(cid:4)नबंधन सं(cid:10)या पी0ट(cid:17)0-40 (cid:4)नबंधन सं(cid:10)या गजट ॢबह(cid:4)र गजट ॢब
[स(cid:3)ध(cid:3)रण [(cid:8)क ॢबह(cid:4)र सरक(cid:4)र ह(cid:4)र(cid:4) (cid:10)क(cid:4)०शत ॢबह(cid:4)र सरक(cid:4)र ह(cid:4)र(cid:4) (cid:10)क(cid:4)०शत ॢबह(cid:4)र सरक(cid:4)र ह(cid:4)र(cid:4) (cid:10)क(cid:4)०शत 22 च(cid:25)(cid:26) 1(cid:28)3(cid:20) (cid:30)श(cid:15)(cid:31)
(स(cid:14)(cid:15) पटन(cid:4) 2(cid:20)(cid:21)) पटन(cid:4)
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जल संसाधन विभाग
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12 tuojh 2016
सं0 22/नि0सि0(विभा0)-14-115/94(पार्ट)/77
ागीय अधिसूचना ज्ञापांक-12 दिनांक 27.08.1998 द्वारा निलम्बित करते हुए ि स0(विभा0)-14-115/94(पार्ट)/77—श्री विक्रमा सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता (वरीयता श्री विक्रमा सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता (वरीयता क्रमांक-3234), सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमंण्डल, सासाराम शिविर-डिहरी को वर्ष 1988-89 में भोजपुर वितरणी में क्रमांक-3234), सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमंण्डल, सासाराम शिविर-डिहरी को वर्ष 1988-89 में भोजपुर वितरणी में क्रमांक-3234), सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमंण्डल, सासाराम शिविर-डिहरी को वर्ष 1988-89 में भोजपुर वितरणी में 98 लाख (चार लाख अनठानवे हजार) संवेदक को अनुचित विाीय लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से बिना कार्य कराए रु0 4.98 लाख (चार लाख अनठानवे हजार) संवेदक को अनुचित विाीय लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से बिना का बोगस विपत्र तैयार करने के आधार पर डिहरी थाना काण्ड संख्या-302/95 में दर्ज प्राथमिकी में प्रथम दृष्टया का बोगस विपत्र तैयार करने के आधार पर डिहरी थाना काण्ड संख्या-302/95 में दर्ज प्राथमिकी में प्रथम दृष्टया का बोगस विपत्र तैयार करने के आधार पर डिहरी थाना काण्ड संख्या-302/95 में दर्ज प्राथमिकी में प्रथम दृष्टया 1998 द्वारा निलम्बित करते हुए विभागीय प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-12 दिनांक 1998 द्वारा विभागीय कार्यवाही चलाई गई। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच .11.1998 द्वारा विभागीय कार्यवाही चलाई गई। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच संकल्प संख्या-3421 दिनांक 25. प्रतिवेदन में आरोप प्रमाणित पाया गया एवं जाँच प्रतिवेदन की सम्यक् समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई तथा प्रतिवेदन में आरोप प्रमाणित पाया गया एवं जाँच प्रतिवेदन की सम्यक् समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई तथा प्रतिवेदन में आरोप प्रमाणित पाया गया एवं जाँच प्रतिवेदन की सम्यक् समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई तथा समीक्षोपरान्त श्री सिंह के विरूद्व आरोप प्रमाणित पाया गया। प्र माणित आरोपों के लिए उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का समीक्षोपरान्त श्री सिंह के विरूद्व आरोप प्रमाणित पाया गया। प्रमाणित आरोपों के लिए उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का निर्णय लिया गया। तदोपरान्त विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन की प्रति के साथ सरकार के उक्त निर्णय से निर्णय लिया गया। तदोपरान्त विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन की प्रति के साथ सरकार के उक्त निर्णय से निर्णय लिया गया। तदोपरान्त विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन की प्रति के साथ सरकार के उक्त निर्णय से 2000 द्वारा उनसे द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री सिंह से हुए विभागीय पत्रांक-1264 दिनांक 30.10.2000 द्वारा उनसे द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री सिंह से अवगत कराते हुए विभागीय पत्रांक-1264 दिनांक ्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरान्त श्री सिंह की सेवा से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरान्त श्री सिंह की सेवा से ्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरान्त श्री सिंह की सेवा से बर्खास्तगी के प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना के पत्रांक-2042 दिनांक 30.01.2002 द्वारा सहमति प्राप्त हुई। 2002 द्वारा सहमति प्राप्त हुई। बर्खास्तगी के प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना के पत्रांक-2042 दि वरूद्व प्रमाणित आरोपों के आधार पर विभागीय अधिसूचना तत्पश्चात् मंत्रिपरिषद् के अनुमोदनोपरान्त श्री सिंह के विरूद्व प्रमाणित आरोपों के आधार पर विभ तत्पश्चात् मंत्रिपरिषद् के अनुमोदनोपरान्त श्री सिंह के ि संख्या-327 दिनांक 27.03.2002 द्वारा निम्न दण्ड दिया गया :
2002 द्वारा निम्न दण्ड दिया गया :
) निलम्बन अवधि में निलम्बन भाा के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं
2009 को माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित न्यायादेश के विरूद्व LPA
(i) सेवा से बर्खास्त (ii) निलम्बन अवधि में निलम्बन भाा के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं उक्त विभागीय दण्डादेश के विरूद्व श्री विक्रमा सिंह द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में CWJC उक्त विभागीय दण्डादेश के विरूद्व श्री विक्रमा सिंह द्वारा माननीय उच्च न्याया उक्त विभागीय दण्डादेश के विरूद्व श्री विक्रमा सिंह द्वारा माननीय उच्च न्याया 02.2009 को न्यायादेश पारित संख्या-10363/2002 दायर किया गया जिसमे माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 26.02 संख्या-10363/2002 दायर किया गया जिसमे SET ASIDE करते हुए रिट किया गया। पारित न्यायादेश में विभागीय दण्डादेश संख्या-327 दिनांक 27.03.2002 को SET ASIDE किया गया। पारित न्यायादेश में विभागीय दण्डादे किया गया। विभाग द्वारा CWJC संख्या-10363/2002 विक्रमा सिंह बनाम बिहार राज्य व अन्य में को ALLOW किया गया। विभाग द्वारा नाम बिहार राज्य व अन्य में संख्या-755/2009 एवं IA दिनांक 26.02.2009 को माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित न्यायादेश के विरूद्व 2011 को पारित न्याय निर्णय में माननीय उच्च न्यायालय, पटना संख्या-3552/2009 दायर किया गया। दिनांक 29.03.2011 को पारित न्याय निर्णय में माननीय उच्च न्यायालय, पटना संख्या-3552/2009 दायर किया गया। द्वारा IA संख्या-3552/2009 को अस्वीकृत कर दिया गया।
संख्या-3552/2009 को अस्वीकृत कर दिया गया।2 ॢबह(cid:4)र गजट (cid:10)[स(cid:4)ध(cid:4)रण(cid:15)(cid:16) 11 [(cid:10)%ल 2016 IA संख्या-3552/2009 में दिनांक 29.03.2011 को पारित न्यायादेश के विरूद्ध विभाग द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय में SLP(C) संख्या-15440/2011 दायर किया गया। उक्त वाद में माननीय उच्चतम न्यायालय ने दिनांक 03.02.2012 को SLP को निष्पादित करते हुए खण्डपीठ माननीय पटना उच्च न्यायालय को LPA संख्या-755/2009 की सुनवाई करने का निदेश दिया। उक्त न्यायादेश के आलोक में माननीय खण्डपीठ पटना उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 14.08.2012 को मामले का निष्पादन करते हुए आदेश किया गया कि चूँकि सेवा से बर्खास्त कर्मी को विभागीय कार्यवाही में उनके द्वारा माँगे गए कागजात उपलब्ध नहीं कराए गए थे अतएव न्यायालय का अभिमत है कि इन कागजातोें के आधार पर याचिकार्काा द्वारा समर्पित जबाब की पुर्नसमीक्षा के पश्चात अनुशासनिक प्राधिकार दुबारा निर्णय ले।
माननीय खण्डपीठ पटना उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 14.08.2012 को पारित न्याय निर्णय के अनुपालन में विभागीय पत्रांक-1126 दिनांक 12.10.2012 द्वारा याचिकार्काा को उनके द्वारा याचित अभिलेख की छायाप्रति उपलब्ध कराने हेतु मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, डिहरी को लिखा गया तथा साथ ही विभागीय आदेश संख्या-135 सह पठित ज्ञापांक-1046 दिनांक 27.09.2012 द्वारा मामले की सुनवाई हेतु श्री हरिनारायण, मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनेटरिंग, सिचांई भवन, पटना को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा दिनांक 14.12. 2012 को जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन में आरोपों को प्रमाणित नहीं पाया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई एवं पाया गया कि संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से असहमत होने का पर्याप्त आधार है। अतः समीक्षोपरान्त विभागीय पत्रांक-703 दिनांक 20.06.2013 द्वारा निम्नांकित असहमति के बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गई %&
1. यह कि उनके द्वारा पूर्व में मापी पुस्तिका संख्या-163 के पृष्ठ 15-17 पर NIL विपत्र प्रस्तुत किया गया था जिससे सम्बन्धित अन्य साक्ष्य उपलब्ध है।
2. पूर्व में NIL विपत्र प्रस्तुत करने के पश्चात् भुगतेय राशि का विपत्र तभी तैयार किया जा सकता है जबकि पूर्व के NIL विपत्र को रद्द करने का आदेश सक्षम पदाधिकारी से प्राप्त किया गया हो जो कि इस मामले में प्राप्त किया गया प्रतीत नहीं होता हैं इस आधार पर कहा जा सकता है कि बाद में प्रस्तुत विपत्र बिना कार्य सम्पादन के तैयार किया गया। 3. यह कि उनके द्वारा मापी पुस्तिका संख्या-163 के पृष्ठ 15-17 पेज को फाड़कर बदला गया है जिसे कार्यपालक अभियंता के कार्यालय के कर्मचारी द्वारा भी उक्त मापी पुस्तिका के पृष्ठ संख्या-15 पर टिप्पणी के रूप में अंकित किया गया है। उक्त टिप्पणी में यह भी अंकित है कि पूर्व में इस कार्य का NIL विपत्र समर्पित किया गया था। श्री सिंह द्वारा उक्त द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युार में असहमति के बिन्दु-1 के सम्बन्ध में कहा गया है कि विभाग द्वारा जाली, फर्जी एवं झूठा असहमति का बिन्दु बनाया गया है। माप पुस्त संख्या-163 का पृष्ठ-16 से 100 तक पूर्णतः सादा है। सम्वेदक का प्रथम चालू विपत्र माप पुस्त संख्या-163 के पेज-1 से 14 तक तथा द्वितीय चालू विपत्र माप पुस्त संख्या-211 के पृष्ठ संख्या-1 से 16 तक में बना हुआ है तो तृतीय विपत्र माप पुस्त संख्या-163 के पृष्ट संख्या-15 से 17 यानि तीन पृष्ठ में अंकित किया जाना असंभव है क्योंकि NIL विपत्र बनाने के पूर्व ली गई सभी मापी को एक साथ/एक जगह उद्धृत करना आवश्यक है। श्री रामाधार सिंह, कनीय अभियंता द्वारा चालू विपत्र में WORK-IN-PROGRESS अंकित किया गया है। वैसी स्थिति में तृतीय विपत्र अन्तिम विपत्र तैयार किया गया होता तो कम-से-कम NIL विपत्र नहीं बनता। NIL विपत्र प्रस्तुत करने सम्बन्धी अन्य साक्ष्य विभाग के पास उपलब्ध है जो उन्हे नहीं दिया गया।
असहमति के बिन्दु-1 के प्रत्युार की समीक्षा में पाया गया कि श्री सिंह द्वारा माप पुस्त संख्या-163 के पृष्ठ-14 एवं 15 पर अंकित बातों की चर्चा विस्तृत रूप से की गई है जो तथ्यहीन है क्योंकि विभाग द्वारा असहमति के बिन्दु-3 में इन बातों को ही अंकित किया गया है। माप पुस्त संख्या-163 के पेज संख्या 16 से 100 तक सादा रहने की बात कही गई है जिसका कोई औचित्य नहीं है क्योंकि माप पुस्त संख्या-163 के पेज संख्या-15 से 17 तक बदलने के बाद उस पर आरोपित क्षेत्रीय पदाधिकारी/कर्मचारी द्वारा भविष्य में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं होने के दृष्टिगत टिप्पणी अंकित की गई है। फलस्वरूप आगे का पृष्ठ संख्या-16 से 100 तक सादा रह गया।
अन्तिम विपत्र में सभी मापी को एक साथ उद्धृत करना आवश्यक कहा गया है जबकि NIL विपत्र में पूर्व के विपत्र का हवाला देकर एवं मात्र मापपुस्त के पन्नों जिसमें पूर्व में मात्रा अंकित है को संदर्भित करते हुए भी NIL विपत्र बनाया जा सकता है जो 2-3 पेज में अंकित हो सकता है। माप पुस्त में विपत्र प्रविष्टि के समय डेट ऑफ कम्पलीशन अंकित करते समय एकरारनामा के अनुसार निर्धारित कार्य पूर्ण करने की तिथि अंकित की जाती है जबकि कनीय अभियंता द्वारा " IN PROGRESS " अंकित कर गलत किया गया है। इसी गलत तथ्य को आधार बनाकर श्री सिंह द्वारा अपने जबाब में " WORK IN PROGRESS " अंकित कर कार्य प्रगति पर बताया गया जिसका कोई औचित्य नहीं है। उल्लेखनीय है कि कार्य का अन्तिम विपत्र पारित होने के पूर्व कार्य को प्रगति पर ही माना जाता है एवं यदि एकरारित कार्य के विरूद्ध सम्पादित सारे कार्य मदों को द्वितीय चालू विपत्र में ही ले लिया गया हो एवं तत्पश्चात् कोई कार्य सम्पादित नहीं किया गया हो तो तृतीय विपत्र निश्चित रूप से NIL विपत्र ही होगा। श्री सिंह द्वारा याचित अभिलेख उनके अधिवक्ता के माध्यम से विभागीय पत्रांक-785 दिनांक 05.07.2013 द्वारा उपलब्ध कराया गया है।3 (cid:23)बहार गजट (असाधारण), 11 [(cid:10)%ल 2016 असहमति के बिन्दु-2 के प्रत्युार में श्री सिंह द्वारा उल्लेख किया गया है कि संवेदक द्वारा किसी चालू विपत्र के भुगतान के बाद काम करना बन्द कर दिया जाता है तब अगला चालू विपत्र ठप होने के कारण NIL विपत्र होगा एवं NIL विपत्र बनाकर संवेदक के विरूद्व एकरारनामा में प्रावधान के अनुरूप कार्रवाई होगी। कार्य अवधि के पूर्व प्रस्तुत किए गए NIL विपत्र को रद्द करने का आदेश देने के लिए कोई पदाधिकारी सक्षम नहीं है। कनीय अभियंता यदि NIL विपत्र बनाता है तो सहायक अभियंता उसे रद्द कर अपनी अभ्युक्ति के साथ विपत्र तैयार कर कार्यपालक अभियंता को देंगे। विवाद की स्थिति में कार्यपालक अभिंयता, अधीक्षण अभियंता को कार्रवाई के लिए अनुशंसित करेंगे। अन्तिम और NIL विपत्र कार्य समाप्ति के बाद कार्यपालक अभियन्ता के आदेश के बाद तैयार किया जाता है। प्रस्तुत मामले में न तो कार्य पूरा हुआ था और न ही कार्य समाप्ति की तिथि बीती थी। अतः NIL विपत्र बनाने का प्रश्न नहीं उठता है। आगे उनके द्वारा बताया गया है कि असहमति के बिन्दु-1 के सम्बन्ध में उनके (श्री सिंह) द्वारा कथित छः साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि उनके (श्री सिंह) द्वारा कभी भी NIL विपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया था। ऐसी स्थिति में NIL विपत्र रद्द करने का आदेश सक्षम पदाधिकारी से प्राप्त करने का प्रश्न उठाया जाना पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का प्रमाण है। श्री सिंह द्वारा यह रेखांकित किया गया है कि मूल आरोप पत्र प्रपत्र 'क' के ''तृतीय एवं अन्तिम NIL विपत्र'' से तृतीय एवं अन्तिम शब्द हटाकर असहमति के बिन्दु-2 में NIL विपत्र अंकित कर दिया गया है। NIL विपत्र को रद्द करने का आदेश देने के लिए किस कोड/नियम में कौन-सा पदाधिकारी सक्षम है, का प्रश्न उठाते हुए उनके द्वारा आरोप को गलत एवं फर्जी बताया गया है।
असहमति के बिन्दु-2 के संबंध श्री सिंह द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा मि0 अपील-174/2001 में दिनांक 22.12.2000 को पारित न्यायादेश का हवाला देते हुए कहा गया है कि सम्वेदक द्वारा नहर के 13 मील से 31 मील में कार्य कराया गया था जिसका विपत्र माप पुस्त संख्या-216 के पृष्ठ संख्या-65 से 77 में तैयार कर पारित किया गया था जो सही था परन्तु उस पर सूद जोड़कर 36,65,888/-रु0 का भुगतान सम्वेदक को दिनांक 28.03.2009 को किया गया जिस हेतु कोई कार्रवाई नहीं की गई और सही विपत्र बनाने वाले को प्रताड़ित किया जा रहा है। सम्वेदक का तृतीय एवं अन्तिम विपत्र भोजपुर वितरणी के 13 मील से 31 मील के बीच किए गए मिट्टी कार्य मुख्य अभियंता, डिहरी के निरीक्षण प्रतिवेदन-1553 दिनांक 24.05.89 के आलोक में कार्यपालक अभियंता, सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमण्डल, डिहरी के पत्रांक-560 दिनांक 12.06.89 के निदेश कि '' अन्तिम मापी प्रस्तुत करें '' के आलोक में किया गया था।
मापी पुस्त संख्या-211 के पृष्ठ-1 से 16 तक जो द्वितीय चालू विपत्र से संबंधित है और कनीय अभियंंता द्वारा " WORK IN PROGRESS " अंकित किया गया है, से स्पष्ट है कि संवेदक द्वारा कराए गए कार्य का ही तृतीय एवं अन्तिम विपत्र तैयार किया गया था। श्री सिंह द्वारा यह भी कहा गया है कि उनके (श्री सिंह) पत्रांक-25-C दिनांक 25.06.2013 द्वारा माँगा गया सभी अभिलेख उपलब्ध नहीं कराया गया और न ही सूचना दी गई कि विभाग के पास अभिलेख उपलब्ध नहीं है।
श्री सिंह द्वारा असहमति के बिन्दु-2 के प्रत्युार की समीक्षा में यह पाया गया कि उनके द्वारा यह कहीं नहीं अंकित किया गया है कि कार्य समाप्ति की तिथि क्या थी। कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता का क्षेत्रीय रूप में कार्य करने का एक चैनल होता है जिसमें बहुत-सी बातें मौखिक रूप से भी होने पर कार्य रूप में परिणत किया जाता है। वैसी स्थिति में कार्यपालक अभियंता के लिखित आदेश के बिना भी NIL विपत्र बनाया जा सकता है। प्रस्तुत मामले में दर्ज F.I.R.से विदित होता है कि संवेदक को अन्तिम मापी हेतु सूचित किया गया था एवं नहीं उपस्थित होने की स्थिति में माप पुस्त संख्या-163 के पेज संख्या 15 - 17 पर NIL विपत्र अंकित कर प्रमण्डलीय कार्यालय में दिनांक 25.05.1990 को जमा किया गया था। पुनः किसी साजिश के तहत् मापपुस्त संख्या-163 के पेज 15-17 को बदल दिया गया एवं संवेदक के विपत्र को मापपुस्त संख्या-216 के पेज 65-67 पर अंकित कर पारित किया गया जिसका भुगतान नहीं हो सका और बाद में उस गलत भुगतान को प्राप्त करने हेतु संवेदक द्वारा न्यायिक प्रक्रिया अपनाकर भुगतान प्राप्त किया गया जो श्री सिंह एवं साथ के क्षेत्रीय पदाधिकारियों की साजिश का परिणाम है जिससे सरकार को विाीय क्षति हुई। संवेदक का NIL विपत्र माप पुस्त संख्या-163 के पेज 15-17 पर आरोपित पदाधिकारी द्वारा बनाया गया था एवं सम्बधित साक्ष्य श्री सिंह को उपलब्ध कराया गया है।
मूल आरोप पत्र प्रपत्र 'क' में तृतीय एवं अन्तिम NIL विपत्र के स्थान पर असहमति के बिन्दु में सिर्फ NIL विपत्र अंकित किए जाने पर श्री सिंह द्वारा प्रश्न उठाने का कोई औचित्व नहीं है चूँकि NIL विपत्र, अन्तिम विपत्र ही होता है।
श्री सिंह द्वारा अंकित बिन्दु कि NIL विपत्र अंकित करने का आदेश देने के लिए किस कोड/नियम से कौन-सा पदाधिकारी सक्षम है, उचित नहीं है क्योंकि राजपत्रित पदाधिकारी होने के नाते कोड/नियम की जानकारी श्री सिंह को स्वयं होनी चाहिए कि कार्य का एकरारनामा करनेवाले पदाधिकारी (कार्यपालक अभियंता) इसके लिए सक्षम पदाधिकारी है।
भोजपुर वितरणी के 13 मील से 31 मील तक के कार्य के सम्बन्ध में मुख्य अभियंता, डिहरी के ज्ञांपाक-1553 दिनांक 24.05.1989 की प्रतिलिपि के आधार पर कार्यपालक अभियंता, सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमण्डल, सासाराम शिविर, डिहरी के पत्रांक-560 दिनांक 12.06.89 का जिक्र करते हुए तृतीय एवं अन्तिम विपत्र प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है जबकि मुख्य अभियंता, डिहरी के ज्ञापांक-1553 दिनांक 24.05.1989 की कण्डिका-3 में स्पष्ट आदेश दिया4 ॢबह(cid:4)र गजट (cid:10)[स(cid:4)ध(cid:4)रण(cid:15)(cid:16) 11 [(cid:10)%ल 2016 गया था कि '' 13 कि0मी0 से आगे उन स्थानों पर अभी कार्य नहीं कराया जाय जहाँ सोन नहर आधुनिकीकरण अंचल द्वारा कार्य कराया जा चुका है। इन स्थलों का निरीक्षण कर विक्रमगंज प्रमंण्डल द्वारा प्रतिवेदित किया जाय कि कहाँ और अतिरिक्त मजबूतीकरण करने की आवश्यकता है तदनुसार ही इस कार्यालय का आदेश लेकर कार्य कराया जाय। ऐसे स्थानों पर अद्यतन कार्य परिमाण एवं अभिलेख सोन नहर आधुनिकीकरण अंचल से प्राप्त किया जाय '' परन्तु मुख्य अभियंता के आदेश का उल्लंधन कर कार्यपालक अभियंता एवं सहायक अभियंता, सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमण्डल, सासाराम, शिविर-डिहरी द्वारा सम्वेदक का तृतीय एवं अन्तिम विपत्र माप पुस्त संख्या-216 के पृष्ठ- 65-77 पर तैयार कर पारित किया गया जो मुख्य अभियंता के आदेश की अवहेलना एवं विाीय अनियमितता का द्योतक है एवं इसके चलते विभाग को न्यायिक प्रक्रिया का सामना करते हुए सम्वेदक को एवार्ड की राशि का भुगतान करना पड़ा जिससे सरकार को विाीय क्षति हुई।
असहमति के बिन्दु-3 के सम्बन्ध में श्री सिंह का कहना है कि '' माप पुस्त संख्या-163 के पृष्ठ संख्या 15 से 17 फाड़कर बदला गया है '' एवं '' कार्यपालक अभियंता कार्यालय के कर्मचारी द्वारा उक्त माप पुस्त के पृष्ठ संख्या-15 पर टिप्पणी के रूप में अंकित किया गया है '' विरोधाभासी है। वैसी स्थिति में पृष्ठ संख्या-15, 16 एवं 17 के अधोभाग का पीठ पृष्ठ संख्या-84, 85 एवं 86 होता है परन्तु उसे बदलने का आरोप नहीं लगाया गया है। मूल आरोप पत्र प्रपत्र 'क' के अनुसार माप पुस्त सेख्या-163 के पृष्ठ संख्या-15 से 17 को गायब कर उसके पृष्ठ 67-77 में तृतीय एवं अन्तिम विपत्र बनाया गया, को संचालन पदाधिकारी द्वारा पूर्णतः गलत पाया गया है। मूल आरोप पत्र प्रपत्र 'क' ''मापी पुस्त संख्या-163 के पृष्ठ-15 से 17 को गायब कर उसके पृष्ठ 66-77 में तृतीय एवं अन्तिम विपत्र बनाया गया'' जबकि असहमति के बिन्दु-3 में आरोप है कि '' मापी पुस्त संख्या-163 के पृष्ठ-15 से 17 में NIL विपत्र समर्पित किया गया था।'' इस प्रकार मूल आरोप में बदलाव कर इस बिन्दु-3 में एक नया आरोप लगाया गया है जो नियम के अनुरूप नही है। सम्वेदक द्वारा दायर CWJC संख्या-1948/95 में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 27.05.1995 को पारित न्याय निर्णय में पृष्ठ-15 पर कोई टिप्पणी अंकित नहीं थी किन्तु विभाग द्वारा दायर प्रतिशपथ पत्र में पृष्ठ-15 पर टिप्पणी अंकित थी जिससे स्पष्ट है कि कार्यालय के किसी कर्मचारी द्वारा टिप्पणी अंकित की गई है जिस हेतु माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित न्यायादेश में चेतावनी दी गई थी। लोक निर्माण संहिता के अनुसार मापी पुस्त पर मापी या टिप्पणी अंकित करने का अधिकार कनीय अभियंता, सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को ही है परन्तु किसी कर्मचारी द्वारा अंकित टिप्पणी कोे विभाग द्वारा असहमति का बिन्दु-3 बनाया जाना पूर्णतः जाली, फर्जी एंव झूठा है।
श्री सिंह द्वारा असहमति के बिन्दु-3 के संबंध में समर्पित प्रत्युार की समीक्षा में पाया गया कि उनके द्वारा जबाब में यह कहना कि असहमति का यह बिन्दु विरोधाभासी है, औचित्यहीन है क्योंकि माप पुस्त संख्या-163 के पृष्ठ 15-17 को फाड़कर बदलने के बाद बदले गए पृष्ठ संख्या-15 पर ही कार्यालय द्वारा टिप्पणी अंकित की गई है। उनके प्रत्युार में पृष्ठ-84, 85 एवं 86 को बदलने का कोई आरोप नहीं लगाने संबंधी नई बातें उठायी गई है जिसका विषय वस्तु से कोई संबंध नहीं है। उक्त पेज सादा रहने के फलस्वरूप इनका जिक्र आरोप में नहीं किया गया। मापी पुस्त संख्या-163 के पृष्ठ 15-17 को गायब कर उसके पृष्ठ 67 से 77 तक में तृतीय एवं अन्तिम विपत्र बनाया गया, को लिपिकीय भूल माना जा सकता है। वस्तुतः मापी पुस्त संख्या-163 के पृष्ठ 15-17 को गायब कर माप पुस्त संख्या-216 के पृष्ठ 65-77 अंकित होना चाहिए था। इससे यह भी स्पष्ट है कि मूल आरोप एवं असहमति के बिन्दु के मूल तथ्य में कोई बदलाव नहीं किया गया है। श्री सिंह द्वारा माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित न्याय निर्णय का हवाला दिए जाने के संबंध में यह स्पष्ट है कि प्रतिशपथ पत्र के माध्यम से विभागीय स्तर पर वास्तविक तथ्य से माननीय उच्च न्यायालय को अवगत कराया गया था। श्री सिंह का यह कहना कि माप पुस्त पर मापी या टिप्पणी अंकित करने का अधिकार केवल कनीय अभियंता, सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को ही है, को स्वीकार किया जा सकता है। उक्त अवधि में श्री सिंह स्वयं उसी प्रमण्डल के अधीन पदस्थापित रहे हैं। अतः अंकित टिप्पणी के संन्दर्भ में इन्हे भी पूर्ण जानकारी होगी परन्तु इनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के क्रम में कभी भी स्पष्ट नहीं किया गया कि उक्त टिप्पणी किस पदाधिकारी द्वारा अंकित की गई। असहमति के बिन्दु के संबंध में आरोपित पदाधिकारी श्री विक्रमा सिंह द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युत्तर से उनके विरूद्व निर्धारित आरोपों का प्रतिवाद नहीं हो पाया। अतः स्थापित आरोपों के लिए पूर्व में विभागीय अधिसूचना सं0-327 दिनांक 27.03.02 द्वारा आरोपित दण्ड ''सेवा से बर्खास्तगी'' को विभागीय अधिसूचना सं0-1345 दिनांक 11.11.13 द्वारा यथावत् रखते हुए उन्हें संसूचित किया गया हैः-
उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्व श्री सिंह द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन प्रस्तुत किया गया जिसमें उनके द्वारा मुख्य रूप से निम्न तथ्य दिया गयाः-
1. संवेदक द्वारा कराए गए कार्य का 4.98 लाख रूपए के विपत्र को बोगस करार दिया गया था जिसे Arbitrator एवं माननीय उच्च न्यायालय, पटना तथा माननीय उच्चतम न्यायालय, दिल्ली द्वारा सही पाए जाने की सम्पुष्टि की गई है। जल संसाधन विभाग द्वारा माननीय उच्च न्यायालय के पारित न्याय निर्णय के आलोक में संतुष्ट होकर 4.98 लाख रूपए विपत्र को सूद सहित लगभग 36 (छतीस) लाख रूपए का भुगतान किया गया है। 2. श्री सिंह द्वारा दायर रिट याचिका सं0-सी0 डब्जू0 जे0 सी0 सं0-10363/02 में माननीय उच्च न्यायालय, पटना के पारित न्याय निर्णय दिनांक 26.02.09 में बर्खासतगी आदेश को निरस्त कर दिया गया है।
3. विभाग द्वारा दायर एल0 पी0 ए0 सं0-755/09 में माननीय उच्च न्यायालय, पटना के खण्ड पीठ द्वारा पारित न्याय निर्णय दिनांक 14.08.12 में विभागीय बर्खास्तगी आदेश को निरस्त करने के आदेश को बरकरार रखते हुए5 (cid:23)बहार गजट (असाधारण), 11 [(cid:10)%ल 2016 पुनः विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा जॅाच कराने और जॅाच प्रतिवेदन के आधार पर दो महीने के अन्तर्गत आदेश पारित करने को कहा गया था।
4. विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी के जॅाच प्रतिवेदन दिनांक 14.12.12 में लगाया गया आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया।
5. विभाग द्वारा दिनांक 05.01.13 को संचालन पदाधिकारी को अपने जॅाच प्रतिवेदन को मूल माप पुस्त के आधार पर पुनर्परीक्षण करने के लिए निदेशित किया गया। गहन निरीक्षणोपरान्त संचालन पदाधिकारी द्वारा स्थिति में कोई परिवर्तन या अतिरिक्त सूचना प्राप्त नहीं होने का प्रतिवेदन दिनांक 03.06.13 को विभाग को समर्पित कर दिया गया।
6. विभाग द्वारा दायर आपराधिक डिहरी थाना काण्ड सं0-302/95 में व्यवहार न्यायालय, डिहरी के पारित न्याय निर्णय में सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया है।
श्री सिंह से प्राप्त पुनर्विचार अभ्यावेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में यह पाया गया कि उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान दिए गए बचाव बयान को ही पुनर्विचार अभ्यावेदन में दुहराया गया है। उनके द्वारा एकमात्र नया तथ्य यह दिया गया है कि उनके विरूद्व दर्ज जिस डिहरी थाना काण्ड सं0-302/95 के लिए विभागीय कार्यवाही चलाई गई थी उसमें उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त उनके द्वारा कोई ऐसा तथ्य अथवा साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिसके आधार पर उनके विरूद्व प्रमाणित आरोपों का प्रतिवाद हो सके। जहॅा तक डिहरी थाना काण्ड सं0-302/95 में व्यवहार न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने का प्रश्न है तो उक्त तथ्य विचारणीय बिन्दु के अधीन नहीं आता है क्योंकि विभागीय कार्यवाही एवं न्यायालय में विचारित मामला एक दूसरे से स्वतंत्र है। चूॅकि श्री सिंह को प्रमाणित आरोप के आधार पर सेवा से बर्खास्त किया गया है एवं उनके द्वारा प्रस्तुत पुनर्विचार अभ्यावेदन में कोई मेरिट नहीं है। अतएव सम्यक समीक्षोपरान्त श्री विक्रमा सिंह के विरूद्व विभागीय अधिसूचना सं0-1345 दिनांक 11.11.13 द्वारा संसूचित दण्ड को यथावत रखते हुए पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत करने का निर्णय सरकार के स्तर से लिया गया है।
उक्त निर्णय के आलोक में श्री विक्रमा सिंह, बर्खास्त सहायक अभियंता को विभागीय अधिसूचना सं0-1345 दिनांक 11.11.13 द्वारा संसूचित दण्ड को यथावत रखते हुए उनके पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत किया जाता है। उक्त निर्णय श्री विक्रमा सिंह, बर्खास्त सहायक अभियंता को संसूचित किया जाता है।
बिहार-राज्यपाल के आदेश से, सतीश चन्द्र झा, सरकार के अपर सचिव।
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