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Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 11 January 2017

Published 11 January 2017

Type
Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2017-01-11.2
Languages
English, Hindi

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(cid:1)नबंधन सं(cid:8)या पी0ट(cid:15)0-40

ॢबह(cid:4)र गजट

ॢबह(cid:4)र सरक(cid:4)र ह(cid:4)र(cid:4) (cid:13)क(cid:4)०शत 21 पौष 1938 (श0) सं(cid:8)या 2 पटना, बुधवार, ———————— 11 जनवर(cid:15) 2017 (ई0) #वषय-सूची पृ'ठ भाग-1—(cid:1)नयुि,त, पद/थापन, बदल(cid:15), शि,त, छु 3ी और अ6य 7यि,तगत सूचनाएं। 2-3 भाग-1-क—/वयंसेवक गु<म> के समादे'टाओं के आदेश।

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भाग-1-ख—मैC(cid:15)कु लेशन, आई0ए0, आई0एससी0, बी0ए0, बी0एससी0, एम0ए0, एम0एससी0, लॉ भाग-1 और 2, एम0बी0बी0एस0, बी0एस0ई0, डीप0-इन- एड0, एम0एस0 और मु(cid:8)तार(cid:15) पर(cid:15)Gाओं के पर(cid:15)Gा-फल, कायIJम, छाKवृिLत Mदान, आNद।

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भाग-1-ग—OशGा संबंधी सूचनाएं, पर(cid:15)Gाफल आNद ---

भाग-2—Pबहार-राRयपाल और कायाISयG> Tवारा (cid:1)नकाले गये #व(cid:1)नयम, आदेश, अUधसूचनाएं और (cid:1)नयम आNद। 4-5 भाग-3—भारत सरकार, पिVचम बंगाल सरकार और उXच 6यायालय के आदेश, अUधसूचनाएं और (cid:1)नयम, 'भारत गजट' और राRय गजट> के उZरण। ---

भाग-4—Pबहार अUध(cid:1)नयम ---

पृ'ठ भाग-5—Pबहार #वधान मंडल म] पुर:/था#पत #वधेयक, उ,त #वधान मंडल म] उप/था#पत या उप/था#पत _कये जानेवाले Mवर सOम(cid:1)तय> के M(cid:1)तवेदन और उ,त #वधान मंडल म] पुर:/थापन के पूवI MकाOशत #वधेयक। ---

भाग-7—संसद के अUध(cid:1)नयम िजनपर रा'Cप(cid:1)त क` Rये'ठ अनुम(cid:1)त Oमल चुक` है। ---

भाग-8—भारत क` संसद म] पुर:/था#पत #वधेयक, संसद म] उप/था#पत Mवर सOम(cid:1)तय> के M(cid:1)तवेदन और संसद म] उप/था#पत Mवर सOम(cid:1)तय> के M(cid:1)तवेदन और संसद म] पुर:/थापन के पूवI MकाOशत #वधेयक। ---

भाग-9—#वaापन

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भाग-9-क—वन #वभाग क` नीलामी संबंधी सूचनाएं ---

भाग-9-ख—(cid:1)न#वदा सूचनाएं, पbरवहन सूचनाएं, 6यायालय सूचनाएं और सवIसाधारण सूचनाएं इLयाNद। 6-6

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पूरक

पूरक-क 7-362 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

भ(cid:2)ग(cid:4)1

०नय१ॢफ(cid:12) पद(cid:16)थ(cid:2)पन(cid:12) बदल(cid:20)(cid:12) शॢफ(cid:12) छ१Ñट(cid:20) jर [(cid:28)य व(cid:30)यॢफक स३चन(cid:2)e $

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पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग

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अधिसूचना

29 दिसम्बर 2016

सं॰ 6 एस॰एस॰(11)02/16-3973—बिहार गजट के असाधारण अंक में प्रकाशित अधिसूचना संख्या-699 दिनांक 29 अगस्त, 2016 द्वारा अधिसूचित बिहार विधान मण्डल द्वारा यथापारित अधिनियम ''बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय विधेयक 2016'' के नियम-23 (2) के आलोक में प्रो॰ (डा॰) अनिल कुमार श्रीवास्तव, सम्प्रति निदेशक, राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा को बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति के रूप में अगले आदेश तक के लिए नियुक्त किया जाता है।

2. प्रस्ताव में माननीय मुख्यमंत्री, बिहार का अनुमोदन प्राप्त है। 3. प्रो॰ (डा॰) श्रीवास्तव को विश्वविद्यालय एक्ट के तहत अनुमान्य सुविधाएँ प्राप्त होगी। 4. यह अधिसूचना प्रो॰ (डा॰) श्रीवास्तव के द्वारा कुलपति के रूप में योगदान करने की तिथि से प्रभावी होगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, डा॰ एन॰ विजयलक्ष्मी, सचिव।

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जल संसाधन विभाग

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अधिसूचना

27 दिसम्बर 2016

सं॰ 5/ पी॰ (याँ॰) 3-10-104/2012-3218—विभागीय प्रोन्नति समिति की दिनांक- 28.11.2016 को संपन्न बैठक में की गयी अनुशंसा के आलोक में निम्न सहायक अभियंता (याँत्रिक) को कार्यपालक अभियंता (याँत्रिक) के पद पर वेतनमान पी.बी.-3 (रूपये 15,600-39,100) ग्रेड वेतन- 6600 रूपये में निम्नरूपेण नियमित प्रोन्नति प्रदान की जाती हैः-

क्र॰ नाम/आई.डी.कोड/गृह जिला वरीयता क्रमांक श्रेणी अभ्युक्ति
1. श्री सुरेश प्रसाद यादव /एम॰-668/खगड़िया 459/2008 अनारक्षित अधिसूचना निर्गत की तिथि से

2. प्रोन्नत पदाधिकारी के प्रोन्नति के फलस्वरूप वेतन, भत्ते आदि का भुगतान नियमित प्रोन्नति के पश्चात उनके द्वारा कार्यपालक अभियंता (याँत्रिक) के पद का पदभार-ग्रहण की तिथि से देय होगा।

3. इस आदेश से नियमित प्रोन्नति पाने वाले किसी भी अभियंता के संबंध में भविष्य में अर्हत्ता को प्रभावित करने वाले किसी भी प्रकार की त्रुटि पाये जाने पर संबंधित अभियंता को प्रदत्त नियमित प्रोन्नति के आदेश को रद्द/संशोधित कर दिया जायेगा तथा उन्हें भुगतान की गई राशि की वसूली कर ली जायेगी।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजय कुमार शर्मा, संयुक्त सचिव (प्र॰)।

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पर्यटन विभाग

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अधिसूचना

29 दिसम्बर 2016

सं॰ टी॰सी॰-09/91-3445/प॰वि॰—पर्यटन विभाग, बिहार सरकार के द्वारा बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम, पटना (बिहार सरकार एक उपक्रम) के आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन की धारा -61 में प्रदा शक्तियों के अन्तर्गत महामहिम राज्यपाल, बिहार के आदेशानुसार विभागीय अधिसूचना संख्या 1568 दिनांक 17.05.16 को आंशिक रूप से संशोधित करते हुए अगले आदेश तक बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम, पटना के निदेशक मंडल का गठन निम्नवत्‌ किया जाता हैः-3 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

क्रमांक  नाम/पदनाम पद
1. प्रधान सचिव/सचिव, पर्यटन विभाग। अध्यक्ष
2. प्रबन्ध निदेशक, बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड, पटना। सदस्य सचिव
3. निदेशक, पर्यटन निदेशालय, बिहार, पटना। सदस्य
4. अपर सचिव-सह-आंतरिक विाीय सलाहकार, पर्यटन विभाग, बिहार, पटना। निदेशक
5. संयुक्त सचिव, पर्यटन विभाग, बिहार, पटना। निदेशक
6. प्राचार्य, होटल प्रबन्धन संस्थान, हाजीपुर सदस्य
7. श्री एस॰पी॰ सिन्हा, प्रबन्ध निदेशक, बिहार होटल लिमिटेड, दक्षिण गाँधी मैदान, मौर्या होटल परिसर, पटना। सदस्य
8. श्रीमती महाश्वेता महारथी, महासचिव, राजगीर बुद्ध विहार सोसाईटी, वीरचन्द पटेल पथ, पटना। सदस्य

बिहार राज्यपाल के आदेष से, (ह॰) अस्पष्ट, प्रधान सचिव।

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स्वास्थ्य विभाग

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अधिसूचना

27 दिसम्बर 2016

सं0 17/एफ-01 -07/2015-878(17)—अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्‌ (अभातशिप) के मापदण्ड के आलोक में राजकीय फॉर्मेसी संस्थान, अगमकुआँ, पटना-07 में कुल सृजित एवं स्वीकृत शैक्षणिक पदों को चार कोर (मुख्य) शाखा में विभागवार वितरण का मामला सरकार के विचाराधीन था।

अभातशिप एवं पी0सी0आई के डी0 फार्मा तथा बी0फार्मा पाठ्‌यक्रम के लिए छात्रों की संख्या के आधार पर विा विभाग के संकल्प संख्या-6669 दिनांक-27.07.2015 एवं स्वास्थ्य विभागीय पत्रांक-61(17) दिनांक-27.01.2016 के आलोक में राजकीय फॉर्मेसी संस्थान, अगमकुआँ, पटना-07 में कुल 28 (अट्‌ठाईस) सृजित एवं स्वीकृत शैक्षणिक पदों को चार मुख्य (कोर) शाखाओं में नये पदनाम सहित निम्न रूप से विभागवार अधिसूचित किया जाता है :-

क्र0 सं0 विभाग प्राध्यापक सह प्राध्यापक सहायक प्राध्यापक
01. फार्मास्यूटिक्स 01 01 07
02. फार्मास्यूटिकल केमिस्ट्री फार्मास्यूटिकल एनालिसिस सहित 01 01 06 02
03. फार्माकोलॉजी 01 01 03
04. फार्माकोग्नोसी 01 01 02
कुल - 04 04 20

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, शेखर चन्द्र वर्मा, संयुक्त सचिव।

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[ध&¡क(cid:12) स०चव(cid:2)लय म१)ण(cid:2)लय(cid:12)

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ॢबह(cid:2)र गजट(cid:12) 43-571+10(cid:4)ड&4ट(cid:20)4प&4?

Website: http://egazette.bih.nic.in

4 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

भ(cid:2)ग(cid:4)2

ॢबह(cid:2)र(cid:4)र(cid:2)Îयप(cid:2)ल jर क(cid:2)य(cid:2)Z8य¡9 ह(cid:2)र(cid:2) ०नक(cid:2)ल: गय: ॢव०नयम(cid:12) \द:श(cid:12) [०धस३चन(cid:2)e $ jर ०नयम \ॢद?

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जल संसाधन विभाग

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(शुद्धि-(शुद्धि-(शुद्धि-(शुद्धि-पत्र)पत्र)पत्र)पत्र)

9 नवम्बर 2016

सं॰ 22/नि0 सि0 (पट0)-03-12/2014/2397—श्री अंबिका प्रसाद, तत्कालीन सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमण्डल सं0-3, खगौल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरुद्ध विभागीय अधिसूचना सं0- 2215 दिनांक 06.10.16 द्वारा ''20 (बीस) प्रतिशत पेंशन पर सदा के लिए रोक का दण्ड'' संसूचित है।

उक्त अधिसूचना की समीक्षा कंडिका (2) में अंकित है कि ''आरोप संख्या-2 के संबंध में संचालन पदाधिकारी द्वारा उच्चाधिकारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं करने एवं उदंडतापूर्वक व्यवहार करने का आरोप प्रमाणित पाया गया है। श्री प्रसाद के प्रत्युत्तर एवं संचालन पदाधिकारी के मंतव्य के आलोक में उच्चाधिकारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं करने एवं उदंडतापूर्वक व्यवहार करने का आरोप प्रमाणित है।''

इसके अतिरिक्त कंडिका उक्त कंडिका में निम्न तथ्य भी पढ़ा जाय। ''मार्च, 2011 से जून, 2013 के बीच भिन्न भिन्न माहों में स्वेच्छापूर्वक अनुपस्थित रहने एवं अवकाश उपभोग के पश्चात योगदान नहीं देने संबंधी आरोप अप्रमाणित पाया गया है।''

शेष यथावत रहेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, उप-सचिव।

——— मुख्य अभियंता का कार्यालय श्सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग ,सिवान। ——— कार्यालय आदेशकार्यालय आदेशकार्यालय आदेशकार्यालय आदेश 1 दिसम्बर 20161 दिसम्बर 20161 दिसम्बर 20161 दिसम्बर 2016

सं0 1स्था0अनु0-12-104/2014-51515151//ि/ि/िसिवान—समाहर्ता सह अध्यक्ष जिला अनुकंपा समिति गोपालगंज गोपालगंज गोपालगंज गोपालगंज .के पत्रांक 438/स्था0- दिनांक438/स्था0- दिनांक438/स्था0- दिनांक438/स्था0- दिनांक 31313131....03030303....2016 2016 2016 2016 द्वारा जिला स्तर पर गठित अनुकंपा समिति गगगगोपालगंजोपालगंजोपालगंजोपालगंज की दिनांक 10101010....02020202....2016201620162016 की बैठक में लिये गये निर्णय के आलोक में श्री तनवीर आलम, पिता स्व0 नसरूद्‌दीन अहमद, भूतपूर्व अनुसेवक, सारण नहर प्रमंडल, श्री तनवीर आलम, पिता स्व0 नसरूद्‌दीन अहमद, भूतपूर्व अनुसेवक, सारण नहर प्रमंडल, श्री तनवीर आलम, पिता स्व0 नसरूद्‌दीन अहमद, भूतपूर्व अनुसेवक, सारण नहर प्रमंडल, श्री तनवीर आलम, पिता स्व0 नसरूद्‌दीन अहमद, भूतपूर्व अनुसेवक, सारण नहर प्रमंडल, 5200-20200 ग्रेड पें-1900 रूपये एवं समय-समय पर सरकार द्वारा गोपालगंज गोपालगंज गोपालगंज गोपालगंज की अनुकंपा के आधार पर वेतनमान 5200-20200 ग्रेड पें-1900 रूपये 5200-20200 ग्रेड पें-1900 रूपये 5200-20200 ग्रेड पें-1900 रूपये स्वीकृत भत्ते सहित निम्नवर्गीय लिपिक निम्नवर्गीय लिपिक निम्नवर्गीय लिपिक निम्नवर्गीय लिपिक के पद पर नियुक्त किया जाता है। उन्हें आदेश दिया जाता है कि वे अपना योगदान, कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमंडल, सिवान कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमंडल, सिवान के कार्यालय में दिनांक 29292929....12121212....2016201620162016 तक निश्चित रूप से दें दें कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमंडल, सिवान कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमंडल, सिवान अन्यथा उनकी नियुक्ति रद्‌द समझी जायेगी। यह नियुक्ति पूर्णतः अस्थाई है।

2. अगर इनके नियुक्ति के पूर्व से नियुक्ति के लिए संबंधित पदाधिकारी के अधीन कोई सूची तैयार की गई हो तो उनकी वरीयता उक्त सूची में अंकित व्यक्तियों के बाद होगी।

3. स्व0 नसरूद्‌दीन अहमद स्व0 नसरूद्‌दीन अहमद स्व0 नसरूद्‌दीन अहमद स्व0 नसरूद्‌दीन अहमद के आश्रित परिवार के सदस्यों का भरण-पोषण का दायित्व श्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलम पर होगी। उत्तरदायित्व का निर्वाह पूरी तत्परता के साथ नहीं करने पर गंभीर कदाचार माना जायेगा। इसके लिए उनके विरूद्ध नियमानुसार कार्रवाई भी की जायेगी। इसके अलावा दायित्व की अवहेलना की संपुष्टि होने पर उनकी परिलब्धियों को एक अंश सरकारी सेवक के आश्रित सदस्यों को देने का आदेश सरकार दे सकती हे।

4. नियुक्त पद पर योगदान करते समय उन्हें जिला सिवानसिवानसिवानसिवान के असैनिक शैल्य चिकित्सक का स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र हर हालत में प्रस्तुत करना होगा।

5. अगर श्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलम की नियुक्ति आरक्षित कोटा से रोस्टर पर हुई हो तो उक्त आरक्षित कोटा के पद को अग्रणित कर दिया जायेगा।5 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 6. योगदान करने हेतु किसी प्रकार का यात्रा भत्ता किसी भी परिस्थिति में देय नहीं होगी। 7. किसी तरह की गलत सूचना अथवा धोखाधड़ी के आधार पर नियुक्ति प्राप्त कर लेने पर उन्हें सेवा से विमुक्त कर दिया जायेगा तथा समुचित कार्रवाई नियमानुसार की जायेगी।

8 अनुकंपा के आधार पर किसी पद पर नियुक्त होने पर उन्हें अनुकम्पा का दोबारा लाभ लेते हुए प्रोन्नति अथवा संवर्ग परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा।

9. नियुक्त पद पर योगदान करते समय उन्हें अपनी शैक्षणिक योग्यता का मूल प्रमाण-पत्र एवं वास्तविक जन्म तिथि से संबंधित प्रमाण-पत्र मूल में संबंधित पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। जिसकी जॉच कर संतुष्ट होकर उनके द्वारा इनका योगदान स्वीकृत किया जायेगा तथा इसकी सूचना तुरंत अधोहस्ताक्षरी को दी जायेगी।

10. योगदान लेने के साथ ही संबंधित पदाधिकारी श्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलमश्री तनवीर आलम से भरण पोषण पत्र एवं विवाह में तिलक दहेज नहीं लेने देने का प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लेंगे।

11. उप-सचिव , वित्त विभाग के पत्र संख्या 1964 दिनांक 31.8.2005 के अनुसार दिनांक 01.09.2005 एवं उसके बाद नियुक्त राज्यकर्मियों के लिए अंशदायी पेंशन योजना लागू होगा ।

आदेश से (ह॰) अस्पष्ट, मुख्य अभियंता।

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[ध&¡क(cid:12) स०चव(cid:2)लय म१)ण(cid:2)लय(cid:12)

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Website: http://egazette.bih.nic.in

6 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

भाग-9(ख)

और सवIसाधारण सूचनाएं इLयाNद।

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सूचना ——

No. 1460—I, SHASHWAT s/o Brijendra Kumar Rai R/o 991 P.S + P.O Narhi Dist. Ballia UP vide Affidavit No. 7391 Date 02.11.16 shall be known as Shashwat Rai for all future purposes.

SHASHWAT.

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[ध&¡क(cid:12) स०चव(cid:2)लय म१)ण(cid:2)लय(cid:12)

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Website: http://egazette.bih.nic.in

7 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

ॢबह(cid:4)र गजट

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प३रक(cid:13)[(cid:15)(cid:16) (cid:17)(cid:4)०धक(cid:4)र(cid:20) ह(cid:4)र(cid:4) (cid:17)क(cid:4)०शत

—————

जल संसाधन विभाग ——— अधिसूचनाएअधिसूचनाएअधिसूचनाएअधिसूचनाएं ं ं ं 27 दिसम्बर27 दिसम्बर27 दिसम्बर27 दिसम्बर 2016201620162016

सं0 22/नि0सि0(पट0)-03-17/2016/2650—श्री विवेक गौरव, सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनेटरिंग अंचल, पटना, द्वारा बोल्डर भंडारण/बोल्डर के हस्तानान्तरण/बाढ़ 2016 हेतु अतिआक्राम्य स्थलों पर बी0ए0 वायर क्रेट रखने संबंधित अति महत्वपूर्ण पत्रों का समय पर संबंधित मुख्य अभियंता को उपलब्ध नहीं कराने के लिए प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए अभियंता प्रमुख, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक 293 दिनांक 29.06.16 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया। तदुपरान्त आपसे प्राप्त स्पष्टीकरण दिनांक 04.07.16 में निम्न बातें कही गयी है :-

''मेरे पटल द्वारा बाढ़ परिक्षेत्रों के लिए आवश्यक बाढ़ संधर्षात्मक सामग्रियों की आपूर्ति की संचिकाओं का संधारण, टिप्पणी तथा अग्रेतर कार्रवाई हेतु उपस्थापन किया जाना है एवं बाढ़ संधर्षात्मक सामग्रियों के आन्तरिक हस्तान्तरण के मामलों का निष्पादन/ कार्यान्वयन संबंधित परिक्षेत्रों के प्रभारी प्रबोधको द्वारा किया जाना पूर्व निर्धारित है। मेरे त्वरित अनुपालनार्थ संचिका अधीक्षण अभियंता महोदय से निष्पादित कराते हुए अभियंता प्रमुख, (बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण) महोदय से हाथाें हाथ निष्पादनोपरान्त प्रधान सचिव महोदय के अनुमोदन हेतु संचिका पुनः भवदीय को उपलब्ध कराया गया। प्रधान सचिव महोदय के अनुमोदनोपरान्त अधीक्षण अभियंता महोदय से संचिका पुनः प्राप्त कर हाथों हाथ अभियंता प्रमुख महोदय के निर्देशानुसार प्रारूप में आवश्यक सुधार कर सभी संबंधित पत्रों पर अभियंता प्रमुख के हस्ताक्षरोपरान्त अधीक्षण अभियंता को संचिका हस्तगत कराया। इसी क्रम में अधीक्षण अभियंता द्वारा मौखिक निर्देश दिया गया कि पत्रों के निर्गतोपरान्त सभी पत्रों के साथ अंचलीय कार्यालय के नर्गत शाखा में हस्तगत कराते हुए निर्देश दिया कि पत्र तुरन्त निर्गत कर ई-मेल/फैक्स शाखा को दी जाए तथा संचिका अविलम्ब मुझे वापस उपलब्ध कराई जाए ताकि मेरे द्वारा भी व्यक्तिगत रूप से पत्रों को ई-मेल किया जा सके। जहॉ तक दिनांक 07.06.16 को भवदीय रात्रि 8.10 बजे तक कार्यालय में उपस्थित रहने तथा मेरे द्वारा पत्र भेजे जाने से संबंधित जानकारी से अवगत नहीं कराने का प्रश्न है, के संबंध में स्पष्ट करना है कि पत्र का निर्गत तदुपरान्त ई-मेल/फैक्स शाखा में प्राप्ति कराने की निर्धारित प्रक्रिया का संबंधित कर्मियों द्वारा अनुपालन लंबित रखे जाने अथवा ई-मेल/फैक्स प्रशाखा द्वारा इसे ससमय ई-मेल/फैक्स किए जाने में विलम्ब का जरा सा भी आभास यदि मुझे होता तो मैं तत्क्षण इस आशय की जानकारी भवदीय को अवश्य देता परन्तु निर्गत शाखा द्वारा हुए विलम्ब की मुझे कोई जानकारी नहीं दी गयी।

उक्त के आलोक में समीक्षा की गयी जिसमें पाया गया कि संचिका के निष्पादन के उपरान्त इन्हें पत्रो को संबंधित मुख्य अभियंता को ई-मेल/फैक्स के माध्यम से भिजवाने का निदेश दिया गया था जिसमें विलम्ब हुआ जिसके लिए समीक्षोपरान्त श्री विवेक गौरव, सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनेटरिंग अंचल, पटना को विभागीय अधिसूचना सं0-1963 दिनांक 06.09.16 द्वारा चेतावनी संसूचित करते हुए निम्न दण्ड अधिरोपित किया गया :-

''एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक''। उक्त दण्डादेश के विरूद्ध भी गौरव द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया।8 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 श्री गौरव द्वारा समर्पित पुनर्विलाकन अर्जी की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी। सम्यक समीक्षोपरान्त पाया गया किः- आरोपी पदाधिकारी श्री गौरव द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी में उन्हीं बातों का उल्लेख किया है जो उनके द्वारा पूर्व में स्पष्टीकरण के रूप में दिया गया था। अतः पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए श्री गौरव के विरूद्ध पूर्व में अधिरोपित दण्डादेश अधिसूचना सं0 1963 दिनांक 06.09.16 को बरकरार रखने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय श्री विवेक गौरव, सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनेटरिंग अंचल, पटना को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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27 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (अभि0)-पू0-21-04/2010/2651—श्री लक्ष्मण राम, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, नहर अंचल, पूर्णियाँ के विरूद्ध मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ परिक्षेत्राधीन सिंचाई प्रमण्डल, नरपतगंज के अन्तर्गत एकरानामा सं0 25F2/2000-01 एवं 29F2/2000-01 के तहत श्री किशोर कुमार जायसवाल, संवेदक के द्वारा सम्पादित कराये गये कार्यों के विरूद्ध विभागीय पत्रांक 353 दिनांक 03.03.01 के आलोक में 40% राशि का भुगतान किया गया। शेष लंबित राशि के भुगतान हेतु समय-समय पर विभाग से आवंटन की माँग की गयी एवं 8 वर्षों के बाद लंबित भुगतान हेतु दायित्व समिति का गठन किया गया, जिसके आप अध्यक्ष/सदस्य थे, परन्तु दायित्व समिति की बैठक में कलभर्ट के गुणवत्ता की जाँच नहीं किया गया, का झूठा प्रतिवेदन अपने उच्चाधिकारियों एवं माननीय उच्च न्यायालय को देते हुए दावे को अमान्य कर दिया, साथ ही संवेदक को करीब 8 वर्षों की लम्बी अवधि तक उनके द्वारा किये गये कार्यों के लंबित भुगतान को नहीं कर संवेदक को मानसिक एवं आर्थिक रूप से हानि पहुँचाने एवं अपने पद का दुरूपयोग करते हुए कर्त्तव्य का पालन नहीं करने के आरोप के लिए विभागीय संकल्प 317 दिनांक 16.03.11 के द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विहित रीति से विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालन के लिए विभागीय जाँच आयुक्त को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँचोपरान्त जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया जिसमें उन्होंने उपर्युक्त आरोप के प्रथम अंश दायित्व समिति के सदस्य के रूप में दिनांक 29.12.08, 30.12.08 20.03.09 एवं 06.04.09 को हुई बैठक में संवेदक के कार्यों को अपूर्ण माने जाने, संवेदक के द्वारा कार्यों को ससमय पूरा नहीं किये जाने के कारण उड़नदस्ता संगठन से जाँच नहीं किये जाने के कारण संवेदक के दावे को अमान्य करते हुए विभाग को निर्णय लेने हेतु भेजे जाने वाले कार्यवाही प्रतिवेदन पर सदस्य के रूप में हस्ताक्षर अंकित होने के फलस्वरूप आरोप प्रमाणित पाया गया तथा उक्त आरोप के द्वितीय अंश संवेदक को करीब 8 वर्षों की लम्बी अविध तक उनके द्वारा किये गये कार्यों के लंबित भुगतान को नहीं कर संवेदक को मानसित एवं आर्थिक रूप से हानि पहुँचाने का आरोप प्रमाणित पाया गया।

श्री राम के विरूद्ध लगाये गये आरोप के द्वितीय अंश संवेदक को करीब 8 वर्षों की लम्बी अवधि तक उनके द्वारा किये गये कार्यों के लंबित भुगतान को नहीं कर संवेदक को मानसित एवं आर्थिक रूप से हानि पहुँचाने का आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया।

श्री चौधरी के विरूद्ध उपरोक्त प्रमाणित आरोप के लिए संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन देते हुए विभागीय पत्रांक 2117 दिनांक 17.09.15 द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा की गयी। श्री राम से प्राप्त द्वितीय कारणपृच्छा की समीक्षा उच्च स्तर पर की गयी, सम्यक समीक्षोपरान्त श्री राम के विरूद्ध दायित्व समिति के सदस्य के रूप में दायित्व समिति के द्वारा संवेदक के दावे को अमान्य करने के निर्णय लेने के आरोप को प्रमाणित पाया गया।

उपरोक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री लक्ष्मण राम, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, नहर अंचल, पूर्णियाँ को ''दो वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक'' का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय विभाग द्वारा लिया गया है।

उपर्युक्त दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग के पत्रांक 1690 दिनांक 06.09.16 द्वारा सहमति प्राप्त है। आयोग से परामर्श/सहमति प्राप्त हो जाने पर ज्ञात हुआ कि विलम्ब से सहमति प्राप्त होने एवं श्री लक्ष्मण राम की सेवानिवृति की तिथि दिनांक 31.05.18 के कारण श्री लक्ष्मण राम, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता के विरूद्ध पूर्व से प्रस्तावित दण्ड प्रभावी नहीं हो पा रहा है। इसलिए उक्त प्रस्तावित दण्ड पर उच्च स्तर पर पुनः समीक्षा की गयी। समीक्षोपरान्त श्री लक्ष्मण राम, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता को पूर्व से प्रस्तावित दण्ड '' दो वेतनवृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक '' के स्थान पर ''एक वेतनवृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक'' का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया।

सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री लक्ष्मण राम, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, नहर अंचल, पूर्णियाँ को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता हैः-

''एक वेतनवृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।9 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

4 अक्तूबर 20164 अक्तूबर 20164 अक्तूबर 20164 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (दर0)-16-05/2013/2200—श्री राजेन्द्र प्रसाद गौड़ (आई0 डी0-3804), तत्कालीन सहायक अभियन्ता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, सकरी द्वारा अपने उक्त पदस्थापन काल में बरती गई कतिपय अनियमितताओं की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से कराई गई। उड़नदस्ता अंचल द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त लिये गये निर्णय के आलोक में विभागीय पत्रांक 1404 दिनांक 22.06.15 द्वारा श्री गौड़ से स्पष्टीकरण किया गया। श्री गौड़ द्वारा समप्रित स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त श्री गौड़ के विरूद्व प्रतिवेदित आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित पाया गया। फलतः श्री गौड़ के विरूद्व आरोप पत्र प्रपत्र-''क'' गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित किये जाने का निर्णय लिया गया।

उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय संकल्प सह पठित ज्ञापांक 303 दिनांक 18.02.16 द्वारा श्री गौड़ के विरूद्व बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया।

आरोप-पश्चिमी मुख्य नहर के वि0 दू0-143.95 पर स्थानीय ग्रामीणों द्वारा अवैध रूप से नहर काटकर ह्‌यूम पाइप लगाने के पूर्व सूचना रहने के बावजूद वरीय अधिकारियों को सूचना नहीं देने, नहर पर पेट्रोलिंग नहीं करने तथा लापरवाही बरते जाने के लिए दोषी है।

श्री गौड़ का बचाव बयानः- श्री गौड़ ने अपने बचाव बयान में स्पष्ट किया कि उन्हें नहर काटे जाने की सूचना दिनांक 28.08.15 के लगभग 4.50 बजे पूर्वाह्‌न में कनीय अभियन्ता के माध्यम से प्राप्त हुई। इसकी सूचना तत्काल ही कार्यपालक अभियन्ता एवं अंचलाधिकारी, खजौली को दी गई। श्री गौड़ द्वारा उल्लेख किया गया कि उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन में इनके विरूद्व गठित आरोप से संबंधित साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया। अनुमंडलीय पुलिस पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में इस आशय के उल्लेख रहने का जिक्र किया कि तटबंध काटने के पूर्व ग्रामीणों द्वारा न तो आवेदन दिया गया था और न ही कोई सूचना दी गई थी।

संचालन पदाधिकारी का मंतव्यः- विभागीय उच्चाधिकारी, संबंधित प्रशासनिक पदाधिकारी एवं पुलिस पदाधिकारियों को आस पास के क्षेत्र में सुखाड़ से उत्पन्न समस्या के कारण नहर में छेड़-छाड़ होने संबंधी संभावनाओं की जानकारी उपलब्ध कराई गई थी। ग्रामीणों द्वारा पुलिस/प्रशासनिक पदाधिकारियों के समक्ष जबरन ह्‌युम पाइप लगाया जाना उनकी आक्रमकता का आभास कराता है। ऐसी स्थिति में असैनिक अभियन्ता द्वारा घटना पर काबु पाकर उन्हें कार्रवाई से रोक पाने में विफलता के लिए लापरवाही का आरोप लगाने का प्रश्न नहीं उठता है।

अतएव आरोपित पदाधिकारी पर पूर्व सूचना नहीं रहने के बावजूद वरीय अधिकारियों को सूचना नहीं देने, पेट्रोलिंग नहीं करने तथा लापरवाही बरतने का आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जॅाच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री गौड़ को आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया।

सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजेन्द्र प्रसाद गौड़ (आई0 डी0-3804), तत्कालीन सहायक अभियन्ता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, सकरी को आरोप मुक्त किया जाता है।

सरकार का उक्त निर्णय श्री गौड़ को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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4 अक्तूबर 20164 अक्तूबर 20164 अक्तूबर 20164 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (औ)-17-05/2007/2201—श्री बादलचन्द्र पान (आई0 डी0 2756), तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक 989 दिनांक 03.12.08 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गईः- आपके अनुसूचित जाति के सदस्य नहीं होने एवं संबंधित प्राप्त कतिपय परिवाद पत्रों के आलोक में विभागीय पत्रांक 1762 दिनांक 26.10.06 द्वारा आपसे स्पष्टीकरण पूछा गया। आपसे प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षोपरान्त उपायुक्त, पाकुड़ से आपकी जाति के संबंध में प्रतिवेदन की माँग की गई।

जिला कल्याण पदाधिकारी, पाकुड़ ने अपने पत्रांक 202 दिनांक 31.03.07 द्वारा प्रतिवेदन दिया कि आप सद्‌गोप जाति के हैं जो अन्य पिछड़ी जाति के अन्तर्गत आता है।

पुनः विभागीय पत्रांक 1011 दिनांक 26.10.07 द्वारा अपर समाहर्त्ता से अन्यून पंक्ति के पदाधिकारी से जॅाच कराकर जाँच प्रतिवेदन उपलब्ध कराने हेतु उपायुक्त, पाकुड़ (झारखण्ड) से अनुरोध किया गया। उपायुक्त, पाकुड़ ने अपने पत्रांक 1200/गो0 दिनांक 04.11.07 द्वारा प्रतिवेदित किया कि अपर समाहर्त्ता स्तर के पदाधिकारी से जाँच कराई गई जिसमें आपकी जाति के संबंध में स्थानीय तौर पर तथा राजस्व अभिलेख से यह स्पष्ट हुआ कि आप 'सद्‌गोप' जाति के हैं जो अन्य पिछडी जाति के अन्तर्गत आता है। पुनः उपायुक्त, पाकुड़ ने अपने पत्रांक 416 दिनांक 29.07.08 द्वारा स्पष्ट किया है कि प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, निदेशक, लेखा प्रशासन एवं स्व नियोजन जिला ग्रामीण विकास अभिकरण, पाकुड़ की जाँच तथा खतियान एवं उसके वंशावली से स्पष्ट हो गया है कि श्री पान 'सद्‌गोप' जाति के हैं जो पिछड़ा वर्ग की अनुसूची-II के अन्तर्गत आते हैं न कि अनुसूचित जति के।10 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 ऊपर से स्पष्ट है कि आप अनुसूचित जाति के सदस्य नहीं हैं परन्तु आपके द्वारा अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रहते हुए भी अनुसूचित जाति के प्रमाण-पत्र के आधार पर आरक्षण का लाभ लेकर अधिदर्शक के पद पर नियुक्ति प्राप्त की गई एवं तत्संबंधी प्रोन्नति का लाभ प्राप्त किया गया। इस प्रकार आप अनुसूचित जाति के प्रमाण-पत्र के आधार पर प्राप्त की गई नियुक्ति एवं प्रोन्नति के लिए प्रथम दृष्टया दोषी हैं।

संचालन पदाधिकारी के समक्ष श्री पान द्वारा अपने बचाव बयान में बताया गया कि जाति प्रमाण पत्र के संबंध में उनके द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, राँची़ (झारखण्ड) में मामला दर्ज कराया गया है जिसके कारण वे जाति प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं। विभागीय कार्यवाही के संचालन के उपरान्त संचालन पदाधिकारी द्वारा इस मंतव्य के साथ जाँच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया कि श्री पान को भरपूर मौका दिए जाने के बावजूद भी वे अपने आपको अनुसूचित जाति का होना प्रमणित नहीे कर सके।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरान्त इससे सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक 2109 दिनांक 17.09.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत श्री पान से द्वितीय कारणपृच्छा की गई।

1. श्री पान द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा के प्रत्युत्तर में मुख्य रूप से बताया गया कि वे दिनांक 31.07.08 को सेवानिवृत हो चुके हैं और इसके बाद विभागीय कार्यवाही चलाई गई है। संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच के दौरान अद्यतन जाति प्रमाण पत्र की माँग की गई जिसके आलोक में कल्याण विभाग के पत्रांक 631 दिनांक 20.03.1969 द्वारा निर्गत जाति प्रमाण पत्र उपलब्ध कराया गया। जब तक इसे निरस्त नहीं किया जाता तब तक कोई दूसरा जाति प्रमाण पत्र निर्गत नहीं हो सकता। उक्त जाति प्रमाण-पत्र सही है जिसके कारण इसे निरस्त नहीं किया गया है। जाँच पदाधिकारी द्वारा अभिलेखों की गहराई से देखे बिना एकतरफा निर्णय लेकर आरोप को प्रमाणित कर दिया गया है।

2. विभागीय कार्यवाही गठन के पूर्व विभाग द्वारा इस संबंध में उपायुक्त, पाकुड़/दुमका से कराए गए जाँच पर प्रश्नचिन्ह्‌ लगाते हुए 'सदगोप' जाति का करार दिए जाने को गलत बताया गया है। परिवादी द्वारा समर्पित राजस्व अभिलेख में कहीं भी 'सदगोप' जाति अंकित नहीं होने की बात बताते हुए कहा गया कि खतिऔनी वर्ष 1928 का बंगला भाषा में है जिसे उनके द्वारा बंगला जानकारों से पढ़ाया गया और वे खुद मैट्रिक तक बंगला भाषा से पठन-पाठन किए हैं। उक्त खतिऔनी में कहीं भी अंकित नहीं है कि उनके पूर्वज सदगोप जाति के थे।

उपायुक्त, पाकुड़ का जाँच प्रतिवेदन विभाग को प्राप्त होने के पश्चात विधि विभाग से राय की गई जिसमें बतलाया गया कि जब तक पूर्व निर्गत जाति प्रमाण-पत्र पत्रांक 631 दिनांक 20.03.1969 को निरस्त नहीं किया जाता है तब तक उपायुक्त, पाकुड़ का जाँच प्रतिवेदन लागू नहीं हो सकता। अभिलेख के अभाव में उनका जाति प्रमाण-पत्र निरस्त नहीं किया गया है क्योंकि यह सर्वथा सही है।

3. श्री पान द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा के प्रत्युत्तर में यह भी कहा गया है कि उनके विरोधियों द्वारा साजिश के तहत उन्हें फँसाया गया ताकि उन्हें प्रोन्नति से वंचित किया जा सके। षड्‌यंत्र के तहत उनके विरूद्ध मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी, पटना न्यायालय में केस सं0 3179/2007 दायर करते हुए सचिवालय थाना में केस सं0 112/2007 दिनांक 01.12.07 में एफ0 आई0 आर0 भी दर्ज हुआ था। उक्त केस में वे निर्दोष साबित हुए हैं।

अन्त में श्री पान द्वारा उपायुक्त, दुमका द्वारा निर्गत जाति प्रमाण-पत्र एवं माननीय न्यायालय से बरी हो जाने के आधार पर आरोप से मुक्त करने का अनुरोध किया गया है।

श्री बादलचन्द्र पान से प्राप्त द्वितीय कारणपृच्छा के प्रत्युत्तर की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में यह पाया गया कि श्री बादलचन्द्र पान, तत्कालीन मुख्य अभियंता, औरंगाबाद सम्प्रति सेवानिवृत (सेवानिवृति की तिथि 31.07.2008) द्वारा अनुसूचित जाति का अनुचित लाभ प्राप्त कर अधिदर्शक के पद पर नियुक्त होने एवं आरक्षण का उत्तरोत्तर लाभ प्राप्त करने के आरोप के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 989 दिनांक 13.12.08 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन मेंं यह प्रतिवेदित किया गया कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में यह प्रतिवेदित किया गया कि आरोपित पदाधिकारी ने माननीय उच्च न्यायालय, राँची में मामला दर्ज कराने का बहाना बनाकर जाति प्रमाण-पत्र उपलब्ध नहीं कराया और भरपूर मौका देने के बावजूद भी श्री पान अपने आपको अनुसूचित जाति का होना प्रमाणित नहीं कर सके।

अतः श्री पान का यह कथन स्वीकार योग्य नहीं है कि जाँच पदाधिकारी द्वारा अभिलेख को गहराई से देखे बिना एकतरफा निर्णय लेकर आरोप को प्रमाणित कर दिया गया है।

श्री पान द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा के प्रत्युत्तर में दिया गया तथ्य इस हद तक सही है कि उनसे संबंधित खतिऔनी वर्ष 1928 का है जो बंगला भाषा में है। साथ ही यह भी सही है कि उपायुक्त, पाकुड़ से जाँच प्रतिवेदन प्राप्त होने के बाद विधि विभाग से प्राप्त परामर्श में यह कहा गया है कि राजस्व अभिलेख का देवनागरी लिपि में अनुवाद कराने के बाद ही कार्रवाई की जाय। इसके साथ ही कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभााग सम्प्रति सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना द्वारा पूर्व निर्गत जाति प्रमाण-पत्र को निरस्त होने के उपरान्त कार्रवाई का परामर्श दिया गया।

इस संबंध में समीक्षा में यह पाया गया उपायुक्त, पाकुड़ द्वारा देवनागरी लिपि में यह सूचित किया गया है कि श्री बादलचन्द्र पान सद्‌गोप जाति के हैं और वे पिछड़ा वर्ग के अन्तर्गत आते हैं। बंगला में लिखित खतियान को निदेशक, लेखा प्रशासन एवं स्वनियोजन ने अनुवाद कराने के उपरान्त ही देवनागरी में उपायुक्त, पाकुड़ को प्रतिवेदित किया है एवं उपायुक्त, पाकुड़ द्वारा अपना प्रतिवेदन निदेशक के प्रतिवेदन के साथ उपलब्ध कराया गया है। अतएव इसे बंगला भाषा में लिखित राजस्व अभिलेख का OFFICIAL TRANSLATE माना जा सकता हैै।

श्री पान के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही में पुनः विधि विभाग का परामर्श प्राप्त किया गया जिसमें आरोपित के विरूद्ध आरोप प्रमाणित होने की स्थिति में नियमानुसार यथोचित कार्रवाई किए जाने का परामर्श दिया गया है।11 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 अतएव श्री पान द्वारा दिया गया तथ्य विचारणीय बिन्दु के अधीन नहीं आता है। श्री पान का द्वितीय कारणपृच्छा के प्रत्युत्तर में इस आधार पर आरोप मुक्त करने का अनुरोध कि उन्हें माननीय न्यायालय द्वारा बरी कर दिया गया है, मान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि एक तरफ श्री पान को सन्देह का लाभ देते हुए बरी किया गया है वहीं दूसरी ओर यह यह प्रावधान है कि विभागीय कार्यवाही स्वतंत्र रूप से चलाई जा सकती है तथा इसका आपराधिक कार्रवाई में सजा होने अथवा सजा मुक्ति से कोई संबंध नहीं है। यदि सरकारी सेवक आपराधिक कार्यवाही में सजा से मुक्त भी हो गया हो तो भी विभागीय कार्यवाही में दोष सिद्ध होने पर सजा दी जा सकती है या सजा कायम रखी जा सकती है।

इसके अतिरिक्त समीक्षा के क्रम में यह भी पाया गया कि ऐसे मामले में Case No. Appeal (Civil) 5868/2006 में पारित सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में उद्धृत है कि ''If the employee concerned having played fraud in obtaining an appointment he should not be allowed to get benefits thereof, as the foundation of appoint collapes. In the view of the matter, we are of opinion that in case of this nature, it might not have been necessary to initiate any disciplinary proceeding against the respondent'' अर्थात फर्जी तरीके से नियुक्त कर्मियों के विरूद्ध कार्रवाई हेतु विभागीय कार्यवाही चलाने की आवश्यकता नहीं है तथा ऐसे व्यक्ति किसी प्रकार का लाभ पाने के हकदार नहीं हैं।

अतः सम्यक समीक्षोपरान्त श्री बादलचन्द्र पान, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध अनुसूचित जाति का अनुचित लाभ प्राप्त कर अधिदर्शक के पद पर नियुक्त होने एवं आरक्षण का उत्तरोत्तर लाभ प्राप्त करने के प्रमाणित आरोप के लिए निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय सरकार के स्तर से लिया गया हैः-

शत-प्रतिशत पेंशन की कटौती। उक्त दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना के पत्रांक 1845 दिनांक- 20.09.16 द्वारा सहमति प्राप्त है। सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री बादलचन्द्र पान, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता हैः-

शत-प्रतिशत पेंशन की कटौती।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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5 अक्तूबर 20165 अक्तूबर 20165 अक्तूबर 20165 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (सम॰)-02-20/2010/2210—श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, सहायक अभियंता (सम्प्रति सेवानिवृत), प्रखण्ड कार्यालय, उजियारपुर में पदस्थापन के दौरान नरेगा के तहत संचालित योजनाओं मेें अनियमितता बरतने इत्यादि कतिपय आरोपों के लिए निम्न आरोप गठित कर विभागीय पत्रांक 1991 दिनांक 31.12.10 द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-19 के तहत विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गयीः- 1. श्री आदित्य प्रसाद, उप सचिव, ग्रामीण विकास विभाग, बिहार, पटना ने अपने जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख किया है कि उजियारपुर प्रखण्ड अन्तर्गत कमला पंचायत में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजनान्तर्गत सैदपुर कब्रिस्तान के चारों तरफ एवं कब्रिस्तान के शेष भाग में क्रमशः योजना सं0 1/06-07 एवं 10/06-07 में बास एवं माउन्ट पर मिट्‌टी डालने पर कुल 78500/- रू0 (अठहत्तर हजार पाँच सौ रूपये) का व्यय किया गया है, वह फर्जी पाया गया है। दोनों योजनाओं में तकनीकी स्वीकृति श्री सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, कनीय अभियंता द्वारा एवं प्रशासनिक स्वीकृति श्री अरूण कुमार, मुखिया, कमला पंचायत के द्वारा दिया गया है। उपर्युक्त दोनों योजनाओं में कनीय अभियंता द्वारा 96,950/- (छियानवे हजार नौ सौ पचास रूपये) का मापी दर्ज किया गया था। जाँच के क्रम में स्थान पर कार्य नहीं पाया गया। अतएव 78,500/- रू0 का व्यय किया गया। उक्त फर्जी व्यय का सत्यापन आपके द्वारा किया गया है। गलत सत्यापन के कारण कुल 78,500/- रूपये के फर्जी व्यय के लिए आप दोषी है।

2. श्री आदित्य प्रसाद, उप सचिव के उक्त जाँच प्रतिवेदन में ही उल्लेख किया गया है कि उजियारपुर प्रखण्ड अन्तर्गत कमला पंचायत में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के अन्तर्गत देवरवाल चौर नहर के दोनों ओर वृक्षारोपण कार्यक्रम योजना सं0 8/06-07 में अभिकर्त्ता श्री मनोज कुमार, जनसेवक द्वारा 1,44,000/- (एक लाख चौवालीस हजार) रू0 का निष्फल व्यय किया गया है। जाँच पदाधिकारी द्वारा उक्त व्यय के लिए कनीय अभियंता को दोषी पाया गया है, क्योंकि इनके द्वारा 17.06.07 को गलत तरीके से मो0 1,44,460/- (एक लाख चौवालीस हजार चार सौ साठ) रू0 का कार्य मापीपुस्त में दर्ज किया गया है। इस निष्फल व्यय के लिए आप दोषी हैं, क्याेंकि आपके द्वारा मापीपुस्त को सत्यापित किया गया। गलत सत्यापन के फलस्वरूप कुल 1,44,000/- (एक लाख चौवालीस हजार) रू0 का निष्फल व्यय हुआ। उक्त के लिए आप दोषी हैं।

विभागीय कार्यवाही में श्री सिंह से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरान्त आरोप सं0 01 को प्रमाणित पाते हुए श्री सिंह के विरूद्ध विधिवत विभागीय कार्यवाही संचालित करने का निर्णय लिया गया। विभागीय कार्यवाही के निष्पादन के क्रम में ही दिनांक 31.01.12 को कार्यपालक अभियंता के पद से श्री सिंह की सेवानिवृति के फलस्वरूप पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय अधिसूचना सं0 08 दिनांक 02.01.13 द्वारा बिहार12 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) में सम्परिवर्तित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 422 दिनांक 29.04.13 द्वारा संचालन पदाधिकारी एवं प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी नियुक्त कर विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोपों को प्रमाणित नहीं पाया गया। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरान्त जाँच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए असहमति के निम्न बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक 1025 दिनांक 31.07.14 द्वारा श्री सिंह से द्वितीय कारणपृच्छा की गयीः-

1. संचालन पदाधिकारी द्वारा माउन्ट पर मिट्‌टी नहीं डालने के संदर्भ में ट्रैैक्टर से मिट्‌टी ढुलाई के प्रमाणक के आधार पर प्रमाणित नहीं पाया गया। जबकि जाँच प्रतिवेदन में रक्षित प्रमाणक के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि टै्रक्टर से मिट्‌टी ढुलाई मद में मात्र कुल (3000800600)=4400/- रू0 प्रमाणक के आधार पर भुगतान किया गया है जबकि गठित आरोप में इस मद में कुल 7500/- रू0 को फर्जी व्यय माना गया है। यदि उक्त प्रमाणक को सही भी मान लिया जाय तो भी (7500-4400)=3100/- रू0 का फर्जी व्यय के लिए आप दोषी हैं।

आरोप के अनुसार चचरी बनाने में कांटी एवं तार आपूर्ति मद में कुल 10,000/- रू0 का फर्जी व्यय होना बताया गया है। जाँच प्रतिवेदन में रक्षित प्रमाणक के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि इस मद में कुल (80080010004000)=6600/- रू0 का व्यय आपूर्तिकर्त्ता को किया गया है। यदि उक्त प्रमाणक को सही भी मान लिया जाता है तो भी कुल (10,000-6600)=3400/- रू0 का फर्जी व्यय के लिए आप दोषी हैं।

3. आरोप पत्र के अनुसार सूचना पट्‌ट मद में कुल 6000/-रू0 फर्जी व्यय होना बताया गया है। जाँच प्रतिवेदन में रक्षित प्रमाणक के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि काला बोर्ड के लिए कुल (30003000)=6000/- रू0 का भुगतान आपूर्तिकर्त्ता को किया गया है परन्तु उक्त प्रमाणक पर तिथि अंकित नहीं होने एवं प्रमाणक पर कार्य का नाम अंकित नहीं होने के कारण यह मानना संदिग्ध हो जाता है कि उक्त प्रमाणक में किया गया भुगतान विषयांकित कार्य के सूचना पट्‌ट के लिए ही किया गया है।

4. आरोप पत्र के अनुसार चचरी बनाने के लिए बांस आपूर्ति मद में कुल 55000/- रू0 का फर्जी व्यय किया जाना बताया गया है। जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि बांस आपूर्तिकर्त्ता श्री राज कुमार महतो को कुल (22000231004400)=49500/- रू0 का भुगतान किया गया है। जाँच प्रतिवेदन में रक्षित प्रमाणक के अवलोकन से स्पष्ट है कि आपूर्तिकर्त्ता से 100 अदद्‌ बांस 55/- रू0 के दर से लिया गया है। परन्तु भुगतान 55000/- रू0 किए जाने का उल्लेख है, जो गलत है क्योंकि 100 बांस का 55/- रू0 के दर से 5500/- होता है। उक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि जाँच पदाधिकारी के समक्ष आपूर्तिकर्त्ता श्री राज कुमार महतो का कथन कि मेरे द्वारा बांस की आपूर्ति नहीं की गयी है बल्कि अभिकर्त्ता श्री मनोज कुमार द्वारा हस्ताक्षर करा लिया गया है, सही है एवं बांस आपूर्ति मद में कुल 55000/- रू0 का व्यय, फर्जी व्यय है। जिसके लिए आप दोषी हैंं।

5. जाँच प्रतिवेदन में रक्षित प्राक्कलन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि दोनों योजनाओं के प्राक्कलन के बिना तकनीकी स्वीकृति प्रदान किए ही कार्य कराया गया है, जो नियम के विपरीत है।

6. जाँच प्रतिवेदन में रक्षित मापपुस्त के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि योजना संख्या 10/06-07 के तहत द्वितीय विपत्र के माध्यम से कुल 97000/- रू0 का भुगतान अभिकर्त्ता को किया गया है तथा योजना संख्या 01/06-07 के तहत द्वितीय विपत्र के माध्यम से कुल 96950/- रू0 का भुगतान किया गया है।

तदनुसार श्री सिंह को उक्त असहमति के बिन्दु पर पूछे गये द्वितीय कारणपृच्छा का जवाब एक पक्ष के अन्दर निश्चित रूप से विभाग को समर्पित करने का निदेश दिया गया, साथ ही यह भी कहा गया कि विलम्ब की स्थिति में विभाग एकपक्षीय निर्णय लेगा।

उक्त के आलोक में श्री सिंह द्वारा असहमति के बिन्दु पर पूछे गये द्वितीय कारणपृच्छा का जवाब नहीं दिया गया। तत्पश्चात विभागीय पत्रांक 1306 दिनांक 10.09.14, पत्रांक 1607 दिनांक 03.11.14 एवं पत्रांक 426 दिनांक 11.12.15 द्वारा कई स्मार पत्र भी भेजा गया परन्तु श्री सिंंह द्वारा असहमति के बिन्दु पर पूछे गए द्वितीय कारणपृच्छा का जवाब नहीं दिया गया। विभागीय समीक्षाः- संचिका के उपलब्ध साक्ष्यों/अभिलेखों के आलोक में सम्यक समीक्षोपरान्त निम्न तथ्य पाये गयेः- तत्पश्चात श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत से द्वितीय कारणपृच्छा का जवाब अप्राप्त रहने के कारण पूर्व में उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर समीक्षा की गयीः-

(i) उजियारपुर प्रखण्ड के अन्तर्गत कमला पंचायत में राष्ट्रीय ग्रामीण योजनान्तर्गत सैदपुर कब्रिस्तान में चारों तरफ एवं कब्रिस्तान के शेष भाग में योजना सं0 01/2006-07 एवं 10/2006-07 में वास एवं माउण्ट पर मिट्‌टी डालने एवं वृक्षारोपण पर कुल 78500/- (अठहत्तर हजार पाँच सौ) रूपया का व्यय किया गया है जो फर्जी पाया गया है। उक्त फर्जी व्यय के सत्यापन के लिए श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत दोषी पाये गये हैं। (ii) उजियारपुर प्रखण्ड के अन्तर्गत कमला पंचायत में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के अन्तर्गत देवरवाल चौर नहर के दोनों ओर वृक्षारोपण कार्यक्रम योजना सं0 08/2006-07 में अभिकर्त्ता श्री मनोज कुमार, जनसेवक द्वारा 144000/- (एक लाख चौवालीस हजार) रू0 का निष्फल व्यय किया गया है। इस निष्फल व्यय को सत्यापित करने के लिए श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत दोषी पाये गये हैं।

(iii) प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, उजियारपुर के पत्रांक 997 दिनांक 11.08.09 के अनुसार योजना सं0 08/2006-07 पंचायत नरेगा अन्तर्गत देवरवाल चौर नहर के दोनों ओर वृक्षारोपण के कुल व्यय 144000/- रूपये की जाँच वरीय पदाधिकारी द्वारा की गई एवं इसे निष्फल व्यय करार दिया गया। इस निष्फल व्यय के लिए अन्य तीन के साथ श्री13 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को समान रूप से दोषी पाते हुए 144000/- रूपये का एक चौथाई अर्थात्‌ 36000/- रूपया प्रखण्ड नजारत, उजियारपुर में जमा करने का निदेश दिया गया।

(iv) अनुमण्डल नीलाम पत्र पदाधिकारी, दलसिंहसराय द्वारा श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध 36000/- रूपये की सर्टिफिकेट देनदारी की नोटिस निर्गत की गयी। श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, उजियारपुर के नीलाम वाद सं0 131/2010-11 के अन्तर्गत 36027/- रूपया प्रखण्ड नजारत में जमा किया गया।

(v) श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा नीलाम वाद की निर्धारित राशि जमा कर देने के कारण प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, उजियारपुर के पत्रांक 288 दिनांक 12.02.11 के आधार पर अनुमण्डल नीलाम पत्र पदाधिकारी सह अनुमण्डल पदाधिकारी, दलसिंहसराय के पत्रांक 33 दिनांक 15.02.11 द्वारा श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध नीलाम पत्र वाद की कार्यवाही समाप्त कर दी गयी।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि योजना सं0 08/06-07 में हुए निष्फल व्यय 144000/- रूपये में श्री सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता की देनदारी के विरूद्ध प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, उजियारपुर द्वारा नीलाम वाद में 36027/- रूपये श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता को प्रखण्ड नजारत, उजियारपुर में जमा करने का निर्देश दिया गया, जिसे आरोपित पदाधिकारी ने जमा कर दिया है। इस मामले से संबंधित मुकदमा अनुमण्डल न्यायिक दण्डाधिकारी, दलसिंहसराय के न्यायालय में लंबित है।

समीक्षा के क्रम में फर्जी एवं निष्फल व्यय प्रमाणित पाया गया। प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, उजियारपुर द्वारा चलाये गये नीलाम पत्र वाद के आलोक में आरोपित पदाधिकारी आवश्यक राशि जमा कर दी गयी है, परन्तु मात्र राशि जमा कर देने से दोष समाप्त नहीें किया जा सकता है।

अतएव समीक्षोपरान्त उक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को ''एक वर्ष के लिए पेंशन से दो प्रतिशत कटौती'' करने का दण्ड संसूचित करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है, जिसपर बिहार लोक सेवा आयोग से सहमति प्राप्त है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री उपेन्द्र नारायण सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को एक वर्ष के लिए पेंशन से दो प्रतिशत कटौती का दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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6 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पट॰)-03-12/2014/2215—श्री अंबिका प्रसाद, तत्कालीन सहायक अभियन्ता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमण्डल सं0-3, खगौल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक 344 दिनांक 04.02.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत निम्नलिखित आरोपों यथाः- (1) सेवापुस्त में जाली हस्ताक्षर के द्वारा सेवा सत्यापन, वेतन वृद्धि एवं अवकाश लेखा अद्यतन किया जाना। (2) स्वेच्छापूर्वक कार्यालय से अनुपस्थित रहना, अवकाश उपभोग के पश्चात योगदान प्रतिवेदन नहीं देना, उच्चधिकारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं करना एवं उनसे उदंडतापूर्वक व्यवहार करना।

(3) उच्चाधिकारियों को लिखे जाने वाले पत्रों में अशिष्ट भाषा का प्रयोग करना एवं शिष्टाचार को ध्यान में नहीं रखना, के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में आरोपवार निम्न मंतव्य अंकित किया गयाः- (1) सेवापुस्त में दिनांक 01.03.11 से 21.04.12 तक सेवा सत्यापन, दिनांक 01.07.11 की वेतनवृद्धि एवं अवकाश लेखा की प्रविष्टि जाली है, यह प्रमाणित है। परन्तु यह प्रविष्टि आरोपित पदाधिकारी द्वारा ही की गयी है, यह प्रमाणित नहीं है।

विभागीय ज्ञापांक 1848 दिनांक 27.07.05 की शर्त्तों का उल्लंघन कर कार्यालय द्वारा आरोपित पदाधिकारी को सेवापुस्त उपलब्ध कराया गया एवं आरोपित पदाधिकारी द्वारा भी सेवापुस्त प्राप्त किया गया है। अतएव सेवापुस्त की जाली प्रविष्टि के मामले में इनकी भूमिका संदिग्ध है।

(2) स्वेच्छापूर्वक अनुपस्थित रहने, अवकाश उपभोग के पश्चात योगदान नहीं देने संबंधी आरोप प्रमाणित नहीं होता परन्तु उच्चाधिकारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं करने एवं उदंडतापूर्वक व्यवहार करने का आरोप प्रमाणित होता है। (3) अशिष्ट भाषा का प्रयोग एवं शिष्टाचार के विरूद्ध आचरण करने का आरोप प्रमाणित होता है। इसी बीच श्री प्रसाद दिनांक 31.08.15 को सेवानिवृत हो गए जिसके पश्चात उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही की विभागीय आदेश सं0 191 सह पठित ज्ञापांक 2199 दिनांक 28.04.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) में सम्परिवर्तित किया गया एवं विभागीय पत्रांक 2378 दिनांक 14.10.15 द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा की गयी। द्वितीय कारणपृच्छा के प्रत्युत्तर श्री प्रसाद द्वारा मुख्य रूप से निम्न तथ्य दिया गया हैः-

(1) संचालन पदाधिकारी द्वारा सेवापुस्त में जाली हस्ताक्षर मेें प्रविष्टि का आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया है। इसके साथ मार्च, 2011 से जून, 2013 तक का सेवा सत्यापन का पृष्ठ उपलब्ध कराने एवं शंका समाधान का अनुरोध किया गया है ताकि प्रत्युत्तर समर्पित किया जा सके।14 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 (2) आरोप से संबंधित तीन पत्र क्रमशः 1317 दिनांक 11.12.12, 403 दिनांक 24.07.13 एवं 39 दिनांक 23.08.13 का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि प्रथम पत्र उपस्थिति एवं अनुपस्थिति अवधि का है।

इनके पत्रांक 39 दिनांक 23.08.13 द्वारा बकाया वेतनादि का भुगतान करने का अनुरोध किया गया है जिसे साजिश के तहत भुगतान हेतु दवाब बताकर वित्तीय अनियमितता उत्पे्ररित करने का कार्य करने, उच्चाधिकारियों से अपेक्षित सहयोग नहीं करने तथा उदंडतापूर्वक व्यवहार करने का आरोप लगाया गया है जो निराधार एवं तथ्य से परे है।

(3) आरोप सं0 3 के संबंध में पत्रांक 22 दिनांक 28.01.14, पत्रांक 38 दिनांक 03.03.14, पत्रांक 41 दिनांक 03.03.14 एवं पत्रांक 46 दिनांक 10.03.14 का पुनः अवलोकन का अनुरोध करते हुए उक्त सारे पत्रों को उपस्थित अवधि के वेतन भुगतान से संंबंधित होने जिस पर सरकार का निदेश प्राप्त है, की बात कही गई है। मार्च, 2011 से जून, 2013 की बकाया अवधि का वेतन भुगतान हेतु इनके द्वारा समर्पित अनुपस्थित प्रतिवेदन की जाँच नहीं कराकर भुगतान हेतु सरकार के निदेश का अनुपालन नहीें कर कार्यपालक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमण्डल सं0-3, खगौल, पटना द्वारा तत्कालीन कार्यालय से पत्राचार करने का निदेश उचित नहीं है।

श्री प्रसाद से प्राप्त उक्त जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षा में निम्न तथ्य पाया गयाः- (1) श्री प्रसाद द्वारा आरोप सं0 1 के संबंध में दिया गया तथ्य स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि वेतनपूर्जा के क्रम में श्री प्रसाद, सहायक अभियंता का सेवापुस्त अविलंब वैयक्तिक दावा निर्धारण कोषांग, वित्त विभाग को कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी मुख्य नहर प्रमण्डल, वाल्मीकिनगर द्वारा भेजा जाना था जिसे गलत नियत से श्री प्रसाद द्वारा स्वयं दिनांक 09.04.13 को बिना अवकाश लेखा के प्राप्त कर लिया गया एवं दिनांक 01.03.11 से 20.04.12 के बीच भिन्न अवधि का सेवा सत्यापन एवं अवकाश लेखा अद्यतन किया गया। इसकी पुष्टि कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी मुख्य नहर प्रमण्डल, वाल्मीकिनगर के पत्रांक 674 दिनांक 25.11.2013 से होती है। चूँकि उक्त कार्य से केवल श्री प्रसाद ही लाभांवित हो सकते थे। अतः उनके अतिरिक्त किसी अन्य द्वारा सेवापुस्त एवं लेखा में प्रविष्टि करने का कोई औचित्य नहीं है। अतः सेवापुस्त एवं अवकाश लेखा में जाली हस्ताक्षर से प्रविष्टि करने में श्री प्रसाद की संलिप्तता प्रमाणित है।

(2) आरोप सं0 2 के संबंध में संचालन पदाधिकारी द्वारा उच्चाधिकारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं करने एवं उदंडतापूर्वक व्यवहार करने का आरोप प्रमाणित पाया गया है। श्री प्रसाद के प्रत्युत्तर एवं संचालन पदाधिकारी के मंतव्य के आलोक में उच्चाधिकारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं करने एवं उदंडतापूर्वक व्यवहार करने का आरोप प्रमाणित है। (3) आरोप सं0 3 के संबंध में श्री प्रसाद द्वारा कोई ऐसा तथ्य नहीं दिया गया है जिससे उनके विरूद्ध गठित आरोपों का प्रतिवाद हो सके। संचालन पदाधिकारी द्वारा साक्ष्यों के आधार पर आरोप को प्रमाणित पाया गया है। अतएव समीक्षोपरान्त उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अंबिका प्रसाद, तत्कालीन सहायक अभियन्ता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमण्डल सं0-3, खगौल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत को सरकार द्वारा निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया हैः-

(1) 20 (बीस) प्रतिशत पेंशन पर सदा के लिए रोक। उक्त दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से सहमति की मॅाग की गई, बिहार लोक सेवा आयोग, पटना ने अपने पत्रांक 1869 दिनांक 21.09.2016 द्वारा उक्त दण्ड प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की गयी है।

उक्त निर्णय/सहमति के आलोक में श्री अंबिका प्रसाद, तत्कालीन सहायक अभियन्ता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमण्डल सं0-3, खगौल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता हैः-

(1) 20 (बीस) प्रतिशत पेंशन पर सदा के लिए रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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6 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पट॰)-03-12/2015/2216—मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पटना के परिक्षेत्र में सोन नहर प्रमण्डल, खगौल के कार्याक्षेत्रान्तर्गत पटना मुख्य नहर के 75वें मील के नजदीक अवैध बालू खनन के मामले में प्राप्त परिवाद की जाँच कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमण्डल सं0-1, जल संसाधन विभाग से करायी गयी। कार्यपालक अभियंता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन का सरकार के स्तर पर की गयी समीक्षा में निम्नलिखित आरोपों के लिए श्री संजय रमण (आई0 डी0-3365), तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता, सोन नहर प्रमण्डल, खगौल, पटना को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए विभागीय पत्रांक 2314 दिनांक 08.10.15 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र 'क' संलग्न करते हुए स्पष्टीकरण पूछा गयाः-

आरोप सं0-1- पटना मुख्य नहर के 75वें मील के नजदीक बायें तटबंध के सेवा पथ से सटाकर 4716.55 घनमीटर (400'x52'x8') मिट्‌टी सरकारी भूखंड (chart land) से अवैध खनन जून, 2015 में न्यूनतम 15-20 दिनों तक जे0 सी0 बी0 मशीन से किया गया है। जिसमें सेवापथ का स्लोप की मिट्‌टी के अवैध खनन से सेवापथ असुरक्षित हो गया एवं न्यूनतम रू0 4,79,201.00 सरकारी राजस्व की हानि हुई। मुख्य अभियंता, पटना के पत्रांक 1929 दिनांक 22.06.15 से अवैध खनन की सूचना भी श्री रमण को थी। उनके द्वारा न तो अवैध मिट्‌टी खनन को रोका गया और न ही विधि सम्मत कार्रवाई ही ससमय की गयी। अतः खननकर्त्ता के साथ मिलीभगत से सरकारी भूखंड से 4716.55 घनमीटर अवैध मिट्‌टी खनन एवं न्यनूतम रू0 4,79,201.00 सरकारी राजस्व की क्षति के लिए उनको प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया।

आरोप सं0-2- पटना मुख्य नहर के 75वें मील के नजदीक बायें तटबंध के सेवा पथ से सटाकर 4716.55 घनमीटर मिट्‌टी सरकारी भूखंड (chart land) से अवैध खनन जून, 2015 में न्यूनतम 15-20 दिनों तक जे0 सी0 बी0 मशीन से किया15 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 गया। उक्त खरीफ अवधि में सिंचाई सुनिश्चित कराने हेतु पदीय दायित्वों के अनुरूप निरीक्षण/भ्रमण किया जाता है। मुख्य अभियंता, पटना का पत्रांक 1929 दिनांक 22.06.15 के द्वारा अवैध मिट्‌टी खनन पर रोक एवं दोषियों पर कार्रवाई का भी निदेश दिया गया था। परन्तु उनके द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई। अतः पदीय दायित्वों के निर्वहन नहीं करने तथा उच्चाधिकारियों के आदेश के अनुपालन में कमी के लिए श्री रमण दोषी पाये गये।

श्री रमण से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में निम्न तथ्य पाया गयाः- 1. जॅाच प्रतिवेदन के अनुसार पटना मुख्य नहर के 75वें मील पर सेवा पथ के टो से सटाकर काटी गयी मिट्‌टी की गणना की गयी, जिसके अनुसार 400' लम्बाई तथा 52' चौड़ाई में 8' गहरा में मिट्‌टी काटी गयी है। अर्थात 400'x 52'x 8'=166400 धन फीट तथा 4716.55 धन मिट्‌टी होता है। 01.10.14 से प्रभारी अनुसूचित दर 101.60 प्रति धन मीटर के अनुसार उक्त मिट्‌टी लागत राशि 4,79,201.48 रूपये होती है। इस संबंध में श्री रमण, अधीक्षण अभियन्ता एवं मुख्य अभियन्ता द्वारा कहा गया है कि जॅाच पदाधिकारी द्वारा सरकारी भू-खण्ड से काटी गयी मिट्‌टी की गणना पूर्णतः चौकोर एवं समतल होने के आधार पर(400'x 52'x 8') की गयी है जो सरासर गलत है, क्योंकि काटी गयी भूमि एक ही निर्धारित आकार में नहीं है और नही समतल है साथ ही मुख्य अभियन्ता के पत्रांक 3573 दिनांक 15.12.15 के साथ संलग्न कार्यपालक अभियन्ता का पत्रांक 400 दिनांक 16.11.15 से काटी गयी मिट्‌टी की मात्रा की गण्ना कर एक प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया। जिसके अनुसार सरकारी भू-भाग से काटी गयी मिट्‌टी की मात्रा 1805.75 धन मीटर बताया गया। इनके द्वारा मिट्‌टी की गणना गणितीय एवं ग्राफिकल विधि से किया गया। परन्तु श्री रमण द्वारा न तो गणितीय विधि से की गयी गणना का कोई आधार दर्शाया गया है। जबकि ग्राफिकल विधि से मिट्‌टी की गणना के लिए प्री लेवल तथा पोस्ट लेवल होना अनिवार्य है। सरकारी भू-खण्ड से मिट्‌टी कट जाने के बाद किसी भी प्रकार से प्री लेवल लाना संभव नहीं होता है। अतएव श्री रमण द्वारा की गयी मिट्‌टी की गणना भी संदिग्ध हो जाता है परन्तु इतना तो स्थापित है कि सरकारी भू-खण्ड से अवैध रूप से मिट्‌टी कटाई की गयी है जबकि उक्त स्थल प्रमण्डलीय कार्यालय से मात्र 3 कि0 मी0 की दूरी पर अवस्थित है।

मुख्य अभियन्ता के पत्रांक 1929 दिनांक 22.06.15 से अवैध मिट्‌टी कटाई की सूचना प्राप्त होने के बावजूद भी अवैध कटाई को नहीं रोका जाना एवं विधि सम्मत ससमय कार्रवाई नहीं करने के संदर्भ में श्री रमण का कथन कि सहायक अभिन्ता एवं कनीय अभियन्ता द्वारा दिनांक 30.06.15 को स्थल निरीक्षण में पाया गया कि उक्त स्थल से निसृत नाला की सफाई तथा बॅाध की मरम्मत कार्रवाई नहीं की गयी को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है, क्योंकि जॅाच पदाधिकारी द्वारा स्पष्ट उल्लेख किया है कि अवैध मिट्‌टी की कटाई माह जून 2015 में किया गया है एवं परिवादी द्वारा भी अवैध मिट्‌टी कटाई की सूचना दिनांक 22.06.15 को ही दिया गया।

2. मिट्‌टी का अवैध खान जून 2015 में न्यूनतम 15-20 दिनों तक जे0 सी0 सी0 से किया है जबकि उक्त खरीफ अवधि में सिंचाई सुनिश्चित कराने हेतु पदीय दायित्वों के अनुरूपन निरीक्षण/भ्रमण किया जाना है। परन्तु ऐसा नहीं कर पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करना एवं उपरोक्त तथ्यों के आलोक में अवैध मिट्‌टी कटाई में श्री रमण की मिलीभगत का बोध होता है।

श्री संजय रमण, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता द्वारा अपने व्यस्तता एवं कठिनाई को बचाव बयान में दर्शाया गया है कि मुख्य अभियन्ता के पत्रांक 1929 दिनांक 22.06.15 के आलोक में सहायक अभियन्ता एवं कनीय अभियन्ता द्वारा दिनांक 30.06.15 को उक्त स्थल का निरीक्षण किया गया एवं उच्च अधिकारी को बताया गया कि सिंचाई हित में उक्त स्थल के पास निसृत करहा की सफाई तथा बॅाध की मरम्मति की जा रही है फलतः किसी प्रकार की विधि सम्मत कार्रवाई करने की आवश्यकता नहीं है। उक्त कथन के संदर्भ में किसी भी स्तर से किसी भी पदाधिकारी को कोई लिखित वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं दी गयी है। जबकि इतने गंभीर मामले में मुख्य अभियन्ता से प्राप्त निदेश के अनुपालन में कार्यपालक अभियन्ता को स्वयं स्थल निरीक्षण कर अनुपालन प्रतिवेदन उच्च पदाधिकारी को उपलब्ध कराना चाहिए था।

अतः समीक्षोपरान्त श्री संजय रमण, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता, सोन नहर प्रमण्डल, खगौल, पटना के विरूद्व अवैध मिट्‌टी खनन होने की सूचना होने के बावजूद अवैध मिट्‌टी खनन पर रोक नहीं लगाने तथा ससमय विधि सम्मत कार्रवाई नहीं करने, मिलीभगत कर अवैध मिट्‌टी कटाई काटकर कुल 4,79,201/-रू0 का सरकारी राजस्व की क्षति पहुॅचाने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने तथा उच्चाधिकारियों के आदेश का अनुपालन नहीं करने के आरोप को प्रमाणित पाया गया।

अतएव प्रमाणित आरोपों के लिए श्री संजय रमण, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता, सोन नहर प्रमण्डल, खगौल, पटना को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया हैः-

1. एक वेतनवृद्वि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। 2. 1,50,000 (एक लाख पचास हजार) रूपए वेतन से वसूली। उक्त के आलोक में श्री संजय रमण, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता, सोन नहर प्रमण्डल, खगौल, पटना को उक्त दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

6 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 20166 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पट॰)-03-12/2015/2217—मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पटना के परिक्षेत्र में सोन नहर प्रमण्डल, खगौल के कार्याक्षेत्रान्तर्गत पटना मुख्य नहर के 75वें मील के नजदीक अवैध बालू खनन के मामले में प्राप्त परिवाद की जाँच कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमण्डल सं0-1, जल संसाधन विभाग से करायी गयी। कार्यपालक16 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 अभियंता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा की गयी एवं निम्नलिखित आरोपों के लिए श्री संतोष कुमार प्रभाकर, सहायक अभियन्ता, सोन नहर अवर, नौबतपुर, पटना को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए विभागीय पत्रांक 2317 दिनांक 08.10.15 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र 'क' संलग्न करते हुए स्पष्टीकरण पूछा गयाः-

आरोप सं0-1- पटना मुख्य नहर के 75वें मील के नजदीक बायें तटबंध के सेवा पथ से सटाकर 4716.55 घनमीटर (400'x52'x8') मिट्‌टी सरकारी भूखंड (chart land) से अवैध खनन जून, 2015 में न्यूनतम 15-20 दिनों तक जे0 सी0 बी0 मशीन से किया गया है। जिसमें सेवापथ का स्लोप की मिट्‌टी के अवैध खनन से सेवापथ असुरक्षित हो गया एवं न्यूनतम रू0 4,79,201.00 सरकारी राजस्व की हानि हुई। मुख्य अभियंता, पटना के पत्रांक 1929 दिनांक 22.06.15 से अवैध खनन की सूचना भी उनको थी। उनके द्वारा न तो अवैध मिट्‌टी खनन को रोका गया और न ही विधि सम्मत कार्रवाई ही ससमय की गयी। अतः खननकर्त्ता के साथ मिलीभगत से सरकारी भूखंड से 4716.55 घनमीटर अवैध मिट्‌टी खनन एवं न्यनूतम रू0 4,79,201.00 सरकारी राजस्व की क्षति के लिए उनको प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया।

आरोप सं0-2- पटना मुख्य नहर के 75वें मील के नजदीक बायें तटबंध के सेवा पथ से सटाकर 4716.55 घनमीटर मिट्‌टी सरकारी भूखंड (chart land) से अवैध खनन जून, 2015 में न्यूनतम 15-20 दिनों तक जे0 सी0 बी0 मशीन से किया गया। उक्त खरीफ अवधि में सिंचाई सुनिश्चित कराने हेतु पदीय दायित्वों के अनुरूप निरीक्षण/भ्रमण किया जाता है। मुख्य अभियंता, पटना का पत्रांक 1929 दिनांक 22.06.15 से द्वारा अवैध मिट्‌टी खनन पर रोक एवं दोषियों पर कार्रवाई का भी निदेश दिया गया था। परन्तु उनके द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई। अतः श्री प्रभाकर पदीय दायित्वों के निर्वहन एवं उच्चाधिकारी के आदेश के अनुपालन में कमी के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये गये।

श्री प्रभाकर से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में निम्न तथ्य पाया गयाः- 1. पटना मुख्य नहर के 75वें मील पर सेवापथ के टो से सटाकर काटी गयी मिट्‌टी की गणना की गयी जिसके अनुसार 400' लम्बाई तथा 52' चौड़ाई में 8' गहरा में मिट्‌टी काटी गयी है। अर्थात 400'x52'x8''=166400 धन फीट तथा 4716.65 धन मिट्‌टी होता है। 01.10.14 से प्रभारी अनुसूचित दर 101.60 प्रति धन मीटर के अनुसार उक्त मिट्‌टी का लागत राशि 4,79,201.48 रूपये होती है।

इस संबंध में श्री प्रभाकर द्वारा कहा गया कि जॅाच पदाधिकारी द्वारा सरकारी भू-खण्ड से काटी गयी मिट्‌टी की गणना पूर्णतः चौकोर एवं समतल होने के आधार पर(400'x 52'x 8') की गयी है जो सरासर गलत है, क्योंकि काटी गयी भूमि एक ही निर्धारित आकार में नहीं है और न समतल है साथ ही मुख्य अभियन्ता के पत्रांक 3573 दिनांक 15.12.15 के साथ संलग्न कार्यपालक अभियन्ता का पत्रांक 400 दिनांक 16.11.15 से काटी गयी मिट्‌टी की मात्रा की गण्ना कर एक प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया जिसके अनुसार सरकारी भू-भाग से काटी गयी मिट्‌टी की मात्रा 1805.75 धन मीटर बताया गया। इनके द्वारा मिट्‌टी की गणना गणितीय एवं ग्राफिकल विधि से किया गया परन्तु श्री प्रभाकर द्वारा भी न तो गणितीय विधि से की गयी गणना का कोई आधार दर्शाया गया है। जबकि ग्राफिकल विधि से मिट्‌टी की गणना के लिए प्री लेवल तथा पोस्ट लेवल होना अनिवार्य है। सरकारी भू-खण्ड से मिट्‌टी कट जाने के बाद किसी भी प्रकार से प्री लेवल लाना संभव नहीं होता है। अतएव श्री प्रभाकर द्वारा की गयी मिट्‌टी की गणना भी संदिग्ध हो जाता है परन्तु इतना तो स्थापित है कि सरकारी भू-खण्ड से अवैध रूप से मिट्‌टी कटाई की गयी जबकि उक्त स्थल प्रमण्डलीय कार्यालय से मात्र 3 कि0 मी0 की दूरी पर अवस्थित है।

मुख्य अभियन्ता के पत्रांक 1929 दिनांक 22.06.15 से अवैध मिट्‌टी कटाई की सूचना प्राप्त होने के बावजूद भी अवैध कटाई को नहीं रोका जाना एवं विधि सम्मत ससमय कार्रवाई नहीं करने के संदर्भ में श्री प्रभाकर का कथन कि उनके एवं कनीय अभियन्ता द्वारा दिनांक 30.06.15 को स्थल निरीक्षण में पाया गया कि उक्त स्थल से निसृत नाला की सफाई तथा बॅाध की मरम्मति कृषको द्वारा किया जा रहा था जो सिंचाई हित में सही था। इस कारण विधि सम्मत कार्रवाई नहीं की गयी को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है, क्योंकि जॅाच पदाधिकारी द्वारा स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि अवैध मिट्‌टी की कटाई माह जून 2015 में किया गया है एवं परिवादी द्वारा भी अवैध मिट्‌टी कटाई की सूचना दिनांक 22.06.15 को ही दिया गया। अगर मान भी लिया जाए कि जून 2015 में अवैध मिट्‌टी कटाई नहीं किया गया है तो भी श्री प्रभाकर को सतर्कता बरती जानी चाहिए थी, जबकि उक्त स्थल प्रमण्डलीय कार्यालय मात्र 3 कि0 मी0 की दूरी पर अवस्थित है। अतएव माना जा सकता है कि अवैध मिट्‌टी कटाई को इनके द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया। फलतः इतनी अधिक मात्रा में 15-20 दिनों तक मिट्‌टी कटाई होता रहा एवं सरकार को लगभग 4,79,201 रूपये का राजस्व की क्षति हुई जिसके लिए श्री प्रभाकर भी दोषी पाये गए।

2. श्री संतोष कुमार प्रभाकर, सहायक अभियन्ता, सोन नहर अवर, नौबतपुर, पटना द्वारा अपने व्यस्तता एवं कठिनाई को बचाव बयान में दर्शाया गया है एवं कहा गया है कि मुख्य अभियन्ता के पत्रांक 1929 दिनांक 22.06.15 के आलोक में उनके एवं कनीय अभियन्ता द्वारा दिनांक 30.06.15 को उक्त स्थल का निरीक्षण किया गया एवं उच्च पदाधिकारियों को बताया गया कि सिंचाई हित में उक्त स्थल के पास निसृत करहा की सफाई तथा बॅाध की मरम्मति की जा रही है। फलतः किसी प्रकार की विधि सम्मत कार्रवाई करने की आवश्यकता नहीं है। उक्त कथन के संदर्भ में किसी भी स्तर से किसी भी पदाधिकारी को कोई लिखित वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं दी गयी है।

अतः समीक्षोपरान्त श्री संतोष कुमार प्रभाकर, सहायक अभियन्ता, सोन नहर अवर, नौबतपुर के विरूद्व अवैध मिट्‌टी खनन होने की सूचना होने के बावजूद अवैध मिट्‌टी खनन पर रोक नहीं लगाने तथा ससमय विधि सम्मत कार्रवाई नहीं करने, मिलीभगत कर अवैध कटाई काटकर कुल 4,79,201/-रू0 का सरकारी राजस्व की क्षति पहुॅचाना, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करना तथा उच्चाधिकारियों के आदेश का अनुपालन नहीं करने के आरोप को प्रमाणित पाया गया।17 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 अतएव प्रमाणित आरोपों के लिए श्री संतोष कुमार प्रभाकर, सहायक अभियन्ता, सोन नहर अवर, नौबतपुर को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया हैः-

1. एक वेतनवृद्वि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। 2. 1,50,000 (एक लाख पचास हजार) रूपए वेतन से वसूली। उक्त के आलोक में श्री संतोष कुमार प्रभाकर, सहायक अभियन्ता, सोन नहर अवर, नौबतपुर, पटना को उक्त दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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सं॰ 22 नि0 सि0 (औ॰)-17-02/2008/2218—श्री राजेश्वर दयाल (आई0 डी0-2467), तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, उत्तर कोयल नहर अंचल, औरंगाबाद के विरूद्ध शीर्ष कार्य प्रमण्डल, हरिहरगंज अन्तर्गत बटाने दायाँ मुख्य नहर के चेन सं0 627.00 पर 6'-0'' फॉल-सह-कैनाल साईफन कार्य का निविदा आमंत्रण सूचना सं0-01/2007-08 के गु्रप सं0-2 के निष्पादन में बरती गई अनियमितता के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 922 दिनांक 21.08.12 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गईः-

1. आपने बटाने शीर्ष कार्य प्रमण्डल, हरिहरगंज शिविर-अम्बा के निविदा सूचना सं0-1 वर्ष 2007-08 के गु्रप सं0-2 के कार्य के लिए कुल पाँच निविदादाताओं में से तीन निविदादाताओं को अग्रधन की राशि निविदा से पूर्व लौटाकर संवेदक विशेष को लाभ पहुँचाने का प्रयास किया जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी हैं।

2. निविदा सूचना सं0-1 वर्ष 2007-08 के गु्रप सं0-2 के कार्य हेतु पाँच निविदादाताओं में से तीन निविदादाताओं के अग्रधन की राशि आपके निदेश के आलोक में निविदा निस्तार के पूर्व ही निविदाकारों को वापस कर दी गई। जाँच के क्रम में इन निविदाकारों के प्राईस बिड (Price bid) को खोलने पर निविदित दर अनुसूचित दर से 15 (पन्द्रह) प्रतिशत कम पाया गया। स्पष्टतः न्यूनतम दर उद्धृत करने वाले निविदाकारों को अवैध रूप से निविदा प्रक्रिया से बाहर रखते हुए कार्य का आवंटन मनोनुकूल ढंग से अनुसूचित दर से 9.50 प्रतिशत अधिक दर पर किया गया। फलस्वरूप अनुसूचित दर से 24.50% (15%9.50%) अधिक दर स्वीकृत कर विभाग को वित्तीय क्षति पहुँचाने का प्रयास आपके द्वारा किया गया जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए।

3. दिनांक 26.06.07 को श्री महादेव सिंह, बजरंज कन्सट्रक्शन, औरंगाबाद द्वारा एक आवेदन के माध्यम से सूचित किया गया कि प्रस्तावित निर्माण स्थल पर पूर्व से उनके द्वारा एकरारनामा सं0-32 एफ0/89-90 के तहत कार्य किया गया है। संवेदक द्वारा मॅाग की गई कि निविदा निष्पादन के पूर्व उनके द्वारा किए गए कार्यो की अन्तिम मापी लेकर भुगतान किया जाय एवं जमानत तथा अग्रधन की राशि वापस की जाय। उक्त पत्र के आलोक में आपके द्वारा संबंधित कार्यपालक अभियन्ता को पूर्व का एकरारनामा बन्द करने हेतु निदेशित किया गया परन्तु कार्यपालक अभियन्ता से इस संबंध में प्रतिवेदन प्राप्त किए बिना ही दिनांक 14.08.07 को आपके द्वारा यह कार्य आनन्द कन्सट्रक्शन को आवंटित कर दिया गया जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी है।

4. दिनांक 14.06.10 से दिनांक 26.06.07 तक गु्रप सं0-2 के निविदा का निष्पादन नियमानुसार हो जाना चाहिए था परन्तु ऐसा नहीं कर आपके द्वारा जानबूझ कर उक्त निविदा निष्पादन कार्य में जटिलता पैदा की गई एवं एक साजिश के तहत ऐसे निविदादाताओं को प्रतिस्पर्धा से बाहर रखा गया जिसके द्वारा निविदित दर अनुसूचित दर से 15 प्रतिशत कम थे। इस प्रकार आपके द्वारा विभाग को वित्तीय क्षति पहुॅचाने का प्रयास किया गया जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी है। दिनांक 30.09.14 को श्री राजेश्वर दयाल के अभियन्ता प्रमुख के पद से सेवानिवृत हो जाने के कारण उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0-123 सह पठित ज्ञापांक 1689 दिनांक 14.11.14 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी0) में सम्परिवर्तित किया गया।

उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव बयान में मुख्यतः निम्न तथ्य प्रस्तुत किया गयाः-

1. आलोच्य कार्य हेतु प्राप्त निविदाओं में से तीन निविदादाताओं के अग्रधन की राशि उनके अनुरोध पर लौटाई गई थी क्योंकि निविदा के नियम एवं शर्तो में कोई भी शर्त नहीं थी कि निविदादाताओं को कार्य आवंटन के पूर्व निविदा प्रक्रिया में शामिल रखने हेतु बाध्य किया जा सके एवं निविदा निर्णय में हो रहे विलम्ब तक अग्रधन की राशि रोक रखी जाय। दिनांक 08.06.07 को प्राप्त एवं उसी दिन खोली गई निविदाओं का तकनीकी बीड वैध पाया गया था लेकिन निविदा निष्पादन के क्रम में संवेदक श्री महादेव सिंह (बजरंज कन्सट्रक्शन, शाहपुर, औरंगाबाद) से दिनांक 26.06.07 को प्राप्त पत्र से तथ्य प्रकाश में आया कि इसी स्थल पर श्री सिंह द्वारा कराए गए कार्यो की अंतिम मापी नहीं हुई है एवं इनका एकरारनामा बन्द नहीं हुआ है। अतः संवेदक से प्राप्त इस आवेदन पर कार्यपालक अभियन्ता से प्रतिवेदन की मॅाग की गई ताकि भविष्य में कोई विवाद उत्पन्न नहीं हो। उनके (श्री दयाल) अनुसार पूर्व के कार्यो के अंतिम मापी के कारण निविदा निष्पादन में हो रहे विलम्ब के मद्‌देनजर संवेदक मे0 मैहर बिल्डर प्रा0 लि0 एवं आदर्श बंधु कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 के दिनांक 24.07.07 तथा ए0 के0 बिल्डर्स के दिनांक 26.07.07 के अर्नेस्ट मनी लौटाने संबंधी अनुरोध पत्र पर कार्यपालक अभियन्ता को आदेश दिया गया लेकिन वित्तीय बीड का लिफाफा बन्द रहा। पूर्व में सम्पादित कार्यो की अंतिम मापी लेकर निविदा की तुलनात्मक विवरणी18 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 कार्यपालक अभियन्ता के पत्रांक 666 दिनांक 12.08.07 से प्राप्त होते ही शेष दो निविदादाताओं का वित्तीय बीड खोलकर न्यूनतम निविदादाता से दर वार्ता के आधार पर कार्य आवंटित किया गया। इस प्रकार प्रतिस्पर्धा के आधार पर ही नियमानुसार निविदा का निष्पादन किया गया है न कि किसी संवेदक विशेष को कोई लाभ पहुॅचाया गया है।

2. तीन निविदापदाताअें का अर्नेस्ट मनी लौटा दिए जाने के उपरान्त मात्र दो निविदादाता की ही निविदा निष्पादन हेतु वैध रह गयी थी। फलतः उक्त दो वैध निविदा का वित्तीय बीड खोला गया था एवं न्यूनतम निविदित दर अनुसूचित दर से 10 प्रतिशत अधिक था न कि अनुसूचित दर से 15 प्रतिशत कम नियमतः न्यूनतम निविदादाता से दर वार्ता कर 9.5 प्रतिशत अधिक दर पर उन्हें कार्य आवंटित किया गया। जिन तीन निविदादाताओं के अग्रधन की राशि लौटाने का आदेश दिया गया था उनके वित्तीय बीड को नहीं खोला गया। अतः बन्द नित्तीय बीड के लिफाफे में अंकित कर की जानकारी संभव नहीं थी। इस प्रकार उड़नदस्ता द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन में विभाग को होने वाली वित्तीय क्षति का आकलन गलत है और उन्हें आरोपित करने के उद्वेश्य से ऐसा किया गया है। साथ ही उल्लेखनीय है कि आलोच्य निविदा को मुख्य अभियन्ता के पत्रांक 3061 दिनांक 18.09.07 द्वारा रद्‌द भी कर दिया गया था। इस प्रकार विभाग को न तो वित्तीय क्षति पहुॅचाने का प्रयास किया गया है और न कोई वित्तीय क्षति हुई है।

3. पूर्व में कराए गए कार्यो के संवेदक से दिनांक 26.06.07 को प्राप्त आवेदन को उसी दिन कार्यपालक अभियन्ता को आवश्यक कार्रवाई हेतु भेजा गया एवं स्मारित भी किया गया जिसके क्रम में कार्यपालक अभियन्ता से दिनांक 12.08.07 को तुलनात्मक विवरणी प्राप्त हुई। कार्यपालक अभियन्ता से अनुपालन के उपरान्त अलग से उक्त संबंध में प्रतिवेदन की आवश्यकता नहीं थी।

4. निविदा सं0-01/2007-08 के ग्रुप सं0-2 में वर्णित कार्य स्थल पर पूर्व में संवेदक श्री महादेव सिंह, बजरंज कन्सट्रक्शन, औरंगाबाद द्वारा कार्य कराया गया था एवं बिना इनके कार्य की अंतिम मापी एवं एकरारनामा बन्द किए ही इस स्थल के अवशेष कार्यो हेतु कार्यपालक अभियन्ता द्वारा उक्त निविदा आमंत्रित की गई। श्री महादेव सिंह द्वारा पूर्व में इस स्थल पर किए गए कार्य की मापी एवं एकरारनामा बन्द करने के संबंध में संवेदक से दिनांक 26.06.07 को प्राप्त आवेदन के आलोक में कार्यपालक अभियन्ता को निदेशित किया गया। उक्त निदेश के अनुपालन के उपरान्त कार्यपालक अभियन्ता से दिनांक 12.08.07 को तुलनात्मक विवरणी प्राप्त हुआ जिस पर उनके द्वारा 14.08.07 के वित्तीय बीड खोलकर अगे्रतर कार्रवाई की गई। पूर्व में सम्पादित कार्यो की अंतिम मापी लेने एवं एकरारनामा को बन्द करने में विलम्ब के लिए कार्यपालक अभियन्ता जिम्मेवार है। उनके (श्री दयाल) सार्थक प्रसास से ही पूर्व का एकरारनामा बन्द हुआ एवं भविष्य में उत्पन्न होने वाले विवाद से बच गया। इस प्रकार निविदा निष्पादन में जटिलता पैदा करने का आरोप निराधार है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जॅाच प्रतिवेदन में सभी आरोपों को प्रमाणित पाया गया। प्राप्त जॅाच प्रतिवेदन की सरकार के स्तर पर समीक्षा की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी के जॅाच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक 2110 दिनांक 17.09.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी0) के तहत श्री दयाल से द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

श्री राजेश्वर दयाल, सेवानिवृत अभियन्ता प्रमुख से द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युत्तर में मुख्यतः निम्न तथ्य प्रस्तुत किया गयाः-

1. ग्रुप सं0-2 में पॅाच निविदादताओं में से तीन निविदादाताओं को उनके अनुरोध पर निविदा निष्पादन के पूर्व अग्रधन की राशि लौटाई गई उनमें से कोई भी वित्तीय बीड नहीं खुला अर्थात उनके निविदित दर की सूचना उपलब्ध नहीं है। वैसी स्थिति में किसी संवेदक विशेष को लाभ पहुॅचाए जाने का आरोप काल्पनिक, आधारहीन एवं तथ्य से परे है। निविदा निष्पादन दो संवेदकों के बीच प्रतिस्पर्धा के आधार पर किया गया।

निविदा के नियम एवं शर्तो के अन्तर्गत कार्याबंटन के पूर्व निविदा प्रक्रिया में शामिल करने एवं निविदा निर्णय के विलम्ब तक अग्रधन राशि रोके जाने की कोई शर्त नहीं है। दिनांक 08.06.07 को प्राप्त निविदादाताओं का तकनीकी बीड बैध पाया गया लेकिन निविदा निष्पादन के क्रम में श्री महादेव सिंह संवेदक से 26.06.07 को प्राप्त पत्र से उस स्थल पर पूर्व के कार्य की अन्तिम मापी नहीं होने का तथ्य प्रकाश में आया। अतः कार्यपालक अभियन्ता से प्रतिवेदन मॅागते हुए अंतिम मापी लेने का निदेश दिया गया एवं स्मारित भी किया गया ताकि पूर्व के कार्य के कारण विवाद न हो एवं मामला न्यायालय में नहीं आए। पूर्व के कार्य की मापी के कारण निविदा निष्पादन में संभावित विलम्ब के आलोक में तीन निविदादाताओं को उनके 24. 07.07 एवं 26.07.07 के अग्रधन की राशि लौटाने के अनुरोध पर कार्यपालक अभियन्ता को आदेश दिया गया लेकिन उनके वित्तीय बीड का लिफाफा बन्द रहा जिसका उल्लेख मुख्य अभियन्ता के पत्रांक 3179 दिनांक 01.10.07 में किया गया है। पूर्व के कार्यो की अंतिम मापी लेकर कार्यपालक अभियन्ता के पत्रांक 666 दिनांक 12.08.07 से प्राप्त निविदा की तुलनात्मक विवरणी शेष दो निविदादाताओं का वित्तीय बीड खोलकर दर वार्ता के आधार पर कार्य आवंटित किया गया। इस प्रकार प्रतिस्पर्धा के आधार पर निविदा का निष्पादन किया गया एवं किसी विशेष को लाभ नहीं पहुॅचाया गया।

2. प्रमाणित आरोप सं0-2 के प्रत्युत्तर में श्री दयाल द्वारा मुख्यतः विभागीय कार्यवाही के क्रम में दिए गए बचाव बयान को दुहराया गया है।

3. आरोप सं0-3 के प्रत्युत्तर में श्री दयाल द्वारा बताया गया है कि आरोप सं0-3 में ही उल्लेख है कि अधीक्षण अभियन्ता ने कार्यपालक अभियन्ता को एकरारनामा बन्द करने का निदेश दिया। उक्त निदेश के तहत एकरारनामा बन्द करने की कार्रवाई कार्यपालक अभियन्ता के स्तर से सुनिश्चित किया जाना था। उनके स्तर से ससमय एकरारनामा बन्द नहीं किए जाने के कारण अधीक्षण अभियन्ता को दोषी ठहराया जाना उचित नहीं है। पूर्व के कराए गए कार्यो के संवेदक से प्राप्त आवेदन दिनांक 26.06.07 को पूर्व के कार्यो की अंतिम मापी लेकर निविदा निष्पादन हेतु कार्यपालक अभियन्ता को निदेशित किया गया एवं स्मारित भी किया गया जिसके क्रम में इनसे 12.08.07 को तुलनात्मक विवरणी प्राप्त होना ही अपने आप में19 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 कार्यपालक अभियन्ता को दिए गए निदेश का अनुपालन प्रतिवेदन भी है। अतः कार्यपालक अभियन्ता से अलग से किसी प्रतिवेदन की आवश्यकता नहीं थी।

4. आरोप सं0-4 के प्रत्युत्तर में भी श्री दयाल द्वारा बचाव बयान में दिए गए तथ्यों को ही दुहराया गया है। श्री राजेश्वर दयाल, सेवानिवृत अभियन्ता प्रमुख से प्राप्त द्वितीय कारणपृच्छा के प्रत्युत्तर की समीक्षा संचालन पदाधिकारी के मंतव्य एवं उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा के क्रम में पाया गया कि आरोप सं0-1 निविदा सूचना सं0-1/07-08 के ग्रुप -2 से संबंधित पॅाच निविदादाताओं से निविदा निष्पादन के पूर्व तीन निविदादाताओं को अग्रधन वापस कर संवेदक विशेष को लाभ पहुॅचाने से संबंधित है। विभागीय जॅाच आयुक्त सह संचालन पदाधिकारी की विवेचना ''आरोपित पदाधिकारी द्वारा ऐसे तीन निविदादाताओं के अग्रधन की राशि वापस की गई ताकि वे निविदा में आगे भाग न ले सके'' की आरोपित पदाधिकारी द्वारा अनिच्छुक निविदादाताओं के अनुरोध पर अग्रधन वापसी की अपनी कार्रवाई के आलोक में आधारहीन कहा गया है। अभिलेख से विदित होता है कि दिनांक 08.06.07 को आलोच्य कार्य से संबंधित पॅाच निविदादाताओं में से तीन निविदादाताओं का स्वयं अभ्यावेदन प्राप्त कर दिनांक 24.07.07 एवं 01.08.07 को अग्रधन वापस करने का आदेश आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिया गया। निविदा की शर्तो के अनुसार निविदा प्राप्ति से 180 दिनों तक अग्रधन वापसी नहीं की जा सकती है जैसा कि मुख्य अभियन्ता, औरंगाबाद के पत्रांक 3179 दिनांक 01.10.07 में उल्लेख है।

9.5 प्रतिशत अधिक दर पर स्वीकृति के कारण 24.50 प्रतिशत अधिक दर पर स्वीकृत किए जाने के विभागीय जॅाच आयुक्त की समीक्षा को आरोपित पदाधिकारी द्वारा काल्पनिक कहा गया है एवं उनका कहना है कि तीन अनिच्छुक निविदादाताओं के जिनका वित्तीय बीड उनको लौटाने के निदेश के साथ कार्यपालक अभियन्ता को वापस किया गया था, अंकित दर की जानकारी न तो उन्हें (श्री दयाल) और न कार्यपालक अभियन्ता को थी तो जॅाच पदाधिकारी को कैसे हुई। अभिलेख से विदित होता है कि मुख्य अभियन्ता, औरंगाबाद के पत्रांक 3179 दिनांक 01.10.07 से अधीक्षण अभियन्ता (आरोपित पदाधिकारी) को प्रश्नगत संवेदकों के प्राइस बीड पर अपना हस्ताक्षर कर उसे सेफ कस्टडी में रखे जाने का निदेश दिया गया। जिससे स्पष्ट होता है कि आलोच्य निविदादाताओं का वित्तीय बीड कार्यालय में ही उपलब्ध था जिसे जॅाच पदाधिकारी के जॅाच के दौरान खोलने पर समान रूप से अंकित दर अनुसूचित दर से 15 प्रतिशत कम पाया गया। इससे स्पष्ट है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा स्वीकृत 9.5 प्रतिशत अधिक दर वास्तव में न्यूनतम अंकित दर से 24.50 प्रतिशत अधिक है। अतः उपलब्ध अभिलेख एवं विभागीय जॅाच आयुक्त के जॅाच प्रतिवेदन के परिपे्रक्ष्य में श्री दयाल तीन न्यूनतम दर दाताओं का निविदा निष्पादन के पूर्व अग्रधन की राशि वापस करने से संवेदक विशेष को लाभ पहुॅचाने के लिए दोषी है। आरोप सं0-2 के संबंध में उपलब्ध अभिलेख से विदित होता है कि 14.06.07 को प्राप्त तुलनात्मक विवरणी से संबंधित तीन निविदादाताओं की राशि को उनके अभ्यावेदन पर दिनांक 01.08.07 तक वापस करने का आदेश दिया गया एवं निविदा निष्पादन नहीं करने के कारण उनके बिना निष्पादन के ही 14.08.07 को निविदा निष्पादन कर शेष बचे दो निविदादाताओं में एक निविदादाता को अनुसूचित दर से 9.5 प्रतिशत अधिक दर पर कार्यावंटन किया गया जबकि उड़नदस्ता जाँच में अग्रधन वापस किए गए तीनों निविदादाताओं का अंकित दर समान रूप से अनुसूचित दर से 15 प्रतिशत कम पाया गया। इससे यह बोध होता है कि श्री दयाल द्वारा न्यूनतम दर अंकित करने वाले तीनों निविदादाताओं को निविदा प्रक्रिया में भाग नहीं लेने की परिस्थति उत्पन्न की गई। अतः न्यूनतम दर दाता को निविदा प्रक्रिया से बाहर रखने की परिस्थिति उत्पन्न कर मनोनुकूल संवेदक से अधिक दर पर कार्यावंटन कर वित्तीय क्षति पहुँचाने के प्रयास के लिए आरोपित पदाधिकारी दोषी हैं।

आरोप सं0-3 के संबंध में उपलब्ध अभिलेख से विदित होता है कि अधीक्षण अभियंता (आरोपित पदाधिकारी) द्वारा कार्यपालक अभियंता को एकरारनामा के तहत प्रस्तावित कार्य स्थल पर पूर्व के कार्य की अन्तिम मापी लेकर एकरारनामा बन्द करने का निदेश दिया गया। इसी बीच तीन निविदादाताओं जिनका अंकित दर जाँच में न्यूनतम पाया गया, को उनके अभ्यावदेन पर दिनांक 24.04.07 एवं 01.08.07 को वापस करने का निदेश आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिया गया। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने पूर्व के निदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराने हेतु पत्रांक 379 दिनांक 09.08.07 द्वारा स्मारित भी किया। जिसके क्रम में कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक 666 दिनांक 12.08.10 द्वारा तुलनात्मक विवरणी पूर्व में ही समर्पित होने का उल्लेख किया गया है परन्तु अन्तिम मापी लेने के पूर्व आदेश के अनुपालन के संदर्भ में कोई उल्लेख नहीं किया गया।

तुलनात्मक विवरणी से भी विदित होता है कि कार्यपालक अभियंता द्वारा शेष दो निविदादाताओं की तुलनात्मक विवरणी नहीं भेजी गई है जबकि पूर्व पे्रषित पाँच निविदादाताओं की तुलनात्मक विवरणी पर ही आरोपित पदाधिकारी द्वारा दर की स्वीकृति दी गई है। इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि बिना पूर्व आदेश जिसके आलोक में निविदा निष्पादन उनके द्वारा रोक रखा गया था, को अनुपालित हुए दिनांक 17.08.07 को निविदा निष्पादित किया गया।

अतः उपर्युक्त तथ्यों/अभिलेख/बचाव बयान के परिपे्रक्ष्य में आरोपित पदाधिकारी आरोप सं0-3 के लिए दोषी हैं। आरोप सं0-4 के प्रत्युत्तर की समीक्षा में पाया गया कि आरोपित पदाधिकाकरी द्वारा निविदा निष्पादन में दो माह समय लगने के संचालन पदाधिकारी की विवेचना पर कहा गया है कि अधीक्षण अभियंता स्तर पर विभिन्न स्तरों से संचिका गुजरने के कारण विलम्ब हो जाता है परन्तु आरोपित पदाधिकारी द्वारा विभिन्न स्तरों का उल्लेख नहीं किया गया है। अभिलेख से विदित होता है कि 14.06.07 को आलोच्य कार्य की निविदा के तकनीकी बीड का तुलनात्मक विवरणी आरोपित पदाधिकारी के कार्यालय में प्राप्त होता है। दिनांक 14.06.07 से 26.06.07 तक इस पर किसी कार्रवाई के संदर्भ का उल्लेख नहीं है जबकि इस अवधि में निष्पादन हो जाना चाहिए था। दिनांक 26.06.07 को श्री महादेव सिंह, संवेदक द्वारा आलोच्य20 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 कार्यस्थल पर उनके द्वारा पूर्व में कराए गए कार्य की अंतिम मापी नहीं होने के अभ्यावेदन पर संज्ञान लेते हुए कार्यपालक अभियंता को अंतिम मापी लेकर एकरारनामा बंद करने का निदेश दिया गया। उपर की कण्डिकाओं में जैसा कि समीक्षा मे पाया गया है कि निदेश बिना अनुपालित हुए निविदा निस्तार कर अधिक दर पर कार्य आवंटित किया गया जिससे वित्तीय क्षति पहुँचाने के प्रयास का आरोप प्रमाणित होता है।

मामले की सम्यक समीक्षोपरान्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री राजेश्वर दयाल, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, उत्तर कोयल नहर अंचल, औरंगाबाद सम्प्रति सेवानिवृत अभियंता प्रमुख के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय सरकार के स्तर से लिया गया है।

25 (पच्चीस) प्रतिशत पेंशन पर पाँच वर्षों तक रोक। उक्त निर्णित दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना के पत्रांक 1868 दिनांक 21.09.16 के माध्यम से सहमति प्रदान की गई है।

अतः सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजेश्वर दयाल, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, उत्तर कोयल नहर अंचल, औरंगाबाद सम्प्रति सेवानिवृत अभियंता प्रमुख के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता हैः-

25 (पच्चीस) प्रतिशत पेंशन पर पाँच वर्षों तक रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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7 अक्तूबर 20167 अक्तूबर 20167 अक्तूबर 20167 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पट॰)-03-07/2016/2228—मो0 औबेदुर रहमान, सहायक अभियन्ता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमण्डल, मोकामा के विरूद्व सुलतानगंज थाना, पटना से दर्ज प्राथमिकी सं0-204/15 दिनांक 09.12.15 भा0 द0 वि0 की धारा-498 (ए)/ 504/ 341/ 323/ 379/34 के तहत एवं न्यायालय के आदेश के आलोक में दिनांक 05.05.16 से न्यायिक हिरासत में जेल में रहने के कारण बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9 (2) (क) में निहित प्रावधान के तहत विभागीय अधिसूचना सं0-1053 दिनांक 08.06.16 के द्वारा मो0 रहमान को दिनांक 05.05.16 के प्रभाव से निलंबित किया गया।

मो0 रहमान के द्वारा माननीय न्यायालय से जमानत प्राप्त कर दिनांक 08.08.16 को विभाग में योगदान देते हुए निलंबन से मुक्त करने का अनुरोध किया गया है।

अतएव मो0 रहमान के योगदान प्रतिवेदन पर सम्यक विचारोपरान्त बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9 (3) (i) में निहित प्रावधान के तहत उनका योगदान दिनांक 08.08.16 से स्वीकृत करते हुए निलंबन से मुक्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

उक्त के आलोक में मो0 औबेदुर रहमान, सहायक अभियन्ता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमण्डल, मोकामा को दिनांक 08.08.16 के प्रभाव से निलंबन मुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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19 अक्तूबर 201619 अक्तूबर 201619 अक्तूबर 201619 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पू॰)-01-12/2006/2281—मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ परिक्षेत्राधीन बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, कटिहार के अन्तर्गत वर्ष 2005 में बाढ़ पूर्व गंगा नदी पर स्थित काटाकोश नवरसिया निस्सृत एवं टोपरा चौकिया पहाड़पुर निस्सृत तटबंध पर एजेण्डा सं0 80/538 एवं 80/539 के तहत कराये गये कटाव निरोधक कार्यों एवं तत्पश्चात उक्त स्थल पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों की जाँच विभागीय उड़नदस्ता से करायी गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरान्त प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 160 दिनांक 15.02.08 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत श्री राम प्रसाद राम, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गयी।

विभागीय कार्यवाही के निष्पादन के क्रम में ही दिनांक 30.06.09 को श्री राम की सेवानिवृति के कारण पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0 60 दिनांक 25.02.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) में सम्परिवर्तित किया गया।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया कि दो कार्यों में से एक कार्य एजेण्डा सं0 80/539 ससमय पूरा कर लिया गया था जबकि एजेण्डा सं0 80/538 के संबंध में उड़नदस्ता के जाँच से यह स्पष्ट है कि कार्य को ससमय शुरू नहीं करने और कार्य में अपेक्षित प्रगति नहीं रहने के कारण नदी के बढ़ते जलस्तर से कटाव निरोधक कार्य क्षतिग्रस्त हुआ। इस संबंध में यह स्पष्ट करना है कि उक्त कार्य की निविदा का निष्पादन 15.03.05 को हुआ। कार्य आवंटन 31.03.05 को हुआ तथा कार्य समाप्ति की तिथि 31.05.05 थी। उक्त कार्य की एकरारित राशि 121.47 लाख रूपये थी। उक्त कार्य की Alignment दिनांक 16.03.05 को किया गया, जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता ने दिनांक 04.04.05 को दी थी, जिसके उपरान्त कार्य प्रारम्भ हो सकता था परन्तु आपके द्वारा Alignment की स्वीकृति में लगभग 18 दिनाें का समय लिया गया। कार्य प्रारम्भ हुआ और विशेषज्ञ दल21 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 ने स्थल निरीक्षण में दिनांक 29.05.05 तक कार्य की प्रगति मात्र 40 प्रतिशत प्रतिवेदित की है। विशेषज्ञ जाँच दल ने यह भी अंकित किया है K K N R तटबंध के चेन सं0 327 पर अवस्थित स्थल के डाउन स्ट्रीम सैन्क से तटबंध के चेन सं0 336.5 तक रिभेटमेन्ट द्वारा जोड़ने का कोई प्रयास क्षेत्रीय पदाधिकारियों द्वारा नहीें किया जा रहा है जो आवश्यक है और इससे तटब्ांध टूट सकता है। परन्तु फिर भी संवेदक एवं क्षेत्रीय पदाधिकारियों द्वारा कार्यों में अपेक्षित तेजी नहीं लायी गयी, जिसके कारण तटबंध का स्लोप भाग नैकेड रह गया और तटबंध क्षतिग्रस्त हो गया। जलश्राव बढ़ने के बाद भी दिनांक 15.07.05 के बाद 21.07.05 तक कोई बाढ़ संघर्षात्मक कार्य नहीं किया गया। विशेषज्ञ के सुझाव के उपरान्त ही 21.07.05 के बाद बाढ़ संघर्षात्मक कार्य करने का प्रमाण अभिलेख से मिला है और तत्कालीन मुख्य अभियंता द्वारा स्थल निरीक्षण भी दिनांक 23.07.05 को करने का प्रमाण मिलता है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री राम प्रसाद राम, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध विभागीय पत्रांक 1022 दिनांक 07.05.15 द्वारा संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति देते हुए द्वितीय कारणपृच्छा की गयी।

उक्त द्वितीय कारणपृच्छा के आलोक में श्री राम ने द्वितीय कारण पृच्छा का प्रतिउत्तर समर्पित किया, जिसकी समीक्षा उच्च स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया कि दिनांक 04.04.05 को दिये गये Alignment की स्वीकृति के संदर्भ में श्री राम द्वारा प्राक्कलन स्वीकृति का उल्लेख किया गया है जो अप्रासंगिक प्रतीत होता है। उनके इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि जाँच प्रतिवेदन से विदित होता है कि दिनांक 16.03.05 को निवृत रेखा का रेखाांकण का प्रस्ताव तैयार किया गया, जिसकी स्वीकृति श्री राम द्वारा 18 दिन विलम्ब से 04.04.05 को दी गई। रेखांकण Alignment की स्वीकृति के उपरान्त ही कार्य कराया जाना संभव हो पाता। श्री आलम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के बचाव बयान से विदित होता है कि 24.02.05 को प्राप्त निविदा का एकरारनामा 21.03.05 को किया गया। इससे विलम्ब से कार्यावंटन के लिए भी श्री राम दोषी पाये गये हैं।

उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से विदित होता है कि 30.05.05 तक स्लोप में पीचिंग कार्य प्रारम्भ नहीं किया गया है। जबकि कार्य समाप्ति की एकरारित तिथि 31.05.05 ही है, यहाँ तक कि विस्तारित अवधि 29.06.05 तक कार्य कराये जाने के बावजूद स्लोप में पीचिंग कार्य चेन 346-350 एवं चेन 340-346 के बीच नहीं ही पाया गया जिससे निर्मित निवृत रेखा तटबंध बढ़ते जलस्तर की स्थिति में दवाब सहने में सक्षम नहीं रहा। अध्यक्ष, विशेष जाँच दल द्वारा भी अपने स्थल निरीक्षण प्रतिवेदन में कार्य की प्रगति असंतोषजनक एवं कार्य में तेजी लाने का सुझाव दिया गया। इसके बावजूद भी श्री राम अपने पदीय दायित्व का अनुपालन सुनिश्चित कराने में असफल रहे। अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के दिनांक 29.05.05 के दौरा प्रतिवेदन में उल्लेख है कि K K N R तटबंध के C H 327 पर अवस्थित स्पर को डाउन स्ट्रीम शैंक से तटबंध के चेन 336.50 तक रिभेटमेन्ट द्वारा जोड़ने का कोई प्रयास क्षेत्रीय पदाधिकारी द्वारा नहीं किया जा रहा है अगर इस भाग को नहीं जोड़ा जाता है तो नदी द्वारा इस भाग में कटाव से इंकार नहीं किया जा सकता है।

स्थल पंजी से भी दिनांक 15.07.05 से दिनांक 19.07.05 तक दूरभाष संवाद द्वारा कटाव की सूचना वरीय पदाधिकारी को दिये जाने की पुष्टि होती है। परन्तु विशेषज्ञ के सुझाव के उपरान्त ही 21.07.05 के बाद से भी बाढ़ संघर्षात्क कार्य कराये जाने का उल्लेख मिलता है, परन्तु श्री राम के स्तर ऐसे महत्वपूर्ण कार्य जिसका उल्लेख अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के हर दौरा प्रतिवेदन में किया गया है, का निरीक्षण 26.07.05 को किया गया। हालांकि जाँच प्रतिवेदन में अधीक्षण अभियंता के टिप्पणी के आलोक में आरोपित पदाधिकारी का स्थल निरीक्षण 23.07.05 कोे कहा गया है परन्तु आरोपित पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराये गये निरीक्षण ब्योरा विवरणी से आलोच्य स्थल का निरीक्षण 29.04.05 के बाद 26.07.05, 03.08.05 को ही किये जाने का बोध होता है। उक्त से श्री राम के द्वारा लापरवाही एवं पदीय उत्तरदायित्व के समुचित निर्वहन में कमी का आरोप प्रमाणित पाया गया है।

उपर्युक्त वर्णित तथ्यों, बचाव बयान एवं साक्ष्य के आलोक में एजेण्डा सं0 80/538 के तहत कराये जा रहे कार्य में श्री राम द्वारा रेखांकण की स्वीकृति विलम्ब से देने एवं अपने पदीय दायित्व का समुचित निर्वहन में कमी को प्रमाणित आरोप के लिए श्री राम प्रसाद राम, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ सम्प्रति सेवानिवृत को ''पन्द्रह प्रतिशत (15%) पेंशन की कटौती पाँच वर्षों तक'' का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय विभाग द्वारा लिया गया है।

सरकार के उक्त निर्णय में पत्रांक 1692 दिनांक 06.09.16 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग का सहमति प्राप्त है। उपरोक्त निर्णय के आलोक में श्री राम प्रसाद राम, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता हैः-

''पन्द्रह प्रतिशत (15%) पेंशन की कटौती पाँच वर्षों तक''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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19 अक्तूबर 201619 अक्तूबर 201619 अक्तूबर 201619 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पू॰)-01-12/2006/2282—मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ परिक्षेत्राधीन बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, कटिहार के अन्तर्गत वर्ष 2005 में बाढ़ पूर्व गंगा नदी पर स्थित काटाकोश नवरसिया निस्सृत एवं टोपरा चौकिया पहाड़पुर निस्सृत तटबंध पर एजेण्डा सं0 80/538 एवं 80/539 के तहत कराये गये कटाव निरोधक कार्यों एवं तत्पश्चात उक्त स्थल पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों की जाँच विभागीय उड़नदस्ता से करायी गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरान्त प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 161 दिनांक 15.02.08 द्वारा बिहार सरकारी22 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत श्री अख्तर आलम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, कटिहार के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गयी।

विभागीय कार्यवाही के निष्पादन के क्रम में ही दिनांक 31.07.12 को श्री आलम की सेवानिवृति के कारण पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0 61 दिनांक 25.02.15 (ज्ञापांक 524 दिनांक 25.02.15) द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) में सम्परिवर्तित किया गया।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया कि दो कार्यों में से एक कार्य एजेण्डा सं0 80/539 ससमय पूरा कर लिया गया था जबकि एजेण्डा सं0 80/538 के संबंध में उड़नदस्ता के जाँच से यह स्पष्ट है कि कार्य को ससमय शुरू नहीं करने और कार्य में अपेक्षित प्रगति नहीं रहने के कारण नदी के बढ़ते जलस्तर से कटाव निरोधक कार्य क्षतिग्रस्त हुआ। इस संबंध में यह स्पष्ट करना है कि उक्त कार्य की निविदा का निष्पादन 15.03.05 को हुआ। कार्य आवंटन 31.03.05 को हुआ तथा कार्य समाप्ति की तिथि 31.05. 05 थी। उक्त कार्य की एकरारित राशि 121.47 लाख रूपये थी। उक्त कार्य की Alignment दिनांक 16.03.05 को किया गया, जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता ने दिनांक 04.04.05 को दी थी, जिसके उपरान्त कार्य प्रारम्भ हो सकता था परन्तु आपके द्वारा Alignment की स्वीकृति में लगभग 18 दिनाें का समय लिया गया। कार्य प्रारम्भ हुआ और विशेषज्ञ दल ने स्थल निरीक्षण में दिनांक 29.05.05 तक कार्य की प्रगति मात्र 40 प्रतिशत प्रतिवेदित की है। विशेषज्ञ जाँच दल ने यह भी अंकित किया है K K N R तटबंध के चेन सं0 327 पर अवस्थित स्थल के डाउन स्ट्रीम सैन्क से तटबंध के चेन सं0 336.5 तक रिभेटमेन्ट द्वारा जोड़ने का कोई प्रयास क्षेत्रीय पदाधिकारियों द्वारा नहीें किया जा रहा है जो आवश्यक है और इससे तटब्ांध टूट सकता है। परन्तु फिर भी संवेदक एवं क्षेत्रीय पदाधिकारियों द्वारा कार्यों में अपेक्षित तेजी नहीं लायी गयी, जिसके कारण तटबंध का स्लोप भाग नैकेड रह गया और तटबंध क्षतिग्रस्त हो गया। जलश्राव बढ़ने के बाद भी दिनांक 15.07.05 के बाद 21.07.05 तक कोई बाढ़ संघर्षात्मक कार्य नहीं किया गया। विशेषज्ञ के सुझाव के उपरान्त ही 21.07.05 के बाद बाढ़ संघर्षात्मक कार्य करने का प्रमाण अभिलेख से मिला है और तत्कालीन मुख्य अभियंता द्वारा स्थल निरीक्षण भी दिनांक 23.07.05 को करने का प्रमाण मिलता है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री अख्तर आलम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, कटिहार दिनांक 21.05.05 से पूरी बाढ़ अवधि में पदस्थापित रहे हैं एवं उनके द्वारा ससमय कार्य पूर्ण नहीं कराने, कटाव की स्थिति में ससमय बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रारम्भ नहीं कराने के प्रमाणित आरोप के लिए विभागीय पत्रांक 1021 दिनांक 07.05.15 द्वारा संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति देते हुए द्वितीय कारणपृच्छा की गयी।

उक्त द्वितीय कारणपृच्छा के आलोक में श्री आलम ने द्वितीय कारणपृच्छा का प्रतिउत्तर समर्पित किया, जिसकी समीक्षा उच्च स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया कि कार्य के प्रारंभिक दिनों में श्री श्याम नारायण सिंह, कार्यपालक अभियंता प्रभार में थे जिनकी मृत्यु हो चुकी है। श्री आलम 21.05.05 को कार्यपालक अभियंता का प्रभार ग्रहण किये उस समय कार्य की प्रगति 20% थी जैसा कि आरोपित पदाधिकारी श्री अख्तर आलम का कहना है। उस समय अधिक श्रम बल एवं संसाधन जुटाकर युद्धस्तर पर अहर्निश कार्य कराने की आवश्यकता थी। दिनांक 26.04.05 को अध्यक्ष, विशेष जाँच दल द्वारा मैन एवं मशीनरी बढ़ाकर रात्रि शिफ्ट में भी कार्य कराने का सुझाव दिया गया था, श्री आलम को पूर्व के सुझााव पर कार्रवाई किया जाना चाहिए था। दिनांक 29.05.05 को भी अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के तृतीय निरीक्षण प्रतिवेदन में भी भौतिक प्रगति लगभग 40% आंका गया जो कि कार्य की तुलना में प्रगति बहुत ही कम का उल्लेख किया गया, साथ ही रात्रि शिफ्ट में भी कार्य कराना जरूरी बताया गया एवं कार्य की प्रगति लाने की दिशा में खास सुधार निरीक्षण के दिन तक नहीं पाये जाने का उल्लेख किया गया है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से भी विदित होता है कि 30.05.05 तक स्लोप में बोल्डर पीचिंग कार्य प्रारम्भ ही नहीं किया गया है। नवनिर्मित निकृत तटबंध के चेन 346-350 के बीच एवं चेन 340-346 के बीच द्वितीय स्लोप में पीचिंग नहीं कराने के कारण नेकेड रह गया, जिसके कारण तटबंध नदी का दवाब झेलने में सक्षम नहीं हो पाया और तटबंध क्षतिग्रस्त हो गया।

कटाव प्रारम्भ होने के बावजूद भी बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रारम्भ नहीं करने के संबंध में स्पष्ट करना है कि विशेषज्ञ श्री बृजनंदन प्रसाद द्वारा 21.07.05 के स्थलीय निरीक्षण प्रतिवेदन में अंकित किया गया है- During inspection, it was found that K K N retired line from C H 345 to 348 in length of about 300 ft was completly ended........

Surprisingly no protection work were being done at site. There was also no indication of any flood fighting work done at the initial stage of bank erosion.

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि 21.07.05 से पूर्व बाढ़ संघर्षात्मक कार्य नहीं कराया गया है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि 20.07.05 से F F W कराया जा रहा है एवं N R 59 एवं 62 द्वारा भी F F W कराये जाने की सूचना विभाग को दी गयी है। अभिलेख से यह भी विदित होता है कि 15.07.05, 18.07.05 एवं 19.07.05 को दूरभाष संवाद द्वारा स्थल प्रभारी, सहायक अभियंता द्वारा कटाव की सूचना श्री आलम को दी गई है। श्री आलम द्वारा भी सूचना प्राप्त होने एवं 10.07.05 से ही कटाव होने का उल्ल्ेख किया गया है परन्तु बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रारम्भ कराना सुनिश्चित नहीं करा पाये।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि कटाव होने के बावजूद भी ससमय बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रारम्भ कराने में श्री आलम असफल रहे।

उपर्युक्त वर्णित तथ्यों, बचाव बयान एवं साक्ष्य के आलोक में एजेण्डा सं0 80/538 के तहत कराये जा रहे कार्य को ससमय पूर्ण नहीं कराने एवं कटाव प्रारम्भ हो जाने के बावजूद ससमय बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रारम्भ नहीं करने के प्रमाणित23 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 आरोप के लिए श्री अख्तर आलम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, कटिहार सम्प्रति सेवानिवृत को ''पन्द्रह प्रतिशत (15%) पेंशन की कटौती पाँच वर्षों तक'' का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय विभाग द्वारा लिया गया है। सरकार के उक्त निर्णय में पत्रांक 1846 दिनांक 20.09.16 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग का सहमति प्राप्त है। उपरोक्त निर्णय के आलोक में श्री अख्तर आलम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, कटिहार सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता हैः-

''पन्द्रह प्रतिशत (15%) पेंशन की कटौती पाँच वर्षों तक''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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20 अक्तूबर 201620 अक्तूबर 201620 अक्तूबर 201620 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (वीर॰)-07-03/2009/2295—श्री अनंत कुमार दास, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, जल निस्रण प्रमण्डल, कोपरिया, सहरसा द्वारा वर्ष 2008-09 में जल निस्सरण प्रमण्डल, कोपरिया, सहरसा अन्तर्गत कराये गये बाढ़ सुरक्षात्मक कार्य में बरती गयी अनियमितता के प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए इनसे विभागीय पत्रांक 501 दिनांक 25.03.10 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र 'क' संलग्न करते हुए स्पष्टीकरण की माँग की गयी।

श्री दास से प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब की विभागीय समीक्षोपरान्त अंतिम विपत्र 26.06.09 से 07.12.09 तक पारित नहीं किये जाने के कारण संवेदक द्वारा अभियंता प्रमुख को विपत्र पर असहमति का पत्र दिये जाने के कारण दोषी पाते हुए बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत विभागीय पत्रांक 63 दिनांक 24.01.12 द्वारा स्पष्टीकरण की माँग की गयी। कई स्मारों के बावजूद स्पष्टीकरण के जवाब अप्राप्त रहने के कारण उनके सेवाकाल में पूछे गये स्पष्टीकरण को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-19 के तहत विभागीय कार्यवाही मानते हुए विभागीय आदेश सं0 94 ज्ञापांक 886 दिनांक 16.04.15 द्वारा उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) में सम्परिवर्तित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के निष्कर्ष के निम्न बिन्दुओं पर असहमत होते हुए श्री दास से द्वितीय कारणपृच्छा की गयीः- ''उड़नदस्ता दल द्वारा पाये गये अधिकाई भुगतान का मामला सत्य था। परन्तु उड़नदस्ता द्वारा जॅाच करने के बाद पुनः इसकी समीक्षा करते हुए श्री दास द्वारा अधिकाई भुगतान की राशि जो लगभग रूपये सात लाख ईटों के मद में ग्यारह हजार रूपये ढुलाई के मद में अगले विपत्र से सामंजित कर लिया गया। इस प्रकार इस मामले में सरकार को कोई वित्तीय क्षति नहीं हुई परन्तु यह माना जा सकता है कि अगर इस बारे में परिवाद प्राप्त नहीं हुआ होता एवं उड़नदस्ता द्वारा जॅाच दल नहीं की गयी होती तो यह अधिकाई भुगतान का मामला प्रकाश में नहीं आता एवं संवेदक को अधिकाई भुगतान हो जाता इस प्रकार कार्य करने के दौरान मापी पुस्त में अंकित करते समय एवं उसकी जॅाच करते समय कार्यपालक अभियन्ता सजय नहीं थे अन्यथा इस प्रकार का अधिकाई भुगतान नहीं होता''।

श्री दास द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया कि श्री दास द्वारा संवेदक को अधिक भुगतान किया गया। यदि उड़नदस्ता द्वारा इस मामले की जॅाच नहीं की जाती तो इस राशि की कटौती अंतिम विपत्र में से नहीं की जाती। श्री दास, संवेदक को अधिक किये गये कार्य से अधिक भुगतान करने के लिए दोषी है। यद्‌पि की अंतिम विपत्र से किये गये कटौती के कारण सरकार को कोई आर्थिक क्षति नहीं हुई, किन्तु श्री दास का यह कृत्य कदाचार की श्रेणी में आयेगा।

वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री दास के विरूद्व उक्त आरोप प्रमाणित पाया गया। प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री दास के विरूद्व निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया हैः- 1. पेंशन से पॅाच प्रतिशत की कटौती दो वर्षो तक 2. उक्त दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है। उक्त निर्णय के आलोक में श्री दास, तत्कालीन कार्यपालक अभियन्ता सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता हैः-

1. पेंशन पर पॅाच प्रतिशत की कटौती दो वर्षो तक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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25 अक्तूबर 201625 अक्तूबर 201625 अक्तूबर 201625 अक्तूबर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (याँ॰)-04-09/2011/2326—/ श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता (याँत्रिक), सिंचाई याँत्रिक प्रमण्डल, दरभंगा के विरूद्ध पदस्थापन अवधि में काम नहीं कराना, घटिया काम कराना, कार्य में विलम्ब करना, कार्य में लापरवाही बरतना, सरकारी राशि का दुरूपयोग करना आदि कतिपय आरोपों के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के तहत विहित रीति से विभागीय संकल्प सं0 1612 दिनांक 27.12.11 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी से प्राप्त प्रतिवेदन के मंतव्य से सहमति/असहमति के बिन्दुओं पर प्रमाणित आरोपों के लिए पत्रांक 427 दिनांक 09.04.14 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री सिंह से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब की समीक्षा24 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरान्त आरोप सं0 01 एवं 02 को प्रमाणित पाया गया। उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिंह को विभागीय अधिसूचना सं0 1452 दिनांक 29.09.14 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गयाः-

(1) निन्दन वर्ष 2011-12 (2) दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। इस बीच श्री सिंह दिनांक 30.09.14 को सेवानिवृत हो गये। सेवानिवृति के कारण पूर्व निर्गत दण्डादेश अधिसूचना सं0 1452 दिनांक 29.09.14 श्री सिंह पर लागू नहीं होने के कारण पूर्व निर्गत दण्डादेश अधिसूचना सं0 1452 दिनांक 29.09. 14 को विभाग द्वारा रद्‌द करने एवं पूर्व संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) में सम्परिवर्तन करने का निर्णय लिया गया एवं एतद संबंधी अधिसूचना 194 दिनांक 21.01.15 निर्गत किया गया। साथ ही विभागीय पत्रांक 690 दिनांक 23.03.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत द्वितीय कारणपृच्छा की गई।

श्री सिंह द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा का जवाब ससमय नहीं दी गई, जिसके लिए इन्हें पुनः विभागीय पत्रांक 2393 दिनांक 16.10.15 एवं विभागीय पत्रांक 2669 दिनांक 11.12.15 द्वारा स्मारित भी किया गया। किन्तु श्री सिंह द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब समर्पित नहीं करने के कारण विभाग द्वारा एक पक्षीय निर्णय लेते हुए इनके पेंशन से 05% (पाँच प्रतिशत) की कटौती दो वर्षों के लिए करने के संबंध में सक्षम प्राधिकार के अनुमोदनोपरान्त एवं बिहार लोक सेवा आयोग से प्राप्त सहमति के आलोक में विभाग द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध निम्नलिखित दण्डादेश अधिरोपित करने का निर्णय लिया गयाः- (1) देय पेंशन 05% (पाँच प्रतिशत) की कटौती दो वर्षों के लिए। उक्त निर्णय के आलोक में श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह को निम्न दण्ड अधिरोपित किया एवं संसूचित किया जाता हैः- (1) देय पेंशन से 05% (पाँच प्रतिशत) की कटौती दो वर्षों के लिए।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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9 नवम्9 नवम्9 नवम्9 नवम्बरबरबरबर 2016201620162016

सं॰ 22 नि0 सि0 (भाग॰)-09-07/2010/2412—श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो (आई0 डी0-2539), तत्कालीन मुख्य अभियन्ता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर को वर्ष 2009-10 के उक्त पदस्थापन काल में रूपांकण प्रमण्डल सं0-1, भागलपुर द्वारा वर्ष 2009 के बाढ़ अवधि में दिनांक 01.07.09 से 15.09.09 तक कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य को नियमानुसार विभाग के निबंधित संवेदकों से नामांकन के आधार पर नहीं कराकर विभागीय प्रक्रिया के विपरीत विभाग में अनिबंधित संवेदक से कराये जाने के आरोप के लिए प्रथम द्रष्टव्या दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिए गये निर्णय के आलोक में इनके विरूद्ध आरोप पत्र प्रपत्र 'क' गठित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 770 दिनांक 11.07.12 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-19 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया। उक्त विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, तत्कालीन मुख्य अभियंता के दिनांक 30.

06.13 को सेवानिवृत हो जाने के फलस्वरूप इनके विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक 770 दिनांक 11.07.12 द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0 181 सह पठित ज्ञापांक 1609 दिनांक 31.12.13 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत सम्परिवर्तित किया गया।

विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी, श्री विवेक कुमार सिंह अपर विभागीय जॅाच आयुक्त सह प्रधान सचिव, पर्यावरण एव वन विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक 219 दिनांक 16.11.15 द्वारा समर्पित जॅाच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरान्त सरकार के स्तर पर लिए गये निर्णय के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर ''विभाग में अनिबंधित संवेदक से बाढ़ संधर्षात्मक कार्य कराये जाने के कार्यपालक अभियंता के प्रस्ताव की अनुशंसा करने, जो विभाग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के प्रतिकूल है'' के प्रमाणित आरोप के लिए श्री महतो, तत्कालीन मुख्य अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत से विभागीय पत्रांक 304 दिनांक 18.02.16 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत द्वितीय कारण पृच्छा किया गया।

श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, सेवानिवृत मुख्य अभियन्ता के पत्रांक- शून्य दिनांक 29.02.16 द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में निम्न तथ्यों को प्रस्तुत किया गयाः-

(i) नामांकन के आधार पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराने के लिए कार्यपालक अभियंता, अधीक्षण अभियंता और विभाग ही सक्षम प्राधिकार है। इसमें मुख्य अभियंता की कहीं कोई भूमिका उल्लेखित नहीं है।

(ii) अनिबंधित संवेदक से कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के प्रस्ताव की अनुशंसा श्री राजेश कुमार, तत्कालीन अधीक्षण अभियन्ता, सिंचाई अंचल, भागलपुर जो दिनांक 21.11.09 को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के प्रभार में थे, के द्वारा दी गयी थी। साक्ष्य के रूप में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के पत्रांक 3790 दिनांक 21.11.09 की छायाप्रति संलग्न की गयी है।

(iii) इनके द्वारा किसी संवेदक की नियुक्ति के बिन्दु पर कोई अनुशंसा नहीं की गयी है क्याेंकि इस प्रकार के कार्यों में मुख्य अभियंता की कोई भूमिका नहीं है।

(iv) इस मामले में श्री धनंजय प्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, रूपांकण प्रमण्डल सं0-1, भागलपुर को इस आधार पर आरोप मुक्त कर दिया गया क्योंकि यह मामला गंभीर प्रकृति का नहीं है और न ही कोई वित्तीय क्षति का25 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 मामला है। मात्र विभागीय प्रक्रिया के विपरीत कार्य कराने का आरोप है। अतएव इनके (श्री महतो के विरूद्ध) बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत विभागीय कार्यवाही नियमानुसार नहीं चलायी जा सकती।

(v) मामला वित्तीय क्षति और गंभीर प्रकृति का नहीं है। अतएव बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी0) के तहत विभागीय कार्यवाही का संचालन नियम विरूद्व है। श्री महतो द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा के उत्तर में प्रस्तुत किये गये उपर्युक्त तथ्यों की समीक्षा पुनः सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरान्त निम्न तथ्य पाये गयेः-

(i) बाढ़ सुरक्षात्मक कार्य दिनांक 01.07.09 से 15.09.09 तक कराये गये। (ii) श्री महतो दिनांक 13.11.09 से 30.11.09 तक उपार्जित अवकाश में थे। (iii) बाढ़ सुरक्षात्मक कार्य की अवधि, दिनांक 01.07.09 से 15.09.09 तक श्री महतो द्वारा कार्य स्थल का भिजिट (दौरा) किया गया है।

(iv) इस अवधि का पाक्षिक प्रतिवेदन प्रपत्र-24 श्री महतो द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित है। (v) कार्य प्रारम्भ के समय या इससे पूर्व अनिबंधित संवेदक से कार्य लेने के लिए कोई प्रस्ताव इनके द्वारा विभाग को नहीं भेजा गया।

(vi) विभाग में निबंधित संवेदक द्वारा कार्य में अभिरूचि नहीं लेने के लिए उनके विरूद्व कोई कार्रवाई नहीं की गयी।

उपर्युक्त पाये गये तथ्यों के आलोक में श्री महतो का द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर स्वीकार योग्य नहीं है एवं इनके विरूद्ध गठित आरोप पूर्णतया प्रमाणित पाया गया। फलस्वरूप श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, तत्कालीन मुख्य अभियन्ता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर सम्प्रति सेवानिवृत को उक्त प्रमाणित आरोप के लिए ''एक वर्ष के लिए पॅाच प्रतिशत पेंशन की कटौती'' का दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया। उक्त निर्णीत दण्ड पर माननीय मुख्यमंत्री का अनुमोदन एवं बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है।

सरकार के स्तर पर लिए गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, तत्कालीन मुख्य अभियन्ता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता हैः-

''एक वर्ष के लिए पॅाच प्रतिशत पेंशन की कटौती।''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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9 नवम्बर 20169 नवम्बर 20169 नवम्बर 20169 नवम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (भाग॰)-09-07/2010/2413—श्री राजेश कुमार (आई0 डी0-3472), तत्कालीन अधीक्षण अभियन्ता, सिंचाई अंचल, भागलपुर को वर्ष 2009-10 के उक्त पदस्थापन काल में रूपांकण प्रमण्डल सं0-1, भागलपुर द्वारा वर्ष 2009 के बाढ़ अवधि में दिनांक 01.07.09 से 15.09.09 तक कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य को नियमानुसार विभाग के निबंधित संवेदकों से नामांकन के आधार पर नहीं कराकर विभागीय प्रक्रिया के विपरीत विभाग में अनिबंधित संवेदक से कराये जाने के आरोप के लिए प्रथम द्रष्टव्या दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिए गये निर्णय के आलोक में इनके विरूद्ध आरोप पत्र प्रपत्र 'क' गठित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 771 दिनांक 11.07.12 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-19 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी, श्री विवेक कुमार सिंह अपर विभागीय जॅाच आयुक्त सह प्रधान सचिव, पर्यावरण एव वन विभाग के पत्रांक 220 दिनांक 16.11.15 द्वारा समर्पित जॅाच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरान्त सरकार के स्तर पर लिए गये निर्णय के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर विभागीय प्रक्रिया अनिबंधित संवेदको से संदर्भित बाढ़ संधर्षात्मक कार्य कराये जाने के प्रमाणित आरोपों के लिए श्री कुमार, तत्कालीन अधीक्षण अभियन्ता, सिंचाई अंचल, भागलपुर सम्प्रति अभियन्ता प्रमुख (उत्तर), जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना से विभागीय पत्रांक 305 दिनांक 18.02.16 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा किया गया।

श्री राजेश कुमार, तत्कालीन अधीक्षण अभियन्ता, सिंचाई अंचल, भागलपुर सम्प्रति अभियन्ता प्रमुख (उत्तर), जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक 32 दिनांक 19.02.16 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर समर्पित किया गया जिसमें निम्न तथ्यों को प्रस्तुत किया गयाः-

(i) अनिबंधित संवेदकों से बाढ़ संधर्षात्मक कार्य दिनांक 01.07.09 को कार्यपालक अभियन्ता द्वारा प्रारम्भ कराया गया जिसकी सूचना 21 (इक्कीस) दिनों के पश्चात दिनांक 16.07.09 को इन्हें दी गयी जिसकी पूर्वानुमति कार्यपालक अभियन्ता द्वारा नहीं ली गयी।

(ii) इनके द्वारा कार्य पर हुए व्यय से संबंधित पाक्षिक प्रतिवेदन प्रपत्र-24 अनुशंसा के साथ मुख्य अभियन्ता को भेजा गया क्योंकि संवेदक का भुगतान नहीं होने की स्थिति में मामला न्यायालय में जा सकता था।

(iii) कार्य पर हुए व्यय से संबंधित प्रपत्र-24 की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गयी थी तथा निर्णय लिया गया था कि आपातकालीन स्थिति में विभाग में निबंधित संवेदक से आपातकालीन स्थिति में गंगा नदी के कटाव से बुधुचक एवं विन्द टोली ग्राम को बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराकर स्थल की सुरक्षा सुनिश्चित की गयी है। इसलिए संवेदक विभाग में निबंधन करा ले तथा कार्य की जाँच उड़नदस्ता से कराने के पश्चात ही व्यय के अनुमोदन की कार्रवाई की जाय।26 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 (iv) उड़नदस्ता ने अपने प्रतिवेदन में अंकित किया है कि जल संसाधन विभाग में निबंधित संवेदक उपलब्ध नहीं होने पर आपातकालीन स्थिति में अन्य विभाग में निबंधित संवेदक से बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराया गया। कराये गये कार्य कारगर सिद्ध हुए हैं तथा आगे की क्षति रोकी गयी है।

(v) संवेदक द्वारा विभाग में निबंधन कराये जाने के पश्चात कराये गये कार्य के विरूद्ध आवंटन दिया गया एवं संवेदकों को भुगतान किया गया।

(vi) आरोप गंभाीर प्रकृति का नहीं है तथा सरकार को आर्थिक क्षति नहीं हुई है। (vii) अनिबंधित संवेदक से कार्य कराने वाले कार्यपालक अभियंता को विभाग ने आरोप मुक्त कर दिया है। श्री राजेश कुमार, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता सम्प्रति अभियंता प्रमुख (उत्तर) द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में प्रस्तुत उपर्युक्त तथ्यों की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरान्त निम्न तथ्य पाये गयेः-

(i) कार्यपालक अभियंता द्वारा अनिबंधित संवेदक से कार्य कराने की जानकारी प्रपत्र-24 प्राप्त होने के बाद हुई, इनका यह कथन स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि एक ही जिला मुख्यालय के सारे पदाधिकारी हैं तथा कार्य भी हो रहा है, फिर भी जानकारी नहीं होने की बात स्वीकार योग्य नहीं है।

(ii) कार्यपालक अभियंता के द्वारा की गयी भूल को सुधारने के बदले प्रपत्र-24 अनुशंसा कर इनके द्वारा भेजा गया।

(iii) कार्य के दौरान अधीक्षण अभियंता के रूप में ये कार्य स्थल पर मौजूद रहे हैं और निर्देश देते रहे हैं। इसलिए इनका यह कथन कि प्रपत्र-24 प्राप्त होने पर मामले की जानकारी इनको हुई तथा इनके द्वारा कार्यपालक अभियंता के प्रस्ताव को मात्र अनुशंसा कर भेजा गया, स्वीकार योग्य नहीं है।

(iv) निबंधित संवेदक के कार्य में अभिरूचि नहीं लेने तथा आपात स्थिति में अनिबंधित संवेदक से कार्य लेना जरूरी था तो इस आशय का प्रस्ताव उसी समय विभाग को भेजना था, जो इनके द्वारा नहीं किया गया।

(v) विभाग के निबंधित संवेदक द्वारा कार्य में अभिरूचि नहीं लेने के लिए उनके विरूद्ध इनके द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गयी।

उपर्युक्त पाये गये तथ्यों के आलोक में श्री राजेश कुमार का द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर स्वीकार योग्य नहीं है एवं इनके विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित पाया गया। फलस्वरूप उक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री राजेश कुमार, तत्कालीन अधीक्षण अभियन्ता, सिंचाई अंचल, भागलपुर सम्प्रति अभियन्ता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया हैः-

''एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक।'' उक्त निर्णीत दण्ड पर माननीय मुख्यमंत्री का अनुमोदन एवं बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है। सरकार के स्तर पर लिए गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजेश कुमार, तत्कालीन अधीक्षण अभियन्ता, सिंचाई अंचल, भागलपुर सम्प्रति अभियन्ता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता हैः-

''एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक।''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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15 नवम्बर 201615 नवम्बर 201615 नवम्बर 201615 नवम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पट॰)-03-02/2008/2433—पटना मुख्य नहर के सेवापथ कि0 मी0 58.20 से 124.20 तक पूर्व में कराये गये सड़क निर्माण कार्य की जाँच तकनीकी परीक्षण कोषांग द्वारा की गयी एवं निम्नलिखित आरोपों के लिए श्री आफताब आलम खाँ (आई0 डी0-3837), तत्कालीन सहायक अभियंता, सोन बाढ़ सुरक्षा प्रमण्डल, दीघा को प्रथम दृष्टया दोषी पाते हुए विभागीय पत्रांक 201 दिनांक 08.02.13 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र 'क' संलग्न करते हुए स्पष्टीकरण पूछा गयाः- आरोप सं0 1ः- परिवादित पथ में drainage की कोई व्यवस्था नहीं थी। साथ ही आलोच्य पथ के कि0 मी0 122.09 से कि0 मी0 109.50 के बीच Schematic Diagramme एवं 69.08 मील, 69.92 मील, 71.68 मील तथा 73.40 मील के आड़ीकाट के अवलोकन से स्पष्ट है कि आलोच्च पथ के बगल के समानान्तर चैनल के पूर्ण आपूर्ति स्तर (FSL) से खींचा गया HG Line आलोच्च पथ के क्रस्ट से पास करता है जिसे तकनीकी दृष्टिकोण से पथ के क्षतिग्रस्त होने का कारण माना गया। प्राक्कलन तैयार करने के समय उनके द्वारा उक्त तथ्य की अनदेखी की गई जिस कारण सेवापथ अल्पावधि में ही क्षतिग्रस्त हो जिसके लिए श्री खाँ प्रथम दृष्टया दोषी पाये गए।

आरोप सं0 2ः- परिवादित पथ में WBM परत के निर्माण के बाद इस पर Bituminous परत (यथा BUSG एवं प्रीमिक्स कारपेट का परत) तुरन्त नहीं किया गया बल्कि यह लगभग ढ़ाई वर्षों के बाद किया गया। MOST की विशिष्टि के अनुसार WBM परत के तुरन्त बाद Bituminous परत करने का प्रावधान है। Rural Road Manual IRC Special Publication 20-2002 के article 5.4.2 के अनुसार ''A gravel road on WBM layer can serve adequately as a surfacing depending on traffic volume. However, it is to be clearly understood that grainular material (like soil gravel mixture) will be lost gradually by traffic action and thickness will be reduced. Therefore, for gravel roads, extra thickness should be provided. Further for similar reasons, only WBM grade III27 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 should be used as a surfacing course. For an unsealed WBM Road other grainular surfacings like moorum, kanker etc. will have to be bladed as and when required to provide smooth riding surface. '' उपर्युक्त तकनीकी पहलुओं की उनके द्वारा अनदेखी करते हुए आलोच्य पथ में WBM परत के उपर 2'' यानि 50.

80 एम0 एम0 मूरम देने का प्रावधान नहीं किया गया। फलस्वरूप सेवापथ अत्यंत ही अल्पावधि में क्षतिग्रस्त हो गया जिसके लिए श्री खाँ प्रथम दृष्टया दोषी पाये गए।

आरोप सं0 3ः- आलोच्य पथ पर भारी वाहनों का आवागमन बेरोकटोक जारी रहा एवं इसकी सलत तेजी से खराब हुई जिसपर नियंत्रण लगाने हेतु आपके स्तर से कोई भी कार्रवाई नहीं की गयी।

आरोप सं0 4ः- याेंजना बनाने से लेकर प्राक्कलन की स्वीकृति तक सेवापथ के क्रस्ट की मोटाई एवं आवश्यक विशिष्टि पर सुसंगत विचार-विमर्श नहीं हुआ। विशेषज्ञों की अनुशंसा प्राप्त करने की कोशिश नहीं की गयी। IRC एवं सड़क-निर्माण से संबंधित उपलब्ध Guidelines में दिए गए अनुशंसााओं की अनदेखी की गयी। फलस्वरूप सेवापथ अत्यंत ही अल्पावधि में क्षतिग्रस्त हो गया।

उक्त के आलोक में श्री खाँ से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी एवं निम्न तथ्य पाया गयाः-

(1) आरोप सं0-3, जो भारी वाहनों के आवागमन के नियंत्रण से संबंधित है। आरोपी पदाधिकारी के मामले में अप्रासंगिक प्रतीत होता है क्योंकि कार्यारम्भ के पूर्व ही श्री खाँ 12.09.01 को आलोच्य कार्य से असम्बद्ध हो गए। (2) आरोप सं0-1 से संबंधित पथांश प्रमण्डल, दीघा के कार्याक्षेत्र के अन्तर्गत आता है एवं श्री खाँ 12.09.01 तक अवर प्रमण्डल, मैनपुरा के प्रभार में रहे एवं प्राक्कलन गठन में सहभागी रहे। जाँच पदाधिकारी का मत है कि HG line, Guideline एवं अन्य निदेशों/प्रावधानों की अनदेखी के कारण ही पथ क्षतिग्रस्त हुआ। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि Pavement के Typical नक्शा के आधार पर प्राक्कलन का गठन किया गया। जाँच प्रतिवेदन में भी प्राक्कलन का गठन अभियंता प्रमुख (मध्य) के पत्रांक 1303 दिनांक 14.11.2000 में दिए गए निर्देश एवं अनुलग्न किए गए पेभमेंट के टिपकल नक्शा के आधार पर किए जाने का उल्लेख है। उक्त से श्री खाँ के उक्त कथन की पुष्टि होती है परन्तु सहायक अभियंता के रूप में श्री खाँ को भी HG line की जाँच अन्य प्रावधानों को सम्बद्ध निदेशों/ Guideline /प्रावधानोें से संतुष्ट हो लेना चाहिए था। जबकि 68.53, 69.08, 69.92, 71.68 एवं 73.40 से HG line पथ के फ्रस्ट से पास करने का बोध होता है एवं किसी प्रकार के अंतर की स्थिति में उच्चाधिकारियों से दिशा निर्देश प्राप्त करना चाहिए था। आरोप सं0 1, 2 एवं 4 प्राक्कलन गठन में त्रुटियों से संबंधित है। स्वीकृति के पूर्व प्राक्कलन की जाँच कार्यपालक अभियंता, अधीक्षण अभियंता एवं मुख्य अभियंता स्तर पर भी की जाती है एवं किसी प्रकार के त्रुटियों का संशोधन संभावित होता है।

अतः समीक्षोपरान्त श्री आफताब आलम खाँ, तत्कालीन सहायक अभियंता, सोन बाढ़ सुरक्षा प्रमण्डल, दीघा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, जल निस्सरण प्रमण्डल, बेतिया के विरूद्ध आरोप सं0 1, 2 एवं 4 जो प्राक्कलन गठन से संबंधित है, आंशिक रूप से प्रमाणित पाया गया। प्रमाणित आरोपों के लिए श्री खाँ को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया।

(1) 2 (दो) वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। तदनुसार उक्त निर्णय के आलोक में श्री आफताब आलम खाँ, तत्कालीन सहायक अभियंता, सोन बाढ़ सुरक्षा प्रमण्डल, दीघा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, जल निस्सरण प्रमण्डल, बेतिया को निम्नांकित दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता हैः-

(1) 2 (दो) वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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15 नवम्बर 201615 नवम्बर 201615 नवम्बर 201615 नवम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पट॰)-03-02/2008/2434—पटना मुख्य नहर के सेवापथ कि0 मी0 58.20 से 124.20 तक पूर्व में कराये गये सड़क निर्माण कार्य की जाँच तकनीकी परीक्षण कोषांग द्वारा की गयी एवं निम्नलिखित आरोपों के लिए श्री पारस नाथ सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, सोन बाढ़ सुरक्षा प्रमण्डल, बिहटा को प्रथम दृष्टया दोषी पाते हुए विभागीय पत्रांक 200 दिनांक 08.02.13 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र 'क' संलग्न करते हुए स्पष्टीकरण पूछा गयाः-

आरोप सं0 1ः- परिवादित पथ में drainage की कोई व्यवस्था नहीं थी। साथ ही आलोच्य पथ के कि0 मी0 122.09 से कि0 मी0 109.50 के बीच Schematic Diagramme एवं 69.08 मील, 69.92 मील, 71.68 मील तथा 73.40 मील के आड़ीकाट के अवलोकन से स्पष्ट है कि आलोच्च पथ के बगल के समानान्तर चैनल के पूर्ण आपूर्ति स्तर (FSL) से खींचा गया HG Line आलोच्च पथ के क्रस्ट से पास करता है जिसे तकनीकी दृष्टिकोण से पथ के क्षतिग्रस्त होने का कारण माना गया। प्राक्कलन तैयार करने के समय उनके द्वारा उक्त तथ्य की अनदेखी की गई जिस कारण सेवापथ अल्पावधि में ही क्षतिग्रस्त हो जिसके लिए श्री सिंह प्रथम दृष्टया दोषी पाये गए।

आरोप सं0 2ः- परिवादित पथ में WBM परत के निर्माण के बाद इस पर Bituminous परत (यथा BUSG एवं प्रीमिक्स कारपेट का परत) तुरन्त नहीं किया गया बल्कि यह लगभग ढ़ाई वर्षों के बाद किया गया। MOST की विशिष्टि के28 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 अनुसार WBM परत के तुरन्त बाद Bituminous परत करने का प्रावधान है। Rural Road Manual IRC Special Publication 20-2002 के article 5.4.2 के अनुसार ''A gravel road on WBM layer can serve adequately as a surfacing depending on traffic volume. However, it is to be clearly understood that grainular material (like soil gravel mixture) will be lost gradually by traffic action and thickness will be reduced. Therefore, for gravel roads, extra thickness should be provided. Further for similar reasons, only WBM grade III should be used as a surfacing course. For an unsealed WBM Road other grainular surfacing like moorum, kanker etc. will have to be bladed as and when required to provide smooth riding surface. '' उपर्युक्त तकनीकी पहलुओं की उनके द्वारा अनदेखी करते हुए आलोच्य पथ में WBM परत के उपर 2'' यानि 50.

80 एम0 एम0 मूरम देने का प्रावधान नहीं किया गया। फलस्वरूप सेवापथ अत्यंत ही अल्पावधि में क्षतिग्रस्त हो गया जिसके लिए श्री सिंह प्रथम दृष्टया दोषी पाये गए।

आरोप सं0 3ः- आलोच्य सेवापथ पर भारी वाहनों का आवागमन बेरोकटोक जारी रहा एवं उसकी हालत तेजी से खराब होती रही जिसपर नियंत्रण लगाने हेतु आपके स्तर से कोई भी कार्रवाई नहीं की गयी। जिसके लिए श्री सिंह प्रथम दृष्टया दोषी पाये गए।

आरोप सं0 4ः- योजना बनाने से लेकर प्राक्कलन की स्वीकृति तक सेवापथ के क्रस्ट की मोटाई एवं आवश्यक विशिष्टि पर सुसंगत विचार-विमर्श नहीं हुआ। विशेषज्ञों की अनुशंसा प्राप्त करने की कोशिश नहीं की गयी। IRC एवं सड़क निर्माण से संबंधित उपलब्ध Guideline में दिए गए अनुशंसााओं की अनदेखी की गयी। फलस्वरूप सेवापथ अत्यंत ही अल्पावधि में क्षतिग्रस्त हो गया। जिसके लिए श्री सिंह प्रथम दृष्टया दोषी पाये गए।

आरोप सं0 5ः- कार्य को अधिक दिनों तक लंबित रखे जाने एवं विशिष्टियों का प्रावधान, प्राक्कलन के गठन में निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं होने के कारण पथ का निर्माण असफल रहा जिसके लिए श्री सिंह प्रथम दृष्टया दोषी पाये गए।

उक्त के आलोक में श्री सिंह से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी एवं निम्न तथ्य पाया गयाः-

आरोप सं0-1 के पथांश 122.09-109.50 कि0 मी0 आरोपी पदाधिकारी के कार्य़क्षेत्र 86.92-99.35 कि0 मी0 होने के आलोक में अप्रासंगिक पाया गया।

आरोप सं0-3 भारी वाहनों के आवागमन पर नियंत्रण की कार्रवाई आरोपी पदाधिकारी के मामले में अप्रासंगिक प्रतीत होता है क्योंकि यह मामला वर्ष 2005-06 का है जबकि श्री सिंह 22.08.03 को ही कार्यमुक्त हो गए।

आरोप सं0-5 का प्रथम अंश, जो कार्य को अधिक दिनों तक लंबित रखने से संबंधित है, इनके विरूद्ध प्रमाणित प्रतीत नहीं होता है क्योंकि श्री सिंह के कार्यक्षेत्र में WBM कार्य मई, 2002 में पूर्ण हुआ। जबकि खगौल प्रमण्डल का अलग-अलग पथांश में वर्ष 2003 एवं 2004 में पूर्ण हुआ एवं समय वृद्धि की स्वीकृति विभाग द्वारा दी गयी। साथ ही 27.03. 03 को पुनरीक्षित प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त हुई एवं 22.08.03 तक ही श्री सिंह कार्य से सम्बद्ध रहे।

आरोप सं0-2, 4 एवं 5 (अंश) प्राक्कलन गठन में विशिष्टियों में कमी से संबंधित है। मुख्य अभियंता, पटना के प्रतिवेदन से श्री सिंह को प्रथम चरण (WBM कार्य) के प्राक्कलन गठन में संलिपत्ता का बोध होता है। श्री सिंह के द्वारा कहा गया कि प्राक्कलन के लिए विशिष्टियों का निर्धारण कार्यपालक अभियंता एवं उनसे वरीय पदाधिकारी द्वारा किया जाता है, आंशिक रूप से स्वीकार योग्य पाया गया। सहायक अभियंता के रूप में आरोपित पदाधिकारी को ही प्राक्कलन में किए गए प्रावधान को सम्बद्ध निदेशों/प्रावधानों के आलोक में संतुष्ट होना चाहिए एवं किसी प्रकार का अंतर की स्थिति में वरीय पदाधिकारियों का दिशा निर्देश प्राप्त करना चाहिए। जाँच पदाधिकारी का स्पष्ट मत है कि प्राक्कलन गठन में निर्धारित मानकों में कमी एवं पथ निर्माण के Guideline का अनुपालन नहीं करने के कारण ही पथ क्षतिग्रस्त हुआ। स्वीकृति पूर्व प्राक्कलन की जाँच कार्यपालक अभियंता एवं मुख्य अभियंता स्तर पर भी की जाती है एवं त्रुटियों का संशोधन संभावित होता है। इस प्रकार श्री सिंह आरोप सं0-2, 4 एवं 5 (अंश) जो प्राक्कलन गठन से संबंधित है, के लिए आंशिक रूप से दोषी पाया गया।

अतः समीक्षोपरान्त श्री पारस नाथ सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, सोन बाढ़ सुरक्षा प्रमण्डल, बिहटा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, दरभंगा को प्रमाणित आरोपों के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

(1) 2 (दो) वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। तदनुसार उक्त निर्णय के आलोक में श्री पारस नाथ सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, सोन बाढ़ सुरक्षा प्रमण्डल, बिहटा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, दरभंगा को निम्नलिखित दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता हैः-

(1) 2 (दो) वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।29 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

30303030 नवम्बर 2016नवम्बर 2016नवम्बर 2016नवम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (मुज॰)-06-07/2012/2496—श्री श्याम कुमार यादव (आई0 डी0 4453), तत्कालीन अवर प्रमण्डल पदाधिकारी, जल पथ अवर प्रमण्डल, रीगा, मुजफ्फरपुर के पद पर पदस्थापित थे तो उनके विरूद्ध उक्त अवर प्रमण्डल में पदस्थापन अवधि के दौरान मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर के परिक्षेत्राधीन तिरहुत तटबंध के 7.50 कि0 मी0 से 9.50 कि0 मी0 के बीच एजेण्डा सं0 113/376 के तहत पहाड़पुर मनोरथ स्थल पर कराये गये कटाव निरोधक कार्याें का निरीक्षण तत्कालीन अभियंता प्रमुख (उत्तर) द्वारा दिनांक 12.06.12 को किया गया। अभियंता प्रमुख (उत्तर) द्वारा स्थल निरीक्षण के क्रम में दिये गये निदेशों का अनुपालन नहीं करने तथा अनावश्यक रूप से प्रस्ताव देने से संबंधित प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक 810 दिनांक 20.07.12 द्वारा श्री यादव से स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री यादव, तत्कालीन अवर प्रमण्डल पदाधिकारी, जल पथ अवर प्रमण्डल, रीगा, मुजफ्फरपुर से प्राप्त स्पष्टीकरण एवं इसी बीच विभागीय उड़नदस्ता अंचल द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरान्त श्री यादव के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं0 291 दिनांक 28.01.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के नियम-17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए मामले में श्री यादव को आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय श्री श्याम कुमार यादव, अवर प्रमण्डल पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमण्डल सं0-2, जबाड़ी रोड, भागलपुर को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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21 दिसम्बर 201621 दिसम्बर 201621 दिसम्बर 201621 दिसम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (पू॰)-01-11/2014/2599—श्री सुरेश चौधरी, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्ण्ाियाँ के विरूद्ध विभागीय पत्रांक 1262 दिनांक 28.05.15 द्वारा निम्नांकित आरोपों के लिए प्रपत्र 'क' के साथ स्पष्टीकरण पूछा गयाः-

(1) अवमाननावाद सं0 3180/2011 राजेन्द्र चौधरी बनाम राज्य सरकार एवं अन्य में विभाग की ओर से कारण पृच्छा दायर करने में विभागीय तथ्यों से अलग हटकर माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष कारण पृच्छा दायर किया गया, जिससे माननीय न्यायालय के समक्ष विभागीय स्थिति कमजोर हो गयी, हालांकि एम0 जे0 सी0 निरस्त हो गया किन्तु वादी को यह स्वतंत्रता प्राप्त हो गयी कि वे अपनी माँगों के संबंध में अन्य फोरम पर भी वस्तुस्थिति को रख सकते हैं।

(2) मुख्य अभियंता, पूर्ण्ाियाँ द्वारा अपने पूरे परिक्षेत्र के समूह 'घ' के पद की रिक्तियों का आकलन करते हुए रिक्तियों की सूचना जिला समाहरणालय, पूर्णियाँ को भेजा गया, जबकि रिक्तियाँ पूर्णियाँ के अतिरिक्त कटिहार, किशनगंज, अररिया, सहरसा, सुपौल एवं मधेपुरा जिला से भी संबंधित थी।

(3) कोषरक्षक एवं दफ्तरी के पदों पर सीधी नियुक्ति नहीं की जाती है बल्कि यह पद अनुसेवकों से भरा जाता है फिर भी इन पदों पर भी सीधी भर्त्ती हेतु अधियाचना की गई।

(4) मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ द्वारा दैनिक वेतनभोगी कर्मियों की नियुक्ति के संबंध में समय-समय पर निर्गत विभागीय निर्देशों के प्रतिकूल कार्रवाई की गयी।

पूछे गये उपरोक्त स्पष्टीकरण के विरूद्ध श्री सुरेश चौधरी द्वारा प्रतिउत्तर समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से उल्लेख किया गया हैः-

(i) माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विभागीय पत्रांक 716 दिनांक 27.05.10 द्वारा न्यायादेश के अनुपालन हेतु दिये गये विस्तृत निदेश को आधार बनाते हुए तथ्य रखा गया था कि पूर्णियाँ परिक्षेत्र से संबंधित रोस्टर क्लीयरेंस की कार्रवाई की जा रही है। प्रमण्डलीय आयुक्त से रोस्टर क्लीयरेंस पर अनुमोदन प्राप्त करने के पश्चात नियुक्ति संबंधी कार्रवाई आरक्षण नियम एवं राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर निर्धारित विहित प्रक्रिया तथा पत्रांक 639 दिनांक 16.03.06 एवं पत्रांक 851 दिनांक 24.02.08 के आलोक में की जायेगी।

(ii) दायर कर पृच्छा के आलोक में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा MJC No. 1242/2010 को इस निर्देश के साथ निरस्त कर दिया कि प्रतिवादी इस दिशा में त्वरित कार्रवाई करें।

(iii) विभागीय पत्रांक 716 दिनांक 27.05.10 के आलोक में न्याय निर्णय के अनुपालन हेतु मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ परिक्षेत्र के वर्ग-4 के पदों यथा अनुसेवक/कोषरक्षक/दफ्तरी पदों का आरक्षण रोस्टर तैयार कर अनुमोदन हेतु प्रमण्डलीय आयुक्त, पूर्णियाँ को मेरे पदस्थापन के पूर्व क्रमशः पत्रांक 319 दिनांक 12.02.11, पत्रांक 423 दिनांक 23.02.11 एवं पत्रांक 424 दिनांक 23.02.11 द्वारा भेजी जा चुकी थी।

(iv) आयुक्त, पूर्णियाँ प्रमण्डल, पूर्णियाँ के पत्रांक 695 दिनांक 23.03.11, पत्रांक 857 दिनांक 05.04.11 एवं पत्रांक 838 दिनांक 01.04.11 से क्रमशः अनुसेवक/कोषरक्षक एवं दफ्तरी पदों का रोस्टर अनुमोदनोपरान्त प्राप्त होने के पश्चात तत्कालीन मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ द्वारा पत्रांक 1081 दिनांक 11.05.11 से अनुमोदित रोस्टर के अनुसार परिक्षेत्राधीन चतुर्थवर्गीय रिक्त पदों का पदभार आरक्षण कोटि का उल्लेख करते हुए CWJC No. 14721/2009 एवं उद्‌भूत MJC No.

30 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

1242/2010 में माननीय न्यायालय द्वारा पारित न्यायादेश के अनुपालन हेतु नियुक्ति की अगली प्रक्रिया का निर्धारण तथा समाचार पत्र में विज्ञापन प्रकाशित कर नियुक्ति किये जाने की परिस्थिति में विज्ञापन संबंधी प्रारूप तथा आवेदन पत्र का प्रारूप तैयार कर अनुमोदन हेतु विभाग में समर्पित किया गया था। साथ ही यह भी प्रतिवेदित किया गया था कि उक्त नियुक्ति से वित्तीय बोझ बढ़ेगा तदनुसार इस संदर्भ में वित्त विभाग से भी सम्पुष्टि की आवश्यकता है।

(v) यह कि उपरोक्त संदर्भ में विभागीय मार्गदर्शन प्राप्त होने मेें हो रहे विलम्ब के मद्धेनजर इस हेतु पुनः पत्रांक 1358 दिनांक 14.06.11 एवं पत्रांक 1686 दिनांक 19.07.11 द्वारा विभाग से अनुरोध किया गया था।

(vi) CWJC No. 14721/2009 में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुपालनार्थ विभागीय पत्रांक 716 दिनांक 27.05.16 से प्राप्त आदेश के तहत इस परिक्षेत्राधीन वर्ग-4 के सभी पदों पर नियुक्ति हेतु अग्रेतर कार्रवाई के निमित्त उक्त पदों पर रोस्टर क्लीयरेंस के कार्रवाई अंतिम रूप से दिनांक 23.02.11 तक अर्थात अधोहस्ताक्षरी के पदस्थापन के पूर्व ही पूरी की जा चुकी थी। फलतः न्यायदेश के त्वरित निष्पादनार्थ अनुमोदित रोस्टर के अनुरूप परिक्षेत्राधीन समूह 'घ' के पदों की रिक्तियाँ जिला समाहरणालय, पूर्णियाँ को प्रतिवेदित की गयी।

(vii) विभागीय पत्रांक 716 दिनांक 27.05.10 में वर्ग-4 के सभी रिक्त पदों पर नियुक्ति हेतु निहित आदेश के अनुसार परिक्षेत्राधीन वर्ग-4 के सभी नियमित स्वीकृत पद यथा- अनुसेवक/दफ्तरी एवं कोषरक्षक के स्वीकृत बल/रिक्त पदों पर रोस्टर क्लीयरेंस उनके पदस्थापन के पूर्व ही कराया जा चुका था। फलतः उक्त क्रम में ही न्यायादेश के त्वरित अनुपालनार्थ नियुक्ति की कार्रवाई हेतु विधिवत अधियाचना उनके द्वारा की गई।

(viii) पूर्णियाँ परिक्षेत्राधीन कतिपय ऐसे दैनिक वेतनभोगी कर्मी जो माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में विभागीय अनुमोदन के फलस्वरूप वेतनमान के न्यूनतम प्रक्रम पर कार्यरत हैंं, किन्तु वे आज तक नियमित नहीं हो सके हैं, वैसे दैनिक वेतनभोगी कर्मियों के नियमितीकरण/ समयोजन के संबंध में परिस्थितिजन्य कार्रवाई हेतु मुख्य अभियंता स्तर पर गठित समिति की दिनांक 16.12.11 को आहूत बैठक में एक आम राय बनी थी, किन्तु उस पर विभागीय निर्देशों के प्रतिकूल कोई भी अग्रेतर कार्रवाई उनके द्वारा नहीं की गई।

श्री चौधरी से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा उच्च स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया किः- जल संसाधन विभाग के अन्तर्गत मुख्य अभियंता परिक्षेत्राधीन छटनीग्रस्त/कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मियों के नियमितीकरण के मामला सामान्य प्रशासन विभाग के संकल्प सं0 639 दिनांक 16.03.06 एवं माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन रहने के कारण समूह 'घ' के पद पर सीधी नियुक्ति नहीं किये जाने का स्पष्ट निदेश विभागीय पत्रांक 321 दिनांक 23.02.12 द्वारा परिचारित है। इसके बावजूद श्री चौधरी द्वारा एम0 जे0 सी0 सं0 3180/2011 राजेन्द्र चौधरी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य के मामले में विभाग द्वारा निरूपित तथ्य के विरूद्ध श्री चौधरी ने माननीय उच्च न्यायालय, पटना में पूरक कारण पृच्छा दायर किया, जिसके कारण विभाग को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं श्री चौधरी द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में विभागीय स्टैंड से अलग कारण पृच्छा दायर किये जाने के कारण विभाग को माननीय उच्च न्यायालय में द्वितीय कारण पृच्छा करना पड़ा। इस प्रकार श्री चौधरी अवमाननावाद सं0 3180/2011 में विभागीय तथ्यों के प्रतिकूल कारण पृच्छा दाखिल करने के लिए दोषी पाये गये हैं।

पूर्णियाँ परिक्षेत्र के समूह 'घ' के रिक्तियों का रोस्टर क्लीयरेंस पर प्रमण्डलीय आयुक्त से अनुमोदन के उपरान्त रिक्तियों का आकलन कर रिक्तियों की सूचना पूर्णियाँ के अतिरिक्त अन्य जिला से संबंधित रहने के कारण संबंधित समाहरणालय को भेजा जाना था, जो इनके द्वारा नहीं किया गया है। इस तथ्य की स्वीकारोक्ति श्री चौधरी द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण में दी गयी है।

इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरान्त उपरोक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री सुरेश चौधरी, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ को ''दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक'' का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय सक्षम प्राधिकार द्वारा लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुरेश चौधरी, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ सम्प्रति मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, गया को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता हैः-

''दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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21 दिसम्बर 201621 दिसम्बर 201621 दिसम्बर 201621 दिसम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (मुज॰)-06-10/2012/2601—श्री जीवन कुमार वर्मा (आई0 डी0 जे0-4972), तत्कालीन सहायक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमण्डल, हाजीपुर के पद पर पदस्थापित थे तो उनके विरूद्ध उक्त प्रमण्डल में पदस्थापन अवधि के दौरान वर्ष 2012 में मलिकपुर शाखा नहर के वि0 दू0 56.00 पर कराये गये कैनाल लाईनिंग कार्यों में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गयी। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरान्त प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक 657 दिनांक 11.06.13 द्वारा श्री वर्मा से स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री वर्मा से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरान्त विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं0 1827 दिनांक 04.12.14 द्वारा श्री वर्मा के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 (2) मेंं विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। संचालन पदाधिकारी से31 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए ब्रिक लाईनिंग कार्य में व्यवहृत प्लास्टर में सीमेन्ट की मात्रा में कमी के आरोप को अप्रमाणित एवं असहमत होते हुए कैनाल लाईनिंग कार्य में व्यवहृत ईंट के कम्प्रेशिव स्ट्रेन्थ 70.72 kg/cm2 पाये जाने के आरोप को प्रमाणित पाया गया तथा असहमति के निम्न बिन्दु पर विभागीय पत्रांक 1072 दिनांक 10.06.16 द्वारा श्री वर्मा से द्वितीय कारण पृच्छा किया गया। (i) I. S. Code 5454 में प्रावधान है कि Compressive strength of any individual brick tested in the sample shall not below the minimum average compressive strength for the corresponding class of brick more than 15%.

32 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

जीउत सिंह, उप-सचिव।

33 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

उक्त निर्णय के आलोक में श्री अशोक कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, चम्पारण प्रमण्डल, मोतिहारी के पूर्व के दण्ड यथाः- (i) एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोेक।

(ii) तीन वर्र्षों तक प्रोन्नति पर रोक को बरकरार रखा जाता है। उक्त निर्णय श्री कुमार को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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22226 दिसम्बर 20166 दिसम्बर 20166 दिसम्बर 20166 दिसम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (मोति॰)-08-15/2014/2643—श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (आई0 डी0 3501), चम्पारण प्रमण्डल, मोतिहारी के विरूद्ध दिनांक 16.08.14 को चम्पारण तटबंध के कि0 मी0 9.00 पर टूटान/कटान के प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोप के लिए विभाग द्वारा स्पष्टीकरण पूछकर विभागीय कार्यवाही चलाने का निर्णय लिया गया। तटबंध टूटने/काटने के संबंध में इनके द्वारा कोई सूचना/कार्रवाई इनके द्वारा नहीं की गयी जबकि तटबंधों की सुरक्षा के लिए प्रत्येक कि0 मी0 पर एक-एक होमगार्ड की व्यवस्था विभाग द्वारा की गयी थी। इनके द्वारा तटबंधों की सुरक्षा में बरती गयी लापरवाही एवं अपने दायित्वों का सफल निर्वहन नहीं करने के लिए विभागीय पत्रांक 1323 दिनांक 12.09.14 द्वारा स्पष्टीकरण की गयी।

श्री ठाकुर द्वारा अपने पत्रांक 01 दिनांक 29.11.14 द्वारा स्पष्टीकरण का जवाब समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरान्त श्री ठाकुर के विरूद्ध आरोप प्रपत्र 'क' के साथ द्वितीय कारण पृच्छा करने का निर्णय लिया गया एवं एतद संबंधी विभागीय पत्रांक 1673 दिनांक 27.07.15 द्वारा आरोप प्रपत्र 'क' के साथ द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। श्री ठाकुर द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब अपने पत्रांक 01 दिनांक 12.04.16 द्वारा विभाग को समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में पाया गया कि श्री ठाकुर द्वारा S O P की कंडिका 4.4 का उल्लंघन करते हुए तटबंध की सुरक्षा के लिए सतत्‌ निगरानी/गठित नहीं करने तथा प्रशिक्षित श्रमिकों की प्रतिनियुक्ति नहीं करने, तटबंध की सेवा पथ को ठीक करने की दिशा में कार्रवाई नहीं करने, टूटान का ससमय सूचना नहीं देने तथा अपने दायित्वों में लापरवाही बरतने का आरोप प्रमाणित पाया गया।

उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री ठाकुर के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गयाः- ''दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक'। उक्त निर्णय के आलोक में श्री ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध निम्न दण्ड संसूचित किया जाता हैैः-

(i) ''दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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27 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (दर॰)-16-05/2013/2648—श्री दीन दयाल तिवारी (आई0 डी0 2338), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, सकरी द्वारा अपने उक्त पदस्थापन काल में बरती गई कतिपय अनियमितताओें की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से कराई गई। उड़नदस्ता अंचल द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त लिये गये निर्णय के आलोक में विभागीय पत्रांक 1398 दिनांक 22.06.15 द्वारा श्री तिवारी से स्पष्टीकरण किया गया। श्री तिवारी द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त श्री तिवारी के विरूद्ध प्रतिवेदित आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित पाया गया। फलतः श्री तिवारी के विरूद्ध आरोप पत्र प्रपत्र 'क' गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित करने का निर्णय लिया गया।

उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय संकल्प सह पठित ज्ञापांक 302 दिनंक 18.02.16 द्वारा श्री तिवारी के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम-43 (बी0) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया।

आरोप सं0-1- पश्चिमी कोशी मुख्य नहर के वि0 दू0 143.95 पर स्थानीय ग्रामीणों द्वारा अवैध रूप से नहर काटकर ह्‌यूम पाईप लगाने के पूर्व सूचना रहने के बावजूद वरीय अधिकारियों को सूचना नहीं देने, नहर पर पैट्रोलिंग नहीं करने तथा लापरवाही बरते जाने के लिए दोषी हैं।

आरोप सं0-2- विभागीय निदेश के बावजूद अवैध रूप से नहर काटे जाने की प्राथमिकी स्वयं दर्ज नहीं कराकर कनीय अभियंता से कराये जाने से विभागीय निर्देश की अवहेलना, अनुशासनहीना एवं कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही बरतने के लिए दोषी हैंंं।

श्री तिवारी का बचाव बयानः-

श्री तिवारी ने अपने बचाव बयान में स्पष्ट किया कि घटना से संबंधित स्थल के आसपास का सिचांई क्षेत्र उनके कार्यक्षेत्र में नहीं था। घटना की तिथि यानि 28.08.13 के पूर्व नहर काटे जाने की तैयारी के संबंध में उन्हें कोई सूचना नहीं34 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 थी। स्थल पर आउटलेट लगाये जाने संबंधी प्रावधान भी योजनान्तर्गत नहीं था। किसानों द्वारा इस स्थल पर ह्‌यूम पाईप लगाने की माँग भी नहीं की गई थी।

संचालन पदाधिकारी का मंतव्यः-

संबंधित स्थल का कमाण्ड क्षेत्र श्री तिवारी के कार्यक्षेत्र में नहीं था। वर्ष 2012 में जिलाधिकारी, मधुबनी को लिखे गये पत्र से आरोपित पदाधिकारी की सजगता स्वतः झलकती है। घटना के उपरान्त इनके द्वारा संबंधित प्रशासनिक/पुलिस पदाधिकारी एवं विभागीय वरीय पदाधिकारियों को सूचित करने के साथ स्वयं घटनास्थल पर पहुँच कर कार्रवाई की गई। कार्यपालक अभियंता द्वारा स्वयं उपस्थित रहकर कनीय अभियंता से प्राथमिकी दर्ज कराई गई। आरोपित पदाधिकारी को स्वयं ही प्राथमिकी दर्ज करना है, की जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं थी। अतः श्री तिवारी के विरूद्ध प्रतिवेदित दोनों आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री तिवारी को आरोपमुक्त करने का निर्णय लिया गया।

सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री दीन दयाल तिवारी (आई0 डी0 2338), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल, सकरी सम्प्रति सेवानिवृत को आरोपमुक्त किया जाता है।

सरकार का उक्त निर्णय श्री तिवारी को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से,

जीउत सिंह, उप-सचिव।

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27 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 201627 दिसम्बर 2016

सं॰ 22 नि0 सि0 (दर॰)-16-05/2013/2649— श्री राजीव रंजन प्रसाद (आई0 डी0 2138), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल सं0-1, राजनगर द्वारा अपने उक्त पदस्थापन काल में बरती गई कतिपय अनियमितताओें की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से कराई गई। उड़नदस्ता अंचल द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त लिये गये निर्णय के आलोक में विभागीय पत्रांक 1399 दिनांक 22. 06.16 द्वारा श्री प्रसाद से स्पष्टीकरण किया गया। श्री प्रसाद द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त श्री प्रसाद के विरूद्ध प्रतिवेदित आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित पाया गया। फलतः श्री प्रसाद के विरूद्ध आरोप पत्र प्रपत्र 'क' गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित करने का निर्णय लिया गया।

उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय संकल्प सह पठित ज्ञापांक 301 दिनंक 18.02.16 द्वारा श्री प्रसाद के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम-43 (बी0) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया।

आरोप-

विभागीय निदेश के बावजूद अवैध रूप से नहर काटे जाने की प्राथमिकी स्वयं दर्ज नहीं कराकर कनीय अभियंता से कराये जाने से विभागीय निदेश की अवहेलना, अनुशासनहीना एवं कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही बरतने के लिए दोषी हैंंं। श्री प्रसाद का बचाव बयानः-

श्री प्रसाद द्वारा अपने बचाव बयान में कहा गया कि कार्यपालक अभियंता को ही प्राथमिकी दर्ज करना है, से संबंधित निदेश की सूचना प्राप्त नहीं हुआ था। यदि विभागीय निर्देश स्पष्ट रूप से प्राप्त होता तो वे स्वयं के स्तर से प्राथमिकी दर्ज करते।

संचालन पदाधिकारी का मंतव्यः-

स्थल से भलीभाँति अवगत रहने से एवं घटना के प्रत्यक्षदर्शी द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराया जाना एवं स्वभाविक एवं उचित प्रक्रिया है। कार्यपालक अभियंता को प्राथमिकी दर्ज करने संबंधी स्पष्ट निदेश की सूचना के अभाव में कनीय अभियंता द्वारा प्राथमिकी दर्ज किये जाने की कार्रवाई सम्यक है। श्री प्रसाद के विरूद्ध प्रतिवेदित आरोप प्रमाणित नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री प्रसाद को आरोपमुक्त करने का निर्णय लिया गया।

सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजीव रंजन प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमण्डल सं0-1, राजनगर सम्प्रति सेवानिवृत को आरोपमुक्त किया जाता है।

सरकार का उक्त निर्णय श्री प्रसाद को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, उप-सचिव।35 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017

सं॰ 5 नि0गो0वि0 (1) 03/2012-416नि॰गो॰

पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग

——— संकल्प

26 दिसम्बर 2016

जिला पशुपालन पदाधिकारी, गोपालगंज के द्वारा डा0 सियाराम महतो, तत्कालीन प्रखण्ड पशुपालन पदाधिकारी, माँझा, गोपालगंज के विरूद्ध दिनांक 06.09.1999 से बिना किसी सूचना के अनुपस्थित रहने संबंधी आरोप के लिए प्रपत्रा-'क' गठित कर पत्राांक-430 दिनांक 05.06.2008 के द्वारा विभाग को सूचित किया गया।

2. उक्त आरोप के लिए डा0 महतो के विरूद्ध विभागीय संकल्प-75 नि0गो0 दिनांक 02.04.2009 के द्वारा विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी। जाँच पदाधिकारी के द्वारा जाँच प्रतिवेदन के निष्कर्ष में डा0 महतो के विरूद्ध अधिरोपित आरोप को प्रमाणित बताते हुए निष्कर्ष में यह भी उल्लेख किया गया था कि डा0 महतो दिनांक 31.12.2004 को सेवानिवृत हो गये है।

3. जाँच प्रतिवेदन के समीक्षा के क्रम में यह पाया गया कि जिला पशुपालन पदाधिकारी, गोपालगंज ने दिनांक 04.06.2008 को अपने स्तर से संबंधित आरोपित पदाधिकारी (डा0 महतो) के विरूद्ध गठित आरोप पत्रा में उनके सेवानिवृत होने की कोई चर्चा नहीं की थी और उन्हें अपने कर्त्तव्य से अनुपस्थित बताया गया। फलतः बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्राण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में विहित प्रक्रिया के अनुरूप डा0 महतो के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित करने का निर्णय लिया गया, जबकि समीक्षा के क्रम में यह पाया गया कि विभागीय कार्यवाही के संचालन के पूर्व ही डा0 महतो सेवानिवृत हो चुके है।

4. चूँकि सेवानिवृत सरकारी सेवकों के लिए बिहार पेंशन नियमावली 2005 के नियम 43 (बी) के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही के संचालन का प्रावधान है लेकिन जिला पशुपालन पदाधिकारी, गोपालगंज के द्वारा डा0 महतो के सेवानिवृति संबंधी वास्तविक स्थिति प्रतिवेदित नहीं किये जाने के कारण उनके विरूद्ध विभागीय कार्यवाही का संचालन सेवारत्‌ सरकारी सेवकों के लिए निर्धारित रीति के तहत किया गया था जो त्राुटिपूर्ण था।

5. सामान्य प्रशासन विभाग के पत्राांक-3448 दिनांक 02.12.2016 में वर्णित प्रावधानानुसार किसी भी मामले के प्रकाश में आने के चार वर्षों के अन्दर बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की जा सकती है। डा0 महतो का मामला वर्ष 2008 के पूर्वाद्ध में प्रकाश में आया था। फलस्वरूप वर्ष 2012 के पूर्वाद्ध तक विभागीय कार्रवाई का संचालन संभव हो सकने के कारण ही डा0 महतो के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्राण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 में विहित प्रावधान के तहत संचालित विभागीय कार्यवाही को त्राुटि मार्जित कर उसे निरस्त करते हुए बिहार पेंशन नियमावली 2005 के नियम 43 (बी) के तहत नए सिरे से विभागीय कार्यवाही संचालित करने का निर्णय लिया गया। तदोपरांत उक्त निर्णय के आलोक में डा0 महतो के विरूद्ध संकल्प 196 नि0गो0 दिनांक 09.05.2011 के द्वारा नए सिरे से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

6. जाँच पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन दिनांक 02.12.2011 में डा0 सियाराम महतो के विरूद्ध गठित अनाधिकृत अनुपस्थिति संबंधी आरोप को प्रमाणित पाया गया। उक्त प्रमाणित आरोप पर डा0 महतो द्वारा द्वितीय लिखित अभिकथन समर्पित नहीं किया गया।

7. उक्त के आलोक में मामले की समीक्षा की गयी एवं समीक्षोपरांत पाया गया कि सामान्य प्रशासन विभाग ने जिस पत्राांक-3448 दिनांक 02.12.2006 के प्रावधान के आलोक में डा0 महतो के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी है, वह परिपत्रा सामान्य प्रशासन विभाग के पत्राांक-1893 दिनांक 14.06.2011 के द्वारा तुरंत प्रभाव से अवक्रमित कर दिया गया है। नये प्रावधाननुसार सेवा निवृत पदाधिकारी के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी) के तहत संचालित होने वाली विभागीय कार्यवाही हेतु चार वर्षो की गणना घटना की तिथि से होगी न कि घटना की जानकारी से। इस प्रकार डा0 महतो का आरोप वर्ष 1999 से 2004 के होने के कारण विभागीय कार्यवाही का कालबाधित होने के बिन्दु पर विधि विभाग का परामर्श प्राप्त किया। विधि विभागीय परामर्श के आलोक में सर्वप्रथम विभागीय आदेश-276 नि0गो0 दिनांक 30.04.2014 के द्वारा डा0 सियाराम महतो का दिनांक 06.09.1999 से 31.12.2004 (से0नि0 तिथि) तक की अनाधिकृत अनुपस्थित अवधि को असाधारण अवकाश के रूप में स्वीकृति प्रदान की गयी।36 Pबहार गजट, 11 जनवर(cid:15) 2017 8. डा0 महतो के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के कालबाधित होने के बिन्दु पर पुनः विधिक परामर्श प्राप्त किया गया। विधि विभाग द्वारा परामर्श दिया गया कि डा0 महतो के विरूद्ध विभागीय कार्रवाई वर्ष 2008 में, वर्ष 1999 से लेकर वर्ष 2004 तक की घटना के संबंध में चलायी जा रही है, जो चार वर्ष की निर्धारित समय-सीमा के अन्दर प्रतीत होती है। अतः डा0 सियाराम महतो के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली, 1990 के नियम 43 (बी) के अंतर्गत विभागीय कार्रवाई कालबाधित नहीं मानी जायेगी।

9. विधिक परामर्शानुसार डा0 महतो के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को कालबाधित नहीं माना गया। अतः डा0 महतो के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को निष्पादन हेतु दिनांक 30.06.2016 के दैनिक समाचार पत्रा हिन्दुस्तान में सूचना प्रकाशन के माध्यम से उन्हें द्वितीय लिखित अभिकथन समर्पित करने का निदेश दिया गया (चूँकि पूर्व में उनके स्तर से द्वितीय लिखित अभिकथन अप्राप्त था) परन्तु उनके स्तर से कोई जबाव समर्पित नहीं किया गया।

10. उक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में लगातार पाँच वर्षो से अधिक समय तक अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने संबंधी प्रमाणित आरोपों पर उच्च स्तरीय निर्णय के क्रम में पाया गया कि आरोपित पदाधिकारी दिनांक 31.12.2004 को सेवा निवृत हुए। अतः दिनांक 09.05.2011 को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित करना नियमानुकूल नहीं माना जा सकता है क्योंकि यह मामला कालबाधित है।

11. अतः वर्णित तथ्यों के आलोक में विभागीय कार्यवाही कालबाधित होने के कारण आरोपित पदाधिकारी डा0 सियाराम महतो (सेवा निवृत) तत्कालीन प्रखण्ड पशुपालन पदाधिकारी, माँझा, गोपालगंज के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी) के तहत संचालित विभागीय कार्यवाही को समाप्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

12. अतः सरकार द्वारा लिए गये निर्णय के आलोक में डा0 सियाराम महतो, तत्कालीन प्रखण्ड पशुपालन पदा0, माँझा, गोपालगंज सम्प्रति सेवा निवृत के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को समाप्त किया जाता है।

vkns'k%- आदेश दिया जाता है कि इस संकल्प की प्रति सभी संबंधितों को भेज दी जाय।

बिहार राज्यपाल के आदेश से,

वीरेन्द्र कुमार सिन्हा, अवर सचिव।

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Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 11 January 2017. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2017-01-11.2/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2017-01-11.2.