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laŒ 5 fuŒxksŒfoŒ ¼3½ 01@2018-229@fuŒxksŒ—डा॰ आेंकार नाथ दिवाकर तदेन् जिला पशुपालन पदाधिकारी, समस्तीपुर सम्प्रति जिला पशुपालन पदाधिकारी, वैशाली के विरूद्ध यह आरोप गठित हुआ है कि वित्तीय वर्ष 2012-13 से लेकर 2016-17 तक राज्य सरकार द्वारा संचालित समग्र गव्य विकास योजना के तहत् जिला पशुपालन पदाधिकारी, समस्तीपुर में डेयरी इकाई की स्थापना तथा अनुदान वितरण से संबंधित रोकड़ पंजी में उनके द्वारा छेड़-छाड़ की गयी है। मामले में दो रोकड़ पंजी तैयार किया गया है। एक रोकड़ पंजी में 94 लाभूकों तथा दूसरे रोकड़ पंजी में 95 लाभूकों का नाम अंकित है जो रोकड़ पंजी में हुई छेड़-छाड़ को इंगित करता है। रोकड़ बही में छेड़-छाड़ करने संबंधी डा॰ दिवाकर का उक्त कृत्य सरकारी सेवक के लिए निर्धारित आचरण के विरूद्ध है।
उक्त आरोपों के लिए डा॰ दिवाकर के विरूद्ध प्रपत्रा 'क' में आरोप-पत्रा गठित कर विभागीय पत्राांक 157 नि॰गो॰ 2 ॢबह(cid:4)र गजट (cid:10)[स(cid:4)ध(cid:4)रण(cid:15)(cid:16) 27 अग(cid:8)त 2019 स्पष्ट है कि प्रासंगिक मामले में किसी भी प्रकार के सरकारी राशि के गबन/वित्तीय अनियमितता नहीं हुआ है। क्योंकि लाभूकों को अनुदान की राशि सक्षम प्राधिकार (जिला पदाधिकारी, समस्तीपुर) के अनुमोदन के पश्चात् ही RTGS अथवा चेक के माध्यम से किया गया है। लेकिन यह भी सही है कि जिला पशुपालन पदाधिकारी कार्यालय, समस्तीपुर में दो रोकड़ पंजी खोला गया। एक रोकड़ पंजी में कुल 95 लाभूकों का नाम अंकित है जबकि दूसरी रोकड़ पंजी में 94 लाभूकों का नाम अंकित है। इससे स्वतः स्पष्ट होता है कि रोकड़ पंजी मेंं छेड़-छाड़ किया गया है। उक्त कार्यालय के रोकड़ पंजी का संधारण डा॰ प्रमोद कुमार द्वारा किया जाता था, जबकि उसमें अंकित तथ्यों का अनुमोदन डा॰ ओंकार नाथ दिवाकर द्वारा किया जाता था। इसलिए उक्त रोकड़ पंजी में छेड़-छाड़ के लिए डा॰ दिवाकर जिम्मेदार है।
दूसरा रोकड़ पंजी खोलने के संबंध में जैसा कि डा॰ दिवाकर का कहना है कि 95 लाभूकों वाले रोकड़ पंजी के क्रमांक 73 पर अंकित भूपनेश्वर महतो के जगह भूपनेश्वर प्रसाद सिंह के नाम से गलत चेक निर्गत हो जाने के कारण मामले को संज्ञान में आने के पश्चात् कुल व्यय अंत शेष एवं सकल योग आदि में ओवर राइंटिग से बचने के लिए अज्ञानतावश नया रोकड़ पंजी का संधारण किया गया। इस संबंध में भूपनेश्वर प्रसाद सिंह के नाम से निर्गत चेक को रद्द किये जाने संबंधी साक्ष्य से उक्त पदाधिकारी के कथन की पुष्टि होती है परंतु जब भूपनेश्वर महतो का चेक भूपनेश्वर प्रसाद सिंह के नाम से निर्गत हो गया तो डा॰ दिवाकर का यह कर्त्तव्य बनता था कि समक्ष प्राधिकार के समक्ष मामले को संज्ञान में लाकर उसी रोकड़ पंजी में इसे सुधार कर देते। लेकिन ऐसा न कर के उसके बदले उनके द्वारा दूसरा रोकड़ पंजी खोला गया। यदि दूसरा रोकड़ पंजी खोलना ही था तो इसके लिए भी उन्हें सक्षम प्राधिकार का आदेश प्राप्त करना चाहिए था जो नहीं किया गया। इसके लिए डा॰ दिवाकर दोषी है और अपने लिखित अभिकथन में उक्त पदाधिकारी द्वारा यह स्वीकार भी किया गया है कि अज्ञानतावश ही सही उनके द्वारा नया रोकड़ पंजी खोला गया है। चूँकि आरोपी पदाधिकारी के विरूद्ध जो आरोप गठित किया गया है, उसे उनके द्वारा स्वीकार भी कर लिया गया है। इस कारण अनजाने में ही सही रोकड़ पंजी में छेड़-छाड़ करने के लिए डा॰ दिवाकर दोषी है। चूँकि प्रासंगिक मामले में किसी भी प्रकार के सरकारी राशि का गबन नही हुआ है सिर्फ अज्ञानतावश पूर्व के रोकड़ बही के बदले दूसरा रोकड़ बही अनजाने में खोला गया है जो एक प्रकार से रोकड़ पंजी संधारण के लिए स्थापित नियमों के प्रतिकूल है जिसके लिए डा॰दिवाकर को