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Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 03 July 2014

Published 03 July 2014

Type
Extra Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2014-07-03.572
Languages
English, Hindi

िनबंधन सं(cid:8)या पी0ट(cid:15)0-40 (cid:18)बहार(cid:18)बहार(cid:18)बहार(cid:18)बहार गजटगजटगजटगजट

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सं0 22/नि0सि0(दर0)-16-04/2009/334—श्री कामेश्वर नाथ सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, खुटौना प्रतिनियुक्त कुसहा तटबंध जब प्रतिनियुक्ति स्थान से दिनांक 20.2.09 को सहायक अभियन्ता श्री विजय कुमार सिन्हा के साथ बोलेरो गाड़ी से पटना आ रहे थे तो निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, पटना के गठित दल द्वारा नन्द लाल छपरा बाईपास रोड, पटना के पास आरोपी श्री कामेश्वर नाथ सिंह एवं श्री विजय कुमार सिन्हा की तलाशी ली गयी। उसी क्रम में श्री कामेश्वर नाथ सिंह, कार्यपालक अभियन्ता से 8,20,000/- (आठ लाख बीस हजार) रूपये नगद अवैध राशि प्राप्त हुए। निगरानी दस्ता द्वारा उन्हें गिरफ्‌तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया एवं उनके विरूद्व निगरानी थाना कांड सं0-014/09 दिनांक 20.2.09 घारा 13(2) सह पठित घारा 13(1)(ई0) भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम, 1988 दर्ज किया गया।

श्री सिंह को दिनांक 20.2.09 से न्यायिक हिरासत में रहने के फलस्वरूप विभागीय अधिसूचना सं0-177 दिनांक 23.3.09 द्वारा न्यायिक हिरासत की तिथि 20.02.2009 के प्रभाव से निलंबित किया गया तथा उनके विरूद्व बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही चलाने का निर्णय लिया गया।

श्री सिंह द्वारा दिनांक 23.04.2009 को जेल से रिहा होने के बाद मुख्यालय में दिनांक 24.04.2009 को योगदान किया गया। उनके योगदान को स्वीकृत करते हुए पुनः योगदान की तिथि दिनांक 24.04.2009 के प्रभाव से ही विभागीय अधिसूचना संख्या-692 दिनांक 20.07.2009 द्वारा निलंबित किया गया तथा नियम-17 के तहत निम्नांकित गठित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संकल्प ज्ञापांक-761 दिनांक 31.07.2009 द्वारा प्रारंभ की गयी :-

''निगरानी अन्वेषण, ब्यूरो के गठित जॉचदल द्वारा 8,20,000/- रूपये (आठ लाख बीस हजार रूपये) नगद अवैध राशि के साथ दिनांक 20.02.2009 को आपको गिरफ्‌तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।2 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 3333 जुलाई जुलाई जुलाई जुलाई 2014201420142014 इस प्रकार आरोपित पदाधिकारी द्वारा भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम 1988 के विभिन्न धाराओं का उल्लंघन किया गया है। साथ ही बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के 19 (6) का आरोपित पदाधिकारी द्वारा उल्लंधन किया गया है।

श्री सिंह, कार्यपालक अभियंता, खुटौना प्रमंडल, मधुबनी प्रतिनियुक्त कुसहा तटवंध सरकारी लोक सेवक हैं, जिन्होंने भ्रष्ट आचरण का परिचय देते हुए पद का दुरूपयोग कर अवैध रूप से कमीशन में प्राप्त कालाधन को ठिकाने लगाने हेतु कुसहा तटबंध से अपने घर पटना आते हुए नन्दलाल छपरा, पटना के पास अवैध रकम के साथ रंगेहाथ पकड़ा गया है।

इसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी हैं।''

विभागीय कार्यवाही में विभागीय जॉंच आयुक्त को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जॉंच प्रतिवदेन में निष्कर्षतः अंकित किया गया है कि ''निगरानी अन्वेषण ब्यूरो द्वारा आरोपी के पास से जब्त 8,20,000/- रूपये (आठ लाख बीस हजार रूपये) का संतोषजनक हिसाब आरोपी ने पर्याप्त अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर दिया है। 8,20,000/- रूपये (आठ लाख बीस हजार रूपये) की यह राशि अवैध रूप से आरोपी द्वारा कमीशन में प्राप्त कर इसे ठिकाने लगाने हेतु अपने घर पटना लाने का आरोप आरोपी के विरूद्ध प्रमाणित नहीं होता है।''

इस प्रकार संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध अवैध रूप से 8,20,000/- रूपये (आठ लाख बीस हजार रूपये) की राशि कमीशन में प्राप्त कर इसे ठिकाने लगाने अपने घर पटना लाने का आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया जबकि पुलिस अधीक्षक-सह-अनुसंधानकर्त्ता, निगरानी अन्वेषण ब्यूरों, पटना के पत्रांक-125 दिनांक 30.03.2009 द्वारा प्रेषित अनुसंधान प्रतिवेदन में उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर ही श्री सिंह के विरूद्ध विधि विभाग द्वारा अभियोजन स्वीकृत्यादेश निर्गत किया गया है। जॉंच प्रतिवेदन के अवलोकन से भी स्पष्ट होता है कि विषयांकित मामले में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के कुल छः पदाधिकारियों द्वारा जॉंच पदाधिकरी के समक्ष गवाही दी गयी है जिसमें सभी साक्षियों ने अपनी गवाही/प्रति परीक्षण में यह बताया है कि श्री सिंह के पास से बरामद 8,20,000/- रूपये (आठ लाख बीस हजार रूपये) की राशि के संबंध में उन्होने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया।

श्री सुधीर कुमार, पुलिस अधीक्षक-सह-अनुसंधानकर्त्ता, निगरानी अन्वेषण ब्यूरों, पटना द्वारा इसी मामले के अनुसंधान में श्री सिंह के विरूद्ध पाये गये साक्ष्यों का उल्लेख अपने पत्र में किया गया है जिसे संलग्न करते हुए संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जॉंच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए असहमति के निम्नांकित बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-1414 दिनांक 24.12.2012 द्वारा श्री सिंह से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी :-

''अनुसंधान से यह स्पष्ट होता है कि आपके पास से पटना आने के क्रम में बरामद राशि 8,20,000/- रूपये (आठ लाख बीस हजार रूपये) में 14 (चौदह) गडि्‌डयॉं 500/- रूपये (पॉच सौ रूपये) के थे और इन सभी गडि्‌डयों पर सेन्ट्रल बैंक ऑंफ इंडिया, बिड़ला मंदिर रोड, पटना का स्टीकर लगा था तथा पी0एन0 जयसवाल तथा एक अन्य कर्मी का हस्ताक्षर था जो क्रमशः 19.12.2008 एवं 23.12.2008 में हस्ताक्षरित थे।

अनुसंधान के क्रम में यह भी स्पष्ट हुआ है कि खजॅाची रोड, सेन्ट्रल बैंक अॅाफ इंडिया में करेंसी चेस्ट नहीं है और उनके द्वारा अधिक राशि जमा होने पर कदमकुअॅा स्थित अपने करेंसी चेस्ट में भेज दिया जाता है और इनकी जानकारी में वहॉं से राशि वीरपुर शाखा में भी भेजी गयी थी। पी0 एन0 जयसवाल उक्त शाखा में कैशियर हैं। अनुसंधान के क्रम में कदमकुअॅा स्थित सेन्ट्रल बैंक अॅाफ इंडिया के शाखा में सत्यापन किया गया और ज्ञात हुआ कि वे लोग जो राशि बिड़ला मंदिर रोड शाखा या अन्य शाखा से प्राप्त करते है उसे मांग के अनुरूप विभिन्न शाखाओं में भेजा जाता है। यह भी ज्ञात हुआ कि दिनांक 27.01.09 को भारी राशि वीरपुर सेन्ट्रल बैंक की शाखा में भेजा गया था। वीरपुर में सेन्ट्रल बैकं अॅाफ इंडिया टे्रजरी शाखा है और भारतीय स्टेट बैंक, वीरपुर उसी शाखा से रूपया मांग के अनुसार प्राप्त करती है।

पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, खुटौना द्वारा कुसहा तटबंध में कराये गये काम के संबंध में दिनांक 13.1.09 को 2,09,61,820.40 रूपये (दो करोड़ नौ लाख इकसठ हजार आठ सौ बीस रूपये चालीस पैसे) का विपत्र जमा किया गया था जिसमें अग्रिम तथा अन्य राशियों को काटकर 1,23,83,616/-रूपये (एक करोड़ तेईस लाख तिरासी हजार छः सौ सोलह रूपये) का भुगतान हेतु चेक उप कोषागार, वीरपुर भेजा गया। पुनः एक विपत्र दिनांक 16.2.09 को 89,53,378.55 रूपये (नवासी लाख तीरपन हजार तीन सौ अठहत्तर रूपये पचपन पैसे) का प्रस्तुत किया गया जो 89,53,379/- रूपये (नवासी लाख तिरपन हजार तीन सौ उन्नासी रूपये) के लिए पारित किया गया। उक्त दोनों विपत्र आपके द्वारा प्रस्तुत किया गया था और मापी पुस्त पर आपका तथा अभियन्ता श्री विजय कुमार सिन्हा का हस्ताक्षर है।

उपर अंकित निगरानी शाखा के अनुसंधान से स्पष्ट है कि आपके पास से जो 8,20,000/- (आठ लाख बीस हजार रूपये) पाये गये थे वे कमीशन के रूप में प्राप्त किये गये थे एवं अवैध थे, जिसे ठिकाना लगाने आप पटना आ3 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 3333 जुलाईजुलाईजुलाईजुलाई 2014201420142014 रहे थे। गिरफ्‌तारी के समय आपने बरामद रूपयों के बारे में संतोषजनक जानकारी नहीं दी। प्रतिनियुक्ति स्थल से भारी मात्रा में अवैध राशि लेकर पटना आते हुए पकड़े जाने पर इसे बैध बनाने के लिए दिया गया बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है।''

श्री सिंह द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जबाव समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न तथ्यों को प्रस्तुत किया गया हैः-

1. विभागीय जॅाच आयुक्त के तथ्यपरक एवं तार्किक जॅाच प्रतिवेदन में मुझे सर्वथा निर्दोष पाया गया है। 2. कारण पृच्छा में प्रशासी विभाग द्वारा संचालन पदाधिकारी के जॅाच प्रतिवेदन से बगैर कोई तार्किक एवं तथ्यपरक कारण के असहमति व्यक्त की गयी है। प्रशासी विभाग द्वारा केवल अनुमान एवं संदेह का सहारा लिया गया है।

3. जॅाच प्रतिवेदन में मेरी निर्दोषिता के संबंध में संचालन पदाधिकारी का प्रतिवेदन-आरोप तथ्य एवं साक्ष्यों के तार्किक विवेचना पर आधारित है। मैं उन तथ्यों एवं तर्को को यहॅा कारण पृच्छा में अपनी सफाई के रूप में पुनः रेखांकित करना चाहूॅगाः-

'' It is settled law that even in departmental inquiries there must be proof and the allegations can not be proved by resorting to conjestures and suspicion''

मैं अपने सफाई में विभागीय जॅाच आयुक्त के जॅाच प्रतिवेदन को पूर्णतः अंगीकार करता हूॅ। पूर्ण जॅाच प्रतिवेदन को मेरे इस कारण पृच्छा के सफाई के अंग के रूप में पढ़ा एवं समझा जाय।

4. मेरे विरूद्व लगाए गये आरोप एवं संशोधित आरोप के लिए संचालित विभागीय कार्यवाही के जॅाच प्रतिवेदन की कंडिका (11) (i) में संचालन पदाधिकारी विभागीय जॅाच आयुक्त, बिहार का जॅाच निष्कर्ष निम्नरूपेण अंकित किया गया हैः-

** आरोपित पदाधिकारी के पास बरामद राशि रूपये 8,20,000/- को अवैध कहा गया है। परन्तु प्रशासी विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गये सभी साक्ष्य अभिलेखों एवं प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा प्रस्तुत साक्षियों के बयान में बरामद राशि अवैध होने का केाई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।''

5. अभियेाजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत सभी साक्षी पुलिस पदाधिकारी थे। उनके बयान को जॅाच प्रतिवेदन की कंडिका (9) में अंकित करते हुए संचालन पदाधिकारी ने अंकित किया है किः-

''सभी साक्षियों ने बताया कि उक्त बरामद राशि अवैध होने का कोई प्रमाण उनके पास नहीं है।'' जब पुलिस पदाधिकारियों ने अपनी गवाही में स्वीकार किया है कि मेरे पास बरामद राशि अवैध होने का केाई प्रमाण नहीं है, तो पुलिस अनुसंधान में उल्लिखित बातें स्वतः निष्प्रभावी हो जाती है क्योंकि पुलिस अनुसंधान कोई साक्ष्य नहीं होता है तथा मात्र पुलिस अनुसंधान के आधार पर आरोप प्रमाणित नहीं माना जा सकता है।

6. विभागीय जॅाच आयुक्त का जॅाच रिपोर्ट जॅाच में उपस्थापित साक्ष्यों पर आधारित है। आरोप-पत्र के साथ संलग्न साक्ष्यों से बिल्कुल भिन्न नये साक्ष्य के आधार पर कारण पृच्छा किया जाना नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का उल्लंधन है, क्योंकि यह नया साक्ष्य विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी के समक्ष उपस्थापित नहीं किया गया था।

उपर्युक्त स्थिति स्पष्ट हो जाने के बाद पुलिस अनुसंधान का सहारा लेकर जॅाच प्रतिवेदन से असहमति की बात की जा रही है। प्रासंगिक विभागीय पत्र के साथ संलग्न पुलिस पदाधिकारी निगरानी अन्वेषण ब्यूरो का पत्रांक 125 दिनांक 30.3.09 है, जो न तो साक्ष्य के रूप में विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया था और न ही उस पुलिस पदाधिकारी को साक्षी के रूप में उपस्थित किया गया था। अतः वैसे साक्ष्य एवं साक्षी जिन्हें संचालन पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं किया गया हो, को कोई कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। 7. प्रशासी विभाग द्वारा निगरानी विभाग के संदर्भित पत्र में उल्लेखित पुलिस पदाधिकारी को विभागीय पत्रांक 1619 दिनांक 29.10.10 द्वारा विभागीय कार्यवाही में साक्षी बनाया गया था, किन्तु बाद में प्रशासी विभाग के पत्रांक 203 दिनांक 24.02.11 द्वारा उनका नाम साक्षी सूची से हटा दिया गया क्योंकि उनके बयान से अभियोजन पक्ष फौजदारी न्यायालय (criminal court) में चल रहे वाद में कमजोर हो जाता। ऐसी स्थिति में उस पुलिस पदाधिकारी के पत्र को विभागीय कार्यवाही के कारण पृच्छा stage में इस्तेमाल करना न तो न्यायसंगत है और न नियम संगत क्योंकि उस पदाधिकारी के प्रति परीक्षण ( cross examination ) किए जाने के अवसर से मैं वंचित रह गया हूॅ। 8. जिन तथ्यों का उल्लेख द्वितीय कारण पृच्छा में है वह न तो सत्य है और न ही विभागीय कार्रवाई का आधार हो सकता है। कारण पृच्छा के साथ संलग्न पत्ऱ में उल्लेखित तथ्य आरोप पत्र के साथ संलग्न निगरानी विभाग 4 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 3333 जुलाई जुलाई जुलाई जुलाई 2014201420142014 द्वारा बनायी गयी तलाशी एवं जब्ती सूची seizure list में उल्लेखित तथ्यों से भिन्न है। अतः नये तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष नैसर्गिक न्याय के सिद्वान्तों के सर्वथा विपरीत है।

9. पुलिस अनुसंधान का सम्परीक्षण फौजदारी न्यायालय में होना है। पुलिस अनुसंधान एवं अभिलेख विसंगतियों से भरा है, जिनका खुलासा करना फौजदारी न्यायालय में मेरे विरूद्व चल रहे वाद में मेरा पक्ष कमजोर करेगा तथा न्याय प्राप्ति में बाघक होगा। अतः पुलिस अनुसंधान के आधार पर विभागीय जॅाच प्रतिवेदन से असहमति व्यक्त करना तथा इस आधार पर मुझसे द्वितीय कारण पृच्छा किया जाना कानून की दृष्टि में ग्राह्‌य नहीं है।

10. इस प्रसंग में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्वान्त यह है कि (कैप्टन एम0 पाल एन्थोनी बनाम भारत गोल्ड माइन्स लि0)

''If the departmental proceeding and the criminal case are based on identical and similar set of facts and the charge in the criminal case against the delinquent employee is of grave nature which involves complicated question of law and fact, it would be desirable to stay the departmental proceeding till the conclusion of the criminal case''

भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय सरकार एवं अधीनस्थ न्यायालयों के लिए बाध्यकारी है।

11. फौजदारी न्यायालय में आपराधिक मामला लंबित रहने के कारण मैं पुलिस अनुसंधान को झूठा एवं गलत साबित करने के लिए अपने तर्को एवं तथ्यों का खुलासा करने में असमर्थ हूॅ, क्योंकि इससे criminal court में मेरा पक्ष कमजोर होगा तथा मुझे न्याय प्राप्ति में कठिनाई होगी। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने न्याय निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है किः-

''It would be unfair to compel the workman to disclose the defence which he may take before criminal court. so that the defence of the employee in the criminal case may not be prejudiced''.

श्री सिंह द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव दिनांक 29.1.13 की सम्यक्‌ समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया कि जॅाच पदाधिकारी ने जॅाच प्रतिवेदन में आरोपित पदाधिकारी श्री कामेश्वर नाथ सिंह, कार्यपालक अभियन्ता (निलंबित) को इस आधार पर आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया है क्योंकि आरोपित पदाधिकारी ने अपने बचाव में यह तर्क दिया था कि उनका पुत्र हर्ष, उच्च शिक्षा हेतु विदेश (इंग्लैण्ड) जाने वाला है, अतः उसके होने वाले ससूर विनोद कुमार सिंह द्वारा तत्काल 7,20,000/- (सात लाख बीस हजार) रूपये नगद उधार के रूप में उन्हें दी गयी। 1,00,000/- (एक लाख) रूपया श्री राजेन्द्र सिंह उर्फ राजन उनके चचेरे साले द्वारा पटना आने के क्रम में श्री रामप्रीत सिंह, अधीक्षण अभियन्ता को पूर्व में लिये गये उधार को वापस करने के लिए दिए गये थे। इस प्रकार 8,20,000/- (आठ लाख बीस हजार) रूपये अवैध नहीं हैं। जिसके आधार पर जॅाच पदाधिकारी द्वारा आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया।

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो द्वारा बाद में मामले का अनुसंधान करने के क्रम में श्री सिंह के विरूद्व विभाग से अभियोजन स्वीकृत्यादेश की मांग की गयी। साथ ही अनुसंधान प्रतिवेदन की प्रति विभाग को उपलब्ध करायी गयी। निगरानी अनुसंधान प्रतिवेदन में यह स्पष्ट अंकित है किः-

'' श्री सिंह से पटना आने के क्रम में बरामद राशि 8,20,000/- रूपये में 14 (चौदह) गडि्‌डया 500/-(पॅाच सौ)रूपये के थे और इन सभी गडि्‌डयों पर सेण्ट्रल बैंक अॅाफ इंण्डियॉं, बिड़ला मंदिर रोड, पटना का स्टीकर लगा था, पी0 एन0 जयसवाल तथा एक अन्य कर्मी का हस्ताक्षर था, जो क्रमशः 19.12.08 एवं 23.12.08 में हस्ताक्षरित थे। अनुसंधान के क्रम में यह स्पष्ट हुआ है कि खजांची रोड, सेण्ट्रल बैंक अॅाफ इंण्डिया में करेंसी चेस्ट नहीं है और उनके द्वारा अधिक राशि जमा होने पर कदमकुअॅा स्थित अपने करेंसी चेस्ट में भेज दिया जाता है और इनकी जानकारी में वहॅा से राशि वीरपुर शाखा भी भेजी गयी थी। पी0 एन0 जयसवाल उक्त शाखा में कैशियर हैं।

अनुसंधान के क्रम में कदमकुअॅा स्थित सेण्ट्रल बैंक अॅाफ इंण्डिया के शाखा में सत्यापन किया गया और ज्ञात हुआ कि वे लोग जो राशि बिड़ला शाखा या अन्य शाखा से प्राप्त करते हैं उसे मांग के अनुरूप विभिन्न शाखाओं में भेजा जाता है। यह भी ज्ञात हुआ कि दिनांक 27.1.09 को भारी राशि वीरपुर सेण्ट्रल बैंक की शाखा में भेजा गया था। वीरपुर में सेण्ट्रल बैंक अॅाफ इंण्डिया टे्रजरी शाखा है और भारतीय स्टेट बैंक, वीरपुर उसी शाखा से रूपया मांग के अनुसार प्राप्त करती है।

कार्यपालक अभियन्ता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, खुटौना द्वारा कुसहा तटबंध में कराये गये कार्य के संबंध में दिनांक 13.1.09 को 2,09,61,820.40 रूपये (दो करोड नौ लाख इकसठ हजार आठ सौ बीस रूपये चालीस पैसे) का विपत्र जमा किया गया था, जिसमें अग्रिम तथा अन्य राशियों को काटकर 1,23,83,616/- (एक करोड़ तेईस लाख5 (cid:18)बहार गजट (असाधारण), 3333 जुलाईजुलाईजुलाईजुलाई 2014201420142014 तीरासी हजार छः सौ सोलह) रूपये के भुगतान हेतु चेक उप कोषागार वीरपुर भेजा गया। पुनः एक विपत्र दिनांक 16. 2.09 को 89,53,378.55 रूपये (नवासी लाख तीरपन हजार तीन सौ अठहतर रूपये पचपन पैसे) का प्रस्तुत किया गया था, जो 89,53,379/- रूपये (नवासी लाख तीरपन हजार तीन सौ उन्नासी रूपयेे) के लिए पारित किया गया। उक्त दोनों विपत्र आरोपित पदाधिकारी श्री कामेश्वर नाथ सिंह, कार्यपालक अभियन्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया था और मापी पुस्त पर आरोपित पदाधिकारी एवं सहायक अभियन्ता का हस्ताक्षर था।

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि श्री सिंह के पास से जो 8,20,000/- रूपये (आठ लाख बीस हजार रूपये) पाये गये थे वे अवैध थे, जिसे ठिकाने लगाने के लिए श्री ंिसंह पटना आ रहे थे। गिरफ्‌तारी के समय भी श्री सिंह द्वारा बरामद रूपयों के संबंध में संतोषजनक जानकारी नहीं दी गयी थी। प्रतिनियुक्त स्थल से पटना लौटने के क्रम में अवैध राशि के साथ पकड़े जाने पर after thought के रूप में श्री ंिसंह द्वारा अब बताया जा रहा है कि जो राशि उनके द्वारा लाया जा रहा था, वह विभिन्न स्रोताें से प्राप्त की गयी थी, जो मान्य नहीं हो सकता है।

2. इस प्रकार श्री सिंह से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की सम्यक समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरान्त उनके विरूद्व गठित आरोप प्रमाणित पाया गया है। उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिंह को सेवा से बर्खास्तगी का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

3. सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री कामेश्वर नाथ सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमंडल, खुटौना प्रतिनियुक्त कुसहा तटबंध सम्प्रति निलंबित को सेवा से बर्खास्त किया जाता है। 4. इसमें बिहार लोक सेवा आयोग की अनुशंसा पत्रांक 1825 दिनांक 25.11.2013 द्वारा एवं मंत्रिपरिषद्‌ का अनुमोदन दिनांक 14.03.2014 की बैठक में प्राप्त है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

सतीश चन्द्र झा,

सरकार के अपर सचिव।

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अधी1क, सिचवालय मुिणालय,

(cid:18)बहार, पटना (cid:26)ारा ूकािशत एवं मु6ित। (cid:18)बहार गजट (असाधारण) 555577772222-571+10-ड(cid:15)0ट(cid:15)0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in

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