Servants of Knowledge
Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 05 March 2013

Published 05 March 2013

Type
Extra Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2013-03-05.177
Languages
English, Hindi

िनबंधन सं(cid:8)या पी0ट(cid:15)0-40 (cid:18)बहार(cid:18)बहार(cid:18)बहार(cid:18)बहार गजटगजटगजटगजट

असाधारण अंकअसाधारण अंकअसाधारण अंकअसाधारण अंक (cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत(cid:18)बहार सरकार (cid:26)ारा ूकािशत 14141414 फा गुफा गुफा गुफा गुनननन 1111934934934934 ((((शशशश0000))))

((((संसंसंसं0000 पपपपटना टना टना टना 177177177177) ) ) ) पपपपटनाटनाटनाटना,,,, मंगलमंगलमंगलमंगलवारवारवारवार,,,, 5555 माच-माच-माच-माच- 2013201320132013 ty lalk/ku foHkkx ———— vf/klwpuk 15 tuojh 2013

सं0 22/नि0सि0(वि0)-1020/90(अंश-1)/62—मुख्य अभियन्ता, जल संसाधन विभाग, डाल्टेनगंज के अन्तर्गत विभिन्न प्रमण्डलों में वर्ष 1987-88 में सोडियम भैपर लैम्प एवं चौक्स की खरीदगी में बरती गई गंभीर अनियमितताओं के लिए मंत्रिमंडल (निगरानी) विभाग द्वारा निगरानी थाना में दायर मुकदमा सं0-51/90 में श्री के0 सी0 प्रधान (कृष्ण चन्द्र प्रधान) तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता यांत्रिक प्रमण्डल मंडल (पलामू) को धारा-420/467/ 468/471/ 477/ 477(ए)/120बी0/109 भा0 द0 वि0 एवं धारा-5(2) सह पठित धारा-5(1) डी0 भ्र0 नि0 अधि0 का संज्ञेय अभियुक्त बनाये जाने के फलस्वरूप विभागीय आ0सं0-18 दिनांक 8.2.91 के द्वारा निलंबित करते हुए उनके विरूद्व विभागीय संकल्प ज्ञापांक 2138 दिनांक 7.10.91 द्वारा सिविल सर्विसेज (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियम-55 के तहत विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गईः-

इनके विरूद्व मुख्य रूप से निम्न आरोप गठित किये गये। (क) जब वे यांत्रिक प्रमण्डल मंडल, पलामू में कार्यपालक अभियन्ता के पद पर पदस्थापित थे तो 200 अद्‌द सोडियम भैपर लैम्प, 250 वाट के चॅाक्स आपातिक खरीद के लिए आपातिक स्थिति की पृष्ठभूमि तैयार कर साजिश पूर्वक मनमाने ढंग से सिमित निविदा के आधार पर मनचाहे फर्म से काफी अधिक कीमत पर समानों की खरीदगी के लिए आपातिक व्यादेश बनाना।

(ख) उपर्युक्त आपातिक व्यादेश पर निदेशक, क्रय एवं परिवहन के पत्र सं0-25/परि0-5-302/88 दिनांक 24.3.88 द्वारा मे0 स्कायी मास्टर सिनेमा रोड, हाजीपुर से जमानत की राशि जमाकर आपूर्ति का आदेश दिया गया। इस आदेश के साथ आपूर्ति किये जाने वाले समानों की सूची, कीमत एवं शत्र्तो की सूची संलग्न थी। (ग) संलग्न शत्र्तो में यह बात निहित थी कि आपूर्तिकत्र्ता किसी भी प्रकार का भुगतान का दावा करने के पहले संबंधित फर्म का अद्यतन बिक्री कर एवं इनकम टैक्स क्लिियरेन्स सर्टिफिकेट, भुगतानकत्र्ता पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। भुगतान के पूर्व सप्लायर से उपरोक्त कागजात जानबूझ कर आपके द्वारा प्राप्त नहीं किया गया। अगर वह ऐसा करते तो फिशटिसस व्यक्ति श्री पी0 के0 सिंह को भुगतान करना उनके लिए संभव नहीं होता।

(घ) उनके द्वारा बैंक ड्राफ्‌ट पर भुगतानकत्र्ता मे0 स्कायी मास्टर लिखा गया परन्तु जानबूझकर एवं साजिश पूर्वक इस फर्म का पता सिनेमा रोड हाजीपुर नहीं लिखा गया और बाद में साजिश के तहत इसे हाजीपुर के बदले पेबुल ऐट पटना कराया गया। उपर्युक्त सभी अनियमितताओं के लिए वह दोषी पाये गये।2 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 5 माच- 2013 संचालन पदाधिकारी द्वारा जॅाच प्रतिवेदन प्राप्त कराया गया जिसमें इनके विरूद्व निम्नांकित कारणों से आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया ।

(क) प्रायः व्यादेशित मात्रा के मुताबिक सामान कम ही मिल पाता है। ऐसी स्थिति में कार्यपालक अभियन्ता के द्वारा पे्रषित व्यादेश कोई विषम परिस्थिति पैदा नहीं करती है तथा इसमें साजिश की कोई बात नहीं दिखती। यह आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

(ख) श्री प्रधान द्वारा आपूर्तिकत्र्ता से भुगतान के पूर्व बिक्रीकर एवं आयकर मुक्त प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिया गया था।

(ग) श्री प्रधान ने एकाउन्ट पेयी बैंक ड्राफ्‌ट मे0 स्कायी मास्टर के नाम दिया। चेक या बैंक ड्राफ्‌ट में सिर्फ पेयी का नाम ही देने का प्रचलन है। ड्राफ्‌ट बनवाने वाले का पूरा पता रहता है। एकाउन्ट पेयी चेक या ड्राफ्‌ट उसी के एकाउन्ट में जमा होगा चाहे वे किसी जगह पेयबुल हो इसमें साजिश की कोई बात नहीं है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जॅाच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरान्त विभागीय पत्रांक 1966 दिनांक 6.7.96 द्वारा जॅाच प्रतिवेदन से असहमति के विन्दु पर इनसे द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। उनसे प्राप्त जबाव की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरान्त उक्त आरोप प्रमाणित पाये गये। तदोपरान्त विभागीय अधिसूचना सं0-3075 दिनांक 22.9.97 द्वारा इन्हें निलंबन से मुक्त करते हुए निम्न दण्ड संसूचित किया गया। (क) 1,60,000/- रूपये ( एक लाख साठ हजार रूपये मात्र) की वसूली जो उनके वेतन से पॅाच हजार रूपये प्रति माह की दर से प्रत्येक माह की जायेगी। अगर सेवा अवधि में उक्त राशि की वसूली नहीं हो पाती है तो उनके सेवानिवृत्ति के उपरान्त शेष राशि की वसूली देय उपादान एवं पावनाओं से एक मुश्त की जायेगी।

(ख) निलंबन अवधि में उन्हें जीवन यापन भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा परन्तु उक्त अवधि पेंशन के प्रयोजनार्थ गणना की जाएगी।

दण्डादेश के विरूद्व श्री प्रधान सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियन्ता द्वारा सी0 डब्लू0 जे0 सी0 सं0-7535/98 दायर किया गया जिसमें न्याय निर्णय पारित कर दण्डादेश सं0-3075 दिनांक 22.9.97 को निरस्त कर दिया गया। विभाग द्वारा उक्त न्याय निर्णय के विरूद्व एल0 पी0 ए0 सं0-98/2000 दायर किया गया, जिसमें दिनांक 19.10.2000 को न्याय निर्णय पारित करते हुए विभाग को जॅाच प्रतिवेदन के असहमति के विन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा कर निर्णय लेने का आदेश पारित किया गया। उक्त न्याय निर्णय के अनुपालन में श्री प्रधान से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। उनसे प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के समीक्षोपरान्त विभागीय अधिसूचना सं0-1282 दिनांक 4.10.02 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया।

(1) 1,60,000/-रू0 ( एक लाख साठ हजार रूपये मात्र) की वसूली जो उनके वेतन से पॅाच हजार रूपये प्रति माह की दर से प्रत्येक माह की जायेगी। अगर सेवा अवधि में उक्त राशि की वसूली नहीं हो पाती है तो उनके सेवानिवृत्ति के उपरान्त शेष राशि की वसूली देय उपादान एवं पावनाओं से एक मुश्त की जायेगी।

(2) निलंबन अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा, लेकिन इसकी गणना पेंशन के प्रयोजनार्थ की जाएगी।

उक्त दण्डादेश के विरूद्व श्री प्रधान द्वारा पुनः याचिका सी0 डब्लू0 जे0 सी0 सं0-10530/03 दायर किया गया जिसमें दिनांक 26.9.03 को माननीय न्यायालय के द्वारा उक्त दण्डादेश दिनांक 4.10.02 को निरस्त कर दिया गया एवं एल0 पी0 ए0 सं0-98/2000 में पारित न्याय निर्णय के आलोक में पुनः कारवाई करने का आदेश पारित किया गया। जिसके अनुपालन में विभागीय पत्रांक 667 दिनांक 3.9.04 द्वारा श्री प्रधान से पुनः द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री प्रधान द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा समर्पित किया गया। प्राप्त जबाब के समीक्षोपरान्त विभागीय अधिसूचना सं0-406 दिनांक 2.5.05 द्वारा पूर्व में संसूचित दण्ड को बरकरार रखने का आदेश निर्गत किया गया। श्री प्रधान द्वारा उक्त विभागीय दण्डादेश दिनांक 2.5.05 के विरूद्व पुनः याचिका सी0 डब्लू0 जे0 सी0 सं0-8469/05 दायर किया गया जिसमें दिनांक 1.7.11 को न्याय निर्णय पारित करते हुए माननीय न्यायालय द्वारा कहा गया कि उक्त दण्डादेश निर्गत करने में पुनः गलती की गयी है। दण्डादेश में वादी के द्वारा किये गये अनियमितता का उल्लेख किया गया है लेकिन वादी द्वारा समर्पित जबाव को अस्वीकार करने के कारणों का उल्लेख नहीं किया गया। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दण्डादेश दिनांक 02.05.05 को निरस्त करते हुए नया आदेश निर्गत करने का आदेश पारित किया गया, जिसके अनुपालन में श्री प्रधान से विभागीय पत्रांक 1609 दिनांक 27.12.11 द्वारा दिनांक 02.01.12 को विभाग में उपस्थित होकर पक्ष रखने का अनुरोध किया गया। उनके द्वारा दिनांक 02.01.12 को उपस्थित होकर पक्ष रखा गया। सुनवाई के दौरान उन्हें निगरानी थाना में दायर मुकदमा सं0-51/90 में माननीय व्यवहार न्यायालय द्वारा गठित आरोप की प्रति उपलब्घ कराने का आदेश दिया गया। उक्त निदेश के आलोक में श्री प्रधान द्वारा दिनांक 20.1. 12 को माननीय व्यवहार न्यायालय, पटना द्वारा पारित न्याय निर्णय की छाया प्रति प्राप्त करायी गई।

उक्त न्याय निर्णय के आलोक में मामले की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। पाया गया कि विभागीय पत्रांक 667 दिनांक 3.9.04 द्वारा श्री प्रधान से निम्नांकित असहमति के विन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गयीः- जॅाच प्रतिवेदन के असहमति के विन्दुः- (क) संचालन पदाधिकारी द्वारा विभाग द्वारा उपलब्ध कराये गये अभिलेखों को नजरंदाज कर जॅाच प्रतिवेदन प्राप्त कराया गया।

(ख) श्री प्रधान द्वारा प्रक्रियाओं का बिना अनुपालन किए ही आपातिक व्यादेश दिनांक 11.11.87 दिया गया।3 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 5 माच- 2013 (ग) श्री प्रधान को भंडार में चौक्स उपलब्ध रहने की पूर्ण जानकारी रहने के बावजुद उनके द्वारा चौक्स के क्रय हेतु आपातिक व्यादेश दिया गया, जो जरूरी नहीं था।

अभिलेखों से ज्ञात होता है कि मे0 स्कायी मास्टर के प्रोपाइटर श्री इशरार अहमद खॅान द्वारा सब इन्स्पेक्टर कैबिनेट भिजिलेंस को आवेदन देते हुए कहा गया है कि इनके तरफ से निविदा नहीं भरा गया है। उस निविदा पर ओम प्रकाश का हस्ताक्षर है उसे वे नहीं जानते है लेकिन श्री प्रधान द्वारा एक योजना के तहत फर्जी व्यक्ति से सामग्रियों की प्राप्ति की गयी एवं उसे भुगतान किया गया।

(घ) उनके उक्त कृत्य के लिए उनके विरूद्व भिजिलेंस केस सं0-51/90 दिनांक 16.11.90 दायर की गयी। (ड.) श्री प्रधान द्वारा उॅचे दर पर व्यक्तिगत लाभ के लिए 5,50,295/- रूपये की चॅाक्स की खरीदगी की गयी।

(च) श्री प्रधान द्वारा जाली व्यक्ति श्री ओम प्रकाश से सामग्री प्राप्त की गई एवं उसे 5,50,295/- रूपये का बैंक ड्राफ्‌ट पेबुल ऐट पटना द्वारा भुगतान किया गया जो मे0 स्कायी मास्टर सिनेमा रोड, हाजीपुर का प्रोपाइटर नहीं था। बैंक ड्राफ्‌ट को पेबुल ऐट, पटना करके बैंक ड्राफ्‌ट निर्गत करने के कुकृत्य से प्रमाणित होता है कि वे कार्य के प्रति इमानदार नहीं थे।

(छ) श्री प्रधान द्वारा अप्रील 1988 में 200 सोडियम भैपर लैम्प की चौक्स की खरीदगी की गयी। लेकिन दिनांक 30.12.88 तक मात्र एक चौक का उपयोग किया गया तथा दिनाक 12.10.90 तक मात्र 54 चौक्स का उपयोग किया गया। शेष सभी चौक्स भंडार में पड़े हुए थे जिससे स्पष्ट है कि 200 चौक्स की खरीदगी की आवश्यकता नहीं थी।

(ज) अभिलेखों से ज्ञात होता है कि वर्ष 1988 में चौक्स का बाजार मूल्य 800/- रूपये प्रति चौक था, लेकिन श्री प्रधान द्वारा वर्ष 1988 में 2500/- रूपये प्रति चौक की दर से निजी लाभ के लिए 200 चौक्स की खरीदगी की गयी जिससे सरकार को भारी क्षति हुई।

श्री कृष्ण चन्द्र प्रधान सेवानिवृत्त कार्यपालक अभियन्ता द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर दिनांक 20.

9.04 में मुख्य रूप से निम्न तथ्य कही गयी हैः-

जब वे नार्थ कोयल मेकेनिकल डिविजन मंडल पलामू में कार्यपालक अभियन्ता के पद पर पदस्थापित थे तब बांध निर्माण कार्यो के लिए एवं कोलोनियों के लिए उनके पत्रांक 1696 दिनांक 11.11.87 द्वारा 200 अद्‌द सोडियम भैपर लैम्प के चौक्स की खरीदगी हेतु आपत्तिक व्यादेश अधीक्षण अभियन्ता मंडल के प्रतिहस्ताक्षर के उपरान्त उनके पत्रांक 1560 दिनाक 27.11.87 द्वारा निदेशक, क्रय एवं परिवहन जल संसाधन विभाग, बिहार को एक माह के अन्दर आपूर्ति करने हेतु भेजा गया। निदेशक, क्रय एवं परिवहन द्वारा आपूर्तिकत्र्ता एवं दर का निर्धारण किया गया एवं लगभग साढ़े चार माह बाद अप्रील 1988 में सामग्रियों को प्राप्त कराया गया। इस मामले में सारी प्रक्रियाओं का पालन निदेशक, क्रय एवं परिवहन जल संसाधन विभाग द्वारा किया जाना था। इसके लिए वे संबंधित नहीं है उक्त बातों के अतिरिक्त श्री प्रधान द्वारा असहमति के विन्दु का विन्दुवार उतर दिया गया जो निम्न हैः-

(1) विभाग द्वारा आरोप सिद्व करने हेतु जॅाच पदाधिकारी को कोई अभिलेख प्राप्त नहीं कराया गया, बल्कि वे ही आरोप के जबाव दिनांक 13.11.91 के साथ अभिलेख जॅाच पदाधिकारी को प्राप्त कराये थे।

(2) जैसाकि उक्त वर्णित है, सारी प्रक्रियाओं के पालन करते हुए दिनांक 11.11.87 का व्यादेश भेजा गया। (3) व्यादेश भेजने के समय भंडार में एक भी चौक उपलब्ध नहीं था। उनके द्वारा खरीदगी का आदेश नहीं दिया गया। यह सभी कार्रवाई सचिवालय स्तर पर निदेशक, क्रय एवं परिवहन सिंचाई विभाग द्वारा की गयी। क्षेत्रीय पदाधिकारी होने के कारण खरीदगी की प्रक्रिया उनसे संबंधित नहीं है। (4) यह सही है कि 14 अन्य व्यक्तियों के साथ उनके विरूद्व निगरानी केस सं0-51/90 दिनांक 16.11.90 रजिस्टर्ड की गयी।

(5) यह सही नहीं है कि 5,50,295/- रूपये के उॅची दर पर चौक्स उनके द्वारा खरीदगी की गयी। परचेज आर्डर निदेशक, क्रय एवं परिवहन, जल संसाधन विभाग बिहार द्वारा दी गयी।

(6) मे0 स्कायी मास्टर हाजीपुर द्वारा सामग्रियों को कार्यपालक अभियन्ता नार्थ कोयल मेकेनिकल डिविजन मंडल के नाम से बुक किया गया। सामग्रियों को साइट पर उनके द्वारा प्राप्त किया गया। यह बिल्कुल गलत है कि बैंक ड्राफ्‌ट ओम प्रकाश के नाम से तैयार किया गया।

यह सही है कि मेसर्स स्कायी मास्टर पेबुल ऐट हाजीपुर के पक्ष में बैंक ड्राफ्‌ट सं0-383542 दिनांक 19.4.88 तैयार कर उन्हें दिया गया। कुछ दिनों के बाद उनके अनुरोध पर उक्त बैंक ड्राफ्‌ट को कैसिंल करते हुए दूसरा बैंक ड्राफ्‌ट सं0-522070 दिनांक 2.5.88 मे0 स्कायी मास्टर पेबुल ऐट पटना बनाकर उन्हें प्राप्त कराया गया।

क्रमांक स्थल की विवरणी प्रस्तावित/कार्यरत भैपर लैम्प स्थल अनुमाानित चौक की संख्या अभियुक्ति
1. 350 मी0 लम्बा डैम स्थल के दोनों तरफ 15-15 अद्‌द 30 30 बिजली क े भोल्टेज म े ं यदाकदा अचानक वृद्वि होने पर बल्ब फ्‌यूज अधिक होते थे तथा चौक जल कर पिधल जाता था।
2. तीन एप्रोच रोड में 3-3 अद्‌द 09 09
3. कार्य स्थल पर उपलब्ध मैटैरियल यार्ड, सिमेंट गोदाम आदि 06 06
4. डाउन स्ट्रीम ब्रिज का निर्माण 05 05
5. 37 कौलोनी का पुराना स्थल तथा 50 प्रभावित नया स्थल के रख रखाव के लिए लगभग डेढ़ चौक प्रति स्थल के दर से 87 150
क्ुल योग- 137 200
4 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 5 माच- 2013

उनके द्वारा व्यादेश दिनांक 11.11.87 को अधीक्षण अभियन्ता को भेजा गया। अधीक्षण अभियन्ता द्वारा दिनांक 27.11.87 को निदेशक, क्रय एवं परिवहन, को भेजा गया और एक माह के अन्दर उन सामग्रियों को वर्क सिजन दिसम्बर 87 से मई 88 तक के लिए प्राप्त कराने का अनुरोध किया गया। परन्तु सामग्रियों को बहुत विलम्ब से वर्किग सिजन के समाप्ति के बाद अप्रील 88 में आपूर्ति हुई जिससे उसका उपयोग नहीं किया जा सका।

(8) उॅची दर 2500/- रूपये प्रति चौक की खरीदगी निदेशक, क्रय एवं परिवहन, सिंचाई विभाग द्वारा की गयी। यह आरोप उनसे संबंधित नहीं है।

उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर मामले की समीक्षा की गयी, जिसमें निम्न तथ्य पाये गयेः- (1) श्री कृष्ण चन्द्र प्रधान द्वारा आपातिक व्यादेश के औचित्य के संबंध में कंडिका (07) में उल्लेखित कारण को मान्य नहीं किया जा सकता है क्योंकि उनके द्वारा 137 प्रस्तावित/कार्यरत भैपर लैम्प स्थल के विरूद्व 200 चौक्स की मांग की गयी। उसमें भी मात्र 54 चौक्स का ही उपयोग किया जा सका। शेष भंडार में पड़े रहे। उनका कहना है कि बिजली के भोल्टेज में यदाकदा अचानक वृद्वि होने पर बल्ब फ्‌यूज होते थे तथा चौक जल कर पिघल जाता था। इस बात को भी मान्य नहीं किया जा सकता है क्योंकि जब उनके द्वारा अप्रील 88 में 200 चौक्स की प्राप्ति की गयी उसमें से कम से कम 137 चौक्स का उपयोग हो जाने चाहिए था। अर्थात 200 भैपरलैम्प के चौक्स की खरीदगी आपतिक स्थिति नहीं थी लेकिन नीजि लाभ के लिए आवश्यकता से अधिक भैपर लैम्प के चौक्स का आपतिक व्यादेश भेजा गया।

(2) श्री प्रधान का कहना है कि आपातिक व्यादेश दिनांक 27.11.87 को निदेशक, क्रय एवं परिवहन, को भेजा गया और एक माह में प्राप्त कराने का अनुरोध किया गया लेकिन उन्हें साढ़े चार माह बाद सामग्री प्राप्त करायी गयी जिससे वर्किग सिजन समाप्त हो चुका था। जिसकेे चलते उन चौक्स का उपयोग नहीं किया जा सका। इस तथ्य को मान्य नहीं किया जा सकता है क्योंकि सामग्री प्राप्त करते समय श्री प्रधान को यह बात मालूम था कि इन 200 चौक्स का उपयोग नहीं हो सकेगा तब उन्हेें 200 चौक्स प्राप्त नहीं करनी चाहिए थी जिससे सरकारी राशि क्षति होने से बच सकती थी।

(3) श्री प्रधान द्वारा स्वंय स्वीकार किया गया है कि स्कायी मास्टर पेबुल ऐट हाजीपुर के पक्ष में बैंक ड्राफ्‌ट तैयार कर फर्म को दिया गया। बाद में फर्म के अनुरोध पर उक्त बैंक ड्राफ्‌ट को कैंसिल कर नया बैंक ड्राफ्‌ट सं0-522070 दिनांक 2.5.88 पेबुल ऐट पटना के पक्ष में तैयार कर फर्म को प्राप्त कराया गया। भुगतान के पूर्व आयकर बिक्री कर का प्रमाण पत्र लिया गया।

इस संबंध में समीक्षा में पाया गया कि आरक्षी उपाधीक्षक मंत्रिमंडल निगरानी विभाग, अन्वेषण ब्यूरों के पत्रांक 1293 दिनांक 22.11.91 के कंडिका-17 से स्पष्ट है कि श्री कृष्ण चन्द्र प्रधान, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता, यांत्रिक प्रमण्डल, मंडल (पलामू) द्वारा बिना आयकर एवं बिक्री कर क्लियरेंस प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किये ही भुगतान आदेश पारित किया गया।

क्रयादेश के मुताबिक आपूर्ति मेसर्स स्कायी मास्टर सिनेमा रोड, हाजीपुर ने किया था परन्तु श्री कृष्ण चन्द्र प्रधान तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता, यांत्रिक प्रमण्डल, मंडल (पलामू) द्वारा भुगतान बैंक ड्राफ्‌ट स्कायी मास्टर पेबुल ऐट हाजीपुर द्वारा किया गया। बाद में जानबूझ कर उक्त बैंक ड्राफ्‌ट को कैंसिंल कर नया बैंक ड्राफ्‌ट स्कायी मास्टर पेबुल ऐट, पटना कर दिया गया, अर्थात बैंक ड्राफ्‌ट में जानबूझकर सिनेमा रोड हाजीपुर अंकित नहीं किया गया एवं फर्जी व्यक्ति को प्राप्त कराया गया। फलस्वरूप फर्जी व्यक्ति द्वारा स्कायी मास्टर स्टेशन रोड, पटना के नाम से बैंक अॅाफ मदुरा में खोले गये छद्‌मनामी खाता से उक्त राशि की निकासी की गयी।

दिनांक 2.1.12 को श्री प्रधान द्वारा समर्पित लिखित पक्ष के समीक्षा में पाया गया कि उनके द्वारा पूर्व में कही गयी बातों को ही दुहराई गई है।

(4) दिनांक 20.1.12 को श्री प्रधान द्वारा प्राप्त कराये गये माननीय व्यवहार न्यायालय, पटना द्वारा पारित न्याय निर्णय में श्री प्रधान के विरूद्व निगरानी थाना में दायर मुकदमा सं0-51/90 मेें धारा-120बी0 आर0/डब्लू0 धारा-467/468/471 एवं धारा-477(ए) भा0 द0 वि0 एवं धारा-5(2)आर0/डब्लू0-5(1)(डी0) भ्र0 नि0 अघि0 19475 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 5 माच- 2013 कौरेसपौडिंग सेक्सन 13(2) आर/डब्लू0 धारा-13(1) डी0 भ्रष्टाचार नि0 अघि0 1988 के तहत आरोप गठित की गई है।

उक्त वर्णित स्थिति में श्री कृष्ण चन्द्र प्रधान, सेवानिवृत्त कार्यपालक अभियन्ता के विरूद्व आरोप प्रमाणित पाये गये।

समीक्षा में यह भी पाया गया कि सी0 डब्लू0 जे0 सी0 सं0-9197/2000 इन्द्रदेव नारायण सिंह बनाम बिहार सरकार एवं अन्य में पारित न्याय निर्णय में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा श्री सिंह सेवानिवृत्त कार्यपालक अभियन्ता के विरूद्व संसूचित दण्ड को निरस्त कर दिया गया, लेकिन विभागीय कार्यवाही चलाने की छूट नहीं दी गई। विधि विभाग द्वारा उक्त न्याय निर्णय के विरूद्व एल0 पी0 ए0 दायर करने का परामर्श नहीं देने के कारण उक्त न्याय निर्णय का अनुपालन करते हुए श्री सिंह के विरूद्व संसूचित दंडादेश निरस्त किया गया।

श्री प्रधान के मामले में सी0 डब्लू0 जे0 सी0 सं0-8469/05 में माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा दिनांक 01.7.11 को पारित न्याय निर्णय में इनके विरूद्व संसूचित दंडादेश को निरस्त करते हुए विभाग को नया आदेश निर्गत करने का आदेश पारित किया गया, जिसके अनुपालन में मामले की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई है। समीक्षोपरान्त श्री कृष्ण चन्द्र प्रधान, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता (यांत्रिक) प्रमण्डल मंडल,( पलामू) सम्प्रति सेवानिवृत्त के विरूद्व आरोप प्रमाणित पाया गया है। समीक्षा में यह भी पाया गया है, कि श्री प्रधान तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता के विरूद्व उनके सेवाकाल में ही सिविल सर्विसेज (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के नियम-55 के तहत विभागीय कार्यवाही चलाई गई थी एवं विभागीय अधिसूचना सं0'3075 दिनांक 22.9.97 द्वारा दण्ड संसूचित किया गया था। इस बीच वे दिनांक 30.9.01 को सेवानिवृत्त हो गये।

समीक्षोपरान्त सरकार द्वारा श्री प्रधान सेवानिवृत्त कार्यपालक अभियन्ता के विरूद्व पूर्व में संसूचित दण्ड से संबंधित विभागीय अधिसूचना सं0-406 दिनांक 02.05.2005 को निरस्त करने का निर्णय लिया गया एवं साथ ही सरकार द्वारा इनके विरूद्व पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 बी0 में सम्परिवर्तित मानते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गयाः-

(क) 1,00,000 रूपये (एक लाख रूपये) मात्र की वसूली। इस राशि की वसूली उनके बकाये उपादान की राशि से की जायेगी।

(ख) निलंबन अवधि में इन्हें जीवन यापन भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा, परन्तु उक्त अवधि पेंशन के प्रयोजनार्थ गणना की जाएगी।

उक्त दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्रदान करने हेतु विभागीय पत्रांक 576 दिनांक 01.6.12 द्वारा अनुरोध किया गया जिसके प्रसंग में बिहार लोक सेवा आयोग, पटना के पत्रांक 1014 दिनांक 30.7.12 द्वारा सूचित किया गया कि उपादान से वसूली करने हेतु आयोग का परामर्श वांछनीय नहीं है। तत्पश्चात मामले की समीक्षा की गइर््र। समीक्षोपरान्त सरकार द्वारा निर्णित दण्ड को संसूचित करने का निर्णय लिया गया।

अतः उपरोक्त वर्णित स्थिति में श्री कृष्ण चन्द्र प्रधान, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता यांत्रिक प्रमण्डल मंडल (पलामू) सम्प्रति सेवानिवृत्त को पूर्व में संसूचित दण्ड से संबंधित विभागीय अधिसूचना सं0-406 दिनांक 02.05.2005 को निरस्त करते हुए निम्नांकित दण्ड संसूचित किया जाता है।

(क) 1,00,000 रूपये (एक लाख रूपये) मात्र की वसूली। इस राशि की वसूली उनके बकाये उपादान की राशि से की जायेगी।

(ख) निलंबन अवधि में इन्हें जीवन यापन भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा, परन्तु उक्त अवधि, पेंशन के प्रयोजनार्थ गणना की जाएगी।

उक्त आदेश श्री प्रधान सेवानिवृत्त कार्यपालक अभियन्ता को संसूचित किया जाए।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, श्याम कुमार सिंह, सरकार के विशेष सचिव।

—————

अधी/क, सिचवालय मुिणालय, (cid:18)बहार, पटना (cid:26)ारा ूकािशत एवं मु2ित। (cid:18)बहार गजट (असाधारण) 177-571+10-ड(cid:15)0ट(cid:15)0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in

Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 05 March 2013. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2013-03-05.177/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2013-03-05.177.