Servants of Knowledge
Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 28 August 2012

Published 28 August 2012

Type
Extra Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2012-08-28.435
Languages
English, Hindi

िनबंधन सं(cid:8)या पी0ट(cid:15)0-40 (cid:18)बहार(cid:18)बहार(cid:18)बहार(cid:18)बहार गजटगजटगजटगजट

असाधारण अंकअसाधारण अंकअसाधारण अंकअसाधारण अंक (cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत 6666 भाभाभाभािििि 1111934934934934 ((((शशशश0000)))) ((((संसंसंसं0000 पपपपटना टना टना टना 444435353535) ) ) ) पपपपटनाटनाटनाटना,,,, मंगलमंगलमंगलमंगलवारवारवारवार,,,, 22228888 अगःतअगःतअगःतअगःत 2012201220122012 कार्यालय निबंधक, सहयोग समितियाँ, बिहार, पटना ------ आदेष 27 अगस्त 2012

सं0 07/नि॰(विधि-03) शीर्ष स॰स॰-01/08-4422—दिनांक 23.08.2012 को बिहार स्टेट हाऊसिंग को-ऑपरेटिव फेडरेषन लि0 (फेडरेशन) के विद्वान अधिवक्तागण को सुना। उनके द्वारा दिनांक 25.08.2012 को Note of Arguments एवं अन्य कागजात दाखिल किया गया है।

वर्त्तमान कार्यवाही कार्मिक एवं प्रषासनिक सुधार विभाग के पत्र संख्या 2263 दिनांक 01.03.07 से प्राप्त प्रषासनिक सुधार आयोग के प्रथम प्रतिवेदन के अनुषंसाओं के क्रम में राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में लिये गये निर्णय के आलोक में प्रारंभ की गई। निबंधक, सहयोग समितियाँ के पत्रांक 2833 दिनांक 01.06.07 द्वारा बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम, 1935 (अधिनियम) की धारा-35 के अंतर्गत जाँच (enquiry) का आदेष श्री पी॰पी॰ ओझा, संयुक्त निबंधक, सहयोग समितियाँ-सह-राज्य अनुश्रवण पदाधिकारी, आई॰सी॰डी॰पी॰ को दिया गया। जाँच पदाधिकारी के पत्रांक 107 दिनांक 29.02.08 से प्रतिवेदन प्राप्त हुआ, जिसके आधार पर अधिनियम की धारा-42 के अंतर्गत परिसमापन की कार्रवाई प्रारम्भ की गयी। निबंधक, सहयोग समितियाँ, बिहार, पटना के आदेष ज्ञापांक 1768 दिनांक 18.03.08 के द्वारा बिहार स्टेट हाऊसिंग को-ऑपरेटिव फेडरेषन लि॰ के निदेषक पर्षद के सभी सदस्यों को यह कारण पृच्छा निर्गत की गयी कि उक्त फेडरेषन को क्यों नहीं परिसमापित करने पर विचार किया जाय। फेडरेषन के प्रबंध समिति के अध्यक्ष द्वारा पत्रांक 127 दिनांक 22.05.08 से जवाब समर्पित किया गया। पुनः पत्रांक 687 दिनांक 30.09.09 द्वारा जवाब दिया गया। सम्प्रति बिहार स्टेट हाऊसिंग को-ऑपरेटिव फेडरेषन लि॰ की प्रबंध समिति माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा सी0डब्लू0जे0सी0-7581/2008 में पारित आदेश दिनांक 23.09.11 के आलोक में अवक्रमित है तथा अधोहस्ताक्षरी के आदेष ज्ञापांक 4827 दिनांक 10.10.11 द्वारा अधिनियम की धारा-14 (10) के तहत फेडरेषन के कार्य संचालन करने के लिए प्रषासक की नियुक्ति की गयी है। अवक्रमण की अवधि का विस्तार अधोहस्ताक्षरी के आदेष ज्ञापांक 1980 दिनांक 10.04.12 तथा आदेष ज्ञापांक 3542 दिनांक 10.07.12 के द्वारा किया गया है। नियुक्त प्रषासक में फेडरेषन के प्रबंध समिति की शक्तियाँ निहित है। उल्लेखनीय है कि बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम, 1935 के धारा-42 के अंतर्गत जिस सहकारी समिति के विरुद्ध परिसमापन की कार्रवाई की जानी है, उन्हें सुनवाई का अवसर दिया जाना है। इसी प्रावधान का अनुपालन करते हुए प्रबंध समिति/प्रषासक से पुनः कारण पृच्छा की माँग की गयी। प्रषासक के पत्रांक 2010 दिनांक 28.07.12 तथा 2044 दिनांक 07.08.12 एवं प्रबंध निदेषक द्वारा पत्रांक 2007 दिनांक 26.07.12 से प्रत्युत्तर प्राप्त हुआ।2 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 28 अगःत 2012 दिनांक 23.08.12 को सुनवाई के आरंभ में फेडरेशन के विद्वान अधिवक्ता द्वारा दिनांक 16.08.12 को सुनवाई के उपरान्त पारित आदेश ज्ञापांक 4277 दिनांक 17.08.12 के संदर्भ में recall/modification petition दाखिल किया गया। उक्त recall/modification petition का अवलोकन किया। उल्लेखनीय है कि दिनांक 16.08.12 को निर्धारित सुनवाई में फेडरेशन के विद्वान अधिवक्ता द्वारा कतिपय बिन्दुओं पर preliminary objection petition दाखिल किया गया एवं बहस किया गया। preliminary objection petition में अंकित बिन्दुओं एवं विद्वान अधिवक्तागण के बहस के आधार पर संगत वैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत समुचित समीक्षोपरान्त आदेश ज्ञापांक- 4277 दिनांक 17.08.12 द्वारा preliminary objection petition को इस हद तक खारिज किया गया कि वर्त्तमान प्रक्रिया में किसी भी संगत वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं हो रहा है। उल्लेखनीय है कि फेडरेशन के विलम्बकारी रूख के बावजूद preliminary objection petition में किये गये अनुरोध के आलोक में विद्वान अधिवक्तागण को कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के पत्र संख्या- 2263 दिनांक 01.03.07 (अनु0 सहित) उपलब्ध करा दी गई थी, जिसमें संंबंधित कागजात की प्रति संलग्न थी। पुनः उन्हीं बिन्दुओं पर आपत्ति दायर करना फेडरेशन के विलम्बकारी रूख का द्योतक प्रतीत हो रहा है। विद्वान अधिवक्तागण द्वारा विगत आदेश ज्ञापांक - 4277 दिनांक 17.08.12 के याचित संशोधन के औचित्य की वैधानिकता स्पष्ट नहीं की जा सकी। विद्वान अधिवक्तागण को सुनने एवं अभिलेख के अवलोकनोपरान्त मैं संतुष्ट हूँ कि विगत सुनवाई दिनांक 16.08.12 के उपरान्त निर्गत आदेश ज्ञापांक 4277 दिनांक 17. 08.12 एक समुचित एवं मुखर आदेश है जिसमें किसी प्रकार की संशोधन की आवश्यकता नहीं है। उक्त आलोक में तत्संबंंंधी आपत्तियों को निस्तारित करते हुए कारण-पृच्छा के बिन्दुओं पर सुनवाई की गई। फेडरेशन के विद्वान अधिवक्ता द्वारा कारण पृच्छा में अंकित बिन्दुओं पर अपना पक्ष रखा गया।

विद्वान अधिवक्ता द्वारा बताया गया कि वर्त्तमान में फेडरेशन अच्छे ढंग से कार्य कर रही है तथा इसके परिसमापन का कोई ठोस आधार नहीं है। विद्वान अधिवक्ता द्वारा बिन्दुवार अपने दावों के पक्ष में बहस किया गया जो निम्नवत्‌ है :-

1. विद्वान अधिवक्ता का कहना है कि फेडरेषन की वित्तीय स्थिति सुदृढ़ है। उनका कहना है कि वर्ष 1998 एवं 2000 में राज्य सरकार की गारंटी पर हुडको से लिये गये ऋण की राशि के विरूद्ध कुल 1515.12 लाख रु0 की राषि सरकार को वापस कर दिया गया है। तथा मात्र 115.89 लाख रु0 बाकी है। इनका यह भी कहना है कि आई॰जी॰आई॰एम॰एस॰, पटना के पास फेडरेषन का 423.51 लाख रु0 बकाया है, जो राज्य सरकार की देनदारी है। इस प्रकार यह राषि राज्य सरकार से ही पावना है और वित्त विभाग के पत्रांक 919 दिनांक 17.11.11 द्वारा स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को यह निदेष दिया गया है कि 1.08 करोड़ रु0 फेडरेषन को अविलम्ब भुगतान किया जाय। इस प्रकार वर्त्तमान परिदृष्य में राज्य सरकार का फेडरेषन के विरुद्ध कोई बकाया नहीं है।

2. श्री पी॰पी॰ ओझा, राज्य अनुश्रवण पदाधिकारी द्वारा किये गये जाँच के संबंध में भी आपत्तियां उठायी गयी और कहा गया कि प्रावधानानुसार जाँच पदाधिकारी द्वारा समिति की आम सभा नहीं बुलायी गयी। इस प्रकार जाँच पदाधिकारी द्वारा कानून की आवष्यकता के अनुरूप कार्य नहीं किया गया और फेडरेषन के सामान्य परिषद को अर्थात्‌ फेडरेषन के सदस्यों को जाँच से अवगत नहीं कराया गया। जाँच पदाधिकारी द्वारा कहीं फेडरेषन में लाभ दिखाया गया तो कहीं हानि भी दिखाई है। जहाँतक फेडरेषन के कार्मिकों पर होने वाले खर्च का संबंध है, फेडरेषन के पास पर्याप्त आय है, जिसे वह इस खर्च को वहन कर सके। इनका कहना है कि जाँच पदाधिकारी द्वारा धारा-35 के तहत की गयी जाँच में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसलिए पूरी जाँच अस्वच्छ है। इस संबंध में विद्वान अधिवक्ता द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय ए॰आई॰आर॰-64 उच्चतम न्यायालय 358 का भी दृष्टांत दिया जाय। इनका यह भी कहना है कि उस तथाकथित जाँच प्रतिवेदन में जाँच पदाधिकारी द्वारा फेडरेषन को बंद करने/परिसमापन करने का कोई आधार नहीं पाया गया है। और न इनके द्वारा इस हेतु कोई अनुषंसा की गयी है। इसलिए वह प्रतिवेदन फेडरेषन के परिसमापन की कार्यवाही को प्रारम्भ करने का आधार नहीं हो सकता है। साथ ही विद्वान अधिवक्ता का यह भी कहना है कि चूंकि उक्त प्रतिवेदन वर्ष 2008 में ही प्राप्त हुआ था इसलिए फेडरेषन के वर्त्तमान क्रियाकलापों एवं वित्तीय स्थिति उससे परिलक्षित नहीं होती है।

3. विद्वान अधिवक्ता का कहना है कि राज्य प्रषासनिक सुधार आयोग का यह क्षेत्राधिकार नहीं था कि वह फेडरेषन के क्रियाकलाप एवं वित्तीय स्थिति को देखे। चूंकि फेडरेशन एक निबंधित सहकारी संस्था है न कि कोई सरकारी विभाग। इसलिए यह आष्चर्यजनक है कि फेडरेषन का मामला किस प्रकार प्रषासनिक सुधार आयोग में गया और आयोग द्वारा फेडरेषन के परिसमापन की अनुषंसा की गयी। इनके द्वारा उक्त आयोग द्वारा की गयी अनुषंसा के कारणों को भी अस्पष्ट, भ्रामक तथा गलत कहा गया। यह कहा गया कि फेडरेषन अपने प्राथमिक समितियों, भवन निर्माताओं को ऋण उपलब्ध कराता है। इस प्रकार फेडरेषन का क्रियाकलाप उसके सदस्यों के हित से जुड़ा हुआ है और यदि इसे बंद किया गया तो इसके सदस्य असहाय हो जायेंगे। आयोग की अनुषंसा में निहित 11.23 लाख रु0 के हानि को भी विद्वान अधिवक्ता द्वारा गलत बताया गया। इनका यह भी कहना है कि दिनांक 18.03.08 के कारण पृच्छा नोटिष को पढ़ने से यह स्पष्ट है कि प्रषासनिक सुधार आयोग के प्रतिवेदन तथा मंत्रिपरिषद में लिये गये निर्णय ने ही निबंधक, सहयोग समितियाँ को परिसमापन की कार्यवाही चलाने के लिए उत्प्रेरित किया, जो कानून की आवष्यकता नहीं है। इस प्रकार निबंधक, सहयोग समितियाँ द्वारा परिसमापन हेतु बनायी गयी राय उन तथ्यों पर बनायी गयी, जो निराधार है और इस प्रकार प्रारम्भ की गयी कार्यवाही समाप्त कर देने के योग्य है।3 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 28 अगःत 2012 4. विद्वान अधिवक्ता का यह भी कहना है कि जाँच पदाधिकारी द्वारा भी फेडरेषन के सदस्यों को नहीं सुना गया और दिनांक 18.03.08 की नोटिष भी फेडरेषन के प्रबंध निदेषक को निदेषक पर्षद के सदस्यों को तामिला के लिए भेजी गयी। इस प्रकार फेडरेषन के सदस्यों को कोई नोटिष नहीं दिया गया, जबकि फेडरेषन का गठन सदस्यों द्वारा ही किया गया है। इनके द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायादेष को उदृत करते हुए यह कहा गया कि किसी कम्पनी अथवा फैक्टरी को बंद करने हेतु उसके बनाने वाले तथा कार्मिकों को भी नोटिष दिया जाना चाहिए। 5. विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह भी कहा गया कि यह कार्यवाही कानूनन गलत एवं निष्क्रीय हो गयी है परन्तु विद्वान निबंधक, सहयोग समितियाँ द्वारा राज्य सरकार के आदेष को क्रियान्वित करने हेतु कार्यवाही चलायी जा रही है। अधिनियम की धारा-42 के प्रावधानानुसार भी अभिलेख में कोई ऐसे तथ्य नहीं है, जिससे यह स्थापित हो सके कि फेडरेषन ने अपना कार्य प्रारम्भ नहीं किया अथवा फेडरेषन ने कार्य कराना बंद कर दिया है अथवा इसके सदस्यों की संख्या घटकर 10 से कम हो गयी है। इसलिए निबंधक, सहयोग समितियाँ को इस मामले में धारा-42 के तहत अपने शक्तियों का प्रयोग करना क्षेत्राधिकार के बाहर है।

6. विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह भी बताया गया कि राज्य के पुनर्गठन के बाद फेडरेषन द्वारा केन्द्रीय पंजीयक को मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाईटी के रूप में फेडरेषन को निबंधित करने हेतु प्रतिवेदन भेजा गया है और मामला अभी भी केन्द्रीय पंजीयक के यहाँ लम्बित है। इसलिए पुनर्गठन के बाद यह कार्यवाही अवैध है और क्षेत्राधिकार के बाहर है। मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव एक्ट की धारा-103 के प्रावधानों के अनुसार फेडरेषन के संबंध में कोई कार्रवाई केन्द्रीय पंजीयक द्वारा ही की जा सकती है।

7. विद्वान अधिवक्ता द्वारा कहा गया कि फेडरेषन प्राथमिक समितियों का संघ है, जो अपने उपविधियों में निहित उद्धेष्यों के अनुरूप कार्यरत्‌ है। उपविधियों में निहित उद्धेष्यों को फेडरेषन द्वारा पूरा किया गया है और अपने कार्य क्षेत्र में अभी भी यह कार्यरत्‌ है। इसलिए भविष्य की योजना सहकारी कानून विषेषकर फेडरेषन के लिए अपरिचित है। इनका कहना है कि वैसे फेडरेषन द्वारा अनेक योजनाएं विभाग/निबंधक, सहयोग समितियाँ को भेजी गयी है परन्तु विभाग/निबंधक, सहयोग समितियाँ द्वारा उन योजनाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। उसे खारिज भी नहीं किया गया है। इसलिए भविष्य की योजना नहीं होने के संबंध में फेडरेषन पर लगाये गये आरोप गलत है। अंत में इनके द्वारा यह अनुरोध किया गया कि उनके द्वारा किये गये बहस एवं दाखिल किये गये कागजात के आधार पर यह स्पष्ट हो रहा है कि संगत प्रावधानों के अन्तर्गत फेडरेशन के परिसमापन का निर्णय लिया जाना उचित नहीं होगा।

फेडेरषन के विद्वान अधिवक्ता को सुनने एवं उनके द्वारा दाखिल प्रत्युत्तर एवं written note of argument एवं दाखिल कागजातों के अवलोकनोपरान्त फेडरेशन के विद्वान अधिवक्ता द्वारा किये गये उपरोक्त वर्णित दावों के संदर्भ में बिन्दु-वार स्थिति निम्नवत्‌ पायी गई :-

1. जांच पदाधिकारी के जांच प्रतिवेदन एवं फेडरेशन द्वारा उपलब्ध कराये गये कागजातों के अवलोकन से यह स्पष्ट हो रहा है कि फेडरेशन का वित्तीय कार्यकलाप समुचित रूप से सम्पादित नहीं किया जा रहा है। फेडरेशन द्वारा राज्य सरकार की गारंटी पर हुडको से वर्ष 1998 एवं 2000 में 816.15 लाख रूपये का ऋण लिया गया। जिस उद्‌देश्य के लिये ऋण लिया गया था उसके निमित्त ऋण की राशि का समुचित उपयोग फेडरेशन द्वारा नहीं किया जा सका। जिसके कारण ऋण की शर्ताें के अनुसार मूलधन एवं सूद की राशि की अदायगी पर फेडरेशन द्वारा वर्षाें तक default किया गया। इसके उपरान्त यह मामला राज्य सरकार के संज्ञान में लाया गया। समीक्षोपरान्त पाया गया कि फेडरेशन द्वारा अनियमित ऋण वितरण तथा वित्तीय गड़बड़ी के कारण इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हुई। तदोपरान्त गारंटर के रूप में हुडको को ऋण एवं सूद के राशि की अदायगी के लिये सहकारिता विभाग के स्वीकृति आदेश संख्या-183 दिनांक 27.10.06 द्वारा कुल 1671.04 लाख रु0 हुडको को भुगतान किया गया। स्वीकृति आदेश के अनुसार उक्त सम्पूर्ण राषि को फेडरेशन को दिये गये ऋण के रूप में मानते हुए 13% वार्षिक सूद के साथ फेडरेषन द्वारा बिहार सरकार को एक वर्ष के अन्दर वापस किया जाना था। तथा फेडरेषन द्वारा ससमय भुगतान करने पर 1.4% की छूट तथा विलम्ब होने पर 2.5% की दर से दंड सूद प्रावधानित था। परन्तु फेडरेषन द्वारा उपलब्ध करायी गयी साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि फेडरेषन द्वारा राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त ऋण की राषि को एक वर्ष की निर्धारित अवधि में वापस नहीं किया गया। उक्त राशि को वापस करने में फेडरेशन द्वारा 10 वर्षाें से अधिक की अवधि ली गई। अभी भी राज्य सरकार को देय सम्पूर्ण राशि वापस नहीं की जा सकी है। उल्लेखनीय है कि फेडरेशन एक निबंधित सहकारी संस्था है तथा इसकी प्रबंध समिति सभी निर्णय लेने हेतु सक्षम है। वर्षाें तक हुडको से ऋण प्राप्त करने के उपरान्त फेडरेशन द्वारा ऋण की अदायगी ससमय नहीं की गयी तथा गारंटर के रूप में सरकार को ऋण की राशि वापस करनी पड़ी। इस प्रकार की स्थिति फेडरेशन के वित्तीय प्रबंधन पर अपने आप में प्रश्नचिन्ह है। जैसा कि सुनवाई एवं कागजातों के अवलोकन से स्पष्ट हो रहा है कि विगत कई वर्षाें से फेडरेशन के आय का स्रोत मात्र ऋण की वसूली एवं मकान किराया है। यह भी उल्लेखनीय है कि समय-समय पर फेडरेशन द्वारा One time settlement (OTS) scheme प्रवृत्त की जाती है जो कि अपने आप में निधि के समुचित प्रबंधन की कमी को दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि फेडरेशन द्वारा राज्य सरकार को वापस की गई राशि के निधि का स्रोत OTS scheme से प्राप्त राशि ही थी। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि फेडरेशन के वित्तीय कार्यकलाप की स्थिति संतोषजनक नहीं है तथा भविष्य के लिये भी वित्तीय कार्यकलाप (financial business) के सुदृढ़ीकरण हेतु फेडरेशन के पास कोई ठोस योजना नहीं है।4 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 28 अगःत 2012 2. फेडरेषन द्वारा दिये गये प्रत्युत्तर में अधिनियम की धारा-35 के तहत किये गये जाँच के प्रावधान को उल्लिखित करते हुए कहा गया कि जाँच पदाधिकारी द्वारा फेडरेषन के सदस्यों की सामान्य बैठक नहीं बुलाई गई। इस प्रकार निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। साथ ही प्रतिवेदन में जाँच पदाधिकारी द्वारा फेडरेषन को बंद करने/परिसमापन करने का कोई आधार नहीं पाया गया है और न उनके द्वारा इस हेतु कोई अनुषंसा की गई। इस संबंंंध में सुनवाई के दौरान फेडरेशन के विद्वान अधिवक्ता द्वारा अधिनियम की धारा 35 (2) की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया था। उक्त वैधानिक प्रावधान का उद्धरण निम्नवत्‌ है :-

" The Registrar or the person authorized by him under sub-section (1) may :-

(a) require an officer of the society to a call a general meeting at such time and place at the headquarters of the society, and require the society to take into consideration such matters, as he may direct ……

उक्त प्रावधान के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि जांच की कार्रवाई के क्रम में समिति की सामान्य बैठक बुलाया जाना बाध्यकारी (pre-requisite) नहीं है। संभवतः जांच पदाधिकारी द्वारा इस संबंध में अपेक्षा नहीं की गई होगी इसलिए बैठक बुलाने का निदेष नहीं दिया गया। अतः निर्धारित प्रक्रिया पूर्ण नहीं करने संबंधी अभिकथन संगत प्रावधानों के अन्तर्गत नहीं है। इसके अलावे परिसमापन संंबंधी अनुषंसा भी जाँच पदाधिकारी से अपेक्षित नहीं है। चूंकि इन्हें मात्र अधिनियम की धारा-35 के तहत समिति की जांच कर प्रतिवेदन समर्पित करने का निदेश दिया गया था। इसलिए यह बिन्दु भी स्वीकार योग्य नहीं है।

3. राज्य प्रषासनिक सुधार आयोग द्वारा अपनी अनुषंसा में कहा गया है कि फेडरेषन का गठन गृह निर्माण कार्यों के लिए सही दरों पर ऋण उपलब्ध कराने के उद्धेष्य से किया गया था। इस कार्य में यह फेडरेषन सफल नहीं हो पाया है। फेडरेषन को अभी तक 11.23 लाख रु0 का घाटा हो चुका हे। अधिकांष ऋणियों से ऋण वसूल करने में फेडरेषन पूर्णतः विफल रहा है। फलस्वरूप फेडरेषन का घाटा लागातार बढ़ रहा है। अभी इस फेडरेषन में 86 कर्मी कार्यरत्‌ हैं, जिनकी स्थापना पर प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ रु0 का व्यय होता है। फलस्वरूप आगामी वर्षों में यह फेडरेषन अपना व्यय भार उठा पाने की स्थिति में नहीं रहेगा। आज की तिथि में सरकारी एवं राष्ट्रीकृत बैंकों से अधिक सुविधा, कम ब्याज दर एवं अल्प समय में गृह निर्माण कार्याें के लिए ऋण उपलब्ध हो जाता है। ऐसे परिस्थिति में बिहार हाऊसिंग को-ऑपरेटिव फेडरेषन की भी अब कोई उपयोगिता नहीं रह गयी है। फेडरेषन द्वारा दिये गये प्रत्युत्तर में संलग्न साक्ष्यों से स्पष्ट है कि फेडरेषन को वर्ष 2002-03 में कुल 1122796.33 रु0 संचित हानि हुई है, जबकि उस वर्ष का लाभ 654856.11 रु0 था। फेडरेषन की कुल प्रदत्त हिस्सा पूँजी मो॰ 867.98 लाख रु0 है, जिसमें मो॰ 199.96 लाख रु0 अन्य सदस्यों के हैं और बाकी 618.02 लाख रु0 राज्य सरकार के अंष है। इस प्रकार उक्त फेडरेशन के कुल प्रदत्त हिस्सा पूँजी में राज्य सरकार का हिस्सा 77 % है। इस प्रकार राज्य सरकार बिहार स्टेट हाऊसिंग को-ऑपरेटिव फेडरेषन की सबसे बड़ी हिस्साधारक सदस्य है। तथा राज्य सरकार का अभिमत संगत राज्य मंत्रिमंडल के निर्णय से संसूचित है।

4. परिसमापन की कार्यवाही को प्रारम्भ करते हुए फेडरेषन के पूर्व प्रबंध समिति तथा वर्त्तमान प्रषासक को कारण पृच्छा निर्गत की गयी तथा उन्हें सुनवाई का अवसर दिया गया। यह सत्य है कि फेडरेषन का गठन उसके सदस्यों अर्थात्‌ हिस्साधारक द्वारा किया गया है परन्तु किसी भी सहकारी समिति का प्रतिनिधित्व उसका प्रबंध पर्षद ही करता है। इस संबंध में बिहार सहकारी समितियाँ अधिनियम-1935 की धारा 2(e) का उद्धरण निम्नवत्‌ है - "Managing committee means the committee of management or other body to whom the management of the affairs of a registered society is entrusted."

उपरोक्त वर्णित परिभाषा से यह स्पष्ट है कि ऐसे सभी मामलों में (जिसके संदर्भ में अन्यथा कोई express provision निरूपित न हो) किसी भी सहकारी समिति का प्रतिनिधित्व प्रबंध समिति ही करती है। इसलिए फेडरेषन के वैधानिक प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित पूर्व प्रबंध समिति से तथा वर्त्तमान प्रषासक (जिनमेें वैधानिक रूप से प्रबंध समिति की सभी शक्तियाँ निहित हैं) से कारण पृच्छा की गयी, जिसके आधार पर निबंधक, सहयोग समितियाँ द्वारा वर्त्तमान कार्यवाही संचालित की जा रही है। जिसमें किसी प्रकार की वैधानिक अस्पष्टता नहीं है। 5- यह सच है कि निबंधक, सहयोग समितियाँ द्वारा बिहार प्रषासनिक सुधार आयोग की अनुषंसा एवं मंत्रिपरिषद के निर्णय के आलोक में यह कार्यवाही प्रारम्भ की गयी परन्तु बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम, 1935 की धारा-42 के प्रावधानों का अनुपालन करते हुए धारा-35 के तहत जाँच कर प्रतिवेदन समर्पित करने के लिए श्री पी॰पी॰ओझा, संयुक्त निबंधक, सहयोग समितियाँ-सह-राज्य अनुश्रवण पदाधिकारी, आई॰सी॰डी॰पी॰ को अधिकृत किया गया तथा उनके द्वारा समर्पित प्रतिवेदन केे आधार पर वर्त्तमान कार्यवाही संचालित की जा रही है। इसलिए निबंधक, सहयोग समितियाँ द्वारा इस मामले में धारा-42 के प्रावधानों का पालन करते हुए कार्यवाही चलायी गयी है।

6. फेडरेषन को मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव एक्ट, 2002 के प्रावधानों के तहत स्वतः निबंधित (Deemed Registered) संस्था मानना वैधानिक रूप से सही नहीं है। जब तक उक्त एक्ट के प्रासंगिक प्रावधानों के अनुसार प्रक्रिया पूर्ण कर फेडरेषन को केन्द्रीय पंजीयक द्वारा (Deemed Registration) का प्रमाण-पत्र (Certificate) नहीं निर्गत किया जाता है तब तक केवल आवेदन प्रेषित करने तथा आवेदन लम्बित को आधार बनाकर बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम, 1935 के प्रावधानों के तहत उसके पक्ष में अथवा उसके विरुद्ध कार्यवाही चलाने तथा आदेष5 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 28 अगःत 2012 पारित करने को क्षेत्राधिकार का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता है। फेडरेषन द्वारा भी अपने लिखित जवाब में जो साक्ष्य दिये गये हैं उससे स्पष्ट होता है कि फेडरेषन बिहार को-ऑपरेटिव सोसाईटीज एक्ट के तहत निबंधित एक संस्था है। जिसका निबंधक संख्या-03/1969 है। यहाँ यह कहना भी प्रासंगिक होगा कि पूर्व में फेडरेशन द्वारा सभी कार्रवाई बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम, 1935 के अन्तर्गत निबंधित संस्था के रूप में ही कार्यकलाप संपादित किया जाता रहा है जैसा की उनके प्रशासक/प्रबंध निदेशक के लगातार पत्राचार से स्पष्ट होता है। अतः इस वर्त्तमान कार्यवाही में इस बिन्दु को उठाया जाना पूर्णतः भ्रामक एवं तथ्यों को तोड़-मरोड़कर उपस्थापित करने का प्रयास है।

7. फेडरेशन की उपविधियाँ में अंकित उद्‌देश्य (objects) निम्नवत्‌ है :-

The Primary objects of the Federation shall be to finance the Primary House Construction Co-operative Societies. For this purpose, it shall be competent for the Federation:- (i) To raise funds by way of deposite and loans as may be decided by the Board in accordance with these bye-laws and subject to the prior approval of the Registrar, Co-operative Societies, Bihar, by debentures or other means as decided by the Board.

(ii) To grant loans to the affiliated Primary House Construction Co-operative Societies and associate members on such terms and conditions as may be prescribed by the Board and as approved by Registrar, Co-operative Societies, Bihar, from time to time, for the following purposes :-

[a] Construction of new houses/flats. [b] Improvement of or additions to existing houses of the members of affiliated Primary Housing Co-operative Societies as are eligble for such loan which will add to their value, and

[c] Purchase of house or house complex where such purchase will be advantageious to the borrowers provide such borrowers are members of affiliated Primary Housing Co-operative Societies and the house or house complex proposed to be purchased falls within the area of operation of such Primary Societies, provided also that no individual shall be eligible for loan for the purchase of more than one house/flat. (iii) To inspect the affiliated Primary House Construction Co-operative Society through such person as may be deputed for the purpose from time to time, and to have the hypothecation for loans issued, valued periodically.

(iv) To serve as an apex institution of Housing Co-operative Societies in the State and to guide and promote Housing Co-operative movement in the State.

(v) To function as a financing and promotional institution in terms of the Act and the Rules for the affiliated Primary Housing Co-operative Societies.

(vi) To assist persons belonging particularly to middle and low income groups and other weaker sections of the community who are members of the affiliated societies. (vii) To undertake housing schemes for the benefit of Weaker Sections and construct housing complexes in both urban and rural areas for such people.

(viii) To construct house complex/colony for its members, if necessary, to under take purchase of lands and development there of for such purposes.

(ix) (a) To procure and help to procure land and building materials for its members.

(b) To purchase land through direct negotiation from Government or Semi Government agencies for construction of house complex/colony or for allotment to the member societies. Provided that no purchase of land from private individuals shall be, made except as per rules approved by the Registrar. Co-operative Societies.

(x) To undertake production of such materials as are essential for the construction of houses and buildings.

(xi) To provide engineering and architectural services to its members.

6 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 28 अगःत 2012

(xii) To extend legal assistance to its members. (xiii) To organise seminars and conference etc for the promotion of Housing Co-operative Movement in the State.

(xiv) To frame rules with the approval of the Registrar, Co-operative Societies for grant of loans and for the smooth working and efficient functioning of the Federation.

(xv) To invest surplus when not required for the business of the Federation, in one or more of the ways as approved by the Registrar, Co-operative Societies.

(xvi) To participate in scheme of financing of the societies sponsored by the Goverement or Semi Government organizations including financial institutions authorized to make investment in housing activites.

(xvii) To plan for the construction of low cost houses. (xviii) To develope, assist and exercise general supervision over the working of affiliated societies.

(xix) To improve social, moral and economice conditions of its members by creating suitable environment and extending such facilities as are conducive to their healthy growth.

(xx) To promote and safeguard the economic interest of the members and do all other things which are incidental to or conducive to the attainment of the above objects.

निबंधित उपविधियों के अनुसार फेडरेशन का प्राथमिक उद्धेष्य प्राथमिक गृह निर्माण सहकारी समितियाें का वित्त-पोषण एवं उनके कार्यकलाप के समुचित सम्पादन हेतु leadership देना है। उक्त कार्य के लिये निधि के प्रबंधन हेतु फेडरेशन की प्रबंध समिति को समुचित अधिकार है तथा निर्णय लेने हेतु प्रबंध समिति स्वयं सक्षम (Competent) है। इस बिन्दु पर भी कोई साक्ष्य नहीं दिये गये हैं कि परिसमापन हेतु कारण पृच्छा निर्गत होने के पूर्व तथा बाद में अब तक सम्बद्ध समितियों के माध्यम से कितनी राषि ऋण के रूप में वितरित की गई है अथवा कितने गृहों का निर्माण कराया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि फेडरेषन द्वारा विगत कई वर्षों से राज्य में गृह निर्माण हेतु वित्त-पोषण का कार्य विधिवत्‌ एवं नियमित रूप से नहीं किया जा रहा है। इस प्रकार फेडरेषन अपने उपविधि में अंकित प्राथमिक उद्धेष्य की पूर्त्ति में विफल रहा है। फेडरेषन द्वारा सुनवाई में कहा गया है कि अनेक प्रस्ताव विभाग/निबंधक, सहयोग समितियाँ के अनुमोदन हेतु लंबित है। जबकि सुनवाई के दौरान उपस्थित प्रबंध निदेशक एवं विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया जा सका कि फेडरेषन की योजनाओं को विभाग अथवा निबंधक, सहयोग समितियाँ की स्वीकृति अधिनियम, नियमावली अथवा उपविधि के किस प्रावधान के तहत वांछित है। जबकि कार्य योजना तैयार करने एवं कार्यान्वित करने हेतु अधिनियम, उसके अन्तर्गत प्रवृत्त नियमावली एवं उसकी उपविधियों के अन्तर्गत प्रबंध समिति स्वयं सक्षम है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि फेडरेशन द्वारा मात्र इस कार्यवाही में अपना पक्ष रखने के उद्‌देश्य से उपरोक्त अभिकथन अंकित किया जा रहा है जबकि वस्तुतः उक्त कार्य फेडरेशन की प्राथमिकता में कभी नहीं रहा। यह भी स्पष्ट है कि फेडरेषन के पास भविष्य के लिए कोई ठोस योजना नहीं है जिससे वर्त्तमान में उसकी प्रासंगिकता अथवा उपयोगिता सिद्ध होती हो। इसके अतिरिक्त उपरोक्त वर्णित फेडरेशन के उद्‌देश्यों की कंडिका (vi) एवं (vii) के संदर्भ में भी फेडरेशन द्वारा कोई सार्थक कार्रवाई नहीं की गई। फेडरेषन द्वारा अपने प्रत्युत्तर में अल्प आय वर्ग एवं कमजोर वर्ग के लोगों के लिए कार्यान्वित किये गये गृह निर्माण योजना के संबंध में कोई संतोषजनक साक्ष्य नहीं दिया गया। इसके अतिरिक्त उपरोक्त वर्णित फेडरेशन के उद्‌देश्यों की कंडिका (x) एवं (xi) के संदर्भ में भी फेडरेशन द्वारा कोई सार्थक कार्रवाई नहीं की गई। इस संबंध में सुनवाई के दौरान कोई भी साक्ष्य नहीं रखा जा सका। इसके अतिरिक्त उपरोक्त वर्णित फेडरेशन के उद्‌देश्यों की कंडिका (xvii) के संदर्भ में भी फेडरेशन द्वारा कोई सार्थक कार्रवाई नहीं की गई। इस संबंध में सुनवाई के दौरान ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं रखा गया जिससे यह स्थापित हो सके की फेडरेशन द्वारा low cost houses के निर्माण की कार्य योजना कार्यान्वित की गई हो। इसके अतिरिक्त उपरोक्त वर्णित फेडरेशन के उद्‌देश्यों की कंडिका (xviii) एवं (xix) के संदर्भ में भी फेडरेशन द्वारा कोई सार्थक कार्रवाई नहीं की गई। यह अंकित करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि अधिकांश प्राथमिक गृह निर्माण सहकारी समितियाँ शहरी क्षेत्रों विशेषकर पटना में केंद्रित है। प्राथमिक गृह निर्माण सहकारी समितियों के सम्पूर्ण राज्य अन्तर्गत भौतिक विस्तार संबंधी कार्य पर फेडरेशन द्वारा कभी भी ध्यान नहीं दिया गया। इसके अतिरिक्त प्राथमिक गृह निर्माण सहकारी समितियों के कार्यकलाप के विभिन्न बिन्दुओं पर leadership देने के बिन्दु पर भी फेडरेशन विफल रहा है। अतः इस बिन्दु पर विद्वान अधिवक्ता का averments तथ्यों के विपरीत रहने के कारण स्वीकार योग्य नहीं है। उपरोक्त वर्णित तथ्यात्मक विवेचना के आधार पर यह स्थापित हो रहा है कि उक्त सहकारी समिति (बिहार स्टेट हाऊसिंग को-ऑपरेटिव फेडरेशन लि0) अपने उपविधि में निहित उद्‌देेष्यों की पूर्ति में असफल रही है। फेडरेशन का वित्तीय प्रबंधन समुचित नहीं रहा है तथा भविष्य के लिये भी वित्तीय प्रबंधन सुदृढ़ीकरण के लिये कोई कार्य योजना7 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 28 अगःत 2012 नहीं है। इसके अतिरिक्त उपविधियों में निहित उद्‌देश्यों के संदर्भ में भी फेडरेशन की भविष्य की ठोस कार्य योजना नहीं है। लगभग 40 वर्षाें से अधिक अवधि के अस्तित्व में फेडरेशन द्वारा अपने उद्‌देश्यों की पूर्ति हेतु समुचित रूप से कार्यान्वित किये गये किसी योजना का साक्ष्य नहीं दिया जा सका। फेडरेशन का वर्त्तमान कार्यकलाप मात्र ऋण की वसूली एवं किराया की वसूली तक सीमित रह गई है। किसी भी संस्था का कार्य अपने उद्‌देश्यों की पूर्ति हेतु सतत्‌ प्रयासरत रहना एवं तत्संबंधी कार्याें का समुचित रूप से कार्यान्वयन करना होता है। फेडरेशन की उपविधि में निहित उद्‌देश्यों में से कई उद्‌देश्यों के संदर्भ में अब तक फेडरेशन द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके अलावे जिन कतिपय बिन्दुआें पर इनके द्वारा कार्य भी किया गया है उसमें गंभीर वित्तीय कुप्रबंधन एवं लापरवाही पूर्ण कार्यान्वयन किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि फेडरेशन द्वारा अपने सम्बद्ध सदस्यों के हितों की उपेक्षा की गई। अतः विद्वान अधिवक्तागण को सुनने एवं उनके द्वारा दाखिल कागजात तथा अभिलेख में संलग्न कागजातों के अवलोकनोपरान्त उक्त विवेचना से यह स्थापित हो रहा है कि फेडरेशन द्वारा अपनी उपविधि में निहित उद्‌देश्यों के कई बिन्दुओं पर आज तक कार्य ही प्रारंभ नहीं किया गया है। तथा उपविधि में निहित उद्‌देश्यों के अन्य बिन्दुओं पर इनका कार्यकलाप ठप है। अतः बिहार स्टेट हाऊसिंग को-ऑपरेटिव फेडरेषन लि॰, पटना के अस्तित्व में बने रहने का कोई यथोचित आधार नहीं पाते हुए उसे विघटित करने की आवश्यकता है।

अतः बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम, 1935 की धारा-42 के अन्तर्गत बिहार स्टेट हाऊसिंग को-ऑपरेटिव फेडरेषन लि॰, पटना (निबंधन संख्या-03/1969) को विघटित करते हुए परिसमापन का आदेष दिया जाता है। उक्त समिति केे परिसमापन की विधिवत कार्रवाई के लिए अधिनियम की धारा-44(1) के तहत श्री संजय कुमार सिंह, जिला पदाधिकारी, पटना को तत्काल के प्रभाव से परिसमापक नियुक्त किया जाता है। नियुक्त परिसमापक अधिनियम की धारा-44(2) के तहत अविलम्ब फेडरेषन के आस्तियों, अभिलेखों एवं अन्य लेख्यों का प्रभार ग्रहण करेंगे। साथ ही परिसमापक, बिहार सहकारी सोसाईटी अधिनियम, 1935 तथा उसकी अधीन बनी नियमावली के प्रासंगिक सुसंगत प्रावधानों के तहत आदेष निर्गत की तिथि से छह माह के भीतर परिसमापन की कार्यवाही समाप्त करेंगे। यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू होगा। इस आदेश की सूचना सभी संबंधितों को दी जाये तथा आदेश की प्रति सरकारी गजट में भी प्रकाशन हेतु भेजी जाये।

आदेश से, राजेष कुमार, निबंधक, सहयोग समितियाँ।

—————

अधी.क, सिचवालय मुिणालय,

(cid:18)बहार, पटना (cid:26)ारा ूकािशत एवं मु2ित। (cid:18)बहार गजट (असाधारण) 435-571+10-ड(cid:15)0ट(cid:15)0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in

Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 28 August 2012. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2012-08-28.435/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2012-08-28.435.