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(स(cid:25)(cid:18) पटन(cid:4) 142) पटन(cid:4)(cid:29) ब१धव(cid:4)र(cid:29) 30 जनवर(cid:15) 2019 सं॰ 08/आरोप-01-18/2016-9857/सा0प्र0 lkekU; iz'kklu foHkkx
——— ladYi
25 tqykbZ 2018
श्री शत्रुंजय कुमार मिश्र, बि॰प्र॰से॰, कोटि क्रमांक-899/08, 673/11, तत्कालीन अंचलाधिकारी, डेहरी के विरूद्ध जिला पदाधिकारी, रोहतास के पत्रांक-1799 दिनांक 30.05.2003 एवं पत्रांक 2940 दिनांक 18.09.2003 द्वारा सरकारी जमीन पर स्थित पेड़ की अवैध कटाई हो जाने के फलस्वरूप निलामी का पैसा लेकर पेड़ की निलामी नहीं करने, गलत पते के आधार पर आवासीय प्रमाण-प्रत्र निर्गत करने, भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचारिता एवं सरकारी निर्देशों के अवहेलना करने का आरोप प्रतिवेदित किया गया। प्रतिवेदित आरोपों के लिए श्री मिश्र के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संकल्प ज्ञापांक-6682 दिनांक 28.06.2007 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही के फलस्वरूप प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा में यह पाया गया कि संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री मिश्र के विरूद्ध प्रतिवेदित आरोपों को तकनीकी आधार पर प्रमाणित नहीं माने जाने का मंतव्य दिया गया, किन्तु यह सुस्पष्ट है कि अवैध रूप से काटे गये पेड़ की निलामी श्री मिश्र द्वारा नहीं किया गया। उनका दायित्व था कि सरकारी पेड़ की अवैध कटाई को वे रोकते तथा यदि पेड़ काट ली गयी थी तो उसकी निलामी करते किन्तु उनके द्वारा इस दायित्व का निर्वाह नहीं किया गया। स्पष्ट है कि श्री मिश्र द्वारा प्रशासनिक लापरवाही बरती गयी तथा उनसे चूक हुयी। उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-8104 दिनांक 23.05.2013 द्वारा श्री मिश्र को (i) दो वेतन वृद्धियों असंचयात्मक रूप से दो वर्षो तक रोकने का दंड संसूचित किया गया।
उक्त दंडादेश के विरूद्ध श्री मिश्र द्वारा माननीय उच्च न्यायालय पटना में दायर सी॰डब्ल्यू॰जे॰सी॰सं॰- 11801/14 में दिनांक 03.05.16 को पारित आदेश का कार्यकारी अंश निम्नवत् है :-
"In view of above, the impugned order of punishment is not sustainable in law and the same accordingly quashed.
2 ॢबह(cid:4)र गजट (cid:10)[स(cid:4)ध(cid:4)रण(cid:15)(cid:16) 30 जनवर(cid:15) 2019 माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित उपर्युक्त न्यायादेश के विरूद्ध एल॰पी॰ए॰ सं॰-1488/16 दायर किया गया। जिसमें माननीय न्यायालय द्वारा दिनांक 18.08.2017 को पारित आदेश का कार्यकारी अंश निम्नवत् है :-''It is the State's appeal under Clause 10 of the Letters Patent and the only reason which weighed with the learned Writ Court for interfering with the order of punishment, i.e. stoppage of two increments without cumulative effect was that the Enquiry Officer exonerated the delinquent employee and without a show cause notice to him the disciplinary authority disagreed with the finding of the Enquiry Officer, recorded his own finding and thereafter proceeded to impose the punishment. The learned Writ Court has found that this is not permissible and in doing so the learned Writ Court has followed the principle laid down by the Supreme Court in the case of Punjab National Bank and others Vs. Kunj Bihari Misra: (1998) 7 SCC 84.
we find no error in the order to the learned Writ Court warranting reconsideration.
The appeal is dismissed."
एल॰पी॰ए॰ सं॰-1488/16 में माननीय न्यायालय द्वारा पारित उपर्युक्त आदेश के आलोक में सी॰डब्ल्यू॰जे॰सी॰सं॰-11801/14 में दिनांक 03.05.2016 को पारित आदेश के अनुपालन में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-8104 दिनाक 23.05.2013 द्वारा श्री शत्रुंजय कुमार मिश्र, बि॰प्र॰से॰, कोटि क्रमांक-899/08, 673/11, तत्कालीन अंचलाधिकारी, डेहरी के विरूद्ध संसूचित दंड (दो वेतन वृद्धियों असंचयात्मक रूप से दो वर्षो तक रोकने का दंड) को वापस लिया जाता है।
आदेशः- आदेश दिया जाता है कि इस संकल्प की प्रति बिहार राजपत्र के अगले अंक में प्रकाशित किया जाय तथा इसकी प्रति सभी संबंधित को भेज दी जाय।
बिहार-राज्यपाल के आदेश से,
राम बिशुन राय, सरकार के अवर सचिव।
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