िनबंधन सं(cid:8)या पी0ट(cid:15)0-40 (cid:18)बहार(cid:18)बहार(cid:18)बहार(cid:18)बहार गजटगजटगजटगजट
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सं0 22/नि0सि0(डा0)-13-01/2005/1327—श्री श्यामानन्द राम, तत्कालीन मुख्य अभियन्ता (चालू प्रभार) जल संसाधन विभाग, डाल्टेनगंज (झारखण्ड) सम्प्रति सेवानिवृत दिनांक 30.9.04 द्वारा विभागीय अधिसूचना सं0-1373 दिनांक 9.11.11 द्वारा संसूचित दण्ड के विरूद्व समर्पित पुनर्विचार अभ्यावेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। निम्न तथ्य पाये गये। श्री श्यामानन्द राम, तत्कालीन मुख्य अभियन्ता, जल संसाधन विभाग, डाल्टेनगंज (झारखण्ड) सम्प्रति सेवानिवृत दिनांक 30.9.04 द्वारा उक्त पद पर पदस्थापन अवधि वर्ष 2003 में सोलह(16) चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को तृतीय वर्ग में दी गई अनियमित प्रोन्नति की जॅाच जल संसाधन विभाग, झारखण्ड द्वारा की गई। इस बीच श्री राम मुख्य अभियन्ता जल संसाधन विभाग, बिहार से दिनांक 30.9.04 को सेवानिवृत हो जाने के कारण जल संसाधन विभाग, झारखण्ड, रॅाची के अर्द्वसरकारी पत्रांक 983 दिनांक 10.3.05 द्वारा संबंधित अभिलेखों की छाया प्रति जल संसाधन विभाग, बिहार भेजते हुए श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 बी0 के तहत विभागीय कार्यवाही करने की अनुशंसा की गई। जल संसाधन विभाग, झारखण्ड, रॅाची से प्राप्त अभिलेखों के आलोक में मामले की सरकार के स्तर पर समीक्षा की गई। समीक्षोपरान्त उक्त वर्णित प्रमाणित आरोपों के लिए श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता के विरूद्व बिहार पेेशन नियमावली के नियम 43 बी0 के तहत विभागीय संकल्प सं0-1440 दिनांक 17.11.05 द्वारा विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गई। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जॅाच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। पाया गया कि श्री राम के विरूद्व निम्न आरोप गठित किए गये। (1) मुख्य अभियन्ता, डाल्टेनगंज में अपने कार्यवधि में आपने (श्री राम) 16 अद्द चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को तृतीय वर्ग कर्मचारी के पद पर अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए प्रोन्नति अनियमित रूप से कर दिया जिसके लिए आप(श्री राम) दोषी है। (2) प्रोन्नति की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है अर्थात प्रोन्नति स्थापना समिति से न कर स्थापना समिति की प्रत्याशा में की गयी जो नियमानुकूल नहीं है। 2 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 2 जनवर(cid:15) 2014 (3) कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के संकल्प सं0-335 दिनांक 16.9.92 के अनुसार चतुर्थ श्रेणी से तृतीय श्रेणी में प्रोन्नति सीमित परीक्षा के आधार पर वरीयता एवं योग्यता की अधिमानता 60ः40 के अनुपात में देते हुए किया जाना है जबकि प्रसंगाधीन मामले में आपके (श्री राम के) द्वारा इसका अनुपालन नहीं किया गया। स्पष्ट है कि आपके द्वारा (श्री राम के द्वारा) सरकारी नियमों की अवहेलना की गयी जिसके लिए आप (श्री राम) दोषी है। श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता द्वारा बचाव बयान में मुख्य रूप से निम्न तथ्य दिया गया हैंः- (1) मुख्य अभियन्ता के कार्यालय में चतुर्थवर्ग से तृतीय वर्ग में दी गयी प्रोन्नति, औपबंधिक (तदर्थ) एवं अस्थायी रूप से दी गयी थी। (2) स्थापना समिति की अनुशंसा की प्रत्याशा में विभागीय मंत्री एवं सचिव के मौखिक आदेश की बाध्यता के कारण पत्र निर्गत किया गया। (3) कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के पत्रांक 335 दिनांक 16.9.92 के अनुरूप 60ः40 के अनुपात में अस्थायी प्रोन्नति की प्रक्रिया अपनायी गयी थी। (4) वर्तमान में प्रोन्नति रद्व कर दी गयी है। न्याय निर्णय में आरोपित पदाधिकारी को प्रोन्नति के लिए गलत नहीं ठहराया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपित के बचाव बयान के आलोक में समर्पित जॅाच प्रतिवेदन में मुख्य रूप से निम्न तथ्य दिये गयेः- (1)चतुर्थवर्ग के कर्मचारियों को तृतीय वर्ग में प्रोन्नति, स्वीकृत पद के विरूद्व कार्मिक एवं वित्त विभाग द्वारा निर्गत परिपत्रों के आलोक में देने के लिए मुख्य अभियन्ता सक्षम है अतएव आरोपी के विरूद्व आरोप प्रमाणित नहीं होता हैं। (2) उच्चाधिकारियों के मौखिक निदेश/आदेश का लिखित साक्ष्य नहीं होता है। परन्तु दिये गये निदेश का अनुपालन किया जाता है उक्त आदेश के अनुपालन के तहत कुल रिक्त पद के 50 प्रतिशत अर्थात 32 रिक्त पद के विरूद्व 16 अद्द चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को तृतीय वर्ग के पद पर प्रोन्नति दी गयी। (3) नव पदस्थापित स्थान पर प्रभार लेने के उपरान्त श्री राम के द्वारा पत्रांक 58/गो0 दिनांक 17.9.03 द्वारा सचिव से इसकी सम्पुष्टि का अनुरोध किया गया। अतः औपबंधिक रूप से दी गयी प्रोन्नति की सम्पुष्टि के लिए उनके द्वारा प्रयास किया गया अतएव आरोप प्रमाणित नहीं होता है। (4) आरोपी के बचाव बयान से ज्ञात होता है कि डाल्टेनगंज परिक्षेत्र में विभागीय नियमानुसार 64 पद रिक्त थे जिसके विरूद्व मात्र 16 चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों को ही सशर्त प्रोन्नति दी गयी इससे सरकारी नियमों का उल्लंधन नहीं हैं। अतएव आरोप सं0 3 भी प्रमाणित नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जॅाच प्रतिवेदन के समीक्षा के क्रम में पाया गया कि संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता के विरूद्व आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया है लेकिन संचालन पदाधिकारी के जॉच प्रतिवेदन से असहमत होने के पर्याप्त आधार है। समीक्षोपरान्त विभागीय पत्रांक 1863 दिनांक 10.12.10 द्वारा श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता से जॅाच प्रतिवेदन के निम्नांकित असहमति के विन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। (2) बिहार सरकार कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के ज्ञाप सं0-335 दिनांक 16.9.92 की कंडिका 2.2 में निम्न प्रावधान हैः-
(क) पत्राचार लिपिक अथवा लिपिकों के 50 प्रतिशत पर सीधी भत्र्ती की प्रक्रिया से भरे जाएगें। (ख) 50 प्रतिशत पदों पर अपेक्षित योग्यता अधिकतम आयु सीमा छोड़कर रखनेवाले चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों से भरे जाएगें।
उक्त नियमावली के कंडिका 03 में प्रावधान है कि मुफसिल कार्यालय के पत्राचार लिपिक अथवा लिपिकों से 50 प्रतिशत पदों पर चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को सीमित प्रतियोगिता परीक्षा द्वारा नियुक्ति में वरीयता को अधिमानता दी जाएगी। वरीयता एवं योग्यता में अधिमानता का क्रम 60ः40 के अनुपात में निर्धारित किया जाएगा। योग्यता का माप दण्ड सीमित प्रतियोगिता परीक्षा होगा।
उक्त वर्णित नियमावली से स्पष्ट है कि चतुर्थवर्गीय कर्मियों की योग्यता निर्धारण सीमित प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर करते हुए तृतीयवर्ग के पदों पर नियुक्ति का प्रावधान है परन्तु उक्त नियमो का अवहेलना करते हुए श्री राम मुख्य अभियन्ता द्वारा प्रोन्नति दी गयी जिसके लिए वे सक्षम नहीं थें।
(2) श्री राम मुख्य अभियन्ता के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि विभागीय मंत्री एवं सचिव के दबाव में प्रोन्नति दी। इसके समर्थन में इनके द्वारा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया।
(3) प्रोन्नति की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है । श्री राम द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है जिसमें ज्ञात होता हो कि इनके द्वारा सदृश अन्य कर्मियों के प्रोन्नति पर विचार किया गया है।
(4) इनके द्वारा प्रोन्नति रद्द नहीं की गयी। श्री राम मुख्य अभियन्ता के द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। श्री राम द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में निम्न तर्क दिये गयेः-
(1) वरीयता एवं योग्यता की अधिमानता के अनुरूप 60ः40 के अनुपात में ही प्रोन्नति की प्रक्रिया अपनायी गयी थी जिसे संचालन पदाधिकारी द्वारा सही माना गया। 3
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(2) विभागीय मंत्री एवं सचिव के मौखिक आदेश का कोई साक्ष्य नहीं होता है परन्तु नीचे के पदाधिकारियों को उच्चाधिकारियों के मौखिक आदेश के अनुपालन की बाध्यता रहती है जिसे संचालन पदाधिकारी द्वारा भी स्वीकार किया गया है।
(3) प्रोन्नति की प्रक्रिया पारदर्शी थी एवं अधिसूचना निर्गत करने वक्त ही इसे रद्द करने की शर्त आदेश में अंकित किया गया था।
श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता द्वारा प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया कि श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता द्वारा उन्हीं तथ्यों का उल्लेख द्वितीय कारण पृच्छा में किया गया है जो उनके द्वारा पूर्व में समर्पित बयाव बयान में किया गया था उनके द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा में कोई नया तथ्य या साक्ष्य नहीं दिया गया है। समीक्षोपरान्त सरकार द्वारा श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता के विरूद्व विभागीय नियमों के विपरीत चतुथवर्गीय कर्मचारियों को तृतीय वर्ग में प्रोन्नति दिये जाने का उक्त वर्णित आरोप प्रमाणित पाया गया। उक्त वर्णित प्रमााणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 बी0 के तहत निम्न दण्ड संसूचित करने का निर्णय लिया गया।
(क) दस प्रतिशत पेंशन पर रोक। तदनुसार श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता को विभागीय अधिसूचना सं0 1373 दिनांक 9.11.11 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 बी0 के तहत निम्न दण्ड संसूचित किया गयाः-
(क) दस प्रतिशन पेंशन पर रोक। उपरोक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री राम सेवानिवृत, मुख्य अभियन्ता द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन दिनांक 2.12.11 विभाग में समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। पाया गया कि श्री राम द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन निम्न तर्क दिया गया है।
सचिव, जल संसाधन विभागद्व झारखण्ड के आदेश के आलोक में उन्हें मुख्य अभियन्ता (चालू प्रभार) से पदच्यूत कर अधीक्षण अभियन्ता का वेतनमान दिया गया। मुख्य अभियन्ता के नियमित पद से बंचित रखा गया। पुनः इसी मामले में पेंशन पर दस प्रतिशत की कटौती का आर्थिक दण्ड दूसरा दण्ड हो जाता है। इस संदर्भ में श्री राम द्वारा झारखण्ड की संचिका की टिप्पणी की छाया प्रति संलग्न की गई।
श्री श्यामानन्द राम, तत्कालीन मुख्य अभियन्ता (चालू प्रभार) के उक्त आवेदन के आलोक में उनसे इस संदर्भ में झारखण्ड द्वारा निर्गत दण्डादेश की प्रति की मांग की गई। जिसके आलोक में उनके अभ्यावेदन दिनांक 24.4.12 द्वारा पुनः पूर्व में कही गई बातो को ही दुहराई गई। उनके द्वारा दण्डादेश की प्रति प्राप्त नहीं कराया गया बल्कि पुनः पूर्व में पे्रषित टिप्पणी की छाया प्रति पुनः प्राप्त करायी गयी। जिसके समीक्षा में पाया गया कि उक्त टिप्पणी सचिव, जल संसाधन विभाग झारखण्ड द्वारा माननीय मंत्री को पे्रषित की गई है। जिसमें अंकित किया गया है कि '' श्री राम जो मुलतः अधीक्षण अभियन्ता है के द्वारा मुख्य अभियन्ता चालू प्रभार में रहते हुए अपने का अधिकारों का दुरूपयोग किया गया। अतः मुख्य अभियन्ता के प्रभार से पदच्युत कर उनके मूल पद पर ही पदस्थापित किया जाय। उक्त टिप्पणी माननीय मंत्री द्वारा अनुमोदित नहीं है एवं इस संदर्भ में श्री राम द्वारा कोई दण्डादेश की प्रति भी उपलब्ध करायी गयी। इसलिये उक्त टिप्पणी को प्रथम दण्ड नहीं माना जा सकता है।
समीक्षा में यह भी पाया गया कि श्री राम, तत्कालीन मुख्य अभियन्ता (चालू प्रभार) जल संसाधन विभाग, डाल्टेनगंज (झारखण्ड) सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा पद का दुरूपयोग कर नियम के विरूद्व वर्ग 4 के कर्मियों को वर्ग 3 के पद पर प्रोन्नति देने का आरोप प्रमाणित पाये जाने के उपरान्त उन्हें दस प्रतिशत पेंशन की कटौती का दण्ड संसूचित किया गया है। श्री राम द्वारा प्रमाणित आरोप के संबंध में कोई नया तथ्य अथवा आधार नहीं दिया गया है जिसके आधार पर इनके दण्ड पर पुनर्विचार किया जा सकें। वर्णित स्थिति में सरकार द्वारा इनके पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया है।
तदनुसार श्री श्यामानन्द राम, तत्कालीन मुख्य अभियन्ता (चालू प्रभार) जल संसाधन विभाग, डाल्टेनगंज (झारखण्ड) सम्प्रति सेवानिवृत का पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत किया जाता है।
उक्त आदेश श्री राम सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता (चालू प्रभार) को संसूचित किया जाता है।
बिहार-राज्यपाल के आदेश से, श्याम कुमार सिंह, सरकार के विशेष सचिव।
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