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1;बपकरू23द्ध 1;बपकरू20द्ध3;बपकरू25द्ध ;बपकरू26द्ध;बपकरू15द्ध;बपकरू27द्ध
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बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद
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अधिसूचना
2 सितम्बर 2015
सं॰ 1758—कैमूर पहाड़ी पर स्थित माँ मुण्डेष्वरी भवानी मन्दिर देष का प्राचीनतम मंदिर है, जो धार्मिक न्यास कैमूर पहाड़ी पर स्थित माँ मुण्डेष्वरी भवानी मन्दिर देष का प्राचीनतम मंदिर है, जो धार्मिक न्यास कैमूर पहाड़ी पर स्थित माँ मुण्डेष्वरी भवानी मन्दिर देष का प्राचीनतम मंदिर है, जो धार्मिक न्यास पर्षद में सार्वजनिक मंदिर के रूप में निबंधित है, जिसकी निबंधन संख्या 3789 है। यहाँ मण्डलेष्वर महादेव की पूजा के पर्षद में सार्वजनिक मंदिर के रूप में निबंधित है, जिसकी निबंधन संख्या 3789 है। यहाँ मण्डलेष्वर महादेव की पूजा के पर्षद में सार्वजनिक मंदिर के रूप में निबंधित है, जिसकी निबंधन संख्या 3789 है। यहाँ मण्डलेष्वर महादेव की पूजा के अभिलेख उपलब्ध है। उस समय गोमिभट्ट ने 500 स्वर्ण सिक्के मन्दिर में तण्डुल प्रसाद एवं अभिलेख उपलब्ध है। उस समय गोमिभट्ट ने 500 स्वर्ण सिक्के मन्दिर में तण्डुल प्रसाद एवं बारे में 108 ई0 का अभिलेख उपलब्ध है। उस समय गोमिभट्ट ने 500 स्वर्ण सिक्के मन्दिर में तण्डुल प्रसाद एवं अखण्ड दीप के लिए दिए थे। इसी पहाड़ी के पास लंका के राजा दुठ्ठगामिनी की मुहर प्राप्त हई है। राज अखण्ड दीप के लिए दिए थे। इसी पहाड़ी के पास लंका के राजा दुठ्ठगामिनी की मुहर प्राप्त हई है। राज अखण्ड दीप के लिए दिए थे। इसी पहाड़ी के पास लंका के राजा दुठ्ठगामिनी की मुहर प्राप्त हई है। राज दुठ्ठगामिनी श्रीलंका के प्रतापी राजा थे, जिनका समय 101-77 ई0 पू0 था। ऐसा प्रतीत हा ेता है कि संस्कृत के दुठ्ठगामिनी श्रीलंका के प्रतापी राजा थे, जिनका समय 101-77 ई0 पू0 था। ऐसा प्रतीत होता है कि संस्कृत के उद्भट कवि बाणभट्ट सम्राट हर्ष से मिलने के लिए आस-पास के इलाके से उनके स्कंधावार गए थे और बाणभट्ट उद्भट कवि बाणभट्ट सम्राट हर्ष से मिलने के लिए आस-पास के इलाके से उनके स्कंधावार गए थे और बाणभट्ट उद्भट कवि बाणभट्ट सम्राट हर्ष से मिलने के लिए आस-पास के इलाके से उनके स्कंधावार गए थे और बाणभट्ट की रचना 'चंडी शतकम्' मुण्डेष्वरी भवानी की स्तुति में ही रचा गया था। 18वीं शताब्दी में प्रसिद्ध चित्रकार विलियम की रचना 'चंडी शतकम्' मुण्डेष्वरी भवानी की स्तुति में ही रचा गया था। 18वीं शताब्दी में प्रसिद्ध चित्रकार विलियम की रचना 'चंडी शतकम्' मुण्डेष्वरी भवानी की स्तुति में ही रचा गया था। 18वीं शताब्दी में प्रसिद्ध चित्रकार विलियम हॉज (William Hodges) द्वारा चित्रित दो बहुत खूबसूरत पेंटिग उपलब्ध है। 1902 ई0 में पुरातत्वविद् टी0 ब्लॉच चित्रित दो बहुत खूबसूरत पेंटिग उपलब्ध है। 1902 ई0 में पुरातत्वविद् टी0 ब्लॉच चित्रित दो बहुत खूबसूरत पेंटिग उपलब्ध है। 1902 ई0 में पुरातत्वविद् टी0 ब्लॉच (T. Bloch) ने इस मंदिर पर छत का निर्माण कराया था और उसने यह भी लिखा था कि पुरातत्व विभाग के पास ने इस मंदिर पर छत का निर्माण कराया था और उसने यह भी लिखा था कि पुरातत्व विभाग के पास ने इस मंदिर पर छत का निर्माण कराया था और उसने यह भी लिखा था कि पुरातत्व विभाग के पास अभी पैसे नहीं हैं इसलिए षिखर की पुनर्स्थापना नहीं की जा रही है, लेकिन जब र ाषि उपलब्ध होगी तब इसके भव्य अभी पैसे नहीं हैं इसलिए षिखर की पुनर्स्थापना नहीं की जा रही है, लेकिन जब राषि उपलब्ध होगी तब इसके भव्य षिखर को पुनर्स्थापित किया जायेगा। इस उद्देष्य की पूर्ति के लिए बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद पिछले नौ वर्षों से षिखर को पुनर्स्थापित किया जायेगा। इस उद्देष्य की पूर्ति के लिए बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद पिछले नौ वर्षों से षिखर को पुनर्स्थापित किया जायेगा। इस उद्देष्य की पूर्ति के लिए बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद पिछले नौ वर्षों से प्रयत्नषील है और हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेषक ने इस कार्य को प्रारंभ करने की सहमति प्रकट प्रयत्नषील है और हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेषक ने इस कार्य को प्रारंभ करने की सहमति प्रकट प्रयत्नषील है और हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेषक ने इस कार्य को प्रारंभ करने की सहमति प्रकट ै। यदि इसका प्राचीन षिखर पुनर्स्थापित हो जाता है, जो कठिन कार्य नहीं है और रज्जु पथ (Rope way) का की है। यदि इसका प्राचीन षिखर पुनर्स्थापित हो जाता है, जो कठिन कार्य नहीं है और रज्जु पथ ( ै। यदि इसका प्राचीन षिखर पुनर्स्थापित हो जाता है, जो कठिन कार्य नहीं है और रज्जु पथ ( निर्माण हो जाता है तो यह धार्मिक न्यास देष के सर्वोत्कृष्ट न्यासों में परिगणित होेगा और यहाँ भक्तों की अपार भीड़ निर्माण हो जाता है तो यह धार्मिक न्यास देष के सर्वोत्कृष्ट न्यासों में परिगणित होेगा और यहाँ भक्तों की अपार भीड़ निर्माण हो जाता है तो यह धार्मिक न्यास देष के सर्वोत्कृष्ट न्यासों में परिगणित होेगा और यहाँ भक्तों की अपार भीड़ होगी।
किंतु दुःख का विषय है कि इस प्राचीनतम मंदिर के प्रबंधन के लिए बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद द्वारा एक प्राचीनतम मंदिर के प्रबंधन के लिए बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद द्वारा एक किंतु दुःख का विषय है कि इस न्यास समिति का गठन इस कार्यालय के अधिसूचना ज्ञापांक 618 दिनांक 10 2008 द्वारा किया गया था और न्यास समिति का गठन इस कार्यालय के अधिसूचना ज्ञापांक 618 दिनांक 10.06.2008 द्वारा किया गया था और जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित होने के बाद भी यह समिति कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर सकी बल्कि जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित होने के बाद भी यह समिति कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित होने के बाद भी यह समिति कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर नेमी(रूटीन) कार्यों में यथा- बजट बनाने, आय-व्यय का हिसाब किताब रखने, पर्षद को शुत्क देने एवं भक्तों को नेमी(रूटीन) कार्यों में यथा- बजट बनाने, आय-व्यय का हिसाब किताब रखने, पर्षद को शुत्क देने एवं भक्तों को नेमी(रूटीन) कार्यों में यथा- बजट बनाने, आय-व्यय का हिसाब किताब रखने, पर्षद को शुत्क देने एवं भक्तों को सुविधा प्रदान करने में भी सक्षम नहीं रही। सबसे बड़ी दुर्दषा यह हुई कि भगवती के छत्र मुकुट की चोरी के सुविधा प्रदान करने में भी सक्षम नहीं रही। सबसे बड़ी दुर्दषा यह हुई कि भगवती के छत्र मुकुट की चोरी के सुविधा प्रदान करने में भी सक्षम नहीं रही। सबसे बड़ी दुर्दषा यह हुई कि भगवती के छत्र मुकुट की चोरी के साथ-साथ उनके नेत्र भी नोंच लिए गये। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कर्मचारी या तो उसे रोकने में अक्षम रहे या साथ-साथ उनके नेत्र भी नोंच लिए गये। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कर्मचारी या तो उसे रोकने में अक्षम रहे या इसमें उनकी भागीदारी भी रही होगी। इसी प्रकार मंदिर के पुजारियों के विरूद्ध भी अपराध दर्ज हुआ और आरोप पत्र इसमें उनकी भागीदारी भी रही होगी। इसी प्रकार मंदिर के पुजारियों के विरूद्ध भी अपराध दर्ज हुआ और आरोप पत्र इसमें उनकी भागीदारी भी रही होगी। इसी प्रकार मंदिर के पुजारियों के विरूद्ध भी अपराध दर्ज हुआ और आरोप पत्र भी समर्पित किया गया।2 ;बपकरू4द्ध ;बपकरू10द्धख्;बपकरू4द्ध;बपकरू4द्ध;बपकरू15द्ध;बपकरू16द्ध न्यास समिति के गठन के तुरत बाद एक उदारमना महिला ने 10 बीघा(ढ़ाई एकड़) जमीन मुण्डेष्वरी मंदिर के नाम से दान में दी और उस पर पर्यटन विभाग के सौजन्य से धर्मषाला का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ। किन्तु प्रारंभिक निर्माण के बाद ठेकेदार भाग गया और यह कार्य वर्षों से लंबित है। स्थानीय एक भक्त के सहयोग से इस भू-खंड पर चाहरदिवारी बनायी गयी किन्तु आगे कुछ भी काम नहीं हो सका। इस परिसर को भक्तों के विश्राम के लिए विकसित किया जाना था ताकि वे बाहर से आकर यहाँ विश्राम कर सकें और स्नान करने के बाद न्यास के वाहन से मंदिर तक जा सकें, किन्तु न तो परिसर का विकास हुआ और न वाहन का प्रबंध हुआ। परिणास्वरूप भक्त सुविधा के अभाव में इधर उधर भटकने को मजबूर रहे हैं और उन्हें स्थानीय दुकानदारों द्वारा शोषित किया जाता रहा है। गोमिभट्ट ने तण्डुल प्रसाद के लिए 500 स्वर्ण सिक्के दिए थे। इस परम्परा को जारी रखने के लिए पटना में तिरूपति के कारीगरों द्वारा तण्डुल प्रसाद की उत्तम किस्म बनाने का प्रषिक्षण स्थानीय मिठाई बनाने वालों को दिया गया। एक महीने तक महावीर मंदिर पटना से तण्डुल प्रसाद भेजा भी गया जिसका स्वाद बहुत उत्तम था किन्तु बाद में तण्डुल प्रसाद की उपेक्षा की गयी और अभी तण्डुल प्रसाद के नाम पर जो प्रसाद बनता है वह स्वादिष्ट नहीं होता है और अल्प मात्रा में खानापूर्ति के लिए बनाया जाता है। यदि स्वादिष्ट तण्डुल प्रसाद की नियमित बिक्री हो तो भक्तों को भी यह संतुष्टि होगी कि वे मुण्डेष्वरी भवानी का प्रसाद लेकर गये हैं और इससे मंदिर को भी काफी आय होगी।
महावीर मंदिर प्रकाषन की ओर से मुण्डेष्वरी मंदिर पर देष और दुनिया में जितने भी प्रकाषित लेख थे सबका संकलन कर एक पुस्तक के रूप में तीन हजार प्रतियाँ वितरण के लिए छपवाई गयी किन्तु उनका भी भरपूर उपयोग प्रचार-प्रसार के लिए नहीं किया गया। महावीर मंदिर न्यास, पटना के सौजन्य से 04 अप्रैल, 2008 को तारामंडल सभागार, पटना में देष के मूर्धन्य लिपिज्ञों की एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें यह सहमति बनी कि मुण्डेष्वरी मंदिर के संबंध में उपलब्ध अभिलेख के अनुसार यह देष का प्राचीनतम अभिलिखित मन्दिर है, जिसमें पूजा अभी भी जारी है।
1980 के दषक के प्रारंभ में पंडित राज मोहन उपाध्याय ने मुण्डेष्वरी मंदिर के प्रचार प्रसार के लिए यज्ञों का आयोजन किया और उसके तुरत बाद मंदिर तक जाने के लिए मोरंग का रास्ता बना अन्यथा पहले लोग पहाड़ पर सिढ़ियों से चढ़कर जाया करते थे। बाद में उस क्षेत्र के नेता एवं मंत्री श्री जगदानन्द ने मुण्डेष्वरी मन्दिर के विकास के लिए काफी सराहनीय कार्य किया। उन्होंने मंदिर तक जाने के लिए प्रषस्त पक्का पथ बनवाया और बिजली की लाईन तथा अन्य सुविधायें उपलब्ध करवाई जिससे भक्तों को काफी सुविधा मिली तथा मुण्डेष्वरी मंदिर में जाने वाले भक्तों की संख्या में काफी वृद्धि हुई। उनके प्रयास से पहाड़ी पर वन विभाग द्वारा काफी संख्या में पेड़ लगाये गये और आज यह पहाड़ी हरियाली से ओत-प्रोत है।
सम्प्रति श्री राजमोहन उपाध्याय जीवित नहीं हैं किन्तु उनके पुत्र श्री चन्द्रमौलि उपाध्याय भी मन्दिर के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य करते है। श्री चन्द्रमौलि उपाध्याय काषी हिन्दू विष्वविद्यालय में ज्योतिष के प्राध्यापक हैं और विष्वविद्यालय परिसर में स्थित विष्वनाथ मन्दिर के प्रबंधन का दायित्व सम्भालते हैं। साथ ही विष्वविख्यात काषी विष्वनाथ मन्दिर ट्रस्ट कमिटि के भी बहुत वर्षों से ट्रस्टी रहते आये हैं। इन्होंने मुण्डेष्वरी मन्दिर में छत्र, मुकुट के अलावे अभी भगवती के नेत्र भी बनवाये हैं। अतः इन दो निष्ठावान् भक्तों - श्री जगदानन्द एवं श्री चन्द्रमौलि उपाध्याय - को माँ मुण्डेष्वरी भवानी मंदिर का आजीवन (स्वस्थ रहने पर) स्थायी संरक्षक बनाया जाता है। वे हर बैठक में आमन्त्रित होंगे और उनके विचारों को पूरी अहमियत दी जायेगी। यद्यपि जिलापदाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति ने पिछले आठ-नौ वर्षाें में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है तथापि यह आषा की जाती है कि उनकी अध्यक्षता में गठित नवीन न्यास समिति संरक्षको के अनुभव आलोक में मंदिर को विकास की पराकाष्ठा तक पहुँचाने में सफल होगी। इसमें उन्हें इन संरक्षकों का अनुभव एवं मार्गदर्षन अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा। वार्षिक बजट बैठक करने के पूर्व इनकी तिथि-सुविधा का ध्यान रखा जायेगा। मुण्डेष्वरी मंदिर की व्यवस्था सुचारू रूप से चले तो यह देष के श्रेष्ठ एवं लोकप्रिय तीर्थों में शुमार होगा और इससे बिहार में पर्यटन को बहुत बढ़ावा मिलेगा।
नई न्यास समिति को मंदिर के षिखर की पुनर्स्थापना एवं उड़न खटोले(Rope way) की व्यवस्था के लिए अनवरत प्रयासरत रहना होगा और गोमिभट्ट के षिलालेख के अनुसार तण्डुल प्रसाद के वितरण एवं विक्रय की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। इसके अलावा इसे निम्न कार्यों पर भी विषेष ध्यान देना चाहिएः-
1. नवगठित न्यास समिति मन्दिर में विद्यमान वन्दनीय विग्रहों की पूजा-अर्चना, राग-भोग, उत्सव-समैया की व्यवस्था परम्परागत ढ़ंग से चली आयी पद्धति के अनुसार करेगी और गोमिभट्ट के षिलालेख में उल्लिखित पूर्त्त कार्यों को मूर्त रूप देने का प्रयत्न करेगी।
2. मंदिर के अन्दर एवं परिसर में जो आय होती है, उसमें पूरी ईमानदारी और पारदर्षिता बरती जायेगी। जो चढ़ावे चढ़ते हैं, उन्हें भेंटपात्र में डाला जायेगा और एक-एक रूपये का हिसाब-किताब रखा जायेगा। मन्दिर में जो भी कर्मकाण्ड होता है, वह चाहे मुण्डन हो या नारियल फोड़ने का विधान, हवन हो या कथा-पाठ प्रत्येक कर्मकाण्ड रसीद काटने के बाद ही होगा और इससे प्राप्त राषि का सही हिसाब रखा जायेगा।
3. समिति का अपना बैंक खाता है, उसमें सारी राषि जमा होगी। उसी जमा राषि से पैसे निकालकर व्यय होगा। बैंक का खाता अध्यक्ष, सचिव या कोषाध्यक्ष में से किन्हीं दो के संयुक्त हस्ताक्षर से संचालित होगा। 4. न्यास समिति न्यास द्वारा धारित सभी चल-अचल सम्पत्तियों का उपयोग न्यास के सम्यक् विकास के लिए करेगी तथा उनकी प्रविष्टि निर्धारित पंजियों में करेगी तथा समय-समय पर इसकी समीक्षा एवं मिलान करेगी।3 5. न्यास समिति मन्दिर में चढ़ने वाले चढ़ावे एवं उपहारों के लिए दाताओं को उचित पावती देकर उन्हें सत्यापित पंजी में प्रविष्ट कर प्रदर्ष के रूप में किसी सुरक्षित खजाने या बैंक लॉकर में रखेगी। भगवती या मण्डलेष्वर षिव के विग्रह दर्षन के लिए भक्तों से कोई शुल्क नहीं लिया जायेगा, किन्तु विषेष पूजा-अर्चना, राग-भोग, प्रसाद वितरण, उत्सव-श्रृंगार या किसी भी कर्मकाण्ड के लिए न्यास समिति प्रस्ताव पारित कर शुल्क निर्धारित कर सकती है, किन्तु ऐसा करते समय भक्तों के हित का भी ध्यान रखा जायेगा तथा कर्मकाण्डीय शुल्क में पौरोहित्य-दक्षिणा का भी समावेष होगा।
6. अध्यक्ष की अनुमति से सचिव न्यास-समिति की बैठक प्रत्येक तिमाही में कम-से-कम एक बार बुलायेंगें। दो तिमाही तक बैठक नहीं बुलाने की स्थिति में उपाध्यक्ष की अनुमति से भी यह बैठक बुलायी जा सकती है। सदस्यों को दस दिन पूर्व सूचना भेजकर बैठक बुलायी जायेगी। बैठक सामान्यतः मुण्डेष्वरी मन्दिर या तलहटी वाले पर्यटन भवन में होगी। सचिव न्यास समिति के निर्णयों को कार्यरूप देगें। साथ ही न्यास समिति की बैठक का कार्यवृत एवं आवष्यक सूचना पर्षद् को सम्प्रेषण के लिए अधिकृत रहेंगे।
7. कोषाध्यक्ष मंदिर के कोष एवं लेखा के संघारण के लिए उत्तरदायी होंगे। इसके लिए न्यास-समिति एक सक्षम लेखापाल की सेवा लेगी। कोषाध्यक्ष प्रति वर्ष बजट, अंकेक्षित आय-व्यय प्रतिवेदन, तिमाही आय-व्यय का विवरण एवं पर्षदीय शुल्क पर्षद् को निष्चित समय पर भेजेंगे।
8. सह-सचिव मन्दिर की सुरक्षा पर विषेष ध्यान देंगें। प्रतिदिन मन्दिर खुलते एवं बन्द होते समय एक प्रतिनिधि (पुलिस या न्यास का) वहाँ उपस्थित रहेगा तथा एक ताला समिति की ओर से भी लगायेगा। चोरी के निवारण के लिए मन्दिर में तथा चढ़ावे की गिनती के समय सी.सी.टी.वी. कार्यरत रहे, वे सुनिष्चित करेंगें।
9. यदि समिति न्यास हित में कोई उप समिति बनाती है या जन हित में कोई योजना चलाती है तो इसके लिए विषेष बैठक में प्रस्ताव पारित कर पर्षद की अनुमति से उसे लागू कर सकती है।
10. समिति मां मुण्डेष्वरी से सम्बद्ध जो अन्य विकास-समिति हैं उसकेे साथ अपने सम्बन्धों के बारे में विचार-विमर्ष कर उसके विलय या अन्य निर्णय के लिए प्रयास करेगी और पर्षद् के पास अपनी अनुषंसा भेजेगी। 11. अहिंसक बलि की जो परंपरा सदियों से चली आयी है, उसका पूर्णतः पालन किया जायेगा यानी हिंसक बलि परिसर में कभी नहीं होगी।
12. न्यास समिति भक्त-महिला द्वारा समर्पित भू-खंड वाले परिसर को विकसित करने का पूरा प्रयास करेगी और इसका एक प्रारूप बनायेगी जिसे पर्षद के पास अनुमोदन के लिए भेजेगी। यदि पर्यटन विभाग द्वारा दिये गये ठेके का संवेदक तीन महीने में पुनः कार्य प्रारंभ नहीं करता, तो समिति उस भवन को विधिसम्मत ढंग से लेकर धर्मषाला निर्माण कार्य अपनी राषि से एक वर्ष में पूर्ण करेगी।
13. न्यास-समिति, चाहे तो, अपने संचालन के लिए विस्तृत नियमावली बनाकर पर्षद् के पास अनुमोदन के लिए भेज सकती है।
14. इस योजना में परिवर्तन, परिवर्द्धन एवं संषोधन का अधिकार पर्षद में निहित होगा।माँ मुण्डेष्वरी भवानी मन्दिर के प्रबंधन के लिए पर्षदीय अधिसूचना ज्ञापांंक 618 दिनांक 10.06.2008 द्वारा गठित न्यास समिति का कार्यकाल 05 वर्षों का था जो पूरा हो गया है, इसलिए एक नवीन न्यास समिति का गठन आवष्यक हो गया है ;;;;
अतः बिहार हिन्दू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1950 की धारा 32 में धार्मिक न्यास पर्षद को प्रदत्त अधिकार जो धार्मिक न्यास की उपविधि संख्या43(द) के तहत अघ्यक्ष को प्राप्त है, का प्रयोग करते हुए माँ मुण्डेष्वरी भवानी मन्दिर, कैमूर पहाड़ी के सुचारू प्रबंधन एवं सर्वांगीण विकास के लिए ऊपर लिखित योजना निरूपित की जाती है तथा इसके कार्यान्वयन को मूर्त रूप देने के लिए संरक्षक-द्वय सहित निम्नलिखित व्यक्तियों की एक न्यास समिति गठित की जाती हैः-
1. जिलाधिकारी, भभुआ
- पदेन अध्यक्ष 2. श्री परमेष्वर खरवार, पूर्व प्रमुख, ग्राम-बन्धा, थाना- अधौरा, - उपाध्यक्ष भभुआ, जिला- कैमूर
3. श्री कमल नारायण सिंह, अधिवक्ता, वार्ड नं0-12, भभुआ, कैमूर - सचिव 4. पुलिस निरीक्षक, भगवानपुर - पदेन सह-सचिव 5. प्रखंड विकास पदाधिकारी, भगवानपुर - पदेन कोषाध्यक्ष 6. श्री आदित्य नारायण प्रसाद, अधिवक्ता, लखनपुर, थाना-चैनपुर,
- सदस्य भभुआ, जिला- कैमूर
7. श्री झामू मुषहर, ग्राम-कुण्डवा, मुण्डेष्वरी, थाना- भगवानपुर, -
सदस्य भभुआ, जिला- कैमूर
8. श्री बाल्मीकि पाण्डेय, भगवानपुर, भभुआ, कैमूर - सदस्य4 ;बपकरू4द्ध ;बपकरू10द्धख्;बपकरू4द्ध;बपकरू4द्ध;बपकरू15द्ध;बपकरू16द्ध 9. श्री आलोक सिंह, भगवानपुर, भभुआ, कैमूर - सदस्य इस समिति का गठन तात्कालिक प्रभाव से किया जाता है और इसका कार्यकाल पाँच वर्षों का होगा।
आदेश से, किषोर कुणाल,किषोर कुणाल,किषोर कुणाल,किषोर कुणाल, अध्यक्ष।
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ख्;बपकरू17द्धँ;बपकरू16द्ध ;बपकरू4द्ध ;बपकरू27द्ध;बपकरू4द्ध;बपकरू16द्ध
;बपकरू4द्ध;बपकरू16द्ध ;बपकरू4द्ध ;बपकरू4द्ध;बपकरू4द्ध ;बपकरू31द्ध;बपकरू4द्ध मरु ;बपकरू27द्धघ् ;बपकरू4द्ध ;बपकरू10द्धख्;बपकरू4द्ध;बपकरू4द्ध;बपकरू15द्ध 1199ः5श्1़10ः;बपकरू17द्ध़ए़;बपकरू17द्ध़घ् Website: http://egazette.bih.nic.in