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6 सितम्बर 2010
सं0-22/नि.सि. (मुक0) जम-19-60/2009-1306—श्री चन्द्र कुमार दास, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, गिरीडीह, झारखंड सम्प्रति सेवा निवृत, को कोदाय बॉंक बॉंध निर्माण में बरती गयी अनियमितता के लिये प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप जल संसाधन विभाग, झारखंड, रॉंची के आदेष संख्या 3502, दिनांक 27 अगस्त 2002 द्वारा निलंबित किया गया। जल संसाधन विभाग, झारखंड, रॉंची के संकल्प संख्या 2861, दिनांक 05 सितम्बर 2002 द्वारा श्री दास के विरूद्ध असैनिक सेवा (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 1930 के नियम 55 के तहत विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गई। जॉंच पदाधिकारी के पत्रांक 1462, दिनांक 11 नवम्बर 2003 द्वारा जॉंच प्रतिवेदन झारखंड सरकार को प्राप्त कराया गया जिसकी समीक्षा झारखंड सरकार के स्तर पर की गई। झारखंड सरकार द्वारा समीक्षोपरांत पाया गया कि श्री दास के देख-रेख में उक्त वर्णित बॉंध का रूपांकण ऑंकड़ों का संकलन हुआ एवं उन्हीं के पर्यवेक्षण में योजना का निर्माण कराया गया। उड़नदस्ता द्वारा अपने प्रतिवेदन में रूपांकण ऑंकड़ों का संकलन एवं स्थल पर वास्तविक निर्माण कार्य, दोनों ही त्रुटिपूर्ण पाया गया। प्रमाणित आरोपों के लिए जल संसाधन विभाग झारखंड, रॉंची द्वारा श्री दास तत्का0 का0अ0 (निलंबित) को निम्न दण्ड देने का निर्णय प्रस्तावित किया गया-
(क) निलम्बन अवधि में मात्र जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा। (ख) बर्खास्तगी (डिसमिसल)।
इस बीच श्री दास का अंतिम कैडर बॅंटवारा होने के उपरांत बिहार राज्य संवर्ग आवंटित हो जाने के फलस्वरूप जल संसाधन विभाग, झारखंड, रॉंची के अधिसूचना संख्या 3734, दिनांक 04 सितम्बर 2004 द्वारा जल संसाधन विभाग, बिहार में योगदान देने हेतु निलंबित अवस्था में ही इन्हें विरमित कर दिया गया, जिसके संदर्भ में इनके द्वारा जल संसाधन विभाग, बिहार में योगदान दिया गया। जल संसाधन विभाग, झारखंड के पत्रांक 1266, दिनांक 31 मई 2007 द्वारा श्री दास के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही से संबंधित संचिका संख्या 8/ज0सं0 (नि0)-ल0सिं0-48/02 की छाया प्रति, जल संसाधन विभाग, बिहार को प्राप्त कराते हुए उक्त वर्णित दंड संसूचित करने का अनुरोध किया गया। झारखंड सरकार से प्राप्त कराये गये संचिका में उपलब्ध अभिलेखों की समीक्षा बिहार सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत पाया गया कि जॉंच प्रतिवेदन में जॉंच पदाधिकारी द्वारा श्री दास के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित पाया गया है। झारखंड सरकार द्वारा श्री दास के विरूद्ध गठित आरोपों को प्रमाणित पाये जाने के उपरान्त 2 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 25 अ+तूबर 2010 ही उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का निर्णय लिया गया है। वर्णित स्थिति में बिहार सरकार द्वारा भी झारखंड सरकार द्वारा लिये गए निर्णय के आलोक में श्री दास को निम्न दण्ड संसूचित करने को प्रस्तावित किया गया।
(क) बर्खास्तगी (डिसमिसल)। (ख) निलम्बन अवधि में मात्र जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।
श्री दास के दिनांक 31 जुलाई 2008 को सेवा निवृत हो जाने के कारण उनके सेवा से बर्खास्तगी के प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयेग की सहमति प्राप्त नहीं हो सकी। तत्पश्चात विभागीय आदेष संख्या 119, दिनांक 14 अक्तूबर 2008 द्वारा इनके सेवा निवृति की तिथि से इन्हें निलंबन से मुक्त करने तथा विभागीय आदेष संख्या 120, दिनांक 14 अक्तूबर 2008 द्वारा बिहार पेंषन नियमावली के नियम 43 ''बी'' के तहत कार्रवाई करने का आदेष निर्गत किया गया। 11. उक्त निर्णय के आलोक में बिहार पेंषन नियमावली के नियम 43 ''बी'' के तहत विभागीय पत्रांक 844, दिनांक 14 अक्तूबर 2008 द्वारा श्री दास से द्वितीय कारण पृच्छा की गई। उनसे प्राप्त स्पष्टीकरण एवं उपलब्ध अभिलेखाें के आधार पर मामले की सरकार के स्तर पर समीक्षा की गई। समीक्षोपरांत पाया गया कि श्री दास द्वारा उन्हीं तथ्यों को रखा गया है कि जिन तथ्यों को पूर्व में विभागीय कार्यवाही के क्रम में रखा गया था। समीक्षोपरांत सरकार द्वारा उक्त वर्णित आरोप प्रमाणित पाया गया। उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए इन्हें निम्न दंड संसूचित करने का निर्णय प्रस्तावित किया गया -
(क) शत-प्रतिषत पेंषन एवं उपादान पर सदा के लिए रोक। (ख) निलंबन अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा।
श्री दास को उक्त वर्णित दंड देने के प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना के पत्रांक 848, दिनांक 16 जुलाई 2009 द्वारा उक्त दंड के प्रस्ताव पर सहमति प्रदान की गई। उक्त वर्णित दंड के प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग पटना की सहमति के उपरांत मामले को सरकार के स्तर पर समीक्षा की गई। समीक्षोपरांत उक्त वर्णित प्रमाणित आरोपों के लिये सरकार द्वारा विभागीय अधिसूचना सं0 898, दिनांक 07 सितम्बर 2009 द्वारा श्री दास को निम्न दंड संसूचित किया गया।
(क) शत-प्रतिषत पेंषन एवं उपादान पर सदा के लिए रोक। (ख) निलंबन अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा।
उक्त दंडादेश के विरूद्ध श्री दास द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी.डब्लू.जे.सी. संख्या 15331/2009 (चन्द्र कुमार दास बनाम बिहार सरकार एवं अन्य) दायर किया गया जिसमें दिनांक 01 दिसम्बर 2009 को माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा न्याय निर्णय पारित करते हुए कहा गया कि वादी के प्रतिनिधि का कहना है कि इस मामले में अन्य पदाधिकारियों को दोषमुक्त कर दिया गया है। इस आधार पर माननीय न्यायालय द्वारा श्री दास को संसूचित दंडादेश अधिसूचना संख्या 898 दिनांक 07 सितम्बर 2009 को निरस्त कर दिया गया एवं साथ ही न्याय निर्णय प्राप्ति के 6 माह के अन्दर बिहार सरकार को झारखंड सरकार के सहयोग से नया तार्किक आदेश निर्गत करने का न्यायादेश पारित किया गया। न्याय निर्णय में यह भी कहा गया कि यदि वादी (श्री दास) व्यक्तिगत सुनवाई के लिए अनुरोध करते हैं तो उनकी व्यक्तिगत सुनवाई की जाय। उक्त न्याय निर्णय के आलोक में श्री दास द्वारा उनके पत्रांक शून्य दिनांक 08 दिसम्बर 2009 द्वारा व्यक्तिगत सुनवाई करने हेतु विभाग से अनुरोध किया गया। जिसके अनुपालन में समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक 1588 दिनांक 23 दिसम्बर 2009 द्वारा श्री हरिनारायण, अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनेटरिंग अंचल सं0-3, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को श्री दास की सुनवाई कर प्रतिवेदन प्राप्त कराने हेतु प्राधिकृत किया गया। साथ ही उक्त पत्र की प्रतिलिपि जल संसाधन विभाग, झारखंड को भेजते हुए संबंधित अभिलेखों को भेजने का अनुरोध किया गया एवं प्रतिलिपि श्री दास को देते हुए उन्हें निदेश दिया गया कि वे अपना पक्ष श्री हरिनारायण, अधीक्षण अभियंता के समक्ष रखें। उक्त अनुरोध के आलोक में श्री हरिनारायण अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 214, दिनांक 02 फरवरी 2010 द्वारा प्रतिवेदन प्राप्त कराया गया। कई स्मारों के उपरांत जल संसाधन विभाग, झारखंड के पत्रांक 301, दिनांक 27 मार्च 2010 द्वारा प्रतिनिधि के माध्यम से प्रतिवेदन एवं अभिलेखों की छाया प्रति भी उपलब्ध करायी गयी। श्री दास के सुनवाई हेतु प्राधिकृत श्री हरिनारायण, अधीक्षण अभियंता से प्राप्त प्रतिवेदन उपलब्ध अभिलेखों एवं जल संसाधन विभाग, झारखंड से प्राप्त अभिलेखों की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री दास को एक और अवसर देते हुए प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार के स्तर पर सुनवाई करने का निर्णय लिया गया। तदुनसार प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार द्वारा श्री दास की व्यक्तिगत सुनवाई दिनांक 29 जून 2010 को की गई। उनसे आरोपाें के संबंध में बिन्दुवार पूछताछ की गई एवं श्री दास द्वारा बिन्दुवार मौखिक जवाब दिया गया। श्री दास द्वारा सुनवाई के दौरान दिये गये जवाब, एवं साक्ष्य तथा उपलब्ध अभिलेखेां के आधार पर प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार का सुनवाई से संबंधित प्रतिवेदन निम्न है-3 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 25 अ+तूबर 2010
| क्र0 | आरोप | श्री दास द्वारा दिया गया जवाब | समीक्षा/मंतव्य |
| 1 | श्री दास जब कार्यपालक अभियंत लघु सिंचाई प्रमंडल गिरीडीह के पद पर पदस्थापित थे तब गिरीडीह जिला के तिसरी प्रखंडान्तर्गत कोदाई बॉंक बॉंध झरना नाला मध्यम सिंचाई योजना के प्राक्कलन की स्वीकृति से लेकर योजना निर्माण के पर्यवेक्षण तक उनके द्वारा अनियमितता बरती गयी जिसके चलते उक्त बॉंध टूट गया। उक्त बॉंध के टूटने के कारण उनके विरूद्ध निम्न आरोप गठित की गई। जिस प्राक्कलन की प्रशासनिक स्वीकृति दी गयी तकनीकी स्वीकृति के क्रम में उक्त प्राक्कलन के ऑंकड़ों को ही एक षडयंत्र के तहत बदल दिया गया। यथा प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त प्राक्कलन म ं े 67.5 मी0सी0 ओ0टी0 75 मी0 रौक टो तथा 32 मी0 लम्बाई के स्केप का प्रावधान था। जिसे घटाकर सी0ओ0टी0 तथा रौक टो दोनों को 32 मी0 तथा स्केप की लम्बाई को 18.0 मीटर कर दिया गया। मूल प्राक्कलन में 3.5 वर्ग किमी0 जल ग्रहण क्ष्ेत्र को 1.65 वर्ग किमी0 कर दिया गया जिससे बॉंध के अक्ष को अप स्ट्रीम में शिफ्ट करने की सम्भावना बनती है जिसका कोई तकनीकी औचित्य भी अंकित नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य ऑकड़ों में भी बदलाव का कोई औचित्य अंकित नहीं किया गया है। प्राथमिक स्वीकृति में बॉंध की लम्बाई 122 मी0 तथा अधिकतम उॅचाई 14.0 मी0 है। परन्तु तकनीकी स्वीकृति के क्रम में इसकी लम्बाई 112 मी0 तथा उॅचाई 14.72 मी0 कर परिवर्तित कर दिया गया है। जिसके लिए कोई तकनीकी कागजात एवं जानकारी उपलब्ध नहीं करायी गयी। स्पष्टतः योजना की तकनीकी स्वीकृति प्रस्ताव मनमाने ढंग से दी गयी। प्राक्कलन के मदों की मात्रा की गणना एन.एस.एल. के आधार पर नहीं किया गया है। बॉंध के स्थायित्व हेतु तीन सबसे महत्वपूर्ण अवयवों, स्केप, सी0ओ0टी बॉंध की उॅचाई तथा रौक टो के प्रावधानों में भारी फेरबदल बिना किसी तकनीकी औचित्य के किया गया जो अवांछित है। प्रशासनिक स्वीकृति के प्रावधानों में भौतिक अन्तर की स्थिति में पुनरीक्षित | श्री दास तत्कालीन, का0अ0 द्वारा पूर्व में दिये गये बचाव बयान एवं उसके साथ संलग्न विभिन्न अनुलग्नकों को ही मुख्य आधार बनाते हुए पुरानी बातें ही दुहरायी गयी हैं। अपने मौखिक बचाव बयान में उनके द्वारा आरोपवार किसी प्रकार का स्पष्ट बयान नहीं दिया गया है परंतु बार-बार यह मौखिक रूप से कहा गया है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री, झारखंड सरकार का क्षेत्र होने के कारण योजना संबंधी सभी कार्य बगैर औपचारिकता पूरी किये ही कार्य कराने एवं समय से पूर्व समाप्त करने हेतु उच्च स्तरीय दबाव बहुत अधिक था, जिसके फलस्वरूप सभी कार्यवाही नियमानुसार सम्पादित नहीं की जा सकी। आरोपित पदाधिकारी द्वारा टोपो सीट की छाया प्रति के साथ प्राक्कलन समर्पित करने का प्रेषण पत्र साक्ष्य के रूप में संलग्न किया गया है। साथ ही प्रशासनिक स्वीकृति प ्रदान करने के क्रम में विभाग द्वारा की गई टिप्पणी एवं रूपांकण मुख्य अभियंता के पत्र की छाया प्रति संलग्न किया गया है। | प्रशासनिक स्वीकृति प्राक्कलन में 67.5 मी0 सी0ओ0टी0, 75 मी0 रौक टो, 32 मी0 स्केप की लम्बाई के प्रावधान के स्थान पर समर्पित कार्यकारी प्राक्कलन में सी0ओ0टी0, रौक टो की लम्बाई 32 मी0 एवं स्केप की लम्बाई घटाकर 18 मी0 कर समर्पित किया गया एवं इसी की तकनीकी स्वीकृति प्राप्त की गयी। प्रशासनिक स्वीकृति प्राक्कलन में जल ग्रहण क्षेत्र 3.5 वर्ग किमी0 के स्थान पर कार्यकारी प्राक्कलन में मात्र 1.65 वर्गकिमी0 का प्रावधान किया गया है साथ ही बॉध की लम्बाई एवं उॅचाई में भी परिवर्तन किया गया है। इससे साफ प ्रतीत होता है कि प्रशासनिक स्वीकृत प्राक्कलन में किये गये प्रावधान की मात्रा में उनकी कमी दर्शाते हुए कार्यकारी प्राक्कलन में प्रावधान किया गया है एवं मात्र 1.65 वर्ग किमी0 के ऑंकड़े के आधार पर रूपांकण स्वीकृति प्राप्त की गयी। प ्रथमतः कार्य का प्राक्कलन 11.10.01 को ही समर्पित किया गया था। तत्पश्चात् सर्वेक्षण आकड़ा रूपांकण मुख्य अभियंता को समर्पित किया गया। मुख्य अभियंता, रूपांकण स गठन ं द्वारा भी समर्पित ऑंकड़ा को सही नहीं ठहराते हुए पुनः आकलन करने हेतु निर्देश दिया गया है। साथ ही मुख्य अभियंता, लघु सिंचाई रॉची द्वारा भी हर-हाल में दिनांक 19.01.02 तक रूपांकण संगठन से अनुमोदन प्राप्त करने का निदेश था। बॉंध के टूटने से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि कैचमेंट एरिया (जल अधिग्रहण क्षेत्र) का सही आकलन नहीं किये जाने एवं गलत ऑकड़ों के प्रेषित किए जाने के फलस्वरूप वांछित रूपांकित क्षमता के अनुरूप बॉध्ां एवं अन्य अवयवों का |
| 2 3 | स्वीकृति प्राप्त किये बिना तकनीकी स्वीकृति का प्रस्ताव देना बिहार लोक निर्माण कार्य संहिता के अनुरूप नहीं है। अ ालोच्य योजना की प्रशासनिक स्वीकृति से भिन्न राशि की तकनीकी स्वीकृति का प्रस्ताव किया गया। उक्त योजना की प्रशासनिक स्वीकृति रू0 87,59,845.00 पर दी गयी थी जिसमें रू0 10,85,155.00 अधिक बढ़ाकर रू0 98,45,000.00 पर तकनीकी स्वीकृति का प्रस्ताव दिया गया जो तकनीकी परि0 कोषांग के संकल्प संख्या 948 दिनांक 16.07.86 के विरूद्ध है। प ्राक्कलन स्वीकृति के पूर्व ही निविदा आमंत्रण करने, परिमाण विपत्र की स्वीकृति का प्रस्ताव देने तथा मिटटी भराई कार्य सम्पादित के बाद लीड चार्ट की स्वीकृति का प्रस्ताव के वे दोषी हैं। | इ स हेतु कोई भी साक्ष्य समर्पित नहीं किया गया है। क ार्यपालक अभियंता द्वारा दिनांक 07.02.02 को प्राक्कलन प्रमाण विपत्र के साथ समर्पित किया गया है। साथ ही दिनांक 15.02.02 एवं 22.05.02 को लीड स्वीकृति प्रस्ताव संबंधी पत्र की छाया प ्रति संलग्न की गई है। | निर्माण नहीं हो सका जो बॉध टूटने का मुख्य कारण बना। इस हेतु श्री दास, तत्तकालीन का0अ0 मुख्य रूप स े जवाबदेह हैं। व र्णित स कल्प ं में स्पष्ट प्रावधान है कि जिन-जिन परियोजनाओं या उनके उपशीर्षो के मदों की स्वीकृति ं विस्तृत अनुसंधान के आधार पर दी जाती ह ै, उनमें अनुसंधान की कमी के कारण 5 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी सामान्य रूप से मान्य नहीं होगी। फिर भी यदि इनकी अनुमान्यता होती है कि प्राक्कलन में प्रावधान पर्याप्त नहीं है तो पुनरीक्षित प्राक्कलन तैयार करें एवं पुनरीक्षित प्रशासनिक अनुमोदन प्राप्त कर कार्य प्रारंभ करें। परन्तु ऐसा नहीं किया गया। साथ ही प्रशासनिक स्वीकृति ह े तु समर्पित प्राक्कलन एवं कार्यकारी स्वीकृति प्राक्कलन के विभिन्न मुख्य अवयवों में बहुत अधिक भिन्नता पायी गयी। जो स्पष्टतः गलत मंशा से की गयी कार्यवाही का द्योतक है। म ुख्य अभि0 लघु सिंचाई, रॉंची के द्वारा प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति 20.03.02 को एवं परिमाण विपत्र की स्वीकृति दिनांक 09.03.02 को दी गयी जबकि निविदा बिना प्राक्क्लन की तकनीकी स्वीकृति प्राप्त किये एवं बिना परिमाण विपत्र अनुमोदित कराये दिनांक 26.02.02 को खोली गयी है स्पष्टतः दिनांक 26.12.02 तक प्राक्कलन एवं प्रमाण विपत्र की स्वीकृति के अभाव में निविदा प्राप्ति की तिथि को बढ़ायी जा सकती थी, जो नहीं की गई। जो ग भीर अनियमितता को दर्शाता ं है। |
| 4 5 6 7 | आलोच्य योजना के डैम फिल कार्य में मिटटी का लेयर वाइज कम्पैक्शन एवं अन्य गुण नियंत्रण कार्य समुचित ढंग से नहीं करने के लिए पूर्ण रूपेण उत्तरदायी हैं। त कनीकी परीक्षण कोषांग के पत्रांक 2347 दिनांक 31.12.03 के अनुसार बॉंध कार्य हेतु कार्यपालक अभियंता को शत प्रतिशत मापी की जॉंच करने का निदेश है। किन्तु उनके द्वारा सरकारी प्रावधानों के आलोक में मापी की समुचित जॉंच नहीं की गयी। जबकि प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र का कार्य उनके ही कार्यकाल में कराया गया है। इस प्रकार कार्यो की ं मापी की जॉंच समुचित रूप से नहीं की गई। अ ालोच्य योजना के निर्माण कार्य की सही स्थलीय पर्यवेक्षण नही करने तथा अपने अधीनस्थ पदाधिकारियों को समुचित समय पर अपेक्षित निदेश नहीं देने के लिए पूर्णरूपेण दोषी हैं। इ स प ्रकार उनके द्वारा अपरधिक षडयंत्र के तहत योजना के रूपांकण एवं कार्यान्वयन में अनियमितता कर सरकारी राशि का गबन एवं दुरूपयोग की स्थिति उत्पन्न की गयी। | इस आरोप के क्रम में श्री दास द्वारा मुख्य अभियंता का पत्र 1238 दिनांक 16.05.02 एवं अभियंता प्रमुख का निरीक्षण प्रतिवेदन की छाया प ्रति समर्पित किया गया। साथ ही गुण नियंत्रण प्रमंडल द्वारा समर्पित प्रतिवेदन की छाया प्रति संलग्न की गई । इ स आरोप के क्रम में श्री दास द्वारा प्री-लेवल बुक की छाया प्रति उपलब्ध करायी गई। | संबंधित गुण नियंत्रण प्रमंडल के पदाधिकारी द्वारा टूटान बिन्दु के निचले भाग का चार अदद नमूनों का संकलन कर जॉंचोंपरांत संपीडन 82.50 प्रतिशत पाया गया जो विशिष्टि के अनुरूप नहीं है। अभियंता प्रमुख के निरीक्षण की तिथि तक डैम फिल कार्य प्रारंभ ही नहीं था एवं साथ ही जल्दबाजी में कार्य कराने पर विशिष्टी के अनुरूप कार्य नहीं होने की आशंका मुख्य अभियंता द्वारा व्यक्त की गई। अतः आरोप प्रमाणित होता है। त कनीकी परीक्षण कोषांग के पत्रांक 2347 दिनांक 31.12.83 में निहित प्रावधान के आलोक में डैम एवं इन्बैकमेंट के मामले में स0अ0 एवं क0अ0 के द्वारा कार्याें का अनिवार्य रूप से शत प्रतिशत जॉंच की जानी चाहिए जो नहीं की गई है। समर्पित लेवल बुक में कार्यपालक अभियंता द्वारा शत-प्रतिशत जॉच नहीं की गई है। का0अ0 इस हेतु दोषी पाये गये हैं। उपरोक्त आरोपाें की प्रमाणिकता से यह अरोप अपने आप स्वतः प्रमाणित होता है। अ ारोप सं0-1 से 4 के निष्कर्ष के आधार पर यह सही प्रतीत होता है। |
प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार द्वारा प्राप्त प्रतिवेदन की सरकार के स्तर पर समीक्षा की गयी। पाया गया कि प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार द्वारा सभी आरोप प्रमाणित पाया गया। सरकार द्वारा भी समीक्षोपरांत श्री दास के विरूद्ध लगाये गये सभी आरोप प्रमाणित पाये गये। उक्त वर्णित याचिका सी.डब्लू.जे.सी. संख्या 15331/2009 (चन्द्र कुमार दास बनाम बिहार सरकार) एवं में दिनांक 01.12.09 को पारित न्याय निर्णय के आलोक में झारखंड सरकार से इस कार्य से संबंधित अन्य पदाधिकारियों के विरूद्ध की गयी विभागीय कार्यवाही से संबंधित प्राप्त अभिलेखों के समीक्षोपरांत पाया गया कि जल संसाधन विभाग, झारखंड द्वारा उक्त कार्य से संबंधित अन्य दोषी पदाधिकारियों जो झारखंड सरकार के अधीन कार्यरत थे को समीक्षोपरांत निम्न दंड संसूचित किया गया है।6 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 25 अ+तूबर 2010
| क्र ॰ | आरोपित पदा0 का नाम | संसूचित दंड |
| 1 | श्री शिवजी शर्मा, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु सिंचाई, रॉची | (1) निलंबन अवधि में मात्र जीवन यापन भत्ता देय होगा जबकि पेंशन आदि परियोजन के लिए यह अवधि कार्य अवधि मानी जायेगी। (2) पेंशन नियमावली 43 बी0 के अंतर्गत सेवा निवृति के बाद जब तक पेंशन देय होगा तबतक पेंशन से 50 प्रतिशत की कटौती। |
| 2 | श्री बलदेव राम, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, लघु सिंचाई अंचल, हजारीबाग | तदैव |
| 3 | श्री निवास चौधरी, सहायक अभियंता, लघु सिंचाई अनुमंडल, डुमरी | (1) निलंबन अवधि में मात्र जीवन यापन भत्ता देय होगा। (2) सेवा से बर्खास्तगी। |
| 4 | श्री प्रमोद कुमार मालवीय, कनीय अभियंता, लघु सिंचाई अनुमंडल, डुमरी | (1) निलंबन अवधि में मात्र जीवन यापन भत्ता देय होगा जबकि पेंशन आदि परियोजन के लिए यह अवधि कार्य अवधि मानी जायेगी। (2) पॉच वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक। |
| 5 | श्री डी.डी. राम, तत्कालीन अभियंता प्रमुख | दोषमुक्त। |
| 6 | श्री विनोद कुमार श्रीवास्तव, तत्कालीन उप सचिव (प्रबं0) अतिरिक्त प्रभार कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल, रॉंची। | दोषमुक्त। |
| 7 | श्री रविभूषण राय, तत्कालीन सहायक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, जमुआ। | दो वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक। |
| 8 | श्री अब्दुल क्यूम, सहायक अभियंता, मुख्य अभियंता का कार्यालय, लघु सिंचाई, रॉंची। | 1- निन्दन 2- तीन वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। माननीय उच्च न्यायालय, झारखंड, रॉंची द्वारा वेतनवृद्धि पर रोक का दंड निरस्त। |
| 9 | श्री अनिल कुमार सिंह, सहायक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल, रॉंची। | दोषमुक्त। |
| 10 | श्री महादेव कुम्हार, सहायक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल, रॉंची। | दोषमुक्त। |
उपरोक्त दस पदाधिकारियों में से झारखंड सरकार द्वारा छः पदाधिकारियों को दंडित किया गया एवं चार पदाधिकारियों के दोषमुक्त किया गया है। समीक्षा के क्रम में पाया गया कि एक ही कार्य के संपादन में विभिन्न स्तर के पदाधिकारियों का दायित्व अलग-अलग होता है। श्री दास कार्यपालक अभियंता के पद पर पदस्थापित थे। अतः इनका दायित्व अन्य पदाधिकारियों से गुरूत्तर था। समीक्षोपरांत सरकार द्वारा सी.डब्लू.जे.सी. सं0 15331/2009 में दिनांक 01 दिसम्बर 2009 को पारित न्याय निर्णय का अनुपालन करते हुए श्री दास सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता को पूर्व मंें संसूचित दंड से संबंधित अधिसूचना सं0 898 दिनांक 07 सितम्बर 2009 को निरस्त करने का निर्णय लिया गया साथ ही श्री दास द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा, सुनवाई के पश्चात् प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार से प्राप्त प्रतिवेदन एवं7 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 25 अ+तूबर 2010 झारखंड सरकार से प्राप्त प्रतिवेदन एवं अभिलेखों के समीक्षोपरांत सरकार द्वारा उक्त वर्णित प्रमाणित आरोपों के लिये श्री दास, से.नि. कार्यपालक अभियंता को निम्न दंड संसूचित करने का निर्णय लिया गया- (क) 50 प्रतिशत (पचास प्रतिशत) पेंशन एवं पूर्ण (शत-प्रतिशत) उपादान पर सदा के लिये रोक। (ख) निलंबन अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा। परंतु उक्त अवधि की गणना पेंशन के प्रयोजनार्थ की जायेगी। उपरोक्त वर्णित स्थिति में श्री चन्द्र कुमार दास, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, गिरीडीह, झारखंड सम्प्रति जल संसाधन विभाग, बिहार से सेवा निवृत को पूर्व में संसूचित दंड से संबंधित अधिसूचना संख्या 898 दिनांक 07 सितम्बर 2009 को निरस्त किया जाता है। साथ ही श्री दास, से.नि. कार्य0 अभि0 को उक्त वर्णित प्रमाणित आरोपों के लिये बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 'बी' के तहत निम्न दंड संसूचित किया जाता है।
(क) 50 प्रतिशत (पचास प्रतिशत) पेंशन एवं पूर्ण (शत-प्रतिशत) उपादान पर सदा के लिये रोक। (ख) निलंबन अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा। परंतु उक्त अवधि की गणना पेंशन के प्रयोजनार्थ की जायेगी।
उक्त दंड श्री दास, से.नि. कार्य0 अभि0 को संसूचित किया जाता है।
बिहार-राज्यपाल के आदेश से, कृष्ण कुमार प्रसाद, सरकार के उप-सचिव।
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अधी-क, सिचवालय मुिणालय, (cid:18)बहार, पटना (cid:26)ारा ूकािशत एवं मु3ित। (cid:18)बहार गजट (असाधारण) 724-571+10-ड(cid:15)0ट(cid:15)0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in