधिकरण में पदस्थापन की अवधि के दौरान अध्यक्ष के प्रशासनिक नियंत्रण में रहेंगे।
बिहार-राज्यपाल के आदेश से, सी0 अशोकवर्धन, प्रधान सचिव।
———— अधी/क, सिचवालय मुिणालय, (cid:18)बहार, पटना (cid:26)ारा ूकािशत एवं मु3ित। (cid:18)बहार गजट (असाधारण) 180-571+750-ड(cid:15)0ट(cid:15)0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in