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Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 20 February 2019

Published 20 February 2019

Type
Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2019-02-20.8
Languages
English, Hindi

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निबंधन संख्या पी0टी0-40

बिहार गजट

बिहार सरकार }kjk प्रकाशित भाग-1—नियुक्ति, inLFkkiu, बदली, शक्ति, छु (cid:7349)ी और vU; O;fDrxr सूचनाएं। 2-119 भाग-1-क—Lo;alsod xqYeksa के समादे"Vkओं के आदेश। --- भाग-1-ख—मैट्रीकु लेशन, आई0ए0, आई0एससी0, बी0ए0, बी0एससी0, एम0ए0, एम0एससी0, लॉ भाग-1 और 2, एम0बी0बी0एस0, बी0एस0ई0, डीप0- इन-एड0, एम0एस0 और eq[rkjh परीक्षाओं के परीक्षा-फल, कार्य(cid:7059)म, छात्रवृत्ति प्रदान, आदि।

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भाग-1-ग—शिक्षा संबंधी सूचनाएं, परीक्षाफल आदि ---

भाग-2—बिहार-jkT;iky और dk;kZ/;{kksa द्वारा निकाले गये विनियम, आदेश, अधिसूचनाएं और नियम आदि। ---

भाग-3—भारत सरकार, प(िcid:7391)म बंगाल सरकार और mPp U;k;ky; के आदेश, अधिसूचनाएं और नियम, 'भारत गजट' और jkT; गजटों के उ(cid:7373)रण।

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भाग-4—बिहार अधिनियम ---

विषय-सूची i`"B

i`"B भाग-5—बिहार विधान मंडल में पुर:LFkkपित विधेयक,उDr विधान मंडल में उपLFkkपित या उपLFkkपित किये जानेवाले प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और mDr विधान मंडल में पुर:LFkkपन के पूर्व प्रकाशित विधेयक। ---

भाग-7—संसद के अधिनियम जिनपर राष्ट्रपति की T;ss"B अनुमति मिल चुकी है। ---

भाग-8—भारत की संसद में पुर:LFkkfir विधेयक, संसद में उपLFkkपित प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और संसद में उपLFkkपित प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और संसद में पुर:LFkkiu के पूर्व प्रकाशित विधेयक। ---

भाग-9—वि(cid:6980)ापन ---

भाग-9-क—वन विभाग की नीलामी संबंधी सूचनाएं ---

भाग-9-ख—निविदा सूचनाएं, परिवहन सूचनाएं, U;k;ky; सूचनाएं और सर्वसाधारण सूचनाएं bR;kfnA ---

पूरक

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पूरक-क 120-122बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 2 भाग-1 नियुक्ति, inLFkkiu] बदली, शक्ति, छु (cid:7349)ी और vU; O;fDrxr सूचनाएं। —————

जल संसाधन विभाग ------ अधिसूचनाएं 8 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(मोति0)-08-10-106/1998/1005--श्री मायानन्द मिश्र (आई0डी0-3394), तत्कालीन सहायक अभियंता, घोड़ासहन नहर अवर प्रमंडल, सिकटा के पदस्थापन अवधि 1998-99 में लगभग रू0 42,000/- (बेयालिस हजार रूपये) के शीशम लकड़ी गबन करने एवं सरकारी सम्पाि को क्षति पहुँचाने संबंधी निम्न आरोप के लिए प्रपत्र 'क' गठित किया गया :- ''अवर प्रमंडल पदाधिकारी, घोड़ासहन नहर अवर प्रमंंडल, सिकटा में पदस्थापन काल में अपने पद का दुरूपयोग करते हुए उनके द्वारा लगभग रू0 42,000/- (बेयालिस हजार रूपये) के विभागीय शीशम लकड़ी जो श्री गौरी शंकर प्रसाद, कनीय अभियंता के प्रभार में था, उसे दिनांक-20.06.1998 को श्री मुगुन पाठक, कार्यदर्शक के मिली भगत से गबन करने एवं सरकारी संपाि को क्षति पहुँचाना।'' गठित प्रपत्र 'क' पर श्री मिश्र से विभागीय पत्रांक-1051 दिनांक-06.05.1999 के द्वारा स्पष्टीकरण की माँग की गयी। उक्त आलोक में प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षोपरांत विभागीय आदेश सं0-239 सहपठित ज्ञापांक-419 दिनांक-19.02. 2001 द्वारा श्री मिश्र के विरूद्ध निम्न दण्ड संसूचित किया गया :-

1. निन्दन वर्ष 1998-99 2. सैंतीस हजार रूपये की वसूली। 3. देय प्रोन्नति पर पाँच वर्षों तक रोक।

उक्त विभागीय दण्डादेश के विरूद्ध श्री मिश्र द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-8647/2001 दायर किया गया, जिसमें सुनवाई के उपरांत माननीय न्यायालय ने उक्त याचिका को खारिज कर दिया गया। सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-8647/2001 को माननीय उच्च न्यायालय द्वारा खारिज किए जाने के उपरांत श्री मिश्र द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में एल0पी0ए0 सं0-1215/2016 दायर किया गया। उक्त याचिका में दिनांक-01.11.2017 को पारित आदेश के द्वारा सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-8647/2001 में पारित आदेश एवं विभागीय दण्डादेश को निरस्त करते हुए सभी सेवांत लाभों का भुगतान करने का आदेश दिया गया। एल0पी0ए0 सं0-1215/2016 में दिनांक-01.11.2017 को पारित आदेश का ऑपरेटिव पार्ट निम्नवत है :- In our considered view, the charge-sheet levelled against the appellant as is reproduced here in above and the acts of commission and omission found established against the appellant are entirely defferent. The appellant was never proceeded against. or charged for the allegation which was found proved in the impugned order. This is another infirmity in the impugned action taken. Finally, on going through the impugned order, we find that in reply to the charge- sheet, the appellant has given a detailed explanation. Apart from the fact that a Departmental Enquiry as contemplated under the rule was not followed, the impugned order does not show assessment and consideration of the explanation or defence of the appellant. The explanation of the appellant is not at all taken note of, has defence is not analyzed and there is no speaking order passed indicating acceptance or rejection of the defence of the appellant and the reason for doing so. Accordingly, the impugned order of punishment was also passed in total disregard to the principal of law, particularly, principle of natural justice, in as much as the explanation and defence of the appellant is not considered. In fact, this has not been taken note of while passing the order. This being the three major infirmities in the impugned order passed, we see reason to interfere into the matter. We see a substantive case made out for interference into the matter and quashing the order of punishment. The learned Writ Court, on scanning of the order, with due respect, we have to say that has only reproduced certain parts of the counter affidavit and dismissed the writ petition without adverting to consider the aforesaid legal infirmities which are apparent from the face of the record.

3 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

Keeping in view the aforesaid, we allow this appeal, quash the order passed by learned Writ Court on 13-08-2015 in Civil Writ Jurisdiction Case No. 8647 pf 2001 as well as the order passed by the Desciplinary Authority vide Memo No. 239 dated 19-02-2001 Annexure-I to the Writ petition and direct for grant of all consequential benefits to the appellant in pursuance to the aforesaid order. माननीय उच्च न्यायालय द्वारा एल0पी0ए0 सं0-1215/2016 में दिनांक-01.11.2017 को पारित आदेश के आलोक में विभाग द्वारा श्री मिश्र के विरूद्ध विभागीय आदेश सं0-239 सहपठित ज्ञापांक-419 दिनांक-19.02.2001 द्वारा संसूचित दण्ड को निरस्त करने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में श्री मायानन्द मिश्र (आई0डी0-3394), तत्कालीन सहायक अभियंता, घोड़ासहन अवर प्रमंडल, सिकटा के विरूद्ध विभागीय आदेश सं0-239 सहपठित ज्ञापांक-419 दिनांक-19.02.2001 द्वारा संसूचित दण्ड यथा 1. निन्दन वर्ष 1998-99, 2. सैंतीस हजार रूपये की वसूली, 3. देय प्रोन्नति पर पाँच वर्षों तक रोक, को निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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11 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-02/2018-1043--श्री राम जनम शर्मा (आई0डी0 सं०-3553), कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल-2, महनार (वैशाली) को उक्त प्रमंडल के अन्तर्गत अल्पसंख्यक कल्याण मद में कब्रिस्तान घेराबंदी से संबंधित निविदा को बगैर प्रचार-प्रसार के निष्पादन में बरती गई अनियमितता के मामले में सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री शर्मा का मुख्यालय मुख्य अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन का कार्यालय, बिहार, पटना निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री शर्मा को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री शर्मा के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित करने से संबंधित संकल्प अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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17 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)14-28/2017-1069--श्री विनोद कुमार, तत्का0 सहायक अभियंता, (आई0डी0-2223) के सिंचाई प्रमंडल, नावानगर के विरूद्ध चार प्रमंडलों यथा सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमंडल, पीरो/सिंचाई प्रमंडल, नावानगर/सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमंडल, नासरीगंज एवं सोन नहर प्रमंडल, विक्रमगंज के अधीन नहर सेवापथ के निर्माण में बरती गई अनियमितता के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 निहित प्रावधान के अनुसार विभागीय संकल्प ज्ञापांक-81 दिनांक 22.01.2008 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में आरोपी पदाधिकारी से प्राप्त स्पष्टीकरण एवं अभिलेखों के आधार पर श्री कुमार के विरूद्ध आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया। तदोपरांत विभागीय समीक्षा के दौरान संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से असहमति के बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री कुमार से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा के उपरांत व्यवहृत मेटल के साईज के संबंध में ओभर साईज का आरोप प्रमाणित पाया गया।

उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-1382, दिनांक 30.11.2009 द्वारा श्री विनोद कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता को दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड संसूचित किया गया।

उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री विनोद कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन विभाग को समर्पित किया गया। पुनर्विचार अभ्यावेदन में श्री कुमार द्वारा निम्न तथ्य उल्लेखित किया गया है-

(i) मेरे कार्य क्षेत्र डुमराँव शाखा नहर कि0मी0 39.449 से 45.316 के बीच में जाँच तिथि दिनांक 17.07.2005 (जो दण्ड से संबंधित है) को कार्य नहीं चल रहा था और न किसी प्रकार की सामग्री गिराई गई थी।

(ii) कार्यपालक अभियंता, प्रशिक्षण प्रमंडल सं०-1, खगौल के जाँच प्रतिवेदन पत्रांक-402, दिनांक 22.07.2005 के क्रमांक-2 पर अंकित तथ्य निम्नलिखित है -

(क) नहर सेवा पथ (कि0मी0 28.068 से 33.025) (ख) नहर सेवा पथ (कि0मी0 36.55 से 39.449) (ग) नहर सेवा पथ (कि0मी0 40.80 से 52.55) (घ) नहर सेवा पथ (कि0मी0 52.565 से 64.80)4 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 उपरोक्त में मेरा कार्य क्षेत्र कि0मी0 39.449 से 45.316 कहीं नहीं दिखाया गया है। यदि कार्य चलते रहता तो अवश्य दिखाया जाता।

(iii) मेरे कार्य क्षेत्र में कार्य अक्टूबर 2005 से शुरू हुआ। प्रथम रिकर्ड इन्ट्री दिनांक 18.10.2005 को बॉक्स कटिंग के रूप में किया गया।

(iv) कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, नावानगर के पत्रांक-239, दिनांक 02.04.2008 जो संचालन पदाधिकारी को उनके मांग पर उपलब्ध कराया गया था, से भी स्पष्ट है।

(v) संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन पत्रांक-1165, दिनांक 30.06.2008 में उक्त चर्चा की गई है कि जाँच के लगभग तीन माह बाद कार्य प्रारंभ हुआ।

श्री कुमार द्वारा समर्पित पुनर्विचार अभ्यावेदन में उल्लेखित उक्त बिन्दुओं की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। विभागीय समीक्षा में निम्न बिन्दुओं को उल्लेखित किया गया -

(1) श्री कुमार का मुख्यतः कहना है कि उनका कार्यक्षेत्र डुमराँव शाखा नहर का कि0मी0 39.499-45.316 था जो कार्यपालक अभियंता सिंचाई प्रमंडल, नावानगर के पत्रांक-239, दिनांक 02.04.2008 से संचालन पदाधिकारी को संसूचित है। उनका कहना है कि जाँच पदाधिकारी के स्थलीय जाँच के दौरान उनके कार्यक्षेत्र में कार्य प्रारंभ नहीं था और न जाँच पदाधिकारी द्वारा उनके कार्य क्षेत्र की जाँच की गई। साथ ही कहना है कि उनके कार्यक्षेत्र में कार्य प्रारंभ अक्टूबर 2005 में हुआ एवं इस कार्य का प्रथम रिकर्ड इन्ट्री दिनांक 18.10.2005 को बॉक्स कटिंग के रूप में मापीपुस्त सं०-360 के पृ0 01-05 में दर्ज किया गया।

(2) आरोप गठन का मुख्य आधार प्रशिक्षण प्रमंडल सं0-1, खगौल का जाँच प्रतिवेदन दिनांक 21.07.2005 एवं 31.

10.2005 होना परिलक्षित होता है। जाँच पदाधिकारी द्वारा दिनांक 16.07.2005 से 18.07.2005 के स्थलीय जाँच के दौरान सिंचाई प्रमंडल, नावानगर अन्तर्गत डुमराँव शाखा नहर के कि0मी0 28.068-33.025 कि0मी0, 36.55-34.449 कि0मी0, 40. 80-52.555 एवं कि0मी0 52.565-64.80 में सेवापथ का जाँच किया जाना परिलक्षित होता है। उपरोक्त से आरोपी श्री कुमार के यथाकथित कार्यक्षेत्र कि0मी0 39.499-45.316 के बीच सेवा पथ का जाँच नहीं किया गया स्पष्ट होता है।

(3) जाँच पदाधिकारी के अंतिम जाँच प्रतिवेदन दिनांक 31.10.2005 के कंडिका-2(i) में अंकित किया गया है कि डुमराँव शाखा नहर के सेवा पथ के विभिन्न रिच में कराए गए कार्यों में ओभर साईज मेटल ग्रेड (1, 2 एवं 3) का प्रयोग किया गया। जाँच प्रतिवेदन दिनांक 21.07.2005 के अनुसार कि0मी0 39.499-46.80 तक सेवापथ की जाँच नहीं किया जाना स्पष्ट होता है। अतएव ओभर साईज मेटल का उपयोग रिच कि0मी0 34.449-46.80 में भी पाये जाने को दिनांक 31.10.2005 का मंतव्य के अनुसार माना जाना न्याय संगत प्रतीत नहीं होता है।

(4) कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, नावानगर के पत्रांक-239, दिनांक 02.04.2008 से संपर्क पदाधिकारी को दी गई प्रतिवेदन से परिलक्षित होता है कि आरोपित श्री कुमार का कार्यक्षेत्र डुमराँव शाखा नहर का कि0मी0 39.449-45.316 है, उक्त भाग में प्रशिक्षण प्रमंडल सं०-1, खगौल के जाँच के समय कार्य प्रारंभ नहीं था एवं उक्त भाग में 18.10.2005 को कार्य प्रारंभ हुआ।

उपरोक्त बिन्दुओं से विदित होता है कि डुमराँव शाखा नहर के आरोपित भाग कि0मी0 28.068-64.872 के बीच अंश भाग कि0मी0 39.499-45.316 से आरोपित श्री कुमार संबंधित रहे हैं जिस भाग में जाँच पदाधिकारी द्वारा स्थलीय जाँच के दौरान सेवापथ की जाँच की गई।

जाँच पदाधिकारी के पत्रांक-492, दिनांक 05.09.05 के स्थलीय जाँच के दौरान लिये गये नमूनो का गुणवत्ता जाँच विभाग को उपलब्ध कराया गया है। जो सेवापथ भाग कि0मी0 39.449-45.316 से संबंधित रहना परिलक्षित नहीं होता है। अतएव उक्त के आधार पर सेवापथ भाग कि0मी0 39.449-45.316 में ओभर साईज मेटल का प्रयोग किये जाने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता।

संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के साथ संलग्न मापीपुस्त सं०-307 के पृ0 01-05 दिनांक 18.10.2005 को कि0मी0 45.316-43.20 मिट्‌टी कटाई का रिकर्ड इन्ट्री किया जाना स्पष्ट है।

इस प्रकार उपरोक्त तथ्यों से आरोपी श्री कुमार डुमराँव शाखा नहर के कि0मी0 28.068-64.872 के अंश भाग कि0मी0 39.499-45.316 भाग के कार्य में संलग्न रहना, जाँच पदाधिकारी के स्थलीय जाँच के दौरान उक्त भाग की जाँच नहीं किया जाना एवं कार्य भी प्रारंभ नहीं रहना, जाँच पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराये गये गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन उक्त से संदर्भित नहीं होना परिलक्षित होता है।

उक्त तथ्यों, पुनर्विचार अभ्यावेदन में अंकित कथन, जाँच प्रतिवेदन के आलोक में श्री विनोद कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, नावानगर का कार्यक्षेत्र प्रशिक्षण प्रमंडल सं0-1, खगौल द्वारा सेवापथ की जाँचित भाग से संबंधित नहीं होना परिलक्षित होता है।

अतः श्री विनोद कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता (सेवानिवृत) के पुनर्विचार अभ्यावेदन को स्वीकार करते हुए आरोपमुक्त करना का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय से श्री विनोद कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता (सेवानिवृत) सिंचाई प्रमंडल, नावानगर को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।5 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

18 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(भाग0)-09-01/2010-1077--श्री सच्चिदानन्द सिंह, (आई0डी0-2572) को अवर प्रमंडल पदाधिकारी (सहायक अभियंता), सिंचाई अवर प्रमंडल, जमालपुर के पदस्थापन अवधि वर्ष 2004-05 से 2008 के दौरान इनके द्वारा सतघरवा जलाशय योजना के पुनस्र्थापन कार्य एवं विविध कार्य हेतु अस्थायी अग्रिम राशि का दुर्विनियोग (असमायोजित 14,62,975.83 रूपये नहीं लौटाने), उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना करने आदि प्रथम द्रष्टया प्रमाणित पाये गये आरोपों के सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं०-1277, दिनांक 31.08.10 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1318, दिनांक 07.09.10 द्वारा विहित प्रपत्र में आरोप पत्र प्रपत्र-'क' गठित कर बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

2. विभागीय कार्यवाही के निष्पादन के पूर्व श्री सच्चिदानन्द सिंह, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी (सहायक अभियंता) के दिनांक 31.12.2011 को सेवानिवृत हो जाने के फलस्वरूप विभागीय अधिसूचना सं०-132, दिनांक 03.02.2012 द्वारा श्री सिंह को उनके सेवानिवृत की तिथि दिनांक 31.12.2011 के प्रभाव से निलंबन से मुक्त करते हुए उनके विरूद्ध पूर्व संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के तहत सम्परिवर्तित किया गया।

3. श्री सिंह के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी, श्री परमानन्द सिंह, अधीक्षण अभियंता, रूपांकण अंचल, भागलपुर के पत्रांक-1261, दिनांक 22.12.11 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर किये जाने के उपरांत निम्नांकित तथ्य पाये गये :-

(i) इनके विरूद्ध वित्तीय वर्ष 2004-05 के समापन के उपरांत रूपये 1,71,835/- (एक लाख इकहतर हजार आठ सौ पैतीस) की असमायोजित राशि थी। वित्तीय वर्ष 2005-06 में इनको बिना कोई लेखा समर्पित किये चार विभिन्न तिथियों में 12,90,000/- (बारह लाख नब्बे हजार) रूपये की अग्रिम राशि स्वीकृत की गयी जिसके कारण मार्च 2006 तक इनके विरूद्ध कुल असमायोजित राशि 14,62,975.83 (चौदह लाख बासठ हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) रूपये हो गयी। संबंधित कार्यपालक अभियंता द्वारा प्रमंडलीय रोकड़पाल को दिनांक 18.06.2009 को श्री सिंह के कार्यालय में इनके द्वारा दिनांक 10.03.2004 से कराये गये कार्यों से संबंधित रोकड़बही एवं हस्तपावती प्राप्त करने हेतु भेजा गया परन्तु इनके द्वारा उक्त अभिलेख उपलब्ध नहीं कराया गया। बिना मान्य साक्ष्य (हस्तपावती) के श्री सिंह द्वारा तीन कनीय अभियंताओं के नाम पर कुल 14, 06,975.83 रूपये (चौदह लाख छः हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) की राशि अग्रिम के रूप में दिखाया गया है जिसकी मान्यता नहीं दी जा सकती। अतः संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए सरकारी राशि के दुर्विनियोग का आरोप श्री सिंह के विरूद्ध प्रमाणित पाया गया है।

(ii) असमायोजित अग्रिम की निकासी के संबंध में बिहार लोक निर्माण संहिता के नियम 100 दिनांक 07.06.2004 के अनुसार अस्थायी अग्रिम पूर्व से पारित प्रमाणकों के विरूद्ध ही दिया जाना है एवं इसका समायोजन अविलम्ब कर लिया जाना है। संलग्न तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री सिंह को इस आशय की जानकारी थी कि विभागीय स्तर पर कराये जा रहे कार्यों को सक्षम पदाधिकारी द्वारा विभागीय स्तर पर कराने की स्वीकृति प्रदान नहीं की गयी है। श्री सिंह को इस तथ्य की भी जानकारी थी कि विषयांकित कार्य से संबंधित श्रमबल की स्वीकृति मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा नहीं दी गयी है। ऐसी स्थिति में श्री सिंह द्वारा अग्रिम की अधियाचना नहीं करना चाहिए था। अतः संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए अस्थायी अग्रिम राशि के दुर्विनियोग के संबंध में श्री सिंह द्वारा बिहार लोक निर्माण लेखा संहिता में निहित प्रावधान का उल्लंघन करने का आरोप इनके विरूद्ध प्रमाणित पाया गया है।

(iii) श्री सिंह द्वारा बिहार लोक निर्माण लेखा संहिता के नियम 100 दिनांक 07.06.2004 का उल्लंघन करते हुए ऐसे कार्यों हेतु अस्थायी अग्रिम की अधियाचना की जाती रही जिसके लिए प्रमाणक पूर्व से पारित नहीं थे एवं प्रमाण पारित नहीं होने का मूल कारण विभागीय स्तर पर कराये जा रहे प्रस्तावित कार्यों को विभागीय स्तर पर कराने हेतु सक्षम पदाधिकारी की स्वीकृति प्राप्त नहीं रहना एवं मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा उक्त कार्यों से संबंधित श्रमबल की स्वीकृति प्रदान नहीं किया जाना था।

ऐसी स्थिति में इनके द्वारा कराये गये कार्यों एवं तत्पश्चात प्रस्तुत विपत्र संबंधित कार्यपालक अभियंता द्वारा पारित नहीं किया जा सका जिसके आलोक में इनके द्वारा वांछित स्वीकृति प्राप्त करने हेतु ठोस कदम उठाया जाना चाहिए था। परन्तु इनके द्वारा अपने स्तर से कोई कार्रवाई नहीं की गयी फलस्वरूप दुर्विनियोग की स्थिति उत्पन्न हुई और इनके द्वारा वरीय पदाधिकारी के आदेश की अवहेलना की गयी। अतएव श्री सिंह के द्वारा उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना करने का आरोप इनके विरूद्ध अंशतः प्रमाणित पाया गया।

4. उपर्युक्त पाये गये तथ्यों के आलोक में प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सच्चिदानन्द सिंह, सेवानिवृत सहायक अभियंता से विभागीय पत्रांक-621, दिनांक 12.06.12 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा किया गया जिसके प्रसंग में इनके द्वारा दिनांक 22.08.12 की हस्ताक्षरित द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर विभाग में समर्पित किया गया। द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में इनके द्वारा निम्नांकित तथ्यों को प्रस्तुत किया गया :-

(i) वर्ष 2004-05 एवं 2005-06 में इनके द्वारा प्राप्त की गयी अग्रिम की कुल राशि 14,06,975.83 रूपये (चौदह लाख छः हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) को गबन करने का इनके विरूद्ध आरोप नहीं लगाया गया है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया गया है कि कार्य कराये गये थे लेकिन संबंधित कनीय अभियंताओं द्वारा प्राप्त राशि की रसीद प्रस्तुत नहीं किये गये। यदि आवंटित कार्य के लिए अग्रिम राशि संबंधित कनीय अभियंताओं द्वारा प्राप्त नहीं की गयी तो उनके द्वारा कार्य कैसे कराये गये ? संबंधित कनीय अभियंताओं द्वारा अग्रिम बिना रसीद के प्राप्त किये गये लेकिन सिर्फ श्री6 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 विष्णुदेव यादव, कनीय अभियंता द्वारा बाद में 45,000/- (पैतालीस हजार रूपये) और श्री कैलास साव, कनीय अभियंता द्वारा लिखित रूप से यह स्वीकार किया गया कि उन्होंने 13,000/- (तेरह हजार रूपये) अग्रिम प्राप्त किया है।

संबंधित कार्यपालक अभियंता द्वारा प्रमंडलीय रोकड़पाल को दिनांक 18.06.09 को भेजे जाने पर रोकड़बही और हस्तपावती नहीं उपलब्ध कराने के संबंध में कहा गया है कि संबंधित कार्यपालक अभियंता और प्रमंडलीय लेखापाल की उपस्थिति में संबंधित अभिलेख प्रमंडलीय लेखा लिपिक को इनके द्वारा उपलब्ध कराया गया। इस संबंध में इनके द्वारा यह कहा गया है कि इनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र प्रपत्र-'क' में रोकड़बही और हस्तपावती उपलब्ध नहीं कराने का आरोप उल्लिखित नहीं है इसलिए इस आरोप को अब शामिल करना नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त के विरूद्ध है।

(ii) कोई कार्य विभाग के स्तर पर करायी जायेगी या निविदा आमंत्रित कर कराया जायेगा इस पर संबंधित मुख्य अभियंता अथवा मुख्यालय जैसा मामला हो, की अनुमति की आवश्यकता होती है। लेकिन निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी तथा कार्य का कार्यान्वयन अधिकारी होने के नाते इसकी पहल कार्यपालक अभियंता द्वारा की जाती है न कि अवर प्रमंडल पदाधिकारी के द्वारा।

(iii) संबंधित कार्यपालक अभियंता द्वारा कार्य के लिए जब अग्रिम उपलब्ध कराया गया और मास्टर रौल्स निर्गत किया गया है तो विश्वास करने का पर्याप्त आधार था कि विभागीय स्तर पर कार्य कराने की अनुमति प्रमंडलीय कार्यालय द्वारा प्राप्त हो चुकी है।

(iv) विभागीय स्तर से कार्य कराने के लिए पहल करने या अनुरोध करने का कार्य अनुमंडल कार्यालय का नहीं है अतएव इसके लिए इन्हें जबावदेह नहीं ठहराया जा सकता है।

(v) इन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी और न ही इससे संबंधित कोई कागजात इन्हंें उपलब्ध कराया गया जिससे इनको जानकारी हो कि सक्षम पदाधिकारी द्वारा कार्य कराने की अनुमति नहीं दी गयी है। अतएव संचालन पदाधिकारी द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँचने का कोई आधार नहीं है।

(vi) पूर्व में स्वीकृत अग्रिम के समायोजन का कार्य संबंधित कार्यपालक अभियंता का है कि पहले अग्रिम का समायोजन कर ले और बाद में बाद की अग्रिम राशि को Disburse करें। इनके द्वारा तो मात्र कार्य के लिए अग्रिम की राशि स्वीकृत करने का अनुरोध किया गया था।

5. श्री सिंह द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में प्रस्तुत किये गये उपर्युक्त तथ्यों की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत निम्नांकित तथ्य पाये गये :-

(i) यह निर्विवाद है कि श्री सिंह को मार्च 2006 तक कुल 14,62,975.83 रूपये (चौदह लाख बासठ हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) का अस्थायी अग्रिम स्वीकृत किया गया है। संचालन पदाधिकारी को दिनांक 16.05.11 को दिये गये अपने बचाव-बयान में श्री सिंह द्वारा स्वयं स्वीकार किया गया है कि इतनी राशि उन्होंने प्राप्त की है। द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में भी इनके द्वारा इसका खण्डन नहीं किया गया है।

कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, तारापुर द्वारा भी श्री सिंह के विरूद्ध 14,62,975.83 रूपये (चौदह लाख बासठ हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) के गबन/दुर्विनियोग के लिए तारापुर, मुंगेर थाना में प्राथमिकी दर्ज की गयी है। प्रधान महालेखाकार (लेखा परीक्षा) बिहार द्वारा भी प्रारूप कंडिका 4.1.1 में प्रतिवेदित किया गया है कि This implied that temporary advance amounting to 14.07 lakh was misappropriated by the SDO., Jamalpur.

द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में श्री सिंह द्वारा मात्र इतना कहा गया है कि विश्वास के आधार पर इनके द्वारा कनीय अभियंताओं को कार्य कराने के लिए अग्रिम की राशि दी परन्तु उनमें से मात्र दो कनीय अभियंताओं द्वारा रू0 45,00013,000=58,000 (अठ्‌ठावन हजार) रूपये प्राप्त होना लिखित रूप से स्वीकार किया गया। अतएव श्री सिंह का यह दलील स्वीकार योग्य नहीं है कि अस्थायी अग्रिम के रूप में उन्हें स्वीकृत अग्रिम बिना हस्तपावती के कनीय अभियंताओं को विश्वास के आधार पर कार्य कराने के लिए दे दिया गया और अब कनीय अभियंता मुकर गये है। यदि इसमें थोड़ी सी सच्चाई भी है तो इसके लिए भी श्री सिंह ही दोषी है। अतएव सरकारी राशि के दुर्विनियोग का आरोप इनके विरूद्ध प्रमाणित होता है।

(ii) श्री सिंह द्वारा अग्रिम स्वीकृत करने का दोष कार्यपालक अभियंता पर डालने का एवं अपने आप को निर्दोष साबित करने का प्रयास किया गया है। परन्तु राजपत्रित पदाधिकारी होने के नाते इनसे इस बात की जानकारी होना अपेक्षित है कि एक सरकारी अग्रिम के समायोजन के बिना दूसरा सरकारी अग्रिम स्वीकृत नहीं किया जा सकता है। अतएव कार्यपालक अभियंता पर अग्रिम स्वीकृति का दोष डालकर ये आरोप से नहीं बच सकते। अग्रिम की अधियाचना इनके द्वारा जानबूझ कर किया गया था।

श्री सिंह का यह दलील भी स्वीकार करने योग्य नहीं है कि इन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि विभागीय स्तर पर कार्य कराने की अनुमति सक्षम पदाधिकारी द्वारा दी गयी थी अथवा नहीं। संबंधित सहायक अभियंता या कनीय अभियंता जिनपर कार्य कराने का दायित्व होता है, को सक्षम पदाधिकारी द्वारा दी गयी स्वीकृति आपत्ति आदि की जानकारी औपचारिक अथवा अनौपचारिक रूप से अवश्यक हुई है।

जहाँ तक कार्य कराने के लिए पहल करने का प्रश्न है, तो कार्य कराने के लिए जब इनके द्वारा अग्रिम की राशि के लिए पहल की गयी तो उक्त राशि के समायोजन के मार्ग में आनेवाली बाधाओं को दूर करने के लिए इनकी पहल अपेक्षित थी।7 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 अतएव बिहार लोक निर्माण लेखा संहिता में निहित प्रावधान का उल्लंघन करने एवं उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना करने का आरोप इनके विरूद्ध अंशतः प्रमाणित होता है।

6. उपर्युक्त पाये गये तथ्यों के आलोक में श्री सच्चिदानन्द सिंह, सेवानिवृत सहायक अभियंता के द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर को स्वीकार योग्य नहीं पाया गया। फलस्वरूप प्रमाणित पाये गये आरोपों के लिए श्री सच्चिदानन्द सिंह, सेवानिवृत सहायक अभियंता को विभागीय अधिसूचना संख्या-1370, दिनांक 17.06.2016 द्वारा निम्नांकित दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया :-

(i) अस्थायी अग्रिम के रूप में कुल रू0 14,62,975.83 (चौदह लाख बासठ हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) जो अबतक असमायोजित है, की वसूली।

(ii) 12(बारह) वर्षों तक 30(तीस) प्रतिशत पेंशन की कटौती। उक्त संसूचित दण्ड के आलोक में श्री सच्चिदानन्द सिंह, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सिंचाई अवर प्रमंडल, जमालपुर सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन प्रस्तुत किया गया है, जिसमें उनके द्वारा मुख्य रूप से निम्न तथ्य प्रस्तुत किया गया है -

1. बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के नियम 17(3) एवं 17(4) के अनुसार अलग-अलग साक्ष्य न देकर समेकित रूप से साक्ष्य दिए जाने, संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं दण्ड संसूचित अधिसूचना में अंकित तथ्यों, लेखा संहिता के नियम 100 के अनुसार अस्थायी अग्रिम के विरूद्ध व्यय संबंधी प्रमाणकों को कार्यपालक अभियंता द्वारा समायोजित कर शून्य नहीं किये जाने के कारण 14,62,975. 83 (चौदह लाख बासठ हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) असमायोजित रह जाने से संबंधित तथ्यों का उल्लेख किया गया है।

2. अधीक्षण अभियंता स्तर से स्वीकृत रू0 10.00लाख के प्राक्कलन के आलोक में प्राप्त रू0 10.00लाख अग्रिम के विरूद्ध बोल्डर ढुलाई कराते हुए व्यय से संबंधित प्रमाणक मापीपुस्त में अंकित करते हुए समायोजन हेतु समर्पित है एवं संगत मापीपुस्त की जाँच संचालन पदाधिकारी द्वारा नहीं की गई है। अतएव इस स्थिति में व्यय की गई राशि को लौटाने का प्रश्न नहीं है।

3. शराधी मुख्य नहर एवं बंगलवा वितरणी के पहुँच पथ निर्माण तथा शीर्ष नियामक कुँआ से संबंधित स्वीकृत श्रमशक्ति के विरूद्ध किए गए भुगतान का भी समायोजन नहीं किया गया।

उक्त के संदर्भ में कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, तारापुर से स्वीकृत श्रमशक्ति के विरूद्ध समायोजन एवं शेष अन्य प्रमाणकों पर नियम संगत कार्रवाई करते हुए संशोधित असमायोजित राशि की अद्यतन स्थिति की माँग की गई। उक्त के क्रम में कार्यपालक अभियंता, तारापुर द्वारा सूचित किया गया है कि वर्ष 2005-06 के लिए स्वीकृत श्रम शक्ति एवं निर्गत मास्टर रोल पर वर्ष 2006-07 में व्यय कर मजदूरों के अंगूठे के निशान को बिना अभिप्रमाणित किए वर्ष 2008-09 में स्वयं अपने स्तर से पारित करते हुए जिसके लिए वे सक्षम नहीं है, वर्ष 2011-12 में समायोजन हेतु प्रमंडल में समर्पित किया गया। सही समय पर अभिश्रव एवं लेखा के इनके द्वारा जमा नहीं किए जाने के कारण लंबित अग्रिम का समायोजन नहीं हुआ। समर्पित अभिश्रवों एवं लेखा के समायोजन लायक होने की सूचना उनको पत्रांक-1004 दिनांक 08. 08.2014 से दे दी गई है। उपलब्ध अभिलेख से विदित होता है कि दिनांक 30.03.06 को श्री सिंह को रू0 10.00लाख दी गई है एवं बोल्डर ढुलाई मद से संबंधित लगभग रू0 10.55लाख के अभिश्रव की प्रविष्टि मापीपुस्त में दिनांक 10.06.2006 को किया गया है जो श्री सिंह द्वारा पारित नहीं होना परिलक्षित होता है। कार्यपालक अभियंता, तारापुर का कहना है कि समर्पित अभिश्रव एवं लेखा वित्तीय नियमों के अनुरूप नहीं रहने के कारण समायोजन लायक नहीं रहा।

श्री सिंह का कहना है कि महालेखाकार के कंडिका में समायोजन पर रोक नहीं लगाया गया है एवं आज भी कार्यपालक अभियंता को आदेश देकर लंबित अग्रिम शून्य किया जा सकता है। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि कार्यपालक अभियंता, तारापुर से प्रमाणकाें पर नियम संगत कार्रवाई कर संशोधित (यदि हो) असमायोजित राशि की अद्यतन स्थिति की मांग के क्रम में सूचित किया गया है कि समर्पित अभिश्रव एवं लेखा वित्तीय नियमों के अनुरूप नहीं रहने के कारण समायोजन के लायक नहीं रहा।

उपर्युक्त से परिलक्षित होता है कि श्री सिंह द्वारा लंबित अग्रिम के विरूद्ध कुछ अभिश्रव उनके स्तर से एवं कुछ बिना पारित किए मापीपुस्त में अंकित कर संगत अभिलेख के साथ ससमय प्रमंडल को समर्पित नहीं किया गया जिसे कार्यपालक अभियंता, तारापुर ने वित्तीय नियमों के अनुरूप नहीं पाए जाने पर समायोजन लायक नहीं समझा गया। श्री सिंह द्वारा भी असमायोजित राशि रू0 14,62,975.83 (चौदह लाख बासठ हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) के विरूद्ध अग्रिम वार स्थिति स्पष्ट नहीं किया जाना परिलक्षित होता है। लेखा संहिता के नियम 100 के अनुसार कार्यपालक अभियंता, व्यय के विरूद्ध समर्पित प्रमाणक के समायोजन हेतु उत्तरदायी है। हालांकि उस नियम के तहत ही पारित प्रमाणक के विरूद्ध ही अस्थायी अग्रिम प्राप्त किया जाना चाहिए था एवं साथ ही समायोजन भी कराते जाना चाहिए था, तो अस्थायी अग्रिम के लंबित रहने की स्थिति नहीं होती ।

उपर्युक्त पाए गए तथ्यों के आलोक में श्री सच्चिदानन्द सिंह, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सिंचाई अवर प्रमंडल, जमालपुर सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा प्रस्तुत पुनर्विचार अभ्यावेदन स्वीकार योग्य नहीं है।

अतः सरकार के स्तर पर लिए गए निर्णय के आलोक में श्री सच्चिदानन्द सिंह, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सिंचाई अवर प्रमण्डल, जमालपुर सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा दाखिल पुनर्विचार अभ्यावेदन अस्वीकृत करते हुए विभागीय8 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 अधिसूचना सं०-1370, दिनांक 17.06.2015 द्वारा पूर्व में अधिरोपित निम्न दण्ड को यथावत रखने का निर्णय लेते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।

(i) अस्थायी अग्रिम के रूप में कुल रूपये 14,62,975.83 (चौदह लाख बासठ हजार नौ सौ पचहत्तर रूपये तेरासी पैसे) जो अबतक असमायोजित है की वसूली।

(ii) 12 (बारह) वर्षों तक तीस प्रतिशत पेंशन की कटौती।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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18 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-02/2015-1079--श्री देवानन्द कुँवर, (आई0डी0-1957) तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, शीर्ष कार्य अंचल, बागमतीनगर, सीतामढ़ी सम्प्रति सेवानिवृत को उनके उक्त अंचल में पदस्थापन अवधि के दौरान अधवारा समूह की मुख्य नदी के तटबंध निर्माण में बरती गई अनियमितता की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग, निगरानी विभाग, पटना द्वारा की गई। तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित निम्न आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-2386, दिनांक 16.10.2015 से श्री कुँवर, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता से स्पष्टीकरण पूछा गया।

(i) बिना बौरो एरिया के सत्यापन/अनुमोदन एवं लीड प्लान की स्वीकृति नहीं रहने के बावजूद लगातार कार्य सम्पादित होने एवं भुगतान करने की खुली छूट आपके द्वारा दी गई परिलक्षित होती है। जिसके कारण क्षेत्रीय पदाधिकारियों द्वारा नियम का उल्लंघन करते हुए मनमाने ढ़ग से वित्तीय अनियमितता बरती गई है। अनियमित ढ़ग से हुई भुगतान में आपकी सहभागिता रही है एवं जिसके लिए आप जिम्मेवार पाये गये हैं।

उक्त स्पष्टीकरण के विरूद्ध श्री कुँवर, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता का जवाब विभाग को अप्राप्त रहा। फलस्वरूप मामले की समीक्षा की गई एवं तत्पश्चात विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं०-1520, दिनांक 27.07.2016 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री कुँवर, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता के विरूद्ध आरोप को अप्रमाणित पाया।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये।

संचालन पदाधिकारी के द्वारा आरोपी पदाधिकारी श्री कुँवर, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रस्तुत किये गये बचाव बयान एवं साक्ष्य के आधार पर प्रश्नगत कार्यों के तहत लीडयुक्त मिट्‌टी कार्य का भुगतान श्री कुँवर के पदस्थापन अवधि में नहीं होने के कारण आरोप को प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है एवं लीडयुक्त मिट्‌टी के भुगतान अवधि दिनांक 08.08.2012 से 27.01.2013 के प्रभार में रहे अधीक्षण अभियंता को जिम्मेवार माना गया है।

संचिका में रक्षित अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल-1, सीतामढ़ी के पत्रांक-1025, दिनांक 30.11.2014 द्वारा प्रश्नगत कार्य में लीडयुक्त मिट्‌टी कार्य का भुगतान हेतु तृतीय एवं पंचम विपत्र, 6वें चालू विपत्र क्रमशः दिनांक 17.12.2012, 28.12.2012 एवं दिनांक 02.03.2013 को तैयार किया गया है। उक्त तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि श्री कुँवर के पदस्थापन अवधि (दिनांक 15.06.2012 से 08.08.2012 एवं 27.01.2013 से 31.01.2013) में लीडयुक्त मिट्‌टी का भुगतान नहीं हुआ है।

समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री कुँवर, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता के विरूद्ध बिना लीड प्लान की स्वीकृति के लीडयुक्त मिट्‌टी का अनियमित भुगतान होने में सहयोग करने के आरोप सहित अन्य आरोपों को अप्रमाणित पाया गया है एवं सरकार द्वारा उक्त मामले में उन्हें आरोपमुक्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय श्री देवानन्द कुँवर, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता, 203, शिवलोक अपार्टमेंट, न्यू पाटलिपुत्रा कॉलोनी, पटना-13 को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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21 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-09/2012-1087--श्री बिन्देश्वर साह, (आई0डी0-3767) तत्कालीन सहायक अभियंता, तिरहुत नहर अवर प्रमंडल सं०-02, गोरौल, हाजीपुर के उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान डुमरिया उप शाखा नहर के वितरणी एवं उपवितरणी से निःसृत लघु नहरों तथा उप लघु नहरों के मरम्मति तथा पुर्नस्थापन कार्य में बरती गई अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गई। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-930, दिनांक 16.07.14 द्वारा श्री साह से स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री साह, से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं०-1194, दिनांक 19.05.2015 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। स्ांचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री साह, सेवानिवृत सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप को अप्रमाणित पाया। फलस्वरूप संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई।9 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए डुमरिया उप शाखा नहर, दामोदरपुर एवं फतेहपुर उपवितरणी से निःसृत लघु नहर/उप लघु नहरो में मिट्‌टी कार्य नहीं कराने से लक्षित लाभ की प्राप्ति नहीं होने के आरोप को अप्रमाणित पाया गया तथा इनके विरूद्ध मामले को संचिकास्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है एवं उक्त निर्णय श्री बिन्देश्वर साह, सेवानिवृत सहायक अभियंता, ग्रामपो0-बड़हरवा, जिला-सीतामढ़ी को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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21 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-09/2012-1088--श्री राम विनोद सिंह, (आई0डी0-2101) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल, हाजीपुर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान डुमरिया उप शाखा नहर के वितरणी एवं उपवितरणी से निःसृत लघु नहरों तथा उप लघु नहरों के मरम्मति तथा पुर्नस्थापन कार्य में बरती गई अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गई। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-929, दिनांक 16.07.14 द्वारा श्री सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री सिंह से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत इनके विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं०-1195, दिनांक 19.05.2015 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

स्ांचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री सिंह, के विरूद्ध आरोप को अप्रमाणित पाया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए डुमरिया उप शाखा नहर, दामोदरपुर एवं फतेहपुर उपवितरणी से निःसृत लघु नहर/उप लघु नहरो में मिट्‌टी कार्य नहीं कराने से लक्षित लाभ की प्राप्ति नहीं होने के आरोप को अप्रमाणित पाया गया तथा इनके विरूद्ध मामले को संचिकास्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया।

सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में मामले को संचिकास्त किया जाता है। उक्त निर्णय श्री रामविनोद सिंह (आई0डी0-2101) सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता, क्लब रोड़, शिवशंकर पथ, मिठनपुरा, पो0-रमना, मुजफ्फरपुर को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

------- 21 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(पू॰) 01-07/16-1089--मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग कटिहार के परिक्षेत्राधीन बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के पदस्थापन अवधि के दौरान एजेण्डा सं0 133/201 एवं 133/202 के तहत कोशी नदी के दायें तट पर क्रमशः सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर वर्ष 2016 बाढ़ के पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्य में बरती गयी अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल द्वारा की गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरान्त बरती गयी अनियमितता के लिए श्री अवधेश कुमार झा,तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को विभागीय अधिसूचना सं0 1469 दिनांक 22.07.2016 द्वारा निलंबित किया गया, तदोपरान्त विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1542 दिनांक-27. 07.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी, सम्यक समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री अवधेश कुमार झा से विभागीय पत्रांक-1164 दिनांक- 18. 07.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी श्री झा से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर की विस्तृत समीक्षा निम्नरूपेण की गयीः- आरोप सं॰-1 :- प्रस्तुत आरोप सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर मानक Voids से अधिक Voids के साथ न्यून विशिष्टि का Crated Boulder Pitching कार्य कराये जाने एवं अधिकाई भुगतान करने से संबंधित है। कोशी नदी के दायें तट पर स्थित सहोरा ग्राम के पास एकरारित राशि रू॰ 611.84 लाख (एकरारनामा सं॰ SBD- 03/15-16) एजेन्डा सं॰ 133/201 के तहत एवं मदरौनी ग्राम के पास एकरारित राशि रू॰ 539.06 लाख (एकरारनामा सं॰ SBD-04/15-16) एजेन्डा सं॰ 133/202 के तहत बाढ़ वर्ष 2016 पूर्व कटाव निरोधक कार्य बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया द्वारा कराया गया। कराये गये कार्य में उड़नदस्ता जाँच में पायी गयी अनियमितता के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। संचालन पदाधिकारी द्वारा बोल्डर क्रेटिंग कार्य वास्तविक Voids से कम कटौती कर अधिकाई भुगतान करने का आरोप प्रमाणित पाया गया। आरोपी पदाधिकारी द्वारा बयान कंडिका 1.3 (i) से (v) तक मुख्य अभियंता, भागलपुर द्वारा गठित असम्बद्ध अभियंताओं के टीम के साथ संयुक्त जाँच किये जाने, अनुवीक्षण दल का 10 जाँच प्रतिवेदन, विभागीय उड़नदस्ता टीम का जाँच प्रतिवेदन 32 बार वरीय पदाधिकारियों का स्थल निरीक्षण एवं Clause of Contract के कंडिका 16, 7 एवं 11 का10 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संचालन पदाधिकारी द्वारा तकनीकी विश्लेषण या विभागीय नियमों के अनुरूप समीक्षा नहीं किये जाने को प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से समीक्षा किया जाना परिलक्षित होता है। अतएव इस बिन्दु पर पुनः समीक्षा किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा बयान कंडिका 1.3 VI में I.S. Code 14262-1995 के कंडिका 3.2 को उद्‌दृत करते हुए बोल्डर का Density 2000Kg/m3 के आधार पर क्रेट के बोल्डर की मात्रा 4320 Kg. की गणना करते हुए उड़नदस्ता जाँच में पाये गये मात्रा 4689 Kg. एवं 4716 Kg. के आलोक में 20 प्रतिशत Voids को सही होने को प्रतिवेदित किया गया। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन कंडिका 3.0.1 से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता द्वारा Sand Replacement Method जो तकनीकी रूप से मान्य विधि है, से की गयी जाँच में Voids 28.59 % एवं 26.40 % पाया गया है। Actual Field Test में पायी गयी Voids की मात्रा का मान्यता दिया जाना उचित प्रतीत होता है। अएतव आरोपित पदाधिकारी के गणित मात्रा के आलोक में संदर्भित बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कंडिका 1.1 एवं 1.2 में एकरारनामा के Technical Specification के कंडिका 4.6.4.5 एवं Special Terms की कंडिका 4.12.0.2 को उद्‌दृत करते हुए प्रतिवेदित किया गया है कि शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल के गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन के आधार पर सहोरा स्थल पर 20.15 प्रतिशत एवं मदरौनी स्थल पर 20.10 प्रतिशत की कई Voids की कटौती एकरारनामा के अनुरूप है। Special Terms & Conditions से स्पष्ट होता है कि Minimum 20% Voids की कटौती की जा सकती है और Actual Field Test या गुणवत्ता नियंत्रण प्रमंडल के जाँचफल के आधार पर अधिक कटौती की जा सकती है। जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल एवं उड़नदस्ता द्वारा अलग-अलग स्थलों पर Voids की जाँच की गयी। शोध प्रमंडल के जाँच में Voids 19.90% से 20.20% पाया गया जबकि उड़नदस्ता जाँच में 28.59 प्रतिशत एवं 26.40 प्रतिशत पाया गया जो मानक 20 प्रतिशत से अधिक है। उड़नदस्ता जाँच दल एवं शोध प्रमंडल का जाँच स्थल अलग-अलग होने की स्थिति में शोध प्रमंडल का जाँचफल पूरे कार्य के लिए माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी के बयान का उक्त अंश स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त वर्णित तथ्यों, आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा बयान एवं साक्ष्य, संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के आलोक में आरोपी पदाधिकारी का आरोप सं॰-1 से संदर्भित द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-2 :- प्रस्तुत आरोप बाढ़ 2016 पूर्व सहोरा एवं मदरौनी ग्राम के समीप कटाव निरोधक कार्य में Under Size एवं Over Size बोल्डर का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षतः अंकित किया गया है कि एकरारनामा के विरूद्ध न्यून विशिष्टि के बोल्डर का उपयोग होने तथा प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान होना परिलक्षित होता है। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि संचालन पदाधिकारी ने एकरारनामा कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 के अनुसार Specific Work के लिए बोल्डर का वजन 40 Kg. से 54.40 Kg. तक होने के आलोक में न्यून विशिष्टि का बोल्डर उपयोग किये जाने का आरोप प्रमाणित पाया गया एवं सभी साईज के बोल्डर का दर अनूसूचित दर में एक रहने के कारण Cost of Boulder में अनियमित भुगतान नहीं होने की बात स्वीकार करते हुए निष्कर्ष में अनियमित भुगतान होना प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी के उपरोक्त समीक्षा के आलोक में आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि एकरारनामा के कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में Crated Boulder Pitching का जिक्र नहीं है अपितु Loose Boulder Pitching या स्टैक के लिए प्रावधान है। साथ ही कहना है कि Technical Specification के कंडिका 4.6.4 में Crated Boulder Pitching का उल्लेख है, परन्तु विशिष्टि अंकित नहीं है। I.S Code 14262-1995 के कंडिका 3.6, I.S. Code 8408-1994 के कंडिका 5.7 एवं CWC को Handbook for Flood Protection, Anti Erosion & River Training works के पारा 4.5.3.1 को उद्‌दृत करते हुए प्रतिवेदित किया गया है कि उपरोक्त परिस्थिति में Clause of Contract के कंडिका 28 के तहत तकनीकी कोडों के अनुसार मेस साईज 150mm X 150mm से बड़े आकार का बोल्डर का उपयोग तकनीकी प्रावधानों एवं एकरारनामा के अन्तर्गत है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा उद्‌दृत संहिता के संगत कंडिकाओं से the size of mesh of Crate should not be smaller than the smallest stone in Ctate स्पष्ट होता है। स्पष्ट है कि उक्त संगत कंडिकाओं में मेश साईज एवं बोल्डर साईज का उल्लेख नहीं है। कार्य में प्रयुक्त Crate के मेश साईज 150mm X 150mm होने का तात्पर्य यह नहीं है कि 150mm से ठीक बड़े आकार का बोल्डर का उपयोग किया जाये। Technical Specification के शीर्ष Boulder/Brick work for Launching Apron/Bedbar Spur/Any other Flood Structure के तहत कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में स्पष्ट उल्लेख है कि "Stones used for the specified work should weigh between 40 Kg. to 54.50 Kg." एवं "Stone shall normally be of size 225mm to 300mm." स्पष्ट है कि 225mm से छोटा एवं 40 Kg. से कम वजन का बोल्डर व्यवहार नहीं किया जाना11 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 है। उक्त से आरोपी पदाधिकारी का कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में Crated Boulder Pitching का उल्लेख नहीं होने का कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आलोच्य कार्य के प्राक्कलन के साथ संलग्नित Analysis of Rate क्रमांक 'B' में Cost of Boulder at source with vat Royality (M-003) अंकित है/अनुसूचित दर पुस्तिका में Ref. Code M003 में Boulder with Minimum size of 300mm for Pitching का दर है। स्पष्ट है कि प्रावधान के अनुसार व्यवहृत बोल्डर का Smallest Size 300mm होना चाहिये। इस प्रकार आरोपी पदाधिकारी के 150mm से बड़े साईज का व्यवहृत बोल्डर तकनीकी प्रावधानों के अन्तर्गत होने का उपरोक्त बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.0.2 (ii) से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा बोल्डर का मानक वजन 40Kg. से 54.40Kg. तक माना गया है एवं स्थनीय जाँच में मदरौनी स्थल पर 40 Kg. से कम 52.20 प्रतिशत एवं 55Kg. से अधिक 11.03 प्रतिशत पाया गया और सहोरा स्थल पर 40Kg. से कम 51.59 प्रतिशत एवं 55 Kg. से अधिक 10.33 प्रतिशत पाया गया। जिससे लगभग आधे से अधिक बोल्डर मानक वजन 40Kg. से कम वजन का व्यवहार करते हुए न्यून विशिष्टि का कार्य होने एवं प्रावधान के अनुरूप भुगतान किये जाने से अनियमित भुगतान किया जाना स्पष्ट होता है। उपरोक्त तथ्यों से 300mm साईज से छोटा एवं 40Kg. से कम वजन का बोल्डर का व्यवहार मानक से न्यून विशिष्टि का होना स्पष्ट होता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी का कंडिका 28 के तहत संहिता के अनुसार मेस साईज 150mm X 150mm से बड़े आकार का बोल्डर का व्यवहार तकनीकी प्रावधानों एवं एकरारनामा के अन्तर्गत होने का बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-3 :- प्रस्तुत आरोप सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर न्यून विशिष्टि का G.I. Wire Crate का व्यवहार किये जाने एवं G.I. Binding Wire का व्यवहार कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराते हुए प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षतः अंकित किया गया है कि "उपरोक्त समीक्षा के आलोक में आरोप सं॰-3 का अंश यथा कार्य में न्यून विशिष्टि (कम वजन के) क्रेट का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने का आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। परन्तु क्रेट बाँधने में G.I.Wire का उपयोग नहीं किये जाने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है"। उक्त के संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि विभाग द्वारा निदेशित सक्षम प्राधिकार के रूप में शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल के गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन को पूरे कार्य के लिए मान्यता दिया जाना चाहिये। संचालन पदाधिकारी द्वारा समीक्षा में अंकित किया गया है कि खगौल के जाँचफल के आधार पर पूरे कार्य में विशिष्टि के अनुरूप क्रेट का उपयोग किया जाना मानना उचित नहीं होगा। गुणवत्ता जाँचफल से सहोरा स्थल के चेन 50 से 250m एवं मदरौनी स्थल के चेन 0 से 200 मीटर के बीच क्रेट का मेश साईज 150mm X 150mm होना परिलक्षित होता है। जो प्रावधान के अनुरूप है। परन्तु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन कंडिका 3.0.3 के अनुसार स्थलीय जाँच में क्रेट साईज प्रावधान के अनुरूप 3X1.5X0.6m, मेश साईज 150 to 200mm X 150 to 200mm पाया गया। जबकि मेश का प्रावधानित साईज 150X150mm है। इसी प्रकार मेश की सं॰ प्रावधानित 20X10X4 के विरूद्ध अधिकांशतः 18 x 9 x4 एवं कहीं-कहीं 16x8x4 पाया गया जो स्पष्टतः विशिष्टि के अनुरूप होना परिलक्षित नहीं होता है। इस प्रकार शोध प्रमंडल, खगौल के जाँचित स्थल को छोड़कर विशिष्टि युक्त G.I. Wire Crate व्यवहृत किया जाना परिलक्षित नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी ने प्रतिवेदित किया है कि अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल के 10 जाँच प्रतिवेदनों के प्रपत्र 'क' के क्रमांक 11 में समान्य विचार में अंकित संतोषप्रद शब्द की समीक्षा की गई है। परन्तु क्रमांक 6 में गुणवत्ता के संबंध में अंकित "कार्य की गुणवत्ता संतोषप्रद है" की समीक्षा नहीं की गई है। अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल द्वारा निरीक्षण के दौरान क्रेटों की मापी कर उसके साईज का उल्लेख नहीं करते हुए गुणवत्ता संतोषप्रद अंकित किया जाना परिलक्षित होता है जिसे सामान्य निरीक्षण के तौर पर नेत्रानुमान के आधार पर अभिव्यक्ति माना जा सकता है, जबकि माननीय मंत्री महोदय जी के निरीक्षण के दौरान दिये गये निदेश के आलोक में दिनांक 27.06.16 के उड़नदस्ता के स्थलीय जाँच के दौरान मापी के उपरान्त व्यवहृत क्रेट के मेश के साईज विशिष्टि के अनुरूप नहीं पाया गया। अतएव उड़नदस्ता के जाँच को मान्यता दिया जाना उचित प्रतीत होता है। इस प्रकार आरोपी का उपरोक्त द्वितीय पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि उड़नदस्ता के चार प्रतिवेदनों में मेस का साईज एवं वजन विशिष्टि के अनुरूप पाया गया है जिसकी संचालन पदाधिकारी द्वारा समीक्षा नहीं की गयी है। उड़नदस्ता जाँच दिनांक 20.03.16 से G.I. Wire Crate का वजन साईज एवं मेश साईज विशिष्टि के अनुरूप होना परिलक्षित होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया है कि 15339 क्रेटों में 1-2 प्रतिशत क्रेटों की बुनाई विशिष्टि के अनुरूप नहीं भी हो सकती है। आरोपी पदाधिकारी का विशिष्टि युक्त कार्य कराने का दायित्व होता है। दिनांक 20.03.16 के सुरक्षात्मक उड़नदस्ता दल के जाँच के बाद 27.06.16 के उड़नदस्ता जाँच में वायर क्रेट का मेश साईज एवं12 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संख्या में विशिष्टि के अनुरूप नहीं पाया गया। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 20.03.16 के जाँच के बाद विशिष्टि युक्त क्रेट का व्यवहार नहीं किया गया। अतएव आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त तथ्यों, बचाव बयान एवं जाँच प्रतिवेदन से संचालन पदाधिकारी के समीक्षा/मंतव्य के आधार पर न्यून विशिष्टि का G.I. Wire Crate का उपयोग किये जाने का मामला बनता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा का बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-4 :- इस आरोप के मुख्य अंश निम्न है :-

(क) अध्यक्ष विशेष जाँच दल के दिनांक 24.04.16 के मदरौनी स्थल पर 300 मीटर विस्तारित कार्य के सुझाव पर विलम्ब से प्रस्ताव दिया जाना ।

(ख) कार्य LWL से 0.6 मीटर उपर से प्रारम्भ किया जाना। (ग) कार्य प्रारम्भ करने में विलम्ब करना। (घ) स्वीकृत स्कोप ऑफ वर्क में बदलाव किया जाना। (ड़) LWL के उपर से एवं विलम्ब से कार्य प्रारम्भ करने के फलस्वरूप कार्य क्षतिग्रस्त होना। (च) समयपर कार्य पूरा नहीं होना। (छ) नदी के जलस्तर के बढ़ने का इंतजार करना ताकि जैसे-तैसे कार्य कराकर राशि का गबन करना।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्न बिन्दुओं को स्वीकार योग्य माना गया है :- (i) अध्यक्ष, विशेष जाँच दल का दिनांक 24.04.16 का जाँच प्रतिवेदन मुझे प्राप्त नहीं कराया गया है।

(ii) अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के 24.04.16 के सुझाव पर मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 11.05.16 को समर्पित प्रस्ताव पर 15 दिनों बाद विभाग द्वारा स्वीकृति दिया जाना कार्य के कार्यान्वयन में विलम्ब होने का कारण स्वीकार किया गया है। (iii) LWL से 0.6 मी॰ उपर कार्य कराने हेतु आरोपित पदाधिकारी को दोषी नहीं माना गया है।

(iv) तथ्यों से स्पष्ट होता है कि विभागीय स्वीकृति के पश्चात कार्य से विलम्ब से प्रारम्भ करने का आरोप नहीं बनता है। (v) मुख्य अभियंता द्वारा स्कोप ऑफ वर्क में किये गये बदलाव के लिए मुझे दोषी नहीं माना गया है।

(vi) अतिरिक्त कार्य के लिए तिथि निर्धारित नहीं था। इसे स्वीकार किया गया है। अतिरिक्त कार्य की स्वीकृति के बाद से ही तुरन्त कार्य शुरू किया गया तथा स्थल स्थिति के अनुसार उपलब्ध जगहों पर पर्याप्त बोल्डर, जमा भी कर लिया गया था, इसे भी सही माना गया है। (vii) कार्य को जैसे-तैसे कराकर गबन करने का आरोप नहीं बनता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कंडिका 4.3 एवं 4.4 में प्रतिवेदित किया गया है कि पहले अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के प्रतिवेदन को गंभीरता से नहीं लेने एवं इससे उत्पन्न अन्य आरोपों के आरोपित किया गया एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा गठित आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं होने एवं मनगढंत पाया गया तो मुख्य अभियंता के दिनांक 08.04.16 को स्थल आदेश पंजी पर दिये गये आदेश् पर तत्परता नहीं बरतने तथा कार्यो को सही ढंग से पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन नहीं करने का नया आरोप लगाया गया । साथ ही आरोपी पदाधिकारी ने नये आरोप के संदर्भ में कंडिका 4.5 में तथ्यों को प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से आरोपित पदाधिकारी के निम्न कथन की पुष्टि होती है :-

(i) विशेष जाँच दल के दिनांक 24.04.16 के स्थल निरीक्षण प्रतिवेदन दिनांक 30.06.16 तक आरोपी पदाधिकारी को प्राप्त नहीं होने के कथन को स्वीकार किया जा सकता है।

(ii) मुख्य अभियंता स्तर से दि॰ 11.05.16 को समर्पित प्रस्ताव पर 15 दिनों के बाद विभागीय स्तर से स्वीकृति प्रदान किया जाना भी कार्य के कार्यान्वयन में विलम्ब होना कारक माना जा सकता है।

(iii) कार्य LWL से 0.6 मीटर उपर से प्रारम्भ किये जाने के लिए आरोपी को दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है।

(iv) विभागीय स्वीकृति के पश्चात कार्य विलम्ब से प्रारम्भ करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है। (v) स्कोप ऑफ वर्क में बदलाव के लिए आरोपी को दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। (vi) कार्य विलम्ब से पूर्ण होने के संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी की उदासीनता परिलक्षित होता है। (vii) कार्य जैसे-तैसे कराकर गबन करने का आरोप नहीं बनता है।

संचालन पदाधिकारी ने समग्र रूप से निम्न निष्कर्ष अंकित किया है "उपरोक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में अतिरिक्त कार्य में तत्परता नहीं बरतने तथा कार्यो को सही ढंग से पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन नहीं करने का आरोप बनता प्रतीत होता है। फलतः कार्य बाढ़ अवधि प्रारम्भ होने के पूर्व समाप्त नहीं हो सका। परन्तु जानबूझ कर गबन करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।" संचालन पदाधिकारी के समीक्षा में अंकित उपरोक्त तथ्य एवं निष्कर्ष से स्पष्ट होता है कि आरोप अंश कार्य विलम्ब से पूर्ण किया जाना को प्रमाणित पाया गया जिसके लिए पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन में कमी माना गया है। आरोपी पदाधिकारी ने संचालन पदाधिकारी के समीक्षा (क्रमांक-vi) एवं निष्कर्ष में कार्य विलम्ब से पूर्ण होने के निष्कर्ष पर द्वितीय पृच्छा में कोई बयान नहीं दिया गया परिलक्षित होता है। अपितु मुख्य अभियंता के दिनांक 08.04.16 के13 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 अनुमोदित प्रस्ताव पर तत्परता नहीं बरतने, कार्य के पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन में कमी के काल्पनिक नया आरोप के संदर्भ में बचाव बयान में प्रतिवेदित किया गया है जिसका उल्लेख बचाव बयान कंडिका में किया गया है। संचालन पदाधिकारी के समीक्षा से स्पष्ट होता है कि दिनांक 03.06.16 के मुख्य अभियंता के निरीक्षण प्रतिवेदन से पर्याप्त बोल्डर उपलब्ध रहने एवं दिनांक 10.06.16 को निरीक्षण प्रतिवेदन में 15.06.16 तक कार्य समाप्त करने के निदेश से विस्तारित कार्य 15.06.16 तक समाप्त होने की स्थिति बनती है। परन्तु कार्य 15.06.16 तक समाप्त नहीं कराया जा सका। संचालन पदाधिकारी के उक्त समीक्षा से सहमत होते हुए कार्य विलम्ब से पूर्ण करने का आरोप अंश प्रमाणित होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा मुख्य अभियंता के 08.04.16 के निदेश के अनुपालन में तत्परता नहीं बरतने, पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण में कमी का नया आरोप लगाये जाने को प्रतिवेदित किया गया है जो स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि समीक्षा में मुख्य अभियंता के 08.04.16 के निदेश का अनुपालन 11.05.16 को किये जाने की स्थिति में अतिरिक्त कार्य में अभिरूची की कमी पाया गया है, जो उनके बयान से स्पष्ट होता है कि 08.04.16 के पूर्व एवं बाद में उनके द्वारा प्रयास किया गया है। इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरान्त श्री अवधेश कुमार झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को उक्त प्रमाणित आरोप के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया हैः- ''कालमान वेतनमान में तीन वेतन प्रक्रम पर अवनति तथा दो भावी वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक एवं तीन वर्षो तक प्रोन्नति की देय तिथि से प्रोन्नति पर रोक'' सरकार द्वारा लिए गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री अवधेश कुमार झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को उक्त दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

------- 21 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(पू॰) 01-07/16-1090--मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग कटिहार के परिक्षेत्राधीन बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के पदस्थापन अवधि के दौरान एजेण्डा सं0 133/201 एवं 133/202 के तहत कोशी नदी के दायें तट पर क्रमशः सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर वर्ष 2016 बाढ़ के पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्य में बरती गयी अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल द्वारा की गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरान्त बरती गयी अनियमितता के लिए श्री विनय कुमार गुप्ता, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को विभागीय अधिसूचना सं0 1470 दिनांक- 22.07.2016 द्वारा निलंबित किया गया, तदोपरान्त विभागीय संकल्प ज्ञापांक- 1541 दिनांक-27.07.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी, सम्यक समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री विनय कुमार गुप्ता, तत्कालीन सहायक अभियंता से विभागीय पत्रांक-1166 दिनांक- 18.07.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी, श्री गुप्ता, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर की विस्तृत समीक्षा निम्नरूपेण की गयीः- आरोप सं॰-1 :- प्रस्तुत आरोप सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर मानक Voids से अधिक Voids के साथ न्यून विशिष्टि का Crated Boulder Pitching कार्य कराये जाने एवं अधिकाई भुगतान करने से संबंधित है। कोशी नदी के दायें तट पर स्थित सहोरा ग्राम के पास एकरारित राशि रू॰ 611.84 लाख (एकरारनामा सं॰ SBD- 03/15-16) एजेन्डा सं॰ 133/201 के तहत एवं मदरौनी ग्राम के पास एकरारित राशि रू॰ 539.06 लाख (एकरारनामा सं॰ SBD-04/15-16) एजेन्डा सं॰ 133/202 के तहत बाढ़ वर्ष 2016 पूर्व कटाव निरोधक कार्य बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया द्वारा कराया गया। कराये गये कार्य में उड़नदस्ता जाँच में पायी गयी अनियमितता के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। संचालन पदाधिकारी द्वारा बोल्डर क्रेटिंग कार्य वास्तविक Voids से कम कटौती कर अधिकाई भुगतान करने का आरोप प्रमाणित पाया गया। आरोपी पदाधिकारी द्वारा बयान कंडिका 1.3 (i) से (v) तक मुख्य अभियंता, भागलपुर द्वारा गठित असम्बद्ध अभियंताओं के टीम के साथ संयुक्त जाँच किये जाने, अनुवीक्षण दल का 10 जाँच प्रतिवेदन, विभागीय उड़नदस्ता टीम का जाँच प्रतिवेदन 32 बार वरीय पदाधिकारियों का स्थल निरीक्षण एवं Clause of Contract के कंडिका 16, 7 एवं 11 का संचालन पदाधिकारी द्वारा तकनीकी विश्लेषण या विभागीय नियमों के अनुरूप समीक्षा नहीं किये जाने को प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से समीक्षा किया जाना परिलक्षित होता है। अतएव इस बिन्दु पर पुनः समीक्षा किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा बयान कंडिका 1.3 VI में I.S. Code 14262-1995 के कंडिका 3.2 को उद्‌दृत करते हुए बोल्डर का Density 2000Kg/m3 के आधार पर क्रेट के बोल्डर की मात्रा 4320 Kg. की गणना करते हुए उड़नदस्ता जाँच में पाये गये मात्रा 4689 Kg. एवं 4716 Kg. के आलोक में 20 प्रतिशत Voids को सही होने को प्रतिवेदितबिहार गजट, 20 Qjojh 2019 14 किया गया। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन कंडिका 3.0.1 से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता द्वारा Sand Replacement Method जो तकनीकी रूप से मान्य विधि है, से की गयी जाँच में Voids 28.59 % एवं 26.40 % पाया गया है। Actual Field Test में पायी गयी Voids की मात्रा का मान्यता दिया जाना उचित प्रतीत होता है। अएतव आरोपित पदाधिकारी के गणित मात्रा के आलोक में संदर्भित बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कंडिका 1.1 एवं 1.2 में एकरारनामा के Technical Specification के कंडिका 4.6.4.5 एवं Special Terms की कंडिका 4.12.0.2 को उद्‌दृत करते हुए प्रतिवेदित किया गया है कि शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल के गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन के आधार पर सहोरा स्थल पर 20.15 प्रतिशत एवं मदरौनी स्थल पर 20.10 प्रतिशत की कई Voids की कटौती एकरारनामा के अनुरूप है। Special Terms & Conditions से स्पष्ट होता है कि Minimum 20% Voids की कटौती की जा सकती है और Actual Field Test या गुणवत्ता नियंत्रण प्रमंडल के जाँचफल के आधार पर अधिक कटौती की जा सकती है। जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल एवं उड़नदस्ता द्वारा अलग-अलग स्थलों पर Voids की जाँच की गयी। शोध प्रमंडल के जाँच में Voids 19.90% से 20.20% पाया गया जबकि उड़नदस्ता जाँच में 28.59 प्रतिशत एवं 26.40 प्रतिशत पाया गया जो मानक 20 प्रतिशत से अधिक है। उड़नदस्ता जाँच दल एवं शोध प्रमंडल का जाँच स्थल अलग-अलग होने की स्थिति में शोध प्रमंडल का जाँचफल पूरे कार्य के लिए माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी के बयान का उक्त अंश स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त वर्णित तथ्यों, आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा बयान एवं साक्ष्य, संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के आलोक में आरोपी पदाधिकारी का आरोप सं॰-1 से संदर्भित द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-2 :- प्रस्तुत आरोप बाढ़ 2016 पूर्व सहोरा एवं मदरौनी ग्राम के समीप कटाव निरोधक कार्य में Under Size एवं Over Size बोल्डर का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षतः अंकित किया गया है कि एकरारनामा के विरूद्ध न्यून विशिष्टि के बोल्डर का उपयोग होने तथा प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान होना परिलक्षित होता है। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि संचालन पदाधिकारी ने एकरारनामा कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 के अनुसार Specific Work के लिए बोल्डर का वजन 40 Kg. से 54.40 Kg. तक होने के आलोक में न्यून विशिष्टि का बोल्डर उपयोग किये जाने का आरोप प्रमाणित पाया गया एवं सभी साईज के बोल्डर का दर अनूसूचित दर में एक रहने के कारण Cost of Boulder में अनियमित भुगतान नहीं होने की बात स्वीकार करते हुए निष्कर्ष में अनियमित भुगतान होना प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी के उपरोक्त समीक्षा के आलोक में आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि एकरारनामा के कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में Crated Boulder Pitching का जिक्र नहीं है अपितु Loose Boulder Pitching या स्टैक के लिए प्रावधान है। साथ ही कहना है कि Technical Specification के कंडिका 4.6.4 में Crated Boulder Pitching का उल्लेख है, परन्तु विशिष्टि अंकित नहीं है। I.S Code 14262-1995 के कंडिका 3.6, I.S. Code 8408-1994 के कंडिका 5.7 एवं CWC को Handbook for Flood Protection, Anti Erosion & River Training works के पारा 4.5.3.1 को उद्‌दृत करते हुए प्रतिवेदित किया गया है कि उपरोक्त परिस्थिति में Clause of Contract के कंडिका 28 के तहत तकनीकी कोडों के अनुसार मेस साईज 150mm X 150mm से बड़े आकार का बोल्डर का उपयोग तकनीकी प्रावधानों एवं एकरारनामा के अन्तर्गत है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा उद्‌दृत संहिता के संगत कंडिकाओं से the size of mesh of Crate should not be smaller than the smallest stone in Ctate स्पष्ट होता है। स्पष्ट है कि उक्त संगत कंडिकाओं में मेश साईज एवं बोल्डर साईज का उल्लेख नहीं है। कार्य में प्रयुक्त Crate के मेश साईज 150mm X 150mm होने का तात्पर्य यह नहीं है कि 150mm से ठीक बड़े आकार का बोल्डर का उपयोग किया जाये। Technical Specification के शीर्ष Boulder/Brick work for Launching Apron/Bedbar Spur/Any other Flood Structure के तहत कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में स्पष्ट उल्लेख है कि "Stones used for the specified work should weigh between 40 Kg. to 54.50 Kg." एवं "Stone shall normally be of size 225mm to 300mm." स्पष्ट है कि 225mm से छोटा एवं 40 Kg. से कम वजन का बोल्डर व्यवहार नहीं किया जाना है। उक्त से आरोपी पदाधिकारी का कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में Crated Boulder Pitching का उल्लेख नहीं होने का कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आलोच्य कार्य के प्राक्कलन के साथ संलग्नित Analysis of Rate क्रमांक 'B' में Cost of Boulder at source with vat Royality (M-003) अंकित है/अनुसूचित दर पुस्तिका में Ref. Code M003 में Boulder with Minimum size of 300mm for Pitching का दर है। स्पष्ट है कि प्रावधान के अनुसार व्यवहृत बोल्डर का Smallest15 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 Size 300mm होना चाहिये। इस प्रकार आरोपी पदाधिकारी के 150mm से बड़े साईज का व्यवहृत बोल्डर तकनीकी प्रावधानों के अन्तर्गत होने का उपरोक्त बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.0.2 (ii) से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा बोल्डर का मानक वजन 40Kg. से 54.40Kg. तक माना गया है एवं स्थनीय जाँच में मदरौनी स्थल पर 40 Kg. से कम 52.20 प्रतिशत एवं 55Kg. से अधिक 11.03 प्रतिशत पाया गया और सहोरा स्थल पर 40Kg. से कम 51.59 प्रतिशत एवं 55 Kg. से अधिक 10.33 प्रतिशत पाया गया। जिससे लगभग आधे से अधिक बोल्डर मानक वजन 40Kg. से कम वजन का व्यवहार करते हुए न्यून विशिष्टि का कार्य होने एवं प्रावधान के अनुरूप भुगतान किये जाने से अनियमित भुगतान किया जाना स्पष्ट होता है। उपरोक्त तथ्यों से 300mm साईज से छोटा एवं 40Kg. से कम वजन का बोल्डर का व्यवहार मानक से न्यून विशिष्टि का होना स्पष्ट होता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी का कंडिका 28 के तहत संहिता के अनुसार मेस साईज 150mm X 150mm से बड़े आकार का बोल्डर का व्यवहार तकनीकी प्रावधानों एवं एकरारनामा के अन्तर्गत होने का बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-3 :- प्रस्तुत आरोप सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर न्यून विशिष्टि का G.I. Wire Crate का व्यवहार किये जाने एवं G.I. Binding Wire का व्यवहार कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराते हुए प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षतः अंकित किया गया है कि "उपरोक्त समीक्षा के आलोक में आरोप सं॰-3 का अंश यथा कार्य में न्यून विशिष्टि (कम वजन के) क्रेट का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने का आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। परन्तु क्रेट बाँधने में G.I.Wire का उपयोग नहीं किये जाने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है"। उक्त के संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि विभाग द्वारा निदेशित सक्षम प्राधिकार के रूप में शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल के गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन को पूरे कार्य के लिए मान्यता दिया जाना चाहिये। संचालन पदाधिकारी द्वारा समीक्षा में अंकित किया गया है कि खगौल के जाँचफल के आधार पर पूरे कार्य में विशिष्टि के अनुरूप क्रेट का उपयोग किया जाना मानना उचित नहीं होगा। गुणवत्ता जाँचफल से सहोरा स्थल के चेन 50 से 250m एवं मदरौनी स्थल के चेन 0 से 200 मीटर के बीच क्रेट का मेश साईज 150mm X 150mm होना परिलक्षित होता है। जो प्रावधान के अनुरूप है। परन्तु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन कंडिका 3.0.3 के अनुसार स्थलीय जाँच में क्रेट साईज प्रावधान के अनुरूप 3X1.5X0.6m, मेश साईज 150 to 200mm X 150 to 200mm पाया गया। जबकि मेश का प्रावधानित साईज 150X150mm है। इसी प्रकार मेश की सं॰ प्रावधानित 20X10X4 के विरूद्ध अधिकांशतः 18 x 9 x4 एवं कहीं-कहीं 16x8x4 पाया गया जो स्पष्टतः विशिष्टि के अनुरूप होना परिलक्षित नहीं होता है। इस प्रकार शोध प्रमंडल, खगौल के जाँचित स्थल को छोड़कर विशिष्टि युक्त G.I. Wire Crate व्यवहृत किया जाना परिलक्षित नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी ने प्रतिवेदित किया है कि अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल के 10 जाँच प्रतिवेदनों के प्रपत्र 'क' के क्रमांक 11 में समान्य विचार में अंकित संतोषप्रद शब्द की समीक्षा की गई है। परन्तु क्रमांक 6 में गुणवत्ता के संबंध में अंकित "कार्य की गुणवत्ता संतोषप्रद है" की समीक्षा नहीं की गई है। अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल द्वारा निरीक्षण के दौरान क्रेटों की मापी कर उसके साईज का उल्लेख नहीं करते हुए गुणवत्ता संतोषप्रद अंकित किया जाना परिलक्षित होता है जिसे सामान्य निरीक्षण के तौर पर नेत्रानुमान के आधार पर अभिव्यक्ति माना जा सकता है, जबकि माननीय मंत्री महोदय जी के निरीक्षण के दौरान दिये गये निदेश के आलोक में दिनांक 27.06.16 के उड़नदस्ता के स्थलीय जाँच के दौरान मापी के उपरान्त व्यवहृत क्रेट के मेश के साईज विशिष्टि के अनुरूप नहीं पाया गया। अतएव उड़नदस्ता के जाँच को मान्यता दिया जाना उचित प्रतीत होता है। इस प्रकार आरोपी का उपरोक्त द्वितीय पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि उड़नदस्ता के चार प्रतिवेदनों में मेस का साईज एवं वजन विशिष्टि के अनुरूप पाया गया है जिसकी संचालन पदाधिकारी द्वारा समीक्षा नहीं की गयी है। उड़नदस्ता जाँच दिनांक 20.03.16 से G.I. Wire Crate का वजन साईज एवं मेश साईज विशिष्टि के अनुरूप होना परिलक्षित होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया है कि 15339 क्रेटों में 1-2 प्रतिशत क्रेटों की बुनाई विशिष्टि के अनुरूप नहीं भी हो सकती है। आरोपी पदाधिकारी का विशिष्टि युक्त कार्य कराने का दायित्व होता है। दिनांक 20.03.16 के सुरक्षात्मक उड़नदस्ता दल के जाँच के बाद 27.06.16 के उड़नदस्ता जाँच में वायर क्रेट का मेश साईज एवं संख्या में विशिष्टि के अनुरूप नहीं पाया गया। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 20.03.16 के जाँच के बाद विशिष्टि युक्त क्रेट का व्यवहार नहीं किया गया। अतएव आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त तथ्यों, बचाव बयान एवं जाँच प्रतिवेदन से संचालन पदाधिकारी के समीक्षा/मंतव्य के आधार पर न्यून विशिष्टि का G.I. Wire Crate का उपयोग किये जाने का मामला बनता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा का बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-4 :- इस आरोप के मुख्य अंश निम्न है :-

बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 16

(क) अध्यक्ष विशेष जाँच दल के दिनांक 24.04.16 के मदरौनी स्थल पर 300 मीटर विस्तारित कार्य के सुझाव पर विलम्ब से प्रस्ताव दिया जाना ।

(ख) कार्य LWL से 0.6 मीटर उपर से प्रारम्भ किया जाना। (ग) कार्य प्रारम्भ करने में विलम्ब करना। (घ) स्वीकृत स्कोप ऑफ वर्क में बदलाव किया जाना। (ड़) LWL के उपर से एवं विलम्ब से कार्य प्रारम्भ करने के फलस्वरूप कार्य क्षतिग्रस्त होना। (च) समयपर कार्य पूरा नहीं होना। (छ) नदी के जलस्तर के बढ़ने का इंतजार करना ताकि जैसे-तैसे कार्य कराकर राशि का गबन करना।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्न बिन्दुओं को स्वीकार योग्य माना गया है :- (i) अध्यक्ष, विशेष जाँच दल का दिनांक 24.04.16 का जाँच प्रतिवेदन मुझे प्राप्त नहीं कराया गया है।

(ii) अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के 24.04.16 के सुझाव पर मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 11.05.16 को समर्पित प्रस्ताव पर 15 दिनों बाद विभाग द्वारा स्वीकृति दिया जाना कार्य के कार्यान्वयन में विलम्ब होने का कारण स्वीकार किया गया है। (iii) LWL से 0.6 मी॰ उपर कार्य कराने हेतु आरोपित पदाधिकारी को दोषी नहीं माना गया है।

(iv) तथ्यों से स्पष्ट होता है कि विभागीय स्वीकृति के पश्चात कार्य से विलम्ब से प्रारम्भ करने का आरोप नहीं बनता है। (v) मुख्य अभियंता द्वारा स्कोप ऑफ वर्क में किये गये बदलाव के लिए मुझे दोषी नहीं माना गया है।

(vi) अतिरिक्त कार्य के लिए तिथि निर्धारित नहीं था। इसे स्वीकार किया गया है। अतिरिक्त कार्य की स्वीकृति के बाद से ही तुरन्त कार्य शुरू किया गया तथा स्थल स्थिति के अनुसार उपलब्ध जगहों पर पर्याप्त बोल्डर, जमा भी कर लिया गया था, इसे भी सही माना गया है। (vii) कार्य को जैसे-तैसे कराकर गबन करने का आरोप नहीं बनता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कंडिका 4.3 एवं 4.4 में प्रतिवेदित किया गया है कि पहले अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के प्रतिवेदन को गंभीरता से नहीं लेने एवं इससे उत्पन्न अन्य आरोपों के आरोपित किया गया एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा गठित आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं होने एवं मनगढंत पाया गया तो मुख्य अभियंता के दिनांक 08.04.16 को स्थल आदेश पंजी पर दिये गये आदेश पर तत्परता नहीं बरतने तथा कार्यो को सही ढंग से पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन नहीं करने का नया आरोप लगाया गया । साथ ही आरोपी पदाधिकारी ने नये आरोप के संदर्भ में कंडिका 4.5 में तथ्यों को प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से आरोपित पदाधिकारी के निम्न कथन की पुष्टि होती है :-

(i) विशेष जाँच दल के दिनांक 24.04.16 के स्थल निरीक्षण प्रतिवेदन दिनांक 30.06.16 तक आरोपी पदाधिकारी को प्राप्त नहीं होने के कथन को स्वीकार किया जा सकता है।

(ii) मुख्य अभियंता स्तर से दि॰ 11.05.16 को समर्पित प्रस्ताव पर 15 दिनों के बाद विभागीय स्तर से स्वीकृति प्रदान किया जाना भी कार्य के कार्यान्वयन में विलम्ब होना कारक माना जा सकता है।

(iii) कार्य LWL से 0.6 मीटर उपर से प्रारम्भ किये जाने के लिए आरोपी को दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है।

(iv) विभागीय स्वीकृति के पश्चात कार्य विलम्ब से प्रारम्भ करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है। (v) स्कोप ऑफ वर्क में बदलाव के लिए आरोपी को दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। (vi) कार्य विलम्ब से पूर्ण होने के संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी की उदासीनता परिलक्षित होता है। (vii) कार्य जैसे-तैसे कराकर गबन करने का आरोप नहीं बनता है।

संचालन पदाधिकारी ने समग्र रूप से निम्न निष्कर्ष अंकित किया है "उपरोक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में अतिरिक्त कार्य में तत्परता नहीं बरतने तथा कार्यो को सही ढंग से पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन नहीं करने का आरोप बनता प्रतीत होता है। फलतः कार्य बाढ़ अवधि प्रारम्भ होने के पूर्व समाप्त नहीं हो सका। परन्तु जानबूझ कर गबन करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।" संचालन पदाधिकारी के समीक्षा में अंकित उपरोक्त तथ्य एवं निष्कर्ष से स्पष्ट होता है कि आरोप अंश कार्य विलम्ब से पूर्ण किया जाना को प्रमाणित पाया गया जिसके लिए पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन में कमी माना गया है। आरोपी पदाधिकारी ने संचालन पदाधिकारी के समीक्षा (क्रमांक-vi) एवं निष्कर्ष में कार्य विलम्ब से पूर्ण होने के निष्कर्ष पर द्वितीय पृच्छा में कोई बयान नहीं दिया गया परिलक्षित होता है। अपितु मुख्य अभियंता के दिनांक 08.04.16 के अनुमोदित प्रस्ताव पर तत्परता नहीं बरतने, कार्य के पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन में कमी के काल्पनिक नया आरोप के संदर्भ में बचाव बयान में प्रतिवेदित किया गया है जिसका उल्लेख बचाव बयान कंडिका में किया गया है। संचालन पदाधिकारी के समीक्षा से स्पष्ट होता है कि दिनांक 03.06.16 के मुख्य अभियंता के निरीक्षण प्रतिवेदन से पर्याप्त बोल्डर उपलब्ध रहने एवं दिनांक 10.06.16 को निरीक्षण प्रतिवेदन में 15.06.16 तक कार्य समाप्त करने के निदेश से विस्तारित कार्य 15.06.16 तक समाप्त होने की स्थिति बनती है। परन्तु कार्य 15.06.16 तक समाप्त नहीं कराया जा सका। संचालन पदाधिकारी के उक्त समीक्षा से सहमत होते हुए कार्य विलम्ब से पूर्ण करने का आरोप अंश प्रमाणित होता है।17 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 आरोपी पदाधिकारी द्वारा मुख्य अभियंता के 08.04.16 के निदेश के अनुपालन में तत्परता नहीं बरतने, पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण में कमी का नया आरोप लगाये जाने को प्रतिवेदित किया गया है जो स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि समीक्षा में मुख्य अभियंता के 08.04.16 के निदेश का अनुपालन 11.05.16 को किये जाने की स्थिति में अतिरिक्त कार्य में अभिरूची की कमी पाया गया है, जो उनके बयान से स्पष्ट होता है कि 08.04.16 के पूर्व एवं बाद में उनके द्वारा प्रयास किया गया है। इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरान्त श्री विनय कुमार गुप्ता, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को उक्त प्रमाणित आरोप के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया हैः- ''छः वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक एवं पॉच वर्षो तक प्रोन्नति की देय तिथि से प्रोन्नति पर रोक'' सरकार द्वारा लिए गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री विनय कुमार गुप्ता, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को उक्त दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राकेश मोहन, संयुक्त सचिव

------- 21 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(पू॰) 01-07/16-1091--मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग कटिहार के परिक्षेत्राधीन बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के पदस्थापन अवधि के दौरान एजेण्डा सं0 133 /201 एवं 133/202 के तहत कोशी नदी के दायें तट पर क्रमशः सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर वर्ष 2016 बाढ़ के पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्य में बरती गयी अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल द्वारा की गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरान्त बरती गयी अनियमितता के लिए श्री राम स्वरूप रजक, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को विभागीय अधिसूचना सं0 1471 दिनांक- 22.07.2016 द्वारा निलंबित किया गया, तदोपरान्त विभागीय संकल्प ज्ञापांक- 1543 दिनांक- 27.07.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी, सम्यक समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री राम स्वरूप रजक, तत्कालीन सहायक अभियंता से विभागीय पत्रांक-1164 दिनांक- 18.07.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी, श्री रजक, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर की विस्तृत समीक्षा निम्नरूपेण की गयीः- आरोप सं॰-1 :- प्रस्तुत आरोप सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर मानक Voids से अधिक Voids के साथ न्यून विशिष्टि का Crated Boulder Pitching कार्य कराये जाने एवं अधिकाई भुगतान करने से संबंधित है। कोशी नदी के दायें तट पर स्थित सहोरा ग्राम के पास एकरारित राशि रू॰ 611.84 लाख (एकरारनामा सं॰ SBD- 03/15-16) एजेन्डा सं॰ 133/201 के तहत एवं मदरौनी ग्राम के पास एकरारित राशि रू॰ 539.06 लाख (एकरारनामा सं॰ SBD-04/15-16) एजेन्डा सं॰ 133/202 के तहत बाढ़ वर्ष 2016 पूर्व कटाव निरोधक कार्य बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया द्वारा कराया गया। कराये गये कार्य में उड़नदस्ता जाँच में पायी गयी अनियमितता के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। संचालन पदाधिकारी द्वारा बोल्डर क्रेटिंग कार्य वास्तविक Voids से कम कटौती कर अधिकाई भुगतान करने का आरोप प्रमाणित पाया गया। आरोपी पदाधिकारी द्वारा बयान कंडिका 1.3 (i) से (v) तक मुख्य अभियंता, भागलपुर द्वारा गठित असम्बद्ध अभियंताओं के टीम के साथ संयुक्त जाँच किये जाने, अनुवीक्षण दल का 10 जाँच प्रतिवेदन, विभागीय उड़नदस्ता टीम का जाँच प्रतिवेदन 32 बार वरीय पदाधिकारियों का स्थल निरीक्षण एवं Clause of Contract के कंडिका 16, 7 एवं 11 का संचालन पदाधिकारी द्वारा तकनीकी विश्लेषण या विभागीय नियमों के अनुरूप समीक्षा नहीं किये जाने को प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से समीक्षा किया जाना परिलक्षित होता है। अतएव इस बिन्दु पर पुनः समीक्षा किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा बयान कंडिका 1.3 VI में I.S. Code 14262-1995 के कंडिका 3.2 को उद्‌दृत करते हुए बोल्डर का Density 2000Kg/m3 के आधार पर क्रेट के बोल्डर की मात्रा 4320 Kg. की गणना करते हुए उड़नदस्ता जाँच में पाये गये मात्रा 4689 Kg. एवं 4716 Kg. के आलोक में 20 प्रतिशत Voids को सही होने को प्रतिवेदित किया गया। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन कंडिका 3.0.1 से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता द्वारा Sand Replacement Method जो तकनीकी रूप से मान्य विधि है, से की गयी जाँच में Voids 28.59 % एवं 26.40 % पाया गया है। Actual Field Test में पायी गयी Voids की मात्रा का मान्यता दिया जाना उचित प्रतीत होता है। अएतव आरोपित पदाधिकारी के गणित मात्रा के आलोक में संदर्भित बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कंडिका 1.1 एवं 1.2 में एकरारनामा के Technical Specification के कंडिका 4.6.4.5 एवं Special Terms की कंडिका 4.12.0.2 को उद्‌दृत करते हुए प्रतिवेदित किया गया है कि शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल के गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन के आधार पर सहोरा स्थल पर 20.15 प्रतिशत एवं मदरौनी स्थल पर 20.10 प्रतिशत कीबिहार गजट, 20 Qjojh 2019 18 कई Voids की कटौती एकरारनामा के अनुरूप है। Special Terms & Conditions से स्पष्ट होता है कि Minimum 20% Voids की कटौती की जा सकती है और Actual Field Test या गुणवत्ता नियंत्रण प्रमंडल के जाँचफल के आधार पर अधिक कटौती की जा सकती है। जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल एवं उड़नदस्ता द्वारा अलग-अलग स्थलों पर Voids की जाँच की गयी। शोध प्रमंडल के जाँच में Voids 19.90% से 20.20% पाया गया जबकि उड़नदस्ता जाँच में 28.59 प्रतिशत एवं 26.40 प्रतिशत पाया गया जो मानक 20 प्रतिशत से अधिक है। उड़नदस्ता जाँच दल एवं शोध प्रमंडल का जाँच स्थल अलग-अलग होने की स्थिति में शोध प्रमंडल का जाँचफल पूरे कार्य के लिए माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी के बयान का उक्त अंश स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त वर्णित तथ्यों, आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा बयान एवं साक्ष्य, संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के आलोक में आरोपी पदाधिकारी का आरोप सं॰-1 से संदर्भित द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-2 :- प्रस्तुत आरोप बाढ़ 2016 पूर्व सहोरा एवं मदरौनी ग्राम के समीप कटाव निरोधक कार्य में Under Size एवं Over Size बोल्डर का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षतः अंकित किया गया है कि एकरारनामा के विरूद्ध न्यून विशिष्टि के बोल्डर का उपयोग होने तथा प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान होना परिलक्षित होता है। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि संचालन पदाधिकारी ने एकरारनामा कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 के अनुसार Specific Work के लिए बोल्डर का वजन 40 Kg. से 54.40 Kg. तक होने के आलोक में न्यून विशिष्टि का बोल्डर उपयोग किये जाने का आरोप प्रमाणित पाया गया एवं सभी साईज के बोल्डर का दर अनूसूचित दर में एक रहने के कारण Cost of Boulder में अनियमित भुगतान नहीं होने की बात स्वीकार करते हुए निष्कर्ष में अनियमित भुगतान होना प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी के उपरोक्त समीक्षा के आलोक में आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि एकरारनामा के कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में Crated Boulder Pitching का जिक्र नहीं है अपितु Loose Boulder Pitching या स्टैक के लिए प्रावधान है। साथ ही कहना है कि Technical Specification के कंडिका 4.6.4 में Crated Boulder Pitching का उल्लेख है, परन्तु विशिष्टि अंकित नहीं है। I.S Code 14262-1995 के कंडिका 3.6, I.S. Code 8408-1994 के कंडिका 5.7 एवं CWC को Handbook for Flood Protection, Anti Erosion & River Training works के पारा 4.5.3.1 को उद्‌दृत करते हुए प्रतिवेदित किया गया है कि उपरोक्त परिस्थिति में Clause of Contract के कंडिका 28 के तहत तकनीकी कोडों के अनुसार मेस साईज 150mm X 150mm से बड़े आकार का बोल्डर का उपयोग तकनीकी प्रावधानों एवं एकरारनामा के अन्तर्गत है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा उद्‌दृत संहिता के संगत कंडिकाओं से the size of mesh of Crate should not be smaller than the smallest stone in Ctate स्पष्ट होता है। स्पष्ट है कि उक्त संगत कंडिकाओं में मेश साईज एवं बोल्डर साईज का उल्लेख नहीं है। कार्य में प्रयुक्त Crate के मेश साईज 150mm X 150mm होने का तात्पर्य यह नहीं है कि 150mm से ठीक बड़े आकार का बोल्डर का उपयोग किया जाये। Technical Specification के शीर्ष Boulder/Brick work for Launching Apron/Bedbar Spur/Any other Flood Structure के तहत कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में स्पष्ट उल्लेख है कि "Stones used for the specified work should weigh between 40 Kg. to 54.50 Kg." एवं "Stone shall normally be of size 225mm to 300mm." स्पष्ट है कि 225mm से छोटा एवं 40 Kg. से कम वजन का बोल्डर व्यवहार नहीं किया जाना है। उक्त से आरोपी पदाधिकारी का कंडिका 4.6.1 एवं 4.6.2 में Crated Boulder Pitching का उल्लेख नहीं होने का कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आलोच्य कार्य के प्राक्कलन के साथ संलग्नित Analysis of Rate क्रमांक 'B' में Cost of Boulder at source with vat Royality (M-003) अंकित है/अनुसूचित दर पुस्तिका में Ref. Code M003 में Boulder with Minimum size of 300mm for Pitching का दर है। स्पष्ट है कि प्रावधान के अनुसार व्यवहृत बोल्डर का Smallest Size 300mm होना चाहिये। इस प्रकार आरोपी पदाधिकारी के 150mm से बड़े साईज का व्यवहृत बोल्डर तकनीकी प्रावधानों के अन्तर्गत होने का उपरोक्त बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.0.2 (ii) से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा बोल्डर का मानक वजन 40Kg. से 54.40Kg. तक माना गया है एवं स्थनीय जाँच में मदरौनी स्थल पर 40 Kg. से कम 52.20 प्रतिशत एवं 55Kg. से अधिक 11.03 प्रतिशत पाया गया और सहोरा स्थल पर 40Kg. से कम 51.59 प्रतिशत एवं 55 Kg. से अधिक 10.33 प्रतिशत पाया गया। जिससे लगभग आधे से अधिक बोल्डर मानक वजन 40Kg. से कम वजन का व्यवहार करते हुए न्यून विशिष्टि का कार्य होने एवं प्रावधान के अनुरूप भुगतान किये जाने से अनियमित भुगतान किया जाना स्पष्ट होता है।19 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 उपरोक्त तथ्यों से 300mm साईज से छोटा एवं 40Kg. से कम वजन का बोल्डर का व्यवहार मानक से न्यून विशिष्टि का होना स्पष्ट होता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी का कंडिका 28 के तहत संहिता के अनुसार मेस साईज 150mm X 150mm से बड़े आकार का बोल्डर का व्यवहार तकनीकी प्रावधानों एवं एकरारनामा के अन्तर्गत होने का बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-3 :- प्रस्तुत आरोप सहोरा एवं मदरौनी स्थल पर न्यून विशिष्टि का G.I. Wire Crate का व्यवहार किये जाने एवं G.I. Binding Wire का व्यवहार कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराते हुए प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षतः अंकित किया गया है कि "उपरोक्त समीक्षा के आलोक में आरोप सं॰-3 का अंश यथा कार्य में न्यून विशिष्टि (कम वजन के) क्रेट का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने का आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। परन्तु क्रेट बाँधने में G.I.Wire का उपयोग नहीं किये जाने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है"। उक्त के संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि विभाग द्वारा निदेशित सक्षम प्राधिकार के रूप में शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल के गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन को पूरे कार्य के लिए मान्यता दिया जाना चाहिये। संचालन पदाधिकारी द्वारा समीक्षा में अंकित किया गया है कि खगौल के जाँचफल के आधार पर पूरे कार्य में विशिष्टि के अनुरूप क्रेट का उपयोग किया जाना मानना उचित नहीं होगा। गुणवत्ता जाँचफल से सहोरा स्थल के चेन 50 से 250m एवं मदरौनी स्थल के चेन 0 से 200 मीटर के बीच क्रेट का मेश साईज 150mm X 150mm होना परिलक्षित होता है। जो प्रावधान के अनुरूप है। परन्तु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन कंडिका 3.0.3 के अनुसार स्थलीय जाँच में क्रेट साईज प्रावधान के अनुरूप 3X1.5X0.6m, मेश साईज 150 to 200mm X 150 to 200mm पाया गया। जबकि मेश का प्रावधानित साईज 150X150mm है। इसी प्रकार मेश की सं॰ प्रावधानित 20X10X4 के विरूद्ध अधिकांशतः 18 x 9 x4 एवं कहीं-कहीं 16x8x4 पाया गया जो स्पष्टतः विशिष्टि के अनुरूप होना परिलक्षित नहीं होता है। इस प्रकार शोध प्रमंडल, खगौल के जाँचित स्थल को छोड़कर विशिष्टि युक्त G.I. Wire Crate व्यवहृत किया जाना परिलक्षित नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी ने प्रतिवेदित किया है कि अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल के 10 जाँच प्रतिवेदनों के प्रपत्र 'क' के क्रमांक 11 में समान्य विचार में अंकित संतोषप्रद शब्द की समीक्षा की गई है। परन्तु क्रमांक 6 में गुणवत्ता के संबंध में अंकित "कार्य की गुणवत्ता संतोषप्रद है" की समीक्षा नहीं की गई है। अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल द्वारा निरीक्षण के दौरान क्रेटों की मापी कर उसके साईज का उल्लेख नहीं करते हुए गुणवत्ता संतोषप्रद अंकित किया जाना परिलक्षित होता है जिसे सामान्य निरीक्षण के तौर पर नेत्रानुमान के आधार पर अभिव्यक्ति माना जा सकता है, जबकि माननीय मंत्री महोदय जी के निरीक्षण के दौरान दिये गये निदेश के आलोक में दिनांक 27.06.16 के उड़नदस्ता के स्थलीय जाँच के दौरान मापी के उपरान्त व्यवहृत क्रेट के मेश के साईज विशिष्टि के अनुरूप नहीं पाया गया। अतएव उड़नदस्ता के जाँच को मान्यता दिया जाना उचित प्रतीत होता है। इस प्रकार आरोपी का उपरोक्त द्वितीय पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि उड़नदस्ता के चार प्रतिवेदनों में मेस का साईज एवं वजन विशिष्टि के अनुरूप पाया गया है जिसकी संचालन पदाधिकारी द्वारा समीक्षा नहीं की गयी है। उड़नदस्ता जाँच दिनांक 20.03.16 से G.I. Wire Crate का वजन साईज एवं मेश साईज विशिष्टि के अनुरूप होना परिलक्षित होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया है कि 15339 क्रेटों में 1-2 प्रतिशत क्रेटों की बुनाई विशिष्टि के अनुरूप नहीं भी हो सकती है। आरोपी पदाधिकारी का विशिष्टि युक्त कार्य कराने का दायित्व होता है। दिनांक 20.03.16 के सुरक्षात्मक उड़नदस्ता दल के जाँच के बाद 27.06.16 के उड़नदस्ता जाँच में वायर क्रेट का मेश साईज एवं संख्या में विशिष्टि के अनुरूप नहीं पाया गया। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि 20.03.16 के जाँच के बाद विशिष्टि युक्त क्रेट का व्यवहार नहीं किया गया। अतएव आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त तथ्यों, बचाव बयान एवं जाँच प्रतिवेदन से संचालन पदाधिकारी के समीक्षा/मंतव्य के आधार पर न्यून विशिष्टि का G.I. Wire Crate का उपयोग किये जाने का मामला बनता है। अतएव आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा का बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं॰-4 :- इस आरोप के मुख्य अंश निम्न है :-

(क) अध्यक्ष विशेष जाँच दल के दिनांक 24.04.16 के मदरौनी स्थल पर 300 मीटर विस्तारित कार्य के सुझाव पर विलम्ब से प्रस्ताव दिया जाना ।

(ख) कार्य LWL से 0.6 मीटर उपर से प्रारम्भ किया जाना। (ग) कार्य प्रारम्भ करने में विलम्ब करना। (घ) स्वीकृत स्कोप ऑफ वर्क में बदलाव किया जाना। (ड़) LWL के उपर से एवं विलम्ब से कार्य प्रारम्भ करने के फलस्वरूप कार्य क्षतिग्रस्त होना। (च) समयपर कार्य पूरा नहीं होना। (छ) नदी के जलस्तर के बढ़ने का इंतजार करना ताकि जैसे-तैसे कार्य कराकर राशि का गबन करना।20 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 आरोपी पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्न बिन्दुओं को स्वीकार योग्य माना गया है :- (i) अध्यक्ष, विशेष जाँच दल का दिनांक 24.04.16 का जाँच प्रतिवेदन मुझे प्राप्त नहीं कराया गया है।

(ii) अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के 24.04.16 के सुझाव पर मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 11.05.16 को समर्पित प्रस्ताव पर 15 दिनों बाद विभाग द्वारा स्वीकृति दिया जाना कार्य के कार्यान्वयन में विलम्ब होने का कारण स्वीकार किया गया है। (iii) LWL से 0.6 मी॰ उपर कार्य कराने हेतु आरोपित पदाधिकारी को दोषी नहीं माना गया है।

(iv) तथ्यों से स्पष्ट होता है कि विभागीय स्वीकृति के पश्चात कार्य से विलम्ब से प्रारम्भ करने का आरोप नहीं बनता है। (v) मुख्य अभियंता द्वारा स्कोप ऑफ वर्क में किये गये बदलाव के लिए मुझे दोषी नहीं माना गया है।

(vi) अतिरिक्त कार्य के लिए तिथि निर्धारित नहीं था। इसे स्वीकार किया गया है। अतिरिक्त कार्य की स्वीकृति के बाद से ही तुरन्त कार्य शुरू किया गया तथा स्थल स्थिति के अनुसार उपलब्ध जगहों पर पर्याप्त बोल्डर, जमा भी कर लिया गया था, इसे भी सही माना गया है। (vii) कार्य को जैसे-तैसे कराकर गबन करने का आरोप नहीं बनता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कंडिका 4.3 एवं 4.4 में प्रतिवेदित किया गया है कि पहले अध्यक्ष, विशेष जाँच दल के प्रतिवेदन को गंभीरता से नहीं लेने एवं इससे उत्पन्न अन्य आरोपों के आरोपित किया गया एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा गठित आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं होने एवं मनगढंत पाया गया तो मुख्य अभियंता के दिनांक 08.04.16 को स्थल आदेश पंजी पर दिये गये आदेश पर तत्परता नहीं बरतने तथा कार्यो को सही ढंग से पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन नहीं करने का नया आरोप लगाया गया । साथ ही आरोपी पदाधिकारी ने नये आरोप के संदर्भ में कंडिका 4.5 में तथ्यों को प्रतिवेदित किया गया है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से आरोपित पदाधिकारी के निम्न कथन की पुष्टि होती है :-

(i) विशेष जाँच दल के दिनांक 24.04.16 के स्थल निरीक्षण प्रतिवेदन दिनांक 30.06.16 तक आरोपी पदाधिकारी को प्राप्त नहीं होने के कथन को स्वीकार किया जा सकता है।

(ii) मुख्य अभियंता स्तर से दि॰ 11.05.16 को समर्पित प्रस्ताव पर 15 दिनों के बाद विभागीय स्तर से स्वीकृति प्रदान किया जाना भी कार्य के कार्यान्वयन में विलम्ब होना कारक माना जा सकता है।

(iii) कार्य LWL से 0.6 मीटर उपर से प्रारम्भ किये जाने के लिए आरोपी को दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है।

(iv) विभागीय स्वीकृति के पश्चात कार्य विलम्ब से प्रारम्भ करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है। (v) स्कोप ऑफ वर्क में बदलाव के लिए आरोपी को दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। (vi) कार्य विलम्ब से पूर्ण होने के संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी की उदासीनता परिलक्षित होता है। (vii) कार्य जैसे-तैसे कराकर गबन करने का आरोप नहीं बनता है।

संचालन पदाधिकारी ने समग्र रूप से निम्न निष्कर्ष अंकित किया है "उपरोक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में अतिरिक्त कार्य में तत्परता नहीं बरतने तथा कार्यो को सही ढंग से पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन नहीं करने का आरोप बनता प्रतीत होता है। फलतः कार्य बाढ़ अवधि प्रारम्भ होने के पूर्व समाप्त नहीं हो सका। परन्तु जानबूझ कर गबन करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।" संचालन पदाधिकारी के समीक्षा में अंकित उपरोक्त तथ्य एवं निष्कर्ष से स्पष्ट होता है कि आरोप अंश कार्य विलम्ब से पूर्ण किया जाना को प्रमाणित पाया गया जिसके लिए पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन में कमी माना गया है। आरोपी पदाधिकारी ने संचालन पदाधिकारी के समीक्षा (क्रमांक-vi) एवं निष्कर्ष में कार्य विलम्ब से पूर्ण होने के निष्कर्ष पर द्वितीय पृच्छा में कोई बयान नहीं दिया गया परिलक्षित होता है। अपितु मुख्य अभियंता के दिनांक 08.04.16 के अनुमोदित प्रस्ताव पर तत्परता नहीं बरतने, कार्य के पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन में कमी के काल्पनिक नया आरोप के संदर्भ में बचाव बयान में प्रतिवेदित किया गया है जिसका उल्लेख बचाव बयान कंडिका में किया गया है। संचालन पदाधिकारी के समीक्षा से स्पष्ट होता है कि दिनांक 03.06.16 के मुख्य अभियंता के निरीक्षण प्रतिवेदन से पर्याप्त बोल्डर उपलब्ध रहने एवं दिनांक 10.06.16 को निरीक्षण प्रतिवेदन में 15.06.16 तक कार्य समाप्त करने के निदेश से विस्तारित कार्य 15.06.16 तक समाप्त होने की स्थिति बनती है। परन्तु कार्य 15.06.16 तक समाप्त नहीं कराया जा सका। संचालन पदाधिकारी के उक्त समीक्षा से सहमत होते हुए कार्य विलम्ब से पूर्ण करने का आरोप अंश प्रमाणित होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा मुख्य अभियंता के 08.04.16 के निदेश के अनुपालन में तत्परता नहीं बरतने, पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण में कमी का नया आरोप लगाये जाने को प्रतिवेदित किया गया है जो स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि समीक्षा में मुख्य अभियंता के 08.04.16 के निदेश का अनुपालन 11.05.16 को किये जाने की स्थिति में अतिरिक्त कार्य में अभिरूची की कमी पाया गया है, जो उनके बयान से स्पष्ट होता है कि 08.04.16 के पूर्व एवं बाद में उनके द्वारा प्रयास किया गया है। इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरान्त श्री राम स्वरूप रजक, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को उक्त प्रमाणित आरोप के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया हैः- ''छः वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक एवं पॉच वर्षो तक प्रोन्नति की देय तिथि से प्रोन्नति पर रोक''21 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 सरकार द्वारा लिए गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री राम स्वरूप रजक, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमण्डल, नवगछिया को उक्त दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

------- 21 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(सिवान)-11-03/2014/1107--श्री सुरेन्द्र कुमार (आई0डी0-जे॰ 7720), तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल, डुमरिया को सल्लेहपुर टंडसपुर छरकी टूटान में बरती गयी लापरवाही आदि आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाते हुए विभागीय अधिसूचना सं0-1167, दिनांक 26.08.2014 द्वारा निलंबित किया गया एवं उनके विरूद्ध आरोप पत्र प्रपत्र 'क' में गठित निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1761, दिनांक 25.11.2014 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत्‌ विभागीय कार्यवाही संचालित की गई :- 1. विभागीय आदेश /निदेश का उल्लंघन करना। 2. सल्लेहपुर टंडसपुर छरकी के रख रखाव एवं बाढ़ से सुरक्षा कार्य में अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करना तथा इस कार्य में लापरवाही बरतना। 3. सरकारी राजस्व का नुकसान करना। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में उक्त आरोपों का प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया। जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए असहमति के बिन्दु पर श्री कुमार से विभागीय पत्रांक-2001 दिनांक-04.09.15 द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की माँग की गई। तदालोक में श्री कुमार द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा प्रत्युार की सम्यक समीक्षोपरांत श्री कुमार के विरूद्ध (i) सल्लेहपुर टंडसपुर छरकी के रख रखाव एवं बाढ़ में सुरक्षा कार्य में अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करने तथा इस कार्य में लापरवाही बरतने (ii) सरकारी राजस्व का नुकसान का आरोप प्रमाणित पाया गया। उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा श्री कुमार को निलंबन मुक्त करते हुए (a) देय प्रोन्नति पर तीन वर्षों तक रोक एवं (b) एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलाके में श्री कुमार को विभागीय अधिसूचना सं0-422 दिनांक 13.03.16 द्वारा निलंबन मुक्त करते हुए प्रस्तावित दण्ड ''एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक'' पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से सहमती प्राप्त करने के उपरांत श्री कुमार के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं0-1728 दिनांक 10.08.16 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गयाः- (a) देय प्रोन्नति पर तीन वर्षों तक रोक। (b) एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक। उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री कुमार द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी दिनांक 14.09.16 समर्पित किया गया, जिसमें उनके द्वारा निम्न बातें कही गयी :- (i) विभागीय अधिसूचना सं0-1728 दिनांक 10.08.16 की कंडिका 3(i) में SOP की कंडिका 4.4 के अनुसार उनके द्वारा सम्यक कार्यवाही नहीं करने का उल्लेख किया गया है, जो वस्तुतः तथ्य की भूल (Mistake of Fact) है। SOP की कंडिका 4.4 में विभिन्न पदाधिकारियों की तटबंध सुरक्षा में जिम्मेवारी अंकित है। कंडिका 4.4 में बाढ़ अवधि के दौरान मात्र एक स्वतंत्र दायित्व सहायक अभियंता को दिया गया है। जिसके अनुसार बाढ़ अवधि के दौरान सहायक अभियंता का मुख्यालय अधीनस्थ तटबंध के सर्वधिक संवेदनशील स्थल के प्रभारी कनीय अभियंता का मुख्यालय होगा। इसी संदर्भ में सल्लेहपुर टंडसपुर छरकी के 8.0 कि0मी0 से 10.50 कि0मी0 तक के प्रभारी कनीय अभियंता का मुख्यालय डुमरिया में मौजूद था। इस तरह SOP की कंडिका 4.4 के अनुसार कार्यपालक अभियंता के अनुसार कार्यपालक अभियंता के साथ नदी का जल स्तर चेतावनी स्तर के उपर रहने एवं तटबंध के टो में पानी सटने की स्थिति में कार्यपालक अभियंता के साथ दिन-रात गश्ती करने में साथ था तथा प्रत्येक कि0मी0 में प्रतिनियुक्त होमगार्ड को मुश्तैदी से गश्ती कराया गया था। इस क्रम में जन प्रतिनिधि उषा देवी, अनुमंडल पदाधिकारी, गोपालगंज के द्वारा भी स्पष्ट किया गया है कि कि0मी0 4.25 पर पाईपिंग के कारण टूटान नहीं हुआ है। तटबंध के रख-रखाव तथा बाढ़ अवधि में सुरक्षा कार्य में दायित्व का निर्वहन नहीं करने तथा कार्य में लापरवाही बरतने के संदर्भ में कहा गया है कि :- पूर्वगामी कंडिकाओं से यह निर्विवाद एवं अकाट्‌य सत्य है कि छरकी के रखरखाव एवं बाढ़ अवधि में सुरक्षा कार्य में अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन किया है। कोई लापरवाही नहीं बरती गयी है। (ii) सरकारी राजस्व का नुकसान होने के संदर्भ में कहा गया है कि अधीक्षण अभियंता के पत्रांक-01 दिनांक-06. 09.14 द्वारा सल्लेहपुर टंडसपुर छरकी के टूटान एवं कटाव बिन्दू क्रमशः 4.25 एवं 10.13 कि0मी0 के पुनस्र्थापन का प्राक्कलन जिला पदाधिकारी, गोपालगंज को समर्पित किये जाने का प्रश्न है। उक्त पत्र में ऐसा कोई संकेत भी नहीं है कि इन प्राक्कलनों का समर्पन सहायक अभियंता के र्काव्य निर्वहन में चूक के कारण हुए टूटान एवं कटाव के लिए समर्पित किया गया है। इस तरहा के टूटान एवं कटाव विशेष परिस्थति में सम्पूर्ण विभागीय पदाधिकारी की सतर्कता के बावजूद होने की22 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संभावना के आलोक में विभाग द्वारा तैयार किया जाता है एवं सक्षम प्राधिकार के स्वीकृत्यादेश नियमानुसार मरम्मत कार्य प्राक्कलन के अनुरूप सम्पन्न किया जाता है। इस तरह प्राक्कलन पर हुए व्यय को राजस्व का नुकसान माना जाना उचित नहीं है। श्री सुरेन्द्र कुमार, सहायक अभियंता द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा में पाया गया कि :- प्रथम आरोप के संदर्भ में श्री कुमार द्वारा अपने पूनर्विलोकन अर्जी के विभिन्न कंडिकाओं में इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा के उार में दिये गये तथ्यों एवं साक्ष्य को ही दोहराते हुए कहा गया है कि सल्लेहपुर टंडसपुर छरकी के रख-रखाव एवं बाढ़ में सुरक्षा कार्य में अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन किया गया है। इसमें किसी प्रकार की लापरवाही नहीं बरती गयी है। उक्त तथ्यों एवं साक्ष्यों की समीक्षा पूर्व में की गयी है एवं समीक्षोपरान्त बचाव बयान अस्वीकार योग्य मानते हुए बाँध के रख-रखाव एवं बाढ़ मे सुरक्षा कार्य में दायित्वों का निर्वहन नहीं करने एवं लापरवाही बरतने के लिए दोषी माना गया है। दूसरे आरोप यथा टूटान भराई कार्य में सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाने के संदर्भ में भी वही तथ्य यथा अधीक्षण अभियंता, गोपालगंज के पत्रांक-01 दिनांक-06.09.14 (जिससे टूटान भराई हेतु प्राक्कलन जिला पदाधिकारी को समर्पित है) में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि इन प्राक्कलनों का समर्पण सहायक अभियंता के र्काव्य निर्वहन में चूक के कारण हुए टूटान एवं कटाव के लिये समर्पित किया जा रहा है, तथा नियमानुसार विशेष परिस्थति में टूटान/कटान होने की संभावना के आलोक में तैयार किया गया है एवं स्वीकृत्यादेश के पश्चात मरम्मत कार्य प्राक्कलन के अनुरूप सम्पन्न कराया जाता है। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि मुख्य अभियंता के पत्रांक-2189 दिनांक-13.09.14 के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि आलोच्य बिन्दु यथा 4.25 कि0मी0 पर दिनांक-18.08.14 के टूटान के पुनस्र्थापन हेतु आपदा राहत कोष/राज्य आपदा रिसपौस कोष से कराने हेतु अधीक्षण अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-1(आवास) दिनांक-06.09.14 से जाँचित प्राक्कलन जिला पदाधिकारी, गोपालगंज को भेजा गया है। जिसकी प्रति विभाग को उपलब्ध कराया गया है। जिसकी राशि 10.049 लाख है। इससे स्पष्ट है कि आरोपी श्री कुमार के उदासीनता के कारण हुए टूटान की मरम्मति पर सरकारी राजस्व की क्षति होना परिलक्षित है। उपर्युक्त वर्णित स्थिति में सरकार द्वारा श्री कुमार द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार योग्य पाते हुए इनके विरूद्ध अधिरोपित दण्ड को यथावत रखने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुरेन्द्र कुमार (आई0डी0-J-7720), तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल, डुमरिया के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं0-1728 दिनांक- 10.08.16 द्वारा अधिरोपित दण्ड ''(a) देय प्रोन्नति पर तीन वर्षों तक रोक एवं (b) एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक'' को यथावत्‌ रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

------- 24 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(ल0सि0)-05-01/2017/1169--मो0 खैरूद्दीन असरार, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, लघु सिंचाई अंचल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा गठित निम्न आरोपों के लिए बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया। 1. एस0बी0डी0 के आधार पर प्राप्त निविदा के तकनीकी निविदा निष्पादन हेतु विभागीय मार्ग-निदेश से संबंधित जल संसाधन विभाग के पत्रांक-335 दिनांक-06.03.2009 को निविदा शर्त में शामिल नहीं किया गया। 2. बरैला सिंचाई तालाब एवं पईन का जीर्णोद्धार कार्य की निविदा के मूल्यांकन में एकरूपता नहीं पायी गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी द्वारा उपर्युक्त आरोपों में आरोप सं0 1 को अप्रमाणित तथा आरोप सं0 2 को प्रमाणित पाया गया है। लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा समीक्षोपरांत लिए गए निर्णय के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर लघु जल संसाधन विभागीय पत्रांक-1838 दिनांक-02.05.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा किया गया। मो0 खैरूद्दीन असरार, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, लघु सिंचाई अंचल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा लघु जल संसाधन विभाग को द्वितीय कारण पृच्छा का उार समर्पित किया गया। लघु जल संसाधन विभाग द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा के क्रम में यह ज्ञात होने पर कि आरोपित पदाधिकारी का पैतृक विभाग, जल संसाधन विभाग है, दण्ड के बिन्दु पर निर्णय लेने हेतु सभी संगत कागजात जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को प्रेषित किया गया। मो0 खैरूद्दीन असरार, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, लघु सिंचाई अंचल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत यह पाया गया कि घटना की तिथि दिनांक-23.09.2011 है जबकि आरोपित सेवानिवृत पदाधिकारी के विरूद्ध दिनांक-28.09.2015 को आरोप पत्र प्रपत्र 'क' निर्गत किया गया है। इस प्रकार यह मामला बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत कालबाधित है। इस मामले में किसी प्रकार की विाीय क्षति कारित किए जाने का आरोप नहीं है। मात्र निविदा निष्पादन में विभागीय दिशा निदेशों को निविदा शर्त में शामिल नहीं किए जाने एवं निविदा के मल्यांकन में एकरूपता नहीं पाए जाने का आरोप है। उपर्युक्त पाए गए तथ्यों के आलोक में सरकार के स्तर पर मो0 खैरूद्दीन असरार, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, लघु सिंचाई अंचल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत संचालित विभागीय23 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 कार्यवाही कालबाधित होने एवं सरकार को किसी प्रकार की विाीय क्षति नहीं होने के कारण मामले को तकनीकी दृष्टीकोण से संचिकास्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। मो0 खैरूद्दीन असरार, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, लघु सिंचाई अंचल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत को उक्त निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

------- 24 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(ल0सि0)-05-01/2017/1170--श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा गठित निम्न आरोपों के लिए बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया। 1. एस0बी0डी0 के आधार पर प्राप्त निविदा के तकनीकी निविदा निष्पादन हेतु विभागीय मार्ग-निदेश से संबंधित जल संसाधन विभाग के पत्रांक-335 दिनांक-06.03.2009 को निविदा शर्त में शामिल नहीं किया गया। 2. बरैला सिंचाई तालाब एवं पईन का जीर्णोद्धार कार्य की निविदा के मूल्यांकन में एकरूपता नहीं पायी गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी द्वारा उपर्युक्त आरोपों में आरोप सं0 1 को अप्रमाणित तथा आरोप सं0 2 को प्रमाणित पाया गया है। लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा समीक्षोपरांत लिए गए निर्णय के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर लघु जल संसाधन विभागीय पत्रांक-1840 दिनांक-02.05.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा किया गया। श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, पटना सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा लघु जल संसाधन विभाग को द्वितीय कारण पृच्छा का उार समर्पित किया गया। लघु जल संसाधन विभाग द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा के क्रम में यह ज्ञात होने पर कि आरोपित पदाधिकारी का पैतृक विभाग, जल संसाधन विभाग है, दण्ड के बिन्दु पर निर्णय लेने हेतु सभी संगत कागजात जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को प्रेषित किया गया। श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, पटना सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत यह पाया गया कि घटना की तिथि दिनांक-23.09.2011 है जबकि आरोपित सेवानिवृत पदाधिकारी के विरूद्ध दिनांक-28.09.2015 को आरोप पत्र प्रपत्र 'क' निर्गत किया गया है। इस प्रकार यह मामला बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत कालबाधित है। इस मामले में किसी प्रकार की विाीय क्षति कारित किए जाने का आरोप नहीं है। मात्र निविदा निष्पादन में विभागीय दिशा निदेशों को निविदा शर्त में शामिल नहीं किए जाने एवं निविदा के मल्यांकन में एकरूपता नहीं पाए जाने का आरोप है। उपर्युक्त पाए गए तथ्यों के आलोक में सरकार के स्तर पर श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत संचालित विभागीय कार्यवाही कालबाधित होने एवं सरकार को किसी प्रकार की विाीय क्षति नहीं होने के कारण मामले को तकनीकी दृष्टीकोण से संचिकास्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। श्री राजेन्द्र प्रसाद महतो, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, पटना सम्प्रति सेवानिवृत को उक्त निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

------- 24 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(ल0सि0)-05-01/2017/1171--श्री श्यामनन्दन प्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा गठित निम्न आरोपों के लिए बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया। 1. एस0बी0डी0 के आधार पर प्राप्त निविदा के तकनीकी निविदा निष्पादन हेतु विभागीय मार्ग-निदेश से संबंधित जल संसाधन विभाग के पत्रांक-335 दिनांक-06.03.2009 को निविदा शर्त में शामिल नहीं किया गया। 2. बरैला सिंचाई तालाब एवं पईन का जीर्णोद्धार कार्य की निविदा के मूल्यांकन में एकरूपता नहीं पायी गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी द्वारा उपर्युक्त आरोपों में दोनों आरोपों को प्रमाणित पाया गया है। लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा समीक्षोपरांत लिए गए निर्णय के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर लघु जल संसाधन विभागीय पत्रांक-1837 दिनांक-02.05.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा किया गया। श्री श्यामनन्दन प्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा लघु जल संसाधन विभाग को द्वितीय कारण पृच्छा का उार समर्पित किया गया।24 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 लघु जल संसाधन विभाग द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा के क्रम में यह ज्ञात होने पर कि आरोपित पदाधिकारी का पैतृक विभाग, जल संसाधन विभाग है, दण्ड के बिन्दु पर निर्णय लेने हेतु सभी संगत कागजात जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को प्रेषित किया गया। श्री श्यामनन्दन प्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत यह पाया गया कि घटना की तिथि दिनांक-23.09.2011 है जबकि आरोपित सेवानिवृत पदाधिकारी के विरूद्ध दिनांक-28.09.2015 को आरोप पत्र प्रपत्र 'क' निर्गत किया गया है। इस प्रकार यह मामला बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत कालबाधित है। इस मामले में किसी प्रकार की विाीय क्षति कारित किए जाने का आरोप नहीं है। मात्र निविदा निष्पादन में विभागीय दिशा निदेशों को निविदा शर्त में शामिल नहीं किए जाने एवं निविदा के मल्यांकन में एकरूपता नहीं पाए जाने का आरोप है। उपर्युक्त पाए गए तथ्यों के आलोक में सरकार के स्तर पर श्री श्यामनन्दन प्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत संचालित विभागीय कार्यवाही कालबाधित होने एवं सरकार को किसी प्रकार की विाीय क्षति नहीं होने के कारण मामले को तकनीकी दृष्टीकोण से संचिकास्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। श्री श्यामनन्दन प्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, पटना सम्प्रति सेवानिवृत को उक्त निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

------- 24 मई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(ल0सि0)-05-01/2017/1172--श्री अखिलेश शर्मा, तत्कालीन मुख्य अभियंता के सचिव (प्रावैधिक), लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा गठित निम्न आरोपों के लिए बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया। 1. एस0बी0डी0 के आधार पर प्राप्त निविदा के तकनीकी निविदा निष्पादन हेतु विभागीय मार्ग-निदेश से संबंधित जल संसाधन विभाग के पत्रांक-335 दिनांक-06.03.2009 को निविदा शर्त में शामिल नहीं किया गया। 2. बरैला सिंचाई तालाब एवं पईन का जीर्णोद्धार कार्य की निविदा के मूल्यांकन में एकरूपता नहीं पायी गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी द्वारा उपर्युक्त आरोपों में आरोप सं0 1 को अप्रमाणित तथा आरोप सं0 2 को प्रमाणित पाया गया है। लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा समीक्षोपरांत लिए गए निर्णय के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर लघु जल संसाधन विभागीय पत्रांक-1839 दिनांक 02.05.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा किया गया। श्री अखिलेश शर्मा, तत्कालीन मुख्य अभियंता के सचिव (प्रावैधिक) सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा लघु जल संसाधन विभाग को द्वितीय कारण पृच्छा का उार समर्पित किया गया। लघु जल संसाधन विभाग द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा के क्रम में यह ज्ञात होने पर कि आरोपित पदाधिकारी का पैतृक विभाग, जल संसाधन विभाग है, दण्ड के बिन्दु पर निर्णय लेने हेतु सभी संगत कागजात जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को प्रेषित किया गया। श्री अखिलेश शर्मा, तत्कालीन मुख्य अभियंता के सचिव (प्रावैधिक), लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत यह पाया गया कि घटना की तिथि दिनांक-23.09.2011 है जबकि आरोपित सेवानिवृत पदाधिकारी के विरूद्ध दिनांक-28.09.2015 को आरोप पत्र प्रपत्र 'क' निर्गत किया गया है। इस प्रकार यह मामला बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत कालबाधित है। इस मामले में किसी प्रकार की विाीय क्षति कारित किए जाने का आरोप नहीं है। मात्र निविदा निष्पादन में विभागीय दिशा निदेशों को निविदा शर्त में शामिल नहीं किए जाने एवं निविदा के मल्यांकन में एकरूपता नहीं पाए जाने का आरोप है। उपर्युक्त पाए गए तथ्यों के आलोक में सरकार के स्तर पर श्री अखिलेश शर्मा, तत्कालीन मुख्य अभियंता के सचिव (प्रावैधिक) सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत संचालित विभागीय कार्यवाही कालबाधित होने एवं सरकार को किसी प्रकार की विाीय क्षति नहीं होने के कारण मामले को तकनीकी दृष्टीकोण से संचिकास्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। श्री अखिलेश शर्मा, तत्कालीन मुख्य अभियंता के सचिव (प्रावैधिक) लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना सम्प्रति सेवानिवृत को उक्त निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव। क25 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

28 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-11/2011-1193--श्री राम चन्द्र प्रसाद (आई0डी0 सं०-1922), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल, रतवारा, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान तिरहुत मुख्य नहर में कराये गये पुनस्र्थापन कार्यों में बरती गई अनियमितता की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग, पटना द्वारा की गई। तकनीकी परीक्षक कोषांग, निगरानी विभाग, पटना से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई समीक्षोपरांत श्री प्रसाद के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-199, दिनांक 21.01.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री प्रसाद के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित आरोप सं०-1, 2, 3 यथा स्थल निरीक्षण नहीं करना ओ0आई0एस0 के अनुरूप कार्य नहीं कराना तथा विभागीय निदेश के बावजूद संवेदक के विरूद्ध दण्डात्मक कार्रवाई नहीं करने के आरोप एवं आरोप सं०-4 को श्री प्रसाद से बचाव-बयान के अप्राप्त रहने के कारण प्रमाणित पाया है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए श्री प्रसाद, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध आरोप सं०-1, 2 एवं 4 को अप्रमाणित एवं सहमत होते हुए आरोप सं०-3 को प्रमाणित पाया गया एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री प्रसाद से विभागीय पत्रांक-2518, दिनांक 06.12.16 से द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

श्री प्रसाद से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री प्रसाद के विरूद्ध आरोप सं०-3 को प्रमाणित पाया गया, किन्तु श्री प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता दिनांक 31.05.2010 को सेवानिवृत हो चुके हैं एवं उनके विरूद्ध प्रपत्र-'क' का गठन दिनांक 21.01.2015 को किया गया। ऐसी स्थिति में श्री प्रसाद के विरूद्ध मामला बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के अन्तर्गत कालबाधित पाया गया। जिस हेतु सरकार द्वारा इनके विरूद्ध मामले को समाप्त करने का निर्णय लिया गया। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री राम चन्द्र प्रसाद, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध मामले को समाप्त किया जाता है।

उक्त निर्णय श्री राम चन्द्र प्रसाद, से0नि0 कार्यपालक अभियंता, K-1, जगत इनक्लेव, आशियाना नगर, पटना को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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28 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-11/2011-1194--श्री संजीव दत्त (आई0डी0 सं०-जे-5964), तत्कालीन सहायक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल, रतवारा, मुजफ्फरपुर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान तिरहुत मुख्य नहर के वि0दू0 704 से 790 तक कराये गये पुनस्र्थापन कार्यों में बरती गई अनियमितता की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग, पटना द्वारा की गई। तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग, पटना से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई समीक्षोपरांत श्री दत्त के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-202, दिनांक 21.01.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री दत्त के विरूद्ध प्रपत्र-क में गठित दोनों आरोप यथा बिना सक्षम पदाधिकारी से लीड प्लान स्वीकृत कराये ही याँत्रिक विधि से मिट्‌टी ढुलाई मद में अनियमित भुगतान एवं स्थल निरीक्षण के समय सीट प्रीपरेशन कार्य विशिष्टि के अनुरूप Consolidation/Compaction नहीं कराने को अप्रमाणित पाया गया है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री दत्त, सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप को प्रमाणित नहीं पाये जाने के कारण उक्त मामले में आरोप मुक्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री संजीव दत्त, सहायक अभियंता को आरोप मुक्त किया जाता है।

उक्त निर्णय श्री संजीव दत्त, सेवानिवृत सहायक अभियंता, PRDA FLAT, BLOCK-J-2/93, FLAT No-304, PTI COLONY, कंकड़बाग, पटना को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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28 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-11/2011-1195--श्री रमेश कुमार वर्मा (आई0डी0 सं०-1166), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल, रतवारा, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान तिरहुत मुख्य नहर में कराये गये पुनस्र्थापन कार्यों में बरती गई अनियमितता की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग, पटना द्वारा की गई। तकनीकी परीक्षक कोषांग, निगरानी विभाग, पटना से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई समीक्षोपरांत श्री वर्मा के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-200, दिनांक 21.01.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।26 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री वर्मा के विरूद्ध प्रपत्र-क में गठित आरोप सं०-1, 2 एवं 4 को अप्रमाणित एवं आरोप सं०-3 यथा स्थल निरीक्षण नहीं करना ओ0आई0एस0 के अनुरूप कार्य नहीं कराना तथा विभागीय निदेश के बावजूद संवेदक के विरूद्ध दण्डात्मक कार्रवाई नहीं करने के आरोप को प्रमाणित पाया है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से प्रमाणित आरोप सं०-3 के लिए विभागीय पत्रांक-2513, दिनांक 02.12.16 से द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

श्री वर्मा से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री वर्मा के विरूद्ध आरोप सं०-3 को प्रमाणित पाया गया, किन्तु श्री वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता दिनांक 31.08.2010 को सेवानिवृत हो चुके हैं एवं उनके विरूद्ध प्रपत्र-'क' का गठन दिनांक 21.01.2015 को किया गया। ऐसी स्थिति में श्री वर्मा के विरूद्ध मामला बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के अन्तर्गत कालबाधित पाया गया। जिस हेतु सरकार द्वारा इनके विरूद्ध मामले को समाप्त करने का निर्णय लिया गया। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री रमेश कुमार वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध मामले को समाप्त किया जाता है।

उक्त निर्णय श्री रमेश कुमार वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता, डी0/108, पी0सी0 कॉलोनी, कंकड़बाग, पो0-लोहियानगर, पटना को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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28 मई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-11/2011-1196--श्री अनिल कुमार (आई0डी0 सं०-3835), तत्कालीन सहायक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल, रतवारा, मुजफ्फरपुर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान तिरहुत मुख्य नहर के वि0दू0 704 से 790 तक कराये गये पुनस्र्थापन कार्यों में बरती गई अनियमितता की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग, पटना द्वारा की गई। तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग, पटना से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई समीक्षोपरांत श्री कुमार के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-201, दिनांक 21.01.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री कुमार के विरूद्ध प्रपत्र-क में गठित दोनों आरोप यथा बिना सक्षम पदाधिकारी से लीड प्लान स्वीकृत कराये ही याँत्रिक विधि से मिट्‌टी ढुलाई मद में अनियमित भुगतान एवं स्थल निरीक्षण के समय सीट प्रीपरेशन कार्य विशिष्टि के अनुरूप Consolidation/Compaction नहीं कराने को अप्रमाणित पाया गया है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री कुमार, सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप को प्रमाणित नहीं पाये जाने के कारण उक्त मामले में आरोप मुक्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री अनिल कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, को आरोपमुक्त किया जाता है।

उक्त निर्णय श्री अनिल कुमार, सहायक अभियंता, जल निस्सरण प्रमंडल, सिवान को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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31 मई 2018

सं॰ 22/नि॰सि॰(मोति॰) 08-01/2014-1211--श्री कृष्णदेव सिंह (आई0डी0-1993) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमण्डल, वाल्मीकिनगर के विरूद्ध महालेखाकार (लेखा परीक्षक), बिहार, पटना के निरीक्षण प्रतिवेदन में वित्तीय अनियमितता संबंधी निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2355 दिनांक-13.10.2015 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 बी0 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयीः-

शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर अन्तर्गत महालेखाकार (लेखा परीक्षक), बिहार पटना के निरीक्षण प्रतिवेदन सं0- 123/13-14 में गबन का मामला उठाया गया। गबन के लिए मुख्य रूप से प्रमंडलीय रोकड़पाल श्री तेजनारायण सिंह दोषी पाये गये। मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, वाल्मीकिनगर के पत्रांक-1722 दिनांक-08.08.2013 द्वारा विभाग को प्रतिवेदित किया गया कि वर्ष 2012-13 एवं 2013-14 में सेवानिवृत कर्मियों के सेवांत लाभ एवं वर्दी मद में प्रमंडलीय रोकड़पाल द्वारा गबन किया गया है।

महालेखाकार (ले0 एवं प0), बिहार, पटना के पत्रांक- WM-IV-427 (2013-14) दिनांक-20.02.2014 द्वारा प्रतिवेदित किया गया कि मार्च 2013 में 66,343.00 रूपये (सैरात मद से प्राप्त) की राशि बैंक में जमा नही की गयी है एवं माह मार्च 2013 में चेक सं0-बी0बी0 500487 दिनांक 15.03.2013 द्वारा 1,75,000.00 रूपये की निकासी की गयी है, परन्तु फार्म 51 के सत्यापन से स्पष्ट है कि चेक की राशि 2,75,000.00 रूपये है। महालेखाकार, बिहार, पटना का निरीक्षण प्रतिवेदन सं0-123/13-14 के अवलोकन से नये तथ्य उभरकर सामने आये जिसमें प्रमंडलीय रोकड़पाल श्री तेज नारायण सिंह के निम्न कृत्यों से कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध निगरानी एवं सर्तकता नही रखने का आरोप पाया गयाः-27 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 (i) प्रमंडलीय रोकड़पाल श्री तेजनारायण सिंह द्वारा राजस्व मद का 1,65,262.00 (एक लाख पैंसठ हजार दो सौ बासठ) रूपये का गबन करना।

(ii) प्राप्तकर्त्ता का फर्जी हस्ताक्षर कर भुगतना दिखलाया जाना। (iii) मार्च 2010 से अक्टूबर 2011 तक कुल 12 विपत्रों की राशि 6,34,482.00 (छः लाख चौंतीस हजार चार सौ बेरासी) को भुगतित राशि के साक्ष्य के बगैर रोकड़बही में भुगतान दिखलाया जाना।

(iv) फार्म 51 पासबुल का तैयार एवं प्रमाणित नहीं होना। (v) कर्मचारियों का 10,67,266.00 (दस लाख सरसठ हजार दो सौ छियासठ) का भुगतान लंबित रखना। (vi) मार्च 2010 से जनवरी 2012 तक बगैर दायित्व का 3,65,603.00 (तीन लाख पैंसठ हजार छः सौ तीन) भुगतान दिखलाया जाना।

(vii) आहरित राशि का नकद रोकड़बही से अलग रखना। उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही में श्री सिंह के विरूद्ध गठित आरोपों को संचालन पदाधिकारी द्वारा अप्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक- 916 दिनांक- 13. 06.2017 द्वारा जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराते हुए संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से निम्न तथ्यों के आधार पर असहमत होते हुए द्वितीयकारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की माँग की गयीः-

आरोप (ii)- निरीक्षण प्रतिवेदन के कंडिका-2(अ)(क)-(ii) में विपत्र संख्या-333E जिसकी राशि रू 8,937/- रूपये के आलावे विपत्र सं0-250E से श्री कान्त चौधरी के नाम पर वेतन भरपाई पंजी में 67/2010-11 से मार्च 2011 में फर्जी हस्ताक्षर कुल 647/- रूपये का भुगतान दिखलाया जाना अंकित है। इस सन्दर्भ में संचालन पदाधिकारी द्वारा कोई समीक्षा नही की गयी है। अतएव इस आरोप को प्रमाणित माना गया है।

आरोप (iii)- इस आरोप के सन्दर्भ में आपके द्वारा उपलब्ध कराये गये साक्ष्य, जिसका उल्लेख संचालन पदाधिकारी द्वारा की गयी के अवलोकन से स्पष्ट है कि विप़त्र सं0-175E रू 12,597/-विपत्र संख्या-103E : 82,188/-, 104E रू 2,67,731/- एवं 250E रू 1,63,399/- का भुगतान संबंधित कर्मियों को बैंक खाता के माध्यम से किया गया है अर्थात रू 5,25,915/-रूपये का भुगतान संबंधित कर्मी को होना परिलक्षित होता है। शेष राशि (6,34,482-5,25,915)़= 1,08,567/- रूपये का भुगतान की स्थिति आपके द्वारा स्पष्ट नही की गयी है, मात्र कहा गया है संदर्भित भुगतान न मिलने के विरूद्ध कोई शिकायत दर्ज नही की गयी है, को स्वीकार योग्य नही माना जा सकता है क्योंकि संभव है कि जिनके नाम पर राशि की निकासी की गयी है, उसकी जानकारी संबंधित कर्मियों को नही मिली हो। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए पर्याप्त साक्ष्य नही रहने की स्थिति में इस आरोप को प्रमाणित माना गया है।

आरोप (v)- महालेखाकार के निरीक्षण प्रतिवेदन के कंडिका-04 (1) (संभावित गबन 10.47 लाख) पर कि गयी टिप्पणी से स्पष्ट होता है कि आपके कार्यपालक अभियंता के कार्यकाल में 10.470 लाख रूपये की कमी बैंक खाता में पायी गयी यानी रोकड़पाल द्वारा इस अवधि में अधिक मात्रा में कार्यपालक अभियंता से बैंक से निकासी की स्वीकृति प्राप्त कर DDO के चेक के माध्यम से नगद राशि प्राप्त कर ली जाती थी और वर्णित राशि का भुगतान नहीं किया जाता था। यदि रोकड़वही को प्रत्येक माह के अन्तशेष की समीक्षा की गयी होती तो इस प्रकार रोकड़पाल द्वारा की जा रही गबन का पर्दाफाश बहुत पहले हो जाता है जो आपके द्वारा नही की गयी फलतः रोकड़पाल द्वारा की जा रही है अनियमित कृत पर अंकुश नहीं लग सका। जिसके लिए संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए आरोप प्रमाणित माना गया है। आरोप (vi)- संचालन पदाधिकारी द्वारा निरीक्षण दल द्वारा भुगतित राशि का अभिश्रव नहीं पाये जाने से राशि के गबन की संभावना व्यक्त किये जाने तथा विपत्र पारित होने के बाद सामान्य रूप से इसका भुगतान रोकड़पाल द्वारा किया जाता है एवं भुगतान के बाद पारित विपत्रों का अभिश्रव रोकड़पाल के पास होता है, के आधार पर भुगतित राशि, अभिश्रव नहीं पाये जाने से उत्पन्न आरोप का कोई सीधा संबंध कार्यपालक अभियंता पर नहीं बनता है, के आलोक में आरोप प्रमाणित नही होने का मंतव्य दिया गया है, को स्वीकार योग्य नहीं माना गया क्योंकि जाँच प्रतिवेदन की कंडिका-4(ii) जो बगैर दायित्व के भुगतान से संबंधित है में स्पष्ट रूप से अंकित है कि मार्च 2010 से जनवरी 2012 के अवधि में बगैर दायित्व के रू 3,65,603/-का भुगतान किया गया है जो कि आपके कार्यकाल का परिलक्षित होता है। महालेखाकार द्वारा रोकड़वही तथा अन्य प्रमाणक के समीक्षोपरांत यह कहा गया है कि रोकड़पाल द्वारा बैंक से नगद निकासी कर ली गयी थी। बैंक में राशि कम होने पर दुसरे विपत्र की राशि जो चालू माह में कोषागार से प्राप्त कर उससे भुगतान कर दिया गया था। इसका हश्र यह हुआ कि अन्त में दायिात्व रह गया एवं बैंक की राशि नगण्य हो गयी। 31.05.2012 तक बैंक विवरणी में अन्तशेष 2,11,597/- रूपये पाया गया। आपका दायित्व बनता था कि रोकड़वही में की गयी प्रविष्टियों एवं बैंक खाता का अन्तशेष तथा दायित्व की राशि की सम्यक जाँचोपरांत ही प्रत्येक माह के अन्त में रोकड़वही को Close करते तो रोकड़पाल द्वारा गबन की जा रही राशि का उद्‌घोषणा काफी पूर्व में हो जाती परन्तु आपके द्वारा ऐसा नहीं कर अपने दायित्व का निर्वहन नहीं किया गया। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए निगरानी सर्तकता नहीं रखने के लिए आपको दोषी माना गया है।

आरोप (vii)- संचालन पदाधिकारी द्वारा संदर्भित मामला 15.03.2013 का होने एवं इस अवधि मे आपके कार्यरत नही रहने के आलोक में इस आरोप को प्रामाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका-04 (iii) जो28 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 आहरित राशि नगद रोकडवही से अलग रखने से संबंधित है, में कहा गया है कि रोकड़पाल द्वारा पारित विपत्र की राशि को रोकड़वही के प्राप्ति पक्ष में लेने में एक से छः माह का विलंब किया गया है एवं आंकड़े से प्रकट हुआ है कि प्रत्येक महिने लगभग 5 लाख रूपये 15.15 लाख रूपये विगत तीन वर्षों में रोकड़वही से बाहर रहे। उक्त कंडिका में किसी अवधि का अंकन नही किया गया है ऐसी स्थिति में आपका एवं संचालन पदाधिकारी का कहना है कि यह अनियमित कृत आपके कार्य अवधि में नहीं हुआ है, को स्वीकार योग्य नहीं माना गया। संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए रोकड़पाल के द्वारा किये जा रहे उक्त अनियमित कृत पर निगरानी एवं सर्त्तकता नही बरतने के लिए दोषी माना गया है। उक्त आलोक में श्री सिंह द्वारा प्राप्त द्वितीय कारणपृच्दा (अभ्यावेदन) का मुख्य अंश निम्नवत हैः- विपत्र सं0- 250E श्री कांत चौधरी को फर्जी हस्ताक्षर कर कुल रू 647/-(छः सौ सैंतालीस) रूपये का भुगतान के सन्दर्भ में कहा गया है कि वास्तव में संबंधित कर्मी को भुगतान किया गया था क्याेंकि भुगतान नही मिलने का कोई शिकायत दिनांक- 27.02.2012 तक नहीं किया गया था।

श्री सिंह द्वारा कुल रू 1,08,567/-(एक लाख आठ हजार पाँच सौ सरसठ)रूपये का भुगतान का सबूत पेश किये जाने के संदर्भ में कहा गया कि अन्य विपत्र 175E, 103E , 104E एवं 250E के भुगतान के सन्दर्भ में दिये गये साक्ष्य के अनुरूप ही विपत्रों का भुगतान हो चुका है क्योंकि भुगतान नहीं होने के सन्दर्भ में किसी उच्च पदाधिकारी को शिकायत प्राप्त नही हुआ।

संभावित गबन की राशि 10.47 लाख के बैंक खाता में कमी के संबंध में कहा गया कि बैंक खाते में राशि की कमी के लिए प्रतिस्थानी द्वारा कोई टिप्पणी नही की गई है, नही किसी स्तर से भुगतान नही होने की शिकायत ही प्राप्त हुआ है। उनके द्वारा सही ढंग से रोकड़बही को बंद किया जाता रहा ।

रू 3,65,603/-(तीन लाख पैंसठ हजार छः सौ तीन) रूपये का प्रमाणक कर्मचारियों की यात्रा विपत्र कार्यालय व्यय का था, जिसे भुगतान करने का दायित्व रोकड़पाल की होती है। प्रमाणक नही मिलने के बाद भी किसे भुगतान किया गया है, रोकड़बही में अंकित रहता है। रोकड़बही प्रत्येक माह की अंतिम तिथि में नियमित रूप से बंद किया गया हैं। बैंक में राशि एवं नकद रोकड़ के लिए प्रमाण पत्र दिये गये है। विपत्रों का भुगतान ससमय होता रहा है। उनके द्वारा दिनांक- 27.02.2012 को रोकड़बही का प्रभार सौंप दिया गया था। अतः दिनांक 31.05.2012 को उनका कार्यकाल नही है।

दिनांक 27.02.2012 को प्रभार रोकड़बही को बंद कर प्रतिस्थानी को विधिवत सौंप दिया। पारित चेक की राशि रोकड़बही में नही लेने की घटना 15.03.2013 की है। उनके समय में रोकड़बही में एक से छः माह के बाद राशि अंकित करने का एक भी मामला नही है। प्रमंडल में अक्टूबर 2011 तक कर फार्म 51 दिनांक- 25.02.2012 को जाँच कर महालेखाकार को समर्पित कर दिया गया है। जिसमें किसी चेक एवं राशि को रोकड़बही से अलग रखने का मामला प्रकाश में नही आया। नवम्बर 2011 से फरवरी 2012 तक के फार्म 51 माह 31.05.2012 को प्रमंडल में प्राप्त हुआ है जो उनके कार्यकाल दिनांक- 27.02.2012 के बाद की अवधि है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री सिंह द्वारा आरोप मुक्त करने का अनुरोध किया गया । संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से आरोप सं0-(ii), (iii), (v), (vi) एवं (vii) के संबंध असहमत होते हुए प्रमाणित होने की स्थिति में श्री सिंह से द्वितीय कारणपृच्छा की माँग की गयी। श्री सिंह द्वारा असहमति के बिन्दुओं के सन्दर्भ में अपने द्वितीय कारणपृच्छा में वही तथ्य उद्धित किया गया जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया। उक्त तथ्यों का उल्लेख असहमति के बिन्दुओं में किया गया है। श्री सिंह द्वारा समर्पित द्वितीय कारणपृच्छा बचाव बयान में कोई नया तथ्य/साक्ष्य उपलब्ध नही कराया गया । उक्त के आलोक में श्री सिंह के द्वितीय कारणपृच्छा उत्तर को अस्वीकार योग्य पाते हुए आरोप के बिन्दु (ii), (iii), (v), (vi) एवं (vii) यथा प्राप्तकर्त्ता का फर्जी हस्ताक्षर कर भुगतान दिखलाने, बिना भुगतान किये ही कुल रू 6,34,482/- रूपये को रोकड़बही में दिखलाने, बैंक से कुल 10,67,266/-रूपये की निकासी कर कर्मियों के भुगतान लंबित रखने एवं आहरित राशि को रोकड़बही से बाहर रखने के रोकड़पाल द्वारा किये गये कुकृत्यों एवं सरकारी राशि को गबन करने पर निगरानी एवं सर्त्तकता नही रखने के लिए दोषी पाते हुए श्री सिंह के विरूद्ध अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गयाः-

'' दस प्रतिशत पेंशन की कटौती तीन वर्षों के लिए''। उक्त निवर्णित दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार पटना के पत्रांक-84 दिनांक-11.04.2018 द्वारा सहमति प्रदान की गयी।

अनुशासनिक प्राधिकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री कृष्णदेव सिंह (आई0डी0-1993), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हे संसूचित किया जाता हैः-

''दस प्रतिशत पेंशन की कटौती तीन वर्षों के लिए''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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4 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-02/2015-1217--श्री सुभाष चन्द्र भट्ट (आई0डी0-जे-9118), तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान अधवारा समूह की मुख्य नदी के29 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 तटबंध निर्माण में बरती गई अनियमितता की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग, पटना द्वारा की गई। तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की सम्यक समीक्षोपरांत सरकार द्वारा विभागीय पत्रांक-2388, दिनांक 16.10. 15 द्वारा श्री भट्ट, सहायक अभियंता से स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री भट्ट से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत उनके विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) के अधीन विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं०-1522, दिनांक 27.7.16 द्वारा निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। आरोप सं० 1- स्थल निरीक्षण के दौरान विभिन्न स्थलों पर रेनकट्‌स की विराटता एवं गड्‌ढे की प्रकृति के आधार पर यह माना गया है कि तटबंध के सभी चैनेज पर Compaction नहीं की गई है। अतएव न्यून विशिष्टि के कार्य कराने के लिये आप दोषी पाये गये हैं। आरोप सं० 2- IS Code-11532 के विपरीत तटबंध के टो से सटकर एवं 25.00 मीटर के अन्दर से बिना बौरो एरिया का निर्धारण कराये एवं बिना लीड प्लान की स्वीकृति के मिट्‌टी काटे जाने एवं अनियमित भुगतान करने के लिए आप दोषी पाये गये है। आरोप सं० 3- बौरो एरिया एवं अन्य मदों की वास्तविक मापी नहीं लेकर कुल गठित मिट्टी की मात्रा में 0.60मी0 से भाग देकर प्राप्त भू-क्षेत्रफल के आधार पर Borrow Area Preparation मद में अनियमित भुगतान में सहयोग करने के लिए आप दोषी पाये गये है। आरोप सं० 4- बौरो एरिया के सत्यापन तथा लीड प्लान की स्वीकृति के बिना ही यांत्रिक विधि से मिट्‌टी कार्य कराने में अवास्तविक मापी के आधार पर अनियमितता भुगतान में सहयोग करने के लिए माप दोषी पाये गये है। आरोप सं० 5- मिट्‌टी कार्य के साथ-साथ समानुपातिक ढ़ंग से संरचना का कार्य नहीं कराया गया है। संवेदक एवं आप समानुपातिक प्रगति से बेखबर होकर मूलतः मिट्‌टी कार्य कराकर भुगतान करने के लिए आप दोषी पाये गये हैं। आरोप सं० 6- जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.2.0 में वर्णित तथ्यों/अनियमितताओं (मापपुस्त की निर्गत एवं अंकण) के लिये आप दोषी पाये गये हैं। आरोप सं० 7- प्री लेवल का गुण नियंत्रण प्रमंडल से जाँच कराये बगैर ही कार्य प्रारंभ कर दिया गया। जिसे अनियमित माना गया एवं प्री-लेवल की प्रमाणिकता संदिग्ध हो गयी है। बाद में गुण नियंत्रण के अभियंताओं द्वारा तथाकथित सत्यापित प्री-लेवल के आधार पर पोस्ट लेवल से गठित मिट्‌टी की मात्रा भी संदिग्ध हो जाती है। अतएव बिना प्री-लेवल की जाँच कराये ही कार्य प्रारंभ करने के लिए आप दोषी पाये गये है। संचालन पदाधिकारी ने अपने पत्रांक-52, दिनांक 27.02.17 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री भट्ट, सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप सं०-6 को अप्रमाणित एवं शेष सभी आरोप (यथा आरोप 01, 02, 03, 04, 05 एवं 07)को प्रमाणित पाया है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-741, दिनांक 26.05.17 द्वारा श्री भट्ट से द्वितीय कारण पृच्छा की गई। उक्त के आलोक में श्री भट्ट, सहायक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-0, दिनांक 14.07.17 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है। श्री भट्ट, सहायक अभियंता ने अपने बचाव-बयान की कंडिका-2 में तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन में उद्धिृत तथ्यों का उल्लेख करते हुए विभागीय कार्यवाही के संचालन प्रक्रिया का उललेख करते हुए कहा गया है कि मेरे मामले पर सहानुभूति पूर्वक सभी आरोपों पर पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया एवं जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित कर दिया गया। कंडिका-4 में संवेदक के विरूद्ध की गई कार्रवाई तथा माननीय न्यायालय द्वारा पारित न्यायादेश का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी भी पदाधिकारी को दोषी नहीं माना गया है एवं इस मामले में आरोपी पदाधिकारी एवं संवेदक पर कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी द्वारा दर्ज करायी गयी FIR पर का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि मेरे विरूद्ध FIR तर्क संगत नहीं है। कंडिका 5(i) से (vii) तक में तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन के विभिन्न कंडिकाओं में उद्धिृत तथ्यों का संक्षिप्त ब्यौरा अंकित करते हुए कहा गया है कि जाँच प्रतिवेदन में किसी भी अनियमित भुगतान में उनकी सहभागिता नहीं है कंडिका 5(viii) में जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 1.4.0, 4.0.3, 4.0.7, 4.0.8, 4.1. 0(iii), 4.0.0(iv), 4.2.0 (क)(ग)(घ), 5.1.0(ख) 5.2.0(ख), 5.5.1 (1), 5.5.3(1), 7.3.0, 8.0.0, 9.8.0 (4) 9.8.0(3) में वर्णित तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा गया है। उक्त जाँच प्रतिवेदन में एक तरफ बार-बार कहा गया है कि मुझे कार्य एवं संबंधित भुगतान से जान-बूझकर कार्यपालक अभियंता श्री भीम शंकर राय ने मुझे झुठे एवं मनगंढत रूप से अवकाश में दिखाते हुए इन्हें व्यवहारिक रूप से दरकिनार कर कनीय अभियंता के क्षेत्र का पुर्ननिर्धारण एवं बिना स्वीकृति के बौरो एरिया एवं बिना लीड की स्वीकृति के भुगतान कर दिया गया। साथ ही कार्य एवं कार्य मापी से किसी कुत्सित मंशा से अलग रखा गया। मापीपुस्त का संधारण अनियमित रूप से कनीय अभियंता से स्वतंत्र रूप से कराया गया। उपरोक्त तारांकित टिप्पणीयों से आगत उत्तरदायी पदाधिकारी के विरूद्ध मंतव्य के बावजूद प्रतिवेदन में मात्र दो कंडिकाओं 9.3.0 एवं 10.2.6 में मेरे विरूद्ध विरोधाभाष टिप्पणी की गई है ? शायद इसलिए की तेरहवी चालु विपत्र में सही ढ़ग से लोकेशन का संधारण नहीं किया गया। पुरे जाँच प्रतिवेदन को गहरायी से देखने पर स्पष्ट है कि कार्यपालक अभियंता एवं अन्य पदाधिकारी द्वारा गलत ढ़ग से कार्य से अलग-थलग कर दिया गया। जो माप पुस्त 1888, 1889 एवं 1890 पर मेरे30 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 हस्ताक्षर नहीं होना दर्शाता है। तकनीकी परीक्षक कोषांग, पटना के जाँच प्रतिवेदन में भी मेरे पक्ष में ऐसी कई टिप्पणी अंकित है। जो आरोप को प्रमाणित नहीं करता है। यहाँ तक की मेरे पत्रांक-47 दिनांक 06.3.13 एवं पत्रांक-61, दिनांक 09.04.14 पर कार्यपालक अभियंता द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया गया। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 10.2.19 में वर्णित कंडिका 5.5.3 में नामित पदाधिकारी/कर्मचारी पर कार्रवाई किया जाना था। जिसमें मेरा नाम नहीं है एवं न ही किसी अनियमितता के लिए दोषी ठहराया गया है। जबकि कार्यपालक अभियंता श्री राय द्वारा संबंधित कार्य से अलग कर दिया गया था। मेरे विरूद्ध आरोप नहीं बनने के बावजूद भी विभागीय कार्यवाही के साथ-साथ अपराधिक मुकदमा में भी मेरा नाम दिया गया है। अभी तक पुलिस जाँच में मेरी संलिप्तता के संबंध में सतह पर नहीं पाया गया है। फिर भी संचालन पदाधिकारी द्वारा माने गये प्रमाणित आरोपों पर मेरे पूर्व में समर्पित बचाव-बयान संलग्न करते हुए अतिरिक्त स्पष्टीकरण आरोपवार निम्न है। आरोप सं०-1 संचालन पदाधिकारी ने इस आरोप से संदर्भित साक्ष्य के साथ किये गये खण्डन पर ध्यान ही नहीं दिया गया। साथ ही उन्होंने साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन को देखा ही नहीं गया एवं अंकित कर दिया गया है कि आरोपी द्वारा तथ्यों के आलोक में साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। जिससे स्थापित हो सके कि प्रावधान के अनुसार परत दर परत compaction कराया गया है एवं गुणवत्ता की जाँच गुण नियंत्रण प्रमंडल द्वारा परत दर परत की गयी है तथा इसी आधार पर उनके कथन को अस्वीकार योग्य मानते हुए प्रमाणित मान लिया गया है, जो गलत है। क्योंकि उनके द्वारा दिनांक 18.01.2017 को दिये गये साक्ष्य जिसमें गुण नियंत्रण प्रमंडल, खगौल के द्वारा Compaction की सम्पुष्टि की गयी है को नहीं देखा गया तथा तकनीकी परीक्षक कोषांग ने भी इस मामले में मुझे उत्तरदायी नहीं माना है। अतएव तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन के आधार पर नये सिरे से विचार किया जाना उचित होगा। आरोप सं०-2 प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। जिससे प्रमाणित हो सके की तटबंध के टो से 25 मीटर के अन्दर से किस अवधि एवं किस वि0दू0 पर मेरे द्वारा मिट्‌टी कटवाया गया है न हीं जाँच प्रतिवेदन में अंकित है। मैंने दिनांक 18.01.17 के बचाव बयान में इस आरोप का स्पष्ट रूप से खण्डन किया था। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 1.4. 0 में अंकित है कि बौरो एरिया एवं लीड की स्वीकृति नहीं हुई है एवं सहायक अभियंता श्री सुभाष चन्द्र भट्ट को व्यवहारिक रूप से दरकिनार कर कनीय अभियंता के क्षेत्र का पुर्णनिर्धारन कार्यपालक अभियंता द्वारा किया गया। जबकि कार्य से अलग किसी अन्य द्वारा टो के नजदीक मिट्‌टी काटने का प्रयास किया गया है। उनके द्वारा कार्रवाई की गयी है। ऐसी स्थिति में तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन को दरकिनार कर आरोप प्रमाणित होने का दिया गया मंतव्य न्यायपूर्वक नहीं है। आरोप सं०-3 कार्य के दौरान 0.6मीटर गहरा मिट्‌टी कटाई की गई थी। जो स्वयं कार्यपालक अभियंता एवं अन्य सहायक अभियंता द्वारा सत्यापित है तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 1.4.0 में कहा गया है कि बौरो एरिया एवं लीड की स्वीकृति नहीं हुई एवं सहायक अभियंता श्री सुभाष चन्द्र भट्ट को व्यवहारिक रूप से दर किनार कर कनीय अभियंता के कार्यक्षेत्र का पुर्ननिर्धारण कर दिया गया तथा कंडिका 5.2.0 में कहा गया है कि किसानों को मुआवजा का भुगतान सहायक अभियंता श्री बबन प्रसाद लाल एवं कनीय अभियंता श्री जवाहर लाल सिंह के द्वारा किया गया है। योजना सहायक अभियंता श्री सुभाष चन्द्र भट्ट के कार्यक्षेत्र का था। कंडिका 4.2.0 से स्पष्ट है कि कोई भी विपत्र नियमानुसार जाँच हेतु उपस्थापित नहीं किया जाता था। उनके द्वारा अपने पत्रांक-70, दिनांक 04.06.13 से चालु विपत्र से त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियों को सुधारते हुए एक संशोधित विपत्र तैयार करने हेतु कनीय अभियंता से अनुरोध किया गया था एवं प्रतिलिपि कार्यपालक अभियंता को दी गई थी। बाढ़ में मुझे उक्त कार्य से अलग रखकर मिट्‌टी का कार्य कराया गया था तथा कराये गये सम्पूर्ण कार्य का अलग से 13वें चालू विपत्र कार्यपालक अभियंता द्वारा बनवाया गया था। जिससे मेरे द्वारा हस्ताक्षरित विपत्र में अंकित मद मात्रा एवं दर का समावेश हू-ब-हू किया गया है। अतएव आरोप सं०-3 प्रमाणित नहीं होता है। आरोप सं०-4 संचालन पदाधिकारी का मंतव्य है कि यह आरोप प्रमाणित होता है पूर्णतः त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन के किसी भी कंडिका में मुझे अनियमित भुगतान होने में सहयोगी माना गया है। बौरो एरिया सत्यापन एवं लीड निर्धारन कार्य फसल/अस्थायी भू-अर्जन मुआवजा का वितरण एवं A-preliminary मद से जुड़ा हुआ है। इन दोनों कार्य से वंचित रखा गया है। तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.0.3 (ग)में अंकित है कि कार्यपालक अभियंता अपनी सक्षमता से बाहर जाकर अनियमित ढ़ग से कनीय अभियंता का कार्यक्षेत्र का निर्धारन किया गया तथा निर्धारित क्षेत्र का अतिक्रमन कर विपत्र बनवाया गया तथा जाँच प्रतिवेदन के इसी कंडिका में कहा गया है कि वास्तविक में कार्यपालक अभियंता द्वारा सहायक अभियंता श्री भट्ट को कार्य एवं भुगतान से किसी कुत्सित मंशा से अलग रखना चाहते थे। कंडिका 4. 0.3 में गुणवत्ता जाँचफल के आधार पर ही भुगतान किया जाना था एवं लीड प्लान Sanction के बगैर मिट्‌टी ढुलाई मद का भुगतान नहीं करना था तथा निर्माण में पाये गये कमियों को दूर करने के पश्चात भुगतान किया जाना था। किन्तु लिखित आदेश नहीं रहने के बावजूद विपत्र से 20-20 प्रतिशत की राशि स्वेच्छा से रोक ली गयी है एवं इस अनियमित रूप से भुगतान के लिये कार्यपालक अभियंता को जिम्मेवार माना गया है। साथ ही कंडिका 10.2.19 में अंकित है कि अपनी मनमर्जी से सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता का कार्य निर्धारित किया गया एवं भुगतान कराया गया। सत्यापित लीड के बिना ही लीड युक्त कार्य मद के भुगतान हेतु कार्यपालक अभियंता श्री राम तथा प्रमंडलीय लेखा लिपिक एवं लेखापाल को उत्तरदायी माना गया है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि मेरा बचाव बयान तथा तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन में उद्धिृत कंडिकाओं के आधार पर संचालन पदाधिकारी द्वारा बिना समीक्षा किये ही गलत ढ़ग से आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है जो उचित एवं न्यायपूर्ण नहीं है। अगर कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-480, दिनांक 20.4.17 को भी संलग्न में लिया जाय तो स्पष्ट होगा कि कार्यपालक अभियंता किसी भी परिस्थिति में लीड का भुगतान करना चाहते थे। इसमें मेरा कोई सहयोग नहीं है।31 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 आरोप सं०-5 मैंने अपने पत्रांक-220, दिनांक 05.11.2012 एवं 14, दिनांक 21.01.2013 की प्रति संलग्न करते हुए कहा है कि उक्त कार्य हेतु संवेदक को मौखिक एवं लिखित रूप से निदेशित भी किया था। तकनीकी परीक्षक कोषांग, पटना के जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4.1.0(iv) में स्पष्ट अंकित है कि कार्यपालक अभियंता ने समानुपातिक प्रगति लाने के लिये कनीय अभियंता के कार्यों का स्वतंत्र जिम्मा दिया था एवं स्वयं भी प्रतिदिन स्थल पर समय देने का वादा दिया था। बावजूद व्यवस्था खोखली साबित हुई और उनके द्वारा केवल मिट्‌टीकरण का भुगतान किया गया। स्पष्टतः जाँच पदाधिकारी द्वारा मुझे दोषी नहीं माना गया है। मेरे द्वारा संवेदक को समानुपातिक कार्य करने के लिये बाध्य किये जाने के खिलाफ संवेदक द्वारा झूठा आरोप लगाकर शिकायत किया गया। आरोप सं०-7 इस आरोप के संदर्भ में संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षित है कि आरोप प्रमाणित माना जा सकता है। पूर्णतः त्रुटिपूर्ण एवं भ्रामक है। इस कार्य के एकरारनामा के पश्चात मुख्य अभियंता द्वारा प्री-लेवल की जाँच हेतु दो अलग-अलग सहायक अभियंता श्री सुबोध चौधरी एवं श्री निकेत कुमार की प्रतिनियुक्ति की गई थी। वर्ष 2012 के बाढ़ के कारण प्रभावित नहीं हो इस हेतु प्री-लेवल कार्य के पश्चात जीर्णोद्धार का कार्य कराया गया। जिस भाग में प्री-लेवल का कार्य सम्पन्न हो जाता था। उस भाग में कार्य कराया जाता था। उदाहरण स्वरूप प्रथम विपत्र से संबंधित प्री-लेवल दिनांक 14.06.12 एवं द्वितीय का विपत्र दिनांक 9.10.12, 12.10.12 तथा 19.10.12 6वें विपत्र का 14.11.12 तथा 8वें विपत्र का प्री-लेवल 24.10.12 एवं 01.11.12 को असम्बद्ध अभियंता द्वारा जाँच करते हुए हस्ताक्षर किया गया है। इस प्रकार प्रथम विपत्र 152088.15 घनमीटर मिट्‌टी कार्य के लिये दिनांक 07.09.12 को तथा द्वितीय विपत्र 692350.675घनमीटर मिट्‌टी कार्य के दिनांक 26.10. 12 को हस्ताक्षरित है। अतएव (692350.672-152088.15)=540268.522 घनमीटर मिट्‌टी कार्य दिनांक 08.09.12 से 25.10.12 के बीच कराये गये हैं। यही कारण है कि जाँच प्रतिवेदन के समेकित कंडिका 10.0.0 में कही भी त्रुटियों के रूप से इसे समेकित नहीं किया गया है तथा कंडिका 10.2.19 में किये गये निदेश के आलोक में विभाग आश्वस्त होकर ही इसी प्री-लेवल के आधार पर भुगतान किया जा रहा है। अतः आरोप से मुक्त किया जाय।

श्री भट्ट, सहायक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। जिसमें निम्न तथ्य पाये गये - (i) आरोप-1 जो मिट्‌टी भराई कार्य में विशिष्टि के अनुरूप संपीड़नता (Compaction) नहीं कराने से संबंधित है। तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 10.1.12 में बाँध में हुए रेनकट्‌स एवं गड्‌ढ़े की प्रकृति के आधार पर कार्य के दौरान गुण नियंत्रण प्रमंडल, खगौल द्वारा किये गये गुणवत्ता जाँचफल को नाकाफी मानते हुए तटबंध के कुछ भाग में न्यून संपीडनता के कार्य कराया जाना बताया गया है।

आरोपी द्वारा कहा गया है कि इनके द्वारा मात्र प्रथम, द्वितीय, षष्टम एवं अष्टम चालू विपत्र दिनांक 07.09. 12, 26.10.12, 02.02.13 एवं 23.02.13 को हस्ताक्षर किया गया है। जबकि जाँच लगभग डेढ़ वर्ष बाद दो वर्षा ऋतु बीत जाने के कारण रेनकट्‌स पाया जाना स्वभाविक है जबकि कार्य के दौरान गुण नियंत्रण प्रमंडल, खगौल द्वारा किये गये जाँच में संपीड़नता प्रावधान के अनुरूप 90 प्रतिशत पाया गया है। आरोपी द्वारा यह भी कहा गया है कि जाँच दल द्वारा बिना गुणवत्ता जाँच कराये ही रेनकट्‌स के प्रकृति के आधार पर न्यून संपीड़नता का कार्य कराये जाने का आधार बनाया गया है जो नियम संगत नहीं है।

संचालन पदाधिकारी ने जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 10.1.12 में अंकित कि गुण नियंत्रण प्रमंडल, खगौल द्वारा की गयी संपीड़नता की जाँच में नाकाफी है तथा आरोपी द्वारा प्राक्कलन के मद सं०-16 के अनुसार मिट्‌टी कार्य में 225mm layer में परत दर परत Compaction कराने से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं दिये जाने के आधार पर आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी का कथन कि जाँच दल द्वारा बिना संपीड़नता जाँच किये ही मात्र रेनकट्‌स की प्रकृति के आधार पर न्यून संपीड़नता होना बताया गया है को स्वीकार योग्य प्रतीत होता है क्योंकि जाँच प्रतिवेदन के साथ किसी तरह के मिट्‌टी की गुणवत्ता से संबंधित कोई जाँचफल संलग्न नहीं है। आरोपी गुण नियंत्रण प्रमंडल, खगौल द्वारा दिये गये जाँचफल में प्रावधान के अनुरूप संपीड़नता पाया गया है। परन्तु जाँच दल द्वारा इस जाँचफल को नाकाफी बताते हुए सम्पूर्ण भाग में समुचित संपीडनता होना नहीं माना गया है। चूँकि श्री भट्ट द्वारा कुल 14 विपत्रों में से मात्र 4 ही विपत्र की जाँच किया गया है। अतएव यह आरोप श्री भट्ट के विरूद्ध प्रमाणित नहीं होता है। (ii) आरोप-2 जो Is Code-11532 के विपरीत तटबंध के टो से बिना बौरो एरिया के निर्धारण एवं बिना लीड प्लान की स्वीकृति के मिट्‌टी काटे जाने की अनियमितता से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी नेे आरोपी द्वारा IS code के अनुरूप तटबंध के टो से निर्धारित दूरी से अधिक दूरी से मिट्‌टी काटने का प्रयास किये जाने से संबंधित कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किये जाने तथा जाँच प्रतिवेदन के निष्कर्षित कंडिका 10.1.13 में अंकित होना Is Code-11532 के विपरीत कार्य कराने के लिये कनीय अभियंता, सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता दोषी है के आधार पर आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया है।

आरोपी द्वारा कहा गया है कि प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी अथवा विभाग द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है जिससे परिलक्षित हो कि तटबंध के टो से एवं 25मी0 के अन्दर किस अवधि में एवं किस बिन्दु पर मेरे द्वारा मिट्‌टी कटवाया गया है न ही जाँच प्रतिवेदन में अंकित है। जबकि कार्यपालक अभियंता द्वारा इन्हें दर किनार पर कनीय अभियंता से स्वतंत्र रूप से भी विभिन्न रीच में कार्य कराया गया है (कंडिका 1.4.0 द्र0)। माप पुस्त के अवलोकन से भी स्पष्ट होता है कि श्री भट्‌ट का प्रश्नगत कार्य के 14 चालू विपत्र में से मात्र प्रथम, द्वितीय, षष्टम32 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 एवं अष्टम विपत्र पर ही हस्ताक्षर है शेष विपत्र कनीय अभियंता द्वारा तैयार किया गया तथा कार्यपालक अभियंता द्वारा सीधे पारित किया गया है। जाँच प्रतिवेदन में भी Is Code के विपरीत किस बिन्दु पर मिट्‌टी कटवाया गया, का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। ऐसी स्थिति में आरोपी का कथन की उनके द्वारा Is Code के अनुरूप ही कार्य कराया गया है, स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। अतः आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

(iii) आरोप-3 जो बिना वास्तविक मापी लिये ही बौरो एरिया प्रीपरेशन कार्य मद का भुगतान करने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी के द्वारा जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 10.2.6 में स्पष्ट अंकित होना कि बौरो एरिया बिना वास्तविक मापी लिये ही कुल गठित मिट्‌टी की मात्रा में 0.6मी0 से भाग देकर प्राप्त भू-क्षेत्रफल के आधार पर बौरो एरिया प्रीपरेशन का भुगतान करने के लिये कनीय अभियंता के साथ-साथ श्री भट्ट भी उत्तरदायी है तथा जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 8.00 के अनुसार स्थलीय जाँच 0.6मी0 से अधिक 1.5 से 2.0 मी0 की गहराई में मिट्‌टी काटी गयी के आधार पर बिना साक्ष्य के आरोपी का कथन की सभी भू-खण्ड से 0.6मी0 की गहरायी में मिट्‌टी काटी गयी है। जिसका सत्यापन कार्यपालक अभियंता द्वारा की गयी है को अस्वीकार योग्य मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

श्री भट्ट द्वारा जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 1.4.0 एवं 5.2.0 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि बौरो एरिया 0.6मी0 मिट्‌टी कटाई का सत्यापन कार्यपालक अभियंता एवं इन्हें व्यवहारिक रूप से दरकिनार करते हुए कार्यपालक अभियंता के द्वारा प्राधिकृत अन्य सहायक अभियंता, श्री बबन प्रसाद द्वारा करते हुए फसल क्षतिपूर्ति का भुगतान कराया गया है। जाँच प्रतिवेदन से भी स्पष्ट होता है कि फसल मुआवजा का भुगतान से श्री भट्‌ट, सहायक अभियंता द्वारा नहीं किया गया है।

आरोपी द्वारा यह भी कहा गया है कि पत्रांक-70, दिनांक 04.06.13 से चालू विपत्र में पाये गये त्रुटियों को सुधारोपरांत संशोधित विपत्र तैयार करने हेतु कनीय अभियंता को निदेश दिया गया था जिसकी प्रति कार्यपालक अभियंता को दी गयी। बाद में मुझे उक्त कार्य से पूर्णतः अलग रखकर मिट्‌टी कार्य कराते हुए नये सीरे से 13वें चालू विपत्र कनीय अभियंता से तैयार कराकर बिना इनकी हस्ताक्षर के कार्यपालक अभियंता द्वारा पारित किया गया को जाँच प्रतिवेदन के आलोक में स्वीकार योग्य माना जा सकता है। माप पुस्त सं०-1970 के अवलोकन से स्पष्ट है कि प्रथम एवं द्वितीय विपत्र की जाँच श्री भट्‌ट द्वारा की गयी है तथा उक्त विपत्र में बिना वास्तविक मापी के कराये गये कुल मिट्‌टी कार्य की मात्रा में 0.6 में भाग देकर प्राप्त भू-क्षेत्रफल के आधार पर बौरो एरिया प्रीपरेशन मद का भुगतान किया जाना परिलक्षित है तथा जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.0.5 एवं 10.2.6 में इस अनियमित कृत के लिये अन्य पदाधिकारी के साथ-साथ श्री भट्‌ट को भी दोषी माना गया है। हलांकि जाँच प्रतिवेदन में उक्त अनियमित कृत के कारण वास्तविक रूप से अनियमित भुगतान हुआ अथवा नहीं का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। अतएव इसे मात्र प्रक्रियात्मक त्रुटि माना जा सकता है। जिसके लिये श्री भट्ट को दोषी माना गया है। अतः आरोप प्रमाणित होता है। (iv) आरोप-4 जो बौरो एरिया के सत्यापन एवं लीड प्लान की स्वीकृति के बिना ही याँत्रिक विधि से मिट्‌टी ढुलाई करोन एवं अनियमित ढ़ग से भुगतान में सहयोग करने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी का कथन कि बौरो एरिया एवं लीड का सत्यापन कार्यपालक अभियंता द्वारा किया है को साक्ष्य के अभाव में अस्वीकार योग्य मानते हुए इस आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी श्री भट्ट द्वारा इस आरोप के संदर्भ में मुख्य रूप से कहा गया है कि -

(i) संचालन पदाधिकारी का आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य त्रुटिपूर्ण है क्योंकि जाँच प्रतिवेदन के किसी भी कंडिका में उन्हें भुगतान में सहयोग होना नहीं बताया गया है।

(ii) जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 8.0.3 तथा 5.2.0 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि कार्यपालक अभियंता अनियमित ढ़ग से अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कनीय अभियंता को स्वतंत्र रूप से कार्यक्षेत्र का निर्धारित किया गया तथा निर्धारित कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण कर कार्य की मापी/विपत्र तैयार कराकर भुगतान किया गया तथा कुत्सित मंशा से इन्हें कार्य एवं भुगतान से अलग रखा गया।

(iii) जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.0.8 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इस अनियमित भुगतान के लिये मुख्य रूप से कार्यपालक अभियंता समेत लेखापाल एवं लेखा लिपिक को उत्तरदायी माना गया है। आरोपी के इस कथन को जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 8.0.3, 10.2.19, 5.2.0 तथा 4.0.8 के आलोक में स्वीकार योग्य माना जा सकता है।

(iv) लोक निर्माण संहिता के कंडिका-10 के अनुसार बिना लीड प्लान की स्वीकृति के लीड युक्त मिट्‌टी कार्य कराने एवं भुगतान करने के लिये कार्यपालक अभियंता को जिम्मेवार माना गया है।

मापपुस्त सं०-1790 से स्पष्ट होता है कि लीड युक्त मिट्‌टी का भुगतान 3rd चालू विपत्र से 13वें चालू विपत्र तक में किया गया है इनमें से मात्र दो विपत्र 6th & 8th चालू विपत्र के Abstract of cost पर श्री भट्ट का हस्ताक्षर है शेष 3rd, 4th, 5th, 7th, 9th, 10th, 11th, 12th एवं 13th चालू विपत्र पर श्री भट्ट का हस्ताक्षर न तो मापी पर है न ही Abstract of Cost पर ही है। जाँच प्रतिवेदन के विभिन्न कंडिकाओं से परिलक्षित होता है कि श्री भट्ट को आलोच्य कार्य से दरकिनार कर कार्यपालक अभियंता द्वारा कार्य कराकर भुगतान की कारवाई की गयी है। ऐसी स्थिति में श्री भट्ट को अनियमित कार्य33 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 कराने एवं भुगतान करने में गलत मंशा परिलक्षित नहीं होता है। इसके लिये मुख्य रूप से कार्यपालक अभियंता को जिम्मेवार माना जा सकता है। जाँच प्रतिवेदन में बिना लीड प्लान के स्वीकृति के लीड युक्त मिट्‌टी के भुगतान के लिए श्री भट्ट को उत्तरदायी नहीं ठहराया गया है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका (5.3.3 द्र0)। अतः आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

(v) आरोप-5 जो मिट्‌टी कार्य के साथ-साथ संरचना का कार्य समानुपातिक रूप से नहीं कराकर मूलतः मिट्‌टी कार्य कराकर भुगतान करने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी का कथन कि इनके द्वारा पत्रांक-220, दिनांक 05.11.12 एवं 14 दिनांक 20.01.13 से संवेदक को दिये गये निदेशों को नाकाफी मानते हुए जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 10.2.9 एवं 4.1.0 में समानुपातिक कार्य नहीं कराने के लिये सहायक अभियंता को भी जिम्मेवार माने जाने के आधार पर आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी द्वारा कहा गया है कि मिट्‌टी कार्य के साथ-साथ संरचना का कार्य समानुपातिक रूप से करने हेतु संवेदक को बार-बार निदेश दिया गया है जिसकी पुष्टि संचिका में रक्षित अभिलेख से स्पष्ट होता है कि संवेदक के प्रतिनिधि, कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा दिनांक 08.02.13 को स्थल निरीक्षण करते हुए संरचना कार्यो का भी स्थलीय जाँच की गयी है। उक्त के आलोक में आरोपी का कथन कि उनके पत्रांक-220, दिनांक 05.11.12 पत्रांक-14 दिनांक 21.01.13 जो संवेदक को सम्बोधित है के आलोक में संवेदक द्वारा दिनांक 21. 01.13 को कई आरोप लगाते हुए मुख्य अभियंता से शिकायत की गयी तथा मुख्य अभियंता द्वारा पत्रांक 447, दिनांक 12.02.13 से स्पष्टीकरण की माँग की गयी। जिसका जवाब पत्रांक-47, दिनांक 06.03.13 से समर्पित किया गया सही प्रतीत होता है। साथ ही कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-1025, दिनांक 30.11.14 से स्पष्ट होता है कि दिनांक 23.02.13 (8th विपत्र के पश्चात)के बाद श्री भट्ट द्वारा कोई भुगतान नहीं किया गया है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में माना जा सकता है कि श्री भट्ट द्वारा समानुपातिक कार्य कराने हेतु प्रयास किया गया है। अतएव यह आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

(vi) आरोप-6 जो मापपुस्त के निर्गत एवं अंकण में अनियमितता बरतने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा इस आरोप को अप्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। फलतः आरोपी द्वारा इस आरोप के संदर्भ में कोई तथ्य नहीं दिया गया है।

जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.2.0 एवं 10.2.10 से स्पष्ट है कि मापपुस्त सं० 1690, 1790, 1889, एवं 1890 को छोड़कर अन्य कई माप पुस्त सहायक अभियंता, श्री भट्ट के नाम से निर्गत है परन्तु इन मापपुस्त का उपयोग स्वतंत्र रूप से सीधे कनीय अभियंता द्वारा किया गया है। अतएव अनियमित ढ़ंग से मापपुस्त निर्गत एवं अंकण के लिये सहायक अभियंता को जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.2.0 एवं 10.2.10 के आलोक में दोषी नहीं पाया गया है। अतः आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

(vii) आरोप-7 जो बिना प्री-लेवल की जाँच कराये नियम के विरूद्ध मिट्‌टी कार्य कराने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 6.0.0 में उद्धित तथ्यों तथा समीक्षोपरांत इस आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी द्वारा कहा गया है कि प्रथम विपत्र से संबंधित प्री-लेवल की जाँच दिनांक 14.06.12, द्वितीय चालू विपत्र के प्री-लेवल की जाँच दिनांक 09.10.12, 12.10.12 तथा 19.10.12 षष्टम विपत्र से संबंधित प्री-लेवल की जाँच 14.11.12 तथा अष्टम विपत्र से संबंधित प्री-लेवल की जाँच दिनांक 24.10.12 से 01.11.12 को करते हुए असम्बद्ध प्रमंडल के पदाधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किया गया है। यह भी कहा गया है कि प्रथम विपत्र में 152088.15 घनमीटर मिट्‌टी कार्य के लिये दिनांक 07.09.12 तथा द्वितीय विपत्र में 692350.672 घनमीटर मिट्‌टी कार्य के लिये हस्ताक्षर है। अर्थात (692350.672-152088.15)=540268.552 घनमीटर मिट्‌टी कार्य दिनांक 08.09.12 से 25.10.12 के बीच 47 दिनों में कराये गये है न की मात्र 19.10.12 से 25.10.12 के बीच मात्र 07 दिनों में कराया गया है जैसा की संचालन पदाधिकारी द्वारा विवेचना की गयी है।

आरोपी का कहना है कि प्री-लेवल लेने एवं तटबंध के जीर्णोद्धार कार्य साथ-साथ किया गया है। इसी प्रक्रिया के तहत दिनांक 08.09.12 से 25.10.12 तक जाँचित प्री-लेवल भाग में कार्य कराने के पश्चात प्रथम एवं द्वितीय विपत्र समर्पित किया गया है। उक्त के आलोक में आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।

जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 6.0.0 में प्री-लेवल, पोस्ट लेवल, ग्राफ तथा अन्य अभिलेखों के आधार पर प्री-लेवल की तमाम कारवाई विश्वसनीय नहीं माना गया है। परन्तु आरोपी द्वारा उपलब्ध कराये गये प्री-लेवल बुक के आलोक में प्री-लेवल के जाँचोपरांत कार्य प्रारंभ किया जाना परिलक्षित होता है। परन्तु मुख्य अभियंता द्वारा बार-बार जाँचित प्री-लेवल Existing Section एवं Design Section के साथ आड़ीकाट तथा लीड प्लान माँग किये जाने पर भी प्रमंडल द्वारा उपलब्ध नहीं कराना मामले को संदिग्ध बनाता है एवं जिसे निदेश का उल्लंघन माना जा सकता है। अतः आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों सं०-03 एवं आरोप सं०-07 में स्पष्ट रूप से कोई वित्तीय अनियमित होना परिलक्षित नहीं है। मात्र प्रक्रियात्मक त्रुटि एवं आदेश की अवहेलना का मामला है, तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 1.4.0, 9.80(4), 9.8.0(2), 4.2.0(ग), 5.2.0, 10.2.12, 10.2.10, 10.2.6 में उल्लेखित होना34 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 कि तत्कालीन कार्यपालक अभियंता श्री भीम शंकर राय द्वारा श्री सुभाष चन्द्र भट्ट, सहायक अभियंता को व्यवहारिक रूप से कार्यों से दरकिनार कर मनमाने ढ़ग से कनीय अभियंता के कार्य क्षेत्र का निर्धारण किया जाना तथा कनीय अभियंता के द्वारा तैयार किये गये विपत्र को सीधे (बिना सहायक अभियंता के हस्ताक्षर के) भुगतान की कार्रवाई प्रमंडल द्वारा किया जाना, मनमाने ढ़ग से विपत्र से कटौती किया जाना तथा बाद की तिथि में बिना लीड प्लान के स्वीकृति के लिये काटी गई राशि को विमुक्त किया जाना, साथ ही अन्य कनीय अभियंता, श्री जवाहर लाल सिंह से फसल मुआवजा का अवैध ढ़ग से भुगतान कराया जाना एवं मापपुस्त के संधारण/अंकण कनीय अभियंता से अनियमित ढ़ग से स्वतंत्र रूप से कराया जाना परिलक्षित करता है कि श्री भट्ट, सहायक अभियंता को कार्य से दरकिनार करते हुए अग्रेतर कार्रवाई की गई है।

अतएव उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री सुभाष चन्द्र भट्ट, तत0 सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है।

"आरोप वर्ष 2012-2013 के लिए निन्दन"। उक्त निर्णय श्री सुभाष चन्द्र भट्ट, सहायक अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल सं०-03, जल संसाधन विभाग, पटना को अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

"आरोप वर्ष 2012-2013 के लिए निन्दन"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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5 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(सम0)02-04/2014-1232--श्री सुरेन्द्र मिश्र, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अंचल, दरभंगा, सम्प्रति सेवानिवृत के पद पर पदस्थापित थे तब आपके विरूद्ध कमला बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं 74. 00 पर दिनांक 15.08.14 को पाइपिंग के कारण टूटने, मोनेटरिंग नहीं करने, अधीनस्थ पदाधिकारी को एहतियात के तौर पर कदम उठाने के लिए निदेशित नहीं करने, तटबंध की सुरक्षा में लापरवाही बरतने एवं अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन नहीं करने आदि कतिपय आरोपों के लिए बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी) में विहित रीति के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-728, दिनांक 05.05.16 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-345, दिनांक 31.07.2016 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित किया गया। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप को प्रमाणित नहीं माना गया।

उक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री सुरेन्द्र मिश्र, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अंचल, दरभंगा सम्प्रति सेवानिवृत को आरोपमुक्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

उक्त निर्णय श्री सुरेन्द्र मिश्र, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अंचल, दरभंगा सम्प्रति सेवानिवृत को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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5 जून 2018

सं॰ 22/नि॰सि॰(मोति॰) 08-03/2013(अंश-2)-1236--श्री ब्रज किशोर चौधरी (आई0डी0-3593), तत्कालीन सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमण्डल -02, खगौल के विरूद्ध नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना के मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के पुनस्र्थापन कार्य में बरती गयी अनियमितता के तथ्यों को अनदेखी करने, मूल तथ्य को छिपाकर कार्य में स्थानीय सामग्री उपयोग का जाँचफल में रेखाकिंत करने संबंधी निम्न आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-947 दिनांक-18.05.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गईः-

नेपाल हितकारी योजना 2009 गंडक प्रोजेक्ट के अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमण्डल, वाल्मीकिनगर के अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर के पुर्नस्थापन कार्य में बरती गयी अनियमितता की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग, निगरानी विभाग, पटना द्वारा किया गया। जाँच में पाया गया कि एकरारनामा के विरूद्ध कार्य में स्थानीय सामग्री यथा स्पेन मेटल का उपयोग होने के बावजूद भी सामग्री ढुलाई मद में ंवास्तविक लीड के बजाय एकरारित दर से अनियमित भुगतान किया गया। फलस्वरूप सरकार को एक बड़ी राशि की क्षति हुई।

उनके द्वारा कार्यों के कार्यान्वयन के दौरान स्थल से प्रयुक्त सामग्रियों का नमूना संग्रह करते हुए गुणवत्ता की जाँच की गयी एवं विभिन्न तिथियों में जाँचफल कार्य में संलग्न प्रमंडल को प्रेषित किया गया, जिसमें स्थानीय सामग्री के प्रयोग के अनियमित कृत्य को रेखांकित नही किया गया। जबकि कार्य में स्थानीय सामग्री का प्रयोग स्पष्ट रूप से परिलक्षित था। मुख्य अभियंता, वाल्मीकिनगर द्वारा भी विभिन्न पत्रों के माध्यम से कार्य में स्थानीय सामग्री के उपयोग होने की उद्‌घोषण बार-बार किया जाता रहा। यहॉ तक कि मुख्य अभियंता, वाल्मीकिनगर के पत्रांक- 481 दिनांक -31.03.2012 से विशेष रूप से गुणवत्ता जाँच हेतु मुख्य अभियंता, रूपांकण एवं शोध, अनिसाबाद, पटना से अनुरोध भी किया गया है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका-4.00 (स्थल निरीक्षण) में उद्धत है कि स्थल निरीक्षण से स्पष्ट परिलक्षित था कि शेखपुरा से भिन्न स्थानीय पत्थर का35 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 इस्तेमाल कार्य में किया गया है, अतएव माना जा सकता है कि वे भली-भॉति अवगत थे कि कार्य में स्थानीय सामग्री का उपयोग हो रहा है।

इन सब तथ्यों को अनदेखी करते हुए उनके द्वारा मूल तथ्य को छिपाकर कार्य में स्थानीय सामग्री के उपयोग होने का जाँचफल में रेखाकिंत नहीं करना दर्शाता है कि उक्त अनियमित कृत में उनकी सहभागिता रही है, जिसके लिए वे दोषी है।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग द्वारा की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से निम्नांकित तथ्यों के आधार पर असहमत होते हुए विभागीय पत्रांक- 2463 दिनांक- 24.11. 2016 द्वारा संचालन पदधिकारी से प्रापत जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराते हुए श्री चौधरी से अभ्यावेदन (द्वितीय कारणपृच्छा) की माँग की गयीः-

आरोपी का यह कहना है कि पूर्व से निर्धारित प्रपत्र में स्थलीय यथा चिकने सतह के पत्थर की जाँच करने का उल्लेख नहीं है, परन्तु पूर्व निर्धारित प्रपत्र किस स्तर के पदाधिकारी से निर्गत है, से संबंधित कोई साक्ष्य नही दिया गया है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा कंडिका में अंकित है कि IRC Section 404.21 में Crushed gravel के प्रयोग करने पर कम से कम 90 प्रतिशत भाग 4.75 mm से बड़ा होना चाहिए तथा इसमें कम से कम दो Fracture Face होना चाहिए तथा IRc Section 1004 में round surface के stone के प्रयोग की मनाही की गई है। Stone के round surface हेतु प्रपत्र में समावेश नहीं किया जाना परिलक्षित करता है कि पूर्व से निर्धारित प्रपत्र त्रुटिपूर्ण हैं। अतएव आरोपी का कथन कि गुणवत्ता प्रपत्र में round surface की जाँच के संबंध मे उल्लेख नही होने के कारण उसकी जाँच नही की गई, को स्वीकार योग्य नही माना जा सकता है। वर्णित सन्दर्भ में श्री चौधरी के विरूद्ध आलोच्य कार्य में एकरारनामा के विरूद्ध स्थानीय सामग्री के उपयोग कर न्यून विशिष्ट के कार्य होने के बावजूद गुणवत्ता जाँचफल में उक्त अनियमित कृत को रेखांकित नहीं करने के कारण अनियमित भुगतान होने के आरोप को प्रमाणित माना जा सकता है। उक्त आलोक में श्री चौधरी द्वारा समर्पित बचाव बयान के मुख्य अंश निम्नवत हैः- (i) उनके द्वारा प्रेषित जाँचफल की टिप्पणी भाग में लिखा होता है कि ''जाँचफल का मिलान अपने स्तर से कार्य की तकनीकी विशिष्टि/एकरारनामा से कर लिया जाय। जाँचफल प्रतिवेदन पुरे संरचना की गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। यह उस बिन्दु का प्रतिनिधत्व करता है, जहाँ से नमूना संगह किया गया हैं।

(ii) आरोप मुख्यतः इस बिन्दु पर है कि सामग्री स्थानीय श्रोत से आपूर्ति की गयी, लेकिन एकरारनामा में प्रावधानित शेखपुरा खदान से सामग्री मद की ढुलाई खिलाकर अत्याधिक लीड से भुगतान किया गया। इस आरोप से संबंधित बिन्दु पर गुण नियंत्रण संगठन द्वारा न तो जाँच की जा सकती है और न ही इसके लिये दोषी ठहराया जा सकता है। यह दायित्व कार्य में संलग प्रभारी अभियंता की होती है।

(iii) संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच का दायरा आरोप पत्र तक रखते हुए सही निष्कर्ष गठित किया गया है कि सामग्री ढुलाई की दूरी का सत्यापन गुण नियंत्रण संगठन के दायरे से परे है। अतएव अनियमितता के लिये आरोपित पदाधिकारी को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है।

(iv) उनके द्वारा यह भी कहा गया है कि जाँचफल में शेखपुरा के पत्थर का उपयोग न होकर स्थानीय सामग्री के उपयोग होने का उल्लेख नहीं किये जाने के कारण अतिरिक्त लीड से भुगतान करने का मौका प्रभारी अभियंताओं को मिल गया एवं इस अनियमित कृत में उनकी सहभागिता का आरोप उन पर नहीं लगाया जा सकता है। यह भ्रामक एवं निर्मूल है जो निम्नलिखित तथ्यों से परिलक्षित होता है। उनके द्वारा जून, 2012 में किये गये गुणवत्ता जाँच के पूर्व ही यह निश्चित हो चूका था कि स्थानीय सामग्री का उपयोग किया जा रहा है।

(v) मुख्य अभियंता, वाल्मीकिनगर के पत्रांक 276 दिनांक 21.03.2012 द्वारा संबंधित अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को निदेश दिया गया था कि गुणवत्ता विहित कार्यो का भुगतान तत्काल लंबित रखा जाय तथा पत्रांक 420 दिनांक 31.03.2012 से पुनः भुगतान पर रोक लगाते हुए अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को निदेश दिया गया है, एवं पत्रांक 499 दिनांक 09.04.2012 द्वारा अभियंता प्रमुख को सम्बोधित पत्र मे अंकित है कि कार्य में स्थानीय सामग्री का उपयोग होने के बावजूद भुगतान एकरारनामा में प्रावधानित लीड के अनुरूप अनियमित ढंग से किया जा रहा है, जिसके लिये अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता दोषी है।

मुख्य अभियंता के पत्रों से स्पष्ट है कि स्थानीय सामग्री के उपयोग होने के पश्चात मार्च 2012 से ही सामग्री ढुलाई मद में अनियमित भुगतान हो रहा था। गुणवत्ता जाँचफल पर निर्भर नहीं था, तब दोषी ठहराया जाना कि अनियमित भुगतान में उनकी सहभागिता थी, न्याय संगत नहीं है। अगर मुख्य अभियंता के द्वारा ही प्रारम्भ से ही भुगतान का रोक का आग्रह कोषागार से किया जाता तो अनियमित भुगतान रोका जा सकता था, परन्तु ऐसा नहीं किया गया एवं गुण नियंत्रण के पदाधिकारियों की सहभागिता चिन्हित की जा रही है।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि न तो Source of Material को चिन्हित करना गुण नियंत्रण के Scope of Work में था एवं न ही इस तरह का कोई दिशा निदेश था। ऐसी स्थिति में गुण नियंत्रण के पदाधिकारी द्वारा इस संबंध में रेखांकित नहीं किये जाने के कारण अतिरिक्त लीड से अनियमित भुगतान का मामला कैसे बनता है।36 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 आरोपी पदाधिकारी द्वारा कहा गया कि जिस आरोप के लिये उन्हे आरोपित किया गया है, उस आरोप से उन्हे जोडे़ जाने एवं प्रमाणित मामले का कोई औचित्य एवं वैधिक आधार नही है। वर्णित तथ्यों के आधार पर संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप मुक्त करने का अनुरोध किया गया।

पूरक बचाव बयानः- विभागीय पत्रांक-756 दिनांक 28.05.2012 के अनुपालन में योजना एवं मोनेटरिंग एवं केन्द्रीय जाँच प्रयोगशाला के संयुक्त गठित जाँच दल द्वारा स्थल पर जाकर गुणवत्ता जाँच हेतु नमुना दि0-15.06.2012 को एकत्रित कर किया गया तथा सामूहिक रूप से जॉचोपरांत जाँचफल विभाग को समर्पित किया गया।

ज्ञातव्य हो कि दिनांक- 15.06.2012 को रोड निर्माण में प्रत्युक्त स्टोन मेटल इत्यादि का नमुना RD 13.50, 15.0, 32.30 एवं 40.10 पर लिया गया था। RD 42.00 से RD 62.00 तक कार्य की प्रगति उस समय नगण्य थी। अतः इस रीच में प्रयोग किये जाने वाले सामग्री की जाँच हेतु नमुना एकत्र करना संभव नहीं हो पाया था। जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि जाँचदल द्वारा दिनांक-13.08.2012 को RD 42.00 से RD 62.00 के बीच सड़क निर्माण में प्रतियुक्त सामग्रियों का नमुना संग्रह किया गया था। उक्त से स्पष्ट है कि तकनीकी परिक्षक कोषांग के जाँच दल द्वारा किये गये जाँच से संबंधित स्थल (वि0दू0) से भिन्न (वि0दू0) स्थल से उनके द्वारा नमुना संग्रह किया गया है। अतः तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा किये गये जाँच एवं उसके फलाफल के आधार पर जो निष्कर्ष निकाला गया है कि WMC के वि0दू0-42.00 से 62.00 तक सड़क निर्माण कार्य में स्थानीय सामग्री का प्रयोग किया गया है। इस निष्कर्ष पर उन्हे संयुक्त जाँच दल द्वारा भिन्न स्थल से एकत्र सामग्री के जाँचफल की तुलना कर दोषी नही माना जा सकता है। क्योंकि भिन्न-भिन्न स्थल पर प्रत्युक्त सामग्री की गुणवत्ता एवं प्राप्ति श्रोत भिन्न हो सकती है जिस पर विचार किया जाना आवश्यक है।

विभागीय समीक्षा श्री ब्रज किशोर चौधरी तत्कालन सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप का मुख्य अंश है कि नेपाल हितकारी योजना 2009 के तहत मुख्य पश्चिमी नहर के पुनस्र्थापन कार्य में एकरारनामा के विरूद्ध कार्य में स्थानीय सामग्री के उपयोग होने के बावजूद उनके द्वारा गुणवत्ता जाँचफल में उक्त अनियमित कृत को रेखांकित नहीं किया जाना। फलतः सामग्री ढुलाई मद में वास्तविक लीड के बजाय प्रावधानित लीड से भुगतान होने की अनियमितता होना। आरोपी पदाधिकारी के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी ने आरोप प्रमाणित नहीं होने के दिये गये मंतव्य से असहमत होते हुए निम्न बिन्दुओं के आलोक में द्वितीय कारणपृच्छा की माँग की गयी।

(i) उनके द्वारा कहा जाना कि पूर्व से निर्धारित प्रपत्र में स्थानीय यथा चिकने सतह के पत्थर की जाँच करने का उल्लेख नहीं है। परन्तु पूर्व निर्धारित प्रपत्र किस स्तर के पदाधिकारी द्वारा निर्गत है, से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। अतएव उक्त कथन स्वीकार योग्य नहीं है।

(ii) संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के समीक्षा कंडिका में अंकित है कि IRC Section 404-21 में Crushed Gravel के प्रयोग करने पर कम से कम 90 प्रतिशत भाग 4.75 mm से बड़ा होना चाहिये तथा इसमें कम से कम दो Fracture Face होना चाहिये। परन्तु IRC-1004 में Round Surface के स्टोन के प्रयोग की मनाही की गयी है। उक्त से स्पष्ट है कि जाँच फल हेतु निर्गत प्रपत्र में Stone के Round Surface के कॉलम का समावेश होना चाहिये था। अतएव पूर्व से निर्धारित प्रपत्र को त्रुटिपूर्ण माना जा सकता है। अतः गुणवक्त्त प्रपत्र में Round Surface की जाँच का उल्लेख नहीं होने के कारण इसकी जाँच नहीं की गयी को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है।

(iii) प्राक्कलन में शेखपुरा या स्थानीय मैटेरियल के प्रावधान के बारे में किसी विशेष विशिष्टि का उल्लेख नहीं था को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है, क्योंकि प्राक्कलन में सामग्री ढुलाई मद तथा एकरारनामा के साथ संलग्न B.O.Q. में स्टोन चिप्स एवं मेटल की ढुलाई शेखपुरा से किये जाने का स्पष्ट उल्लेख है। साथ ही मुख्य अभियंता, वाल्मीकिनगर द्वारा विभिन्न पत्रों उक्त अनियमित कृत का उद्‌घोषणा लागातार जाता रहा है। जबकि विभागीय पत्रांक 754 दिनांक 28.05.2012 द्वारा विशेष ढंग से गुणवत्ता की जाँच हेतु उनको निदेश दिया गया था।

(iv) उनके द्वारा कहा जाना कि कार्य में स्थानीय सामग्री अथवा शेखपुरा के पत्थर के उपयोग के बारे में टिप्पणी किया जाना इनके कार्यक्षेत्र से परे है, स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि गुणवत्ता जाँचफल के आधार पर ही कार्य प्रमंडल द्वारा भुगतान किया जाता है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.00 से स्पष्ट है कि कार्य में शेखपुरा से भिन्न श्रोत से पत्थर प्राप्त कर उपयोग किया गया है एवं मुख्य अभियंता वाल्मीकिनगर मात्र नेत्रानुमान के आधार पर उक्त अनियमित कृत को बार-बार उद्‌घोषणा की गयी है।

आरोपी द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा में वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी के समक्ष उपस्थापित किया गया असहमति के बिन्दु के आलोक में इनके द्वारा न तो कोई नया तथ्य ही दिया गया एवं न ही कोई साक्ष्य ही उपलब्ध कराया गया । जिससे परिलक्षित हो सके कि इनके द्वारा निर्गत गुणवत्त जाँचफल वास्तविक तथ्यों के आधार पर दिया गया है। अनियमित भुगतान के संदर्भ में कहा गया है कि भुगतान से पूर्व लीड का सत्यापन करने का दायित्व कार्य मे ंसंलग्न अभियंता की है, न की गुण नियंत्रण कार्य में संलग्न पदाधिकारी की। आरोपी के इस कथन को स्वीकार योग्य माना जा सकता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा अपने अनुपूरक बचाव बयान में कहा गया कि विभागीय निदेश के अनुपालन में दिनांक-15.06.2012 को रोड निर्माण कार्य में प्रत्युक्त सामग्री का नमुना वि0दू07 13.50, 15. 0, 32.30 एवं 40.10 से संग्रह किया गया तथा प्रयोगशाला में जाँचोपरांत जांचफल विभाग एंव संबंधित प्रमंडल को दिया गया। वि0दू0-42.00 से 62.00 के बीच कार्य की प्रगति नगण्य रहने के कारण इस रीच से नमुना संग्रह संभव नहीं हो सका। जबकि तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा दि0-13.08.2002 को स्थलीय जांच में उक्त रोड निर्माण कार्य के वि0दू0-42.00 से 62.00 के37 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 बीच से नमुना संग्रह किया गया एवं निष्कर्ष दिया गया है। अतएव भिन्न-भिन्न स्थल पर प्रत्युक्त सामग्री की गुणवत्ता एवं प्राप्ति श्रोत भिन्न हो सकती है। अतः तकनीकी परीक्षक कोषांग के निष्कर्ष के आधार पर दोषी माना जाना न्यायोचित नहीं है। गुणवत्ता जांचफल के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि गुणवत्ता जांच हेतु वि0दू0-13.50, 15.0, 32.30 एवं 40.10 (Patching plant) से नमूना संग्रह कर जांचफल दिनांक- 28.06.2012 को आरोपी द्वारा निर्गत किया गया है। जांच प्रतिवेदन के कंडिका-4.0.0 (स्थल निरीक्षक कंडिका) के अवलोकन से परिलक्षित होता है कि तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा वि0दू0-42.0 से 62.0 के बीच स्थल निरीक्षण करते हुए इसी रीच से नमुना संग्रह किया गया है तथा कंडिका-5.1.0 में प्रयोगशाला जांचफल के आधार पर कहा गया है कि वि0दू0-42.0 से 62.0 की बीच लिये गये नमुनों में भी गोल पत्थर का औसत प्रतिशत 62.30 है। इन तथ्यों के आलोक में अरोपी का कथन कि उनके द्वारा संग्रहित नमुना एवं जांच दल द्वारा संग्रहित नमुना का कार्य स्थल पर प्रत्युक्त सामग्री की गुणवत्ता एवं प्राप्ति श्रोत अलग-अलग हो सकती है, को कुछ हद तक स्वीकार योग्य माना जा सकता है।

परन्तु आरोपी द्वारा दि0-03.05.2012 को भी दो गुणवत्ता जांचफल निर्गत किया गया है। जिसमें Location वि0दू0-00.0 से 62.50 अंकित है। इस जांचफल के संदर्भ में जांच प्रतिवेदन के कंडिका-5.2.0 (ख) में कहा गया है कि विभागीय गुणवत्ता जांचदल द्वारा स्वयं नमुना संग्रह नही किया जाना माना जा सकता है एवं दोनो जांचफल में नमुना संग्रहण के कार्य स्थल के विशेष बिन्दु स्पष्टतः अंकित नही हैं। ऐसी स्थति मे उक्त दोनो जांचफल का नमुना वि0दू0-42.0 से 62.0 के बीच से ही संग्रह किया गया है अथवा नहीं, स्थापित किया जाना संभव प्रतित नही होता है। लेकिन दिनांक 03.05.2012 के पूर्व मुख्य अभियंता द्वारा अनेकों पत्र के माध्यम से आलोच्य कार्य में स्थनीय सामग्री का उपयोग होने की घोषणा किया जा चुका है।

आरोपी का यह कहना कि उनके द्वारा दि0 15.06.2012 को नमुना संग्रहण अवधि में वि0दू0-42.0 से 62.0 के बीच कार्य की प्रगति नगण्य थी फलतः उक्त रीच मे ंप्रयोग की जाने वाली सामग्री का नमुना संग्रह करना संभव नही पाया था को स्वीकार योग्य नही माना जा सकता क्योकि मुख्य अभियंता के दिनांक- 11.12.2011 के निरीक्षण प्रतिवेदना में अंकित है कि मुख्य पश्चिमी नहर के वि0दू0-0.0 से 62.50 तक सेवापथ का कार्य निर्माणाधीन पाया गया एवं निरीक्षण के समय पुरी लम्बाई में RBM एवं GSB के साथ एक लेयर WBM का कार्य पूर्ण पाया गया।

वर्णित तथ्यों के आलोक में दिनांक 26.06.2012 को निर्गत जाँचफल के आधार पर इनके विरूद्ध कार्य में स्थानीय सामग्री के प्रयोग होने के बावजूद गुणवत्ता जाँचफल में उक्त अनियमित कृत को रेखांकित नही करने के आरोप संदिग्ध है क्योकि आरोपी द्वारा संग्रहित नमूना एवं जाँचफल द्वारा संग्रहित नमूना का कार्यस्थल बिन्दू अलग-अलग होने के कारण संग्रहित नमूना की गुणवत्ता भिन्न होने की संभावना से इंकार नही किया जा सकता, परन्तु पूर्व में आरोपी द्वारा दिये गये तथ्यों एवं साक्ष्य तथा दिनांक 03.05.2012 को इनके द्वारा निर्गत जाँचफल के आलोक में आरोप बनता परिलक्षित होता है। उपरोक्त विभागीय समीक्षा में वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री चौधरी द्वारा कार्य मे ंएकरारनामा के विरूद्ध कार्य में स्थानीय सामग्री के उपयोग होने के बावजूद भी गुणवत्ता जाँचफल में उक्त अनियमित कृत को रेखांकित नही करने के लिए दोषी माना गया।

मामले की सम्यक समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री ब्रज किशोर चौधरी (आई0डी0-3593), तत्कालीन सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमण्डल-02, खगौल संप्रति कार्यपालक अभियंता, दुर्गावती बाँध प्रमंडल सं0-02 के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिया गया हैः-

''कालमान वेतनमान में एक वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति और भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।'' उक्त निर्णय दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना के पत्रांक-83 दिनांक-11.04.2018 के माध्यम से सहमति प्रदान की गयी है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री ब्रज किशोर चौधरी (आई0डी0-3593), तत्कालीन सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमण्डल-02, खगौल संप्रति कार्यपालक अभियंता, दुर्गावती बाँध प्रमंडल सं0-02 के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता हैः-

''कालमान वेतनमान में एक वेतन प्रक्र्रम पर स्थायी रूप से अवनति और भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, संयुक्त सचिव।

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12 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-01/2014-1280--श्री अशोक सिंह ठाकुर, तत्कालीन सहायक अभियंता (आई0डी0-3634) सिंचाई प्रमंडल, नावानगर के पद पर पदस्थापित थे तो उनके विरूद्ध रोहतास (सासाराम) जिलान्तर्गत मलई बराज के निर्माण कार्य में अनियमितता बरते जाने का आरोप प्रतिवेदित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-445, दिनांक 12.12.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री ठाकुर के विरूद्ध निम्न आरोप प्रतिवेदित किया गया - आरोप सं०-1 -मलई बराज योजना में Finish Rate पर बोल्डर पिचिंग/Stone metal filter को Supply and labour rate में तोड़कर प्राक्कलन (सं० SCMC-4701-04/2013-14) तैयार करने एवं अग्रसारण हेतु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 6.1.0, 6.3.0, 6.6.0 के आलोक में प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते हैं।38 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 जाँच के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-259, दिनांक 21.02.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री ठाकुर द्वारा उक्त पत्र के आलोक में अपना जवाब विभाग को समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। प्रस्तुत आरोप मलई बराज योजना के प्राक्कलन बोल्डर पीचिंग एवं मेटल फिल्टर कार्य मद का Finish Rate का प्रावधान नहीं कर आपूर्ति मद एवं श्रम मद को अलग-अलग पर का प्रावधान करते हुए प्राक्कलन का गठन एवं अग्रसारण किए जाने से संबंधित है। श्री ठाकुर को आंशिक प्रमाणित पाये जाने को निष्कर्षित किया गया है। उक्त आंशिक प्रमाणित आरोप के लिए आरोपित पदाधिकारी का बचाव बयान एवं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों से विदित होता है कि -

(i) वर्ष 1987-88 में इस योजना के परिमाण विपत्र में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (ii) वर्ष 1956-96 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है।

(iii) वर्ष 2009 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (iv) वर्ष 2012 में मुख्य अभियंता, डिहरी के रूपए 5825.00 लाख के तकनीकी अनुमोदित प्राक्कलन के आधार पर विभाग द्वारा उतनी ही राशि की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई। संबंधित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है।

उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि मलई बराज योजना के पूर्व के प्राक्कलनों में आपूर्ति एवं श्रम दर का प्रावधान अलग-अलग रहा है एवं तदनुसार ही वर्ष 2012 में गठित प्राक्कलनों के आधार पर विभाग से प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त हुई है। अतः यह माना जा सकता है कि आपूर्ति एवं श्रम दर के अलग-अलग प्रावधान पर मुख्य अभियंता एवं विभाग को कोई आपत्ति नहीं थी। उपरोक्त से आरोपित पदाधिकारियों के कथन की पुष्टि होना परिलक्षित होता है।

जाँच प्रतिवेदन कंडिका 6.1.0 में अंकित किया गया है कि आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है जो Current practice में नहीं है। उक्त के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि यह Current practice में है। विभागीय अनुसूचित दर में भी अलग-अलग प्रावधान है, जो प्राक्कलन गठन का मुख्य आधार होता है। उनके द्वारा साक्ष्य के रूप में संलग्नित प्राक्कलनों से स्पष्ट होता है कि मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ के अन्तर्गत वर्ष 2012 में आपूर्ति एवं श्रम मद के अलग-अलग प्रावधान के साथ तकनीकी अनुमोदन सक्षम प्राधिकार द्वारा किया गया है। जिसे यह माना जा सकता है कि वर्ष 2012 में अलग-अलग कार्य मद का प्रावधान रहा है।

जाँच प्रतिवेदन में अलग-अलग कार्यमद के प्रावधान से किस विभागीय मार्गदर्शन/निदेश का उल्लंघन हुआ है, स्पष्ट नहीं किया जाना परिलक्षित होता है। मात्र कहा गया है कि Current practice में नहीं है। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि विभागीय पत्रांक-2726, दिनांक 11.12.2010 से कटाव निरोधक/बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की निविदा फिनिश दर पर आमंत्रित किए जाने का निदेश है। परन्तु सिंचाई परियोजनाओं के लिए ऐसा कोई विभागीय निदेश/मार्गदर्शन नहीं मिलता है।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा मात्र पूर्व के गठित प्राक्कलन को वर्ष 2012 में अद्यतन अनुसूचित दर के आधार पर पुनरीक्षित किया गया है। श्री ठाकुर कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। अतएव अगल-अलग मद का प्रावधान कर संवेदक को लाभ पहुँचाने अथवा अतिरिक्त लाभ प्राप्त किए जाने की मंशा परिलक्षित नहीं होती है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पूर्व के प्रावधान के अनुरूप यथास्वरूप रखते हुए गठित प्राक्कलन (पुनरीक्षित प्राक्कलन) के तदनुरूप कार्यकारी प्राक्कलनों को तैयार करने की बाध्यता होती है। इसी के अनुरूप अलग-अलग आपूर्ति एवं श्रम मद का प्रावधान करते हुए आलोच्य कार्य का प्राक्कलन तैयार किया गया जिसे अनियमित माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव पूर्व के गठित प्राक्कलन एवं प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पुनरीक्षित प्राक्कलन जिस पर प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई है के अनुरूप कार्यकारी प्राक्कलन, जिसकी तकनीकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई, तैयार करने के लिए दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। चूँकि ये आरोपी पदाधिकारी कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। इस परिस्थिति में इनके द्वारा वित्तीय अनियमितता बरती जानी परिलक्षित नहीं होता है। अतएव श्री ठाकुर द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब स्वीकार योग्य प्रतीत होता है।

उक्त आरोप के लिए अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) से मंतव्य की मांग की गई। अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) द्वारा DPR प्रभावी के क्रम में कार्य मद में बदलाव न कर यथावत रखने की कार्रवाई की अनियमित कृत माने जाने का कोई कारण नहीं है।

इस प्रकार उपर्युक्त समीक्षा एवं अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) के मंतव्य के आलोक में श्री अशोक सिंह ठाकुर, तत0 सहायक अभियंता (आई0डी0-3634) सिंचाई प्रमंडल, नावानगर को उक्त आरोप से मुक्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णय से श्री अशोक सिंह ठाकुर, तत0 सहायक अभियंता (आई0डी0-3634) को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।39 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

12 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(भाग0)-09-16/2009-1282--श्री सबीर अहमद, आई0डी0-3879, तत्कालीन प्राक्कलन पदाधिकारी (सहायक अभियंता) सिंचाई प्रमंडल सं०-2, जमुई को जिला पदाधिकारी, गोपालगंज के प्रतिवेदन के आधार पर उचकागाँव थाना काण्ड सं०-150/09 के मामले में दिनांक 16.10.09 से 21.10.09 तक न्यायिक हिरासत में रहने के फलस्वरूप विभागीय अधिसूचना सं०-2916, दिनांक 27.11.09 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9 के उपनियम-2 के तहत न्यायिक हिरासत की अवधि के लिए निलंबित किया गया एवं विभागीय संकल्प ज्ञापांक-09, दिनांक 05.01.2010 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया -

(i) एक सरकारी सेवक होने के उपरांत भी जान बूझकर पैक्स चुनाव 2009 में दिनांक 16.10.09 को गोपालगंज जिला अन्तर्गत उचकागाँव प्रखंड के मतदान केन्द्र सं०-11(ख) झीरवा पंचायत भवन में पैक्स चुनाव प्रत्याशी श्री आजाद अहमद के द्वारा मतदान अभिकर्त्ता के रूप में नियुक्त किया गया तथा इनके द्वारा उक्त मतदान केन्द्र पर मतदान अभिकर्त्ता के रूप में कार्य किया गया।

(ii) उक्त मतदान केन्द्र पर प्रतिनियुक्त पदाधिकारियों/कर्मियों को अन्य मतदाताओं के पैक्स की सदस्यता रसीद के आधार पर स्वयं मत देने हेतु इनके द्वारा वाह्‌य दबाव डाला गया।

(iii) मतदान पदाधिकारियों द्वारा बोगस वोट नहीं करने हेतु समझाये जाने के बावजूद भी इनके द्वारा बोगस वोट डालने हेतु मतदान कार्य में व्यवधान उत्पन्न किया गया।

(iv) इनके द्वारा अपने कार्यक्षेत्र से बिना अवकाश स्वीकृत कराये, बगैर मुख्यालय त्याग की अनुमति के स्वेच्छापूर्वक मुख्यालय छोड़ना इनके स्वेच्छाचारिता एवं कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही का द्योतक है।

(v) इनके द्वारा कारावास से मुक्त होने के पश्चात स्पीड पोस्ट से योगदान भेजा गया जो नियम के प्रतिकूल है। इनको स्वयं उपस्थित होकर योगदान करना चाहिए था। इनके द्वारा स्थापित नियम का उल्लंघन कर अनुशासनहीनता का परिचय दिया गया है।

2. उक्त विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी-सह-अधीक्षण अभियंता, गंगा सोन बाढ़ सुरक्षा अंचल, पटना के पत्रांक-33, दिनांक 04.01.13 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर किये जाने के उपरांत निम्नांकित तथ्यों को उक्त जाँच प्रतिवेदन में पाया गया -

(i) चूँकि श्री सबीर अहमद, तत्कालीन सहायक अभियंता पर पैक्स निर्वाचन 2009 में उचकागाँव प्रखंड के मतदान केन्द्र सं०-11(ख) झीरवा पंचायत भवन पर चुनाव प्रत्याशी श्री आजाद के मतदान अभिकर्त्ता के रूप में कार्य करने, मतदान केन्द्र पर प्रतिनियुक्त पदाधिकारियों एवं कर्मियों को स्वयं मत देने हेतु दबाव डालने और बोगस मत डालने हेतु मतदान कार्य में बाधा उत्पन्न करने का गंभीर आरोप है एवं इस मामले में उनके विरूद्ध उचकागाँव थाना काण्ड सं०-150/09 भा0 द0 वि0 की धारा-171 (सी0), 468, 471, 353 तथा 419 के तहत प्राथमिकी दर्ज है जिसमें माननीय न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जा चुका है एवं विषयांकित वाद माननीय न्यायिक दण्डाधिकारी गोपालगंज के न्यायालय ट्रायल सं०-72/12 के रूप में चल रहा है।

यद्यपि विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री सबीर अहमद, तत्कालीन सहायक अभियंता के आरोपों के संबंध में प्रमाणित होने अथवा न होने का प्रतिवेदन में उल्लेख नहीं किया गया है परन्तु जिस तरह के मुख्यालय से बाहर उचकागाँव में मतदान केन्द्र पर विवाद के बाद उनके विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज की गयी और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया जिसकी सम्पुष्टि जिला पदाधिकारी गोपालगंज के पत्रांक-1743/सी0, दिनांक 26.10.09 द्वारा की गयी है, से इनके विरूद्ध लगाये गये आरोपों की पुष्टि होती है।

एक राजपत्रित पदाधिकारी/सरकारी सेवक के रूप में चुनाव प्रत्याशी के मतदान अभिकर्त्ता के रूप में कार्य करना एवं मतदान कार्य में व्यवधान उत्पन्न करना सरकारी सेवक आचार नियमावली के विरूद्ध होने के प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना सं०-799, दिनांक 11.07.13 द्वारा श्री अहमद को निम्नांकित दण्ड देते हुए आदेश संसूचित किया गया - (1) निन्दन वर्ष 2009-10 (2) दो वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक। 3. उक्त विभागीय अधिसचूना सं०-799, दिनांक 11.07.13 द्वारा संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री अहमद, सहायक अभियंता द्वारा एक पुनरीक्षण अभ्यावेदन दिनांक 03.01.14 समर्पित किया गया जिसमें निम्नांकित बिन्दुओं को मुख्य रूप से उठाया गया है -

(i) विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में पुरे घटनाक्रम का वर्णन किया गया है। (ii) माननीय न्यायालय, न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी गोपालगंज द्वारा वाद सं०-जी0आर0-2547/09 टी0आर0-64/13 में दिनांक 30.10.13 को पारित न्याय निर्णय द्वारा इन्हें साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया गया है।

(iii) आरोप गठन से लेकर वृहत शास्तियाँ अधिरोपित करने से संबंधित सामान्य प्रशासन विभाग के अधिसूचनाओं एवं परिपत्रों का उल्लेख किया गया है।

(iv) संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन के आलोक में विभागीय समीक्षा का उल्लेख करते हुए तथ्यांकित किया गया है कि बिना इनसे द्वितीय कारण पृच्छा किये तथा बिना संचालन पदाधिकारी का40 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 जाँच प्रतिवेदन उपलब्ध कराये ही विभागीय अधिसूचना सं०-799, दिनांक 11.07.13 द्वारा दण्ड संसूचित किया गया है।

(v) सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन के मामले में दिये गये नियमों/तथ्यों/निर्देशों का हवाला देते हुए विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन दिये बिना तथा बिना द्वितीय कारण पृच्छा की मांग किये फौजदारी मुकदमा के आधार पर दण्ड अधिरोपित करने, जिसे माननीय न्यायालय, गोपालगंज द्वारा निरस्त कर दिया गया है के मद्देनजर संसूचित दण्ड को निरस्त करने का अनुरोध किया गया है।

4. श्री सबीर अहमद, तत0 सहायक अभियंता द्वारा पुनरीक्षण अभ्यावेदन में उठाये गये उपर्युक्त बिन्दुओं की समीक्षा पुनः सरकार के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरांत यह पाया गया कि श्री सबीर अहमद, तत0 सहायक अभियंता के साक्ष्य के अभाव में माननीय न्यायालय, न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी गोपालगंज द्वारा वाद सं०-जी0आर0-2547/09, टी0आर0 64/13 में दिनांक 30.10.13 को पारित न्याय निर्णय द्वारा दोषमुक्त किया गया है जिससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि घटना के दिन मतदान केन्द्र पर नहीं गये थे तथा उन्होंने मतदान अभिकर्त्ता के रूप में कार्य नहीं किया था। श्री सबीर अहमद, तत0 सहायक अभियंता द्वारा पुनरीक्षण अभ्यावेदन में यह भी हवाला दिया गया है कि वे आकस्मिक अवकाश लेकर अपने घर गये थे एवं अपनी पत्नी को वोट दिलाने के लिए मतदान केन्द्र पर गये थे परन्तु उनके अवकाश आवेदन से स्पष्ट है कि उन्होंने अपनी पत्नी की तबियत अचानक खराब हो जाने के कारण अवकाश हेतु अनुरोध किया है जबकि दूसरी ओर उनका कहना है कि वे अपनी पत्नी को मतदान दिलाने के लिए पोलिंग बूथ पर गये थे। इस प्रकार उनका स्वयं का कथन विरोधाभाषी है जो सुस्पष्टयता मनगढं़त हैं।

अतएव श्री सबीर अहमद के पुनरीक्षण अभ्यावेदन को स्वीकार करने का कोई औचित्य नहीं रहने के कारण इसे विभागीय अधिसूचना सं०-858, दिनांक 03.07.14 द्वारा खारिज करने का निर्णय लिया गया है।

उपुर्यक्त विभागीय अधिसूचना सं०-799, दिनांक 11.07.13 एवं विभागीय अधिसूचना सं०-858, दिनांक 03.09.2014 द्वारा संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री सबीर अहमद, तत्कालीन प्राक्कलन पदाधिकारी (सहायक अभियंता) सिंचाई प्रमंडल सं०-2, जमुई सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, जमुई द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-13297/2014 दायर किया गया। माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा दिनांक 26.02.2018 को पारित न्याय निर्णय का कार्यकारी अंश निम्नवत्‌ है-

" it is an admitted fact that no inquiry report was given to the petitioner and no second show casuse notice was issued to him along with the inquiry report and tentative reasoning of disciplinary authority with respect to his differing with the findings of the enquiry officer, the whole proceeding becomes vitiated and as such the order of punishment cannot be sustained. There is flagrant violation of Bihar Government Servent (Classification, Control & Appeal) Rules- 2005 while conducting the enquiry proceeding and the enquiry officer exonerating the petitioner of three charges and giving opinion that charge no. 4 and 5 will be subject to result of the criminal trial and petitioner being acquitted by the criminal court, there was no occasion for imposing any punishment against the petitioner without giving a copy of the enquiry report and tentative reasons of disciplinary authority differing with the finding of the enquiry officer and giving liberty to the petitioner to meet the findings of disciplinary authority to convince him that the enquiry report by which he has been exonerated is correct and proper but no such opportunity was given to the petitioner, as such as order passed by the disciplinary authority as well as the revisional authority cannot be sustained and are set aside with all consequential benefits to the petitioner."

माननीय उच्च न्यायालय, पटना के उपर्युक्त न्याय निर्णय के आलोक में श्री सबीर अहमद, तत्कालीन प्राक्कलन पदाधिकारी (सहायक अभियंता) सिंचाई प्रमंडल सं०-2, जमुई सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, जमुई के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं०-799, दिनांक 11.07.13 द्वारा संसूचित दण्ड को निरस्त करते हुए उन्हें सभी देय लाभों को भुगतान करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री सबीर अहमद, तत्कालीन प्राक्कलन पदाधिकारी (सहायक अभियंता) सिंचाई प्रमंडल सं०-2, जमुई सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, जमुई के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं०-799, दिनांक 11.07. 2013 द्वारा संसूचित दण्ड को निरस्त करते हुए उन्हें देय सभी लाभों को भुगतान करने का आदेश संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राकेश मोहन, संयुक्त सचिव।41 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

14 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-01/2014-1308--श्री लाला दास, अवर प्रमंडल पदाधिकारी (आई0डी0-4676) सोन नहर आधुनिकीकरण अवर प्रमंडल सं०-2, सासाराम के पद पर पदस्थापित थे तो उनके विरूद्ध रोहतास (सासाराम) जिलान्तर्गत मलई बराज के निर्माण कार्य में अनियमितता बरते जाने का आरोप प्रतिवेदित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-473, दिनांक 18.02.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री दास के विरूद्ध निम्न आरोप प्रतिवेदित किया गया - आरोप सं०-1 -मलई बराज योजना में Finish Rate पर बोल्डर पिचिंग/Stone metal filter को Supply and labour rate में तोड़कर प्राक्कलन (सं० SCMC-4701-04/2013-14) तैयार करने एवं अग्रसारण हेतु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 6.1.0, 6.3.0, 6.6.0 के आलोक में प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते हैं। जाँच के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-262, दिनांक 21.02.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री दास द्वारा उक्त पत्र के आलोक में अपना जवाब विभाग को समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। प्रस्तुत आरोप मलई बराज योजना के प्राक्कलन बोल्डर पीचिंग एवं मेटल फिल्टर कार्य मद का Finish Rate का प्रावधान नहीं कर आपूर्ति मद एवं श्रम मद को अलग-अलग पर का प्रावधान करते हुए प्राक्कलन का गठन एवं अग्रसारण किए जाने से संबंधित है। श्री दास को आंशिक प्रमाणित पाये जाने को निष्कर्षित किया गया है। उक्त आंशिक प्रमाणित आरोप के लिए आरोपित पदाधिकारी का बचाव बयान एवं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों से विदित होता है कि -

(i) वर्ष 1987-88 में इस योजना के परिमाण विपत्र में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (ii) वर्ष 1956-96 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है।

(iii) वर्ष 2009 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (iv) वर्ष 2012 में मुख्य अभियंता, डिहरी के रूपए 5825.00 लाख के तकनीकी अनुमोदित प्राक्कलन के आधार पर विभाग द्वारा उतनी ही राशि की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई। संबंधित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है।

उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि मलई बराज योजना के पूर्व के प्राक्कलनों में आपूर्ति एवं श्रम दर का प्रावधान अलग-अलग रहा है एवं तदनुसार ही वर्ष 2012 में गठित प्राक्कलनों के आधार पर विभाग से प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त हुई है। अतः यह माना जा सकता है कि आपूर्ति एवं श्रम दर के अलग-अलग प्रावधान पर मुख्य अभियंता एवं विभाग को कोई आपत्ति नहीं थी। उपरोक्त से आरोपित पदाधिकारियों के कथन की पुष्टि होना परिलक्षित होता है।

जाँच प्रतिवेदन कंडिका 6.1.0 में अंकित किया गया है कि आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है जो Current practice में नहीं है। उक्त के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि यह Current practice में है। विभागीय अनुसूचित दर में भी अलग-अलग प्रावधान है, जो प्राक्कलन गठन का मुख्य आधार होता है। उनके द्वारा साक्ष्य के रूप में संलग्नित प्राक्कलनों से स्पष्ट होता है कि मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ के अन्तर्गत वर्ष 2012 में आपूर्ति एवं श्रम मद के अलग-अलग प्रावधान के साथ तकनीकी अनुमोदन सक्षम प्राधिकार द्वारा किया गया है। जिसे यह माना जा सकता है कि वर्ष 2012 में अलग-अलग कार्य मद का प्रावधान रहा है।

जाँच प्रतिवेदन में अलग-अलग कार्यमद के प्रावधान से किस विभागीय मार्गदर्शन/निदेश का उल्लंघन हुआ है, स्पष्ट नहीं किया जाना परिलक्षित होता है। मात्र कहा गया है कि Current practice में नहीं है। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि विभागीय पत्रांक-2726, दिनांक 11.12.2010 से कटाव निरोधक/बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की निविदा फिनिश दर पर आमंत्रित किए जाने का निदेश है। परन्तु सिंचाई परियोजनाओं के लिए ऐसा कोई विभागीय निदेश/मार्गदर्शन नहीं मिलता है।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा मात्र पूर्व के गठित प्राक्कलन को वर्ष 2012 में अद्यतन अनुसूचित दर के आधार पर पुनरीक्षित किया गया है। श्री दास कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। अतएव अगल-अलग मद का प्रावधान कर संवेदक को लाभ पहुँचाने अथवा अतिरिक्त लाभ प्राप्त किए जाने की मंशा परिलक्षित नहीं होती है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पूर्व के प्रावधान के अनुरूप यथास्वरूप रखते हुए गठित प्राक्कलन (पुनरीक्षित प्राक्कलन) के तदनुरूप कार्यकारी प्राक्कलनों को तैयार करने की बाध्यता होती है। इसी के अनुरूप अलग-अलग आपूर्ति एवं श्रम मद का प्रावधान करते हुए आलोच्य कार्य का प्राक्कलन तैयार किया गया जिसे अनियमित माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव पूर्व के गठित प्राक्कलन एवं प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पुनरीक्षित प्राक्कलन जिस पर प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई है के अनुरूप कार्यकारी प्राक्कलन, जिसकी तकनीकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई, तैयार करने के लिए दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। चूँकि ये आरोपी पदाधिकारी कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। इस परिस्थिति में इनके द्वारा वित्तीय अनियमितता बरती जानी परिलक्षित नहीं होता है। अतएव श्री दास द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब स्वीकार योग्य प्रतीत होता है।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 42 उक्त आरोप के लिए अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) से मंतव्य की मांग की गई। अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) द्वारा DPR प्रभावी के क्रम में कार्य मद में बदलाव न कर यथावत रखने की कार्रवाई की अनियमित कृत माने जाने का कोई कारण नहीं है।

इस प्रकार उपर्युक्त समीक्षा एवं अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) के मंतव्य के आलोक में श्री लाला दास, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी (आई0डी0-4676) सोन नहर आधुनिकीकरण अवर प्रमंडल सं०-2, सासाराम को उक्त आरोप से मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णय से श्री लाला दास, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी (आई0डी0-4676) सोन नहर आधुनिकीकरण अवर प्रमंडल सं०-2, सासाराम को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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14 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-01/2014-1309--श्री सुमन कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता (आई0डी0-3590) सिंचाई प्रमंडल, नावानगर के पद पर पदस्थापित थे तो उनके विरूद्ध रोहतास (सासाराम) जिलान्तर्गत मलई बराज के निर्माण कार्य में अनियमितता बरते जाने का आरोप प्रतिवेदित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-472, दिनांक 18.02.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री कुमार के विरूद्ध निम्न आरोप प्रतिवेदित किया गया - आरोप सं०-1 -मलई बराज योजना में Finish Rate पर बोल्डर पिचिंग/Stone metal filter को Supply and labour rate में तोड़कर प्राक्कलन (सं० SCMC-4701-04/2013-14) तैयार करने एवं अग्रसारण हेतु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 6.1.0, 6.3.0, 6.6.0 के आलोक में प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते हैं। जाँच के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-260, दिनांक 21.02.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री कुमार द्वारा उक्त पत्र के आलोक में अपना जवाब विभाग को समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। प्रस्तुत आरोप मलई बराज योजना के प्राक्कलन बोल्डर पीचिंग एवं मेटल फिल्टर कार्य मद का Finish Rate का प्रावधान नहीं कर आपूर्ति मद एवं श्रम मद को अलग-अलग पर का प्रावधान करते हुए प्राक्कलन का गठन एवं अग्रसारण किए जाने से संबंधित है। श्री कुमार को आंशिक प्रमाणित पाये जाने को निष्कर्षित किया गया है। उक्त आंशिक प्रमाणित आरोप के लिए आरोपित पदाधिकारी का बचाव बयान एवं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों से विदित होता है कि -

(i) वर्ष 1987-88 में इस योजना के परिमाण विपत्र में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (ii) वर्ष 1956-96 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है।

(iii) वर्ष 2009 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (iv) वर्ष 2012 में मुख्य अभियंता, डिहरी के रूपए 5825.00 लाख के तकनीकी अनुमोदित प्राक्कलन के आधार पर विभाग द्वारा उतनी ही राशि की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई। संबंधित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है।

उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि मलई बराज योजना के पूर्व के प्राक्कलनों में आपूर्ति एवं श्रम दर का प्रावधान अलग-अलग रहा है एवं तदनुसार ही वर्ष 2012 में गठित प्राक्कलनों के आधार पर विभाग से प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त हुई है। अतः यह माना जा सकता है कि आपूर्ति एवं श्रम दर के अलग-अलग प्रावधान पर मुख्य अभियंता एवं विभाग को कोई आपत्ति नहीं थी। उपरोक्त से आरोपित पदाधिकारियों के कथन की पुष्टि होना परिलक्षित होता है।

जाँच प्रतिवेदन कंडिका 6.1.0 में अंकित किया गया है कि आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है जो Current practice में नहीं है। उक्त के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि यह Current practice में है। विभागीय अनुसूचित दर में भी अलग-अलग प्रावधान है, जो प्राक्कलन गठन का मुख्य आधार होता है। उनके द्वारा साक्ष्य के रूप में संलग्नित प्राक्कलनों से स्पष्ट होता है कि मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ के अन्तर्गत वर्ष 2012 में आपूर्ति एवं श्रम मद के अलग-अलग प्रावधान के साथ तकनीकी अनुमोदन सक्षम प्राधिकार द्वारा किया गया है। जिसे यह माना जा सकता है कि वर्ष 2012 में अलग-अलग कार्य मद का प्रावधान रहा है।

जाँच प्रतिवेदन में अलग-अलग कार्यमद के प्रावधान से किस विभागीय मार्गदर्शन/निदेश का उल्लंघन हुआ है, स्पष्ट नहीं किया जाना परिलक्षित होता है। मात्र कहा गया है कि Current practice में नहीं है। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि विभागीय पत्रांक-2726, दिनांक 11.12.2010 से कटाव निरोधक/बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की निविदा फिनिश दर पर आमंत्रित किए जाने का निदेश है। परन्तु सिंचाई परियोजनाओं के लिए ऐसा कोई विभागीय निदेश/मार्गदर्शन नहीं मिलता है।43 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 आरोपी पदाधिकारी द्वारा मात्र पूर्व के गठित प्राक्कलन को वर्ष 2012 में अद्यतन अनुसूचित दर के आधार पर पुनरीक्षित किया गया है। श्री कुमार कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। अतएव अगल-अलग मद का प्रावधान कर संवेदक को लाभ पहुँचाने अथवा अतिरिक्त लाभ प्राप्त किए जाने की मंशा परिलक्षित नहीं होती है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पूर्व के प्रावधान के अनुरूप यथास्वरूप रखते हुए गठित प्राक्कलन (पुनरीक्षित प्राक्कलन) के तदनुरूप कार्यकारी प्राक्कलनों को तैयार करने की बाध्यता होती है। इसी के अनुरूप अलग-अलग आपूर्ति एवं श्रम मद का प्रावधान करते हुए आलोच्य कार्य का प्राक्कलन तैयार किया गया जिसे अनियमित माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव पूर्व के गठित प्राक्कलन एवं प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पुनरीक्षित प्राक्कलन जिस पर प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई है के अनुरूप कार्यकारी प्राक्कलन, जिसकी तकनीकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई, तैयार करने के लिए दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। चूँकि ये आरोपी पदाधिकारी कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। इस परिस्थिति में इनके द्वारा वित्तीय अनियमितता बरती जानी परिलक्षित नहीं होता है। अतएव श्री कुमार द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब स्वीकार योग्य प्रतीत होता है।

उक्त आरोप के लिए अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) से मंतव्य की मांग की गई। अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) द्वारा DPR प्रभावी के क्रम में कार्य मद में बदलाव न कर यथावत रखने की कार्रवाई की अनियमित कृत माने जाने का कोई कारण नहीं है।

इस प्रकार उपर्युक्त समीक्षा एवं अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) के मंतव्य के आलोक में श्री सुमन कुमार, तत0 सहायक अभियंता (आई0डी0-3590) सिंचाई प्रमंडल, नावानगर को उक्त आरोप से मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णय से श्री सुमन कुमार, तत0 सहायक अभियंता (आई0डी0-3590), सिंचाई प्रमंडल, नावानगर को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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14 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-01/2014-1310--श्री वेदाकान्त पाठक, तत0 अधीक्षण अभियंता (आई0डी0-1696) सोन नहर आधुनिकीकरण अंचल, डिहरी के पद पर पदस्थापित थे तो उनके विरूद्ध रोहतास (सासाराम) जिलान्तर्गत मलई बराज के निर्माण कार्य में अनियमितता बरते जाने का आरोप प्रतिवेदित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-446, दिनांक 12.02.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री पाठक के विरूद्ध निम्न आरोप प्रतिवेदित किया गया - आरोप सं०-1 -मलई बराज योजना में Finish Rate पर बोल्डर पिचिंग/Stone metal filter को Supply and labour rate में तोड़कर प्राक्कलन (सं० SCMC-4701-04/2013-14) तैयार करने एवं अग्रसारण हेतु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 6.1.0, 6.3.0, 6.6.0 के आलोक में प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते हैं। जाँच के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-263, दिनांक 21.02.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री पाठक द्वारा उक्त पत्र के आलोक में अपना जवाब विभाग को समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। प्रस्तुत आरोप मलई बराज योजना के प्राक्कलन बोल्डर पीचिंग एवं मेटल फिल्टर कार्य मद का Finish Rate का प्रावधान नहीं कर आपूर्ति मद एवं श्रम मद को अलग-अलग पर का प्रावधान करते हुए प्राक्कलन का गठन एवं अग्रसारण किए जाने से संबंधित है। श्री पाठक को आंशिक प्रमाणित पाये जाने को निष्कर्षित किया गया है। उक्त आंशिक प्रमाणित आरोप के लिए आरोपित पदाधिकारी का बचाव बयान एवं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों से विदित होता है कि -

(i) वर्ष 1987-88 में इस योजना के परिमाण विपत्र में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (ii) वर्ष 1956-96 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है।

(iii) वर्ष 2009 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (iv) वर्ष 2012 में मुख्य अभियंता, डिहरी के रूपए 5825.00 लाख के तकनीकी अनुमोदित प्राक्कलन के आधार पर विभाग द्वारा उतनी ही राशि की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई। संबंधित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है।

उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि मलई बराज योजना के पूर्व के प्राक्कलनों में आपूर्ति एवं श्रम दर का प्रावधान अलग-अलग रहा है एवं तदनुसार ही वर्ष 2012 में गठित प्राक्कलनों के आधार पर विभाग से प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त हुई है। अतः यह माना जा सकता है कि आपूर्ति एवं श्रम दर के अलग-अलग प्रावधान पर मुख्य अभियंता एवं विभाग को कोई आपत्ति नहीं थी। उपरोक्त से आरोपित पदाधिकारियों के कथन की पुष्टि होना परिलक्षित होता है।

जाँच प्रतिवेदन कंडिका 6.1.0 में अंकित किया गया है कि आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है जो Current practice में नहीं है। उक्त के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि यह Current practice में है।44 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 विभागीय अनुसूचित दर में भी अलग-अलग प्रावधान है, जो प्राक्कलन गठन का मुख्य आधार होता है। उनके द्वारा साक्ष्य के रूप में संलग्नित प्राक्कलनों से स्पष्ट होता है कि मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ के अन्तर्गत वर्ष 2012 में आपूर्ति एवं श्रम मद के अलग-अलग प्रावधान के साथ तकनीकी अनुमोदन सक्षम प्राधिकार द्वारा किया गया है। जिसे यह माना जा सकता है कि वर्ष 2012 में अलग-अलग कार्य मद का प्रावधान रहा है।

जाँच प्रतिवेदन में अलग-अलग कार्यमद के प्रावधान से किस विभागीय मार्गदर्शन/निदेश का उल्लंघन हुआ है, स्पष्ट नहीं किया जाना परिलक्षित होता है। मात्र कहा गया है कि Current practice में नहीं है। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि विभागीय पत्रांक-2726, दिनांक 11.12.2010 से कटाव निरोधक/बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की निविदा फिनिश दर पर आमंत्रित किए जाने का निदेश है। परन्तु सिंचाई परियोजनाओं के लिए ऐसा कोई विभागीय निदेश/मार्गदर्शन नहीं मिलता है।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा मात्र पूर्व के गठित प्राक्कलन को वर्ष 2012 में अद्यतन अनुसूचित दर के आधार पर पुनरीक्षित किया गया है। श्री पाठक कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। अतएव अगल-अलग मद का प्रावधान कर संवेदक को लाभ पहुँचाने अथवा अतिरिक्त लाभ प्राप्त किए जाने की मंशा परिलक्षित नहीं होती है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पूर्व के प्रावधान के अनुरूप यथास्वरूप रखते हुए गठित प्राक्कलन (पुनरीक्षित प्राक्कलन) के तदनुरूप कार्यकारी प्राक्कलनों को तैयार करने की बाध्यता होती है। इसी के अनुरूप अलग-अलग आपूर्ति एवं श्रम मद का प्रावधान करते हुए आलोच्य कार्य का प्राक्कलन तैयार किया गया जिसे अनियमित माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव पूर्व के गठित प्राक्कलन एवं प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पुनरीक्षित प्राक्कलन जिस पर प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई है के अनुरूप कार्यकारी प्राक्कलन, जिसकी तकनीकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई, तैयार करने के लिए दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। चूँकि ये आरोपी पदाधिकारी कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। इस परिस्थिति में इनके द्वारा वित्तीय अनियमितता बरती जानी परिलक्षित नहीं होता है। अतएव श्री पाठक द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब स्वीकार योग्य प्रतीत होता है।

उक्त आरोप के लिए अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) से मंतव्य की मांग की गई। अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) द्वारा DPR प्रभावी के क्रम में कार्य मद में बदलाव न कर यथावत रखने की कार्रवाई की अनियमित कृत माने जाने का कोई कारण नहीं है।

इस प्रकार उपर्युक्त समीक्षा एवं अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) के मंतव्य के आलोक में श्री वेदाकान्त पाठक, तत0 अधीक्षण अभियंता (आई0डी0-1696) सोन नहर आधुनिकीकरण अंचल, डिहरी को उक्त आरोप से मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णय से श्री वेदाकान्त पाठक, तत0 अधीक्षण अभियंता (आई0डी0-1696) सोन नहर आधुनिकीकरण अंचल, डिहरी को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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14 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-01/2014-1311--श्री सूर्यदेव पाण्डेय, तत्कालीन सहायक अभियंता (आई0डी0-3436) सिंचाई प्रमंडल, नावानगर के पद पर पदस्थापित थे तो उनके विरूद्ध रोहतास (सासाराम) जिलान्तर्गत मलई बराज के निर्माण कार्य में अनियमितता बरते जाने का आरोप प्रतिवेदित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-474, दिनांक 18.02.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री पाण्डेय के विरूद्ध निम्न आरोप प्रतिवेदित किया गया - आरोप सं०-1 -मलई बराज योजना में Finish Rate पर बोल्डर पिचिंग/Stone metal filter को Supply and labour rate में तोड़कर प्राक्कलन (सं० SCMC-4701-04/2013-14) तैयार करने एवं अग्रसारण हेतु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 6.1.0, 6.3.0, 6.6.0 के आलोक में प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते हैं। जाँच के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-261, दिनांक 21.02.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री पाण्डेय द्वारा उक्त पत्र के आलोक में अपना जवाब विभाग को समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। प्रस्तुत आरोप मलई बराज योजना के प्राक्कलन बोल्डर पीचिंग एवं मेटल फिल्टर कार्य मद का Finish Rate का प्रावधान नहीं कर आपूर्ति मद एवं श्रम मद को अलग-अलग पर का प्रावधान करते हुए प्राक्कलन का गठन एवं अग्रसारण किए जाने से संबंधित है। श्री पाण्डेय को आंशिक प्रमाणित पाये जाने को निष्कर्षित किया गया है। उक्त आंशिक प्रमाणित आरोप के लिए आरोपित पदाधिकारी का बचाव बयान एवं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों से विदित होता है कि -

(i) वर्ष 1987-88 में इस योजना के परिमाण विपत्र में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है। (ii) वर्ष 1956-96 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है।

(iii) वर्ष 2009 में इस योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद को अलग-अलग रखा गया है।45 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 (iv) वर्ष 2012 में मुख्य अभियंता, डिहरी के रूपए 5825.00 लाख के तकनीकी अनुमोदित प्राक्कलन के आधार पर विभाग द्वारा उतनी ही राशि की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई। संबंधित प्राक्कलन में आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है।

उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि मलई बराज योजना के पूर्व के प्राक्कलनों में आपूर्ति एवं श्रम दर का प्रावधान अलग-अलग रहा है एवं तदनुसार ही वर्ष 2012 में गठित प्राक्कलनों के आधार पर विभाग से प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त हुई है। अतः यह माना जा सकता है कि आपूर्ति एवं श्रम दर के अलग-अलग प्रावधान पर मुख्य अभियंता एवं विभाग को कोई आपत्ति नहीं थी। उपरोक्त से आरोपित पदाधिकारियों के कथन की पुष्टि होना परिलक्षित होता है।

जाँच प्रतिवेदन कंडिका 6.1.0 में अंकित किया गया है कि आपूर्ति एवं श्रम मद का अलग-अलग प्रावधान है जो Current practice में नहीं है। उक्त के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि यह Current practice में है। विभागीय अनुसूचित दर में भी अलग-अलग प्रावधान है, जो प्राक्कलन गठन का मुख्य आधार होता है। उनके द्वारा साक्ष्य के रूप में संलग्नित प्राक्कलनों से स्पष्ट होता है कि मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ के अन्तर्गत वर्ष 2012 में आपूर्ति एवं श्रम मद के अलग-अलग प्रावधान के साथ तकनीकी अनुमोदन सक्षम प्राधिकार द्वारा किया गया है। जिसे यह माना जा सकता है कि वर्ष 2012 में अलग-अलग कार्य मद का प्रावधान रहा है।

जाँच प्रतिवेदन में अलग-अलग कार्यमद के प्रावधान से किस विभागीय मार्गदर्शन/निदेश का उल्लंघन हुआ है, स्पष्ट नहीं किया जाना परिलक्षित होता है। मात्र कहा गया है कि Current practice में नहीं है। आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि विभागीय पत्रांक-2726, दिनांक 11.12.2010 से कटाव निरोधक/बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की निविदा फिनिश दर पर आमंत्रित किए जाने का निदेश है। परन्तु सिंचाई परियोजनाओं के लिए ऐसा कोई विभागीय निदेश/मार्गदर्शन नहीं मिलता है।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा मात्र पूर्व के गठित प्राक्कलन को वर्ष 2012 में अद्यतन अनुसूचित दर के आधार पर पुनरीक्षित किया गया है। श्री ठाकुर कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। अतएव अगल-अलग मद का प्रावधान कर संवेदक को लाभ पहुँचाने अथवा अतिरिक्त लाभ प्राप्त किए जाने की मंशा परिलक्षित नहीं होती है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पूर्व के प्रावधान के अनुरूप यथास्वरूप रखते हुए गठित प्राक्कलन (पुनरीक्षित प्राक्कलन) के तदनुरूप कार्यकारी प्राक्कलनों को तैयार करने की बाध्यता होती है। इसी के अनुरूप अलग-अलग आपूर्ति एवं श्रम मद का प्रावधान करते हुए आलोच्य कार्य का प्राक्कलन तैयार किया गया जिसे अनियमित माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव पूर्व के गठित प्राक्कलन एवं प्रशासनिक स्वीकृति हेतु पुनरीक्षित प्राक्कलन जिस पर प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई है के अनुरूप कार्यकारी प्राक्कलन, जिसकी तकनीकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई, तैयार करने के लिए दोषी माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। चूँकि ये आरोपी पदाधिकारी कार्य के कार्यान्वयन में संलग्न नहीं रहे है। इस परिस्थिति में इनके द्वारा वित्तीय अनियमितता बरती जानी परिलक्षित नहीं होता है। अतएव श्री पाण्डेय द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब स्वीकार योग्य प्रतीत होता है।

उक्त आरोप के लिए अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) से मंतव्य की मांग की गई। अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) द्वारा DPR प्रभावी के क्रम में कार्य मद में बदलाव न कर यथावत रखने की कार्रवाई की अनियमित कृत माने जाने का कोई कारण नहीं है।

इस प्रकार उपर्युक्त समीक्षा एवं अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) के मंतव्य के आलोक में श्री सूर्यदेव पाण्डेय, तत0 सहायक अभियंता (आई0डी0-3436) सिंचाई प्रमंडल, नावानगर को उक्त आरोप से मुक्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णय से श्री सूर्यदेव पाण्डेय, तत0 सहायक अभियंता (आई0डी0-3436), सिंचाई प्रमंडल, नावानगर को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

------- 14 जून 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(भाग॰) 09-02/2017-1312--श्री चन्द्रशेखर प्रसाद (आई0डी0-3951) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमण्डल, शिवनारायणपुर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमण्डल, दरभंगा के विरूद्ध विभागीय उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर का अंतिम मापी लिए जाने के निदेश का लगभग एक वर्ष तक अनुपालन नहीं किए जाने, पुनर्निविदा में अप्रत्याशित विलम्ब, समयवृद्धि के प्रस्ताव को समय पर नही भेंजने आदि आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर विभगीय पत्रांक 1675 दिनांक 20.09. 2017 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया। उक्त के आलोक में श्री प्रसाद के पत्रांक 244 दिनांक- 27.11.2017 द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण में अंकित बिन्दु निम्नवत हैः-

1. मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के निदेश के अनुपालन में पत्रांक-735 दिनांक 19.12.2015 के द्वारा अवर प्रमण्डल पदाधिकारी-4, शिवनारायणपुर को अंतिम मापी लेकर विपत्र तैयार करने का निदेश दिया गया। साथ ही पत्रांक- 727 दिनांक 17.12.2015 से संवेदक को अंतिम मापी के समय उपस्थित रहने का निदेश दिया गया। कनीय अभियंता द्वारा अंतिम मापी लेकर समर्पित विपत्र में संवेदक का हस्ताक्षर नहीं पाया गया, जो नियमानुसार अनिवार्य है। इसकी सूचना46 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संवेदक को दिए जाने पर उनके द्वारा मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के पास लम्बित समयवृद्धि प्रस्ताव के निष्पादन के उपरांत ही मापी पुस्त पर हस्ताक्षर किए जाने की बात कही गई।

2. अवशेष कार्याे का पूर्ण प्राक्कलन लगभग एक वर्ष पश्चात भी तैयार नहीं करवाने के संबंध में उल्लेख किया गया है कि पत्रांक 735 दिनांक 19.12.2015 से अवर प्रमण्डल पदाधिकारी-4 को कासरी वितरणी के अवशेष कार्यों का प्राक्कलन 15 दिनों के अंदर समर्पित करने का निदेश दिया गया। तदनुसार 15 दिनों में प्राप्त प्राक्कलन की राशि 3 करोड़ अधिक होने के कारण अधीक्षण अभियंता को समर्पित किया गया जो उनके द्वारा मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर को भेजा गया। मुख्य अभियंता द्वारा जाँच कर राशि अधिक बतायी गयी एवं उनके स्तर से गठित असम्बद्ध कनीय अभियंता की टीम द्वारा प्रतिवेदित एवं पुनरीक्षित प्राक्कलन कार्यपालक अभियंता (आरोपित पदाधिकारी) को समर्पित किया गया। तदनुसार लीड चार्ट वगैरह तैयार कर पुनरीक्षित प्राक्कलन पत्रांक 246 दिनांक 24.07.2016 द्वारा अधीक्षण अभियंता/मुख्य अभियंता को समर्पित किया गया। तदोपरांत मुख्य अभियंता के निदेशानुसार निविदा आमंत्रण सूचना सं0- 01/16-17 प्रकाशित कराया गया। परन्तु अंतिम विपत्र पर संवेदक का हस्ताक्षर नहीं रहने के कारण मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा परिमाण विपत्र अनुमोदित नहीं होने पर निविदा रद्द किया गया। फलतः कासरी वितरणी का निविदा क्रियान्वित नहीं हो सका। 3. पुराने एकरारनामा को बंद करने के क्रम में संबंधित समय वृद्धि एक ही साथ न भेंजकर अनावश्यक रूप से विलम्ब किए जानेे के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अंकित किया गया है कि संबंधित समयवृद्धि प्रस्ताव उनके योगदान के पूर्व ही अधीक्षण अभियंता के माध्यम से मुख्य अभियंता को समर्पित था। मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के पत्रांक 1409 दिनांक 31.05.2016 द्वारा नए प्रपत्र में पूर्ण सूचना उपलब्ध कराने के निदेश के अनुपालन में पत्रांक 74 दिनांक 14.07.2016 द्वारा कासरी वितरणी के समयवृद्धि प्रस्ताव को उच्चाधिकारियों को भेजा गया।

4. पुराने एकरारनामा को बंद कर अवशेष कार्यों के पुनर्निविदा के लिए मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के निदेशों का अनुपालन नही करने के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता द्वारा सर्वप्रथम कासरी वितरणी का निविदा प्रकाशित करने का निदेश दिया गया। कासरी वितरणी का पत्रांक 246 दिनांक 24.07. 2016 द्वारा समर्पित पुनर्निविदा प्रस्ताव के क्रम में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा परिमाण विपत्र अनुमोदित नहीं करने के कारण निविदा सूचना रद्द करना पड़ा। दिनांक 21.11.2016 को प्रधान सचिव द्वारा आहूत समीक्षात्मक बैठक में दिए गए निदेश के अनुपालन में पत्रांक 299 दिनांक 06.12.2016 द्वारा अवर प्रमण्डल पदाधिकारी शिवनारायणपुर को निदेशित किया गया। परन्तु उनके द्वारा कार्य में शिथिलता बरतने पर वेतन अवरूद्ध करने की चेतावनी की सूचना पत्रांक 349 दिनांक 21.12.2016 द्वारा देते हुए अधीक्षण अभियंता एवं मुख्य अभियंता को भी सूचित किया गया। हरिश्चन्द्रपुर वितरणी का अंतिम विपत्र तैयार करने हेतु पत्रांक 735 दिनांक 19.12.2015 के द्वारा एक टीम गठित किया गया एवं संवेदक को भी उपस्थित रहने एवं मापी पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने हेतु पत्रांक 244 दिनांक 12.11.2016, पत्रांक 271 दिनांक 26.11.2016 एवं पत्रांक 301 दिनांक- 06.12.2016 द्वारा स्मारित किया गया एवं पत्रांक 347 दिनांक 21.12. 2016 द्वारा प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से अंतिम रूप से निदेशित किया गया। कनीय अभियंता एवं अवर प्रमण्डल पदाधिकारी द्वारा हरिश्चन्द्रपुर वितरणी में गैर जिम्मेदराना हरकत किया गया और लेवल लेकर लेवल बुक खो दिया गया तथा कार्यपालक अभियंता को अंतिम विपत्र तैयार होने को कहकर बहकावें में रखा गया। श्री प्रसाद द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण की सम्यक समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा के क्रम में निम्न तथ्य पाए गएः-

1. आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 22.12.2015 को संवेदक को अंतिम मापी के समय उपस्थित रहने का निदेश दिया गया। दिनांक 21.01.2016 को कासरी वितरणी का अंतित विपत्र प्राप्त हो जाने को सूचित किया गया। दिनांक 15.10. 2016 को शाखा नहर एवं कासरी वितरणी के अंतिम मापी पर संवेदक को हस्ताक्षर करने के लिए सम्पर्क करने हेतु सूचित किया गया। पुनः दिनांक 06.12.2016 को शाखा नहर का दिनांक 10.12.2016 को संयुक्त अंतिम मापी के समय संवेदक को उपस्थित रहने हेतु निदेशित किया गया। उक्त दोनों पत्र दिनांक 15.10.2016 एवं 06.12.2016 से संवेदक को की गई सूचना विरोधाभाषी प्रतीत होता है। उपर्युक्त तथ्यों एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका- 4.0.0 एवं 5.1.0 के विभिन्न उपकंडिकाओं में उल्लिखित तथ्यों से मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग,भागलपुर के अंतिम मापी लिए जाने के निदेश का लगभग एक वर्ष तक अनुपालन नहीं किए जाने, मापी के संदर्भ में गलत सूचना देने एवं मापी की अद्यतन जानकारी नहीं रखना परिलक्षित होता है। 2. दिनांक- 12.12.2015 को राज्यस्तरीय बैठक में बटेश्वर गंगा पम्प नहर योजना के पुराने एकरारनामा की अंतिम मापी लेकर अवशेष कार्य का पुनर्निविदा कर पूरा करने के निदेश की सूचना मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के पत्रांक 01 दिनांक 04.01.2016 द्वारा आरोपित कार्यपालक अभियंता को दी गई। बचाव बयान में उल्लिखित उनके पत्रांक 735 दिनांक 19.12.2015 द्वारा अंतिम विपत्र तैयार करने का निदेश दिया गया है, न कि अवशेष कार्य का प्राक्कलन तैयार करने का। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव बयान में मात्र कासरी वितरणी का प्राक्कलन समर्पित किए जाने एवं निदेशानुसार सुधारोपरांत अपने पत्रांक 246 दिनांक 24.07.2016 द्वारा प्राक्कलन समर्पित करने का उल्लेख किया गया है। जाँच प्रतिवेदन कंडिका- 4.1.1 से 4.1.9 में अंकित तथ्यों से विदित होता है कि दिनांक 25.01.2016 को भी मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा अवशेष कार्यों का निविदा आमंत्रित करने का निदेश दिया गया एवं अलग-अलग पत्राें से दिनांक 01.04.2016, 22.04.2016, 27.04.2016, 31.05.2016 एवं दिनांक 27.09.2016 को कासरी वितरणी के अवशेष कार्यों का पुनरीक्षित प्राक्कलन में निदेशानुसार संशोधित किए जाने तथा शेष वितरणियों का वांछित प्राक्कलन उपलब्ध कराने का निदेश दिया गया। तदोपरांत आरोपित पदाधिकारी के पत्रांक 166 दिनांक 11.09.2016 द्वारा अधीक्षण अभियंता को कासरी वितरणी का प्राक्कलन उपलब्ध कराया गया है।47 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 जहाँ तक अन्य वितरणी यथा शाखा नहर II, हरिश्चन्द्र वितरणी की स्थिति है, उपलब्ध अभिलेख एवं जाँच प्रतिवेदन से विदित होता है। कि आरोपित कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक 253 दिनांक 05.05.2016 से अवर प्रमण्डल पदाधिकारी-2 एवं अन्य पाँच कनीय अभियंताओं की टीम शाखा नहर- II के अवशेष कार्यों के प्राक्कलन तैयार करने हेतु गठित की गई, जबकि दिसम्बर 2015 में ही पुनर्निविदा करने हेतु निदेश है। उनके पत्रांक 299 दिनांक 6.12.2016 से अवर प्रमण्डल पदाधिकारी को शाखा नहर के वि0दू0 8.20 से 30.00 के अवशेष कार्यों के प्राक्कलन के लिए आउटसोर्सिंग से कम्प्यूटरराइज्ड ग्राफ तैयार कर मिट्टी की गणना करने का निदेश दिया गया एवं दिनांक 21.12.2016 को अवर प्रमण्डल पदाधिकारी को निदेशित किया गया। पुनः आरोपित पदाधिकारी द्वारा आपने पत्रांक 26 दिनांक 16.01.2017 से कासरी वितरणी, हरिश्चंद्रपुर वितरणी एवं शाखा नहर का प्राक्कलन एक सप्ताह के अंदर उपलब्ध कराने का निदेश अवर प्रमण्डल पदाधिकारी, शिवनारायणपुर को दिया गया। जाँच प्रतिवेदन कंडिका 4.0.0 एवं 5.2.0 के विभिन्न उप कंडिकाओं में अंकित विभिन्न पत्राचारों एवं समीक्षा से आरोपी कार्यपालक अभियंता द्वारा मुख्य अभियंता एवं विभागीय निदेश के बावजूद अपने अधीनस्थों के सहयोग एवं अपने मार्ग दर्शन में प्रभावी एवं कालबद्ध तरीके से अवशेष कार्यों का पुनरीक्षित प्राक्कलन लगभग एक वर्ष बाद भी तैयार नहीं करवाया जाना परिलक्षित होता है, जो पुनर्निविदा में अप्रत्याशित विलम्ब का कारण हुआ। 3. प्रस्तुत आरोप पुराने एकरारनामा को बंद करने के क्रम में समयवृ़द्धि प्रस्ताव एक ही साथ जनवरी 2016 में नहीं भेजकर अनावश्यक विलम्ब किये जाने सें संबंधित है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा उनके योगदान दिनांक- 15.07.15 के पूर्व पूर्ववर्ती द्वारा समयवृद्धि प्रस्ताव मुख्य अभियंता, भागलपुर को समर्पित किये जाने को प्रतिवेदित किया गया है। इस संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी द्वारा साक्ष्य संलग्न नहीं किये जाने एवं जाँच प्रतिवेदन में तत्संबंधी उल्लेख/साक्ष्य नहीं रहने से उनके बयान की सत्यता स्थापित करना संभव प्रतीत नहीं होता है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा मुख्य अभियंता, भागलपुर के पत्रांक-1409 दिनांक- 31.05.2016 से नये प्रपत्र में पूर्ण सूचना उपलब्ध कराने के निदेश के क्रम में जुलाई- 16 में अलग-अलग पत्रों से शाखा नहर एवं कासरी वितरणी का समयवृद्धि प्रस्ताव समर्पित करने को प्रतिवेदित किया गया है। जाँच प्रतिवेदन में उक्त संदर्भित पत्र दिनांक- 31.05.2016 का उल्लेख अथवा आरोपित पदाधिकारी साक्ष्य के रूप में संलग्न होना परिलक्षित नहीं होता है जिससे उक्त संदर्भित पत्र में बयान के अनुरूप अथवा समयवृद्धि प्रस्ताव समर्पित करने का निदेश होने को स्थापित करना संभव प्रतीत नहीं होता है। परन्तु आरोपित पदाधिकारी का पत्रांक- 40 दिनांक- 21.01.2016, जिसका उल्लेख जाँच प्रतिवेदन कंडिका 4.2.3 में किया गया है, में कासरी वितरणी का समयवृद्धि प्रस्ताव मुख्य अभियंता, भागलपुर में लम्बित होने का उल्लेख मिलता है। जबकि शाखा नहर II का समयवृद्धि प्रस्ताव आरोपित पदाधिकारी का पत्रांक- 74 दिनांक- 14.07.2016 से अधीक्षण अभियंता को उपलब्ध कराने एवं अधीक्षण अभियंता के पत्रांक- 657 दिनांक- 03.12.2016 से मुख्य अभियंता को उपलब्ध होना परिलक्षित होता है जिसके संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता के पत्रांक -1409 दिनांक- 31.05.2016 के क्रम में पूर्व समर्पित समयवृद्धि प्रस्ताव को नये प्रपत्र में समर्पित किया गया है। उक्त पत्र दिनांक- 31.05.2016 की अनुपलब्धता की स्थिति में समयवृद्धि प्रस्ताव पूर्व में समर्पित होना स्थापित करना संभव प्रतीत नहीं होता है। उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा आरोपित पदाधिकारी के उपरोक्त उल्लिखित पत्रांक-40 दिनांक- 21.01.2016 एवं पत्रांक- 74 दिनांक- 14.07.2016 के आलोक में समयवृद्धि प्रस्ताव एक ही समय जनवरी 2016 में नहीं भेजने के लिए आरोपित पदाधिकारी को उत्तरदायी माना गया है। 4. प्रस्तुत आरोप गंगा पम्प नहर परियोजना के अन्तर्गत वितरणी प्रणाली के पुराने एकरारनामा के तहत कार्यों का अंतिम मापी लेकर एकरारनामा बंद कर अवशेष कार्याें के पुनर्निविदा के लिए मुख्य अभियंता, भागलपुर के निदेशों का अनुपालन नहीं किये जाने से संबंधित है। उपरोक्त के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता, भागलपुर के कासरी वितरणी का पहले निविदा प्रकाशित कराने के निदेश के अनुपालन में पत्रांक- 246 दिनांक-24.07.2016 से पुनर्निविदा प्रस्ताव मुख्य अभियंता द्वारा परिमाण विपत्र अनुमोदित नहीं किये जाने के कारण रदद्‌ करना पड़ा। साथ ही यह भी कहना है कि दिनांक- 21.11. 2016 के समीक्षात्मक बैठक में 10 दिनों के अंदर निविदा प्रकाशित करने के निदेश के अनुपालन में पत्रांक- 299 दिनांक- 06.12.2016 से अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शिवनारायणपुर को निदेशित किया गया एवं पत्रांक-735 दिनांक- 19.12.2015 से सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता की एक टीम गठित की गयी। संवेदक को उपस्थित रहने हेतु कई स्मार एवं प्रेस विज्ञप्ति से सूचित किया गया। परन्तु अवर प्रमंडल पदाधिकारी एवं कनीय के लेवल बुक खो दिये जाने जैसे गैर जिम्मेदाराना हरकत करते हुए विपत्र तैयार करने को कहकर बहकावे में रखा गया। आरोप विन्दु 1 एवं 2 से स्पष्ट है कि मुख्य अभियंता, भागलपुर एवं विभागीय निदेश के बावजूद पुराने एकरारनामा को बंद करने के लिए अंतिम मापी लेने एवं तद्‌दोपरान्त अवशेष कार्यों का प्राक्कलन ससमय तैयार नहीं करने के लिए उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा आरोपित पदाधिकारी को उत्तरदायी माना गया है। प्राक्कलन ससमय तैयार नहीं होना ही निविदा प्रकाशन में अप्रत्याशित विलम्ब का कारक माना जा सकता है। उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा उक्त के आलोक में पुनर्निविदा के क्रम में मुख्य अभियंता, भागलपुर के दिये निदेश का अनुपालन आरोपित पदाधिकारी द्वारा नहीं किये जाने को पाया गया है। इस प्रकार श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमंंंंंंंंंंंडल, शिवनारायणपुर के विरूद्ध उड़नदस्ता के द्वारा किये गये जाँच एवं श्री प्रसाद से प्राप्त स्पष्टीकरण के समीक्षोपरांत श्री प्रसाद को मुख्य अभियंता,48 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 भागलपुर के अंतिम मापी लिये जाने का निदेश का लगभग एक वर्ष तक अनुपालन नहीं किया जाना, मापी की अद्यतन जानकारी नहीं रखने तथा पुनर्निविदा में अप्रत्याशित विलंब, समय वृद्धि के प्रस्ताव को समय पर नही भेंजने के लिए श्री प्रसाद दोषी है। अतएव उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के सम्यक समीक्षोपरांत श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमण्डल, शिवनारायणपुर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमण्डल, दरभंगा के विरूद्ध (i) संगत वर्ष 2015-16 तथा 2016-17 के लिए 'निंदन' (ii) दो वार्षिक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय सरकार के स्तर से लिया गया है। अतः सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमण्डल, शिवनारायणपुर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमण्डल, दरभंगा के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है। (i) संगत वर्ष 2015-16 तथा 2016-17 के लिए निन्दन। (ii) दो वार्षिक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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20 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)-03-13/2015-1374--सुश्री वन्दना सिन्हा, सहायक अभियंता (असैनिक) आई0डी0-5088, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-1, जल संसाधन विभाग, पटना के पद पर विभागीय अधिसूचना संख्या-377, दिनांक 15.09. 2008 के आलोक में 16.09.2008 को योगदान दियें और तब से दिनांक 13.09.2010 तक सुश्री सिन्हा द्वारा कार्यों का सम्पादन किया गया। तत्‌पश्चात दिनांक 13.09.2010 को 14.09.2010 से 17.09.2010 तक के लिए आकस्मिक अवकाश का आवेदन सुश्री सिन्हा द्वारा दिया गया। पुनः दिनांक 23.09.2010 को पारिवारिक कारणों की वजह से 20-25 दिनों तक के लिए अवकाश बढ़ाने के लिए आवेदन दिया गया। समय-समय पर निम्न तिथियों दिनांक 20.10.2010, दिनांक 02.11.2010 (डाक से), दिनांक 06.12.2010 में हस्ताक्षरित आवेदन दिया गया। तदोपरांत पत्रांक-216, दिनांक 17.03.2011 के द्वारा उपस्थित होकर सम्पत्ति का ब्योरा समर्पित करने का निदेश दिया गया था परन्तु कोई पत्र प्राप्त नहीं हुआ। पुनः दिनांक 08.04.2011 को अवकाश के संदर्भ में आवेदन प्राप्त हुआ। इस कार्यालय के पत्रांक-1049, दिनांक 21.12.2011 द्वारा सम्पत्ति का ब्योरा नहीं समर्पित करने के चलते कार्यालय में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण समर्पित करने के लिए निदेशित किया गया। तत्‌पश्चात सुश्री सिन्हा के पिताजी द्वारा दिनांक 02.01.2012 को बिना साक्ष्य के तबियत खराब होने की सूचना के कारण दो-तीन माह के बीच योगदान देने की बात कही गई थी। इसके बाद सुश्री सिन्हा द्वारा किसी कार्रवाई की सूचना नहीं दी गई, जबकि पत्रांक-644, दिनांक 01.08.2014 द्वारा सुश्री सिन्हा के स्थाई पते पर निबंधित डाक से सूचना भेजी गई। 2. पुनः दिनांक 05.11.2014 को समाचार पत्र ( हिन्दी समाचार पत्र-हिन्दुस्तान, सहारा एवं टाईम्स ऑफ इंडिया ) के माध्यम से एक सप्ताह के अन्दर योगदान करने हेतु सूचना दी गई, परन्तु एक माह के बाद नई दिल्ली के पते से दिनांक 08. 12.2014 को हस्ताक्षरित पत्र डाक के माध्यम से दिनांक 16.12.2014 को कार्यालय में प्राप्त हुआ, जिसमें आपके द्वारा निश्चित तिथि के बजाय एक-दो माह के अन्दर योगदान किए जाने की बात कही गई। परन्तु दो माह के अवधि बीत जाने के उपरांत योगदान नहीं किया गया। पुनः माह जनवरी, 2015 एवं अप्रैल, 2015 को स्मारित किया गया। 3. इस प्रकार दिनांक 14.09.2010 से लगातार अबतक कार्य से स्वेच्छा से अनधिकृत रूप से अनुपस्थिति सरकारी पदाधिकारी के आचरण के प्रतिकूल है। 4. अतएव विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1102, दिनांक 14.06.2016 द्वारा दिनांक 14.09.2010 से लगातार अबतक कार्य से स्वेच्छा से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने का आरोप प्रतिवेदित करते हुए सुश्री वन्दना सिन्हा, सहायक अभियंता के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में समर्पित जाँच प्रतिवेदन में यह उल्लेखित किया गया कि सुश्री सिन्हा एक बार भी सुनवाई में उपस्थित नहीं हुई। सुश्री सिन्हा के द्वारा विभाग को समर्पित त्याग पत्र के संदर्भ में विभाग द्वारा पत्रांक-854, दिनांक 08.09.2016 एवं पत्रांक-357, दिनांक 03.03.2017 द्वारा सम्पुष्टि पत्र की मांग की गई। जो अबतक अप्राप्त रहा है।

5. संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में सुश्री सिन्हा के विरूद्ध लम्बी अवधि से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने, कर्त्तव्यहीनता एवं सरकारी कार्यों के प्रति उदासीनता का आरोप प्रमाणित पाया गया। जाँच प्रतिवेदन के विभागीय स्तर पर समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत रहते हुए प्रमाणित आरोप के लिए सुश्री सिन्हा से विभागीय पत्रांक-1025, दिनांक 23.06.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। जवाब अप्राप्त रहने की स्थिति में सुश्री सिन्हा को विभागीय पत्रांक-1279, दिनांक 09.08.2017 एवं पत्रांक-1472, दिनांक 28.08.2017 द्वारा स्मारित किया गया। फिर भी सुश्री सिन्हा से द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब अप्राप्त रहा है।

6. सुश्री सिन्हा लगभग सात वर्षों से अपने कार्यों से अनुपस्थित रही है। सूचना दिए जाने के बावजूद उनके द्वारा कोई जवाब नहीं दिया गया है। स्पष्ट है कि सुश्री वन्दना सिन्हा, सहायक अभियंता, कर्त्तव्यहीन और सरकारी कार्यों के प्रति उदासीन हैं। अतः सुश्री वन्दना सिन्हा, सहायक अभियंता के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही सहित पूर्ण प्रक्रिया का पालन करते हुए निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है :-

सेवाच्युति (Removal from Service)49 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 7. उक्त प्रस्ताव में मंत्रिपरिषद की स्वीकृति प्राप्त है। 8. उक्त प्रस्ताव में बिहार लोक सेवा आयोग के पत्रांक-2656, दिनांक 01.02.18 द्वारा सहमति प्रदान की गई है। अतः सुश्री वन्दना सिन्हा, सहायक अभियंता (असैनिक) आई0डी0-5088, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-1, जल संसाधन विभाग, पटना को सेवाच्युति (Removal from Service) का दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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27 जून 2018

सं॰ 22/नि0सि0(दर0)-16-03/2017-1413--मो॰ कलीमुल्लाह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (ID-3488) स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल-2, झंझारपुर द्वारा अपने उक्त पदस्थापन काल में बरती गयी कतिपय अनियमितता के संबंध में जिलाधिकारी, मधुबनी का पत्रांक 388 दिनांक 02.05.15 द्वारा समर्पित आरोप पत्र प्रपत्र 'क' के आलोक में योजना एवं विकास विभाग की अधिसूचना सं॰-4628 दि॰ 09.09.15 द्वारा निलंबित किया गया। तदोपरान्त योजना एवं विकास विभाग के अधिसूचना सं॰-4627 दिनांक 09.09.15 द्वारा मो॰ कलीमुल्लाह के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। आरोप निम्नवत्‌ है -

आरोप सं०-1ः- राष्ट्रीय सम विकास योजना के अंतर्गत आवंटित राशि का डी0सी विपत्र विहित प्रपत्र में तैयार करने हेतु कार्य0 अभि0 को निदेश दिया गया था। उक्त राशि कार्य0 अभि0 को वर्ष 2013 में उपलब्ध कराया गया था, जबकि वित्त विभाग द्वारा शीर्ष स्थानांतरण संबंधी आदेश दि0 16.09.14 को जारी हुआ। इस प्रकार कार्य0 अभि0 द्वारा एक वर्ष तक उक्त राशि का व्यय नहींं किया गया, जिसके फलस्वरूप निर्धारित समय पर डी0सी विपत्र जमा नहींं किया जा सका तथा योजनाओं को ससमय पूर्ण होने में बाधा उत्पन्न हुआ। आरोप सं०-2ः- जिला पदाधिकारी मधुबनी द्वारा सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 2013-14 की दो योजना के संबंध में प्रतिवेदित किया गया कि आपके द्वारा उक्त योजना का प्राक्कलन दि0-17.7.14 को तकनीकी अनुमोदन हेतु भेजा गया था, अधीक्षण अभियंता द्वारा त्रुटि इंगित करते हुए प्राक्कलन पुनः वापस किया गया। पुनः त्रुटि निराकरण के पश्चात आपके द्वारा दि0-06.12.14 को प्राक्कलन भेजा गया। उक्त योजन की प्रशासनिक स्वीकृति के उपरांत अभिलेख आपके कार्यालय को दि0 8.4.15 को मिला। इस प्रकार लगभग 9 माह तक का समय योजना तैयार करने से प्रशासनिक स्वीकृति तक लगा। उक्त दोनो योजनाओं में से एक योजना को रद्‌द किया गया तथा दुसरी योजना का कार्य को एकरारनामा की प्रक्रिया में बताया गया है। इस प्रकार आपकी लापरवाही के कारण योजना का कार्य में अनावश्यक विलंब हुआ तथा इस दरम्यान प्राक्कलित राशि में संभावित बढ़ोतरी के कारण सरकारी राजस्व का अपव्यय हुआ जो आपकी नाकारात्मक अभिरूचि को दर्शाता है। आरोप सं०-3ः- आप जिला स्तर पर आयोजित दि0-09.02.15, 12.03.15, 23.03.15, 13.04.15, 18.05.15, 25. 05.15, 08.06.15, एवं 13.07.15 को विभागीय बैठको में बिना पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहे हे। साथ ही प्रधान सचिव, योजना एवं विकास विभाग के दि0-28.04.15 को मधुबनी भ्रमण के क्रम में भी बिना सक्षम स्तर से स्वीकृति के आप मुख्यालय से अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित पाये गये है। आपके द्वारा कहना है कि आप मुख्यालय में थे परन्तु भ्रमण की सूचना आपको नहींं थी। इस संबंध में जिला पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित किया गया कि प्रधान सचिव, योजना एवं विकास विभाग के मधुबनी भ्रमण की आवश्यक जानकारी होती। यदि आप उक्त तिथि को कार्य क्षेत्र के दौरा पर थे, तो आपके द्वारा उक्त तिथि को कौन-कौन सा विभागीय क्षेत्रिय कार्य किया गया है संदर्भित कोई साक्ष्य नहींं दिया गया। आरोप सं०-4ः- राजनगर विधान सभा क्षेत्र के अंतर्गत स्वीकृत की गयी योजनाओं को संवेदक द्वारा ससमय कार्य प्रारंभ नहींं करने के कारण आपके द्वारा पत्रांक-589 दि0-2703.15 जो सीधे श्री राम लखन राम रमण, माननीय मंत्री, खान एवं भूतत्व विभाग को संबोधित है। द्वारा पाँच योजनाओं की स्वीकृत्यादेश को निरस्त कर दिया गया है, जबकि इसके लिये आप प्राधिकृत नहींं है। अपनी सक्षमता से बाहर जाकर योजनाओं को रद्‌द करने का यह कृत आपकी अकुशलता एवं कार्य में अनियमितता का परिचायक है। आरोप सं०-5ः- श्रीमति गुलजार देवी माननीय स0वि0स0, फुलपरास, मधुबनी की अनुशंसा पर कार्यान्वित योजना सिसवा बरही में हरगोरिया में तालाब में घाट निर्माण योजना की मापी का कार्य मनरेगा के नियोजित कनीय अभि0 से करायी गयी, जिसका सत्यापन सहा0 अभि0 द्वारा नहींं किया गया। जिसके कारण योजना की गुणवत्ता संदिग्ध है। विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। जिसमें सभी आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत योजना एवं विकास विभाग के पत्रांक-3815 दिनांक 28. 07.2016 द्वारा मो0 कलीमुल्लाह से द्वितीय कारण पृच्छा किया गया। मो0 कलीमुल्लाह से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब का मुख्य अंश निम्नवत है - आरोप सं0-1 राष्ट्रीय समविकास योजना में 15 योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु जिला योजना पदाधिकारी मधुबनी के द्वारा दि0-31.07.13 को चार एवं दि0-29.09.13 को ग्यारह योजना की प्रशासनिक स्वीकृति दी हुई। तथा दि0-21.09.13 से 20.03. 14 तक में कुल 15345300/- की प्रथम किस्त की राशि प्राप्त हुई। जिसमें से 4 योजना का कार्य मार्च 14 एवं शेष योजना50 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 का कार्य दिसम्बर 14 तक पूरा करा लिया गया। द्वितीय किस्त की राशि दि0-22.03.15 को तथा एक अन्य योजना की राशि जुलाई 14 तथा एक योजना का द्वितीय किस्त मार्च 16 में प्राप्त हुई। कुल व्यय वर्ष 2013-14 में 1,11,19500/- हुआ तथा वर्ष 2014-15 में रू0-205.386 लाख हुआ। व्यय शीर्ष बदलने से सितम्बर 2014 से ही खर्च का भाउचर कोषागार से नहीं मिलने के कारण डी0सी0 बिल मार्च 2015 तक जमा नहींं हो सका दि0-23.03.15 को व्यय शीर्ष, ठीक होने पर अप्रैल 2015 में जमा हो सका। सभी योजनाओं में से एक योजना छोड़कर शेष योजना का कार्य सितम्बर 2014 में पूरा करा लिया गया था। एक योजना भूमि विवाद के कारण बाधित हो गया। लेकिन द्वितीय किस्त की राशि विलंब से प्राप्त होने के कारण पूरी राशि खर्च नहीं हो सका। प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी भी मेरे जवाब से सहमत है। आरोप सं0-2 :- वर्ष 2013-14 में सीमा क्षेत्र विकास योजना का प्राक्कलन दि0-17.07.14 को अंचल कार्यालय में भेजा गया तथा तकनीकी अनुमोदन के पश्चात दि0-10.01.15 के बाद प्राप्त किया गया। उक्त अवधि में प्राक्कलन सुधार हेतु लौटायी गयी तथा सुधार कर बिना Forwarding अंचल कार्यालय में समर्पित किया गया अतएव प्राक्कलन लौटाने एवं समर्पित करने का तिथिवार प्रतिवेदन देना संभव नहींं है। आरोप पत्र में वर्ष 2013-14 के प्राक्कलन संशोधन कर लौटाने की तिथि-06.02.14 अंकित की गयी है यह वर्ष 2014-15 की योजना की तिथि है। उल्लेखनीय है कि 50000/- से अधिक की योजना के कागजात के निस्तार में विलंब अधी0 अभि0 के कार्यालय से हुआ है। उसी तरह से प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति में अंचल कार्यालय से विलंब हुआ है। वर्ष 2014-15 के दो योजनाओं के कार्यान्वयन में विलंब होने के संदर्भ में कहा गया है कि उक्त दो योजना में से एक योजना का कार्य ग्रामीण विभाग द्वारा करा दिया गया है। शेष एक योजना की निविदा के तुल्यनात्मक विवरणी प्रमंडल के पत्रांक-828 दि0-19.05.15 से अंचल कार्यालय में भेजा गया था। तथा अंचल कार्यालय द्वारा निविदा कागजात दि0-08. 06.15 को लौटाया गया। तत्पश्चात दि0-24.06.15 को कार्य प्रारंभ करने का आदेश दिया गया तथा दि0-21.07.15 को एकरारनामा किया गया तथा ससमय कार्य पूर्ण करा लिया गया। जिसका प्रगति प्रतिवेदन प्रति माह जिला योजना पदाधिकारी मधुबनी को दी गयी थी। अतः कार्य कुशलता एवं तत्परता का ज्वलंत उदाहरण मेरे प्रतिवेदन से सीमा विकास क्षेत्र के 89 प्रतिशत योजना/पंचायत सरकार के 90 प्रतिशत योजना/कब्रिस्तान घेराबंदी के 95% योजना कराया जाना दर्शाता है इस प्रकार योजना के कार्यान्वयन में कोई विलंब नहीं किया गया है तथा कार्याें को तत्परता एवं ससमय संपन्न कराया गया है। आरोप सं0-3 :- आरोपी द्वारा कहा गया है कि मधुबनी से कार्यालय 55Km तथा कार्यक्षेत्र 75km आगे पड़ता है। दि0-09. 02.15, 12.03.15, 23.03.15, 13.04.15, 18.05.15 एवं 10.07.14 की बैठक की कोई सूचना नहींं दी गयी है। इसी तरह प्रधान सचिव के दि0-28.04.15 को मधुबनी भ्रमण की सूचना नहींं रहने के फलस्वरूप मैं लोकहा विधान सभाक्षेत्र में चल रहे सीमा क्षेत्र विकास योजना एवं पंचायत भवन योजना का निरीक्षण हेतु चला गया था। जिसे वहॉ के स्थल पंजी से देखा जा सकता है। यह क्षेत्र नेपाल के सीमा क्षेत्र है एवं वहाँ भारतीय फोन कार्य नहींं करता है। जिसके कारण सूचना नहीं मिल सका। लौटने के बाद सूचना मिलते ही दूसरे दिन सुबह उपस्थित रहा। अगर सचिव महोदय की आने की सूचना ससमय हो जाती तो निश्चित रूप से मुलाकात करता जिला पदाधिकारी द्वारा तथा कथित तिथियों के संबंध में कभी भी पत्राचार नहीं किया गया और न ही स्पष्टीकरण पुछा गया। आरोप सं0-4 वर्ष 2012-13 के योजनाओं का कार्य संवेदक द्वारा काफी समय तक प्रारंभ नहींं किया गया। जिसके लिये निबंधित डाक से कार्य प्रारंभ करने का स्मार दिया गया। किन्तु उनके द्वारा कार्य प्रारंभ नहींं करने तथा माननीय मंत्री से बार-बार दबाव दिये जाने पर एकरारनामा को रद्‌द कर दिया गया। न की योजनाओं को रद्‌द किया गया। भूलवश एकरारनामा के बदले योजना को रद्‌द करना अंकित हो गया है। आरोपी अपने पुरक बचाव बयान में अंकित किया है कि संवेदक द्वारा लगभग तीन वर्ष तक कार्य प्रारम्भ नहींं करने के कारण उनका एकरारनामा रद्‌द करते हुए अग्रधन एवं जमानत की राशि जप्त की गयी। इन योजनाओं को वर्ष 2016-17 में वर्त्तमान कार्यपालक अभियंता द्वारा विभागीय रूप से पुराने स्वीकृत दर पर ही पूरा कराया गया (कार्यादेश की प्रति संलग्न) उल्लेखनीय है कि उनके उक्त निर्णय से सरकार को निम्न वित्तीय लाभ हुआ। (क) एकरारनामा रद्‌द करने के कारण सरकार को जब्त राशि का लाभ। (ख) विभागीय रूप से वर्ष 2012-13 के तकनीकी/प्रशासनिक स्वीकृत दर पर कार्य कराने से Contractor Profit की भी बचत हुई है। आरोप सं0-5 मार्च माह में संबंधित कनीय अभि0 के व्यस्तता के कारण उसी विधान सभा क्षेत्र के अंतर्गत पड़ने वाले मनरेगा के कनीय अभि0 द्वारा मापीपुस्त अंकित की गई एवं संबंधित सहा0 अभि0 का स्थल जाँचाेंपरान्त भुगतान किया गया है। इसमें किसी तरह का संदेहास्पद कार्य नहींं कराया गया है एवं मुझे आरोप मुक्त करने की कृपा की जाय। मो0 कलीमुल्लाह द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा की गई जो निम्नवत है - आरोप सं0-1 जो वर्ष 2013 के राष्ट्रीय समविकास योजना के अंतर्गत आवंटित राशि का व्यय नहीं करने तथा उक्त राशि का डी0सी0 विपत्र समर्पित नहीं करने तथा योजनाओं को ससमय पूर्ण नहींं कराने से संबंधित है। आरोपी द्वारा कहा गया है कि वर्ष 2013 में कुल 15 योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु दि0-29.09.13 से 20.0314 तक में प्रथम किस्त के रूप में कुल 15345300/- रूपये की राशि उपलब्ध करायी गयी थी, के विरूद्ध वर्ष 2013-14 में कुल व्यय-11119500/- रूपये बताया गया है। डी0सी0 विपत्र विलंब से समर्पित करने के संदर्भ में कहा गया हे कि व्यय शीर्ष सितम्बर 2014 से बदलने के कारण खर्च एवं कोषागार से भाउचर नहीं मिलने के फलस्वरूप मार्च 2015 तक डी0सी0 बिल जमा नहीं हो सका। व्यय शीर्ष ठीक होने के पश्चात अप्रैल 2015 में डी0सी0 बिल जमा हुआ।51 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संचालन पदाधिकारी के द्वारा संबंधित व्यय शीर्ष माह सितम्बर 2014 में बदला है जबकि वर्ष 13 में राशि उपलब्ध करायी गयी थी। स्पष्टतः एक वर्ष तक राशि का कोई व्यय नहीं किया गया। इससे योजना को ससमय पूर्ण होने में कार्य बाधित हुआ। इस संबंध में जिला पदाधिकारी मधुबनी द्वारा कई पत्रों के माध्यम से स्मारित भी किया गया था। के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। जिला पदाधिकारी के पत्रांक-120 दि0-03.02.14 से स्पष्ट होता है कि दि0-31.07.13 से 23.09.13 तक में स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्र0-2 झंझारपुर को कुल-198.42 लाख का आवंटन राष्ट्रीय समविकास योजना के अंतर्गत वर्ष 2013-14 में कार्यान्वयन हेतु उपलब्ध कराया गया है। आरोपी द्वारा कहा गया है कि इन योजनाओं में वर्ष 2013-14 में कुल-11119500/- रूपये का व्यय किया गया हें जबकि डी0सी0 बिल (जो अप्रैल 2015 में समर्पित किया गया है) से स्पष्ट होता है कि वर्ष 2013-14 में दि0-20.08.13, 28.08.13 एवं 01.10.13 को कुल-2669800/-रू0 2669800/- एवं 2274400/- कुल रू0-76.14 लाख का व्यय दिखाया गया है। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी का मंतव्य कि एक वर्ष तक राशि का व्यय नहीं किया गया। उचित प्रतित नहीं होता है। परन्तु पत्राें से स्पष्ट होता है कि व्यय शीर्ष को बदलाव की तिथि सितम्बर-2014 के पूर्व दि0-01.11.13 से 24.07.14 के बीच डी0सी0 बिल के लिये कई स्मार पत्र दिये गये है। फिर भी आदेश के अवहेलना करते हुए डी॰सी॰ विपत्र जमा नहींं किया गया। अतएवं डी0सी0 विपत्र ससमय समर्पित करने में इनका स्पष्ट रूप से लापरवाही परिलक्षित होता है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। आरोप सं0-2 जो वर्ष 2013-14 में सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम के अंतर्गत दो योजनाओं के कार्यान्वयन में अभिरूचित नहीं लेने तथा लापरवाही बरतने के कारण ससमय कार्य नहीं होने के फलस्वरूप प्राक्कलित राशि में संभावित बढ़ोतरी के कारण सरकारी राजस्व का अपव्यय होने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने इन योजनाओं के विलंब से संबंधित स्पष्टीकरण में दि0-17.07.14 से 06.12.14 तक के विलंब का तिथिवार ब्योरा नहीं दिये जाने तथा प्राक्कलन में सुधार हेतु पॉच माह के विलंब को उचित नहींं माना गया है तथा एकरारनामा की प्रक्रिया को लंबित रखने से संबंधित तथ्य नहीं दिये जाने के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। अभिलेखो के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि कार्य0 अभि0 द्वारा उक्त दोनो कार्यो का प्राककलन अपने पत्रांक-1358 दि0-17.07.14 से अधी0 अभि0 को समर्पित किया गया था। अधी0 अभि0 द्वारा त्रुटियों को इंगित करते हुए प्राक्कलन कार्य0 अभि0 को वापस किया गया है। तत्पश्चात त्रुटियों का निराकरण करते हुए कार्य0 अभि0 द्वारा दि0-06.12.14 को प्राक्कलन पुनः अधी0 अभि0 को समर्पित किया जाना परिलक्षित होता है। इस संदर्भ में आरोपी द्वारा कहा गया है कि दि0-17.07.14 को समर्पित प्राक्कलन मौखिक रूप से सुधार हेतु लौटाया गया था तथा आवश्यक सुधार कर हाथे हाथ अंचल कार्यालय में वापस किया गया। ऐसी स्थिति में तिथिवार प्रतिवेदन देना संभव नहींं है। संशोधित प्राक्कलन दि0-06.12.14 को लौटाने के संदर्भ में कहा गया है कि उक्त तिथि को वर्ष 2014-15 को योजना लौटायी की गई थी। न कि वर्ष 2013-14 के योजना प्राक्कलन लौटायी गयी है। परन्तु इनके द्वारा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है। जिला योजना पदाधिकारी मधुबनी के विभिन्न पत्रो से सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम के तहत वर्ष 2013-14 के योजना प्राककलन हेतु स्मारित किया जाता रहा है। अतएव आरोपी के बचाव बयान को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। वर्ष 2014-15 के दो योजनाओं का एकरारनामा प्रक्रिया लंबित रहने के संदर्भ में कहा गया हे कि दो योजनाओं में से एक योजना का कार्य ग्रामीण कार्य विभाग के द्वारा कराया गया है तथा एक योजना के निविदा कागजात की तुल्नात्मक विवरणी दि019.05.15 को अंचल में भेजा गया तथा अंचल द्वारा दि0 8.6.15 को निर्गत कार्यवंटन आदेश प्राप्ति के पश्चात दि0 24.6.15 को एकरारनामा संपन्न हुआ है तथा समय पर कार्य पूरा कर लिया गया। परंतु इनके द्वारा संदर्भित कोई साक्ष्य नहींं दिया गया है अतएव बचाव बयान स्वीकार योग्य नहींं जा सकता है। अतएव आरोप-2 प्रमाणित होता है। आरोप सं०-3 जो दिनांक 9.2.15, 12.3.15, 23.3.15, 13.4.15, 18.5.15, 25.5.15, 8.6.15 एवं 13.7.15 को जिला स्तर पर आयोजित बैठकों में बिना पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहने तथा प्रधान सचिव, यो0 एवं विकास विभाग के दि0 24.4.15 को मधुवनी भ्रमण में बिना साक्ष्य पदा0 के अनुमति प्राप्त किये अनुपस्थित रहने से संबंधित है। संचालन पदा0 के द्वारा आरोपी द्वारा विभिन्न तिथियों में जिला स्तर पर आयोजित बैठक में बिना पूर्व सूचना के अनुपस्थिति के संदर्भ में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहींं किये जाने तथा आरोपी का कथन कि दि028.4.15 को प्रधान सचिव के आने की सूचना नहींं रहने के कारण कार्यक्षेत्र भ्रमण में था से संबंधित कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहींं करने के कारण आरोप-3 को प्रमाणित होने का मंतवय दिया गया है। तथा आरोपी का स्पष्ट लापरवाही बताया गया है। आरोपी द्वारा कहा गया है कि दि0 9.215, 12.3.15, 23.3.15, 13.4.15, 18.5.15 25.5.15, 8.6.15 एवं 13.7.15 को आयोजित बैठक की कोई पूर्व सूचना नहींं दी गयी थी। जिला पदा0 के पत्र से स्पष्ट है कि श्री कलीमुल्लाह तत्का0 कार्य0 अभि0 के क्रिया कलाप से प्रधान सचिव को अवगत कराया गया है। जिला स्तर पर सप्ताहिक बैठक आयोजित की जाती रही है। उपस्थिति विवरणी से स्पष्ट होता है कि दि0 23.3.15, 13.4.15, 9.2.15 को जिला स्तर पर आयोजित बैठक में श्री कलीमुल्लाह भाग नहींं लेकर कहना की उन्हें बैठक की सूचना नहींं दी गयी है स्वीकार योग्य प्रतीत नहींं होता है। दि0 28.4.15 को प्रधान सचिव यो0 एवं विकास के मधुबनी भ्रमण में भाग नहींं लेने के संदर्भ में आरोपी द्वारा कहा गया है कि उन्हे प्रधान सचिव के आगमन की सूचना नहीं रहने के कारण उक्त तिथि को लौकहा विधान सभा क्षेत्र में चल रहे कार्यो का निरीक्षण हेतु चला गया था तथा सूचना मिलने पर दूसरे दिन सुबह में उपस्थित रहा हूँ। प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी-सह-जिला योजना पदाधिकारी द्वारा भी मंतव्य दिया गया है कि प्रधान सचिव के आने की सूचना दि0-18.04.15 के दो बजे अपराह्‌ण में दूरभाष से प्राप्त होने के पश्चात इसकी सूचना दूरभाष के माध्यम से कार्य0 अभि0 को देने हेतु संपर्क52 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 करने की कोशिश की गयी परन्तु संपर्क नहींं होने के कारण अधोहस्ताक्षरी द्वारा ससमय इन्हे सूचित नहींं किया जा सका। पुनः इनसे संपर्क स्थापित कर सूचना दी गयी। तत्पश्चात दूसरे दिन प्रधान सचिव के समक्ष मिटिंग में उपस्थित हुए। अतएव जिला योजना पदाधिकारी में उक्त मंतव्य से आरोपी का कथन की प्रधान सचिव दि0-28.04.15 को आने की सूचना नहीं मिली को स्वीकार योग्य माना जा सकता है। उपरोक्त तथ्यो के आलोक मे मो0 कलीमुल्लाह तत0 कार्य0 अभि0 के विरूद्व आरोप का प्रथम अंश यथा जिला स्तर पर आयोजित बैठक में भाग नहीं लेकर लापरवाही बरतने के आरोप प्रमाणित होता है परन्तु दि0-28.04.15 को जानबुझकर लापरवाही बरतते हुए प्रधान सचिव के मधुबनी भ्रमण में भाग नहींं लेने का आरोप बनता प्रतीत नहींं होता है। आरोप सं0-4 जो राजनगर विधान सभा क्षेत्र के अंतर्गत स्वीकृत पॉच योजनाओं को संवेदक द्वारा प्रारंभ नहीं करने के कारण अपनी सक्षमता से बाहर जाकर रद्‌द करते हुए माननीय मंत्री, खान एवं भूतत्व विभाग को देकर अकुशलता तथा अनियमितता बरतने से संबंधित है। संचालन पदाधिाकरी ने मो0 कलीमुल्लाह के स्पष्टीकरण को अस्वीकार योग्य मानते हुए इनके पत्र-589 दि0-27.03. 15 के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। आरोपी द्वारा कहा गया है कि संवेदक द्वारा काफी समय तक निबंधित डाक एवं समाचार पत्रो के माध्यम से कई बार स्मारित करने के बाद भी कार्य प्रारंभ नहींं करने पर मात्र पत्रांक-589 दि0-27.03.15 से एकरारनामा रद्‌द किया गया था न की योजना को रद्‌द किया गया। परन्तु भूलवश एकरारनामा के बदले योजना को रद्‌द करना अंकित हो गया है तथा बाद की तिथि में पत्रांक-1039 दि0-24.06.15 से उन सभी संवेदक के अग्रधन एवं जमानत की राशि जब्त करते हुए काली सूचि में डालने हेतु अनुरोध किया गया। आरोपी के पत्रांक-589 दि0-27.03.15 के अवलोकन से स्पष्ट है कि उक्त पाँचाें योजना को रद्‌द करते हुए इन योजनाओं के बदले अन्य योजना की अनुशंसा हेतु अनुरोध किया गया है। उक्त के आलोक में माननीय मंत्री खान एवं भतत्व ने अपने पत्रांक 266 दि0-21.05.15 से प्रधान सचिव को कार्य0 अभि0 द्वारा रद्‌द की गयी योजनाओं को ही प्राथमिकता के आधार पर कार्यान्वयन हेतु अनुरोध किया गया है चुॅकि यह एक गंभीर मामला है। अतएव आरोपी का कथन है कि भूलवश एकरारनामा के बदले योजना अंकित हो गया है स्वीकार योग्य प्रतित नहींं होता है हलांकि कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-1059 दि0-24.06.15 से स्पष्ट है कि वर्ष 2012-13 एवं 2013-14 में संवेदक कार्य नहीं कराने के कारण कुल-17 अदद योजनाओं से संबंधित संवेदक के अग्रधन एवं जमानत की राशि जब्त करते हुए काली सूचि में डालने का अनुरोध अधी0 अभि0 से की गयी। आरोपी द्वारा उपलब्ध कराये गये प्रमंडलीय पत्रांक-606, 612 दि0-10.06.16 से स्पष्ट होता है कि इन पॉच योजनाओं का कार्य वर्ष 2012 में अनुमोदित प्राक्कलन के आधार पर वर्ष 2016-17 में विभागीय स्तर से कराया गया है। उपरोक्त वर्णित तथ्यो के आलोक में सक्षमता से बाहर जाकर अनुशंसित योजनाओं को रद्‌द करने की कार्रवाई कर लापरवाही बरतने का आरोप प्रमाणित होता है। आरोप सं0-5 जो योजनाओं के कार्यान्वयन से संबंधित कनीय अभि0 से नहीं कराकर प्रखंड के मनरेगा, के कनीय अभियंता से करकर दर्ज मापी पर सह0 अभि0 द्वारा जांच नहींं करने के फलस्वरूप कार्य की गुणवत्ता संदिग्ध होने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने आरोपी का कथन कि विभागीय आदेश सं0-4608 दि0-07.1014 के अनुपालन में मनरेगा कनीय अभि0 से कार्य कराया गया है, को विभागीय आदेश के अनुसार मनरेगा योजना के तहत संविदा पर नियोजित कनीय अभि0 की सेवा मुख्य मंत्री क्षेत्र विकास योजना के कार्यान्वयन हेतु अपने मूल कार्यो के अतिरिक्त उनके पदस्थापित प्रखंड कार्यक्षेत्र के अंतर्गत लेने का निर्णय लिया एवं मापी की जांच सहा0 अभि0 द्वारा की गयी है जिससे इस आरोप की पूष्टि नहींं होती हैं के आधार पर आरोप आंशिक प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। आरोपी द्वारा कहा गया हे कि सरकारी नियमानुसार संबंधित कनीय अभि0 के व्यस्तता के कारण उसी विधान सभा क्षेत्र के अंतर्गत पड़ने वाले मनरेगा के कनीय अभि0 द्वारा मापी अंकित की गयी है तथा सहा0 अभि0 द्वारा जांच की गयी है अतएवं किसी तरह का संदेहास्पद कार्य नहींं कराया गया है। योजना एवं विकास विभाग के पत्रांक-4608 दि0-07.10.14 से स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन के कार्य प्रमंडलों में कनीय अभि0 के कमी के मद्वेनजर प्रमंडल में मनरेगा योजना के तहत संविदा पर नियोजित कनीय अभि0 की सेवा मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के कार्यान्वयन हेतु उनके पदस्थापित प्रखंड क्षेत्र के अंतर्गत लेने का निर्णय संसूचित किया गया है जबकि आलोच्य योजना मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना से संबंधित नहीं है, तथा आरोपी द्वारा स्वीकार किया गया है उसी विधान सभाक्षेत्र के मनरेगा के कनीय अभि0 से मापी करायी गयी है। अतएवं इनका बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है परन्तु चुँकि कार्य की मापी की जांच सहा0 अभि0 द्वारा की गयी है अतएव कार्य को संदेहास्पद माना जाना उचित प्रतीत नहींं होता है। विभागीय कार्यवाही के कालक्रम में दिनांक 29.02.16 को मो0 कलीमुल्लाह सेवानिवृत हो गये। फलतः मामले के समीक्षोपरांत योजना एवं विकास विभाग के अधिसूचना सं०-2965 दिनांक 13.06.16 द्वारा मो0 कलीमुल्लाह, तत0 कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध बिहार सरकारी सवेक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के तहत संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया गया।

योजना एवं विकास विभाग द्वारा विभागीय पत्रांक-2486, दिनांक 16.05.17 द्वारा मो0 कलीमुल्लाह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध अग्रेतर कार्रवाई हेतु पैतृक विभाग जल संसाधन विभाग से अनुरोध किया गया। मामले के सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना सं०-174, दिनांक 19.01.18 द्वारा मो0 कलीमुल्लाह, तत्कालीन53 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को उनके सेवानिवृति की तिथि 29.02.16 के प्रभाव से निलंबन मुक्त किया गया एवं मो0 कलीमुल्लाह के विरूद्ध प्रमाणित आरोपों के लिए निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया - "पेशन से 2 (दो) वर्षों के लिए 5 (पाँच) प्रतिशत की कटौती"। उक्त निर्णय के आलोक में मो0 कलीमुल्लाह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता है -

"पेशन से 2 (दो) वर्षों के लिए 5 (पाँच) प्रतिशत की कटौती"। सरकार के उक्त निर्णय में बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है। निलंबन अवधि (दिनांक 09.09.2015 से दिनांक 29.02.16 तक) के विनियमन के संबंध में मो0 कलीमुल्लाह से बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 11(5) के अन्तर्गत स्पष्टीकरण पूछने का पत्र अलग से निर्गत किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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9 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(ल0सिं0)-05-01/2018-1466--श्री विनोद कुमार वर्मा (आई0डी0-1662), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, जहानाबाद सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध वर्ष 2004-05 में जिला ग्रामीण विकास अभिकरण, जहानाबाद द्वारा दी गई राशि से एस0जी0आर0वाई0 योजना अन्तर्गत गैबियन का निर्माण कर वृक्षारोपण नहीं किए जाने से अनावश्यक रूप में गैबियन निर्माण पर 48.58लाख रूपये का निष्फल व्यय किए जाने के कारण लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा आरोप गठित कर बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम-43(बी) के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया।

विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी-सह-अपर विभागीय जाँच आयुक्त द्वारा आरोप पत्र में वर्णित आरोप को प्रमाणित पाया गया। लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा समीक्षोपरांत लिए गए निर्णय के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर द्वितीय कारण पृच्छा किया गया।

श्री विनोद कुमार वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमण्डल, जहानाबाद सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा लघु जल संसाधन विभाग को द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर समर्पित किया गया।

लघु जल संसाधन विभाग द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर की समीक्षा के क्रम में यह ज्ञात होने पर कि आरोपित पदाधिकारी का पैतृक विभाग, जल संसाधन विभाग है, दण्ड के बिन्दु पर निर्णय लेने हेतु सभी संगत कागजात, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को प्रेषित किया गया।

श्री विनोद कुमार वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, जहानाबाद सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत यह पाया गया कि आरोप वर्ष 2004-05 है जबकि आरोपित सेवानिवृत पदाधिकारी (सेवानिवृति की तिथि 30.06.2011) के विरूद्ध प्रपत्र-'क' गठन एवं संकल्प निर्गत की तिथि 01.06.2016 है। इस प्रकार यह मामला बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के अन्तर्गत कालबाधित है। श्री वर्मा के विरूद्ध अनावश्यक रूप से गैबियन निर्माण पर 48.58 लाख रूपये के निष्फल व्यय करने का आरोप है। इस प्रकार के मामलों में व़िद्वान महाधिवक्ता, बिहार, पटना का परामर्श निम्नवत है -

"In view of the lapse of considerable period, the department is right that they cannot take any departmental action but the said engineer cannot escape the criminal liability for such gross omission and commission".

विद्वान महाधिवक्ता, बिहार, पटना से प्राप्त उपर्युक्त विधिक परामर्श के आलोक में श्री विनोद कुमार वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, जहानाबाद सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के अन्तर्गत मामला कालबाधित हो जाने के कारण किसी प्रकार की विभागीय कार्रवाई संभव नहीं है, परन्तु लघु जल संसाधन विभाग द्वारा श्री वर्मा के विरूद्ध आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ की जा सकती है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री विनोद कुमार वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमण्डल, जहानाबाद सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) के अन्तर्गत संचालित विभागीय कार्यवाही, कालबाधित होने के कारण तकनीकी दृष्टिकोण से संचिकास्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। श्री विनोद कुमार वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमण्डल, जहानाबाद सम्प्रति सेवानिवृत को उक्त निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 9 जुलाई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(सह0)-26-02/2017/1472--श्री चकलेश्वर खरवार (ID-J-9042), सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज को उक्त प्रमंडल के अंतर्गत सुखासन वितरणी के वि0दू0 28.00 पर निर्माणाधीन सी0डी0 संरचना केबिहार गजट, 20 Qjojh 2019 54 Structural Safety, Stability and Utility के कार्य में बरती गयी अनियमितता के मामले में सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

(2) निलंबन अवधि में श्री खरवार (ID-J-9042) का मुख्यालय, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

(3) निलंबन अवधि में श्री खरवार को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 10 के आलोक में जीवन निर्वाह भाा देय होगा।

(4) श्री खरवार के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित करने हेतु आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण पत्र अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 9 जुलाई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(सह0)-26-02/2017/1473--श्री अर्जुन चौधरी (ID-4666), कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज को उक्त प्रमंडल के अंतर्गत सुखासन वितरणी के वि0दू0 28.00 पर निर्माणाधीन सी0डी0 संरचना के Structural Safety, Stability and Utility के कार्य में बरती गयी अनियमितता के मामले में सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है। (2) निलंबन अवधि में श्री चौधरी (ID-4666) का मुख्यालय, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर का कार्यालय निर्धारित किया जाता है। (3) निलंबन अवधि में श्री चौधरी को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 10 के आलोक में जीवन निर्वाह भाा देय होगा। (4) श्री चौधरी के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित करने हेतु आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण पत्र अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 10 जुलाई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(मोति॰)-08-01/2014/1481--श्री रंजन प्रसाद समैयार (आई॰डी॰-3223), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के विरूद्ध महालेखाकार (लेखा परीक्षक), बिहार, पटना के निरीक्षण प्रतिवेदन में विाीय अनियमितता संबंधी निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2353, दिनांक-13.10.2015 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई :- (1) प्रमंडलीय रोकड़पाल श्री तेज नारायण सिंह के निम्नलिखित कृत्यों से कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध निगरानी एवं सर्तकता नहीं रखने का आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित पाये गये :- (i) प्रमंडलीय रोकड़पाल श्री तेज नारायण सिंह द्वारा राजस्व मद का रू 267527/- (दो लाख सरसठ हजार पाँच सौ सााइस) का गबन करना। (ii) पुनरीक्षित फार्म 51 का फर्जी प्रेषण। (iii) फार्म 51 पासबुक का तैयार एवं प्रमाणित नही होना। (iv) कर्मचारियों का रू 1,68,000/- (एक लाख अड़सठ हजार) का भुगतान लंबित रखना। (v) फरवरी 2012 से मई 2012 तक बगैर दायित्व का राशि रू 14,22,611/- (चौदह लाख बाइस हजार छः सौ ग्यारह) का भुगतान दिखलाया जाना। (vi) आहरित राशि का नकद रोकड़बही से अलग रखना। श्री समैयार के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा उनके विरूद्ध गठित आरोपों को अप्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। मामले की समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-917 दिनांक-13.06.2017 द्वारा संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए उनसे द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी। उक्त आलोक में श्री समैयार द्वारा समर्पित द्वितीय कारणपृच्छा उार के समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना सं0-2235 दिनांक-15.12.2017 द्वारा उनके विरूद्ध निम्न दण्ड संसूचित किया गया :- ''कालमान वेतन में तीन वेतन प्रक्रम पर दो वर्षों के लिए अवनति''। उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री समैयार द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया। उनके द्वारा समर्पित पुनिर्विलोकन अर्जी का मुख्य अंश निम्नवत है :- पुनर्विलोकन अर्जी के कंडिका 01 से 10 तक में श्री समैयार द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के विभिन्न नियमों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इनके विरूद्ध अधिरोपित दण्ड नियम55 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 14 (VI) के तहत अधूरी है। अधिरोपित दण्ड के तहत अवनति की अवधि के दौरान सरकारी सेवक वेतन वृद्धि अर्जित करेगा या नहीं तथा ऐसी अवधि के समाप्ति के पश्चात उक्त अवनति का प्रभाव उसकी भावी वेतन वृद्धियों को स्थगित रखने पर होगा या नहीं। इसमें स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि कितनी अवधि के लिए ऐसी शास्ति की अवधि समाप्ति के पश्चात भविष्य में वेतन वृद्धियाँ स्वतः अनुमान्य होने लगेगी या बाधित रहेगी। यदि बाधित रहेगी तो कितनी अवधि तक। अतएव अधिरोपित दण्ड पर सम्यक विचार नहीं किया जा सका है, जिस पर विचार किया जाना आवश्यक है। श्री समैयार तत्कालीन कार्यपाल अभियंता द्वारा प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों (जिसके लिए इन्हें दण्ड संसूचित की गयी है) के सन्दर्भ में आरोपवार निम्न तथ्य उद्धित किये गये है :- (i) पुनरीक्षित फार्म-51 तैयार कराने एवं सत्यापित नहीं कराने के सन्दर्भ में कंडिका 11.6 में कहा गया कि लोक निर्माण लेखा संहिता की कंडिका 528/529 के अनुसार CTR/CTI का कार्यपालक अभियंता एवं कोषागार पदाधिकारी द्वारा किये जाने का प्रावधान है। मात्र तीन माह के अति अल्प वृत प्रभार की अवधि में कोषागार द्वारा TCI/TCR के Revised Form-51 के पासबुक का सत्यापन नहीं हुआ था। क्योंकि कोषागार के अतिव्यस्तता के कारण वर्तमान में लोक निर्माण लेखा संहिता की कंडिका 528/529 के अनुसार CTR/CTI का नियमित रूप से सत्यापन नहीं हो पा रहा था। मुख्य अभियंता के पत्रांक-1722 दिनांक-08.08.2013 में आशंका व्यक्त की गई है कि कार्य प्रमंडल वाल्मीकिनगर में श्री तेजनारायण सिंह, पमंडलीय रोकड़पाल द्वारा गबन में कोषागार की भी मिलीभगत है। इसी पृष्टभूमि में उच्च स्तरीय जाँच की अनुशंसा की गयी। जिसका फलाफल विभाग में ही उपलब्ध होना अपेक्षित है। (ii) कर्मचारियों के भुगतान हेतु निकासी की गयी राशि 1,68,000/- का भुगतान लंबित रखने के संदर्भ में कहा गया कि इनके पदस्थापन अवधि में किसी भी कर्मचारी का भुगतान लंबित नहीं था। (iii) फरवरी, 2012 से मई 2012 तक बगैर दायित्व का कुल 14,12,211/- का भुगतान किये जाने के संदर्भ में कहा गया कि फरवरी, 2012 से मई 2012 तक उल्लेखित साक्ष्य के रूप में प्रेषित किसी भी पत्राचार में नहीं है। फलतः यह लांक्षण पूर्णतः निराधार है। (iv) आहरित राशि का नगद रोकड़वही से अलग रखने के संदर्भ में कहा गया है कि तीन माह के प्रभार में आहरित राशि को रोकड़वही से अलग नहीं रखा गया है। आहरित राशि के लिए अलग रोकड़वही इनके कार्यकाल में प्रारम्भ नहीं किया गया है। वर्णित तथ्यों के आलोक में अधिरोपित दण्ड को निरस्त करने का अनुरोध किया गया। श्री समैयार द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा में पाया गया कि उनके द्वारा वही तथ्य (बिना साक्ष्य के) अंकित किया गया जो उनके द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा के जवाब में उद्धित किया गया। आरोपवार स्थिति निम्नवत्‌ है :- (i) पुनरीक्षित प्रपत्र-51 तैयार नहीं करने एवं कोषागार से सत्यापित नहीं कराने के संदर्भ में कहा गया कि लोक निर्माण लेखा संहिता की कंडिका 528/529 के अनुसार CTR/CTI कार्यपालक अभियंता एवं कोषागार पदाधिकारी द्वारा किये जाने का प्रावधान है परन्तु कोषागार की अतिव्यस्तता के कारण तीन माह की अति अल्प प्रभार अवधि में CTR/CTI का सत्यापन नहीं हो सका। स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता क्योंकि जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 1(छः) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि फार्म-51 पासबुक तैयार कर संधारित एवं सत्यापित कराया जाता तो रोकड़पाल द्वारा गबन करने की स्थिति नहीं बनती। इनके द्वारा स्वयं स्वीकार किया गया कि इनके कार्यकाल में कोई प्रपत्र-51 तैयार कराकर सत्यापन नहीं कराया जा सका है। जबकि कार्यपालक अभियंता के दायित्वों में से मुख्य दायित्व है कि नियमित रूप से किये गये व्यय एवं राजस्व मद में जमा की गयी राशि को फार्म-51 के माध्यम से कोषागार से सत्यापित कराना है। ताकि अनियमितता नहीं हो सके। अतएव इनके द्वारा उक्त दायित्व के निर्वहन नहीं करने के कारण रोकड़पाल को गबन करने का मौका मिलना स्वभाविक है। (ii) इनके कार्यकाल में कर्मचारियों के भुगतान हेतु निकासी की गयी कुल 1,68,000/- रूपये का भुगतान लंबित रखने के संदर्भ मे कहा गया है कि इनके पदस्थापन अवधि में किसी भी कर्मचारियों का भुगतान लंबित नहीं रखा गया था, को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4(i) में स्पष्ट है कि इनके कार्यकाल (फरवरी, 2012 से मई 2012) में कुल 1.68 लाख रूपये का भुगतान लंबित था। इससे स्पष्ट है कि रोकड़पाल द्वारा इस अवधि में DDO के चेक के माध्यम से नगद राशि प्राप्त कर ली जाती थी एवं संबंधित कर्मचारी को भुगतान नहीं किय जाता था फलतः कर्मचारियों का भुगतान लंबित रह जाना स्वभाविक है। जबकि प्रमंडल में व्याप्त अनियमितता पर निगरानी रखना भी कार्यपालक अभियंता का दायित्व है। जिसमें श्री समैयार विफल रहें। (iii) फरवरी, 2012 से मई 2012 तक बगैर दायित्व का कुल राशि 14,22,611/- का भुगतान दिखलाने के संबंध में कहा गया कि फरवरी 2012 से मई 2012 तक उल्लेखित साक्ष्य के रूप में प्रेषित किसी भी पत्राचार में नहीं होने के आधार पर यह लांक्षण निराधार है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4(ii) बगैर दायित्व के भुगतान के संबंध में कहा गया है कि फरवरी, 2012 से मई, 2012 के बीच बगैर दायित्व के कुल 14,22,611/- रूपये का भुगतान किया गया है। यह भी अंकित किया गया है कि रोकड़वही के संधारण मे प्रत्येक माह के अन्तशेष विवरणी अगले माह के दायित्व का रूप लेता है। यदि बगैर दायित्व दर्शाए हुए किसी विपत्र का भुगतान किया जाता है तो यह स्पष्ट है कि उतनी राशि पूर्व के रोकड़वही में नहीं थी। दूसरे विपत्र की राशि जो चालू माह मे प्राप्त की गयी। उससे भुगतान कर दिया गया। इसका हश्र हुआ कि दिनांक-31.05.2012 को कुल दायित्व 14,22,611/- के विरूद्ध बैंक में मात्र 2,11,597/- रूपये ही बच गये। यदि रोकड़वही एवं बैंक में जमा राशि को प्रत्येक56 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 माह जाँच की जाती तो इस तरह के गबन का उजागर इनके कार्यकाल में हो जाता। परन्तु इनके द्वारा ऐसा नहीं कर रोकड़पाल को गबन करने का मौका प्रदान किया जाना परिलक्षित हुआ। (iv) आहरित राशि का नगद रोकड़वही से अलग रखने के संदर्भ में कहा गया कि इनके तीन माह के अति अल्प अवधि में आहरित राशि को रोकड़वही से अलग नहीं रखा गया एवं न ही अहरित राशि के लिये कोई अलग रोकड़वही प्रारम्भ किया गया। स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। क्योंकि जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4(iii) में कहा गया है कि कोषागार अनुसूचि से रोकड़वही के प्राप्ति पक्ष के मिलान करने पर पाया गया कि रोकड़पाल द्वारा पारित विपत्र की राशि को रोकड़वही के प्राप्ति साईड में एक से छः माह तक के विलम्ब से अंकित किया जाता था। इससे स्पष्ट है कि पारित विपत्र की राशि DDO के पदेन खाता में है परन्तु रोकड़वही में नहीं लिया गया। इस प्रकार की अनियमितता प्रत्येक माह लगभग 5.0 लाख से 18.15 लाख रूपये हमेशा विगत तीन वर्षों में रोकड़वही से बाहर रहे। यानि इस राशि ाक पुर्विनियोग होना माना गया है। यदि कार्यपालक अभियंता द्वारा पारित विपत्र की राशि की प्रविष्टि सही ढंग से रोकड़वही में मिलान किया जाता तो इस प्रकार की अनियमितता नहीं होती। वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री समैयार का पुनर्विलोकन अर्जी अस्वीकृत किये जाने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-2235 दिनांक-15.12.2017 द्वारा संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री रंजन प्रसाद समैयार (ID-3223), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल सं0-01, मुजफ्फरपुर द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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13 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-07/2014-1505--श्री मोइनुद्‌दीन अंसारी (आई0डी0-जे-7545), तत्कालीन कनीय अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, कदवा (कटिहार) सम्प्रति सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल संख्या-3, खगौल को बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, कटिहार एवं सालमारी के अन्तर्गत अपर महानंदा योजना फेज-1 के अधीन केन्द्रीय प्रायोजित योजना के अन्तर्गत महानंदा नदी के बायाँ एवं दायाँ तटबंध के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण एवं ब्रीक सोलिंग कार्य में स्वीकृत प्राक्कलन के मद संख्या-9 का प्रावधान तकनीकी रूप से सही नहीं होने, साथ ही इस मद के अतिरेक भुगतान करने, एक ही कार्य के लिए दो बार प्रावधान करना, बगैर काम कराये हुए संवेदक को भुगतान करने एवं बरती गई अनियमितता के आरोप के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है। 2. श्री मोइनुद्‌दीन अंसारी को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री अंसारी का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री अंसारी के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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13 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-07/2014-1506--श्री उदयभान सिंह (आई0डी0-4010), तत्कालीन प्राक्कलन पदाधिकारी, पूर्णियाँ को बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, कटिहार एवं सालमारी के अन्तर्गत अपर महानंदा योजना फेज-1 के अधीन केन्द्रीय प्रायोजित योजना के अन्तर्गत महानंदा नदी के बायाँ एवं दायाँ तटबंध के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण एवं ब्रीक सोलिंग कार्य में स्वीकृत प्राक्कलन के मद संख्या-9 का प्रावधान तकनीकी रूप से सही नहीं होने, साथ ही इस मद के अतिरेक भुगतान करने, एक ही कार्य के लिए दो बार प्रावधान करना, बगैर काम कराये हुए संवेदक को भुगतान करने एवं बरती गई अनियमितता के आरोप के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री उदयभान सिंह को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री सिंह का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री सिंह के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।57 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

13 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-07/2014-1507--श्री मुखलाल राम (आई0डी0-जे-9004), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, कदवा सम्प्रति सहायक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल-1, कटिहार को बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, कटिहार एवं सालमारी के अन्तर्गत अपर महानंदा योजना फेज-1 के अधीन केन्द्रीय प्रायोजित योजना के अन्तर्गत महानंदा नदी के बायाँ एवं दायाँ तटबंध के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण एवं ब्रीक सोलिंग कार्य में स्वीकृत प्राक्कलन के मद संख्या-9 का प्रावधान तकनीकी रूप से सही नहीं होने, साथ ही इस मद के अतिरेक भुगतान करने, एक ही कार्य के लिए दो बार प्रावधान करना, बगैर काम कराये हुए संवेदक को भुगतान करने एवं बरती गई अनियमितता के आरोप के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है। 2. श्री मुखलाल राम को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री राम का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री राम के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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19 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(सम0)-02-08/2017-1538--श्री मिथिलेश कुमार सिंह (आई0डी0-3611), तत्का0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-02, झंझारपुर सम्प्रति निलंबित, मुख्यालय मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग, जल संसाधन विभाग, पटना के विरूद्ध कमला-बलान दायाँ तटबंध के टूटान स्थल 73.50 एवं 74.60 कि0मी0 पर मुख्य अभियंता के निदेश के बावजूद भी टूटान के कट इण्ड को होल्ड करने में आवश्यकतानुरूप अभिरूची नहीं होने, उच्चाधिकारियों की निदेशों की अवहेलना करने संबंधी, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर, कैम्प-झंझारपुर के NR-56 दिनांक 14. 08.17 के प्रतिवेदन के आलोक में उन्हें विभागीय अधिसूचना सं०-1613, दिनांक 14.09.17 द्वारा निलंबित किया गया एवं विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1678, दिनांक 20.09.17 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत प्रपत्र-'क' में गठित निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी - कमला-बलान दायाँ तटबंध के टूटान स्थल 73.50 कि0मी0 एवं 74.60 कि0मी0 पर कट इण्ड को होल्ड करने हेतु आपको आवश्यक निदेश मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर द्वारा दिया गया, किन्तु आपके द्वारा निदेशों की अनदेखी की गयी। आप दिनांक 13.08.17 से ही अपने कार्यक्षेत्र से अनुपस्थित पाये गये। बाढ़ संघर्षात्मक कार्य हेतु पर्याप्त मात्रा में सामग्री और मानव बल की व्यवस्था नहीं की गयी। बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में आपके द्वारा लापरवाही बरते जाने के कारण जान-माल की व्यापक क्षति हुई। आपका यह कृत्य उच्चाधिकारियों के निदेशों की अवहेलना, संवेदनशील कार्य के प्रति घोर लापरवाही एवं स्वेच्छाचारिता का परिचायक है। आपका यह कृत्य बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम-3 (iii) के प्रतिकूल है। श्री सिंह के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-91, दिनांक 14. 05.18 द्वारा समर्पित किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोपी के बचाव-बयान एवं विभागीय अभिमत के समीक्षोपरांत प्रपत्र-'क' में गठित आरोप के प्रथम एवं तृतीय भाग को प्रमाणित एवं द्वितीय भाग को अप्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया :- आरोप का प्रथम भाग मुख्य अभियंता, समस्तीपुर के NR-56 दिनांक 14.08.17 द्वारा टूटान के कट इण्ड को होल्ड करने के लिए आवश्यक निदेश दिये गये हैं के आलोक में आरोपी का कथन कि कि0मी0 73.50 एवं 74.60 कि0मी0 पर हुए टूटान के कट इण्ड को होल्ड करने के लिए तत्का0 मुख्य अभियंता से उन्हें कोई निदेश नहीं मिला, समीचीन नहीं माना जा सकता है। सरकार के मुख्य सचिव के पत्रांक-1934, दिनांक 11.05.17 के कंडिका 8.02 एवं 3.02 में अंकित तथ्यों के आलोक में आरोप के प्रथम भाग यथा निदेश के बावजूद कट इण्ड की सुरक्षा में अनदेखी करने का आरोप प्रमाणित होता है। आरोप का द्वितीय भाग जिला पदाधिकारी, दरभंगा के पत्रांक-2749, दिनांक 14.08.17 में उल्लेखित है कि जल स्तर के अत्यधिक दबाव के समय कार्यपालक अभियंता भी वहाँ से हट गये, परन्तु अनुमंडल पदाधिकारी द्वारा खोज करने पर काफी देर के बाद पुनः उपस्थित हुुए, को कमला-बलान दायाँ तटबंध के विभिन्न बिन्दुओं पर हो रहे पाईपिंग को नियंत्रित करने के मद्देनजर माना जा सकता है। अतएव आरोप के द्वितीय भाग को प्रमाणित नहीं होता है। आरोप का तृतीय भाग जो तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के द्वारा पूर्व में प्रचुर मात्रा में सामग्री, मजदुर एवं संवेदक की व्यवस्था नहीं रखने के कारण बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रभावित होता रहा को जिला पदाधिकारी, दरभंगा के पत्रांक-2749, दिनांक 14.08.17 में अंकित होना कि तटबंध की मरम्मति के समय सामग्री, मानव बल का अभाव देखा गया, के आलोक में आरोपी का कथन कि58 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 स्थल पर वांछित मात्रा में सामग्री भंडारित था को स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। अतएव आरोप का तृतीय भाग प्रमाणित होता है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर विभाग द्वारा सहमति व्यक्त करते हुए जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराते हुए विभागीय पत्रांक-1111, दिनांक 22.05.18 द्वारा श्री सिंह से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) उत्तर की मांग की गयी। श्री सिंह द्वारा अपने पत्रांक-0, दिनांक 06.06.18 द्वारा समर्पित अभ्यावेदन में इस बात की सम्पुष्टि की है कि द्वितीय कारण पृच्छा पूछे जाने से संबंधित पत्र का तामिला हो चुका है। किन्तु द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर समर्पित न कर सभी दस्तावेज की पठनीय प्रति माँगी गई, जबकि इन्हें संचालन पदाधिकारी के द्वारा दस्तावेज की पठनीय प्रति उपलब्ध करा दी गई है। इस कार्यालय के पत्रांक-1252, दिनांक 08.06.18 द्वारा इनसे दो दिनों मेें द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर समर्पित करने हेतु स्मारित भी किया गया। किन्तु इसके बावजूद भी इनसे द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर अप्राप्त है। द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर का प्राप्त न होना इस बात का परिचायक है कि प्रपत्र-'क' में गठित आरोप सही है। विभागीय स्तर से स्मारित किये जाने के बावजूद श्री सिंह से द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब अप्राप्त रहा। इनके द्वारा अनावश्यक रूप से आरोप से असंदर्भित कागजातों की माँग की गयी, जिसके आलोक में इन्हें दो दिनों के अन्दर बचाव-बयान उपलब्ध कराने का निदेश दिया गया। चूँकि स्मारित करने के बावजूद भी निर्धारित अवधि तक बचाव-बयान अप्राप्त रहा। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप का प्रथम एवं तृतीय अंश यथा मुख्य अभियंता के निदेश के बावजूद भी टूटान के कट इण्ड की सुरक्षा नहीं कर आदेश की अवहेलना करने तथा कार्य स्थल पर प्रचुर मात्रा में बाढ़ सामग्री, श्रम बल की व्यवस्था नहीं करने के कारण बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रभावित होने का आरोप प्रमाणित होता है।

2. अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा समीक्षा की गई और समीक्षा में प्रमाणित आरोप को गंभीरता से लिया गया, क्योंकि बाढ़ जैसी आपदा की स्थिति में हजारों/लाखों जनजीवन प्रभावित होता है। जिसमें किसी प्रकार की लापरवाही, अनुशासनहीनता/कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही, जनसामान्य के प्रति अक्षम्य अपराध है। समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री मिथिलेश कुमार सिंह (आई0डी0-3611), तत्का0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-02, झंझारपुर सम्प्रति निलंबित कार्यपालक अभियंता, मुख्यालय मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, पटना को बिहार सरकारी सेवक, (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय यथासंशोधित) के नियम-14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड दिये जाने का विनिश्चय किया गया।

3. बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से श्री सिंह के विरूद्ध विनिश्चत दण्ड प्रस्ताव पर परामर्श की मॉग की गयी जिसपर आयोग के पत्रांक-933 दिनांक- 06.07.18 द्वारा सहमति प्रदान की गयी।

4. अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री मिथलेश कुमार सिंह, (आई0डी0-3611), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-2, झंझारपुर सम्प्रति निलंबित मुख्यालय, मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनेटरिंग का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, पटना के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005(समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम-14 (Xl)के तहत ''सेवा से बर्खास्तगी'' का दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता हैं। 5. श्री मिथलेश कुमार सिंह (आई0डी0-3611), कार्यपालक अभियंता, को सेवा से बर्खास्त करने के दण्ड पर मंत्रीपरिषद का अनुमोदन प्राप्त है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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19 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(सम0)-02-08/2017-1539--श्री बिजेन्द्र कुमार राम (आई0डी0-3871), तत्कालीन मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, समस्तीपुर सम्प्रति निलंबित मुख्यालय मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, पटना के विरूद्ध दिनांक 13.08.2017 को कमला-बलान नदी के पश्चिमी तटबंध में रिसाव होने की स्थिति में स्थल से अनुपस्थित रहने एवं जिला पदाधिकारी, दरभंगा एवं पुलिस अधीक्षक, दरभंगा द्वारा खोजबीन करने पर कर्त्तव्य से अनुपस्थित रहने, कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही एवं उदासीनता बरतने, विभागीय निदेश के बावजूद आक्रम्य स्थलों पर बाढ़ सुरक्षा हेतु सामग्रियों का भण्डारण नहीं करने,आपात स्थिति में मानव बल की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं करने संबंधित जिलाधिकारी, दरभंगा के पत्र सं०-2749/cदिनांक 14.08.17 के प्रतिवेदन के आलोक में उन्हें विभागीय अधिसूचना सं०-1615, दिनांक 14.09.17 द्वारा निलंबित किया गया एवं विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं०-1677, दिनांक 20.09.17 द्वारा विहित सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत प्रपत्र-'क' में गठित में निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। (i) दिनांक 13.08.17 को कमला-बलान पश्चिमी तटबंध में नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण तटबंध में रिसाव होने लगा, तटबंध में हो रहे रिसाव एवं पाईपिंग को रोकने के लिए जिला पदाधिकारी, दरभंगा द्वारा आपकी काफी खोजबीन की गयी। किन्तु आप स्थल पर उपस्थित नहीं हो सके। जिलापदाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक, दरभंगाके संयुक्त निरीक्षण के समय भी आप अनुपस्थित पाये गये। तटबंध की मरम्मति हेतु आवश्यक सामग्री एवं मानव बल की पूर्व तैयारी नहीं की गई, जिसके कारण रात को 02ः00 बजे कमला-बलान तटबंध 73वें कि0मी0 के पास क्षतिग्रस्त हो गया। फलस्वरूप जान-माल की व्यापक क्षति हुई। बाढ़ जैसे महत्वपूर्ण कार्यो के प्रति सजग नहीं रहना, आपात स्थित से निपटने के लिए, विभागीय दिशा-निदेशों की अवहेलना करते हुए आवश्यक तैयारी नहीं करना एवं अपने कार्यक्षेत्र से अनुपस्थित रहना, घोर लापरवाही,59 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 कार्य के प्रति उदासीनता एवं स्वेच्छाचारित को दर्शाता है। आपका यह कृत्य बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली 1976 के नियम 3(iii) के प्रतिकूल है। श्री राम, मु0 अभि0 (निलंबित) के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-74, दिनांक 27.04.18 द्वारा प्राप्त हुआ। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोपी के बचाव-बयान एवं विभागीय अभिमत के समीक्षोपरांत निम्न मंतव्य गठित किया गया-

(i) सरकार के मुख्य सचिव के पत्रांक-1934, दिनांक 11.05.17 से निर्गत बाढ़ नियंत्रण आदेश 2017 के कंडिका 8.

02 जब किसी तटबंध की सुरक्षा पर गंभीर खतरा हो जाय तो मुख्य अभियंता तथा अधीनस्थ कार्यपालक अभियंता स्तर तक के पदाधिकारी स्थिति की सूचना जिला पदाधिकारी को देंगे तथा स्थिति से केन्द्रीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष, पटना को अवगत करायेंगे। परन्तु इस निदेश का अनुपालन नहीं किया गया। अंततः बाँध टूट गया। जिला पदाधिकारी के पत्रांक-2749, दिनांक 14.08.17 से स्पष्ट है कि दिनांक 13.08.17 को तटबंध के कि0मी0 73.0 पर रिसाव की सूचना पर प्रखण्ड विकास पदाधिकारी, अंचलाधिकारी, अनुमंडल पदाधिकारी एवं अनुमण्डल पुलिस पदाधिकारी को भेजा गया तथा उक्त स्थल पर मुख्य अभियंता से आने का अनुरोध के बावजूद स्थल पर नहीं आये तथा जिला पदाधिकारी एवं वरीय पुलिस पदाधिकारी को संध्या 03ः00 बजे से 6ः30 बजे तक स्थल पर रहने के दौरान भी मुख्य अभियंता उपस्थित नहीं हुए जबकि गंभीर स्थिति में आक्रम्य स्थल पर वरीय तकनीकी पदाधिकारी का उपलब्ध रहना है। गंभीर स्थिति होने की सूचना पर तुरन्त उपस्थित होकर रिसाव रोकने की कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की जा सकी जिसके कारण तटबंध टूट गया। अतः आरोप प्रमाणित होता है।

(ii) जिला पदाधिकारी के पत्रांक-2749, दिनांक 14.08.17 से स्पष्ट है कि दिनांक 13.07.18 को कमला-बलान पश्चिमी तटबंध के 73वें कि0मी0 में मरम्मति समय आवश्यक सामग्री, मानव बल का अभाव पाया गया साथ ही मुख्य अभियंता अगर समय पर उपस्थित रहते तो सामग्री एवं मानव बल विभिन्न जगहों से इक्कठा कर सकते थे। उक्त से स्पष्ट होता है कि पर्याप्त सामग्री का भंडारण नहीं करवाया गया था। प्रस्तुत मामले में आवश्यकतानुसार सामग्री एवं मानव बल की कमी पायी गयी जो टूटने का कारण बना। अतः आरोप प्रमाणित होता है।

(iii) आरोपी का कथन कि बाढ़ पूर्व तैयारी हेतु अधीनस्थ पदाधिकारियों के साथ समय-समय पर बैठक कर समुचित निदेश दिया गया है। जिसके अनुपालन में अधीनस्थ पदाधिकारी द्वारा कार्यों का पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण कर विभाग को संसूचित किया गया है। साथ ही विभाग द्वारा जारी दिशा निदेश का अनुपालन कर विभाग को सूचना दी गयी है स्वीकार योग्य नहीं है। उनके सम्पूर्ण क्रिया-कलाप के आकलन करने पर बाढ़ जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के प्रति सजगता का पूर्ण अभाव, कार्य के प्रति लापरवाही, विभागीय दिशा निदेश की अवहेलना एवं उच्चधिकारी के आदेश को सही मानने का विभागीय मंतव्य सही प्रतीत होता है। अतः आरोप प्रमाणित होता है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षोपरांत मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-1031, दिनांक 11.05.18 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराते हुए श्री राम से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की माँग की गई। श्री राम, तत्का0 मुख्य अभियंता (निलंबित) द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर समर्पित किया गया जिसका मुख्य अंश निम्नवत है -

(i) दिनांक 12.08.17 को रात में कमला-बलान के कि0मी0 73.0 का देख-रेख किया जा रहा था। दिनांक 13.08.17 को स्थिति सामान्य थी। जल स्तर काफी उपर तक आ चुका था। 11ः30AM दाँये तटबंध पर आ गया। पुनः 12ः30PM बायें तटबंध पर पहुँचा। वहाँ कई जगहों पर रिसाव हो रहा था। रिसाव की मरम्मति कार्य की निगरानी की जा रही थी। शाम 05ः00 बजे विभागीय निदेश के आलोक में दायाँ तटबंध पर प्रस्थान किया गया परन्तु असमां गाँव के पास ग्रामीणों द्वारा गाड़ी रोक दी गयी। जानकारी मंत्री महोदय को दी गयी। पुनः DM तथा SDMसे बात की गयी। अंततः काफी मसक्कत के बाद कि0मी0 73 के लिये प्रस्थान किया। लगभग 8ः00 बजे पहुँचा गया। उस समय तक तटबंध के पूरी ऊँचाई में पानी भरा गया था। महज संयोग है कि जब DM/SSP दाँये तटबंधपर थे। उस समय विभागीय निदेशानुसार बाँयें तटबंध के कार्यों का निरीक्षण में संलग्न था।

(ii) अक्राम्य स्थल पर भंडारित सामग्रियों की सूची एवं मात्रा विभाग को पूर्व में उपलब्ध करायी गयी थी। जिस पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी विभाग द्वारा दर्ज नहीं है। पानी तटबंध से ओभरफ्लो की स्थिति में मजदूर/संवेदक सुरक्षा कारणों से काम करने का जोखिम नहीं उठाते हैं। उस परिस्थति में मजदूरों/संवेदकों को समझा बुझाकर कार्य को सुचारू रूप से चालू रखा गया जिसकी पुष्टि जिला पदाधिकारी के पत्र से होती है। प्रलंयकारी बाढ़ से आकलित सामग्री कम पड़ जाती है। फलतः अन्य स्थल से सामग्री ढुलाई करायी गयी एवं कार्य कराया गया। उक्त प्राकृतिक आपदा में भी अथक प्रयास के बाद भी सफलीभूत नहीं हो पाया।

(iii) यह आरोप साक्ष्य विहिन है क्योंकि गठित आरोप का मूल साक्ष्य जिला पदाधिकारी के पत्रांक-2749, दिनांक 14.08.17 है जिसमें उक्त तथ्य का उल्लेख नहीं है। विभाग के स्तर से निर्गत बाढ़ प्रबंधन निदेशिका एवं मुख्यालय द्वारा दिये गये निदेशों के आलोक में कार्रवाई की पूर्ण दृढ़ता एवं निष्ठापूर्वक की गयी थी।60 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संचालन पदाधिकारी द्वारा दिये गये मंतव्य साक्ष्य आधारित नहीं है और न ही विभागीय कार्यवाही बिहार सरकारी सेवक नियमावली 2005 निहित प्रावधानों के आलोक में की गयी है, जिसे विधि संगत नहीं माना जा सकता है।

श्री राम द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) के उत्तर की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरांत निम्न तथ्य पाया गया -

(i) आरोपी द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में वही तथ्य उद्धिृत किया गया है जो इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। आरोपित पदाधिकारी के बचाव-बयान पर जिला पदाधिकारी, दरभंगा से मंतव्य की माँग की गयी। जिला पदाधिकारी से मंतव्य प्राप्त हुआ जिसमें आरोपी के कथन को स्वीकार योग्य नहीं माना गया। संचालन पदाधिकारी के द्वारा भी मामले के समीक्षोपरांत आरोप के प्रथम अंश को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। जिस पर विभाग द्वारा सहमति व्यक्त की गई। श्री राम द्वारा कहा गया कि प्रश्नगत स्थल पर जाने के क्रम में रास्ते में ग्रामीणों द्वारा गाडी रोक दिया गया। फलतः स्थल पर विलंब से 08ः00बजे शाम में पहुँचा। परन्तु उक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया। अतएव उक्त कथन को स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप प्रमाणित पाया गया।

(ii) आरोप के द्वितीय अंश के संदर्भ में आरोपी द्वारा वही तथ्य द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में अंकित किया गया जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिये गये बचाव-बयान में अंकित किया गया था।संचालन पदाधिकारी ने जिला पदाधिकारी के पत्रांक-2749/c, दिनांक 14.08.17 में अंकित कि स्थल पर पर्याप्त मात्रा में सामग्री एवं श्रम बल का अभाव पाया गया। आरोप के इस अंश को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया। आरोपी द्वारा स्थल पर पर्याप्त मात्रा में सामग्री का भंडारण तथा श्रम बल एवं उपस्थिति से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं दिया गया। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप को प्रमाणित पाया गया।

(iii) आरोप के तीसरे अंश के संदर्भ में श्री राम द्वारा कहा गया है कि आरोप साक्ष्य आधारित नहीं है। विभाग द्वारा निर्गत बाढ़ प्रबंधन निदेशिका एवं मुख्यालय द्वारा दिये गये निदेशों के आलोक में पूर्ण दृढ़ता एवं निष्ठापूर्वक अनुपालन किया गया है। परन्तु इनके द्वारा एक भी अनुपालन प्रतिवेदन उपलब्ध नहीं कराया गया है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप के इस अंश को प्रमाणित पाया गया।

2. अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा समीक्षा की गई और समीक्षा में प्रमाणित आरोप को गंभीरता से लिया गया, क्योंकि बाढ़ जैसी आपदा की स्थिति में हजारों/लाखों जनजीवन प्रभावित होता है। जिसमें किसी प्रकार की लापरवाही, अनुशासनहीनता/कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही, जनसामान्य के प्रति अक्षम्य अपराध है। समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री बिजेन्द्र कुमार राम (आई0डी0-3871), तत्कालीन मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर सम्प्रति निलंबित मुख्य अभियंता, मुख्यालय मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, पटना को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय यथा संशोधित)के नियम-14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड दिये जाने का विनिश्चय किया गया।

3. बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से श्री राम के विरूद्ध विनिश्चत दण्ड प्रस्ताव पर परामर्श की मॉ की गयी जिसपर आयोग के पत्रांक-932 दिनांक- 06.07.18 द्वारा सहमति प्रदान की गयी।

4. अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री बिजेन्द्र कुमार राम, (आई0डी0-3871), तत्कालीन मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर सम्प्रति निलंबित मुख्यालय, मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनेटरिंग का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, पटना के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005(समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम-14 (Xl)के तहत ''सेवा से बर्खास्तगी'' का दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता हैं। 5. श्री बिजेन्द्र कुमार राम (आई0डी0-3871), मुख्य अभियंता, को सेवा से बर्खास्त करने के दण्ड पर मंत्रीपरिषद का अनुमोदन प्राप्त है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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19 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(गोपा0)-27-04/2017-1540--श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-01, पडरौना सम्प्रति निलंबित मुख्यालय मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, पटना के विरूद्ध CRL के बिन्दु 88.00 कि0मी0 से 98.00 कि0मी0 के बीच पाईपिंग होने की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं देने, रात्रि के समय एवं सुबह पाईपिंग के कारण बाँध कट जाने तक कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं होने संबंधी अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अंचल, पडरौना, कैम्प-कार्यस्थल के NR 65 दिनांक 15.08.17 के प्रतिवेदन के आलोक में उन्हें विभागीय अधिसूचना संख्या-1612, दिनांक 14.09.17 द्वारा निलंबित किया गया एवं विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1672, दिनांक 20.09.17 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत प्रपत्र-'क' में गठित निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

दिनांक 15.08.17 को सुबह लगभग 04ः00बजे पूर्वाह्‌न CRL के बिन्दु 88.00 कि0मी0 से 98.00 कि0मी0 के बीच पाईपिंग शुरू हो गया, जिसकी सूचना आपके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी। पाईपिंग के कारण 07ः45AM में 15मी0 की लंबाई में बाँध टूट गया, जिसके कारण जान-माल की व्यापक क्षति हुई। रात्रि के समय एवं सुबह पाईपिंग के कारण बाँध कट जाने तक आप कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं पाये गये, जो बाढ़ संघर्षात्मक कार्य जैसे संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण कार्य के61 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 प्रति आपकी घोर उदासीनता, कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही एवं स्वेच्छाचारिता का परिचायक है। आपका यह कृत्य बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली-1976 के नियम-3(iii) के प्रतिकूल है।

श्रुति भूल के कारण बेतार संवाद में CRL के बिन्दु 0.88 कि0मी0 से 0.98 कि0मी0 की जगह 88.00 कि0मी0 से 98.

00 कि0मी0 अंकित होने के कारण आरोप पत्र में भी उक्त बिन्दु अंकित हो गया था, जिसे विभागीय ज्ञापांक-2033, दिनांक 16.11.17 द्वारा सुधार कर शुद्धिपत्र निर्गत किया गया।

श्री सिंह के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-67, दिनांक 11.

04.18 द्वारा समर्पित किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोपी के बचाव बयान एवं विभागीय अभिमत के समीक्षोपरांत निम्न मंतव्य गठित किया गया :-

''आरोपित पदाधिकारी अपने कर्त्तव्य, विभागीय दिशा-निदेश एवं गंडक नदी के जल स्तर में अप्रत्याशित वृद्धि की स्थिति में चौकस रहते हुये विषयांकित कार्य स्थल पर उपस्थित रह कर, हो रहे पाईपिंग पर नियंत्रण का प्रयास एवं ससमय संबंधितों को सूचित किया जाता तो टूटान होने की संभावना नहीं बनती। परन्तु उनके द्वारा कर्त्तव्य एवं दिशा-निदेश के अनुरूप कार्य नहीं करने के कारण विषयांकित तटबंध में टूटान होना माना जा सकता है। उनका यह कृत्य कर्त्तव्य एवं विभागीय दिशा-निदेश के अनुपालन में घोर लापरवाही उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता की श्रेणी में माना जा सकता है। अतः आरोप प्रमाणित होता है।''

संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-970, दिनांक 26.04.18 द्वारा जाँच प्रतिवेदन की प्रति के साथ आरोपित पदाधिकारी से अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई। उक्त आलोक में श्री सिंह द्वारा कतिपय अभिलेख की मांग की गई जिसे विभागीय पत्रांक-1114, दिनांक 23.05.18 द्वारा उपलब्ध कराते हुए सात दिनों के अन्दर जवाब समर्पित करने का निदेश दिया गया। लेकिन पुनः उनके पत्रांक-26, दिनांक 04.06.18 द्वारा जवाब समर्पित न कर स्वयं प्रमंडल स्तर से कतिपय कागजात प्राप्त कर जवाब देने हेतु 15 दिनों के समय की माँग की बात कही गयी। अर्थात उनके द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब निर्धारित समय-सीमा के अन्दर समर्पित नहीं किया गया।

श्री सिंह के विरूद्ध प्रपत्र-'क' के गठन का आधार अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अंचल, पडरौना, कैम्प-कार्यस्थल का बेतार संवाद सं0 65 दिनांक 15.08.2017 है जिसमें उल्लेखित है कि दिनांक 15.08.2017 को सुबह लगभग 04.00 बजे CRL के बिन्दु 88.00 कि0मी0 से 98.00 कि0मी0 के बीच अचानक पाईपिंग शुरू हो गया, जिसकी सूचना दूरभाष पर मुख्य अभियंता एवं विभाग को देते हुये युद्धस्तर पर कार्य शुरू कर दिया गया। कार्य शुरू करने के दौरान बाँध कटने लगा, जिसके कारण ग्रामीण अपना सामान बचाने के लिए कार्य में लगे ट्रैक्टर का प्रयोग करने लगे। पाईपिंग के कारण लगभग 7.45AM बजे 15 मीटर की लम्बाई में बाँध कट गया। रात्रि के समय एवं सुबह पाईपिंग के समय तथा बाँध कट जाने तक कार्यपालक अभियंता, पडरौना श्री विजय कुमार सिंह, कार्य स्थल पर उपस्थित नहीं थे, जो उनके घोर लापरवाही, उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता का द्योतक है। विभागीय कार्यवाही संचालित किये जाने के दौरान श्री सिंह द्वारा संचालन पदाधिकारी के समक्ष बचाव-बयान समर्पित किया गया, जिसमें कहा गया कि उनके विरूद्ध नियमानुसार प्रपत्र-'क' गठित नहीं किया गया है। संचालन पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किये गये बचाव-बयान पर संचालन पदाधिकारी द्वारा विभागीय अभिमत की मांग की गई, जिसके अनुपालन में बिन्दुवार विभागीय अभिमत उपलब्ध कराया गया। विभागीय अभिमत में श्री सिंह के बचाव-बयान को स्वीकार योग्य नहीं पाया गया।

श्री सिंह के विरूद्ध मुख्य आरोप यह है कि बाँध में हो रहे पाईपिंग की सूचना उन्होंने उच्चाधिकारियों को नहीं दी तथा हो रहे पाईपिंग की रोक-थाम के लिए कारगर कदम नहीं उठाये। दूसरा आरोप यह है कि श्री सिंह दिनांक 14.08.2017 की रात्रि में एवं दिनांक 15.08.2017 को 8.00 बजे प्रातः तक अपने कार्य क्षेत्र में उपस्थित नहीं थे। इसकी पुष्टि इनके सरकारी मोबाईल के ट्रैकिंग डिटेल से हुआ। सरकारी मोबाईल के ट्रैकिंग डिटेल के अवलोकन से स्पष्ट है कि दिनांक 14.08. 2017 की रात्रि 8.44 बजे मोबाईल स्वीच ऑफ कर दिया गया। इसके बाद दिनांक 15.08.2017 की रात्रि 11.44 बजे तक इनका सरकारी मोबाईल या तो Switched Off पाया गया या Location could not be obtained पाया गया। इसके अतिरिक्त इनके अधीनस्थ कनीय अभियंताओं एवं अवर प्रमंडल पदाधिकारियों द्वारा लिखित रूप से सूचना दी गई कि श्री सिंह दिनांक 14.08.2017 की रात्रि से दिनांक 15.08.2017 के सुबह 8.00 बजे तक कार्य क्षेत्र में उपस्थित नहीं थे। श्री सिंह ने अपने बचाव बयान में कार्य क्षेत्र में उपस्थित होने के संबंध में ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया, जिससे कि आरोपों का खण्डन हो सके। इस प्रकार यह आरोप पूर्णतः प्रमाणित है कि श्री सिंह अपने कार्य क्षेत्र में उपस्थित नहीं थे एवं इसी कारण से बाँध में हो रहे पाईपिंग की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी जा सकी। इस प्रकार श्री सिंह के विरूद्ध गठित प्रपत्र-'क' में वर्णित आरोप पूर्णतः प्रमाणित होते है।

2. अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा समीक्षा की गई और समीक्षा में प्रमाणित आरोप को गंभीरता से लिया गया, क्योंकि बाढ़ जैसी आपदा की स्थिति में हजारों/लाखों जनजीवन प्रभावित होता है। जिसमें किसी प्रकार की लापरवाही, अनुशासनहीनता/कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही, जनसामान्य के प्रति अक्षम्य अपराध है। समीक्षोपरांत श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-01, पडरौना सम्प्रति निलंबित मुख्यालय मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, पटना को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम-14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड दिये जाने का विनिश्चय किया गया।62 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 3. बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से श्री सिंह के विरूद्ध विनिश्चित दण्ड प्रस्ताव पर परामर्श की माँग की गई जिस पर आयोग के पत्रांक-934 दिनांक-06.07.2018 द्वारा सहमति प्रदान की गयी। 4. अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-01, पडरौना सम्प्रति निलंबित मुख्यालय मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, पटना के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम-14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता है। 5. श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516), कार्यपालक अभियंता को सेवा से बर्खास्त करने के दण्ड प्रस्ताव पर मंत्रिपरिषद का अनुमोदन प्राप्त है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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24 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(सम0)02-04/2014-1566--श्री सच्चिदानंद सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता (आई0डी0-जे0 4966), बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या-2, झंझारपुर के पद पर पदस्थापित थे तो कमला-बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं कि0मी0 74.00 के पास कुम्हरौल गाँव एवं बौड़ ग्राम के पास दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान आदि आरोपों के लिए प्रथम द्रष्टया दोषी पाये जाने के कारण विभागीय अधिसूचना सं०-1107, दिनांक 16.08.14 द्वारा निलंबित करते हुए आपके विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही में नियुक्त संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-621, दिनांक 22.07.15 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित किया गया। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर किया गया एवं समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए असहमति के बिन्दुओं पर द्वितीय कारण पृच्छा करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया एवं साथ ही निलंबन अवधि डेढ़ साल व्यतीत हो जाने के कारण निलंबन मुक्त करने का भी निर्णय लिया गया।

उक्त के आलोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-755, दिनांक 10.05.16 द्वारा श्री सिन्हा को निलंबन मुक्त किया गया एवं विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 05.05.16 द्वारा असहमति के निम्न बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गयी - (1) बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर के कार्यक्षेत्राधीन दायाँ कमला बलान तटबंध के कि0मी0 74.80 एवं कि0मी0 70.00 के पास कुम्हरौल गाँव एवं बौड़ ग्राम के पास दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान एवं कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाही। (2) विभागीय निदेशों के अनुरूप तटबंध की गश्ती नहीं करने का आरोप प्रमाणित नहीं माना जा सकता है, लेकिन तटबंध की सुरक्षा में घोर लापरवाही बरतने, दायित्व के निर्वहन में घोर उदासीनता बरतने एवं सुरक्षा हेतु आवश्यक कार्रवाई नहीं करने का आरोप उक्त के आलोक में श्री सिन्हा द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब दिया गया है जो इस प्रकार है :- बिन्दु (1) (i) कमला नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा के फलस्वरूप दिनांक 15.08.14 को नदी का जलस्तर 52.85मी0 हो गया।

(ii) अपने कार्यक्षेत्र 44.00-75.00कि0मी0 के बीच सरकारी जीप BRG-5807 से सघन पेट्रोलिंग कर रहा था। (iii) प्रतिनियुक्त होमगार्ड तटबंध की सुरक्षा हेतु लगाये गये थे। (iv) कि0मी0 48.70 पर संवेदक संतोष कुमार यादव के माध्यम से जलश्राव रोकने का कार्य किया गया। (v) कि0मी0 60.68, 64.00, 67.00, 73.20, 73.40, 73.80, 69.0, 66.0, 70.80, 74.0 पर पाईपिंग पर नियंत्रण एवं कुछ बिन्दुओं पर पुनः नियंत्रण का कार्य श्री योगेन्द्र कुमार, कनीय अभियंता, श्री अशोक कुमार सिन्हा, कनीय अभियंता, श्री मनोज कुमार, कनीय अभियंता, श्री रामपुकार यादव, संवेदक एवं श्री संतोष कुमार यादव, संवेदक से लगातार सम्पर्क किया गया।

(vi) कि0मी0 70.80 पर 15.08.14 के अपराह्‌न में पाईपिंग की सूचना प्राप्त होने पर श्री रामपुकार यादव, संवेदक की मदद से पाईपिंग पर नियंत्रण पा लिया गया था कि एकाएक 5.40 बजे अपराह्‌न में श्री अशोक कुमार सिन्हा, कनीय अभियंता द्वारा कि0मी0 70.80 पर बाँध टूटने की सूचना दी गई। तत्‌क्षण 5. 45 बजे कार्यपालक अभियंता का सूचना दी गई।

(vii) टूटान को बाँधने का पहल किया गया। परन्तु अप्रत्याशित पानी के दबाव के कारण टूटान को रोकना संभव नहीं हो सका।

(viii) राशि 10.00बजे श्री सिन्हा, कनीय अभियंता द्वारा कि0मी0 74.00 पर बाँध टूटने की सूचना दी गई उस वक्त मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता के साथ कि0मी0 64.0 पर था।

(ix) खैरियत प्रतिवेदन लेते हुए एवं कार्यपालक अभियंता से प्राप्त निदेश के अनुसार कार्य कराते रहा। बिन्दु (2) (i) नदी का जलस्तर 52.00मी0 से उपर अथवा नीचे दोनों ही परिस्थिति में सघन पेट्रोलिंग की गईं है। (ii) तटबंध की सुरक्षा हेतु बालू का भंडारण स्वीकृत कार्यक्रम के अनुसार किया गया। (iii) दिनांक 15.08.14 को नीजी मोबाईल से 56(छप्पन) अद्‌द call तटबंध की सुरक्षा हेतु किया गया। संवेदक एवं कनीय अभियंता को बराबर निदेश देता रहा हूँ।63 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 (iv) तटबंध के कि0मी0 48.70, 60.80, 64.00, 66.00 69.00, 70.80, 73.20, 73.40 एवं 74.00 पर हो रहे पाइपिंग बिन्दु पर पहुँचकर पाइपिंग को नियंत्रित कराया गया। (v) कमला बलान नदी का जलस्तर खतरे के निशान से सुबह ही पार कर गया था। कार्यपालक अभियंता द्वारा दिये गये निदेश एवं मेरे द्वारा की गई वार्त्ता का साक्ष्य मोबाईल के Call detail से प्राप्त किया जा सकता है। (vi) तटबंध के कि0मी0 70.80 पर टूटान की सूचना एकाएक कनीय अभियंता द्वारा 5.40 बजे अपराह्‌न दिया गया जिसकी सूचना कार्यपालक अभियंता को 5.45 बजे दी गई। (vii) तटबंध के कि0मी0 74.00 पर टूटान की सूचना रात्रि 10.00 बजे कनीय अभियंता द्वारा दी गई। तत्पश्चात उक्त सूचना मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को अवगत करा दिया एवं उस समय उनके साथ कि0मी0 64.00 पर था। (viii) द्वितीय कारण पृच्छा के साथ संलग्न संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में कहीं भी आरोप प्रमाणित नहींं पाया गया है। जाँच पदाधिकारी द्वारा श्री मिथिलेश कुमार सिंह, कार्यपालक अभियंता श्री नवल किशोर सिंह, सहायक अभियंता, श्री दिनेश राय, सहायक अभियंता, श्री योगेन्द्र कुमार, कनीय अभियंता एवं श्री रमेश झा, जीप चालक से लिखित सूचना प्राप्त की गई है। प्राप्त सूचना में लापरवाही, उदासीनता या आवश्यक कार्रवाई नहीं करने का आरोप नहीं है। उक्त के आलोक में श्री सिन्हा से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी, जिसमें निम्न तथ्य पाया गया :- कमला बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं 74.00 पर दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान मामले में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 से कुल चार आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा गठित सभी आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया। परन्तु विभागीय समीक्षोपरांत प्रथम आरोप एवं चौथा आरोप (अंश) प्रमाणित पाया गया। जिसके लिए विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 05.05.16 से द्वितीय कारण पृच्छा की गई। द्वितीय कारण पृच्छा एवं इसके क्रम में आरोपी पदाधिकारी द्वारा दिए गए बचाव बयान से स्पष्ट होता है कि आरोपी पदाधिकारी द्वारा दोनों ही आरोपों के लिए सदृश बात कही गयी है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान दिये गये बयाव बयान सदृश ही द्वितीय बचाव बयान में तथ्य अंकित किया गया है। अर्थात कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री सिन्हा के विरूद्ध दायाँ कमला बलान तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं कि0मी0 74.0 पर दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान एवं कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाही बरतने, दायित्व के निर्वहन में घोर उदासीनता बरतने एवं सुरक्षा हेतु आवश्यक कार्रवाई नहीं करने के संबंध में दिया गया द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर स्वीकार योग्य नहीं है। फलस्वरूप श्री सच्चिदानंद सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर को प्रमाणित आरोप के लिए "एक (01) वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" का दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया। उक्त दण्ड निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का एवं बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है।

सरकार के स्तर पर लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री सच्चिदानंदन सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर सम्प्रति सेवानिवृत को विभागीय अधिसूचना संख्या-278, दिनांक 09.02.18 द्वारा निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया गया है -

"एक (01) वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"। उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा विभाग में पुर्नविलोकन अर्जी समर्पित किया गया जिसमें इनके द्वारा निम्न बातें कही गयी हैं -

(i) दिनांक 14.08.14 एवं दिनांक 15.08.14 को मेरे द्वारा तटबंध का सघन पेट्रोलिंग किया गया। (ii) तटबंध को बचाने हेतु हमलोगों द्वारा भरपुर प्रयास किया गया जो NR से स्वतः स्पष्ट है। (iii) तटबंध के पाईपिंग बिन्दु एवं टूटान बिन्दु पर टूटान से बचाने हेतु हमलोगों एवं ग्रामीणों द्वारा भी काफी प्रयास किया गया।

(iv) तटबंध सुरक्षा के लिए अपने कर्त्तव्यों के प्रति पूर्ण सजग था। तटबंध को बचाने हेतु सभी प्रकार का आवश्यक कदम मेरे द्वारा उठाया गया। अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग था जिसका प्रमाण कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या-2, झंझारपुर द्वारा लिखित पत्र से प्राप्त होता है।

(v) ई0 चन्द्रभूषण प्रसाद, जाँच पदाधिकारी-सह-अधीक्षण अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर अंचल, मधुबनी द्वारा जाँच प्रतिवेदन में कहीं भी दोषी नहीं ठहराया गया।

श्री सिन्हा द्वारा विभाग में समर्पित पुर्नलोकन अर्जी की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई, जिसमें पाया गया कि कमला-बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं 74.00 पर दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान मामले में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 द्वारा कुल चार आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। संचालन पदाधिकारी द्वारा गठित सभी आरोपों को अप्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया, परन्तु विभागीय समीक्षा में प्रथम आरोप एवं चौथा आरोप64 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 (अंश) प्रमाणित पाया गया, जिसके लिए विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 05.05.16 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। आरोपी पदाधिकारी द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में दिये गए जवाब, विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिए गए बचाव बयान के सदृश्य है। अर्थात कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। इस प्रकार आरोप सं०-1, दायाँ कमला-बलान तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं कि0मी0 74.00 पर दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान एवं कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाही बरतने एवं आरोप संख्या-2, तटबंध की सुरक्षा में घोर लापरवाही बरतने, दायित्व के निर्वहन में घोर उदासीनता बरतने एवं सुरक्षा हेतु आवश्यक कार्यवाई नहीं करने का आरोप प्रमाणित होता है। अतएव श्री सिन्हा का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है। उपर्युक्त विभागीय समीक्षा के आधार पर श्री सच्चिदानन्द सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध अधिरोपित दण्ड "एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" को बरकरार रखते हुए उनके पुनर्विलोकन अर्जी को स्वीकार करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री सच्चिदानन्द सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर सम्प्रति सेवानिवृत प्राक्कलन पदाधिकारी, उत्तर कोयल नहर प्रमंडल, अम्बा, औरंगाबाद द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना संख्या-278, दिनांक 09.02.18 द्वारा अधिसूचित दण्ड को बरकरार रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(सम0)02-08/2015-1568--श्री नन्द कुमार झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-02, खगड़िया सम्प्रति सेवानिवृत के पद पर पदस्थापित थे तो आपके विरूद्ध कार्य में अभिरूचि नहीं लेने, जिला पदाधिकारी के स्तर पर आयोजित समीक्षात्मक बैठक में सूचना देने के बावजूद भाग नहीं लेने, अध्यक्ष, कटाव निरोधक कार्य के स्थलीय जाँच में स्थल पर उपस्थित नहीं रहने तथा विभागीय एवं वरीय पदाधिकारी के आदेश की अवहेलना करने के लिए प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 में विहित रीति के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1832, दिनांक 23.08.16 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। उक्त विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान श्री नन्द कुमार झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के दिनांक 31.

01.17 को सेवानिवृत हो जाने के फलस्वरूप विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं०-24 सहपठित ज्ञापांक-376, दिनांक 08.03.17 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया गया।

विभागीय कार्यवाही में नियुक्त संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-31(सी0) दिनांक 18.10.16 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित किया गया। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर किया गया एवं समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए असहमति के निम्न बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा करने का निर्णय विभाग द्वारा लिया गया जो इस प्रकार है :-

कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-02, खगड़िया के हस्ताक्षरयुक्त दिनांक 28.05.15 तक का प्रगति प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि प्रमण्डलाधीन बाढ़ 2015 के पूर्व कुल 18 अद्‌द कार्य दिनांक 28.05.15 तक समाप्त हो चुका था। परन्तु मुख्य अभियंता के पत्रांक-2056, दिनांक 31.08.15 (जिसके द्वारा आरोप पत्र गठित कर विभाग को समर्पित किया गया है) के साथ दिनांक 02.03.15 तक का प्रगति प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि अधिकतर कार्यों की प्रगति धीमी रही है तथा एक एजेण्डा सं०-125/349 का कार्य प्रांरभ भी नहीं हुआ था। साथ ही दिनांक 14.03.15 को विभागीय स्तर पर आयोजित समीक्षात्मक बैठक में समीक्षोपरांत कार्य में रूची नहीं लेने के संबंध में आपसे स्पष्टीकरण किये जाने तथा स्थानांतरण का प्रस्ताव हेतु मुख्य अभियंता को निदेशित किया गया था। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि कार्य के प्रारंभिक अवस्था से ही आपके द्वारा कार्य में कोई रूची नहीं ली जा रही थी, भले ही प्रमण्डलाधीन के सभी कार्य बाढ़ 2015 के पूर्व दिनांक 28.05.2015 तक पूर्ण करा लिया गया हो।

(2) आरोप पत्र के साथ संलग्न जिला पदाधिकारी के पत्रों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि आप बाढ़ संबंधी तैयारी की समीक्षात्मक बैठक में अनुपस्थित रहे हैं जिसके लिए जिला पदाधिकारी, खगड़िया के द्वारा आपका वेतन बार-बार अवरूद्ध किया गया है। आपसे प्राप्त स्पष्टीकरण के समीक्षोपरांत जिला पदाधिकारी, खगड़िया के पत्रांक-1143(गो0) दिनांक 18.05.15 द्वारा चेतावनी संसूचित करते हुए आपका वेतन विमुक्त किया गया है। इसके बावजूद भी आपके द्वारा अपने कार्य-कलाप में कोई सुधार नहीं किये जाने के कारण अगले माह जून 2015 की समीक्षात्मक बैठक में पुनः अनुपस्थित रहने के फलस्वरूप जिला पदाधिकारी के पत्रांक-557(गो0), दिनांक 23.06.15 द्वारा आपके वेतन भुगतान अगले आदेश तक रोक दिया गया। संयुक्त सचिव (प्रबंधन), जल संसाधन विभाग के पत्र से स्पष्ट होता है कि जिला पदाधिकारी के पत्रांक-341, दिनांक 18.07.14 द्वारा आपके कार्य-कलाप के संदर्भ में संसूचन के आलोक में कार्यों में रूची नहीं लेने, बाढ़ पूर्व तैयारी से संबंधित आवश्यक निदेशों का अनुपालन नहीं करने तथा जिला पदाधिकारी द्वारा दूरभाष पर सूचना देने के बावजूद अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही बरतने एवं दिनांक 08.07.14 को जिला स्तर पर आयोजित समन्वय समिति एवं तकनीकी समिति की बैठक में अनुपस्थित रहने के लिए आपसे विभागीय पत्रांक-3703, दिनांक 01.08.14 द्वारा स्पष्टीकरण की माँग किया गया।

(3) आपके द्वारा कहा गया है कि दिनांक 14.03.15 को अध्यक्ष कटाव निरोधक कार्य द्वारा स्थल पर उपस्थित रहने का कोई निदेश नहीं दिया गया है एवं विभागीय पत्रांक-430, दिनांक 10.02.15 के कंडिका-'च' में अध्यक्ष को किसी प्रकार का निदेश क्षेत्रीय पदाधिकारी को नहीं दिया जाना है, को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि विभागीय65 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 पत्रांक-430, दिनांक 10.02.15 के कंडिका-5 में स्पष्ट रूप से अंकित है कि स्थल निरीक्षण के दौरान कार्यपालक अभियंता/सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता को सभी आवश्यक कागजात यथा साईट आदेश पंजी मापपुस्त, लेइंग रजिस्टर तथा अन्य अभिलेखों को अद्यतन कर मौजूद रहना है एवं जाँच दल के समक्ष प्रस्तुत किया जाना है। निरीक्षण पंजी पर दल के प्रधान का हस्ताक्षर प्राप्त किया जाना है। ऐसा नहीं करने पर संबंधित पदाधिकारी के विरूद्ध अनुशासनिक कार्रवाई करने का प्रावधान है। उक्त विभागीय पत्र के अनुसार दिनांक 09.03.15 से 13.03.15 के बीच जाँच दल का द्वितीय स्थल दौरा निर्धारित था एवं अध्यक्ष, कटाव निरोधक कार्य द्वारा मुख्य अभियंता को सूचित करना कि कार्यपालक अभियंता को सूचना देने के बावजूद वे स्थल पर उपस्थित नहींं हुए एवं आपके द्वारा अनमने ढ़ग से जवाब दिया गया। उक्त शिकायत के संदर्भ में मुख्य अभियंता द्वारा आपसे स्पष्टीकरण भी किया गया। उक्त के आलोक में आपसे प्राप्त स्पष्टीकरण में अंकित सभी बातों को असत्य एवं आधारहीन बताया गया।

उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उच्चाधिकारियों के आदेश/निदेश की अवहेलना करते हुए जानबूझ कर पूर्व से निर्धारित स्थल भ्रमण कार्यक्रम के तहत स्थल जाँच में उपस्थित नहीं होने के लिए आप दोषी हैं।

उक्त के आलोक में श्री झा द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में कहा गया है कि उन्होंने पूर्व में ही इस संबंध में अपना स्पष्टीकरण एवं बचाव-बयान संचालन पदाधिकारी के समक्ष दे चुके हैं। श्री झा द्वारा पूर्व में जो स्पष्टीकरण समर्पित किया गया है उसमें आरोपों के संदर्भ में निम्न बातें कही गयी हैं :-

(1) कार्य पूर्ण करवाने की जिम्मेदारी मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता, कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता, कनीय अभियंता एवं संवेदक की सामूहिक रूप से होती है। यदि कार्य की प्रगति धीमी थीे, तो इसके लिए सिर्फ कार्यपालक अभियंता को दोषी माना जाना कहाँ तक उचित है। कटाव निरोधक कार्य (2015) को पूर्ण करने की तिथि 15.05.2015 थी। एक कार्य छोड़कर सभी कार्य प्रारंभ (02.03.15 तक) पूर्ण हो चुका था। एजेण्डा सं०-125/349 कार्य पायलट चैनल सफाई का था। यह कार्य पायलट चैनल सफाई का था। यह कार्यस्थल बागमती नदी के उत्तर में था। जहाँ कार्य कराने हेतु यांत्रिक साधन नाव से ले जाना था। फिर जिस पायलट चैनल की सफाई करना था उसमें पानी या दलदल था। जिसे कार्य लायक सूखने की प्रतीक्षा की जा रही थी। इस संबंध में उल्लेखनीय है कि प्रमण्डलाधीन सभी कार्य एकरारित समय 15.05.15 तक पूर्ण हो चुका है। अतः कार्य में अभिरूची नहीं लिये जाने के आरोप के प्रमाणित नहीं माना जा सकता है।

(2) जिला पदाधिकारी, खगड़िया का पत्रांक-760, दिनांक 11.06.2015 द्वारा किये गये स्पष्टीकरण पर मेरे द्वारा समर्पित जवाब परिशिष्टि-2 पर संलग्न है। उल्लेखनीय है कि जिलाधिकारी द्वारा बैठक से अनुपस्थित रहने की बात कही गई जबकि मुख्य अभियंता द्वारा कार्य में अभिरूची नहीं लेने की बात कही गई है। स्पष्ट है कि मुख्य अभियंता द्वारा मामले को बढ़ा-चढ़ाकर प्रतिवेदित किये जाने के उद्‌देश्य से पत्र को संलग्न कर दिया गया है।

(3) जिला पदाधिकारी का पत्रांक-1143, दिनांक 18.05.15 मेरे वेतन को विमुक्त करने से संबंधित है, जबकि मुख्य अभियंता द्वारा उक्त पत्र को कार्य में अभिरूचि नहीं लेने के साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो विचारणीय बिन्दु है। (4) आरोप कंडिका 2 एवं 3 के संदर्भ में कहना है कि दिनांक 14.03.2015 को श्री शैलेश कुमार, अध्यक्ष कटाव निरोधक कार्य द्वारा दूरभाष पर स्थल पर उपस्थित रहने से संबंधित कोई निदेश अधोहस्ताक्षरी को नहीं दिया गया था, यह मुख्य अभियंता, खगड़िया के स्तर से गठित एक मनगढ़त आरोप है। इसी कारणवश इस आरोप के पुष्टि हेतु कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराये गये हैं। परिशिष्टि-5 पर संलग्न अभिलेख के अवलोकन से भी स्पष्ट कि उक्त तिथि को अध्यक्ष को कोई भ्रमण कार्यक्रम निर्धारित नहीं था। अतः साक्ष्य रहित इस आरोप को मेरे विरूद्ध प्रमाणित माने जाने का कोई आधार नहीं है। इसी परिशिष्टि पर संलग्न विभागीय पत्रांक-430, दिनांक 10.02.15 के कंडिका 'च' से स्पष्ट है कि अध्यक्ष को किसी प्रकार का निदेश क्षेत्रीय पदाधिकारी को नहीं दिया जाना था।

(5) अध्यक्ष कटाव निरोधक कार्य के अनुमति से मैं दिनांक 06.05.2015 को अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य मो0 शमशाद आलम के बुलाये जाने पर परिषदन खगडिया गया था। साक्ष्य के रूप में परिषदन में आहूत बैठक से संबंधित जिला पदाधिकारी खगड़िया के पत्र की प्रति संलग्न की जा रही है। उक्त बैठक के बाद दिनांक 07.05.2015 एवं 08.05.2015 को मैं स्थल निरीक्षण के क्रम में अध्यक्ष के साथ स्थल पर उपस्थित था। अतः विभाग को वरीय पदाधिकारियों के साथ सम्मान/शिष्टाचार से पेश नहीं आने का प्रश्न ही नहीं उठता है।

श्री झा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी जिसमें निम्न तथ्य पाये गये -

श्री झा ने अपने द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर मे ंअंकित किया है कि कटाव निरोधक कार्य को पूर्ण करने की तिथि 15.

05.2015 थी। एक कार्य को छोड़कर सभी कार्य दिनांक 02.03.2015 तक पूर्ण हो चुके थे। एजेण्ड सं०-125/349 से संबंधित कार्य पायलट चैनल के सफाई का था। यह कार्य स्थल बागमती नदी के उत्तर में था, जहाँ कार्य कराने हेतु यांत्रिक साधन नाव से ले जाना था। जिस पायलट चैनल की सफाई करना था, उसमें पानी या दलदल था जिसे सूखने की प्रतिक्षा की जा रही थी। सभी कार्य एकरारित सयम दिनांक 15.05.2015 तक पूर्ण हो चुके थे। अतः कार्य में अभिरूचि नहीं लेने का आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, खगड़िया द्वारा समर्पित दिनांक 28.05.15 तक के प्रगति प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि प्रमंडलाधीन बाढ़ 2015 के पूर्व कुल 18 अद्‌द कार्य दिनांक 28.05.15 तक समाप्त हो चुका था, परन्तु मुख्य अभियंता के पत्रांक-2056, दिनांक 31.08.15 के समय दिनांक 02.03.15 तक प्रगति प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि अधिकतर कार्यो की प्रगति धीमी रही तथा एक एजेण्डा सं०-125/349 का कार्य प्रारंभ भी नहीं हुआ । साथ ही दिनांक 14.3.2015 को विभागीय स्तर पर आयोजित समीक्षात्मक बैठक में समीक्षोपरांत कार्य में रूचि नहीं लेने के संदर्भ में66 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 श्री झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से स्पष्टीकरण किये जाने तथा स्थानांतरण का प्रस्ताव हेतु मुख्य अभियंता को निदेशित किया गया है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि कार्य के प्रारंभिक अवस्था से ही आरोपी द्वारा कार्य में कोई अभिरूचि नहीं ली जा रही थी। प्रपत्र-'क' के साथ संलग्न जिला पदाधिकारी के पत्रों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि श्री झा, बाढ़ तैयारी संबंधी समीक्षात्मक बैठक में लगातार अनुपस्थित रहे हैं, जिसके लिए जिला पदाधिकारी, खगड़िया के द्वारा इनका वेतन बार-बार रोका गया है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री झा के विरूद्ध कार्य में लापरवाही बरतने एवं समीक्षात्मक बैठक में लगातार रहने के संबंध में दिया गया द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर स्वीकार योग्य नहीं है। फलस्वरूप ई0 नन्द कुमार झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-02, खगड़िया सम्प्रति सेवानिवृत को प्रमाणित आरोप के लिए "पेंशन से 05(पाँच) प्रतिशत की कटौती एक वर्ष के लिए" का दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया। उक्त निर्णय दण्ड पर माननीय मुख्यमंत्री का अनुमोदन एवं बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है।

सरकार के स्तर पर लिए गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री नन्द कुमार झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-02, खगड़िया सम्प्रति सेवानिवृत को विभागीय अधिसूचना सं०-40, दिनांक 05.01.18 द्वारा निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया गया :-

"पेंशन से 05(पाँच) प्रतिशत की कटौती एक वर्ष के लिए"। उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री झा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता द्वारा विभाग में पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। श्री झा द्वारा अपने पुनर्विलोकन अर्जी में इस बात का उल्लेख किया है कि गठित प्रपत्र-'क' में किसी वित्तीय क्षति होने का उल्लेख नहीं है। यह सही है कि श्री झा के विरूद्ध किसी प्रकार की वित्तीय क्षति कारित करने का उल्लेख नहीं है, किन्तु विभागीय कार्यों में अभिरूची नहीं लेना, उच्चाधिकारियों के आदेश/निदेश की अवहेलना करना कदाचार की श्रेणी में आता है, जिसके लिए बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है। इसलिए श्री झा का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकारयोग्य नहीं है।

उपर्युक्त विभागीय समीक्षा के आधार पर श्री नन्द कुमार झा, से0नि0 कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध अधिरोपित दण्ड "पेंशन से 05(पाँच) प्रतिशत कटौती एक वर्ष के लिए" को बरकरार रखते हुए इनके पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री नन्द कुमार झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-02, खगड़िया सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना सं०-40, दिनांक 05.01.18 द्वारा अधिसूचित दण्ड को बरकरार रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1597--श्री अनिल कुमार (आई0डी0-5112), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, कटिहार सम्प्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सारण नहर अवर प्रमंडल, बसंतपुर को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री अनिल कुमार को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री कुमार का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1598--श्री ललन प्रसाद सिंह (आई0डी0-जे-7512), तत्कालीन कनीय अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज सम्प्रति सहायक अभियंता, जल विज्ञान निदेशालय, पटना को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल67 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री ललन प्रसाद सिंह को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री सिंह का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, मोतिहारी का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री सिंह के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1599--श्री सुरेश मिस्त्री (आई0डी0-जे-4831), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, अररिया सम्प्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, त्रिवेणी नहर अवर प्रमंडल, सुगौली को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री सुरेश मिस्त्री को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री मिस्त्री का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री मिस्त्री के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1600--श्री विजय शंकर सिंह (आई0डी0-जे-7643), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, कटिहार सम्प्रति सहायक अभियंता, मुख्य अभियंता का कार्यालय, समग्र, योजना अन्वेषण एवं योजना आयोजन, जल सांसधन विभाग, पटना को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री विजय शंकर सिंह को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री सिंह का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, मोतिहारी का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री सिंह के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1601--श्री विजय कुमार पाल (आई0डी0-5104), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, नरपतगंज सम्प्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सारण नहर अवर प्रमंडल-1, गरखा, गौरा को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की68 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री विजय कुमार पाल को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री पाल का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री पाल के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1602--श्री सुरेश चन्द्र झा (आई0डी0-जे-7577), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, अररिया सम्प्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, पुनपुन बराज अवर प्रमंडल-6, गोह को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री सुरेश चन्द्र झा को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री झा का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, मोतिहारी का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री झा के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1603--श्री अरूण कुमार पाण्डेय (आई0डी0-जे-8134), तत्कालीन कनीय अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-1, खगौल, पटना सम्प्रति प्राक्कलन पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, छपरा को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री अरूण कुमार पाण्डेय को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री पाण्डेय का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री पाण्डेय के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1604--श्री सुनील कुमार सिंह (आई0डी0-जे-8048), तत्कालीन कनीय अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बनमनखी सम्प्रति सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बनमनखी को मुख्य अभियंता, जल संसाधन69 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री सुनील कुमार सिंह को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री सिंह का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री सिंह के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1605--श्री सुधीर कुमार (आई0डी0-4478), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, दुर्गावती बाँध प्रमंडल-1, भीतरीबाँध को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री सुधीर कुमार को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री कुमार का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, मोतिहारी का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1606--श्री प्रेमचंद राम (आई0डी0-5111), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बनमनखी सम्प्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सारण नहर अवर प्रमंडल, जलालपुर को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री प्रेमचंद राम को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री राम का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री राम के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 70

25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1607--श्री शैलेन्द्र कुमार (आई0डी0-3803), तत्कालीन सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-1, खगौल, पटना सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, आरा को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री शैलेन्द्र कुमार को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री कुमार का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, मोतिहारी का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1608--श्री जवाहर लाल मंडल (आई0डी0-4456), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, अररिया सम्प्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अवर प्रमंडल, सकरीपौरा को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री जवाहर लाल मंडल को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री मंडल का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, मोतिहारी का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री मंडल के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1609--श्री शिवदानी पासवान (आई0डी0-4670), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज सम्प्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, पश्चिमी कोशी नहर अवर प्रमंडल, घोघरडीहा को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री शिवदानी पासवान को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री पासवान का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री पासवान के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।71 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

25 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1610--श्री महेन्द्र चौधरी (आई0डी0-4372), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, अररिया को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है। 2. श्री महेन्द्र चौधरी को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री चौधरी का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री चौधरी के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 27 जुलाई 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(मोति॰)-08-03/2013(अंश-1)(खण्ड-क)-1637--श्री बीरेन्द्र कुमार सिन्हा (आई0डी0-1760), तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-02, जल संसाधन विभाग, पटना के विरूद्ध नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना के अन्तर्गत एकरारनामा के विरूद्ध स्थानीय सामग्री उपयोग के बावजूद ढुलाई मद का भुगतान वास्तविक लीड की बजाय एकरारनामा मद दर के अनुरूप किये जाने संबंधी आरोप के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-296 दिनांक-12.03.2014 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली-2005 के नियम 17 के तहत्‌ विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। दिनांक-31.01.2016 को श्री सिन्हा के सेवानिवृत होने के कारण उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश ज्ञापांक-61 दिनांक-18.01.2017 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के तहत सम्परिवर्तित किया गया। नेपाल हितकारी योजना 2009 गंडक परियोजना के अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अधीन पुनस्र्थापन कार्य में एकरारनामा के विरूद्ध स्थानीय सामग्री का उपयोग किये जाने एवं भुगतान वास्तविक लीड के अनुसार न कर प्राक्कलन में प्रावधानित दर से किये जाने के आरोप की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग, निगरानी विभाग द्वारा की गयी। तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया कि कार्य में कम से कम 61.62 प्रतिशत स्थानीय सामग्री का उपयोग किया गया, जबकि भुगतान वास्तविक लीड के अनुसार न कर प्राक्कलन में प्रावधानित मद दर के अनुसार किया गया। इस आरोप के लिए अन्य अभियंताओं के साथ-साथ श्री सिन्हा, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-02 के विरूद्ध उनके निरीक्षण प्रतिवेदन में इस योजना में प्रयुक्त की जा रही स्थानीय सामग्रियों को चिन्हित नहीं किये जाने के आरोप के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। श्री सिन्हा के विरूद्ध गठित आरोप को संचालन पदाधिकारी द्वारा प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। विभागीय पत्रांक-503 दिनांक-11.04.2017 द्वारा संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री सिन्हा से द्वितीय कारणपृच्छा की माँग की गयी। उक्त आलोक में प्राप्त द्वितीय कारणपृच्छा उार के समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना सं0-44 दिनांक-05.01.2018 द्वारा उनके विरूद्ध निम्न दण्ड संसूचित किया गया :- ''बीस प्र्रतिशत पेंशन से कटौती पाँच वर्षों के लिए'' उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री सिन्हा द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया जिसमें निम्न तथ्यों का उल्लेख किया गया :-

(I) अभियंता प्रमुख (उार) के मौखिक आदेश से माननीय मुख्यमंत्री की सेवा-यात्रा में भाग लेने हेतु दिनांक-09.

11.2011 को बेतिया पहुँचा, दिनांक-10.11.2011 से 12.11.2011 तक मुख्य अभियंता, वाल्मीकिनगर के क्षेत्राधीन कई नहरों का क्षेत्र भ्रमण किया। इसी क्रम में मुख्य पश्चिमी नहर का भी क्षेत्र घुमा। दिनांक-12.11.2011 को किये गये निरीक्षण के दौरान रास्ते में कुछ ईंट देखे गये थें, जो देखने में अच्छी गुणवाा के नहीं लग रहे थें। इसलिए उन्हें हटाने का निदेश दिया गया। दाँये पथ पर कहीं भी चिप्स/सिंगल्स नहीं रखे थें। इसलिए पत्थर के टुकड़े की गुणवाा के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की गयी।

(II) मोनिटरिंग अंचल के अभियंता के साथ कोई प्रयोगशाला नहीं है। इसलिए निर्माण सामग्रियों की गुणवाा एवं विशिष्टि के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाना उचित नहीं है।

(III) स्थल भ्रमण के दौरान सेवा पथ में GSB,WMM, First Layer का कार्य पूर्ण हो गया था, जिसके कारण पत्थर की गुणवाा पर कोई टिप्पणी नहीं की गयी।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 72 (IV) सेवा पथ के निर्माण में स्थानीय सामग्री की प्रयुक्त होने की जानकारी उन्हें निरीक्षण की तिथि 12.11.2011 तक नहीं थी। दिनांक-04.05.2011 एवं 11.12.2011 को मुख्य अभियंता, वाल्मीकीनगर श्री दिनेश कुमार चौधरी द्वारा कार्यों का निरीक्षण किया गया था। उनके द्वारा भी सामग्रियों की गुणवाा एवं विशिष्टि पर कोई प्रतिकुल टिप्पणी नहीं की गयी। पश्चिमी मुख्य नहर के सेवा पथ में Stone Metal की आपूर्ति शेखपुरा से एवं बालू की आपूर्ति कोयलवर से किये जाने का प्रावधान था। किन्तु सड़क निर्माण में चिकने सतहयुक्त स्थानीय Stone Metal का व्यवहार किया गया, जिसके कारण कार्य की गुणवाा खराब हुई। तकनीकी परीक्षक कोषांग के प्रतिवेदन में कहा गया है कि सेवापथ के निर्माण में कम से कम 61.62 प्रतिशत स्थानीय सामग्री का प्रयोग किया गया है। श्री सिन्हा द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी में इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने 12.11.2011 को सेवा पथ का निरीक्षण किया था। चुँकि उनके पास सामग्रियों की गुणवाा जाँच हेतु किसी प्रकार का प्रयोगशाला स्थापित नहीं है, इसलिए निरीक्षण के दौरान व्यवहृत स्थानीय सामग्रियों के बारे में उन्हेंं जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी। एक तकनीकी पदाधिकारी होने के नाते श्री सिन्हा का यह कथन स्वीकार योग्य नहीं है कि प्रयोगशाला के अभाव में कार्य में प्रयुक्त सामग्रियों की गुणवाा के बारे में उन्हेंं जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी। ब्लास्टेड स्टोन एवं चिकने सतह वाले स्टोन की पहचान आँखों से भी किया जा सकता है। इसके निर्धारण के लिए प्रयोगशाला का होना आवश्यक नहीं है। श्री सिन्हा एक वरीय तकनीकी पदाधिकारी थें। माननीय मुख्यमंत्री की सेवा यात्रा के दौरान निरीक्षण के क्रम में प्रयुक्त की जा रही स्थानीय एवं गुणवााविहीन सामग्री को अपने निरीक्षण प्रतिवेदन में उदहारित (Disclose) किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया। वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री सिन्हा द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत किये जाने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है। उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-44 दिनांक-05.01.2018 द्वारा संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री बीरेन्द्र कुमार सिन्हा (आई0डी0-1760), तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-02, जल संसाधन विभाग, पटना संप्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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27 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(कटि0)-25-04/2017-1638--श्री बालेश्वर पासवान, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल-02, बनमनखी (पूर्णियाँ) सम्प्रति (निलंबित) के विरूद्ध विकास योजनाओं के पूर्ण हो जाने के बाद भी संवेदकों को भुगतान लंबित रखने, उच्चाधिकारी के सरकारी आदेशों की अवहेलना करने एवं सरकारी सेवक के र्निधारित आचार संहिता के प्रतिकूल व्यवहार करने के प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोप के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(1) (क) के तहत यो0 एवं वि0 विभाग के अधिसूचना संख्या-936, दिनांक 18.02.2016 द्वारा निलंबित किया गया, तदोपरांत उक्त आरोपों के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17(2) में विहित रीति से अधिसूचना संख्या-1277, दिनांक 04.03.2016 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री पासवान के विरूद्ध विकास योजनाओं के पूर्ण हो जाने के बाद भी संवेदकों को भुगतान लंबित रखने के आरोप को आंशिक प्रमाणित तथा उच्चााधिकारियों के सरकारी आदेशों की अवहेलना करने के आरोप को प्रमाणित पाये जाने का मंतव्य दिया गया।

संचालन पदाधिकारी के प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की सम्यक समीक्षा योजना एवं विकास विभाग द्वारा की गयी तथा आरोप को प्रमाणित पाते हुए श्री पासवान से पत्रांक-3816, दिनांक 28.07.16 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा/अभ्यावेदन की माँग की गयी। श्री पासवान से प्राप्त अभ्यावेदन की समीक्षा यो0 एवं विकास विभाग के स्तर से की गयी। जिसमें कोई नया तथ्य नहीं देने के कारण द्वितीय कारण पृच्छा को अस्वीकृत करते हुए वृहत दण्ड की अनुशंसा के साथ पैतृक विभाग (जल संसाधन विभाग) को समर्पित किया गया।

योजना एवं विकास विभाग से प्राप्त अभिलेख की समीक्षा की गयी, समीक्षा में पाया गया कि श्री बालेश्वर पासवान के विरूद्ध मुख्य रूप से निम्न दो आरोप प्रतिवेदित है जिसका विवरण निम्नवत है :-

आरोप 1 (i) -कार्यपालक अभियंता स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल-2, बगहा के पदस्थापन अवधि में आप के द्वारा विकास योजनाओं के पूर्ण हो जाने के बाद भी संवेदक के भुगतान को लंबित रखना, सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत कार्यान्वित भेडिहाडी कम्पार्ट से उराव बस्ती होते हुए तिरहुत नहर तक पी0सी0सी0 पथ निर्माण कार्य में गुणवत्तापूर्ण कराये जाने के बावजूद उक्त कार्य में संवेदक श्री मिथलेश यादव का भुगतान लंबित रखा गया, जिसके कारण श्री यादव को माननीय उच्च न्यायालय, पटना से न्यायादेश प्राप्त करना पडा तथा आपका स्थानान्तरण प्रशासनिक दृष्टिकोण से कार्य प्रमण्डल, बगहा में किया गया।

(ii) पूर्णियाँ जिला के अन्तर्गत अन्य पंचायत सरकार भवन के साथ श्रीनगर प्रखण्ड के गढिया बलुआ पंचायत सरकार भवन के निर्माण कार्य को पूर्ण प्रतिवेदित करते हुए आपके द्वारा आवंटन की माँग की गयी, इस आलोक में विभागीय पत्रांक-69, दिनांक 22.09.15 के द्वारा दो करोड़ की राशि उपलब्ध करायी गयी, इसी क्रम में उक्त योजना के संवेदक श्री प्रदीप कुमार महतो के द्वारा विभाग को एक आवेदन दिया गया कि पूर्ण कराये गये कार्य का भुगतान नहीं हो रहा है तथा इस हेतु उनके द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में एक वाद भी दायर किया गया है। दिनांक 10.11.15 को संयुक्त निदेशक योजना एवं विकास विभाग के कार्यालय कक्ष में भुगतान संबंधी विषय पर मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता73 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 (मुख्यालय) के साथ संबंधित कार्य0 अभि0 एवं संवेदक की एक बैठक की गयी जिसमें समीक्षोपरांत यह निर्णय लिया गया कि संवेदक के द्वारा कराये गये कार्य का भुगतान कर दिया जाए एवं यदि कार्य में कोई त्रुटि हो तो उसके लिए आवश्यक सुधार के साथ अवशेष राशि का भुगतान कर दिया जाय और इस आशय की तथ्य विवरणी तैयार कराकर अधीक्षण अभियंता के माध्यम से विभागीय अनुमोदन हेतु प्राप्त कराया जाय। अधीक्षण अभियंता स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य अंचल, पूर्णियाँ के द्वारा उक्त के संबंध में अपने पत्रांक-465, दिनांक 28.11.15 द्वारा मुख्य अभियंता को प्रेषित प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि कार्य पूर्ण एवं गुणवत्ता संतोषजनक है। दिनांक 26.11.15 को विभागीय राज्य स्तरीय समीक्षा बैठक में जब आपके भुगतान के संबंध में पृच्छा की गयी तो आपके द्वारा कहा गया कि चूँकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है अतएव भुगतान नहीं किया जाएगा, तत्पश्चात संबंधित वाद में न्यायादेश प्राप्त हुआ जिसमें भुगतान यथाशीघ्र करने का आदेश था। न्यायादेश प्राप्त होने के पश्चात जब आपको भुगतान करने के लिए कहा गया तो अपने पत्रांक-820, दिनांक 21.12.15 के द्वारा पुनः आवंटन की मांग आपके द्वारा यह कहते हुए की गई की पूर्व में आवंटित राशि का व्यय हो चुका है, फलतः विभाग द्वारा भुगतान हेतु अतिरिक्त राशि कार्य प्रमंडल-2, बनमनखी, पूर्णियाँ को प्राप्त करायी गयी। इससे स्पष्ट है कि आपके आचरण से राज्य सरकार को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।

(iii) इस प्रकार अन्य संवेदक मेसर्स पूर्णियाँ डेवलपर द्वारा सूचित किया गया कि राष्ट्रीय सम विकास योजना के अन्तर्गत अनुसूचित जनजाति आवासीय विद्यालय में अतिरिक्त 8 कमरे का कार्य पूर्ण हो जाने के बाद भी आपके द्वारा कराये गये कार्य का भुगतान नहीं किया गया जबकि अंतिम विपत्र कार्यालय में समर्पित है इस मामले में भी माननीय न्यायालय में वाद दायर है।

आरोप संख्या : 2-उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना करना। संचालन पदाधिकारियों द्वारा जाँचोपरांत आरोप संख्या 1 (i) अंशतः प्रमाणित 1 (ii) आंशिक प्रमाणित 1 (iii) प्रमाणित नहीं तथा आरोप संख्या-2 प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोप संख्या 1 (i) अंशतः प्रमाणित 1(ii) आंशिक प्रमाणित तथा आरोप संख्या-2 प्रमाणित आरोप के लिए श्री पासवान से अभ्यावेदन की माँग की गयी।

श्री पासवान से प्राप्त अभ्यावेदन की समीक्षा की गयी; जिसमें संचालन पदाधिकारी के आंशिक प्रमाणित मंतव्य को दृढ़ता पूर्वक अस्वीकार करते हुए आरोपित पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि अपने पत्रांक-शून्य/PE1 दिनांक 05.07.15 से सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता के पत्रांक-15, दिनांक 05.07.2014 से विषयांकित कार्य प्राक्कलन एवं विशिष्टि के अनुरूप नहीं होने तथा GSB की जाँच कराये बिना पी0सी0सी0 कार्य संवेदक द्वारा कराये जाने की सूचना का उल्लेख किया गया है। दिनांक 31.07.14 को अधीक्षण अभियंता एवं क्षेत्रीय योजना पदाधिकारी के स्थलीय जाँच के दौरान पी0सी0सी0 सड़क के बीच में मुटाई दिखाये जाने के संवेदक को निदेश दिये जाने के अनुरोध को जाँच पदाधिकारी द्वारा मना कर दिया गया।

कालान्तर में सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता के साथ सड़क की मुटाई जाँच के संयुक्त प्रयास को ग्रामीणाें के विरोध के कारण मापी संभव नहीं हो सका जिसकी सूचना अधीक्षण अभियंता को देते हुए दिशा निदेश की माँग की गई जो मेरे पदस्थापन अवधि तक प्राप्त नहीं हुआ।

कनीय अभियंता द्वारा दर्ज एवं सहायक अभियंता द्वारा हस्ताक्षरित दिनांक 28.11.2014 को उपस्थापित मापी पुस्त सं०-299 पर पूर्व में उनलोगों द्वारा विशिष्टि युक्त कार्य नहीं होने के पूर्व बयान के आलोक में उनसे स्पष्टीकरण माँगा गया। उनसे प्राप्त स्पष्टीकरण एवं अधीक्षण अभियंता के दिनांक 20.10.14 के मौखिक निदेश के आलोक में सड़क के अनुप्रस्थ परिच्छेद के दोनों किनारे की मापी, मापीपुस्त में दर्ज की गई तथा बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड पटना से अधीक्षण अभियंता के मौखिक निदेश के आलोक में गुणवत्ता प्रतिवेदन हेतु अनुरोध किया गया।

Non Destructive Test के रूप में हैमर टेस्ट कब और किसकी उपस्थिति में होने की जानकारी नहीं है और न Test Report मेरे कार्यकाल में प्राप्त हुआ। MIT मुजफ्फरपुर से गुणवत्ता प्रमाण पत्र किस तरह/किसको प्राप्त हुआ। विशेष कार्य पदाधिकारी को प्रतिवेदित जाँच प्रतिवेदन संलग्न नहीं है।

इसी क्रम में सड़क के बीचो-बीच मापी लेने हेतु सुरक्षा बल उपलब्ध कराने के जिला पदाधिकारी बेतिया से अनुरोध के क्रम में उनके पत्रांक-113, दिनांक 31.01.15 से आरक्षी अधीक्षक, बगहा को सुरक्षा बल उपलब्ध कराने का निदेश 22.02.15 को प्राप्त हुआ।

CWJC No- 2902/2015 में माननीय न्यायालय द्वारा पारित न्यायादेश दिनांक 23.02.15 के पूर्व ही स्थानांतरण हो जाने के कारण दिनांक 25.02.15 को प्रमंडल-2, बगहा के प्रभार से स्वतः मुक्त हो गया।

प्राक्कलन एवं विशिष्टि के अनुरूप कार्य करना एकरारनामा शर्त्तों के अनुरूप संवेदक की जिम्मेवारी है। अतएव भुगतान नहीं होने। विलम्ब होने के लिए मैं नहीं अपितु संवेदक जिम्मेवार है।

विभागीय समीक्षा :- अभिलेख से विदित होता है कि रू0 42,08,731 एकरारित राशि के अन्तर्गत कार्य समाप्ति के एकरारित तिथि 02.07.14 तक संवेदक द्वारा कार्य पूर्ण करा लिया गया है। संवेदक श्री मिथलेश यादव को भुगतान नहीं होने पर उनके द्वारा दायर सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-2902/2015 में माननीय न्यायालय द्वारा जाँचोपरांत संवेदक को भुगतान करने, संवेदक के Interest पाने का हकदार होने की जाँच एवं दर निर्धारण तथा उत्तरदायी पदाधिकारी के विरूद्ध कार्रवाई का निदेश का न्याय निर्णय दिनांक 23.02.15 को पारित किया गया, तदोपरांत आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही योजना एवं विकास विभाग द्वारा संचालित की गयी, जिसमें संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप आंशिक प्रमाणित पाया गया।74 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 19.04.16 को उपस्थित होकर बचाव-बयान दिया जाना स्पष्ट होता है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 19.04.16 को हस्ताक्षरित बचाव बयान उपलब्ध अभिलेख में संलग्नित नहीं रहना परिलक्षित होता है, परन्तु संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपित पदाधिकारी के बचाव बयान के संदर्भ में अंकित किया गया है कि संवेदक के विभिन्न मदो का कार्य विशिष्टियों के अनुरूप नहीं किये जाने के कारण ही कनीय अभियंता/सहायक अभियंता द्वारा संहिता में प्रावधान के तहत मापी अंकित एवं जाँच नहीं की गयी, फलस्वरूप भुगतान की कार्रवाई नहीं की जा सकी।

उपरोक्त से आरोपित पदाधिकारी द्वारा भुगतान नहीं किये जाने का सदृश्य तथ्य द्वितीय कारण पृच्छा में अंकित किया जाना परिलक्षित होता है यो0 एवं विकास विभाग द्वारा आरोपित पदाधिकारी के द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा में कोई नया तथ्य नहीं दिये जाने को अंकित किया गया है उक्त से यो0 एवं विकास विभाग की समीक्षा से सहमत होते हुए आरोपित पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा स्वीकार योग्य नहीं है।

आरोप संख्या- 1(ii) के संबंध में आरोपित पदाधिकारी के बचाव-बयान में अंकित किया गया है कि कार्यपूर्णता की सूचना एवं आवंटन की माँग ज्ञापांक-605, दिनांक 12.08.15 द्वारा कनीय अभियंता द्वारा दिनांक 05.07.15 को अंकित एवं सहायक अभियंता द्वारा दिनांक 06.07.15 को जाँचित मापीपुस्त के आधार पर कार्यालय प्रक्रिया के अधीन कार्यहित में की गई थी, लेकिन कार्यपालक अभियंता से अपेक्षित दायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए उक्त योजना पर नियम के प्रतिकूल कोई व्यय नहीं किया गया।

विभागीय समीक्षा :-आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि संयुक्त निदेशक एवं अन्य के साथ दिनांक 10.11.15 को बैठक में मेरे द्वारा भुगतान का आश्वासन दिये जाने के बाद संवेदक द्वारा दायर वाद में मेरे विरूद्ध गंभीर आरोप लगाये जाने के कारण भुगतान किया जाना न्याय संगत नहीं पाया गया एवं दिनांक 26.11.15 के बैठक में मामला न्यायालीय होने के कारण भुगतान में असमर्थता व्यक्त की गयी, परन्तु न्याय निर्णय प्राप्त होते ही त्रुटि से संबंधित मद को छोड़कर भुगतान कर दिया गया।

संचालन पदाधिकारी ने विभागीय निदेश की अवहेलना कर भुगतान को अनावश्यक लंबित रखने, भ्रामक सूचना के आधार पर आवंटन की माँग किये जाने एवं राज्य स्तरीय बैठक में आश्वासन के पश्चात भी निदेश की अवहेलना करने के आलोक में आरोप प्रमाणित पाया गया।

इस तरह द्वितीय कारण पृच्छा बचाव बयान के समीक्षा में नया तथ्य नहीं दिये जाने के आलोक में श्री पासवान से प्राप्त अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए उक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री बालेश्वर पासवान, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंता संगठन कार्य प्रमंडल-2, बनमनखी सम्प्रति (निलंबित) को निलंबन से मुक्त करते हुए निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर से लिया गया है :-

(i) तीन वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक। (ii) आरोप वर्ष के लिए निन्दन। (iii) दो वर्षो के लिए प्रोन्नति की देय तिथि से प्रोन्नति पर रोक। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री बालेश्वर पासवान, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंता संगठन कार्य प्रमंडल-2, बनमनखी सम्प्रति (निलंबित) को निलंबन से मुक्त करते हुए निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है :-

(i) तीन वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक। (ii) आरोप वर्ष के लिए निन्दन। (iii) दो वर्षो के लिए प्रोन्नति की देय तिथि से प्रोन्नति पर रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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30 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)-03-09/2017-1649--श्री राजीव नंदन मौर्य, सहायक अभियन्ता (निलंबित) आई0डी0 सं0-3498, मुख्यालय, मुख्य अभियन्ता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर द्वारा अपने नियमित प्रोन्नति को रद्द किये जाने के मामले को माननीय सर्वोच्च न्यायालय में नये तथ्यों के साथ जिसमें अपने आप को बिहार राज्य में जन्म एवं लालन-पालन के आधार पर बिहार राज्य के आरक्षित श्रेणी में घोषित किये जाने के संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं पटना उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निदेश के आलोक में श्री मौर्य के जन्म, निवास एवं जाति प्रमाण पत्र को सक्षम प्राधिकार द्वारा जाँचोपरांत उन सभी प्रमाण पत्रों को फर्जी पाया गया तथा उन प्रमाण पत्रोें को रद्द करते हुए श्री मौर्य के विरुद्ध भा0द0वि0 की धारा 420-467/468/471 के तहत गाँधी मैदान थाना, पटना में प्राथमिकी सं0-266/2017 दर्ज की गई है। श्री मौर्य द्वारा पदीय गरिमा को धूमिल करते हुए सरकारी कार्यालयों को धोखे में रखकर स्वंय के शपथपत्र के आधार पर बिहार राज्य से जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र एवं आवासीय प्रमाण पत्र प्राप्त करने तथा इन फर्जी प्रमाण पत्रों को माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष शपथ पत्र के माध्यम से साक्ष्य के रुप में दायर किये जाने के साजिशपूर्ण एवं धोखाधड़ी के कृत के चलते बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 9 (1) (ग) के प्रावधान के तहत इन्हें विभागीय अधिसूचना सं0-1099 दिनांक-06.07.17 द्वारा अगले आदेश तक निलंबित किया गया।75 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 श्री मौर्य के विरुद्ध उपर्युक्त आरोपों की गंभीरता को देखते हुए विभागीय अधिसूचना सं0-1100 दिनांक-07.07.2017 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। अपर सचिव-सह-संचालन पदाधिकारी, जल संसाधन विभाग के पत्रांक-157/डी0 दिनांक-31.10.17 द्वारा जाँच प्रतिवेदन प्राप्त हुुआ जिसमें श्री मौर्य के विरुद्ध अधिरोपित सभी आरोपों को पूर्णतया प्रमाणित पाया गया।

संचालन पदाधिकारी द्वारा प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत प्रमाणित सभी आरोपों के लिये बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के संगत प्रावधानों के तहत श्री मौर्य से द्वितीय कारण पृच्छा की गई। इसके अनुपालन में श्री मौर्य द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण अस्पष्ट रहने पर पुनः स्पष्ट जवाब समर्पित करने हेतु निदेशित किया गया। परंतु श्री मौर्य द्वारा स्पष्ट जवाब विभाग को समर्पित नहीं किया गया और ना ही कोई ऐसा तथ्य अंकित किया गया जिसमें आरोपों के बचाव एवं साक्ष्य से संबंधित तथ्य हो।

श्री मौर्य के विरूद्ध गठित आरोप, संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जांच प्रतिवेदन एवं श्री मौर्य द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण के समीक्षोपरांत पाया गया कि श्री मौर्य द्वारा अनैतिक कार्य किया गया जो सरकारी सेवक के लिये अशोभनीय है। उनका यह आचरण कर्त्तव्य के प्रति प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। श्री मौर्य के उक्त कृत्य से जल संसाधन विभाग, बिहार एवं राज्य सरकार की छवि धूमिल हुई। श्री मौर्य का यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के धारा-3 के प्रावधानों के प्रतिकूल है। अतएव श्री मौर्य सरकारी सेवा में बनाये रखने योग्य नहीं है।

अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा आरोपित पदाधिकारी श्री राजीव नंदन मौर्य, निलंबित सहायक अभियन्ता के विरुद्ध गठित आरोप, स्पष्टीकरण एवं जांच प्रतिवेदन की समीक्षा के उपरांत श्री मौर्य को आदेश की निर्गत तिथि से सेवा से बर्खास्तगी का दण्ड अधिरोपित करने का विनिश्चय किया गया।

विभागीय पत्रांक-1373 दिनांक-20.06.18 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग से श्री मौर्य के विरुद्ध विनिश्चित दण्ड पर परामर्श की मांग की गई। आयोग के पत्रांक-931 दिनांक-06.07.18 द्वारा विभागीय प्रस्तावित दण्ड प्रस्ताव पर आयोग की पूर्ण पीठ की सहमति विभाग को संसूचित की गई।

उक्त प्रस्तावित दण्ड पर माननीय विभागीय मंत्री, माननीय मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद का अनुमोदन प्राप्त है। अतः श्री राजीव नंदन मौर्य, सहायक अभियन्ता (निलंबित) आई0डी0 सं0-3498, मुख्यालय, मुख्य अभियन्ता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर को "आदेश की निर्गत तिथि से सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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31 जुलाई 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-07/2012-1655--श्री राम विनोद सिंह (आई0डी0-3798), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, लालगंज सेवानिवृत को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 12.06.12 को अभियंता प्रमुख (उत्तर) द्वारा गंडक नदी के बाँये तट पर 7.50कि0मी0 से 9.50कि0मी0 के बीच अवस्थित पहाड़पुर मनोरथ स्थल पर निरीक्षण के क्रम में दिये गये निदेश में बरती गई अनियमितता के लिए विभागीय पत्रांक-810, दिनांक 20.07.2012 द्वारा श्री सिंह से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं०-288, दिनांक 28.01.2015 द्वारा श्री राम, मुख्य अभियंता के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 (2) मे विहित रीति से प्रपत्र-'क' में गठित निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

(1) दिनांक 11.05.12 को प्रधान सचिव को मुजफ्फरपुर स्थित विभागीय निरीक्षण भवन में क्षेत्रीय पदाधिकारी से वार्ता के क्रम में इनके द्वारा बताया गया कि उक्त स्थल पर प्रस्तावित तीन अद्‌द स्पर निर्माण कार्य में से दो अदद स्पर निर्माण का कार्य पुरा करा लिया गया है। जबकि दिनांक 12.06.12 को अभियंता प्रमुख (उ0) के स्थल निरीक्षण में उक्त दोनों स्पर का निर्माण कार्य अधूरा पाया गया। अतएव गलत सूचना देने के लिए आप दोषी है।

(2) दिनांक 12.06.12 को अभियंता प्रमुख (उत्तर) द्वारा स्थल निरीक्षण के क्रम में कई निदेश दिया था। पुनः दिनांक 24.06.2012 को उनके स्थल निरीक्षण के क्रम में दिये गये निदेशों में से निम्नलिखित निदेशों के अनुपालन उनके द्वारा नहीं किया गया।

(क) दिनांक 12.06.12 को अभियंता प्रमुख के निरीक्षण के क्रम में स्पर सं०-3 का कार्य नहीं होने के कारण वैकल्पिक रूप से 300मी0 की लंबाई में बोल्डर रिभेटमेंट कार्य कराने हेतु एप्रोन के लिए 50-60मी0 की लंबाई में मिट्‌टी खुदाई कर दी गयी थी।

रिभेटमेंट कार्य हेतु 50-60मी0 की गयी खुदाई को अविलंब भर देने एवं ट्रैन्च के बीच में 03 स्थलों पर एन0सी0 से प्लग करने का स्थल पर उपस्थित सभी पदाधिकारियों को दिया गया था। ताकि, पानी बढ़ने पर चैनल एक्टिवेट नहीं हो। इसके अतिरिक्त एक अद्‌द क्रेटेड बेडवार जो अब OUT FLANK हो गया था को NSL तक रिभर साईड एवं कंट्रासाईड के NSL को मिलाते हुए जोड़ने का आदेश दिया गया था। ताकि, फॉल क्रियेट नहीं हो सके। उक्त निदेश का अनुपालन नहीं किया गया।76 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 (ख) तकनीकी सलाहकार समिति के अनुशंसा के आलोक में पायलट चैनल का निर्माण नहीं किये जाने के कारण स्पर सं०-1 अपस्ट्रीम ऑफसूट चैनल को यथा संभव मैनुअल लेबर से एकटीवेट करने को कहा गया था। जिसका अनुपालन नहीं किया गया।

(ग) स्पर सं०-1 अपस्ट्रीम में तटबंध के तरफ नदी रिफटिंग की प्रवृति को देखते हुए प्रतिवेदन तीन Reference point यथा स्कूल भवन ग्रामीण सड़क एवं पुराने रिंगबांध के निकट तटबंध एवं रीभर एज की दूरी मुख्यालय में प्रतिवेदित कराने का निदेश दिया गया था। ताकि, कटाव की दर का आकलन किया जा सके। उक्त निर्देश का भी अनुपालन नहीं किया जा सका।

(3) एजेण्डा सं०-113/376 के तहत तिरहुत तटबंध के 7.50कि0मी0 से 9.50कि0मी0 के बीच कटाव निरोधक कार्यों के तहत SRC की अनुशंसा के आलोक में उक्त स्थल पर विस्तृत सर्वेक्षणोपरांत एवं अद्यतन सेटेलाईट मैप के आधार पर पायलट चैनल के निर्माण की योजना तैयार कर समर्पित करनी थी। परन्तु आपके द्वारा उक्त अनुशंसा के आलोक में वांछित प्रस्ताव भी समर्पित नहीं किया गया।

(4) उक्त स्थल पर भू-अर्जन की समस्या के कारण स्पर सं०-3 का निर्माण कार्य प्रारंभ होने की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में स्थल पर 300मी0 में बोल्डर रिभटमेंट का प्रस्ताव (लागत राशि 3 करोड़) मुख्यालय को स्वीकृति हेतु दिनांक 25.05.2012 को भेजा गया। प्रस्ताव में तटबंध से नदी की दूरी 120मी0 बतलाई गई। जबकि दिनांक 12.06.12 को अभियंता प्रमुख (उ0) के द्वारा स्थल निरीक्षण में तटबंध से नदी (River Edge) के बीच की दूरी 291मी0 पाई गई। उड़नदस्ता द्वारा भी स्थलीय जाँच में तटबंध से रिभर ऐज की दूरी 317मी0 पाई गई। उक्त बोल्डर रिभटमेंट कार्य को अभियंता प्रमुख (उ0) द्वारा तकनीकी दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं बताया गया है। अतएव गलत स्थलीय स्थिति को दर्शाते हुए अनावश्यक रूप से बढ़ा चढ़ाकर 300मी0 की लंबाई में बोल्डर रिभेटमेंट का अनुपयुक्त प्रस्ताव सम्प्रेषित करना गलत मंशा परिलक्षित करता है।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन मे श्री सिंह, कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध सभी आरोपों को अप्रमाणित पाया है। फलस्वरूप संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं० 2(ख) 2(ग) एवं 4 को अप्रमाणित पाया गया। साथ ही संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होेते हुए आरोप सं०-1, 2(क) एवं 2(ग) को प्रमाणित पाते हुए असहमति के निम्न बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-2269 दिनांक 19.10.2016 से द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

आरोप सं० 1-दिनांक 11.06.2012 को मुजफ्फरपुर स्थित निरीक्षण भवन में वार्ता के क्रम में आपके द्वारा तत्कालीन प्रधान सचिव महोदय को बताया गया कि प्रश्नगत स्थल पर कराये जा रहे कटाव निरोधक कार्य के तहत तीन अद्‌द स्पर में से दो अद्‌द स्पर का कार्य पूर्ण करा लिया गया है। जबकि दिनांक 12.06.2012 को तत्कालीन अभियंता प्रमुख (उ0) के स्थल निरीक्षण में पाया गया कि स्पर सं०-1 को टैगिंग बाँध Proper profile एवं उपर के लेयर में कार्य नहीं कराया गया है तथा स्पर स०-2 में प्रथम वर्ष में क्रेटिंग का कार्य प्रगति में एवं द्वितीय स्लोप पर कार्य आरंभ नहीं किया गया है। टैगिंग बाँध भी डिजाईन सेक्शन में पूर्ण नहीं है। जिससे स्पष्ट है कि उनके द्वारा प्रधान सचिव को गलत सूचना दी गयी।

संचालन पदाधिकारी के द्वारा उनके कथन की दिनांक 11.06.12 को प्रधान सचिव को निरीक्षण भवन में समीक्षा के दौरान कहा गया था कि स्पर सं०-1 का कार्य टैगिंग बाँध को छोड़कर लगभग समाप्त था एवं स्पर सं०-2 का प्रथम वर्म तक सभी कार्य समाप्त करा लिया गया है। मात्र प्रथम वर्म के उपर का द्वितीय स्लोप एवं टैगिंग बाँध का कार्य प्रगति में था को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि कटाव निरोधक हेतु स्पर निर्माण में टैगिंग बाँध एवं प्रथम वर्म के उपर के अवशेष कार्य को साधारण प्रकृति का मामूली कार्य मानते हुए आपके द्वारा Substantially complete होने की सूचना दी गयी थी। जिससे संभवतः प्रधान सचिव के मन में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई होगी एवं गलत सूचना देने के लिए दोषी करार दिया गया।

संचालन पदाधिकारी का यह कहना कि प्रधान सचिव के मन में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होने के कारण गलत सूचना देने के लिए दोषी करार दिया गया है, से सहमत नहीं हुआ जा सकता है। जहाँ तक दो स्पर के कार्य पूर्ण होने की सूचना देने का प्रश्न है तो प्रधान सचिव के पत्रांक 84/ps दिनांक 18.06.12 में स्पष्ट अंकित है कि आपके द्वारा तीन स्पर में से दो स्पर का कार्य पूर्ण होने की सूचना दी गयी है। आपके द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे परिलक्षित हो सके कि आपके द्वारा प्रथम एवं द्वितीय स्पर के मुख्य भाग के निर्माण का Substantially complete होने की सूचना प्रधान सचिव को दी गयी थी। जबकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में भी स्पर सं०-1 में टैगिंग बाँध का कार्य प्रगति में पाया गया है तथा स्पर सं०-2 में भी प्रथम वर्म पर क्रेटिंग का कार्य होते हुए पाया गया है। उसके उपर द्वितीय स्लोप तथा टैंगिग बाँध का कार्य शेष था। अभियंता प्रमुख (उ0) के दिनांक 12.06.12 को दिये गये स्थल निरीक्षण में भी दोनों स्पर के कार्य को पूर्ण नहीं पाया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि दिनांक 11.06.12 तक स्पर सं०-1 एवं स्पर सं०-2 का कार्य पूर्ण नहीं हुआ था। अतः आरोप सं०-1 प्रमाणित होता है।

आरोप सं० 2(क) -संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्न तथ्यों के आलोक में आरोप को अप्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

(i) दिनांक 12.06.12 को स्थल पर दिये गये निदेश की सम्पुष्टि अपने निरीक्षण प्रतिवेदन द्वारा दिनांक 17.06.12 तक नहीं दिया जाना।77 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 (ii) दिनांक 12.06.12 को स्थल पर दिये गये मौखिक आदेश में अनेकों परिवर्तन के साथ निरीक्षण प्रतिवेदन पृष्ठांकित किया जाना।

(iii) आरोपी का कहना है कि संवेदक द्वारा कार्य प्रारंभ तो किया गया परन्तु आदेश की सम्पुष्टि नहीं होने के कारण भुगतान में अनिश्चितता उत्पन्न होने की आशंका के कारण कार्य बन्द कर दिया गया।

(iv) अभियंता प्रमुख (उ0) द्वारा अपने निरीक्षण प्रतिवेदन को ससमय क्षेत्रीय पदाधिकारियों को पृष्ठांकित नहीं करने एवं साथ ही उसमें फेरबदल की सूचना मिलने तथा एकरारित मदों से भिन्न मदों को कराने का मौखिक निदेश का अनुपालन द्रुतगति से कराना संभव नहीं हो सका। जिसके कारण समय से कार्य प्रारंभ नहीं हो सका।

अभियंता प्रमुख (उ0) का दिनांक 12.06.12 को निरीक्षण प्रतिवेदन दिनांक 13.06.12 को निर्गत है एवं उक्त प्रतिवेदन पत्रांक-1497 दिनांक 18.06.12 से पृष्ठांकित किया गया है। प्रश्न है कि दिनांक 12.06.12 को स्थल पर दिये गये निदेश की सम्पुष्टि में विलंब हो रहा था तो आपके द्वारा क्या कार्रवाई की गयी। जबकि बाढ़ सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्य में आपका दायित्व बनता था कि अभियंता प्रमुख द्वारा स्थल पर दिये गये निदेश की सम्पुष्टि में विलंब होने की स्थिति में अपने अधीनस्थ सभी पदाधिकारियों के बचाव बयान से परिलक्षित होता है कि दिनांक 12.06.12 के पश्चात दिनांक 18.06.12 तक स्थल पर दिये गये निदेश के अनुपालन करने के दिशा में न तो कोई रूचि ही ली गई और न ही ठोस कार्रवाई ही की गयी। अगर आपके द्वारा प्रयास किया जाता तो संभव था कि अभियंता प्रमुख (उ0) का निरीक्षण प्रतिवेदन दिनांक 13.06.12 को प्राप्त हो सकता था क्योंकि निरीक्षण प्रतिवेदन 13.06.12 को निर्गत हो चुका था।

OUT FLANK BOULDER BEDBAR को NSL तक जोड़ने हेतु दिये गये निदेश के अनुपालन नहीं होने के संबंध में कहा गया है कि दिनांक 12.06.12 को स्थल पर दिये गये निदेश की सम्पुष्टि दिनांक 17.06.12 तक नहीं होने तथा विभागीय पत्रांक-1497, दिनांक 18.06.12 द्वारा निर्गत निरीक्षण प्रतिवेदन में दिनांक 12.06.12 को स्थल पर बेडवार का एक्स्टेंशन जियो बैग से करने का निदेश को परिवर्तित कर क्रेटेड बोल्डर से करने का निदेश प्राप्त होने के पश्चात दिनांक 19.06.12 से कार्य प्रारंभ किया गया। लेकिन दिनांक 23.06.12 को असामाजिक तत्वों द्वारा कार्य को बन्द करा दिया गया। जिसकी प्राथमिकी संवेदक के प्रतिनिधि द्वारा स्थानीय थाना में दर्ज करायी गयी तथा क्षेत्रीय पदाधिकारी द्वारा भी थाना प्रभारी को सुरक्षा प्रदान करने का अनुरोध किया गया। पुनः 24.06.12 से शेष कार्य NC से कराकर दिनांक 27.06.12 तक पूरा कराते हुए इसका अनुपालन प्रतिवेदन विभाग को भेजा गया है, के आधार पर संचालन पदाधिकारी ने आरोप को प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया है, को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि दिनांक 12.06.12 का स्थल निरीक्षण का निरीक्षण प्रतिवेदन दिनांक 13.06.12 को विभाग से निर्गत है एवं प्रतिलिपि में उल्लेखित है कि इसकी सूचना दूरभाष से भी आपको दी गयी। आपका यह कहना है कि स्थल निरीक्षण के दौरान दिये गये निदेश को निरीक्षण प्रतिवेदन में परिवर्तित कर दिया गया, को साक्ष्य के अभाव में स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। अगर अभियंता प्रमुख द्वारा स्थल पर दिये गये निदेश में किसी प्रकार की दुविधा थी तो इसी समय उसका समाधान किया जाना चाहिए था अथवा अभियंता प्रमुख से पत्राचार कर मामले को निष्पादित करते हुए बाढ़ सुरक्षा जैसे कार्य को ससमय निष्पादित करना चाहिए था। परन्तु आपके द्वारा ऐसा नहीं किया गया। अत। आरोप से 2(क) प्रमाणित होता है।

आरोप सं० 2(ग)- स्पर सं०-1 के U/s में तटबंध के तरफ नदी सिफ्टिंग की प्रवृति को देखते हुए प्रतिदिन तीन Reference point यथा स्कूल भवन, ग्रामीण सड़क एवं पुराने रिंग बाँध के निकट तटबंध एवं रिभर एज की दूरी मुख्यालय को कटाव की दर का आकलन करने हेतु प्रतिवेदित करने के दिये गये निदेश का अनुपालन नहीं करने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा प्रमंडलीय स्तर पर संधारित आँकड़े में दिनांक 27.06.2012 तक नदी की सिफटींग प्रवृति में मामूली परिवर्तन होने तथा दिनांक 27.06.12 के बाढ़ नदी की सिफटींग प्रवृति के अधिक वृद्धि होने के फलस्वरूप इसकी सूचना प्रमंडलीय कार्यालय से मुख्य अभियंता सहित मुख्यालय को दिनांक 27.06.12 से दिये जाने के आलोक में आरोप सं०-2(ग) को प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है।

श्री सिंह, तत0 कार्यपालक अभियंता के बचाव बयान के साथ संलग्न अभिलेख से स्पष्ट होता है कि दिनांक 12.06. 12 को स्थल निरीक्षण के क्रम में अभियंता प्रमुख द्वारा दिये गये निदेश के अनुपालन में तीन Reference Point पर नदी के रिभर एज की दूरी प्रतिदिन मापीकर संधारित किया गया है। जिसकी पुष्टि श्री सिंह के बचाव-बयान से भी होती है। अतएव माना जा सकता है कि प्रमंडलीय कार्यालय में उक्त आँकड़ों का संधारण किया गया है। ऐसी स्थिति में श्री सिंह, कार्यपालक अभियंता का दायित्व था कि दिये गये निदेश का अनुपालन के लिए उच्चाधिकारियों एवं विभाग को उक्त आँकड़ों उपलब्ध कराते एवं अभियंता प्रमुख के दिनांक 24.06.2012 के द्वारा स्थल निरीक्षण के दौरान दिखलाते परन्तु श्री सिंह के द्वारा अपने पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं किया गया। जिसके लिए श्री सिंह दोषी पाये गये है। अतः आरोप सं०-2(ग) प्रमाणित होता है।

उक्त के आलोक में श्री राम विनोद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-01, दिनांक 16.01.17 जिसमें निम्न बातें कही गयी है :-

आरोप सं०-1 (i) दिनांक 11.06.2012 को प्रधान सचिव को प्रथम एवं द्वितीय स्पर निर्माण कार्य का मुख्य भाग का निर्माण Substantially complete होने की सूचना दी गई थी।

(ii) दिनांक 15.06.2012 को उड़नदस्ता के स्थल परिभ्रमण के उपरांत प्रेषित प्रतिवेदन से स्पष्ट उल्लेख है कि (क) 7.50KM पर स्थित स्पर-1 के नोज, सैंक एवं टॉप पर ब्रीक सोलिंग करा लिया गया है। मात्र टैंगिंग बांध पर मिट्‌टी कार्य कराया जा रहा था।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 78 (ख) 7.87KM पर स्पर-2 के प्रथम वर्म तक स्लोप तक मिट्‌टी कार्य नोज एवं सैंक के एप्रोन का प्रमुख कार्य किया जा चुका था। वर्म पर क्रेटिंग कार्य एवं IInd slope में मिट्‌टी कार्य प्रगति में था।

(ग) दिनांक 11.06.2012 को प्रमंडलीय स्तर से दिये गये प्रतिवेदन के आधार पर मुख्य अभियंता ने अपने पत्रांक-1621, दिनांक 13.06.2012 से प्रगति प्रतिवेदन विभाग को दी गयी। उक्त प्रतिवेदन में स्पर-1 एवं स्पर-2 की प्रगति क्रमश 96.82% एवं 77.48% प्रतिवेदित है।

वस्तुतः प्रधान सचिव का पत्रांक-84/PS दिनांक 18.06.2012 अभियंता प्रमुख के निरीक्षण प्रतिवेदन के आधार पर आधारित है। जिसमें अधिकांश भाग काल्पनिक है। इसी आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप अप्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोप सं० 2(क) ः- दिनांक 12.06.2012 को अभियंता प्रमुख (उ0) द्वारा स्थल निरीक्षण में कुछ कार्य करने का मौखिक निदेश दिया गया, परन्तु इस आशय का आदेश स्थल पंजी एवं निरीक्षण पंजी पर अंकित नहीं किया गया। फलतः संवेदक द्वारा लिखित आदेश की माँग की गयी। परन्तु अभियंता प्रमुख (उ0) के उक्त मौखिक निदेश जो उनके पत्रांक-753, दिनांक 16.02.2012 में निहित आदेश के आलोक में नहीं था। फलतः मेरे स्तर से कार्यपालक अभियंता के स्तर से संवेदक को लिखित निदेश देना संभव नहीं हो सका।

दिनांक 15.06.2012 को स्थल पर अभियंता प्रमुख (उ0) द्वारा दिये गये मौखिक आदेश में श्री संजय कुमार तिवारी द्वारा कुछ संशोधन की सूचना दी गयी एंव मुख्य अभियंता से आदेश प्राप्त कर अग्रेतर कार्रवाई की सूचना दी गई। इसी क्रम में दूरभाष पर मुख्य अभियंता से वार्ता करने पर उनके द्वारा निदेश प्राप्त हुआ कि निरीक्षण प्रतिवेदन प्राप्त होने पर कार्यान्वयन किया जायेगा। दिनांक 18.06.2012 को मुख्य अभियंता के मौखिक निदेश पर नाईलन क्रेट से ट्रेच प्लग करने एवं बोल्डर से आउट फ्लौंक बेडवार को जोड़ने का निदेश प्राप्त हुआ। तत्पश्चात दिनांक बेडवार को जोड़ने का निदेश प्राप्त हुआ। तत्पश्चात दिनांक 19.06.2012 से कार्य प्रारंभ किया गया। परन्तु दिनांक 23.06.2012 को असमाजिक तत्वो द्वारा अवरोध पैदा किया गया। जिसकी सूचना जिलाधिकारी को दी गयी।

आरोप सं० 2(ग) :- दिनांक 12.06.2012 से ही नीचे रेफरेंस बिन्दु पर रिभर ऐज की दूरी को प्रमंडलीय कार्यालय में प्रतिदिन संधारित किया गया है। उक्त से ज्ञात है कि दिनांक 24.06.2012 तक रिभर एज में मामूली परिवर्तन हुआ है एवं दिनांक 25.06.2012 से रिभर एज की गतिशिलता दर्शनीय तौर पर देखा गया। जिसे खैरियत प्रतिवेदन के साथ मुख्यालय को NR के माध्यम से सूचित किया गया। दिनांक 24.06.2012 को अभियंता प्रमुख को स्थल निरीक्षण में दिखलाया गया। उपरोक्त वर्णित तथ्यों से स्पष्ट है कि दिनांक 12.06.2012 को निरीक्षण प्रतिवेदन दिनांक 13.06.2012 को निर्गत है। जिसे दिनांक 18.06.2012 को मुख्य अभियंता को पृष्ठांकित कर निर्गत किया गया है। संभव है कि किसी खास कारण से जानबूझकर निलंबित किया गया। इसका आभास उनके द्वितीय निरीक्षण के बाढ़ निर्गत पीत पत्र के अंतिम कंडिका से होती है। इसी बीच श्री संजय कुमार तिवारी द्वारा स्थल पर दिये गये निदेश में व्यापक फेर-बदल होने की सूचना प्रभारी सहायक अभियंता को मिलने पर कार्यान्वयन हेतु मुख्य अभियंता से विचार विमर्श करने पर लिखित प्रतिवेदन मिलने तक इंतजार करने की सलाह दिया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री तिवारी, सहायक अभियंता से मौखिक आदेश में फेर-बदल होने की स्वीकारोक्ति के पश्चात सहमत होते हुए आरोप 2(क) एवं 2(ग) को अप्रमाणित पाया था।

श्री राम विनोद सिंह, तत0 कार्यपालक अभियंता, सम्प्रति सेवानिवृत से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

आरोप सं० 1 - जो स्पर निर्माण कार्य अधुरा रहने के बावजूद दिनांक 11.05.2012 के बैठक में तत्कालीन प्रधान सचिव महोदय को कार्य पूर्ण होने की गलत सूचना देने से संबंधित है।

यह आरोप तत्कालीन प्रधान सचिव के पत्रांक-84/PS दिनांक 18.06.2012 में उद्धित तथ्यों यथा दिनांक 11.05.2012 को मुजफ्फरपुर स्थित निरीक्षण भवन में वार्ता के क्रम में आरोपी द्वारा बताया गया कि तीन अद्‌द स्पर में से दो अद्‌द स्पर निर्माण का कार्य पूर्ण करा लिया गया जबकि दिनांक 12.06.2012 को अभियंता प्रमुख (उ0) के स्थल निरीक्षण में स्पर-1 एवं स्पर-2 का कार्य अधुरा पाया गया।

आरोपी का कथन है कि दिनांक 11.05.2012 को तत्कालीन प्रधान सचिव महोदय को स्पर-1 का कार्य टैगिंग बाँध को छोड़कर लगभग समाप्त होने एवं स्पर-2 का प्रथम वर्म के उपर 2nd shape एवं टैगिंग बाँध का कार्य प्रगति पर था की सूचना दी गयी थी को संचालन पदाधिकारी द्वारा स्वीकार करते हुए कहा गया है कि अवशेष कार्य साधारण प्रकृति का मानते हुए आरोपी द्वारा Substantially complete होने की सूचना दी गयी थी। जिसमें संभवतः भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई होगी एवं गलत सूचना देने के लिए दोषी करार दिया गया तथा आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया। चूँकि प्रधान सचिव के पत्रांक-84 /PS दिनांक 18.06.2012 में उद्धित है कि आरोपी द्वारा दिनांक 11.05.2012 को दोनों स्पर-1 तथा स्पर-2 का निर्माण कार्य की पूर्ण जानकारी दी गयी थी एवं इसके अतिरिक्त कोई साक्ष्य संचिका में नहीं है जिससे स्थापित हो सके की आरोपी द्वारा दोनों स्पर-1 एवं स्पर-2 का निर्माण का निर्माण कार्य दिनांक 11.05.2012 तक पूर्ण कराने की सूचना दी गयी है। मुख्य अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-1621, दिनांक 13.06.2012 से विभाग को समर्पित प्रगति प्रतिवेदन में दोनों स्पर के निर्माण कार्य की प्रगति क्रमशः 96.82 प्रतिशत एवं 77.48 प्रतिशत बताया गया है न कि पूर्ण होना। परन्तु तत्कालीन प्रधान सचिव के पत्रांक-84 /PS दिनांक 18.06.2012 में उद्धित तथ्यों को नकारा जाना भी उचित नहीं है। उल्लेखनीय है कि सामन्यतः किसी की प्रगति की प्रथम सूचना कार्यपालक अभियंता के द्वारा की उच्चाधिकारियों को दिया79 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 जाता है। क्योंकि कार्यपालक अभियंता कार्यो के कार्यान्वयन पदाधिकारी होते है। अतएव आरोप सं०-1 श्री सिंह के विरूद्ध प्रमाणित होता है।

आरोप सं० 2(क) :- संचालन पदाधिकारी ने निम्न तथ्यों के आलोक में आरोप को प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है।

(क) दिनांक 12.06.2012 को स्थल पर दिये गये निदेशों की समपुष्टि अपने निरीक्षण प्रतिवेदन द्वारा दिनांक 17.06. 2012 तक नहीं किया जाना।

(ख) दिनांक 12.06.2012 को स्थल पर दिये गये मौखिक निदेशों में परिवर्तन के साथ निरीक्षण प्रतिवेदन पृष्ठांकित किया जाना।

(ग) आरोपी का कहना है कि संवेदक द्वारा कार्य प्रारंभ किया गया था। परन्तु आदेश की सम्पुष्टि नहीं होने के कारण कार्य बन्द कर दिया गया ।

इस संबंध में आरोपी श्री सिंह द्वारा कहा गया है कि श्री संजय कुमार तिवारी, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना जो दिनांक 12.06.12 को स्थल निरीक्षण में अभियंता प्रमुख के साथ थे द्वारा दिनांक 15.06.12 को दिनांक 12.06.2012 को अभियंता प्रमुख द्वारा दिये गये मौखिक निदेश में संशोधन की सूचना दी गयी। साथ ही मुख्य अभियंता से आदेश प्राप्त कर अग्रेतर कार्रवाई करने संबंधि सूचना प्राप्त हुआ। इस क्रम में मुख्य अभियंता द्वारा निदेशित किया गया कि मौखिक आदेश को उनके निरीक्षण प्रतिवेदन प्राप्त होने के पश्चात ही कार्यान्वयन किया जायेगा। जिसकी पुष्टि मुख्य अभियंता के बचाव बयान एवं स्थल पंजी से होती है। ऐसी स्थिति में श्री सिंह के विरूद्ध आरोप सं०-2(क) जो अभियंता प्रमुख (उ0) के द्वारा दिनांक 12.06.2012 को दिये गये निदेश का अनुपालन यही करने से संबंधित है प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप सं० 2(ग) :-जो दिनांक 12.06.2012 को रिभर एज से तटबंध की दूरी मुख्यालय को प्रतिदिन उपलब्ध कराने के लिये दिये गये निदेश का अनुपालन नहीं करने से संबंधित है।

दिनांक 12.06.2012 को स्थल निरीक्षण के क्रम में अभियंता प्रमुख (उ0) द्वारा प्रतिदिन तीन रेफरेंस प्वाईंट पर तटबंध से रीभर एज की दूरी प्रतिदिन मुख्यालय को प्रतिवेदित करने का निदेश दिया गया था ताकि कटाव की गति का आकलन किया जा सके। अभियंता प्रमुख (उ0) के दिनांक 24.06.12 को निरीक्षण प्रतिवेदन में अंकित है कि आदेश का अनुपालन नहीं किया गया। अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि तीनों Reference point पर रिभर एज की दूरी माप कर प्रमंडल स्तर पर पंजी में संधारित किया गया है। परन्तु कार्यपालक अभियंता श्री सिंह द्वारा उक्त आँकड़े को दिनांक 27.06.2012 तक न तो उच्चाधिकारी एवं न ही विभाग को उपलब्ध कराया गया।

आरोपी श्री सिंह ने अपने द्वितीय कारण पृच्छा में ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है। जिससे परिलक्षित हो सके कि उनके द्वारा दिनांक 12.06.12 को दिये गये निदेश का अनुपालन करते हुए वांछित आकड़े विभाग अथवा वरीय पदाधिकारी को उपलब्ध कराया गया है। अतएव श्री सिंह कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध आदेश की अवहेलना करते हुए अधियाचित आँकड़े उपलब्ध नहीं कराने का आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री रामविनोद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, लालगंज वैशाली सम्प्रति सेवानिवृत को विभागीय अधिसूचना संख्या-54, दिनांक 09.01. 2018 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया :-

"पेंशन से पाँच प्रतिशत (5%) की कटौती एक वर्ष के लिए" उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री राम विनोद सिंह, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-03, दिनांक 06.04.2018 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कहीं गई है :-

संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए मुझसे द्वितीय कारण पृच्छा की गई थी। जिसका विस्तारपूर्वक बिन्दुवार जवाब मेरे द्वारा पूर्व में समर्पित किया गया था। परन्तु मेरे जवाब से असहमत होते हुए पेंशन से पाँच प्रतिशत (5%) की कटौती एक वर्ष के लिए दण्ड अधिरोपित करने का आदेश निर्गत किया गया।

उक्त निर्गत आदेश के संबंध में कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग, बिहार सरकार के पत्रांक-20233, दिनांक 08.

11.1978 में अंकित है कि सेवाकाल में ऐसे आरोपों के संबंध में प्रारंभ की गई वही विभागीय कार्यवाही उनके सेवानिवृत के बाद चालु रखी जाय जो प्रथम दृष्टया घोर कदाचार की कोटि में आते है अथवा यह विश्वास करने का यथेष्ट कारण हो कि उन्होंने अपने कदाचार द्वारा सरकार को वित्तीय क्षति पहुँचाई है जिसके लिए बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) के अधीन कार्यवाही की जाना चाहिए। जबकि मेरे द्वारा न तो कदाचार की गई है और न ही सरकार को वित्तीय क्षति ही पहुँचाई गई है।

श्री सिंह, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाया गया।

श्री सिंह ने अपने पुनर्विलोकन अर्जी में अंकित किया है कि सेवा काल में ऐसे आरोपों के संबंध में प्रारंभ की गई वहीं विभागीय कार्यवाही उनके सेवानिवृत के बाद चालू रखी जाय जो प्रथम दृष्टया घोर कदाचार की श्रेणी में आता हो अथवा यह विश्वास करने का कारण है कि उन्होंने अपने कदाचार से सरकार को गंभीर वित्तीय क्षति पहुँचाई हो। इस मामले में न तो उनके कृत्य से सरकार को किसी प्रकार की वित्तीय क्षति हुई है और न ही ऐसा कोई आरोप है जो घोर कदाचार की श्रेणी में आता है।80 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 श्री सिंह को उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना करना, स्पर निर्माण की गलत प्रतिवेदन प्रेषित करना एवं आवश्यक रूप से बढ़ा-चढ़ा कर 300मी0 की लंबाई में बोल्डर रिभेटमेंट का अनुपयुक्त प्रस्ताव भेजने के आरोप में श्री सिंह के विरूद्ध दण्ड संसूचित किया गया है। आरोपित बिन्दुओं पर श्री सिंह, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता के द्वितीय कारण पृच्छा की उत्तर को स्वीकार योग्य नहीं पाया गया। पुनर्विलोकन अर्जी में श्री सिंह द्वारा आरोपित बिन्दुओं के संबंध में किसी प्रकार का साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है। प्रपत्र-'क' में श्री सिंह के विरूद्ध गठित आरोप कदाचार की श्रेणी में आता है। समीक्षोपरांत वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री राम विनोद सिंह, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-54, दिनांक 09.01.2018 द्वारा संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री राम विनोद सिंह (आई0डी0-3798), तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, लालगंज सम्प्रति सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत किया जाता है एवं उक्त निर्णय श्री सिंह को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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1 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(औ0)-17-05/2017-1659--श्री अनिल कुमार जायसवाल, तदेन कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग, कार्य प्रमंडल, अरवल (सेवानिवृत) आई0डी0-2549 द्वारा अपने पदस्थापन काल में कार्य प्रमंडल, अरवल के अधीन मुख्य सड़क एन0एच0-98 के कलेर प्राथमिकी स्वास्थ्य केन्द्र तक पहुँच पथ के निर्माण कार्य में, मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजनान्तर्गत सरवरपुर से मुसोपुर सड़क निर्माण, मनमाने ढं़ग से कार्य आवंटन, बहादुरपुर से सुमेरा पथ भाग-1 एवं भाग-2 की मरम्मति कार्य एवं तीनों पथों के जाँच में एक पथ में एकरारनामा की राशि से 9.99 प्रतिशत अधिक भुगतान संबंधी अनियमितता के आरोप गठित करते हुए ग्रामीण कार्य विभाग के संकल्प ज्ञापांक संख्या-424, दिनांक-29.01.2014 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-14 एवं 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री जायसवाल दिनांक 31.10.2013 को सेवानिवृत हो चुके थे। अतएव उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही को ग्रामीण कार्य विभाग के आदेश संख्या-29, दिनांक 06.05.2014 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में सम्परिवर्तित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोप पत्र प्रपत्र-'क' में वर्णित आरोपों को प्रमाणित पाया गया। उल्लेखनीय है कि श्री अनिल कुमार जायसवाल का पैतृक विभाग, जल संसाधन विभाग होने के आधार पर विभागीय कार्यवाही में अग्रेत्तर कार्रवाई हेतु ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा सभी अभिलेखों को जल संसाधन विभाग को उपलब्ध कराया गया। श्री जायसवाल के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के क्रम में समर्पित जाँच प्रतिवेदन में प्रमाणित आरोपों के आलोक में बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) के तहत विभागीय पत्रांक-1674, दिनांक 20.09.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। जवाब अप्राप्त रहने की स्थिति में श्री जायसवाल को विभिन्न पत्रों के माध्यम से स्मारित किया गया, जो अबतक अप्राप्त रहा है। इस स्थिति में उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर विभागीय समीक्षा की गई। समीक्षा- प्रस्तुत आरोप एन0एच0-98 से कलेर पी0एच0सी0 तक पहुँच पथ निर्माण के लिए तीन निविदाकारों में से बैजनाथ निर्माण इंडिया प्रा0 लि0, राँची को 15% कम दर पर श्री जायसवाल द्वारा दर में छेड़-छाड़ करके 0.15% कर रूपये 5,37,719.00 गबन कर लिए जाने से संबंधित है। प्राप्त परिवाद के आलोक में कार्यपालक अभियंता, निगरानी प्रमंडल-1 (मु0)ग्रा0का0वि0 द्वारा मामले की जाँच की गई। जाँच प्रतिवेदन पत्रांक-614 अनु0, दिनांक-13.12.11 द्वारा निविदा पंजी में तीनों निविदादाताओं द्वारा 15% कम दर उद्धृत किए जाने, तुलनात्मक विवरणी में तीनों निविदादाताओं के B.O.Q के अंतिम पृष्ठ पर अंकित 15% कम दर को फोर्स इन्ट्री कर 0.15% कर दिया जाना पाया गया है। इस प्रकार जाँच पदाधिकारी द्वारा फोर्स इन्ट्री कर दर को 0.15% कम कर दिये जाने से राजस्व की क्षति होने एवं परिवाद पत्र में उल्लेखित आरोप प्रमाणित पाया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच पदाधिकारी के जाँचित अभिलेखों को सही पाते हुए आरोपी श्री जायसवाल के अंचलीय कार्यालय के निविदा पंजी में लिपिकीय भूल के कारण 0.15% दर को 15% अंकित होने के तथ्य को अस्वीकार करते हुए आरोप प्रमाणित पाया गया है। निविदा पंजी में तीनों निविदादाताओं का निविदित दर 15% अंक एवं अक्षर में अंकित होने तथा निविदादाताओं एवं पदाधिकारी को हस्ताक्षर स्पष्ट है। परिमाण विपत्र में 0.15.00% below अंकित होना स्पष्ट होता है जो संदेहास्पद प्रतीत होता है। क्योंकि 15 के पहले एवं बाद में दशमलव चिह्न दिये जाने का कोई औचित्य स्पष्ट नहीं होता है। साथ ही क्रमांक C में पंद्रह प्रतिशत बड़े अक्षरों में एवं दशमलव छोटे अक्षरों में अंकित होने से फोर्स इन्ट्री किये जाने से इंकार नहीं किया जा सकता है। तुलनात्मक विवरणी में निविदादाताओं द्वारा उद्‌दृत दर 15 प्रतिशत अनुसूचित दर से कम दर अंकित होना स्पष्ट होता है जो आरोपी श्री जायसवाल द्वारा हस्ताक्षरित है। उपरोक्त से आरोपी के लिपिकीय भूल के कथन को स्वीकार किये जाने का कोई आधार परिलक्षित नहीं होता है।81 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 निष्कर्ष-1-उक्त परिपेक्ष्य में उपरोक्त तथ्यों, जाँच पदाधिकारी एवं संचालन पदाधिकारी के समीक्षा एवं मंतव्य के आलोक में आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। (ब) सरवरपुर से मुसोपुर सड़क निर्माण में धांधली मामले में आरोपी श्री जायसवाल के बचाव-बयान का मुख्य सार :- संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से आरोपी के पत्रांक-32 दिनांक-09.02.12 सचिव ग्रा॰का॰वि॰ को पत्रांक-109 दिनांक-10.05.2013 संयुक्त सचिव ग्रा॰का॰वि॰ को एवं पत्रांक-शून्य दिनांक-24.07.2017 सं॰पदा॰ को सम्बोधित पत्रों में आरोप संदर्भित तथ्य दिया जाना स्पष्ट होता है। उक्त से मुख्यतः अरोपवार निम्न तथ्य अंकित किया जाना स्पष्ट होता है :- आरोप संख्या- 1ः- विषयांकित कार्य में GSB का कार्य जाँच मे नहीं पाये जाने एवं इसके लिए रू॰ 38.25 लाख भुगतान किये जाने के संबंध में आरोपी का कहना है कि बिहार लोक निर्माण एवं लेखा संहिता में दिये निदेश के आलोक में कार्यपालक अभियंता स्तर पर 10 प्रतिशत जाँच किया जाना है जो मेरे द्वारा किये जाने से आरोप नहीं बनता है। एकरारनामा कंडिका 10 एवं 7 में विशिष्टि के अनुरूप कार्य नहीं करने के लिए संवेदक को दंडित किये जाने एवं सभी चालू विपत्र अग्रिम भुगतान होने का प्रावधान है। प्रथम चालू विपत्र से किये गये कार्य के विरूद्ध दिनांक-10.06.11 को रू॰ 38.25 लाख भुगतान किया गया एवं 10% राशि सुधार हेतु रोककर रखा गया क्योकि GSB परत कुछ जगहों को छोड़कर मिलाई जा रही थी। दिनांक-16.06.11 को जाँच पदाधिकारी के स्थलीय जाँच के दौरान दिये गये निदेश एवं कमी के आलोक में GSB परत का कार्य विशिष्टि के अनुरूप करा दिया गया जिसे वर्त्तमान में भी किसी पदाधिकारी द्वारा देखा जा सकता है। आरोप संख्या- 2 :- विषयांकित कार्य में सहायक अभियंता द्वारा बिना मापी जाँच के गबन के नीयत से भुगतान किये जाने के संबंध में आरोपी का कहना है कि लोक निर्माण लेखा के संबंध में आरोपी का कहना है कि लोक निर्माण लेखा संहिता कंडिका-243 के तहत कनीय अभियंता द्वारा मापीपुस्त में अंकित मापी एवं तैयार विपत्र के प्रमंडलीय स्तर पर जाँचोपरान्त प्रथम चालू विपत्र का भुगतान में किसी तरह की अनियमितता नहीं है क्योकि बिना सहायक अभियंता के हस्ताक्षर के किसी विपत्र के भुगतान पर किसी नियम के तहत रोक नहीं है। आरोप संख्या- 3 :- पथ के किनारे सिंचाई हेतु पूर्व निर्मित नाली के कुछ स्थानों पर भर दिये जाने एवं कुछ स्थानों पर खुदाई कर दिये जाने से जनाक्रोश के संबंध में आरोपी का कहना है कि योजना में भूमी अर्जन का प्रावधान नहीं रहने के कारण भूधारियों के अनुमति से उनके जमीन से मिट्‌टी काटी जाती है एवं स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप मिट्‌टी कार्य कराया जाता है। पथ के रेखांकण में एक से डेढ़ फीट निर्मित नाली का कहीं कहीं कुछ भाग भर गया एवं कहीं खुदाई पथ निर्माण के लिए हो गया था जिसे सिंचाई में असुविधा न हो इस हेतु उनके अनुरोध एवं इच्छानुसार ठीक करवा दिया गया था जिसका उल्लेख जाँच प्रतिवेदन दिनांक- 21.6.2011 क कंडिका- 13 में किया गया है। आरोप संख्या- 4 :- पथ के दोनों तरफ खुदाई के कारण बने गड्‌ढ़े से दुर्घटना होने के संबंध में आरोपी का कहना है कि विषयांकित कार्य में भूमि अर्जन का प्रावधान नही रहने के कारण भू-खण्ड मालिकों के सहमकत से सीमीत क्षेत्र में मिट्‌टी काटे जाने की बाध्यता थी पथ की उँचाई 2-3 फीट में समुचित स्लोप में कर दिये जाने से दुर्घटना की गुंजाइश नहीं रह जाती है। समीक्षा :- श्री ब्रह्मदत साह, श्री दामोदर शर्मा एवं अन्य के परिवाद के आलोक में मामले की जाँच निगरानी प्रमंडल-3 (मु॰) ग्रमीण कार्य विभाग के कार्यपालक अभियंता द्वारा की गई। जाँच पदाधिकारी द्वारा दिनांक-16.06.11 को स्थलीय जाँच के दौरान मिट्‌टी कार्य होने Side Slope की आवश्यकता होने, पथ किनारे पूर्व निर्मित सिंचाई नाला कहीं भरा कही खुदा हुआ एवं पथ के दोनों किनारे से मिट्‌टी खुदाई के कारण खाई बना पाया गया है एवं G.S.B का कार्य नहीं हुआ पाया गया। साथ ही दिनांक- 10.06.11 तक रू॰ 38.25 लाख भुगतान एवं विपत्र/मापी सहायक अभियंता द्वारा हस्ताक्षरित नहीं होना अंकित किया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन एवं आरोपी के बयान के आलोक में पूर्ण समीक्षोपरांत आरोप प्रमाणित होने के निष्कर्षित किया गया है। बिना GSB कार्य कराये रू॰ 38.25 लाख के भुगतान/गबन के संबंध में आरोपी के बयान से स्पष्ट होता है कि दिनांक-10.06.11 को भुगतान के समय GSB कार्य कुछ स्थल को छोड़कर नहीं कराया गया था जिसे दिनांक-16.06.11 को स्थलीय जाँच के दौरान GSB कार्य जाँच पदाधिकारी द्वारा नहीं पाया गया। उक्त से बिना कार्य एवं जाँच के रू॰ 38.25 लाख भुगतान/गबन के लिए आरोपी जिम्मेवार प्रतीत होते है। सहायक अभियंता के बिना मापी जाँच के भुगतान से संबंधित आरोप-2 के संबंध में आरोपी द्वारा इसे स्वीकार किया गया प्रतीत होता है। सहायक अभियंता द्वारा भी मापी जाँच का संहिता/ परिपत्र में प्रावधान है। अतएव उनका कथन स्वीकार योग्य नहीं प्रतीत होता है। सिंचाई नाला को कुछ जगहों पर भरे जाने एवं कुछ जगहों पर खुदाई किये जाने से संबंधित आरोप सं॰-3 को स्वीकार किया गया है। जिससे आरोपी अथवा अन्य पदाधिकारी द्वारा कार्य के दौरान सथल पर नहीं जाया जाना प्रतीत होता है जो जनाक्रोश का कारण बना। अतएव आरोप प्रमाणित एवं बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। पथ के दोनों तरफ मिट्‌टी खुदाई कर खुदाई किये जाने संबंधित आरोप संख्या-4 के संदर्भ में आरोपी का कहना है कि भूमि अर्जन का प्रावधान योजना मे नहीं रहने के कारण भू-धारियों के अनुमति से मिट्‌टी कटाई की गई है। जाँच82 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 पदाधिकारी द्वारा पथ के दोनों तरफ मिट्‌टी कटाई के कारण उत्पन्न खाई पाया गया। पथ के नजदीक से मिट्‌टी खुदाई कर खाई किया जाना पथ की सुरक्षा एवं दुर्घटना के मद्‌देनजर उचित प्रतीत नहीं होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी अथवा अन्य सम्बद्ध पदाधिकारियों द्वारा कार्य के दौरान स्थल पर न जाकर संबेदक के विवेक से मिट्‌टी कटाई कार्य छोड़ दिया गया हो जिसके कारण पथ के नजदीक अधिक गहराई में मिट्‌टी काटकर मिट्‌टी भराई कार्य किया गया। अतएव आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। निष्कर्ष :-2 जाँच पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा की गई समीक्षा एवं निष्कर्ष से सहमत होते हुए आरोपी श्री अनिल कुमार जायसवाल के विरूद्ध सरवरपुर से मुसोपुर सड़क निर्माण में अनियमितता से संबंधित गठित आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। (स) अनियोजित अभियंता को सरकार द्वारा प्रदत सुविधा हेतु नियमों को नजर अंदाज कर मनमाने ढ़ंग से कार्यवंटन में अनियमितता :- आरोपी श्री जायसवाल का संचालन पदाधिकारी एवं अन्य पदाधिकारी को दिया गया बचाव बयान :- संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में उल्लेखित आरोपी के अभिकथन सूची के अवलोकन से संयुक्त सचिव ग्रा॰का॰वि॰ को सम्बोधित पत्र दिनांक-24.07.17 से आरोप संदर्भित तथ्य अंकित किया जाना स्पष्ट होता है। आरोपी द्वारा अपने पत्रांक-109 दिनांक-10.05.13 में प्रतिवेदित किया गया है कि जाँच प्रतिवेदन के साथ अनु॰ यथा निविदा कागजात पेपर कटिंग तुलनात्मक विवरणी, आरोप में संदर्भित पत्रों की छायाप्रति संलग्न नहीं है जिसके कारण सभी आरोप साक्ष्य विहिन हो जाते हैं। अपने पत्र दिनांक-24.07.17 में प्रतिवेदित किया गया है कि बिहार लोक निर्माण संहिता के अनुसार निविदा निष्पादन की शक्ति प्रदत है। उक्त प्रदत शक्ति के आलोक में नियमानुसार कार्रवाई की गयी थी। तुलनात्मक विवरणी पर उनके सिवा अन्य का हस्ताक्षर नहीं होने का विरोध करते हुए मूल संचिका अवलोकन करने को कहा गया है। साथ ही उनके कार्य शैली से स्थानीय राजनैतिक को नाखुश रहने, गलत कार्य हेतु दबाव देने एवं जान पर खतरा उत्पन्न होने को प्रतिवेदित किया गया है। समीक्षा ः- प्रस्तुत आरोप कार्यपालक अभियंता द्वारा आमंत्रित तीन ग्रुपों के निविदा निष्पादन सक्षमता के बाहर किये जाने नियमानुकूल नहीं होने एवं मनमाने ढ़ंग से एक ही निविदादाता को कार्यावंटन किये जाने से संबंधित है। परिवादी की जाँच निगरानी प्र॰-3 (मु॰) ग्रा॰ कार्य विभाग द्वारा की गयी जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से आरोपों में उल्लेखित तथ्यों के सदृश तथ्य जाँच में भी पाया जाना परिलक्षित होता है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से में उपरोक्त आरोपों को आरोप प्रमाणित पाया गया है। P.W.D. संहिता के कंडिका 294(VIII) के अनुसार कार्यपालक अभियंता रू॰ 3.5 लाख तक के निविदा को स्वीकार कर सकते हैं। प्रस्तुत मामले में आरोपी कार्यपालक अभियंता द्वारा रू॰8.00 लाख, 16.00 लाख एवं 25.00 लाख प्राक्कलित राशि से संबंधित निविदा का निस्तार किया गया है जो उनके सक्षमता में नहीं है। अतएव निर्माण संहिता में प्रदत शक्ति के अनुसार निविदा निस्तार किये जाने का उनका अभिकथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। निर्माण संहिता क नियम 163 में समान निविदित दर की स्थिति में लॉटरी के आधार पर चुनाव किया जाना है आठ ग्रुपों से संबंधित निविदा सूचना के ग्रुप सं॰-1 में श्री जयबहादुर सिंह एवं श्री सुभाष कुमार द्वारा समान दर (15% अनुसूचित दर से कम) निविदित करने की स्थिति में बिना लॉटरी के श्री जय बहादुर सिंह को निविदा निस्तार करते हुए कार्यावंटन किया जाना परिलक्षित होता है जो संहिता के प्रावधान का उल्लंघन माना जा सकता है। इसी प्रकार इसी निविदा के ग्रुप सं॰-7 का निविदा, निविदा खुलने की प्रकाशित तिथि 16.04.11 के बदले 18.04.11 को खोला जाना स्पष्ट होता है जबकि इसे नियमानुसार 16.04.11 को ही खोला जाना चाहिये था। इस प्रकार इस ग्रुप के निविदा निस्तार एवं कार्यावंटन में नियमों का उल्लंघन एवं मनमानापन किया जाना स्पष्ट होता है। जहाँ तक तुलनात्मक विवरणी पर अन्य कर्मी/पदाधिकारी का हस्ताक्षर नहीं होने के जाँच में पाये गये तथ्य के संदर्भ में आरोपी का मूल अभिलेख अवलोकन करने के अभिकथन के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा अभिलेख की जाँच में जाँचित तथ्य को सही पाया जाना स्पष्ट होता है। निष्कर्ष- 3ः- जाँच पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा की गई समीक्षा एवं निष्कर्ष से सहमत होते हुए आरोपी श्री अनिल कुमार जायसवाल के विरूद्ध अनियोजित अभियंता को सरकार द्वारा प्रदत्त सुवीधा हेतु नियमो को नजर अंदाज कर मनमाने ढ़ंग से कार्यावंटन से संबंधित गठित आरोप प्रमाणित होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा जो द्वितीय कारण-पृच्छा बयान में आरोप संदर्भित कोई तथ्य नहीं दिया गया है। अतः संचालन पदाधिकारी के मंतव्य सहमत होते हुए द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य नहीं पाया गया है। उपर्युक्त समीक्षा एवं निष्कर्ष के आलोक में श्री अनिल कुमार जयसवाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग कार्य प्रमंडल-02, अरवल संप्रति सेवानिवृत्त के विरूद्व गंभीर आरोप है जो ग्रामीण कार्य विभाग से संबंधित है। ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा श्री जायसवाल के विरूद्व संचालित विभागीय कार्यवाही में प्राप्त जॉच प्रतिवेदन एवं अन्य संबंधित अभिलेख की छायाप्रति जल संसाधन विभाग को भेजते हुए अनुरोध किया गया है कि जॉच प्रतिवेदन के आलोक में श्री जायसवाल के विरूद्व प्रमाणित आरोपों के लिए दंड के संबंध में निर्णय लिया जाय। श्री जायसवाल पर टेंडर के निष्पादन में अनियमितता, बिना कार्य कराये राशि का भुगतान एवं ग्रामीण कार्य विभाग को राजस्व क्षति पहुंचाने एवं निविदित दर में छेड़छाड़ करके दर को कम करते हुए संवेदक को लाभ पहूंचाने जैसे गंभीर आरोप प्रमाणित पाये गये है। उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अनिल कुमार जायसवाल, तदेन कार्यपालक अभियंता (सेवानिवृत) को निम्न दंड अधिरोपित करने का निर्णय विभाग द्वारा लिया गया है :-

83 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

"देय पेंशन की राशि में से 40% की राशि को स्थायी रूप से रोक"। उक्त दंड प्रस्ताव पर माननीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त दंड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना की सहमति प्राप्त है। उक्त दण्ड निर्णय के आलोक में श्री अनिल कुमार जायसवाल, कार्यपालक अभियंता (सेवानिवृत) को निम्न दंड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है। "देय पेंशन की राशि में से 40% की राशि को स्थायी रूप से रोक"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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2 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(सिवान)-11-19/2012-1676--श्री उमेश चन्द्र शर्मा (आई0डी0-2552), तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-1, मधुबनी, शिविर पडरौना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-1, शिविर पडरौना के अन्तर्गत वर्ष 2012 में कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों से संबंधित विभागीय उड़नदस्ता अंचल द्वारा प्रतिवेदित जाँच प्रतिवेदन के आलोक में उनके द्वारा बरती गयी अनियमितताओं के लिए बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1307, दिनांक 09.06.15 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र-'क' में गठित निम्नांकित प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी -

(1) बाढ़ अवधि 2012 में पी0पी0 तटबंध के 26.75कि0मी0 स्पर पर परकोपाईन का गलत NR रिपोर्ट किये जाने से सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाया जाना।

(2) पी0पी0 तटबंध के कि0मी0 22.00 से कि0मी0 28.00 तक पक्कीकरण का प्राक्कलन बढ़ा चढ़ाकर तैयार करने से सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाये जाने की मंशा रखना।

(3) दिनांक 15.06.12 से 19.06.12 तक लगातार कार्यस्थल तथा मुख्यालय से अनुपस्थित रहना। (4) NR-11 दिनांक 20.06.12 से आरक्षित बालू भरे बोरे की मात्रा कुल 12500 अद्‌द के विरूद्ध मात्र कुल 15000 अद्‌द का NR देकर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाना।

(5) श्री संतोष कुमार चक्रवर्ती, कनीय अभियंता को कार्य से हटाने से संबंधित अधीक्षण अभियंता को कार्य से हटाने से संबंधित अधीक्षण अभियंता बाढ़ नियंत्रण अंचल, पडरौना का स्थल पंजी पर दिनांक 01.05.12 को निर्देश दिये जाने के बावजूद उक्त निदेश का अनुपालन नहीं कर उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना करना।

संचालन पदाधिकारी के पत्रांक 15 दिनांक 03.06.16 द्वारा जाँच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया जिसमें आरोपित पदाधिकारी श्री शर्मा के विरूद्ध गठित आरोपों में से आरोप सं०-1 एवं 2 को अप्रमाणित तथा आरोप सं० 3, 4, एवं 5 को प्रमाणित प्रतिवेदित किया गया। विभागीय पत्रांक 2129, दिनांक 26.09.16 द्वारा जाँच प्रतिवेदन की प्रति संलग्न करते हुए द्वितीय कारण पृच्छा की गयी।

श्री शर्मा द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के बचाव बयान के समीक्षोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा श्री शर्मा के विरूद्ध आरोप सं०-1, 3, 4 एवं 5 को प्रमाणित पाया गया। प्रमाणित आरोपों के लिए श्री उमेश चन्द्र शर्मा को विभागीय अधिसूचना संख्या-2028, दिनांक 15.11.17 द्वारा "10 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से कटौती" का दंड दिया एवं संसूचित किया गया।

उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री शर्मा द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में सी0डब्लू0जे0सी0 नं०-1724/2018 दायर किया गया। उक्त याचिका में दिनांक 09.03.18 को पारित माननीय उच्च न्यायालय का आदेश निम्नवत है :-

"Accordingly, it is directed that the petitioner may file an appeal against the punishment order dated 15-11-17 within a period of two weeks and in case such appeal is filed, the appellate authority shall dispose off the same within a period of four weeks thereafter by taking a sympathetic view since the petitioner has already retired from service".

माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में दण्डादेश के विरूद्ध अपील अभ्यावेदन दिनांक 21.03.18 श्री उमेश चन्द्र शर्मा द्वारा उनके अधिवक्ता के माध्यम से विभाग को प्राप्त हुआ। उक्त समर्पित अभ्यावेदन में मात्र आरोप संख्या-1 के संदर्भ में अभ्यावेदन की कंडिका-8, 9, 10 में कहा गया है कि विभाग द्वारा मांगे गये द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब हेतु दिनांक 20.02.17 को कार्य से संबंधित कागजात यथा सामग्री लेखा, स्थल लेखा, पाली पंजी, फार्म-24 की माँग की गयी थी, परन्तु मात्र स्थल लेखा उपलब्ध कराया गया जो आर्टकिल-311(2) का उल्लंघन है। फलतः दिनांक 08.10.2016 को आंशिक जवाब दिया जा सका एवं उसी के आधार पर दिनांक 15.11.2017 को दण्डादेश निर्गत कर दिया गया जो नियमानुकूल नहीं है।

अपील अभ्यावेदन की समीक्षा में पाया गया कि श्री शर्मा के द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब के अवलोकन से स्पष्ट है कि श्री शर्मा द्वारा आरोप सं०-1 के संदर्भ में संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन की प्रति एवं माह जून, 2012 से अक्टूबर, 2012 तक परक्युपाईन भंडारण से संबंधित अवर प्रमंडल का स्थल लेखा/भंडार लेखा की सत्यापित प्रति की माँग करते हुए कहा गया था कि परक्युपाईन लेईंग कार्य में कोई गलत प्रतिवेदन नहीं दिया गया है।84 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 आरोप सं०-1 के संदर्भ में कार्य में संलग्न सहायक अभियंता, श्री कामेश्वर प्रसाद एवं कनीय अभियंता निखिलानन्द पाण्डेय से स्पष्टीकरण की माँग की गयी। इन दोनों पदाधिकारियों से प्राप्त स्पष्टीकरण में इन पदाधिकारियों द्वारा दिनांक 27. 07.2012 से 14.08.2012 के बीच कराये गये परक्युपाईन लेईंग कार्य से संबंधित पूर्ण अभिलेखों यथा पूर्ण पाली पंजी, एन0आर0 की पूर्ण अभिलेख तथा मापपुस्त उपलब्ध नहीं कराये जाने के फलस्वरूप संचिका में उपलब्ध अभिलेख यथा स्थल लेखा, अधूरा पाली पंजी एवं अधूरा एन0आर0 (बेतार संवाद) के आधार पर उक्त अवधि में कराये गये परक्युपाईन लेईंग कार्य के विवरणी सारणीबद्ध किया गया था। विवरणी के अनुसार स्थल लेखा से कुल 1881 अद्‌द परक्युपाईन सेट निर्गत किये जाने, उपलब्ध पाली पंजी में 493 अद्‌द अंकित होने तथा एन0 आर0 के माध्यम से कुल 1932 अद्‌द परक्युपाईन लेईंग कार्य प्रतिवेदित किये जाने के आधार पर माना गया था कि आलोच्य कार्य में वास्तविक रूप से कराये गये परक्युपाईन लेईंग कार्य से अधिक संख्या में एन0 आर0 (बेतार संवाद) के माध्यम से प्रतिवेदित किया गया है।

इस कार्य में संलग्न सहायक अभियंता, श्री कामेश्वर प्रसाद एवं कनीय अभियंता श्री निखिलानन्द पाण्डेय से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी के साथ संलग्न पूर्ण पाली पंजी, स्थल लेखा, एन॰आर॰ (बेतार संवाद) तथा मापपुस्त संलग्न करते हुए कहा कि कि॰मी॰ 26.75 पर अवस्थित स्पर एवं कि॰मी॰ 26.10 से 26.53 के बीच निर्मित 9 अद्‌द स्टर्ड पर बाढ़ 2012 अवधि में दिनांक 27.07.2012 से 14.07.2012 तक पाली पंजी के अनुसार कुल 2082 अदद्‌ परक्युपाईन की खपत अंकित है। एन॰आर॰ (बेतार संवाद) के माध्यम से कुल 2083 अदद्‌ परक्युपाईन लेईंग का कार्य प्रतिवेदित है तथा स्थल लेखा से निर्गत एवं मापपुस्त में किये गये इंट्री के अनुसार कुल 2080 अदद्‌ है।

अतएव प्रश्नगत स्थल पर कराये गये परक्युपाईन लेईंग कार्य हेतु स्थल लेखा से निर्गत परक्युपाईन सेट की सं0, पाली पंजी में दर्ज सं0 एवं एन0आर0 (वेतार संवाद) से प्रतिवेदित परक्युपाईन की सं0 में मात्र 2-3 अदद परक्युपाईन की भिन्नता परिलक्षित है। चूॅंकि स्थल लेखा से निर्गत परक्युपाईन के अनुरूप ही मापपुस्त में दर्ज किया गया है तथा भुगतान माप पुस्त के अनुरूप ही किया जाता है, अतएव अधिक भुगतान का मामला बनता प्रतीत नहीं होता है। ऐसी स्थिति में श्री शर्मा के विरूद्ध आरोप सं॰-1 प्रमाणित नहीं होता है। इस संदर्भ में इनके अर्जी का यह अंश स्वीकार योग्य है। श्री शर्मा से प्राप्त अपील अभ्यावेदन/पुनर्विचार अभ्यावेदन में अधिरोपित दण्ड से संबंधित अन्य प्रमाणित आरोपों यथा कार्यस्थल एवं मुख्यालय से अनुपस्थित रहना, एन0आर0 (बेतार संवाद) के माध्यम से गलत आरक्षित बालू भरे बोरो की सं0 को प्रतिवेदित कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुॅंचाने की मंशा रखना एवं उच्चाधिकारी के आदेश के अवहेलना करते हुए कनीय अभियंता को कार्यस्थल से नहीं हटाये जाने से संबंधित कोई तथ्य/साक्ष्य नहीं दिया गया है। उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन में बालू भरे बोराें की सं॰ 12500 के बदले 15000 प्रतिवेदित करने का आरोप है। उक्त तथ्यों के आलोक में श्री शर्मा के विरूद्ध प्रपत्र 'क' में गठित आरोप सं॰-1 प्रमाणित नहीं होता है। अन्य आरोप सं०-3, 4, एवं 5 यथा स्वेच्छापूर्वक कार्यस्थल/मुख्यालय से अनुपस्थित रहने, बेतार संवाद के माध्यम से गलत आरक्षित बालू भरे बोरों के भण्डारण की संख्या प्रतिवेदित कर सरकारी राशि की क्षति पहुँचाने की मंशा रखने एवं उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना करते हुए कनीय अभियंता को कार्यस्थल से नहीं हटाए जाने का आरोप प्रमाणित है। उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में सरकार द्वारा श्री शर्मा के अभ्यावेदन दिनांक 21.03.18 को अस्वीकृत करते हुए उनके विरूद्ध विभागीय अधिसूचना संख्या-2028, दिनांक 15.11.17 द्वारा पेंशन से "10 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से कटौती" का दंड को पूर्ववत बरकरार रखने का निर्णय लिया गया।

सरकार के उक्त निर्णयानुसार श्री उमेश चन्द्र शर्मा (आई0डी0-2552), तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-1, मधुबनी, शिविर पडरौना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-1, शिविर पडरौना के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना संख्या-2028, दिनांक 15.11.17 द्वारा पेंशन से "10 प्रतिशत पेंशन स्थायी रूप से कटौती" के अधिरोपित दंड को पूर्ववत बरकरार रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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8 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-10/2015-1722--श्री ओम प्रकाश अम्बरकर (आई0डी0 सं०-3467), तत्कालीन मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर सम्प्रति मुख्य अभियंता बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड, पटना को उनके मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के पद पर पदस्थापन अवधि के दौरान सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-22123/2014 शिवेश कुमार बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के मामले में ससमय तथ्य विवरणी तैयार नहीं करने, उच्च पदाधिकारियों के आदेश की अवहेलना करने एवं MOU में वर्णित कंडिकाओं का अनुपालन में अनियमितता बरतने के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं०-2274, दिनांक 06.10.2015 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17(2) के विहित रीति से निम्नलिखित आरोप के लिए प्रपत्र-'क' गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

आरोप सं०-1ः-सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-22123/2014 शिवेश कुमार बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के मामले में विभागीय अनुमोदन हेतु तथ्य कथन विवरणी पत्रांक-2647, दिनांक 19.12.2014 एवं पत्रांक-736, दिनांक 24.04.2015 द्वारा माँग की गई। पुनः तथ्य कथन विवरणी उपलब्ध कराने हेतु विभागीय पत्रांक-932, दिनांक 26.05.2015 द्वारा स्मारित कराया गया। मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के पत्रांक-2216, दिनांक 14.08.2015 द्वारा लगभग आठ माह की अवधि व्यतीत होने के उपरांत भी स्तरीय तथ्य विवरणी तैयार नहीं किया गया। इसमें राज्य सरकार का पक्ष मजबुती से नहीं रखे गये। साथ ही synopsis of the case संलग्न नहीं किया गया। वाद से संबंधित अधिकतर बिन्दुओं पर कंडिकावार तथ्य प्रस्तुत नहीं किये गये। अतः विभागीय पत्रांक-1586, दिनांक 19.08.2015 द्वारा कंडिकावार तथ्य विवरणी साक्ष्य के साथ विभाग को उपलब्ध85 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 कराने हेतु आपको निदेशित किया गया फिर भी आपके द्वारा वांछित तथ्यात्मक विवरणी उपलब्ध नहीं कराया गया। आपकी शिथिलता की वजह से मुख्य सचिव, बिहार, सचिव, जल संसाधन विभाग, पटना एवं अभियंता प्रमुख (उ0) सहित कुल आठ पदाधिकारियों को दिनांक 14.09.15 को माननीय उच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश पारित किया गया।

विभागीय निदेशों के बावजूद राज्य सरकार का पक्ष मजबूती से रखते हुए स्तरीय तथ्य विवरणी तैयार कर विभाग को अनुमोदन हेतु उपलब्ध नहीं कराया गया, जिसके फलस्वरूप मुख्य सचिव एवं सचिव, जल संसाधन विभाग सहित कुल आठ पदाधिकारियों को माननीय उच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पडे़गा जिसके लिए आप दोषी है। आरोप सं0-2ः- श्री नवल किशोर शाही, अध्यक्ष, कार्यान्वयन समिति एवं श्री अवनीश कुमार सिंह, माननीय सदस्य, बिहार विधान सभा से प्राप्त पत्र के आलोक में बागमती बाढ़ प्रबंधन योजना के तहत HSCL द्वारा कराये गये बागमती नदी के बाँये एवं दाँये तटबंध पर उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण एवं विस्तारीकरण एवं ब्रीक सोलिंग कार्य की जाँच उड़नदस्ता द्वारा की गई। जाँच प्रतिवेदन में अंकित तथ्यों के आलोक में अभियंता प्रमुख (उ0) जल संसाधन विभाग द्वारा विभागीय पत्रांक-1030, दिनांक 02.06.2014 जाँचफल में उद्धिृत तथ्यों का उल्लेख करते हुए गहन समीक्षोपरांत बिन्दुवार प्रतिवेदन/साक्ष्य सहित उपलब्ध कराने का निदेश दिया गया है। वांछित प्रतिवेदन अप्राप्त रहने की स्थिति में अभियंता प्रमुख (उ0) द्वारा पत्रांक-2655, दिनांक 10.11.14, 3646, दिनांक 18.12.14 तथा 2091, दिनांक 19.08.12 से भी स्मारित करने के बावजूद अभी तक आपके द्वारा न तो उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में उद्धिृत तथ्यों का अनुपालन ही किया गया एवं न ही वांछित प्रतिवेदन की उपलब्ध कराया गया है। फलस्वरूप आपकी उदासीनता के कारण मिट्‌टी ढुलाई मद में एवं अन्य मद में हुए अतिरिक्त भुगतान {78788441308153} रूपये का न तो समायोजन हो सका एवं न ही संवेदक से वसूली ही हो सकी, जो आपकी उदासीनता, आक्रमनता कार्य के प्रति लापरवाही तथा उच्च पदाधिकारियों के आदेश की अवहेलना को दर्शाता है। जिसके लिए आप दोषी है।

आरोप सं0-3ः- अभियंता प्रमुख (उ0) के पत्रांक-1030, दिनांक 02.06.14 के कंडिका-4 में उल्लेख है कि कार्य मद राज्यादेश के अनुसार विषयांकित कार्यों के घोषित नियंत्री पदाधिकारी मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर है किन्तु आपके द्वारा भी प्रमंडलीय पदाधिकारी को सही मार्गदर्शन एवं तकनीकी दिशा निर्देश प्राप्त नहीं किया गया। फलस्वरूप MOU के कंडिका-11 (पारा-11) जिसमें HSCL के स्तर से कार्य में किये गये विलंब की स्थिति में दण्ड का प्रावधान किया गया है का अनुपालन विधिवत रूप से नहीं हो पाया। इसके अनुपालन हेतु प्रत्येक वर्ष क्षेत्रीय स्थिति को देखते हुए Realistic programme of works पर विभाग एवं एजेंसी के आपसी सहमति के पश्चात अनुमोदन सक्षम पदाधिकारी द्वारा किया जाना है एवं प्रत्येक माह में इसकी उपलब्धि का आकलन करते हुए वर्ष के अंत में यदि एजेंसी के कारण उपलब्धि slippage हो तो कंडिका-11 के अनुसार एजेंसी उदासीनता के कारण कंडिका-11 के तहत संवेदक को दंड लगाने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई एवं इस संबंध में न विभाग को ही कोई प्रतिवेदन दिया गया जो आपके उदासीनता, आक्रमनता कार्य के प्रति लापरवाही तथा उच्च पदाधिकारियों के आदेश की अवहेलना एवं MOU में वर्णित कंडिकाओं का अनुपालन नहीं करना दर्शाता है एवं जिसके लिए आप दोषी है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-172(अनु0), दिनांक 30.03.16 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग में समर्पित किया गया जिसमें श्री अम्बरकर, तत0 मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के विरूद्ध आरोपों को आशिंक रूप से प्रमाणित पाये जाने का मंतव्य दिया गया।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-996, दिनांक 16.06.2017 द्वारा श्री अम्बरकर, मुख्य अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

उक्त के आलोक में श्री अम्बरकर, तत0 मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा अपने पत्रांक-306, दिनांक 26.07.17 द्वारा पूछे गये द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी हैं - आरोप सं०-1- इनके द्वारा विषयांकित वाद में तथ्य विवरणी विभाग को समर्पित करने हेतु संबंधित अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को लगातार पत्र भेजे गये तथा समय-समय पर स्मारित भी किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से अंकित हैं कि रीट याचिका में प्रतिशपथ पत्र दाखिल करने हेतु सामग्री एवं तथ्य विवरणी उपलब्ध कराने की मौलिक जिम्मेवारी संबंधित कार्यपालक अभियंता की ही होती है। संचालन पदाधिकारी ने जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख किया है कि उक्त वाद में तथ्य कथन विवरणी समर्पित करने में हुए विलंब के लिए दोषी अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता पर कार्रवाई चलाई गई अथवा नहीं जानकारी उपलब्ध नहीं है। दोषी कार्यपालक अभियंता पर ससमय कार्रवाई करने हेतु प्रपत्र-'क' गठन कर विभाग को भेजा गया। स्पष्ट है कि PWD Code में दी गई शक्तियों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाता है। अधीनस्थ पदाधिकारी द्वारा विलंब किये जाने के कारण उनके उपर विभागीय कार्यवाही संचालित है। उनके स्तर से किये गये विलंब के लिये मुझे दोषी ठहराना ठीक नहीं है। मेरे द्वारा कही भी शिथिलता नहीं बरती गई है और न ही तत्परता में कोई कमी लायी गयी है। अतएव लगाये गये आरोप से मुक्त करने की कृपा की जाय। आरोप सं0-2-विभागीय पत्रांक-1030, दिनांक 02.06.2014 में दिये गये निदेश के अनुपालन/ कार्यान्वयन हेतु भी संबंधित कार्यपालक अभियंता/अधीक्षण अभियंता को अनेकों पत्र लिखा गया एवं अनेकों बार स्मारित भी किया गया। परन्तु उनके स्तर से ससमय कार्रवाई नहीं की गई। किसी कार्य का Engineer in Charge संबंधित कार्यपालक अभियंता होते हैं। उनके86 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 द्वारा संबंधित अभिलेख विलंब से दिये जाने के कारण वांछित प्रतिवेदन दिनांक 19.09.2015 को समर्पित किया गया। साथ ही दोषी पदाधिकारी पर कार्रवाई का प्रस्ताव भी विभाग को समर्पित किया गया है अतएव अभिलेखों के अभाव में ससमय अनुवर्ती कार्रवाई नहीं करने के लिए मुझे दोषी ठहराना उचित नहीं है। जहाँ तक Excess भुगतान का प्रश्न है। इस संबंध में पत्रांक-2639, दिनांक 25.09.2015 द्वारा स्थिति स्पष्ट की जा चुकी है उक्त से स्पष्ट है कि कोई Excess भुगतान का मामला नहीं बनता है। विभागीय उड़नदस्ता द्वारा वास्तविक भुगतान की स्थिति में अवगत नहीं कराया गया। अतः आरोपमुक्त करने की कृपा की जाय। आरोप सं0-3-इनके द्वारा मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर का पदभार दिनांक 24.02.2014 को ग्रहण किया गया। जबकि विषयांकित कार्य की भौतिक एवं वित्तीय प्रगति मेरे कार्यावधि के काफी पूर्व का है Engineer in charge के रूप में कार्यपालक अभियंता, शिवहर द्वारा MOU के कंडिका-11 का अनुपालन करते हुए दण्डात्मक कार्रवाई की गयी है उक्त योजना को पूर्ण करने हेतु मार्च-2014 तक समय वृद्धि की गयी थी। एक तरफ MOU के शर्त्तों का अनुपालन कर कार्यपालक अभियंता द्वारा संवेदक पर कुल रू0 6.13 लाख का दण्ड लगाया गया है को विभाग द्वारा मात्र खानापूर्ति की संज्ञा दी गयी है तथा दुसरे तरफ स्थल की स्थिति यथा माओवादी की सक्रियता के कारण वर्ष 2009 से 2011 के बीच कार्य पूर्णतः बाधित रहा है को नजरअंदाज करते हुए ससमय कार्यान्वयन नहीं होने के लिए दोषी ठहराया जाना प्रासंगिक नहीं प्रतीत होता है वर्णित तथ्यों के आलोक में उदासीनता/अक्रमन्यता कार्य के प्रति लापरवाही तथा उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना के लगाये गये आरोप उचित प्रतीत नहीं लगता है। इनके द्वारा निवेदन किया गया है कि उपरोक्त वर्णित तथ्यों से स्पष्ट है कि मुख्य अभियंता के रूप में पदीय दायित्वों का निर्वहन तत्परतापूर्वक किया गया है PWD code में प्रावधानित प्रशासनिक क्षमताओं का उपयोग कर सभी कार्रवाई लिखित/मौखिक रूप से ससमय किया गया है। प्रशासनिक क्षमता के पारामीटर को मेरे कृत कार्रवाई एवं Written evidence से हटकर अनुमान के आधार पर अरोप लगाना उचित नहीं है। श्री अम्बरकर, मुख्य अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा को जवाब की समीक्षा अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा की गयी समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- विभागीय जाँच आयुक्त-सह-संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन श्री ओम प्रकाश अम्बरकर से प्राप्त बचाव-बयान तथा आरोप से संदर्भित अभिलेखों को सम्यक समीक्षोपरांत कहा गया है कि आरोपी पदाधिकारी के विरूद्ध प्रथम आरोप एक रीट याचिका मेें सरकारी पक्ष रखने के लिये जवाब तैयार करने से संबंधित है। दुसरा आरोप उड़नदस्ता की जाँच पर Follow up action एवं विस्तृत प्रतिवेदन समर्पित करने से संबंधित है एवं तीसरा आरोप योजना के कार्यान्वयन में हुए विलंब के लिए संवेदक के विरूद्ध दण्डात्मक कार्रवाई नहीं करने से संबंधित है तीनों आरोप का वास्तविक अनुपालन संबंधित कार्यपालक अभियंता द्वारा किया जाना था एवं अधीक्षण अभियंता द्वारा कार्यों की समीक्षा के बाद मुख्य अभियंता के माध्यम से अभियंता प्रमुख को प्रतिवेदन भेजना था। लोक निर्माण संहिता के मुताबिक मुख्य अभियंता की जवाबदेही महत्वपूर्ण है उनके स्तर से अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को नियमित अंतराल पर कार्रवाई के लिये निदेश भी दिया जाता रहा है इसके बावजूद अधीनस्थ पदाधिकारी द्वारा निदेश की उपेक्षा किये जाने की स्थिति में उनके विरूद्ध उचित प्रशासनिक कार्रवाई हेतु सरकार को अनुशंसा नहीं भेजना आरोपित पदाधिकारी की प्रशासनिक क्षमता पर प्रश्नचिन्ह उत्पन्न करता है। उक्त तथ्यों के आलोक में आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध आंशिक शिथिलता का आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य संचालन पदाधिकारी द्वारा दिया गया है। आरोप सं०-1-श्री अम्बरकर मुख्य अभियंता द्वारा आरोप सं०-01 के संदर्भ में कहा गया है कि उक्त वाद में तथ्य विवरणी समर्पित करने हेतु अनेकों बार मासिक बैठक एवं पत्राचार के माध्यम से तथा समय-समय पर दूरभाष पर संबंधित पदाधिकारी को निदेशित किया जाता रहा है अंततः तथ्य विवरणी में हुए विलंब के लिये विभागीय कार्यवाही संचालित करने हेतु प्रपत्र-'क' गठित कर विभाग को भेजा गया। स्पष्ट है कि PWD Code में दी गई शक्तियों का प्रभावी ढं़ग से मेरे द्वारा उपयोग किया गया है। संचिका में उपलब्ध अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि प्रश्नगत वाद का रिट आवेदन विभाग द्वारा पत्रांक-2647, दिनांक 19.12.2014 द्वारा आरोपी को उपलब्ध कराते हुए तथ्यकथन की माँग की गयी तथा स्मारित भी किया गया। इसके बावजूद आरोपी द्वारा रूटीन ढ़ग से विभिन्न पत्रों के माध्यम से अधीनस्थ पदाधिकारी से पत्राचार किया जाता रहा। अंततः माननीय न्यायालय द्वारा मुख्य सचिव सहित अन्य पदाधिकारी को Physically appearance होने का आदेश पारित किया गया। लगभग नौ माह बाद दिनांक 07.09.15 को तथ्यकथन विभाग को उपलब्ध कराया गया। श्री अम्बरकर का कहना है कि इस मामले में दोषी अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही हेतु प्रपत्र-'क' गठित कर विभाग को दिया गया। खण्ड संचिका से स्पष्ट है कि श्री अम्बरकर द्वारा दिनांक 30.10.15 को तीन पदाधिकारी के विरूद्ध प्रपत्र-'क' गठित कर अभियंता प्रमुख को उपलब्ध कराया गया है। इस प्रकार देखा जाय तो श्री अम्बरकर मुख्य अभियंता के विरूद्ध विभाग द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित करने के पश्चात दिनांक 22.10.15 को प्रपत्र-'क' गठित कर दो माह के बाद अपने बचाव में अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र-क गठित किया जाना परिलक्षित होता है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि इनकी प्रशासनिक विफलता के कारण ससमय तथ्यकथन विवरणी विभाग को उपलब्ध नहीं हो सका। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं०-1 को प्रमाणित पाया जाता है। आरोप सं0-2-इस आरोप के संदर्भ में आरोपी द्वारा वही तथ्य दर्शाया गया है जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है एवं कहा गया है कि वांछित अभिलेख उपलब्ध कराने हेतु पदाधिकारी के रूप में87 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 पत्राचार, मौखिक/दूरभाष कर निदेश दिया जाना एक विकल्प था जो लगातार किया गया। अतएव अभिलेख के अभाव में विभागीय निदेशानुसार उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन पर ससमय अनुवर्ती कार्रवाई नहीं हुई। संचालन पदाधिकारी द्वारा मामले के सम्यक समीक्षोपरांत माना गया है कि निदेश का अनुपालन अधीनस्थ पदाधिकारी द्वारा नहीं किये जाने की स्थिति में PWD code के तहत उनके विरूद्ध प्रशासनिक कार्रवाई हेतु सरकार को अनुशंसा नहीं भेजा जाना इनकी प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। जिससे सहमत होते हुए आरोप सं०-02 प्रमाणित होता है। आरोप सं0-3-इस आरोप के संदर्भ में श्री अम्बरकर, मुख्य अभियंता द्वारा कहा गया है कि स्थल की स्थिति के अनुसार माओबादी/अप्रीय होते घटनाओं के कारण ससमय योजना के कार्यान्वयन नहीं होने के लिए जब MOU के तहत कार्यपालक अभियंता द्वारा रू0 6.13 लाख का संवेदक के विरूद्ध दण्ड लगाया गया है जिसे विभाग द्वारा मात्र खानापूर्ति की संज्ञा दी गयी है तथा दूसरे तरफ स्थल की स्थिति को नजर अंदाज करते हुए दोषी ठहराया जाता है। जो उचित नहीं है संचिका में रक्षित अभिलेख से स्पष्ट है कि श्री अम्बरकर के विरूद्ध तीनों आरोप के संदर्भ में उनके बचाव-बयान पर मंतव्य की माँग अधीक्षण अभियंता बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना से की गई। जिसमें उनके द्वारा आरोप सं०-3 के संबंध में मंतव्य अंकित किया गया है कि विभागीय पत्रांक-3646, दिनांक 18.12.14 से संवेदक के विरूद्ध दण्डात्मक कार्रवाई करने का विभागीय निर्णय मुख्य अभियंता को संसूचित किया गया परन्तु एक लंबे अरसे के बाद मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर अपने पत्रांक-2639 दिनांक 25.09.2015 से अनुपालन प्रतिवेदन दिया गया। जिसमें अंकित है कि संवेदक के विरूद्ध कार्यपालक अभियंता, शिवहर द्वारा रू0 3,34,665/- रू0 95,525/- एवं रू0 1,87,208/-का वित्तीय दण्ड अधिरोपित किया जाना मात्र खानापूर्ति प्रतीत होता है एवं मुख्य अभियंता के रूप में योजना के ससमय कार्यान्वयन कराने तथा विफलता की स्थिति में संवेदक के विरूद्ध नियमानुसार दण्ड अधिरोपित नहीं किये जाने के लिए श्री अम्बरकर, मुख्य अभियंता जिम्मेवार हैं। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री अम्बरकर मुख्य अभियंता द्वारा ससमय संवेदक के विरूद्ध एकरारनामा के शर्त के आलोक में कोई कार्रवाई नहीं की गई है जो इसकी प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। श्री अम्बरकर द्वारा वही तथ्य उद्धिृत किया गया है जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं०-3 प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री ओम प्रकाश अम्बरकर, तत्कालीन मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

"कालमान वेतन में तीन वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतन वृद्धि देय नहीं होगी।" उक्त दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से विभागीय पत्रांक-870, दिनांक 05.04.2018 द्वारा परामर्श/सहमति की माँग की गई। जिसमें उनके द्वारा अपने पत्रांक-983, दिनांक 10.07.2018 द्वारा उक्त दण्ड पर अपनी सहमति प्रदान की गयी है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री ओम प्रकाश अम्बरकर, तत0 मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर सम्प्रति मुख्य अभियंता, बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम लि0, वीरचन्द पटेल पथ, पटना को निम्न दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता है।

"कालमान वेतन में तीन वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतन वृद्धि देय नहीं होगी।"

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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13 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(सिवान)-11-19/2012-1740--श्री कामेश्वर प्रसाद (आई0डी0-4526), सहायक अभियंता से बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-1, मधुबनी, शिविर, पडरौना के अन्तर्गत बाढ अवधि 2012 में पी0पी0 तटबंध के कि0मी0 26.75 पर अवस्थित स्पर पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के तहत वास्तविक रूप से कराये गये परक्युपाईन लेईंग कार्य बढ़ा चढ़ाकर NR (दैनिक प्रगति प्रतिवेदन) में प्रतिवेदित कर सरकारी राशि की क्षति का प्रयास करने के संबंध में विभागीय पत्रांक-2488 दिनांक 29.11.16 द्वारा स्पष्टीकरण की मांग की गयी। तदालोक में उनसे प्राप्त स्पष्टीकरण अस्वीकार योग्य पाये जाने के कारण अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं०-2031, दिनांक 15.11.17 द्वारा उन्हें "दो वेतनवृद्धियों पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड" संसूचित किया गया।

श्री प्रसाद द्वारा उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध पत्रांक-08, दिनांक 30.01.18 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया। जिसकी समीक्षा में पाया गया कि इनके द्वारा पूर्व समर्पित स्पष्टीकरण में बाढ़ अवधि 27.07.17 से 14.08.12 के बीच कराये गये परक्युपाईन लेईंग कार्य से संबंधित पूर्ण अभिलेखों यथा पाली पंजी एवं NR का पूर्ण अभिलेख तथा मापपुस्त उपलब्ध नहीं कराये जाने के फलस्वरूप संचिका में उपलब्ध अभिलेख यथा स्थल लेखा, अधूरा पाली पंजी एवं NR के आधार पर उक्त अवधि में कराये गये परक्युपाईन लेईंग कार्य के विवरणी को सारणीबद्ध किया गया था। उक्त विवरणी के अनुसार स्थल लेखा से कुल 1881 अद्‌द परक्युपाईन सेट निर्गत किया जाना, उपलब्ध पाली पंजी (अधूरा) के अनुसार 493 अद्‌द खपत होना तथा NR के माध्यम से कुल 1932 अद्‌द परक्युपाईन लेईंग कार्य प्रतिवेदित किये जाने के आधार पर माना गया था कि आलोच्य कार्य में वास्तविक रूप से कराये गये परक्युपाईन लेईंग कार्य से अधिक संख्या NR के माध्यम से प्रतिवेदित किया गया है।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 88 इनके द्वारा समर्पित अपील अभ्यावेदन में पाली पंजी, स्थल लेखा, NR तथा मापपुस्त की प्रति संलग्न करते हुए कहा गया है कि आलोच्य कार्यस्थल यथा कि0मी0 26.75 पर अवस्थित स्पर एवं कि0मी0 26.10 से 26.53 के बीच निर्मित 9 अद्‌द स्टर्ड पर बाढ़ 2012 अवधि में दिनांक 27.07.12 से 14.08.12 तक पाली पंजी के अनुसार कुल 2082 अद्‌द परक्युपाईन की खपत अंकित है। NR के अनुसार प्रतिवेदित परक्युपाईन की सं0-2083 अद्‌द है तथा स्थल लेखा एवं मापपुस्त में अंकित किये गये रेकर्ड इन्ट्री के अनुसार परक्युपाईन सेट की कुल सं0-2080 अद्‌द है तथा इस कार्य का भुगतान मापपुस्त मे ंकिये गये इन्ट्री के अनुसार परक्युपाईन सेट की कुल सं0 2080 अद्‌द है। इस कार्य का भुगतान माप पुस्त में किये गये रेकर्ड इन्ट्री के अनुसार किया गया है। अतएव किसी प्रकार का सरकारी राशि की क्षति नहीं हुई है।

उक्त तथ्यों के आलोक में मामले की सम्यक समीक्षोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा श्री प्रसाद के पुनर्विलोकन अर्जी को स्वीकार करते हुए विभागीय अधिसूचना सं०-2031, दिनांक 15.11.17 द्वारा संसूचित दण्ड "दो वेतनवृद्धियों पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक" को निरस्त करने का निर्णय लिया गया है।

अनुशासनिक प्राधिकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री कामेश्वर प्रसाद (आई0डी0-4526), सहायक अभियंता को विभागीय अधिसूचना संख्या-2031 दिनांक 15.11.17 द्वारा संसूचित दण्ड को निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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23 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(भाग0)-09-02/2009-1819--श्री संजीवन चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता (आई0डी0-2575), सिंचाई अंचल सं०-01, जमुई शि0-खड़गपुर सम्प्रति सेवानिवृत को उनके द्वारा "खड़गपुर बाजार से खड़गपुर झील तक पहुँच पथ के जीर्णोद्धार कार्य" हेतु आमंत्रित निविदा के निष्पादन में बरती गयी अनियमितता के लिये विभागीय आदेश सं०-352 सहपठित ज्ञापांक-352, दिनांक 18.02.09 द्वारा तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया। श्री चौधरी, तत्का0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा उक्त विभागीय निलंबन आदेश सं०-352, दिनांक 18.

02.09 के विरूद्ध माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्लू0जे0सी0 संख्या- 3058/09 याचिका दायर किया गया जिसमें माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा दिनांक 06.03.09 को न्याय निर्णय पारित करते हुए श्री संजीवन चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध संचालित होने वाले विभागीय कार्यवाही के निष्पादन हेतु समय सीमा निर्धारित कर दिया गया।

तदुपरांत माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा सी0डब्लू0जे0सी0 संख्या-3058/09 में दिनांक 06.03.09 को पारित न्याय निर्णय के आलोक में श्री संजीवन चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध "खड़गपुर बाजार से खड़गपुर झील तक पहुँच पथ के जीर्णोद्धार कार्य" हेतु आमंत्रित निविदा के निष्पादन में बरती गयी अनियमितता के लिये बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-383, दिनांक 14.05.09 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

उक्त विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग द्वारा की गयी एवं समीक्षोपरांत विभागीय कार्यवाही के जाँच प्रतिवेदन से असहमति के बिन्दु पर श्री संजीवन चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत से विभागीय पत्रांक-1396, दिनांक 01.12.09 द्वारा स्पष्टीकरण किया गया।

श्री चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत निम्नांकित प्रमाणित आरोपों के लिये श्री चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को अपने कर्त्तव्य के प्रति सचेत नहीं रहने तथा निविदा में अनावश्यक विलंब के लिये दोषी पाया गया-

(1) सिंचाई प्रमंडल, तारापुर के निविदा आमंत्रण सूचना सं०-03/2008-09 के द्वारा आमंत्रित निविदा में कागजात की बिक्री दिनांक 13.10.08 से 21.10.08 तक एवं निविदा प्राप्ति के तिथि 21.10.08 निर्धारित थी अर्थात उक्त निविदा बिहार ठीकेदारी निबंधन नियमावली 1982 के तहत आमंत्रित की गयी थी क्योंकि उक्त तिथि से वही नियमावली जल संसाधन विभाग में लागू थी। अतएव निविदा का निष्पादन उसी नियमावली के अधीन की जानी थी। नई नियमावली बिहार ठीकेदारी निबंधन नियमावली 2007 जल संसाधन विभाग में दिनांक 12.11.08 से प्रभावी मानी गयी है जो उक्त तिथि के बाद आमंत्रित निविदा पर ही प्रभावी समझी जायेगी। उक्त के आलोक में निविदा निष्पादन की प्रक्रिया गलत पायी गयी।

(2) कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, तारापुर से निविदा संबंधी संचिका दिनांक 13.11.08 को प्राप्त होने पर आपके द्वारा दिनांक 23.11.08 को संचिका अपने अधीनस्थ को भेजा जाना संदेहास्पद है।

उपरोक्त वर्णित तथ्यों के आधार पर श्री संजीवन चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को विभागीय अधिसूचना संख्या-175, दिनांक 28.01.10 द्वारा निलंबन से मुक्त करते हुए निम्नांकित दण्ड अधिरोपित किया गयाः- (1) निन्दन वर्ष 2008-09 (2) एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। (3) निलंबन अवधि में जीवन यापन भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा, परन्तु इसकी गणना पेंशन प्रदायी सेवा के लिये की जायेगी। श्री चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा उपर्युक्त दण्डादेश के विरूद्ध पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया। जिसे सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-1276, दिनांक 31.08.2010 द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया।89 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 श्री संजीवन चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा अधिसूचना सं०-175, दिनांक 28.01.2010 तथा अधिसूचना सं०-1276, दिनांक 31.08.2010 के विरूद्ध माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-15212/2010 संजीवन चौधरी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य दायर किया गया। माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा दिनांक 16.05.2018 को पारित न्याय निर्णय में उपर्युक्त अधिसूचनाओं को निरस्त कर दिया गया है। साथ ही माननीय उच्च न्यायालय, पटना ने आदेश दिया है कि वादी श्री संजीवन चौधरी सेवानिवृत हो गए है, इसलिए विभाग चाहे तो बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) के तहत कार्रवाई कर सकता है।

माननीय उच्च न्यायालय, पटना के उपर्युक्त आदेश के आलोक में सक्षम प्राधिकार के स्तर पर सम्यक समीक्षोपरांत निम्नांकित निर्णय लिया गया है -

(1) विभागीय अधिसूचना सं०-175, दि0 28.01.2010 तथा विभागीय अधिसूचना सं०-1276, दिनांक 31.08.2010 को निरस्त किया जाता है।

(2) श्री संजीवन चौधरी के विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन निमयावली के नियम-43(बी) के तहत सम्परिवर्तित करते हुए श्री चौधरी से द्वितीय कारण पृच्छा (लिखित अभ्यावेदन) के स्तर से कार्यवाही प्रारंभ की जाती है।

उक्त निर्णय श्री संजीवन चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

------- 27 अगस्त 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(वीर)-7-03/03/1824--श्री महेन्द्र चौधरी (आई0डी0-4372) तत्कालीन सहायक अभियंता, पूर्वी तटबंध प्रमंडल सुपौल के विरूद्ध उनके उक्त प्रमंडल मेें पदस्थापन की अवधि में बरती गई अनियमितताओं की जाँच उड़नदस्ता अंचल से करायी गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत सरकार द्वारा श्री चौधरी, तत्कालीन सहायक अभियंता से असैनिक सेवा(वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के नियम-55 ए के तहत विभागीय पत्रांंक 1074 दिनांक-22.10.2003 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री चौधरी, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई तथा सम्यक समीक्षोपरांत श्री चौधरी को निम्न आरोपों के लिए दोषी पाये गयेः- (1) समय के पूर्व बाढ़ निरोधत्मक कार्य नही कराना। (2) कार्य के प्रति उदासीनता एवं लापरवाही । उपर्युक्त प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री चौधरी, तत्कालीन सहायक अभियंता को निम्न दंड देने का निर्णय लिया गयाः- (क) 'निंदन' प्रविष्टि वर्ष-1999-2000 (ख) देय प्रोन्नति पर तीन वर्ष तक रोक। (ग) बाढ़ प्रमंडलो में कही भी आगे पदस्थापन के अयोग्य। उक्त निर्णय श्री महेन्द्र चौधरी, तत्कालीन सहायक अभियंता को विभागीय आदेश सं0-127 ज्ञापांक-884 दिनांक-18. 10.2004 द्वारा संसूचित किया गया। उक्त दंडादेश के विरूद्ध श्री चौधरी द्वारा अपील अभ्यावेदन समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा सरकार द्वारा की गई। समीक्षा में पाया गया कि श्री चौधरी के द्वारा अपने अपील अभ्यावेदन में ऐसा कोई नया तथ्य नही दिया गया है जिस पर नये सिरे से विचार किया जाय। उक्त निर्णय श्री चौधरी को विभागीय आदेश सं0-148 ज्ञापांक-1010 दिनांक-17.12.2008 द्वारा संसूचित किया गया। उक्त दंडादेश के विरूद्ध श्री चौधरी, तत्कालीन सहायक अभियंता द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में C.W.J.C सं0 14731/2010 दायर किया गया। माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा C.W.J.C सं0 14731/2010 में दिनांक-15.05.2018 को न्याय निर्णय पारित किया गया। माननीय उच्च न्यायालय, पटना के न्याय निर्णय से सहमत होते हुए विभागीय आदेश सं0-127, ज्ञापांक-884 दिनांक-18.10.2004 को निरस्त करने का निर्णय इस आशय के साथ लिया गया कि श्री चौधरी, तत्कालीन सहायक अभियंता द्वारा दिये गये स्पष्टीकरण की पुनः बिंदुवार समीक्षा की जायेगी। उक्त निर्णय के आलोक में श्री चौधरी, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध निर्गत दंडादेश विभागीय आदेश सं0-127, ज्ञापांक-884 दिनांक-18.10.2004 को निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राज भूषण प्रसाद, उप-सचिव।

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28 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015-1845--श्री धनंजय कुमार (आई0डी0-4052), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, त्रिवेणी नहर प्रमंडल, नरकटियागंज को मुख्य अभियंता, जल संसाधन90 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री धनंजय कुमार को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

3. श्री कुमार का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण अलग से किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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30 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मोति0)-08-03/2013 (अंश-3)-1874--श्री कृष्णदेव सिंह (आई0डी0-1993) तत्का0 कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के विरूद्ध विभागीय उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के आलोक में नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना के तहत शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अन्तर्गत पूर्वी मुख्य नहर के पुनस्र्थापन कार्य में बरती गयी अनियमितता संबंधी निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-73, दिनांक 18.01.2017 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

(1) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन एवं गुण नियंत्रण जाँचफल के समीक्षोपरांत पाया गया कि नवें चालू विपत्र के भुगतान अवधि तक एकरारनामा में प्रावधान के तहत कराये गये कार्य का मात्रा 10569.95 घन मी0 (Coarse aggregate) के विरूद्ध 6758.64 घन मी0 स्थानीय श्रोत से प्राप्त कर एकरारनामा के विरूद्ध व्यवहार में लाया गया परिलक्षित है। जो Coarse aggregate की मात्रा का 63.94 प्रतिशत होता है। स्थानीय श्रोत से प्राप्त Coarse aggregate की मात्रा का भी वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा के अनुसार शेखपुरा से प्राप्ति दिखलाते हुए प्रावधानित कार्य मद दर से ढुलाई मद में अनियमित भुगतान किया गया। उक्त अनियमित कृत के फलस्वरूप सरकार को हुई क्षति का आकलन वर्तमान कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर द्वारा की गयी। जिसके अनुसार राजस्व की क्षति की आकलित राशि 1,99,71,777/- रूपये मात्र बताया गया। अतएव एकरारनामा के विरूद्ध न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर ढुलाई मद में अनियमित भुगतान करने के लिए वे दोषी हैं।

(2) इस योजना के तहत SLR Bridge एवं Bathing Ghat के निर्माण कार्य से उड़नदस्ता द्वारा एकत्रित नमूनों की जाँच गुण नियंत्रण प्रयोगशाला, खगौल से कराया गया। प्राप्त जाँचफल एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से परिलक्षित होता है कि Bathing Ghat के निर्माण कार्य में प्रावधानित P.C.C. में सीमेंट, बालू एवं चिप्स का अनुपात 1ः2ः4 के जगह पर दो नमूनों में P.C.C. में सीमेंट एवं बालू का अनुपात 1ः3.35 एवं 1ः3.75 पाया गया है। अतएव P.C.C. में प्रावधान से अधिक बालू की मात्रा होना परिलक्षित है। अतएव न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर भुगतान प्रावधान के अनुरूप किये जाने से सरकार को राजस्व की क्षति होना स्थापित होता है। जिसके लिए वे दोषी हैं।

(3) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 6.0.0 (g), 9.0.0 (x) एवं 10.0.0(i) से स्पष्ट होता है कि नियम के विरूद्ध कार्य में प्रत्युक्त सामग्री का भुगतान बिना एम0 एण्ड एन0 फार्म के सत्यापन कराये ही अनियमित ढंग से भुगतान किया गया। जिसके लिए वे दोषी है। संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध गठित आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-654, दिनांक 13.03.2018 द्वारा श्री सिंह को संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्धता कराते हुए द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की माँग की गई। उक्त आलोक में श्री सिंह से प्राप्त बचाव बयान के मुख्य अंश निम्नवत है :- बिहार सरकार सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक-1893, दिनांक 14.06.11 पत्रांक-3448, दिनांक 02.12.2006 जल संसाधन विभाग के पत्रांक-1377, दिनांक 10.11.11 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि -

(i) दिनांक 08.01.17 को उनके विरूद्ध विभागीय कार्यवाही पेंशन नियमावली 43(बी0) के तहत शुरू की गयी। (ii) दिनांक 27.02.12 को शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर का प्रभार रिपोर्ट 202 पर प्रतिस्थानी को प्रभार सौंप दिया।

(iii) दिनांक 30.04.2012 को कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमंडल, दरभंगा से सेवानिवृत हुआ। (iv) दिनांक 26.08.11 से लेकर दिनांक 08.02.12 तक तीन चालू विपत्रों को पारित किया। उपरोक्त से स्पष्ट है कि तथा कथित कदाचार की घटना 26.08.11 से 08.02.12 के बीच का है एवं दिनांक 30.04. 12 को सेवानिवृत हो चुके है तथा 43(बी0) के तहत दिनांक 18.01.17 को विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी है। इस प्रकार91 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 विभागीय कार्यवाही घटना एवं सेवानिवृति की तिथि से चार (4) वर्ष से अधिक समय के बाद प्रारंभ की गयी है। जो कालबाधित की श्रेणी में आता है। अतः मामला समाप्त किया जाय।

आरोप के संदर्भ में कहा गया कि उनके द्वारा मात्र बाथिंग घाट एवं पुल के निर्माण कार्य के सिर्फ 3 चालू विपत्र को पारित किया गया है। सड़क निर्माण कार्य को कोई भी विपत्र पारित नहीं किया गया है। जबकि कोर्स एग्रीगेट एवं RBM की मात्रा का प्रतिशत केवल सड़क से प्राप्त नमूनों के जाँचफल के आधार पर निकाला गया है। अतः रोड के नमूनों के जाँचफल के आधार पर ही पुलों एवं स्नान घाट के कोर्स एग्रीगेट की मात्रा का आकलन कर लिया गया है जो सर्वथा अनुचित है। श्री सिंह द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही को कालबाधित होना बताया गया। श्री सिंह द्वारा दिनांक 27.02.2012 को शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर का प्रभार श्री रंजन प्रसाद सैमयार को सौंपा गया। अर्थात आरोप की तिथि 27.02.2012 है, श्री सिंह दिनांक 30.04.2012 को सेवानिवृत हो चुके हैं। विभागीय संकल्प ज्ञापांक-73, दिनांक 18.01.2017 द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। उक्त से स्पष्ट है कि घटित घटना की तिथि 27.02.2012 से चार वर्ष के पश्चात दिनांक 18.01.2017 को विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

वर्णित तथ्यों के आलोक में मामले के सम्यक समीक्षोपरांत श्री कृष्णदेव सिंह (आई0डी0-1993) तत0 कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के अन्तर्गत कालबाधित होने के कारण सरकार द्वारा इनसे संबंधित मामले को संचिकास्त करने का निर्णय लिया गया है।

सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री कृष्णदेव सिंह (आई0डी0-1993) तत0 कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-73, दिनांक 18.01.2017 द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही को संचिकास्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 30 अगस्त 2018 सं॰ 22/नि॰सि॰(सिवान)-11-04/2013/1875--श्री युगेश्वर पासवान (आई0डी0-4665), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, अन्वेषण एवं योजना प्रमंडल, गाडा, छपरा के विरूद्ध दामोदरपुर जलवाहा के वि0दू0 2.94 (एल0) एवं 3.20 (आर0) पर बिना नाला निर्माण कराये हुए कुल 5,44,349/- रू0 भुगतान करने के आरोप में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-468 दिनांक- 17.03.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक(वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। क्षेत्रीय विकास आयुक्त-सह-अध्यक्ष गंडक काडा, मुजफ्फरपुर के पत्रांक-768 दिनांक-21.07.2014 द्वारा प्रतिवेदित प्रतिवेदन के आलोक में श्री पासवान के विरूद्ध गठित प्रपत्र 'क' में निम्न आरोप हैः- ''दामोदर जलवाहा के वि0दू0 2.94 (एल0)एवं 3.20 (आर0) पर नाला निर्माण कार्य के स्थलीय जाँच में नाला का न दीवार एवं न नाला के तल में किये गये ढ़लाई का कोई अवशेष पाया गया। यहाँ तक की नाला निर्माण होना प्रमाणित नहीं पाया गया। जबकि इस मद में कुल 5,44,349/-रू0 का भुगतान किया गया है। अतएव बिना नाला निर्माण कार्य कराये ही कुल 5,44,349/-रू0 का अनियमित भुगतान करने एवं सरकारी राशि के गबन होने में सहयोग करने के गंभीर आरोप प्रमाणित होता है, जिसके लिए आप दोषी है''। संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-204 दिनंक-20.12.2016 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री पासवान के विरूद्ध आरोप पत्र (प्रपत्र 'क') में गठित आरोप को पूर्णतः प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति उपलब्ध कराते हुए श्री पासवान से विभागीय पत्रांक-182 दिनांक- 03.02.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी। जिसके आलोक में श्री पासवान द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर में मुख्य रूप से निम्न तथ्यों का उल्लेख किया गया हैः- (i) संचालन पदाधिकारी द्वारा विभागीय दबाव में विभागीय कार्यवाही के दौरान गवाहोें के बयानों एवं उनके द्वारा समर्पित बचाव-बयान की अनदेखी करते हुए एक तरफा निर्णय अंकित किया गया है, जो स्वीकार योग्य नहीं है। (ii) नाला निर्माण का कार्य होने के पश्चात ही योजना के अभिकर्ता श्री सुदिष्ट प्रसाद सिंह को भुगतान किया गया। नाला के कार्य पूर्ण होने पर लाभान्वित किसानों की समिति बनाकर उन्हें हस्तांतरित कर दिया गया। (iii) अभिकर्ता श्री सुदिष्ट प्रसाद सिंह एवं श्री विजय कुमार सिंह के बीच आपसी रंजीश है, जिसके कारण श्री विजय कुमार ंिसंह द्वारा नाला को ध्वस्त कर दिया गया। इस संबंध में योजना के अभिकर्ता श्री सुदिष्ट प्रसाद सिंह द्वारा स्थानीय थाना में प्राथमिकी भी दर्ज करायी गयी है, जिसकी सं0-225/13 दिनांक-23.07.2013 है। (iv) नाला निर्माण के लगभग दो वर्षो के पश्चात नाला निर्माण की जाँच की गयी। जाँच पदाधिकारी ने अपने प्रतिवेदन में उल्लेख किया है कि दामोदर जलवाहा के वि0दू0 2.94 (एल0) एवं 3.20 (आर0) पर नाला निर्माण नहीं पाया गया, जबकि इनके द्वारा नाला निर्माण का कार्य पूर्ण कराकर लाभान्वित किसानों की समिति गठित करते हुए सिंचाई कार्य हेतु नाला को हस्तांतरित किया गया। इसलिए उन पर यह आरोप कि नाला निर्माण कराये बगैर अभिकर्ता को भुगतान किया गया है सही नहीं है। आरोप पत्र संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन एवं श्री पासवान द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा जवाब की समीक्षा में पाया गया कि श्री विजय कुमार सिंह, ग्रामपोस्ट-मोथहा, थाना-मढ़ौरा, जिला-छपरा के द्वारा दिये गये परिवाद92 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 पत्र की जाँच गंडक कमांड क्षेत्र विकास अभिकरण छपरा द्वारा त्रिसदस्यीय समिति का गठन कर जाँच करायी गयी। जाँच प्रतवेदन में निष्कर्षतः अंकित किया गया है कि दामोदर जलवाहा के वि0दू0 2.94 (एल0) एवं 3.20 (आर0) पर न नाला का दीवार और न ही नाले के तल में किये गये ढलाई का कोई अवशेष पाया गया। अन्य वर्णित बिन्दुओं पर नाला दिखायी पड़ा जो जगह-जगह टूटा हुआ है। दामोदरपुर जलवाहा के उक्त बिन्दुओं पर नाला का निर्माण कराया गया है यह प्रमाणित नहीं हुआ, जबकि इस नाला निर्माण के लिए संवेदक को कुल 5,44,349/- का भुगतान कर दिया गया। श्री पासवान ने अपने द्वितीय करण पृच्छा उत्तर में इस बात का उल्लेख किया कि परिवादी द्वारा ही नाला को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। आरोपी पदाधिकारी द्वारा यह बताने का प्रयास किया गया कि जाँच दल द्वारा जिन बिन्दुओं पर नाला निर्मित नहीं होने की बात कही गयी, उस बिन्दु पर वास्तव में नाला निर्माण हुआ था जिसे परिवादी द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। आरोपी पदाधिकारी का यह कथन स्वीकारयोग्य प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि जाँच दल ने अपने जाँच प्रतिवेदन में इस बात का उल्लेख किया कि इन दो बिन्दुओं के अतिरिक्त अन्य बिन्दुओे पर नाला का निर्माण किया गया था, जिसे टूटा हुआ पाया गया। आरोपित पदाधिकारी अन्य बिन्दुओं पर निमित टूटे हुए नाले को ही आलोच्य बिन्दु पर नाला निर्माण होने की बात सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। जाँच दल द्वारा स्पष्ट किया गया है कि आलोच्य बिन्दु पर नाला निर्माण कोई भी अवशेष नहीं पाया गया, न तो टूटी हुई दीवार पायी गयी और न ही नाले के तल में किये गये ढ़लाई का अवशेष पाया गया। वर्णित तथ्यों के आधार पर श्री पासवान के द्वितीय कारण पृच्छा को अस्वीकृत करते हुए अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वगीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-14 (समय-समय पर यथा संशोधित) के प्रावधानों के तहत निम्न दण्ड निरूपित करने का निर्णय लिया गयाः- (i) सरकार को पहुँचायी गयी आर्थिक क्षति की राशि मो0 5,44,349/- (पाँच लाख चौवालीस हजार तीन सौ उनचास रू0) की लगभग आधी राशि 2,73,000/- (दो लाख तेहत्तर हजार रू0) वेतन से वसूली। (ii) कालमान वेतन में दो वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। इन्हें भावी वेतन वृद्धि भी देय नहीं होगी। उपर्युक्त विनिश्चित दण्ड के संदर्भ में विभागीय पत्रांक-928 दिनांक-18.04.2018 के द्वारा उक्त प्रस्तावित वृहत दण्ड कंडिका (ii) पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की माँग की गयी। तदालोक में बिहार लोक सेवा आयोग, पटना के पत्रांक-1284 दिनांक 03.08.2018 द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर सहमति संसूचित की गयी। अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री युगेश्वर पासवान (आई0डी0-4665) कार्यपालक अभियंता, अन्वेषण एवं योजना प्रमंडल, गाड़ा छपरा के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-14 (समय-समय पर यथा संशोधित) के तहत निम्न दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता हैः- (i) सरकार को पहूँचाई गयी आर्थिक क्षति की राशि मो0 5,44,349/- (पाँच लाख चौवालीस हजार तीन सौ उनचास रू0) की लगभग आधी राशि 2,73000/-(दो लाख तेहत्तर हजार रू0) वेतन से वसूली। (ii) कालमान वेतन में दो वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। इन्हें भावी वेतन वृद्धि भी देय नहीं होगी।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राजभूषण प्रसाद, उप-सचिव।

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30 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-13/2010-1876--श्री प्रद्‌युम्न शर्मा (आई0डी0 सं०-3691), तत्कालीन सहायक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, मुजफ्फरपुर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान बोल्डर आपूर्ति एवं उसके विरूद्ध किये गये भुगतान में बरती गई अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गई। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। तदोपरांत विभागीय पत्रांक-2289, दिनांक 06.10.2015 द्वारा श्री प्रद्‌युम्न शर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता से निम्न बिन्दु पर स्पष्टीकरण पूछा गया।

(1) एकरारित मात्रा से अधिक मात्रा में लिये गये बोल्डर आपूर्ति एवं इसके विरूद्ध किये गये भुगतान को अनियमित माना गया है।

उक्त स्पष्टीकरण के आलोक में श्री शर्मा द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 12.11.2015 द्वारा विभाग में समर्पित जवाब में निम्नलिखित बातें कहीं हैं :-

विभागीय पत्रांक-83, दिनांक 13.01.2010 द्वारा आगामी बाढ़ 2010 में संभावित आपात स्थिति से निपटने के लिए केन्द्रीय भंडार जल पथ प्रमंडल, मुजफ्फरपुर के लिए 5000 घनमीटर बोल्डर आपूर्ति लेने की स्वीकृति संसूचित की गई, जिसका व्यय गैर योजना मद शीर्ष-2711 -003 के अन्तर्गत भारित होना था। इसके लिए आवंटन 127.50 लाख प्राप्त हुआ। निविदा निष्पादन के पश्चात बोल्डर आपूर्ति के कार्य परिमाण विपत्र की दर से 6.00 प्रतिशत उपर की दर पर मेसर्स दीपशिखा कन्सट्रक्शन प्राईवेट लिमिटेड को आवंटित किया गया। जिसकी कुल लागत राशि रू0 127.0134 लाख रूपये थी। संवेदक द्वारा एकरारनामा कर बोल्डर की ढुलाई प्रारंभ की गयी। बोल्डर ढुलाई एवं रैकिंग के दौरान सभी क्षेत्रीय पदाधिकारियों द्वारा निरीक्षण किया जाता रहा निरीक्षण के क्रम में स्टैकिंग स्थल पर ही उच्चाधिकारियों से प्राप्त आवंटन एवं एकरारित राशि के अंतर राशि के विरूद्ध भी अतिरेक बोल्डर ढुलाई के संबंध में विमर्श हुआ। उल्लेखनीय है कि प्राप्त आवंटन बोल्डर ढुलाई कार्य के लिए कर्णांकित था।

इसी बीच दिनांक 14.03.2010 तक संवेदक द्वारा आपूरित बोल्डर के स्टैक की मापी लेकर प्रथम चालू विपत्र दिनांक 15.03.2010 को समर्पित किया गया। इसी दौरान उच्चाधिकारियों द्वारा संवेदक को अवशेष राशि के विरूद्ध 774 घनमीटर अतिरिक्त बोल्डर ढुलाई के लिए मौखिक निदेश देते हुए प्रस्ताव कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-452, दिनांक 18.03.2010 के93 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 माध्यम से अधीक्षण अभियंता, जल निस्सरण अनुसंधान अंचल, मुजफ्फरपुर को समर्पित किया गया। चुँकि प्रस्तावित अतिरिक्त मात्रा का प्रतिशत एकरारित मात्रा के सापेक्ष्य 15.48 प्रतिशत होती थी। अतएव अधीक्षण अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा पत्रांक-322, दिनांक 18.03.2010 द्वारा उपरोक्त प्रस्ताव स्वीकृत हेतु मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर को समर्पित किया गया।

चुँकि विषयांकित कार्य पूर्ण करने की तिथि दिनांक 25.03.2010 थी। पुनः दिनांक 24.03.2010 को संवेदक द्वारा आपूरित बोल्डर के स्टैक की मापी ली गई जो 2069.79 घनमीटर थी। अतएव इस कार्य का द्वितीय चालु विपत्र कुल 5440.47 घनमीटर बोल्डर के लिए दिनांक 25.03.10 को प्रमंडल में समर्पित किया गया। अर्थात निर्धारित अवधि तक संवेदक द्वारा मात्र 5440.47 घनमीटर बोल्डर की मात्रा की आपूर्ति की जा सकी। वित्तीय वर्ष समाप्ति के मद्देनजर संवेेदक द्वारा दिनांक 24.03. 2010 के पश्चात कोई बोल्डर थी आपूर्ति नहीं की गई।

दिनांक 27.03.2010 को स्टैक स्थल का निरीक्षण मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता द्वारा किया गया एवं समयाभाव के कारण और अतिरिक्त बोल्डर ढुलाई करने का निर्णय लिया गया। फलस्वरूप मुख्य अभियंता द्वारा उनके कार्यालय में समर्पित प्रस्ताव पर समीक्षा करते हुए बोल्डर ढुलाई की मात्रा का प्रतिशत 10 प्रतिशत के नीचे होने के कारण अपने पत्रांक-865, दिनांक 27.03.2010 द्वारा अतिरिक्त बोल्डर ढुलाई पर अपने स्तर से आवश्यक अग्रेतर कार्रवाई करने का निर्देश अधीक्षण अभियंता, जल निस्सरण अनुसंधान अंचल, मुजफ्फरपुर को दिया गया, जिसकी प्रति कार्य0 अभियंता, जल पथ प्रमंडल, मुजफ्फरपुर को दी गई। ततपश्चात ही कार्यपालक अभियंता द्वारा दिनांक 28.03.2010 को द्वितीय चालू विपत्र पारित करने का आदेश दिया गया। कार्य के दौरान कार्य की विशिष्टि एवं गुणवत्ता से समझौता नहीं किया गया है। जैसा कि अनुसंधान एवं प्रशिक्षण अंचल, खगौल, पटना के गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है साथ ही आपूरित बोल्डर की मात्रा का सत्यापन उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 5.1.5 से होता है। इस प्रकार एकरारित मात्रा 5,000 घनमीटर के अतिरिक्त 440.47घनमीटर अतिरिक्त बोल्डर ढुलाई की प्रक्रिया से सभी क्षेत्रीय अधिकारी अवगत थे।

श्री शर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत विभागीय ज्ञापांक सं०-1466, दिनांक 22.07.16 द्वारा श्री शर्मा के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में निम्न बातें कही गई है। विभागीय पत्रांक-83, दिनांक 13.01.2010 द्वारा गैर योजना मद शीर्ष-2711 के अन्तर्गत 5000 घनमीटर बोल्डर की आपूर्ति के लिए संवेदक मेसर्स दीपशिखा कन्सट्रक्शन प्राईवेट लिमिटेड के साथ कार्यपालक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, मुजफ्फरपुर के द्वारा एकरारनामा संख्या-57 F2/2009-2010 किया गया था। जिसके विरूद्ध 5440.47 घनमीटर बोल्डर एकरारित मात्रा से अधिक लिया गया तथा जिसका विपत्र दिनांक 20.08.2010 को मापपुस्त में दर्ज कर प्रमंडलीय कार्यालय में समर्पित किया गया, जिसे कार्यपालक अभियंता द्वारा दिनांक 22.08.2010 को C&P कर पारित किया गया। आरोपी पदाधिकारी के बचाव बयान में कथन है कि :-

बोल्डर आपूर्ति का कार्य मरम्मति एवं संपोषण की श्रेणी में आता है अपितु यह मूल प्रकृति के कार्य की श्रेणी में आता है क्योंकि मरम्मति एवं अनुरक्षण किसी कार्य का तभी किया जा सकता है जबकि वह कार्य पूर्व में विद्यमान हो इस प्रकार बोल्डर आपूर्ति का कार्य मूल प्रकृति का कार्य है एवं किसी भी दृष्टिकोण से मरम्मति एवं अनुरक्षण की श्रेणी में नहीं आता है। इस संदर्भ में उनके द्वारा लोक निर्माण विभाग के संकल्प-2776(5) दिनांक 15.05.2005 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इसकी कंडिका-6 के तहत बिहार सरकार मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग, गोपनीय कोषांग के संकल्प त0स0 को/ दिनांक 16.07.1986 की कंडिका 8.1.2 को पुनः प्रत्यापित/संशोधित नहीं किया गया है। फलस्वरूप 8.1.2 कंडिका स्वतः समाप्त हो जाती है। इसके आधार पर एकरारित मात्रा से अधिक लिये गये बोल्डर को उनके द्वारा अनियमितता नहीं मानी गई है तथा उन पर लगे आरोप से उन्हें दोषमुक्त करने का अनुरोध किया गया है।

यहाँ मामला मुख्य रूप से एकरारित मात्रा से अधिक मात्रा में बोल्डर आपूर्ति प्राप्त करना एवं अनियमित भुगतान करने से संबंधित है। उल्लेखनीय है किसी भी कार्य के किसी मद में बढोतरी तभी होती है। जब उसका क्रियान्वयन हो रहा होता है तथा इस दौरान स्थलीय स्थिति के अनुसार अधिक मात्रा में कार्य कराने की स्थिति उत्पन्न होती है। इस मामले में ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं थी बोल्डर की आपूर्ति मात्र केन्द्रीय भंडार हेतु लिया जाना था। आरोपित पदाधिकारी श्री शर्मा को विभागीय आदेशानुसार एकरारनामा के तहत 5000घनमीटर बोल्डर केन्द्रीय भंडार में भंडारण हेतु लेना था। परन्तु संवेदक के द्वारा 5000घनमीटर बोल्डर के बदले 5440.47 घनमीटर लाये गये बोल्डर की मात्रा को बिना तत्काल स्थलीय आवश्यकता एवं उच्च पदाधिकारी के पूर्वादेश के प्राप्त किया गया। मापपुस्त में दर्ज किया गया तथा मापपुस्त एवं विपत्र कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया जिसे कार्यपालक अभियंता के द्वारा पारित किया गया। इस प्रकार विभागीय आदेश के इस उल्लंघन से उत्पन्न अनियमितता के कारण लगे आरोप को आरोपित पदाधिकारी के उक्त उल्लेखित कथन के आलोक में गलत नहीं ठहराया जा सकता। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन आरोपित पदाधिकारी पर लगे आरोप उनके द्वारा समर्पित बचाव बयान की समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि विभागीय आदेशानुसार एकरारनामा के तहत 5000 घनमीटर बोल्डर की आपूर्ति तत्काल किसी कार्य के लगाने हेतु नहीं अपितु केन्द्रीय भंडार में भंडारन हेतु लिया जाना था। अर्थात ऐसी कोई परिस्थिति नहीं थी। जिसके लिए कार्यहित में एकरारित मात्र से अधिक बोल्डर की तत्काल आपूर्ति लिया जाना बाध्यता थी। आरोपी पदाधिकारी द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे स्पष्ट हो कि कार्य की तत्काल आवश्यकता के तहत एवं उच्च पदाधिकारियों के आदेश से एकरारित मात्रा से अधिक बोल्डर कार्यहित में लिया जाना आवश्यक था। स्पष्ट है कि संवेदक द्वारा एकरारित मात्रा से अधिक मात्रा लायेे गये बोल्डर बिना कार्य की तत्काल स्थलीय आवश्यकता एवं उच्च पदाधिकारियों के94 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 आदेश के प्राप्त किया गया। माप पुस्त में दर्ज किया गया तथा पारित करने हेतु सहायक अभियंता के माध्यम से कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया जिससे की संवेदक को एकरारनामा से अधिक मात्रा के भुगतान का लाभ प्राप्त हुआ। इस प्रकार आरोपित पदाधिकारी श्री शर्मा के विरूद्ध एकरारित मात्रा से अधिक मात्रा मे लिये गये बोल्डर की आपूर्ति एवं अनियमित भुगतान करने का आरोप प्रमाणित होता है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपित के लिए विभागीय पत्रांक-845 दिनांक-05.06.2017 द्वारा श्री शर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता को संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति उपलब्ध कराते हुए द्वितीय कारण पृच्छा की गई। उक्त के आलोक में श्री शर्मा, तत्का0 सहायक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-1034 दिनांक-04.09.2017 द्वारा समर्पित द्वितीयकारण पृच्छा के जवाब में मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है। संचालन पदाधिकारी द्वारा गठित आरोप के बिन्दु से हटकर इस तथ्य की जाँच की गयी कि एकरारित मात्रा से अधिक मात्रा में बोल्डर की आवश्यकता थी अथवा नहीं एवं इसी के आधार पर आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। जिसे उचित नहीं माना जा सकता है। सहायक अभियंता का मुख्य दायित्व कार्यादेश निर्गत होने के पश्चात एकरारनामा के अनुसार कार्य का कार्यान्वयन पूर्ण गुणवत्ता के अनुरूप कराना है। जहाँ तक सम्पादित कार्य की मात्रा का प्रश्न है। एकरारनामा के अनुसार 5000 घनमीटर बोल्डर की आपूर्ति ली गई तथा शेष बचे राशि के विरूद्ध भी बोल्डर आपूर्ति लिये जाने का निदेश कार्यपालक अभियंता द्वारा दिया गया। जिसका PWD Code के कंडिका 49 के अनुसार निदेश का अनुपालन सुनिश्चित करना सहायक अभियंता का दायित्व था। उक्त तथ्य की पुष्टि कार्यपालक अभियंता द्वारा अधीक्षण अभियंता के पत्रांक-452, दिनांक 18.03.10 से भेजे गये प्रस्ताव तथा अधीक्षण अभियंता अपने पत्रांक-322, दिनांक 18.03.10 से मुख्य अभियंता को भेजे गये प्रस्ताव से होती है। उल्लेखनीय है कि बोल्डर की मात्रा में 8.81 प्रतिशत हुई वृद्धि की स्वीकृति हेतु कार्यपालक अभियंता सक्षम प्राधिकार है। जहाँ तक प्रसंगाधीन कार्य योजना मद अथवा गैर योजना मद से संबंधित होने का प्रश्न है। PWD Code के अनुसार मरम्मति एवं अनुरक्षण कार्य का प्राक्कलन जो चालू अनुसूचित दर पर बनाये गये हो। उसके उपर किसी प्रकार की बढ़ोतरी अनुमान्य नहीं होगी। किसी स्तर के भी पदाधिकारी प्राक्कलित राशि से अधिक भुगतान करने के लिए सक्षम नहीं होंगे। ऐसे कार्यों के कार्य मदों के मात्रा में भी किसी प्रकार की बढ़ोतरी अनुमान्य नहीं होगी अंकित है। जबकि आरोप में गैर योजना मद में एकरारित मात्रा में वृद्धि अनुमान्य नहीं है अंकित है। अतः बोल्डर आपूर्ति कार्य बिल्कुल ही नया कार्य गैर योजना मद के तहत कराया गया है एवं एकरारित मात्रा में हुई बढ़ोतरी को अनुमान्य नहीं करने का कोई कारण स्पष्ट नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी का कहना कि ऐसी कोई परिस्थति नहीं थी, जिसके लिये तत्काल कार्यहित में एकरारित मात्रा से अधिक बोल्डर की आपूर्ति किया जाना बाध्यता थी। साक्ष्य आधित नहीं माना जा सकता है क्याेंकि बोल्डर आपूर्ति लिये जाने के वर्ष ही आपूरित मात्रा को बाढ़ की विभिषिका के मद्देनजर अन्य प्रमंडलों में हस्ताक्षरित करना आवश्यक हो गया। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि - (a) आपूर्ति लिये गये बोल्डर की मात्रा एवं गुणवत्ता पर कोई विवाद नहीं है। बोल्डर की आपूर्ति मात्रा के विरूद्ध एकरारित दर पर भुगतान करने की अनुशंसा अद्योहस्ताक्षरी द्वारा की गयी।

(b) बोल्डर की आपूर्ति लेते हुए इसके केन्द्रीय गोदाम में भंडारण के कार्य को मरम्मति एवं अनुरक्षण कार्य नहीं माना जा सकता है। अतः एकरारित मात्रा में वृद्धि को अनुमान्य नहीं किये जाने का कोई कारण नहीं है।

श्री शर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत निम्न तथ्य पाये गये :-

आरोप का मुख्य बिन्दु है कि विभागीय पत्रांक-83, दिनांक 13.01.2010 के 5000 घनमीटर केन्द्रीय भंडार जल पथ प्रमंडल, मुजफ्फरपुर बोल्डर भंडारण की स्वीकृति प्रदान की गयी थी। इसका व्यय गैर योजना मद शीर्ष 2711में भारित किया जाना था। परन्तु मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग के संकल्प सं०-948, दिनांक 16.07.1986 के विपरीत गैर योजना मद में एकरारित मात्रा से अधिक कुल 5440.47 घनमीटर बोल्डर की आपूर्ति लेने एवं अनियमित भुगतान करने से संबंधित है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.1.5 में नियम के विरूद्ध एकरारित मात्र से अधिक मात्रा में किये गये बोल्डर आपूर्ति एवं इसके विरूद्ध किये गये अनियमित भुगतान करने के लिए कार्य में संलग्न कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता को जिम्मेवार माना गया है।

मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग के संकल्प सं०-948, दिनांक 16.07.1986 के कंडिका 8.1.2 के अनुसार गैर योजना मद के तहत मरम्मति एवं अनुरक्षण कार्य के प्राक्कलन जो चालु अनुसूचित दर पर बनाये गये हो उसके उपर किसी प्रकार की बढ़ोतरी अनुमान्य नहीं है। किसी स्तर के भी पदाधिकारी राशि से अधिक खर्च करने के लिए सक्षम नहीं होगे। ऐसे कार्यों के कार्य मद की मात्रा में किसी प्रकार की बढ़ोतरी अनुमान्य नहीं होगी। निविदा निस्तार में भी कार्य बढ़ोतरी अनुमान्य नहीं होगा।

इस संदर्भ में अभियंता प्रमुख से प्रश्नगत कार्य बोल्डर आपूर्ति का कार्य को मूल कार्य मानते हुए दर एवं मात्रा में वृद्धि अनुमान्य है अथवा नहीं के संदर्भ में मंतव्य की मांग की गई। अभियंता प्रमुख में मंतव्य के रूप में अंकित किया गया कि "संदर्भित मामले में गैर योजना शीर्ष 2711 के अन्तर्गत बोल्डर भंडारन का प्रस्ताव था। इस शीर्ष के अन्तर्गत कार्य कराने के95 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 संदर्भ में मंत्रिमंडल सचिवालय एवं समन्वय विभाग के संकल्प सं०-948, दिनांक 16.07.1986 के कंडिका 8.1.2 में उल्लेखित नियम लागु होते है।

संचालन पदाधिकारी के द्वारा भी कार्य हित में एकरारित मात्रा से अधिक मात्रा में बोल्डर आपूर्ति लेने की बाध्यता नहीं होने एवं बिना उच्चाधिकारी के आदेश प्राप्त किये ही संवेदक के लाभ पहुँचाने के लिये एकरारित मात्रा से अधिक मात्रा में लिये गये बोल्डर आपूर्ति एवं अनियमित भुगतान करने के आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। आरोपी द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में लगभग वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया है। जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी के समक्ष विभागीय कार्यवाही के दौरान दिया गया है एवं कहा गया है कि -

(क) आपूर्ति लिये गये बोल्डर की मात्रा एवं गुणवता पर कोई विवाद नहीं है। बोल्डर की आपूर्ति मात्रा के विरूद्ध एकरारित दर पर भुगतान करने की अनुशंसा की गयी थी।

(ख) बोल्डर आपूर्ति होते हुए इसके केन्द्रीय गोदाम में भंडारण के कार्य को मरम्मति एवं अनुरक्षण कार्य नहीं माना जा सकता है। अतः एकरारित मात्रा में वृद्धि को अनुमान्य नहीं किये जाने का कोई कारण नहीं है।

उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.1.5 के अंतिम पारा से स्पष्ट होता है कि एकरारित मात्रा कुल 5000 घनमीटर आपूर्ति बोल्डर को चम्पारण प्रमंडल मोतिहारी एवं बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, ठकराहा को हस्ताक्षरित किया गया। उक्त के आलोक में आरोपों का कथन की आपूर्ति मात्रा पर कोई विवाद नहीं है, को स्वीकार योग्य नहीं है तथा मापपुस्त सं०-3465, के पेज 32 से स्पष्ट है कि कुल आपूर्ति बोल्डर की मात्रा 5440.47 घनमीटर को एकरारित दर 2207.306% प्रति घनमीटर की दर से कुल 1,27,29,274 रूपये का भुगतान किया गया है। अतएव आरोपी का कथन की आपूर्ति बोल्डर का एकरारित दर पर भुगतान किया गया है, को स्वीकार योग्य है। परन्तु जहाँ तक अनियमित भुगतान का प्रश्न है इनके द्वारा एकरारित मात्रा से कुल 440.47 घनमीटर अधिक बोल्डर की आपूर्ति ली गई । उक्त बोल्डर आपूर्ति का एकरारित दर पर मूल रूपये 10.306लाख होता है। परन्तु अनुसूचित दर पर यह राशि रू0 9.722 लाख होता है। इस प्रकार एकरारित मात्रा से अधिक ली गई बोल्डर को एकरारित दर 6 प्रतिशत अधिक दर पर भुगतान किये जाने के कारण रूपये 58349/- का अधिक भुगतान का मामला बनता है। आरोपी का कथन है कि केन्द्रीय भंडार में बोल्डर भंडारण के कार्य को मरम्मति एवं अनुरक्षण कार्य नहीं माना जा सकता है को स्वीकार योग्य नहीं माना गया है क्योंकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 5.1.5 अभियंता प्रमुख का मंतव्य एवं संचालन पदाधिकारी के मंतव्य के आलोक में नियम के विरूद्ध एकरारित मात्रा से अधिक मात्रा बोल्डर आपूर्ति लेने एवं तदनुरूप भुगतान करने के लिए श्री शर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता दोषी हैं। अतएव आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री प्रद्‌युम्न शर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता, जलपथ प्रमंडल, मुजफ्फरपुर सम्प्रति तकनीकी सलाहकार, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अंचल, मोतिहारी को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

"एक वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"। प्रस्तावित दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री प्रद्‌युम्न शर्मा, तकनीकी सलाहकार, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अंचल, मोतिहारी को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

"एक वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राजभूषण प्रसाद, उप-सचिव।

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31 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-10/2012-1885--श्री विष्णुकांत पाठक, (आई0डी0-2049) तत्का0 कार्यपालक अभियंता, सोन बराज प्रमंडल, इन्द्रपुरी के पदस्थापन अवधि में उनके विरूद्ध पश्चिमी संयोजक नहर के कि0मी0 2.0 से 2.13 एवं कि0मी0 2.25 से 2.36 कि0मी0 के बीच बाँए बाँध के प्राक्कलन में नक्शा से अलग एवं तकनीकी दृष्टि से अनुपयुक्त कार्यमद के प्रावधान से कार्य कराने तथा बम्बू गाड़ने के मद में अधिक भुगतान का आरोप प्रतिवेदित करते हुए आरोप पत्र प्रपत्र-'क' गठित किया गया। गठित आरोप के संदर्भित विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1499, दिनांक 02.07.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री पाठक का दिनांक 31.01.2016 को सेवानिवृत होने पश्चात उक्त विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश संख्या-285-सहज्ञापांक-2118, दिनांक 22.09.16 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया।

1. पश्चिमी संयोजक नहर के कि0मी0 2.0 से 2.13 एवं कि0मी0 2.25 से 2.36 तक बाएँ बाँध के मरम्मति के प्राक्कलन (संख्या-SCMC '0' 9 एवं SCMC '0' 10) में नक्शा से विपरीत दो ROW के बदले एक ROWमें बम्बू पाईलिंग एवं 1.5 मीटर के बदले 3.0 मीटर पाईल गाड़ने का प्रावधान किया गया था। साथ ही तकनीकी रूप से Protection work के लिए उपर्युक्त नाईलॉन क्रेट के बदले अनुपयुक्त Loose sand filled E.C. bags की भी स्वीकृति दी गई। इस प्रकार के प्रावधान से झांकी भराई की उपयोगिता नहीं रह गई एवं उड़नदस्ता जाँच में Protection Work क्षतिग्रस्त एवं अस्त-व्यस्त पाया गया।96 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 इस प्रकार नक्शा से अलग एवं तकनीकी रूप से अनुपयुक्त कार्यमद के प्राावधान वाले प्राक्कलन से कराया गया कार्य कारगर साबित नहीं हुआ एवं भुगतान भी बेकार गया। बम्बू गाड़ने में अधिक भुगतान किया गया जिसके लिए दोषी हैं।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप के प्रमाणित एवं अप्रमाणित होने की स्थिति में श्री पाठक से प्रमाणित एवं असहमति के बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गई। आरोपित पदाधिकारी से प्राप्त बचाव-बयान की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षा- नक्शा से इतर प्रावधान वाले प्राक्कलन के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि नक्शा के अनुसार दोनो प्राक्कलनों (संख्या-SCMC '0' 9 एवं SCMC '0' 10) दो ROW में बम्बू पाईल किया जाना है परन्तु बम्बू पाईल के लिए बाँस की आपूर्ति की गणना में दोनों ROW की गणना के लिए भूलवश 2 से गुणा करना छूट जाने के कारण 377(872x 145) के बदले 232 (87145) एवं 319 (732x 123) के बदले 126 (73123) का प्रावधान हो गया।

प्राक्कलनों से उक्त त्रुटि के कारण एक ROW बम्बू पाईल एवं दोनों ROW में रनर के लिए बाँस का प्रावधान होना परिलक्षित होता है। इससे नक्शा के अनुसार प्राक्कलन तैयार किया जाना स्पष्ट होता है। संचालन पदाधिकारी ने त्रुटिपूर्ण प्राक्कलन तैयार करने का आरोप प्रमाणित माना है साथ ही प्राक्कलन में गणना के अध्ययन से इसे मानवीय भूल होने की संभावना से इंकार नहीं किया जाना अंकित किया गया है।

एक ही ROW में बम्बू पाईल कराकर अनुपयोगी झाँकी भराई कार्य किये जाने के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि वास्तविक रूप में नक्शा के अनुसार दो ROW में ही बम्बू पाईल एवं झाँकी कार्य कराया गया है एवं साक्ष्य के रूप में फोटोग्राफ्स संलग्न किया गया है। जिसमें दो ROW में बम्बू पाईल होना परिलक्षित होता है। जबकि प्राक्कलन की गणना भाग के अनुसार यह कार्य सिर्फ एक ही ROW में कराया गया है। मापीपुस्त में रक्षित प्राक्कलन से बम्बू पाईल से दूसरे ROW के लिए बम्बू का भुगतान एवं प्रावधान होना परिलक्षित नहीं होता है ऐसी स्थिति में दूसरे ROW में बम्बू पाईल किया जाना संदेहास्पद प्रतीत होता है। साथ ही एक ROW बम्बू पाईल की स्थिति में झाँकी भराई कार्य की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है।

संचालन पदाधिकारी ने जाँच प्रतिवेदन में स्थलीय जाँच के दौरान क्षेत्रीय पदाधिकारी की उपस्थिति एवं मापी अथवा भौतिक जाँच के बारे में उल्लेखित नहीं रहने तथा दो ROW के बदले एक ही ROW में कार्य कराये जाने के लिए ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं कराये जाने को अंकित करते हुए आरोपित पदाधिकारी का तर्क की मान्यता दिये जाने को निष्कर्षित किया है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में क्षेत्रीय पदाधिकारी की उपस्थिति एवं भौतिक जाँच उल्लेखित होना परिलक्षित नहीं होता है। मात्र समीक्षा कंडिका 7.2.7.2 में "प्राक्कलन के गणना भाग के अनुसार (वास्तविक रूप में भी) यह कार्य सिर्फ एक ROW में ही कराया गया है" अंकित किया गया है।

भुगतान के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि वास्तविक रूप में दो ROW में बम्बू पाईलिंग कार्य एवं झाँकी भराई कार्य कराया गया एवं गैर योजना मद के अन्तर्गत कार्य कराये जाने के कारण भुगतान स्वीकृत प्राक्कलन/वार्षिक कार्यक्रम के अन्तर्गत किया गया है।

उपलब्ध अभिलेख एवं जाँच प्रतिवेदन कंडिका 6.4.1 एवं 6.6.0 से वार्षिक कार्यक्रम में अनुमोदित राशि रू0 3.92 लाख एवं रू0 3.31 लाख के विरूद्ध क्रमशः रू0 3.84 लाख एवं रू0 3.22 लाख भुगतान किया जाना परिलक्षित होता है। परन्तु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के अनुसार एक ही ROW में कार्य होने से दूसरे ROW के लिए रनर हेतु बाँस आपूर्ति, दूसरे ROW के लिए बम्बू पाईल गाड़ने एवं झाँकी भराई पर किया गया भुगतान संदेह की श्रेणी में होना परिलक्षित होता है। उपरोक्त अंकित तथ्यों, जाँच प्रतिवेदन एवं बचाव-बयान के आलोक में नक्शा से भिन्न एक ही ROW में बम्बू पाईल के प्रावधान को गणना में मानवीय भूल होने को आरोपित पदाधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया है। संचालन पदाधिकारी ने भी मानवीय भूल होने से इंकार नहीं करने को प्रतिवेदित किया गया है। नक्शा के अनुसार दो ROW में कार्य कराये जाने को आरोपित पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराये गये फोटोग्राफ्स को आधार एवं तर्क को संचालन पदाधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया है जबकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन प्राक्कलन एवं मापीपुस्त से एक ही ROW का प्रावधान कार्य एवं भुगतान होना परिलक्षित होता है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री विष्णुकांत पाठक, तत0 कार्यपालक अभियंता, त्रुटिपूर्ण प्राक्कलन के लिए दोषी हैं। जिसके लिए श्री पाठक, तत0 कार्यपालक अभियंता को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है - "पेंशन से 10% (दस प्रतिशत) की कटौती एक वर्ष तक"। उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णित दण्ड श्री विष्णुकांत पाठक, तत0 कार्यपालक अभियंता को संसूचित एवं अधिरोपित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।97 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

31 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-10/2012-1886--श्री अशोक कुमार, (आई0डी0-जे-5058) तत्का0 सहायक अभियंता, संयोजक नहर अवर प्रमंडल, इन्द्रपुरी के पदस्थापन अवधि में उनके विरूद्ध पश्चिमी संयोजक नहर के कि0मी0 2.0 से 2.13 एवं कि0मी0 2.25 से 2.36 कि0मी0 के बीच बाँए बाँध के प्राक्कलन में नक्शा से अलग एवं तकनीकी दृष्टि से अनुपयुक्त कार्यमद के प्रावधान से कार्य कराने तथा बम्बू गाड़ने के मद में अधिक भुगतान का आरोप प्रतिवेदित करते हुए आरोप पत्र प्रपत्र-'क' गठित किया गया। गठित आरोप के संदर्भित विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1444, दिनांक 26.06.15 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री कुमार का दिनांक 30.06.15 को सेवानिवृत होने पश्चात उक्त विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश संख्या-198-सहज्ञापांक-2404, दिनांक 19.10.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया। 2. पश्चिमी संयोजक नहर के कि0मी0 2.0 से 2.13 एवं कि0मी0 2.25 से 2.36 तक बाएँ बाँध के मरम्मति के प्राक्कलन (संख्या-SCMC '0' 9 एवं SCMC '0' 10) में नक्शा से विपरीत दो ROW के बदले एक ROWमें बम्बू पाईलिंग एवं 1.5 मीटर के बदले 3.0 मीटर पाईल गाड़ने का प्रावधान किया गया था। साथ ही तकनीकी रूप से Protection work के लिए उपर्युक्त नाईलॉन क्रेट के बदले अनुपयुक्त Loose sand filled E.C. bags की भी स्वीकृति दी गई। इस प्रकार के प्रावधान से झांकी भराई की उपयोगिता नहीं रह गई एवं उड़नदस्ता जाँच में Protection Work क्षतिग्रस्त एवं अस्त-व्यस्त पाया गया।

इस प्रकार नक्शा से अलग एवं तकनीकी रूप से अनुपयुक्त कार्यमद के प्राावधान वाले प्राक्कलन से कराया गया कार्य कारगर साबित नहीं हुआ एवं भुगतान भी बेकार गया। बम्बू गाड़ने में अधिक भुगतान किया गया जिसके लिए दोषी हैं।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप के प्रमाणित एवं अप्रमाणित होने की स्थिति में श्री कुमार से प्रमाणित एवं असहमति के बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गई। आरोपित पदाधिकारी से प्राप्त बचाव-बयान की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षा- नक्शा से इतर प्रावधान वाले प्राक्कलन के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि नक्शा के अनुसार दोनो प्राक्कलनों (संख्या-SCMC '0' 9 एवं SCMC '0' 10) दो ROW में बम्बू पाईल किया जाना है परन्तु बम्बू पाईल के लिए बाँस की आपूर्ति की गणना में दोनों ROW की गणना के लिए भूलवश 2 से गुणा करना छूट जाने के कारण 377(872x 145) के बदले 232 (87145) एवं 319 (732x 123) के बदले 126 (73123) का प्रावधान हो गया।

प्राक्कलनों से उक्त त्रुटि के कारण एक ROW बम्बू पाईल एवं दोनों ROW में रनर के लिए बाँस का प्रावधान होना परिलक्षित होता है। इससे नक्शा के अनुसार प्राक्कलन तैयार किया जाना स्पष्ट होता है। संचालन पदाधिकारी ने त्रुटिपूर्ण प्राक्कलन तैयार करने का आरोप प्रमाणित माना है साथ ही प्राक्कलन में गणना के अध्ययन से इसे मानवीय भूल होने की संभावना से इंकार नहीं किया जाना अंकित किया गया है।

एक ही ROW में बम्बू पाईल कराकर अनुपयोगी झाँकी भराई कार्य किये जाने के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि वास्तविक रूप में नक्शा के अनुसार दो ROW में ही बम्बू पाईल एवं झाँकी कार्य कराया गया है एवं साक्ष्य के रूप में फोटोग्राफ्स संलग्न किया गया है। जिसमें दो ROW में बम्बू पाईल होना परिलक्षित होता है। जबकि प्राक्कलन की गणना भाग के अनुसार यह कार्य सिर्फ एक ही ROW में कराया गया है। मापीपुस्त में रक्षित प्राक्कलन से बम्बू पाईल से दूसरे ROW के लिए बम्बू का भुगतान एवं प्रावधान होना परिलक्षित नहीं होता है ऐसी स्थिति में दूसरे ROW में बम्बू पाईल किया जाना संदेहास्पद प्रतीत होता है। साथ ही एक ROW बम्बू पाईल की स्थिति में झाँकी भराई कार्य की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है।

संचालन पदाधिकारी ने जाँच प्रतिवेदन में स्थलीय जाँच के दौरान क्षेत्रीय पदाधिकारी की उपस्थिति एवं मापी अथवा भौतिक जाँच के बारे में उल्लेखित नहीं रहने तथा दो ROW के बदले एक ही ROW में कार्य कराये जाने के लिए ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं कराये जाने को अंकित करते हुए आरोपित पदाधिकारी का तर्क की मान्यता दिये जाने को निष्कर्षित किया है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में क्षेत्रीय पदाधिकारी की उपस्थिति एवं भौतिक जाँच उल्लेखित होना परिलक्षित नहीं होता है। मात्र समीक्षा कंडिका 7.2.7.2 में "प्राक्कलन के गणना भाग के अनुसार (वास्तविक रूप में भी) यह कार्य सिर्फ एक ROW में ही कराया गया है" अंकित किया गया है।

भुगतान के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि वास्तविक रूप में दो ROW में बम्बू पाईलिंग कार्य एवं झाँकी भराई कार्य कराया गया एवं गैर योजना मद के अन्तर्गत कार्य कराये जाने के कारण भुगतान स्वीकृत प्राक्कलन/वार्षिक कार्यक्रम के अन्तर्गत किया गया है।

उपलब्ध अभिलेख एवं जाँच प्रतिवेदन कंडिका 6.4.1 एवं 6.6.0 से वार्षिक कार्यक्रम में अनुमोदित राशि रू0 3.92 लाख एवं रू0 3.31 लाख के विरूद्ध क्रमशः रू0 3.84 लाख एवं रू0 3.22 लाख भुगतान किया जाना परिलक्षित होता है। परन्तु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के अनुसार एक ही ROW में कार्य होने से दूसरे ROW के लिए रनर हेतु बाँस आपूर्ति, दूसरे ROW के लिए बम्बू पाईल गाड़ने एवं झाँकी भराई पर किया गया भुगतान संदेह की श्रेणी में होना परिलक्षित होता है।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 98 उपरोक्त अंकित तथ्यों, जाँच प्रतिवेदन एवं बचाव-बयान के आलोक में नक्शा से भिन्न एक ही ROW में बम्बू पाईल के प्रावधान को गणना में मानवीय भूल होने को आरोपित पदाधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया है। संचालन पदाधिकारी ने भी मानवीय भूल होने से इंकार नहीं करने को प्रतिवेदित किया गया है। नक्शा के अनुसार दो ROW में कार्य कराये जाने को आरोपित पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराये गये फोटोग्राफ्स को आधार एवं तर्क को संचालन पदाधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया है जबकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन प्राक्कलन एवं मापीपुस्त से एक ही ROW का प्रावधान कार्य एवं भुगतान होना परिलक्षित होता है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री अशोक कुमार, तत0 सहायक अभियंता, त्रुटिपूर्ण प्राक्कलन के लिए दोषी हैं। जिसके लिए श्री अशोक कुमार, तत0 सहायक अभियंता को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है - "पेंशन से 10% (दस प्रतिशत) की कटौती एक वर्ष तक"। उक्त निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णित दण्ड श्री अशोक कुमार, तत0 सहायक अभियंता को संसूचित एवं अधिरोपित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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31 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-10/2012-1887--श्री वेदाकान्त पाठक (आई0डी0-1696) तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, सोन नहर आधुनिकीकरण अंचल, डिहरी सम्प्रति सेवानिवृत के द्वारा उनके उक्त पदस्थापन अवधि में निविदा संख्या-03/2011-12 के कार्यों का निष्पादन से संबंधित कार्यपालक अभियंता, सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमंडल, सासाराम शि0-डिहरी के प्रस्ताव पर निर्णय नहीं लेने एवं दो पदावनत कार्यपालक अभियंताओं से संबंधित विभागीय निदेश के अनुपालन में अनियमितता बरतने का आरोप प्रपत्र-'क' में प्रतिवेदित किया गया। गठित आरोप के लिए संदर्भित विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1443, दिनांक 26.06.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली, 2005 के नियम 43(बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। आरोप-1-पश्चिमी संयोजक नहर के कि0मी0 2.0 से 2.13 एवं कि0मी0 2.25 से 2.36 तक बाएँ बाँध के मरम्मति के प्राक्कलन (संख्या-SCMC '0' 9 एवं SCMC '0' 10) में नक्शा से विपरीत दो ROW के बदले एक ROWमें बम्बू पाईलिंग एवं 1.5 मीटर के बदले 3.0 मीटर पाईल गाड़ने के लिए प्रावधान वाले प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति दिनांक 14.02.2012 को आपके द्वारा दी गई। साथ ही तकनीकी रूप से Protection work के लिए उपर्युक्त नाईलॉन क्रेट के बदले अनुपयुक्त Loose sand filled E.C. bags की भी स्वीकृति दी गई। इस प्रकार के प्रावधान से झांकी भराई की उपयोगिता नहीं रह गई एवं उड़नदस्ता जाँच में Protection Work क्षतिग्रस्त एवं अस्त-व्यस्त पाया गया।

इस प्रकार नक्शा से अलग एवं तकनीकी रूप से अनुपयुक्त कार्यमद के प्राावधान वाले प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति देने से कराया गया कार्य कारगर साबित नहीं हुआ एवं भुगतान भी बेकार गया उक्त अनियमितता के लिए दोषी हैं। आरोप-2-सोन उच्च स्तरीय नहर प्रमण्डल, सासाराम के कार्यालय भवन की मरम्मति के क्रम में उसमें कार्यरत सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमण्डल, सासाराम शिविर-डिहरी के दो अवर प्रमण्डलों के कार्यालय कार्य को सुचारू रूप से निष्पादन हेतु अस्थायी व्यवस्था के तहत कार्यपालक अभियंता, सोन नहर आधुनिकीकरण प्रमण्डल, सासाराम, शिविर-डिहरी के न्यू डिलिया सिंचाई कॉलनी के सरकारी आवास संख्या-2 में चलाने के पत्रांक-262 दिनांक 20.04.2010 द्वारा दिये गये प्रस्ताव पर उनके द्वारा कोई निर्णय/कार्रवाई नहीं की गई, जिसके लिए वे दोषी है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित किया गया जिसमें संचालन पदाधिकारी द्वारा त्रुटिपूर्ण प्राक्कलन स्वीकृत करने का आरोप प्रमाणित पाया गया। परन्तु अन्य आरोप विन्दु प्रमाणित नहीं पाया गया। संचालन पदाधिकारी के द्वारा अन्य आरोप को प्रमाणित नहीं पाये जाने संबंधि तथ्य से असहमत होते हुए प्रमाणित एवं असहमति के बिन्दु पर आरोपित पदाधिकारी से विभागीय पत्रांक-831, दिनांक 01.06.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। आरोपित पदाधिकारी से प्राप्त बचाव बयान की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षा-प्राक्कलन के साथ संलग्न नक्शा में दो ROW में Bamboo piling का प्रावधान था जबकि सम्बद्ध क्षेत्रीय पदाधिकारी (अधीक्षण अभियंता) द्वारा स्वीकृत प्राक्कलन में एक ही ROW के लिए Bamboo की गणना की गई तथा उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 7.2.7.2 में अंकित है कि प्राक्कलन के गणना भाग के अनुसार वास्तविक रूप में भी यह कार्य एक ROW में ही कराया गया साथ ही 7.2.7.3 में Bush filling कार्य मद में भुगतान संशयपूर्ण एवं अनियमित माना गया है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराए गए Photographs से दो ROW में कार्य कराना जाना परिलक्षित होता है जिससे संचालन पदाधिकारी द्वारा भी मान्य किया गया है। उपरोक्त विरोधाभाष की स्थिति में अभियंता प्रमुख सिंचाई सृजन से मंतव्य की मांग की गई जो निम्नवत है - "आरोपी के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गई जिसकी समीक्षा निगरानी प्रशाखा द्वारा की गई। कराए गए कार्य को प्राक्कलन के साथ संलग्न नक्शा में दो ROW में बम्बू पाईल का प्रावधान था जिसके अनुसार आरोपी पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराए गए Photographs से दो ROW में बम्बू पाईल का कार्य कराया जाना परिलक्षित होता है। जिसकी मान्यता संचालन पदाधिकारी द्वारा भी दी गई है।"99 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 तकनीकी समीक्षा, संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं अभियंता प्रमुख द्वारा समर्पित मंतव्य के आलोक में स्थिति निम्नवत है - (1) प्राक्कलन में संलग्न नक्शा के अनुसार दो ROW Bamboo piling का कार्य कराये जाने को आरोपित पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराए गए Photographs को आधार एवं तर्क को संचालन पदाधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया जिसे अभियंता प्रमुख (सिंचाई सृजन), जल संसाधन विभाग, पटना द्वारा सहमति दी गई है। जिससे स्पष्ट होता है कि दोनों स्थलों पर Double ROW में Bamboo piling कराये जाने पर सहमति प्रदान की गई है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि कनीय अभियंता द्वारा प्राक्कलन त्रुटिपूर्ण बनाया गया जिसकी जाँच संबंधित सहायक अभियंता एवं तत्कालीन कार्यपालक अभियंता को द्वारा नहीं की गई। त्रुटिपूर्ण प्राक्कलन को संलग्न नक्शा से बिना मिलान किए प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति श्री वेदाकान्त पाठक, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा दी गई। मामले की पूर्ण समीक्षोपरांत उक्त अनियमितता के लिए श्री वेदाकान्त पाठक, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता को निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया है - "पेंशन से 10% कटौती एक वर्ष के लिए"। उक्त दंड प्रस्ताव पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। अतः श्री वेदाकान्त पाठक, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता (आई0डी0-1696) सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न निर्णीत दंड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

"पेंशन से 10% कटौती एक वर्ष के लिए"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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1 अगस्त 2018

सं॰ 22/नि0सि0(औ0)-17-05/2017-1659--श्री अनिल कुमार जायसवाल, तदेन कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग, कार्य प्रमंडल, अरवल (सेवानिवृत) आई0डी0-2549 द्वारा अपने पदस्थापन काल में कार्य प्रमंडल, अरवल के अधीन मुख्य सड़क एन0एच0-98 के कलेर प्राथमिकी स्वास्थ्य केन्द्र तक पहुँच पथ के निर्माण कार्य में, मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजनान्तर्गत सरवरपुर से मुसोपुर सड़क निर्माण, मनमाने ढं़ग से कार्य आवंटन, बहादुरपुर से सुमेरा पथ भाग-1 एवं भाग-2 की मरम्मति कार्य एवं तीनों पथों के जाँच में एक पथ में एकरारनामा की राशि से 9.99 प्रतिशत अधिक भुगतान संबंधी अनियमितता के आरोप गठित करते हुए ग्रामीण कार्य विभाग के संकल्प ज्ञापांक संख्या-424, दिनांक-29.01.2014 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-14 एवं 17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री जायसवाल दिनांक 31.10.2013 को सेवानिवृत हो चुके थे। अतएव उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही को ग्रामीण कार्य विभाग के आदेश संख्या-29, दिनांक 06.05.2014 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में सम्परिवर्तित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोप पत्र प्रपत्र-'क' में वर्णित आरोपों को प्रमाणित पाया गया। उल्लेखनीय है कि श्री अनिल कुमार जायसवाल का पैतृक विभाग, जल संसाधन विभाग होने के आधार पर विभागीय कार्यवाही में अग्रेत्तर कार्रवाई हेतु ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा सभी अभिलेखों को जल संसाधन विभाग को उपलब्ध कराया गया। श्री जायसवाल के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के क्रम में समर्पित जाँच प्रतिवेदन में प्रमाणित आरोपों के आलोक में बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) के तहत विभागीय पत्रांक-1674, दिनांक 20.09.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। जवाब अप्राप्त रहने की स्थिति में श्री जायसवाल को विभिन्न पत्रों के माध्यम से स्मारित किया गया, जो अबतक अप्राप्त रहा है। इस स्थिति में उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर विभागीय समीक्षा की गई। समीक्षा- प्रस्तुत आरोप एन0एच0-98 से कलेर पी0एच0सी0 तक पहुँच पथ निर्माण के लिए तीन निविदाकारों में से बैजनाथ निर्माण इंडिया प्रा0 लि0, राँची को 15% कम दर पर श्री जायसवाल द्वारा दर में छेड़-छाड़ करके 0.15% कर रूपये 5,37,719.00 गबन कर लिए जाने से संबंधित है। प्राप्त परिवाद के आलोक में कार्यपालक अभियंता, निगरानी प्रमंडल-1 (मु0)ग्रा0का0वि0 द्वारा मामले की जाँच की गई। जाँच प्रतिवेदन पत्रांक-614 अनु0, दिनांक-13.12.11 द्वारा निविदा पंजी में तीनों निविदादाताओं द्वारा 15% कम दर उद्धृत किए जाने, तुलनात्मक विवरणी में तीनों निविदादाताओं के B.O.Q के अंतिम पृष्ठ पर अंकित 15% कम दर को फोर्स इन्ट्री कर 0.15% कर दिया जाना पाया गया है। इस प्रकार जाँच पदाधिकारी द्वारा फोर्स इन्ट्री कर दर को 0.15% कम कर दिये जाने से राजस्व की क्षति होने एवं परिवाद पत्र में उल्लेखित आरोप प्रमाणित पाया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच पदाधिकारी के जाँचित अभिलेखों को सही पाते हुए आरोपी श्री जायसवाल के अंचलीय कार्यालय के निविदा पंजी में लिपिकीय भूल के कारण 0.15% दर को 15% अंकित होने के तथ्य को अस्वीकार करते हुए आरोप प्रमाणित पाया गया है।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 100 निविदा पंजी में तीनों निविदादाताओं का निविदित दर 15% अंक एवं अक्षर में अंकित होने तथा निविदादाताओं एवं पदाधिकारी को हस्ताक्षर स्पष्ट है। परिमाण विपत्र में 0.15.00% below अंकित होना स्पष्ट होता है जो संदेहास्पद प्रतीत होता है। क्योंकि 15 के पहले एवं बाद में दशमलव चिह्न दिये जाने का कोई औचित्य स्पष्ट नहीं होता है। साथ ही क्रमांक C में पंद्रह प्रतिशत बड़े अक्षरों में एवं दशमलव छोटे अक्षरों में अंकित होने से फोर्स इन्ट्री किये जाने से इंकार नहीं किया जा सकता है। तुलनात्मक विवरणी में निविदादाताओं द्वारा उद्‌दृत दर 15 प्रतिशत अनुसूचित दर से कम दर अंकित होना स्पष्ट होता है जो आरोपी श्री जायसवाल द्वारा हस्ताक्षरित है। उपरोक्त से आरोपी के लिपिकीय भूल के कथन को स्वीकार किये जाने का कोई आधार परिलक्षित नहीं होता है। निष्कर्ष-1-उक्त परिपेक्ष्य में उपरोक्त तथ्यों, जाँच पदाधिकारी एवं संचालन पदाधिकारी के समीक्षा एवं मंतव्य के आलोक में आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। (ब) सरवरपुर से मुसोपुर सड़क निर्माण में धांधली मामले में आरोपी श्री जायसवाल के बचाव-बयान का मुख्य सार :- संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से आरोपी के पत्रांक-32 दिनांक-09.02.12 सचिव ग्रा॰का॰वि॰ को पत्रांक-109 दिनांक-10.05.2013 संयुक्त सचिव ग्रा॰का॰वि॰ को एवं पत्रांक-शून्य दिनांक-24.07.2017 सं॰पदा॰ को सम्बोधित पत्रों में आरोप संदर्भित तथ्य दिया जाना स्पष्ट होता है। उक्त से मुख्यतः अरोपवार निम्न तथ्य अंकित किया जाना स्पष्ट होता है :- आरोप संख्या- 1ः- विषयांकित कार्य में GSB का कार्य जाँच मे नहीं पाये जाने एवं इसके लिए रू॰ 38.25 लाख भुगतान किये जाने के संबंध में आरोपी का कहना है कि बिहार लोक निर्माण एवं लेखा संहिता में दिये निदेश के आलोक में कार्यपालक अभियंता स्तर पर 10 प्रतिशत जाँच किया जाना है जो मेरे द्वारा किये जाने से आरोप नहीं बनता है। एकरारनामा कंडिका 10 एवं 7 में विशिष्टि के अनुरूप कार्य नहीं करने के लिए संवेदक को दंडित किये जाने एवं सभी चालू विपत्र अग्रिम भुगतान होने का प्रावधान है। प्रथम चालू विपत्र से किये गये कार्य के विरूद्ध दिनांक-10.06.11 को रू॰ 38.25 लाख भुगतान किया गया एवं 10% राशि सुधार हेतु रोककर रखा गया क्योकि GSB परत कुछ जगहों को छोड़कर मिलाई जा रही थी। दिनांक-16.06.11 को जाँच पदाधिकारी के स्थलीय जाँच के दौरान दिये गये निदेश एवं कमी के आलोक में GSB परत का कार्य विशिष्टि के अनुरूप करा दिया गया जिसे वर्त्तमान में भी किसी पदाधिकारी द्वारा देखा जा सकता है। आरोप संख्या- 2 :- विषयांकित कार्य में सहायक अभियंता द्वारा बिना मापी जाँच के गबन के नीयत से भुगतान किये जाने के संबंध में आरोपी का कहना है कि लोक निर्माण लेखा के संबंध में आरोपी का कहना है कि लोक निर्माण लेखा संहिता कंडिका-243 के तहत कनीय अभियंता द्वारा मापीपुस्त में अंकित मापी एवं तैयार विपत्र के प्रमंडलीय स्तर पर जाँचोपरान्त प्रथम चालू विपत्र का भुगतान में किसी तरह की अनियमितता नहीं है क्योकि बिना सहायक अभियंता के हस्ताक्षर के किसी विपत्र के भुगतान पर किसी नियम के तहत रोक नहीं है। आरोप संख्या- 3 :- पथ के किनारे सिंचाई हेतु पूर्व निर्मित नाली के कुछ स्थानों पर भर दिये जाने एवं कुछ स्थानों पर खुदाई कर दिये जाने से जनाक्रोश के संबंध में आरोपी का कहना है कि योजना में भूमी अर्जन का प्रावधान नहीं रहने के कारण भूधारियों के अनुमति से उनके जमीन से मिट्‌टी काटी जाती है एवं स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप मिट्‌टी कार्य कराया जाता है। पथ के रेखांकण में एक से डेढ़ फीट निर्मित नाली का कहीं कहीं कुछ भाग भर गया एवं कहीं खुदाई पथ निर्माण के लिए हो गया था जिसे सिंचाई में असुविधा न हो इस हेतु उनके अनुरोध एवं इच्छानुसार ठीक करवा दिया गया था जिसका उल्लेख जाँच प्रतिवेदन दिनांक- 21.6.2011 क कंडिका- 13 में किया गया है। आरोप संख्या- 4 :- पथ के दोनों तरफ खुदाई के कारण बने गड्‌ढ़े से दुर्घटना होने के संबंध में आरोपी का कहना है कि विषयांकित कार्य में भूमि अर्जन का प्रावधान नही रहने के कारण भू-खण्ड मालिकों के सहमकत से सीमीत क्षेत्र में मिट्‌टी काटे जाने की बाध्यता थी पथ की उँचाई 2-3 फीट में समुचित स्लोप में कर दिये जाने से दुर्घटना की गुंजाइश नहीं रह जाती है। समीक्षा :- श्री ब्रह्मदत साह, श्री दामोदर शर्मा एवं अन्य के परिवाद के आलोक में मामले की जाँच निगरानी प्रमंडल-3 (मु॰) ग्रमीण कार्य विभाग के कार्यपालक अभियंता द्वारा की गई। जाँच पदाधिकारी द्वारा दिनांक-16.06.11 को स्थलीय जाँच के दौरान मिट्‌टी कार्य होने Side Slope की आवश्यकता होने, पथ किनारे पूर्व निर्मित सिंचाई नाला कहीं भरा कही खुदा हुआ एवं पथ के दोनों किनारे से मिट्‌टी खुदाई के कारण खाई बना पाया गया है एवं G.S.B का कार्य नहीं हुआ पाया गया। साथ ही दिनांक- 10.06.11 तक रू॰ 38.25 लाख भुगतान एवं विपत्र/मापी सहायक अभियंता द्वारा हस्ताक्षरित नहीं होना अंकित किया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन एवं आरोपी के बयान के आलोक में पूर्ण समीक्षोपरांत आरोप प्रमाणित होने के निष्कर्षित किया गया है। बिना GSB कार्य कराये रू॰ 38.25 लाख के भुगतान/गबन के संबंध में आरोपी के बयान से स्पष्ट होता है कि दिनांक-10.06.11 को भुगतान के समय GSB कार्य कुछ स्थल को छोड़कर नहीं कराया गया था जिसे दिनांक-16.06.11 को स्थलीय जाँच के दौरान GSB कार्य जाँच पदाधिकारी द्वारा नहीं पाया गया। उक्त से बिना कार्य एवं जाँच के रू॰ 38.25 लाख भुगतान/गबन के लिए आरोपी जिम्मेवार प्रतीत होते है।101 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 सहायक अभियंता के बिना मापी जाँच के भुगतान से संबंधित आरोप-2 के संबंध में आरोपी द्वारा इसे स्वीकार किया गया प्रतीत होता है। सहायक अभियंता द्वारा भी मापी जाँच का संहिता/ परिपत्र में प्रावधान है। अतएव उनका कथन स्वीकार योग्य नहीं प्रतीत होता है। सिंचाई नाला को कुछ जगहों पर भरे जाने एवं कुछ जगहों पर खुदाई किये जाने से संबंधित आरोप सं॰-3 को स्वीकार किया गया है। जिससे आरोपी अथवा अन्य पदाधिकारी द्वारा कार्य के दौरान सथल पर नहीं जाया जाना प्रतीत होता है जो जनाक्रोश का कारण बना। अतएव आरोप प्रमाणित एवं बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। पथ के दोनों तरफ मिट्‌टी खुदाई कर खुदाई किये जाने संबंधित आरोप संख्या-4 के संदर्भ में आरोपी का कहना है कि भूमि अर्जन का प्रावधान योजना मे नहीं रहने के कारण भू-धारियों के अनुमति से मिट्‌टी कटाई की गई है। जाँच पदाधिकारी द्वारा पथ के दोनों तरफ मिट्‌टी कटाई के कारण उत्पन्न खाई पाया गया। पथ के नजदीक से मिट्‌टी खुदाई कर खाई किया जाना पथ की सुरक्षा एवं दुर्घटना के मद्‌देनजर उचित प्रतीत नहीं होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी अथवा अन्य सम्बद्ध पदाधिकारियों द्वारा कार्य के दौरान स्थल पर न जाकर संबेदक के विवेक से मिट्‌टी कटाई कार्य छोड़ दिया गया हो जिसके कारण पथ के नजदीक अधिक गहराई में मिट्‌टी काटकर मिट्‌टी भराई कार्य किया गया। अतएव आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। निष्कर्ष :-2 जाँच पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा की गई समीक्षा एवं निष्कर्ष से सहमत होते हुए आरोपी श्री अनिल कुमार जायसवाल के विरूद्ध सरवरपुर से मुसोपुर सड़क निर्माण में अनियमितता से संबंधित गठित आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। (स) अनियोजित अभियंता को सरकार द्वारा प्रदत सुविधा हेतु नियमों को नजर अंदाज कर मनमाने ढ़ंग से कार्यवंटन में अनियमितता :- आरोपी श्री जायसवाल का संचालन पदाधिकारी एवं अन्य पदाधिकारी को दिया गया बचाव बयान :- संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में उल्लेखित आरोपी के अभिकथन सूची के अवलोकन से संयुक्त सचिव ग्रा॰का॰वि॰ को सम्बोधित पत्र दिनांक-24.07.17 से आरोप संदर्भित तथ्य अंकित किया जाना स्पष्ट होता है। आरोपी द्वारा अपने पत्रांक-109 दिनांक-10.05.13 में प्रतिवेदित किया गया है कि जाँच प्रतिवेदन के साथ अनु॰ यथा निविदा कागजात पेपर कटिंग तुलनात्मक विवरणी, आरोप में संदर्भित पत्रों की छायाप्रति संलग्न नहीं है जिसके कारण सभी आरोप साक्ष्य विहिन हो जाते हैं। अपने पत्र दिनांक-24.07.17 में प्रतिवेदित किया गया है कि बिहार लोक निर्माण संहिता के अनुसार निविदा निष्पादन की शक्ति प्रदत है। उक्त प्रदत शक्ति के आलोक में नियमानुसार कार्रवाई की गयी थी। तुलनात्मक विवरणी पर उनके सिवा अन्य का हस्ताक्षर नहीं होने का विरोध करते हुए मूल संचिका अवलोकन करने को कहा गया है। साथ ही उनके कार्य शैली से स्थानीय राजनैतिक को नाखुश रहने, गलत कार्य हेतु दबाव देने एवं जान पर खतरा उत्पन्न होने को प्रतिवेदित किया गया है। समीक्षा ः- प्रस्तुत आरोप कार्यपालक अभियंता द्वारा आमंत्रित तीन ग्रुपों के निविदा निष्पादन सक्षमता के बाहर किये जाने नियमानुकूल नहीं होने एवं मनमाने ढ़ंग से एक ही निविदादाता को कार्यावंटन किये जाने से संबंधित है। परिवादी की जाँच निगरानी प्र॰-3 (मु॰) ग्रा॰ कार्य विभाग द्वारा की गयी जाँच प्रतिवेदन के अवलोकन से आरोपों में उल्लेखित तथ्यों के सदृश तथ्य जाँच में भी पाया जाना परिलक्षित होता है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से में उपरोक्त आरोपों को आरोप प्रमाणित पाया गया है। P.W.D. संहिता के कंडिका 294(VIII) के अनुसार कार्यपालक अभियंता रू॰ 3.5 लाख तक के निविदा को स्वीकार कर सकते हैं। प्रस्तुत मामले में आरोपी कार्यपालक अभियंता द्वारा रू॰8.00 लाख, 16.00 लाख एवं 25.00 लाख प्राक्कलित राशि से संबंधित निविदा का निस्तार किया गया है जो उनके सक्षमता में नहीं है। अतएव निर्माण संहिता में प्रदत शक्ति के अनुसार निविदा निस्तार किये जाने का उनका अभिकथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। निर्माण संहिता क नियम 163 में समान निविदित दर की स्थिति में लॉटरी के आधार पर चुनाव किया जाना है आठ ग्रुपों से संबंधित निविदा सूचना के ग्रुप सं॰-1 में श्री जयबहादुर सिंह एवं श्री सुभाष कुमार द्वारा समान दर (15% अनुसूचित दर से कम) निविदित करने की स्थिति में बिना लॉटरी के श्री जय बहादुर सिंह को निविदा निस्तार करते हुए कार्यावंटन किया जाना परिलक्षित होता है जो संहिता के प्रावधान का उल्लंघन माना जा सकता है। इसी प्रकार इसी निविदा के ग्रुप सं॰-7 का निविदा, निविदा खुलने की प्रकाशित तिथि 16.04.11 के बदले 18.04.11 को खोला जाना स्पष्ट होता है जबकि इसे नियमानुसार 16.04.11 को ही खोला जाना चाहिये था। इस प्रकार इस ग्रुप के निविदा निस्तार एवं कार्यावंटन में नियमों का उल्लंघन एवं मनमानापन किया जाना स्पष्ट होता है। जहाँ तक तुलनात्मक विवरणी पर अन्य कर्मी/पदाधिकारी का हस्ताक्षर नहीं होने के जाँच में पाये गये तथ्य के संदर्भ में आरोपी का मूल अभिलेख अवलोकन करने के अभिकथन के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा अभिलेख की जाँच में जाँचित तथ्य को सही पाया जाना स्पष्ट होता है। निष्कर्ष- 3ः- जाँच पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा की गई समीक्षा एवं निष्कर्ष से सहमत होते हुए आरोपी श्री अनिल कुमार जायसवाल के विरूद्ध अनियोजित अभियंता को सरकार द्वारा प्रदत्त सुवीधा हेतु नियमो को नजर अंदाज कर मनमाने ढ़ंग से कार्यावंटन से संबंधित गठित आरोप प्रमाणित होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा जो द्वितीय कारण-पृच्छा बयान में आरोप संदर्भित कोई तथ्य नहीं दिया गया है। अतः संचालन पदाधिकारी के मंतव्य सहमत होते हुए द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य नहीं पाया गया है।102 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 उपर्युक्त समीक्षा एवं निष्कर्ष के आलोक में श्री अनिल कुमार जयसवाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग कार्य प्रमंडल-02, अरवल संप्रति सेवानिवृत्त के विरूद्व गंभीर आरोप है जो ग्रामीण कार्य विभाग से संबंधित है। ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा श्री जायसवाल के विरूद्व संचालित विभागीय कार्यवाही में प्राप्त जॉच प्रतिवेदन एवं अन्य संबंधित अभिलेख की छायाप्रति जल संसाधन विभाग को भेजते हुए अनुरोध किया गया है कि जॉच प्रतिवेदन के आलोक में श्री जायसवाल के विरूद्व प्रमाणित आरोपों के लिए दंड के संबंध में निर्णय लिया जाय। श्री जायसवाल पर टेंडर के निष्पादन में अनियमितता, बिना कार्य कराये राशि का भुगतान एवं ग्रामीण कार्य विभाग को राजस्व क्षति पहुंचाने एवं निविदित दर में छेड़छाड़ करके दर को कम करते हुए संवेदक को लाभ पहूंचाने जैसे गंभीर आरोप प्रमाणित पाये गये है। उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अनिल कुमार जायसवाल, तदेन कार्यपालक अभियंता (सेवानिवृत) को निम्न दंड अधिरोपित करने का निर्णय विभाग द्वारा लिया गया है :-

"देय पेंशन की राशि में से 40% की राशि को स्थायी रूप से रोक"। उक्त दंड प्रस्ताव पर माननीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त दंड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना की सहमति प्राप्त है। उक्त दण्ड निर्णय के आलोक में श्री अनिल कुमार जायसवाल, कार्यपालक अभियंता (सेवानिवृत) को निम्न दंड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है। "देय पेंशन की राशि में से 40% की राशि को स्थायी रूप से रोक"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, चन्द्रमा प्रसाद, अवर सचिव।

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गृह विभाग

(आरक्षी शाखा)

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अधिसूचनाएं

8 फरवरी 2019

सं0 1/पी1-02/2013 खंड-I गृ.आ.-1381--भारतीय पुलिस सेवा के निम्नांकित पदाधिकारियों को स्थानांतरित करते हुये अगले आदेश तक उनके नाम के सम्मुख स्तम्भ-4 में अंकित पद एवं स्थान पर पदस्थापित किया/अतिरिक्त प्रभार दिया जाता है :-

क्र0 सं0 पदाधिकारियों का नाम/बैच वर्त्तमान पदस्थापन नव पदस्थापन/अतिरिक्त प्रभार
1 2 3 4
1. श्री आलोक राज, भा0पु0से0 (1989) अपर पुलिस महानिदेशक, विधि-व्यवस्था, बिहार पटना। पुलिस महानिदेशक (प्रशिक्षण), बिहार, पटना। अतिरिक्त प्रभार- महानिदेशक, बिहार पुलिस अकादमी, राजगीर
2. श्री अमित कुमार, भा0पु0से0 (1994) अपर पुलिस महानिदेशक, रेलवे, बिहार, पटना। अतिरिक्त प्रभार- अपर पुलिस महानिदेशक, विधि-व्यवस्था, बिहार, पटना।
3. श्री नैय्‌यर हसनैन खाँ, भा0पु0से0 (1996) प्रक्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक, पटना। प्रक्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक, मुजफ्फरपुर।
4. श्री सुनील कुमार, भा0पु0से0 (1996) प्रक्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक मुजफ्फरपुर। प्रक्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक, पटना।
5. श्री अभिनव कुमार, भा0पु0से0 (तमिलनाडु-2009) पुलिस महानिरीक्षक के सहायक, रेलवे, बिहार, पटना। पुलिस अधीक्षक, नगर (पश्चिमी), पटना।
6. श्री सुधीर कुमार पोरिका, भा0पु0से0 (2010) पुलिस अधीक्षक, नालंदा। पुलिस अधीक्षक, विशेष कार्य बल, पटना।
7. श्री आनन्द कुमार, भा0पु0से0 (2012) पुलिस अधीक्षक, ग्रामीण, पटना। समादेष्टा, बिहार सैन्य पुलिस-7, कटिहार।
8. श्री निलेश कुमार, भा0पु0से0 (नवप्रोन्नत) पुलिस अधीक्षक, विशेष कार्य बल, पटना। पुलिस अधीक्षक, नालंदा।
9. श्री संजय कुमार सिंह, भा0पु0से0 (नवप्रोन्नत) पुलिस अधीक्षक, रेल, मुजफ्फरपुर। पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण), पटना।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, गिरीश मोहन ठाकुर, अवर सचिव।103 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

6 फरवरी 2019

सं0 1/सी0-01-31/2014 गृ0आ0-1242--श्री आलोक राज, भा0पु0से0 (1989), अपर पुलिस महानिदेशक, विधि-व्यवस्था, बिहार, पटना को अपर पुलिस महानिदेशक कोटि से पुलिस महानिदेशक कोटि [Pay Level-16 in the Pay Matrix (रू0 2,05,400 - 2,24,400/-)] में प्रोन्नति प्रदान की जाती है।

2. प्रोन्नति का आर्थिक लाभ प्रोन्नत पद पर पदस्थापन की अधिसूचना निर्गत होने के पश्चात्‌, प्रभार ग्रहण करने की तिथि से देय होगा ।

बिहार-राज्यपाल के आदेष से, रंजन कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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18 दिसम्बर 2018

सं0 1/पी1-02/2013 खंड-I गृ.आ.-11652--भारतीय पुलिस सेवा के निम्नांकित पदाधिकारियों को स्थानांतरित

क्र0 सं0 पदाधिकारियों का नाम/बैच वर्त्तमान पदस्थापन नव पदस्थापन
1 2 3 4
1. श्री गणेश कुमार, भा0पु0से0 (2000) पदस्थापन की प्रतीक्षा में। पुलिस महानिरीक्षक (प्रोविजन), बिहार, पटना।
2 श्री राकेश राठी, भा0पु0से0 (2002) पदस्थापन की प्रतीक्षा में। पुलिस उप-महानिरीक्षक, शाहाबाद क्षेत्र, डिहरी ऑन-सोन।
3 श्री अभिनव कुमार, भा0पु0से0 (TN : 2009 ), पदस्थापन की प्रतीक्षा में। पुलिस महानिरीक्षक के सहायक, रेल, बिहार, पटना।
4 श्री चन्दन कुशवाहा, भा0पु0से0 (2010), पुलिस अधीक्षक, बॉका। समादेष्टा, गृह रक्षा वाहिनी, बिहार, पटना।
5 श्रीमती स्वपना जी0 मेश्राम, भा0पु0से0 (2011), प्राचार्य, सी0टी0एस0, नाथनगर। पुलिस अधीक्षक, बॉका।
6 श्री आशीष भारती, भा0पु0से0 (2011) वरीय पुलिस अधीक्षक, भागलपुर। अतिरिक्त प्रभार- प्राचार्य, सी0टी0एस0, नाथनगर।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, रंजन कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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17 दिसम्बर 2018

सं0 1/पी1-02/2013 खंड-II गृ.आ.-11622--भारतीय पुलिस सेवा के निम्नांकित पदाधिकारियों को स्थानांतरित

क्र0 सं0 पदाधिकारियों का नाम/बैच वर्त्तमान पदस्थापन नव पदस्थापन
1 2 3 4
1. श्री सुजीत कुमार, भा0पु0से0 (2006) पदस्थापन की प्रतीक्षा में। पुलिस अधीक्षक, सीतामढ़ी
2. श्री विकास वर्मन, भा0पु0से0 (2008) पुलिस अधीक्षक, सीतामढ़ी समादेष्टा, बिहार सैन्य पुलिस-5, पटना।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, रंजन कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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6 फरवरी 2019

सं0 1/पी05-10-01/2008 गृ0आ0-1243--श्री विनोद कुमार चौधरी, भा0पु0से0 (1999), तत्कालीन पुलिस उप-महानिरीक्षक, अपराध अनुसंधान विभाग, बिहार, पटना के विरूद्ध विभागीय ज्ञापन सं0-10014, दिनांक-04.12.2014 एवं विभागीय संकल्प सं0-2410, दिनांक-29.03.2016 द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही सं0-26/2016 लंबित रहने के कारण104 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 दिनांक 27.12.2016 को आयोजित विभागीय प्रोन्नति समिति की बैठक में विचारोपरान्त पुलिस महानिरीक्षक की कोटि में प्रोन्नति की अनुशंसा मुहरबंद लिफाफे में रखी गयी।

2. श्री चौधरी के विरूद्ध संचालित उक्त विभागीय कार्यवाही में संघ लोक सेवा आयोग के परामर्श के आलोक में ''परिनिन्दा (censure)'' का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिया गया एवं तत्संबंधी विभागीय संकल्प सं0-927, दिनांक-29.01.2019 निर्गत किया गया। गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा निर्गत दिशा-निर्देश के आलोक में विभागीय कार्यवाही के फलस्वरूप किसी पदाधिकारी पर कोई दण्ड अधिरोपित होने पर मुहरबंद लिफाफे की अनुशंसा के अनुरूप कोई कार्रवाई नहीं की जानी है। उनकी प्रोन्नति का मामला प्रोन्नति समिति की अगली बैठक में अधिरोपित दण्ड के आलोक में विचारणीय है।

3. अधिरोपित दण्ड के प्रभाव के संबंध में अखिल भारतीय सेवायें (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1969 के अन्तर्गत परिनिन्दा के दण्ड के प्रभाव की अवधि निर्धारित नहीं है। परिनिन्दा के लघु दण्ड के अधिरोपण के पश्चात्‌ विभागीय कार्यवाही पूर्ण होने के फलस्वरूप उनकी प्रोन्नति के मामले पर विभागीय प्रोन्नति समिति की अगली बैठक में सामान्य रूप से विचार किया जाना है। चूंकि श्री चौधरी पर परिनिन्दा का दण्ड अधिरोपित किया गया है, इसलिये उन्हें भूतलक्षी प्रभाव से प्रोन्नति अनुमान्य नहीं है। इसी आशय का परामर्श समरूप मामले में भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक पदाधिकारी के संदर्भ में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार के पत्र सं0-20011/6/2015-AIS-II, दिनांक-04.10.2017 द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार को दिया गया है।

4. दिनांक-29.01.2019 को श्री विनोद कुमार चौधरी, भा0पु0से0 (1999) पर अधिरोपित लघु दण्ड ''परिनिन्दा'' के प्रभाव की कोई अवधि नहीं होने के कारण दिनांक-31.01.2019 को वार्धक्य सेवानिवृत्त श्री चौधरी की पुलिस महानिरीक्षक कोटि में प्रोन्नति पर विभागीय प्रोन्नति समिति द्वारा विचारोपरान्त श्री चौधरी को दण्ड अधिरोपण की तिथि 29.01.2019 के प्रभाव से पुलिस महानिरीक्षक कोटि में वैचारिक प्रोन्नति की अनुशंसा की गयी।

5. विभागीय प्रोन्नति समिति की अनुशंसा पर सक्षम प्राधिकार के अनुमोदन के आलोक में श्री विनोद कुमार चौधरी, भा0पु0से0 (1999) सम्प्रति सेवानिवृत्त को पुलिस उप-महानिरीक्षक की कोटि से पुलिस महानिरीक्षक की कोटि वेतनमान [Pay Level-14 in the Pay Matrix (रू0 1,44,200 - 2,18,200/-)] में दिनांक-29.01.2019 के प्रभाव से वैचारिक प्रोन्नति प्रदान की जाती है।

बिहार-राज्यपाल के आदेष से, रंजन कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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पटना उच्च न्यायालय

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अधिसूचनाएं

30 नवम्बर 2018

सं0 477 नि0ः--निम्न तालिका के स्तम्भ-2 में उल्लिखित जिला एवं सत्र न्यायाधीश/प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय को, तालिका के स्तंभ-3 में निर्देशित स्थान एवं स्तम्भ 4 में दी गयी स्थानान्तरण श्रृखंला के अन्तर्गत जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्य करने हेतु स्थानांतरित एवं पदस्थापित किया जाता है।

क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम एवं वर्तमान पदस्थापन का स्थान। स्थान का नाम जहॉ पदाधिकारी स्थानान्तरित किए गए स्थानान्तरण श्रृंखला
1. 2. 3. 4.
1. श्री कृष्ण कान्त त्रिपाठी, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पटना। किशनगंज डा0 रतन किशोर तिवारी के स्थान पर।
2. श्री रूद्र प्रकाश मिश्रा, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, नवादा। पटना श्री के0के0 तिवारी के स्थान पर।
3. श्री शैलेन्द्र सिंह, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कैमुर, भभुआ। गया सेवानिवृत्त श्री रविन्द्र पटवारी के स्थान पर।
4. श्री प्रेम रंजन मिश्रा, निबंधक (लिस्ट), पटना उच्च न्यायालय, पटना। वैशाली (हाजीपुर) श्री अखिलेश जैन के स्थान पर।
5. श्री राज कुमार सिंह, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जमुई। दरभंगा श्री अरूणेन्द्र सिंह के स्थान पर।
6. श्री अम्बरीक्ष कुमार तिवारी, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, कैमुर (भभुआ) बांका श्री मजहर इमाम के स्थान पर।
7 . मो0 परवेज आलम, सदस्य सचिव, बिहार राज्य न्याय आयोग, पटना। अपने वर्तमान पदस्थापन के स्थान पर जिला न्यायाधीश के रूप में उत्क्रमित --
8. श्री अनिल कुमार झा-1, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, कटिहार। नवादा श्री आर. पी. मिश्रा के स्थान पर।
9. श्री नजरे इमाम अंसारी, पीठासीन पदाधिकारी, बिहार बक्फ टि्‌व्यूनल, पटना। अपने वर्तमान पदस्थापन के स्थान पर जिला न्यायाधीश के रूप में उत्क्रमित --
10. श्री रघुपति सिंह, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, सारण, छपरा। नालंदा, बिहारशरीफ सेवानिवृत्त श्री उज्जवल कुमार दुवे के स्थान पर।
11. श्री ललन लाल श्रीवास्तव, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, औरंगाबाद। समस्तीपुर सेवानिवृत्त श्री के0 एम0 तिवारी के स्थान पर।
12. श्री राम प्रकाश, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, अररिया। अररिया श्री आर0 के0 तिवारी के स्थान पर।
13. श्री हरेन्द्र नाथ, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, मधेपुरा। बक्सर सेवानिवृत्त श्री ए0 के0 श्रीवास्तव के स्थान पर।
14. श्री संजय कुमार सिंह, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, नालंदा (बिहारशरीफ) शिवहर सेवानिवृत्त श्री सजल मंदिलवार के स्थान पर।
15. श्री उमॉ शंकर द्विवेदी, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, पटना। खगड़िया सेवानिवृत्त श्री एस0 सी0 चौरसिया के स्थान पर।
16. श्रीमति पद्‌मा कुमारी चौवे, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, लखीसराय। जमुई श्री आर0 के0 सिंह के स्थान पर।
17. श्री शैलेन्द्र कुुमार सिंह-2, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, गोपालगंज। मुजफ्फरपुर श्री एच0 एन0 तिवारी के स्थान पर।
18. श्री ओम प्रकाश श्रीवास्तव-1, प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, रोहतास (सासाराम) कैमुर (भभुआ) श्री शैलेन्द्र सिंह के स्थान पर।
105 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 30th November 2018

No. 477 A :--The District and Sessions Judges / Principal Judges, Family Courts names in column no. 2 of the table given below are hereby transferred and posted as District and Sessions Judges at the stations mentioned in column no. 3 of the table against their respective names and in chain as indicated in column no. 4 of the table given below.

बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 106
S l. No. Name of the Officers with designation and present place of posting. Name of the Station where the officer has been transferred. Chain of Transfer.
1. 2. 3. 4.
1. Sri Krishna Kant Tripathi District and Sessions Judge, Patna Kishanganj Vice Dr. Ratan Kishore Tiwary
2. Sri Rudra Prakash Mishra District and Sessions Judge, Nawadah. Patna Vice Sri K.K. Tripathi
3. Sri Shailendra Singh District and Sessions Judge, Kaimur at Bhabhua. Gaya Vice Sri Ravindra Patwari since retired.
4. Sri Prem Ranjan Mishra, Registrar (List) Patna High Court, Patna. Vaishali at Hajipur Vice Sri Akhilesh Jain
5. Sri Raj Kumar Singh, District and Sessions Judge, Jamui. Darbhanga Vice Sri Arunendra Singh
6. Sri Ambrish Kumar Tiwary, Principal Judge, Family Court, Kaimur at Bhabhua. Banka Vice Sri Mazhar Imam
7. Md. Perwez Alam, Member Secretary, Bihar State Law Commission, Patna. Upgraded in the rank of District Judge at his present posting ---
8. Sri Anil Kumar Jha I, Principal Judge, Family Court, Katihar. Nawadah Vice Sri R.P. Mishra
9. Sri Najre Imam Ansari, Presiding Officer Bihar Waqf Tribunal, Patna. Upgraded in the rank of District Judge at his present posting ---
10. Sri Raghupati Singh, Principal Judge, Family Court, Saran at Chapra. Nalanda at Biharsharif Vice Sri Ujjwal Kumar Dubey since retired
11. Sri Lallan Lal Srivastava, Principal Judge, Family Court, Aurangabad. Samastipur Vice Sri K.M. Tiwary since retired
12. Sri Ram Prakash, Principal Judge, Family Court, Araria. Araria Vice Sri R.K. Tiwary
13. Sri Harendra Nath, Principal Judge, Family Court, Madhepura. Buxar Vice Sri A.K. Srivastava since retired
14. Sri Sanjay Kumar Singh, Principal Judge, Family Court, Nalanda at Biharsharif. Sheohar Vice Sri Sajjal Mandilwar, since retired
1 5. Sri Uma Shankar Dwivedi, Principal Judge, Family Court, Patna. Khagaria Vice Sri S.C. Chourasia, since retired
16. Smt. Padma Kumari Choubey, Principal Judge, Family Court, Lakhisarai. Jamui Vice Sri R.K. Singh
17. Sri Shailendra Kumar Singh II, Principal Judge, Family Court, Gopalganj. Muzaffarpur Vice Sri H.N. Tiwary
18. Sri Om Prakash Srivastava-I, Principal Judge, Family Court, Rohtas at Sasaram. Kaimur at Bhabhua Vice Sri Shailendra Singh
107 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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1 दिसम्बर 2018

सं0 478 नि0 :--श्री सुनील कुमार पनवार, जिला एवं सत्र न्यायाधीश संप्रति सचिव, बिहार विधान परिषद, पटना के रूप में प्रतिनियुक्त की सेवाएं राज्य सरकार से वापस लेते हुए, को माननीय न्यायालय के आदेशानुसार उनके पदभार ग्रहण करने की तिथि से पटना उच्च न्यायालय, पटना का निबंधक (निगरानी) नियुक्त किया जाता है।

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 1st December 2018

No. 478 A :--The Hon'ble Court has been pleased to repatriate the services of Sri Sunil Kumar Panwar, District & Sessions Judge, presently posted as Secretary, Bihar Legislative Council, Patna from the State Government and appoint him as Registrar (Vigilance), Patna High Court, Patna with effect from the date he assumes charge of his office.

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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03 दिसम्बर 2018

सं0 479 नि0ः--श्री राम सुरत, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पटना को तत्काल प्रभाव से पटना सिटी के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रूप में स्थानांतरति एवं पदस्थापित किया जाता है।

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 3rd December 2018

No. 479 A--Sri Ram Surat, Additional District and Sessions Judge, Patna is transferred and posted as Additional District and Sessions Judge of Patna city with immediate effect.

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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03 दिसम्बर 2018

सं0 479 नि0 :--श्री किशोर प्रसाद, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश संप्रति संयुक्त निबंधक (न्यायिक), पटना उच्च न्यायालय, पटना को उनके पदभार ग्रहण करने की तिथि से माननीय उच्च न्यायालय के आदेशानुसार पटना उच्च न्यायालय, पटना का निबंधक-सह-सचिव, पटना उच्च न्यायालय विधिक सेवा प्राधिकार-सह-संयुक्त निबंधक (न्यायिक) नियुक्त किया जाता है।

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 108

The 3rd December 2018

No. 479 A :--The Hon'ble Court has been pleased to appoint Sri Kishore Prasad, Additional District and Sessions Judge, presently posted as Joint Registrar (Judicial), Patna High Court, Patna as Registrar-cum-Secretary, Patna High Court Legal Services Committee (in the cadre of District Judge)-cum-Joint Registrar (Judicial), Patna High Court, Patna with effect from the date he assumes charge of his office.

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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07 दिसम्बर 2018

सं0 512 नि0ः--शिल्पी सोनीराज, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश जो वर्त्तमान में प्रभारी निबंधक (निगरानी), पटना उच्च न्यायालय, पटना के पद पर कार्यरत हैं को माननीय मुख्य न्यायाधीश के आदेशानुसार, पटना उच्च न्यायालय, पटना में, मुख्य न्यायाधीश सचिवालय का तत्काल प्रभाव से विशेष कार्य पदाधिकारी नियुक्त किया जाता है, जो निबंधक (निगरानी) से जुड़ी रहेंगी।

मुख्य न्यायाधीश के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 7th December 2018

No. 512 A :--Hon'ble the Chief Justice has been pleased to appoint Ms. Shilpee Soniraj, Additional District and Sessions Judge, who is presently working as I/C Registrar (Vigilance), Patna High Court, Patna, as O.S.D. in the Chief Justice's Secretariat and she will remain attached with Registrar (Vigilance) with immediate effect.

By Order of the Hon'ble the Chief Justice, B.B. Pathak, Registrar General.

11 दिसम्बर 2018

सं0 520 नि0 :--निम्न तालिका के स्तम्भ-2 में उल्लिखित न्यायिक पदाधिकारियों असैनिक न्यायाधीश, वरीय कोटि को उसी तालिका के स्तम्भ-3 में क्रमशः उनके नाम के सामने निर्देशित जजी एवं स्थान जहॉ पर वे अधिष्ठित रहेंगे तथा स्तंभ 4 में दी गई स्थानांतरण श्रृंखला में अवर न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है।

तदोपरान्त, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (अधिनियम 2, 1974) की धारा 11 की उपधारा (3) के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्च न्यायालय द्वारा निम्न तालिका के स्तम्भ-2 में उल्लिखित अवर न्यायाधीशों को स्तम्भ-5 में उल्लिखित उनके नाम के सामने निर्देशित जिला के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी की शक्तियाँ प्रदान की जाती है।

साथ ही उपर्युक्त संहिता की धारा 12 की उपधारा (1) के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उक्त पदाधिकारीयों को तालिका के स्तम्भ-3 में उनके नाम के सामने निर्देशित जिला के लिए मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी भी नियुक्त किया जाता है और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (अधिनियम 2, 1974) की धारा 9 की उपधारा (3) के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्च न्यायालय द्वारा निम्न तालिका के स्तम्भ-2 में उल्लिखित न्यायिक पदाधिकारी को उनके नाम के सामने स्तम्भ-5 में अंकित सत्र प्रमण्डल के लिए सहायक सत्र न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है।

क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम एवं वर्तमान पदस्थापन का स्थान (जजी सहित) अ- नए स्थान का पदनाम ब- पदाधिकारी का साधारणतः अधिष्ठित रहने का स्थान स- जजी/स्थान जहॉ नियुक्त किये जाते है। स्थानांतरण की श्रृंखला जिला एवं सत्र प्रमंडल का नाम
1 2 3 4 5
1. सुश्री नुर सुलताना अवर न्यायाधीश, सोनपुर (सारण) अ- अवर न्यायाधीश ब- छपरा स- सारण सेवानिवृत श्री के0 लाल के स्थान पर सारण
2. सुश्री अंजु सिंह अवर न्यायाधीश-सह-अपर मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी, सासाराम (रोहतास) अ- अवर न्यायाधीश ब- गया स- गया सेवानिवृत श्री रामानन्द राम के स्थान पर गया

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।109 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

The 11th December 2018

No. 520 A:--The Judicial officers of the rank of Sub Judge (Civil Judge, Senior Division), named in column no. 2 of the table given below are transferred as Subordinate Judges in the Judgeships to be stationed ordinarily at the places mentioned in Column No. 3 and in the chain specified in Column No. 4 of the table.

Further, in exercise of the powers conferred under Sub-Section (3) of Section 11 of the Code of Criminal Procedure, 1973 (Act 2 of 1974), the High Court are pleased to confer upon the Civil Judges (Senior Division) named in column no. 2 of the table, the powers of a Judicial Magistrate of the first Class for the District noted against their respective names in column no. 5 of the table.

Furthermore, in exercise of the powers conferred under Sub Section (1) of Section 12 of the said Criminal Procedure Code the officers are also appointed as Chief Judicial Magistrate for the District noted against their respective names in column no. 5 of the table and in exercise of the powers conferred under Sub Section (3) of Section 9 of the code of Criminal Procedure, 1973 (Act 2 of 1974) the High Court are also pleased to appoint the Judicial Officers named in column-2 of the table as Assistant Sessions Judge for the Session Division noted against their respective names in column-5 of the table.

Sl. No. Name of the Officer with designation and present place of posting (with Judgeship) (a) Designation at the new station/ place (b) Place where the officer is to be ordinarily stationed at (c) Name of the Judgeship in which appointed on transfer Chain of transfer Name of the District and Sessions Division.
1. 2. 3. 4. 5.
1. Ms. Noor Sultana Sub Judge, Sonepur (Saran) a) Sub Judge b) Chapra c) Saran Vice Sri K. Lal since retired Saran
2. Ms. Anju Singh Sub Judge-cum- A.C.J.M., Sasaram (Rohtas) a) Sub Judge b) Gaya c) Gaya Vice Sri Ramanand Ram since retired Gaya

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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11 दिसम्बर 2018

सं0 521 नि0ः--निम्न तालिका के स्तम्भ-2 में उल्लिखित न्यायिक पदाधिकारी असैनिक न्यायाधीश, वरीय कोटि को उसी तालिका के स्तम्भ-3 में क्रमशः उनके नाम के सामने निर्देशित जजी एवं स्थान जहॉ पर वे अधिष्ठित रहेगे पर अवर न्यायाधीश सह अपर मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी के रूप में स्थानान्तरित किया जाता है।

पुनः दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 11 की उपधारा (3) के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्च न्यायालय, स्तंभ-3 में अंकित अवर न्यायाधीश असैनिक न्यायाधीश, वरीय कोटि को उनके पदस्थापन के जिला के क्षेत्राधिकारों के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक दण्डाधिकारी की शक्तियां प्रदान करता है, बशर्ते उनके द्वारा निष्पादित दिवानी तथा आपराधिक वादों की संख्या 30ः70 के अनुपात में हो।बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 110

क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम एवं वर्तमान पदस्थापन का स्थान जजी सहित अ- नये स्थान का पदनाम ब- पदाधिकारी का साधारणतः अधिष्ठित रहने का स्थान स- जजी/स्थान जहाँ नियुक्त किये जाते है।
1. श्री पाठक आलोक कौशिक अवर न्यायाधीश-सह-अपर मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी, बिहारशरीफ (नालन्दा) अ- अवर न्यायाधीश ब- सुपौल स- सुपौल

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 11th December 2018

No. 521 A:--The Judicial Officers of the cadre of Civil Judge (Senior Division), named in column no. 2 of the table given below is transferred and posted as Sub Judge- cum-A.C.J.M. in the Judgeship to be stationed ordinarily at the station mentioned in column no. 3 of the table. Further in exercise of the powers conferred under Sub Section (3) of Section (11) of the Code of Criminal Procedure, 1973 (Act 2 of 1974) the High Court are pleased to confer upon the Subordinate Judge named below, the powers of a Judicial Magistrate of the 1st Class for the concerned Districts, provided that he shall work in such a way that his disposal of Civil and Criminal matter must be in the ratio of 30:70.

Sl. No. Name of the Officer, designation and present place of posting (with Judgeship) (a) Designation at the new station (b) Place where the officer is to be stationed at ordinarily. (c) Name of the Judgeship/place in which transferred
1. 2. 3.
1. Sri Pathak Alok Kaushik, Sub Judge-cum-A.C.J.M., Biharsharif (Nalanda) a) Sub Judge b) Supaul c) Supaul

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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11 दिसम्बर 2018

सं0 522 नि0ः--दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (अधिनियम 2, 1974) की धारा 11 की उपधारा 3 के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्च न्यायालय द्वारा निम्न तालिका के स्तंभ-2 में उल्लिखित असैनिक न्यायाधीश (कनीय कोटि) को स्तंभ-3 में उनके नाम के सामने अंकित जिला के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक दण्डाधिकारी की शक्तियाँ भी प्रदान की जाती है। क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम तथा वर्तमान पदस्थापन का स्थान जिला का नाम

क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम तथा वर्तमान पदस्थापन का स्थान जिला का नाम
1. 2. 3.
1. श्री राजेश कुमार दूबे, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, सहरसा। सहरसा
2. श्री रंजन कुमार सिंह, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बक्सर। बक्सर
3. श्री दीवान फहद खान, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बक्सर। बक्सर
4. श्री राघवेन्द्र शरण पाण्डेय, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, सिवान। सिवान
5. श्री योगेश कुमार मिश्रा, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, मंझौल (बेगूसराय)। बेगूसराय
6. श्री कुमार गिरीन्द्र गौरव, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, हाजीपुर। वैशाली
7. श्री मनीष कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, दानापुर (पटना)। पटना
8. श्री सुशील कुमार श्रीवास्तव, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, औरंगाबाद। औरंगाबाद
9. श्री सुभाष कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, गया। गया
10. श्री कमलेश कुमार देउ, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, सुपौल। सुपौल
11. श्री मृत्युंजय कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, मोतिहारी। पूर्वी चम्पारण
12. श्री कुलदीप श्रीवास्तव, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, रोसड़ा (समस्तीपुर)। समस्तीपुर
13. श्री सुनील कुमार सिंह, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, शेरघाटी (गया)। गया
14. श्री दीपक कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, मुजफ्फरपुर (पूर्वी)। मुजफ्फरपुर
15. श्री विनय कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, मधुबनी। मधुबनी
16. श्री मो0 शाहनवाज आलम, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, पूर्णिया। पूर्णिया
17. श्री प्रमोद रंजन, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, छपरा। सारण
18. श्री राजीव कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बेगूसराय। बेगूसराय
19. सपना रानी, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बांका। बांका
20. रितु कुमारी, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, पटना सिटी (पटना)। पटना
21. सुष्मिता कुमारी, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, पटना सिटी (पटना)। पटना
22. श्री मनोज कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बेतिया। पश्चिमी चम्पारण
23. श्री विद्या नंद सागर, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बिहारशरीफ। नालन्दा
24. श्री करूणानीधि प्रसाद आर्य, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बाढ़ (पटना)। पटना
25. आरती जायसवाल, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, पटना। पटना
26. श्री चंदन कुमार वर्मा, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, डेहरी (रोहतास)। रोहतास
27. श्री रंजीत कुमार सोनू, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, मोतिहारी। पूर्वी चम्पारण
28. हेमा कुमारी, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, हाजीपुर। वैशाली
29. श्री प्रमोद कुमार शर्मा, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बगहा (पश्चिमी चम्पारण)। पश्चिमी चम्पारण
30. निशा कुमारी, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बिक्रमगंज (रोहतास)। रोहतास
31. श्री आफताब आलम, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, मुजफ्फरपुर (पूर्वी)। मुजफ्फरपुर
32. श्री हेमन्त कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, मुजफ्फरपुर (पश्चिमी)। मुजफ्फरपुर
33. कुमारी ज्योत्स्ना, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, सिकरहना (पूर्वी चम्पारण)। पूर्वी चम्पारण
34. दिव्या अमल, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, पटना। पटना
35. श्री राजीव रंजन, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, बेगूसराय। बेगूसराय
36. श्री मो0 मंजूर आलम, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, मधेपुरा। मधेपुरा
37. श्री दामोदर कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, आरा। भोजपुर
38. श्री सुशान्त कुमार, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, आरा। भोजपुर
39. श्री उदय प्रताप, न्यायिक दण्डाधिकारी द्वितीय श्रेणी, गोपालगंज। गोपालगंज
111 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 112

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।113 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

The 11th December 2018

Sl. No. Name of the Officers with designation and present place of posting Name of the District
1. 2. 3.
1. Sri Rajesh Kumar Dubey, J.M. 2nd Class, Saharsa. Saharsa
2. Sri Ranjan Kumar Singh, J.M. 2nd Class, Buxar. Buxar
3. Sri Diwan Fahad Khan, J.M. 2nd Class, Buxar. Buxar
4. Sri Raghwendra Sharan Pandey, J.M. 2nd Class, Siwan. Siwan
5. Sri Yogesh Kumar Mishra, J.M. 2nd Class, Manjahul, (Begusarai). Begusarai
6. Sri Kumar Girindra Gaurav, J.M. 2nd Class, Hajipur. Vaishali
7. Sri Manish Kumar, J.M. 2nd Class, Danapur (Patna). Patna
8. Sri Sushil Kumar Srivastava, J.M. 2nd Class, Aurangabad. Aurangabad
9. Sri Subhash Kumar, J.M. 2nd Class, Gaya. Gaya
10. Sri Kamlesh Singh Deou, J.M. 2nd Class, Supaul. Supaul
11. Sri Mritunjay Kumar, J.M. 2nd Class, Motihari. East Champaran
12. Sri Kuldeep Srivastav, J.M. 2nd Class, Rosera (Samastipur). Samastipur
13. Sri Sunil Kumar Singh, J.M. 2nd Class, Sherghati (Gaya). Gaya
14. Sri Deepak Kumar, J.M. 2nd Class, Muzaffarpur (East). Muzaffarpur
15. Sri Vinay Kumar, J.M. 2nd Class, Madhubani. Madhubani
16. Sri Md. Shahnawaz Alam, J.M. 2nd Class, Purnea. Purnea
17. Sri Pramod Ranjan, J.M. 2nd Class, Chapra. Saran
18. Sri Rajeev Kumar, J.M. 2nd Class, Begusarai. Begusarai

No. 522 A:--In exercise of the powers conferred under Sub-Section (3) of Section 11 of the Code of Criminal Procedure, 1973 (Act 2 of 1974) the High Court are pleased to confer upon the Civil Judges (Junior Division) named in column no. 2 of the table given below, the powers of a Judicial Magistrate 1st Class for the District noted against their respective names in column no. 3 of the table. Name of the Officers with designation Sl. No. and present place of posting

बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 114
19. Ms. Sapna Rani, J.M. 2nd Class, Banka. Banka
20. Ms. Ritu Kumari, J.M. 2nd Class, Patna City (Patna). Patna
21. Ms. Susmita Kumari, J.M. 2nd Class, Patna City (Patna). Patna
22. Sri Manoj Kumar, J.M. 2nd Class, Bettiah. West Champaran
23. Sri Vidha Nand Sagar, J.M. 2nd Class, Biharsharif. Nalanda
24. Sri Karunanidhi Prasad Arya, J.M. 2nd Class, Barh (Patna). Patna
25. Ms. Arti Jayaswal, J.M. 2nd Class, Patna. Patna
26. Sri Chandan Kumar Verma, J.M. 2nd Class, Dehri (Rohtas). Rohtas
27. Sri Ranjeet Kumar Sonu, J.M. 2nd Class, Motihari. East Champaran
28. Ms. Hema Kumari, J.M. 2nd Class, Hajipur. Vaishali
29. Sri Pramod Kumar Sharma, J.M. 2nd Class, Bagaha (West Champaran). West Champaran
30. Ms. Nisha Kumari, J.M. 2nd Class, Bikramganj (Rohtas). Rohtas
31. Sri Aftab Alam, J.M. 2nd Class, Muzaffarpur (East). Muzaffarpur
32. Sri Hemant Kumar, J.M. 2nd Class, Muzaffarpur (West). Muzaffarpur
33. Ms. Kumari Jyotsna, J.M. 2nd Class, Sikrahana (East Champaran). East Champaran
34. Ms. Divya Amal, J.M. 2nd Class, Patna. Patna
35. Sri Rajeev Ranjan, J.M. 2nd Class, Begusarai. Begusarai
36. Sri Md. Manzoor Alam, J.M. 2nd Class, Madhepura. Madhepura
37. Sri Damodar Kumar, J.M. 2nd Class, Ara. Bhojpur
38. Sri Sushant Kumar, J.M. 2nd Class, Ara. Bhojpur
39. Sri Uday Pratap, J.M. 2nd Class, Gopalganj. Gopalganj

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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14 दिसम्बर 2018

सं0 524 नि0ः--निम्न तालिका के स्तम्भ-2 में उल्लिखित न्यायिक पदाधिकारियों (असैनिक न्यायाधीश, कनीय कोटि) को असैनिक न्यायाधीश (वरीय कोटि) के रूप में प्रोन्नत करते हुए उसी तालिका के स्तंभ-3 में क्रमशः उनके नाम के115 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 सामने निर्देशित जजी एवं स्थान जहाँ पर वे साधारणतः अधिष्ठित रहेगे पर अवर न्यायाधीश सह अपर मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी के रूप में स्थानान्तरित एवं नियुक्त किया जाता है।

पुनः दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 11 की उपधारा (3) के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्च न्यायालय, स्तंभ-2 में अंकित न्यायिक पदाधिकारियों को उनके पदस्थापन के जिला के क्षेत्राधिकारों के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक दण्डाधिकारी की शक्तियां प्रदान करता है, बशर्ते उनके द्वारा निष्पादित दिवानी तथा आपराधिक वादों की संख्या 30ः70 के अनुपात में हो। क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम एवं वर्तमान पदस्थापन का

क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम एवं वर्तमान पदस्थापन का स्थान (जजी सहित) अ- नये स्थान का पदनाम ब- पदाधिकारी का साधारणतः अधिष्ठित रहने का स्थान स- जजी/स्थान जहाँ नियुक्त किये जाते हैं।
1. श्री अशोक कुमार I न्यायिक दण्डाधिकारी, प्रथम श्रेणी, पटना (पटना) अ- अवर न्यायाधीश ब- सिवान स- सिवान
2. श्री प्रेम चन्द अनल अनुमण्डल न्यायिक दण्डाधिकारी, शेरघाटी (गया) अ- अवर न्यायाधीश ब- भभुआ स- कैमूर
3. श्री श्यामल कुमार अनुमण्डल न्यायिक दण्डाधिकारी, बेनीपुर (दरभंगा) अ- अवर न्यायाधीश ब- भागलपुर स- भागलपुर

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 14th December 2018

No. 524 A:--The Judicial Officers of the cadre of Civil Judge (Junior Division), named in column no. 2 of the table given below, on promotion to the cadre of Civil Judge (Senior Division), are transferred and appointed to act as Sub Judge-cum- A.C.J.M. in the Judgeships to be stationed ordinarily at the station mentioned in column no. 3 of the table. Further in exercise of the powers conferred under Sub Section (3) of Section (11) of the Code of Criminal Procedure, 1973 (Act 2 of 1974) the High Court are pleased to confer upon the Judicial Officers named below, the powers of a Judicial Magistrate of the 1st Class for the concerned Districts, provided that they shall work in such a way that their disposal of Civil and Criminal matter must be in the ratio of 30:70.

Sl. No. Name of the Officers, designation and present place of posting (with Judgeship) (a) Designation at the new station (b) Place where the officer is to be stationed at ordinarily (c) Name of the Judgeship/place in which appointed on promotion
1. 2. 3.
1. Sri Ashok Kumar I, J.M. 1st Class, Patna (Patna) a) Sub Judge b) Siwan c) Siwan
2. Sri Prem Chand Anal, S.D.J.M., Sherghati (Gaya) a) Sub Judge b) Bhabhua c) Kaimur
3. Sri Shyamal Kumar, S.D.J.M., Benipur (Darbhanga) a) Sub Judge b) Bhagalpur c) Bhagalpur

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 116

14 दिसम्बर 2018 सं0 528 नि0ः--निम्न तालिका के स्तम्भ-2 में उल्लिखित न्यायिक पदाधिकारी असैनिक न्यायाधीश (कनीय कोटि) को उसी तालिका के स्तम्भ-3 में निर्देशित जजी एवं स्थान पर मुंसिफ एवं उच्च न्यायालय द्वारा दंडाधिकारी की आवश्यक शक्तियाँ प्रदान किये जाने पर न्यायिक दण्डाधिकारी नियुक्त किया जाता है। पदाधिकारी को आवश्यकतानुसार, बंगाल, आगरा एवं आसाम सिविल कोर्ट बिहार एमेंडमेंट ऐक्ट-2013 (ऐक्ट XIV, 2014) द्वारा संबोधित बंगाल, आगरा एवं आसाम सिविल कोर्टस ऐक्ट, 1887 (ऐक्ट XII, 1887) की धारा 19 की उपधारा (2) के अन्तर्गत उक्त तालिका के स्तम्भ-4 में यथानिर्देशित आर्थिक एवं प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के भीतर होने वाले मौलिक वादों की साधारण प्रक्रिया के अधीन निष्पादन की शक्तियाँ प्रदान की जाती है। सम्बन्धित पदाधिकारी को उसी स्तम्भ-4 में निर्देशित आर्थिक एवं प्रादेशिक क्षेत्राधिकारी के अन्दर लघुवाद न्यायालय द्वारा संज्ञेय वादों के निष्पादन के लिए ऐसे न्यायालय के न्यायाधीश की शक्तियाँ भी प्रदान की जाती है।

क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम एवं वर्तमान पदस्थापन का स्थान जजी सहित अ) नए स्थान का पदनाम ब) साधारणतः अधिष्ठित रहने का स्थान स) जजी जहाँ नियुक्त किए गये हैं नये स्थान पर अधिकारियों को प्रदान की गयी विशेष शक्तियाँ अ) बंगाल, आगरा एण्ड आसाम सिविल कोर्ट ऐक्ट के अंतर्ग (साधारन प्रक्रिया) ब) प्रोविन्सिीयल स्मॉल कॉजेज कोर्टस ऐक्ट 1987 के अंतर्गत
1 2 3 4
1. श्री गोरख नाथ दूबे, प्रथम न्यायिक दंडाधिकारी, शेरघाटी (गया) अ) मुंसिफ (असैनिक न्यायाधीश, कनीय कोटि) ब) मुंगेर स) मुंगेर अ) मुंगेर मुंसिफी की स्थानीय सीमाओं के अंतर्गत 150000 रूपये तक ब) मुंगेर मुंसिफी की स्थानीय सीमाओं के अंतर्गत 1000 रूपये तक लघुवाद की शक्तियाँ

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 14th December 2018

No. 528 A:--The Judicial Officer of the rank of Civil Judge (Junior Division) named in column no. 2 of the table given below is appointed as Munsif (Civil Judge, Jr. Div.) in the judgeship and station mentioned in the column no. 3.

As mentioned in column no. 4, the officer is also vested with the powers under Sub- section (2) of Section-19 of the Bengal, Agra and Assam Civil Courts Acts, 1887, (act XII of 1887) as amended by the Bengal, Agra and Assam Civil Courts Bihar Amendment Act, 2013 (Act 14 of 2014) to try under ordinary procedure original suits of Pecuniary and Territorial Jurisdiction.

As further mentioned in column no. 4, the officer is also vested with powers of the Court of small causes for the trial of suits cognizable by such a Court with the necessary Pecuniary and Territorial Jurisdiction.

The powers vested as per column no. 4, should not, however, be exercised by the officer concerned unless it is published in the Bihar Gazette or in the District Gazette.

117 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019
Sl. No. Name of the Officer with designation and present place of posting with judgeship a) Designation at the new station. b) Place where the officer is to be stationed at ordinarily. c) Name of the Judgeship in which appointed on transfer. Special Power with which the Officer is vested at the new station a) Under the Bengal, Agra and Assam Civil Court Acts (under ordinary procedure). b) Under the provincial small causes Courts Act,1987
1 2 3 4
1 Sri Gorakh Nath Dubey, J.M. 1st Class, Sherghati (Gaya) a) Munsif (Civil Judge, Jr. Div.) b) Munger c) Munger a) Rs.1,50,000/- within the local limits of Munger Munsifi. b) S.C.C. Powers of Rs. 1000/- within the local limits of Munger Munsifi.

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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14 दिसम्बर 2018

सं0 529 नि0ः--निम्न तालिका के स्तम्भ-2 में उल्लिखित न्यायिक पदाधिकारी असैनिक न्यायाधीश (कनीय कोटि) को उसी तालिका के स्तम्भ-3 में निर्देशित जजी एवं स्थान पर न्यायिक दण्डाधिकारी नियुक्त किया जाता है।

पुनः दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 (अधिनियम 2, 1974) की धारा 11 की उपधारा (3) के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्च न्यायालय द्वारा निम्न तालिका के स्तंभ-2 में उल्लिखित न्यायिक पदाधिकारी (असैनिक न्यायाधीश, कनीय कोटि) को स्तंभ-4 में उनके नाम के सामने अंकित जिला के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक दण्डाधिकारी की शक्तियाँ भी प्रदान की जाती हैं।

क्रम संख्या पदाधिकारी का नाम, पदनाम एवं वर्तमान पदस्थापन का स्थान अ) नए स्थान का पदनाम ब) साधारणतः अधिष्ठित रहने का स्थान स) जजी जहाँ नियुक्त किए गये हैं। जिला का नाम
1 2 3 4
1. श्री कुमुद रंजन, प्रथम न्यायिक दण्डाधिकारी-सह- अपर मुंसिफ, बेतिया। अ) न्यायिक दण्डाधिकारी ब) अररिया स) अररिया अररिया
2. सुश्री श्वेता ग्रेवाल, प्रथम न्यायिक दण्डाधिकारी-सह- अपर मुंसिफ, बेगूसराय। अ) न्यायिक दण्डाधिकारी ब) मुंगेर स) मुंगेर मुंगेर
3. श्री विश्वजीत कुमार, प्रथम न्यायिक दण्डाधिकारी-सह- अपर मुंसिफ, औरंगाबाद। अ) न्यायिक दण्डाधिकारी ब) मुंगेर स) मुंगेर मुंगेर

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 14th December 2018

No. 529 A:--The Judicial Officers of the rank of Civil Judge (Junior Division) named in column no. 2 of the table given below are appointed as Judicial Magistrate in the Judgeship and station mentioned in column no. 3 of the table. Further in exercise of the powers conferred under Sub-Section (3) of Section 11 of the Code of Criminal Procedure, 1973 (Act 2 of 1974) the High Court are pleased toबिहार गजट, 20 Qjojh 2019 118 confer upon the officers named below, the powers of a Judicial Magistrate of the 1st Class for the District noted against their names in column no. 4 of the table.

Sl. No. Name of the Officers with designation and present place of posting (a) Designation at the new station. (b) Place where the Officer is to be ordinarily stationed at. (c) Name of the Judgeship in which posted. Name of the District
1. 2. 3. 4.
1. Sri Kumud Ranjan J.M. 1st-cum-Addl. Munsif, Bettiah (a) Judicial Magistrate (b) Araria (c) Araria Araria
2. Ms. Shweta Grewal J.M. 1st-cum-Addl. Munsif, Begusarai (a) Judicial Magistrate (b) Munger (c) Munger Munger
3. Sri Vishwjeet Kumar J.M. 1st-cum-Addl. Munsif, Aurangabad (a) Judicial Magistrate (b) Munger (c) Munger Munger

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

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22 दिसम्बर 2018

सं0 537 नि0ः--सर्वश्री अखिलेश कुमार सिंह (सेवानिवृत्त), अरूण कुमार चौधरी (सेवानिवृत्त), विजय किशोर प्रसाद (सेवानिवृत्त), अंजनी कुमार (सेवानिवृत्त), दीपक कुमार सिंह (सेवानिवृत्त), रंजीत कुमार राय (सेवानिवृत्त), राजेश कुमार (सेवानिवृत्त) एवं प्रफुल्ल कुमार ठाकुर (जो दिनांक 31.12.2018 को सेवानिवृत्त होंगे) के स्थान पर माननीय मुख्य न्यायाधीश के आदेशानुसार सर्वश्री अनिल कुमार-III, मेहता विजय कुमार, जुगेश कुमार आनंद, निर्मल कुमार सिन्हा, मो0 जमालुद्‌दीन खान, सरस्वती नन्द कुमार, संजय कुमार पाठक एवं सुरेन्द्र प्रसाद सभी सहायक निबंधक, पटना उच्च न्यायालय, पटना को उनके पदभार ग्रहण करने की तिथि से प्रोन्नत कर वेतन बैण्ड रू0 15,600-39,100/- ग्रेड वेतन रू0 7600/- (पुरानी वेतनमान) में नियमानुसार अनुमान्य विशेष वेतन के साथ पटना उच्च न्यायालय, पटना का उप निबंधक नियुक्त किया जाता है।

माननीय मुख्य न्यायाधीश के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 22nd December 2018

No. 537 A:--Hon'ble the Chief Justice has been pleased to appoint temporarily, on promotion, Sri Anil Kumar III, Sri Mehta Vijay Kumar, Sri Jugesh Kumar Anand, Sri Nirmal Kumar Sinha, Sri Md. Jamaluddin Khan, Sri Saraswati Nand Kumar, Sri Sanjay Kumar Pathak and Sri Surendra Prasad all Assistant Registrars, Patna High Court, Patna as Deputy Registrar, Patna High Court, Patna in the Pay Band of Rs. 15,600- 39,100 plus Grade Pay of Rs. 7,600/- (old pay scale) with special pay as admissible under the rules with effect from the date they assume charge of their respective offices as such vice Sri Akhilesh Kumar Singh (since retired), Sri Arun Kumar Choudhary (since retired), Sri Bijoy Kishore Prasad (since retired), Sri Anjani Kumar (since retired), Sri Deepak Kumar Singh (since retired), Sri Ranjeet Kumar Roy (since retired), Sri Rajesh Kumar (since retired) and Sri Prafull Kumar Thakur (retiring on 31.12.2018).

By Order of the Hon'ble the Chief Justice, B.B. Pathak, Registrar General.

119 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019

24 दिसम्बर 2018

सं0 538 नि0ः--श्री मनोज कुमार सिंहा, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पटना जो वर्त्तमान में विशेष कार्य पदाधिकारी, पटना उच्च न्यायालय, पटना के पद पर कार्यरत हैं, को सामान्य प्रशासन विभाग के अधिसूचना संख्या 16691 दिनांक 20.12.2018 के द्वारा, उनके जिला एवं सत्र न्यायाधीश के कोटि में प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय के रूप में नियुक्त करते हुए, निबंधक (लिस्ट), पटना के रूप में, संयुक्त निबंधक (लिस्ट), उच्च न्यायालय, पटना के पद को निबंधक (लिस्ट), पटना उच्च न्यायालय, पटना के रूप में उत्क्रमित करते हुए, पदस्थापित किया जाता है।

उच्च न्यायालय के आदेश से, विधु भूषण पाठक, महानिबंधक।

The 24th December 2018

No. 538 A:--Sri Manoj Kumar Sinha, Additional District and Sessions Judge, Patna presently working as Officer on Special Duty, Patna High Court, Patna on being appointed in the category of District and Sessions Judge for posting as Principal Judge, Family Court in hereby posted as Registrar (List), Patna High Court, Patna by upgrading the post of Joint Registrar (List), Patna High Court, Patna as Registrar (List), Patna High Court, Patna in terms of Notification No. 16691 dated 20.12.2018 of the General Administration Department, Government of Bihar, Patna.

By Order of the High Court, B.B. Pathak, Registrar General.

————— अधीक्षक, सचिवालय मु(cid:7076)णालय बिहार, पटना द्वारा प्रकाशित एवं मु(िcid:7076)त। बिहार गजट, 48—571+10-डी0टी0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.inबिहार गजट, 20 Qjojh 2019 120

बिहार गजट

का

पूरक(अ0)

प्राधिकारी }kjk प्रकाशित

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सं0 एल/एच॰जी॰- 1512/2016-1323 गृह विभाग (विषेष शाखा) ------ संकल्प 5 फरवरी 2019 विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2397, दिनांक-23.03.2018 एवं विभागीय पत्रांक-4407, दिनांक-11.05.2018 द्वारा श्री जयंत प्रताप सिंह, जिला समादेष्टा, बिहार गृह रक्षा वाहिनी, वैशाली के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के निमित श्री त्रिलोक नाथ झा, जिला समादेष्टा, बिहार गृह रक्षा वाहिनी, पटना को उपस्थापन पदाधिकारी नियुक्त किया गया था। 2. आयुक्त कार्यालय, पटना प्रमंडल, पटना के पत्रांक-1757, दिनांक-05.11.2018 एवं इस अनुक्रम में समादेष्टा, बिहार गृह रक्षा वाहिनी, पटना के पत्रांक-178, दिनांक-08.01.2019 से प्राप्त अनुशंसा के आलोक में श्री त्रिलोक नाथ झा, वरीय जिला समादेष्टा, बिहार गृह रक्षा वाहिनी, पटना के स्थान पर श्री अखिलेश कुमार ठाकुर, वरीय जिला समादेष्टा, बिहार गृह रक्षा वाहिनी, गया को उपस्थापन पदाधिकारी नियुक्त किया जाता है। आदेश :- आदेष दिया जाता है कि इस संकल्प की प्रति बिहार राजपत्र के अगले अंक में प्रकाषित किया जाय तथा इसकी प्रति सभी संबंधित को भेज दी जाय।

बिहार-राज्यपाल के आदेष से, उमेश प्रसाद रजक, अवर सचिव।

------ सं0 कारा/नि0को0(अधी0)-01-01/2018-1132 कारा एवं सुधार सेवाएँ निरीक्षणालय गृह विभाग (कारा) ------ संकल्प 8 फरवरी 2019

श्री राम सुमेर शर्मा, बिहार कारा सेवा, तत्कालीन उपाधीक्षक, मंडल कारा, कटिहार सम्प्रति सेवानिवृत्त काराधीक्षक के विरूद्ध दिनांक 30.08.2017 को मंडल कारा, कटिहार में बंदी के साथ की गई मारपीट की घटना का विडियो दिनांक 01.09. 2017 को सोषल मिडिया में वायरल होने तथा दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाषित खबर एवं न्यूज चैनलों में प्रसारित घटना के प्रतिवेदित आरोप के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1947 दिनांक-27.03.2018 के द्वारा उन्हें निलंबित करते हुए केन्द्रीय कारा, मोतिहारी में संलग्न किया गया। साथ ही प्रपत्र 'क' में गठित उक्त प्रतिवेदित आरोपों के आलोक में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-4920 दिनांक-17.07.2018 द्वारा श्री शर्मा के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गई जो सम्प्रति प्रक्रियाधीन है। श्री शर्मा दिनांक-31.01.2019 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं। अतः श्री राम सुमेर शर्मा, बिहार कारा सेवा, तत्कालीन उपाधीक्षक, मंडल कारा, कटिहार सम्प्रति सेवानिवृत्त काराधीक्षक को उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि 31.01.2019 के प्रभाव से निलंबन से मुक्त करते हुए उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंषन नियमावली, 1950 के नियम-43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया जाता है। आदेशः-आदेश दिया जाता है कि इस संकल्प की प्रति बिहार राजपत्र के अगले अंक में प्रकाशित की जाय तथा इसकी प्रति सभी संबंधित को भेज दी जाय।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, अंजनि कुमार, उप-सचिव-सह-उप निदेषक (प्र0)।121 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 सं0 08/न्या0-05-11/2016 सा0प्र0-1398 सामान्य प्रशासन विभाग ------- संकल्प 31 जनवरी 2019 श्री विजय कुमार शर्मा, बि0प्र0से0, कोटि क्रमांक-55/08 तत्कालीन संयुक्त सचिव, सहकारिता विभाग, बिहार, पटना के विरूद्ध बिहार राज्य भूमि विकास बैक को मंत्रिपरिषद्‌ के निर्णयानुसार बंद करने संबंधी निर्णय के पश्चात बिना सक्षम प्राधिकार के आदेश प्राप्त किये बिहार राज्य भूमि विकास बैक को मल्टी स्टेट कॉपरेटिव सोसाईटी एक्ट के तहत केन्द्रीय निबंधक सहकारिता कृषि मंत्रालय भारत सरकार को बैक का निबंधन करने हेतु निदेश देने संबंधी घोर कदाचार एवं अनुशासनहिनता बरते जाने संबंधी आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 11825 दिनांक 10.11.2008 द्वारा निलंबित किया गया। उक्त आदेश के विरूद्ध श्री शर्मा द्वारा पटना उच्च न्यायालय में दायर याचिका सी0डब्ल्यू0जे0सी0 संख्या- 18692/2008 एवं सी0डब्ल्यू0जे0सी0 संख्या-305/2009 में दिनांक 03.03.2009 को पारित न्यायादेश में उन्हें निलंबन मुक्त किये जाने का आदेश दिया गया। उक्त आदेश के आलोक में श्री शर्मा को विभागीय आदेश ज्ञापांक 4558 दिनांक 20.05.2009 द्वारा निलंबन मुक्त किया गया किन्तु श्री शर्मा के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही प्रारंभ नहीं की जा सकी। उक्त न्यायादेश के विरूद्ध विधि विभाग से प्राप्त परामर्श के आलोक में विभागीय स्तर से एल0पी0ए0 संख्या-131/2010 माननीय उच्च न्यायालय, पटना में दायर किया गया। एल0पी0ए0 संख्या-131/2010 में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 03.03.2009 को सी0डब्ल्यू0जे0सी0 संख्या- 18692/2008 एवं सी0डब्ल्यू0जे0सी0 संख्या-305/2009 में पारित न्यायादेश को निरस्त कर दिया गया। उक्त न्यायादेश के विरूद्ध श्री शर्मा द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में एस0एल0पी0 संख्या-27308/2016 दायर किया गया, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 14.09.2016 को अंतरिम आदेश पारित करते हुए एल0पी0ए0 संख्या-131/2010 में पारित आदेश को अगले आदेश तक Stay कर दिया गया। तत्पश्चात माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 14.08.2018 को अंतिम रूप से आदेश पारित किया गया है, जिसका कार्यकारी अंश निम्नवत हैः- "We consider it appropriate in the interest of justice to confirmed the said order and direct that the departmental proceedings shall not proceed and shall stand quashed and set aside. The appeal is accordingly disposed of. C.A. NO. 8255/2018 @ SLP(C) No. 27308/2016 Leave granted. The present case is similar to the case 3 decided above in the appeal arising out of SLP(C) No. 16653/2016. However, the only difference is that the appellant herein has retired while he was within the disciplinary control of the State of Bihar. In these circumstances, the order of stay of suspension needs to be confirmed and departmental enquiry proceedings are hereby quashed and set aside. Subject to above, this appeal is also disposed of in terms of order passed in civil arising out of SLP(C) No. 16653/2016." उपर्युक्त वर्णित तथ्यों एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित न्यायादेश के आलोक में सम्यक विचारोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा निम्न निर्णय लिया गया है :- 1. चूँकि श्री शर्मा के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही अबतक आरंभ नहीं हुई है, अतः इस संबंध में अब किसी अग्रेत्तर कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। 2. श्री शर्मा से संबंधित निलंबनादेश (संकल्प ज्ञापांक 11825 दिनांक 10.11.2008) को निरस्त करते हुए उनके निलंबन अवधि दिनांक 10.11.2008 से 20.05.2009 को विनियमित किया जाता है। उक्त अवधि में उन्हें अनुमान्य वेतनादि देय होगा। आदेशः-आदेश दिया जाता है कि इस संकल्प की प्रति बिहार राजपत्र के अगले अंक में प्रकाशित किया जाय तथा इसकी प्रति सभी संबंधित को भेज दी जाय।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राम बिशुन राय, अवर सचिव।

----- सं0 08/आरोप-01-27/2016 सा0प्र0-1355 ------ संकल्प 30 जनवरी 2019 श्री उदयकांत झा, बि0प्र0से, कोटि क्रमांक-273/2011 तत्कालीन संयुक्त आयुक्त विभागीय जाँच, पटना प्रमंडल पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध संयुक्त आयुक्त विभागीय जाँच, पटना प्रमंडल, पटना के पदस्थापन काल में श्री विजय कुमार के विरूद्ध संस्थित विभागीय कार्यवाही (सामान्य प्रशासन विभाग के संकल्प ज्ञापांक 2773 दिनांक 26.02.2014) मेें संचालन पदाधिकारी के रूप में दायित्व निर्वहन में लापरवाही बरतने संबंधी आरोपो के लिए विभागीय स्तर पर आरोप प्रपत्र-'क' गठित करते हुए अनुशासनिक प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त किया गया।122 बिहार गजट, 20 Qjojh 2019 2. विभागीय स्तर पर गठित एवं अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा अनुमोदित उक्त आरोप, प्रपत्र-'क' की प्रति संलग्न करते हुए विभागीय पत्रांक 11283 दिनांक 19.08.2016 द्वारा श्री झा से स्पष्टीकरण की मांग की गयी। श्री झा से प्राप्त स्पष्टीकरण (दिनांक 16.09.2016) की समीक्षा के उपरांत मामले की वृहद जांच की आवश्यकता पायी गयी। समीक्षोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक 9532 दिनांक 26.07.2017 द्वारा श्री झा के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। जिसमें आयुक्त पटना, प्रमंडल पटना को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। 3. आयुक्त, पटना प्रमंडल पटना के पत्रांक 588 दिनांक 21.03.2018 द्वारा श्री झा के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन प्राप्त हुआ। संचालन पदाधिकारी द्वारा उनके विरूद्ध लगाये गये आरोपों को प्रमाणित बताया गया। विभागीय पत्रांक 4682 दिनांक 09.04.2018 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन की प्रति संलग्न करते हुए श्री झा से लिखित अभिकथन की मांग की गयी। उक्त के आलोक में श्री झा का लिखित अभिकथन (दिनांक 047.05.2018) प्राप्त हुआ। 4. श्री झा के विरूद्ध गठित आरोप, प्रपत्र-'क', संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन एवं श्री झा से प्राप्त बचाव बयान/स्पष्टीकरण की समीक्षा अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा की गयी तथा प्रमाणित आरोपों के लिए अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के संगत प्रावधानों के तहत श्री झा के पेंशन से 10 प्रतिशत की कटौती 03 वर्षाे तक करने का दंड विनिश्चित किया गया। उक्त विनिश्चित दंड पर विभागीय पत्रांक 11631 दिनांक 29.08. 2018 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से मंतव्य की मांग की गयी। आयोग के पत्रांक 2617 दिनांक 31.12.2018 द्वारा उक्त दंड प्रस्ताव पर अपनी सहमति संसूचित की गयी। 5. उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में सम्यक विचारोपरांत श्री उदयकांत झा, बि0प्र0से, कोटि क्रमांक-273/2011 तत्कालीन संयुक्त आयुक्त विभागीय जाँच, पटना प्रमंडल पटना (सम्प्रति सेवानिवृत) को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के तहत उनके पेंशन से 10 प्रतिशत की कटौती 03 वर्षाे तक करने संबंधी शास्ति अधिरोपित/संसूचित की जाती है। आदेशः-आदेश दिया जाता है कि इस संकल्प की प्रति बिहार राजपत्र के अगले अंक में प्रकाशित किया जाय तथा इसकी प्रति सभी संबंधित को भेज दी जाय।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राम बिशुन राय, अवर सचिव।

————— अधीक्षक, सचिवालय मु(cid:7076)णालय बिहार, पटना द्वारा प्रकाशित एवं मु(िcid:7076)त। बिहार गजट, 48—571+10-डी0टी0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in

Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 20 February 2019. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2019-02-20.8/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2019-02-20.8.