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âìCäeââ=^=2 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 बिहार लोकायुक्त विधेयक, 2011 [Ñç∫ä∫ÑçCOR]OMNN⁄
प्रस्तावना।-लोकायुक्त संस्था, उनकी शक्तियों एवं कृत्यों एवं सभी श्रेणी के लोकसेवकों के विरूद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की त्वरित जाँच एवं अभियोजन हेतु प्रावधान करने के लिए विधेयक ।
भारत गणराज्य के बासठवें वर्ष में बिहार राज्य विधान मंडल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
अध्याय-I प्रारंभिक 1 (1) संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ । - यह अधिनियम बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 कहा जा सकेगा। (2) इसका विस्तार सम्पूर्ण बिहार राज्य में होगा। (3) यह उस तिथि से प्रवृत्त होगा जिसे राज्य सरकार, राजपत्र में, अधिसूचना द्वारा, नियत करे जो राज्यपाल की सहमति की तिथि से तीस दिनों से अनधिक होगी । 2 परिभाषाएँ । - (1) इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) किसी लोक सेवक के संबंध में ''आरोप'' से अभिप्रेत है यह अभिपुष्टि कि ऐसे लोक सेवक ने - (i) अपनी स्थिति का दुरुपयोग स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई अनुचित लाभ या अनुग्रह अभिप्राप्त करने के लिए या किसी अन्य व्यक्ति को असम्यक हानि पहुँचाने या कठिनाई में डालने अथवा राज्य को हानि पहुँचाने के लिए किया हो;
(ii) एक लोक सेवक के रूप में, अपने कृत्यों का निर्वहन करने में वैयक्तिक हित अथवा अनुचित, भ्रष्ट हेतु से प्रेरित था; अथवा
(iii) लोक सेवक अपनी हैसियत में भ्रष्टाचार या सत्यनिष्ठा की कमी का दोषी हो; (iv) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन दंडनीय कुछ भी किया हो ।
(ख) ''न्यायपीठ'' से अभिप्रेत है लोकायुक्त की न्यायपीठ; (ग) ''अध्यक्ष'' से अभिप्रेत है लोकायुक्त का अध्यक्ष; (घ) ''सक्षम प्राधिकार'' से अभिप्रेत है-
(i) ''मुख्य मंत्री'' के संबंध में राज्यपाल; (ii) ''मंत्रिपरिषद के किसी सदस्य'' के संबंध में मुख्य मंत्री; (iii) ''किसी मंत्री या सभापति से भिन्न राज्य विधान परिषद् के किसी सदस्य'' के संबंध में राज्य विधान परिषद् का सभापति और ''किसी मंत्री या अध्यक्ष से भिन्न राज्य विधान सभा के किसी सदस्य'' के संबंध में राज्य विधान सभा का अध्यक्ष;
और, ''विधानपरिषद् के सभापति एवं विधान सभा के अध्यक्ष'' के संबंध में राज्यपाल; (iv) सरकार के विभाग में किसी अधिकारी से अभिप्रेत है नियुक्ति प्राधिकारी; (v) अध्यक्ष या निदेशक । -किसी निकाय या पर्षद या निगम अथवा स्थानीय स्वशासन सहित प्राधिकार, अथवा पंचायती राज संस्थाओं सहित स्थानीय प्राधिकार राज्य अधिनियम के अधीन गठित या स्थापित शहरी स्थानीय निकाय या कंपनी या स्वशासी निकास (चाहे जिस नाम से वह जाना जाय) अथवा सोसाइटी या व्यक्तियों का संगठन या न्यास अथवा गैर सरकारी संगठन (चाहे तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत हो अथवा नहीं) जो पूर्णतः या अंशतः सरकार द्वारा वित्त पोषित अथवा विदेशी अभिदाय (विनियम) अधिनियम, 1976 के अधीन किसी रकम की अथवा जनता से चंदा की प्राप्ति में हो, राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त या दिये जाने वाले अनुदान अथवा विहित राशि से अधिक भुगतान की प्राप्ति में है अथवा राज्य सरकार द्वारा पूर्णतः या अंशतः वित्त पोषित अथवा इसके द्वारा नियंत्रित से अभिप्रेत है ऐसी निकाय या पर्षद या निगम या प्राधिकार या कंपनी या सोसाइटी अथवा स्वशासी निकाय के प्रभारी मंत्री;
(vi) राज्य अधिनियम के अधीन स्थापित या गठित और पूर्ण या आंशिक रूप से राज्य सरकार द्वारा वित्त प्रदत्त या नियंत्रित किसी निकाय या पर्षद या निगम या प्राधिकार या कंपनी या सोसाइटी या स्थानीय स्वशासन, स्थानीय प्राधिकार, पंचायती राज संस्थाएँ एवं शहरी स्थानीय निकाय सहित अथवा कंपनी अथवा सोसाइटी अथवा स्वशासी निकाय (चाहे जिस किसी नाम से पुकारा जाय) के किसी पदाधिकारी से अभिप्रेत है, ऐसी निकाय या पर्षद या निगम या प्राधिकार या कंपनी या सोसाइटी या स्वशासी निकाय का प्रधान;
(vii) सरकार द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से वित्त प्रदत्त या विदेशी अभिदाय (विनियम) अधिनियम, 1976 के अधीन कोई राशि प्राप्त या जनता से चंदा प्राप्त प्रत्येक अन्य सोसाइटी या व्यक्तियों3 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 का संघ या न्यास(तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन निबंधित हो या नहीं) का कोई निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य पदाधिकारी के संबंध में, सोसाइटी का प्रधान या व्यक्तियों के संघ का प्रधान या न्यास का प्रधान;
(ङ) ''पूर्ण न्यायपीठ'' से अभिप्रेत है अध्यक्ष एवं लोकायुक्त के सभी विद्यमान सदस्यों को मिलाकर लोकायुक्त की न्यायपीठ;
(च) ''परिवाद'' से अभिप्रेत है किसी व्यक्ति द्वारा यह दावा कि उसे कुप्रशासन के चलते अन्याय या असम्यक् कष्ट हुआ है;
(छ) ''जाँच'' से अभिप्रेत है लोकायुक्त द्वारा इस अधिनियम के अधीन संचालित प्रत्येक जाँच; (ज)''न्यायिक सदस्य'' से अभिप्रेत है इस रूप में नियुक्त लोकायुक्त का कोई न्यायिक सदस्य; (झ) ''लोकायुक्त'' से अभिप्रेत है इस अधिनियम की धारा-3 के अधीन स्थापित संस्था; (ञ) ''सदस्य'' से अभिप्रेत है लोकायुक्त का कोई सदस्य; (ट) ''मंत्री'' से अभिप्रेत है राज्य के लिए मंत्रिपरिषद का कोई सदस्य (चाहे जिस किसी नाम से पुकारा जाय) और इसमें कोई राज्य मंत्री, कोई उप-मंत्री एवं संसदीय सचिव शामिल हैं;
(ठ) ''अधिसूचना'' से अभिप्रेत है राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना और पद ''अधिसूचित'' का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(ड) ''पदाधिकारी'' से अभिप्रेत है लोक सेवा में या राज्य के कार्यकलाप से सम्बद्ध पद पर नियुक्त कोई व्यक्ति;
(ढ) ''लोक प्राधिकार'' से अभिप्रेत है -
(i) राज्य सरकार की कोई स्थापना या निकाय अथवा संस्था; (ii) कोई स्थानीय प्राधिकार, पंचायती राज संस्थाएँ एवं शहरी स्थानीय निकाय सहित स्थानीय स्वशासन;
(iii) राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम के अधीन स्थापित या गठित और राज्य सरकार द्वारा पूर्णतः या अंशतः वित्त पोषित अथवा उसके द्वारा नियंत्रित कोई निकाय/बोर्ड/निगम /प्राधिकार/कंपनी/सोसाईटी/स्वशासी निकाय (चाहे वह जिस नाम से जाना जाता हो);
(ण)''विहित'' से अभिप्रेत है इस अधिनियम के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा विहित; (त)''लोक सेवक'' से अभिप्रेत है धारा-16के खंड (1) में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति; (थ) ''विनियम'' से अभिप्रेत है इस अधिनियम के अधीन बनाये गये विनियम; (द) ''अनुसूची'' से अभिप्रेत है इस अधिनियम की कोई अनुसूची; (ध) ''विशेष न्यायालय'' से अभिप्रेत है भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 3 की उप धारा-(1) के अधीन स्थापित कोई विशेष न्यायालय अथवा बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अधीन स्थापित विशेष न्यायालय।
(न) ''अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर)'' से अभिप्रेत है किसी लोक प्राधिकार का कोई व्यक्ति जो उस लोक प्राधिकार में भ्रष्टाचार के संबंध में कोई जानकारी रखता हो ।
(2) इस अधिनियम में प्रयुक्त एवं अपरिभाषित शब्दों या पदों के वही अर्थ होंगे जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में क्रमशः उनके लिए समनुदेशित किये गये हों।
अध्याय-II
लोकायुक्त की स्थापना 3. लोकायुक्त की स्थापना । -(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही, इस अधिनियम के अधीन की गई शिकायतों के संबंध में जाँच करने के प्रयोजन के लिए, ''लोकायुक्त'' नामक एक संस्था की स्थापना की जाएगी। (2) लोकायुक्त संस्था निम्नलिखित कोे मिलाकर होगी-
(क) एक अध्यक्ष; और (ख) दो सदस्य, परंतु अध्यक्ष एवं दो सदस्यों में से कम-से-कम दो व्यक्ति न्यायिक सदस्य होंगे; परंतु और कि इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पूर्व नियुक्त लोकायुक्त अपने कार्यकाल के पूरा होने तक प्रथम अध्यक्ष के रूप में बने रहेंगे। (3) कोई व्यक्ति निम्नलिखित रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा -
(क) अध्यक्ष या किसी सदस्य के रूप में नियुक्त किये जाने के लिए पात्र होगा यदि वह निर्दोष, सत्यनिष्ठा, उत्कृष्ट योग्यता और प्रतिष्ठा वाला ऐसा व्यक्ति हो जिसके पास पच्चीस वर्षों से अन्यून अवधि का लोक कार्य, प्रशासनिक विधि एवं नीति, शैक्षणिक, वाणिज्य एवं उद्योग, विधि, वित्त अथवा प्रबंधन से संबंधित मामलों में विशेष ज्ञान एवं व्यावसायिक अनुभव हो और पचास वर्षों से अन्यून आयु का हो;
(ख) किसी न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किये जाने के लिए पात्र होगा यदि वह किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या कोई न्यायाधीश हो या रहा हो या किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के4 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 रूप में नियुक्त होने हेतु अर्हित हो और 50 वर्षों से अन्यून आयु का हो । (4) अध्यक्ष या कोई सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा, जो संसद का सदस्य या किसी राज्य या संघ क्षेत्र के विधान मण्डल का सदस्य न हो/ना पूर्व में रहा हो और न्यास या लाभ का कोई पद (अध्यक्ष या कोई सदस्य के रूप में उसके पद से भिन्न) धारण नहीं करेगा या किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होगा या कोई कारोबार नहीं करेगा या कोई वृत्ति नहीं करेगा । (5) अध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य, अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल के समक्ष इस अधिनियम के प्रथम अनुसूची में उपवर्णित प्रपत्र में शपथ लेंगे या प्रतिज्ञान करेंगे । 4. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति और चयन समिति - (1) अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा, निम्नलिखित को मिलाकर बनी एक चयन समिति की अनुशंसा प्राप्त करने के पश्चात्, की जाएगी,-
(क) सभापति, बिहार विधान परिषद् - संयोजक (ख) अध्यक्ष, बिहार विधान सभा - सदस्य (ग) पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामनिर्दिष्ट पटना उच्च न्यायालय के वरिष्ठ पदासीन दो न्यायाधीश - सदस्य (घ) आसन्न उत्तरजीवी बहिर्गामी लोकायुक्त - सदस्य
परन्तु लोकायुक्त के सदस्यों के चयन पर विचार करते समय, विद्यमान अध्यक्ष भी चयन समिति के सदस्य होंगे ।
(2) समिति में मात्र किसी रिक्ति के कारण किसी अध्यक्ष या सदस्य की नियुक्ति अविधिमान्य नहीं होगी। (3) चयन समिति, लोकायुक्त के अध्यक्ष या अन्य सदस्यों का चयन करने के प्रयोजनार्थ और उस रूप में नियुक्ति के लिए विचार किए जाने वाले व्यक्तियों का एक पैनल तैयार करने हेतु एक खोजबीन समिति का गठन करेगी ।
(4) उप-धारा (3) में निर्दिष्ट खोजबीन समिति का कार्यकाल एवं खोजबीन समिति के सदस्य को भुगतेय फीस तथा अन्य भत्ते वही होंगे जो नियमावली के अधीन विहित किए जाएं ।
(5) चयन समिति लोकायुक्त के अध्यक्ष एवं सदस्य के चयन के लिए अपनी स्वयं प्रक्रिया विनियमित करेगी जो पारदर्शी होगी ।
(6) खोजबीन समिति निर्विवाद सत्यनिष्ठा एवं सार्वजनिक जीवन में प्रसिद्धि वाले पाँच व्यक्तियों को मिलाकर होगी तथा उनका चयन ऐसे निम्न व्यक्तियों में से होगा जिन्होंने सेवानिवृत्ति के पश्चात् राजनीति दल की सदस्यता नहीं ली है एवं किसी सरकार के अंतर्गत लाभकारी पद पर कार्यरत नहीं हैं, भारत के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, सेवानिवृत्त न्यायाधीश, भारत के सेवानिवृत्त मुख्य चुनाव आयुक्त, केन्द्रीय सूचना आयोग अथवा राज्य सूचना आयोग के सेवानिवृत्त मुख्य सूचना आयुक्त, संघ लोक सेवा आयोग/बिहार लोक सेवा आयोग के सेवानिवृत्त अध्यक्ष, सेवानिवृत्त कैविनेट सचिव/मुख्य सचिव/भारत सरकार के सेवानिवृत्त सचिव और सेवानिवृत्त मुख्य लेखा नियंत्रक, भारत सरकारः
परन्तु खोजबीन समिति में कम से कम दो सदस्य सर्वोच्च न्यायालय अथवा किसी उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश अथवा न्यायाधीश होने चाहिए ।
(7) खोजबीन समिति व्यक्तियों के पैनल की तैयारी हेतु अनुशंसा के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनायगीः-
(क) खोजबीन समिति बेबसाइट तथा कम से कम दो व्यापक रूप से परिचालित अखबारों के माध्यम से व्यक्तियों अथवा संगठनों से नामनिर्देशन आमंत्रित करेगी ।
(ख) खोजबीन समिति उपलब्धियों के बारे में जानकारी व्यक्ति या संगठनों द्वारा नाम निर्दिष्ट ऐसे व्यक्तियों की उपलब्धियों के बारे में जानकारी तथा पृष्ठभूमि का पूर्ण ब्यौरा संग्रह करने का प्रयास करेगी । (ग) खोजबीन समिति जनता से, बेबसाइट पर रखकर या किसी अन्य स्रोत से जिसे खोजबीन समिति द्वारा ठीक एवं उचित समझा जाए, प्राप्त नाम निर्देशनों के संबंध में सुझाव एवं जानकारी आमंत्रित करेगी । (घ) प्राप्त नाम निर्देशनों के संबंध में वैसी जानकारी और सुझावों पर विचारण के पश्चात् खोजबीन समिति व्यक्तियों का एक पैनल तैयार करेगी जो लोकायुक्त के अध्यक्ष या सदस्य या दोनों के रूप में नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की संख्या के तीन गुणी होगीः
परन्तु यदि खोजबीन समिति के दो सदस्यों को किसी नाम निर्देशन के संबंध में कोई आपत्ति हो तो वह खोजबीन समिति के तैयार पैनल में शामिल नहीं किया जायगा;
परन्तु और कि किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के नामों पर, जिसका/जिनका नाम उपधारा (7) (क) के अधीन यथा उपबंधित नाम निर्देशन हेतु आमंत्रण के अनुपालन में प्राप्त नहीं हुआ हो, खोजबीन समिति द्वारा विचारण नहीं किया जाएगा ।
(ङ) अध्यक्ष और/या सदस्य या दोनों के पदों के लिए नामों के पैनल की अनुशंसा करने के पूर्व, खोजबीन समिति नाम निर्देशिती की उस पद पर नियुक्ति के लिए सहमति प्राप्त करेगी जिसके विरुद्ध उसका5 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 नाम विचाराधीन हो;
(च) खोजबीन समिति उपर्युक्त प्रक्रिया पूर्ण करेगी और उप धारा (7) (क) के अधीन प्रक्रिया आरंभ होने के तीन माह के भीतर सूची भेज देगी ।
(8) खोजबीन समिति, से अनुशंसा प्राप्ति के एक माह के भीतर, अनुशंसाओं को अंतिम रूप देगी । 5. अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि । - अध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य, चयन समिति की अनुशंसाओं के आधार पर, राज्यपाल द्वारा उनके हस्ताक्षर और मुद्रा के अधीन, अधिपत्र द्वारा नियुक्त किये जाएंगे और उस तारीख से, जब वे अपना पद ग्रहण करेंगे, पाँच वर्षों से अनधिक अवधि तक या 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पूर्वत्तर हो, अपना पद धारण करेंगेः
सकेगा । 6. अध्यक्ष एवं सदस्यों का वेतन, भत्ते एवं सेवा की अन्य शर्त्तें । - अध्यक्ष का वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्त्तें वही होंगी जो पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की हैं तथा अन्य सदस्यों का वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्त्तें वही होंगी जो उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की हैंः
परन्तु यदि अध्यक्ष या कोई सदस्य, अपनी नियुक्ति के समय, सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा न्यायाधीश के रूप में या भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी पूर्व सेवा की बाबत पेंशन (निःशक्तता पेंशन से भिन्न) प्राप्त कर रहा है तो, यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य के रूप में सेवा के संबंध में उसके वेतन में से, -
(क) उस पेंशन की राशि को, और (ख) यदि ऐसी नियुक्ति से पूर्व उसने ऐसे पूर्व सेवा की बाबत उसको शोध्य पेंशन के किसी भाग के बदले में उसका संराशीकृत मूल्य प्राप्त हुआ हो तो पेंशन के उस भाग की रकम को, घटा दिया जाएगा;
परन्तु और कि अध्यक्ष या सदस्य को संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन तथा उसकी सेवा की अन्य शर्त्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात्, उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा । 7. लोकायुक्त के अध्यक्ष और अन्य सदस्य का हटाया जाना । - (1) अध्यक्ष एवं सदस्यों को राज्यपाल द्वारा दुव्र्यवहार अथवा अक्षमता के आधार पर उनके पद से सेवा मुक्त किया जा सकेगा और किसी अन्य आधार पर नहींः
परन्तु ऐसी सेवा मुक्ति से पूर्व की जाने वाली अपेक्षित जाँच, पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नाम निर्दिष्ट होने वाले उच्च न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश द्वारा की जायगी ।
(2) उप-धारा (1) के परंतुक के अधीन नियुक्त व्यक्ति तीन माह के भीतर राज्यपाल को प्रतिवेदन सुपूर्द करेगा जो, यथाशक्य शीघ्र, उसे राज्य विधान मंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवायेंगे ।
(3) उप-धारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्यपाल राज्य विधान मंडल के प्रत्येक सदन द्वारा संबोधन के पश्चात् आदेश के सिवाय, जो, इस सदन की कुल सदस्यता के बहुमत और उस सदन में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से अन्यून बहुमत द्वारा समर्थित हो, ऐसी सेवा मुक्ति के लिए उसी सत्र में राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया गया हो, अध्यक्ष एवं सदस्यों को सेवा मुक्त नहीं किया जायगा।
(4) राज्य विधान मंडल उपर्युक्त उप-धारा (3) में उल्लिखित संबोधन के प्रस्तुतीकरण प्रक्रिया एवं कार्यवाही का निष्कर्ष विनियमित कर सकेगा ।
(5) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में दुव्र्यवहार की किसी अन्य परिभाषा के होने पर भी, अन्य के बीच ''दुव्र्यवहार'' से अभिप्रेत है यदि अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, भारत सरकार या राज्य सरकार द्वारा अथवा की ओर से की गयी किसी संविदा अथवा किये गये समझौते में किसी रूप में सहयुक्त अथवा हितवद्ध हो अथवा हो जाता है अथवा उसके लाभ में अथवा किसी फायदा में, एक सदस्य से अन्यथा रूप में और एक निगमित कंपनी के अन्य सदस्यों की भाँति उससे उद्भूत उपलब्धि में किसी रूप में भाग लेता है अथवा अपनी हैसियत का, स्वयं अथवा किसी अन्य व्यक्ति का पक्ष में लाभ प्राप्त करने अथवा किसी अन्य व्यक्ति को असम्यक् हानि करने या कठिनाई में डालने में दुरूपयोग करता अथवा किसी व्यक्तिगत हित द्वारा अथवा अनुचित लाभ, भ्रष्ट व्यवहार के लिए कृत्यों के निर्वहन में प्रेरित हो ।
(6) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में ''अक्षमता'' की किसी अन्य परिभाषा के होते हुए भी, अन्य के बीच ''अक्षमता'' से अभिप्रेत है यदि अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य किसी सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा एक दिवालिया घोषित या न्याय निर्णीत हो अथवा दिमाग या शरीर की दुर्बलता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य हो । 8. अध्यक्ष और सदस्यों द्वारा पद पर न रहने के पश्चात् नियोजन पर प्रतिबंध ।-(1) अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य पद पर नहीं रहने के पश्चात्, -6 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 (i) लोकायुक्त के अध्यक्ष या एक सदस्य के रूप में पुनर्नियुक्ति के लिए अपात्र होगा; या
(ii) भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ के किसी अन्य पद पर आगे और नियोजन के लिए अपात्र होगा ।
(iii) सरकार द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से वित्त प्रदत्त या फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट, 1976 के अधीन कोई राशि प्राप्त या जनता से चंदा प्राप्त प्रत्येक अन्य सोसाइटी या व्यक्तियों का संघ या न्यास (तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन निबंधित हो या नहीं) में नियुक्ति का अपात्र होगा ।
(2) उप-धारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई सदस्य अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए पात्र होगा, यदि सदस्य और अध्यक्ष के रूप में उसकी कुल कार्यावधि पाँच वर्ष से अधिक नहीं है । 9. कतिपय परिस्थितियों में सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना और उसके कृत्यों का निर्वहन करना । -
(1) राज्यपाल, अध्यक्ष के पद पर, उसकी मृत्यु, त्यागपत्र के कारण या अन्यथा कोई रिक्ति होने की दशा में, उस रिक्ति को भरने के लिए किसी नए अध्यक्ष की नियुक्ति किए जाने तक, वरिष्ठतम सदस्य को, अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए अधिसूचना द्वारा प्राधिकृत कर सकेगा ।
(2) जब अध्यक्ष, छुट्टी पर अनुपस्थिति के कारण या अन्यथा, अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हों तो उपलब्ध ऐसा वरिष्ठतम सदस्य, जिसे राज्यपाल, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करें, उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेंगे, जिस तारीख को अध्यक्ष अपने कर्त्तव्यों को पुनः ग्रहण करेंगे । 10. लोकायुक्त का सचिव अन्य अधिकारी तथा कर्मचारीवृन्द । - (1) लोकायुक्त के सचिव की नियुक्ति लोकायुक्त की अनुशंसा से की जाएगी । सचिव भारतीय प्रशासनिक सेवा के राज्य संवर्ग में स्थायी रूप से आवंटित अधिसमय वेतनमान का होगा, या राज्य वरीय न्यायिक सेवा के अधिसमय वेतनमान का होगा, और वह वैसा वेतन पाएगा जो उसे सचिव के रूप में नियुक्ति नहीं होने पर प्राप्त होता । सचिव, राज्य सरकार द्वारा अध्यक्ष के परामर्श से यथानिर्णीत अवधि के लिए पद धारण करेगा ।
(2) अन्य राजपत्रित पदाधिकारियों, अनुसचिवीय पदाधिकारियों और स्थापना के समूह 'घ' कर्मचारियों की नियुक्ति अध्यक्ष द्वारा राज्य सरकार द्वारा वर्तमान आरक्षण नीति और नियुक्ति के लिए स्थापित नियुक्ति प्रक्रिया प्रतिनियुक्ति सहित तथा समान निर्बंधन एवं शर्त्तें के अनुसार होगी जो सरकार के समान स्तर के पदाधिकारी को उपलब्ध हो: परन्तु अध्यक्ष, सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, समूह 'ग' या समूह 'घ' के किसी पद या पदों के किसी समूह, जैसा कि ऐसे आदेश में विर्निदिष्ट हो, में नियुक्ति की शक्तियाँ सचिव को प्रत्यायोजित कर सकेंगे । (3) राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, लोकायुक्त के सचिव एवं अन्य अधिकारियों, अन्वेषण खण्ड के पदाधिकारियों सहित, तथा कर्मचारीवृन्द की सेवा की शर्त्तें वही होगी जो लोकायुक्त द्वारा इस प्रयोजनार्थ बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जायँ:
परन्तु इस उप-धारा के अधीन बनाए गए विनियमों के लिए, जहाँ तक उनका संबंध पदों के सृजन, वेतन, भत्ता, छुट्टी या पेंशन एवं कार्य की शर्त्तों से हो, राज्य सरकार का अनुमोदन अपेक्षित होगा ।
अध्याय-III अन्वेषण खण्ड 11. अन्वेषण खण्ड । - तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, लोकायुक्त, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन दण्डनीय ऐसे किसी अपराध के, जिसका किसी लोक सेवक द्वारा किए जाने का अभिकथन किया गया हो, अन्वेषण का संचालन करने के प्रयोजन के लिए, एक अन्वेषण खण्ड का गठन राज्य सरकार द्वारा वर्तमान आरक्षण नीति, नियुक्ति के लिए स्थापित नियुक्ति प्रक्रिया प्रतिनियुक्ति सहित तथा समान निर्बंधन एवं शर्त्तें के अनुसार होगी जो राज्य सरकार के समान स्तर के पदाधिकारी को उपलब्ध हो: परन्तु लोकायुक्त द्वारा अन्वेषण खण्ड गठित होने तक, राज्य सरकार, इस अधिनियम के अधीन अन्वेषण करने के लिए अपने विभागों से, उतने अन्वेषण अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी जितने की लोकायुक्त द्वारा अपेक्षा की जाए । 12. अन्वेषण अधिकारी को पुलिस की शक्तियाँ होना । - (1) कोई भी अन्वेषण, पुलिस उपाधीक्षक की पंक्ति से अन्यून पंक्ति के अन्वेषण खण्ड के अन्वेषण अधिकारी द्वारा या समतुल्य पंक्ति के किसी अन्य अधिकारी द्वारा नहीं किया जाएगा । (2) अन्वेषण खण्ड के अन्वेषण अधिकारियों को, ऐसे अपराधों के अन्वेषण के संबंध में, वे सभी शक्तियाँ, कर्त्तव्य, विशेषाधिकार और दायित्व होंगे, जो ऐसे अपराधों के अन्वेषण के संबंध में पुलिस अधिकारियों को होते हैं । 13. अन्वेषण अधिकारी द्वारा लोकायुक्त के निदेश पर जाँच करना । - (1) लोकायुक्त इस अधिनियम के अधीन कोई जाँच कराने के पूर्व एक आदेश द्वारा अपने जाँच खण्ड के जाँच पदाधिकारी द्वारा एक प्रारंभिक जाँच करायेगी, या इस तरह से करायेगी या करवायेगी जैसा वह निर्देशित करे तथा लोकायुक्त द्वारा निर्धारित एक समय सीमा के भीतर प्रतिवेदन समर्पित करेगी, जिससे लोकायुक्त संतुष्ट हो सकें कि वह विषय लोकायुक्त के7 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 द्वारा जाँच के लायक है या नहीं । (2) अन्वेषण अधिकारी, उप-धारा (1) के अधीन आदेश की प्राप्ति पर, उस उप-धारा के अधीन विनिर्दिष्ट समय के भीतर अन्वेषण पूरा करेगा और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।
अध्याय-IV अभियोजन खण्ड 14. अभियोजन निदेशक की नियुक्ति । - (1) लोकायुक्त, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के अधीन लोकायुक्त द्वारा किसी परिवाद के संबंध में लोक सेवकों के अभियोजन के प्रयोजनार्थ अभियोजन खंड का गठन और अभियोजन निदेशक की सहायता के लिए राज्य सरकार की वर्तमान आरक्षण नीति तथा प्रतिनियुक्ति सहित भर्ती की स्थापित प्रक्रिया के अनुसार तथा राज्य सरकार के समान पंक्ति के कर्मचारियों पर लागू समान निर्बंधन और शर्त्तों पर अन्य पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति करेगी। (2) अभियोजन निदेशक, लोकायुक्त द्वारा इस प्रकार निदेश प्राप्त पर, सम्यक जाँच के पश्चात् विशेष न्यायालय के समक्ष शिकायत दाखिल करेगा, और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 तथा बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के संबंध में लोकसेवकों के अभियोजन के संबंध में सभी आवश्यक कदम उठायेगा ।
अध्याय- V लोकायुक्त की संस्था के व्ययों का राज्य की संचित निधि पर भारित होना 15. लोकायुक्त के व्ययों का राज्य की संचित निधि पर भारित होना । - लोकायुक्त के व्ययों को, जिसके अन्तर्गत लोकायुक्त के अध्यक्ष, सदस्यों या सचिव या अन्य अधिकारियों या कर्मचारीवृन्द को या उनके संबंध में संदेय सभी वेतन, भत्ते और पेंशन भी हैं, राज्य की संचित निधि पर भारित किया जाएगा और लोकायुक्त द्वारा ली गई कोई फीस या अन्य धनराशि उस निधि का भाग होंगी ।
अध्याय- VI जाँच के संबंध में अधिकारिता 16. लोकायुक्त की अधिकारिता । - (1) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, लोकायुक्त किसी लोकसेवक के विरूद्ध निम्नलिखित के संबंध में, किसी शिकायत में, किए गए आरोप के किसी अभिकथन में अन्तर्वलित या उससे उद्भूत होने वाले या संबद्ध किसी मामले के बारे में जाँच करेगा, यथा :-
(क) कोई व्यक्ति, जो राज्य का मुख्य मंत्री हो या रहा हो, (ख) कोई व्यक्ति, जो राज्य का मंत्री हो या रहा हो, (ग) कोई व्यक्ति, जो राज्य विधानमण्डल के किसी सदन का सदस्य हो या रहा हो, (घ) धारा - 2 के खण्ड (ढ) में निर्दिष्ट प्रत्येक पदाधिकारी, (ङ) धारा - 2 के खण्ड (ढ) में निर्दिष्ट प्रत्येक पदाधिकारी, जो बाह्य सेवा में प्रतिनियुक्ति या स्थानान्तरण होने पर निम्नलिखित की सेवा अथवा वेतन पर हों-
(i) स्थानीय प्राधिकार, पंचायती राज संस्थाओं तथा शहरी स्थानीय निकाय सहित स्थानीय स्वशासन; (ii) राज्य अधिनियम के द्वारा या अधीन स्थापित तथा राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण में कोई निगम (स्थानीय प्राधिकार से भिन्न);
(iii) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का अधिनियम-1) की धारा-617 के अर्थान्तर्गत कोई सरकारी कंपनी, जिसमें राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त हिस्सा पूंजी 51 प्रतिशत से अन्यून हो, या कोई अन्य कंपनी, जो किसी कंपनी की सहायक हो, जिसकी पूंजी राज्य सरकार धारण करती हो;
(iv) सोसाइटी रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1860 (1860 का अधिनियम 21) के अधीन निबंधित कोई सोसाइटी, जो राज्य सरकार के नियंत्रणाधीन हो और जो राज्य सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित हो;
(च) प्रत्येक प्रधान अथवा उप प्रधान, चाहे उसका पदनाम जो भी हो, और स्थानीय प्राधिकार, पंचायती राज संस्थाओं एवं शहरी स्थानीय निकायों सहित स्थानीय स्वशासन, निगम, सरकारी कंपनी अथवा विदेशी स्रोत सहित किसी अन्य स्रोत से पाँच लाख रुपये से अधिक चंदा प्राप्त करने वाली सोसाइटी या व्यक्तियों का संगठन या न्यास अथवा गैर सरकारी संगठनों (तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत हो अथवा नहीं) अथवा राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त या अनुदान प्राप्त अथवा सरकार से विहित राशि से अधिक भुगतान प्राप्त करने वाली कोई अन्य संस्था या संगठन या प्राधिकार के अन्य कर्मचारी;
(छ) राज्य विधानमण्डल के किसी अधिनियम के अधीन स्थापित या गठित या राज्य सरकार द्वारा पूर्णतः या अंशतः वित्त प्रदत्त या नियंत्रित किसी निकाय/निगम/पर्षद/प्राधिकार/कंपनी/सोसाइटी/स्वशासी निकाय (चाहे जिस किसी नाम से पुकारा जाए) में कोई अध्यक्ष या सदस्य या अधिकारी {उप-धारा(1) के खण्ड (ङ) में निर्दिष्ट} या समकक्ष/उच्चतरः
परन्तु अधिनियम की धारा-16 की उप-धारा (1) के खण्ड (क), (ख) एवं (ग) में नामित व्यक्तियों के विरूद्ध कोई अन्वेषण या अभियोजन, लोकायुक्त की पूर्ण न्यायपीठ से अनुमति लिए बिना, प्रारंभ नहीं किया जाएगा ।8 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 (2) लोकायुक्त, धारा-16 की उप-धारा (1) में निर्दिष्ट से भिन्न किसी व्यक्ति के किसी कृत्य या आचरण की जाँच कर सकेगा यदि ऐसा व्यक्ति भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन भ्रष्टाचार के आरोपों से संबद्ध हो । 17. लोकायुक्त से पूर्व किसी न्यायालय या समिति या प्राधिकार के समक्ष जाँच के लिए लंबित मामले। -यदि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित कोई मामला या कार्यवाही इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पूर्व या इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पश्चात् किसी जाँच के प्रारम्भ होने से पूर्व किसी न्यायालय या राज्य विधान मंडल के किसी सदन की समिति के समक्ष या किसी अन्य प्राधिकार के समक्ष लंबित पड़ी हुई हो तो ऐसा मामला या कार्यवाही उस न्यायालय/राज्य विधान मंडल के किसी सदन की समिति / किसी अन्य प्राधिकार के समक्ष जारी रहेगी; ऐसे मामलों के सिवाय जो भारत के संविधान के अनुच्छेद-194 के खंड (2) के अधीन संरक्षित हैं या किसी न्यायालय के समक्ष लंबित हों, इस अधिनियम के अधीन ऐसे मामलों की जाँच करने की लोकायुक्त की शक्तियों पर प्रभाव नहीं पडे़गा। 18. लोकायुक्त की न्यायपीठों का गठन । - (1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए-
(क) लोकायुक्त की अधिकारिता, शक्तियों एवं प्राधिकार का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा;
(ख) कोई न्यायपीठ अध्यक्ष द्वारा एक या अधिक सदस्यों के साथ, जो अध्यक्ष ठीक समझें, गठित की जा सकेगी;
(ग) प्रत्येक न्यायपीठ साधारणतया कम-से-कम एक न्यायिक सदस्य को मिलाकर बनेगी; (घ) जहाँ कोई न्यायपीठ अध्यक्ष कोे मिलाकर बनती हो वह उस न्यायपीठ की अध्यक्षता अध्यक्ष द्वारा की जाएगी;
(ङ) जहाँ कोई न्यायपीठ न्यायिक सदस्य और गैर-न्यायिक सदस्य अध्यक्ष को छोड़कर को मिलाकर बनती हो, वहाँ उस न्यायपीठ की अध्यक्षता न्यायिक सदस्य द्वारा की जाएगी;
(च) लोकायुक्त की न्यायपीठें साधारणतया पटना में और ऐसे अन्य स्थानों पर अधिविष्ट होंगी जो लोकायुक्त विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट करे।
(2) लोकायुक्त उन क्षेत्रों को अधिसूचित करेंगे जिनके संबंध में लोकायुक्त की प्रत्येक न्यायपीठ अपनी अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगी।
(3) उप-धारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष को, समय-समय पर, न्यायपीठों का गठन या पुनर्गठन करने की शक्ति होगी।
(4) यदि किसी मामले या विषय की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर अध्यक्ष या किसी सदस्य को यह प्रतीत होता है कि मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है कि उसकी सुनवाई पूर्ण न्यायपीठ द्वारा की जानी चाहिए तो उस मामले या विषय को अध्यक्ष द्वारा पूर्ण न्यायपीठ को यथास्थिति अंतरित किया जा सकेगा या अंतरण के लिए उसे निर्दिष्ट किया जा सकेगा।
(5) यह सुनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ कि, किसी मामले या मामलों में किसी अंतर्ग्रस्त प्रश्न की प्रकृति को ध्यान रखते हुए अध्यक्ष की राय में या इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा निर्मित नियमों के अधीन, दो से अधिक सदस्यों से गठित न्यायपीठ द्वारा निर्णीत होने की अपेक्षा है अध्यक्ष ऐसा सामान्य या विशेष आदेश जारी कर सकेगा जैसा वह उचित समझे।
(6) इस धारा के पूर्ववर्ती उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष या इस संबंध में अध्यक्ष या अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत कोई सदस्य एकल सदस्य से युक्त किसी न्यायपीठ का कार्य करने के लिए सक्षम होगा और ऐसे मामलों के वर्गों और ऐसे मामलों के वर्गों के संबंध में लोकायुक्त की अधिकारिता, शक्ति एवं प्राधिकार का प्रयोग करेगा जैसा कि अध्यक्ष द्वारा सामान्य या विशेष आदेश द्वारा निर्दिष्ट किया जाए:
परंतु किसी ऐसे विषय या मामले की सुनवाई के किसी स्तर पर यदि अध्यक्ष या ऐसे सदस्य को यह प्रतीत हो कि विषय या मामला ऐसी प्रकृति का है कि उसे दो सदस्यों वाली न्यायपीठ द्वारा सुनी जानी चाहिए तो यथास्थिति, विषय या मामले को, अध्यक्ष द्वारा उस न्यायापीठ को अन्तरित किये जाने हेतु अध्यक्ष को निर्दिष्ट कर सकेगी, जिसे अध्यक्ष उचित समझें। 19. न्यायपीठों के बीच कार्य का वितरण । - जहाँ न्यायपीठें गठित की गयी हाें, वहाँ अध्यक्ष, समय-समय पर, अधिसूचना द्वारा, न्यायपीठों के बीच लोकायुक्त के कार्यों के वितरण के बारे में उपबंध कर सकेगा और उन विषयों का भी उपबंध कर सकेगा जिनपर प्रत्येक न्यायपीठ द्वारा कार्रवाई की जा सकेगी। 20. अध्यक्ष को मामले अन्तरित करने की शक्ति । - शिकायतकर्ता या लोक सेवक द्वारा अन्तरण के लिए दिये गये आवेदन पर, यथास्थिति, शिकायतकर्ता या लोक सेवक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, अध्यक्ष किसी न्यायपीठ के समक्ष लंबित किसी मामले के निपटारे के लिए किसी अन्य न्यायापीठ को अन्तरित कर सकेगा। 21. विनिश्चय का बहुमत द्वारा किया जाना । - यदि दो सदस्यों से मिलकर बनी किसी न्यायपीठ के सदस्यों के बीच किसी मुद्दे या मुद्दों पर मतभेद हो और दोनों सदस्य की इच्छा हो कि विषय को निर्दिष्ट किया जाय तो उसे निर्दिष्ट कर दिया जाएगा और पूर्ण न्यायपीठ द्वारा सुनवाई की जाएगी । स्पष्टीकरण :- यदि एक सदस्य का पद रिक्त है तो अध्यक्ष का अभिमत अभिभावी होगा।9 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 22. किसी कार्रवाई या कार्यवाही की विधिमान्यता । - लोकायुक्त का कोई कृत्य या कार्यवाही मात्र निम्नलिखित कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि-ः
(क) लोकायुक्त के गठन में कोई रिक्ति है या कोई त्रुटि है, (ख) लोकायुक्त के सदस्य के रूप में कार्य कर रहे किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है, या (ग) मामले के गुणावगुण पर प्रभाव न डालने वाली कोई अनियमितता है ।
अध्याय- VII
जाँच एवं अन्वेषण से संबंधित प्रक्रिया
23. जाँच तथा अन्वेषण से संबंधित उपबंध । - (1) लोकायुक्त, कोई शिकायत प्राप्त होने पर, यह अभिनिश्चित करने के लिए कि मामले में अग्रतर कार्रवाई के लिए कोई प्रथमद्रष्टया मामला विद्यमान है या नहीं प्रारंभिक जाँच या अन्वेषण करवा सकेगी ।
(2) उप-धारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक प्रारंभिक जाँच या प्रारंभिक अन्वेषण साधारणतया शिकायत की प्राप्ति की तारीख से 30 दिनों की अवधि के भीतर और लिखित रूप में अभिलिखित किये जाने वाले कारणों से, तीन माह की अवधि के भीतर पूरा किया जायेगा।
(3) प्रारंभिक अन्वेषण के पूरा हो जाने पर, अन्वेषण प्राधिकार अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा । 24. प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की संभावना वाले व्यक्तियों का सुना जाना । - यदि लोकायुक्त कार्रवाई के किसी प्रक्रम पर,-
(क) भावी अभियुक्त से भिन्न किसी व्यक्ति के आचरण की जाँच करना आवश्यक समझते हों, या (ख) यह राय हो कि अभियुक्त से भिन्न किसी व्यक्ति की ख्याति पर जाँच द्वारा प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है,
-तो लोकायुक्त उस व्यक्ति को जाँच में सुने जाने का और उसके बचाव में साक्ष्य प्रस्तुत करने का नैसर्गिक न्याय के सिद्वांतों के अनुसार युक्तियुक्त अवसर प्रदान करेंगे। 25. लोकायुक्त द्वारा किसी लोकसेवक या अन्य व्यक्ति से सूचना आदि प्रस्तुत करने की अपेक्षा करना । - (1) इस धारा के उपबंधो के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन किसी अन्वेषण के प्रयोजनार्थ ( ऐसे अन्वेषण के पूर्व प्रारंभिक जाँच, यदि कोई हो, सहित) लोकायुक्त किसी लोकसेवक या किसी अन्य व्यक्ति से, जो उसकी राय में, ऐसी जाँच या अन्वेषण से सुसंगत सूचना देने या दस्तावेज प्रस्तुत करने में सक्षम है, तो ऐसी सूचना देने या ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकेगा।
(2) ऐसी किसी जाँच (प्रारंभिक जाँच सहित) के प्रयोजनार्थ, लोकायुक्त को, निम्नलिखित मामलों के संबंध में वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का अधिनियम 05) के अधीन व्यवहार न्यायालय की सभी शक्तियाँ प्राप्त होगी, अर्थात-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और उसको हाजिर कराना तथा उसकी शपथ पर परीक्षा करना, (ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किये जाने की अपेक्षा करना, (ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य लेना, (घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा करना, (ङ) साक्षियों या दस्तावेजो की परीक्षा के लिए कमीशन बहाल करना, (च) ऐसे अन्य विषय, जो विहित किये जाएँ । (3) लोकायुक्त के समक्ष किसी कार्यवाही को भारतीय दंड संहिता (1860 का अधिनियम सं0 45) की धारा-193 के अंतर्गत न्यायिक कार्यवाही समझी जायेगी।
(4) कोई भी व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन अन्वेषण के प्रयोजनार्थ ऐसा कोई साक्ष्य देने के लिए अथवा ऐसी कोई दस्तावेज पेश करने के लिए विवश नहीं किया जाएगा जिसे किसी न्यायालय के समक्ष कार्यवाही में देने या पेश करने के लिए उसे बाघ्य नहीं किया जा सकता है । 26. अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया । - (1) इस धारा में किसी बात के रहते हुए भी, जहाँ तक दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा-197 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-19 के अधीन मंजूरी का संबंध है, सक्षम प्राधिकार, लोकायुक्त की अनुशंसा पर मंजूरी या अनुमति के लिए अनुशंसा प्राप्त होने के तीन माह के भीतर युक्तियुक्त आदेश पारित करेगा । परन्तु किसी लोक सेवक की दशा में, जो केन्द्र सरकार से धारा-19, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत अभियोजन की स्वीकृति की प्राप्ति के बिना पद से हटाने योग्य न हो, राज्य सरकार पंद्रह दिनों के भीतर अपनी अनुशंसा केन्द्रीय सरकार को भेज देगी । (2) उप-धारा (1) के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 311 और अनुच्छेद 320 के खण्ड (3) के उपखण्ड (ग) में अन्तर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होंगे । 27. ऐसे लोकसेवकों के संबंध में जाँच पर कार्रवाई जो मुख्य मंत्री या मंत्री या राज्य विधानमंडल के सदस्य नहीं हैं । - (1) जहाँ जाँच या अन्वेषण की समाप्ति पर लोकायुक्त के निष्कर्ष से, धारा-16 की उप-धारा (1) के खण्ड (घ), (ङ), (च) या (छ) में निर्दिष्ट किसी लोकसेवक द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,10 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 1988 के अधीन किसी अपराध के किए जाने का प्रकटन होता है, वहाँ लोकायुक्त द्वारा प्राधिकृत कोई अधिकारी - (क) विशेष न्यायालय में मामला दाखिल कर सकेगा और अपने निष्कर्षों के साथ रिपोर्ट की एक प्रति सक्षम प्राधिकारी को भेज सकेगा तथा, (ख) सक्षम प्राधिकारी को ऐसे लोकसेवक पर लागू अनुशासनिक कार्यवाही से संबंधित नियमों के अधीन अनुशासनिक कार्यवाही प्रारंभ करने की अनुशंसा कर सकेगा । (ग) लोकसेवक या उसके प्रतिनिधि को रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध करा सकेगा । (2) सक्षम प्राधिकारी, लोकायुक्त की अनुशंसाओं का ध्यान रखते हुए, उप-धारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन अनुशंसा प्राप्त होने की तीस दिनों की अवधि के भीतर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन अपराध किए जाने का अभियुक्त कदाचारी लोकसेवक के विरूद्ध अनुशासनिक कार्यवाही आरंभ करेगा और रिपोर्ट पर की गई कार्रवाई या की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई सहित, उस पर अपनी टिप्पणी साधारणतया ऐसी अनुशासनिक कार्यवाही आरंभ करने के छः माह के भीतर लोकायुक्त को भेजेगा । 28. ऐसे लोकसेवक के विरूद्ध जाँच पर कार्रवाई जो मुख्य मंत्री, मंत्री या राज्य विधानमण्डल के सदस्य हों । - (1) जहाँ मामला इस अधिनियम की धारा-16 की उप-धारा (1) के खण्ड (क), (ख) एवं (ग) में निर्दिष्ट लोकसेवक से संबंधित हो वहाँ धारा 16 (1) के परन्तुक में निर्धारित प्रक्रिया के पालन करने के उपरान्त प्रथम द्रष्टया मामला पाए जाने पर, लोकायुक्त जाँच या अन्वेषण के लिए निर्देश देंगे । (2) जहाँ जाँच या अन्वेषण की समाप्ति के बाद, लोकायुक्त के निष्कर्ष से, धारा-16 की उप-धारा (1) के खण्ड (क), (ख) एवं (ग) में निर्दिष्ट किसी लोकसेवक द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन किसी अपराध के किए जाने का प्रकटन होता हो, वहाँ लोकायुक्त विशेष न्यायालय में मामला दाखिल कर सकेंगे और अपने निष्कर्षों के साथ रिपोर्ट सक्षम प्राधिकारी तथा लोकसेवक को भी भेज सकेंगे ।
अध्याय- VIII
लोकायुक्त की शक्तियाँ
29. परिवादों से संबंधित उपबंध । - (1) लोकायुक्त परिवाद प्राप्त होने पर अथवा स्वप्रेरणा से समुचित कार्रवाई आरंभ कर सकेंगे । इस धारा के प्रयोजनार्थ ''परिवाद'' से अभिप्रेत है आरोप, शिकायत अथवा ''अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर)'' द्वारा संरक्षण हेतु अनुरोध । (2) इस अधिनियम के अधीन प्रत्येक परिवाद यथासंभव विहित प्रपत्रों में किए जाएँगे और उसमें निम्नलिखित शामिल रहेंगे : - (क) प्रत्येक परिवाद में शीर्षक रहेगा '' बिहार के लोकायुक्त के समक्ष'' (ख) पूर्ण पता सहित परिवादकर्ता का नाम । (ग) जिसके विरुद्ध परिवाद किया जा रहा हो उस व्यक्ति/व्यक्तियों का नाम एवं पूर्ण पता । (3) लोकायुक्त के समक्ष किया गया सभी परिवाद परिवादकर्ता के द्वारा सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित होंगे, या यदि वह निरक्षर हो तो, उसके बाएँ अंगूठे का निशान किसी साक्षर व्यक्ति द्वारा सम्यक रूप से अभिप्रमाणित होगा और उसमें अभिप्रमाणित किए जाने वाले व्यक्ति का नाम एवं पता स्पष्ट होगा । (4) प्रत्येक परिवाद यथा विहित शपथ पत्र द्वारा समर्थित होगा । (5) लोकायुक्त किसी परिवाद की जाँच नहीं करेंगे - (क) जहाँ की गई शिकायत की जानकारी परिवादी को ऐसी शिकायत लिए जाने के बारह माह पूर्व आ गई हो, (ख) यदि परिवाद में अन्तगर््रस्त कृत्य के कथित रूप से होने के पाँच वर्षों के बीत जाने के बाद से संबंधित आरोप हो: परन्तु लोकायुक्त खण्ड (क) में निर्दिष्ट कोई शिकायत ग्रहण कर सकेंगे । यदि परिवादकर्ता उनका समाधान करा दे कि उसे उक्त खण्ड में विहित समय के भीतर परिवाद नहीं कर सकने का पर्याप्त कारण है। (6) किसी अन्य अधिनियमिति में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, पुलिस अभिरक्षा या जेल या पागलखाने या उन्मत्त व्यक्तियों के किसी अन्य शरण स्थान से किसी व्यक्ति द्वारा लोकायुक्त को लिखा गया कोई पत्र उस पुलिस पदाधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति द्वारा बिना खोले और बिना विलंब के प्रेषिती को अग्रसारित किया जाएगा जो ऐसे जेलों, पागलखाने या अन्य शरण स्थान का भारसाधक हो और लोकायुक्त उस पत्र को उप-धारा (2) के उपबंधों के अनुसार किया गया परिवाद समझेंगे यदि उनका समाधान हो जाए कि ऐसा करना आवश्यक है । 30. अन्वेषण । - (1) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन अपराध के अन्वेषण के लिए प्राधिकृत लोकायुक्त के अन्वेषण अधिकारियों को ऐसी सभी शक्तियाँ होंगी जो दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अपराध के अन्वेषण के लिए किसी पुलिस अधिकारी में निहित हो । (2) किसी अन्वेषण अधिकारी से वरीय पंक्ति केे लोकायुक्त के सभी अन्वेषण पदाधिकारी उन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे जिनका प्रयोग अन्वेषण पदाधिकारी द्वारा किया जा सके ।11 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 31. तलाशी और अभिग्रहण । - (1) जहाँ लोकायुक्त या उसके द्वारा प्राधिकृत अधिकारी को उपलब्ध सूचना के परिणामस्वरूप यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी व्यक्ति, जिसे इस अधिनियम के अधीन सम्मन या नोटिस दी गई हो या दी जाएगी, वह कोई संपत्ति, दस्तावेज या चीज, जो उनके द्वारा किसी जाँच या अन्य कार्यवाही के लिए आवश्यक या उपयोगी या प्रासंगिक होगी, प्रस्तुत नहीं करेगा या नहीं कराएगा, वहाँ तलाशी वारंट निर्गत करेंगे और पुलिस निरीक्षक से अन्यून पंक्ति के किसी पदाधिकारी को, और विशेष रूप से किसी भवन या स्थान में प्रवेश करने एवं तलाशी लेने, या निरीक्षण करने हेतु, जहाँ उसे यह संदेह करने का कारण हो कि ऐसी संपत्ति या दस्तावेज रखी गई है, प्राधिकृत करेंगे । (2) उप-धारा (1) के अधीन निर्गत कोई वारंट, सभी प्रयोजनों के लिए, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा-93 के अधीन किसी न्यायालय द्वारा निर्गत वारंट समझा जाएगा । (3) यदि लोकायुक्त का यह समाधान हो जाय कि उप-धारा (1) के अधीन अभिगृहीत कोई दस्तावेज, इस अधिनियम के अधीन किसी अन्वेषण या जाँच के प्रयोजन के लिए, साक्ष्य होगी और ऐसे दस्तावेज को, उसकी अभिरक्षा में या ऐसे तलाशी अधिकारियों की अभिरक्षा में, जो प्राधिकृत किए जाएँ, प्रतिधारित करना आवश्यक होगा तो वह उसे लौटा सकेंगे या ऐसे प्राधिकृत पदाधिकारी को, ऐसे दस्तावेज को ऐसे अन्वेषण या जाँच के पूरा होने तक प्रतिधारित करने का निदेश दे सकेंगेः परन्तु जहाँ किसी दस्तावेज को वापस करना अपेक्षित हो वहां लोकायुक्त या प्राधिकृत अधिकारी ऐसे दस्तावेज की सम्यक रूप से अधिप्रमाणित प्रतियों को प्रतिधारित करने के पश्चात्, उसे वापस कर सकेंगे । (4) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तलाशियों से संबंधित उपबंध, जहाँ तक संभव हो इस धारा के अधीन तलाशियों के संबंध में लागू होंगे । 32. अन्वेषण का शासन । - बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 के अधीन सभी अन्वेषण भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अध्याय iv द्वारा शासित होंगे । स्पष्टीकरण : इस अधिनियम के प्रावधानों के रहते हुए भी, अन्वेषण से संबंधित दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अध्याय-xii के प्रावधान, जो इस अधिनियम से असंगत नहीं हैं, भी लागू होंगे । 33. आस्तियों की अनंतिम कुर्की । - (1) जहाँ लोकायुक्त या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्वेषण अधिकारी को अपने कब्जे में ली गयी सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण हो, ऐसे विश्वास के कारणों को लिखित रूप में अभिलिखित किया जाएगा, - (क) किसी व्यक्ति के कब्जे में भ्रष्टाचार का कोई आगम हैं, (ख) ऐसा व्यक्ति भ्रष्टाचार से संबंधित कोई अपराध कारित करने का अभियुक्त है, और (ग) अपराध के ऐसे आगमों को छिपाने, अंतरित करने या ऐसी रीति से बरतने की संभावना है जिसके परिणामस्वरूप अपराध के ऐसे आगमों के अधिहरण से संबंधित कोई कार्यवाही विफल हो सकती है, वहाँ वह लिखित आदेश द्वारा अनंतिम रूप से ऐसी संपत्ति को ऐसे आदेश की तारीख से नब्बे दिन से अनधिक अवधि के लिए उपबंधित रीति से कुर्क कर सकेगा । (2) लोकायुक्त उप-धारा (1) के अधीन कुर्की के तुरंत पश्चात् आदेश की प्रति, उसके कब्जे में उस उप-धारा में निर्दिष्ट सामग्री सहित विशेष न्यायालय को एक सीलबंद लिफाफे में, उस रीति से, जो विहित की जाय, अग्रेषित करेगा और ऐसा न्यायालय कुर्की के आदेश का विस्तार कर सकेगा और ऐसी सामग्री को ऐसी अवधि के लिए रख सकेगा, जो न्यायालय उचित समझे । (3) उप-धारा (1) के अधीन की गयी कुर्की का प्रत्येक आदेश उस उप-धारा में विनिर्दिष्ट अवधि के अवसान पर या उप-धारा (2) के अधीन विशेष न्यायालय द्वारा निदेशित अवधि के अवसान पर निष्प्रभावी हो जाएगा । 34. आस्तियों की कुर्की की पुष्टि । - (1) लोकायुक्त, जब धारा 33 की उप-धारा (1) के अधीन किसी संपत्ति को अनंतिम रूप से कुर्क करता है, ऐसी कुर्की की तीस दिन की अवधि के भीतर, अपने अभियोजन खंड को विशेष न्यायालय के समक्ष ऐसी कुर्की के तथ्यों का कथन करने तथा विशेष न्यायालय में लोक सेवक के विरूद्ध कार्यवाहियों के पूरा होने तक संपत्ति की कुर्की की पुष्टि की प्रार्थना करने संबंधी आवेदन दाखिल करने का निदेश देगा । (2) विशेष न्यायालय, यदि उसकी यह राय हो कि अनंतिम रूप से कुर्क की गई संपत्ति का अर्जन भ्रष्ट साधनों से किया गया है, ऐसी संपत्ति की कुर्की की तब तक पुष्टि करने का आदेश कर सकेगा जब तक कि विशेष न्यायालय में लोक सेवक के विरुद्ध कार्यवाहियां पूरी न हो जाएं । (3) यदि लोक सेवक को तत्पश्चात् उसके विरुद्ध विरचित आरोपों से दोषमुक्त कर दिया जाता है तो विशेष न्यायालय के आदेशों के अधीन रहते हुए संपत्ति को ऐसे फायदों सहित जो कुर्की की अवधि के दौरान प्रोद्भूत हुए हों, संबंधित लोक सेवक को प्रत्यावर्तित कर दिया जाएगा । 35. भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित लोकसेवक के स्थानान्तरण या निलंबन की अनुशंसा करने की लोकायुक्त की शक्ति । - (1) जहाँ लोकायुक्त का, भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करते समय उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर प्रथम द्रष्टया यह समाधान हो जाय - कि धारा 16 की उप-धारा (1) के खंड (घ), (ङ), (च) और (छ) में निर्दिष्ट लोकसेवक के अपने पद पर बने12 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 रहने से ऐसी जाँच प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो सकती है वहाँ लोकायुक्त ऐसे लोकसेवक को उसके द्वारा धारित पद से उस अवधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, स्थानान्तरित करने या उसे निलंबित करने के लिए राज्य सरकार को अनुशंसा कर सकेगा । (2) राज्य सरकार सामान्यतया लोकायुक्त की अनुशंसा को स्वीकार करेगी । 36. जाँच के दौरान अभिलेखों को नष्ट किए जाने को रोकने के लिए निदेश देने की लोकायुक्त की शक्ति । - लोकायुक्त, इस अधिनियम के अधीन, अपने कृत्यों के निर्वहन में, - (क) ऐसे दस्तावेज या अभिलेख को नष्ट किए जाने या नुकसान से उसकी संरक्षा करने, या (ख) ऐसे दस्तावेज या अभिलेख में परिवर्तन करने या उसे छिपाने से लोक सेवक को रोकने, या (ग) लोक सेवक को भ्रष्ट साधनों के माध्यम से उसके द्वारा अभिकथित रूप से अर्जित किन्हीं आस्तियों को अंतरित करने या उनका अन्यसंक्रामण करने से रोकने, - के लिए किसी ऐसे लोक सेवक को समुचित निदेश जारी कर सकेगा जिसे दस्तावेज या अभिलेख को तैयार करने या उसे अभिरक्षा में रखने का कार्य सौंपा गया हो । 37. प्रत्यायोजित करने की शक्ति । - लोकायुक्त, लिखित रूप में साधारण या विशेष आदेश द्वारा और ऐसी शर्तों और परिसीमाओं, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएं, के अधीन रहते हुए, यह निदेश दे सकेगा कि उसको प्रदत्त किसी प्रशासनिक या वित्तीय शक्ति का, उसके ऐसे सदस्यों या अधिकारियों या कर्मचारियों द्वारा भी, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रयोग या निर्वहन किया जा सकेगा । 38. अन्य शक्ति एवं कर्त्तव्य । - लोकायुक्त के निम्नलिखित कर्त्तव्य एवं शक्तियाँ भी होंगी;- (1) (क) यदि लोकायुक्त का, अन्वेषण के प्रारंभिक जाँच के आधार पर प्रथम द्रष्टया यह समाधान हो जाय कि कोई लीज, लाइसेंस अनुज्ञप्ति, संविदा या समझौता, अपकरण (Misfeasance), दुव्र्यपदेशन, कपट या दबाव सहित भ्रष्ट स्रोत से प्राप्त किया गया था तो वह लीज, लाइसेंस, अनुज्ञप्ति, संविदा या समझौता के रद्दकरण या उपांतरण की अनुशंसा करेगा और भ्रष्टाचार की कार्रवाई में लिप्त फर्म, कंपनी, ठीकेदार अथवा किसी अन्य व्यक्ति को काली सूची में डालने के लिए भी अनुशंसा कर सकेगा । उपर्युक्त अनुशंसाएँ या तो लोक प्राधिकार या उसके द्वारा मान्य की जाएँगी अथवा अनुशंसा प्राप्ति के एक माह के भीतर नामंजूर कर दी जाएगी । (ख) यदि लोकायुक्त का किसी अनुसंधान के दौरान यह समाधान हो जाय कि भ्रष्टाचार की जारी घटनाओं को रोकने हेतु लोकहित में कोई निवारक कार्रवाई आवश्यक है तो वह संबंधित लोक प्राधिकार से या तो किसी विनिश्चय का क्रियान्वयन/प्रवर्त्तन स्थगित करने या किसी ऐसी कार्रवाई, जिसे लोकायुक्त द्वारा अनुशंसा की जाय को रोक देने की अनुशंसा कर सकेगा । उपर्युक्त अनुशंसाएँ लोक प्राधिकार द्वारा मान्य की जाएँगी अथवा अनुशंसा प्राप्ति के पंद्रह दिन के भीतर नामंजूर कर दी जाएँगी । (ग) लोकायुक्त की ओर से प्रारम्भ किये गये मामलों के लिये, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन किये गये अपराधों के अन्वेषण का अनुश्रवण करना, जिसमें भ्रष्टाचार के —त्य शामिल हैं । (घ) लोकायुक्त की ओर से प्रारम्भ किये गये मामलों के लिये, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अधीन स्थापित किसी विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन प्रारम्भ करना। (ङ) लोकायुक्त की ओर से प्रारम्भ किये गये मामलों के लिये, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन और बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अधीन या इस अधिनियम के अधीन अभियोजकों और वरीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति करना । (च) अन्वेषण अधिकारी को वैज्ञानिक अन्वेषण की आधुनिक पद्धतियों में प्रशिक्षित करना । (छ) समुचित अन्वेषण के लिये आवश्यक आधुनिक उपकरणों के बारे में जानकारी लेना । (ज) लोकायुक्त के किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध शिकायतों को प्राप्त करना । (झ) अपने ओहदेदारों/पदाधिकारियों/कर्मचारियों की सत्यनिष्ठा को सुनिश्चित करना और बर्खास्तगी, सेवामुक्ति एवं पदावनति का दण्ड अधिरोपित करना ।
अध्याय- IX
विशेष न्यायालय
39. राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किये जाने वाले विशेष न्यायालय । - (1) लोकायुक्त, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 से उद्भूत या बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अधीन या इस अधिनियम के अधीन मामलों के लिये अधिक विशेष न्यायालयों की स्थापना की अनुशंसा कर सकेगा और राज्य सरकार अधिक न्यायालयों की स्थापना के प्रस्ताव पर विचार करेगी । (2) उप-धारा(1) के अधीन गठित विशेष न्यायालय, न्यायालय में मामले के दाख़िल किये जाने की तारीख़ से एक वर्ष के भीतर प्रत्येक विचारण को पूरा किया जाना सुनिश्चित करेगा। परंतु यदि विचारण एक वर्ष की अवधि के भीतर पूरा नहीं किया जा सके तो विशेष न्यायालय उसके लिए कारण अभिलिखित करेगा और तीन मास से अनधिक की अतिरिक्त अवधि के भीतर या ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर, जो तीन मास से अधिक न होगी, ऐसी प्रत्येक तीन माह की अवधि की समाप्ति से पूर्व लिखित रूप में अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से, किंतु दो वर्ष की कुल अवधि से अनधिक के भीतर, विचारण को,13 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 पूरा करेगा । 40. कतिपय मामलों में अन्य राज्यों को अनुरोध पत्र । - (1) इस अधिनियम या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में किसी बात के होते हुए भी, यदि, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध या अन्य कार्यवाही में किसी जाँच या अन्वेषण के अनुक्रम में, लोकायुक्त के अन्वेषण अधिकारी द्वारा विशेष न्यायालय को यह आवेदन किया जाता है कि इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध या कार्यवाही में जाँच या अन्वेषण करने के संबंध में कोई साक्ष्य अपेक्षित है और उसकी यह राय हो कि ऐसा साक्ष्य अन्य राज्य में किसी स्थान पर उपलब्ध हो सकेगा और विशेष न्यायालय का यह समाधान हो जाने पर कि ऐसा साक्ष्य इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध या कार्यवाही में जाँच या अन्वेषण के संबंध में अपेक्षित है, वह कार्यवाही करने के लिए सक्षम अन्य राज्य में किसी न्यायालय को या प्राधिकारी को ऐसे अनुरोध के साथ अनुरोध पत्र जारी कर सकेगा कि वह,- (i) मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की परीक्षा करे; (ii) ऐसा उपाय करे जो विशेष न्यायालय द्वारा ऐसे अनुरोध पत्र में विनिर्दिष्ट किया जाए, और (iii) ग्रहण किये गये या संग्रहीत किये गये सभी साक्ष्य को, अनुरोध पत्र जारी करने वाले विशेष न्यायालय को अग्रसारित किया जाय । (2) अनुरोध पत्र ऐसी रीति से प्रेषित किया जायगा जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विहित की जाय । (3) उपधारा(1) के अधीन अभिलिखित प्रत्येक कथन या प्राप्त दस्तावेज या चीज़ जाँच या अन्वेषण के दौरान संग्रहीत साक्ष्य समझी जायगी ।
अध्याय- X
लोकायुक्त और पदाधिकारियों के विरुद्ध परिवाद
41. अध्यक्ष और सदस्यों के विरुद्ध परिवाद का लोकायुक्त द्वारा जाँच नहीं किया जाना । - (1) लोकायुक्त, अध्यक्ष अथवा सदस्य के विरुद्ध किये गये किसी परिवाद की जाँच नहीं करेगा । (2) अध्यक्ष या किसी सदस्य के विरुद्ध कोई परिवाद, व्यथित पक्ष द्वारा राज्यपाल के समक्ष एक आवेदन देकर किया जाएग । (3) (क) राज्यपाल का यदि यह समाधान हो जाय कि परिवाद में कोई प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो तीन माह के भीतर अधिनियम की धारा-7 के प्रावधान के अधीन जाँच के लिए शिकायत को निर्देशित कर देंगे। (ख) फिर भी, राज्यपाल का यदि समाधान न हो कि शिकायत में कोई प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो उप-धारा (3) के खंड (क) में विहित कालावधि के भीतर समुचित आदेश पारित करेंगे । 42. लोकायुक्त के पदाधिकारियों के विरुद्ध शिकायतें । - (1) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन दण्डनीय अपराध के लिए लोकायुक्त के अधीन या उससे सहबद्ध किसी अधिकारी या कर्मचारी या अन्वेषण अभिकरण के विरुद्ध उनके द्वारा किये गये दोषपूर्ण कार्य के आरोप के संबंध में की गई प्रत्येक शिकायत पर इस धारा के उपबंधों के अनुसार कार्रवाई की जायगी । (2) लोकायुक्त, की गई शिकायत या अभिकथन की जाँच, उसके प्राप्त किये जाने की तारीख़ से साठ दिन की अवधि के भीतर पूरा करेगा । (3) लोकायुक्त या लोकायुक्त में अभिनियोजित या उससे सहबद्ध किसी अभिकरण के किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध शिकायत की जाँच करते हुए यदि उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर लोकायुक्त का प्रथमद्रष्ट्या यह समाधान हो जाता है, कि- (क) जाँच करते समय लोकायुक्त के अधिकारी या सेवक या उसमें अभिनियोजित या उससे सहबद्ध अभिकरण के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी के अपने पद पर बने रहने से ऐसी जाँच प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो सकती है; या (ख) लोकायुक्त के अधिकारी या सेवक या उसमें अभिनियोजित या सहबद्ध अभिकरण का कोई अधिकारी या कर्मचारी साक्ष्य को नष्ट कर सकता है या किसी रूप में उसके साथ छेड़छाड़ कर सकता है या साक्ष्यिों को प्रभावित कर सकता है; - तो लोकायुक्त, आदेश द्वारा, ऐसे अधिकारी या कर्मचारी को निलंबित कर सकेगा या लोकायुक्त में अभिनियोजित या उससे सहबद्ध ऐसे अभिकरण को उसके द्वारा इससे पूर्व प्रयोग की गई सभी शक्तियों और उत्तरदायित्वों से वंचित कर सकेगा । (4) ऐसी जाँच के पूरा हो जाने पर, यदि लोकायुक्त को यह समाधान हो जाता है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन किसी अपराध या किसी गलत कार्य के किये जाने का प्रथमद्रष्ट्या साक्ष्य है तो वह ऐसी जाँच के पूरा होने के चालीस दिन की अवधि के भीतर लोकायुक्त के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी या लोकायुक्त में अभिनियोजित या उससे सहबद्ध अभिकरण के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी को अभियोजित करने का आदेश देगा और संबंधित पदाधिकारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही आरम्भ करने का आदेश दे सकेगाः परंतु ऐसा कोई आदेश, लोकायुक्त के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी या उसमें अभिनियोजित या उससे सहबद्ध अभिकरण के अधिकारी या कर्मचारी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिये बिना, पारित नहीं किया जायगा ।14 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011
अध्याय- XI
वित्त, लेखा और अंकेक्षण
43. बजट । - लोकायुक्त, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसे प्रपत्र में और ऐसे समय पर जो विहित किया जाय, अगले वित्तीय वर्ष के लिये, लोकायुक्त की प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय को दर्शाते हुए अपना बजट तैयार करेगा और उसे राज्य सरकार को सूचनार्थ अग्रसारित करेगा । 44. राज्य सरकार द्वारा अनुदान । - राज्य सरकार, इस निमित्त विधि द्वारा विधानमंडल द्वारा किये गये सम्यक् विनियोग के पश्चात् लोकायुक्त को ऐसी धन राशि अनुदत्त कर सकेगी, जो अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्तों के लिये और लोकायुक्त के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को या उनके संबंध में संदेय वेतन और भत्ते तथा पेंशन सहित प्रशासनिक ख़र्चों के लिये संदत्त किया जाना अपेक्षित हो । 45. वार्षिक लेखा विवरण । - (1) लोकायुक्त, उचित लेखाओं और अन्य सुसंगत अभिलेखों को बनाये रखेगा और महालेखाकार, बिहार के परामर्श से, ऐसे प्रपत्र में, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाय, लेखाओं का वार्षिक विवरण तैयार करेगा । (2) लोकायुक्त के लेखाओं का महालेखाकार, बिहार द्वारा ऐसे अंतरालों पर लेखा परीक्षा किया जायेगा जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किये जायँ । (3) महालेखाकार, बिहार को या इस अधिनियम के अधीन लोकायुक्त के लेखाओं कीे लेखा परीक्षा करने के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति को ऐसे लेखा परीक्षण के संबंध में वही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार प्राप्त होंगे जो सरकारी लेखाओं के लेखा परीक्षा के संबंध में साधारणतया महालेखाकार, बिहार को प्राप्त होेते हैं और विशेष रूप में बहियों, लेखाओें, संबंधित अभिश्रवों और अन्य दस्तावेजों तथा काग़ज़ात को प्रस्तुत करने की माँग करने और लोकायुक्त के कार्यालयों में से किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार प्राप्त होगा । (4) महालेखाकार, बिहार या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित लोकायुक्त के लेखाओं को, उनपर लेखा परीक्षा रिपोर्ट सहित, राज्य सरकार को वार्षिक रूप में अग्रसारित किया जायगा और राज्य सरकार उसे राज्य विधान मण्डल के प्रत्येक सदन के समक्ष रखेगी । (5) बिहार विधान-सभा एवं बिहार विधान परिषद् की कोई उपयुक्त संयुक्त समिति, लोकायुक्त के कार्यकलाप के वार्षिक मूल्यांकन का विनिश्चय कर सकेगी । लोकायुक्त, जहाँ वह इस समिति की अनुशंसाओं को स्वीकार नहीं करता है, वहाँ इसका विस्तृत कारण बताते हुए, राज्यपाल को एक अनुपालन रिपोर्ट समर्पित करेगा । इस रिपोर्ट को बिहार विधान-सभा एवं बिहार विधान परिषद् के पटलों पर रखा जाएगा ।
अध्याय- XII
अपराध और शास्तियाँ
46. अपराध एवं शास्तियाँ । - इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी भारतीय दंड संहिता, 1860 के साथ साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009, जहाँ तक अपराध एवं शास्तियों का संबंध है, लागू होंगे ।
अध्याय- XIII विशेष न्यायालय द्वारा हानि का निर्धारण एवं उसकी वसूली
47. विशेष न्यायालय द्वारा हानि का निर्धारण और उसकी वसूली । - विशेष न्यायालय द्वारा, यदि कोई लोक सेवक भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन किसी अपराध का सिद्धदोषी हो तो, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होने पर भी, वह हानि का, यदि कोई, सद्भावना से न की गई ऐसे लोक सेवक की कार्रवाई या न लिए गए विनिश्चय के चलते लोक राजकोष को हुए नुकसान का, जिसके लिए वह सिद्धदोषी है, निर्धारण कर सकेगा और उस सिद्धदोषी लोक सेवक से, ऐसी हानि, जो संभव या परिमाण योग्य हो, की वसूली के लिए आदेश कर सकेेगा;
परंतु यदि विशेष न्यायालय, लिखित रूप में अभिलिखित किये जाने वाले कारणों से, इस निष्कर्ष पर पहुॅंचता है कि कारित हानि उस सिद्धदोषी लोक सेवक की कार्रवाई या विनिश्चय के लाभुक या लाभुकों के षड्यंत्र के तहत की गयी थी, तब ऐसी हानि, यदि इस धारा के अधीन निर्धारित और परिमाण योग्य हो, आनुपातिक रूप से ऐसे लाभुक या लाभुकों से भी वसूल की जा सकेगी।15 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 अध्याय- XIV
अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर)
48. अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर) । - (1) कोई लोक पदधारी या आम जनता का कोई व्यक्ति, जिसे ज्ञात/जानकारी हो कि कोई लोक पदाधिकारी भ्रष्ट आचरण में लिप्त है तो उक्त ज्ञात/जानकारी को लोकायुक्त को भेजने हेतु प्रोत्साहित किया जायेगा और यह लोकायुक्त पर निर्भर करेगा कि यदि उसका समाधान हो जाए तो उस सूचना या जानकारी की स्वयं या अपनी एजेंसी से जॉंच का आदेश दें अथवा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के अधीन अन्वेषण के लिए आदेश पारित करें।
(2) अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर) की पहचान गोपनीय रखना, जहॉं अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर) वैसी इच्छा रखता है और/ अथवा किसी शारीरिक हानि या किसी प्रशासनिक परेशानी से अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर) को पूर्ण संरक्षण देना लोकायुक्त का दायित्व होगा। (3) अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर) को संरक्षण किसी भी रूप में दिया जाना हो वहॉं लोकायुक्त किसी सुरक्षा एजेंसी/एजेंसियों अथवा किसी अन्य प्राधिकार अथवा प्राधिकारियों को जिन्हें लोकायुक्त ठीक और उचित समझें, समुचित निदेश देने हेतु सक्षम होंगे। लोकायुक्त के उपर्युक्त निदेश उन एजेंसी/एजेंसियों या प्राधिकार/प्राधिकारियों पर बाध्यकारी होगा। (4) (क) किसी भी मामले में लोकायुक्त, इस धारा के अधीन तीव्रता से शिकायत प्राप्ति के एक माह के भीतर आदेश पारित करेगा। (ख) लोकायुक्त को यह समाधान होने पर कि अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर) को शारीरिक परिपातन की धमकी है अथवा इसका पूर्वानुमान है तो लोकायुक्त तत्काल समुचित कार्रवाई करने को स्वतंत्र होगा जैसा कि उचित एवं आवश्यक समझते हों। (5) शारीरिक अथवा व्यवसायिक भयादोहन के शिकार अन्तर्सूचक (हि्वशिल ब्लोअर) द्वारा शिकायत का अनुसंधान का निपटारा तीव्रता से प्राथमिकता के रूप में उसकी प्राप्ति के तीन माह के भीतर किया जायेगा।
अध्याय- XV
प्रकीर्ण
49. सद्भावपूर्वक की गयी कार्रवाई का संरक्षण । - लोकायुक्त अथवा उनके किसी पदाधिकारी, कर्मी, एजेंसी या किसी व्यक्ति के विरूद्ध किसी बात के लिए जो सद्भावनापूर्वक अथवा इस अधिनियम के अधीन किये जाने के आशय से की गयी है कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाहियाँ संस्थित नहीं होंगी । 50. लोकायुक्त के सदस्यों, अधिकारियों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना । - लोकायुक्त के अध्यक्ष, सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को, जब वे इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में कार्रवाई कर रहे हों या कार्रवाई करने के लिए तात्पर्यित हों, भारतीय दंड संहिता की धारा-21 के अंतर्गत लोक सेवक माना जायगा । 51. अधिकारिता का वर्जन । - किसी सिविल न्यायालय की ऐसे किसी मामले के संबंध में अधिकारिता नहीं होगी, जिसका अवधारण करने के लिए लोकायुक्त इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन सशक्त है ।
52. अधिनियम का अभिभावी प्रभाव होना । - इस अधिनियम के उपबंध, इस अधिनियम से भिन्न किसी अन्य अधिनियमिति या इस अधिनियम से भिन्न किसी अन्य अधिनियमिति के कारण प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में अंतर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे । 53. इस अधिनियम के उपबंधों का अन्य विधियों के अतिरिक्त होना । - इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे न कि उसके अल्पीकरण में । 54. राज्य सरकार को विवरण आदि दिया जाना । - (1) लोकायुक्त प्रत्येक वर्ष में एक बार, ऐसे प्ररूप में एवं ऐसे समय पर जैसा कि विहित किया जाय, विगत वर्ष की अपनी गतिविधियों का सारांश देते हुए एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और रिपोर्ट की प्रतियाँ राज्य सरकार को अग्रसारित करेगा । (2) उप-धारा(1) के अधीन प्राप्त रिपोर्ट की एक प्रति, इसकी प्राप्ति के बाद यथाशीघ्र राज्य सरकार द्वारा राज्य विधान मण्डल के दोनों सदनों के समक्ष रखी जायेगी । 55. नियम बनाने की शक्ति । - (1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों को क्रियान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी । (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित विषयों में से सभी या किसी के लिये उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :- (क) खोजबीन समिति के सदस्यों को देय फीस एवं भत्ते; (ख) इस अधिनियम की धारा-33 की उप-धारा (1)(ग) के अधीन अनंतिम कुर्की की रीति; (ग) इस अधिनियम की धारा-33 की उप-धारा (2) एवं धारा-34 के अधीन विशेष न्यायालय को सामग्री के साथ कुर्की आदेश भेजने की रीति; (घ) धारा-40 की उप-धारा(2) के अधीन अनुरोध पत्र प्रेषित करने की रीति; (ङ) प्रत्येक वित्तीय वर्ष में आगामी वित्तीय वर्ष के लिए बजट तैयार करने का प्ररूप और समय जिसमें16 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011 धारा-43 के अधीन लोकायुक्त की अनुमानित प्राप्तियाँ और व्यय दिखाए जाएँगे; (च) धारा-45 की उप-धारा (1) के अधीन लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख रखने के लिए प्ररूप और वार्षिक लेखा विवरणों का प्ररूप; (छ) धारा-45 की उप-धारा (1) के अधीन विवरण एवं विशिष्टियों सहित प्रतिवेदन तैयार करने का प्ररूप एवं रीति तथा समय ; (ज) धारा-54 की उप-धारा (1) के अधीन एक वार्षिक रिपोर्ट, जिसमें पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों के संक्षिप्त ब्यौरे दिए जाएँगे, तैयार करने का प्ररूप एवं समयः (झ) ऐसा कोई अन्य विषय जिसे विहित किया जाना हो या जो विहित किया जाय । 56. लोकायुक्त की विनियम बनाने की शक्ति । - (1) इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन, लोकायुक्त, राज्य सरकार के अनुमोदन के पश्चात् राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों को क्रियान्वित करने के लिए विनियम बना सकेगा । (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित विषयों में से सभी या किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :- (क) लोकायुक्त के सचिव और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारीयों की सेवाशर्त्तें और ऐसे विषय, जिनके लिए, जहाँ तक उनका संबंध वेतन, भत्तों, छुट्टी या पेंशन से है, धारा-10 की उप-धारा (2) के अधीन राज्य सरकार का अनुमोदन अपेक्षित है; (ख) धारा-18 की उप-धारा (1) के खण्ड (च) के अधीन लोकायुक्त की न्यायपीठों के बैठने का स्थान; (ग) कोई जाँच या अन्वेषण करने की रीति और प्रक्रिया; (घ) ऐसा कोई अन्य विषय, जिसे इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित हो या जिसे विनिर्दिष्ट किया जाए । 57. नियमों और विनियमों का रखा जाना । - इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम, उसके बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधानमण्डल के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा, यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात पर सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह नियम या विनियम, यथास्थिति, ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या वह निष्प्रभावी हो जाएगा, किंतु नियम या विनियम के इस प्रकार परिवर्तित या निष्प्रभावी होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा । 58. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति । - (1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो राज्य सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक प्रतीत होः परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभ से छः माह की अवधि के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा । (2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधानमण्डल के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा । 59. निरसन एवं व्यावृत्ति । - (1) बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 1973 और उसमें समय समय पर किया गया संशोधन एतद् द्वारा निरसित किया जाता है। (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 1973 के द्वारा या अधीन प्रदत्त शक्तियों के अधीन किया गया कोई कार्य या की गई कोई कार्रवाई इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्रदत्त शक्तियों के अधीन किया गया कार्य या की गई कार्रवाई समझी जाएगी मानो यह अधिनियम उस दिन प्रवृत्त था जिस दिन ऐसा कार्य किया गया था या कार्रवाई की गई थी ।17 (cid:1)बहार गजट (असाधारण), 21 &दस(बर 2011
प्रथम अनुसूची
[देखें धारा 3 की उप-धारा (5)]
मैं, ..................................................... जो लोकायुक्त का अध्यक्ष/सदस्य* नियुक्त हुआ हूँ ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा में प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति श्रद्धा एवं निष्ठा रखूंगा और मैं सम्यक् प्रकार से, श्रद्धापूर्वक तथा अपनी पूरी-पूरी योग्यता, ज्ञान एवं विवेक के साथ अपने कर्त्तव्यों का पालन भय या पक्षपात, राग या द्वेष से रहित होकर करूँगा । (* यथास्थिति)
वित्तीय संलेख
बिहार लोकायुक्त विधेयक, 2011 द्वारा राज्य में एक सशक्त लोकायुक्त संस्था, उनकी शक्तियों एवं कृत्यों एवं सभी श्रेणी के लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच का कार्य विहित किया जा रहा है। यह व्यय साध्य है। लोकायुक्त के अध्यक्ष का वेतन माननीय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समतुल्य एवं सदस्य का वेतन माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समतुल्य होंगे। साथ ही लोकायुक्त की स्थापना में वर्ग एक से वर्ग चार तक के पदाधिकारी / कर्मचारी भी होंगे । इनके वेतन एवं भत्ते राज्य सरकार के कर्मचारियों के समरूप होने के साथ अन्वेषण का कार्य की स्थापना पर भी राशि व्यय होना संभावित है। विधेयक के व्ययमूलक प्रावधान में वित्त विभाग की सहमति प्राप्त है।
(नीतीश कुमार) भारसाधक सदस्य
उद्देश्य एवं हेतु
बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 1973 न्याय के साथ विकास के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में हो रही अनियमितताओं, भ्रष्टाचार एवं इसके लिए दोषी के पहचान एवं उसके नियंत्रण के लिए पर्याप्त नहीं है, जबकि उपर्युक्त के लिए लोकायुक्त की महत्ती भूमिका है। सक्षम लोकायुक्त संस्था का निर्माण, उनकी शक्तियों, कृत्यों एवं सभी श्रेणी के लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की त्वरित जाँच एवं अभियोजन की स्वीकृति के लिए प्रावधान हेतु सशक्त लोकायुक्त अधिनियम समय की माँग है। इन्हीं बिन्दुओं की प्रतिपूर्त्ति बिहार लोकायुक्त विधेयक, 2011 का उद्देश्य है तथा इसे अधिनियमित कराना ही इस विधेयक का अभीष्ट है।
(नीतीश कुमार) भारसाधक सदस्य
पटनाः दिनांक-07.12.2011
गिरीश झा, प्रभारी सचिव, बिहार विधान-सभा।
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अधी-क, सिचवालय मुिणालय, (cid:1)बहार, पटना (cid:13)ारा ूकािशत एवं मु&ित। (cid:1)बहार गजट (असाधारण) 781-571+10-ड*0ट*0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in