Servants of Knowledge
Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 12 February 2020

Published 12 February 2020

Type
Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2020-02-12.7
Languages
English, Hindi

click here for IIIF manifest

निबंधन संख्या पी0टी0-40

बिहार गजट

बिहार सरकार kjk प्रकाशित भाग-1—नियुक्ति, inLFkkiu, बदली, शक्ति, छु (cid:7349)ी और vU; O;fDrxr सूचनाएं। 2-100 भाग-1-क—Lo;alsod xqYeksa के समादे"Vkओं के आदेश। --- भाग-1-ख—मैट्रीकु लेशन, आई0ए0, आई0एससी0, बी0ए0, बी0एससी0, एम0ए0, एम0एससी0, लॉ भाग-1 और 2, एम0बी0बी0एस0, बी0एस0ई0, डीप0- इन-एड0, एम0एस0 और eq[rkjh परीक्षाओं के परीक्षा-फल, कार्य(cid:7059)म, छात्रवृत्ति प्रदान, आदि।

---

भाग-1-ग—शिक्षा संबंधी सूचनाएं, परीक्षाफल आदि ---

भाग-2—बिहार-jkT;iky और dk;kZ/;kksa द्वारा निकाले गये विनियम, आदेश, अधिसूचनाएं और नियम आदि। 101-101 भाग-3—भारत सरकार, प(िcid:7391)म बंगाल सरकार और mPp U;k;ky; के आदेश, अधिसूचनाएं और नियम, 'भारत गजट' और jkT; गजटों के उ(cid:7373)रण।

---

भाग-4—बिहार अधिनियम ---

विषय-सूची i"B

i"B भाग-5—बिहार विधान मंडल में पुर:LFkkपित विधेयक,उDr विधान मंडल में उपLFkkपित या उपLFkkपित किये जानेवाले प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और mDr विधान मंडल में पुर:LFkkपन के पूर्व प्रकाशित विधेयक। ---

भाग-7—संसद के अधिनियम जिनपर राष्ट्रपति की T;ss"B अनुमति मिल चुकी है। ---

भाग-8—भारत की संसद में पुर:LFkkfir विधेयक, संसद में उपLFkkपित प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और संसद में उपLFkkपित प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और संसद में पुर:LFkkiu के पूर्व प्रकाशित विधेयक। ---

भाग-9—वि(cid:6980)ापन ---

भाग-9-क—वन विभाग की नीलामी संबंधी सूचनाएं ---

भाग-9-ख—निविदा सूचनाएं, परिवहन सूचनाएं, U;k;ky; सूचनाएं और सर्वसाधारण सूचनाएं bR;kfnA 102-102 पूरक

---

पूरक-क

---

बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 2

भाग-1 नियुक्ति, inLFkkiu] बदली, शक्ति, छु (cid:7349)ी और vU; O;fDrxr सूचनाएं। —————

सहकारिता विभाग ------ अधिसूचनाएं 21 जनवरी 2020 सं॰ 8/नि॰को॰(रा॰)विभागीय-709/2016-271--जिलाधिकारी, पटना के पत्रांक-11017, दिनांक-31.10.16 द्वारा श्री कुमार शांत रक्षित, तत्कालीन जिला सहकारिता पदाधिकारी, पटना सम्प्रति सहायक निबंधक, सहयोग समितियाँ (बुनकर), बिहार, पटना के विरूद्ध बिना अवकाष स्वीकृति के अनाधिकृत रूप से दिनांक 17-22 अक्टूबर, 2016 तक अनुपस्थिति रहने के आरोप में अनुषासनिक कार्रवाई करने की अनुषंसा की गई थी। इस संबंध में श्री रक्षित से स्पष्टीकरण पूछकर निबंधक, सहयोग समितियाँ, बिहार, पटना से मंतव्य प्राप्त की गई। समीक्षोपरान्त विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-2228, दिनांक 27.06.2019 द्वारा श्री रक्षित को निन्दन की सजा देते हुए भविष्य के लिए सचेत किया गया। उक्त दण्डादेष के विरूद्ध श्री कुमार शांत रक्षित, सहायक निबंधक, सहयोग समितियाँ (बुनकर), बिहार, पटना द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी दायर किया गया। साथ ही इस संबंध में श्रीमती अनिमा रक्षित पति-श्री कुमार शांत रक्षित का भी आवेदन प्राप्त हुआ। श्री रक्षित के पुनर्विलोकन अर्जी की सम्यक्‌ समीक्षा की गई। समीक्षोपरान्त विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-2228, दिनांक-27.06.2019 द्वारा श्री कुमार शांत रक्षित को संसूचित दण्ड यथा-निन्दन की सजा एवं भविष्य में सचेत रहने के आदेष पर पुनर्विचार करते हुए घटना की तिथि से चेतावनी देने का निर्णय लिया गया है। अतएव विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-2228, दिनांक-27.06.2019 द्वारा निर्गत दण्डादेष को निरस्त करते हुए श्री कुमार शांत रक्षित, तत्कालीन जिला सहकारिता पदाधिकारी, पटना सम्प्रति सहायक निबंधक, सहयोग समितियाँ (बुनकर), बिहार, पटना को घटना की तिथि से चेतावनी दी जाती है। इसमें माननीय विभागीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त हैं।

बिहार के राज्यपाल के आदेष से, ऋचा कमल, उप-सचिव।

--------

23 जनवरी 2020

सं0 01/रा॰स्था॰स्थाना॰/पद॰-64/2019 सह॰/304--प्रबंध निदेषक, बिहार राज्य सहकारी बैंक लि॰, पटना के पद पर पदस्थापन संबंधी पूर्व निर्गत विभागीय अधिसूचना संख्या-256 दिनांक 21.01.2020 को पूर्वाग्राही (Status quo ante) प्रभाव से निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेष से, विनय कुमार, अवर सचिव।

--------

21 जनवरी 2020

सं0 1/रा॰स्था॰नि॰-27/2019 सह॰/257--पूर्व निर्गत विभागीय अधिसूचना संख्या-4570 दिनांक 13.12.2019 को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेष से, विनय कुमार, अवर सचिव।

--------

21 जनवरी 2020

सं0 01/रा॰स्था॰स्थाना॰/पद॰-64/2019 सह॰/256--श्री बबन मिश्र, जिला सहकारिता पदाधिकारी, भोजपुर, आरा (अति॰ प्रभार-प्रबंध निदेषक, जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक लि॰, आरा/सहायक निबंधक, सहयोग समितियाँ, आरा) को अंतरिम व्यवस्था के तहत तत्काल प्रभाव से प्रबंध निदेषक, बिहार राज्य सहकारी बैंक लि॰, पटना का अतिरिक्त प्रभार दिया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेष से, विनय कुमार, अवर सचिव।

-------- 22 जनवरी 2020 सं0 8/नि॰को॰(रा॰)विभागीय-718/2019-289--श्री अजय कुमार भारती, तत्कालीन प्रबंध निदेषक, दि रहिका केन्द्रीय सहकारी बैंक लि॰, मधुबनी सम्प्रति जिला सहकारिता पदाधिकारी, समस्तीपुर के विरूद्ध प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत रबी 2016-17 एवं रबी 2017-18 में फसल बीमा प्रीमियम की राषि समय पर संबंधित इन्ष्योरेंस कम्पनी को नहीं3 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 जमा होने के कारण संबंधित किसानों को फसल बीमा का लाभ नहीं मिल सका, जो प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के कार्यान्वयन में अपने कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही एवं प्रभावी अनुश्रवण में चूक का प्रतीक है। उक्त आरोपों पर इनके विरूद्ध आरोप पत्र गठित कर स्पष्टीकरण की पृृच्छा की गई। श्री भारती से प्राप्त स्पष्टीकरण की सम्यक समीक्षा की गई। समीक्षोपरान्त पाया गया कि श्री भारती के विरूद्ध फसल बीमा कार्य के अनुश्रवण में चूक का आरोप प्रमाणित है, जिसके लिए वे दोषी हैं। अतएव प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अजय कुमार भारती, तत्कालीन प्रबंध निदेषक, दि रहिका केन्द्रीय सहकारी बैंक लि॰, मधुबनी सम्प्रति जिला सहकारिता पदाधिकारी, समस्तीपुर को एक वेतन वृृद्धि असंचयात्मक प्रभाव से रोकने एवं भविष्य में सचेत रहने के चेतावनी का दण्ड संसूचित किया जाता है। इसके साथ ही अनुषासनिक कार्रवाई समाप्त की जाती है। इसमें माननीय विभागीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है।

बिहार के राज्यपाल के आदेष से, ऋचा कमल, उप-सचिव।

--------

16 जनवरी 2020

सं0 1/रा॰स्था॰नि॰-27/2019 सह॰/214--बिहार लोक सेवा आयोग की 60वीं से 62वीं सम्मिलित संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर जिला अंकेक्षण पदाधिकारी, सहयोग समितियाँ के पद पर नियुक्ति हेतु अनुषंसा के उपरान्त विभागीय अधिसूचना संख्या-2769 दिनांक-01.08.2019 द्वारा श्री धर्मवीर कुमार (वरीयता क्रमांक-773) की नियुक्ति जिला अंकेक्षण पदाधिकारी, सहयोग समितियाँ, बेगूसराय के पद पर की गयी। उक्त विभागीय अधिसूचना में नवनियुक्त पदाधिकारियों को 15 (पन्द्रह) दिनों के अन्दर नवपदस्थापित पद/स्थान पर योगदान देने का निदेष था। श्री कुमार द्वारा निर्धारित अवधि में योगदान न देते हुए योगदान हेतु अवधि विस्तार का अनुरोध किया गया। विभागीय पत्रांक-3872 दिनांक-24.10.2019 द्वारा श्ररी कुमार को 15 (पन्द्रह) दिनों के अन्दर योगदान देने हेतु इस शर्त्त के साथ अनुमति दिया गया कि उक्त निर्धारित अवधि में योगदान नहीं देने पर उनकी नियुक्ति रद्द कर दी जायेगी। तदोपरान्त भी श्री कुमार द्वारा उक्त पद पर योगदान नहीं दिया गया।

सम्यक विचारोपरान्त विभाग द्वारा श्री धर्मवीर कुमार की नियुक्ति को रद्द किया जाता है।

बिहार के राज्यपाल के आदेष से, ऋचा कमल, उप-सचिव।

--------

(cid:356)ामीण िवकास िवभाग

--------

अिधसूचना

1 फरवरी 2020

सं0 (cid:356)ा0कव0-14(भा0)बॉंाि-03/2019-455663--(cid:373)ी अकमत ुि मार, (cid:356)ामीण कवािस पदाकधािरी-सह- (cid:366)भारी (cid:366)खंड कवािस पदाकधािरी, बौंसी, बॉंाि ेि कव(cid:349)(cid:544) सहायि समाहता(cid:330)-सह-सहायि दण्डाधिकारी ेि (cid:366)खंड (cid:366)क(cid:407)ण म(cid:336) र्योगदान हेतु (cid:366)भार नही ं सौंपने, अनाकधृि त (cid:349)प से विभिन्न कदवसं व महत्वपूर्ण बैठंि म(cid:336) अनुप(cid:304)(cid:830)थत रहने, स्पष्टीकरण ाि उत्तर नही ं देने, र्योजनाओं ेि क्रियान्वयन म(cid:336) (cid:349)कच नही ं लेने, कनवा(cid:330)चन ािय(cid:344) म(cid:336) लापरवाही इत्यादि ेि कलए कजला पदाकधािरी, बॉंाि ेि प(cid:361)ांि-670 कदनांि 30.11.2019 (cid:554)ारा आर्रोप प(cid:361) प्राप्त (cid:352)आ। उक्त ेि अतिरिक्त कजला पदाकधािरी, बॉंाि ेि (cid:466)ापांि 97 कदनांि 18.01.2020 (cid:554)ारा (cid:373)ी ुि मार से पूछे गए स्पष्टीकरण म(cid:336) माननीय मुख्यमं(cid:361)ी ेि महत्वपूण(cid:330) ािय(cid:330)(cid:354)म म(cid:336) उनीि लापरवाही एवं अनुप(cid:304)(cid:830)थत रहने से संबंकधत अत्यंत गंभीर आर्रोप भी (cid:366)कतवेकदत कयिे गये ह(cid:339)।

(cid:373)ी ुि मार ेि कव(cid:349)(cid:544) (cid:366)कतवेकदत आर्रोप (cid:366)थम दृष्टया गम्भीर लापरवाही एवं अव(cid:466)ा से संबंकधत है। उपरोक्त आर्रोपं ेि आर्लोि म(cid:336) सम्यक विचारोपरान्त कबहार सरािरी सेवि (वग(cid:334)रिण, कनयं(cid:361)ण एवं अपील) कनयमावली, 2005 ेि कनयम 9(1)(ि) ेि (cid:366)ावधानं ेि तहत (cid:373)ी अकमत ुि मार, (cid:356)ामीण कवािस पदाकधािरी-सह-(cid:366)भारी (cid:366)खंड कवािस पदाकधािरी, बौंसी, बॉंाि र्ोि अगले आदे ति कनलंकबत कयिा जाता है। कनलंबन ीि अवकध म(cid:336) (cid:373)ी ुि मार ाि मुख्यालय (cid:366)खंड ािया(cid:330)लय, पटना सदर, पटना कनधा(cid:330)(cid:303)रत कयिा जाता है।

कनलंबन ीि अवकध म(cid:336) (cid:373)ी ुि मार र्ोि कबहार सरािरी सेवि (वग(cid:334)रिण, कनयं(cid:361)ण एवं अपील) कनयमावली, 2005 ेि कनयम- 10 ेि तहत् अनुमान्य जीवन कनवा(cid:330)ह भ(cid:517)ा दे य र्होगा।

उक्त आदे पर स(cid:407)म (cid:366)ाकधािर ाि अनुर्मोदन प्राप्त है।

िबहार-राज्यपाल के आदेश से, संजय कु मार िसंह, संयुक्त सकचव।बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 4

गृह विभाग

(विषेष शाखा)

-------

आदेश

3 फरवरी 2020

सं॰ एल/एच॰जी॰-14-01/2019-1113/सी॰--महानिदेशक-सह-महासमादेष्टा का कार्यालय, गृह रक्षा वाहिनी एवं अग्निशाम सेवाएँ, बिहार, पटना के पत्रांक-5604, दिनांक 23.12.2019 द्वारा प्राप्त प्रस्ताव के आलोक में बिहार सेवा संहिता के नियम-236 के अधीन श्री कृष्णा कुमार, तत्कालीन परिवीक्ष्यमान जिला समादेष्टा, बिहार गृह रक्षा वाहिनी के प्रशिक्षण अवधि में स्वयं की चिकित्सा के कारण अनुपस्थिति अवधि दिनांक 08.04.2019 से 10.06.2019 तक कुल 64 दिनों का असाधारण अवकाश की स्वीकृति प्रदान की जाती है।

2. इस आदेश में अपर मुख्य सचिव का अनुमोदन प्राप्त है।

आदेश से, विमलेश कुमार झा, अपर सचिव।

-------

जल संसाधन विभाग

------

अधिसूचनाएं

6 अगस्त 2019

सं॰ 22/नि॰सि॰(कटि0) 25-01/2019-1655--श्री आलोक कुमार (आई0डी0-5070) सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना का स्थानान्तरण विभागाीय अधिसूचना संख्या-2349 दिनांक 22.06.2018 द्वारा अवर प्रमण्डल पदाधिकारी बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अवर प्रमण्डल-3 पूर्णियॉ के पद पर किया गया, पुनः विभागीय पत्रांक-3685 दिनांक 28.09.2018 द्वारा श्री कुमार को सूचित किया गया कि नियंत्री पदाधिकारी द्वारा विरमित नही किये जाने की स्थिति में दिनांक 20.10.18 के प्रभाव से स्वतः विरमित होकर दिनांक 22.10.2018 तक निश्चित रूप से नवपदस्थापित स्थान पर प्रभार ग्रहण कर विभाग को ई-मेल से अवगत कराये। उक्त निदेश के बाद भी श्री कुमार ने नव पदस्थापन स्थान पर दिनांक 22.10.2018 तक योगदान न देकर दिनांक 01.11.2018 को योगदान समर्पित किया । विभागीय आदेश का उल्लंघन करने के कारण विभागीय पत्रांक 4082 दिनांक 05.11.2018 द्वारा श्री कुमार से स्पष्टीकरण की माँग की गयी, तदालोक में श्री कुमार द्वारा स्पष्टीकरण का उत्तर समर्पित किया गया। श्री कुमार से प्राप्त स्पष्टीकरण की सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय आदेश की अवहेलना करने के आरोप के लिए विभागीय अधिसूचना 505 दिनांक 08.03.2019 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गयाः- ''एक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक''। उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री आलोक कुमार द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन समर्पित किया गया, जिसमें उल्लेख किया गया है कि उनके स्थानान्तरण पर विभाग द्वारा दिनांक 31.10.2018 तक रोक लगायी गयी थी, जिसके कारण वे दिनांक 22.10.2018 को विरमित नहीं हो सके। इस संदर्भ में श्री कुमार द्वारा अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग, जल संसाधन विभाग, पटना के पत्रांक-4426 दिनांक 03.10.2018 की छायाप्रति प्रस्तुत की है। जिसमें स्पष्ट अंकित किया गया है कि ''श्री आलोक कुमार, सहायक अभियंता को कार्यहित में बाढ़ अवधि दिनांक 31.10.2018 तक विरमित नहीं किये जाने संबंधित प्रधान सचिव महोदय द्वारा अनुमोदित टिप्पणी पूर्व में अवगत कराया जा चुका है।'' उक्त से स्पष्ट होता है कि श्री कुमार द्वारा कोई विभागीय आदेश की अवहेलना नहीं की गयी है। बल्कि उनका स्थानान्तरण दिनांक 31.10.2018 तक स्थगित किया गया था। श्री कुमार के पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में लिखित तथ्यों, इसके साथ संलग्न कागजात के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि श्री कुमार द्वारा विभागीय आदेश की अवहेलना नहीं की गयी है। विभागीय आदेश के आलोक में ही ये दिनांक-31.10. 2018 तक अपने पद पर बने रहें और इसके अगले दिन दिनांक 01.11.2018 को अपने नवपदस्थापित स्थान पर योगदान कर लिये। इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री कुमार के पुनर्विलोकन अभ्यावेदन को स्वीकार करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-505 दिनांक 08.03.2019 द्वारा संसूचित दण्ड ''एक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक'' को निरस्त करने का निर्णय लिया गया। सरकार द्वारा लिए गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री कुमार को संसूचित दण्ड ''एक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक'' को निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।5 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020

6 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-1672--श्री क्षितिष कुमार (आई0डी0 सं०-5090), सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णोद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में कार्य सम्पादन की प्रक्रिया में अनियमितता एवं अन्य कार्यों में बरती गयी गंभीर अनियमितता के लिए सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री कुमार का मुख्यालय मुख्य अभियंता का कार्यालय, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, गया निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री कुमार को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री क्षितिष कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित कर अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

6 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-1670--श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा (आई0डी0 सं०-जे-7916), सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णोद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में कार्य सम्पादन की प्रक्रिया में अनियमितता एवं अन्य कार्यों में बरती गयी गंभीर अनियमितता के लिए सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री शर्मा का मुख्यालय मुख्य अभियंता का कार्यालय, सिंचाई सृजन जल संसाधन विभाग, गया निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री शर्मा को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित कर अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

6 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-1671--श्री दिलीप कुमार (आई0डी0 सं०-जे-7640), सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णोद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में कार्य सम्पादन की प्रक्रिया में अनियमितता एवं अन्य कार्यों में बरती गयी गंभीर अनियमितता के लिए सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री कुमार का मुख्यालय मुख्य अभियंता का कार्यालय, सिंचाई सृजन जल संसाधन विभाग, गया निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री कुमार को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री दिलीप कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित कर अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

7 अगस्त 2019

सं0 22नि0सि0(भाग0)-09-07/2015/1679--श्री अक्षयवर ठाकुर (आई0डी0-जे-4935), तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-4, नवगछिया सम्प्रति सेवानिवृत सहायक अभियंता के विरूद्ध बाढ़ 2014 पूर्व एकरारनामा सं०-3SBD/2014-15 के तहत एजेण्डा संख्या-122/319, 122/320 एवं एजेण्डा संख्या-122/322 के अन्तर्गत कराए गए कार्यों में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से करायी गयी। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर किए जाने के उपरांत प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2515, दिनांक 07.12.2018 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया।

श्री अक्षयवर ठाकुर, तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-4, नवगछिया द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण के उत्तर की समीक्षा सक्षम प्राधिकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत निम्नलिखित तथ्य पाए गए :- विभागीय समीक्षा के आलोक में श्री अक्षयवर ठाकुर, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-4, नवगछिया के विरूद्ध गठित आरोप संख्या-01, 02, 03, 04 एवं 05 प्रमाणित नहीं पाया गया। जहाँ तक आरोप संख्या-06 का6 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 प्रश्न है। यह आरोप कार्य के कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री को वापस लेने अथवा वसूली करने से संबंधित है। उड़नदस्ता जाँच के पश्चात दिये गये सामग्री की वसूली चतुर्थ चालू विपत्र के माध्यम से कर ली गई है। श्री अक्षयवर ठाकुर, सेवानिवृत सहायक अभियंता दिनांक 31.08.2016 को सेवानिवृत हो चुके हैं। अतएव इनके विरूद्ध मामला कालबाधित है। उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री अक्षयवर ठाकुर, सेवानिवृत सहायक अभियंता के विरूद्ध मामला कालबाधित होने के कारण मामले को संचिकास्त करने का निर्णय लिया गया।

सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री अक्षयवर ठाकुर, तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-4, नवगछिया सम्प्रति सेवानिवृत सहायक अभियंता के मामले को कालबाधित मानते हुए संचिकास्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

6 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-1669--श्री राम विनय सिंह (आई0डी0 सं०-जे-7645), सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णोद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में कार्य सम्पादन की प्रक्रिया में अनियमितता एवं अन्य कार्यों में बरती गयी गंभीर अनियमितता के लिए सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री सिंह का मुख्यालय मुख्य अभियंता का कार्यालय, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, गया निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री सिंह को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री राम विनय सिंह के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित कर अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

7 अगस्त 2019

सं0 22नि0सि0(भाग0)-09-07/2015/1680--श्री रामस्वरूप रजक (आई0डी0-4602), तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-3, नवगछिया सम्प्रति पुनर्वास पदाधिकारी, कोशी योजना सुपौल के विरूद्ध बाढ़ 2014 पूर्व एकरारनामा सं०-3SBD/2014-15 के तहत एजेण्डा संख्या-122/319, 122/320 एवं एजेण्डा संख्या-122/322 के अन्तर्गत कराए गए कार्यों में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से करायी गयी। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर किए जाने के उपरांत प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2514, दिनांक 07.12.2018 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया।

श्री रामस्वरूप रजक, तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-3, नवगछिया द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण के उत्तर की समीक्षा सक्षम प्राधिकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत निम्नलिखित तथ्य पाए गए :- श्री रजक द्वारा मूल रूप से कहा गया है कि इनके द्वारा विषयांकित कार्य न तो कराया गया है और न ही कोई विपत्र तैयार/जाँच करने में इनकी सहभागिता रही है। साक्ष्य के रूप में प्रश्नगत कार्य से संबंधित मापपुस्त संख्या-1096, 1097, 1100 एवं 1105 की छायाप्रति उपलब्ध करायी गयी है। उपर्युक्त मापपुस्त में से मापपुस्त संख्या-1105, जो श्री रामस्वरूप रजक के नाम से निर्गत है परन्तु उक्त मापपुस्त पर अंकित मापी के अन्त में किये गये हस्ताक्षर से स्पष्ट होता है श्री रजक का हस्ताक्षर उस मापपुस्त में होना परिलक्षित नहीं होता है। श्री रजक द्वारा यह भी कहा गया है कि उन्हें अपने मूल कार्य क्षेत्र के अतिरिक्त इस्माईलपुर बिन्द टोली के पास स्पर संख्या-01 पर कार्यादेश दिया गया था परन्तु कुछ ही दिनों बाद उच्च पदाधिकारी के मौखिक आदेशानुसार कोसी नदी के सोहरा/मदरौना ग्राम के पास भयंकर कटाव शुरू हो जाने के कारण उपर्युक्त कार्य से मुक्त कर मूल कार्य क्षेत्र में वापस लौटा दिया गया। उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री रामस्वरूप रजक, तत0 सहायक अभियंता को कार्य से असम्बद्ध रहने के कारण उनके विरूद्ध कोई भी आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया है।

अतएव श्री रामस्वरूप रजक, तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-3, नवगछिया के विरूद्ध आरोप प्रमाणित नहीं होने की स्थिति में सक्षम प्राधिकार के स्तर पर उन्हें आरोपमुक्त करने का निर्णय लिया गया। सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री रामस्वरूप रजक, तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-3, नवगछिया को आरोपमुक्त करते हुए संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।7 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020

7 अगस्त 2019

सं0 22नि0सि0(भाग0)-09-07/2015/1681--श्री लक्ष्मण राम (आई0डी0-3494), तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर सम्प्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध बाढ़ 2014 पूर्व एकरारनामा सं०-3SBD/2014- 15 के तहत एजेण्डा संख्या-122/319, 122/320 एवं एजेण्डा संख्या-122/322 के अन्तर्गत कराए गए कार्यों में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से करायी गयी। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर किए जाने के उपरांत प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2518, दिनांक 07.12.2018 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया।

श्री लक्ष्मण राम, तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा स्पष्टीकरण का जवाब समर्पित नहीं किया गया, परन्तु उनके विरूद्ध गठित सभी छः आरोपों की समीक्षा सक्षम प्राधिकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत निम्नलिखित तथ्य पाए गए :- विभागीय समीक्षा के आलोक में श्री लक्ष्मण राम, तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के विरूद्ध गठित आरोप सं0-1, 2, 3, 4 एवं 5 प्रमाणित प्रतीत नहीं होता है। जहाँ तक आरोप संख्या-06 का प्रश्न है यह आरोप कार्य के कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री को वापस लेने अथवा वसूली करने से संबंधित है। किसी भी संवेदक को कार्यहित में दिये गये विभागीय सामग्री की वसूली का दायित्व प्रमंडल स्तर पर संलग्न पदाधिकारियों अथवा कार्यपालक अभियंता से लेकर कनीय अभियंता तक के पदाधिकारी का दायित्व है न कि मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता का जब तक कि किसी स्तर से इन दोनों पदाधिकारी के संज्ञान में नहीं लाया जाता है। उड़नदस्ता जाँच के पश्चात दिये गये सामग्री की वसूली चतुर्थ चालू विपत्र के माध्यम से कर ली गई है। उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री लक्ष्मण राम, तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के विरूद्ध कोई भी आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया है।

अतएव श्री लक्ष्मण राम, तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के विरूद्ध आरोप प्रमाणित नहीं होने की स्थिति में सक्षम प्राधिकार के स्तर पर उन्हें आरोपमुक्त करने का निर्णय लिया गया।

सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री लक्ष्मण राम, तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर को आरोपमुक्त करते हुए संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

7 अगस्त 2019

सं0 22नि0सि0(भाग0)-09-07/2015/1682--श्री विनोद कुमार गुप्ता (आई0डी0-1991), तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भागलपुर सम्प्रति सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता के विरूद्ध बाढ़ 2014 पूर्व एकरारनामा सं०-3SBD/2014-15 के तहत एजेण्डा संख्या-122/319, 122/320 एवं एजेण्डा संख्या-122/322 के अन्तर्गत कराए गए कार्यों में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से करायी गयी। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर किए जाने के उपरांत प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2517, दिनांक 07.12.2018 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया।

श्री विनोद कुमार गुप्ता, तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भागलपुर द्वारा स्पष्टीकरण का जवाब समर्पित नहीं किया गया, परन्तु उनके विरूद्ध गठित सभी छः आरोपों की समीक्षा सक्षम प्राधिकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत निम्नलिखित तथ्य पाए गए :- विभागीय समीक्षा के आलोक में श्री विनोद कुमार गुप्ता, तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भागलपुर के विरूद्ध गठित आरोप सं0-1, 2, 3, 4 एवं 5 प्रमाणित प्रतीत नहीं होता है। जहाँ तक आरोप संख्या-06 का प्रश्न है यह आरोप कार्य के कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री को वापस लेने अथवा वसूली करने से संबंधित है। किसी भी संवेदक को कार्यहित में दिये गये विभागीय सामग्री की वसूली का दायित्व प्रमंडल स्तर पर संलग्न पदाधिकारियों अथवा कार्यपालक अभियंता से लेकर कनीय अभियंता तक के पदाधिकारी का दायित्व है न कि मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता का जब तक कि किसी स्तर से इन दोनों पदाधिकारी के संज्ञान में नहीं लाया जाता है। उड़नदस्ता जाँच के पश्चात दिये गये सामग्री की वसूली चतुर्थ चालू विपत्र के माध्यम से कर ली गई है। उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री विनोद कुमार गुप्ता, तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भागलपुर के विरूद्ध कोई भी आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया है।

अतएव श्री विनोद कुमार गुप्ता, तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भागलपुर के विरूद्ध आरोप प्रमाणित नहीं होने की स्थिति में सक्षम प्राधिकार के स्तर पर उन्हें आरोपमुक्त करने का निर्णय लिया गया।

सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री विनोद कुमार गुप्ता, तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भागलपुर को आरोपमुक्त करते हुए संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 8

7 अगस्त 2019

सं0 22नि0सि0(भाग0)-09-07/2015/1683--श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा (आई0डी0-जे-7916), तत0 कनीय अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बौंसी सम्प्रति सहायक अभियंता, मुख्य अभियंता कार्यालय (सिंचाई सृजन), जल संसाधन विभाग, भागलपुर के विरूद्ध बाढ़ 2014 पूर्व एकरारनामा सं०-3SBD/2014-15 के तहत एजेण्डा संख्या-122/319, 122/320 एवं एजेण्डा संख्या-122/322 के अन्तर्गत कराए गए कार्यों में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से करायी गयी। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर किए जाने के उपरांत प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2509, दिनांक 07.12.2018 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया।

श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा, तत0 कनीय अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बौंसी द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण के उत्तर की समीक्षा सक्षम प्राधिकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत निम्नलिखित तथ्य पाए गए :- आरोप 1ः- प्रश्नगत कार्य के तहत मिट्‌टी भराई कार्य में नियमानुसार Settlement की कटौती नहीं करना, जबकि

(cid:2869)

एकरारनामा के अनुसार राजस्थानी ट्रैक्टर से कराये गये मिट्‌टी भराई काय में 𝑡ℎ तथा Excavator/Tripper के प्रयोग

(cid:2876)

(cid:2869)

(cid:2869)(cid:2871)

Settlement की से याँत्रिक विधि से मिट्‌टी भराई कार्य जिसका Compaction 90% at OMC पर किया गया है, से कटौती की जानी है। उक्त से स्पष्ट है कि नियम तथा एकरारनामा के विरूद्ध मिट्‌टी भराई कार्य में अधिकाई भुगतान किये जाने से संबंधित है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.0(K), 8.0.0(D) तथा 9.0.0(iii) एवं (v) से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य के तहत मिट्‌टी भराई कार्य में Settlement allowance में लिये deduction नहीं किया गया है जबकि राजस्थानी (cid:2869)

ट्रैक्टर से मिट्‌टी भराई कार्य में 𝑡ℎ तथा याँत्रिक विधि से मिट्‌टी भराई जिसका Compaction 90% at OMC पर किया (cid:2876)

(cid:2869)

गया है, से Settlement की कटौती एकरारनामा के अनुसार किया जाना है। उड़नदस्ता द्वारा मत दिया गया है कि (cid:2869)(cid:2871)

आकलित मिट्‌टी भराई की मात्रा में से Settlement की कटौती अंतिम विपत्र से किया जाना आवश्यक है, जिससे विभाग को वित्तीय क्षति नहीं हो। उपरोक्त आरोपित पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि उड़नदस्ता के जाँच तिथि यथा दिनांक 12.03.2015 के पूर्व तृतीय विपत्र के माध्यम से दिनांक 07.02.2015 को संवेदक को मिट्‌टी भराई कार्य में आवश्यक Settlement की कटौती का ही भुगतान किया गया है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता द्वारा द्वित्तीय विपत्र तक किये गये भुगतान की जाँच की गयी है। मापीपुस्त सं0-1105 से स्पष्ट है कि तृतीय चालू विपत्र में याँत्रिक विधि से ढुलाई गयी मिट्‌टी भराई (cid:2869)

(cid:2869)

कार्य में 𝑡ℎ एवं राजस्थानी ट्रैक्टर से भराई की गई मिट्‌टी भी मात्रा में

(cid:2869)(cid:2871)

(cid:2876)

𝑡ℎ Settlement की कटौती की गयी है। तृतीय चालू विपत्र का भुगतान दिनांक 23.03.2015 को किया गया है। चूँकि तृतीय चालू विपत्र से मिट्‌टी भराई कार्य मद में वाँछित Settlement की कटौती कर भुगतान किया गया है ऐसी स्थिति में Settlement की कटौती नहीं कर अधिकाई भुगतान का मामला नहीं पाया गया। आरोप 2ः-कार्य में प्रयुक्त किये गये जियो बैग की गुणवत्ता की जाँच विभागीय प्रयोगशाला, खगौल से भौतिक जाँच कराया जाना है तथा विभागीय निदेश के आलोक में तकनीकी विशिष्टियों की जाँच हेतु नमूना संग्रह कर CWPRS, Pune से कराकर ही अंतिम विपत्र का भुगतान किया जाना है। जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि मुख्य अभियंता, भागलपुर के पत्रांक-2845, दिनांक 11.09.2014 द्वारा जियो बैग का नमुना CWPRS, Pune को भेजा गया है; परन्तु दिनांक 12.03.2015 तक उड़नदस्ता को जाँच प्रतिवेदन नहीं दिया गया, जो मामला को संदिग्ध बनाता है कि कार्य में प्रयुक्त जियो बैग विशिष्टि के अनुरूप था अथवा नहीं जबकि भुगतान प्रावधान के अनुरूप किया गया है। अतएव अनियमित भुगतान होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 8.0.0(a) (vi) एवं (vii) से स्पष्ट है कि जियो बैग के तकनीकी विशिष्टि का जाँचफल प्राप्त नहीं होने के कारण द्वितीय चालू विपत्र से विभागीय निदेशानुसार आवश्यक कटौती की गयी है एवं कंडिका-9.0.0 (ix) में जियो बैग के पूर्ण भुगतान CWPRS, Pune से जाँचफल के फलाफल के आधार पर करने की अनुशंसा की गयी है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि उड़नदस्ता जाँच की तिथि दिनांक 12.03.2015 तक CWPRS, Pune से जाँचफल कार्यालय को प्राप्त नहीं था। जियो बैग का जाँचफल मुख्य अभियंता के पत्रांक-980, दिनांक 13.03.2015 तथा अधीक्षण अभियंता के पत्रांक-401, दिनांक 21.03.2015 से प्रमंडल को प्राप्त हो सका। फलतः उड़नदस्ता दल को उक्त जाँचफल नहीं दिया जा सका। जियो बैग का जाँचफल प्राप्त होने के पूर्व विभागीय पत्रांक-384, दिनांक 17.02.2014 के आलोक में जियो बैग से संबंधित कार्यों का भुगतान किया गया। जिसमें विभागीय निदेशानुसार गुणवत्ता जाँच हेतु 20% राशि विपत्र से काटकर रखी गयी थी जिसकी कुल राशि रु0 66,37,456.00/- मात्र है। विभागीय पत्रांक-384, दिनांक 17.02.2014 के कंडिका (iv) से स्पष्ट होता है कि जियो बैग के जाँचफल प्राप्त होने के प्रत्याशा में संबंधित कार्यपालक अभियंता को उक्त सामग्री से संबंधित कार्यों की राशि का 20% की कटौती संबंधित9 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 संवेदक के विपत्रों से करने का निदेश है जो मापपुस्त सं0-1096 से स्पष्ट है। जियो बैग के गुणवत्ता जाँच हेतु 20% के रूप में कुल रु0 22,49,550.00/- की कटौती की गयी है तथा मुख्य अभियंता के पत्रांक-980, दिनांक 17.03.2015 से स्पष्ट है कि बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के अन्तर्गत बाढ़ 2014 के पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्यों के तहत उपयोग किये गये जियो बैग का गुणवत्ता जाँचफल CWPRS, Pune से प्राप्त होने के पश्चात विभागीय पत्रांक-384, दिनांक 17.02.2014 के कंडिका (v) में निहित निदेश के आलोक में गठित समिति द्वारा एक प्रतिवेदन दिया गया है। उक्त प्रतिवेदन के कंडिका 1.3 में अंकित है कि CWPRS, Pune से प्राप्त जाँचफल में 9 Particular बिन्दुओं को शामिल किया गया है प्रत्येक बिन्दु पर जाँचफल अस्वीकार रहने पर 20/9=2.229% कटौती कराने का समिति द्वारा निर्णय लिया गया। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में आरोप सं0-2 प्रमाणित नहीं पाया गया। आरोप 3ः-विभागीय नियमानुसार कार्य में प्रयुक्त बोल्डर से संबंधित M&N का सत्यापन कराकर ही भुगतान की कार्रवाई किया जाना है परन्तु प्रश्नगत कार्य को कुल 2349.41 घनमीटर बोल्डर के उपयोग होने के बावजूद बिना M&N Form के सत्यापन कराये ही अनियमित ढंग से भुगतान की कार्रवाई किया जाना विभागीय निदेशों का उल्लंघन करने से संबंधित है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.0.0(t) से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य में कुल 2349.40 घनमीटर बोल्डर का उपयोग किया गया है। उक्त बोल्डर के ढुलाई एवं खपत से संबंधित चालान एवं M&N Form का सत्यापन नहीं कराया जा सका है एवं भुगतान से पूर्व समेकित/प्रयुक्त बोल्डर की मात्रा के लिये जिला खनन विभाग से M&N का सत्यापन कराने की अनुशंसा की गयी है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि कार्य पूर्ण होने के बाद भी भुगतान की गयी प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र में बोल्डर का भुगतान नहीं किया गया है तृतीय विपत्र जो दिनांक 07.02.2015 को भुगतान की गयी है उसके पूर्व ही संवेदक के द्वारा उपयोग में लाई गयी बोल्डर का चालान एवं M&N Form समर्पित किया गया था जिसके आधार पर तृतीय विपत्र से किया गया भुगतान में इस में सत्यापन हेतु 50% की राशि कुल रु0 34,22,609.00/- की कटौती कर ली गयी है जिसकी पुष्टि मापपुस्त 1096 से होती है। इन लोगों द्वारा यह भी कहा गया है कि सहायक खनन पदाधिकारी पाकुड़, झारखंड ने अपने पत्रांक-254, दिनांक 25.03.2015 से सूचित किया है कि वर्ष 2014-15 में इसमाईलपुर बिन्द टोली स्थल पर सम्पादित कार्य में प्रयुक्त कुल 81,500 घनफीट बोल्डर का उपयोग इस जिले के वैध खनन पदाधिकारियों से क्रय कर किया गया है। चूँकि कार्य में प्रयुक्त बोल्डर का सत्यापन जिला खनन पदाधिकारी, पाकुड़ से करा लिया गया अतएव M&N Form सत्यापन नहीं कराने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है। आरोप 4ः-प्राक्कलन के विरमित प्रश्नगत कार्य LWL से 0.80मी0 उपर जल स्तर पर कराये जाने से संबंधित है जिसके कारण नोज भाग में गैबियन का कार्य 12मी0 के जगह पर अधिकतम 9.0मी0 यो उससे कम चौड़ाई में कराया जाना परिलक्षित है। इस प्रकार NC का कार्य ज्यादा कराना अर्थात Water Level बढ़ने के कारण NC Base के कार्य में प्रावधान से अधिक व्यय किया गया साथ ही गैबियन NC/BA Wire Crate वाँछित चौड़ाई से कम चौड़ाई में कार्य होने के कारण स्पर सं0-7 का कार्य कारगर साबित नहीं हुआ एवं ज्यादा भाग ध्वस्त हो गया एवं अन्य भाग में से कराये गये कार्य अपने उद्‌ेश्य की पूर्ति नहीं कर पाया। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका-8.0.0(c) से स्पष्ट होता है कि प्राक्कलन में प्रावधान के अनुरूप प्रश्नगत कार्य LWL (24.0मी0) पर लगभग 12मी0 NC Base के उपर 10.80मी0 चौड़ाई में गैबियन से कार्य कराना था। परन्तु कार्य लगभग 24.80मी0 जलस्तर पर नोन भाग में गैबियन का कार्य 9मी0 या उससे कम चौड़ाई से कराया गया। फलतः अधिक जल स्तर पर NC Base बनाने के कारण NC में बालू भरे बैग की खपत ज्यादा करना पड़ा। साथ ही गैबियन का कार्य वांछित चौड़ाई से कम चौड़ाई में कराने के कारण स्पर सं0-7 पर कार्य पूर्णतः कारगर नहीं हो सका एवं ज्यादा भाग ध्वस्त हो गया। आरोपित पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि इस कार्य की प्रशासनिक स्वीकृति दिनांक 24.04.2014 को प्राप्त हुआ, जिसके आलोक में निविदा निष्पादनोपरांत दिनांक 29.05.2014 को कार्य आवंटित किया गया तथा कार्यावंटन के पश्चात संवेदक के साथ दिनांक 30.05.2014 को एकरारनामा सम्पन्न करते हुए दिनांक 30.05.2014 को कार्यादेश निर्गत किया गया। विभाग इस सत्य को जानते हुए कि जून माह में गंगा नदी का जल स्तर अपने जल स्तर (LWL) से उपर रहता है कार्यावंटन दिनांक 29.05.2014 को किया गया फलतः स्थल की गंभीरता एवं संवेदनशीलता को देखते हुए दिनांक 30.05.2014 से कार्य कराना पड़ा। इसलिए जून माह में गंगा नदी का जलस्तर LWL से 0.80मी0 उपर पर कार्य कराना स्थल की बाध्यता थी, स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। क्योंकि गंगा का जल स्तर जून में बढ़ने लगता है। स्पर संख्या-7 के क्षतिग्रस्त होने के संदर्भ में कहा गया है कि स्पर सं0-7 पर नदी की मुख्य धारा Strike कर रही थी जिसके कारण बाढ़ अवधि में क्षतिग्रस्त हुआ है जाँच प्रतिवेदन में कार्य भी उपयोगिता के संदर्भ में कहा गया है कि स्थल जाँच में मूल स्वीकृति प्रावधान के आलोक में कराया गया कटाव निरोधक कार्य के अन्तर्गत स्पर सं0-1, 7, 8, एवं 9 में से केवल स्पर सं0-7 को छोड़कर सभी कार्य Robust एवं Intact दिख रहा था। अंत में कहा गया है कि इस एकरारनामा के विरूद्ध कराये गये सभी कार्य पूर्णतः अपनी उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पाया लेकिन यदि ध्यान दिया जाय कि संबंधित कार्य10 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 कब एवं किस परिस्थिति में करवाये गये है तो पूरी दृढ़ता से कहा जा सकता है कि विशेष परिस्थिति में कराये गये कार्य काफी लाभप्रद साबित हुए है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य माह जून में कराया गया है। उक्त अवधि में गंगा का जलस्तर में अमुमन वृद्धि होती है। अतएव LWL सं0 0.80मी0 उपर कार्य कराया जाना परिस्थितिजन्य माना जा सकता है जिसके कारण NC की अधिक खपत होना स्वाभाविक है। क्योंकि NC Base बढते हुए जलस्तर कराना था। जहाँ तक कराये गये कार्य में स्पर सं0-7 क्षतिग्रस्त होने के प्रश्न है तो उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से परिलक्षित होता है कि नदी के प्रकृतिके कारण स्पर सं0-7 क्षतिग्रस्त हुआ है। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में आरोप सं0-4 प्रमाणित नहीं पाया गया है। आरोप 5ः-स्पर सं0-7 के D/S रौक में 51मी0 की लंबाई में कराये गये NC Base Slip कर सिंक कर जाने एवं इसे दोबारा ठीक कराने के संबंध में मुख्य अभियंता द्वारा आदेश दिया गया कि एकरारनामा के तहत किसी तरह के Damage का सुधार संवेदक को अपने Cost पर कराना है। उक्त दिशा निदेश का अनुपालन नहीं हो सका तथा उक्त राशि की वसूली संवेदक से किया जाना परिलक्षित नहीं होता है जो एक अनियमित भुगतान का मामला बनता है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 9.0.0(vi) से स्पष्ट होता है कि प्रश्नगत कार्य के तहत स्पर सं0-7 के स्थल पंजी पर दिनांक 11.06.2014 में अंकित किया गया है कि D/s रौंक में 51मी0 की लंबाई में NC Base Slip का सिंक कर गया है। इस दुबारा ठीक कराने के संबंध में मुख्य अभियंता द्वारा आदेश दिया गया कि एकरारनामा के तहत Damage का सुधार संवेदक को अपने cost पर करना है परन्तु लेयिंग पंजी एवं मापपुस्त से स्पष्ट होता है कि उक्त निदेश/आदेश का अनुपालन लंबित है। अतएव संबंधित मुख्य अभियंता के स्तर पर एक कमिटि गठित कर सिंक हुए NC Base की मात्रा का आकलन कराकर तदनुसार आकलित मात्रा को पूरे मात्रा में से घटाकर भुगतान करने का सुझाव दिया गया है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि मुख्य अभियंता के आदेश के आलोक में सिंक किये हुए NC Base को पुर्नस्थापित करने में उपयोग में लाये गये NC की मात्रा को तृतीय विपत्र से इस मद में किये गये कुल कार्य की मात्रा में से घटाकर ही अवशेष NC की मात्रा का ही भुगतान किया गया है। यह कटौती उड़नदस्ता जाँच के पूर्व ही भुगतान किये गये तृतीय विपत्र में ही कर ली गयी थी। इस प्रकार किसी तरह का अनियमित भुगतान नहीं किया गया है। मापपुस्त 1096 के पेज सं0-45 से स्पष्ट होता है कि NC Base बनाने में NC की कुल खपत मात्रा 39474 अदद में से 204 अदद NC (Restoration of damage) को घटाकर कुल 34270 अदद NC का भुगतान तृतीय चालू विपत्र के माध्यम से किया जाना परिलक्षित होता है। आरोप 6ः- कार्य में कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को विभागीय सामग्री यथा पोलीमर रोप गैबियन (1.8 x 1.8 x 0.5m) 1000 अद्‌द तथा बोल्डर 233.51 घनमीटर दिया जाना परिलक्षित है। मापपुस्त में अंकित द्वितीय विपत्र में मेमों से पहले विभागीय सामग्री दिये जाने का उल्लेख है परन्तु उक्त सामग्री की वसूली अथवा नियमानुसार राशि की कटौती किये जाने का कोई उल्लेख नहीं है। इस प्रकार संवेदक को अधिकाई भुगतान होना परिलक्षित है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.0.0 (LL), 8.0.0(4) एवं 9.0.0 (vii) से स्पष्ट है कि कार्य में कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को विभागीय सामग्री के रूप में 100 अद्‌द पोलिमर रोप गैबियन तथा 233.51 घनमीटर बोल्डर दिया गया है जिसकी वसूली द्वितीय चालू विपत्र तक किया जाना परिलक्षित नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि कार्य के कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री यथा 100 अद्‌द पोलिमर रौप गैबियन तथा 233.51 घनमीटर बोल्डर दिया गया था, जिसकी वसूली चतुर्थ विपत्र से नियमानुसार 233.51 घनमीटर बोल्डर की कीमत 4,21,696/-घटाकर ही संवेदक को भुगतान किया गया है तथा 1000 अद्‌द पोलिमर रोप गैबियन भी संवेदक द्वारा दिनांक 16.03.2015 को विभागीय प्रमंडलीय गोदाम में लौटा दिया गया। मापपुस्त सं0-1096 मेें तैयार किये गये चतुर्थ चालू विपत्र के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री के रूप में 233.51 घनमीटर की वसूली 1805.90/M3 की दर से कुल 421696/- रूपये की वसूली दिनांक 23.03.2015 को किया गया है तथा संवेदक को दिये गये 1000 अदद पालिमर रोप गैबियन को संवेदक द्वारा दिनांक 25.03. 2015 को प्रमंडलीय गोदाम में वापस भी दिया जाना परिलक्षित होता है। संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री के रूप में 233.51 घनमीटर बोल्डर एवं 1000 अद्‌द पोलिमर रोप गैबियन की वसूली हो जाने से आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है हालांकि इसकी वसूली उड़नदस्ता के जाँच के बाद में किया गया है, जिससे गलत मंशा परिलक्षित होता है। ऐसी स्थिति में उड़नदस्ता के जाँच के पूर्व नहीं करने के लिये आरोपित पदाधिकारी को कुछ हद तक दोषी माना जा सकता है। उपर्युक्त विभागीय समीक्षा के आलोक में श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा, तत0 कनीय अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बौंसी के विरूद्ध गठित आरोप सं0-1, 2, 3, 4 एवं 5 प्रमाणित प्रतीत नहीं होता है परन्तु आरोप सं0-6 यथा कार्य के दौरान संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री की वसूली में बरती गयी उदासीनता के लिए कुछ हद तक दोषी माने जा सकते हैं। उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा, तत0 कनीय अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बौंसी को निम्न दण्ड देने का निर्णय सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिया गया है।

"निन्दन" (आरोप वर्ष 2014-2015)।11 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा, तत0 कनीय अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बौंसी को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है।

"निन्दन" (आरोप वर्ष 2014-2015)।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

7 अगस्त 2019

सं0 22नि0सि0(भाग0)-09-07/2015/1684--श्री अवधेश कुमार झा (आई0डी0-3219), तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, समग्र योजना अन्वेषण एवं प्रोजेक्ट प्रीपरेशन मंडल, बौंसी के विरूद्ध बाढ़ 2014 पूर्व एकरारनामा सं०-3SBD/2014-15 के तहत एजेण्डा संख्या-122/319, 122/320 एवं एजेण्डा संख्या-122/322 के अन्तर्गत कराए गए कार्यों में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से करायी गयी। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर किए जाने के उपरांत प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2516, दिनांक 07.12.2018 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया।

श्री अवधेश कुमार झा, तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण के उत्तर की समीक्षा सक्षम प्राधिकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत निम्नलिखित तथ्य पाए गए :- आरोप 1ः- प्रश्नगत कार्य के तहत मिट्‌टी भराई कार्य में नियमानुसार Settlement की कटौती नहीं करना, जबकि

(cid:2869)

एकरारनामा के अनुसार राजस्थानी ट्रैक्टर से कराये गये मिट्‌टी भराई काय में 𝑡ℎ तथा Excavator/Tripper के प्रयोग

(cid:2876)

(cid:2869)

(cid:2869)(cid:2871)

से याँत्रिक विधि से मिट्‌टी भराई कार्य जिसका Compaction 90% at OMC पर किया गया है, से Settlement की कटौती की जानी है। उक्त से स्पष्ट है कि नियम तथा एकरारनामा के विरूद्ध मिट्‌टी भराई कार्य में अधिकाई भुगतान किये जाने से संबंधित है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.0(K), 8.0.0(D) तथा 9.0.0(iii) एवं (v) से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य के तहत मिट्‌टी भराई कार्य में Settlement allowance में लिये deduction नहीं किया गया है जबकि राजस्थानी (cid:2869)

ट्रैक्टर से मिट्‌टी भराई कार्य में 𝑡ℎ तथा याँत्रिक विधि से मिट्‌टी भराई जिसका Compaction 90% at OMC पर किया (cid:2876)

(cid:2869)

गया है, से Settlement की कटौती एकरारनामा के अनुसार किया जाना है। उड़नदस्ता द्वारा मत दिया गया है कि (cid:2869)(cid:2871)

आकलित मिट्‌टी भराई की मात्रा में से Settlement की कटौती अंतिम विपत्र से किया जाना आवश्यक है, जिससे विभाग को वित्तीय क्षति नहीं हो। उपरोक्त आरोपित पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि उड़नदस्ता के जाँच तिथि यथा दिनांक 12.03.2015 के पूर्व तृतीय विपत्र के माध्यम से दिनांक 07.02.2015 को संवेदक को मिट्‌टी भराई कार्य में आवश्यक Settlement की कटौती का ही भुगतान किया गया है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता द्वारा द्वित्तीय विपत्र तक किये गये भुगतान की जाँच की गयी है। मापीपुस्त सं0-1105 से स्पष्ट है कि तृतीय चालू विपत्र में याँत्रिक विधि से ढुलाई गयी मिट्‌टी भराई (cid:2869)

(cid:2869)

कार्य में 𝑡ℎ एवं राजस्थानी ट्रैक्टर से भराई की गई मिट्‌टी भी मात्रा में

(cid:2869)(cid:2871)

(cid:2876)

𝑡ℎ Settlement की कटौती की गयी है। तृतीय चालू विपत्र का भुगतान दिनांक 23.03.2015 को किया गया है। चूँकि तृतीय चालू विपत्र से मिट्‌टी भराई कार्य मद में वाँछित Settlement की कटौती कर भुगतान किया गया है ऐसी स्थिति में Settlement की कटौती नहीं कर अधिकाई भुगतान का मामला नहीं पाया गया। आरोप 2ः-कार्य में प्रयुक्त किये गये जियो बैग की गुणवत्ता की जाँच विभागीय प्रयोगशाला, खगौल से भौतिक जाँच कराया जाना है तथा विभागीय निदेश के आलोक में तकनीकी विशिष्टियों की जाँच हेतु नमूना संग्रह कर CWPRS, Pune से कराकर ही अंतिम विपत्र का भुगतान किया जाना है। जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि मुख्य अभियंता, भागलपुर के पत्रांक-2845, दिनांक 11.09.2014 द्वारा जियो बैग का नमुना CWPRS, Pune को भेजा गया है; परन्तु दिनांक 12.03.2015 तक उड़नदस्ता को जाँच प्रतिवेदन नहीं दिया गया, जो मामला को संदिग्ध बनाता है कि कार्य में प्रयुक्त जियो बैग विशिष्टि के अनुरूप था अथवा नहीं जबकि भुगतान प्रावधान के अनुरूप किया गया है। अतएव अनियमित भुगतान होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 8.0.0(a) (vi) एवं (vii) से स्पष्ट है कि जियो बैग के तकनीकी विशिष्टि का जाँचफल प्राप्त नहीं होने के कारण द्वितीय चालू विपत्र से विभागीय निदेशानुसार आवश्यक कटौती की गयी है एवं कंडिका-9.0.0 (ix) में जियो बैग के पूर्ण भुगतान CWPRS, Pune से जाँचफल के फलाफल के आधार पर करने की अनुशंसा की गयी है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि उड़नदस्ता जाँच की तिथि दिनांक 12.03.2015 तक CWPRS, Pune से जाँचफल कार्यालय को प्राप्त नहीं था। जियो बैग का जाँचफल मुख्य अभियंता के पत्रांक-980, दिनांक 13.03.2015 तथा अधीक्षण अभियंता के पत्रांक-401, दिनांक 21.03.2015 से प्रमंडल को प्राप्त हो सका। फलतः उड़नदस्ता दल को उक्त12 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 जाँचफल नहीं दिया जा सका। जियो बैग का जाँचफल प्राप्त होने के पूर्व विभागीय पत्रांक-384, दिनांक 17.02.2014 के आलोक में जियो बैग से संबंधित कार्यों का भुगतान किया गया। जिसमें विभागीय निदेशानुसार गुणवत्ता जाँच हेतु 20% राशि विपत्र से काटकर रखी गयी थी जिसकी कुल राशि रु0 66,37,456.00/- मात्र है। विभागीय पत्रांक-384, दिनांक 17.02.2014 के कंडिका (iv) से स्पष्ट होता है कि जियो बैग के जाँचफल प्राप्त होने के प्रत्याशा में संबंधित कार्यपालक अभियंता को उक्त सामग्री से संबंधित कार्यों की राशि का 20% की कटौती संबंधित संवेदक के विपत्रों से करने का निदेश है जो मापपुस्त सं0-1096 से स्पष्ट है। जियो बैग के गुणवत्ता जाँच हेतु 20% के रूप में कुल रु0 22,49,550.00/- की कटौती की गयी है तथा मुख्य अभियंता के पत्रांक-980, दिनांक 17.03.2015 से स्पष्ट है कि बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के अन्तर्गत बाढ़ 2014 के पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्यों के तहत उपयोग किये गये जियो बैग का गुणवत्ता जाँचफल CWPRS, Pune से प्राप्त होने के पश्चात विभागीय पत्रांक-384, दिनांक 17.02.2014 के कंडिका (v) में निहित निदेश के आलोक में गठित समिति द्वारा एक प्रतिवेदन दिया गया है। उक्त प्रतिवेदन के कंडिका 1.3 में अंकित है कि CWPRS, Pune से प्राप्त जाँचफल में 9 Particular बिन्दुओं को शामिल किया गया है प्रत्येक बिन्दु पर जाँचफल अस्वीकार रहने पर 20/9=2.229% कटौती कराने का समिति द्वारा निर्णय लिया गया। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में आरोप सं0-2 प्रमाणित नहीं पाया गया। आरोप 3ः-विभागीय नियमानुसार कार्य में प्रयुक्त बोल्डर से संबंधित M&N का सत्यापन कराकर ही भुगतान की कार्रवाई किया जाना है परन्तु प्रश्नगत कार्य को कुल 2349.41 घनमीटर बोल्डर के उपयोग होने के बावजूद बिना M&N Form के सत्यापन कराये ही अनियमित ढंग से भुगतान की कार्रवाई किया जाना विभागीय निदेशों का उल्लंघन करने से संबंधित है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.0.0(t) से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य में कुल 2349.40 घनमीटर बोल्डर का उपयोग किया गया है। उक्त बोल्डर के ढुलाई एवं खपत से संबंधित चालान एवं M&N Form का सत्यापन नहीं कराया जा सका है एवं भुगतान से पूर्व समेकित/प्रयुक्त बोल्डर की मात्रा के लिये जिला खनन विभाग से M&N का सत्यापन कराने की अनुशंसा की गयी है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि कार्य पूर्ण होने के बाद भी भुगतान की गयी प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र में बोल्डर का भुगतान नहीं किया गया है तृतीय विपत्र जो दिनांक 07.02.2015 को भुगतान की गयी है उसके पूर्व ही संवेदक के द्वारा उपयोग में लाई गयी बोल्डर का चालान एवं M&N Form समर्पित किया गया था जिसके आधार पर तृतीय विपत्र से किया गया भुगतान में इस में सत्यापन हेतु 50% की राशि कुल रु0 34,22,609.00/- की कटौती कर ली गयी है जिसकी पुष्टि मापपुस्त 1096 से होती है। इन लोगों द्वारा यह भी कहा गया है कि सहायक खनन पदाधिकारी पाकुड़, झारखंड ने अपने पत्रांक-254, दिनांक 25.03.2015 से सूचित किया है कि वर्ष 2014-15 में इसमाईलपुर बिन्द टोली स्थल पर सम्पादित कार्य में प्रयुक्त कुल 81,500 घनफीट बोल्डर का उपयोग इस जिले के वैध खनन पदाधिकारियों से क्रय कर किया गया है। चूँकि कार्य में प्रयुक्त बोल्डर का सत्यापन जिला खनन पदाधिकारी, पाकुड़ से करा लिया गया अतएव M&N Form सत्यापन नहीं कराने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है। आरोप 4ः-प्राक्कलन के विरमित प्रश्नगत कार्य LWL से 0.80मी0 उपर जल स्तर पर कराये जाने से संबंधित है जिसके कारण नोज भाग में गैबियन का कार्य 12मी0 के जगह पर अधिकतम 9.0मी0 यो उससे कम चौड़ाई में कराया जाना परिलक्षित है। इस प्रकार NC का कार्य ज्यादा कराना अर्थात Water Level बढ़ने के कारण NC Base के कार्य में प्रावधान से अधिक व्यय किया गया साथ ही गैबियन NC/BA Wire Crate वाँछित चौड़ाई से कम चौड़ाई में कार्य होने के कारण स्पर सं0-7 का कार्य कारगर साबित नहीं हुआ एवं ज्यादा भाग ध्वस्त हो गया एवं अन्य भाग में से कराये गये कार्य अपने उद्‌ेश्य की पूर्ति नहीं कर पाया। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका-8.0.0(c) से स्पष्ट होता है कि प्राक्कलन में प्रावधान के अनुरूप प्रश्नगत कार्य LWL (24.0मी0) पर लगभग 12मी0 NC Base के उपर 10.80मी0 चौड़ाई में गैबियन से कार्य कराना था। परन्तु कार्य लगभग 24.80मी0 जलस्तर पर नोन भाग में गैबियन का कार्य 9मी0 या उससे कम चौड़ाई से कराया गया। फलतः अधिक जल स्तर पर NC Base बनाने के कारण NC में बालू भरे बैग की खपत ज्यादा करना पड़ा। साथ ही गैबियन का कार्य वांछित चौड़ाई से कम चौड़ाई में कराने के कारण स्पर सं0-7 पर कार्य पूर्णतः कारगर नहीं हो सका एवं ज्यादा भाग ध्वस्त हो गया। आरोपित पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि इस कार्य की प्रशासनिक स्वीकृति दिनांक 24.04.2014 को प्राप्त हुआ, जिसके आलोक में निविदा निष्पादनोपरांत दिनांक 29.05.2014 को कार्य आवंटित किया गया तथा कार्यावंटन के पश्चात संवेदक के साथ दिनांक 30.05.2014 को एकरारनामा सम्पन्न करते हुए दिनांक 30.05.2014 को कार्यादेश निर्गत किया गया। विभाग इस सत्य को जानते हुए कि जून माह में गंगा नदी का जल स्तर अपने जल स्तर (LWL) से उपर रहता है कार्यावंटन दिनांक 29.05.2014 को किया गया फलतः स्थल की गंभीरता एवं संवेदनशीलता को देखते हुए दिनांक 30.05.2014 से कार्य कराना पड़ा। इसलिए जून माह में गंगा नदी का जलस्तर LWL से 0.80मी0 उपर पर कार्य कराना स्थल की बाध्यता थी, स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। क्योंकि गंगा का जल स्तर जून में बढ़ने लगता है।13 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 स्पर संख्या-7 के क्षतिग्रस्त होने के संदर्भ में कहा गया है कि स्पर सं0-7 पर नदी की मुख्य धारा Strike कर रही थी जिसके कारण बाढ़ अवधि में क्षतिग्रस्त हुआ है जाँच प्रतिवेदन में कार्य भी उपयोगिता के संदर्भ में कहा गया है कि स्थल जाँच में मूल स्वीकृति प्रावधान के आलोक में कराया गया कटाव निरोधक कार्य के अन्तर्गत स्पर सं0-1, 7, 8, एवं 9 में से केवल स्पर सं0-7 को छोड़कर सभी कार्य Robust एवं Intact दिख रहा था। अंत में कहा गया है कि इस एकरारनामा के विरूद्ध कराये गये सभी कार्य पूर्णतः अपनी उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पाया लेकिन यदि ध्यान दिया जाय कि संबंधित कार्य कब एवं किस परिस्थिति में करवाये गये है तो पूरी दृढ़ता से कहा जा सकता है कि विशेष परिस्थिति में कराये गये कार्य काफी लाभप्रद साबित हुए है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य माह जून में कराया गया है। उक्त अवधि में गंगा का जलस्तर में अमुमन वृद्धि होती है। अतएव LWL सं0 0.80मी0 उपर कार्य कराया जाना परिस्थितिजन्य माना जा सकता है जिसके कारण NC की अधिक खपत होना स्वाभाविक है। क्योंकि NC Base बढते हुए जलस्तर कराना था। जहाँ तक कराये गये कार्य में स्पर सं0-7 क्षतिग्रस्त होने के प्रश्न है तो उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से परिलक्षित होता है कि नदी के प्रकृतिके कारण स्पर सं0-7 क्षतिग्रस्त हुआ है। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में आरोप सं0-4 प्रमाणित नहीं पाया गया है। आरोप 5ः-स्पर सं0-7 के D/S रौक में 51मी0 की लंबाई में कराये गये NC Base Slip कर सिंक कर जाने एवं इसे दोबारा ठीक कराने के संबंध में मुख्य अभियंता द्वारा आदेश दिया गया कि एकरारनामा के तहत किसी तरह के Damage का सुधार संवेदक को अपने Cost पर कराना है। उक्त दिशा निदेश का अनुपालन नहीं हो सका तथा उक्त राशि की वसूली संवेदक से किया जाना परिलक्षित नहीं होता है जो एक अनियमित भुगतान का मामला बनता है। जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 9.0.0(vi) से स्पष्ट होता है कि प्रश्नगत कार्य के तहत स्पर सं0-7 के स्थल पंजी पर दिनांक 11.06.2014 में अंकित किया गया है कि D/s रौंक में 51मी0 की लंबाई में NC Base Slip का सिंक कर गया है। इस दुबारा ठीक कराने के संबंध में मुख्य अभियंता द्वारा आदेश दिया गया कि एकरारनामा के तहत Damage का सुधार संवेदक को अपने cost पर करना है परन्तु लेयिंग पंजी एवं मापपुस्त से स्पष्ट होता है कि उक्त निदेश/आदेश का अनुपालन लंबित है। अतएव संबंधित मुख्य अभियंता के स्तर पर एक कमिटि गठित कर सिंक हुए NC Base की मात्रा का आकलन कराकर तदनुसार आकलित मात्रा को पूरे मात्रा में से घटाकर भुगतान करने का सुझाव दिया गया है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि मुख्य अभियंता के आदेश के आलोक में सिंक किये हुए NC Base को पुर्नस्थापित करने में उपयोग में लाये गये NC की मात्रा को तृतीय विपत्र से इस मद में किये गये कुल कार्य की मात्रा में से घटाकर ही अवशेष NC की मात्रा का ही भुगतान किया गया है। यह कटौती उड़नदस्ता जाँच के पूर्व ही भुगतान किये गये तृतीय विपत्र में ही कर ली गयी थी। इस प्रकार किसी तरह का अनियमित भुगतान नहीं किया गया है। मापपुस्त 1096 के पेज सं0-45 से स्पष्ट होता है कि NC Base बनाने में NC की कुल खपत मात्रा 39474 अदद में से 204 अदद NC (Restoration of damage) को घटाकर कुल 34270 अदद NC का भुगतान तृतीय चालू विपत्र के माध्यम से किया जाना परिलक्षित होता है। आरोप 6ः- कार्य में कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को विभागीय सामग्री यथा पोलीमर रोप गैबियन (1.8 x 1.8 x 0.5m) 1000 अद्‌द तथा बोल्डर 233.51 घनमीटर दिया जाना परिलक्षित है। मापपुस्त में अंकित द्वितीय विपत्र में मेमों से पहले विभागीय सामग्री दिये जाने का उल्लेख है परन्तु उक्त सामग्री की वसूली अथवा नियमानुसार राशि की कटौती किये जाने का कोई उल्लेख नहीं है। इस प्रकार संवेदक को अधिकाई भुगतान होना परिलक्षित है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.0.0 (LL), 8.0.0(4) एवं 9.0.0 (vii) से स्पष्ट है कि कार्य में कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को विभागीय सामग्री के रूप में 100 अद्‌द पोलिमर रोप गैबियन तथा 233.51 घनमीटर बोल्डर दिया गया है जिसकी वसूली द्वितीय चालू विपत्र तक किया जाना परिलक्षित नहीं होता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि कार्य के कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री यथा 100 अद्‌द पोलिमर रौप गैबियन तथा 233.51 घनमीटर बोल्डर दिया गया था, जिसकी वसूली चतुर्थ विपत्र से नियमानुसार 233.51 घनमीटर बोल्डर की कीमत 4,21,696/-घटाकर ही संवेदक को भुगतान किया गया है तथा 1000 अद्‌द पोलिमर रोप गैबियन भी संवेदक द्वारा दिनांक 16.03.2015 को विभागीय प्रमंडलीय गोदाम में लौटा दिया गया। मापपुस्त सं0-1096 मेें तैयार किये गये चतुर्थ चालू विपत्र के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री के रूप में 233.51 घनमीटर की वसूली 1805.90/M3 की दर से कुल 421696/- रूपये की वसूली दिनांक 23.03.2015 को किया गया है तथा संवेदक को दिये गये 1000 अदद पालिमर रोप गैबियन को संवेदक द्वारा दिनांक 25.03. 2015 को प्रमंडलीय गोदाम में वापस भी दिया जाना परिलक्षित होता है। संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री के रूप में 233.51 घनमीटर बोल्डर एवं 1000 अद्‌द पोलिमर रोप गैबियन की वसूली हो जाने से आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है हालांकि इसकी वसूली उड़नदस्ता के जाँच के बाद में किया गया है, जिससे गलत मंशा परिलक्षित होता है। ऐसी स्थिति में उड़नदस्ता के जाँच के पूर्व नहीं करने के लिये आरोपित पदाधिकारी को कुछ हद तक दोषी माना जा सकता है।14 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उपर्युक्त विभागीय समीक्षा के आलोक में श्री अवधेश कुमार झा, तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के विरूद्ध गठित आरोप सं0-1, 2, 3, 4 एवं 5 प्रमाणित प्रतीत नहीं होता है परन्तु आरोप सं0-6 यथा कार्य के दौरान संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री की वसूली में बरती गयी उदासीनता के लिए कुछ हद तक दोषी माने जा सकते हैं। उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री अवधेश कुमार झा, तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया को निम्न दण्ड देने का निर्णय सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिया गया है।

"निन्दन" (आरोप वर्ष 2014-2015)। सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री अवधेश कुमार झा, तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है।

"निन्दन" (आरोप वर्ष 2014-2015)।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

7 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(पट0)-03-09/2017/1685--श्री राजीव नंदन मौर्य, सहायक अभियन्ता (निलंबित) आई0डी0 सं0-3498, मुख्यालय, मुख्य अभियन्ता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर द्वारा अपने नियमित प्रोन्नति को रद्द किये जाने के मामले को माननीय सर्वोच्च न्यायालय में नये तथ्यों के साथ जिसमें अपने आप को बिहार राज्य में जन्म एवं लालन-पालन के आधार पर बिहार राज्य के आरक्षित श्रेणी में घोषित किये जाने के संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं पटना उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निदेश के आलोक में श्री मौर्य के जन्म, निवास एवं जाति प्रमाण पत्र को सक्षम प्राधिकार द्वारा जाँचोपरांत उन सभी प्रमाण पत्रों को फर्जी पाया गया तथा उन प्रमाण पत्रोें को रद्द करते हुए श्री मौर्य के विरुद्ध भा0द0वि0 की धारा 420-467/468/471 के तहत गाँधी मैदान थाना, पटना में प्राथमिकी सं0-266/2017 दर्ज की गई है। श्री मौर्य द्वारा पदीय गरिमा को धूमिल करते हुए सरकारी कार्यालयों को धोखे में रखकर स्वंय के शपथपत्र के आधार पर बिहार राज्य से जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र एवं आवासीय प्रमाण पत्र प्राप्त करने तथा इन फर्जी प्रमाण पत्रों को माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष शपथ पत्र के माध्यम से साक्ष्य के रुप में दायर किये जाने के साजिशपूर्ण एवं धोखाधड़ी के कृत के चलते बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 9 (1) (ग) के प्रावधान के तहत इन्हें विभागीय अधिसूचना सं0-1099 दिनांक-06.07.17 द्वारा अगले आदेश तक निलंबित किया गया।

श्री मौर्य के विरुद्ध उपर्युक्त आरोपों की गंभीरता को देखते हुए विभागीय अधिसूचना सं0-1100 दिनांक-07.07.2017 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। अपर सचिव-सह-संचालन पदाधिकारी, जल संसाधन विभाग के पत्रांक-157/डी0 दिनांक-31.10.17 द्वारा जाँच प्रतिवेदन प्राप्त हुुआ जिसमें श्री मौर्य के विरुद्ध अधिरोपित सभी आरोपों को पूर्णतया प्रमाणित पाया गया।

संचालन पदाधिकारी द्वारा प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत प्रमाणित सभी आरोपों के लिये बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के संगत प्रावधानों के तहत श्री मौर्य से द्वितीय कारण पृच्छा की गई। इसके अनुपालन में श्री मौर्य द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण अस्पष्ट रहने पर पुनः स्पष्ट जवाब समर्पित करने हेतु निदेशित किया गया। परंतु श्री मौर्य द्वारा स्पष्ट जवाब विभाग को समर्पित नहीं किया गया और ना ही कोई ऐसा तथ्य अंकित किया गया जिसमें आरोपों के बचाव एवं साक्ष्य से संबंधित तथ्य हो।

श्री मौर्य के विरूद्ध गठित आरोप, संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जांच प्रतिवेदन एवं श्री मौर्य द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण के समीक्षोपरांत पाया गया कि श्री मौर्य द्वारा अनैतिक कार्य किया गया जो सरकारी सेवक के लिये अशोभनीय है। उनका यह आचरण कर्त्तव्य के प्रति प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। श्री मौर्य के उक्त कृत्य से जल संसाधन विभाग, बिहार एवं राज्य सरकार की छवि धूमिल हुई। श्री मौर्य का यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के धारा-3 के प्रावधानों के प्रतिकूल है। अतएव श्री मौर्य सरकारी सेवा में बनाये रखने योग्य नहीं है।

अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा आरोपित पदाधिकारी श्री राजीव नंदन मौर्य, निलंबित सहायक अभियन्ता के विरुद्ध गठित आरोप, स्पष्टीकरण एवं जांच प्रतिवेदन की समीक्षा के उपरांत श्री मौर्य को आदेश की निर्गत तिथि से सेवा से बर्खास्तगी का दण्ड अधिरोपित करने का विनिश्चय किया गया।

विभागीय पत्रांक-1373 दिनांक-20.06.18 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग से श्री मौर्य के विरुद्ध विनिश्चित दण्ड पर परामर्श की मांग की गई। आयोग के पत्रांक-931 दिनांक-06.07.18 द्वारा विभागीय प्रस्तावित दण्ड प्रस्ताव पर आयोग की पूर्ण पीठ की सहमति विभाग को संसूचित की गई।

उक्त प्रस्तावित दण्ड पर माननीय विभागीय मंत्री, माननीय मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद का अनुमोदन प्राप्त है। अतः श्री राजीव नंदन मौर्य, सहायक अभियन्ता (निलंबित) आई0डी0 सं0-3498, मुख्यालय, मुख्य अभियन्ता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर को विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक 1649, दिनांक 30.07.2018 द्वारा आदेश की निर्गत तिथि से सेवा से बर्खास्तगी का दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया गया।15 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री राजीव नन्दन मौर्य, सहायक अभियंता (सेवा से बर्खास्त) द्वारा पत्रांक-18, दिनांक 21.08.2018 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी विभाग को समर्पित किया गया है। श्री मौर्य द्वारा अपने पुनर्विलोकन अर्जी में अपने ऊपर अधिरोपित दण्ड को समाप्त करने का अनुरोध किया गया है, जो निम्नवत है -

1. उनका कथन है कि आरोप पत्र गठित करने के पहले आरोप से संबंधित बिन्दुओं पर कारण पृच्छा नहीं किया गया।

2. संचालन पदाधिकारी द्वारा विभागीय कार्यवाही के क्रम में वांछित कागजातों को उपलब्ध नहीं कराया गया। 3. श्री मौर्य द्वारा मौखिक बयान देने पर संचालन पदाधिकारी द्वारा नकारा गया। 4. अधिरोपित आरोप को प्रमाणित करने के लिए प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा गवाह उपस्थित नहीं किया गया। 5. अभियोजन गवाह को बिना प्रस्तुत किए ही संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया।

6. गाँधी मैदान थाना, पटना में दर्ज प्राथमिकी संख्या-266/2017 दिनांक 13.05.17 भारतीय दण्ड विधान के धारा 420, 467, 468 एवं 471 में श्री मौर्य को दोषी करार नहीं दिया गया, ऐसी स्थिति में प्रथम दृष्टया प्रतिवेदन के आधार पर श्री मौर्य को दोषी करार नहीं दिया जा सकता।

7. उनके द्वारा गलत सूचना देकर जाति प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किया गया है और न ही गलत शपथ पत्र के आधार पर आवासीय प्रमाण पत्र बनाया गया है।

8. जाति प्रमाण पत्र एवं आवासीय प्रमाण पत्र से संबंधित मामला उच्च न्यायालय, पटना में लंबित है। 9. जाति प्रमाण पत्र एवं आवासीय प्रमाण पत्र से संबंधित जाँच उनके पीछे में किया गया है। जो मन में आया लिख दिया गया, उन्हें मौका नहीं दिया गया।

10. उनका कहना है कि आवासीय प्रमाण पत्र में लिखित पता पर श्री मौर्य 18 वर्षों से रह रहे है। उल्लेखनीय है कि श्री मौर्य के विरूद्ध गठित आरोपों को संचालन पदाधिकारी द्वारा प्रमाणित माना गया है। अद्यतन पुनर्विलोकन आवेदन में कोई ऐसा नया तथ्य श्री मौर्य द्वारा समर्पित नहीं किया गया है जिसके आधार पर पुनः इस मामले पर पुनर्विचार करके उनके दण्ड को संशोधित किया जा सके।

संचालन पदाधिकारी ने आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध लगाए गए चारों आरोपों को प्रमाणित पाया है। आरोपित पदाधिकारी श्री मौर्य से प्रमाणित आरोपों के लिए द्वितीय कारण पृच्छा भी की गई। इन्होंने द्वितीय कारण पृच्छा समर्पित किया, जिसमें उन्होंने कोई ऐसा तथ्य नहीं दिया, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वे निर्दाेष हैं। वस्तुतः श्री मौर्य अभियंत्रण सेवा मेें प्रवेश के समय अपना स्थायी पता-ग्रामपो0-कशिया, जिला-देवरिया, उत्तरप्रदेश राज्य के आरक्षित वर्ग के मूलवासी है, बताया गया था। श्री मौर्य द्वारा अपने पद का दुरूपयोग करते हुए गलत शपथ पत्र के आधार पर अनुमंडल पदाधिकारी, पटना सदर से बिहार राज्य के स्थायी निवासी होने का निवास प्रमाण पत्र कराया गया तथा 'चमार' समुदाय का प्रमाण पत्र प्राप्त किया गया।

उक्त के गहन समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया है और उसकी उच्च स्तरीय समीक्षा के उपरांत आरोपी पदाधिकारी के विरूद्ध दण्ड संसूचित किया गया है। श्री मौर्य के पुनर्विलोकन आवेदन में कोई नया तथ्य नहीं है जिसके आधार पर नये सिरे से उक्त मामले की सुनवाई की जा सके तथा दण्ड संसूचित किए जाने के बिन्दु पर कोई अग्रेतर कार्रवाई की जा सके। अतः श्री राजीव नन्दन मौर्य, सहायक अभियंता (सेवा से बर्खास्त) द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णय से श्री राजीव नन्दन मौर्य, सहायक अभियंता (सेवा से बर्खास्त) को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

8 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(सम0)02-04/2014/1707--श्री सच्चिदानंद सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता (आई0डी0-जे0 4966), बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या-2, झंझारपुर के पद पर पदस्थापित थे तो कमला-बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं कि0मी0 74.00 के पास कुम्हरौल गाँव एवं बौड़ ग्राम के पास दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान आदि आरोपों के लिए प्रथम द्रष्टया दोषी पाये जाने के कारण विभागीय अधिसूचना सं०-1107, दिनांक 16.08.14 द्वारा निलंबित करते हुए आपके विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही में नियुक्त संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-621, दिनांक 22.07.15 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित किया गया। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर किया गया एवं समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए असहमति के बिन्दुओं पर द्वितीय कारण पृच्छा करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया एवं साथ ही निलंबन अवधि डेढ़ साल व्यतीत हो जाने के कारण निलंबन मुक्त करने का भी निर्णय लिया गया।

उक्त के आलोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-755, दिनांक 10.05.16 द्वारा श्री सिन्हा को निलंबन मुक्त किया गया एवं विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 05.05.16 द्वारा असहमति के निम्न बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गयी -16 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 (1) बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर के कार्यक्षेत्राधीन दायाँ कमला बलान तटबंध के कि0मी0 74.80 एवं कि0मी0 70.00 के पास कुम्हरौल गाँव एवं बौड़ ग्राम के पास दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान एवं कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाही। (2) विभागीय निदेशों के अनुरूप तटबंध की गश्ती नहीं करने का आरोप प्रमाणित नहीं माना जा सकता है, लेकिन तटबंध की सुरक्षा में घोर लापरवाही बरतने, दायित्व के निर्वहन में घोर उदासीनता बरतने एवं सुरक्षा हेतु आवश्यक कार्रवाई नहीं करने का आरोप उक्त के आलोक में श्री सिन्हा द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब दिया गया है जो इस प्रकार है :- बिन्दु (1) (i) कमला नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा के फलस्वरूप दिनांक 15.08.14 को नदी का जलस्तर 52.85मी0 हो गया।

(ii) अपने कार्यक्षेत्र 44.00-75.00कि0मी0 के बीच सरकारी जीप BRG-5807 से सघन पेट्रोलिंग कर रहा था। (iii) प्रतिनियुक्त होमगार्ड तटबंध की सुरक्षा हेतु लगाये गये थे। (iv) कि0मी0 48.70 पर संवेदक संतोष कुमार यादव के माध्यम से जलश्राव रोकने का कार्य किया गया। (v) कि0मी0 60.68, 64.00, 67.00, 73.20, 73.40, 73.80, 69.0, 66.0, 70.80, 74.0 पर पाईपिंग पर नियंत्रण एवं कुछ बिन्दुओं पर पुनः नियंत्रण का कार्य श्री योगेन्द्र कुमार, कनीय अभियंता, श्री अशोक कुमार सिन्हा, कनीय अभियंता, श्री मनोज कुमार, कनीय अभियंता, श्री रामपुकार यादव, संवेदक एवं श्री संतोष कुमार यादव, संवेदक से लगातार सम्पर्क किया गया।

(vi) कि0मी0 70.80 पर 15.08.14 के अपराह्‌न में पाईपिंग की सूचना प्राप्त होने पर श्री रामपुकार यादव, संवेदक की मदद से पाईपिंग पर नियंत्रण पा लिया गया था कि एकाएक 5.40 बजे अपराह्‌न में श्री अशोक कुमार सिन्हा, कनीय अभियंता द्वारा कि0मी0 70.80 पर बाँध टूटने की सूचना दी गई। तत्‌क्षण 5. 45 बजे कार्यपालक अभियंता का सूचना दी गई।

(vii) टूटान को बाँधने का पहल किया गया। परन्तु अप्रत्याशित पानी के दबाव के कारण टूटान को रोकना संभव नहीं हो सका।

(viii) राशि 10.00बजे श्री सिन्हा, कनीय अभियंता द्वारा कि0मी0 74.00 पर बाँध टूटने की सूचना दी गई उस वक्त मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता के साथ कि0मी0 64.0 पर था।

(ix) खैरियत प्रतिवेदन लेते हुए एवं कार्यपालक अभियंता से प्राप्त निदेश के अनुसार कार्य कराते रहा। बिन्दु (2) (i) नदी का जलस्तर 52.00मी0 से उपर अथवा नीचे दोनों ही परिस्थिति में सघन पेट्रोलिंग की गईं है। (ii) तटबंध की सुरक्षा हेतु बालू का भंडारण स्वीकृत कार्यक्रम के अनुसार किया गया। (iii) दिनांक 15.08.14 को नीजी मोबाईल से 56(छप्पन) अद्‌द call तटबंध की सुरक्षा हेतु किया गया। संवेदक एवं कनीय अभियंता को बराबर निदेश देता रहा हूँ। (iv) तटबंध के कि0मी0 48.70, 60.80, 64.00, 66.00 69.00, 70.80, 73.20, 73.40 एवं 74.00 पर हो रहे पाइपिंग बिन्दु पर पहुँचकर पाइपिंग को नियंत्रित कराया गया। (v) कमला बलान नदी का जलस्तर खतरे के निशान से सुबह ही पार कर गया था। कार्यपालक अभियंता द्वारा दिये गये निदेश एवं मेरे द्वारा की गई वार्त्ता का साक्ष्य मोबाईल के Call detail से प्राप्त किया जा सकता है। (vi) तटबंध के कि0मी0 70.80 पर टूटान की सूचना एकाएक कनीय अभियंता द्वारा 5.40 बजे अपराह्‌न दिया गया जिसकी सूचना कार्यपालक अभियंता को 5.45 बजे दी गई। (vii) तटबंध के कि0मी0 74.00 पर टूटान की सूचना रात्रि 10.00 बजे कनीय अभियंता द्वारा दी गई। तत्पश्चात उक्त सूचना मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को अवगत करा दिया एवं उस समय उनके साथ कि0मी0 64.00 पर था। (viii) द्वितीय कारण पृच्छा के साथ संलग्न संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में कहीं भी आरोप प्रमाणित नहींं पाया गया है। जाँच पदाधिकारी द्वारा श्री मिथिलेश कुमार सिंह, कार्यपालक अभियंता श्री नवल किशोर सिंह, सहायक अभियंता, श्री दिनेश राय, सहायक अभियंता, श्री योगेन्द्र कुमार, कनीय अभियंता एवं श्री रमेश झा, जीप चालक से लिखित सूचना प्राप्त की गई है। प्राप्त सूचना में लापरवाही, उदासीनता या आवश्यक कार्रवाई नहीं करने का आरोप नहीं है। उक्त के आलोक में श्री सिन्हा से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी, जिसमें निम्न तथ्य पाया गया :- कमला बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं 74.00 पर दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान मामले में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 से कुल चार आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा गठित सभी आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया। परन्तु विभागीय समीक्षोपरांत प्रथम आरोप एवं चौथा आरोप (अंश) प्रमाणित पाया गया। जिसके लिए विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 05.05.16 से द्वितीय कारण पृच्छा की गई। द्वितीय कारण पृच्छा एवं इसके क्रम में आरोपी पदाधिकारी द्वारा दिए गए बचाव बयान से स्पष्ट होता है कि आरोपी पदाधिकारी द्वारा दोनों ही आरोपों के17 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 लिए सदृश बात कही गयी है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान दिये गये बयाव बयान सदृश ही द्वितीय बचाव बयान में तथ्य अंकित किया गया है। अर्थात कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री सिन्हा के विरूद्ध दायाँ कमला बलान तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं कि0मी0 74.0 पर दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान एवं कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाही बरतने, दायित्व के निर्वहन में घोर उदासीनता बरतने एवं सुरक्षा हेतु आवश्यक कार्रवाई नहीं करने के संबंध में दिया गया द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर स्वीकार योग्य नहीं है। फलस्वरूप श्री सच्चिदानंद सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर को प्रमाणित आरोप के लिए "एक (01) वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" का दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया। उक्त दण्ड निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का एवं बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है।

सरकार के स्तर पर लिए गए उक्त निर्णय के आलोक विभागीय अधिसूचना संख्या-278, दिनांक 09.02.18 द्वारा श्री सच्चिदानंदन सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर को निम्न दंड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है :-

"एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक।" उक्त दण्ड के आलोक में वित्त (वै0दानि0को0) विभाग, बिहार, पटना द्वारा अपने पत्र के माध्यम से विभाग को सूचित किया गया है कि श्री सच्चिदानन्द सिन्हा की सेवानिवृति की तिथि 31.05.2018 होने के कारण उपर्युक्त दण्ड अप्रभावी हो जा रहा है।

अतएव वर्णित संदर्भ में मामले की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई एवं सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-278, दिनांक 09.02.18 द्वारा निर्गत दण्डादेश को निरस्त करने के साथ हीं विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

उक्त के आलोक में श्री सच्चिदानन्द सिन्हा, तत0 सहायक अभियंत, बाढ़, नियंत्रण प्रमंडल सं0-02, झंझारपुर के विरूद्ध निर्गत दण्ड "एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" को निरस्त किया जाता है। (2) श्री सिन्हा के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित करने का आदेश अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

8 अगस्त 2019

सं0 22नि0सि0(मुक0)कटि0-19-17/2018/1709--श्री मुकेश कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, चन्द्रदेई अनुमंडल, अररिया के विरूद्ध ज्ञात स्त्रोतों से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने के आरोप में आर्थिक अपराध थाना काण्ड सं0 24/13 दिनांक 27.06.2013 धारा-13 (2) पठित धारा-13 (1) ई0 भ्रष्टाचार अधिनियम 1988 दर्ज किया गया। आर्थिक अपराध इकाई, बिहार, पटना से प्राप्त प्रतिवेदन के आधार पर विभागीय अधिसूचना सं0 948 दिनांक 13.08.2013 द्वारा श्री सिंह को निलंबित किया गया एवं विभागीय संकल्प ज्ञापांक 1072 दिनांक 06.09.2013 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गयी। जाँचोपरान्त संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जाँच प्रतिवेदन में आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने के आरोप को प्रमाणित पाया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। सम्यक समीक्षोपरान्त जाँच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक 919 दिनांक 14.07.2014 द्वारा श्री सिंह से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। श्री सिंह से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी, पाया गया कि श्री सिंह द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में मुख्य रूप से कहा गया है कि मेरे द्वारा आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित नहीं किया गया है क्योंकि वे हिन्दू अविभाज्य परिवार के सदस्य है। अविभाज्य परिवार के सम्पत्ति अभी भी परिवार के मुखिया अर्थात उनके पिता के अधीन है और उनके द्वारा ही समय-समय पर इन परिसम्पत्तियों को पुत्र एवं बहुओं में आवश्यकतानुसार वितरित किया गया है। साक्ष्य के रूप में बैलेंस शीट एवं वेतन विवरणी की छायाप्रति संलग्न किया गया। श्री मुकेश कुमार सिंह द्वारा प्राप्त कराये गये बैलेंस शीट में स्वयं एवं पत्नी की कुल आय (69,35,399 1,09,92,086) = 1,79,27,485/- रूपये दर्शाया गया है। आर्थिक अपराध इकाई द्वारा दिये गये सूचना में श्री सिंह द्वारा 23,29,000/- रूपये का क्रय की गयी जमीन का समावेश बैलेंस शीट मेें यह कहकर नहीं किया गया है कि उक्त जमीन उनके नाम से हिन्दू अविभाज्य परिवार के द्वारा खरीद की गई है। श्री सिंह द्वारा मकान किराया एवं उपहार से प्राप्त नगद राशि को स्वयं एवं पत्नी के आय में समावेश किया गया है जबकि उक्त राशि 2006 से 2010 के बीच में ही अर्जन किया गया है। उपरोक्त आय का स्त्रोत अर्जित सम्पत्ति की लागत राशि को पूरा करने के लिए दर्शाया गया है। अर्जित सम्पत्ति की लागत राशि को पूरा करने के लिए घरेलू खर्च तथा व्यक्तिगत खर्च को एक तिहाई से भी कम दिखाया गया है। श्री सिंह एवं उनकी पत्नी द्वारा ली गई नगद राशि के रूप में उपहार को न तो आयकर रिटर्न में दिखाया गया है और न ही इससे संबंधित बैंक लेन देन का साक्ष्य ही दिखलाया गया है।18 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 श्री मुकेश कुमार सिंह की पत्नी के द्वारा मकान किराया से प्राप्त आय की राशि 47,45,123/- रूपये को अंशतः माना जा सकता है परन्तु श्री सिंह एवं उनकी पत्नी के द्वारा नगद राशि के रूप में प्राप्त उपहार की कुल राशि 36.70 लाख रूपये एवं श्री सिंह के नाम से हिन्दू अविभाज्य परिवार के द्वारा श्री सिंह के सेवाकाल के दौरान वर्ष 2006 से 2010 के बीच सात स्थानों पर 23.29 लाख रूपये की क्रय की गई जमीन श्री सिंह के दो भाई एवं चार बहन के होते हुए हिन्दू अविभाज्य परिवार के दौरान सिर्फ श्री सिंह के नाम से किया जाना एवं उपहार के रूप में केवल इन्हें एवं इनकी पत्नी को ही नगद राशि देना को मान्य नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2012-13 की अवधि के लिए श्री सिंह, सहायक अभियंता द्वारा समर्पित चल एवं अचल सम्पत्ति तथा दायित्वों की विवरणी में कई चल एवं अचल सम्पत्ति की जानकारी उनके द्वारा विभाग को न देकर उसे छिपाया गया है। उक्त आरोप के संदर्भ में श्री सिंह द्वारा संचालन पदाधिकारी को समर्पित बचाव बयान में बिहार सरकारी सेवक नियमावली 1976 के मेमो नं0 3/108/76-21734 दिनांक 05.11.1978 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि परिवार के किसी सदस्य (पत्नी) के द्वारा स्वयं अर्जित राशि से क्रय किये गये सम्पत्ति का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है दूसरी तरफ उनके द्वारा चल एवं अचल सम्पत्ति तथा दायित्वों की विवरणी में अपनी पत्नी के नाम से सम्पत्ति अंशतः दर्शाया गया है जो एक दूसरे के विरोधाभाषी है। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री सिंह के विरूद्ध उक्त आरोप को प्रमाणित पाया गया है।

इस प्रकार श्री सिंह से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की सम्यक समीक्षा की गयी। समीक्षोपरान्त उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री मुकेश कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, चन्द्रदेई अनुमंडल, अररिया सम्प्रति सहायक अभियंता (निलंबित), मुख्य अभियंता का कार्यालय, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध, जल संसाधन विभाग, अनिसाबाद, पटना को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के संशोधन से संबंधित नियमावली 2007 के नियम 14 (xi) के तहत ''सेवा से बर्खास्त'' करने का निर्णय लिया गया है।

श्री सिंह को "सेवा से बर्खास्त" करने के प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग से सहमति की मांग किये जाने पर आयोग द्वारा विनिश्चित दण्ड पर सहमति संसूचित की गयी। बिहार लोक सेवा आयोग से सहमति प्राप्त होने के उपरांत श्री सिंह को सेवा से बर्खास्तगी के दण्ड प्रस्ताव पर मंत्रीपरिषद द्वारा स्वीकृति दी गयी। मंत्रिपरिषद के उक्त निर्णय के आलोक में श्री मुकेश कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, चन्द्रदेई अनुमंडल, अररिया को विभागीय अधिसूचना संख्या-1559, दिनांक 10.07.2015 द्वारा सेवा से बर्खास्तगी का दण्ड संसूचित किया गया। विभागीय अधिसूचना संख्या-1559, दिनांक 10.07.2015 द्वारा संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री मुकेश कुमार सिंह द्वारा सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-17665/2015 दायर किया गया, जिसमें माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 08.03.18 को न्याय निर्णय पारित किया गया। उक्त न्याय निर्णय में विभागीय दण्डादेश को निरस्त करते हुए सभी परिणामी लाभों का भुगतान करने का आदेश पारित किया गया है।

सी0डब्लू0जे0सी0 संख्या-17665/2015 में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 08.03.2018 को पारित न्यायादेश के विरूद्ध राज्य सरकार द्वारा एल0पी0ए0 संख्या-1443/2018 दायर किया गया। उक्त एल0पी0ए0 माननीय उच्च न्यायालय में सम्प्रति विचाराधीन है। इसी बीच सी0डब्लू0जे0सी0 संख्या-17665/2015 में पारित आदेश का अनुपालन नहीं होने के आधार पर श्री सिंह द्वारा अवमाननावाद एम0जे0सी0 संख्या-2068/2018 दायर किया गया है। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उक्त अवमाननावाद में दिनांक 23.07.2018 एवं 06.08.2019 को सी0डब्लू0जे0सी0 संख्या-17665/2015 में दिनांक 08.03.2018 को पारित आदेश का अनुपालन करने हेतु आदेश पारित किया गया है।

अतएव माननीय न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में श्री मुकेश कुमार सिंह, तत0 सहायक अभियंता को विभागीय अधिसूचना संख्या-1559, दिनांक 10.07.15 द्वारा संसूचित दण्डादेश को निरस्त करते हुए सेवा में पुनःस्थापित किया जाता है। पुर्नस्थापन आदेश माननीय उच्च न्यायालय, पटना में लंबित एल0पी0ए0 संख्या-1443/2018 में पारित आदेश के फलाफल से आच्छादित होगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

9 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015/1730--श्री मुकेश कुमार सिंह (आई0डी0-4499), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, अररिया को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के अधीन पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में प्राक्कलन की विशिष्टियों एवं गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराने, पक्की संरचनाओं में सीमेंट की मात्रा कम होने, कराये गये मिट्टी कार्य में सेटलमेंट मद में मिट्टी की मात्रा की कटौती किये बगैर संवेदक को भुगतान करने, बिना सर्वेक्षण किये ही स्थल के अनुरूप DPR प्राक्कलन में प्रावधान नहीं करने, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने इत्यादि अन्य आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के फलस्वरूप सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. श्री मुकेश कुमार सिंह को निलंबन अवधि में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 10 के तहत नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।19 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 3. श्री सिंह का निलंबन अवधि में मुख्यालय, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

4. श्री सिंह के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र अलग से निर्गत किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

13 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(सम0)02-06/2019/1731--श्री श्याम कुमार यादव (आई0डी0 सं०-4046), कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या-2, झंझारपुर को उक्त प्रमंडल के अन्तर्गत कटाव बिन्दुओं का निरीक्षण बाढ़ पूर्व नहीं करने, बेतार संवाद द्वारा दिये गये निदेश का अनुपालन नहीं करने, कर्त्तव्य में लापरवाही बरतने एवं विभागीय दिशा-निर्देश का उल्लंघन करने के मामले में सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री यादव का मुख्यालय मुख्य अभियंता का कार्यालय, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, अनिसाबाद, पटना निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री यादव को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री श्याम कुमार यादव के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित कर अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, गोरखनाथ, अपर सचिव।

------

20 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(मुज0)06-07/2016/1753--श्री प्रभु नारायण पाण्डेय (आई0डी0-5255) तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल मोतिहारी को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान वर्ष 2016 में बगहा शहर के नजदीक रतनमाला एवं पुअर हाउस में कराये गये कटाव निरोधक कार्य में बरती गई वित्तीय अनियमितता एवं सरकारी राशि की क्षति के लिए विभागीय ज्ञापांक सं०-1527 दिनांक 27.07.2016 द्वारा श्री पाण्डेय को निलंबित किया गया एवं तदोपरांत विभागीय ज्ञापांक सं०-1586 दिनांक 29.07.16 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 में विहित रीति से प्रपत्र-'क' में उल्लेखित निम्न आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। (1) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 2.0.1 एवं 5.0.0 (1) के क्रम में प्रश्नगत कार्य के स्वीकृत प्राक्कलन के मद सं०-4 एवं 5 (बोल्डर क्रेटिंग एवं बोल्डर पीचींग कार्य) में बोल्डर ढुलाई मद में Loading एवं Unloading के लिए रूपये 145.04 प्रति घनमीटर तथा Stacking कार्य में रूपये 39.73 प्रति घनमीटर का अधिक दर स्वीकृत होने के कारण क्रमशः 7691833/- एवं 2106990/- अर्थात कुल रू0 97,98,824/- का अधिकाई भुगतान होना संभावित प्रतीत होता है। उक्त प्राक्कलन का गठन प्रस्ताव का सर्मपण एवं अनियमित भुगतान में आपकी संलिप्तता रही है।

(2) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 2.0.2 एवं 5.0.0 के उप कंडिका-3 से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य में जंगल सफाई कार्य का प्राक्कलन में प्रावधानित मात्रा 23250 वर्गमी0 का हूबहू मापपुस्त में अंकित कर भुगतान करने की कार्रवाई की गई है। जबकि स्थल पर प्रावधानित लंबाई 1550 मीटर के विरूद्ध 1490 मीटर पाया गया। इस प्रकार जंगल सफाई मद में अधिकाई भुगतान करने के लिये आप दोषी है।

(3) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.0.1 एवं 5.0.0(3) के समीक्षा में पाया गया कि एप्रोन लेईंग का Alignment बिना सक्षम प्राधिकार के स्वीकृत प्राप्त किये ही नदी के किनारे से 2.8मी0 से 6.25मी0 Back Shift कर गलत alignment पर कार्य कराया गया। जिसके कारण ग्रामीणों का आवासीय एवं उपजाऊ भूमि बर्बाद होने के साथ-साथ सरकार के भूमि अधिग्रहण मद एवं फसल मुआवजा मद तथा मिट्‌टी कटाई मद में सरकारी राशि का अपव्यय होना परिलक्षित है। यदि apron laying को बिना back shift किये हुए कार्य कराया जाता तो उपरोक्त अपव्यय को बचाया जा सकता है। परन्तु आपके द्वारा ऐसा नहीं किया गया।

(4) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.03 से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य प्राक्कलन के प्रावधानित के विरूद्ध LWL 80.96 से 0.16मी0 से 0.95मी0 उपर तक कार्य प्रारंभ कराया गया है जिसके कारण एप्रोन सिंक करने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस स्थिति में इस योजना पर किया गया व्यय अनुपयोगी होने की प्रबल संभावना बनती है। इस प्रकार न्यूनतम जलस्तर से उपर एप्रोन का कार्य कराया गया।

(5) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 3.0.4 से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता जाँच दल द्वारा स्थलीय जाँच में Boulder Crating कार्य में 20.25 तथा Uncrated Boulder Pitching कार्य में 21.43 प्रतिशत voids पाया गया है, जो निर्धारित मानक 20 प्रतिशत से अधिक है। फलतः अनियमित भुगतान होना परिलक्षित होता है। अतएव न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर भुगतान प्रावधान के अनुरूप कया गया।

(6) जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.0.1 से स्पष्ट है कि स्थलीय जाँच में एकरारनामा में प्रावधानित विशिष्टि के विरूद्ध Boulder Crating कार्य में Oversize Boulder 39.95% एवं Under Size Boulder 48.22% पाया गया उसी प्रकार पैनल में Uncrated Boulder Pitching कार्य में Over Size Boulder 49.37% तथा Under sizeबिहार गजट, 12 फरवरी 2020 20 boulder 30.22% पाया गया। इससे परिलक्षित है कि विशिष्टि के अनुरूप कार्य नहीं कराया गया परन्तु भुगतान प्रावधान के अनुरूप करने के फलस्वरूप अधिकाई भुगतान होना स्पष्ट रूप से परिलक्षित है।

(7) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4.0.2 से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता के स्थलीय जाँच में स्वीकृत प्राक्कलन/एकरारनामा में प्रावधानित G.I. Binding Wire का व्यवहार क्रेट बांधने में नहीं किया गया है। फलतः B.A Wire Crate के साईज सिंक कर छोटा हो गया है। अतएव बिना G.I. Binding wire के उपयोग किये ही निम्न विशिष्टि के कार्य कराने के बावजूद भुगतान एकरारित दर से करने के कारण इस मद में अधिकाई भुगतान परिलक्षित है। (8) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4.0.3 से स्पष्ट है कि स्थलीय जाँच में Boulder Crating एवं Boulder Pitching कार्य में एकरारनामा तथा GOI, CWC द्वारा प्रकाशित Hand Book के पारा 5.3.4 के विपरीत भरे हुए बोल्डर तथा कम मोटाई के समतल (Flat) Boulder का उपयोग कर न्यून विशिष्टि का बोल्डर कार्य उपयोग कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराया गया है एवं भुगतान प्रावधान के अनुरूप होने के फलस्वरूप अधिकाई भुगतान होना परिलक्षित है। (9) जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.0.4 एवं 5.0.0 के उप कंडिका 10 से बोध होता है कि एप्रोन एवं स्लोप के मिलन बिन्दु पर 1 फीट का गैप रह गया है, जिसके कारण अभी से ही बिना कटाव के ही स्लोप पिचींग फिसल रहा है एवं कुछ भाग के स्लोप पीचींग क्षतिग्रस्त भी हो गया है। जिसके कारण सरकार को एक बड़ी राशि का अपव्यय होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। अतएव इस प्रकार के अनियमित कार्य कराकर सरकारी राशि की अपव्यय की गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी के क्रम में ही श्री पाण्डेय के दिनांक 31.01.2017 को सेवानिवृत होने के कारण श्री पाण्डेय को निलंबन से मुक्त करते हुए उनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय पत्रांक-475, दिनांक 06.04.17 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) में सम्परिवर्तित किया गया।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री पाण्डेय, सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप सं०-03, 04, 05, 06, 07, 08 एवं 09 को पूर्णतः प्रमाणित एवं आरोप सं०-02 को अप्रमाणित तथा आरोप सं०-1 में 76,91,833/- (छिहत्तर लाख इकानवे हजार आठ सौ तैतीस) रूपये के अधिकाई भुगतान को प्रमाणित पाया है। इसी आरोप में रू0 21,06,990/- रूपये के अधिकाई भुगतान को अप्रमाणित पाया गया है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई । समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति श्री पाण्डेय को विभागीय पत्रांक-495, दिनांक 10.04.2017 द्वारा उपलब्ध कराते हुए द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

उक्त के आलोक में श्री पाण्डेय, सहायक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 19.05.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया, जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित बाते कही गई हैं :-

आरोप सं०-1- 69,22,650/- रूपये की अनियमित भुगतान संबंधी आरोप को प्रमाणित पाये जाने हेतु संचालन पदाधिकारी कई तथ्यों का उल्लेख किया गया है जो निम्नवत है :-

(क) प्राक्कलन में 2 times loading or unloading के लिये 2x143.60 का प्रावधान किया जाना जो Font end loader से Loading & Unloading by tripper का है। उसमें मैनुअल लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान नहीं रहने के कारण मेरा बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं माना गया है। जबकि मैनुअल लोडिंग एवं अनलोंिडंग किया गया है।

(ख) मेरे द्वारा पूरक बचाव बयान में मिर्जापुर एवं बेतिया स्टेशन पर मात्र Manual Means से लोडिंग एवं अनलोडिंग करने के प्रावधान के साथ दर विशलेषण एवं तुलनात्मक विवरणी के माध्यम से सं० 16,07,736/-राशि की बचत को मात्र इस आधार पर सही नहीं माना गया कि गणना सही प्रतीत नहीं होता है।

(ग) उड़नदस्ता संगठन द्वारा मात्र एक ही बार लोडिंग एवं अनलोडिंग को सही बताया जाना। (घ) अभियंता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना द्वारा मंतव्य दिया जाना कि ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त प्राक्कलन में बोल्डर की ढुलाई में Originating Station एवं Destination Station का क्रमशः मात्र एक ही लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान होना चाहिये।

आरोप को मात्र संभावना के आधार पर प्रमाणित मान लिया गया है। पूर्व के बचाव बयान के कंडिका 1.1.1 (क) को अस्वीकार योग्य माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। रेलवे द्वारा माल ढुलाई हेतु रैंक में 59 बोगी को Standard पाया गया है। प्रति बोगी की क्षमता अधिकतम 66 टन रहने पर एक रैक में 59x66=3894 टन बोल्डर ढुलाई की जा सकती है। इस हिसाब से उक्त स्थल पर कार्य हेतु बोल्डर 106276 टन की ढुलाई हेतु 106276/3894=27 रैक की आवश्यकता होती। प्रति रैक 3894 टन बोल्डर [3894x0.499=1943.106M3]की ढुलाई की जा सकती है। 1943.106M2 को सीधे क्वेरी साईट से 74कि0मी0 दूरी पर स्थित मिर्जापुर रेलवे रैक प्वाईंट पर लाकर 9 घंटे के अन्दर बोगी में लोड करना एवं इसको बेतिया स्टेशन पर पहुँचाने के पश्चात रैक प्वाईंट पर अनलोड कर पुनः 9 घंटे के अन्दर रैक प्वाईंट खाली कर 68कि0मी0 स्थित कार्य स्थल पर पहुँचाना कतई संभव नहीं है। इस स्थिति में निश्चित रूप से यह दण्डात्मक शुल्क का मामला बनता है।

रेलवे द्वारा सामग्री रेल यार्ड में संग्रहन के बाद ही रैक दिया जाता है। पुनः रैक लगने के बाद वहाँ Font end leader से टिपर में लोड करने के पश्चात उसे रैक प्वांइट पर अनलोड कर मैनुअली बोगी में डाला जाना था। उसी प्रकार बेतिया में मैनुअली बोगी से अनलोड कर Front end Loader से पुनः टिपर में डाल कर रैक प्वाईंट को निर्धारित समय में21 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 खाली कराना आवश्यक था। उक्त कारणों से दो लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान प्राक्कलन गठन के समय किया गया था। इस प्रकार मात्र मैनुअल लोडिंग अनलोडिंग का प्राक्कलन में प्रावधान नहीं रहने के कारण मेरे बचाव बयान अस्वीकार करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है।

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि रेल द्वारा बोल्डर ढुलाई मद में दर विशलेषण में Originating एवं destination दोनों ही स्टेशन पर एक-एक बार अर्थात कुल दो बार लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान एवं विवेक एवं व्यवहारिक बाध्यता के अनुसार good intention से किया गया था। जिसे अधीक्षण अभियंता ने अनुमोदन किया एवं मुख्य अभियंता भी सहमत होते हुए तकनीकी स्वीकृति हेतु प्राक्कलन मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध पटना के अनुशंसित किया गया। ततपश्चात मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध, पटना द्वारा उक्त दर विशलेषण को सही मानते हुए प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति दी गयी। जिसके आधार पर पर BOQ की स्वीकृति मुख्य अभियंता, मोतिहारी द्वारा दी गई एवं अनुमोदित परिमाण विपत्र के आधार पर निविदा का निष्पादन किया गया।

आरोप सं०-3-इस बिन्दु को पूर्णतः प्रमाणित पाये जाने का उल्लेख है। जबकि संचालन पदाधिकारी द्वारा विषयांकित कार्य को सही एलाईनमेंट पर कराये जाने संबंधी तथ्य को स्वीकार योग्य माना गया। मात्र रेखांकण की विधिवत स्वीकृत सक्षम प्राधिकार से प्राप्त नहीं किये जाने हेतु ही मुझे दोषी माना गया है।

कार्य प्रारंभ किये जाने के पूर्व संबंधित मुख्य अभियंता से कार्यालय कक्ष में वार्ता के उपरांत एलाइनमेंट का निर्धारण किया गया। कार्य सम्पादन अवधि में मुख्य अभियंता द्वारा एलाइनमेंट पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं किये जाने से उसकी पुष्टि होती है। मेरे उक्त कृत्य से न तो सरकारी राजस्व की क्षति ही हुई है एवं न ही कार्य की गुणवता पर ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है एवं आज की तारीख में भी कार्य पूर्णतः Intact है एवं उद्‌देश्य की पूर्ति कर रहा है।

आरोप सं०-4-आरोप का यह बिन्दु एप्रोन LWL से 0.16मी0 से 0.95मी0 उपर से प्रारंभ किये जाने से संबंधित है। उड़नदस्ता के जाँच के पश्चात एप्रोन के Bottom Level की जाँच कार्य से संबंधित कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा दिनांक 14.08.2016 को की गई एवं अन्तर अधिकतम 0.14मी0 पाया गया। वर्णित स्थिति में संचालन पदाधिकारी से पुनः उड़नदस्ता जाँच कराने का अनुरोध किया गया। परन्तु उड़नदस्ता जाँच में कनीय अभियंता/सहायक अभियंता स्थल पर उपस्थित थे के आधार पर अमान्य कर दिया गया। जबकि उड़नदस्ता जाँच के समय कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता का लेवल लेने में कोई सहभागिता नहीं थी।

आरोप सं०-5-क्रेटेड बोल्डर पिचिंग कार्य में Voids की मात्रा 20प्रतिशत के विरूद्ध 20.25 प्रतिशत पाये जाने से संबंधित है। इस नगन्य अन्तर को मान्य सीमा से अन्दर माना जाना न्यायोचित है।

कार्य में कुल 10814 अद्‌द क्रेटस में से मात्र एक क्रेट की जाँच कर पुरे कार्य के संबंध में अवधारणा बनाया जाना न्यायोचित नहीं माना जा सकता है। क्रेटेड बोल्डर पिचिंग कार्य में यदि जाँचित एवं प्रावधानित Voids में अन्दर का आकलन किया जाय तो यह (20.25-20)=0.25 प्रतिशत आता है। जिसे नगन्य माना जा सकता है।

आरोप सं०-6-यह आरोप विशिष्टि के विरूद्ध बोल्डर क्रेटिंग कार्य में अन्दर साईज एवं ओभर साईज बोल्डर की मात्रा अपेक्षित मात्रा से अधिक पाये जाने से संबंधित है। इस क्रम में पुनः उल्लेखनीय है कि -

(क) अनुसूचित दर में 150mm एवं Below से लेकर 30mm एवं above size का बोल्डर का Basic rate at Quarry site पर समान है। अतः, यदि प्रावधान से छोटे एवं बडे आकार के बोल्डर का उपयोग किये जाने पर भी वित्तयी अनियमितता का मामला नहीं बनता है।

(ख) IS Code 14262-1998 के अनुसार यदि क्रेटेड बोल्डर पीचिग कार्य में बोल्डर का आकार मेस साईज से बड़ा हो तो मान्य किया जा सकता है।

(ग) तकनीकी परीक्षक कोषांग भी क्रेट में Voids की मात्रा नियंत्रित करने के लिए छोटे आकार के बोल्डर के व्यवहार को मान्य बताया गया है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में न्यून विशिष्टि का कार्य कराये जाने का आरोप प्रमाणित माना जाना उचित नहीं है। आरोप सं०-7-यह आरोप क्रेट के बाँधने में GI winding wire के जगह पर क्रेट बुनाई में इस्तेमाल किये जाने वाले 10SWG GI Wire को ही आवश्यतानुसार अधिक लंबाई में छोड़कर फिर उसी से क्रेट को बांधन का कार्य किया गया। क्रेट बांधने का कार्य अकुशल मजदूर द्वारा किया जाता है। लोहे के रौड से क्रेट को कसकर बाँधने में कही-कहीं क्रेट के मेस में मामूली सिकुडन उत्पन्न हो जना स्वभाविक है। उक्त कृत से अधिकाई भुगतान होने जैसी संभावना उत्पन्न होने का कोई प्रश्न नहीं है। कृपया मुक्त करने की कृपा की जाय।

आरोप सं०-8- यह बिन्दु भरे हुए बोल्डर एवं कम मोटाई के समतल बोल्डर कार्य में उपयोग करने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता के निदेश के बाद भी कार्य में भरे एवं समतल बोल्डर का उपयोग किया गया। उल्लेखनीय है कि मुख्य अभियंता दिनांक 01.03.2016 को स्थल निरीक्षण के पश्चात दिये गये निरीक्षण प्रतिवेदन में कही पर भरे पत्थर का स्थल पर पाये जाने का उल्लेख नहीं है। स्थल पर पाये गये कतिपय Heant/Flat बोल्डर को स्थल से हटाने का उनके द्वारा निदेश दिया गया था। जिसका अनुपालन प्रतिवेदन पत्रांक-437 दिनांक 26.03.2016 द्वारा मुख्य अभियंता, द्वारा उपलब्ध करा दिया गया था। इसके पश्चात दिनांक 16.03.2016 एवं दिनांक 17.04.2016 को अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल, मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता द्वारा किये गये स्थल निरीक्षण में कार्य को संतोषप्रद बताया गया है एवं22 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 बोल्डर की गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई है। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी का मंतव्य कि मुख्य अभियंता के निदेश के बावजूद न्यून विशिष्टि के बोल्डर कार्य में प्रयुक्त किया गया है। आधारहीन एवं तथ्य के परे है। आरोप सं०-9-यह आरोप एप्रोन एवं स्लोप के मिलान बिन्दु पर गैप से संबंधित है। नदी के जलस्तर में वृद्धि के पश्चात कहीं-कहीं एप्रोन में मामूली रूप से सेटल होने के फलस्वरूप एप्रोन एवं स्लोप के मिलान बिन्दु पर कहीं-कहीं मामूली गैप होने लगा था। परन्तु कार्य defeat liability अवधि के अन्तर्गत रहने के कारण संवेदक द्वारा तत्क्षण मुख्य अभियंता के दिशा निदेश के अनुरूप सुधारात्मक कार्य अपने खर्च पर ही कर दिया गया था। इसके अतिरिक्त व्यय भी नहीं हुआ है। आज की तिथि में कार्य मूलरूप में विद्यमान है। इसमें किसी प्रकार की सरकारी राशि का अपव्यय नहीं हुआ है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन एवं आरोपी अभियंता श्री पाण्डेय, सहायक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा निम्न तथ्य पाये गये हैं -

आरोप सं० -1 में उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के अनुसार Quarry site से मिर्जापुर स्टेशन एवं बेतिया स्टेशन पर पहुँचाने में प्राक्कलन में प्रावधानित 2 time loading एवं Unloading को अनियमित बताते हुए 2 times के बदले एक बार मिर्जापुर स्टेशन पर लोडिंग एवं एक बार बेतिया स्टेशन पर रैक से Unloading होना बताया गया है तथा इसी आधार पर One time loading एवं Unloading मद में किये गये भुगतान को अधिकाई भुगतान होने का मंतव्य दिया गया है। उक्त आरोप के संदर्भ में श्री सिंह, कनीय अभियंता (निलंबित) का कथन की प्राक्कलन गठन में मेरी कोई संलिप्तता नहीं रही है। क्योंकि मेरी प्रतिनियुक्ति के पूर्व कार्य प्रारंभ था एवं 40 प्रतिशत कार्य हो चुका था एवं एकरारनामा एवं प्राक्कलन के अनुरूप भुगतान करना मेरी बाध्यता थी को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। क्योंकि प्राक्कलन में बोल्डर ढुलाई के दर में अगर कोई त्रुटि थी तो श्री सिंह का दायित्व था कि भुगतान से पूर्व उक्त तथ्यों को उजागर करते हुए आवश्यक अनुमोदन प्राप्त कर भुगतान करते परन्तु इनके द्वारा अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर गलत भुगतान में सहयोग किया जाना परिलक्षित है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य सहमत होते हुए श्री सिंह के विरूद्ध आरोप सं०-1 का अंश यथा बोल्डर ढुलाई मद में कुल 69,22,650/- के अनियमित भुगतान होने में संलिप्तता होने के आरोप को प्रमाणित पाया गया है तथा बोल्डर स्टैकिंग मद में अनियमित भुगतान होने के आरोप को प्रमाणित नहीं माना गया है।

आरोप सं० -3 जो Revetment कार्य का एलाइनमेंट बिना सक्षम पदाधिकारियों से स्वीकृत प्राप्त किये ही नदी के किनारे से Back shift कर गलत एलाइनमेंट पर कार्य कराने के कारण मुआवजा मद तथा मिट्‌टी कटाई मद में सरकारी राशि के अपव्यय होने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा एलाइनमेंट की स्वीकृति सक्षम प्राधिकार यथा मुख्य अभियंता से लेने के आधार पर इस आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है विदित हो कि कि एलाइनमेंट के संदर्भ में अभियंता प्रमुख बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण से आरोपी अभियंता के बचाव-बयान पर मंतव्य की मांग की गई थी। जिसके आलोक में अभियंता प्रमुख अपने मंतव्य में अंंिकत किया है कि बिना सक्षम प्राधिकार से विधिवत स्वीकृत प्राप्त किये ही एलाइनमेंट कार्य कराया गया। उक्त के आलोक में माना जा सकता है कि कार्य सही रेखांकण पर कराया गया है परन्तु रेखांकण के लिये विधिवत स्वीकृत प्राप्त नहीं किया गया है।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव बयान में यही तथ्य उद्धित किया गया है जो इनके अतिरिक्त कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य एवं अभियंता प्रमुख के मंतव्य से सहमत होते हुए बिना सक्षम पदाधिकारी से एलाइनमेंट का अनुमोदन प्राप्त किये ही कार्य कराया जाना स्थापित होता है। अतएव आरोप सं०-3 प्रमाणित होता है।

आरोप सं० -4 जो प्राक्कलन में प्रावधानुसार के विरूद्ध LWL से 0.16मी0 से 0.95 मी0 उपर के लेवल से कार्य प्रारंभ करने के कारण एप्रोन सिंक करने ही प्रबल संभावना होने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने आरोपी का कथन की उड़नदस्ता जाँच केे पश्चात कार्य से संबंधित कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा लेवल की जाँच करने पर मात्र 0.14मी0 का अन्तर है को उड़नदस्ता जाँच के समय कार्य से संबंधित सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता की उपस्थिति में जाँच दल द्वारा लेवल की जाँच किये जाने के आधार पर अस्वीकार योग्य मानते हुए इस आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया कि श्री पाण्डेय द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में वहीं तथ्य उद्धित किया है जो इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी के समक्ष कही गयी थी। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री पाण्डेय को LWL से 0.16मी0 से 0.95मी0 उपर से कार्य प्रारंभ करने के लिए दोषी माना जाता है अतः आरोप सं०-4 प्रमाणित होता है।

आरोप सं० -5 जो बोल्डर क्रेटिंग कार्य के मानक से अधिक Voids पाये जाने के फलस्वरूप न्यून विशिष्टि का कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान होने से संंबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने आरोपी का कथन की वरीय पदाधिकारी द्वारा समय-समय पर निरीक्षण किया गया है एवं उनके द्वारा इस त्रुटियों की ओर इंगित नहीं किया है उक्त कथन को उड़नदस्ता टीम ने क्रेट खोलकर विधिवत Sand replacement method and density volume method से Voids की जाँच की गयी। जाँच Scientific है के आलोक में अस्वीकार योग्य मानते हुए आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी अभियंता द्वारा कहा गया है कि कार्य में प्रयुक्त कुल 10814 अद्‌द क्रेट में से मात्र एक क्रेट जाँच कर पूरे कार्य के संंबंध में अवधारणा बनाया जाना उचित नहीं है को स्वीकार योग्य माना जा सकता है। उनके द्वारा यह भी कहा गया23 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 है कि जाँचित एवं प्रावधानित Voids में अन्तर मात्र 20.25-20.00=0.25 प्रतिशत आता है जिसे मैनुअली कार्य कराने के कारण Voids में यह अन्तर आना स्वभाविक है को आलोच्य कार्य में मैनुअली रूप से कराये गये कुल 10814 अद्‌द क्रेट में मात्र एक क्रेट में Voids की गणना में मात्र 0.84 प्रतिशत अनुमान्य सीमा से अधिक पाये जाने की स्थिति को स्वीकार योग्य माना जा सकता है अतएव आरोप सं०-5 अप्रमाणित होता है।

आरोप सं० -6 जो एकरारनामा/प्राक्कलन के विरूद्ध कार्य में मानक से काफी अधिक मात्रा में अन्डर साईज एवं ओभर साईज बोल्डर का उपयोग कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर अनियमित भुगतान करने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी का कथन की अलग-अलग साईज के बोल्डर का बेसिक रेट अनुसूचित दर तालिका में एक होने के कारण वित्तयी अनियमितता नहीं हुआ है। विभिन्न साईज के बोल्डर के दर एक होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी साईज का बोल्डर का प्रयोग किया जाय। प्राक्कलन/एकरारनामा के प्रावधान के विपरीत न्यून विशिष्टि का कार्य के कारण सिस्टम फेल हो सकता है दर एक होना अलग चीज है। साईज के आधार पर गुणवत्ता अलग महत्व रखता है के आधार पर स्वीकार योग्य नहीं माना गया तथा आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया है बल्कि वही तथ्य को दुहराया गया है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं०-6 को प्रमाणित माना जाता है। आरोप सं० -7 जो प्रावधान के अनुसार बोल्डर क्रेटिंग कार्य में क्रेट बांधने में Binding wire का उपयोग नहीं कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने कहा है कि आरोपी अभियंता का कथन की Binding wire के बदले GI Wire क्रेट के निर्मित तार से क्रेट को खींचकर बाँधने का कार्य किया गया है। फलतः मोटे तौर से गुणवत्ता में सुधार हुआ है को क्रेट में मोटे तार को खींचकर ही बाँधने का भी कार्य उसी तार से किये जाने के कारण क्रेटिंग का साईज में भी कमी हो गयी जो खतरनाक स्थिति है एवं इस आरोप को आरोपी अभियंता द्वारा स्वीकार किया गया है के आधार पर स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। आरोपी अभियंता द्वारा अपने बचाव बयान में वही तथ्य उद्धित किया गया है। जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन में कहा गया था। इसके अतिरिक्त कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। आरोपी का कथन की 12-14Garge के जगह पर SWG GI Wire से बाँधने पर गुणवत्ता प्रभावित नहीं हुआ है को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। क्योंकि उड़नदस्ता जाँच के क्रेट के साईज एवं मेस की संख्या में कमी पायी गयी है इस प्रकार विशिष्टि के अनुरूप कार्य नहीं कराकर प्रावधान के अनुरूप भुगतान किये जाने से अधिकाई भुगतान परिलक्षित होता है। अतएव आरोप सं०-7 प्रमाणित होता है।

आरोप सं० -8 जो बोल्डर पीचींग कार्य में प्रावधान के विपरीत भरे हुए/कम मोटाई बोल्डर का उपयोग कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी का कथन कि कार्य के दौरान गुणवत्ता जाँचफल तथा अधीक्षण अभियंता मुख्य अभियंता तथा अनुवीक्षण दल द्वारा कोई प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज नहीं की गई थी तथा इसमें कोई अनियमितता नहीं हुई है को स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। मात्र कहा गया है कि मुख्य अभियंता के दिनांक 01.03.2016 के स्थल निरीक्षण के पश्चात दिये गये कतिपय Lean/Flat बोल्डर को स्थल से हटवाते हुए अनुपालन प्रतिवेदन पत्रांक-437, दिनांक 26.03.16 से मुख्य अभियंता को दिया गया। इसके पश्चात किसी भी पदाधिकारी के स्थल निरीक्षण में उक्त तथ्यों का उल्लेख नहीं है एवं कार्य में भरे हुए/समतल बोल्डर का उपयोग नहीं किया गया है। जबकि उड़नदस्ता अंचल जाँच प्रतिवेदन में स्पष्ट अंकित है कि एप्रोन के टॉप एवं स्लोप में कहीं-कहीं भरा हुआ एवं कम मोटाई का पत्थर लगा हुआ पाया गया तथा मुख्य अभियंता के निरीक्षण प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि स्थल पर भरे एवं समतल बोल्डर उपलब्ध थे एवं मुख्य अभियंता के निदेश के बावजूद भी कार्य में न्यून विशिष्टि के बोल्डर का उपयोग किया जाना परिलक्षित है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए कार्य में न्यून विशिष्टि के बोल्डर का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान होने के आरोप को प्रमाणित माना गया है। अतः आरोप सं०-08 प्रमाणित होता है। आरोप सं० -9 जो स्लोप एवं एप्रोन के बीच 1 फीट गैप पाये जाने के कारण स्लोप पीचींग कार्य क्षतिग्रस्त होने की संभावना के कारण सरकारी राशि अपव्यय होने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने अपने समीक्षा में कहा है कि आरोपी अभियंता का कथन की नदी के जलस्तर में वृद्धि के कारण गैप परिलक्षित हुआ था। जिसे संवेदक द्वारा Defect Liability Period में सुधार करा लिया गया है। परन्तु कार्य संवेदक द्वारा करवाया गया अथवा नहीं उसका स्पष्ट प्रमाण नहीं होना तथा गैप होना प्रमाणित होने के कारण अस्वीकार योग्य मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी अभियंता श्री पाण्डेय द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया है अतएव श्री पाण्डेय, सहायक अभियंता का बचाव-बयान को संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए अस्वीकार किया जाता है। अतः आरोप सं० -9 प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री प्रभु नारायण पाण्डेय, तत0 सहायक अभियंता, को विभागीय अधिसूचना संख्या-2287, दिनांक 21.12.17 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया।

" पेंशन से 15% की कटौती स्थायी रूप से"।24 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री पाण्डेय, सेवानिवृत सहायक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 26.02.2018 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :- आरोप-1 :- इस आरोप में गलत प्राक्कलन के प्रस्ताव के समर्पण की बात कही गई है फलतः बोल्डर ढुलाई मद में लोडिंग अनलोडिंग मद में कुल 69,22,650/- रूपये का अधिकाई भुगतान होने की संभावना व्यक्त की गई है।

समर्पित प्राक्कलन में समीक्षोपरांत कार्यपालक अभियंता के द्वारा अधीक्षण अभियंता को दिया गया तथा अधीक्षण अभियंता द्वारा जाँचोपरांत मुख्य अभियंता के माध्यम से मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध, पटना को भेजा गया, जिसकी स्वीकृति प्रदान की गयी। तत्पश्चात निविदा की प्रक्रिया अपनाते हुए कार्यपालक अभियंता द्वारा एकरारनामा किया गया। दर विशलेषण के लिये अधीक्षण अभियंंंंंंंंंंंंंंंंंता सक्षम प्राधिकार है। अतः मुझे बलि का बकरा बनाना न्याय संगत नहीं है। आरोप-3 :-एलाईनमेंट की स्वीकृति बिना सक्षम प्राधिकार से प्राप्त किये ही कार्य कराये जाने से किनारे से 2.8मी0 से 6. 25मी0 तक बैंक सिफ्ट का गलत एलाईनमेंट पर कार्य कराने का आरोप तथ्य से परे है। कार्यपालक अभियंता के कार्यालय कक्ष में U/s एवं D/s में पूर्व में कराये गये कार्य के अनुरूप एप्रोन का एलाईनमेंट रखने का निदेश दिया गया तथा स्थल के अनुरूप कार्य कराया गया। कार्य के दौरान अधीक्षण अभियंता, मुख्य अभियंता तथा उड़नदस्ता दल द्वारा कई बार निरीक्षण किया परन्तु इस पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज नहीं किया गया। वस्तुतः एप्रोन निर्माण के क्रम में LWL तक काटी गयी मिट्‌टी को नदी के River edge पर रखा गया था, जिसे कार्य सम्पादन के उपरांत उड़नदस्ता द्वारा नदी के किनारे से पीछे हट कर कार्य कराने का भ्रम हुआ। मात्र 15मी0 चौड़ाई में भू-अर्जन के विरूद्ध भुगतान किया गया है। फलतः मुआवजा एवं मिट्‌टी कटाई मद में स्वीकृत प्राक्कलन के अन्तर्गत ही भुगतान किया गया है। आरोप-4 ः-प्रस्तुत कार्य LWL से 0.14 मी0 उपर से कराया गया है। उड़नदस्ता दल द्वारा Leveling कार्य के दौरान मानवीय भूल की गयी है। जिसके कारण यह अन्तर 0.95मी0 तक पाया गया। कार्य सम्पादन के उपरांत नदी से वर्ष 2016 से 3.75लाख क्यूसेक जलश्राव अगस्त में प्रवाहित हुआ परन्तु कार्य थोड़ा सा सिंक या किसी प्रकार की मामूली गड़बड़ी नहीं हुई। अतएव मात्र 0.16/0.14मी0 को नगण्य माना जा सकता है। आरोप-6 :-सुसंगत अनुसूचित दर में 150mm and below से लेकर 300mm and above size के बोल्डर का basic rate of quary site पर समान है अतः यदि प्रावधान से छोटे अथवा बडे आकार के बोल्डर का उपयोग किया जाता है तो इससे वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बनता है। कार्य एक बाढ़ अवधि बीत जाने के पश्चात मूल रूप से विद्यमान है। IS Code 14262-1995 के अनुसार यदि क्रेटेड बोल्डर पिचिंग कार्य में बोल्डर का आकार मेस साईज से बड़ा हो तो इसे मान्य किया जा सकता है। तकनीकी परीक्षक कोषांग भी क्रेट में Voids की मात्रा नियंत्रित करने के लिये छोटे आकार के बोल्डर के व्यवहार को मान्य माना गया है। आरोप-7 :-क्रेट बांधने में व्यवहृत GI Binding Wire का प्रयोग प्राक्कलन में उपबंधित 12-14 SWG Binding Wire के बदले 10 SWG wire का उपयोग करने के कारण अधिक भुगतान करने का आरोप लगाया गया है जबकि 10 SWG का वजन 12-14 SWG से अधिक होता है। अतः अधिकाई भुगतान का आरोप नहीं बनता है। आरोप-8 :-कार्य के शुरूआती में मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 01.03.16 के निरीक्षण के पश्चात कही भी मरे पत्थर का स्थल पर पाये जाने का उल्लेख नहीं है। स्थल पर पाये गये कतिपय मरे एवं समतल बोल्डर को स्थल से हटाने का निदेश था। जिसका अनुपालन प्रतिवेदन कार्यपालक अभियंता के द्वारा पत्रांक-437, दिनांक 26.03.16 द्वारा अधीक्षण अीिायंता को दिया गया। उसके बाद किसी भी पदाधिकारी द्वारा कार्य में प्रयोग किये गये बोल्डर के गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गयी है। अतः संचालन पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता के निदेश के बावजूद न्यून विशिष्टि के बोल्डर कार्य में प्रत्युक्त किया गया है आधारहीन है। आरोप-9 :-कार्य पूर्ण विशिष्टि एवं आलेख्य के अनुरूप सम्पादित कराया गया था किन्तु नदी के जलस्तर में वृद्धि के पश्चात कहीं-कहीं एप्रोन के मामूली रूप से सेटल होने के कारण एप्रोन एवं स्लोप के मिलन बिन्दु पर गैप परिलक्षित होने लगा था। परन्तु Defect Liablity अवधि के अन्तर्गत संवेदक द्वारा तत्क्षण अपने खर्च पर ठीक कर दिया गया एवं किसी प्रकार की सरकारी राशि का अतिरिक्त व्यय नहीं हुआ है।

श्री प्रभुनारायण पाण्डेय, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- (क) आरोप-1 ः-जो प्रश्नगत कार्य में प्रत्युक्त बोल्डर की ढुलाई मद में कुल 6922650/- की अधिकाई भुगतान से संबंधित है। श्री पाण्डेय द्वारा अपने पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी अथवा द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व के टिप्पण पृ0 में की गयी है एवं उनका बचाव बयान अस्वीकार योग्य मानते हुए गलत ढंग से प्राक्कलन में बोल्डर ढुलाई मद के दर विश्लेषण कर समावेश करने तथा भुगतान के समय भी उक्त तथ्यों को नजरअंदाज करने के लिये दोषी पाये गये है। चूँकि कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है अतएव इस आरोप के संदर्भ में दिये गये बचाव बयान अस्वीकार योग्य माना जा सकता है। (ख) आरोप-3 ः- जो रिभेटमेंट कार्य में एलाईनमेंट बिना सक्षम प्राधिकार से अनुमोदन कराये ही नदी के किनारे से back shift कर गलत एलाईनमेंट पर कार्य कराने से भू-अर्जन मद एवं मिट्‌टी कटाई मद में अधिकाई भुगतान करने से संबंधित है।25 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 इस संदर्भ में श्री पाण्डेय द्वारा कहा गया है कि प्रश्नगत कार्य के U/s एवं D/s में पूर्व से निर्मित रिभेटमेंट के अनुरूप ही कार्य कराया गया है। इनके द्वारा एलाईनमेंट निर्धारण से संबंधित स्वीकृत्यादेश की प्रति नहीं दिया गया है। ऐसी स्थिति में सक्षम प्राधिकार से एलाईनमेंट की स्वीकृति प्राप्त किये ही कार्य कराने के लिए दोषी प्रतीत होते है। (ग) आरोप-4 :- जो SRC की अनुशंसा के विपरीत LWL पर कार्य नहीं कराकर LWL से 0.16मी0 0.95मी0 उपर कार्य करने के कारण कराये गये कार्य क्षतिग्रस्त होने की संभावना से संबंधित है। श्री पाण्डेय द्वारा कहा गया है कि परिस्थितिजन्य प्रश्नगत कार्य LWL से 0.14मी0 उपर कार्य कराया गया है उड़नदस्ता द्वारा लेवलिंग कार्य के दौरान भूल की गयी है स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि इनके द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे स्थापित हो सके कि प्रश्नगत कार्य का एप्रोन का कार्य LWL पर कराया गया है। ऐसे भी इनके द्वारा स्वीकार किया गया है कि 0.14मी0 उपर से एप्रोन का कार्य किया गया है। अतएव इस आरोप को प्रमाणित माना जा सकता है। (घ) आरोप-6 :- जो बोल्डर क्रेटिंग कार्य में मानक से अधिक मात्रा में अंडरसाईज एवं ओभर साईज बोल्डर का उपयोग कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराने के बावजूद अनियमित भुगतान करने से संबंधित है। श्री पाण्डेय द्वारा इस आरोप के संदर्भ में वही तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया है। जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी है एवं आरोप प्रमाणित पाये गये है। चूँकि इनके द्वारा कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया है। ऐसी स्थिति में इनका बचाव बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। (ड़) आरोप-7 :- जो प्रावधान के अनुरूप बोल्डर क्रेटिंग कार्य में Binding wire का उपयोग क्रेट बाँधने में नहीं कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अधिकाई भुगतान करने से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि प्राक्कलन में अपबंध 12-14 SWG GI Binding Wire का प्रयोग करना था। उसके जगह पर क्रेट बुनाई कार्य में 10 SWG का अधिक तार छोड़ दिया गया था। उसी से क्रेट को बाँधा गया था। परन्तु उक्त के संदर्भ में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। अतएव साक्ष्य के अभाव में प्रावधान के अनुरूप 12-14 SWG GI Binding Wire का उपयोग क्रेट बाँधने में नहीं किये जाने का आरोप बनता प्रतीत होता है। (च) आरोप-8 :-प्रश्नगत कार्य में प्रावधान के विपरीत भरे एवं समतल बोल्डर का उपयोग करने से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया है। जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी है एवं आरोप प्रमाणित पाये गये है। चूँकि इनके द्वारा कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। अतएव प्रावधान के विपरीत कार्य में मरे एवं समतल बोल्डर का उपयोग करने के लिए दोषी प्रतीत होते हैं। (छ) आरोप-9 :- जो प्रश्नगत में स्लोप एवं एप्रोन के मिलाने बिन्दु पर एक फीट के गैप पाये जाने के कारण स्लोप पिचिंग कार्य क्षतिग्रस्त होने की संभावना के कारण सरकारी राशि का अपव्यय होने से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि कार्य पूर्ण विशिष्टि के अनुरूप कराया गया था परन्तु नदी के जलस्तर में वृद्धि के पश्चात कहीं-कहीं एप्रोन में मामूली रूप से सेटल होने के कारण एप्रोन एवं स्लोप के मिलन बिन्दु पर मामूली गैप परिलक्षित हुआ परन्तु Defect liability अवधि के अन्तर्गत रहने के कारण संवेदक द्वारा तत्क्षण सुधारात्मक कार्य अपने खर्च पर कर दिया गया। इसमें किसी तरह की कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं किया गया है। उपर के कंडिका से परिलक्षित है कार्य में कई तरह की त्रुटि पाया गया है तथा संवेदक द्वारा किये गये सुधारात्मक कार्य से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। अतएव इनका कथन स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है।

समीक्षोपरांत श्री पाण्डेय, सेवानिवृत सहायक अभियंता के द्वारा दिये गये पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है एवं आरोप सं0- 1, 3, 4, 6, 7, 8 एवं 9 को प्रमाणित माना जाता है एवं विभागीय अधिसूचना संख्या-2287, दिनांक 21.12.2017 द्वारा संसूचित दण्ड "पेंशन से 15% की कटौती स्थायी रूप से" को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री प्रभु नारायण पाण्डेय, सेवानिवृत सहायक अभियंता, सुभाष नगर, (परबतिया टोला) के0आर0 स्कूल के निकट, पो0-बेलबाग, बेतिया, जिला- प0 चम्पारण, पिन-845438 को उक्त निर्णय संसूचित किया जाता है।

"पेंशन से 15% की कटौती स्थायी रूप से"

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

20 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(मुज0)-06-11/2008/1754--श्री अम्बिका प्रसाद भगत, (आई0डी0-3551) तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल रून्नीसैदपुर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान एजेण्डा सं0-95/69 के तहत कि0मी0 48.517 पर भादाडीह स्थल पर बाढ़ वर्ष 2007-2008 एवं 2008-09 के पूर्व कराए गए कटाव निरोधक कार्य में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गयी। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-1129 दिनांक-12.10.2012 द्वारा श्री भगत से स्पष्टीकरण पूछा गया एवं तत्पश्चात विभागीय26 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 अधिसूचना सं0-1719 दिनांक-05.08.2015 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

आरोप सं0-01 :- बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई कार्य विशिष्टि के विपरीत डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का क्रेट तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाया गया। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

आरोप सं0-02 :- ब्रीक रेटिंग कार्य में विशिष्टि के विपरीत कमतर गुणवाा के 10 से 15 प्रतिशत ईंट के टुकड़े का उपयोग कर सरकारी राजस्व का क्षति पहुँचाना। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

आरोप सं0-03 :-उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के अनुसार जाँच की तिथि 16.01.2009 तक भुगतान नहीं हुआ था। मुख्य अभियंता के पत्रांक-593 दिनांक-25.02.2015 से स्पष्ट है कि कराए गए कार्य का भुगतान दिनांक-10.10.2009 को किया गया है। चूँकि उड़नदस्ता जाँच में न्यून विशिष्टि का वी0ए0 वायर क्रेट (Double knot के जगह पर Single knot) का तथा ब्रीक क्रेटिंग कार्य में न्यून विशिष्टि के ईंट एवं ईंट के टुकड़े (10 से 15 प्रतिशत तक) का उपयोग करने की अनियमितता प्रकाश में आ गयी थी। जिसके बावजूद भी प्रावधानित बी0ए0 वायर क्रेट के अनुरूप ही 24.67kg प्रति क्रेट की दर से भुगतान कर दिया गया तथा न्यून विशिष्टि के ईंट एवं ईंट के टुकड़े का उपयोग होने के बावजूद ईंट के गुणवाा जाँच हेतु काटी गई राशि 10 प्रतिशत को मात्र एक फॉग मार्क (आरती) की गुणवाा जाँच प्रतिवेदन के आधार पर विमुक्त कर दिया गया है जबकि कार्य में कई मार्कों के ईंटों का प्रयोग किया गया है साथ ही 10 से 15 प्रतिशत ईंट के टुकड़े का भी उपयोग किया गया है। इस प्रकार अनियमितता प्रकाश में आने के बावजूद भी जान बूझ कर अतिरेक भुगतान कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचायी गयी। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री भगत, तत0 कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र 'क' में गठित तीनों आरोपों यथा आरोप सं0-1, आरोप सं0-2 एवं आरोप सं0-3 को अप्रमाणित पाया गया। फलस्वरूप संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत श्री भगत के दिनांक 31.03.2017 को सेवानिवृत हो जाने के फलस्वरूप उनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश संख्या-62 सह ज्ञापांक-1157, दिनांक 17.07.2017 बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया एवं तत्पश्चात संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप संख्या-02 एवं आरोप संख्या-03 को अप्रमाणित एवं असहमत होते हुए आरोप संख्या-01 को प्रमाणित पाया गया तथा असहमति के निम्न बिन्दु पर विभागीय पत्रांक-1213, दिनांक 20.07.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी।

आरोप सं0-01 जो विशिष्टि के विपरीत बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई कार्य में डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का क्रेट तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर सरकारी राशि की क्षति पहुँचाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने अपने निष्कर्ष कंडिका में अंकित किया है कि आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध ईंट से भरे हुए क्रेट के क्षतिग्रस्त होने से एवं जलीय दबाव के कारण क्रेट में खिंचाव आना एवं वायर टूटना स्वभाविक बताया गया है। फलतः डबल नॉट, सिंगल नॉट में प्रतीत हो रहा होगा तथा अनुवीक्षण दल के चारो दौरा में बी0ए0 वायर क्रेट को संतोषप्रद बताया गया है के आधार पर आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है। जिसमें निम्न तथ्यों के आलोक में असहमत हुआ गया है :-

जलीव दबाव के कारण किसी भी क्षतिग्रस्त ईंट भरे बी0ए0 वायर क्रेट में तनाव आना स्वाभाविक है। जिसे माना जा सकता है। उक्त दबाव/तनाव के कारण किसी भी क्रेट के मेस साईज में अंतर आ सकता है परन्तु क्रेट की बुनाई अगर डबल नॉट देकर की गयी है तो तनाव/दबाव के कारण नॉट का साईज छोटा हो सकता है परन्तु डबल नॉट सिंगल नॉट में प्रतीत होना संभव नहीं है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.3.2 में स्पष्ट रूप से अंकित है कि मारर ग्राम के पास एवं भादाडी स्थल पर कराये गये कटाव निरोधक कार्य की जाँच में बी0ए0 वायर क्रेट डबल नॉट की जगह पर सिंगल नॉट किया गया है। जिससे वजन में कमी निश्चित है तथा मेस का साईज प्रावधानित 4''x 4'' की जगह 4''x 5'' पाया गया। उड़नदस्ता द्वारा क्रेट का वजन नहीं लिया गया है। परन्तु स्वभाविक है कि क्रेट में डबल नॉट की जगह सिंगल नॉट से बुनाई करने पर बी0ए0 वायर क्रेट की बचत होगी एवं डबल नॉट की जगह पर सिंगल नॉट का बी0ए0 वायर क्रेट का वजन कम होना भी स्वभाविक है। जहाँ तक अनुवीक्षण दल के जाँच प्रतिवेदन बी0ए0 क्रेट वायर संतोषप्रद उद्धित होने का प्रश्न है वो अनुवीक्षण दल के जाँच प्रतिवेदन के कडिका 4(ख) में विभागीय सामग्री जो उपयोग मेें लाया गया है, के संदर्भ में संतोषप्रद अंकित किया गया है। इस कार्य में क्रेट बुनाई का कार्य संवेदक द्वारा किया गया है। ऐसी स्थिति में इस प्रतिवेदन के आधार पर उड़नदस्ता द्वारा स्थलीय जाँचोपरांत की गयी टिप्पणी को नाकारा नहीं जा सकता। अतएव आरोप सं0-1 प्रमाणित होता है। उक्त के आलोक में श्री भगत, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-शून्य दिनांक-30.08.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया जिसमें निम्न तथ्य अंकित किया गया है :- जाँच दल द्वारा दिनांक 17.01.2009 को जाड़े के मौसम में स्थल निरीक्षण किया गया है। फलतः स्पर के नोज पर नीचे दूर की स्थिति क्षतिग्रस्त लॉन्च किये गये क्रेट के कुछ डबल नॉट बड़े एवं छोटे असमान साईज के कारण सिंगल नॉट प्रतीत होना स्वभाविक है। निर्मित स्पर के नोज भाग पर जलीय दवाब के कारण सामान्य से कई गुणा अधिक दबाव के कारण तार में टूटान भी हुई। इस स्वभाविक प्राकृतिक घटना को संचालन पदाधिकारी द्वारा भी स्वीकार किया गया। इस प्रक्रिया के कारण सिंगल नॉट होना स्वभाविक है तथा सिल्ट से ढक जाने पर भी यह स्थिति बन सकती है। यह कार्य कटाव निरोधक प्रवृति का है27 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 और बाढ़ अवधि के दौरान नदी का प्रवाह अपने उग्रतम स्वभाव में रहता है। तदनुसार एक ही समय में कई दिशाओं से उत्पन्न उपरोक्त घटनाओं को जन्म देती है। जहाँ तक अनुवीक्षण दल के जाँच प्रतिवेदन में कंडिका -4(ख) में विभागीय सामग्री जो उपयोग में लाया गया है के संदर्भ में संतोषप्रद अंकित किया गया है। इस कार्य में क्रेट बुनाई का कार्य संवेदक द्वारा किया गया है। कार्यों की जाँच अनुवीक्षण दल द्वारा चार बार किया गया है। चारों प्रतिवेदन की कंडिका 4(क) में संतोषप्रद टिप्पणी अंकित किया गया है। स्पष्टतः यह टिप्प्णी सभी कार्य मदों के लिये स्थलीय जाँचोपरांत किया गया है। कार्य समाप्ति के 7 माह बाद उड़नदस्ता द्वारा जाँच किया गया है एवं निष्कर्ष कंडिका में किसी प्रकार का आरोप प्रतिवेदित नहीं किया गया है। उड़नदस्ता द्वारा क्रेट का वजन नहीं लिया गया। कम वजन के क्रेट का उपयोग का आरोप संभावना पर आधारित है जो सही नहीं है। इसी उड़नदस्ता जाँच दल के जाँच प्रतिवेदन के आधार पर गठित आरोपों से कार्यकारी संवेदक HSCL को विभागीय आदेश सं0-6288 दिनांक 07.12.16 द्वारा आरोप मुक्त किया जा चुका है। श्री भगत, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में निम्न तथ्य पाए गए :- संचालन पदाधिकारी ने निष्कर्षित किया है कि ईंट से भरे हुए क्रेट का क्षतिग्रस्त होने के पश्चात मेस साईज में खिचांव आना तथा तार टूटना स्वभाविक प्रतीत होता है। फलतः डबल नॉट सिंगल नॉट में प्रतीत हो रहा होगा। अनुवीक्षण दल के चारों प्रतिवेदन में बी0ए0 वायर क्रेट को संतोषप्रद बताया गया है। साथ ही उड़नदस्ता द्वारा अंतिम निष्कर्ष में भादाडीह स्थल पर निर्मित बेडवार में प्रत्युक्त हुए क्रेट को विशिष्टि के विपरीत होने की टिप्पणी नहीं की गयी है, से निम्न तथ्यों के आलोक में असहमत होते हुए श्री भगत, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी है। (क) जलीय दबाव के कारण क्रेट मेंं तनाव उत्पन्न होने से डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट में परिवर्तन होना संभव नहीं है।

(ख) उड़नदस्ता द्वारा क्रेट के वजन नहीं लिया गया। परन्तु स्वभाविक है कि डबल नॉट के जगह पर सिंगल नॉट से क्रेट बुनाई कराने पर बी0ए0 वायर की बचत होगी एवं सिंगल नॉट के क्रेट का वजन कम होगा।

(ग) अनुवीक्षण दल के प्रतिवेदन में विभागीय सामग्री के संदर्भ में संतोषप्रद टिप्पणी अंकित की गयी है जबकि क्रेट बुनाई का कार्य संवेदक द्वारा कराया गया है। अतः उक्त प्रतिवेदन के आलोक में उड़नदस्ता के स्थलीय जाँचोपरांत न्यून विशिष्टि के कार्य के संदर्भ में की गयी टिप्पणी को अमान्य किया जाना उचित नहीं है। यह भी कहा गया है कि बाढ़ अवधि में उत्पन्न जलीय दबाव के कारण तार टूट गया होगा एवं स्पर के नोज पर से नीच दूर स्थित क्षतिग्रस्त क्रेट में कुछ डबल नॉट छोटा या बड़ा साईज के कारण सिंगल नॉट प्रतीत होना स्वभाविक है। बाढ़ अवधि में क्रेट के उपर सिल्ट जमा होने से सिल्ट से ढक जाने के कारण डबल नॉट कहीं-कहीं सिंगल नॉट के रूप में प्रतीत हो रहा था। यह वही तथ्य है जो इनके दोनों के द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में करते हुए द्वितीय कारण पृच्छा की गयी है। इसके अतिरिक्त श्री भगत द्वारा न तो कोई तथ्य ही दिया गया है न ही कोई नया साक्ष्य ही उपलब्ध कराया गया है। ऐसी स्थिति में इनके द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब को अस्वीकार किया जाता है तथा आरोप सं0-1 प्रमाणित माना जाता है। समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री अम्बिका प्रसाद भगत, तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर सम्प्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया। 1. पाँच प्रतिशत पेंशन की स्थायी रूप से कटौती। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री अम्बिका प्रसाद भगत, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता, के विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर विभागीय पत्रांक-925, दिनांक 09.05.2019 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की मांग की गई। जिसमें बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा अपने पत्रांक-1051, दिनांक 30.07.2019 द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर सहमति प्रदान की गई है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये निर्णय के आलोक में श्री अम्बिका प्रसाद भगत, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता, 401-A, श्री रामकुँज अपार्टमेंट, रोड नं0-04, महेश नगर, पटना को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है। 1. पाँच प्रतिशत पेंशन की स्थायी रूप से कटौती।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

20 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(मुज0)-06-12/2011/1755--श्री अवधेश कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल सं0-1, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत को उनके पदस्थापन अवधि के दौरान जैतपुर शाखा नहर के वि0दू0 14.00 पर दिनांक 23.05.11 को नहर के बाँये तटबंध के 15'0" चौड़ाई मेें हुए टूटान कार्य में लापरवाही एवं शिथिलता बरतने से संबंधित प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना सं0-1495, दिनांक 05.12.11 द्वारा निलंबित किया गया एवं तदोपरांत विभागीय संकल्प सह ज्ञापांक-01, दिनांक 04.01.12 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच में आरोप को28 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 प्रमाणित नहीं पाया गया। अतएव संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन एवं उपलब्ध अभिलेख के आधार पर मामले की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए निम्नलिखित बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-504, दिनांक 30.04.13 द्वारा श्री कुमार से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी।

(i) आपके द्वारा तर्क दिया गया है कि टूटान की सूचना उन्हें दिनांक 21.09.11 में 01ः40 बजे कनीय अभियंता से दूरभाष पर प्राप्त हुई। जब कनीय अभियंता द्वारा दूरभाष पर उनसे सम्पर्क स्थापित कर लिया गया तो उनके उस बयान को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है कि सुदूर क्षेत्र में होने के कारण अथक प्रयास के बावजूद इनके द्वारा उच्चाधिकारियों से मोबाईल पर सम्पर्क स्थापित नहीं किया जा सका।

(ii) नहर में रूपांकित जलश्राव 480 घनसेक के विरूद्ध प्रवाहित जलश्राव 163 घनसेक मात्र में ही नहर टूट गया। श्री कुमार द्वारा यदि निश्चित अंतराल पर नहर बाँध का भ्रमण किया जाता तो पाईपिंग के कारण नहर बाँध के टूटान को रोका जा सकता था। अतः नहर संचालन में लापरवाही एवं शिथिलता बरतने का आरोप प्रमाणित माना जाता है। श्री कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता ने अपने पत्रांक-शून्य दिनांक 08.05.13 द्वारा कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी है।

(i) अधीक्षण अभियंता तथा मुख्य अभियंता द्वारा ससमय स्थल निरीक्षण नहीं करने के कारण टूटान हुआ। क्योंकि विभागीय पत्रांक-991, दिनांक 17.06.11 के आलोक में नहर में पानी छोड़ने के संबंध में उनके द्वारा कोई मंतव्य नहीं दिया गया। फलस्वरूप विभाग द्वारा अस्त-व्यस्त नहर में पानी खोलने का निर्णय लिया गया।

(ii) घटना घटने के पश्चात 23 घंटे में एन0सी0सी0 (पुनस्र्थापन कार्य के संवेदक) के माध्यम से मरम्मति कराकर पुनः जल प्रवाहित करा दिया गया एवं इससे सरकार को न तो आर्थिक क्षति हुई एवं न ही किसानों को कोई क्षति हुआ। श्री कुमार से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। जिसमें पाया गया कि श्री कुमार द्वारा ऐसा कोई तथ्य/साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे यह परिलक्षित हो सके कि इनके द्वारा नहर टूटान की सूचना ससमय उच्च पदाधिकारियों एवं विभाग को दिया गया है तथा नहर बाँध के रख-रखाव की दिशा में कोई कारगर कार्रवाई की गयी है एवं नियमित अंतराल पर नहर बाँध का निरीक्षण इनके द्वारा किया गया है। अगर इनके द्वारा नहर के रख-रखाव पर समुचित ढंग से ध्यान दिया जाता तो नहर में रूपांकित जलश्राव 460घनसेक के विरूद्ध मात्र 163 घनसेक में नहर टूटान होने की संभावना नहीं बनती। अतएव प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता को विभाग अधिसूचना सं0-1302, दिनांक 23.10.13 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया।

(i) निन्दन वर्ष 2011-12 (ii) दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-शून्य, दिनांक 28.11.13 द्वारा विभाग में समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी एवं वरीय लेखा पदाधिकारी, महालेखाकार (ले0 एवं हक0) का कार्यालय, बिहार, पटना से प्राप्त पत्र की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत श्री कुमार के दिनांक 30.06.14 को सेवानिवृत हो जाने के कारण विभागीय अधिसूचना सं0-1302, दिनांक 23.10.13 द्वारा पारित दण्डादेश के अधिरोपित नहीं होने के कारण उक्त दण्डादेश के कंडिका (ii) जो दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड है को विभागीय अधिसूचना संख्या-1914, दिनांक 10.12.14 द्वारा निरस्त किया गया एवं पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित करते हुए विभागीय पत्रांक-03, दिनांक 05.01.15 द्वारा श्री कुमार, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी।

श्री कुमार, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब अप्राप्त रहने के कारण मामले की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत पाया गया कि आरोप के संदर्भ में श्री कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता को पूर्व के कथन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कहना है। अतएव श्री अवधेश कुमार, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता को नहर टूटान की सूचना ससमय उच्चाधिकारियों को नहीं देने तथा नहर के रख-रखाव तथा पर्यवेक्षण करने की अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन नहीं करने के आरोप को प्रमाणित पाया गया। चूँकि श्री कुमार दिनांक 30.06.14 को सेवानिवृत हो चुके हैं। अतः पूर्व में अधिरोपित निन्दन का दण्ड निष्प्रभावी होने के कारण सरकार द्वारा प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-995 दिनांक 30.05.16 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग का परामर्श प्राप्त करते हुए निम्न दण्ड संसूचित किया गया।

(i) 10% दस प्रतिशत पेंशन की कटौती दो वर्षों के लिए। (ii) निलंबन अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा किन्तु उक्त अवधि की गणना पेंशन प्रयोजनार्थ की जायेगी।

उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री कुमार, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता द्वारा माननीय पटना उच्च न्यायालय में सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-6906/2015 दायर किया गया। जिसमें माननीय न्यायालय द्वारा दिनांक 09.04.19 को निम्न आदेश पारित किया गया।

The Petitioner has adequate remedy under Rule 24(2) of C.C.A rules 2005. Where in it is open to the petitioner to prefer a review by way of Memorial against the said order. The petitioner should prefer his remedy under the said provisions within eight week from today. In29 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 the event such an application is filed. The authority would be obliged to consider the same in accordance with law without raising the issue of review being barred by delay.

उक्त आदेश के आलोक में श्री अवधेश कुमार द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक-01.05.19/16.05.19 से एक पुनःविचार अभ्यावेदन विभाग को उपलब्ध कराया गया है। श्री कुमार द्वारा पुनःविचार अभ्यावेदन में आरोप से संदर्भित निम्न तथ्य अंकित किया गया है :-

मुझ पर आरोप लगाया गया है कि मोबाईल से सम्पर्क नहीं होना विश्वास योग्य नहीं है साथ ही 480 घनसेक के बदले में 163 घनसेक पर पाईपिंग हो गया के संबंध में कहा गया है कि यह पूरी घटना मुख्य अभियंता/अधीक्षण अभियंता के समय पर नहर निरीक्षण नहीं कर नहर की स्थिति से सरकार को अवगत नहीं कराने के कारण हुआ। जबकि संवेदक NCC द्वारा महत्वपूर्ण कार्य कराया जा रहा था एवं खरीफ संचालन के पूर्व नहर निरीक्षण करना आवश्यक होता है। यहाँ तक कि योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-2 के पत्रांक-991, दिनांक 17.06.2011 द्वारा नहर के स्थिति के संबंध में रिपोर्ट मांगा गया था। तब भी मुख्य अभियंता द्वारा न निरीक्षण किया गया, न रिपोर्ट भेजा गया। NCC ने अपने पत्रांक-NCC/GC/832/11-12 दिनांक 03.06.11 एवं कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-611 दिनांक 08.06.11 द्वारा नहर में जलश्राव नहीं छोडने का अनुरोध किया गया था। क्योंकि उक्त अवधि तक मात्र 26.49 प्रतिशत ही कार्य हुआ था एवं नहर अस्त-व्यस्त अवस्था में था। इन सभी बिन्दुओं पर विचार करते हुए अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-2 ने अपने पत्रांक-991 दिनांक 17.06.11 द्वारा मुख्य अभियंता से मंतव्य मांगा था। परन्तु मुख्य अभियंता द्वारा कोई मंतव्य प्राप्त नहीं होने के कारण विभाग द्वारा नहरों में जलश्राव प्रवाहित किया गया।

जब विभाग स्वयं मान रही है कि मुख्य अभियंता द्वारा मंतव्य नहीं देने के कारण अधूरे नहर में जलश्राव प्रवाहित किया गया ऐसी स्थिति में इस घटना के लिये वे कैसी दोषी हो सकते है। यहाँ तक कि घटना के पश्चात दिन रात कार्य कराकर 23 घंटो के अन्दर नहर में पुनः जलश्राव प्रावाहित कर दिया गया। सरकार का एक पैसा खर्च नहीं हुआ एवं न ही किसानों को कोई क्षति हुई। अतः अनुरोध है कि दण्ड मुक्त कर निलंबन अवधि का बकाया भुगतान एवं रोके गये दो वेतन वृद्धि को समाप्त किया जाय।

श्री अवधेश कुमार से प्राप्त पूर्णविचार आवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई जिसमें निम्न तथ्य पाये गयेः-

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा पूर्व में की गयी है। जिसमें श्री अवधेश कुमार को नहर टूटान की सूचना ससमय वरीय पदाधिकारी को न देने का आरोप प्रमाणित पाया गया था किन्तु नहर संचालन में लापरवाही एवं शिथिलता बरतने का आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया था। उक्त प्रमाणित आरोप के लिये चेतावनी का दण्ड प्रस्ताव पर माननीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त किया गया। उक्त दण्ड प्रस्ताव पर माननीय मुख्यमंत्री महोदय के अनुमोदन के क्रम में मामले की समीक्षा मुख्य सचिव द्वारा की गयी। जिसके कंडिका (4) में कहा गया है कि संचिका में रक्षित अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, मुजफ्फरपुर के टूटान पर निरीक्षण प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि टूटान का मुख्य कारण स्थल टूटान पर पाईपिंग रहा जो गश्ती में शिथिलता एवं लापरवाही के कारण detect नहीं किया जा सका। इसके अतिरिक्त रूपांकित जलश्राव 2000 घनसेक के विरूद्ध प्रवाहित जलश्राव मात्र 65 घनसेक में ही नहर में टूटान होना। इसके रख-रखाव में लापरवाही स्पष्ट रूप से परिलक्षित है एवं कंडिका-6 में नहरों के रख-रखाव की जिम्मेवारी कार्यपालक अभियंता की बनती है। अपनी जिम्मेवारी के निर्वहन में कार्यपालक अभियंता ने स्पष्ट रूप से लापरवाही बरती है जिसके आलोक में श्री कुमार के विरूद्ध निम्न दण्ड प्रस्ताव पर माननीय मुख्यमंत्री का अनुमोदन प्राप्त हुआ एवं तदनुसार दण्डादेश निर्गत किया गया।

(i) 10% दस प्रतिशत पेंशन की कटौती दो वर्षों के लिए। (ii) निलंबन अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा किन्तु उक्त अवधि की गणना पेंशन प्रयोजनार्थ की जायेगी।

आरोपी द्वारा अपने पुनः विचार याचिका में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा पूर्व में विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी को दिया गया है तथा कहा गया है कि नहर का पुनस्र्थापन कार्य NCC द्वारा कराया जा रहा था। NCC ने अपने पत्रांक-832 दिनांक 03.06.11 तथा प्रमंडल के पत्रांक-611, दिनांक 08.06.11 द्वारा नहर में जलश्राव नहीं छोडने का अनुरोध विभाग से किया गया। तत्पश्चात अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-2 ने अपने पत्रांक-991 दिनांक 17.06.11 द्वारा मुख्य अभियंता से मंतव्य की मांग की गयी परन्तु मुख्य अभियंता द्वारा कोई मंतव्य नहीं देने के कारण विभाग द्वारा नहर में जलश्राव प्रवाहित किया गया। दूसरी तरफ यह भी कहा गया कि उक्त टूटान की मरम्मति कराकर 23 घंटे के अन्दर जलश्राव पुनः प्रवाहित करा दिया गया। जो विरोधाभाषी है, क्योंकि अगर नहर क्षति-विक्षत था तो टूटान के बाद नहर में जल प्रवाहित कैसे हो सका। इससे स्पष्ट है कि उक्त नहर 163 घन सेक पानी प्रवाहित करने के लिये सक्षम था। अभिलेखों से स्पष्ट है कि नहर टूटान का मुख्य कारण पाईपिंग है। अगर पाईपिंग को समय पर मरम्मति करा दिया30 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 जाता तो संभव था कि नहर में कोई टूटान नहीं होता। इससे स्पष्ट है कि नहर के देख-रेख में श्री कुमार द्वारा लापरवाही एवं उदासीनता बरती गयी है। यहाँ तक कि इनके द्वारा समय पर टूटान की सूचना भी वरीय पदाधिकारी को नहीं दी गयी। इससे परिलक्षित है कि इनके द्वारा जलश्राव होने से टूटान होने तक नहर का निरीक्षण नहीं किया गया। अतएव इनका पुनः विचार अभ्यावेदन स्वीकार योग्य नहीं है।

समीक्षोपरांत वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री अवधेश कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का पुनः विचार अभ्यावेदन अस्वीकार किया जाता है एवं उक्त निर्णय श्री अवधेश कुमार, मेहसी निवास, रोड नं0-05, आदर्श कॉलोनी, पश्चिमी पटेल नगर, पटना-23 को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

20 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(मुज0)06-07/2016/1756--श्री अंशुमण ठाकुर (आई0डी0-3501) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल मोतिहारी को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान वर्ष 2016 में बगहा शहर के नजदीक रतनमाला एवं पुअर हाउस में कराये गये कटाव निरोधक कार्य में बरती गई वित्तीय अनियमितता एवं सरकारी राशि की क्षति के लिए विभागीय ज्ञापांक सं०-1526 दिनांक 27.07.2016 द्वारा श्री ठाकुर को निलंबित किया गया एवं तदोपरांत विभागीय ज्ञापांक सं०-1585 दिनांक 29.07.16 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 में विहित रीति से प्रपत्र-क में उल्लेखित निम्न आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। (1) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 2.0.1 एवं 5.0.0 (1) के क्रम में प्रश्नगत कार्य के स्वीकृत प्राक्कलन के मद सं०-4 एवं 5 (बोल्डर क्रेटिंग एवं बोल्डर पीचींग कार्य) में बोल्डर ढुलाई मद में Loading एवं Unloading के लिए रूपये 145.04 प्रति घनमीटर तथा Stacking कार्य में रूपये 39.73 प्रति घनमीटर का अधिक दर स्वीकृत होने के कारण क्रमशः 7691833/- एवं 2106990/- अर्थात कुल रू0 97,98,824/- का अधिकाई भुगतान होना संभावित प्रतीत होता है। उक्त प्राक्कलन का गठन प्रस्ताव का सर्मपण एवं अनियमित भुगतान में आपकी संलिप्तता रही है।

(2) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 2.0.2 एवं 5.0.0 के उप कंडिका-3 से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य में जंगल सफाई कार्य का प्राक्कलन में प्रावधानित मात्रा 23250 वर्गमी0 का हूबहू मापपुस्त में अंकित कर भुगतान करने की कार्रवाई की गई है। जबकि स्थल पर प्रावधानित लंबाई 1550 मीटर के विरूद्ध 1490 मीटर पाया गया। इस प्रकार जंगल सफाई मद में अधिकाई भुगतान करने के लिये आप दोषी है।

(3) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.0.1 एवं 5.0.0(3) के समीक्षा में पाया गया कि एप्रोन लेईंग का Alignment बिना सक्षम प्राधिकार के स्वीकृत प्राप्त किये ही नदी के किनारे से 2.8मी0 से 6.25मी0 Back Shift कर गलत alignment पर कार्य कराया गया। जिसके कारण ग्रामीणों का आवासीय एवं उपजाऊ भूमि बर्बाद होने के साथ-साथ सरकार के भूमि अधिग्रहण मद एवं फसल मुआवजा मद तथा मिट्‌टी कटाई मद में सरकारी राशि का अपव्यय होना परिलक्षित है। यदि apron laying को बिना back shift किये हुए कार्य कराया जाता तो उपरोक्त अपव्यय को बचाया जा सकता है। परन्तु आपके द्वारा ऐसा नहीं किया गया।

(4) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.03 से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य प्राक्कलन के प्रावधानित के विरूद्ध LWL 80.96 से 0.16मी0 से 0.95मी0 उपर तक कार्य प्रारंभ कराया गया है जिसके कारण एप्रोन सिंक करने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस स्थिति में इस योजना पर किया गया व्यय अनुपयोगी होने की प्रबल संभावना बनती है। इस प्रकार न्यूनतम जलस्तर से उपर एप्रोन का कार्य कराया गया।

(5) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 3.0.4 से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता जाँच दल द्वारा स्थलीय जाँच में Boulder Crating कार्य में 20.25 तथा Uncrated Boulder Pitching कार्य में 21.43 प्रतिशत voids पाया गया है, जो निर्धारित मानक 20 प्रतिशत से अधिक है। फलतः अनियमित भुगतान होना परिलक्षित होता है। अतएव न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर भुगतान प्रावधान के अनुरूप कया गया।

(6) जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.0.1 से स्पष्ट है कि स्थलीय जाँच में एकरारनामा में प्रावधानित विशिष्टि के विरूद्ध Boulder Crating कार्य में Oversize Boulder 39.95% एवं Under Size Boulder 48.22% पाया गया उसी प्रकार पैनल में Uncrated Boulder Pitching कार्य में Over Size Boulder 49.37% तथा Under size boulder 30.22% पाया गया। इससे परिलक्षित है कि विशिष्टि के अनुरूप कार्य नहीं कराया गया परन्तु भुगतान प्रावधान के अनुरूप करने के फलस्वरूप अधिकाई भुगतान होना स्पष्ट रूप से परिलक्षित है।

(7) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4.0.2 से स्पष्ट है कि उड़नदस्ता के स्थलीय जाँच में स्वीकृत प्राक्कलन/एकरारनामा में प्रावधानित G.I. Binding Wire का व्यवहार क्रेट बांधने में नहीं किया गया है। फलतः B.A Wire Crate के साईज सिंक कर छोटा हो गया है। अतएव बिना G.I. Binding wire के उपयोग किये ही निम्न विशिष्टि के कार्य कराने के बावजूद भुगतान एकरारित दर से करने के कारण इस मद में अधिकाई भुगतान परिलक्षित है।31 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 (8) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4.0.3 से स्पष्ट है कि स्थलीय जाँच में Boulder Crating एवं Boulder Pitching कार्य में एकरारनामा तथा GOI, CWC द्वारा प्रकाशित Hand Book के पारा 5.3.4 के विपरीत भरे हुए बोल्डर तथा कम मोटाई के समतल (Flat) Boulder का उपयोग कर न्यून विशिष्टि का बोल्डर कार्य उपयोग कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराया गया है एवं भुगतान प्रावधान के अनुरूप होने के फलस्वरूप अधिकाई भुगतान होना परिलक्षित है। (9) जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.0.4 एवं 5.0.0 के उप कंडिका 10 से बोध होता है कि एप्रोन एवं स्लोप के मिलन बिन्दु पर 1 फीट का गैप रह गया है, जिसके कारण अभी से ही बिना कटाव के ही स्लोप पिचींग फिसल रहा है एवं कुछ भाग के स्लोप पीचींग क्षतिग्रस्त भी हो गया है। जिसके कारण सरकार को एक बड़ी राशि का अपव्यय होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। अतएव इस प्रकार के अनियमित कार्य कराकर सरकारी राशि की अपव्यय की गयी। (10) जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 1.0.1 से बोध होता है कि उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा जाँचित कार्य से संबंधित दस्तावेज दिनांक 17.06.16 को विशेष दूत से भेजने हेतु अनुरोध किया गया था परन्तु आपके द्वारा दिनांक 19.06. 2016 को शाम 5 बजे तक आंशिक दस्तावेज ही उपलब्ध कराया गया। अतएव वांछित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराने के लिए आप दोषी हैं।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री ठाकुर, कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध आरोप सं०-03, 04, 05, 06, 07, 08 एवं 09 को पूर्णतः प्रमाणित एवं आरोप सं०-02 एवं 10 को अप्रमाणित तथा आरोप सं०-1 में 76,91,833/- (छिहत्तर लाख इकानवे हजार आठ सौ तैतीस) रूपये के अधिकाई भुगतान को प्रमाणित पाया है। इसी आरोप में रू0 21,06,990/- रूपये के अधिकाई भुगतान को अप्रमाणित पाया गया है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई । समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति श्री ठाकुर को विभागीय पत्रांक-494, दिनांक 10.04.2017 द्वारा उपलब्ध कराते हुए द्वितीय कारण पृच्छा की गई। उक्त के आलोक में श्री ठाकुर, कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 19.05.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया, जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित बाते कही गई हैं :-

आरोप सं०-1- 69,22,650/- रूपये की अनियमित भुगतान संबंधी आरोप को प्रमाणित पाये जाने हेतु संचालन पदाधिकारी कई तथ्यों का उल्लेख किया गया है जो निम्नवत है :-

(क) प्राक्कलन में 2 times loading or unloading के लिये 2x143.60 का प्रावधान किया जाना जो Font end loader से Loading & Unloading by tripper का है। उसमें मैनुअल लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान नहीं रहने के कारण मेरा बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं माना गया है। जबकि मैनुअल लोडिंग एवं अनलोंिडंग किया गया है।

(ख) मेरे द्वारा पूरक बचाव बयान में मिर्जापुर एवं बेतिया स्टेशन पर मात्र Manual Means से लोडिंग एवं अनलोडिंग करने के प्रावधान के साथ दर विशलेषण एवं तुलनात्मक विवरणी के माध्यम से सं० 16,07,736/-राशि की बचत को मात्र इस आधार पर सही नहीं माना गया कि गणना सही प्रतीत नहीं होता है।

(ग) उड़नदस्ता संगठन द्वारा मात्र एक ही बार लोडिंग एवं अनलोडिंग को सही बताया जाना। (घ) अभियंता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना द्वारा मंतव्य दिया जाना कि ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त प्राक्कलन में बोल्डर की ढुलाई में Originating Station एवं Destination Station का क्रमशः मात्र एक ही लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान होना चाहिये।

आरोप को मात्र संभावना के आधार पर प्रमाणित मान लिया गया है। पूर्व के बचाव बयान के कंडिका 1.1.1 (क) को अस्वीकार योग्य माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। रेलवे द्वारा माल ढुलाई हेतु रैंक में 59 बोगी को Standard पाया गया है। प्रति बोगी की क्षमता अधिकतम 66 टन रहने पर एक रैक में 59x66=3894 टन बोल्डर ढुलाई की जा सकती है। इस हिसाब से उक्त स्थल पर कार्य हेतु बोल्डर 106276 टन की ढुलाई हेतु 106276/3894=27 रैक की आवश्यकता होती। प्रति रैक 3894 टन बोल्डर [3894x0.499=1943.106M3]की ढुलाई की जा सकती है। 1943.106M2 को सीधे क्वेरी साईट से 74कि0मी0 दूरी पर स्थित मिर्जापुर रेलवे रैक प्वाईंट पर लाकर 9 घंटे के अन्दर बोगी में लोड करना एवं इसको बेतिया स्टेशन पर पहुँचाने के पश्चात रैक प्वाईंट पर अनलोड कर पुनः 9 घंटे के अन्दर रैक प्वाईंट खाली कर 68कि0मी0 स्थित कार्य स्थल पर पहुँचाना कतई संभव नहीं है। इस स्थिति में निश्चित रूप से यह दण्डात्मक शुल्क का मामला बनता है।

रेलवे द्वारा सामग्री रेल यार्ड में संग्रहन के बाद ही रैक दिया जाता है। पुनः रैक लगने के बाद वहाँ Font end leader से टिपर में लोड करने के पश्चात उसे रैक प्वांइट पर अनलोड कर मैनुअली बोगी में डाला जाना था। उसी प्रकार बेतिया में मैनुअली बोगी से अनलोड कर Front end Loader से पुनः टिपर में डाल कर रैक प्वाईंट को निर्धारित समय में खाली कराना आवश्यक था। उक्त कारणों से दो लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान प्राक्कलन गठन के समय किया गया था। इस प्रकार मात्र मैनुअल लोडिंग अनलोडिंग का प्राक्कलन में प्रावधान नहीं रहने के कारण मेरे बचाव बयान अस्वीकार करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है।

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि रेल द्वारा बोल्डर ढुलाई मद में दर विशलेषण में Originating एवं destination दोनों ही स्टेशन पर एक-एक बार अर्थात कुल दो बार लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान एवं विवेक एवं व्यवहारिक बाध्यता के अनुसार good intention से किया गया था। जिसे अधीक्षण अभियंता ने अनुमोदन किया एवं मुख्य अभियंता भी सहमत32 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 होते हुए तकनीकी स्वीकृति हेतु प्राक्कलन मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध पटना के अनुशंसित किया गया। ततपश्चात मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध, पटना द्वारा उक्त दर विशलेषण को सही मानते हुए प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति दी गयी। जिसके आधार पर पर BOQ की स्वीकृति मुख्य अभियंता, मोतिहारी द्वारा दी गई एवं अनुमोदित परिमाण विपत्र के आधार पर निविदा का निष्पादन किया गया।

आरोप सं०-3-इस बिन्दु को पूर्णतः प्रमाणित पाये जाने का उल्लेख है। जबकि संचालन पदाधिकारी द्वारा विषयांकित कार्य को सही एलाईनमेंट पर कराये जाने संबंधी तथ्य को स्वीकार योग्य माना गया। मात्र रेखांकण की विधिवत स्वीकृत सक्षम प्राधिकार से प्राप्त नहीं किये जाने हेतु ही मुझे दोषी माना गया है।

कार्य प्रारंभ किये जाने के पूर्व संबंधित मुख्य अभियंता से कार्यालय कक्ष में वार्ता के उपरांत एलाइनमेंट का निर्धारण किया गया। कार्य सम्पादन अवधि में मुख्य अभियंता द्वारा एलाइनमेंट पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं किये जाने से उसकी पुष्टि होती है। मेरे उक्त कृत्य से न तो सरकारी राजस्व की क्षति ही हुई है एवं न ही कार्य की गुणवता पर ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है एवं आज की तारीख में भी कार्य पूर्णतः Intact है एवं उद्‌देश्य की पूर्ति कर रहा है।

आरोप सं०-4-आरोप का यह बिन्दु एप्रोन LWL से 0.16मी0 से 0.95मी0 उपर से प्रारंभ किये जाने से संबंधित है। उड़नदस्ता के जाँच के पश्चात एप्रोन के Bottom Level की जाँच कार्य से संबंधित कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा दिनांक 14.08.2016 को की गई एवं अन्तर अधिकतम 0.14मी0 पाया गया। वर्णित स्थिति में संचालन पदाधिकारी से पुनः उड़नदस्ता जाँच कराने का अनुरोध किया गया। परन्तु उड़नदस्ता जाँच में कनीय अभियंता/सहायक अभियंता स्थल पर उपस्थित थे के आधार पर अमान्य कर दिया गया। जबकि उड़नदस्ता जाँच के समय कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता का लेवल लेने में कोई सहभागिता नहीं थी।

आरोप सं०-5-क्रेटेड बोल्डर पिचिंग कार्य में Voids की मात्रा 20प्रतिशत के विरूद्ध 20.25 प्रतिशत पाये जाने से संबंधित है। इस नगन्य अन्तर को मान्य सीमा से अन्दर माना जाना न्यायोचित है।

कार्य में कुल 10814 अद्‌द क्रेटस में से मात्र एक क्रेट की जाँच कर पुरे कार्य के संबंध में अवधारणा बनाया जाना न्यायोचित नहीं माना जा सकता है। क्रेटेड बोल्डर पिचिंग कार्य में यदि जाँचित एवं प्रावधानित Voids में अन्दर का आकलन किया जाय तो यह (20.25-20)=0.25 प्रतिशत आता है। जिसे नगन्य माना जा सकता है।

आरोप सं०-6-यह आरोप विशिष्टि के विरूद्ध बोल्डर क्रेटिंग कार्य में अन्दर साईज एवं ओभर साईज बोल्डर की मात्रा अपेक्षित मात्रा से अधिक पाये जाने से संबंधित है। इस क्रम में पुनः उल्लेखनीय है कि -

(क) अनुसूचित दर में 150mm एवं Below से लेकर 30mm एवं above size का बोल्डर का Basic rate at Quarry site पर समान है। अतः, यदि प्रावधान से छोटे एवं बडे आकार के बोल्डर का उपयोग किये जाने पर भी वित्तयी अनियमितता का मामला नहीं बनता है।

(ख) IS Code 14262-1998 के अनुसार यदि क्रेटेड बोल्डर पीचिग कार्य में बोल्डर का आकार मेस साईज से बड़ा हो तो मान्य किया जा सकता है।

(ग) तकनीकी परीक्षक कोषांग भी क्रेट में Voids की मात्रा नियंत्रित करने के लिए छोटे आकार के बोल्डर के व्यवहार को मान्य बताया गया है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में न्यून विशिष्टि का कार्य कराये जाने का आरोप प्रमाणित माना जाना उचित नहीं है। आरोप सं०-7-यह आरोप क्रेट के बाँधने में GI winding wire के जगह पर क्रेट बुनाई में इस्तेमाल किये जाने वाले 10SWG GI Wire को ही आवश्यतानुसार अधिक लंबाई में छोड़कर फिर उसी से क्रेट को बांधन का कार्य किया गया। क्रेट बांधने का कार्य अकुशल मजदूर द्वारा किया जाता है। लोहे के रौड से क्रेट को कसकर बाँधने में कही-कहीं क्रेट के मेस में मामूली सिकुडन उत्पन्न हो जना स्वभाविक है। उक्त कृत से अधिकाई भुगतान होने जैसी संभावना उत्पन्न होने का कोई प्रश्न नहीं है। कृपया मुक्त करने की कृपा की जाय।

आरोप सं०-8- यह बिन्दु भरे हुए बोल्डर एवं कम मोटाई के समतल बोल्डर कार्य में उपयोग करने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता के निदेश के बाद भी कार्य में भरे एवं समतल बोल्डर का उपयोग किया गया। उल्लेखनीय है कि मुख्य अभियंता दिनांक 01.03.2016 को स्थल निरीक्षण के पश्चात दिये गये निरीक्षण प्रतिवेदन में कही पर भरे पत्थर का स्थल पर पाये जाने का उल्लेख नहीं है। स्थल पर पाये गये कतिपय Heant/flat बोल्डर को स्थल से हटाने का उनके द्वारा निदेश दिया गया था। जिसका अनुपालन प्रतिवेदन पत्रांक-437 दिनांक 26.03.2016 द्वारा मुख्य अभियंता, द्वारा उपलब्ध करा दिया गया था। इसके पश्चात दिनांक 16.03.2016 एवं दिनांक 17.04.2016 को अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल, मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता द्वारा किये गये स्थल निरीक्षण में कार्य को संतोषप्रद बताया गया है एवं बोल्डर की गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई है। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी का मंतव्य कि मुख्य अभियंता के निदेश के बावजूद न्यून विशिष्टि के बोल्डर कार्य में प्रयुक्त किया गया है। आधारहीन एवं तथ्य के परे है।

आरोप सं०-9-यह आरोप एप्रोन एवं स्लोप के मिलान बिन्दु पर गैप से संबंधित है। नदी के जलस्तर में वृद्धि के पश्चात कहीं-कहीं एप्रोन में मामूली रूप से सेटल होने के फलस्वरूप एप्रोन एवं स्लोप के मिलान बिन्दु पर कहीं-कहीं मामूली गैप होने लगा था। परन्तु कार्य defeat liability अवधि के अन्तर्गत रहने के कारण संवेदक द्वारा तत्क्षण मुख्य अभियंता के दिशा निदेश के अनुरूप सुधारात्मक कार्य अपने खर्च पर ही कर दिया गया था। इसके अतिरिक्त व्यय भी नहीं हुआ है। आज की तिथि में कार्य मूलरूप में विद्यमान है। इसमें किसी प्रकार की सरकारी राशि का अपव्यय नहीं हुआ है।33 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन एवं आरोपी अभियंता श्री ठाकुर, कार्यपालक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा निम्न तथ्य पाये गये हैं -

आरोप सं० -1 में उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के अनुसार Quarry site से मिर्जापुर स्टेशन एवं बेतिया स्टेशन पर पहुँचाने में प्राक्कलन में प्रावधानित 2 time loading एवं Unloading को अनियमित बताते हुए 2 times के बदले एक बार मिर्जापुर स्टेशन पर लोडिंग एवं एक बार बेतिया स्टेशन पर रैक से Unloading होना बताया गया है तथा इसी आधार पर One time loading एवं Unloading मद में किये गये भुगतान को अधिकाई भुगतान होने का मंतव्य दिया गया है। उक्त आरोप के संदर्भ में श्री सिंह, कनीय अभियंता (निलंबित) का कथन की प्राक्कलन गठन में मेरी कोई संलिप्तता नहीं रही है। क्योंकि मेरी प्रतिनियुक्ति के पूर्व कार्य प्रारंभ था एवं 40 प्रतिशत कार्य हो चुका था एवं एकरारनामा एवं प्राक्कलन के अनुरूप भुगतान करना मेरी बाध्यता थी को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। क्योंकि प्राक्कलन में बोल्डर ढुलाई के दर में अगर कोई त्रुटि थी तो श्री सिंह का दायित्व था कि भुगतान से पूर्व उक्त तथ्यों को उजागर करते हुए आवश्यक अनुमोदन प्राप्त कर भुगतान करते परन्तु इनके द्वारा अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर गलत भुगतान में सहयोग किया जाना परिलक्षित है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य सहमत होते हुए श्री सिंह के विरूद्ध आरोप सं०-1 का अंश यथा बोल्डर ढुलाई मद में कुल 69,22,650/- के अनियमित भुगतान होने में संलिप्तता होने के आरोप को प्रमाणित पाया गया है तथा बोल्डर स्टैकिंग मद में अनियमित भुगतान होने के आरोप को प्रमाणित नहीं माना गया है।

आरोप सं० -3 जो Revetment कार्य का एलाइनमेंट बिना सक्षम पदाधिकारियों से स्वीकृत प्राप्त किये ही नदी के किनारे से Back shift कर गलत एलाइनमेंट पर कार्य कराने के कारण मुआवजा मद तथा मिट्‌टी कटाई मद में सरकारी राशि के अपव्यय होने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा एलाइनमेंट की स्वीकृति सक्षम प्राधिकार यथा मुख्य अभियंता से लेने के आधार पर इस आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है विदित हो कि कि एलाइनमेंट के संदर्भ में अभियंता प्रमुख बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण से आरोपी अभियंता के बचाव-बयान पर मंतव्य की मांग की गई थी। जिसके आलोक में अभियंता प्रमुख अपने मंतव्य में अंंिकत किया है कि बिना सक्षम प्राधिकार से विधिवत स्वीकृत प्राप्त किये ही एलाइनमेंट कार्य कराया गया। उक्त के आलोक में माना जा सकता है कि कार्य सही रेखांकण पर कराया गया है परन्तु रेखांकण के लिये विधिवत स्वीकृत प्राप्त नहीं किया गया है।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव बयान में यही तथ्य उद्धित किया गया है जो इनके अतिरिक्त कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य एवं अभियंता प्रमुख के मंतव्य से सहमत होते हुए बिना सक्षम पदाधिकारी से एलाइनमेंट का अनुमोदन प्राप्त किये ही कार्य कराया जाना स्थापित होता है। अतएव आरोप सं०-3 प्रमाणित होता है।

आरोप सं० -4 जो प्राक्कलन में प्रावधानुसार के विरूद्ध LWL से 0.16मी0 से 0.95 मी0 उपर के लेवल से कार्य प्रारंभ करने के कारण एप्रोन सिंक करने ही प्रबल संभावना होने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने आरोपी का कथन की उड़नदस्ता जाँच केे पश्चात कार्य से संबंधित कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा लेवल की जाँच करने पर मात्र 0.14मी0 का अन्तर है को उड़नदस्ता जाँच के समय कार्य से संबंधित सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता की उपस्थिति में जाँच दल द्वारा लेवल की जाँच किये जाने के आधार पर अस्वीकार योग्य मानते हुए इस आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया कि श्री ठाकुर द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में वहीं तथ्य उद्धित किया है जो इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी के समक्ष कही गयी थी। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री ठाकुर को LWL से 0.16मी0 से 0.95मी0 उपर से कार्य प्रारंभ करने के लिए दोषी माना जाता है अतः आरोप सं०-4 प्रमाणित होता है।

आरोप सं० -5 जो बोल्डर क्रेटिंग कार्य के मानक से अधिक Voids पाये जाने के फलस्वरूप न्यून विशिष्टि का कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान होने से संंबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने आरोपी का कथन की वरीय पदाधिकारी द्वारा समय-समय पर निरीक्षण किया गया है एवं उनके द्वारा इस त्रुटियों की ओर इंगित नहीं किया है उक्त कथन को उड़नदस्ता टीम ने क्रेट खोलकर विधिवत Sand replacement method and density volume method से Voids की जाँच की गयी। जाँच Scientific है के आलोक में अस्वीकार योग्य मानते हुए आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी अभियंता द्वारा कहा गया है कि कार्य में प्रयुक्त कुल 10814 अद्‌द क्रेट में से मात्र एक क्रेट जाँच कर पूरे कार्य के संंबंध में अवधारणा बनाया जाना उचित नहीं है को स्वीकार योग्य माना जा सकता है। उनके द्वारा यह भी कहा गया है कि जाँचित एवं प्रावधानित Voids में अन्तर मात्र 20.25-20.00=0.25 प्रतिशत आता है जिसे मैनुअली कार्य कराने के कारण Voids में यह अन्तर आना स्वभाविक है को आलोच्य कार्य में मैनुअली रूप से कराये गये कुल 10814 अद्‌द क्रेट में मात्र एक क्रेट में Voids की गणना में मात्र 0.84 प्रतिशत अनुमान्य सीमा से अधिक पाये जाने की स्थिति को स्वीकार योग्य माना जा सकता है अतएव आरोप सं०-5 अप्रमाणित होता है।

आरोप सं० -6 जो एकरारनामा/प्राक्कलन के विरूद्ध कार्य में मानक से काफी अधिक मात्रा में अन्डर साईज एवं ओभर साईज बोल्डर का उपयोग कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर अनियमित भुगतान करने से संबंधित है।34 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी का कथन की अलग-अलग साईज के बोल्डर का बेसिक रेट अनुसूचित दर तालिका में एक होने के कारण वित्तयी अनियमितता नहीं हुआ है। विभिन्न साईज के बोल्डर के दर एक होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी साईज का बोल्डर का प्रयोग किया जाय। प्राक्कलन/एकरारनामा के प्रावधान के विपरीत न्यून विशिष्टि का कार्य के कारण सिस्टम फेल हो सकता है दर एक होना अलग चीज है। साईज के आधार पर गुणवत्ता अलग महत्व रखता है के आधार पर स्वीकार योग्य नहीं माना गया तथा आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया है बल्कि वही तथ्य को दुहराया गया है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं०-6 को प्रमाणित माना जाता है। आरोप सं० -7 जो प्रावधान के अनुसार बोल्डर क्रेटिंग कार्य में क्रेट बांधने में Binding wire का उपयोग नहीं कर न्यून विशिष्टि का कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने कहा है कि आरोपी अभियंता का कथन की Binding wire के बदले GI Wire क्रेट के निर्मित तार से क्रेट को खींचकर बाँधने का कार्य किया गया है। फलतः मोटे तौर से गुणवत्ता में सुधार हुआ है को क्रेट में मोटे तार को खींचकर ही बाँधने का भी कार्य उसी तार से किये जाने के कारण क्रेटिंग का साईज में भी कमी हो गयी जो खतरनाक स्थिति है एवं इस आरोप को आरोपी अभियंता द्वारा स्वीकार किया गया है के आधार पर स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। आरोपी अभियंता द्वारा अपने बचाव बयान में वही तथ्य उद्धित किया गया है। जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन में कहा गया था। इसके अतिरिक्त कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। आरोपी का कथन की 12-14Garge के जगह पर SWG GI Wire से बाँधने पर गुणवत्ता प्रभावित नहीं हुआ है को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। क्योंकि उड़नदस्ता जाँच के क्रेट के साईज एवं मेस की संख्या में कमी पायी गयी है इस प्रकार विशिष्टि के अनुरूप कार्य नहीं कराकर प्रावधान के अनुरूप भुगतान किये जाने से अधिकाई भुगतान परिलक्षित होता है। अतएव आरोप सं०-7 प्रमाणित होता है।

आरोप सं० -8 जो बोल्डर पीचींग कार्य में प्रावधान के विपरीत भरे हुए/कम मोटाई बोल्डर का उपयोग कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी का कथन कि कार्य के दौरान गुणवत्ता जाँचफल तथा अधीक्षण अभियंता मुख्य अभियंता तथा अनुवीक्षण दल द्वारा कोई प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज नहीं की गई थी तथा इसमें कोई अनियमितता नहीं हुई है को स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। मात्र कहा गया है कि मुख्य अभियंता के दिनांक 01.03.2016 के स्थल निरीक्षण के पश्चात दिये गये कतिपय Lean/Flat बोल्डर को स्थल से हटवाते हुए अनुपालन प्रतिवेदन पत्रांक-437, दिनांक 26.03.16 से मुख्य अभियंता को दिया गया। इसके पश्चात किसी भी पदाधिकारी के स्थल निरीक्षण में उक्त तथ्यों का उल्लेख नहीं है एवं कार्य में भरे हुए/समतल बोल्डर का उपयोग नहीं किया गया है। जबकि उड़नदस्ता अंचल जाँच प्रतिवेदन में स्पष्ट अंकित है कि एप्रोन के टॉप एवं स्लोप में कहीं-कहीं भरा हुआ एवं कम मोटाई का पत्थर लगा हुआ पाया गया तथा मुख्य अभियंता के निरीक्षण प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि स्थल पर भरे एवं समतल बोल्डर उपलब्ध थे एवं मुख्य अभियंता के निदेश के बावजूद भी कार्य में न्यून विशिष्टि के बोल्डर का उपयोग किया जाना परिलक्षित है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए कार्य में न्यून विशिष्टि के बोल्डर का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान होने के आरोप को प्रमाणित माना गया है। अतः आरोप सं०-08 प्रमाणित होता है। आरोप सं० -9 जो स्लोप एवं एप्रोन के बीच 1 फीट गैप पाये जाने के कारण स्लोप पीचींग कार्य क्षतिग्रस्त होने की संभावना के कारण सरकारी राशि अपव्यय होने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने अपने समीक्षा में कहा है कि आरोपी अभियंता का कथन की नदी के जलस्तर में वृद्धि के कारण गैप परिलक्षित हुआ था। जिसे संवेदक द्वारा Defect Liability Period में सुधार करा लिया गया है। परन्तु कार्य संवेदक द्वारा करवाया गया अथवा नहीं उसका स्पष्ट प्रमाण नहीं होना तथा गैप होना प्रमाणित होने के कारण अस्वीकार योग्य मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

आरोपी अभियंता श्री ठाकुर द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया है अतएव श्री ठाकुर, कनीय अभियंता का बचाव-बयान को संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए अस्वीकार किया जाता है। अतः आरोप सं० -9 प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अंशुमण ठाकुर, तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी को विभागीय अधिसूचना संख्या-1584, दिनांक 11.09.2017 द्वारा निलंबन से मुक्त करते हुए तदोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-2288, दिनांक 21.12.17 द्वारा निम्न दण्ड दिया गया।

" 3 (तीन) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"। उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री ठाकुर, कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-01, दिनांक 01.03.18 द्वारा पूणर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है।

श्री ठाकुर द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा Roop Singh Negi V/s Punjab National Bank & other (2009) 2 Sec-570, State of Uttar Pradesh & Other Vs Saroj Kumar Singh (2010) 2 SSC 772, में पारित आदेश का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि श्री देवेन्द्र प्रसाद सिंह के मामले में CWJC 11962/1995 में35 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 दिनांक 22.07.10 को पारित न्याय निर्णय में उद्धित करते हुए दिये गये दण्ड को निरस्त करते हुए सभी लाभ देने का आदेश दिया था। अतएव बिना प्रतिपरीक्षण के संचालन पदाधिकारी द्वारा दिये गये जाँच प्रतिवेदन न्याय के विपरीत है।

आरोप से संदर्भित निम्न तथ्य दिया गया है।

आरोप-1 ः-अभियंता प्रमुख द्वारा मंतव्य दिया जाना कि ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त प्राक्कलन में बोल्डर की ढुलाई में Originating Station एवं Destination Station पर क्रमशः मात्र एक ही लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान होना चाहिए था। इसका मतलब है कि एक ही लोडिंग/अनलोडिंग का प्रावधान के प्रतीत संभावना के आधार पर है कोई तथ्यात्मक साक्ष्य नहीं है एवं न ही प्रावधानित दो लोडिंग एवं अनलोडिंग के समर्थन में उनके द्वारा दिये गये तथ्य का कोई खण्डन ही किया गया है। रेल से बोल्डर ढुलाई का जो दर विश्लेषण प्राक्कलन में उनके द्वारा दिया गया है। उसमें Originating एवं Destination दोनों ही स्टेशन पर एक एक बार अर्थात कुल दो बार लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान स्थलीय स्थिति एवं Wharpage, damage बचाने के उद्‌ेश्य से अपने विवेक एवं व्यवहारिक बोध के अनुसार किया गया। जिसकी स्वीकृति सक्षम प्राधिकार द्वारा किया गया। बिना किसी ill Motive के स्थलीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए स्वविवेक से प्रस्तुत दर विश्लेषण जिसकी स्वीकृति सक्षम प्राधिकार के पश्चात निविदा आमंत्रित कर निविदा के अनुमोदनोपरांत कार्य कराकर भुगतान करने के लिये दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं है। आरोप-3 ः-कार्य सम्पादन अवधि में निरीक्षण के दौरान संबंधित मुख्य अभियंता द्वारा एलाईनमेंट पर कभी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं किये जाने से उसकी अनुमति एवं सहमति में निर्धारण किये जाने की स्वतः पुष्टि होती है। उक्त कृत से न तो सरकारी राजस्व की क्षति ही हुई एवं न ही कार्य की गुणवत्ता पर ही कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। विगत दो बाढ़ अवधि के सम्पादन कार्य की उपयोगिता सिद्ध हो गया एवं आज की तिथि में भी कार्य पूर्णतः Intact है एवं उद्‌देश्य की पूर्ति कर रहा है। आरोप-4ः- LWL से एप्रोन का Bottom level 14Cm. उपर पाया जाना परिस्थितिजन्य था। आरोप-5ः- अनुसूचित दर में 15mm and below से लेकर 300mm and above size के बोल्डर का Basic rate at quary site समान है। अतः छोटे बड़े आकार के बोल्डर का उपयोग कार्य में किया जाता है तो वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बनता है।

IS code 14262-1995 के अनुसार क्रेटेड बोल्डर पीचिंग कार्य में बोल्डर कार्य में बोल्डर का आकार मेश साईज से बड़ा हो तो इसे मान्य किया गया है। आरोप-6ः-प्रावधानित 12-14 SWG, GI Binding wire के जगह पर क्रेट बुनाई के क्रम में ही को 10 SWG GI Wire आवश्यकतानुसार अधिक लंबाई में छोडा गया था। क्रेटिंग के समय क्रेट बाँधने के समय छोड गये तार से क्रेट बाँधने का कार्य किया गया था। क्रेट कस कर बाँधने से क्रेट के मेस साईज में मामूली अन्तर होना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। आरोप-7 :- मुख्य अभियंता के द्वारा दिनांक 01.03.16 को स्थल निरीक्षण के पश्चात दिये गये निरीक्षण प्रतिवेदन में कही पर मरे पत्थर का स्थल पर पाये जाने का उल्लेख नहीं है, स्थल पर पाये गये कतिपय Lean/ Flat बोल्डर को स्थल से हटाने के दिये गये निदेश का अनुपालन प्रतिवेदन पत्रांक-437, दिनांक 26.03.16 द्वारा मुख्य अभियंता को उपलब्ध करा दिया गया था। दिनांक 16.03.16 को अध्यक्ष अनुवीक्षण दल एंव अधीक्षण अभियंता तथा दिनांक 17.04.16 को पुनः स्थल निरीक्षण में कार्य को संतोषजनक बताया गया है एवं बोल्डर की गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गयी। ऐसी स्थिति में निदेश के बावजूद न्यून विशिष्टि के बोल्डर का कार्य में प्रत्युक्त किया गया है आधारहीन एवं तथ्य से परे है। आरोप-8 :- कार्य पूर्ण विशिष्टि के अनुरूप कराया गया था, किन्दु नदी के जल स्तर में वृद्धि के पश्चात कहीं-कहीं एप्रोन में मामूली रूप से सेटल होने के फलस्वरूप एप्रोन एवं स्लोप के मिलान बिन्दु पर कहीं-कहीं गैप होने लगा था, परन्तु कार्य Defect liablity अवधि के अन्तर्गत रहने के कारण संवेदक द्वारा तुरन्त सुधरात्मक कार्य अपने ही खर्च पर करा दिया गया था। इसके लिए किसी सरकारी राशि का अतिरिक्त व्यय भी नहीं हुआ। श्री अंशुमण ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- अभिलेखों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि श्री ठाकुर के विरूद्ध गठित आरोपों के लिए विधिवत विभागीय कार्यवाही संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोप सं0-1 का प्रथम अंश तथा आरोप 3, 4, 6, 7, 8 एवं 9 के लिये "तीन वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड" विभागीय अधिसूचना सं0-2288, दिनांक 21.12.17 से संसूचित है। जिसके विरूद्ध श्री ठाकुर द्वारा पुर्णविलोकन अर्जी दिया गया है। जिसकी समीक्षा आरोपवार नीचे की जा रही है। (क) आरोप-1ः- जो प्रश्नगत कार्य में प्रत्युक्त बोल्डर की ढुलाई मद में कुल 69,22,650/- रूपये की अधिकाई भुगतान से संबंधित है।

श्री ठाकुर द्वाराइस आरोप के संदर्भ में वही तथ्य दिया गया है तो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन में संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में दिया गया है। इनके द्वारा कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। इनके द्वारा मुख्य रूप से कहा गया है कि बोल्डर ढुलाई मद में दो लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान स्थलीय स्थिति के अनुरूप स्वविवेक के आधार पर किया गया है। चूँकि उनके द्वारा बोल्डर ढुलाई मद में रेलवे रैंक में 2 times loading एवंबिहार गजट, 12 फरवरी 2020 36 Unloading का किये गये प्रावधान के संदर्भ में कोई तथ्यात्मक तथ्य नहीं दिया गया है। अतएव इनका पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है साथ ही यह भी कहा गया है कि अभियंता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण के द्वारा संभावना के आधार पर दिये गये मंतव्य को उचित नहीं माना गया है। परन्तु इनके द्वारा भी उक्त तथ्य के संदर्भ में कोई नया साक्ष्य नहीं दिया गया है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। (ख) आरोप-3ः-जो रिभेटमेंट कार्य का एलाईनमेंट बिना सक्षम प्राधिकार से स्वीकृति प्राप्त किये ही नदी के किनारे से back Shift कर गलत एलाईनमेंट पर कार्य कराने के कारण भू-मुआवजा मद तथा मिट्‌टी कटाई मद में सरकारी राशि के अपव्यय किये जाने से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में श्री ठाकुर द्वारा वही तथ्य दिया गया है तो इनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में दिया जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी है। चूँेिक इनके द्वारा कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य इस आरोप के संदर्भ में नहीं दिया गया है ऐसी स्थिति में SRC के विपरीत बिना एलाईनमेंट अनुमोदन कराये ही कार्य कराने के लिये दोषी माना जाता है। (घ) आरोप-6ः- जो बोल्डर क्रेटिंग कार्य में मानक से अधिक अंडर साईज एवं ओभर साईज बोल्डर का उपयोग किये जाने के फलस्वरूप न्यून विशिष्टि का कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान होने से संबंधित है। श्री ठाकुर द्वारा इस आरोप के संदर्भ में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में की गई है। श्री ठाकुर द्वारा कहा गया है कि अनुसूचित दर में 150mm and below से लेकर 300mm and above बोल्डर का Basic rate at Quary side पर समान है। अतएव इस मद में अधिकाई भुगतान नहीं हुआ है। स्वीकार योग्य है परन्तु एकरारनामा के अनुसार प्रश्नगत कार्य में 225mm से 300mm साईज के बोल्डर का उपयोग किया जाना था। जबकि उड़नदस्ता जाँच में 39.95% over size एवं 48.22% Under size boulder का उपयोग किये जाने का उल्लेख है जो प्रावधान के विपरीत है। अतएव श्री ठाकुर का कथन स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। (ड.) आरोप-7ः- जो प्रावधान के अनुरूप बोल्डर क्रेटिंग कार्य में बाईडिंग वायर का उपयोग बांधने में नहीं कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि बाईडिंग वायर के स्थान पर जिस तार से क्रेट बुनाई की गयी थी उसी तार से क्रेट को बाँधा गया है। परन्तु उक्त कथन के संदर्भ में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। ऐसे भी प्रावधान के अनुसार प्रत्येक क्रेट को 12-14गैज के बाईडिंग वायर से बाँधा जाना है। ऐसी स्थिति में इनका कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। (च) आरोप-8ः- जो बोल्डर पिचिंग कार्य में प्रावधान के विपरीत मरे हुए एवं समतल आकार के बोल्डर का उपयोग कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया है। चूँकि इनके द्वारा कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया है। अतएव इनका कथन स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। (छ) आरोप-9ः- जो स्लोप एवं एप्रोन के बीच एक फीट के गैप पाये जाने के कारण स्लोप पिचिंग कार्य क्षतिग्रस्त होने की संभावना के कारण सरकारी राशि का अपव्यय होने से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि कार्य विशिष्टि के अनुरूप कराया गया है एवं नदी के जलस्तर में वृद्धि होने के कारण एप्रोन में मामूली सेटलमेंट होने के कारण एप्रोन एवं स्लोप के मिलान बिन्दु पर गैप होना स्वभाविक है। स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि Launching apron का कार्य है कि एप्रोन के अग्र भाग Launch करते हुए मिट्‌टी Surface को प्रोजेक्ट करना होता है न कि एप्रोन का सेटलमेंट होता है। इससे स्पष्ट है कि कार्य प्रावधान के अनुरूप नहीं हुआ है। समीक्षोपरांत श्री ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के द्वारा दिये गये पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है एवं आरोप सं0- 1, 3, 4, 6, 7, 8 एवं 9 को प्रमाणित माना जाता है एवं विभागीय अधिसूचना संख्या-2288, दिनांक 21.12.2017 द्वारा संसूचित दण्ड "तीन वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री अंशुमण ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, समग्र योजना अन्वेषण एवं प्रोजेक्ट प्रीपरेशन प्रमंडल, भागलपुर को उक्त निर्णय संसूचित किया जाता है।

"तीन वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।37 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020

22 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(मोति0)-08-03/2013(अंश-3)/1779--श्री रंजन प्रसाद समैयार (आई0डी0-3223), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के विरूद्ध विभागीय उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन पत्रांक-उद0-002/2014-12, दिनांक 25.03.2015 के आलोक में नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना के तहत शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अन्तर्गत पूर्वी मुख्य नहर के पुनस्र्थापन कार्य में बरती गयी अनियमितता संबंधी निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-72, दिनांक 18.01.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 के तहत विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :- (1) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन एवं गुण नियंत्रण जाँचफल के समीक्षोपरांत पाया गया कि नौवाँ चालू विपत्र के भुगतान अवधि तक एकरारनामा में प्रावधान के तहत कराये गये कार्य की मात्रा 10569.95 घन मी0 (कोर्स एग्रीगेट) के विरूद्ध 6758.64 घन मी0 स्थानीय श्रोत से प्राप्त कर एकरारनामा के विरूद्ध व्यवहार में लाया गया परिलक्षित है जो कोर्स एग्रीगेट की मात्रा का 63.94 प्रतिशत होता है। स्थानीय श्रोत से प्राप्त कोर्स एग्रीगेट की मात्रा का भी वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा के अनुसार शेखपुरा से प्राप्ति दिखलाते हुए प्रावधानित कार्य मद दर से ढुलाई मद में अनियमित भुगतान किया गया। उक्त अनियमित कृत के फलस्वरूप सरकार को हुई क्षति का आकलन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर द्वारा की गयी। जिसके अनुसार राजस्व की क्षति की आकलित राशि 1,99,71,777/- (एक करोड़ निन्यानवे लाख इकहत्तर हजार सात सौ सतहत्तर) रूपये मात्र बताया गया। अतएव एकरारनामा के विरूद्ध न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर ढुलाई मद में अनियमित भुगतान करने के लिए वे दोषी है। (2) इस योजना के तहत एस0एल0आर0 ब्रिज एवं स्नान घाट के निर्माण कार्य से उड़नदस्ता द्वारा एकत्रित नमूनों की जाँच गुण नियंत्रण प्रयोगशाला, खगौल से कराया गया। प्राप्त जाँचफल एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से परिलक्षित होता है कि स्नान घाट के निर्माण कार्य में प्रावधानित पी0सी0सी0 में सीमेंट, बालू एवं चिप्स का अनुपात 1ः2ः4 के जगह पर दो नमूनों में पी0सी0सी0 में सीमेंट एवं बालू का अनुपात 1ः3.35 एवं 1ः3.75 पाया गया है। अतएव पी0सी0सी0 में प्रावधान से अधिक बालू की मात्रा होना परिलक्षित है। अतएव न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर भुगतान प्रावधान के अनुरूप किये जाने से सरकार को राजस्व की क्षति होना स्थापित होता है, जिसके लिए वे दोषी हैं। (3) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 6.0.0(g), 9.0.0(x) एवं 10.0.0(i) से स्पष्ट होता है कि नियम के विरूद्ध कार्य में प्रत्युक्त सामग्री का भुगतान बिना एम0 एण्ड एन0 फार्म के सत्यापन कराये ही अनियमित ढंग से भुगतान किया गया है, जिसके लिए वे दोषी है। उक्त विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री समैयार के विरूद्ध गठित आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-653, दिनांक 13.03.2018 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराते हुए श्री समैयार से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की माँग की गयी। उक्त आलोक में श्री समैयार से प्राप्त बचाव बयान के मुख्य अंश निम्नवत है :- इनके कार्यकाल (दिनांक 27.02.12 से 01.06.12 तक) में चौथा एवं पाँचवां चालू विपत्र के हुए भुगतान को कोर्स एग्रीगेट की मात्रा 4064.264 घन मी0 का संवेदक द्वारा दिये गये एम0 एण्ड एन0 फार्म खनन एवं भूतत्व विभाग शेखपुरा के खनन पदाधिकारी द्वारा सत्यापित है। संचालन पदाधिकारी को सुसंगत मापपुस्त की प्रति दी गयी थी तथा दिनांक 27.03.17 को दिये गये बचाव बयान के कंडिका 6.1.2 में निवेदित किया गया है कि चतुर्थ चालू विपत्र का कार्य उनके पूर्वाधिकारी के कार्यकाल में हो चुका था। आरोप में उल्लेखित स्टोन एग्रीगेट की मात्रा 6758.64 घन मी0 एवं आकलित राजस्व की रू0 1,99,71,777/- (एक करोड़ निन्यानवे लाख इकहत्तर हजार सात सौ सतहत्तर) की हानि का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष कोई संबंध इनसे नहीं है।

सीमेंट, बालू एवं स्टोन एग्रीगेट का अनुपात का उल्लेख अनिवार्य है जबकि गुण नियंत्रण जाँचफल में मात्र सीमेंट एवं बालू का ही अनुपात 1ः3.35 एवं 1ः3.75 का जाँचफल दिया गया है। जो प्रावैधिक दृष्टिकोण से सही नहीं है। कार्य के दौरान कंक्रीट के क्यूब का निर्माण कर जाँच की गयी थी एवं Compressive Strength विशिष्टि के अनुरूप पाया गया था। तकनीकी परीक्षक कोषांग के पत्रांक-1045, दिनांक 06.07.1992 में निहित कंडिका 3 (I) में कन्ट्रोल सैंपल का भी उड़नदस्ता द्वारा पालन नहीं किया गया एवं कंडिका 2(1) में अंकित निदेश का अनुपालन भी शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-2, खगौल द्वारा नहीं किया गया। जिसमें Calcium Content Assume कर अनुपात निकाला गया है। जो नियम के विरूद्ध है। केन्द्रीय सर्तकता आयोग द्वारा यह अभिमत व्यक्त है कि Chemical Analysis Methods से आकलित सीमेंट एवं बालू तथा एग्रीगेट के अनुपात पर पुरा भरोसा नहीं किया जा सकता है। इसके स्थान पर ASTM designation C- 5/1966 को अपनाने का परामर्श दिया गया था। पुनः तकनीकी समिति द्वारा ASTM designation C-108-1977 को अपनाने का परामर्श दिया गया जिसे भी अब तक नहीं अपनाया गया है। अतः एस0एल0आर0 ब्रिज एवं स्नान घाट में 1ः2ः4 की ढलाई पुरी सर्तकता से करायी गयी थी तथा क्यूब टेस्ट में Compressive Strength विशिष्ट के अनुरूप पाया गया था।

आरोप 1 एवं 3 का मूल स्वरूप एक ही है। संचालन पदाधिकारी द्वारा उनके बचाव बयान का सम्यक समीक्षा किये बिना ही इस आरोप को प्रमाणित मान लिया गया, जिसका कोई औचित्य नहीं है। संचालन पदाधिकारी द्वारा एम0 एण्ड एन0 का सत्यापन अगस्त, 2012 में होने की पृष्ठभूमि में दिनांक 03.03.12 एवं 03.03.12 को क्रमशः चौथा एवं पाँचवां चालू विपत्र38 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 पारित किये जाने पर आपत्ति दर्ज की गयी है। भुगतान के बाद सक्षम प्राधिकार द्वारा सत्यापित एम0 एण्ड एन0 फॉर्म को अस्वीकार किया जाना संगत नहीं है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन, उपलब्ध अभिलेख एवं श्री समैयार से प्राप्त अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा प्रत्युत्तर) के समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- आरोप 1 ः-संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी के द्वारा दिये गये बचाव बयान एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन तथा अन्य अभिलेखों के समीक्षोपरांत अंकित किया गया है कि विषयांकित कार्य में स्थानीय श्रोत से ढुलाई की गयी निर्माण सामग्रियों के कारण अधिकाई भुगतान के आकलन से संबंधित अंतिम जाँच प्रतिवेदन के अनुसार निर्माण सामग्रियों के ढुलाई हेतु परिमाण विपत्र में निर्धारित लीड से कम दूरी से सामग्री की ढुलाई की गयी परन्तु आरोपित पदाधिकारी द्वारा प्रावधानित लीड का भुगतान किया गया। अतः लगाया गया आरोप प्रमाणित होता है। आरोपी श्री समैयार द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में कहा गया है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा सम्यक समीक्षा नहीं किया गया, स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि इनके द्वारा विषयांकित कार्य को दिनांक 27.02.12 से 01.06.12 तक में चौथा विपत्र एवं पाँचवां चालू विपत्र का भुगतान किया गया है तथा उड़नदस्ता जाँच में प्रश्नगत कार्य में 63.94 प्रतिशत स्थानीय श्रोत से कोर्स एग्रीगेट प्राप्त कर कार्य में उपयोग होने के बावजूद प्रावधानित लीड से भुगतान होना बताया गया है। आरोपी द्वारा ऐसा कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया कि जिससे स्थापित हो सके कि कार्य में व्यवहृत सम्पूर्ण सामग्री (कोर्स एग्रीगेट) की ढुलाई शेखपुरा से ही किया गया है। अतएव इस आरोप को प्रमाणित माना जा सकता है। आरोप 2 ः- संचालन पदाधिकारी द्वारा उड़नदस्ता द्वारा एकत्रित नमूनों के जाँचफल के आलोक में विशिष्टि के अनुरूप पी0सी0सी0 का कार्य नहीं कराने के क्रम में न्यून विशिष्टि के कार्य कराने के आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य के तहत एस0एल0आर0 ब्रिज एवं स्नान घाट के निर्माण कार्य से एक-एक अद्‌द पी0सी0सी0 का नमूना संग्रह कर प्रयोगशाला में जाँच करायी गयी है। जाँचफल के अनुसार प्रावधानित पी0सी0सी0 में सीमेंट, बालू एवं चिप्स के अनुपात 1ः2ः4 के जगह पर सीमेंट एवं बालू का अनुपात 1ः3.35 एवं 1ः3. 75 पाया गया है। प्रावधानित सीमेंट, बालू एवं चिप्स के अनुपात तथा जाँच में पाये गये सीमेंट बालू के अनुपात के आलोक में सीमेंट की मात्रा में निम्नवत रूप से कमी आती है :- (i) एस0एल0आर0 ब्रिज - 16.17%

(ii) स्नान घाट - 19.96%

तकनीकी परीक्षक कोषांग के पत्रांक-1045, दिनांक 06.07.1992 के अनुसार सीमेंट, बालू एवं चिप्स के अनुपात में 15-20 प्रतिशत की भिन्नता को अनुमान्य सीमा के अन्तर्गत माना गया है। उक्त के आलोक में प्रश्नगत कार्य में सीमेंट की मात्रा में पायी गयी कमी यथा 16.17 प्रतिशत एवं 19.96 प्रतिशत को मान्य सीमा के अन्तर्गत माना जा सकता है तथा न्यून विशिष्टि के पी0सी0सी0 का कार्य कराया जाना परिलक्षित नहीं होता है। आरोप 3 :- संचालन पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि आरोपित पदाधिकारी के स्तर से चौथा एवं पाँचवां चालू विपत्र क्रमशः 03.03.12 एवं 30.03.12 को पारित कर भुगतान किया गया, जबकि एम0 एण्ड एन0 फॉर्म का प्रथम सत्यापन अगस्त, 2012 में प्राप्त हुआ है उक्त के आलोक में आरोप प्रमाणित होेने का मंतव्य दिया गया है। आरोपी द्वारा कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है जिससे परिलक्षित हो सके कि इनके द्वारा मार्च 2012 में चौथा एवं पाँचवां चालू विपत्र के भुगतान के पूर्व एम0 एण्ड एन0 फॉर्म का सत्यापन कराया गया है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए इस आरोप को प्रमाणित माना जा सकता है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री समैयार के विरूद्ध गठित आरोप-2 यथा न्यून विशिष्टि के पी0सी0सी0 का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप भुगतान करने का आरोप अप्रमाणित पाया गया परन्तु आरोप-01 यथा कार्य में स्थानीय स्त्रोत से कोर्स एग्रीगेट प्राप्त कर, कार्य में उपयोग कर, ढुलाई मद में वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा में प्रावधानित लीड से अनियमित भुगतान करने एवं आरोप संख्या-03 यथा नियम के विरूद्ध कार्य में प्रयुक्त सामग्री का भुगतान बिना एम0 एण्ड एन0 फॉर्म के सत्यापन कराये ही अनियमित ढंग से भुगतान करने का आरोप प्रमाणित पाया गया।

2. अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री रंजन प्रसाद समैयार (आई0डी0-3223) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति कार्यपालक अभियंता, पुनपुन बराज प्रमंडल-01, गोह के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम 14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड दिये जाने का निर्णय लिया गया।

3. श्री समैयार के विरूद्ध उक्त विनिश्चित दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की माँग की गई, जिस पर आयोग के पत्रांक-178, दिनांक 25.04.19 द्वारा सहमति प्रदान की गई।

4. अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री रंजन प्रसाद समैयार (आई0डी0-3223) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति कार्यपालक अभियंता, पुनपुन बराज प्रमंडल-01, गोह के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम 14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।39 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 5. श्री रंजन प्रसाद समैयार (आई0डी0-3223) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति कार्यपालक अभियंता, पुनपुन बराज प्रमंडल-01, गोह को सेवा से बर्खास्त करने के दण्ड प्रस्ताव पर मंत्रिपरिषद का अनुमोदन प्राप्त है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

-------

22 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(मोति0)-08-03/2013(अंश-3)/1780--श्री प्रवीण कुमार (आई0डी0-5066) तत्कालीन सहायक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के विरूद्ध विभागीय उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन पत्रांक-उद0-002/2014-12 दिनांक 25.03.2015 के आलोक में नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना के तहत शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अन्तर्गत पूर्वी मुख्य नहर के पुनस्र्थापन कार्य में बरती गयी अनियमितता संबंधी निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-71, दिनांक 18.01.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 के तहत विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :- (1) उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन एवं गुण नियंत्रण जाँचफल के समीक्षोपरांत पाया गया कि नौवाँ चालू विपत्र के भुगतान अवधि तक एकरारनामा में प्रावधान के तहत कराये गये कार्य की मात्रा 10569.95 घन मी0 (कोर्स एग्रीगेट) के विरूद्ध 6758.64 घन मी0 स्थानीय श्रोत से प्राप्त कर एकरारनामा के विरूद्ध व्यवहार में लाया गया परिलक्षित है जो कोर्स एग्रीगेट की मात्रा का 63.94 प्रतिशत होता है। स्थानीय श्रोत से प्राप्त कोर्स एग्रीगेट की मात्रा का भी वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा के अनुसार शेखपुरा से प्राप्ति दिखलाते हुए प्रावधानित कार्य मद दर से ढुलाई मद में अनियमित भुगतान किया गया। उक्त अनियमित कृत के फलस्वरूप सरकार को हुई क्षति का आकलन कार्यपालक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर द्वारा की गयी। जिसके अनुसार राजस्व की क्षति की आकलित राशि 1,99,71,777/- (एक करोड़ निन्यानवे लाख इकहत्तर हजार सात सौ सतहत्तर) रूपये मात्र बताया गया। अतएव एकरारनामा के विरूद्ध न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर ढुलाई मद में अनियमित भुगतान करने के लिए वे दोषी है। (2) इस योजना के तहत एस0एल0आर0 ब्रिज एवं स्नान घाट के निर्माण कार्य से उड़नदस्ता द्वारा एकत्रित नमूनों की जाँच गुण नियंत्रण प्रयोगशाला, खगौल से कराया गया। प्राप्त जाँचफल एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से परिलक्षित होता है कि स्नान घाट के निर्माण कार्य में प्रावधानित पी0सी0सी0 में सीमेंट, बालू एवं चिप्स का अनुपात 1ः2ः4 के जगह पर दो नमूनों में पी0सी0सी0 में सीमेंट एवं बालू का अनुपात 1ः3.35 एवं 1ः3.75 पाया गया है। अतएव पी0सी0सी0 में प्रावधान से अधिक बालू की मात्रा होना परिलक्षित है। अतएव न्यून विशिष्टि के कार्य कराकर भुगतान प्रावधान के अनुरूप किये जाने से सरकार को राजस्व की क्षति होना स्थापित होता है, जिसके लिए वे दोषी हैं। उक्त विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री कुमार के विरूद्ध गठित आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-1327, दिनांक 16.08.2017 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराते हुए श्री कुमार से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की माँग की गयी। उक्त आलोक में श्री कुमार से प्राप्त बचाव बयान के मुख्य अंश निम्नवत है :- जाँच प्रतिवेदन में अंकित है कि जाँचफल के अनुसार विषयांकित कार्य में निर्माण सामग्री के रूप में स्थानीय रीभर बेड मटेरियल (RBM) का उपयोग होना प्रमाणित होता है। जबकि जाँचफल में "अधिकांश एक ही तरह के पत्थर से, अधिकांश रीभर बेड मटेरियल से" अंकित है। जबकि कार्य सम्पादन के दौरान गुणवत्ता प्रतिवेदन प्राप्त किया गया है। जिसमें इस प्रकार की कोई टिप्पणी अंकित नहीं है। इस संबंध में यह भी कहना है कि उप निदेशक, पथ निर्माण विभाग के पत्रांक-129, दिनांक 10.09.14 से प्राप्त जाँचफल में उनके द्वारा Blasted Rock एवं रीभर बेड मटेरियल के संबंध में स्पष्ट प्रतिवेदन है। किन्तु विभागीय उड़नदस्ता द्वारा करायी गयी जाँच में इस तथ्य को नहीं देखा गया। अतः गलत तथ्य के आधार पर स्थानीय श्रोत से लाये गये एग्रीगेट की गणना किया जाना न्याय संगत नहीं है। इनके पदस्थापन की तिथि 22.09.08 से 16.07.13 तक में आठवाँ चालू विपत्र तक प्रस्तुत मापी के जाँचोपरांत कार्यपालक अभियंता को उपस्थापित किया गया था। कार्य के निरीक्षण के समय कहीं भी स्थानीय पत्थर का उपयोग नहीं पाया गया। ऐसी स्थिति में निर्माण सामग्री, जिसका गुणवत्ता प्रतिवेदन प्राप्त था, के आधार पर यह सुनिश्चित किया जाना कि स्थानीय पत्थर का उपयोग किया गया है संभव नहीं था। एस0एल0आर0 ब्रिज एवं स्नान घाट के निर्माण में एकत्रित किये गये नमूनों के जाँचफल के आधार पर पी0सी0सी0 के कार्य गुणवत्ता के अनुरूप नहीं कराये जाने का प्रतिवेदन दिया गया। मुख्य अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण के कार्यालय द्वारा निर्गत जाँचफल में अंकित है कि व्यवहृत सीमेंट उपलब्ध नहीं रहने के कारण के0सी0सी0 सीमेंट में उपलब्ध कैल्शियम की मात्रा 34.03 मानकर गणना की गयी है। इस संबंध में तकनीकी परीक्षक कोषांग के पत्रांक-1045, दिनांक 06.07.1992 में जाँचाधीन कार्यों में मोर्टार/कंक्रीट के परीक्षण हेतु दिये गये निदेश का पालन नहीं किया गया। अतः त्रुटिपूर्ण जाँच के आधार पर कार्रवाई किया जाना विधि संगत नहीं है। श्री कुमार द्वारा एक पूरक बचाव बयान समर्पित किया गया, जिसमें पूर्व में दिये गये तथ्य के अतिरिक्त IS code 2386 Part-I 1963 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उक्त कोड में कंडिका 2.3 में अंकित निर्देश का अनुपालन नमूनाबिहार गजट, 12 फरवरी 2020 40 एकत्रित करने में नहीं किया गया। जिसमें 50mm के लिये 100kg सामग्री की आवश्यकता है जबकि उससे कम लिया गया है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन, उपलब्ध अभिलेख एवं श्री कुमार से प्राप्त अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा प्रत्युत्तर) के समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

आरोप 1ः-संचालन पदाधिकारी द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान आरोपी द्वारा उपलब्ध कराये गये बचाव-बयान, उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन तथा अन्य अभिलेखों के समीक्षोपरांत इस कार्य में स्थानीय स्त्रोत से ढुलाई की गयी निर्माण सामग्री के कार्य में उपयोग करने के कारण न्यून विशिष्टि के कार्य करने एवं वास्तविक लीड के बजाय प्रावधानित लीड से अनियमित भुगतान करने के आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

श्री कुमार द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में इस आरोप के संदर्भ में वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया। इसके अतिरिक्त इनके द्वारा IS code 2386 Part-I 1963 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उड़नदस्ता द्वारा उक्त कोड के कंडिका 2.3 में दिये गये निदेश के आलोक में नमूनों का संग्रह नहीं किया गया। IS code 2386 Part-I 1963 के कंडिका 2.3 के अवलोकन से स्पष्ट है कि उक्त कंडका में एग्रीगेट के Sieve analysis हेतु सैंपल की मात्रा का निर्धारण किया गया है अर्थात एग्रीगेट के गे्रडिंग की जाँच से संबंधित है न कि स्थानीय कोर्स एग्रीगेट के निर्धारण हेतु है।

उल्लेखनीय है कि श्री कुमार विषयांकित कार्य के प्रारंभ से 8th A/C bill के पारित होने तक अर्थात दिनांक 16.07. 13 तक कार्य में संलग्न रहे। अभिलेखों से ज्ञात है कि श्री कुमार द्वारा प्रथम चालू विपत्र से लेकर आठवें चालू विपत्र तक में ही कुल 10569.95 घन मी0 कोर्स एग्रीगेट से कराये गये कार्य में कुल 6758.64 घन मी0 स्थानीय श्रोत से प्राप्त कर कार्य में उपयोग किया जाना परिलक्षित है क्योंकि नौवाँ चालू विपत्र में आठवाँ चालू विपत्र में अंकित मात्रा को मात्र कैरी ओवर हुए अन्य कार्य मदों में कराये कार्यों की प्रविष्टि की गयी। अर्थात यह माना जा सकता है कि श्री कुमार द्वारा ही कराये गये कार्य में 63.94 स्थानीय सामग्री का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप भुगतान होने के कारण कुल 1,99,71,777/- (एक करोड़ निन्यानवे लाख इकहत्तर हजार सात सौ सतहत्तर) रूपये का सरकारी राशि का क्षति हुई।

तत्कालीन मुख्य अभियंता, श्री राम पुकार रंजन द्वारा दिनांक 18.02.2012 से ही कार्य में स्थानीय सामग्री का उपयोग होने का उदभेदन करते हुए विशिष्टि के अनुरूप कार्य कराने, पूर्व में स्थानीय सामग्री का किये गये उपयोग का आकलन करने, कार्य के भुगतान पर रोक लगाने का निदेश दिया जाता रहा। इसके बावजूद भी लगातार भुगतान हेतु आरोपी द्वारा विपत्र जाँचोपरांत अनियमित ढंग से समर्पित किया जाता रहा। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इनके द्वारा जानबूझ कर कार्य में स्थानीय सामग्री के उपयोग होने के बावजूद प्रावधान के अनुरूप संवेदक को लाभ पहुँचाने के लिए चालू विपत्र समर्पित किया जाता रहा। फलतः कुल 1,99,71,777/- (एक करोड़ निन्यानवे लाख इकहत्तर हजार सात सौ सतहत्तर) रूपये मात्र का क्षति होना परिलक्षित है जिसके लिये इन्हें जिम्मेवार माना जा सकता है।

आरोप 2ः-संचालन पदाधिकारी द्वारा उड़नदस्ता द्वारा एकत्रित नमूनें के जाँचफल के आलोक में विशिष्टि के अनुरूप पी0सी0सी0 का कार्य नहीं कराने के क्रम में न्यून विशिष्टि के कार्य कराने के आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य के तहत एस0एल0आर0 ब्रिज एवं स्नान घाट के निर्माण कार्य से एक-एक अद्‌द पी0सी0सी0 का नमूना संग्रह कर प्रयोगशाला में जाँच करायी गयी है। जाँचफल के अनुसार प्रावधानित पी0सी0सी0 में सीमेंट, बालू एवं चिप्स के अनुपात 1ः2ः4 के जगह पर सीमेंट एवं बालू का अनुपात 1ः3.35 एवं 1ः3. 75 पाया गया। प्रावधानित सीमेंट, बालू एवं चिप्स के अनुपात तथा जाँच में पाये गये सीमेंट बालू के अनुपात के आलोक में सीमेंट की मात्रा में निम्नवत रूप से कमी आती हैः-

(i) एस0एल0आर0 ब्रिज - 16.17% (ii) स्नान घाट - 19.96% तकनीकी परीक्षक कोषांग के पत्रांक 1045, दिनांक 06.07.1992 के अनुसार सीमेंट, बालू एवं चिप्स के अनुपात में 15-20 प्रतिशत की भिन्नता को अनुमान्य सीमा के अन्तर्गत माना गया है। उक्त के आलोक में प्रश्नगत कार्य में सीमेंट की मात्रा में पायी गयी कमी यथा 16.17 प्रतिशत एवं 19.96 प्रतिशत को मान्य सीमा के अन्तर्गत माना जा सकता है तथा न्यून विशिष्टि के पी0सी0सी0 का कार्य कराया जाना परिलक्षित नहीं होता है। अतएव इस आरोप को अप्रमाणित माना जा सकता है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में आरोप सं०-2 यथा न्यून विशिष्टि के पी0सी0सी0 का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप भुगतान करने का आरोप अप्रमाणित पाया गया, परन्तु आरोप-1 यथा कार्य में स्थानीय स्त्रोत से कोर्स एग्रीगेट प्राप्त कर कार्य में उपयोग कर ढुलाई मद में वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा में प्रावधानित लीड से अनियमित भुगतान करने के कारण सरकार को संभावित क्षति रू0 1,99,71,777/- (एक करोड़ निन्यानवे लाख इकहत्तर हजार सात सौ सतहत्तर) की सरकारी राशि की क्षति होने का आरोप प्रमाणित पाया गया।

2. अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा उक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री प्रवीण कुमार (आई0डी0-5066) तत्कालीन सहायक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सहायक अभियंता, नगर एवं आवास विभाग के विरूद्ध बिहार41 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम 14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड दिये जाने का निर्णय लिया गया।

3. श्री कुमार के विरूद्ध उक्त विनिश्चित दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की माँग की गई, जिस पर आयोग के पत्रांक-3583, दिनांक 28.03.19 द्वारा सहमति प्रदान की गई।

4. अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री प्रवीण कुमार (आई0डी0-5066) तत्कालीन सहायक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सहायक अभियंता, नगर एवं आवास विभाग के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम 14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।

5. श्री प्रवीण कुमार (आई0डी0-5066) तत्कालीन सहायक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सहायक अभियंता, नगर एवं आवास विभाग को सेवा से बर्खास्त करने के दण्ड प्रस्ताव पर मंत्रिपरिषद का अनुमोदन प्राप्त है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

26 अगस्त 2019

सं0 22/नि॰सि॰(डि॰)-14-07/2016/1823--श्री देवराज रजक (आई0डी0-4574), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, डिहरी प्रमंडल, डिहरी संप्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल रजौली, नवादा के पदस्थापन अवधि में उनके विरूद्ध मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, डिहरी से प्राप्त पत्र पत्रांक-299 दिनांक-30.01.2016 द्वारा CWJC No- 6513/2015 लक्ष्मण सिंह बनाम बिहार राज्य व अन्य में बरती गई अनियमितता के लिए अनुशासनिक कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। इसके आलोक में विभागीय पत्रांक-1005 दिनांक-16.06.2017 के द्वारा आरोप पत्र 'क' एवं साक्ष्य की प्रति संलग्न करते हुए श्री रजक से स्पष्टीकरण किया गया। पुनः विभागीय पत्रांक-1234 दिनांक-26.07.2017 के द्वारा जवाब समर्पित करने हेतु स्मारित किया गया। आरोप का बिन्दु निम्न है :- आरोप सं0-01 :- मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, डिहरी के पत्रांक-299 दिनांक-30.01.2016 के आलोक में ग्यारह स्मार एवं अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भभुआ के पत्रांक-1637 दिनांक-02.09.2016 के आलोक में चार स्मार के बावजूद माँगा गया प्रतिवेदन आपके द्वारा उपलब्ध नहीं कराया गया, जो आपकी कर्तव्यहीनता एवं उच्चाधिकारी की अवहेलना को परिलक्षित करता है। जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी हैं। आरोप सं0-02 :- मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, डिहरी द्वारा निर्गत सुनिश्चित वृति उन्नयन योजना के आदेश के विपरीत आदेश निकालकर आपके द्वारा श्री लक्ष्मण सिंह, सेवानिवृत जीप चालक को व्यक्तिगत लाभ पहुँचाया गया, जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी हैं। उक्त आरोप के संबंध में श्री रजक के द्वारा अपने स्पष्टीकरण में मुख्य रूप से बताया गया है कि मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, डिहरी (संप्रति मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, डिहरी) का पत्रांक-299 दिनांक-30. 01.2016 एवं अधीक्षण अभियंता, सिंचाई सृजन, भभुआ के पत्रांक-1637 दिनांक-02.09.2016 के आलोक में विषयांकित मामले से संबंधित तथ्य विवरणी अनुलग्नक सहित उनके कार्यालय का पत्रांक-1004 दिनांक-11.07.2015 द्वारा अधीक्षण अभियंता को समर्पित कर दिया गया था। जिसमें उनके द्वारा कुछ टिप्पणी भी की गई थी। इसी बीच जून' 2015 में उनका स्थानान्तरण कार्यपालक अभियंता, खेत विकास प्रमंडल, काडा, पूर्णियाँ के पद पर हो गया और विभागीय निदेश के आलोक में वे योगदान करने हेतु प्रस्थान कर गए। साक्ष्य रूवरूप अधीक्षण अभियंता, जलपथ अंचल, भभुआ का पत्रांक-1225 दिनांक-17.07.2015 की प्रति एवं तथ्य कथन की प्रति संलग्न किया गया। विभागीय पत्रांक-07 दिनांक-03.01.2018 के द्वारा श्री देवराज रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, डिहरी प्रमंडल, डिहरी के स्पष्टीकरण पर मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, डिहरी से मंतव्य की माँग की गयी। मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, डिहरी के पत्रांक-1252 दिनांक 05.07.2018 द्वारा मंतव्य उपलब्ध कराया गया। जिसमें निम्न तथ्यों का उल्लेख किया गया है :- श्री लक्ष्मण सिंह को मुख्य अभियंता, कार्यालय, डिहरी के कार्यालय आदेश सं0-1161 दिनांक-09.03.2006 द्वारा प्रथम A.C.P दिनांक-01.01.2000 से वेतनमान 4000-6000 में स्वीकृत किया गया तथा आदेश ज्ञापांक-5186 दिनांक-31.08. 2006 द्वारा प्रथम A.C.P की देय तिथि को दिनांक-01.01.2000 से संशोधित कर 09.08.1999 किया गया। कार्यालय आदेश सं0-3841 दिनांक-31.08.2006 द्वारा श्री सिंह को द्वितीय A.C.P दिनांक-09.08.1999 से वेतनमान 4500-7000 में स्वीकृत किया गया। श्री देवराज रजक द्वारा डिहरी प्रमंडल, डिहरी के आदेश सं0-1058 दिनांक-25.07.2015 के माध्यम से कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग, बिहार संप्रति सामान्य प्रशासन विभाग के अधिसूचना सं0-1468 दिनांक-25.04.2007 के आलोक में श्री सिंह का प्रथम विाीय उन्नयन एवं द्वितीय विाीय उन्नयन के तहत स्वीकृत वेतनमानों को अपने स्तर से संशोधित कर क्रमशः 4500-7000 एवं 5000-8000 किया गया। श्री रजक द्वारा मुख्य अभियंता, डिहरी के अनुमति के बिना मुख्य अभियंता, कार्यालय, डिहरी द्वारा स्वीकृत प्रथम एवं द्वितीय A.C.P में संशोधन कर दिया गया, जो नियमानुकूल नहीं है। श्री लक्ष्मण सिंह, सेवानिवृत वाहन चालक तृतीय संवर्ग के कर्मचारी के रूप में कार्यरत थें। मुख्य अभियंता कार्यालय, डिहरी के परिक्षेत्राधीन कार्यरत चतुर्थ वर्ग एवं तृतीय संवर्ग के कर्मचारियों के A.C.P और M.A.C.P कि स्वीकृति/संशोधन42 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 हेतु सक्षम प्राधिकार मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, डिहरी है। विभागीय अधिसूचना सं0-3058 दिनांक-30.06.2015 द्वारा श्री रजक का स्थानान्तरण आदेश निर्गत हो जाने के पश्चात भी उनके द्वारा डिहरी प्रमंडल, डिहरी के आदेश सं0-1058 दिनांक-25.07.2015 द्वारा सक्षम प्राधिकार के अनुमति/आदेश के बिना स्वीकृत प्रथम एवं द्वितीय A.C.P में संशोधन करना श्री सिंह को अनुचित लाभ पहुँचाने की मंशा से प्रेरित होना प्रतीत होता है। अतएव वर्णित तथ्यो के आलोक में श्री देवराज रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से प्राप्त स्पष्टीकरण को अस्वीकृत करने की अनुशंसा मुख्य अभियंता, डिहरी द्वारा की गई है। पूरे मामले को विभागीय स्तर पर समीक्षा की गई। समीक्षोपरांत मुख्य अभियंता से प्राप्त अनुशंसा के आलोक में श्री देवराज रजक को निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया :- 1. संगत वर्ष के लिए निन्दन की सजा दी जाय। 2. एक वार्षिक वेतनवृद्धि असंचयात्मक प्रभाव से रोकी जाय। उक्त निर्णित दण्डादेश के विरूद्ध पुनर्विचार करने हेतु श्री रजक द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया। पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत पाया गया कि पुनर्विलाकन अर्जी में उन्हीं तथ्यों को दोहराया गया है, जो स्पष्टीकरण में उन्होंने समर्पित किया था। पुनर्विलोकन अर्जी में कोई भी ऐसा नया तथ्य का समावेश नहीं है, जिसके आधार पर श्री रजक को दण्ड से मुक्ति के लिए विचार किया जा सके। उनके विरूद्ध गठित आरोप सं0-01 एवं 02 पूर्णतः प्रमाणित है। कोई विचारणीय तथ्य नहीं पाये जाने के कारण पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया। अतएव सरकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-2463, दिनांक 29.11.18 द्वारा संसूचित निम्न दण्ड - 1. संगत वर्ष के लिए निन्दन की सजा दी जाय। 2. एक वार्षिक वेतनवृद्धि असंचयात्मक प्रभाव से रोकी जाय। को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

27 अगस्त 2019

सं0 22/नि॰सि॰(मुज॰)-06-02/2019/1845--श्री पुरेन्द्र सिंह (आई0डी0-3714) तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-2, वाल्मीकिनगर को उनके उक्त अवर प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान जलापूर्ति प्रतिष्ठान के वार्षिक सम्पोषण का प्राक्कलन प्रमंडल से लौटाये जाने के मामले में अपने कार्यपालक अभियंता से गाली-गलौज करने, मारपीट करने एवं अभद्र व्यवहार करने के मामले में अभियंता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना से प्राप्त पत्र के आलोक में मामले के समीक्षोपरांत सरकार द्वारा श्री सिंह, सहायक अभियंता को विभागीय अधिसूचना संख्या-343 दिनांक 21. 02.2019 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(i) के तहत निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय पत्रांक-773, दिनांक 15.04.2019 द्वारा आरोप पत्र गठित करते हुए श्री सिंह, सहायक अभियंता (निलंबित) से निम्न आरोपों के लिए स्पष्टीकरण पूछा गया। आरोप-1- श्री राजेश कुमार, अभियंता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण के गै0स0प्रे0सं0-02, दिनांक 02.01.19 द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि श्री पुरेन्द्र सिंह, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-2, वाल्मीकिनगर द्वारा उक्त अवर प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 29.10.18 को सिविल एवं याँत्रिक अभियंताओं के साथ बराज के गेटों का संयुक्त निरीक्षण कर रहे कार्यपलाक अभियंता, शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर से कार्यक्रम के पश्चात गंडक बराज नियंत्रण कक्ष में जलापूर्ति प्रतिष्ठान के वार्षिक सम्पोषण का प्राक्कलन प्रमंडल से लौटाये जाने का हवाला देते हुए गाली-गलौज एवं मार पीट की गई। उनका यह आचरण वरीय पदाधिकारियों द्वारा दिये गये निदेश की अवहेलना, सरकारी कार्यों के प्रति लापरवाही एवं पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने को दर्शाता है। इस अशोभनीय एवं अभद्रपूर्ण घटना के लिए श्री पुरेन्द्र सिंह, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी दोषी प्रतीत होते हैं। आरोप-2- उक्त से स्पष्ट है कि श्री पुरेन्द्र सिंह, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-2, वाल्मीकिनगर का यह आचरण बिहार सरकारी सेवक अचार नियमावली के नियम 3(I) का उल्लंघन है। उक्त के आलोक में श्री पुरेन्द्र सिंह, सेवानिवृत अभियंता (निलंबित) द्वारा अपना स्पष्टीकरण का जवाब विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :- (i) वे दिनांक 26.03.18 को शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-2, वाल्मीकिनगर का प्रभार ग्रहण किए। प्रभार ग्रहण करने के पश्चात उन्हें जानकारी प्राप्त हुई कि दैनिक मजदूरों का पारिश्रमिक 20 प्रतिशत से 22 प्रतिशत काट कर भुगतान किया जा रहा है जिसका उन्होंने विरोध किया। कटौती को विरोध करने के कारण वे अलग-थलग पड़ गए तथा अभियंताओं द्वारा उनके साथ असहयोगात्मक रवैया अपनाया जाने लगा। (ii) दिनांक 29.10.18 को द्वितीय पाली 2P.M. तक उनकी ड्‌यूटी थी तथा उसी दिन असैनिक एवं यांत्रिक अभियंताओं द्वारा बराज गेटों का संयुक्त निरीक्षण भी था। दिनांक 27.10.18 को प्राक्कलन लौटाने वाला पत्र दो दिन बाद उन्हें हस्तगत कराने का प्रयास किया गया। उन्होंने पत्र के अग्रसारण पत्र पर ही अंकित कर दिया कि प्राक्कलन में कोई त्रुटि नहीं है।43 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 कार्यपालक अभियंता से प्राक्कलन लौटाने पर जब वे चर्चा प्रारंभ किए तो कार्यपालक अभियंता उग्र हो गए एवं अनाप-सनाप बकने लगे। इसी बात को लेकर दोनों में बहस हुई। कार्यपालक अभिंयता के साथ मार-पीट नहीं की गई। (iii) जब वे दिनांक 30.10.18 को जलापूर्ति प्रतिष्ठान में पम्प चलवा रहे थें तो प्रमंडलीय बड़ा बाबू के नेतृत्व में चार लोग आकर उनके चारो तरफ खडे हो गए। उसी समय कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता भी वहाँ पहुँ गए। चारो लोग उनके साथ गाली-गलौज करने लगते तथा मार पीट पर उतारू हो गए किन्तु दैनिक मजदूरों द्वारा उनका बचाव किया गया। इसकी जानकारी अधीक्षण अभियंता को है। (iv) शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर में कदाचार चरम पर है। जलापूर्ति प्रतिष्ठान में अधिष्ठापित जेनरेटर में डीजल की खपत का वर्षवार विवरणी निम्न प्रकार है :- वर्ष डीजल की खपत 1. वर्ष 2016-17 रू0 1,67,603/- 2. वर्ष 2017-18 रू0 1,33,281/- 3. वर्ष 2018-19 (01.04.18 से 30.09.18 तक) रू0 24,316/- उपर्युक्त विवरणी से स्पष्ट है कि जेनरेटर के डीजल में भी कदाचार किया गया है।

(v) बराज के कंट्रोल रूम से स्काडा कम्प्युटर प्रणाली लगने के बाद गेज रीडर को दैनिक मजदूर के रूप में नहीं रखा जाता है क्योंकि कम्प्यूटर प्रणाली सेंसर द्वारा जल स्तर को हर क्षण बताते रहता है। किन्तु आठ-आठ घंटो की तीन पाली में बाढ़ अवधि में तीन दैनिक मजदूर रखकर उनका बोगस भुगतान किया जाता है। प्रमंडल में किए जा रहे कदाचार का विरोध करने पर कार्यपालक अभियंता द्वारा साजिश रची गई है। (vi) कार्यपालक अभियंता के साथ किसी प्रकार की मार पीट नहीं की गई है। कनीय अभियंता द्वारा दिनांक 22.10.18 को प्राक्कलन दिया गया जिसे वे दिनांक 23.10.18 को हस्ताक्षरित कर प्रमंडल में सौंप दिए। अतः विलंब से प्राक्कलन समर्पित करने का आरोप सही नहीं है। (vii) जलापूर्ति प्रतिष्ठान के सम्पोषण मद में किए गए व्यय की विवरणी निम्न प्रकार है :-

वर्ष डीजल की खपत 1. वर्ष 2016-17 रू0 13,88,256/- 2. वर्ष 2017-18 रू0 15,80,000/- 3. वर्ष 2018-19 (01.04.18 से 30.09.18 तक) रू0 7,94,240/-

श्री पुरेन्द्र सिंह , सहायक अभियंता (निलंबित) से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- श्री सिंह द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण एवं इसके साथ संलग्न कागजात के अवलोकन से प्रतीत होता है कि इस प्रमंउल में अभियंताओं के बीच आपसी सामंजस्य नहीं है। श्री सिंह ने अपने स्पष्टीकरण के साथ जेनरेटर में डीजल की खपत एवं इसके सम्पोषण मद में व्यय की गई राशि का जो आंकड़ा उपलब्ध कराया है उसके विश्लेषण से इतना स्पष्ट है कि श्री सिंह अपने कर्त्तव्यों एवं दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी से कर रहे हैं। प्राक्कलन की छायाप्रति के अवलोकन से प्रतीत होता है कि कनीय अभियंता द्वारा दिनांक 22.10.18 को समर्पित प्राक्कलन अगले ही दिनांक 23.10.18 को श्री सिंह द्वारा अग्रसारित किया गया है। जहाँ तक कार्यपालक अभियंता द्वारा मार-पीट करने का प्रश्न है इस संबंध में कार्यपालक अभियंता द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई गई है। यह सम्पूर्ण मामला अभियंताओं के बीच उत्पन्न संवादहीनता एवं आपसी सामंजस्य के अभाव के कारण प्रतिफलित हुआ है। समीक्षोपरांत पाया गया कि यह मामला अभियंताओं के बीच उत्पन्न संवादहीनता एवं आपसी समन्वय के अभाव के कारण प्रतिफलित हुआ है। जिस कारण श्री पुरेन्द्र सिंह, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य प्रमंडल-02, वाल्मीकिनगर सम्प्रति निलंबित को विभागीय अधिसूचना संख्या-1577 दिनांक 23.07.19 द्वारा निलंबन से मुक्त किया गया। श्री सिंह के विरूद्ध प्रथम द्रष्टया ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। जिसके कारण विभागीय कार्यवाही संचालित किये जाने की आवश्यकता हो। अतएव वर्णित स्थिति में श्री सिंह, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध निम्न निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है :- (1) श्री सिंह के स्पष्टीकरण को स्वीकार करते हुए उन्हे आरोप मुक्त किया जाता है। (2) निलंबन अवधि (दिनांक 21.02.19 से दिनांक 22.07.19 तक) को कर्तव्य अवधि मानते हुए सम्पूर्ण वेतनादि (पूर्व में भुगतान किये गये जीवन निर्वाह भत्ता को घटाकर) का भुगतान किया जाता है। अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय श्री पुरेन्द्र सिंह, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य प्रमंडल-02, वाल्मीकिनगर सम्प्रति सहायक अभियंता द्वारा-श्री दीपक प्रधान, अवर सचिव (प्रबंधन), जल संसाधन विभाग, पटना को संसूचित किया जाता है। (1) श्री सिंह के स्पष्टीकरण को स्वीकार करते हुए उन्हे आरोप मुक्त किया जाता है। (2) निलंबन अवधि (दिनांक 21.02.19 से दिनांक 22.07.19 तक) को कर्तव्य अवधि मानते हुए सम्पूर्ण वेतनादि (पूर्व में भुगतान किये गये जीवन निर्वाह भत्ता को घटाकर) का भुगतान किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 44

28 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(पट0)-03-20/2018/1860--श्री कृष्णदेव प्रसाद (आई0डी0-4006) तत्कालीन अवर सचिव (प्रबंधन) सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग प्रमंडल-4, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना के पद पर पदस्थापन अवधि में उनके विरूद्ध बिना स्वच्छता (निगरानी) देखे बगैर कनीय अभियंता से सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति दिए जाने का आरोप प्रतिवेदित कर उप सचिव-1(प्रबंधन), जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना का गै0स0प्रे0संख्या-504, दिनांक 29.06.18 द्वारा आरोप पत्र साक्ष्य संलग्न कर अनुशासनिक कार्रवाई हेतु विभाग को उपलब्ध कराया गया।

श्री कृष्णदेव प्रसाद के विरूद्ध प्राप्त आरोप पत्र एवं साक्ष्य संलग्न कर विभागीय पत्रांक-1903, दिनांक 31.08.2018 द्वारा स्पष्टीकरण किया गया। प्राप्त जवाब के समीक्षोपरांत श्री कृष्णदेव प्रसाद के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही करने का निर्णय लिया गया। विभागीय संकल्प ज्ञापांक-790, दिनांक 16.04.2019 द्वारा निम्न आरोप के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के नियम-17 के तहत श्री कृष्णदेव प्रसाद के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। आरोप (1)-श्री कृष्णदेव प्रसाद, तत्कालीन अवर सचिव (प्रबंधन) के जल संसाधन विभाग में पदस्थापन अवधि में श्री सुरेश नारायण, तत्कालीन कनीय अभियंता के संबंध में निगरानी प्रशाखा द्वारा उपलब्ध कराए गए विभागीय आदेश संख्या-223 सहपठित ज्ञापांक-1413, दिनांक 18.07.16 को उनके स्तर से प्रशाखा-7 में हस्तगत नहीं कराया गया जिसके कारण दिनांक 09.08.16 को आहुत विभागीय प्रोन्नति समिति की बैठक में श्री नारायण को प्रोन्नति योग्य पाया गया एवं विभागीय कार्यवाही संचालित रहते हुए प्रोन्नति दे दिया गया जिसके लिए दोषी है।

(2) श्री कृष्णदेव प्रसाद, तत्कालीन अवर सचिव (प्रबंधन) जल संसाधन विभाग, प्रशाखा-09 के प्रभार में थे। श्री सुरेश नारायण पर निगरानी प्रशाखा द्वारा उपलब्ध कराए गए विभागीय कार्यवाही चलने संबंधी विभागीय आदेश संख्या-223 सहपठित ज्ञापांक-1413 दिनांक 18.07.16 प्रशाखा-09 को उपलब्ध कराया गया था। इस पत्र को उप सचिव-1(प्रबंधन) कोषांग/प्रशाखा-7 में ससमय उपलब्ध कराई गई होती तो इस भूल से बचा जा सकता था जिसके लिए दोषी हैं। उक्त आरोप के लिए संचालन पदाधिकारी द्वारा पत्रांक-639, दिनांक 28.06.19 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित किया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत यह निष्कर्षित किया गया कि श्री कृष्णदेव प्रसाद के विरूद्ध गठित आरोप पत्र इनके द्वारा समर्पित बचाव-बयान एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन एवं मंतव्य के आलोक में श्री प्रसाद का इस प्रकरण में कोई दोष नहीं है।

अतएव संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप प्रमाणित नहीं पाये जाने के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री कृष्णदेव प्रसाद, तत्कालीन अवर सचिव (प्रबंधन) सम्प्रति कार्यपालक अभियंता (सेवानिवृत), जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण एवं बचाव बयान को स्वीकार करते हुए श्री प्रसाद को आरोपमुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त अनुमोदित निर्णय श्री कृष्णदेव प्रसाद, तत्कालीन अवर सचिव (प्रबंधन) सम्प्रति कार्यपालक अभियंता (सेवानिवृत) को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

29 अगस्त 2019

सं0 22/नि॰सि॰(मुज॰)-06-11/2016/1882--श्री सुबोध प्रसाद शर्मा (आई0डी0-जे0 4749), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल सं0-1, वाल्मीकिनगर को उनके उक्त अवर प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान गंडक बराज के गेट सं0-33 के क्षतिग्रस्त होने, कार्य स्थल का समय-समय पर निरीक्षण नहीं किये जाने, बराज के देख-रेख एवं गेटों के संचालन में लापरवाही बरतने एवं अपने पदीय दायित्वों की घोर उपेक्षा करने के मामले में बरती गई अनियमितता के लिए अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा विभागीय अधिसूचना सं0-1663 दिनांक-03.08.2016 से निलंबित किया गया एवं तदोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1701 दिनांक-05.08.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17(2) मे निम्नलिखित आरोपों के लिए विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गई :- आरोप सं0-01 :- वाल्मीकिनगर स्थित गंडक बराज में दिनांक-21.07.2016 के शाम से दिनांक-22.07.2016 के सुबह तक जलश्राव में अत्याधिक वृद्धि होने के कारण गंडक बराज के गेटों का सही संचालन नहीं होने के कारण बराज के गेट सं0-33 क्षतिग्रस्त हो गया एवं पूर्वी मुख्य नहर में त्रीव गति से पानी प्रवेश करने के फलस्वरूप आर0डी0-6.0 पर नहर बाँध पर पानी ओभर टॉप कर गया। जिसके कारण त्रिवेणी पावर हाउस में यंत्रों की क्षति एवं कॉलोनी के घरों में भी क्षति हुई। जिसकी जाँच मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर, मुख्य अभियंता (याँ0) एवं जिला पदाधिकारी, पश्चिमी चम्पारण के स्तर पर गठित त्रिसदस्यीय समिति द्वारा की गई। प्राप्त तीनों जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत आपके विरूद्ध निम्न आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित पाये गये है :- 1. मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर के पत्रांक-1 (बराज) कैम्प वाल्मीकिनगर दिनांक-23.07.2016 में अंकित है कि बराज के प्रभारी श्री सुबोध प्रसाद शर्मा, अवर प्रमंडल पदाधिकारी, वाल्मीकिनगर थें जो घटना की रात बराज के कंट्रोल रूम से अनुपस्थित थें। उनके द्वारा गेटों को कम से कम समय में खोलने की व्यवस्था न तो रखी गयी थी और न ही घटना के समय गेटों को खोलने की त्वरित व्यवस्था की गयी। इसके अलावा उनके द्वारा जलश्राव45 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 बढ़ने की सूचना उच्चाधिकारियों को घटना की रात्रि में तत्काल नहीं दी गयी। फलतः स-समय गेट का संचालन नहीं होने के कारण गेट सं0-33 क्षतिग्रस्त हो गया। जो परिलक्षित करता है कि आपके द्वारा इतने महत्वपूर्ण कार्य में लापरवाही बरती गयी है जो आपकी कर्तव्यहीनता एवं कार्य के प्रति उदासीनता को दर्शाता है एवं जिसके लिए आप दोषी हैं। 2. जिला पदाधिकारी, पश्चिमी चम्पारण के पत्रांक-203/गो0 दिनांक-23.07.2016 से परिलक्षित होता है कि आप घटना के रात में सोए हुए थें। जेनरेटर में डिजल नहीं रहने एवं स्काडा ऑटोमेशन के कभी-कभी बंद रहने के कारण ड्‌यूटी पर तैनात कर्मी द्वारा अग्रेतर कार्रवाई नहीं किया जा सका एवं पानी का दबाव बढ़ता गया। जिस कारण गेट सं0-33 क्षतिग्रस्त हो गया। विदित हो कि आप उक्त गेट के प्रभारी थें तो आपात स्थिति से निपटने के लिए गेटों के संचालन हेतु समुचित एवं सुदृढ़ व्यवस्था नहीं की गयी। यहाँ तक कि रात्रि 10 बजे के बाद जलश्राव का लॉग बुक भरा हुआ नहीं पाया गया है। मुख्य अभियंता (याँ0) ने भी अपने पत्रांक-02 शिविर-वाल्मीकिनगर दिनांक-24.07.16 से उपलब्ध कराये गये निरीक्षण प्रतिवेदन में घटना क्रम को उल्लेख करते हुए निष्कर्षित किया गया है कि बराज के देख-रेख एवं गेटों के संचालन में संलग्न पदाधिकारी/कर्मी द्वारा सही समय पर न तो सही निर्णय लिया यगा और न ही पूर्व तैयारी की गयी एवं न ही स्थिति को संभालने तथा काबू मे रखने की किसी भी पदाधिकारी द्वारा समुचित कार्रवाई की गयी। फलतः इस तरह की घटना घटी। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि आपके लापरवाही एवं कर्तव्य का पालन नहीं करने के कारण इस प्रकार की घटना घटी है तथा क्षतिग्रस्त गेटों के मरम्मति पर सरकारी राजस्व की क्षति होना संभावित है एवं जिसके लिए आप दोषी हैं। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन मे निम्नलिखित बातें कही गई है :- (1) इस मामले में घटना यही है कि वाल्मीकिनगर स्थित गंडक बराज में दिनांक-21.7.2016 के शाम से 22.07.2016 के सुबह तक गंडक नदी के जलश्राव में अत्याधिक वृद्धि के कारण गंडक बराज का गेट सं0-33 क्षतिग्रस्त हो गया। पानी तीव्र गति से ओभर टॉप कर त्रिवेणी पावर हाउस के यंत्रों की क्षति एवं कॉलोनी के घंटों में क्षति हुई। अभियंतागण की लापरवाही के कारण विनाशकारी स्थिति उत्पन्न हो सकती थी। (2) आरोपी अभियंता पर मुख्य आरोप है कि मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर के द्वारा अनेकों बार दूरभाष पर एवं पत्रांक-297 दिनांक-18.07.2016 द्वारा आपात स्थिति से निबटने के लिए पर्याप्त सं0 मे मजदूर रखने का निर्देश दिया गया। किन्तु इस निर्देश का पालन नहीं हुआ। गेट समुचित रख-रखाव व देखभाल नहीं हुआ, गेट टुट गया। दिनांक-22.07.2016 के सुबह में उन्हें घर जगाने गया तो नहीं उठें। कार्य स्थल का सम्यक निरीक्षण नहीं किये जाने के कारण गेट संचालन में गंभर चूक हुई। अब क्षतिग्रस्त गेट को बनाने में जो व्यय होगा, वह Avoidable Expenditure हुआ। (3) आरोपी अभियंता ने बचाव बयान दिया है, उसमें से उन्होंने गेट संचालन कार्य के लिए मुख्य अभियंता (याँ0) मुजफ्फरपुर को जिम्मेवार माना है। इनके अनुसार इन्होंने मुख्य अभियंता (याँ0), मुजफ्फरपुर एवं वरीय अधिकारी को गेटों के Machanically संचालित करने जिलाधिकारी सहित सभी वरीय पदाधिकारी को सूचित करते, किन्तु दिनांक-21.07.2016 को उन लोगों के द्वारा स्थल पर उपस्थित रहते उचित कार्रवाई करने का कोई प्रमाण नहीं। (4) बराज गेट पर पर्याप्त मजदूर रखने का निर्देश था। यहाँ जो स्थिति हो रही है कि जेनरेटर में तेल नहीं था, जिस कारण गेट को मशीन के बदले Manually कुछ मजदुर से उठाने का प्रयास हुआ। इससे विलंब हुआ। गेट पर दबाव बढ़ा और गेट टुट गया। आपात स्थिति में भी बराज गेट पर मजदूर नहीं रखने और जेनरेटर में तेल नहीं रहने से सिविल के अभियंतागण की घोर लापरवाही है। (5) बाढ़ के समय इस तरह के कार्य की अपेक्षा वरीय पदाधिकारी से नहीं की जाती है। बाढ़ का समय आपाल काल की स्थिति है। थोड़ी सी लापरवाही से जानमाल की बड़ी क्षति हो सकती है। इस समय 24 घंटे अलर्ट रहने की जरूरत है। (6) बराज गेट टूट गया यह प्रमाणित है। दिनांक-21.07.2016 को आरोपी अभियंता कार्य स्थल से नदारद थें, यह भी प्रमाणित है। गेट टूटने पर दोड़-भाग करते हैं। आरोपी अभियंता ने कर्तव्य निर्वहण में घोर लापरवाही बरती है। बाढ़ के समय इनके लिए ड्‌यूटी के बजाय सोना ज्यादा महत्वपूर्ण था। इसके लिए गेट टूटने के लिए ये भी जिम्मेवार माने जा सकते हैं। प्रपत्र 'क' में गठित आरोप पूर्णतः प्रमाणित होते हैं। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1942 दिनांक-07.11.2017 द्वारा द्वितीयकारण पृच्छा की गई। उक्त के आलोक में श्री शर्मा द्वारा अपना द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :-

संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 7 (I) के संदर्भ में कहा गया है कि Dam Sefety के Expert Review Committee द्वारा परामर्शित Under Sluice गेट सं॰ 1 से 6 तथा 31 से 36 के S.S. Plate का रिपेयर तथा गेट सं॰ 7, 8, 9, 21 एवं 23 जो Buckled था के मरम्मति/बदलने के परामर्श का अनुपालन नहीं हो पाया था। यह कार्य याँत्रिक प्रभाग को कराना था। अत्याधिक जलश्राव के कारण गेट-33 के टूटे S.S. Plate एवं पेड़ फँस जाने के कारण गेट का उठाव नहीं होने के कारण गेट-33 क्षतिग्रस्त हो गया। मुख्य अभियंता के पत्रांक 297 दिनांक 18.07.16 से प्राप्त निदेश के पूर्व से ही कार्यपालक अभियंता द्वारा स्वविवेकपूर्वक 4 अद्‌द मजदूर रख लिये गये थे। उल्लेखित है कि गेटों का संचालन आदि कार्य में लगने वाले दैनिक मजजूद याँत्रिक प्रभाग को रखना था। फिर भी आपात स्थिति के लिये 4 अद्‌द मजदूर रखे गये थे।46 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 दिनांक 22.07.16 के सुबह 5ः00 बजे जगाये जाने के संबंध में कहा गया है कि बराज स्थल की महत्ता को देखते हुए प्रायः बराज पर ही रहा करते थे। घटना के दिन सुबह 5 बजे घटना की जानकारी देने हेतु कार्यपालक अभियंता/अधीक्षण अभियंता के आवास पर गये थे। गेटों के संचालन की जिम्मेवारी याँत्रिक प्रभाग तथा उनके द्वारा अनुबंधित संवेदक P.I. System Pvt. Ltd. पर थी। बाढ़ अवधि शुरू होने के पूर्व 15.06.16 को वाल्मीकिनगर बराज के सभी 52 गेटों को जुगाड़ विधि से याँत्रिक प्रभाग द्वारा संचालित किया गया था न की डैम सेफ्टी सेल द्वारा परामर्शनुसार किया गया। गेट क्षतिग्रस्त होने के पूर्व डैम सेफ्टी सेल द्वारा परामर्शित कार्यो को 15.06.16 तक प्रारम्भ नहीं किया गया था। गेट के रखरखाव याँत्रिक प्रभाग से संबंधित है जिसके लिये उन्हें बार-बार उच्चाधिकारियों एवं उनके द्वारा सूचित किया गया था। बराज पर मेरी पाली ड्‌यूटी नहीं थी। मेरे साथ मात्र एक कनीय अभियंता जो संविदा कनीय अभियंता थे तीनों पालियों का ड्‌यूटी करता था। क्योंकि बराज प्रमंडल में पदास्थापित अन्य तीन कनीय अभियंता में से दो की प्रतिनियुक्ति बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, बगहा में मुख्य अभियंता द्वारा की गयी थी। बराज के प्रभारी होने के नाते मैं प्रायः बराज पर ही रहा करता था। घटना के दिन भी मैं बराज पर था जिसकी पुष्टि जिला खनन पदाधिकारी एवं मुख्य अभियंता (याँ॰) द्वारा की गयी है। बराज पर प्रयाप्त मात्रा में डीजल उपलब्ध था समर्पित साक्ष्य लॉग बुक पूर्व में ही समर्पित किया गया था। बराज के गेटों का संचालन बिजली/जेनरेटर/मैनुअली किया गया है। अतः डीजल उपलब्ध नहीं रहने संबंधि आरोप मिथ्या है। बराज में गेट क्षतिग्रस्त होने के लिये संचालन कार्य में संलग्न संवेदक P I System Pvt. Ltd. को दोषी मानते हुए विभाग द्वारा 10 वर्षो के लिये कालीकृत किया गया है। घटना के दिन गेट के संचालन में याँत्रिक प्रभाग को पूर्ण सहयोग दिया गया। संचालन पदाधिकारी का कथन कि उभय पक्षों में किसी भी पक्ष ने अवसर दिये जाने के बावजूद भी कोई गवाह प्रस्तुत नहीं किया। जबकि उनके द्वारा पूर्व के बचाव बयान के कंडिका 22.0.0 में प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी से विभागीय साक्ष्यों का प्रतिपरीक्षण करने का अनुरोध किया था। परन्तु ऐसा नहीं किया गया। कृपया संचालन संबंधित Day by Day अंकित आदेश फलक उपलब्ध करायी जाय ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके। उल्लेखनीय है कि आरोप के समर्थन में सभी दस्तोवेजों को प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा प्रदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाना C.C.A. Rule के तहत आवश्यक है। एवं संबंधित पदाधिकारी के परीक्षण द्वारा उन दस्तावेजों को प्रमाणित किया जाय। उसके पश्चात आरोपी को प्रतिपरीक्षण का अवसर दिया जाय। परन्तु यह प्रक्रिया नहीं अपनायी गयी। एवं उन दस्तावेजो को सत्य मानकर संचालन पदाधिकारी द्वारा गलत ढंग से मंतव्य अंकित किया गया जिसे विधि सम्मत नहीं माना जा सकता है। संचालन पदाधिकारी द्वारा माननीय उच्च न्यायालय द्वारा State of U.P Vrs. Saroj Kumar Sinha के मामले में पारित न्यायादेश (2010) 10 SCC 972(Para-28) का भी उल्लंघन किया गया है।

श्री शर्मा के विभागीय कार्यवाही के दौरान दिनांक 30.11.17 को सेवानिवृत हो जाने के कारण इन्हें दिनांक 30.11. 2017 के प्रभाव से निलंबन मुक्त करते हुए इनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में विभागीय अधिसूचना संख्या-132, दिनांक 15.01.18 द्वारा सम्परिवर्तित किया गया।

श्री शर्मा, सेवानिवृत सहायक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये। श्री शर्मा तत्कालीन सहायक अभियंता द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में लगभग वही तथ्य उद्धित किया गया है जो उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। जिसकी विस्तृत समीक्षा संचालन पदाधिकारी के द्वारा अधियाचित विभागीय मंतव्य के समय किया गया। समीक्षोपरान्त श्री वर्मा तत्कालीन सहायक अभियंता को दायित्वों के सही ढंग से निर्वहन नहीं करने एवं घटित घटना का ससमय सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं देने के लिये दोषी पाये गये हैं। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि उनके द्वारा श्री वर्मा के विरूद्ध गठित आरोप से संबंधित सभी साक्ष्य, आरोपी के बचाव बयान, तथा विभागीय अभिमत के सम्यक समीक्षोपरान्त श्री वर्मा के विरूद्ध गठित दोनों आरोप को पूर्णतः प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। आरोपी द्वारा पूर्व में दिये गये बचाव बयान के अतिरिक्त कहा गया है कि संचालन पदाधिकारी ने C.C.A नियमावली एवं माननीय सर्वोच्य न्यायालय द्वारा वर्ष 2010 में पारित न्यायादेश के विपरीत उन्हें समुचित प्रतिपरीक्षण का अवसर दिये बिना एवं दस्तावेजों को सत्यापित कराये बिना ही सही मानकर मंतव्य दिया गया है। जो विधि सम्मत नहीं है। तथा संचालन प्रक्रिया में संधारित आदेश फलक की प्रति की माँग की गयी है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 6.0 में अंकित है कि उभय पक्षों में किसी भी पक्ष ने अवसर दिये जाने के बावजूद कोई गवाही हेतु गवाह प्रस्तुत नहीं की गयी। उक्त के आलोक में आरोपी के उक्त कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है।47 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 समीक्षोपरांत उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री शर्मा का द्वितीय कारण पृच्छा का जबाव अस्वीकार योग्य मानते हुए संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री शर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता को दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं करने, आपात स्थिति से निपटने हेतु समुचित तैयारी नहीं करने तथा घटित घटना का ससमय सूचना नहीं देने का आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सुबोध प्रसाद शर्मा, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल सं0-01 वाल्मीकिनगर सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

"10 (दस) प्रतिशत पेंशन की कटौती पाँच वर्षाें के लिए"। उक्त दण्ड प्रस्ताव पर विभागीय पत्रांक-1978, दिनांक 06.09.2018 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्श की माँग की गई। जिसके आलोक में बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा पत्रांक-1046 दिनांक 30.07.2019 द्वारा सहमति प्रदान की गई है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुबोध प्रसाद शर्मा, सेवानिवृत सहायक अभियंता, ग्रा0पो0-मफो, भाया-शेखपुरा, जिला-मुँगेर को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

"10 (दस) प्रतिशत पेंशन की कटौती पाँच वर्षाें के लिए"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

29 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(मुज0)-06-11/2016/1883--श्री सुभाष कुमार वर्मा (आई0डी0-एम0-0538) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (याँत्रिक) सिंचाई याँत्रिक प्रमंडल, वाल्मीकिनगर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान गंडक बराज के गेट सं0-33 के क्षतिग्रस्त होने में बरती गई अनियमितता के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-1662, दिनांक 03.08.2016 द्वारा निलंबित किया गया एवं तदोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं0-1704 दिनांक 05.08.16 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17(2) में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

आरोप सं0-1- वाल्मीकिनगर स्थित गंडक बराज में दिनांक 21.07.16 के शाम से दिनांक 22.07.2016 के सुबह तक गंडक नदी के जलश्राव में अत्यधिक वृद्धि होने के कारण गंडक बराज के गेट सं0-33 क्षतिग्रस्त हो गया एवं पूर्वी मुख्य नहर में तीव्र गति से पानी प्रवेश कर 6.00 आर.डी. पर नहर बांध ओभरटॉप कर गया। जिसके कारण त्रिवेणी पावर हाउस के यंत्रों की क्षति एवं कॉलोनी के घरों में भी क्षति हुई। इसकी जाँच मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर, मुख्य अभियंता (याँत्रिक) एवं जिला पदाधिकारी, पश्चिमी चम्पारण के द्वारा गठित त्रि-सदस्यीय समिति द्वारा किया गया। प्राप्त तीनों जाँच प्रतिवेदनों के समीक्षोपरांत आपके विरूद्ध निम्न आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित पाये गये हैं :-

1. गंडक बराज के गेटों के संचालन हेतु वार्षिक सम्पोषण कार्य को दिनांक 16.06.2016 को माननीय मंत्री महोदय द्वारा स्थल निरीक्षण के क्रम में दिनांक 30.06.2016 तक गंडक बराज के सभी गेटों को स्काडा सिस्टम के तहत परिचालन सुनिश्चित करने का निदेश दिया गया। पुनः अभियंता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अपने एन.आर.-154 दिनांक 13.07.2016 से आपको गंडक बराज पर कैम्प कर बराज के सभी गेटों का संचालन स्काडा सिस्टम से कराना सुनिश्चित करने का निदेश देते हुए अनुपालन प्रतिवेदन की मांग की गई। घटना के दिन आप कार्य स्थल से अनुपस्थित पाये गये। दिनांक 22.07.16 को घटित घटना की जाँच तीन स्तर पर करायी गई। तीनों जाँच प्रतिवेदन में स्पष्ट उल्लेख है कि गेटों का संचालन में स्काडा सिस्टम क्रियाशील नहीं रहा एवं आपात स्थिति में गेटों को मैनुअली संचालित करना पड़ा। साथ ही साथ गेट मैनुअली उठाने के क्रम में गेट सं0-33 भी क्षतिग्रस्त हो गया। उपरोक्त से स्पष्ट है कि आपके द्वारा अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं किया गया है एवं उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना भी की गई। फलतः इस तरह की घटना घटी। जिसके लिए आप दोषी हैं।

2. गेटों के स्काडा सिस्टम से संचालन कार्य में संवेदक पाई सिस्टम प्रा0 लि0 द्वारा कार्य नहीं कराने की स्थिति में विभागीय एन.आर. सं0-165 दिनांक 14.07.2016 से आपको एकरारनामा के सुसंगत कंडिकाओं के तहत कार्रवाई करने का लगातार स्पष्ट निदेश दिया जाता रहा, परन्तु आपके द्वारा न तो संवेदक के उपर कोई कार्रवाई की गयी न तो गेटों के सुचारू रूप से संचालन हेतु कोई वैकल्पिक व्यवस्था ही की गयी, जिसके कारण दिनांक 21.07.2016/ 22.07.16 को इस प्रकार की घटना घटित हुई। अगर आपके द्वारा विभागीय निदेशों के आलोक में ससमय सुमिचत कार्रवाई की गयी होती तो सम्भव था कि इस तरह की घटना नहीं घटती जो परिलक्षित करता है कि आपके द्वारा अपने दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही बरती गयी है। जिसके लिए आप दोषी हैं।

3. तीनों जाँच प्रतिवेदनों से परिलक्षित होता है कि आपका अपने अधीनस्थों/संवेदक पर नियंत्रण है, जो आपकी प्रशासनिक विफलता दर्शाता है। जिसके लिए आप दोषी है।48 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 4. गेट सं0-33 के क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण इसके मरम्मति आदि पर होने वाले संभावित व्यय के कारण सरकारी राशि का हानि होना स्वभाविक है। यह व्यय आपके कर्त्तव्यहीनता कार्य के प्रति लापरवाही, शिथिलता के कारण ही होना परिलक्षित है। जिसके लिए आप दोषी है। उक्त तीनों जाँच प्रतिवेदनों में लिखित तथ्यों से प्रमाणित हाता है कि आपके द्वारा गंडक बराज के देख-रेख एवं गेटों के संचालन में लापरवाही बरती गयी है। आपके द्वारा न तो ससमय सही निर्णय लिया गया और न ही आपका अपने अधीनस्थ पदाधिकारियों पर कोई नियंत्रण है। साथ ही आपके द्वारा किसी भी विपरीत परिस्थिति का सामना करने हेतु पूर्व से कोई तैयारी भी नहीं की गई, जो आपके कर्त्तव्यों का सम्यक निर्वहन नहीं किया जाना प्रमाणित करता है। फलतः इस तरह की घटना घटित हुई जिसके लिए आप दोषी है। संचालन पदाधिकारी को समर्पित बचाव बयान में श्री वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता (याँत्रिक) द्वारा मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :- (1) माननीय मंत्री, जल संसाधन विभाग, पटना के दिनांक 16.06.2016 के स्थल निरीक्षण के निर्देश के अनुपालन में लगातार दिनांक 30.06.2016 तक वाल्मीकिनगर में कैम्प किया गया। उनके द्वारा पाई सिस्टम को पत्रांक-651 दिनांक 17.06. 2016 को स्काडा के सभी गेटों को दिनांक 30.06.2016 तक चालू करने का निर्देश दिया गया। इस प्रकार वाल्मीकिनगर कैम्प कर 52 गेटों को स्काडा से चालू कराते हुए पत्रांक-699 दिनांक 27.06.2016 द्वारा अनुपालन प्रतिवेदन मुख्य अभियंता (याँ0) को भेज दिया गया। मुख्य अभियंता, सिविल, मुजफ्फरपुर द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में जिन 2, 12, 16, 18 एवं 19 गेटों का जिक्र किया गया, उसे उनके द्वारा वाल्मीकिनगर में कैम्प करते हुए ठीक कराया गया एवं एन0आर0 15.07.16 द्वारा मुख्य अभियंता, सिविल मुजफ्फरपुर को दी गयी, जिससे स्पष्ट होता है कि 52 गेट स्काडा से संचालित हो रहे थे। मात्र गेट संख्या-12 एवं 19 का इन्डोर (इनकोडर) खराब होने के कारण इसे बदलने हेतु पाई सिस्टम को उनके द्वारा निर्देश दिया गया एवं इसकी सूचना मुख्य अभियंता (याँ0) को भी दी गयी। तत्पश्चात्‌ मुख्य अभियंता द्वारा दिये गये निदेश के आलोक में माननीय मंत्री महोदय के सीतामढ़ी एवं मुजफ्फरपुर में दिनांक 15.07.2016 एवं दिनांक 17.07.2016 बैठक में भाग लिया गया। तत्पश्चात मुजफ्फरपुर में रहकर अंचल के कार्यों का निष्पादन किया गया एवं बाद में उन्हें छपरा भी जाना पड़ा था। परन्तु दिनांक 22.07.16 को 06ः00 बजे सुबह में श्री अतुल कुमार, कनीय अभियंता (याँ0) द्वारा दूरभाष पर उन्हें घटना की सूचना दी गयी। ज्ञातव्य हो कि विभागीय निदेश के आलोक में वे मुजफ्फरपुर अंचल का कार्य देख रहे थे, ऐसी परिस्थति में उनके द्वारा एक ही समय तीनों स्थान पर रहना संभव नहीं था। इस प्रकार उन पर अनुपस्थित रहने का आरोप न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता है। त्रिस्तरीय जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि घटना की रात्रि में अचानक नदी में जलश्राव बढ़ गया एवं पाई सिस्टम के दोनों कर्मी सोये पाये गये। इसी बीच अत्यधिक जलश्राव बढ़ने से गेट पर दबाव पड़ने से स्काडा फेल कर गया। जिस कारण कुछ गेटों को इलेक्ट्रीकली एवं मैन्युली उठाया गया। इस प्रकार पाई सिस्टम के कर्मी के समय पर सतर्क नहीं रहने के कारण दो पेड गेट संख्या-33 में फंस गये, जिसके दबाव से गेट संख्या-33 क्षतिग्रस्त हो गया। इस संबंध में जिलाधिकारी, बेतिया द्वारा स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है, जबकि मुख्य अभियंता, सिविल, मुजफ्फरपुर द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में इस तथ्य की अनदेखी की गयी। इस प्रकार त्रिस्तरीय जाँच समिति में गेट संख्या-33 के क्षतिग्रस्त होने के लिए पाई सिस्टम एवं उसके कर्मी को पूर्ण रूप से दोषी पाया है। अतः उन पर दायित्वों का निर्वहन नहीं करने एवं उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना करने का आरोप सही प्रतीत नहीं होता है। (2) श्री वर्मा द्वारा बतलाया गया है कि दिनांक 11.07.2016 से 15.07.2016 को वाल्मीकिनगर कैम्प कर के सारे गेटों को स्काडा से चालू कराया गया। साथ ही उनके द्वारा समय-समय पर निरीक्षण भी किया जाता रहा एवं पाई सिस्टम को निर्देशित किया जाता रहा है। उनके द्वारा अधीक्षण अभियंता के स्तर से पत्रांक-790 दिनांक 10.07.2016 एवं कार्यपालक अभियंता स्तर से पत्रांक-776 दिनांक 13.07.16 द्वारा एकरारनामा के तहत बराज पर अनुभवी एवं दक्ष कर्मी रखने हेतु निर्देश दिया गया ताकि स्काडा से गेटों के संचालन में किसी प्रकार की कठिनाई न हो। साथ ही उनको चेतावनी भी दी गयी कि विपरीत परिस्थितियों में पाई सिस्टम पूर्ण रूप से जिम्मेवार होंगे। उनके द्वारा पत्रांक7824, दिनांक 23.07.2016 एवं पत्रांक-828, दिनांक 24.07.2016 द्वारा दण्डात्मक कार्रवाई करने के साथ पाई सिस्टम को कालीकृत करने की अनुशंसा की गई। मुख्य अभियंता (याँ0) के जाँच प्रतिवेदन से यह स्पष्ट हुआ है कि पाई सिस्टम द्वारा उच्चाधिकारियों के आदेश की घोर अवहेलना की गयी जिस पर विभाग द्वारा पत्रांक-5409, दिनांक 04.10.2016 द्वारा 10 साल के लिए कालीकृत किया गया। जहाँ तक गेटों का सुचारू रूप से संचालन का प्रश्न है उसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था के तहत कार्यपालक अभियंता, बराज द्वारा दैनिक मजदूर का प्रावधान किया जाता है। इसके अतिरिक्त बराज पर जेनरेटर की व्यवस्था रहती है, जिसका संचालन एवं रख-रखाव असैनिक शाखा द्वारा किया जाता है। त्रिसदस्यीय जाँच प्रतिवेदन में भी उन्हें कहीं से दोषी नहीं पाया गया है। अतः उन पर लगाया गया आरोप सही प्रतीत नहीं होता है। (3) इस आरोप के संदर्भ में कहना है कि त्रिसदस्यीय जाँच प्रतिवेदन में उन्हें कहीं से भी दोषी नहीं पाया गया है। अतः उन पर प्रशासनिक विफलता का लगाया गया आरोप सही प्रतीत नहीं होता है। (4) ज्ञातव्य हो कि गण्डक बराज के 52 गेटों का रख-रखाव एवं संचालन का अनुबंध पाई सिस्टम के साथ था। गेटों को उठाने एवं गिराने का निर्देश बराज के असैनिक अभियंता नदी के जलश्राव के अनुसार पाई सिस्टम को दिया जाता है। त्रिसदस्यीय जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि पाई सिस्टम के दोनों कर्मी के सोये जाने एवं बराज पर प्रतिनियुक्त कर्मियाें को लापरवाही बरतने का दोषी पाया गया। उनके द्वारा सही समय पर सक्रिय नहीं होने के कारण गेट संख्या-33 पर दो पेड फंसने के कारण पानी के अधिक दबाव से गेट संख्या-33 टेढ़ा होकर क्षतिग्रस्त हो गया। त्रिसदस्यीय जाँच प्रतिवेदन में उन्हें कहीं से भी दोषी नहीं पाया गया। ज्ञातव्य हो कि अधीक्षण अभियंता अंचल में एक तकनीकी सलाहकार एवं दो सहायक49 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 अभियंता के पद के विरूद्ध कोई भी अभियंता अंचल में एक तकनीकी सलाहकार एवं दो अभियंता कार्यरत नहीं थे। इसी तरह वाल्मीकिनगर प्रमण्डल में 1 कार्यपालक अभियंता, 6 सहायक अभियंता एवं 18 कनीय अभियंता के पद के विरूद्ध मात्र संविदा पर नियुक्त 2 कनीय अभियंता कार्यरत थे। इस तरह वे तीन जगह के प्रभार में थे। उनके द्वारा अधीक्षण अभियंता के स्तर से बाढ़ संबंधित सुरक्षात्मक कार्यों एवं आपात स्थिति से निपटने हेतु उनके पत्रांक-110, दिनांक 28.01.2016 पत्रांक-291 दिनांक 05.03.2016 पत्रांक-432, दिनांक 07.04.2016 एवं पत्रांक-679 दिनांक 02.07.2016 द्वारा वाल्मीकिनगर द्वारा वाल्मीकिनगर में स्वतंत्र कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता के पदस्थापन हेतु अनुरोध किया परन्तु कोई कार्रवाई नहीं हुई फिर भी उनके द्वारा दायित्वों का निर्वहन पुरी निष्ठा एवं जवाबदेही के साथ किया गया है। अतएव आरोप से मुक्त किया जा सकता है। विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में ही श्री वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (निलंबित) के दिनांक 30.11. 2016 को सेवानिवृत हो जाने के कारण उन्हें दिनांक 30.11.2016 के प्रभाव से निलंबन मुक्त करते हुए इनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय अधिसूचना संख्या-190, दिनांक 07.02.17 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया। श्री वर्मा से प्राप्त बचाव बयान के आलोक में समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्न बातें कही गई हैं :- श्री वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (याँ0) सिंचाई याँत्रिक प्रमंडल, वाल्मीकिनगर सम्प्रति सेवानिवृत के द्वारा दिये गये स्पष्टीकरण बचाव बयान मुख्य अभियंता (याँ0) के द्वारा घटना के दो दिनों के पश्चात समर्पित प्रतिवेदन एवं जिलाधिकारी, पश्चिमी चम्पारण द्वारा दिये गये प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत यह स्पष्ट है कि श्री वर्मा मूल रूप से कार्यपालक अभियंता (याँ0) सिंचाई याँत्रिक प्रमंडल, छपरा के पद पर पदस्थापित थे तथा इसके अलावे श्री वर्मा को छपरा से सुदूर सिंचाई याँत्रिक प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के कार्याें का निष्पादन का दायित्व सौंपा गया था। इसके साथ ही सिंचाई याँत्रिक अंचल, मुजफ्फरपुर में भी प्रभारी अधीक्षण अभियंता (याँ0) के रूप में पदस्थापित किया गया था। इस अंचल के अन्तर्गत पड़ने वाले अन्य प्रमंडलों यथा मुजफ्फरपुर एवं समस्तीपुर के कार्यों का भी निरीक्षण एवं अनुश्रवण की जिम्मेवारी इनके उपर थी। बरसात के समय नदी में प्रवाहित Discharge का पुर्वानुमान करना उनके लिये संभव नहीं था। अतएव किस जगह पर कब रूका जाय, यह बिल्कुल उनके स्वविवेक एवं कार्य के औचित्य पर निर्भर कर रहा था। परन्तु कार्य के सुचारू रूप से संचालन करने हेतु उपलब्ध अभियंत्रण, स्थायी/अस्थायी कर्मचारी एवं उपलब्ध संसाधनों से पूर्व वर्ष की भांति काम कराया जा रहा था। अतः इनके द्वारा कार्य में लापरवाही बरतने, कर्तव्यों का पालन नहीं करने तथा उच्चाधिकारियों के आदेश का अवहेलना करने का आरोप सही प्रतीत नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए असहमति के निम्न बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-1441 दिनांक 07.11.2017 द्वारा श्री वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता (याँ0) से द्वितीय कारण पृच्छा की गई :- आरोप सं॰-01 :- जो तत्कालीन माननीय मंत्री महोदय तथा अभियंता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना के द्वारा दिये गये आदेश की अवहेलना करते हुए बराज के सभी गेटों का संचालन स्काडा सिस्टम से क्रियाशील नहीं कराने के कारण दिनांक-22.07.2016 को गेट सं॰-33 के क्षतिग्रस्त होने से संबंधित है। श्री वर्मा का कहना कि बराज के सभी 52 गेटों की स्काडा से चालू करते हुए पत्रांक-699, दिनांक-27.06. 2017 से अनुपालन प्रतिवेदन मुख्य अभियंता (यांत्रिक) को भेजा गया तथा अभियंता प्रमुख के दिनांक-10.07.2016 को दिये गये निदेश के अनुपालन मे दिनांक-11.07.2017 को वाल्मीकिनगर गये थें। इससे स्पष्ट है कि तत्कालीन माननीय मंत्री महोदय के द्वारा दिनांक-16.06.2016 को स्थल निरीक्षण के दौरान दिये गये निदेश के बावजूद दिनांक-27.06.2016 के बाद दिनांक-10.07.2016 तक वाल्मीकिनगर नहीं गये। आपके द्वारा यह भी कहा गया है कि मुख्य अभियंता (यांत्रिक) से दिनांक-14.07.2016 को प्राप्त निदेश के आलोक में दिनांक-15.07.2016 को वाल्मीकिनगर से लौटकर माननीय मंत्री महोदय के सीतामढ़ी एवं मुजफ्फरपुर में आयोजित बैठक मे दिनांक-16.07.2016 एवं 17.07.2016 को भाग लिया गया तथा दिनांक-22.07.2016 को घटना की सूचना मिलने पर वाल्मीकिनगर प्रस्थान किया गया। इससे स्पष्ट है कि दिनांक-17.07. 2016 के बैठक के बाद दिनांक-21.07.2016 तक भी बराज पर नहीं गये जबकि अभियंता प्रमुख के द्वारा NR-154 दिनांक-13.07.2016 एवं 201, दिनांक-21.07.2016 से गेट सं॰-2, 16, 18, 19 एवं अन्य गेटों के संचालन में हो रही समस्या को ठीक कराने हेतु श्री वर्मा को कैम्प करने का निदेश दिया गया था। मूल संचिका मे रक्षित अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि गेट सं॰-31 से 36, 7, 18, 29, 12, 19, 5, 22 एवं 16 मे कुछ न कुछ खराबी के कारण इन सभी गेटों का स्काडा सिस्टम कार्य नहीं कर रहा था। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि विभागीय निदेशों का उल्लंघन करते हुए दायित्वों का ससमय निर्वहन नहीं करने के कारण गेट क्षतिग्रस्त होने जैसी घटना घटित हुई। अतएव आरोप सं॰-01 प्रमाणित होता है। आरोप सं॰-02 :- जो संवेदक द्वारा स्काडा सिस्टम ठीक नही करने के फलस्वरूप विभागीय NR-165 दिनांक-14.07.2016 से एकरारनामा के तहत कार्रवाई करने के निदेश दिये जाने के बावजूद संवेदक पर कोई कार्रवाई नही करने एवं न ही स्काडा सिस्टम को ठीक कराने हेतु कोई वैकल्पिक व्यवस्था करने से संबंधित है। विभागीय NR-154 दिनांक-13.07.2016 से सभी गेटों को ठीक करते हुए अनुपालन प्रतिवेदन की माँग की गई। पुनः NR-165 दिनांक-14.07.2016 से संवेदक के विरूद्ध कार्रवाई करने का निदेश आपको दिया गया। दिनांक-19.07.2016 तक गेट ठीक नहीं होने की स्थिति में कार्यपालक अभियंता (असैनिक) भी अपने NR-134 दिनांक-19.07.2016 से सूचना विभाग को दिया गया। तत्पश्चात विभागीय NR-201 दिनांक-21.07.2016 से असंचालित गेट सं॰-12, 19, 05, एवं 22 को50 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 ठीक करने का निदेश आपको दिया गया एवं पुनः संवेदक के विरूद्ध एकरारनामा के तहत कार्रवाई करने का भी निदेश दिया गया। इस संदर्भ में आपके द्वारा कहा गया कि दिनांक-11.07.2016 से 15.07.2016 तक कैम्प कर सारे गेटों का स्काडा से चालु किया गया तथा दिनांक-16.07.2016 से 17.07.2016 को माननीय मंत्री महोदय के बैठक मे भाग लेने के बाद दिनांक-21.07.2016 तक अंचलीय कार्यों का निष्पादन किया गया तथा घटित घटना के बाद पत्रांक-824, दिनांक-23.07. 2016 तथा 828, दिनांक-27.07.2016 के द्वारा संवेदक पर दण्डात्मक कार्रवाई के साथ कालीकृत करने की अनुशंसा की गई इससे स्पष्ट होता है कि इसे महत्वपूर्ण कार्य को दरकिनार कर निदेश देने के बावजूद आपके द्वारा न तो बराज पर जाना हुआ और न ही संवेदक के विरूद्ध गेट क्षतिग्रस्त होने के पूर्व कोई कार्रवाई की गई। जो आपके कर्तव्यों मे लापरवाही एवं निदेशों की अवहेलना को दर्शाता है। अतएव आरोप सं॰-02 प्रमाणित होता है। आरोप सं॰-03 :- जो अधिनस्थ/संवेदक पर नियंत्रण नही होने के कारण आपकी प्रशासनिक विफलता से संबंधित है। आपके द्वारा कहा गया है कि जाँच प्रतिवेदन में आपको दोषी नहीं माना गया है। आरोप सं॰-01 एवं 02 में वर्णित तथ्यों से स्पष्ट है कि संवेदक पर आपका नियंत्रण नहीं रहने के कारण गेट सं॰-33 क्षतिग्रस्त होने के पूर्व गेटों का संचालन स्काडा सिस्टम से नहीं हो सका। फलतः गेट क्षतिग्रस्त होने जैसी घटना घटित होना परिलक्षित था। जो आपकी प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। अतएव आरोप सं॰-03 प्रमाणित होता है। आरोप सं॰-04 :- जो क्षतिग्रस्त गेट सं॰-33 के मरम्मति पर होने वाले व्यय से संबंधित है। आपका कहना है कि घटना की रात्रि में संवेदक के दोनों कर्मचारी सोए रहने एवं उनके सक्रीय नहीं रहने के कारण गेट में पेड़ फँस जाने के कारण गेट क्षतिग्रस्त हो गया। साथ ही सहायक अभियंता/कनीय अभियंता की कमी होना बताया गया है। आरोप सं॰-01 एवं आरोप सं॰-02 में वर्णित तथ्यों से स्पष्ट होता है कि गेटों का संचालन स्काडा सिस्टम से नहीं होने के कारण गेटों के उठाव में विलम्ब हुआ है। फलतः पानी के दबाव के कारण गेट में पेड़ फँस जाने के कारण गेट सं॰-33 को मैनुअली उठाने के क्रम में क्षतिग्रस्त होना परिलक्षित है जबकि असैनिक के पदाधिकारी द्वारा लगातार स्काडा से गेटों का संचालन हेतु अनुरोध किया गया है। साथ ही विभाग द्वारा भी निदेश दिया जाता रहा है परन्तु आपके द्वारा दिनांक-15.07.2016 के पश्चात दिनांक-22.07.2016 तक गेट को ठीक नहीं कराया जाना परिलक्षित है। जो आपकी लापरवाही एवं उदासीनता को दर्शाता है। उक्त के आलोक में श्री वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता (याँ0) द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी है :-

अभियंता प्रमुख के दिनांक 10.07.16 के निदेश के अनुपालन में दिनांक 11.07.17 से 15.07.17 तक कैम्प पर सभी गेटों को स्काडा सिस्टम से संचालित कराया था। जो कार्यपालक अभियंता के NR-5, 7 एवं 8 से भी स्पष्ट है कि सारे गेट संचालित हो रहे थे मात्र चार गेट 12, 18, 19 एवं 22 का संचालन Electrically किया जा रहा है। जिसे दिनांक 15.07.16 तक ठीक करा लिया गया था। साक्ष्य स्वरूप NR-11 संलग्न। ततपश्चात मुख्य अभियंता (याँ॰) के निदेशानुसार दिनांक 16. 07.16 एवं 12.07.16 माननीय मंत्री महोदय के बैठक में भाग लिया गया। ततपश्चात दिनांक 18.07.16 से 21.07.16 तक मुजफ्फरपुर अंचल के कार्यो मुख्य अभियंता (याँ॰) के निदेशानुसार किया गया। अतः आदेश का अवहेलना करने का आरोप गलत है। (ii) गेटों का संचालन Three Tier System के द्वारा किये जाने का प्रावधान है। प्रथम स्काडा, दूसरा Electrically एवं तीसरा मैनुअली संचालित भी किया जाता है। पूर्व में स्काडा में गड़बड़ी होने की स्थिति में Electrically गेटों का संचालन किया जाता रहा है। इसके अतिरिक्त आपात स्थिति में दैनिक मजदूरों एवं जेनरेटर की व्यवस्था बराज प्रमंडल द्वारा किया जाता है। चूँकि संवेदक द्वारा दिनांक 15.07.16 को स्काडा सिस्टम से चालू करा दिया गया था। अतएव संवेदक पर कारवाई नहीं की गयी। वैसे मैनें पत्रांक 776 दि॰ 13.07.16 द्वारा चेतावनी देते हुए भुगतान रोक दिया। कार्यपालक अभियंता असैनिक बराज के NR-134 दि॰ 19.07.16 एवं विभागीय NR-201 दि॰ 21.07.16 द्वारा गेट 12, 19, 5, 22 को असंचालित होने की बात कही गयी जो तकनीकी दृष्टिकोण से सही नहीं था क्योंकि गेटों का संचालन स्काडा से नहीं हो पा रहा था, परन्तु Electrically किया जा रहा था। (iii) बराज पर एक ही कनीय अभियंता, श्री विवेक कुमार पदस्थापित थे। जबकि हर पाली में एक सहायक अभियंता एवं एक कनीय अभियंता को होना आवश्यक था। बाढ़ अवधि में सुरक्षात्मक एवं आपात स्थिति के लिये स्वतंत्र रूप से कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता के पदस्थापन हेतु अनेको बार अनुरोध किया गया। ताकि कार्यो का सही पर्यवेक्षण एवं प्रशासनिक नियंत्रण हो सके एवं आवश्कता पड़ने पर त्वरित कारवाई की जा सके। परन्तु घटना घटित होने के पश्चात अभियंता प्रमुख द्वारा सहायक एवं कनीय अभियंता का पदस्थापन किया गया। घटना के समय मैं अंचल का कार्य देख रहा था। ऐसी स्थिति में मेरे लिये नदी का डिस्चार्ज का पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं था। अतः प्रशासनिक विफलता एवं अधीनस्थों पर नियंत्रण नहीं रहने का आरोप गलत है। (iv) स्काडा सिस्टम में गड़बड़ी होने के कारण मैनुअली उठाने में विलम्ब होने के कारण गेट-33 क्षतिग्रस्त हुआ गलत है क्योंकि कार्यपालक अभियंता के NR-21 दि॰ 21.07.16 से स्पष्ट है कि गेट सं॰ 12, 19, 22 एवं 05 का संचालन51 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 Electrically किया जा रहा था जबकि शेष 48 गेटों का संचालन स्काडा से हो रहा था एवं सारे गेट सुरक्षित एवं क्रियाशील थे। संलग्न प्रिंट आउट से स्पष्ट है कि दिनांक 20.07.16 एवं घटना के दिन 21.07.16 को सारे गेटों का संचालन स्काडा से हो रहा है। जिला पदाधिकारी, बेतिया द्वारा जाँच प्रतिवेदन में कहा है कि श्री सुबोध प्रसाद शर्मा एवं श्री रंजन कुमार, कनीय अभियंता कंट्रोल रूम से अनुपस्थित थे। जिला पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के अनुसार कंट्रोल रूम में उपर सोये सहायक अभियंता को जगाया गया तब तक पानी का स्तर इतना बढ़ गया कि गेट-33 पर दो पेड़ फँसे रहने एवं देर तक मैनुअली नहीं उठाये जाने के कारण यह फाटक फँस गया। इससे स्पष्ट है कि गेट की संचालन की प्रक्रिया प्रारम्भ होने के पूर्व से ही गेट सं॰ 33 क्षतिग्रस्त हो चुका था। मुख्य अभियंता, सिविल द्वारा जाँच प्रतिवेदन में कहा गया है कि श्री सुबोध प्रसाद शर्मा, सहायक अभियंता कंट्रोल रूम से अपने अन्य कर्मियों के साथ ड्‌यूटी पर उपस्थित नहीं थे। रात्रि में उन्हें 2 बजे उठाया गया। तब तक पानी का स्तर बढ़ने के कारण Over Flow करने लगा। इसके बावजूद सहायक अभियंता द्वारा गेटों का संचालन में त्वरित कारवाई नहीं की गयी एवं गेट क्षतिग्रस्त हो गया। उल्लेखनीय है कि स्काडा सिस्टम की गड़बड़ी होने की स्थिति में गेटों का संचालन पूर्व के भाँति Electrically गेटों का संचालन किया जाता है। पावर नहीं रहने पर जेनरेटर की व्यवस्था बराज पर चौबिस घंटे रहता है जिसका रखरखाव बराज प्रमंडल का है। जब जेनरेटर खराब अथवा डीजल नहीं रहने पर गेटों का संचालन मैनुअली किया जाता है। जिला पदाधिकारी से प्राप्त प्रतिवेदन के अनुसार डीजल उपलब्ध नहीं था। जिसके कारण जेनरेटर चलाने में विलम्ब हुआ। एवं कुछ गेटों का संचालन मैनुअली शेष तथा सारे गेट का संचालन स्काडा एवं Electrically किया गया। श्री वर्मा द्वारा अंतिम पारा में माननीय सर्वोच्य न्यायाल द्वारा Nand Kishore Prasad Vrs. State of Bihar के मामले में जो (1992) 2 Sec 10 में पारित न्याय निर्णय को उद्धित करते हुए कहा है कि तीन जगहों के प्रभार में होने के बावजूद भी दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी से किया है। अतः आरोप मुक्त करते हुए भुतलक्षी प्रभाव से प्रोन्नति दी जाय।

श्री वर्मा से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई समीक्षा में निम्न तथ्य पाए गए :-

श्री वर्मा तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (याँ॰) के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा की गयी। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप वार मामले की समीक्षा नही कर मात्र श्री वर्मा के याँत्रिक प्रभाग, छपरा एवं वाल्मीकिनगर एवं अंचल के तकनीकी सलाहकार के प्रभार में रहने का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि बरसात के समय नदी में प्रवाहित डिस्चार्ज का पूर्वानुमान करना संभव नहीं था। अतएव किस जगह कब रूका जाय, यह बिल्कुल उनके स्वविवेक एवं कार्य के औचित्य पर निर्भर था, के आधार पर कार्य में लापरवाही बरतने, कर्त्तव्याें का पालन नहीं करने एवं उच्चाधिकारियों के आदेश का अवहेलना करने के आरोप को अप्रामाणित मानते हुए श्री वर्मा को आरोप से मुक्त करने पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने की अनुशंसा की गयी है। को अस्वीकार योग्य मानते हुए श्री वर्मा के विरूद्ध गठित चारों आरोप के संदर्भ में प्राप्त बचाव बयान एवं साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए असहमति के बिन्दु पर श्री वर्मा से द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी। (I) आरोप-1 :- जो तत्कालीन माननीय मंत्री महोदय एवं अभियंता प्रमुख, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना के द्वारा दिये गये निदेशों का अवहेलना करते हुए बराज के सभी गेटों का संचालन स्काडा सिस्टम से क्रियाशील नहीं कराने के कारण ससमय गेटों का उठाव नहीं होने के फलस्वरूप दिनांक 22.07.16 को गेट सं॰ 33 क्षतिग्रस्त होने से संबंधित है। श्री वर्मा द्वारा बचाव बयान के कंडिका (I) में कहा गया है कि अभियंता प्रमुख के दिनांक 10.07.16 के निदेश के अनुपालन में दिनांक 11.07.16 से कैम्प कर दिनांक 15.07.16 तक बराज के सभी गेटों को स्काडा सिस्टम से संचालित करवा दिया गया था। जबकि जिला पदाधिकारी, मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर तथा मुख्य अभियंता (याँ॰) के जाँच प्रतिवेदन से परिलक्षित होता है कि स्काडा सिस्टम क्रियाशील नहीं रहने के कारण गेट को मैनुअली उठाव कराने में हुए विलम्ब के कारण गेट क्षतिग्रस्त हुआ है। आरोपी श्री वर्मा द्वारा बचाव बयान के कंडिका-4 (iv) में स्वयं स्वीकार किया गया है कि कुछ गेटों का संचालन मैनुअली एवं अन्य गेटों का संचालन स्काडा एवं Electrically किया गया। जब सभी गेटों का संचालन स्काडा से हो रही थी तो गेटों का उठाव मैनुअली एवं Electrically कराने की जरूरत क्यों पड़ी। अतएव आरोपी का कि दिनांक 15.07.16 तक सभ गेटों का संचालन स्काडा से संचालित करा दिया गया था सही प्रतीत नहीं होता है। श्री वर्मा द्वारा कहा गया है कि तीन कार्यालय के प्रभार में रहने के कारण बाढ़ अवधि की गंभीरता एवं कार्य की महत्ता को देखते हुए कब कहा रूका जाय स्वविवेक से निर्णय लेते हुए दिनांक 18.07.16 से 21.07.16 तक अंचल के कार्यो का सम्पादन किया गया। उक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। जबकि अभियंता प्रमुख द्वारा NR-154 दिनांक 13.07.16 एवं 201 दिनांक 27.07.16 से भी गेटों के संचालन में हो रही समस्या को ठीक कराने हेतु कैम्प करने का निदेश दिया गया था। अतएव श्री वर्मा का उक्त कथन स्वीकार योग्य नहीं है। आरोपी द्वारा कहा गया है कि गेटों का संचालन Three Tier System के द्वारा किया जाता है। (प्रथम स्काडा, दूसरा Electrically एवं तीसरा मैनुअली) स्काडा में खराबी रहने पर गेट को Electrically संचालन किया जाता रहा है। इसके अतिरिक्त आपात स्थिति में दैनिक मजदूरों एवं जेनरेटर की व्यवस्था की जाती है। जिसका रख रखाव बराज प्रमंडलबिहार गजट, 12 फरवरी 2020 52 द्वारा किया जाता है। विदित हो कि Electrically एवं Manually गेट के संचालन में विलम्ब होने की स्थिति से निपटने के लिये ही गेटों का रख रखाव तथा स्काडा सिस्टम से संचालित रहने के लिये ही PI System Pvt. Ltd. को दायित्व सौंप गया है एवं कार्य कराने का दायित्व याँत्रिक प्रमंडल को थी। अतएव स्काडा से गेट को संचालन कराना श्री वर्मा का दायित्व बनता था। उक्त के आलोक में आरोपी का कहना कि स्काडा में गड़बड़ी होने के कारण गेटों को मैनुअली उठाने में हुए विलम्ब के कारण गेट-33 क्षतिग्रस्त हुआ। पूर्णतः गलत एवं निराधार है स्वीकार योग्य नहीं है एवं इसमें इनका कोई दोष नहीं बनता है स्वीकार योग्य नहीं है। वर्णित तथ्यों के आलोक में विभागीय निदेशों का उल्लंघन करते हुए दायित्वों का ससमय निर्वहन नहीं करने के कारण गेट क्षतिग्रस्त होने जैसे घटित घटना के लिये दोषी पाये गये है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। (II) आरोप-2 :- जो संवेदक द्वारा स्काडा सिस्टम ठीक नहीं करने के फलस्वरूप विभागीय NR-165 दि॰ 14.07.16 से एकरारनामा के तहत कारवाई करने के दिये गये निदेश के बावजूद संवेदक के विरूद्ध कोई कारवाई नहीं करने तथा न ही स्काडा सिस्टम को ठीक कराने हेतु वैक्ल्पिक व्यवस्था नहीं करने से संबंधित है। अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि विभागीय NR-154 दि॰ 13.07.16 से सभी गेटों को ठीक कराते हुए अनुपालन प्रतिवेदन की माँग की गयी। पुनः NR-165 दि॰ 14.07.16 से संवेदक के विरूद्ध कारवाई करने का निदेश दिया गया। दिनांक 19.07.16 तक सभी गेटों का संचालन स्काडा से नहीं होने की स्थिति में विभागीय NR-201 दि॰ 21.07.16 से असंचालित गेटों को स्काडा से ठीक कराने तथा पुनः संवेदक के विरूद्ध एकरारनामा के तहत कारवाई करने का निदेश दिया गया। इस संदर्भ में आरोपी द्वारा पूर्व बचाव बयान में कहा गया है कि विभागीय निदेश के आलोक में दिनांक 11.07.16 से 15. 07.16 तक कैम्प कर सारे गेटों को स्काडा से चालू किया गया। तथा दिनांक 16.07.16 एवं 17.07.16 को माननीय मंत्री महोदय के बैठक में भाग लेने के बाद दिनांक 21.07.16 तक अंचलीय कार्य सम्पादन किया गया। तथा घटित घटना के बाद पत्रांक 824 दिनांक 23.07.16 एवं 828 दिनांक 27.07.16 के द्वारा संवेदक के विरूद्ध दण्डात्मक कारवाई की अनुशंसा की गयी। इस आरोप के संदर्भ में श्री वर्मा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में कोई भी तथ्य उद्धित नहीं दिया गया है। उपरोक्त से स्पष्ट है कि इतने महत्वपूर्ण कार्य को दरकिनार कर निदेश देने के बावजूद श्री वर्मा द्वारा न तो बराज पर गये। न ही संवेदक के विरूद्ध गेट क्षतिग्रस्त होने के पूर्व कारवाई नहीं की गयी जो उनके कर्त्तव्यों में लापरवाही एवं निदेश का अवहेलना दर्शाता है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। (III) आरोप-3 :- जो अधीनस्थ/संवेदक पर नियंत्रण नहीं होने के कारण इनकी प्रशासनिक विफलता से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में श्री वर्मा द्वारा न तो कोई तथ्य उद्धित किया गया है न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है। उपरोक्त कंडिका में वर्णित तथ्यों से स्पष्ट है कि संवेदक पर इनका कोई नियंत्रण नहीं रहने के कारण घटना के पूर्व सारे गेटों का संचालन स्काडा सिस्टम से नहीं हो सका एवं दिनांक 22.07.16 को गेट सं॰-33 क्षतिग्रस्त हो गया। जो इनकी प्रशासनिक विफलता दर्शाता है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। (IV) आरोप-4 :- जो क्षतिग्रस्त गेट सं॰-33 के मरम्मति पर होने वाले व्यय से संबंधित है। इस संदर्भ में श्री वर्मा द्वारा कहा गया है कि गेटों पर पानी का अत्याधिक दबाव होने तथा गेट सं॰-33 पर दो पेड़ फँसे रहने तथा देर तक मैनुअली गेट नहीं उठाये जाने के कारण गेट खराब हो गया था। इससे प्रमाणित होता है कि सहायक अभियंता एवं कर्मियों के सोये हुए रहने के क्रम तथा संचालन की प्रक्रिया प्रारम्भ होने के पूर्व ही गेट-33 क्षतिग्रस्त हुआ। अतएव वर्णित तथ्यों एवं जिला पदाधिकारी तथा मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के जाँच प्रतिवेदन से परिलक्षित है कि गेटों का संचालन स्काडा सिस्टम से नहीं होने के कारण गेटों का उठाव में विलम्ब हुआ है। एवं गेट में पेड़ फँस जाने के कारण गेट सं॰-33 को मैनुअली उठाने के क्रम में क्षतिग्रस्त हआ है। जबकि क्षेत्रीय असैनिक अभियंता द्वारा लगातार स्काडा सिस्टम को ठीक करने का अनुरोध किया गया है साथ ही विभागीय स्तर से भी निदेश दिया जाता रहा है। इसके बावजूद भी इनके द्वारा दि॰ 15.07.16 के पश्चात दिनांक 22.07.16 तक भी गेटों को ठीक नहीं कराया जाना परिलक्षित होता है एवं गेटों का ससमय उठाव नहीं होने के कारण दिनांक 22.07.16 को गेट क्षतिग्रस्त होना परिलक्षित है। जो इनकी लापरवाही एवं उदासीनता दर्शाता है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सुभाष कुमार वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता (याँत्रिक) को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है :-

"दस प्रतिशत पेंशन की कटौती पाँच वर्षों के लिए"। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुभाष कुमार वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता (याँ0), के विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर विभागीय पत्रांक-1979, दिनांक 06.09.2018 से द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की मांग की गई। जिसमें बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा अपने पत्रांक-1047, दिनांक 30.07.2019 द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर सहमति प्रदान की गई है।53 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुभाष कुमार वर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता (याँ0), न्यू बैंक कॉलोनी, कायस्थ टोला, पो0-बेला, शेरपुर, मुजफ्फरपुर को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता हैः-

"दस प्रतिशत पेंशन की कटौती पाँच वर्षों के लिए"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

1 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(गोपा0)27-03/2019/1886--मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, गोपालगंज के नव निर्मित सरकारी आवास पर दिनांक-29.08.2019 को घटित घटना के संदर्भ में मुख्य अभियंता, गोपालगंज आवास निर्माण योजना के अद्यतन भुगतान एवं लंबित भुगतान से संबंधित अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-01 जल संसाधन विभाग, पटना के पत्रांक-18 दिनांक-31.08.2019 से प्राप्त प्रारंभिक जॉच प्रतिवेदन में मुख्य अभियंता के आवास निर्माण में प्राक्कलन से बाहर जाकर अतिरिक्त कार्य कराने, कार्य कराकर संवेदक को भुगतान नहीं करने, सक्षम प्राधिकार की अनुमति के बगैर अपने मुख्यालय से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने आदि कतिपय प्रतिवेदित आरोपाें के लिए श्री मुरलीधर सिंह (आई0डी0 सं०-3177), मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, गोपालगंज को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 9(1)(क) के प्रावधानों के तहत अगले आदेश तक के लिए तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री सिंह का मुख्यालय संयुक्त सचिव, (प्रबंधन) जल संसाधन विभाग बिहार, पटना का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री सिंह को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री सिंह के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित करने से संबंधित संकल्प अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

1 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(गोपा0)27-03/2019/1887--मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, गोपालगंज के नव निर्मित सरकारी आवास पर दिनांक-29.08.2019 को घटित घटना के संदर्भ में मुख्य अभियंता, गोपालगंज आवास निर्माण योजना के अद्यतन भुगतान एवं लंबित भुगतान से संबंधित अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-01 जल संसाधन विभाग, पटना के पत्रांक-18 दिनांक-31.08.2019 से प्राप्त प्रारंभिक जॉच प्रतिवेदन में मुख्य अभियंता के आवास निर्माण में प्राक्कलन से बाहर जाकर अतिरिक्त कार्य कराने, कार्य कराकर संवेदक को भुगतान नहीं करने, सक्षम प्राधिकार की अनुमति के बगैर अपने मुख्यालय से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने आदि कतिपय प्रतिवेदित आरोपाें के लिए श्री जितेन्द्र प्रसाद सिंह (आई0डी0 सं०-3356), अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अंचल, गोपालगंज को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 9(1)(क) के प्रावधानों के तहत अगले आदेश तक के लिए तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री सिंह का मुख्यालय संयुक्त सचिव, (प्रबंधन), जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री सिंह को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री सिंह के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित करने से संबंधित संकल्प अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

1 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(गोपा0)27-03/2019/1888--मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, गोपालगंज के नव निर्मित सरकारी आवास पर दिनांक-29.08.2019 को घटित घटना के संदर्भ में मुख्य अभियंता, गोपालगंज आवास निर्माण योजना के अद्यतन भुगतान एवं लंबित भुगतान से संबंधित अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-01 जल संसाधन विभाग, पटना के पत्रांक-18 दिनांक-31.08.2019 से प्राप्त प्रारंभिक जॉच प्रतिवेदन में मुख्य अभियंता के आवास निर्माण में प्राक्कलन से बाहर जाकर अतिरिक्त कार्य कराने, कार्य कराकर संवेदक को भुगतान नहीं करने, सक्षम प्राधिकार की अनुमति की बगैर अपने मुख्यालय से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने आदि कतिपय प्रतिवेदित आरोपाें के लिए श्री सत्येन्द्र54 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 कुमार (आई0डी0 सं०-3911), कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, गोपालगंज को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 9(1)(क) के प्रावधानों के तहत अगले आदेश तक के लिए तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री कुमार का मुख्यालय संयुक्त सचिव, (प्रबंधन) जल संसाधन विभाग बिहार, पटना का कार्यालय निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री कुमार को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित करने से संबंधित संकल्प अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

--------

2 सितम्बर 2019

सं0 22/नि॰सि॰(मुज॰)-06-05/2019/1904--श्री विकास कुमार (आई0डी0-5458), तत्कालीन सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल, पटना को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान विभागीय स्थानांतरण आदेश में दिए गए निदेशों की अवहेलना करने से संबंधित अवर सचिव (प्रबंधन) से प्राप्त पत्र के आलोक में मामले के समीक्षोपरांत श्री कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध निम्नलिखित आरोपों के लिए आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-1224 दिनांक-19.06.2019 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया। आरोप :-श्री विकास कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल, पटना को विभागीय अधिसूचना संख्या-4632, दिनांक 12.12.18 द्वारा शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल, खगौल, पटना से अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-1 वाल्मीकिनगर (शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर) के पद पर स्थानांतरित किया गया था। उक्त अधिसूचना के कंडिका-4 में यह स्पष्ट रूप से निदेशित था कि संबंधित नियंत्री पदाधिकारी अपने अधीनस्थ के सहायक अभियंताओं को स्थानीय व्यवस्था के तहत दिनांक 18.12.2018 तक प्रभार का आदान-प्रदान करना सुनिश्ति करेंंगे, अन्यथा नवपदस्थापित सहायक दिनांक 19.12.2018 के प्रभाव से स्वतः भारमुक्त होकर दिनांक 20.12.2018 के पूर्वाह्‌न तक नवपदस्थापित पद का प्रभार ग्रहण कर इसकी सूचना विभाग को देंगे। साथ ही साथ यह भी निदेश संसूचित था कि नवस्थानान्तरित सहायक अभियंताओं का माह दिसम्बर 2018 का वेतनादि का भुगतान नवपदस्थापन स्थान से होगा। उपर्युक्त निदेश के बावजूद भी उनके द्वारा निर्धारित तिथि 20.12.2018 के पूर्वाह्‌न तक नवपदस्थापित पद पर योगदान नहीं दिया गया। उनका यह आचरण विभागीय आदेश/निदेश की अवहेलना एवं पदीय दायित्वों एवं कर्त्तव्यों के प्रति उदासीनता को दर्शाता है। उनका यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम-3(i) के प्रतिकूल है। उक्त के आलोक में श्री कुमार, सहायक अभियंता, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल सं0-01, वाल्मीकिनगर द्वारा अपने पत्रांक-59 दिनांक-16.07.2019 द्वारा पूछे गये स्पष्टीकरण का जवाब विभाग में समर्पित किया गया, जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :- (1) विभागीय अधिसूचना सं0-4632 दिनांक-12.12.2018 द्वारा मेरा स्थानान्तरण शीर्ष कार्य प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अन्तर्गत अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-01, वाल्मीकिनगर के रूप में हुआ। (2) स्थानान्तरण आदेश के पूर्व से ही मैं अपनी पत्नी का ईलाज पटना में करा रहा था। डॉक्टर के द्वारा पत्नी को दवाईयों के साथ-साथ Complete bed rest का परामर्श दिया गया था। पटना में मेरे अलावा मेरी पत्नी की देखभाल करने वाला कोई और नहीं है। ऐसी परिस्थिति में बीमार पत्नी को अकेला छोड़कर वाल्मीकिनगर, नव पदस्थापित स्थान पर प्रभार ग्रहण करने जाना काफी जोखिम भरा कार्य था। मै अपनी बीमार पत्नी के प्रति अपने दायित्वों को अनदेखा नहीं कर सका। मैं सरकारी कार्यों का निष्पादन करते हुए अपनी पत्नी की देखभाल करता रहा। इस संबंध में मेरे द्वारा कार्यपालक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-1, खगौल, पटना को मौखिक रूप से जानकारी भी दी गयी थी। मेरी पत्नी के अस्वस्थ होने की पुष्टि माननीय मंत्री, पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक-150 (आ0) दिनांक-13.12.2018 से भी होती है, जो मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, अनिसाबाद, पटना के गैर सरकारी प्रेषण सं0-490 दिनांक-15.12.2018 द्वारा भी होती है, जो कार्यपालक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-1, खगौल, पटना को दिनांक-17.12.2018 को प्राप्त हुआ है। (3) पत्नी की तबियत में सुधार होते ही मैं दिनांक-14.01.2019 को अपना प्रभार सौंप कर दिनांक-17.01.2019 को अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-01, वाल्मीकिनगर का प्रभार ग्रहण कर लिया। सरकारी कार्यों के साथ-साथ पति के रूप में बीमार पत्नी की देखभाल के दायित्व का निर्वहन करते हुए मेरे द्वारा विभागीय आदेश के अनुपालन में थोड़ा विलम्ब हुआ, जो परिस्थितिजन्य जरूरत थी। श्री विकास कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- अवर सचिव (प्रबंधन) के पीत-पत्र के द्वारा श्री विकास कुमार (आई0डी0-5458), अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-1, वाल्मीकिनगर के विरूद्ध विभागीय आदेश/निदेश की अवहेलना करने के आरोप में अनुशासनिक55 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है। पीत-पत्र के साथ संलग्न संबंधित संचिका की छायाप्रति के अवलोकन से प्रतीत होता है कि श्री कुमार का स्थानांतरण विभागीय अधिसूचना सं0-4632 दिनांक-12.12.2018 द्वारा किया गया था। उक्त अधिसूचना के क्रमांक 4 के द्वारा निदेश संसूचित था कि संबंधित नियंत्री पदाधिकारी स्थानांतरित सहायक अभियंता को दिनांक-18.12.2018 के पूर्वाहन से नवपदस्थापित कार्यालय का प्रभार निश्चित रूप से ग्रहण कर इसकी सूचना विभाग को उपलब्ध कराना सुनिश्चित करेंगें। विभागीय निदेश का अनुपालन श्री कुमार के द्वारा नहीं किया गया, जिसके लिए स्पष्टीकरण की माँग की गई। श्री कुमार से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा प्रबंधन स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत श्री कुमार से प्राप्त स्पष्टीकरण को अस्वीकार करते हुए उनके विरूद्ध अनुशासनिक कार्रवाई करने का प्रस्ताव माननीय मंत्री महोदय के अनुमोदनोपरांत निगरानी प्रशाखा को प्राप्त कराया गया। श्री कुमार के विरूद्ध आरोप पत्र गठित कर स्पष्टीकरण की माँग की गई। श्री कुमार द्वारा स्पष्टीकरण समर्पित किया गया। जिसमें कहा गया है कि स्थानांतरण आदेश के पूर्व ही वे अपनी पत्नी का इलाज पटना में करा रहे थें। डॉक्टर द्वारा पत्नी को Complete bed rest देने का परामर्श दिया गया था। चूँकि पटना में उनके अलावा पत्नी का देखभाल करने वाला कोई नहीं था इसलिए बीमार पत्नी को अकेला छोड़कर नवपदस्थापित स्थान पर योगदान नहीं कर सका। पत्नी की तबियत में सुधार होते ही वे दिनांक-14.01.2019 को अपना प्रभार सौंप कर दिनांक-17.01.2019 को अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य प्रमंडल-1, वाल्मीकिनगर का प्रभार ग्रहण कर लिया गया। इस आधार पर श्री कुमार ने सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए आरोप मुक्त करने का आग्रह किया है। श्री कुमार ने अपने स्पष्टीकरण में नवपदस्थापित स्थान पर स-समय योगदान नहीं करने का कारण पत्नी का बीमार होना बताया है। श्री कुमार ने अपने स्पष्टीकरण में ऐसा कोई साक्ष्य संलग्न नहीं किया है। जो उनके कथन की पुष्टि करता हो। पत्नी की बीमारी का बहाना बना कर नवपदस्थापित स्थान पर योगदान नहीं देना स्पष्ट रूप से विभागीय दिशा निर्देश का उल्लंघन है। अतएव श्री कुमार का स्पष्टीकरण स्वीकार योग्य नहीं है एवं उनके विरूद्ध आरोप पत्र में गठित आरोप प्रमाणित पाया जाता है। समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री विकास कुमार, अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल-1, वाल्मीकिनगर को विभागीय अधिसूचना सं0-1904 दिनांक-02.09.2019 से निम्न दण्ड संसूचित किया गया है :- ''एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक''

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री विकास कुमार, अवर प्रमंडल पदधिकारी, शीर्ष कार्य अवर प्रमंडल सं0-01 वाल्मीकिनगर को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता हैः-

''एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

-------

2 सितम्बर 2019

सं0 22/नि॰सि॰(वीर॰) 07-02/18/1905--श्री सतीश कुमार वर्मा, तत0 कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल, सुपौल के पद पर पदस्थापित थे तब आपके विरूद्ध योजना एवं विकास विभाग, पटना से प्राप्त निम्न आरोप के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-2361, दिनांक 15.11.18 द्वारा इन्हें निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प सं०-2364, दिनांक 15.11.18 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई :-

(i) श्री वर्मा, कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल, सुपौल द्वारा विभागीय कार्य के निष्पादन में अभिरूचि नहीं लिया गया।

(ii) श्री वर्मा द्वारा उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना की गई। (iii) श्री वर्मा द्वारा सरकारी राशि के निष्पादन में लापरवाही बरती गई। (iv) श्री वर्मा द्वारा जान-बूझकर सरकारी राशि का दुरूपयोग किया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के निष्कर्ष से सहमत होते हुए श्री सतीश कुमार वर्मा, तत0 कार्यपालक अभियंता को उपर्युक्त आरोप को अप्रमाणित मानते हुए निलंबन से मुक्त करते हुए विभागीय कार्यवाही समाप्त करने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया है।

अतः उक्त निर्णय के आलोक में श्री सतीश कुमार वर्मा, तत0 कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल, सुपौल सम्प्रति सेवानिवृत को सेवानिवृति की तिथि दिनांक 31.07.19 से निलंबन मुक्त करते हुए इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को समाप्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 56

3 सितम्बर 2019

सं0 22/नि॰सि॰(मुज॰)-06-11/2008/1918--श्री रविन्द्र कुमार (आई0डी0-3276) तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल शिवहर सम्प्रति कार्यपलाक अभियंता को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान बागमती नदी के दायाँ एफलक्स बाँध के कटएण्ड के 2362मी0 से 3262मी0 तक बेलवा इनरवा के पास बाढ़ 2008 के पूर्व HSCL द्वारा कराए गए रिभर्टमेंट कार्याें में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा की गयी। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-1143 दिनांक-16.10.2012 द्वारा श्री कुमार से स्पष्टीकरण पूछा गया एवं तत्पश्चात विभागीय अधिसूचना सं0-1720 दिनांक-05.04.2015 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

आरोप सं0-01 :- बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई कार्य विशिष्टि के विपरीत डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का क्रेट तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाया गया। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

आरोप सं0-02 :- ब्रीक रेटिंग कार्य में विशिष्टि के विपरीत कमतर गुणवाा के 10 से 15 प्रतिशत ईंट के टुकड़े का उपयोग कर सरकारी राजस्व का क्षति पहुँचाना। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

आरोप सं0-03 :-उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के अनुसार जाँच की तिथि 16.01.2009 तक भुगतान नहीं हुआ था। मुख्य अभियंता के पत्रांक-593 दिनांक-25.02.2015 से स्पष्ट है कि कराए गए कार्य का भुगतान दिनांक-10.10.2009 को किया गया है। चूँकि उड़नदस्ता जाँच में न्यून विशिष्टि का वी0ए0 वायर क्रेट (Double knot के जगह पर Single knot) का तथा ब्रीक क्रेटिंग कार्य में न्यून विशिष्टि के ईंट एवं ईंट के टुकड़े (10 से 15 प्रतिशत तक) का उपयोग करने की अनियमितता प्रकाश में आ गयी थी। जिसके बावजूद भी प्रावधानित बी0ए0 वायर क्रेट के अनुरूप ही 24.67 प्रति क्रेट की दर से भुगतान कर दिया गया तथा न्यून विशिष्टि के ईंट एवं ईंट के टुकड़े का उपयोग होने के बावजूद ईंट के गुणवाा जाँच हेतु काटी गई राशि 10 प्रतिशत को मात्र एक फॉग मार्क (आरती) की गुणवाा जाँच प्रतिवेदन के आधार पर विमुक्त कर दिया गया है जबकि कार्य में कई मार्कों के ईंटों का प्रयोग किया गया है साथ ही 10 से 15 प्रतिशत ईंट के टुकड़े का भी उपयोग किया गया है। इस प्रकार अनियमितता प्रकाश में आने के बावजूद भी जान बूझ कर अतिरेक भुगतान कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचायी गयी। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री कुमार, तत0 सहायक अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र 'क' में गठित तीनों आरोपों यथा आरोप सं0-1, आरोप सं0-2 एवं आरोप सं0-3 को अप्रमाणित पाया गया। फलस्वरूप संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं0-2 एवं आरोप सं0-3 को अप्रमाणित एवं असहमत होते हुए आरोप सं0-1 को प्रमाणित पाया गया एवं असहमति के निम्न बिन्दु पर विभागीय पत्रांक-839 दिनांक-05.06.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। आरोप सं0-01 जो विशिष्टि के विपरीत बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई कार्य में डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का क्रेट तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर सरकारी राशि की क्षति पहुँचाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने अपने निष्कर्ष कंडिका में अंकित किया है कि डबल नॉट की जगह पर सिंगल नॉट का क्रेट तैयार किया गया था। बेलवा इनरवा स्थल बागमती नदी एवं ललबकिया नदी के मिलन बिन्दु पर अत्यधिक जल दबाव के कारण डबल नॉट का सिंगल नॉट में प्रतीत होना स्वभाविक है। निरीक्षण दल द्वारा क्रेट का तौल होना संभव नहीं हो सका तथा अनुमान के आधार पर तौल में कमी बताया गया है। संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से निम्न बिन्दुओं पर असहमत हुआ गया है :-

जलीय दबाव के कारण किसी भी क्षतिग्रस्त ईंट भरे बी0ए0 वायर क्रेट में तनाव आना स्वाभाविक है। जिसे माना जा सकता है। उक्त दबाव/तनाव के कारण किसी भी क्रेट के मेस साईज में अंतर आ सकता है परन्तु क्रेट की बुनाई अगर डबल नॉट देकर की गयी है तो तनाव/दबाव के कारण नॉट का साईज छोटा हो सकता है परन्तु डबल नॉट सिंगल नॉट में प्रतीत होना संभव नहीं है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.2.3 एवं 3.2.2 में स्पष्ट रूप से अंकित है कि खुले बी0ए0 वायर क्रेट के मेस साईज प्रावधानित 4''x4'' की जगह 5''x4.5'' पाया गया तथा डबल नॉट की जगह सिंगल नॉट पाया गया इसलिए क्रेट के तौल में कमी निश्चित है। क्योंिक जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि क्रेट का वजन नहीं लिया गया है। परन्तु क्रेट में नॉट की संख्या देखकर ही स्थापित किया जा सकता है कि क्रेट सिंगल नॉट अथवा डबल नॉट से बुनाई की गयी है। उड़नदस्ता द्वारा की गयी स्थलीय जाँच में क्रेट के डबल नॉट की जगह पर सिंगल नॉट पाया गया है। हालॉकि क्रेट के वजन में वास्तविक रूप से कितने की कमी है उसे तौल कर ही ज्ञात किया जा सकता है परन्तु यह तो परिलक्षित है कि कार्य मे न्यून विशिष्टि के बी0ए0 वायर क्रेट का उपयोग हुआ है एवं प्रावधान के अनुरूप भुगतान कर अनियमितता बरती गयी है। उड़नदस्ता द्वारा क्रेट का वजन नहीं लिया गया है परन्तु स्वभाविक है कि क्रेट में डबल नॉट की जगह सिंगल नॉट से बुनाई करने पर बी0ए0 वायर क्रेट की बचत होगी एवं डबल नॉट की जगह पर सिंगल नॉट का बी0ए0 वायर क्रेट का वजन कम होना भी स्वभाविक है। जहाँ तक अनुवीक्षण दल के जाँच प्रतिवेदन में बी0ए0 वायर क्रेट संतोषप्रद उद्धित होने का प्रश्न है, वो अनुवीक्षण दल के जाँच प्रतिवेदन में कडिका 4(ख) में विभागीय सामग्री जो उपयोग मेें लाया गया है के संदर्भ में संतोषप्रद अंकित किया गया है। इस कार्य में क्रेट बुनाई का कार्य संवेदक द्वारा किया गया है। ऐसी स्थिति में इस प्रतिवेदन के आधार पर उड़नदस्ता द्वारा स्थलीय जाँचोपरांत की गयी टिप्पणी को नाकारा नहीं जा सकता। अतएव आरोप सं0-1 प्रमाणित होता है।57 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उक्त के आलोक में श्री कुमार, कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-1487 दिनांक-11.12.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी हैं :- 1 ः- इस संबंध में पूर्व में भी सूचित किया गया है कि उपर्युक्त कार्य एच0एस0सी0एल0 द्वारा एम0ओ0यू0 के आधार पर कराया गया था। जिसमें कम्पनी द्वारा समेकित रूप से अन्यत्र क्रेट की बुनाई की गई थी तथा आवश्यकतानुसार सभी तीन प्रमंडलों के स्थलों पर ढोकर पहुँचाया गया था फिर भी स्थल पर नियमानुसार क्रेटों को तौलकर ही सही तौल के क्रेटों को ही व्यवहार में लाया गया था। 2 :- इस स्थल का उच्चाधिकारियों एवं अनुवीक्षण दल द्वारा बराबर निरीक्षण किया जाता था, परन्तु किसी स्तर पर किसी पदाधिकारी द्वारा इस संबंध में कोई टिप्पणी नहीं किया गया। साथ ही स्थल पर व्यवहृत निर्माण सामग्री को संतोषप्रद बताया गया। इससे स्पष्ट होता है कि इस संबंध में कोई गड़बड़ी न थी और न ही परिलक्षित हुआ। 3 :- इस कार्य को सिमित समय-सीमा के अन्दर सम्पन्न कराया गया तथा अपन उद्‌देश्य में सफल भी रहा। बाढ़ अवधि के बाद भारी दबाव के कारण खुले हुए मात्र एक क्रेट का स्थलीय जाँचोपरांत टिप्पणी युक्तसंगत नहीं प्रतीत होता है। 4 :- उड़नदस्ता द्वारा व्यापक रूप से फैले कार्य क्षेत्र में क्रेटों के कतिपय क्रय में कुछ नॉट यदि सिंगल संज्ञान में आया तथा उससे न्यून विशिष्टि का क्रेट तथा राजस्व की क्षति का आभास हुआ तो उसे इंकित कर संख्या, तौल इत्यादि में कमी को विभाग के संज्ञान में देना चाहिए था ताकि एच0एस0सी0एल0 द्वारा विभाग के साथ एम0ओ0यू0 की कंडिका-13 यथा "HSCL Shall be responsible for rectification of defects during defects liability period of 12 Months after completion of work." कार्रवाई की जाती तथा ससमय समुचित निराकरण कर लिया जाता क्याेंकि उड़नदस्ता का जाँच Defect liability period के अन्तर्गत किया गया था तथा कार्य का प्रथम चलन्त भुगतान किया गया था, परन्तु ऐसा क्यों नहीं किया गया। यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। वर्णित तथ्यों के आलोक में स्पष्ट होगा कि आरोप संख्या-01 निराधार एवं तथ्यों से परे है। साथ ही मेरे द्वारा किसी भी स्तर शिथिलता बरती गई है और न ही कोई गलत मंशा से कार्रवाई की गई है। वर्णित तथ्यों के आलोक में मेरा बचाव पत्र स्वीकार करने की कृपा की जाय। श्री कुमार, कार्यपलाक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- आरोप-1 :- जो विशिष्टि के विपरीत बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई कार्य में डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी के द्वारा उड़नदस्ता के स्तर से केवल कुछ क्षतिग्रस्त क्रेटों के अवलोकन कर यह निष्कर्ष देना कि डबल नॉट के जगह पर सिंगल नॉट प्रतीत होता है। जबकि अत्याधिक जलीय दबाव के कारण डबल नॉट सिंगल नॉट में प्रतीत होना की संभावना है। जाँच दल द्वारा क्रेटों का तौल नहीं लिया गया तथा अनुमान के आधार पर तौल में कमी होना बतायी गया है। उक्त से स्पष्ट है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा इस आरोप के संदर्भ में आरोप की प्रमाणिकता के संदर्भ में कोई स्पष्ट मंतव्य नहीं दिया गया हैं फलतः द्वितीय कारण पृच्छा की माँग श्री कुमार से की गयी। श्री कुमार द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में मुख्यतः वही तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। इनके द्वारा कार्य में आवश्यकतानुसार स्थल पर तौल कर क्रेटों का व्यवहार किया जाना कहा गया है। जिसकी जाँच कार्य के दौरान उच्चाधिकारियों द्वारा करते हुए कार्य को संतोषप्रद बताया गया है एवं कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई है। उड़नदस्ता द्वारा बाढ़ अवधि 2008 के बाद खुले हुए एक मात्र क्रेट का स्थलीय जाँच कर किये गये टिप्पणी युक्तिसंगत नहीं है। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 3.2.3 से 3.2.2 मेें स्पष्ट अंकित है कि खुले हुए बी0ए0 वायर क्रेट में मेस साईज प्रावधानित 4"x4" के जगह पर 5"x4.5" पाया गया तथा डबल नॉट के जगह पर सिंगल नॉट पाया गया। फलतः क्रेट के तौल में कमी निश्चित होना बताया गया है। हालांकि उड़नदस्ता द्वारा स्थलीय जाँच में क्रेट का वजन नहीं लिया गया परन्तु जाँच में पाई गयी कमी के आधार पर क्रेट के वजन में कमी आना स्वभाविक है। उक्त कार्य का भुगतान प्रावधान के अनुरूप किया जाना परिलक्षित है। विभागीय उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन में आर्थिक क्षति का उल्लेख नहीं होने के कारण विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 16.03.2018 द्वारा मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर से वित्तीय क्षति का आकलन कर प्रतिवेदन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया जिसके आलोक में मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा अपने पत्रांक-1296, दिनांक 05.05.18 द्वारा सैद्धांतिक रूप से आर्थिक क्षति का आकलन प्रतिवेदन समर्पित किया गया। बागमती प्रमंडल, शिवहर के अन्तर्गत बागमती नदी के दायाँ एफ्लैक्स बाँध के कटिंग के 2362मी0 से 3262मी0 के बीच बेलवा इनरवा स्थल के पास बाढ़ 2008 के पूर्व कराये गये रिभेंटमेंट कार्य में प्रयोग किये गये बी0ए0 वायर क्रेट की संख्या कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर के पत्रांक-660 दिनांक-15.12.18 से उपलब्ध कराया गया। उक्त प्रतिवेदन के कंडिका-3 में उपरोक्त स्थल पर कराये गये रिभेंटमेंट कार्य में कुल 5270 अदद्‌ बी0ए0 वायर क्रेट का उपयोग किया गया तथा मुख्य अभियंता के पत्रांक-1296 दिनांक-05.05.18 से प्रति क्रेट 76.39 रूपये की क्षति होना प्रतिवेदित किया गया है। इस प्रकार प्रश्नगत स्थल पर रिभेंटमेंट कार्य में उपयोग किये गये न्यून विश्ष्टिि के क्रेट के कारण कुल 5270x76.39=402575.30 रूपये की क्षति होना परिलक्षित होता है। जिसके लिए कार्य में संलग्न तीनों पदाधिकारी यथा कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता को दोषी माने जाते हैं। अतएव श्री कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, शिवहर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध आरोप संख्या-01 यथा विशिष्टि के विपरीत कार्य में न्यून विशिष्टि यथा डबल नॉट के स्थान सिंगल नॉट के बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई करा कर कार्य में उपयोग करने एवं भुगतान प्रावधान के अनुरूप कर सरकारी राशि की क्षति पहुँचाने का आरोप प्रमाणित होता है।58 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री रविन्द्र कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर सम्प्रति तकनीकी सलाहकार, अधीक्षण अभियंता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढ़ी को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया।

1. "एक वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"। 2. वेतन से रूपये 1,34,192/- (एक लाख चौतीस हजार एक सौ बानवे रूपये) की वसूली। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री रविन्द्र कुमार, तकनीकी सलाहकार, के विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर विभागीय पत्रांक-926, दिनांक 09.05.2019 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की मांग की गई। जिसके आलोक में बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा अपने पत्रांक-1157, दिनांक 14.08.2019 द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर सहमति प्रदान की गई है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री रविन्द्र कुमार, तकनीकी सलाहकार, अधीक्षण अभियंता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढ़ी, को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

1. "एक वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"। 2. वेतन से रूपये 1,34,192/- (एक लाख चौतीस हजार एक सौ बानवे रूपये) की वसूली।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

3 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(मुज0)-06-11/2013/1919--श्री भरत पूर्वे (आई0डी0-1894) तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, मुजफ्फरपुर के उनके उक्त अवधि में पदस्थापन अवधि के दौरान आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के मामले में आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 1988 के तहत दर्ज प्राथमिकी के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-138, दिनांक 27.01.2014 द्वारा श्री पूर्वे को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं0-281 दिनांक 07.03.2014 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। आरोप संख्या-1-सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक-946, दिनांक 24.01.11, पत्रांक-220 दिनांक 06.01.12 एवं पत्रांक-17521 दिनांक 21.12.12 द्वारा राज्य सरकार के सभी पदाधिकारियों एवं कर्मियों से विहित प्रपत्र में चल अचल सम्पत्ति तथा दायित्वों की विवरणी प्राप्त कर उसे सार्वजनिक करने का निर्णय लिया गया। उक्त आलोक में आपके द्वारा वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए विहित प्रपत्र में चल अचल सम्पति एवं दायित्व विवरणी दिनांक 05.2.13 को घोषित की गयी है। उक्त विवरणी दिनांक 05.2.13 में आपने अपने पास मौजूद सम्पति की सही जानकारी नहीं देकर उसे छुपाया है क्योंकि आर्थिक अपराध इकाई, बिहार, पटना द्वारा आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के आरोप में आपके विरूद्ध आर्थिक अपराध थाना कांड सं0-36/ 13 दिनांक 13.08.13 धारा-13(2) सह पठित धारा 13(1) ई भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 1988 दर्ज किया गया है। आर्थिक अपराध ईकाई पटना द्वारा अबतक किये गये अनुसंधान के अनुसार समर्पित प्रतिवेदन एवं आपके द्वारा घोषित चल अचल सम्पति एवं दायित्व विवरणी दिनांक 05.2.13 के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि आपके द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से कई ऐसी चल अचल सम्पति का अर्जन किया गया है जिसकी घोषणा उक्त विवरणी में नहीं की गई है। यह बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 19(6) के आलोक में गंभीर कदाचार है तथा सरकारी सेवक के प्रतिकूल आचरण है। इस कदाचार के लिए आप दोषी है। उक्त अघोषित चल अचल सम्पति की विवरणी निम्नरूपेण है :- अघोषित अचल सम्पति

क्र0 अघोषित अचल सम्पति का विवरण अनुमानित मूल्य
1 पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला दरभंगा डीड नं0-11636 खरीदगी की तिथि 2009 के नाम एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर, थाना-अगमकुँआ, जिला-पटना में खाता सं0-123 सर्वे प्लॉट सं0-802, रकवा-39.13 डिसमिल 2,04,800
2 पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला दरभंगा डीड नं0-11636 खरीदगी की तिथि 2009 के नाम एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर, थाना-अगमकुँआ, जिला-पटना में खाता सं0-126 सर्वे प्लॉट सं0-822, रकवा-1.09 डिसमिल 1,63,500

आर्थिक अपराध ईकाई के पत्र में उल्लेखित है। आरोप संख्या-2- बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 19(2) के अनुसार कोई सरकारी सेवक सरकार की पूर्व जानकारी के बिना किसी अचल सम्पति का अर्जन या निबटाव अपने नाम से या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम से पट्‌टे बंधक खरीद, बिक्री या प्रतिदान के द्वारा अन्यथा न करेगा।

इसी प्रकार बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम-19(2) के अनुसार प्रत्येक सरकारी सेवक, सभी ऐसा संव्यवहार के संबंध में, जिसका मूल्य सरकारी सेवक के दो माहों के मूल वेतन जोड़ ग्रेड वेतन से अधिक हो, ऐसा संव्यवहार के पूर्ण होने के एक माह के अन्दर सरकार को जानकारी देगा।59 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 परन्तु यह कि यदि ऐसा कोई संव्यवहार किसी ऐसे व्यक्ति के साथ हो जिसका सरकारी के साथ पदीय कारबार चलता हो तो सरकार की पूर्व मंजूरी ली जायेगी।

आपके द्वारा अर्जित उपरोक्त अघोषित चल एवं अचल सम्पति की जानकारी सरकार को पूर्व में नहीं दी गयी है जो गंभीर कदाचार है। आरोप संख्या-3-आपके विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने संबंधी थाना कांड संख्या-36/13 दिनांक 13.08.2013 में धारा-13(2) पठित धारा-13(1) ई0 भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम 1988 भी दर्ज किया गया है। अनुसंधान में पाये गये तथ्यों के अनुसार अनुमानित बचत कुल रू0-1,68,41,112/- तथा अर्जित आय के अनुसार अनुमानित बचत कुल रू0-67,00,000/- है। आपके द्वारा आय से अधिक सम्पति (रू0 1,68,41,112-67,00,000) रू0-1,01,41,112/- है। जो नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से अर्जित की गयी है। यह सम्पति आपके द्वारा पदीय कर्त्तव्य का दुरूपयोग कर अवैध तरीके से अर्जित की गयी है। जो घोर कदाचार है जिसके लिए आप दोषी है।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में ही दिनांक 31.03.2015 को श्री पूर्वे के सेवानिवृत हो जाने के कारण श्री पूर्वे को दिनांक 31.03.15 के प्रभाव से निलंबन मुक्त करते हुए इनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय अधिसूचना संख्या-915, दिनांक 17.04.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालन में श्री पूर्वे द्वारा मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई :-

(1) आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 05.08.16 को समर्पित अपने बचाव बयान में मुख्य रूप से यह उल्लिखित किया गया है कि आरोप पत्र के पृष्ठ संख्या-06 में उनके पी0पी0एफ0 लेखा में जमा राशि रू0 5,41,605.73 एवं सूद की राशि केवल रू0 2,58,305.73 दिखाया गया है। उनका यह भी कहना है कि न्यायालय से मिले अभिलेख के पृष्ठ संख्या-154 में उनके पी0पी0एफ0 लेखा में कुल राशि 5,91,883.73 रूपये है, जिसमें सूद की राशि 3,03,583.73 रूपये है। इसी प्रकार SBI NMCH शाखा में उनके द्वारा 1-1 लाख के दो एफ0डी0 के संबंध में भी उल्लेख किया गया है। साथ ही उनके द्वारा कहा गया है कि LIC में जमा की गयी राशि आरोप पत्र में उनके व्यय में दर्शाया गया है, परन्तु LIC से प्राप्त की गयी राशि रू0 1.00 लाख को उनकी आय में नहीं जोड़ा गया है। पुनः उनके द्वारा तकनीकी परीक्षक कोषांग के आधार पर आरोप पत्र में उनके फ्लैट -01/37 एवं 01/40 में साजो-सज्जा के सामानों का खर्च 2,23,215/- रूपये दिखाया गया है तथा फ्लैट-01/37 में फ्लोर टाईल्स का कार्य 1527 वर्गफीट दर्शाया गया है। इसी प्रकार बिहार राज्य आवास बोर्ड द्वारा उक्त फ्लैट का रकवा 1450 वर्गफीट लिखे जाने की बात कही गयी है। ऐसी स्थिति में टाईल्स का कार्य 1527 वर्गफीट दर्शाया गया है। इसी प्रकार बिहार राज्य आवास बोर्ड द्वारा उक्त फ्लैट का रकवा 1450 वर्गफीट लिखे जाने की बात कही गयी है। ऐसी स्थिति में टाइल्स का क्षेत्र अधिक नहीं हो सकने का उल्लेख किया गया है। पुनः आरोप पत्र के पृष्ठ संख्या-13 में कम्प्युटर मॉल, एस0पी0 वर्मा रोड से क्रय किये गये प्रिंटर का मूल्य 19,500 रूपये दिखाया गया है, जबकि इसका मूल्य 1950 रूपये होने की बात कही गयी है। इसी प्रकार घर में मिले सोना-चाँदी के जेवर का वर्तमान दर पर मूल्य 16,08,100/- लाख रूपये एवं घर में मिले सामनों का मूल्य 10.00 लाख रूपये आरोप पत्र के पृष्ठ संख्या-17 के क्रमांक 11 में दिखलाये जाने पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा गया है कि घर में पाये गये सामान पुराना है तथा कई सामान गिफ्ट तथा उनके बेटा, बेटी एवं वधु का है, जो वर्षों से नौकरी कर रहे है और इस तरह इस परिसम्पति को उनके द्वारा अर्जित सम्पति में जोड़ने पर आपत्ति की गयी है। उनका यह भी कथन है कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि हर तरह के व्यक्ति एवं परिवार का केवल खाना मद में आय को एक तिहाई व्यय हो। इसके अलावे आरोपित पदाधिकारी द्वारा उनकी पत्नी द्वारा सभी तरह के निवेश एवं प्राप्त राशि का सही अनुसंधान नहीं किये जाने का भी उल्लेख किया गया है। (2) आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 06.09.16 को अपना अभ्यावेदन प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग को संबोधित कर इसकी प्रति इस स्तर पर समर्पित किया गया। अपने अभ्यावेदन में उनके द्वारा विभागीय आरोप पत्र एवं न्यायालय में समर्पित आरोप पत्र में अचल सम्पति की विवरणी का उल्लेख करते हुए विभागीय आरोप पत्र में मूल्यांकित राशि एवं जाँचोपरांत आरोप पत्र में मूल्यांकित राशि की भिन्नता को दर्शाते हुए मुख्य रूप से कहा गया कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा उनके किसी भी चल अचल सम्पति को अवैध नहीं बतलाया गया है तथा उनके द्वारा यह भी आरोप लगाया गया कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा उनके आय-व्यय में हेराफेरी देखाकर उनके विरूद्ध आरोप पत्र दायर किया गया है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा पुनः दिनांक 13.01.17 को उक्त तथ्यों को ही दोहराते हुए एक अभ्यावेदन सुनवाई के क्रम में पुनः उनके द्वारा समर्पित किया गया।

पुनः दिनांक 01.12.17 को आरोपित पदाधिकारी द्वारा आरोप पत्र एवं आरोप पत्र के साथ संलग्न अन्य दस्तावेज तथा विभागीय पत्रांक-549, दिनांक 01.04.16 द्वारा प्रस्तुत कागजात यथा अंतिम अनुसंधान प्रतिवेदन के आलोक में कंडिकावार एक प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें उनके द्वारा कहा गया कि आरोप में दर्शाये गये दोनों जमीन का मूल्य तथा साक्ष्य में लिखे गये मूल्य में काफी भिन्नता हे। उन्होंने यह भी कहा है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा समर्पित अंतिम प्रतिवेदन में उनके किसी भी सम्पति को अधोतिप या अवैध नहीं बतलाया गया। उन्होने पुनः कहा है कि उनकी पत्नी की सम्पति पर बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 में उपबंधित नियम लागू नहीं होता है। साथ ही यह भी कहा गया कि उनके पास आय से अधिक 1,01,41,112/- रूपये की सम्पति से संबंधित आरोप में विभाग द्वारा इसका कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। मात्र न्यायालय में समर्पित प्रतिवेदन की प्रति उन्हें दी गयी है तथा निष्कर्ष के रूप में उनके द्वारा उल्लिखित किया गया है कि उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र पर किसी प्रकार की प्रारंभिक जाँच नहीं की गयी। साथ ही उनके द्वारा यह भी उल्लिखित किया गया कि आर्थिक अपराध ईकाइ द्वारा दर्ज प्राथमिकी के आधार पर ही विभाग द्वारा आरोप गठित कर दिया60 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 गया, जबकि आरोप को साबित करने हेतु विभाग द्वारा कोई साक्ष्य या गवाह नहीं दिया गया और इस आधार पर उनके द्वारा अपने विरूद्ध गठित आरोपों को तथ्यहीन बतलाया गया है।

दिनांक 22.12.17 को आरोपित पदाधिकारी द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा निर्गत परिपत्र संख्या-17696 दिनांक 23.12.14 एवं परिपत्र संख्या-10875 दिनांक 24.08.17 की छायाप्रति संलग्न करते हुए मुख्य रूप से कहा गया कि अनुशासनिक प्राधिकार/विभाग उन पर लगाये गये आरोप को सिद्ध करने के लिए तैयार नहीं है। फलतः उक्त परिपत्रों को संदर्भित करते हुए आरोपों को निरस्त करने हेतु अनुरोध किया गया है। (3) आरोपित पदाधिकारी द्वारा समर्पित लिखित बहस में मुख्य रूप से यह उल्लिखित किया गया है कि संचालन पदाधिकारी को आरोपों की जाँच हेतु अनुशंसा करने के पूर्व बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में निहित प्रावधानों का अनुपालन विभाग द्वारा नहीं किया गया। उनके द्वारा कहा गया कि बारम्बार मांग करने के बावजूद उन्हें संगत दस्तावेजों एवं साक्ष्यों की सूची उपलब्ध नहीं कराया गया। उन्होनें अपने लिखित बहस में कहा है कि विभागीय मंतव्य में उनके विरूद्ध पहला आरोप असत्य पाया गया, जबकि दूसरा एवं तीसरा आरोप सही बताया गया, जो उनके जवाब की समीक्षा से भिन्न है। उनके द्वारा कहा गया है कि उनकी पत्नी के नाम की सम्पति उनकी पत्नी द्वारा स्वअर्जित है, जिसकी सूचना विभाग को देना आवश्यक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा है कि उनके द्वारा क्रय की गयी फ्लैट की जानकारी विभाग को पहले से ही थी, क्योंकि इसके लिए उनके द्वारा भविष्य निधि से अग्रिम विभागीय अनुशंसा पर ही लिया गया था। उनका यह भी कथन है कि विभागीय कार्यवाही प्रारंभ होने के लगभग 2 वर्षों के उपरांत उन्हें विभागीय पत्रांक-549 दिनांक 01.04.16 द्वारा साक्ष्य के रूप में आर्थिक अपराध ईकाई पटना द्वारा निगरानी न्यायालय में दाखिल आरोप पत्र की छायाप्रति उपलब्ध कराया गया तथा न्यायालय में दाखिल अंतिम प्रतिवेदन एवं विभागीय आरोप में समानता नहीं है। पुनः उनके द्वारा कहा गया है कि विभागीय कार्यवाही एक अर्द्ध न्यायिक प्रक्रिया है, जिसमें साक्ष्य एवं गवाह दोनों के आरोप को सिद्ध करना है, परंतु विभाग के पास न तो साक्ष्य है और न ही गवाह है तथा विभाग द्वारा तैयार किया गया आरोप पत्र बगैर किसी प्रारंभिक जाँच पर आधारित है।

आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिये गये स्पष्टीकरण/बचाव-बयान तथा लिखित बहस एवं विभाग द्वारा गठित आरोप पत्र, आरोप पत्र के साथ संलग्न दस्तावेज एवं कागजात, आरोपित पदाधिकारी के स्पष्टीकरण/बचाव बयान पर प्राप्त विभागीय मंतव्य एवं विभाग द्वारा दिये गये लिखित बहस के समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा अपना जाँच प्रतिवेदन विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी है :-

प्रशनगत मामला आरोपित पदाधिकारी श्री भरत पूर्वे, तत0 अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के आरोप में आर्थिक अपराध ईकाई, पटना द्वारा दर्ज आर्थिक अपराध थाना कांड संख्या-36/13, दिनांक 13.08.2013 धारा-13(2) सहपठित धारा-13(1) ई भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम, 1988 के आधार पर जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना के संकल्प ज्ञापांक-281, दिनांक 07.03.2014 द्वारा संस्थित विभागीय कार्यवाही एवं तदालोक में आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित आरोपों तथा आरोपों को सिद्ध करने हेतु विभाग द्वारा संलग्न साक्ष्यों पर निर्णय लेने से संबंधित है।

आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध गठित आरोप पत्र में उल्लिखित आरोप संख्या-01 में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि सरकारी परिपत्र के आलोक में सभी पदाधिकारियों एवं कर्मियों को विहित प्रपत्र में चल/अचल सम्पति तथा दायित्वों की विवरणी देना अनिवार्य है। उक्त पत्र के अनुपालन में आरोपित पदाधिकारी द्वारा वर्ष 2012-13 के लिए दिनांक 05.02.2013 को विहित प्रपत्र में चल/अचल सम्पति एवं दायित्व की विवरणी घोषित की गयी है, जिसमें आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा दर्ज प्राथमिकी से संबंधित प्रतिवेदन में उल्लिखित आरोपित पदाधिकारी द्वारा धारित चल/अचल सम्पति तथा दिनांक 05.02.2013 को आरोपित पदाधिकारी द्वारा स्वघोषित सम्पति विवरणी के तुलनात्मक अध्ययन से विभाग को यह परिलक्षित हुआ कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से कई ऐसी चल/अचल सम्पति अर्जित की गई है, जिसकी घोषणा आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 05.02.2013 को अपनी घोषणा पत्र में नहीं किया गया है। इस आधार पर आरोपित पदाधिकारी को बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 19(6) के आलोक में गंभीर कदाचार मानकर इसके लिए उन्हें दोषी माना गया है। आरोप पत्र में अधोपित अचल सम्पति की विवरणी के रूप आरोपित पदाधिकारी की पत्नी के नाम पर मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) दरभंगा में दस्तावेज संख्या-11636 वर्ष 2009 द्वारा क्रय एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर थाना, अगमकुँआ, पटना में खाता संख्या-123, खेसरा संख्या-802, रकवा-39.13 डिसमिल एवं क्रमांक-02 में पुनः मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला दरभंगा के अधीन दस्तावेज संख्या-11636 वर्ष 2009 एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर थाना, अगमकुआँ, पटना में खाता संख्या-126 खेसरा संख्या-822 रकवा, 1.09 डिसमिल अनुमानित मूल्य क्रमशः 2,04,800/- एवं 1,63,500/- प्रदर्शित किया गया है।

पुनः आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध दूसरे आरोप में यह उल्लिखित किया गया है कि बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 19(2) में निहित प्रावधान का उल्लंघन उनके द्वारा करते हुए उपरोक्त चल एवं अचल सम्पति की जानकारी सरकार को नहीं दी गयी है।

तृतीय एवं अंतिम आरोप में आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के आधार पर दर्ज थाना कांड संख्या-36/13 तथा इस मामले में अनुसंधान के उपरांत पाये गये तथ्यों के अनुसार कुल 1,01,41,112 रूपये आरोपित पदाधिकारी द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से अपने पदीय कर्त्तव्यों का दुरूपयोग कर अवैध तरीके से अर्जित करने का आरोप संस्थित किया गया है।61 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उक्त आरोपों के समर्थन में आर्थिक अपराध ईकाई, पटना के पत्रांक-232 दिनांक 02.09.13 में यह उल्लिखित किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा वर्ष 2012-13 में स्वघोषित उनकी सम्पति विवरणी की प्रति डाउनलोड किया गया, जिसमें आरोपित पदाधिकारी द्वारा उनकी पत्नी के नाम पर अवस्थित मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला-दरभंगा में पत्नी के नाम पर क्रय की गयी जमीन खात संख्या-123, खेसरा संख्या-802, एवं एक अन्य दस्तावेज द्वारा क्रय की गयी जमीन खाता संख्या-126, खेसरा संख्या-822 को नहीं दर्शाया गया है।

इस आरोप के संबंध में आरोपित पदाधिकारी द्वारा दाखिल अपने स्पष्टीकरण में दरभंगा देहाती सर्किल मौजा सोनकी में नया खाता संख्या-227, खेसरा संख्या-1142, रकवा-9 कट्ठा जमीन तथा जिसका पुराना खाता संख्या-126, खेसरा संख्या-822, रकवा-39.13 डिसमिल बतलाया गया है, उनकी पत्नी द्वारा क्रय करने की बात कही गयी है तथा इसी प्रकार 1. 09 डिसमिल जमीन भी उसी जमीन का हिस्सा बतलाकर अपनी पत्नी के नाम से क्रय करने का उल्लेख किया गया है तथा साक्ष्य स्वरूप संबंधित दस्तावेज की छायाप्रति भी संलग्न की गयी है।

संलग्न दस्तावेज संख्या-11,636 के अवलोकन से यह परिलक्षित होता है कि मौजा पंटा के अधीन खाता संख्या-126, खेसरा सं0-802/822 (पुराना) खाता संख्या-125, खेसरा संख्या-262(पुराना) खाता संख्या-227 खेसरा संख्या-1142(नया) आरोपित की पत्नी श्रीमति ममता पूर्वे के नाम पर दिनांक 08.04.2009 को निबंधित किया गया है, जबकि दस्तावेज संख्या-11550 दिनांक 03.08.2009 द्वारा उक्त मौजा का ही खाता संख्या-126 खेसरा संख्या-822(पुराना) तथा खाता संख्या-260 तथा खेसरा संख्या-1145 (नया) रकवा-1.09 डिसमिल अर्थात 5 धूर भी आरोपित की पत्नी श्रीमति ममता पूर्वे के नाम पर निबंधित किया गया है। इस आरोप के संबंध में जल संसाधन विभाग के पत्रांक-1726, दिनांक 19.11.14 से प्राप्त विभागीय मंतव्य में आरोपों की पुष्टि नहीं की गयी है, बल्कि इसे अप्रमाणित प्रतीत होने का उल्लेख करते हुए नक्शा मिलान के बाद ही निश्चयता के साथ माने जाने की बात कही गयी है।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा अपने पत्र में उक्त जमीन के संबंध में दर्ज ब्योरा तथा आरोप पत्र में इस संबंध में तैयार किये गये ब्योरे में असमानता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आरोप पत्र के गठन में आर्थिक अपराध ईकाई से प्राप्त प्रतिवेदन को गंभीरता से नहीं लिया गया है तथा आरोप को लेखबद्ध करने में असावधानी बरती गई है।

इस आरोप की समीक्षा के क्रम में आर्थिक अपराध ईकाई के पत्रांक-651 दिनांक 02.02.16 द्वारा विशेष कार्य पदाधिकारी, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को संबोधित पत्र जिसमें इस मामले में माननीय विशेष न्यायाधीश, निगरानी के न्यायालय में अंतिम प्रतिवेदन दायर किया गया है, जिसके अवलोकन से भी पता चलता है कि दस्तावेज संख्या-11636 दिनांक 04.08.2009 एवं दस्तावेज संख्या-11550 दिनांक 03.08.2009 द्वारा उक्त जमीन आरोपित पदाधिकारी की पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे के नाम पर निबंधित किया गया है तथा अन्य परिसम्पति सहित उक्त दोनों परिसम्पतियों की राशि क्रमशः 2,16,595.00 एवं 16,477.00 रूपये (निबंधन एवं मुद्रांक शूल्क सहित) के संबंध में अनुसंधान में यह का गया है कि अपने पति के अवैध रूप से किये गये कमाई को जायज ठहराने के लिए आरोपित पदाधिकारी की पत्नी श्रीमति ममता पूर्वे द्वारा अपने अन्य कारोबार का सहारा लिया गया है और इसी आधार पर आरोपित पदाधिकारी की पत्नी को भी अप्राथमिकी अभियुक्त के रूप में नामित किया गया है। यह ध्यान देनें की बात है कि प्रश्नगत जमीन का निबंधन आरोपित पदाधिकारी की पत्नी का नाम से वर्ष 2009 में ही हुआ है तो फिर विभाग द्वारा आरोपित पदाधिकारी के स्तर से अपनी चल एवं अचल सम्पति सहित दायित्व की विवरणी वर्ष 2012-13 जिसे उनके द्वारा दिनांक 05.02.2013 को दाखिल किया गया था, को विभाग द्वारा आधार बनाने को औचित्य समझ से परे है। इस मामले में विभाग द्वारा आरोपित पदाधिकारी के चल एवं अचल सम्पतियों की विवरणी का तुलनात्मक अध्ययन काफी पूर्व से ही किया जाना चाहिए था। आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा समर्पित अभियोग पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी की पत्नी के विभिन्न श्रोतों से प्राप्त आय एवं दाखिल किये गये आयकर विवरणी में विभिन्नता है। प्रतिवेदन में प्रतिवेदित तथ्यों के अनुसार उनकी पत्नी द्वारा कुल श्रोतों से प्राप्त आय 25,04,530/- रूपये होने की बात कही गई है, जबकि आयकर विवरणी के अनुसार उनकी आय 14,68,986/- रूपये ही होने का मामला प्रकाश में लाया गया है। आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा दाखिल प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी के पत्नी का संदर्भित व्यवसाय श्रम विभाग से निबंधित भी नहीं है।

आरोपित पदाधिकारी द्वारा भी अपने स्पष्टीकरण एवं बचाव बयान में उक्त जमीन को अपनी पत्नी द्वारा अपने निजी आय के श्रोत से प्राप्त किये जाने की बात कही गई है, परंतु इस कथन के समर्थन में उनके द्वारा अपनी पत्नी का दाखिल आयकर विवरणी की छायाप्रति तथा वर्ष 2008-09 में अपनी चल अचल सम्पति की घोषणा से संबंधित विवरणी की छायाप्रति नहीं प्रस्तुत किये जाने के कारण आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा अपने अनुसंधान के दौरान पाये गये तथ्यों तथा अनुसंधान के उपरांत न्यायालय में दाखिल अंतिम प्र्रतिवेदन में अंतरनिर्हित तथ्यों से आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध आरोप संख्या-01 में वर्णित आरोप को अप्रमाणित मानने का कोई कारण/आधार नहीं है। अतएव आरोप संख्या-01 प्रमाणित होता है। आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध दूसरा आरोप यह है कि उन्होने अपने द्वारा अर्जित चल एवं अचल सम्पति की जानकारी सरकार को पूर्व में नही दी और इस आधार पर उनके द्वारा बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 19(2) का उल्लंघन किया गया है।

उक्त आरोप के संबंध में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने स्पष्टीकरण एवं बचाव बयान में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना द्वारा निर्गत आदेश के आलोक में वे वर्ष 2010-11 से ही अपने सभी चल एवं अचल सम्पति घोषित करते आ रहे है। उन्होंने यह भी कहा है कि अपने कोई सम्पति अर्जित करने अथवा बेचने के पूर्व इसे छिपाने की उनकी कोई मंशा नहीं रही है। इस संबंध में विभाग का यह अभिमत है कि बिहार सरकारी सेवक आचार62 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 नियमावली, 1976 के नियम 19(2) में उपबंधित प्रावधान का आरोपित पदाधिकारी द्वारा उल्लंघन किया गया है, क्याेंकि न तो उनके द्वारा किसी चल/अचल सम्पति के अर्जन की सरकार को पूर्व जानकारी दी गई है और न ही ऐसी सम्पतियों के संव्यवहार की सूचना यथा निर्धारित अवधि के अंदर उनके द्वारा सरकार में दी गई है।

इस आरोप के संबंध में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपना प्रतिवाद दाखिल करते हुए यह कहा गया है कि जो सम्पति परिवार के किसी सदस्य द्वारा उनके निजी श्रोत से अर्जित है, उसपर उक्त नियम लागू नहीं होता है। अपने इस कथन के समर्थन में उनके द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना के परिपत्र संख्या-21734 दिनांक 15.11.1976 जो बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 19 का स्पष्टीकरण है को संदर्भित किया गया है तथा उनके द्वारा कहा गया है कि उनकी सम्पति की जानकारी विभाग को पूर्व से ही है, क्योंकि इसका अर्जन उन्होने भविष्य निधि मद से अग्रिम प्राप्त कर किया है तथा ऐसे अग्रिम की स्वीकृति विभाग द्वारा ही दी जाती है। परंतु यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा न्यायालय में समर्पित प्रतिवेदन में आरोपित पदाधिकारी एवं उनकी पत्नी के नाम पर अचल परिसम्पति के रूप में पाई गयी सम्पतियों का ब्यौरा निम्नरूपेण दर्शाया गया है :-

क्र0 परिसम्पति परिसम्पति की राशि
1. श्रीमति ममता पूवे र् के नाम से मौजा पंटा, दरभंगा में 09 कट्ठा यानि 39.13 डिसमल जमीन खरीदा गया, जिसका दस्तावेज संख्या-11636 दिनांक 04.08.2009 है। रू0 2,16,595/- (निबंधन एवं मुद्रांक शुल्क सहित)
2. श्रीमति ममता पूवे र् के नाम से मौजा पंटा, दरभंगा में 1.09 डिसमल जमीन जिसका दस्तावेज संख्या-11550 दिनांक 03.08.2009 है। रू0 16,477/- (निबंधन एवं मुद्रांक शुल्क सहित)
3. श्रीमति ममता पूर्वे के नाम से बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी, पटना में दिनांक 01.06.2000 का फ्लैट संख्या-03एस0एफ0ए0 1/37 खरीदा गया। रू0 4,09,546/-
4. श्री भरत पूर्वे के नाम से बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी, पटना में दिनांक 01.12.2001 को फ्लैट संख्या-03 एस0एफ0ए0 1/40 खरीदा गया। रू0 5,11,000/-
5. श्री भरत पूर्वे के नाम से पाटलीग्राम कुम्हरार, पटना में दिनांक 29.08. 2010 का फ्लैट संख्या-104(k) की बुकिंग हेतु जमा की गई राशि। रू0 18,40,000/-

यद्यपि आरोपित पदाधिकारी ने अपने अभिकथन में अपने नाम से अर्जित उक्त अचल सम्पतियों के संबंध में इसे अपने भविष्य निधि मद में संचित राशि से अग्रिम प्राप्त कर करने की बात कही है, परंतु उनके द्वारा ली गई अग्रिम राशि का कोई ब्योरा साक्ष्य स्वरूप संलग्न नहीं किया गया है, जबकि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा निगरानी न्यायालय में समर्पित प्रतिवेदन में आरोपित पदाधिकारी द्वारा भविष्य निधि कार्यालय भोजपुर से प्राप्त की गई राशि में पहली बार 3.00 लाख रूपये एवं दूसरी बार 50 हजार रूपये अर्थात कुल तीन 3.50लाख रूपये तथा यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, श्री कृष्णा नगर, पटना से कार हेतु ऋण के रूप में 2,50,000 रूपये तथा पुत्र की पढाई के लिए एस0बी0आई0 शाखा, एन0एम0सी0एच0, पटना से 3. 50लाख रूपये ऋण प्राप्त किये जाने का उल्लेख अपने प्रतिवेदन में किया है। इस प्रकार आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने भविष्य निधि से संचित राशि से प्राप्त अग्रिम एवं बैंक से प्राप्त ऋण का कुल रकम 9,50,000/-रूपये है, जबकि उनके एवं उनकी पत्नी के पास पाई गयी परिसम्पतियों की कुल आकलित राशि 1,31,48,234/- रूपये है। इस प्रकार आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा अपने अनुसंधान के क्रम में पाये गये तथ्यों एवं आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव-बयान में निहित तथ्यों से मेल नहीं खाता है। यह बात सही है कि बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम-19 का उपनियम-02 एवं 03 तभी प्रवृत होगा जब सरकारी सेवक या तो स्वयं अपने नाम पर या परिवार के किसी अन्य सदस्य के नाम पर सम्पति अर्जित करे। यह भी सही है कि सरकारी सेवक के परिवार के कोई सदस्य यदि निजी श्रोत से या विरासत में (Inheritance) कोई सम्पति अर्जित करता है तो ऐसी अर्जित की गई सम्पति पर उक्त नियम लागू नहीं है परंतु आलोच्य मामले में उल्लिखित तथ्यों से इस बात की पुष्टि होती है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा स्वयं ऐसी परिसम्पतियाँ अवैध तरीके से अपनी पत्नी के नाम पर अर्जित की गई है। अगर ऐसी परिसम्पतियाँ आरोपित पदाधिकारी की पत्नी द्वारा अपना निजी व्यवसाय अथवा निजी आय श्रोत से अर्जित की गई, तो सुनवाई के क्रम में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपनी पत्नी द्वारा प्रति वर्ष दाखिल आयकर विवरणी की छायाप्रतियाँ क्याें नहीं प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार अपुष्ट एवं अपर्याप्त साक्ष्य की स्थिति में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अभिकथित तथ्यों को प्रमाणिक मानने का कोई आधार नहीं है।

अतः उक्त परिपेक्ष्य में आरोपित द्वारा इस आरोप के संबंध में दिया गया स्पष्टीकरण एवं बचाव बयान मान्य नहीं है। अतएव आरोप संख्या-02 प्रमाणित होता है।

आरोपित पदाधिकारी श्री पूर्वे के विरूद्ध तीसरे आरोप में यह कहा गया है कि उनके विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने संबंधी थाना कांड संख्या-36/13 दिनांक 13.08.13 धारा-13(2)सहपठित धारा-13(1) ई भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज कराया गया है तथा अनुसंधान में पाये गये तथ्यों के अनुसार उनके द्वारा अर्जित सम्पति कुल 1,68,41,112/- तथा अनुमानित बचत 67,00,000/- रूपये है। इस तरह 1,68,41,112.00-67,00,000.00 =1,01,41,112.00 उनके द्वारा अपने पदीय कर्त्तव्यों का दुरूपयोग कर अवैध एवं भ्रष्ट तरीके से अर्जित किये जाने के लिए उन्हें दोषी पाया गया है।63 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 इस आरोप के विरूद्ध आरोपित पदाधिकारी द्वारा मुख्य रूप से यह कहा गया है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा उनकी सम्पति का सही आकलन नहीं किया गया है। उनका यह भी कथन है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा उनकी चल/अचल सम्पतियों के आकलन में उनकी पत्नी को अपने पिता, पुत्र एवं बहन से चेक, ड्राफ्ट एवं लेखा से हस्तान्तरण राशि को भी शामिल कर लिया गया है। उनका यह भी कहना है कि उनकी एवं उनकी पत्नी की कुल सम्पति अबतक किये गये बचत के अधीन है। पुनः उन्होने कहा है कि इस आरोप के संबंध में विभाग द्वारा दो बार अर्थात दिनांक 19.11.2014 एवं दिनांक 11.06.2015 को दो भिन्न-भिन्न मंतव्य भेजा गया है। दिनांक 19.11.14 के मंतव्य में विभाग द्वारा 81,21,100/- रूपये तथा दिनांक 01.06.15 के विभागीय मंतव्य में 1,01,41,112/- रूपये आय से अधिक सम्पति बतलाया गया, जबकि विभागीय समीक्षा में ऐसे अंतर का कोई उल्लेख नहीं किया गया। उन्होने यह भी कहा है कि उनके द्वारा स्वयं एवं उनकी पत्नी द्वारा अर्जित कुल सम्पति मात्र 61,71,000/- रूपये ही पाया गया, जो उनके कुल बचत 67,00,000/- रूपये से कम है और इस तरह उनके द्वारा आरोप को अप्रमाणित कहा गया है।

इस संबंध में दिनांक 19.11.2014 को विभागीय अभिमत में कहा गया है कि आरोपित पदाधिकारी का स्वयं 11,45,000/- एवं पत्नी द्वारा निवेशित राशि 75,75,000/- अर्थात कुल 87,20,000/- रूपये है। जबकि आर्थिक अपराध थाना कांड संख्या-36/13 में आरोपित पदाधिकारी की कुल सम्पति 1,68,41,112/- रूपये दर्शाया गया है। इस तरह आरोपी पदाधिकारी के पास पाई गयी कुल सम्पति 1,68,41,112.00-87,20,000.00=81,21,112/- रूपये को आरोपित पदाधिकारी द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से अर्जित किये जाने का उल्लेख किया गया है। पुनः दिनांक 01.06.15 को गठित विभागीय मंतव्य में अपने पूर्व अभिमत को शामिल करते हुए यह माना गया है कि आरोपित पदाधिकारी की आय से कुल बचत 67,00,000/- रूपये है तथा पत्नी द्वारा निवेश की गई राशि 75,75,000/- रूपये में 25,49,000/- रूपये की वह राशि भी शामिल है, जो उनकी पत्नी को अपने पिता, पुत्र, भाई, बहन से प्राप्त हुआ था। तदनुसार उक्त 25,49,000/- रूपये को घटाकर निवेशित राशि 61,71,000/- रूपये विभाग द्वारा आकलित की गई है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध यह आरोप उनके विरूद्ध दिनांक 13.08.2013 को आर्थिक अपराध ईकाई थाना कांड संख्या-36/13 पर आधारित है। आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा दर्ज उक्त प्राथमिकी में संलग्न प्रतिवेदन में यह उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी के पास पाई गयी चल एवं अचल सम्पति का कुल अनुमानित मूल्य 1,68,41,112/- रूपये तथा अनुमानित बचत 67,00,000/- रूपये है और तदनुसार 1,68,41,112. 00-67,00,000.00=1,01,41,112.00 की सम्पति आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने पदीय कर्तव्यों का दुरूपयोग कर अवैध तरीके से अर्जित करने का उल्लेख किया गया है।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह मामला आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा दर्ज आर्थिक अपराध थाना कांड संख्या-36/13 से उद्‌भूत है, तथा यह भी प्रासंगिक है कि उक्त दर्ज प्राथमिकी के विरूद्ध आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा अभियोग पत्र (Charge Sheet) निगरानी न्यायालय में समर्पित किया जा चुका है तथा एतद संबंधित सूचना पुलिस निरीक्षक-सह-अनुसंधानकर्त्ता आर्थिक अपराध ईकाई, पटना के पत्रांक-651, दिनांक 02.02.16 द्वारा विशेष कार्य पदाधिकारी, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को दी जा चुकी है तथा उप सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक-412, दिनांक 08.03.16 द्वारा आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध निगरानी न्यायालय में दाखिल अभियोग पत्र की छायाप्रति प्रासंगिक विभागीय कार्यवाही के सुनवाई के क्रम में प्रस्तुत भी किया गया है। उक्त अभियोग पत्र में अंतर्विष्ट तथ्यों के अवलोकन से यह पता चलता है कि आरोपित पदाधिकारी के पास कुल 1,31,67,748/- रूपये (जिसमें वेतन मद से 76,90,491/- एवं अन्य मद से 54,74,257/- रूपये) पाई गयी है तथा कुल व्यय के रूप में 63,63063/- रूपये आकलित किया गया है। इस तरह 1,31,64,748.00-63,36,063.00=68,28,685/- रूपये आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध अप्रत्यानुपातिक धनार्जन किये जाने का उल्लेख किया गया है। अनुसंधान के क्रम में यह भी पाये जाने का उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा अप्रत्यानुपातिक धनार्जन में उनकी पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे द्वारा भी सहयोग किया गया है, क्योंकि उनकी विभिन्न श्रोतों से आय 25,04,530/- रूपये बताया गया है, जबकि आयकर विवरणी के अनुसार उनकी आय मात्र 14,68,986/- रूपये ही है। प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी की पत्नी द्वारा अपने पति की अवैध कमाई को जायज ठहराने के लिए विभिन्न कारोबार का सहारा लिया गया है तथा अनुसंधान के उपरांत आरोपित पदाधिकारी के साथ उनकी पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे को अप्राथमिकी अभियुक्त ठहरा कर भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम-1988 की धारा 13(2) सहपठित धारा-13(1)ई एवं भारतीय दण्ड विधान की धारा-109 के अन्तर्गत सत्य पाकर अभियोग पत्र दाखिल किया जा चुका है।

अतः इस परिपेक्ष्य में आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण बचाव बयान एवं लिखित बहस में उनके द्वारा उल्लेखित तथ्यों पर पर्याप्त साक्ष्य का सर्वथा अभाव है। तदनुसार इसे मान्य/स्वीकार करने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोप संख्या-03 प्रमाणित होता है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-2495 दिनांक 06.12.18 द्वारा श्री पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की मांग की गई।

उक्त के आलोक में श्री पूर्वे सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 08.01.19 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें कही गई है :-

64

बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 संचालन पदाधिकारी ने मेरे आरोप को सिद्ध करने का आधार आर्थिक अपराध इकाई द्वारा न्यायालय में समर्पित अनुसंधान प्रतिवेदन को बनाया है, आर्थिक अपराध ईकाई मेरे विरूद्ध भ्रष्टाचार का आरोप गठित की है। आरोप को सिद्ध करने के लिए वह न्यायालय में अनुसंधान प्रतिवेदन के साथ 84 गवाह एवं 600 पृष्ठ का दस्तावेज समर्पित किया गया है। उल्लेखनीय है एक ही तरह के साक्ष्य पर आधारित आरोप पर विभागीय कार्यवाही एवं न्यायालय दोनों में सुनवाई चल रही है। जिस विभाग (संस्थान) द्वारा मुझ पर आरोप लगाया गया है, आरोप को सिद्ध करने की जिम्मेदारी उसी की है। संचालन पदाधिकारी पुलिस के अनुसंधान प्रतिवेदन को सही मानते हुए अपना जाँच प्रतिवेदन विभाग में समर्पित किए है, परन्तु उनके द्वारा अनुसंधान प्रतिवेदन के साथ संलग्न 600 पृष्ठ का दस्तावेजों एवं 84 गवाहों में से किसी की भी जाँच नहीं की गई।

मैं सुनवाई के क्रम में अपने पत्रांक शून्य दिनांक 13.01.2017 को संचालन पदाधिकारी से अनुरोध किया था कि आरोप को सिद्ध करने हेतु संबंधित अहम गवाहों की परीक्षण की जाए, परन्तु उनके द्वारा ऐसा नहीं किया गया। इस मामले में अनुसंधान कर्त्ता एक पुलिस निरीक्षक है उनके द्वारा तैयार किए गये प्रतिवेदन को सही मानकर यदि कारवाई हो तो न्यायालय की कोई आवश्यकता ही नहीं रहेगी, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आर्थिक अपराध ईकाई बिहार पुलिस का एक विभाग है वहाँ एक अनुसंधान कर्ता का प्रतिवेदन ही अंतिम होता है उसे कोई भी उपर के पुलिस पदाधिकारी जाँच नहीं करते है अन्यथा इस तरह का विसंगतिपूर्ण प्रतिवेदन तैयार ही नहीं होता।

आर्थिक अपराध इकाई द्वारा न्यायालय में समर्पित अनुसंधान प्रतिवेदन विसंगतियों से भरा है, जिसका उल्लेख मैं अपने जवाब में कर चुका हूँ मेरे तथा मेरी पत्नी से संबंधित कई हाय व्यय का गलत आकलन किया गया है, ऐसे संपति जैसे पत्नी का जेबर घरेलु सामान (जिसका कुल मूल्य लगभग 30 लाख आका गया है) आदि, जो चेक अवधि के पहले का है उसको भी स्वअर्जित दिखाया गया है जबकि इसका दस्तावेजी साक्ष्य आर्थिक अपराध इकाई द्वारा कोर्ट में समर्पित नहीं किया गया है, खाने मद में व्यय 25.75 लाख आका गया है। इसका भी कोई दस्तावेजी साक्ष्य नहीं है यह एक आपराधिक मामला है जिसका कोई भी दस्तावेजी साक्ष्य नहीं है उसकी सत्यता की जाँच गवाही से ही संभव है।

संचालन पदाधिकारी, पुलिस के अनुसंधान प्रतिवेदन में अंकित मेरे आय व्यय एवं संपति का आकलन को सही माना जिसकी जाँच आवश्यक थी, उनके प्रतिवेदन में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि मेरा कोई भी आय या संपति अवैध है। ऐसे मामले जिसकी जाँच केवल दस्तावेजो से नहीं की जा सकती वहाँ बिना गवाही के जाँच संभव ही नहीं है, साथ ही कई ऐसे दस्तावेज है जो अधूरे साक्ष्य पर आधारित है उसकी भी जाँच मौखिक गवाही से ही संभव है।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन आर्थिक अपराधिक इकाई द्वारा न्यायालय में समर्पित जाँच प्रतिवेदन में मेरे तथा पत्नी के नाम का अचल संपति तथा उसकी राशि अंकित किया है ये संपति में निवेशित राशि है, ये सभी संपति घोषित है, राशि में अंतर का कारण है, सामान्य प्रशासन विभाग से निर्गत "Declaration of Asset and Liabilities" प्रपत्र के अनुसार संपतिओं का बाजार मूल्य अंकित किया गया है।

बिहार सरकारी (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय समय पर यथासंशोधित) के नियम-17(14) से स्पष्ट है कि आरोप सिद्ध करने के लिए मौखिक साक्ष्य आवश्यक है।

सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार सरकार के पत्रांक-15548 दिनांक 06.12.17 के क्रमांक-5 के अनुसार संचालन पदाधिकारी के लिए अभिलेखों एवं साक्षियों के परीक्षण एवं प्रति परीक्षण को आवश्यक माना गया है परन्तु मेरे अनुरोध करने के बाद भी संचालन पदाधिकारी द्वारा इसकी अनदेखी की गई।

उल्लेखनीय है कि विभागीय कारवाई एक अर्द्धन्यायिक प्रक्रिया है, जाँच पदाधिकारी के लिए अनिवार्य है कि आरोपित को उसके बचाव वास्ते स्वच्छ एवं समुचित अवसर प्रदान की जाए, समुचित अवसर के अन्दर प्रतिपरीक्षण आता है। मैं अपने पत्रांक शून्य दिनांक 13.01.2017 में यह भी उल्लेख किया हूँ कि आर्थिक अपराध इकाई के अनुरोध पर आय कर विभाग द्वारा मेरे एवं मेरी पत्नी के केई वर्षों के आयकर विवरणी एवं संपतियाँ की जाँच की गई तथा सभी संपति वैद्य पाया गया (आय-कर विभाग के द्वारा वर्ष 2012-13 के आकलन आदेश का सत्यप्रति संलग्न) मैं अपने परीक्षण के क्रम में इसे संचालन पदाधिकारी को देता परन्तु यह अवसर मुझे नहीं मिला। मैं लिखित बहस में स्वयं को गवाह के रूप में प्रस्तुत करने का अनुरोध किया था, उसे भी संचालन पदाधिकारी द्वारा नहीं मानकर एकतरफा निर्णय ले लिया गया है। यहाँ यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति के आय व संपति का सही आकलन आयकर विभाग ही कर सकता है एक पुलिस नहीं।

विभाग में मेरे पुरे सेवा काल में मेरे विरूद्ध ऐसा कोई भी कदाचार का मामला नहीं रहा है जिससे मेरे किसी कार्य से सरकारी संपति की कोई क्षति हुई हो। यह एक आपराधिक मामला है इसके सत्यता की जाँच केवल उपलब्ध दस्तावेज से नहीं हो सकती है।

प्रायः ऐसा पाया गया है कि विभागीय कार्यवाही में सरकारी निर्देशों का अनुपालन किए बिना, संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर की गई कार्रवाई न्यायिक रूप से सही नहीं माना जाता है।

अधूरी जाँच पर आधारित प्रतिवेदन पर या किसी धारणा के तहत मेरे विरूद्ध किसी प्रकार की कारवाई नहीं की जानी चाहिए।

श्री पूर्वे सेवानिवृत कार्य0 अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री पूर्वे ने अपने अभ्यावेदन में विभागीय कार्यवाही के दौरान उनके पक्ष को नहीं सुने जाने, जाँच पदाधिकारी एवं गवाही का परीक्षण एवं प्रतिपरीक्षण नहीं किये जाने, पुलिस अनुसंधान के आधार पर आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य देने65 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 एवं विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं देनेे की बात कही गई है, किन्तु आरोप पत्र में श्री पूर्वे के विरूद्ध रू0 1,01,41,112/- (एक करोड एक लाख एकतालीस हजार एक सौ बारह रूपये) अधिक परिसंपति अर्जित करने का जो आरोप है, उसके संबंध में इनके द्वारा किसी प्रकार का खंडन नहीं किया गया है और न ही कोई ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत किया गया जो प्रपत्र-क में गठित आरोपों को खंडित करते हो। संचालन पदाधिकारी (अपर विभागीय जाँच आयुक्त) द्वारा इन्हें सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान श्री पूर्वे द्वारा समर्पित बचाव बयान की विधिवत समीक्षा संचालन पदाधिकारी द्वारा कंडिकावार की गई है। संचालन पदाधिकारी ने श्री पूर्वे द्वारा दिये गये बचाव बयान एवं इसके साथ संलग्न कागजात तथा प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा समर्पित किये गये कागजात के समीक्षोपरांत प्रपत्र-'क' में गठित तीनों आरोपों को श्री पूर्वे को विरूद्ध प्रमाणित पाया है।

समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपाें के लिए श्री भरत पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

"शत प्रतिशत पेंशन पर स्थायी रूप से रोक" सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय पत्रांक-812, दिनांक 18.04.2019 द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श मांगी गई। जिसके आलोक में बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर पत्रांक-1049 दिनांक 30.07.19 से अपनी सहमति प्रदान की गई।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक मं श्री भरत पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता, 3, SFA- 1/37 बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी, पटना-26 को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

"शत प्रतिशत पेंशन पर स्थायी रूप से रोक"

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

6 सितम्बर 2019

सं0 22नि0सि0(सम0)-02-09/2014/1926--श्री चंद्रिका तिवारी (आई0डी0-2258), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा सम्प्रति सेवानिवृत के पद पर पदस्थापित थे, तब आपके विरूद्ध निम्न आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2264, दिनांक 18.10.16 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में विहित रीति के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा अन्तर्गत, खिरोई बायाँ एवं दायाँ तटबंध के कि0मी0 44.0 से 90.50 एवं दायाँ तटबंध के कि0मी0 44.0 से 51.50 तक उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण कार्य की निविदा दिनांक 08.12.11 को प्राप्त की गयी। प्राप्त निविदा की संख्या-12 (बारह) थी। तकनीकी बीड मूल्यांकण समिति द्वारा तकनीकी बीड पर निर्णय दिनांक 02.05.12 को लिया गया। जिसमें 06 अद्‌द निविदाकार घोषित किये गये। वित्तीय बीड में सभी निविदाकारों का दर समान रहने के कारण लॉटरी से निर्णय लिया गया। जिसमें जी0एस0सी0ओ0 (GSCO) इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राईवेट लिमिटेड चयनित हुए।

इस निविदा के विरूद्ध परिवाद प्राप्त हुआ। जिसकी जाँच निगरानी विभाग, तकनीकी परीक्षक कोषांग, पटना से करायी गयी। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत यह परिलक्षित हुआ कि संवेदक जी0एस0सी0ओ0 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राईवेट लिमिटेड, चंडीगढ द्वारा सदृश कार्यानुभव प्रमाण में Brick lining की जगह Brick lining/Soling अंकित कराकर निर्गत कराया गया, जो गलत था। विभागीय पत्रांक-3031, दिनांक 18.12.09 के आलोक में सदृश कार्यानुभव प्रमाण पत्र का भौतिक सत्यापन नहीं कराने से सदृश कार्यानुभव प्रमाण में छेड़छाड़ करने वाले संवेदक को कार्य आवंटित हो गया।

अतः निविदा में दिये गये कार्यानुभव प्रमाण पत्र की सत्यता की जाँच नहीं कराने के फलस्वरूप एक असफल निविदाकार को कार्यावंटन हो गया, के लिए आप दोषी है।

विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-115, दिनांक 03.08.18 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन जिसमें आरोप को आंशिक प्रमाणित पाया गया है, की सम्यक समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी। सम्यक समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोप के लिए विभागीय पत्रांक-2446, दिनांक 28. 11.18 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी।

उक्त के आलोक में श्री चंद्रिका तिवारी, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में निम्न बचाव बयान दिया गया :-

खिरोई बायाँ तटबंध के कि0मी0 44.0 से 99.0 तथा दायाँ तटबंध के कि0मी0 44.0 से 91.50 तक के उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य के निविदा से संबंधित तकनीकी बीड दिनांक 27.01.12 को उच्चाधिकारी को अग्रेत्तर कार्रवाई हेतु समर्पित की गयी। जिसका निष्पादन विभागीय मूल्यांकण समिति द्वारा दिनांक 08.05.12 को किया गया।

तकनीकी बीड मूल्यांकण के क्रम में इसकी जाँच कई स्तरों पर की जाती है एवं उच्चाधिकारियों से प्राप्त निदेश के आलोक में आगे की कार्रवाई की जाती है। निविदा के तकनीकी बीड मूल्यांकण के निर्णय एवं कार्यावंटन के समय वे उक्त प्रमंडल में पदस्थापित नहीं थे, क्योंकि स्थानांतरण के फलस्वरूप दिनांक 22.02.12 को बाढ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा का पूर्ण प्रभार अपने प्रतिस्थानी को सौंप चुके थे।

कार्यानुभव प्रमाण-पत्र की सत्यता की जाँच कराये बगैर विभागीय तकनीकी मूल्यांकण समिति के समक्ष रखे जाने के लिए संचालित पदाधिकारी द्वारा उत्तरदायी नहीं माना गया है। निविदा में दिये गये कार्यानुभव प्रमाण पत्र की सत्यता की जाँच नहीं कराने के कारण असफल निविदाकार को कार्य आवंटित होने में इन्हें दोषी नहीं माना जा सकता है।बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 66 श्री तिवारी के द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा विभाग द्वारा की गयी जो निम्न प्रकार है :-

विभागीय पत्रांक-3031, दिनांक 18.12.09 से स्पष्ट है कि निविदा के समय संलग्न सभी प्रमाण पत्रों का निर्धारित समय-सीमा के अंदर भौतिक सत्यापन के उपरांत ही निविदा पर निर्णय लिया जाएगा। अभिलेखों से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य का निविदा दिनांक 08.12.11 को प्राप्त किया गया है तथा श्री तिवारी द्वारा दिनांक 22.02.12 को बाढ़ नियंत्रण प्रमंड, दरभंगा का प्रभार सौंपने के पूर्व ही दिनांक 27.01.12 को इस निविदा के तकनीकी बीड से संबंधित कागजात का अग्रसारण अधीक्षण अभियंता को की गयी है। अर्थात निविदा प्राप्त दिनांक 08.12.11 से दिनांक 27.01.12 अर्थात लगभग 49 दिनों के बाद निविदा कागजात आरोपी द्वारा भेजा गया है। इनके द्वारा गलत कार्यानुभव प्रमाण पत्र के सत्यापन कराने से संबंधित कोई भी अभिलेख उपलब्ध नहीं कराया गया है। इससे स्पष्ट है कि विभागीय पत्रांक-3031, दिनांक 18.12.09 के विपरीत बिना सत्यापन कराये ही निविदा कागजात उच्च पदाधिकारी को अग्रसारित किया जाना परिलक्षित है। इस प्रकार श्री तिवारी द्वारा अपने विरूद्ध लगाये गये आरोपों के संबंध में दिया गया द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब स्वीकार योग्य नहीं है। फलस्वरूप श्री चंद्रिका तिवारी (आई0डी0-2258), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा सम्प्रति सेवानिवृत को प्रमाणित आरोप के लिए "पाँच (05) प्रतिशत पेंशन की कटौती एक वर्ष के लिए" का दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया जिस पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग का परामर्श भी प्राप्त है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री चंद्रिका तिवारी, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है -

"पाँच (05) प्रतिशत पेंशन की कटौती एक वर्ष के लिए"

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

11 सितम्बर 2019

सं0 22नि0सि0(दर0)-16-03/2014/1942--श्री शैलेश कुमार सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (आई0डी0-3532), पश्चिमी कोशी नहर प्रमंडल, खुटौना द्वारा अपने उक्त पदस्थापन काल में बरती गई अनियमितता के संबंध में श्री संतोष कुमार झा द्वारा प्राप्त परिवाद की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल द्वारा कराई गई। उड़नदस्ता अंचल द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत निम्न आरोप के संबंध में विभागीय पत्रांक-335 दिनांक 25.02.16 द्वारा श्री सिंह से स्पष्टीकरण की मांग की गई।

आरोप-1- विभागीय पत्रांक-1283 दिनांक 04.10.13 के कंडिका -(ii) में अनुसार स्पष्ट उल्लेख है कि एकरारनामा के प्रावधानों के अनुरूप नियमानुसार कराये गये कार्यों का अंतिम मापी कर जमानत की राशि को वापस लौटाया जाय। परन्तु जाँच प्रतिवेदन एवं संलग्न अभिलेख यथा मापपुस्त एवं रोकड़बही से स्पष्ट है कि आपके द्वारा दोनों एकरारनामा संख्या-1SBD/2008-09 एवं 2SBD/2008-09 के तहत जमानत के रूप में चालु विपत्र से काटी गयी कुल राशि (कुल 9843237/-) कराये गये कार्यो के बिना अंतिम मापी लिए एवं बिना अंतिम विपत्र पारित किये ही संवेदक को लौटा दिया गया। जो विभागीय आदेश एवं नियम के विरूद्ध है जिसके लिये आप दोषी है।

आरोप-2-उसी प्रकार नियमानुसार इन दोनों एकरारनामा में समयवृद्धि में काटी गयी कुल राशि 4867417/- रूपये को कराये गये कार्यों के अंतिम मापी लेकर अंतिम विपत्र पारित होने के पश्चात ही संवेदक को वापस किया जाना विभागीय हित में होता ताकि ऋणात्मक विपत्र होने पर राशि का समायोजन हो सके। परन्तु आपके द्वारा विभागीय पत्रांक-1283, दिनांक 04.10.13 को आधार बनाते हुए दोनों एकरारनामा के तहत समयवृद्धि मद में काटी गयी राशि को कराये गये कार्यों को बिना अंतिम मापी लिये एवं बिना अंतिम विपत्र पारित किये ही संवेदक को कुल 4867417/- रूपये वापस कर दिया गया जो विभागीय नियम के विरूद्ध है। जिसके लिये आप दोषी है।

श्री सिंह द्वारा अपना स्पष्टीकरण समर्पित किया गया। प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरांत श्री सिंह के स्पष्टीकरण को अस्वीकार योग्य पाते हुए श्री सिंह के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित करने का निर्णय लिया गया।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री शैलेश कुमार सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमंडल, खुटौना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम 43बी0 के तहत विभागीय संकल्प सह पठित ज्ञापांक-470 दिनांक 03.04.17 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री सिंह के विरूद्ध प्रतिवेदित आरोप सं0-01 को प्रमाणित एवं आरोप सं0-02 को अप्रमाणित होने का मंतव्य अंकित किया गया। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोप सं0-01 एवं अप्रमाणित आरोप सं0-02 के आलोक में असहमति के बिन्दु पर श्री सिंह से अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) प्राप्त करने का निर्णय लिया गया।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री सिंह से विभागीय पत्रांक-1322 दिनांक 14.06.18 द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) समर्पित करने हेतु अनुरोध किया गया। असहमति के बिन्दु :-

67 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020

आरोप सं0-02 जो दोनों एकरारनामा के तहत विभागीय निदेश एवं नियम के विरूद्ध समयवृद्धि मद में काटी गयी कुल राशि 48,67,417/- रूपये को बिना अंतिम मापी लिए एवं बिना अंतिम विपत्र पारित किये ही लौटाने से संबंधित है के संदर्भ में संचालन पदाधिकारी का मत एवं आरोपित पदाधिकारी का कथन कि कार्य का आकलन भुगतान की गयी राशि से ज्यादा किया गया है यानि संवेदक को अंतिम मापी के आधार पर राशि भुगतान ही होता न कि वसूली। अतएव वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बनता है, स्वीकार योग्य नहीं है। क्योंकि किसी भी एकरारनामा के तहत कराये गये कार्यों का बिना अंतिम मापी लिये यह स्थापित नहीं किया जा सकता कि चालू विपत्र के माध्यम से किये गये भुगतान के तीन वर्ष बाद बिना कार्य कराये ही विपत्र घनात्मक होगा। प्रस्तुत मामले में बिना मापी लिये ही सहायक अभियंता/कनीय अभियंता द्वारा अनुमान के आधार पर तैयार किये गये तुल्यनात्मक विवरणी के आधार पर यह माना जाना कि अंतिम विपत्र ऋणात्मक न होकर घनात्मक होगा उचित प्रतीत नहीं होता है। यदि अंतिम विपत्र ऋणात्मक आता तो ऐसी स्थिति में उक्त राशि की वसूली जमानत की राशि अथवा समय वृद्धि में काटी गई राशि से किया जाता। परन्तु आपके द्वारा उक्त दोनों ही मदों की राशि को वापस कर देने के कारण वसूली किया जाना संभव नहीं होगा। अतएव बिना अंतिम मापी लिए समयवृद्धि मद में काटी गई राशि को वापस करने के लिये आप दोषी हैं। श्री सिंह द्वारा अपना अभ्यावेदन विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातों का उल्लेख किया। आरोप 1ः-जो जमानत की राशि लौटाने से संबंधित है। चूँकि As per entered MB घनात्मक है। कार्य वस्तुतः जून 2010 के बाद नहीं हुआ था। कृत कार्य की मात्रा के आधार पर संबंधित कनीय अभियंता/सहायक अभियंता द्वारा माप पुस्त में दर्ज मापी के अनुसार तुल्यनात्मक विवरणी तैयार किया गया था। जिसमें कराये गये कार्य की मात्रा माप पुस्त 700 (पृ0 सं0 35 से 50) में एकरारनामा सं0-1SBD/08-09 का दर्ज है तथा माप पुस्त सं0 732 के पृ0 32-37/प0 में एकरारनामा संख्या-SBD /08-09 की मात्रा दर्ज है। कार्य की बढ़ी हुई मात्रा के स्वीकृति के लिये अधीक्षण अभियंता ने अपने पत्रांक-947, दिनांक 14.11.13 द्वारा अनुशंसा किया गया तथा पत्रांक-938 दिनांक 13.11.13 द्वारा जमानत एवं विविध जमा राशि लौटाने का निदेश दिया गया। संबंधित सहायक अभियंता को अंतिम मापी कर एकरारनामा बन्द करने हेतु कई बार स्मारित किया गया। परन्तु उनके द्वारा कोई विपत्र समर्पित नहीं किया गया। तुल्यनात्मक विवरणी में अंकित मात्रा कार्य का अंतिम मात्रा था। फिर भी तुल्यनात्मक विवरणी एवं मापपुस्त में दर्ज मात्रा के भुगतान होने पर संवेदक को लगभग 15,00,000/- रूपये का और भुगतान होता। इस प्रकार कार्य स्वतः घनात्मक है। कार्य चूँकि 2010 में ही समाप्त था। अतः एकरारनामा के Clause-41 के अनुसार जमानत की राशि लौटा दी गयी। यद्यपि संवेदक से समय पर कार्य न कराने हेतु कार्य के 1 प्रतिशत विविध मद में काटी गयी राशि अभी भी शेष बची हुई है। जो कि एकरारनामा संख्या-01SBD/08-09 में रू0 533827/- एवं एकरारनामा संख्या-2SBD/08-09 में रू0 688074 रूपये बची हुई है जो कि विभागीय आदेश सं0-1283, दिनांक 04.10.13 के कंडिका 2 एवं 4 के द्वारा समय पर कार्य पूर्ण न कराये जाने के लिये संवेदक को जिम्मेवार नहीं माने जाने के कारण संवेदक को देय होता। लेकिन राशि अभी तक शेष बची हुई है। इस प्रकार स्पष्ट है कि तुल्यनात्मक विवरणी में अंकित मात्रा अनुमान्य के आधार पर आकलित नहीं है। बल्कि यह मापी पुस्त में दर्ज कृत कार्य की मात्रा है जो अधीक्षण अभियंता द्वारा भी अनुशंसित है कृत कार्य की मात्रा के आधार पर राशि लौटाने के समय विपत्र घनात्मक ही होता। उपर्युक्त कथनों एवं साक्ष्य से स्पष्ट है कि समयवृद्धि मद में काटी गयी राशि संवेदक को वापस करने के संबंध में विभागीय पत्रांक-1283, दिनांक 04.10.13 के कंडिका 4 में स्पष्ट आदेश है। जब कार्य घनात्मक है, कृत कार्य की मात्रा सही है, गुणवत्ता सही है, उड़नदस्ता जाँच दल द्वारा स्थलीय जाँचोपरांत कार्य पर कोई टिका-टिप्पणी नहीं है, अधीक्षण अभियंता का अनुशंसा है, लेखा पदाधिकारी की सहमति है, कार्य में कोई Defect Liablity नहीं है। अतः आरोप लगाना न्यायोचित नहीं है। विभागीय समीक्षा :- आरोप-1 के संदर्भ में श्री सिंह द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में वही तथ्य दिया गया जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया। आरोपी का कथन कि SBD के कंडिका-41 में प्रावधान है कि कार्य सम्पन्न होने के छः माह पश्चात जमानत की राशि का आधा रकम एवं शेष आधी रकम Defect liability अवधि के पश्चात डिफेक्ट को निदेशानुसार दूर करने एवं किसी वसूलीय राशि की वसूली करने के पश्चात देय है। इनके द्वारा यह भी कहा गया कि कार्य माह जून, 2010 तक कार्य कराया गया था जिसका तुल्यनात्मक विवरणी में कार्य घनात्मक होने के कारण जमानत की राशि लौटा दिया गया। स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता क्योंकि विभागीय पत्रांक 1283 दि॰ 04.10.13 के कंडिका (ii) में स्पष्ट अंकित है कि अंतिम मापी लेकर अंतिम विपत्र पारित करने के पश्चात जमानत की राशि लौटाना है। आरोपी के बचाव बयान से स्पष्ट परिलक्षित पाया गया कि उनके द्वारा बिना अंतिम मापी लिये एवं अंतिम विपत्र पारित किये ही दोनों एकरारनामा में संवेदक का जमानत के रूप में काटी गयी राशि को लौटाया गया। अतएव आरोप-1 प्रमाणित पाया गया। आरोप-2-विभागीय पत्रांक 1283 दि॰ 04.10.13 के कंडिका 4 से स्पष्ट है कि एकरारनामा के अन्तर्गत कार्य किये जाने की तिथि तक समय वृद्धि की स्वीकृति प्रदान करते हुए समय वृद्धि में काटी गयी राशि को संवेदक को वापस करने का निदेश है। उक्त कंडिका में अंतिम मापी लेकर इस मद में काटी गयी राशि को वापस करने का कोई उल्लेख नहीं है के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया। परन्तु संचालन पदाधिकारी का मत कि कार्य का आकलन भुगतान की राशि से ज्यादा किया गया है। यानी संवेदक को अंतिम मापी के आधार पर राशि का भुगतान ही होता न कि वसूली। स्वीकार योग्य नहीं पाया गया क्योंकि किसी भी एकरारनामा के तहत कराये गये कार्यो का बिना अंतिम मापी लिये ही यह स्थापित नहीं किया जा सकता है कि चालू विपत्र के माध्यम से किये गये भुगतान के तीन वर्ष के बाद बिना68 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 कार्य कराये ही विपत्र घनात्मक होगा। प्रस्तुत मामले में भी बिना अंतिम मापी लिये ही मात्र तुल्यनात्मक विवरणी के आधार पर स्थापित किया जाना कि विपत्र घनात्मक होगा, स्वीकार योग्य नहीं पाया गया। उपरोक्त के अतिरिक्त आरोपी द्वारा अपने बचाव बयान में कोई नया तथ्य नहीं दिया गया। मात्र वही तथ्य को दुहराया गया जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया। यदि अंतिम मापी के आधार पर विपत्र त्रृणात्मक होता तो उक्त राशि की वसूली जमानत की राशि एवं समय वृद्धि मद में काटी गयी राशि से की जाती। परन्तु आरोपी द्वारा बिना अंतिम मापी कराये एवं बिना अंतिम विपत्र पारित किये ही दोनों मदों में जमा राशि को वापस देने के कारण वसूली किया जाना संभव नहीं होगा। अतएव नियम के विरूद्ध बिना अंतिम मापी लिये ही समय वृद्धि मद में काटी गयी राशि को वापस करने के लिये श्री सिंह दोषी पाये गये। उक्त के आलोक में श्री सिंह के विरूद्ध प्रमाणित आरोपों के लिए "दस प्रतिशत (10%) पेंशन की कटौती पाँच वर्षों के लिए" दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में श्री शैलेश कुमार सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमंडल, खुटौना सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता है - "दस प्रतिशत (10%) पेंशन की कटौती पाँच वर्षों के लिए" सरकार के उक्त निर्णय में बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

13 सितम्बर 2019

सं0 22नि0सि0(पट0)-03-04/2017/1976--श्री उमेश सिंह (आई0डी0-3680), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल-01, पटना के पद पर पदस्थापित थें तो उनके विरूद्ध 14.01.2017 को सबलपुर दियारा पतंग उत्सव के दौरान हुई नाव दुर्घटना के दिन प्रतिनियुक्ति स्थल से अनधिकृत अनुपस्थिति, कर्तव्य में लापरवाही एवं अनुपस्थित के कारण विधि व्यवस्था के संधारण में हुई कठिनाई का आरोप गठित कर जिलाधिकारी, पटना के पत्रांक-1419 दिनांक-20.03.2017 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र 'क' उपलब्ध कराया गया। जिसके आलोक में श्री सिंह को विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-1032 दिनांक-27.06.2017 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1033 दिनांक-28.06.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। आरोप ः- जिला नियंत्रण कक्ष, पटना के संयुक्तादेश ज्ञापांक-160/जि0नि0क0 दिनांक-13.01.2017 द्वारा पतंग उत्सव के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में दिनांक-14.01.2017 से 17.01.2017 तक के लिए श्री उमेश सिंह, दण्डाधिकारी के रूप में प्रतिनियुक्ति हुए। पतंग उत्सव कार्यक्रम के दौरान दिनांक-14.01.2017 की संध्या में नाव दुर्घटना की घटना घटित हुई। इस घटना की जाँच हेतु सरकार की ओर से दो सदस्यीय जाँच दल का गठन किया गया। जाँच दल द्वारा उच्च स्तरीय जाँच करते हुए मोबाईल फोन के टॉवर लोकेशन के आधार पर समर्पित प्रतिवेदन में श्री सिंह को प्रतिनियुक्ति स्थल से अनुपस्थिति रहने के आलोक में दोषी पाया गया है। राज्य सरकार द्वारा लिए गए निर्णय के आलोक में सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक-3091 दिनांक-15.03.2017 के आधार पर चिन्हित पदाधिकारियों जो अनुपस्थित रहे हैं, जिनमें श्री सिंह भी सम्मिलित हैं, के विरूद्ध प्रपत्र 'क' में आरोप गठित कर अनुशासनिक प्राधिकार को भेजने का निदेश प्राप्त हुआ है। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के अनुसार श्री सिंह अपने प्रतिनियुक्ति स्थल से अनुपस्थित थें। श्री सिंह द्वारा अपनी अनुपस्थिति के संबंध में न तो कोई अनुमति ली गई अथवा इसकी सूचना ही वरीय पदाधिकारियों को दी गई। यह विधि व्यवस्था संबंधी संवेदनशील मामले में आदेश की अवहेलना सहित अनधिकृत अनुपस्थिति एवं कर्तव्य में लापरवाही का द्योतक है तथा श्री सिंह के इस अनुपस्थिति के कारण विधि व्यवस्था संधारण में कठिनाई हुई है। उक्त विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी का पत्रांक-2801 दिनांक-06.11.2017 द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। जाँच प्रतिवेदन में श्री सिंह की उपस्थिति के संबंध में कहा गया कि श्री सिंह पुलिस बल के लिए जारी कमान एवं अन्य दंडाधिकारियों द्वारा प्राप्त प्रमाण पत्र के आधार पर स्वंय को कार्यस्थल पर उपस्थित होने का साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है। जाँच पदाधिकारी द्वारा कहा गया कि जिस साक्ष्य के आधार पर आरोप पत्र गठित किया गया वह अपूर्ण है। मोबाईल लोकेशन के आधार पर ही श्री सिंह को दिनांक-14.01.2017 को अनुपस्थित मानते हुए निलंबित कर विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। परन्तु उपलब्ध कराए गए साक्ष्य कॉल डिटेल में श्री सिंह का मोबाईल नं0 का डिटेल अंकित नहीं है। जाँच पदाधिकारी द्वारा उक्त आधार पर श्री सिंह को आरोप से मुक्त पाया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा प्राप्त जाँच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए असहमति के बिन्दु पर विभागीय पत्रांक-1427 दिनांक-02.07.2018 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री सिंह द्वारा पत्रांक-शून्य दिनांक-04.07.2018 द्वारा जवाब समर्पित किया गया। जिसमें श्री सिंह द्वारा कहा गया है कि मोबाईल गाड़ी में छूट जाने के कारण मोबाईल लोकेट नहीं हुआ। वाहन चालक द्वारा अपने शपथ पत्र में भी उल्लेख किया गया है कि श्री सिंह का मोबाईल गाड़ी में छूट गया था। फेरी की व्यवस्था अच्छी नहीं होने के कारण दियारा में जाना संभव नहीं था।69 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उपर्युक्त अभिकथन की समीक्षा से ऐसा प्रतीत होता है कि घटना के बाद अपने बचाव के उद्देश्य से श्री सिंह द्वारा अपने मोबाईल को गाड़ी में छूट जाने की बात कहकर एक नयी कहानी बनाई गई है। यूँ भी विधि व्यवस्था के संधारण में वरीय पदाधिकारियों से संपर्क करने तथा अन्य व्यक्तियों के संपर्क में बने रहने के लिए मोबाईल अपने पास रखना आवश्यक था। अगर एक क्षण के लिए मान भी लिया जाए कि मोबाईल गाड़ी में छूट गया, तो यह भी उनकी गंभीर लापरवाही का द्योतक है। इसलिए उनके इस तर्क को सहज रूप से स्वीकृत नहीं किया जा सकता है। उनका यह कृत्य दंडनीय है। श्री सिंह दिनांक-31.10.2018 को सेवानिवृत हो गए। श्री सिंह को विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-2333 दिनांक-31. 10.2018 द्वारा सेवानिवृत होने के तिथि 31.10.2018 के प्रभाव से निलंबन मुक्त किया गया तथा उक्त विभागीय कार्यवाही को उनके सेवानिवृत होने के कारण बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) में सम्परिवर्तित किया गया। अतएव श्री उमेश सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता संप्रति सेवानिवृत को उक्त आरोप को प्रमाणित पाया गया। समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोप के लिए श्री उमेश सिंह को निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया :- ''01. अगले पाँच (05) वर्षों के लिए श्री सिंह के पेंशन की राशि से 20% की कटौती।'' उक्त दण्ड पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है तथा बिहार लोक सेवा आयोग के पत्रांक-1158 दिनांक-14. 08.2019 द्वारा उक्त निर्णित दण्ड पर सहमति प्राप्त है। श्री उमेश सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल-01, पटना संप्रति सेवानिवृत को निम्न अनुमोदित दण्ड संसूचित एवं अधिरोपित किया जाता है :- ''01. अगले पाँच (05) वर्षों के लिए श्री सिंह के पेंशन की राशि से 20% की कटौती।''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

13 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(औ0)-17-04/2017/1977--श्री अनिल कुमार जायसवाल (आई0डी0-2449), ग्रामीण कार्य विभाग, कार्य प्रमंडल, अरवल (प्रतिनियुक्त) सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा अपने उक्त पदस्थापन काल में बरती गई अनियमितता के संबंध में ग्रामीण कार्य विभाग के पत्रांक-2233 दिनांक 13.06.13 द्वारा स्पष्टीकरण किया गया। स्मारित करने के बावजूद श्री जायसवाल द्वारा स्पष्टीकरण समर्पित नहीं किया गया। फलतः मामले के सम्यक समीक्षोपरांत ग्रामीण कार्य विभाग के संकल्प सह पठित ज्ञापांक-2969 दिनांक 14.08.15 द्वारा श्री जायसवाल के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली 1950 के नियम-43(बी0) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। आरोप :- श्री जायसवाल के विरूद्ध निम्नांकित कार्याें के निविदा निष्पादन में गठित आरोप निम्नवत है (a) किंजर में P.C.C कार्य (प्राक्कलित राशि रू॰ 42,32,259/-), (b) ग्राम शेरपुर महादलित टोला में P.C.C पथ निर्माण (प्राक्कलित राशि रू॰ 32,73,000/-) (c) बम्बई ग्राम में P.C.C पथ निर्माण कार्य (प्राक्कलित राशि रू॰ 42,36,721/-)। आरोप (1) निविदा का प्रकाशन समाचार पत्र में नहीं कराया गया। आरोप (2) दिनांक- 25.08.11 को प्राप्त की जाने वाली उपरोक्त तीनों कार्याें की अल्पकालिन निविदा आमंत्रण सूचना का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं कराया गया तथा उसकी प्रति संबंधित कार्यालयों में नहीं भेजी गई। आरोप (3) उपरोक्त कार्याें के परिमाण विपत्र की स्वीकृति अधीक्षण अभियंता, कार्य अंचल- 2, गया से प्राप्त नहीं की गई। आरोप (4) अधीक्षण अभियंता कार्य अंचल- 2, गया द्वारा पत्रांक- 557 दिनांक- 25.08.11 द्वारा उक्त अल्पकालीन निविदा आमंत्रण सूचना को रद्‌द कर देने के बावजूद आपके द्वारा दिनांक- 25.08.11 को ही दो संबेदकों क्रमशः (क) मेंहन्दिया कन्सट्रक्शन प्राईवेट लिमिटेड, अरवल, जहानाबाद (ख) श्री पंकज कुमार, राजेन्द्र नगर, पटना से उपरोक्त तीनों कार्याें के लिए निविदा प्राप्त कर ली गई तथा इनमें से मेंहन्दिया कन्सट्रकशन प्राईवेट लिमिटेड, अरवल, जहानावाद को दो कार्य अनुसूचित दर पर (किंजर में P.C.C कार्य तथा ग्राम शेरपुर महादलित टोला में P.C.C पथ निर्माण) तथा एक कार्य (बम्बई ग्राम में P.C.C पथ निर्माण) श्री पंकज कुमार राजेन्द्र नगर, पटना को अनुसूचित दर पर दिनांक- 11.09.2011 को आवंटित कर दिया गया। आरोप (5) अधीक्षण अभियंता द्वारा निविदा आमंत्रण सूचना को रद्‌द कर देने के बावजूद आपके द्वारा दो संबंदकों से निविदा कागजात प्राप्त कर निविदा का गलत एवं मनमाने ढ़ंग से कर अपने पद का दूरूपयोग करते हुए सरकारी राशि की क्षति पहुँचायी गई।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। जाँच प्रतिवेदन में संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप संख्या-01 एवं आरोप संख्या-02 को अप्रमाणित एवं आरोप संख्या-03, 04 एवं 05 को प्रमाणित होने का मंतव्य अंकित किया गया। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए मामले के सम्यक समीक्षोपरांत ग्रामीण कार्य विभाग का पत्रांक-1482, दिनांक 29.04.2016 द्वारा श्री जायसवाल से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की गई। जवाब अप्राप्त रहने पर ग्रामीण कार्य विभाग के पत्रांक-3280 दिनांक 27.10.16 पत्रांक-224, दिनांक 31.01.17 द्वारा श्री जायसवाल को स्मारित किया गया। स्मारित करने के पश्चात भी द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब अप्राप्त रहने पर उक्त मामले को जल संसाधन विभाग स्थानांतरित किया गया चूंकि श्री जायसवाल का पैतृक विभाग जल संसाधन विभाग है। जल संसाधन विभाग का पत्रांक-1475, दिनांक 28.08.17 द्वारा श्री जायसवाल से द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब समर्पित करने हेतु70 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 अनुरोध किया गया। श्री जायसवाल द्वारा कतिपय अभिलेखों की मांग की गई जो उन्हें उपलब्ध कराया गया। अन्ततोगत्वा श्री जायसवाल द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब अपने पत्रांक-शून्य दिनांक 27.03.18 द्वारा समर्पित किया गया। द्वितीय कारण पृच्छा का प्रत्युत्तर :- ग्रामीण कार्य विभाग के पत्रांक-1482 दिनांक- 29.04.2016 द्वारा उपरोक्त पाँच गठित आरोपों पर संचालित विभागीय कार्रवाई में आरोप सं॰- (3), (4) एवं (5) को संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से सहमत होकर प्रमाणित पाते हुए पुछे गये द्वितीय कारण पृच्छा के प्रतियुत्तर में निम्न तथ्याें का उल्लेख अपने बचाव बयान में किया है। (क) श्री जायसवाल दिनांक- 31.10.2013 को सेवानिवृत हो चुके है। (ख) इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी द्वारा समेकित जाँच प्रतिवेदन के आरोप सं॰- (3), (4) एवं (5) में अंकित मंतव्य एक ही प्रकार का है, की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुये संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप सं॰- (3) का अंकित मंतव्य उद्धृत किया है। (ग) अपने प्रतिउत्तर में योजना एवं विकास विभाग का पत्रांक- 2036 दिनांक-30.06.11 एवं विकास आयुक्त कोषांग का पत्रांक- 64 दिनांक- 16.03.11 का हवाला देते हुए कहा गया है कि 50 लाख रूपये तक के कार्याें का तकनीकी स्वीकृति देने की शक्ति कार्यपालक अभियंता को है। यह शक्ति सरकार द्वारा किसी संबंधित योजना के क्रम में दी गई है जबकि PWD कोड के अनुसार कार्यपालक अभियंता को 3.50 रूपये तक की है। (घ) इनके द्वारा बिहार लोक निर्माण संहिता की कंडिका- 171 को उद्धृत करते हुए अंकित किया है कि '' If the amount of the tender is likely to be beyond the executive Engineer's Power of acceptance, or to be of an unusual character he should before publicly inviting tenders, Submit the Contract documents to the Superintending Engineer for his approved or remarks together with a copy of proposed advertisement for tenders and the form in which tenders are to be Submitted. इस प्रकार आरोपी पदाधिकारी का कथन है कि वैसी निविदा जिसपर निर्णय लेने की सक्षमता कार्यपालक अभियंता को नहीं थी, उसी परिमाण विपत्र को अधीक्षण अभियंता को भेजे जाने का निर्देश है। (ड.) बयान में कहा गया है कि जिन निविदाओं का निष्पादन किया गया था, वह सरकार के निर्णय अनुसार 50 लाख के अन्तर्गत था जिसपर निर्णय उन्हे ही लेना था। उक्त परिस्थिति में संचालन पदाधिकारी द्वारा यह कहा जाना कि परिमाण विपत्र की स्वीकृति अधीक्षण अभियंता से नहीं कराया जाना PWD Code के विपरीत है, बिहार लोक निर्माण संहिता के कंडिका- 171 के आलोक में नियमानुसार नहीं है। अतएव सहानुभूति पूर्वक विचार करते हुए आरोप से मुक्त किया जाय। द्वितीय कारण पृच्छा पर विभागीय समीक्षा ः- ग्रामीण कार्य विभाग के पत्रांक- 1482 दिनांक- 29.04.2016 द्वारा पुछे गये द्वितीय कारण पृच्छा में उक्त गठित पाँच आरोपों पर संचालित विभागीय कार्रवाई में मात्र आरोप सं॰- (3), (4) एवं (5) पर संचालन पदाधिकारी के प्रतिवेदन से सहमत होते हुए आरोप प्रामणित पाया है इसलिए आरोप सं॰- (3), (4) एवं (5) पर ही समीक्षा की गई। आरोप सं॰-3 में कार्याें का परिमाण विपत्र की स्वीकृति आरोपी पदाधिकारी द्वारा संबंधित अधीक्षण अभियंता, कार्य अंचल-2, गया से प्राप्त नहीं की गयी। इसपर संचालन पदाधिकारी का मंतव्य कि विकास आयुक्त कोषांग, पटना का पत्रांक-64 दिनांक-16.03.11 एवं योजना विकास विभाग, पटना का पत्रांक-2036 दिनांक-30.06.11 द्वारा 50 लाख रूपये तक के लिए प्रदत्त शक्ति के आलोक में मात्र तकनीकी स्वीकृति देने का सक्षम प्राधिकार कार्यपालक अभियंता को है जबकि आरोपी कार्यपालक अभियंता द्वारा कार्याें की तकनीकी स्वीकृति के साथ-साथ परिमाण विपत्र की भी स्वीकृति दी गई। संचालन पदाधिकारी द्वारा B.O.Q की स्वीकृति अधीक्षण अभियंता से किये जाने का साक्ष्य नहीं दिया गया। अतएव PWD कोड के प्रतिकूल पाया गया। बिहार लोक निर्माण संहिता की कंडिका-171 के अनुसार निविदा की राशि कार्यपालक अभियंता को प्रदत शक्ति के बाहर रहने पर या unsual charactor का कार्य रहने की स्थिति में ही कार्यपालक अभियंता को आम निविदा आमंत्रण सूचना एवं Contract documents संबंधित अधीक्षण अभियंता को भेजे जाने का उल्लेख है परिमाण विपत्र भी Contrect document का हिस्सा माना जाता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा कराये जाने वाले कार्य Unusual cheracter का कार्य था कि नहीं यह साक्ष्य या ब्यान में उल्लेखित नहीं है। Unusual cheracter का कार्य रहने की स्थिति में संबंधित अधीक्षण अभियंता का अनुमोदन आवश्यक है। अतः आरोपी के बयान से असहमत होते हुए द्वितीय कारण पृच्छा के आरोप सं॰- 3 में लगाये गये आरोप प्रमाणित पाया गया। आरोप संख्या-04 एवं 05 लगभग सदृश है जिसपर संचालन पदाधिकारी का मंतव्य एक ही तरह का है जिसे आरोप सं॰-4 के मंतव्य में अंकित किया गया है। आरोपी पदाधिकारी (कार्यपालक अभियंता) द्वारा उपरोक्त कार्याें का निविदा का प्रकाशन अपने पत्रांक-660 दिनांक 16.08.11 द्वारा किया गया था। Advertisment Receipt में Last Publishing date 25.08.11 अंकित है आमंत्रित अल्पकालिन निविदा सूचना में परिमाण विपत्र निर्गत करने की तिथि मात्र एक दिन 24.08.11 को 1 बजे अपराहन तक रखा गया है जबकि निविदा जमा करने की तिथि दिनांक- 25.08.11 को 3ः30 बजे अपराहन है। इस प्रकार परिमाण विपत्र बिक्री की तिथि मात्र एक दिन रखी गई है। लोक निर्माण विभागीय कोड की कंडिका- 159 में अंकित है कि निविदा विज्ञप्ति का प्रकाशन तथा निविदा प्राप्ति की अन्तिम तिथि के बीच आकस्मिक परिस्थिति में भी कम से कम 10 दिन से कम अन्तर नहीं71 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 होना चाहीए किन्तु इस अवधि को अधीक्षण अभियंता की पूर्वानुमति से कम किया जा सकता है। इस मामले में अधीक्षण अभियंता की पूर्वानुमति का साक्ष्य परिलक्षित नहीं होता है इसके विपरीत अधीक्षण अभियंता कार्य अंचल- 2, गया का पत्रांक7 557 दिनांक- 25.08.11 द्वारा उक्त अल्पकालिन निविदा आमंत्रण सूचना को रद्द करने संबंधी पत्र संबंधित कार्यपालक अभियंता को लिखे जाने के बावजूद निविदा प्रक्रिया को पुरा करते हुए दिनांक- 11.09.11 को कार्य आवंटित किया गया परिलक्षित होता है। विकास आयुक्त, पटना का पत्रांक- 64 दिनांक- 16.03.11 एवं योजना विकास विभाग, पटना का पत्रांक- 2036 दिनांक- 30.06.2006 के आलोक में मात्र 50 लाख तक की राशि का तकनीकी स्वीकृति की शक्ति कार्यपालक अभियंता को है, प्रशासनिक स्वीकृति की शक्ति नहीं है। आरोपित पदाधिकारी के पत्रांक- 701 दिनांक- 01.09.2011 द्वारा मात्र विभागीय पत्र द्वारा प्रदत शक्तियों के अनुकूल एवं नियमानुकूल कार्य करने का निदेश है। इस प्रकार द्वितीय कारण पृच्छा में आरोपी के बयान से असहमत होते हुए आरोप सं॰- 4 एवं आरोप सं॰- 5 प्रमाणित पाया गया।

द्वितीय कारण पृच्छा पर आरोपी का प्रत्युतर एवं संचालन पदाधिकारी का प्रतिवेदन के आलोक में श्री अनिल कुमार, जायसवाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग कार्य प्रमंडल, अरवल सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध ग्रामीण कार्य विभाग के पत्रांक- 1482 दिनांक- 29.04.16 द्वारा पुछे गये द्वितीय कारण पृच्छा में आरोपी के बयान से असहमत होते हुए लगाये गये आरोप सं॰- (3), (4) एवं (5) को प्रमाणित पाया गया।

उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अनिल कुमार जायसवाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध "10 (दस) प्रतिशत पेंशन पर 05(पाँच) वर्ष के लिए रोक" का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में श्री अनिल कुमार जायसवाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता है -

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

17 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(बिहा0)28-09/2018/2002--श्री रामप्रवेश पासवान (ID-4599), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमंडल-02, उदेरास्थान के पद पर जब पदस्थापित थे, तब विभागीय अधिसूचना सं0-3564 दिनांक-30.06.2016 द्वारा इनका स्थानांतरण बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल, सिउरीघाट किया गया। परन्तु श्री पासवान द्वारा इसका अनुपालन नहीं किया गया। नव-पदस्थापित पद पर योगदान नहीं किए जाने के फलस्वरूप विभागीय पत्रांक-3891 दिनांक-15.10.2018 द्वारा श्री पासवान को दिनांक-27.10.2018 के प्रभाव से स्वतः विरमित समझे जाने का निदेश संसूचित करते हुए दिनांक-29.10. 2018 तक नव-पदस्थापित पद का प्रभार ग्रहण कर इसकी सूचना विभाग को उपलब्ध कराने का निर्देश संसूचित किया गया परन्तु उनके द्वारा इस आदेश का भी अनुपालन नहीं किया गया।

उक्त कृत्य के लिए श्री पासवान को विभागीय अधिसूचना सं0-2704 दिनांक 31.12.2018 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प सं0-314 दिनांक-18.02.2019 द्वारा उनके विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में निहित प्रावधानांतर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी का पत्रांक-79 दिनांक-03.06.2019 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्न तथ्य पाया गया :-

(1) श्री रामप्रवेश पासवान द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि वे नव-पदस्थापित स्थान पर योगदान करने हेतु प्रयासरत थें, परन्तु प्रमंडल के अधीन अतिमहत्वपूर्ण कार्यों से संबद्ध रहने के कारण कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, उदेरास्थान के पत्रांक-733 दिनांक-23.10.2018 द्वारा उन्हें माह जून 2019 तक उक्त प्रमंडल में पदस्थापित रखने का अनुरोध अधीक्षण अभियंता से किया गया। इसी क्रम में अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, नालंदा, बिहारशरीफ के पत्रांक-1031 दिनांक-23.10.2018 द्वारा मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, नालंदा, बिहारशरीफ से श्री पासवान को पदस्थापित रहने देने का अनुरोध किया गया, जिसके आलोक में मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, बिहारशरीफ द्वारा उनके पत्रांक-1361 दिनांक-24.10. 2018 द्वारा श्री पासवान को प्रमंडल में जून 2019 तक पदस्थापित रखने हेतु विभाग से अनुशंसा की गयी। (2) बचाव बयान में श्री पासवान द्वारा अपने उपर आरोपों के बचाव में प्रतिवेदित किया गया कि उनके प्रमंडल के अन्तर्गत मुहाने बहुउद्देशीय मध्यम सिंचाई योजना से विभिन्न नहरों से निःसृत लघु नहर एवं जल स्त्राव का आधुनिकीकरण एवं लाईनिंग कार्य तथा मुहाने नदी के कि॰मी॰ 0.00 से 12.40 कि॰मी॰ तक नदी तल की उड़ाही, तटबंध एवं संरचना का निर्माण कार्य का विस्तृत योजना प्रतिवेदन तैयार करने एवं अन्य महत्वपूर्ण कार्यों से संबद्ध रहने के कारण उच्चाधिकारियों द्वारा कार्यहित में विभाग से माह जून-2019 तक यथावत पदस्थापित रखने का अनुरोध किया गया था। संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षतः पाया गया कि श्री पासवान, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमण्डल-2, उदेरास्थान सम्प्रति निलंबित को विभाग द्वारा स्थानांतरित किए जाने के पश्चात संबंधित उच्चाधिकारियों/वरीय पदाधिकारियों द्वारा विशेष परिस्थिति में माह जून-2019 तक उक्त प्रमण्डल में ही पदस्थापित रखने का अनुरोध किया, परन्तु विभागीय स्तर से कोई आदेश प्राप्त नही हो पाया। विभागीय आदेश के द्वारा श्री पासवान को दिनांक-27.10.2018 से स्वतः विरमित किया गया परन्तु उनके द्वारा विभागीय आदेश का अनुपालन नही किया गया। फलतः संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री पासवान के विरूद्ध लगाए गए आरोप को प्रमाणित पाया गया।72 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के आलोक में श्री रामप्रवेश पासवान, निलंबित सहायक अभियंता से विभागीय पत्रांक-1534 दिनांक-19.07.2019 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी एवं प्राप्त जवाब में भी उनके द्वारा वही तथ्य का उल्लेख किया गया जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया एवं समीक्षा से विदित है कि श्री रामप्रवेश पासवान, निलंबित सहायक अभियंता को विभाग द्वारा स्थानांतरित किए जाने के पश्चात यधपि संबंधित उच्चाधिकारियों द्वारा विशेष परिस्थिति में माह जून 2019 तक उक्त प्रमण्डल में ही पदस्थापित रखने का अनुरोध किया गया परन्तु उक्त अनुरोध को विभाग द्वारा स्वीकार नहीं किया गया और उनके स्थानांतरण पर कोई स्थगन आदेश सक्षम स्तर पर निर्गत नहीं हुआ, विभाग द्वारा उसके विपरीत दिनांक-27.10.2018 के प्रभाव से श्री पासवान को स्वतः विरमित करते हुए निदेश दिया गया कि वह नव-पदस्थापित स्थान पर अपना योगदान समर्पित करें परन्तु उक्त आदेश का भी उनके द्वारा अनुपालन नहीं किया गया। जिससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने जान-बूझ कर विभागीय आदेशों की अवहेलना की एवं पूर्व पद पर बने रहें। इस प्रकार श्री राम प्रवेश पासवान, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमण्डल-2, उदेरास्थान सम्प्रति निलंबित को विभागीय आदेश की अवहेलना के लिए दोषी पाया गया है। वर्णित तथ्यों के आधार पर मामले की सम्यक समक्षोपरांत सरकार द्वारा श्री राम प्रवेश पासवान (आई0डी0-4599), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमण्डल-2, उदेरास्थान सम्प्रति निलंबित को निलंबन से मुक्त करते हुए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-14 के तहत निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है :- ''असंचयात्मक प्रभाव से दो वेतनवृद्धि पर रोक।'' अतएव सरकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री रामप्रवेश पासवान, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमंडल-2, उदेरास्थान संप्रति निलंबित को निलंबन से मुक्त करते हुए निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है :-

''असंचयात्मक प्रभाव से दो वेतनवृद्धि पर रोक।''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

18 सितम्बर 2019

सं0 22नि0सि0(सम0)-02-08/2009/2018--श्री अवधेश प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा के विरूद्ध उक्त प्रमण्डलान्तर्गत वर्ष 2007-08 में प्रथम चरण में संपादित जमींदारी बाँधों के उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य में बरती गयी अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल, पटना से करायी गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के विभागीय समीक्षोपरांत कार्य में पायी गयी अनियमितता के लिए विभागीय पत्रांक-314 दिनांक-18.02.2010 द्वारा श्री सिंह से स्पष्टीकरण पूछा गया। प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए निम्न आरोप गठित करते हुए श्री अवधेश प्रसाद सिंह, सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-103, दिनांक 28.01.11 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी :-

1. जमींदारी बाँध के कार्यान्वयन हेतु दिये गये विभागीय निदेशों के आलोक में प्री लेवल की जाँच कराये बिना कार्य कराया गया।

2. बाँध का स्लोप विशिष्टि के अनुरूप नहीं पाया गया एवं बिना गुण नियंत्रण से जाँच कराये ही कार्यों का भुगतान किया गया है।

3. स्वीकृत प्राक्कलन में जंगल क्लीयरेंस हेतु अनुचित दर का प्रावधान किया गया है जिसके फलस्वरूप रु 25,361/- राशि का अनियमित भुगतान के लिए आप दोषी हैं।

4. जाँच पदाधिकारी के द्वारा सूचित किये जाने के बावजूद आपके द्वारा जाँच कार्य में सहयोग नहीं किया गया जिसके कारण कार्यों की पूर्ण जाँच नहीं की जा सकी।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोपों को प्रमाणित नहीं पाया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरांत जाँच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए असहमति के निम्नांकित बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-619 दिनांक-22.05.2014 द्वारा श्री सिंह से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी :-

1. संचालन पदाधिकारी द्वारा उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन में प्री लेवल की जाँच विभाग द्वारा गठित जाँच दल द्वारा किये जाने का उल्लेख के आधार पर बिना प्री लेवल की जाँच का ही कार्य कराने के आरोप को प्रमाणित नहीं माना गया है। परन्तु संदर्भित कोई साक्ष्य (जाँचित प्री लेवल बुक) न तो उड़नदस्ता दल एवं न ही आपके द्वारा उपलब्ध कराया गया है। अतः साक्ष्य विहित तथ्य को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। इस प्रकार संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आपके विरूद्ध आरोप सं0-01 प्रमाणित होता है।

2. जमींदारी बाँध का कार्य राजस्थानी ट्रैक्टर से कराने, प्राक्कलन में Compaction मद का प्रावधान नहीं रहने के कारण मिट्टी गुण नियंत्रण से जाँच का औचित्य नहीं होने तथा उड़नदस्ता द्वारा कराये गये कार्य पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं करने, मिट्टी की गुणवाा की जाँच नहीं करने एवं पायी गयी भिन्नता मामूली एवं मान्य सीमा के अन्तर्गत माने जाने के आधार पर संचालन पदाधिकारी द्वारा आपके विरूद्ध आरोप सं0-2 प्रमाणित नहीं माना गया है। परन्तु जिससे सहमत नहीं73 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 हुआ जा सकता है। शाहपुर PWD Road से बरहेता धरनी पट्टी तक जमींदारी बाँध के प्राक्कलन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि इस बाँध में 10 अद्‌द डबल भेट का पाईप कल्बर्ट का प्रावधान है। उक्त संरचना में कंक्रिटिंग कार्य, ब्रीक वर्क तथा अन्य पक्का कार्य कराया गया है। उक्त कार्य का भी गुण नियंत्रण जाँच से संबंधित कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अतः संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए बिना गुण नियंत्रण से जाँच कराये ही भुगतान करने का आरोप प्रमाणित होता है।

श्री सिंह से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत पाया गया कि बिना प्री लेवल जाँच कराये ही जमींदारी बाँध में मिट्टी कार्य कराने के संबंध में श्री सिंह द्वारा नया साक्ष्य रूप में संलग्न अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि विभागीय पत्रांक-2570 दिनांक-05.12.2007 के आलोक में मुख्य अभियंता, समस्तीपुर ने ज्ञापांक-3092 दिनांक-10.12.2007 से परिक्षेत्राधीन जमींदारी बाँध से संबंधित प्रमंडल के अधीन जमींदारी बाँध के प्री लेवल की जाँच हेतु प्रमंडलावार जाँच टीम गठित किया गया है तथा विभागीय पत्रांक-2665 दिनांक-18.12.2007 से मुख्य अभियंता परिक्षेत्रावार जमींदारी बाँध के प्री लेवल की जाँच हेतु टीम गठित की गयी है तथा मुख्य अभियंता को जमींदारी बाँधो के प्री लेवल की शत प्रतिशत जाँच असम्बद्ध अभियंताओं से कराने का निदेश दिया गया है। श्री सिंह द्वारा प्री लेवल की जाँच से संदर्भित साक्ष्य स्वरूप प्री लेवल बुक की छायाप्रति दी गयी है जिसके अवलोकन से स्पष्ट होता है कि हिचौल से अम्माडीह भाया फरगपुर तथा शाहपुर PWD Road से बरहेता धरनी पट्टी तक जमींदारी बाँधों के प्री लेवल बुक एवं PWD Road (दरभंगा-समस्तीपुर) से मखनाही टोला के खरंजा तक तथा PWD Road (परोरी-विशनपुर) से हब्बीपुर खरंजा तक जमींदारी बाँधो का संबंधित कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा लिए गये प्री लेवल का मुख्य अभियंता द्वारा गठित टीम से शत प्रतिशत जाँच कराया गया है तथा विभाग द्वारा गठित टीम द्वारा भी प्री लेवल की रेन्डम जाँच की गयी है। अतएव उड़नदस्ता तथा संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री सिंह के विरूद्ध बिना प्री लेवल की जाँच कराये कार्य कराने का आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

शाहपुर PWD Road से बरहेता घरनी पट्टी तक जमींदारी बाँधो में कराये गये संरचना कार्य में बिना गुण नियंत्रण की जाँच कराये भुगतान कराने संबंधी द्वितीय कारण पृच्छा में श्री सिंह द्वारा स्वीकार किया गया है कि उक्त जमींदारी बाँध में छोटे-छोटे संरचना रहने के कारण कार्यों का गुण नियंत्रण की जाँच नहीं करायी गयी है। जबकि नियमानुसार गुण नियंत्रण की जाँच कराकर ही भुगतान की कार्रवाई करना है। श्री सिंह द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है जिससे प्रमाणित हो सके कि कराये गये संरचनाओं के कार्य के भुगतान से पूर्व गुण नियंत्रण की जाँच करायी गयी है। अतएव श्री सिंह के विरूद्ध बिना गुण नियंत्रण की जाँच कराये ही भुगतान करने का आरोप प्रमाणित होता है।

इस प्रकार समीक्षोपरांत श्री अवधेश प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा के विरूद्ध आरोप सं0-02, संरचना के कार्यों का भुगतान बिना गुण नियंत्रण जाँच कराये ही करने का आरोप प्रमाणित होता है। उक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री अवधेश प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं0-1767 दिनांक-26.11.2014 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया :-

1. ''एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।'' उक्त दण्ड के आलोक में महालेखाकार (ले0 एवं ह0) का कार्यालय, बिहार, पटना के पत्रांक-जी0ई0-05-408 दिनांक-05.01.2018 (पृ0 378/प0) द्वारा विभाग को सूचित किया गया कि श्री अवधेश प्रसाद सिंह की सेवानिवृति की तिथि-31.01.2018 होने के कारण ''एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक'' का दण्ड संचयात्मक हो जा रहा है। अतएव वर्णित संदर्भ में मामले की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना सं0-1767 दिनांक-26.11.2014 द्वारा निर्गत दण्डादेश को निरस्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

उक्त के आलोक में श्री अवधेश प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं0-1767 दिनांक-26.11.2014 द्वारा निर्गत दण्ड ''एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक'' को निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

23 सितम्बर 2019

सं0 22नि0सि0(डि0)-14-06/2019/2046--श्री नरसिंह प्रसाद (ID-J-7694), सहायक अभियंता (असै0), दुर्गावती कार्य प्रमंडल, चेनारी संप्रति उार कोयल बाँध एवं बराज अवर प्रमंडल-2, मोहम्मदगंज का स्थानांतरण विभागीय आदेश सं0-2882 दिनांक-27.07.2018 द्वारा उनके प्रतिनियुक्ति पदस्थापन स्थान दुर्गावती कार्य प्रमंडल, चेनारी से समाप्त करते हुए मूल पदस्थापित स्थान उार कोयल बाँध एवं बराज अवर प्रमंडल-2 मोहम्मदगंज (औरंगाबाद) में योगदान करने हेतु किया गया। परन्तु उक्त आदेश के आलोक में संबंधित कार्यपालक अभियंता द्वारा दिनांक-24.01.2019 (पूर्वाहन) में योगदान करने की सूचना विभाग को उपलब्ध कराई गई।

श्री प्रसाद द्वारा उक्त आदेश का अनुपालन तत्समय नहीं करते हुए लगभग छः माह के विलम्ब से मूल पदस्थापित स्थान पर योगदान समर्पित किया गया।

विभागीय आदेश का उल्लंघन करने के कारण विभागीय पत्रांक-576 दिनांक-13.02.2019 द्वारा श्री प्रसाद से स्पष्टीकरण की माँग की गयी, तदालोक में श्री प्रसाद द्वारा स्पष्टीकरण का उार समर्पित किया गया। श्री प्रसाद से प्राप्त74 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 स्पष्टीकरण के सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय आदेश की अवहेलना करने के आरोप को प्रमाणित पाते हुए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया :-

(i) संगत वर्ष के लिए निन्दन की सजा। (ii) असंचयात्मक प्रभाव से एक वेतनवृद्धि पर रोक। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री नरसिंह प्रसाद, तत्कालीन सहायक अभियंता, दुर्गावती कार्य प्रमंडल, चेनारी संप्रति उार कोयल बाँध एवं बराज अवर प्रमंडल-2, मोहम्मदगंज को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है :-

(i) संगत वर्ष के लिए निन्दन की सजा। (ii) असंचयात्मक प्रभाव से एक वेतनवृद्धि पर रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

--------

23 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019/2054--श्री रत्नेश कुमार (आई0डी0 सं०-3985), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा संप्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, सिकन्दरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णोद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में कार्य सम्पादन की प्रक्रिया में अनियमितता एवं अन्य कार्यों में बरती गयी गंभीर अनियमितता के लिए सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री रत्नेश कुमार का मुख्यालय मुख्य अभियंता का कार्यालय, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, गया निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री रत्नेश कुमार को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री रत्नेश कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित कर अलग से निर्गत किया जायेगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

24 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(मुज0)-06-10/2015/2056--श्री राजेन्द्र प्रसाद (आई0डी0-4561), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-22123/2014 शिवेश कुमार बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के मामले में बरती गई अनियमितता के लिए विभागीय पत्रांक-1085, दिनांक 13.06.2016 द्वारा श्री प्रसाद से निम्नलिखित आरोपों के लिए आरोप प्रपत्र-'क' के साथ स्पष्टीकरण पूछा गया।

(i) सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-22123/2014 शिवेश कुमार बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के मामले में विभागीय उच्चाधिकारियों के निदेशों एवं स्मार पत्रों के बावजूद आपके द्वारा ससमय तथ्यकथन उपलब्ध नहीं कराने के कारण तथ्यकथन ससमय विभाग को समर्पित नहीं किया जा सका। फलस्वरूप माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा मुख्य सचिव, बिहार, पटना, सचिव, जल संसाधन विभाग, अभियंता प्रमुख (उत्तर) एवं मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर सहित अन्य सात पदाधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से दिनांक 14.09.15 को उपस्थित होने का आदेश पारित किया गया। जिससे विभाग छवी धुमिल हुई है। यह आपकी उदासीनता, अक्रमन्यता, कार्य के प्रति लापरवाही एवं उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना को दर्शाता है। जिसके लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी है।

(ii) बागमती विस्तारीकरण योजना कार्य से संबंधित श्री नवल किशोर प्रसाद शाही, अध्यक्ष कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति एवं श्री अवनीश कुमार सिंह, माननीय सदस्य बिहार विधान सभा से प्राप्त परिवाद की जाँच उड़नदस्ता अंचल, जल संसाधन विभाग, पटना से कराने के पश्चात विभागीय पत्रांक-1030, दिनांक 02.06.2014 द्वारा उक्त जाँच प्रतिवेदन पर अनुवर्ती कार्रवाई करते हुए बिन्दुवार मंतव्य एवं अभिलेखों साक्ष्य सहित उपलब्ध कराने के कारण ससमय विभागीय निदेश का अनुपालन नहीं हो सका, जो आपकी उदासीनता, अक्रमन्यता कार्य के प्रति लापरवाही एवं उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना एवं M.O.U. में वर्णित कंडिकाओं का अनुपालन नहीं करना दर्शाता है जिसके लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी है। उक्त के आलोक में श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, शिवहर ने अपने पत्रांक-0, दिनांक 13.08.2016 द्वारा विभाग में समर्पित स्पष्टीकरण में मुख्य रूप से निम्न बातें कहीं गई हैं :-

आरोप सं० 1ः- आरोप सं०-1 के संदर्भ में कहना है कि सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-22123/2014, शिवेश कुमार बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के रिट याचिका में कुल 11 (ग्यारह) Respondent है। जिसमें कार्यपालक अभियंता, बागमती75 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 प्रमंडल, शिवहर का नाम नहीं है। Respondent नहीं रहने के कारण बाढ़ में तथ्यकथन विवरणी तैयार कर प्रतिशपथ पत्र दायर करने का प्रश्न नहीं बनता है।

पुनः आरोप पत्र के साथ अनुलग्नक के पत्रांक-3221, दिनांक 26.12.2014, 1199 दिनांक 24.04.2015, 1354 दिनांक 15.05.15 तथा 1468, दिनांक 27.05.2015 आदि में भी बागमती प्रमंडल, शिवहर का नाम नहीं है।

बाद में हमसे पत्राचार के बाद मेरे द्वारा मौखिक एवं लिखित सूचना दे दी गई थी कि उक्त वाद में कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर Respondent नहीं है। इससे जो सहयोग की आवश्यकता हो मैं हमेशा सहयोग करने के लिए तैयार हूँ। इस कार्यालय के पत्रांक-374, दिनांक 04.08.2015 तथा पत्रांक-01 (कैम्प) मुज0 दिनांक 10.08.2015 द्वारा कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर को सूचना प्रेषित की गई थी।

मैं न्यायिक मामले में कभी भी उदासीनता नहीं बरतता हूँ। मेरे उपर पूर्व में भी कभी न्यायिक मामले में उदासीनता का आरोप नहीं लगा है। क्योंकि मैं उक्त मामलों में ससमय अपने कर्तव्य का निर्वहन करता रहा हूँ। अतः मेरे उपर लगाया गया आरोप बेबुनियाद एवं तथ्य से परे है। इसलिए इस आरोप से मुक्त करने की कृपा की जाय।

आरोप सं० 2ः- आरोप सं०-2 के संदर्भ में कहना है कि विभागीय पत्रांक-1030, दिनांक 02.06.2014 द्वारा जाँच प्रतिवेदन के कंडिका-"2" में अतिरिक्त भुगतान की समीक्षा मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर एवं बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल स्तर पर पूर्ण समीक्षा कर प्रतिवेदन समर्पित करने का निदेश था। इस पूर्ण समीक्षात्मक बैठक के लिए मौखिक रूप से मेरे द्वारा मुख्य अभियंता को स्मारित किया गया था। जब मुख्य अभियंता के पत्रांक-2503, दिनांक 14. 09.15 के आलोक में मुख्य अभियंता कार्यालय द्वारा बुलाया गया तो मैं अपने सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता के साथ अधीक्षण अभियंता सहित सभी संबंधित अभिलेखों के साथ पूर्ण समीक्षा के लिए मुख्य अभियंता कार्यालय में उपस्थित हुआ और दिनांक 16.09.2015 एवं 17.09.2015 को मुख्य अभियंता के साथ सचिव (प्रावैधिक) ई0 अशोक कुमार सिंह के साथ पूर्ण समीक्षा की गई। समीक्षोपरांत पूर्ण समीक्षा प्रतिवेदन मुख्य अभियंता महोदय द्वारा विभाग को आवश्यक कार्रवाई हेतु समर्पित किया गया। इसके पश्चात दिनांक 21.09.2015 को बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल द्वारा समीक्षा के लिए विभाग में उपस्थित होने के लिए दूरभाष द्वारा सभी अभिलेखों के साथ उपस्थित होने को कहा गया। मैं संबंधित अन्य अभियंताओं एवं वांछित अभिलेखों के साथ निर्देशानुसार निर्धारित तिथि एवं समय को पूर्ण समीक्षा में सहयोग के लिए उपस्थित हुआ था। इस प्रकार अनुरोधपूर्वक कहना है कि मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर एवं बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना को गहन समीक्षा कर प्रतिवेदन विभाग को समर्पित करना था तथा मेरे द्वारा सभी वांछित अभिलेख के साथ पूर्ण सहयोग करना था। जो मेरे द्वारा निर्धारित तिथि एवं समय को सहयोग किया गया है। अतएव मुझे आरोप से मुक्त करने की कृपा की जाय।

श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

आरोप 1- सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-22123/2014 शिवेश कुमार बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के मामले में विभागीय निदेश एवं स्मारित करने के बावजूद तथ्यात्मक विवरणी उपलब्ध नहीं कराने के बावजूद तथ्यात्मक विवरणी ससमय उपलब्ध नहीं कराने के कारण न्यायालय द्वारा विभागीय पदाधिकारी का व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का न्याय निर्णय पारित किये जाने से संबंधित है।

श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता द्वारा कहा गया है कि उक्त रीट याचिका में कार्यपालक अभियंता, शिवहर को Respondent नहीं बनाया गया था। इसकी लिखित सूचना पत्रांक-374, दिनांक 04.08.15 तथा एक (1) कैम्प दिनांक 10. 08.15 से कार्यपालक अभियंता, रून्नीसैदपुर को देते हुए प्रति मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को दे दी गयी है। इस आरोप के संदर्भ में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर द्वारा उपलब्ध कराये गये साक्ष्य से स्पष्ट है कि उक्त रीट याचिका में तथ्यकथन समर्पित करने हेतु प्रथम बार दिनांक 05.08.2015 को कार्यपालक अभियंता, शिवहर को निदेश दिया गया तथा आरोपी द्वारा दिनांक 04.08.15 एवं दिनांक 10.08.15 को वांछित सूचना यथा केस में वे पार्टी नहीं है। कार्यपालक अभियंता, रून्नीसैदपुर को देते हुए इसकी सूचना अधीक्षण अभियंता एवं मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर को दी गयी है तथा यह भी अंकित किया है कि विषयांकित मामले में अगर किसी तथ्य की आवश्यकता महसूस होती है तो कार्यालय से वांछित अभिलेख प्राप्त किया जा सकता है। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में ससमय तथ्यकथन विवरणी समर्पित नहीं करने के लिए श्री प्रसाद दोषी नहीं है। अतएव आरोप सं०-1 अप्रमाणित होता है।

आरोप सं० 2- विभागीय/मुख्य अभियंता के निदेश के अवहेलना करते हुए उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन पर ससमय अनुवर्ती कार्रवाई करते हुए वांछित प्रतिवेदन उपलब्ध नहीं कराने से संबंधित है।

श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता द्वारा कहा गया है कि विभागीय पत्रांक-1030, दिनांक 02.06.14 की कंडिका-2 में अतिरिक्त भुगतान की समीक्षा मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना के स्तर पर किया जाना था तथा मुख्य अभियंता के पत्रांक-2503, दिनांक 14.09.15 के आलोक में मुख्य अभियंता के कार्यालय में उपस्थित था एवं दिनांक 16.09.15 एवं 17.09.15 को सचिव (प्रावैधिक) के साथ समीक्षा की गयी। इसके पश्चात दिनांक 21. 09.15 को बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना के निदेशानुसार सभी अभिलेख के साथ समीक्षा हेतु उपस्थित होकर सहयोग किया गया, को आंशिक रूप से स्वीकार योग्य प्रतीत हो रहा है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि कार्यपालक अभियंता को चुपचाप बैठे रहना था। जबकि इन्हें अनेकों पत्र के माध्यम से वांछित प्रतिवेदन हेतु स्मारित किया गया है। विभागीय पत्रांक-1030, दिनांक 02.06.14 को मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर ने अपने पत्रांक-1480, दिनांक 01.07.14 के अन्य प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता के साथ-साथ शिवहर कार्यपालक अभियंता से एक विस्तृत जाँच प्रतिवेदन अधीक्षण76 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 अभियंता के माध्यम से उपलब्ध कराने का निदेश दिया गया तथा मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुवर्ती कार्रवाई करते हुए अनुपालन प्रतिवेदन हेतु स्मारित किया गया। परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इनके द्वारा दिनांक 14.09.2015 तक न तो अनुवर्ती कार्रवाई ही की गई और न ही वांछित प्रतिवेदन ही उच्चाधिकारी को उपलब्ध कराया गया। अपने कमियों को छिपाने के लिए उक्त पत्र में उद्धिृत कि "मुख्य अभियंता तथा अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, के स्तर पर समीक्षा किया जाना था को आधार बनाना चाहते है। जिसे उचित नहीं माना जा सकता है। अतएव कार्य में लापरवाही एवं उदासीनता बरतने तथा उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना करने के लिए श्री प्रसाद दोषी है। अतएव आरोप सं०-2 प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री राजेन्द्र प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर को विभागीय अधिसूचना संख्या-866 दिनांक 05.04.2018 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया -

"एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक" उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-01 दिनांक 15.05.18 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया है। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैंः-

विभागीय उड़नदस्ता का जाँच प्रतिवेदन अभियंता प्रमुख (उ0) के पत्रांक-1030, दिनांक 02.06.14 द्वारा निर्गत है। उड़नदस्ता के जाँचफल के कंडिका-02 में राजेन्द्र प्रसाद, कार्यपालक अभियंता द्वारा अतिरिक्त भुगतान करने की बात कहते हुए उस पर पुनः गहन समीक्षा का दायित्व मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर एवं अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग, पटना को सौंपा गया था। मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा अपने पत्रांक-1480, दिनांक 01.07.14 एवं कुछ अन्य पत्रों के माध्यम से अनुवर्ती कार्रवाई करते हुए कार्यपालक अभियंता, शिवहर से ही विस्तृत जाँच प्रतिवेदन की माँग की गयी। विभागीय समीक्षा में ऐसा पाया गया कि राजेन्द्र प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, शिवहर दिनांक 14.09.15 तक कोई जाँच प्रतिवेदन अपने उच्च पदाधिकारी को नहीं सौंपने के कारण दोषी है। इस बिन्दु पर उनका कहना है कि अपने उच्च पदाधिकारी की गहन समीक्षा में सहयोग के रूप में उन्हें वांछित अभिलेख के साथ उपस्थित रहना था अपना जाँच प्रतिवेदन नहीं देना था। मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के पत्रांक-2503, दिनांक 14.09.15 के आलोक में उनके द्वारा दिनांक 16.09.2015 से 17.09.2015 तक मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के कार्यालय में एवं 21.09.15 को बाढ़ मोनिटरिंग अंचल, पटना के उच्च पदाधिकारी की गहन समीक्षा में अभिलेख सहित उपस्थित रह कर सहयोग किया गया था।

श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सक्षम प्राधिकार द्वारा की गई। जिसमें निम्न तथ्य पाये गये हैं -

आरोपी द्वारा अपने पुनर्विलोकन अर्जी में मुख्य रूप से कहा गया है कि विभागीय पत्रांक-1030 दिनांक 02.06.14 से प्राप्त निदेश के आलोक में मामले की गहन समीक्षा में सहयोग के रूप में उन्हें मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना में उन्हें वांछित अभिलेख के साथ उपस्थित रहना था। उक्त के आलोक में उनके द्वारा दिनांक 16.09.15 से 17.09.15 तक मुख्य अभियंता, कार्याल्य एवं दिनांक 21.09.15 को बाढ नियंत्रण मोनिटरिंग, पटना में उच्च पदाधिकारियों की गहन समीक्षा में उपस्थित रहकर सहयोग किया गया था। उक्त कथन के समर्थन में कोई भी अभिलेख नहीं दिया गया है यह वही तथ्य है जो उनके द्वारा पूर्व में दिये गये स्पष्टीकरण में दिया गया है जिसकी पूर्ण समीक्षा पूर्व में की जा चुकी है। चूँकि इनके द्वारा न तो कोई नया तथ्य ही दिया गया है एवं न ही कोई साक्ष्य ही दिया गया है। ऐसी स्थिति में श्री प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। समीक्षोपरांत वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री राजेन्द्र प्रसाद, तत0 कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर का पुनर्विलोकन अर्जी अस्वीकृत करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजेन्द्र प्रसाद, तत0 कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर का पुनर्विलोकन अर्जी अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना संख्या-866, दिनांक 05.04.2018 द्वारा निर्गत दण्ड यथा "एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक" का दण्ड यथावत रखा एवं संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

24 सितम्बर 2019

सं0 22नि0सि0(पू0)-01-10/2006/2058--श्री चन्द्रशेखर पासवान, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, पूर्णियाँ के विरूद्ध सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज के अन्तर्गत निविदा आमंत्रण सूचना सं0-05/2005-06 के ग्रुप सं0-03 के कार्यावंटन में अनियमितता बरते जाने से संबंधित आरोपों की जाँच विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई, उड़नदस्ता से प्राप्त प्रतिवेदन की सम्यक समीक्षोपरांत आरोप को प्रमाणित पाते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-160 दिनांक-11.02.2011 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 19 के तहत विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गयी। विभागीय कार्यवाही के निष्पादन के क्रम में ही श्री पासवान की सेवानिवृत के बाद उक्त विभागीय कार्यवाही को आदेश सं0-52 दिनांक-10.02.2015 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) में सम्परिवर्तित किया गया।

विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत जाँच पदाधिकारी द्वारा आरोप को प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत मंतव्य से असहमत होेते हुए असहमति के बिन्दु के लिए श्री पासवान से विभागीय पत्रांक-1553 दिनांक-07.09.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी। श्री पासवान से प्राप्त77 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 द्वितीय कारण पृच्छा के सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना सं0-2194 दिनांक-28.09.2018 द्वारा श्री पासवान को निम्न दण्ड संसूचित किया गया :-

(i) 5% (पाँच प्रतिशत) पेंशन की कटौती 5 (पाँच) वर्षों तक। उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री पासवान द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन समर्पित किया गया, जिसमें वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को एवं द्वितीय कारण पृच्छा के उार में दिया गया।

निष्पादन हेतु बिना जाँचे-परखे निविदा कागजात मुख्य अभियंता को भेजा गया है, यदि मामले की सम्पूर्ण जाँच की जाती तो संभव था कि आरोपी द्वारा मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 के पक्ष में अनुशंसा नहीं की जाती। यदि मामले की विभागीय स्तर पर सम्यक जाँच नहीं होती तो श्री पासवान द्वारा मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 के पक्ष में निष्पादित निविदा जो अनुसूचित दर पर किया गया था, के तहत कार्य कराया जाता एवं एक बड़ी राशि का दुरूपयोग होने का मामला बनता, जबकि विभागीय जाँचोपरांत इस कार्य का निविदा मे0 रतिलाल यादव के पक्ष में अनुसूचित दर से 15% कम दर आवंटित किया गया है।

श्री पासवान ने अपने पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में कहा है कि कार्यपालक अभियंता, मुरलीगंज द्वारा तकनीकी बीड की जाँच की गयी, जाँच के क्रम में मे0 रतिलाल यादव के तकनीकी बीड में कुछ कारणों से जैसे चरित्र प्रमाण पत्र में ओभर राइटिंग/कटिंग, अग्रधन की राशि के रूप में NSC के पता में भिन्नता, सेल टैक्स सफाया प्रमाण पत्र में मे0 रतिलाल यादव की जगह पर रतिलाल यादव पाया गया, जिसके कारण मे0 रतिलाल यादव के तकनीकी बीड को अमान्य किया गया तथा मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 तकनीकी बीड को मान्य किया गया। निविदा कागजात एकल की स्थिति में अधीक्षण अभियंता, नहर अंचल पूर्णियाँ को भेजा गया। कार्यपालक अभियंता द्वारा मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 के अग्रधन के रूप में जमा राशि NSC जमा नहीं किया गया, जबकि NSC में 100 रूपये कम थी, यानि 100 रूपये के NSC निविदा की तिथि में कटिंग/ओभर राईटिंग कर तिथि में फेरबदेल किया गया। इसी आधार मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 का तकनीकी बीड अमान्य हो जाता। फलतः रतिलाल यादव का एकल निविदा हो जाता। एकल होने के कारण निविदा निस्तार हेतु मुख्य अभियंता को भेजा गया, लेकिन कार्यपालक अभियंता से NSC अप्राप्त रहने के कारण निविदा कागजात की जाँच नहीं हो सकी। मुख्य अभियंता द्वारा जाँचोपरांत अनुसूचित दर कार्यावंटन करने हेतु अधीक्षण अभियंता को भेजा गया, तत्पश्चात कार्यपालक अभियंता को भेजा गया।

उक्त कार्यावंटन के पश्चात मे0 रतिलाल द्वारा दिनांक-23.06.2006 को अभियंता प्रमुख (उार) को एक लिखित बयान दिया गया कि उनके द्वारा डाले गये निविदा को अमान्य कर कार्य मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 को आवंटित कर दिया गया। विभागीय स्तर पर निविदा अभिलेखों की जाँच के पश्चात विभागीय पत्रांक-1884 दिनांक-22.09.2006 द्वारा मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 के कार्यावंटन को रद्द करते हुए मे0 रतिलाल यादव को कार्यावंटन करने का आदेश दिया गया।

उक्त विभागीय आदेश के आलोक में पत्रांक-3320 दिनांक-11.12.2006 द्वारा मे0 रतिलाल यादव को निविदा दर अनुसूचित दर से 15% कम दर पर कार्य आवंटित किया गया।

श्री पासवान ने अपने पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में यह भी उल्लेख किया है कि निविदा अभिलेख के अग्रधन से संबंधित सभी NSC को अपने पास रखकर संबंधित कार्यालय के कर्मचारी द्वारा निविदा का निष्पादन कराया गया है। निविदा से 1.77 लाख की विभागीय राशि की क्षति हुई। इस संबंध में राशि का ब्योरा संचालन पदाधिकारी द्वारा विभागीय सुनवाई के क्रम में माँगा गया, लेकिन विभागीय पदाधिकारी से उन्हें प्राप्त नहीं हुआ। पूर्व में निविदा का कार्यावंटन निविदत दर पर हुआ, जो विभाग द्वारा रद्द कर दिया गया तथा विभाग द्वारा कार्यावंटन निविदत दर अनुसूचित दर से 15% कम दर पर कार्यावंटन हुआ, इसमें तो विभाग को स्वीकृत राशि का 15% का बचत हुआ, इसमें वसूली का मामला नहीं बनता है यदि उक्त राशि का वसूली करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है तो वसूली कार्यपालक अभियंता से होना चाहिए था क्योंकि उनके द्वारा उक्त निविदा के निष्पादन NSC को छुपाकर घोर अनियमितता का कार्य किये।

श्री पासवान से प्राप्त पुनर्विलोकन अभ्यावेदन से स्पष्ट होता है कि वे अपने पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में लगभग वही तथ्य एवं साक्ष्य दिये हैं जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को अथवा द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में दिये है। श्री पासवान ने पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में मुख्यतः प्रश्नगत कार्य के निविदा आमंत्रण से लेकर मे0 रतिलाल यादव को कार्यावंटन एवं कराये गये कार्य का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि निविदा के निष्पादन में पूर्ण रूप से कार्यपालक अभियंता एवं उनके कार्यालय के संबंधित कर्मचारी ही दोषी हैं क्योकि उनके द्वारा निविदा अभिलेख में अग्रधन से संबंधित सभी NSC को अपने पास रखकर संबंधित कार्यालय के कर्मचारी द्वारा गलत तथ्य प्रतिवेदित किया गया इसमें अधीक्षण अभियंता का कोई दोष नहीं है, स्वीकार योग्य नहीं है।

उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के अनुसार जिस आधार पर रलिलाल यादव का तकनीकी बीड अमान्य किया गया है वह नियम के विरूद्ध है क्योंकि विभागीय पत्रांक-34 दिनांक-12.02.2006 में स्पष्ट अंकित है कि आचरण प्रमाण पत्र को तकनीकी बीड के मापदण्ड में आवश्यक अंग नहीं बनाया गया है। मे0 रतिलाल यादव के पाटनरशीप डीड के क्लाउज (ii) के अनुसार श्री जगरनाथ यादव फर्म की ओर से एकरारनामा करने, NSC पास बुक आदि जमा करने के लिए प्राधिकृत है। डाकघर द्वारा सामान्यतः फर्म के नाम से निर्गत नहीं किया जाता है। बल्कि व्यक्तिगत नाम से निर्गत किया जाता है। अतएव फर्म के पतेबिहार गजट, 12 फरवरी 2020 78 एवं आवासीय पते की भिन्नता के आधार पर NSC को अमान्य किया जाना नियम संगत नहीं है। सेल टैक्स सफाया प्रमाण पत्र में केवल मे0 नाम के सामने अंकित नहीं रहने से इसे अमान्य किया जाना भी उचित नहीं है क्योंकि सेल टैक्स प्रमाण पत्र एवं सफाया प्रमाण पत्र में एक ही संख्या अंकित है। बिहार लोक निर्माण संहित के नियम 158A के अनुसार असफल निविदाता का प्राईस बीड लिफाफा लौटाने के उपरांत ही सफल निविदादाता का प्राईस बीड खोलने का प्रावधान है। परन्तु इस मामले में इनके द्वारा मे0 रतिलाल यादव के प्राईस बीड बिना लौटाये ही मे0 सरोज प्रा0 लि0 का प्राईस बीड खोला गया।

उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4.1.16 (i) से स्पष्ट है कि तुल्नात्मक विवरणी पर अग्रधन के रूप में मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 का 15,300/- रूपये को काट कर 15,900/- किया गया है जिसकी पुष्टि NSC संख्या 2AA010715 जिसकी राशि 100 रूपये से होती है जो दिनांक-17.03.2006 को निर्गत है जिसे Over Writing कर दिनांक-07.03.2006 बनाया जाना परिलक्षित है।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री पासवान द्वारा संवेदक एवं कार्यपालक अभियंता से मिलीभगत कर गलत ढंग से इस निविदा के निष्पादन हेतु बिना जाँचे-परखे निविदा कागजात मुख्य अभियंता को भेजा गया है। यदि मामले की सम्पूर्ण जाँच की जाती तो संभव था कि आरोपी द्वारा मे0 माँ सरोज कन्सट्रक्शन प्रा0 लि0 के पक्ष में अनुशंसा नहीं की जाती। अतएव श्री पासवान के विरूद्ध बिना जाँचे-परखे गलत ढंग से निविदा को एकल मानते हुए अनुशंसा करने के लिए दोषी हैं।

इस प्रकार श्री पासवान के विरूद्ध बिना जाँचें-परखे गलत ढंग से निविदा को एकल मानते हुए अनुशंसा करने के लिए दोषी पाते हुए उनसे प्राप्त पुर्नविलोकन अभ्यावेदन को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री चन्द्रशेखर पासवान, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, नहर अंचल, पूर्णियाँ संप्रति सेवानिवृत से प्राप्त पुर्नविलोकन अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

25 सितम्बर 2019

सं0 22नि0सि0(पट0)-03-01/2009/2070--श्री विजय कुमार सिन्हा (आई0डी0-2271), तत्कालीन सहायक अभियंता, सोन बाढ़ सुरक्षा प्रमंडल, दीघा, पटना संप्रति सेवानिवृत जब प्रतिनियुक्त स्थान (कुसहा तटबंध) से दिनांक-22.02. 2009 को कार्यपालक अभियंता श्री कामेश्वर नाथ सिंह के साथ बोलेरो गाड़ी से पटना आ रहे थें तब निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, पटना के गठित जाँच दल द्वारा नन्दलाल छपरा, बाईपास रोड, पटना के पास गाड़ी के तलाशी के दौरान 3,12,632/- (तीन लाख बारह हजार छः सौ बाीस रूपये) पाया गया। निगरानी दस्ता द्वारा उन्हें तत्काल हिरासत में लेकर निगरानी थाना कांड सं0-15/09 दिनांक-20.02.2009 दर्ज किया गया।

श्री विजय कुमार सिन्हा को उक्त राशि के साथ गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने के फलस्वरूप विभागीय अधिसूचना सं0-115 दिनांक-04.03.2009 द्वारा दिनांक-20.02.2009 द्वारा दिनांक-20.02. 2009 के प्रभाव से निलंबित किया गया तथा विभागीय संकल्प ज्ञापांक-342 दिनांक-24.04.2009 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत निम्न आरोप के लिए आरोप पत्र प्रपत्र 'क' गठित कर विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

आरोप :- ''निगरानी अन्वेषण बयूरो के गठित जाँच दल द्वारा 3,12,632/- (तीन लाख बारह हजार छः सौ बाीस रूपये) नगद अवैध राशि के साथ दिनांक-20.02.2009 को आपको गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है, इसके लिए आप दोषी पाए गए हैं।''

विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा प्राप्त जाँच प्रतिवेदन में श्री सिन्हा पर विभागीय दृष्टिकोण से 3,12,632/- हासिल करने का आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया, जबकि पुलिस अधीक्षक-सह-अनुसंधानकर्ता, निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, पटना का पत्रांक-126, दिनांक- 30.03.2009 द्वारा प्रेषित अनुसंधान प्रतिवेदन में उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर श्री सिन्हा पर नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से भारी राशि अर्जित करने का आरोप प्रमाणित पाया गया। श्री सिन्हा के पटना स्थित आवास से रु 2,82,500/- रूपये नगद मिलने तथा बैंकों के पासबुक में अंकित राशि का कोई वैधानिक लेखा प्रस्तुत नहीं करने का उल्लेख किया गया है। पुलिस अधीक्षक, निगरानी ब्यूरो से प्राप्त पत्रांक-126 दिनांक-30.03.2009 को साक्ष्य के रूप में संलग्न करते हुए संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन से असहमति के बिन्दु पर कारण पृच्छा की गई।

श्री सिन्हा द्वारा प्राप्त कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा की गई। समीक्षोपरांत यह निष्कर्ष हुआ कि श्री विजय कुमार सिन्हा एवं श्री कामेश्वर नाथ सिंह, कार्यपालक अभियंता दो ही व्यक्ति गाड़ी में थें। श्री सिन्हा द्वारा स्पष्ट नहीं किया गया कि काले रंग का बैग उनका नहीं है। प्रतिनियुक्ति कार्यालय से वेतनआदि की निकासी नहीं होती है। इसका मूल पदस्थापन कार्यालय, दीघा, पटना तथा इनकी प्रतिनियुक्ति कुसहा तटबंध पर थी। वर्तमान व्यवस्था में बिहार के सभी कर्मियों का सभी प्रकार का भुगतान बैंक के माध्यम से होता है। वर्णित स्थिति में निश्चित रूप से इनके पास से बरामद राशि नाजायज तरीके से प्राप्त की गई राशि है, जिसे पकड़े जाने पर झुठला रहे हैं। अनैतिक रूप से प्राप्त राशि की जब्ती सूची79 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 पर इनका लघु हस्ताक्षर प्राप्त है। उनके द्वारा कहीं नहीं कहा गया है कि उनके द्वारा किसी के दबाव में हस्ताक्षर किया गया है। जब्त की गई राशि को बाद में अपना होने से इनकार करना उनका Second Thought है।

उक्त समीक्षा के आधार पर विभागीय अधिसूचना सं0-756 दिनांक-11.07.2013 द्वारा ''सेवा से बर्खास्त'' का दण्ड अधिरोपित किया गया।

उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री सिन्हा द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी को समीक्षोपरांत अधिसूचना सं0-1297 दिनांक-22.

10.2013 द्वारा निरस्त कर दिया गया ।

श्री विजय कुमार सिन्हा द्वारा उक्त दंडादेश के विरूद्ध CWJC No-10607/2014 विजय कुमार सिन्हा बनाम बिहार राज्य एवं अन्य वाद माननीय उच्च न्यायालय, पटना में दायर किया गया, जिसमें दिनांक-05.12.2017 को माननीय उच्च न्यायालय, पटना का Oral Judgement में उक्त दंडादेश को निरस्त करते हुए निम्न आदेश पारित किया गया है। "In view of the procedure having been conducted contrary to the provisions of the Rules as noticed above, the order of Disciplinary Authority dated 11.07.2013 as also the order dated 22.10.2013 passed on the petitioner's review are hereby quashed. The matter is remanded to stage of Disciplinary Authority to proceed afresh in the matter, in accordance with procedure prescribed under the CCA Rules noticed above."

उक्त आदेश के आलोक में विभागीय दंडादेश सं0-756 दिनांक-01.07.2013 एवं पत्रांक-1297 दिनांक-22.10.2013 को विभागीय अधिसूचना सं0-270 दिनांक-08.02.2018 द्वारा निरस्त कर दिया गया। श्री सिन्हा को उनके सेवानिवृत (सेवानिवृति तिथि 30.09.2015) होने के कारण विभागीय अधिसूचना सं0-562 दिनांक-06.03.2018 द्वारा उक्त विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) में सम्परिवर्तित करते हुए विभागीय पत्रांक-564 दिनांक-06.03.2018 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

श्री विजय कुमार सिन्हा द्वारा कहा गया कि द्वितीय कारण पृच्छा में असहमति का बिन्दु का उल्लेख नहीं है। पुनः असहमति के बिन्दु अंकित करते हुए विभागीय पत्रांक-1975 दिनांक 06.09.2018 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री सिन्हा द्वारा उक्त के संदर्भ में जवाब प्राप्त हुआ।

उल्लेखनीय है कि जाँच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-1975 दिनांक-06.09.2018 द्वारा निम्न बिन्दुओं के संदर्भ में पृच्छा की गई :-

1. अनुसंधान के क्रम में बरामद की गई बैग में 500-500 रूपये की चार गड्डियाँ, जिसपर सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बिड़ला मंदिर रोड का स्टीकर लगा हुआ है, जिसपर पदाधिकारी का दिसम्बर माह का हस्ताक्षर अंकित है।

2. धावा दल द्वारा 3,12,632/- (तीन लाख बारह हजार छः सौ बाीस रूपये) श्री सिन्हा के पास से बरामद किया गया। उक्त बिन्दुओं के संदर्भ में श्री सिन्हा द्वारा अपने जवाब में कोई तथ्य प्रस्तुत नहीं किया गया। उल्लेखनीय है कि उसी अवधि मे पश्चिमी नहर प्रमंडल, खुटौना द्वारा कुसहा तटबंध पर कराए गए काम के संबंध में दिनांक-13.01.2009 तथा 16.02.2009 को क्रमशः रु 2,09,618/- तथा रु 89,53,779/- का विपत्र जमा हुआ, जो अग्रिम तथा अन्य राशि के कटौती के बाद विपत्र श्री कामेश्वर नाथ सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिस पर दोनों का हस्ताक्षर है। यह भी उल्लेखनीय है कि धावा दल द्वारा उस समय श्री विजय कुमार सिन्हा के पास से काले बैग में 3,12,632/- (तीन लाख बारह हजार छः सौ बाीस रूपये) बरामद किया गया। श्री सिन्हा द्वारा इतनी बड़ी राशि के बरामदगी के संदर्भ में अपने जवाब में कोई स्पष्ट साक्ष्य या तथ्य अंकित नहीं किया गया है, जो उनके अवैध तरीके से उक्त राशि अर्जित करने को प्रमाणित करता है। उनका आचरण बिहार सरकारी सेवक नियमावली के प्रतिकूल है।

अभियोजन स्वीकृति से यह भी प्रमाणित है कि जब्त राशि संवेदक को किए गए भुगतान का ही एक अंश है। इस प्रकार श्री विजय कुमार सिन्हा अपने बचाव बयान में द्वितीय कारण पृच्छा के प्रतिउार में यह स्पष्ट करने में विफल रहे हैं कि इतनी बड़ी धन राशि उनके पास कुसहा तटबंध से लौटते समय कहाँ से आई, जबकि न तो उनका स्थापना विपत्र वहाँ से पारित होना था और न ही मासिक वेतन नगद भुगतान किए जाने का प्रावधान है। स्पष्टतः उनके द्वारा लाई गई राशि अवैध थी जिसे गलत तरीके से उनके द्वारा अर्जित किया गया था। अपने द्वितीय कारण पृच्छा के अद्यतन बचाव बयान में कोई भी ऐसा तथ्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे उन्हें निर्दोष माना जा सके। अतः इसे बचाव बयान को अस्वीकृत किया जाता है। उक्त कृत्य के लिए श्री सिन्हा पूर्णतः दोषी हैं।80 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उक्त परिस्थिति में श्री विजय कुमार सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध प्रमाणित आरोपों के लिए बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के अन्तर्गत निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया हैः-

''स्थायी रूप से 100% (सौ प्रतिशत) पेंशन पर रोक'' उक्त निर्णीत दण्ड पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। अतएव उक्त निर्णय के आलोक में श्री विजय कुमार सिन्हा (आई0डी0-2271), तत्कालीन सहायक अभियंता, गंगा सोन बाढ़ सुरक्षा प्रमंडल, दीघा, पटना संप्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है :-

''स्थायी रूप से 100% (सौ प्रतिशत) पेंशन पर रोक''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

26 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(मुक0)(मुज0)19-27/2014/2076--श्री संजीवन चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 07.01.2007 को तिरहुत मुख्य नहर के वि0दू0 65.00 बायाँ बाँध पर टूटान एवं इसी स्थल पर दिनांक 13.01.2007 को नहर में हुए टूटान के संबंध में योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, जल संसाधन विभाग, पटना द्वारा उपलब्ध कराये गये प्रतिवेदन की सम्यक समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए श्री चौधरी को विभागीय संकल्प सं0-444, दिनांक 11.03.2010 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में ही दिनांक 31.05.2011 को श्री चौधरी के सेवानिवृत हो जाने के कारण उनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय अधिसूचना सं0-677, दिनांक 10.06.11 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए श्री चौधरी, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता से विभागीय पत्रांक-381, दिनांक 12.04.2012 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

श्री चौधरी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री चौधरी के विरूद्ध नहर के पर्यवेक्षण में कमी करने, टूटान की अनियमित ढंग से मरम्मति एवं नहर संचालन में अनियमितता के लिए सरकार द्वारा विभागीय अधिसूचना संख्या-146, दिनांक 04.02.13 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया। जिस पर बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा अपनी सहमति प्रदान की गयी। "पाँच प्रतिशत पेंशन पर सदा के लिए रोक"। उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री चौधरी, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 11.2.13 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया। जिसकी समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1092, दिनांक 11.09.13 द्वारा श्री चौधरी के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत किया गया।

उक्त के विरूद्ध श्री चौधरी, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्लू0जे0सी0 संख्या-12154/2014 दायर किया गया। जिसमें दिनांक 05.04.19 को पारित न्यायादेश के आलोक में श्री चौधरी द्वारा अपना अभ्यावेदन समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है - आरोप (i)- दिनांक 07.01.17 को तिरहुत मुख्य नहर के वि0दू0 65.0 बायाँ बाँध पर टूटान हुआ। उसी स्थल पर पुनः दिनांक 13.01.07 को नहर में टूटान हुआ। परन्तु इनके द्वारा इसकी सूचना मुख्य अभियंता को क्रमशः दिनांक 11.01.17 एवं 19.01.17 को दी गयी। जिससे स्पष्ट परिलक्षित है कि विभागीय पत्रांक-1256, दिनांक 30.12.06 में निर्गत दिशा निदेश का उल्लंघन कर नहर का पर्यवेक्षण नहीं किया गया।

(ii)- दिनांक 07.01.17 को हुए टूटान का यथाशीघ्र निरीक्षण कर उसकी मरम्मति असम्बद्ध प्रमंडल से कराने का निदेश विभागीय पत्रांक-1295, दिनांक 28.08.90 के अनुसार देना चाहिए था। जो नहीं दिया गया।

(iii)- नहर के टूटान मरम्मति की अवधि में नहर संचालन एवं नहर मरम्मति के पश्चात नियमित जलश्राव हेतु किसी प्रकार के दिशा निदेश उनके द्वारा नहीं दिया गया, जो नहर संचालन के लिये निर्गत विभागीय पत्रांक-1256, दिनांक 30.12.2006 में निहित दिशा निदेश का प्रतिकूल पाया गया। जो नहर संचालन में अनियमितता दर्शाता है। बचाव बयान - आरोप-1-इस आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि विभागीय जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि बाँध टूटान में दो दिन बाद सूचना पत्रांक-77 दिनांक 09.01.17 द्वारा दी गयी, तत्पश्चात कार्रवाई करते हुए जाँच रिपोर्ट उनके स्तर से ज्ञापांक-65 दिनांक 11.01.17 द्वारा उच्च पदाधिकारी को भेजी गयी। पुनः बाँध टूटान की जानकारी उन्हें ज्ञापांक-134 दिनांक 15.01.17 को दी गयी और मैंने विस्तृत जाँच प्रतिवेदन ज्ञापांक-12 दिनांक 19.01.17 द्वारा विभाग को भेज दी। जो अभिलेखों एवं गोपनीय विभागीय जाँच रिपोर्ट से स्पष्ट है। अतः उनके स्तर से पर्यवेक्षण में कोई कमी नहीं की गयी थी। आरोप-2-विभागीय निदेश से एवं अन्य आदेशों से पूर्णतः स्पष्ट है कि टूटान मरम्मति कार्य संबंधित निर्णय मुख्य अभियंता द्वारा लिये जाने की शक्ति प्रदत है। अधीक्षण अभियंता मात्र इस संबंध में प्रतिवेदन अग्रसारित कर सकता है। उनके द्वारा भी81 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 यही किया थ। जो विभागीय जाँच प्रतिवेदन से भी स्पष्ट है एवं उनके पत्रांक-65 दिनांक 11.01.17 से भी स्पष्ट है जो विचारणीय है। अतः उनके समय मरम्मति को अनियमित ढंग से नहीं कराया गया। आरोप-3- नहर संचालन का कार्य अधीक्षण अभियंता के देख-रेख में कनीय अभियंता, सहायक अभियंता, कार्यपालक अभियंता, मेट एवं नहर खलासी से संचालित होता है। उन्हें ससमय कोई भी सूचना इन पदाधिकारी द्वारा नहीं दी गयी थी। नहर का संचालन सुचारू रूप से चल रहा था। यह सब देखना प्रतिदिन उनका काम है तो सहायक अभियंता, कनीय अभियंता, कार्यपालक अभियंता, मेट एवं नहर खलासी की नियुक्ति करने की कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता है। नहर संचालन में भी अनियमितता उनके स्तर से नहीं की गयी है। उनके द्वारा सभी कर्मचारी एवं पदाधिकारी के लापरवाही के बारे में अपने प्रतिवेदन से सूचित किया गया था।

विभाग में कुछ पदाधिकारी का एक संगठन दल था जो ईमानदार कर्मठ एवं कर्त्तव्य परायण पदाधिकारी के विरूद्ध आरोप गठित करने का कार्य किया करते थे। जातिये आधार की नीति को सर्वप्रथम प्राथमिकता बनाकर उन्हें मुख्य अभियंता की पदोनत्ति रोकने के लिये एवं आर्थिक एवं मानसिक क्षति पहुँचाने के आशय में गलत आरोप लगाकर नियम एवं गोपनीय विभागीय जाँच एवं बिना साक्ष्य के आर्थिक क्षति का आकलन किये बिना संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपों को आंशिक प्रभावी मान लिया गया एवं उन्हें दण्डित कर 5 प्रतिशत पेंशन को सदा के लिये रोक दिया गया। जो न्यायोचित नहीं है। उनके स्तर से दो दिन का भी विलंब नहीं किया गया लेकिन दण्ड दिया गया। जबकि उनके इन आरोप को वर्ष 2006-07 का था, उनका निष्पादन करने में लगभग 6 साल विभाग द्वारा लिया गया। यह विभाग का उचित निर्णय नहीं कहा जा सकता है, जो विभागीय दिशा निदेशों का उल्लंघन है एक विशेष जाति के सेवानिवृत पदाधिकारी पर अकारण कारवाई होती है। दण्ड निर्धारण के बाद से ही मेरा 5 प्रतिशत पेंशन आज तक बन्द है। जिसमें मुझे आर्थिक क्षति हो रही है। श्री संजीवन चौधरी, सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता से प्राप्त अभ्यावेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- आरोप-1-जो नहर टूटान की सूचना ससमय नहीं देकर विभागीय पत्रांक-1256, दिनांक 30.12.16 में निहित निदेश का उल्लंघन करने से संबंधित है। श्री चौधरी द्वारा कहा गया है कि नहर बाँध टूटान के दो दिन बाद सूचना पत्रांक-77 दिनांक 09.01.07 द्वारा दी गयी। तत्पश्चात कार्रवाई करते हुए जाँच रिपोर्ट पत्रांक-65, दिनांक 11.01.17 से उच्च पदाधिकारी को दी गयी। पुनः बाँध टूटान की जानकारी उन्हें दिनांक 15.01.07 को दी गयी एवं उनके द्वारा विस्तृत जाँच प्रतिवेदन पत्रांक-120 दिनांक 19.01.07 द्वारा विभाग को दी गयी। अभिलेखों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि तिरहुत मुख्य नहर में प्रथम वार दिनांक 07.01.07 को टूटान हुआ है तथा पुनः दिनांक 13.01.07 को उसी स्थल पर टूटान हुआ है। श्री चौधरी के अभ्यावेदन से स्पष्ट होता है कि उक्त टूटान की सूचना क्रमशः दिनांक 11.01.17 एवं दिनांक 19.01.17 को मुख्य अभियंता को दी गयी है। विभागीय पत्रांक-1256, दिनांक 30. 12.06 के कंडिका (x) के अनुसार अधीक्षण अभियंता को प्रतिदिन नियमित रूप से गश्ती करना है एवं प्रतिवेदन उच्च पदाधिकारी को उपलब्ध कराना है। इससे स्पष्ट है कि इनके द्वारा नहरों को सही ढंग से पर्यवेक्षण नहीं किया गया है। अगर इनके द्वारा नहरों का सही ढंग से निरीक्षण/पर्यवेक्षण किया जाता तो संभव था कि पुनः नहरों में टूटान नहीं होता। साक्ष्य के अनुसार दिनांक 07.01.07 को बाँध पाईपिंग के कारण टूटा। टूटान स्थल पर नहर का जलश्राव 84 घनसेक था जबकि नहर का रूपांकित जलश्राव 3387 घनसेक है। इतनी कम जलश्राव पर बाँध का टूटान तभी संभव है जब नहर में किसी कारण से पाउडिंग किया गया होगा। जिसकी ससमय सूचना नहीं दी गयी। इस प्रकार अधीक्षण अभियंता श्री चौधरी के स्तर से नहरों के पर्यवेक्षण में कमी परिलक्षित होता है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। आरोप-2-दिनांक-07.01.2007 को हुए टूटान का यथाशीघ्र विभागीय पत्रांक-1295 दिनांक-28.08.2009 के अनुसार मरम्मति असम्बद्ध प्रमंडल से कराने का निदेश नहीं देने से संबंधित है। श्री चौधरी द्वारा कहा गया है कि विभागीय निदेश एवं अन्य आदेशों से पूर्णतः स्पष्ट है कि टूटान मरम्मति कार्य संबंधित निर्णय मुख्य अभियंता द्वारा निये जाने की शक्ति प्रदा है। अधीक्षण अभियंता मात्र इस संबंध में प्रतिवेदन अग्रसारित ही कर सकता है। यही किया गया था। उक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। जबकि विभागीय पत्रांक-1295 दिनांक-20.08.09 के कंडिका (3) के अनुसार कटान/टूटान की मरम्मति प्रभारी कनीय अभियंता/सहायक अभियंता से न कराकर भिन्न प्रमंडल से कराना है तथा कंडिका-4 में टूटान की जिम्मेवारी निश्चित कर जवाबदेही व्यक्ति की प्रक्रिया के अनुरूप समुचित दण्ड दिया जाना है। उक्त निदेशों का उल्लंघन करते हुए इनके द्वारा पत्रांक-65 दिनांक-10.01. 07 द्वारा मरम्मति का कार्य विभागीय रूप से कराने का प्रस्ताव दिया गया। अतएव इनके द्वारा विभागीय ढंग से नहर टूटान की मरम्मति करने का प्रस्ताव देने से विभागीय पत्रांक-1295 दिनांक-20.08.90 में निहित निदेशों की अवहेलना करने का आरोप प्रमाणित होता है। आरोप-3-जो विभागीय पत्रांक-1256 दिनांक-31.12.06 में निहित निदेश का उल्लंघन करते हुए नहर टूटान मरम्मति की अवधि में एवं मरम्मति के पश्चात नियमित जलश्राव एवं संचालन हेतु कोई दिशा निदेश नहीं दिये जाने से संबंधित है। श्री चौधरी द्वारा कहा गया है कि नहर संचालन का कार्य अधीक्षण अभियंता के देख-रेख में कनीय अभियंता, सहायक अभियंता, कार्यपालक अभियंता, मेट एवं नहर खलासी से द्वारा किया जाता है उनके स-समय कोई सूचना नहीं दी गयी। यह कथन उचित प्रतीत नहीं होता है क्योंकि विभागीय पत्रांक-1256 दिनांक-30.12.06 के कंडिका (ix) के अनुसार नहरों में प्रवाहित जलश्राव का गहन प्रबंधन अधीक्षण अभियंता के स्तर पर किया जाना है। जिसका अनुपालन श्री चौधरी द्वारा82 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 नहीं किये जाने के कारण मरम्मति के पश्चात पुनः उसी स्थल पर टूटान हुआ जिससे विभाग को विाीय क्षति होना परिलक्षित है। श्री चौधरी द्वारा यह भी कहा गया है कि सभी अधीनस्थ कर्मचारियों एवं पदाधिकारियों की लापरवाही के बारे में उच्चाधिकारी को सूचित किया गया था। उक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। अतएव इनका कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है एंव आरोप प्रमाणित होता है। समीक्षोपरांत श्री संजीवन चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध पूर्व में निर्गत दण्डादेश यथा पाँच प्रतिशत पेंशन पर सदा के लिए रोक के दण्ड को बरकरार रखते हुए इनका अभ्यावेदन अस्वीकृत करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है। अतएव सरकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री संजीवन चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध पूर्व में निर्गत दण्डादेश यथा पाँच प्रतिशत पेंशन पर सदा के लिए रोक के दण्ड को बरकरार रखते हुए अभ्यावेदन अस्वीकृत किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

26 सितम्बर 2019

सं0 22नि0सि0(पट0)-03-01/2014/2080--श्री अजय कुमार सिंह (आई0डी0-3918), तत्कालीन सहायक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग, कार्य प्रमंडल-2, पटना संप्रति सहायक अभियंता, अभियंता प्रमुख मुख्यालय का कार्यालय, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना जब उक्त पद पर पदस्थापित थें तो उनके विरूद्ध पटना जिला के खजूरी पनहारा (वी0आर0-26 आर0/03) पथ निर्माण कार्य में अनियमितता बरतने का आरोप प्रतिवेदित कर आरोप पत्र प्रपत्र 'क' गठित किया गया। आरोप निम्नलिखित है :-

ग्रामीण कार्य विभाग, कार्य प्रमंडल-2, पटना पदस्थापन अवधि में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनान्तर्गत पटना जिला के खजूरी पनहारा (वी0आर0-26/आर0/03) पथ निर्माण कार्य में बरती गई अनियमितता की जाँच दिनांक-07.11.2009 को श्री धर्मेन्द्र सिंह, विशेष कार्य पदाधिकारी, ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार, पटना के नेतृत्व में गठित जाँच दल के द्वारा की गई। जाँच प्रतिवेदन के आधार पर निम्न आरोपों के लिए दोषी प्रतिवेदित किए गए :-

1. जाँच के क्रम में GSB की मुटाई प्रथम कि0मी0 से चौथे कि0मी0 तक प्रावधानित मुटाई (300 मी0मी0) से कम पाई गई। विशेष रूप से प्रथम कि0मी0 के एक स्थान पर मुटाई बहुत ही कम (150 मी0मी0) पाई गई। शेष स्थानों पर इसकी मुटाई प्रावधान के अनुरूप पाई गई लेकिन यह मुटाई प्रावधान के अनुरूप पाई गई लेकिन यह मुटाई मिट्टी के लगभग तीन ईंच परत को शामिल करके है, जो अस्वीकार्य है।

2. WBM Grade-II एवं Grade-III की संयुक्त मुटाई प्रावधानित 150मी0मी0 के बदले तीसरे, चौथे, पांचवें कि0मी0 के बीच में एवं आठवें कि0मी0 में कम पाई गई है।

3. पथ के लगभग सभी स्थानों पर GSB एवं WBM Grade-II एवं Grade-III की संयुक्त मुटाई में मिट्टी का अंश पाया गया है, जो आपािजनक है।

4. पथ के सतह पर Grades नजर आ रहे है। पथ लगभग सभी स्थानों पर Failed कर गया है। जिसके कारण Subgrades का Optimum moisture content पर Compaction न किया जाना, परिवर्ती परतों का उचित संपीड़न न होना तथा GSB में प्राक्कलन से निम्न कोटि के बालू का उपयोग तथा GSB के उपर मिट्टी की परत देना आदि माना जा सकता है।

5. पथ के Failed Portion में Brick bats से मरम्मति की गई जबकि Failed Portion में जिस layer में failure है उसी लेयर के प्रावधानित Material से उसकी मरम्मति कराई जानी चाहिए।

6. अनेक स्थानों पर Premix उखड़ रहा है। जहाँ कहीं भी Primix Carpet परत छोड़ रहा है वहाँ Mix का Overburnt होना एवं Proper Rolling नहीं होना उसका सम्मिलित कारण माना जा सकता है। प्रयोगशाला जाँचफल में Premix carpet में प्रयुक्त Bitimen की मात्रा अस्वीकार्य बतलाया गया है। उक्त आरोपों की जाँच के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1213 दिनांक-29.08.2014 द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-1174 दिनांक-08.10.2014 द्वारा जाँच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया। जिसमें उक्त सभी आरोपों को अप्रमाणित माना। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत आरोप सं0-01 एवं 02 के संदर्भ में जाँच पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना का पत्रांक-482 दिनांक-18.02.2015 द्वारा असहमति के निम्न बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा श्री सिंह से की गई :-

1. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनान्तर्गत पटना जिला के खजूरी से पनहारा पथ के संयुक्त जाँच दल की जाँच में 8.5 से 1.00 कि0मी0 एवं 1.50 से 2.00 कि0मी0 के बीच GSB की मुटाई प्राक्कलित मुटाई 300 मी0मी0 के विरूद्ध क्रमशः 150 मी0मी0 एवं 235मी0मी0 पाई गई है जो स्वीकार योग्य नहीं है।83 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 2. खजूरी से पनहारा पथ के संयुक्त जाँच दल की जाँच में WBM Grade II एवं III की संयुक्त मुटाई 3.0 से 3.50कि0मी0, 4.50 से 5.00 कि0मी0 एवं 7.0 से 7.50 कि0मी0 में एक-एक बिन्दु पर प्रावधानित 150मी0मी0 मुटाई के विरूद्ध 130मी0मी0 पाई गई, जो अनुज्ञेय सीमा के अन्तर्गत नहीं है, स्वीकार योग्य नहीं है। उक्त के आलोक में श्री सिंह द्वारा प्राप्त जवाब पर जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना का पत्रांक-1442 दिनांक-25.06.2015 द्वारा ग्रामीण कार्य विभाग का मंतव्य उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया। ग्रामीण कार्य विभाग का पत्रांक-3491 दिनांक-25.11.2016 द्वारा मंतव्य उपलब्ध कराया गया जिसमें श्री सिंह के द्वितीय बचाव बयान को निम्न तथ्यों के साथ अस्वीकृत किया गया :-

1. प्रथम आरोप GSB की मोटाई मेंं कमी के संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी के अभिकथन की बरसात में भारी वाहनों के आवागमन से बने इम्प्रेशन के कारण पथ की मुटाई में भैरियेशन पाया गया है, को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा अपने स्पष्टीकरण में स्वयं स्वीकार किया गया है कि 0.50कि0मी0 से 1.00कि0मी0 पथांश में 150 कि0मी0 की मुटाई पाई गई जिसे संवेदक द्वारा सुधार कराया जा सकता है। 2. द्वितीय आरोप जिसमें तीसरे, चौथे, पांचवे एवं आठवें कि0मी0 WBM Grad II एवं III की मुटाई कम पाए जाने के आलोक में आरोपी पदाधिकारी के स्पष्टीकरण में संतोषजनक उत्तर नही दिया गया है।

ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा प्राप्त मंतव्य की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। संचालन पदाधिकारी के द्वारा प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन, आरोपित पदाधिकारी श्री सिंह द्वारा समर्पित बचाव बयान एवं ग्रामीण कार्य विभाग के मंतव्य की समीक्षा से स्पष्ट है कि GSB एवं WBM की कतिपय बिंदुवार जांचित मोटाई में प्रावधानित मुटाई से कमी होना परिलक्षित होता है। परन्तु जांचित आंकडों के आधार पर आंकलित GSB एवं WBM की समेकित मात्रा प्रावधानित मात्रा से बाढ़ पूर्व 1.25% एवं बाढ़ अवधि के बाद 1.58% की मात्रात्मक कमी 7.55 किलोमीटर लम्बे पथ में जगह-जगह पाई गई। उक्त कमी के कारण सड़क की स्थिति ऐसी खराब हुई कि जिसे मरम्मत करना भी संभव नहीं पाया गया प्रतिवेदित है। यह निश्चित रूप से अनियमितता का द्योतक है और इस कृत्य के लिए श्री अजय कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता दोषी प्रतीत होते हैं। उपर्युक्त विभागीय कार्यवाही में श्री सिंह द्वारा प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा पर ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा प्रस्तुत मंतव्य की समीक्षोपरांत यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत खजूरी-पनहारा पथ निर्माण में अनियमितता बरती गई कि पथ का मरम्मत करना भी संभव नहीं पाया गया। जिसके लिए श्री अजय कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता दोषी हैं। विभागीय समीक्षोपरांत श्री सिंह को उक्त अनियमितता बरतने के लिए निम्न दंड संसूचित करने का निर्णय लिया गया। (i) असंचयात्मक प्रभाव से दो वेतन वृद्धि पर रोक। उक्त निर्णीत दण्ड पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। अतएव उक्त निर्णय के आलोक में श्री अजय कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है :- (i) असंचयात्मक प्रभाव से दो वेतन वृद्धि पर रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

27 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(पू0)01-06/2004/2093--श्री निरंजन कुमार दाा (ID-1785), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के विरूद्ध प्रशासनिक आधार पर स्थानान्तरित कनीय अभियंता श्री हरेन्द्र नारायण, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया को दिनांक-11.02.2004 से 29.06.2004 तक विरमित नहीं करना, अनेको स्मार/दूरभाष पर निदेश दिलाने के बावजूद कनीय अभियंता को विरमित नहीं करना तथा अनुशासनहीनता के आरोप के लिए विभागीय पत्रांक-34 दिनांक-03.02.2005 द्वारा सिविल सर्विसेज (क्लासिफिकेशन, कंट्रोल एण्ड अपील) रूल्स 1956 के नियम 55(ए॰) के अन्तर्गत विभागीय कार्रवाई प्रारम्भ की गयी। उक्त आरोपों के संबंध में श्री दाा से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षोपरांत आरोप को प्रमाणित पाते हुए विभागीय अधिसूचना सं0-1467 दिनांक-09.12.2009 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया :-

(i) निन्दन वर्ष 2004-05 (ii) दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री दाा द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में CWJC No-20209/11 दायर किया गया जिसे माननीय उच्च न्यायालय ने दिनांक-03.11.2018 को खारिज कर दिया गया। पारित आदेश के विरूद्ध श्री दाा द्वारा LAA No-175/18 दायर किया गया, जिसकी सुनवाई के पश्चात माननीय न्यायालय द्वारा दिनांक-03.04.2019 को पारित84 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 न्यायादेश में विभागीय अधिसूचना सं0-1467 दिनांक-09.12.2009 एवं विभागीय पत्रांक-1465 दिनांक-28.09.2010 को निरस्त करते हुए आवेदक की प्रोन्नति संबंधी दावों पर विधि सम्मत आदेश पारित करने का आदेश दिया गया।

माननीय न्यायालय द्वारा पारित आदेश के आलोक में श्री निरंजन कुमार दाा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, नवगछिया संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं0-1467 दिनांक-19.12.2009 द्वारा संसूचित दण्डादेश एवं विभागीय पत्रांक-1465 दिनांक-28.09.2010 (पुनर्विलोकन अर्जी अस्वीकृत संबंधी पत्र) को निरस्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री निरंजन कुमार दाा (ID-1785) को विभागीय अधिसूचना सं0-1467 दिनांक-19.12.

2009 द्वारा संसूचित दण्डादेश एवं विभागीय पत्रांक-1465 दिनांक-28.09.2010 को निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

27 सितम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(कटि0)25-11/2017/2094--श्री रमेश कुमार (ID-3829), कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, भागलपुर के विरूद्ध बाढ़ 2017 के दौरान चन्दन नदी के बाँयें एवं दाँयें तटबंध के विभिन्न बिन्दुओं पर टूटान होने की गलत सूचना देने के लिए विभागीय पत्रांक-368 दिनांक-16.02.2018 द्वारा स्पष्टीकरण की माँग की गयी, जिसके अनुपालन में श्री सिंह द्वारा स्पष्टीकरण का उार समर्पित किया गया आरोप के विभिन्न बिन्दु निम्न है :-

(i) चंदन मुख्य नदी के दाँया तटबंध में दोस्तानी ग्राम के समीप 50 मीटर की लम्बाई में। (ii) चंदन पुरैनी नदी में सोन्डीहा सन्हौली के नजदीक निर्मित पुल के डाउन स्ट्रीम मे 20 मीटर की लम्बाई तक दाँया तटबंध के 25 मीटर की लम्बाई में।

(iii) पुल से लगभग 400 मीटर डाउन स्ट्रीम में चंदन नदी का दाँया तटबंध क्रमशः 130 मीटर एवं 40 मीटर की लम्बाई में।

उपरोक्त क्रमांक (i) के टूटान बिन्दु के संबंध में कहा गया है कि संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में इस बिन्दु पर बाँध में पूर्व से आवागमन का रास्ता के कारण क्षतिग्रस्त था, इस बिन्दु में टुटान नहीं है, परन्तु इस भाग से पानी बाहर गया हुआ माना गया है जो अपने आप में विरोधाभाषी है, वस्तुतः बाँध से पानी टूटान के उपरांत ही बाहर बह गया, जिसे छिपाने के दृष्टिकोण से उक्त बात प्रतिवेदित किया गया था, में टूटान के संदर्भ में किया गया है कि संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में इसे Cattle Crossing की तरह क्षतिग्रस्त प्रतिवेदित किया है एवं इसमें पानी पास नहीं किया था, जबकि आरोपी द्वारा दिनांक-03.10.2017 को इस स्थल पर NSL के उपर टूटा हुआ पाया गया तथा पानी पार होने के सबूत भी पाया गया। संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में टूटान को छिपाने के लिए Cattle Crossing का इस्तेमाल किया गया है, स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि संयुक्त निरीक्षण में असम्बद्ध अभियंता यथा अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल भी सम्मिलित थें।

उपरोक्त क्रमांक (ii) में वर्णित आरोप चन्दन पुरैनी नदी में सोनडीहा के नजदीक निर्मित पुल के D/S में 20 मीटर लम्बाई में टूटान के संदर्भ संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में इसे Cattle Crossing की तरह क्षतिग्रस्त प्रतिवेदित किया है एवं इससे पानी पास नहीं किया जबकि आरोपी द्वारा दिनांक- 03.10.2017 को इस स्थल पर NSL के उपर टूटा हुआ पाया गया तथा पानी पार होने के सबूत भी पाया गया। संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में टूटान को छिपाने के लिए Cattle Crossing term का इस्तेमाल किया गया है।

क्रमांक (iii) में वर्णित चन्दन पुरैनी नदी में सोनडीहा के नजदीक निर्मित पुल के D/S में 20 मीटर की लम्बाई तक दाँया तटबंध 25 मीटर को चिन्हित करना मुश्किल है जबकि सोनडीहा, सन्हौली पथ पर PMGSY द्वारा निर्मित पुल के डाउन स्ट्रीम के दाँया तटबंध में 15 मीटर में टूटा हुआ था, जबकि संयुक्त निरीक्षण में ग्रामीणों के आधार पर इसे पूर्व से ही ट्रैक्टर के आने जाने का लगभग 15 मीटर रास्ता बताया गया है जो उचित नहीं है श्री कुमार द्वारा यह कहा गया है कि टूटानों की सूचना सही रूप में देकर अपने दायित्व का निर्वहन किया है, जबकि मुख्य अभियंता द्वारा विभाग को अंधेरे में रखकर उपरोक्त बिन्दुओं पर हुए टूटान को छुपाने के लिए दबाव दिया जा रहा था, इसी उद्देश्य से उनके द्वारा NR दिनांक-03.01. 2017 से अभियंता प्रमुख को गलत सूचना प्रेषण होना बताया गया है, इसके बावजूद उनके द्वारा सही स्थिति से विभाग को अवगत कराया गया।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री कुमार द्वारा मुख्य अभियंता स्तर से निर्गत संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में दिये गये तथ्य को ही गलत बताया गया है तथा मुख्य अभियंता पर ही दोषारोपण किया गया है कि मुख्य अभियंता द्वारा तटबंध में हुए टूटान को छुपाकर विभाग को अंधेरे में रखने हेतु जवाब दिया जा रहा था एवं इसी उद्देश्य से इनके द्वारा प्रतिवेदित टूटान की सूचना को गलत बताया गया है, स्वीकार योग्य नहीं है।85 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री कुमार से प्राप्त स्पष्टीकरण को अस्वीकृत करते हुए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है :-

(i) आरोप वर्ष के लिए निन्दन (ii) एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक उक्त निर्णय के आलोक में श्री रमेश कुमार (ID-3829), कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, भागलपुर को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है :- (i) आरोप वर्ष के लिए निन्दन (ii) एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

4 अक्तूबर 2019

सं0 22/नि0सि0(मुज0)-06-09/2017/2127--श्री अनिल कुमार प्रसाद (ID-J-7926), तत्कालीन कनीय अभियंता, बागमती अवर प्रमंडल, बैरगनिया, सीतामढ़ी को उनके उक्त अवर प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक-13.08.2017 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ रिंग बाँध के मशान नरोाम ग्राम मे सीपेज के कारण हुए टूटान में जान-माल की व्यापक क्षति सहित अन्य निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय आदेश सं0-86 सह-ज्ञापांक-1619 दिनांक- 14.09.2017 द्वारा निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय आदेश सं0-96 सह-ज्ञापांक-1712 दिनांक-22.9.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। आरोप :- दिनांक-13.08.2017 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ रिंग बाँध मशान नरोाम ग्राम में सीपेज के कारण टूट गया, जिसके कारण जान-माल की व्यापक क्षति हुई। रिंग बाँध में सीपेज की मरम्मति की सूचना आरोपी के द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई विभागीय स्तर से उनको स्पष्ट रूप से निदेशित किया गया था कि बाँध की सतत निगरानी करायी जाय एवं आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति करा ली जाय, किन्तु उनके द्वारा विभागीय दिशा निर्देश का उल्लंघन किया गया। उनका यह कृत बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो के प्रति घोर लापरवाही एवं कर्तव्य के प्रति उदासीनता एवं स्वेच्छाचारित को दर्शाता है। संचालन पदाधिकारी को समर्पित अपने बचाव बयान मे श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता द्वारा निम्न बाते कही गई है। श्री प्रसाद, कनीय अभियंता द्वारा कहा गया है कि बागमती अवर प्रमंडल, बैरगनियाँ में एक मात्र कनीय अभियंता के रूप में वे पूरी तत्परता एवं सहायक अभियंता तथा कार्यपालक अभियंता द्वारा दिये गये निर्देशों का अनुशीलन किया गया था। सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता के स्थल पर मौजूद रहने की स्थिति में उनके द्वारा किसी अन्य वरीय पदाधिकारी को सूचना की कोई प्रासंगिकता नहीं थी। साक्ष्य के रूप में उनके द्वारा कार्यपालक अभियंता द्वारा जिला पदाधिकारी, सीतामढ़ी को प्रेषित पत्र संलग्न है। श्री प्रसाद बैरगनियाँ रिंग बाँध के क्षतिग्रस्त होने के कारण उसके जलग्रहण क्षेत्र में अप्रत्याशित वर्षपात होना, नेपाल प्रभाग में ललबकैया के बायाँ तटबंध तथा बागमती के दायाँ तटबंध के कई जगहों पर क्षतिग्रस्त होने के फलस्वरूप उन नदियों के जलश्राव का अधिकांश हिस्सा रिंग बाँध के तरफ प्रवाहित होना जिससे जल स्तर के पूर्व के H.F.L से काफी उपर आ जाना फलस्वरूप तटबंध का HG लाईन फेल होना जिम्मेवार है। इन सारे कारणों को आपदा की श्रेणी में मानते हुए उल्लेखित किया गया है कि उनका इस पर कोई नियंत्रण नहीं था। उनके द्वारा कनीय अभियंता से अपेक्षित दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए निरंतर सहायक अभियंता/कार्यपालक अभियंता/अधीक्षण अभियंता के निर्देशों के अनुपालन बाँध मे सीपेज बंद कराने के लिये किया गया था। जिसके कारण बागमती अवर प्रमंडल, बैरगनियाँ के कार्यक्षेत्र में अवस्थित अन्य सभी तटबंध भयंकर बाढ़ में भी पूर्णतः सुरक्षित रहे। श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंताके विरूद्ध गठित प्रपत्र-'क' एवं उनके द्वारा समर्पित बचाव बयान के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन मेंं निम्न बातें कही गई है :- विभागीय कार्यवाही में आरोपित पदाधिकारी श्री प्रसाद द्वारा अपना बचाव बयान समर्पित किया है। उन्होंने अपने बचाव में कहा है कि जल स्तर में बराबर वृद्धि होने के कारण समस्या उत्पन्न हुई। उन्होंने क्षतिग्रस्त होने का कारण अत्याधिक वर्षापात होना बताया है। श्री प्रसाद ने यह भी कहा है कि वे कनीय अभियंता के दायित्वों का पूरी तरह से निर्वहन किया है। साथ ही अप्रत्याशित वर्षापात से उत्पन्न अप्रत्याशित बाढ़ एवं जल स्तर में वृद्धि के फलस्वरूप नदियों के जलश्राव का हिस्सा रिंग बाँध के तरफ प्रवाहित होने के चलते बैरगनियाँ रिंग बाँध क्षतिग्रस्त हुआ। श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता के बचाव पर विभागीय मंतव्य में यह कहा गया कि मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर के पत्रांक-02(C) दिनांक713.08.2017 से स्पष्ट है कि दिनांक-13.08.2017 को तत्कालीन कनीय अभियंता श्री प्रसाद द्वारा बैरगनियाँ रिंग बाँध से हो रही सीपेज की सूचना अपने अधिकारियों को यही दी गई और ना ही इसकी मरम्मति श्री प्रसाद द्वारा स-समय पर की गई। स्पष्ट है कि आरोपित तत्कालीन कनीय अभियंता श्री प्रसाद के द्वारा बाँधों की सतत निगरानी एवं चौकसी बरतने के संबंध में विभागीय दिशा निर्देशें का उल्लंघन किया गया। जिसके कारण श्री प्रसाद को रिंग बाँध में हो रही सीपेज की जानकारी स-समय नहीं हो सकी। जिस कारण इसकी मरम्मति नहीं कराई जा सकी एवं अतंतः बाँध टूट गया। अगर स-समय सीपेज की रोकथाम के लिए श्री प्रसाद द्वारा आवश्यक कदम उठाए गये होते तो बैरगनियाँ रींग बाँध सुरक्षित86 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 रहता और इससे कोई जान-माल की क्षति भी नहीं होती तथा प्रदेश को कोई विाीय क्षति भी नहीं उठानी पड़ती। इस प्रकार श्री प्रसाद पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के प्रति उदासीनता लापरवाही एवं संवेदनहीनता दर्शाता है। विभागीय अभिमत है कि आरोपित का बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है। अतएव आरोप एवं उसके साथ संलग्न साक्ष्य एवं आरोपित पदाधिकारी का बचाव बयान एवं विभागीय अभिमत के आलोक में श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित होता है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1041 दिनांक-11.05.2018 से श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता से द्वितीयकारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की गई। उक्त के आलोक में श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता द्वारा अपना द्वितीय कारणपृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया है। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :- श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता द्वारा अपने द्वितीय कारणपृच्छा के जवाब में कहा गया है कि दिनांक-13.08. 2017 को ही रिंग बाँध टूटने के पूर्व सुबह 06ः00 बजे सूचना पाकर कार्यपालक अभियंता, रामपुरकंठ स्थल से बैरगनिया रिंग बाँध आये एवं उनके मार्गदर्शन में बाँध को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। जिसकी पृष्टि कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-922 दिनांक 08.09.2017 से होती है। जिसकी समीक्षा संचालन पदाधिकारी द्वारा नहीं की गई है। उक्त पत्रांक-922 दिनांक-08.09.2017 में बाँध की सुरक्षा में Technical Man Power की कमी होना अंकित है। बैरगनिया अवर प्रमंडल में एक मात्र कनीय अभियंता के रूप में लगभग 27 कि0मी0 बाँध की देख-रेख हेतु थें। इनका पदोन्नति के पश्चात सरकार के पत्रांक-6150 दिनांक-29.11.2016 के द्वारा पदस्थापन हो चुका था। जिसके आलोक में उन्हें विरमित कर देना था। परन्तु ऐसा नहीं हो सका। इसके बावजूद उनके द्वारा Motor Cycle No- BR-22/7047 से निगरानी की गयी। बाढ़ के पूर्व कार्य स्थल पर झोपड़ी का निर्माण कराया गया तथा उचित हस्त रसीद पर E.C Bag प्राप्त कर कार्य स्थल पर बालु का भंडारण किया गया। जिसका उल्लेख पूर्व के बचाव बयान में किया गया। परन्तु संचालन पदाधिकारी द्वारा संज्ञान में नहीं लिया गया। टूटान का मुख्य कारण नेपाल में अत्यधिक वर्षा के कारण ललबकिया के बायाँ एवं बागमती के दायाँ बाँध लगभग 20 जगहों पर टूट जाने के कारण बैरगनिया बाँध के टॉप लेवल तक पानी का आना है। नेपाल मंत्रालय द्वारा बिहार स्थित GFCC को दिये गये पत्रों की प्रति दी गयी थी परन्तु संचालन पदाधिकारी द्वारा ध्यान नहीं दिया गया। मूल बचाव बयान के कंडिका 1 से 4 उनके स्तर से कोई चुक नहीं हुई थी तथा बिहार लोक निर्माण संहित के कंडिका 49 में अपेक्षित दायित्वों का निर्वहन नहीं किया गया था। कंडिका 5 एवं 6 मे अवर प्रमंडल में कनीय अभियंता की स्थिति दर्शाते हुए कहा गया है कि एक कनीय अभियंता होने के बावजूद भी बाँध को सुरक्षित रखने का भरपूर प्रयास किया गया। कंडिका 7 में कार्य पर भंडारित सामग्री का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि निदेशानुसार आवश्यक मात्रा मे सामग्री का भण्डारण कर लिया गया था। कंडिका 9 एवं 10 में इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को नियमवाली-2005 के नियम 17 (3), (1), (11), (4) तथा साक्ष्य प्रशासन विभाग के पत्रांक-12196 दिनांक-07.09.2016 के अनुसार आरोप से संदर्भित साक्ष्य में माँग करने पर भी उपलब्ध नहीं कराया गया। कंडिका 11 एवं 12 में नियमावली 2005 के नियम 17 (23)(11) का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उनके मामले मेंं जाँच प्राधिकार द्वारा अनुशासनिक प्राधिकार अभियंता प्रमुख (मुख्यालय) को जाँच प्रतिवेदन प्रेषित नहीं किया गया। जो नियम संगत नहीं है। कंडिका 12 एवं 13 में सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक-1893 दिनांक-14.06.2011 की प्रति संलग्न करते हुए कहा गया है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा उक्त पत्र के अनुरूप आदेश फलक कर विधिवत हस्ताक्षर नहीं किया गया। कंडिका 15 एवं 16 में कहा गया है कि दिनांक-13.08.2017 को कार्यपालक अभियंता के मार्गदर्शन में मरम्मति कराया गया। साक्ष्य के रूप में कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-922 दिनांक-08.09.2017 की प्रति दी गयी है तथा तटबंध की निगरानी हेतु बाँध पर तैनात होम गार्ड की उपस्थिति को भी संचालन पदाधिकारी द्वारा ध्यान नहीं दिया गया। कंडिका 17 में कहा गया है कि मोटर साईकिल से पेट्रोलिंग का कार्य करने में साक्ष्य स्वरूप पेट्रोल पम्प का रसीद को भी संचालन पदाधिकारी द्वारा संज्ञान में नहीं लिया गया। उपरोक्त से स्पष्ट है कि दिनांक-13.08.2017 के दो दिन पूर्व से नेपाल में अत्याधिक वर्षा के कारण नेपाल में ही ललबकिया नदी और बागमती नदी लगभग 20 जगहों पर टूट गया था। जिसका अत्याधिक जल प्रवाह बागमती नदी के दाँये बाँध के खुले भाग एवं ललबकिया नदी के बाँये बाँध के खुले भाग से प्रवेश कर रिंग बाँध पर अत्याधिक दबाव के कारण टूट गया। श्री प्रसाद, कनीय अभियंता (निलंबित) से प्राप्त द्वितीय कारणपृच्छा (अभ्यावेदन) की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता के विरूद्ध आरोप का मुख्य अंश है कि :- (i) बैरगनिया रिंग बाँध के मशान नरोाम ग्राम में सीपेज के कारण बाँध टूट जाने से व्यापक जान माल की क्षति होना। (ii) रिंग बाँध में हुए सीपेज की मरम्मति की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं देना।87 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 (iii) विभागीय निदेश के बावजूद बाँध का सतत निगरानी नहीं कराया तथा आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति नहीं कराना। इनका उपरोक्त कृत बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के प्रति लापरवाही एवं कर्तव्य के प्रति उदासीनता, स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है।

संचालन पदाधिकारी ने श्री प्रसाद का कथन कि उनके द्वारा बाँधों का सतत निगरानी की गयी एवं सीपेज मरम्मति की जाती थी। परन्तु जलस्तर मेंं लगातार वृद्धि होने के कारण समस्या उत्पन्न हुई जो क्षतिग्रस्त होने का कारण था, को विभागीय मंतव्य की तत्कालीन मुख्य अभियंता के पत्रांक-02(C) दिनांक-13.08.2017 से स्पष्ट है कि इनके द्वारा रिंग बाँध से हो रहे सीपेज के संबंध में कोई सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी और न ही इसकी मरम्मति स-समय की जा सकी, के आधार पर माना गया है कि श्री प्रसाद द्वारा बाँधों की सतत निगरानी एवं चौकसी बरतने में विभागीय निदेशों का उल्लंघन किया गया, जिसके कारण सीपेज की जानकारी स-समय नहीं हुई। इस प्रकार श्री प्रसाद पर बाढ़ नियंत्रण आदेश एवं बाढ़ गश्ति नियमावली 2017 का अनुपालन नहीं किया जाना, बाढ़ संघर्षात्मक जैसे कार्यों के प्रति उदासीनता लापरवाही एवं संवेदनहीनता के आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। श्री अनिल कुमार प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता के द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि उनके द्वारा आरोप के संदर्भ में वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया है जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है एवं कहा गया है कि उनके बचाव बचान पर संचालन पदाधिकारी ने ध्यान नहीं दिया। श्री प्रसाद के उक्त बचाव बयान जो संचालन पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराया गया था, पर विभागीय स्तर से बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना से मंतव्य प्राप्त कर विभागीय अभिमत से संचालन पदाधिकारी को अवगत कराया गया। जिसमें श्री प्रसाद के विरूद्ध गठित आरोप को प्रमाणित पाया गया है। चुँकि श्री प्रसाद द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा के जवाब में न ही कोई नया तथ्य ही दिया गया है और न ही कोई नया साक्ष्य ही उपलब्ध कराया है। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होना ही एक मात्र विकल्प है। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री अनिल कुमार प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता के विरूद्ध तटबंध मे हो रहे सीपेज एवं उसकी मरम्मति की सूचना स-समय नहीं देने, सीपेज मरम्मति कार्य में लापरवाही बरतने तथा तटबंध की सतत निगरानी नहीं करने, विभागीय निदेशों का उल्लंघन करने, कार्य के प्रति लापरवाही बरतने/उदासीनता बरतने एवं दायित्वों का निर्वहन सही ढंग से नहीं करने का आरोप प्रमाणित पाया गया। एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता को विभागीय आदेश सं0-104 सहपठित ज्ञापांक-2087 दिनांक-19.09.2018 द्वारा निलंबन से मुक्त करते हुए निम्न दण्ड अधिरोपित किया गया है :- ''कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति/भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।''

उक्त के आलोक में श्री कुमार, सहायक अभियंता द्वारा अपना पुनर्विचार अभ्यावेदन विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :- श्री प्रसाद द्वारा दिये गये पुनर्विचार अभ्यावेदन का मुख्य अंश निम्नवत्‌ है। कंडिका 1 से 3 तक में उनके द्वारा नियम-17, अपील नियमावली 2005 के नियम 23, 25 विभागीय पत्रांक 104 दि॰ 19.09.18, मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के पत्रांक 2 (C) दिनांक 13.08.17 का उल्लेख करते हुए संचालित विभागीय कार्यवाही के संचालन से लेकर दण्ड अधिरोपण का उल्लेख किया गया। मुख्य अभियंता के पत्रांक 2(c) दिनांक 13.08.17 के संदर्भ में उनके द्वारा समर्पित बचाव अभियान एवं द्वितीय कारण पृच्छा, पूरक द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर सहित में निवेदित इस तथ्य की ओर विभागीय समीक्षा में विचार नहीं हो सका कि लोक निर्माण संहिता की कंडिका-49 के अनुसार सहायक अभियंता अपने कार्यक्षेत्र में कार्य प्रबंधन के लिये तथा अपने कार्यक्षेत्र में कार्य के कार्यान्वयन के लिये कार्यपालक अभियंता के प्रति जिम्मेवार होते है तथा कंडिका 50 के आलोक में सहायक अभियंता के सहायतार्थ कनीय अभियंता का पदस्थापन होता है, जो अपने कार्य प्रशाखा में कार्य के कार्यान्वयन के लिये सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता के प्रति जिम्मेवार होते है। बाढ़ प्रबंधन हेतु निर्गत मानक संचालन प्रक्रिया के कंडिका 4.4 में भी स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि कनीय अभियंता द्वारा सूचना अपने सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को देनी है जिसकी पूरी तरह अनुशील उनके द्वारा प्रश्नगत तटबंध में सिपेज को रोकने के लिये हर संभव प्रयास किया गया एवं वस्तुस्थिति से निरन्तर सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को अवगत कराया गया था। ऐसी स्थिति में यह कहा जाना कि उनके द्वारा सिपेज की सूचना मुख्य अभियंता को नहीं दी गयी। न्यायसंगत नहीं है। उनके कार्यक्षेत्र में कुल 23.23 कि॰मी॰ तटबंध बैरगनिया रिंग बाँध था। तटबंध सुरक्षित रखने का उनके द्वारा कार्यपालक अभियंता एवं सहायक अभियंता की देख-रेख में पूर्ण प्रयास किया गया था। लेकिन प्रश्नगत स्थल पर बाँध क्षतिग्रस्त होने से नहीं बचाया जा सका। जिसका मुख्य कारण नेपाल प्रभाग में हुई अत्याधिक वर्षापात (करीब 700mm ) एवं इसके फलस्वरूप नदियों में आयी फलश फ्लड है। ललबकिया नदी का जलस्तर कोबा बाड़ी में 1992 में उच्चतम वार्ड स्तर 72.84 मी॰ से बढ़कर दिनांक 13.08.17 को 73.90 हो गया तथा बागमती के जलस्तर उच्चतम बाढ़ स्तर 72.34 मी॰ से बढ़कर 72.95 मी॰ हो गया था। उपरोक्त से स्वतः सम्पुष्ट है कि ललबकिया नदी का बायाँ तटबंध नरोत्तम ग्राम में टूटान का कारण Force Majeure है अर्थात Arising out of acts of god है जो मानव के नियंत्रणाधीन नहीं था। ऐसी स्थिति में उक्त स्थल पर हुए टूटान के लिये कनीय अभियंता को दोषी माने जाने का कोई औचित्य नहीं है। क्योंकि उनके द्वारा अपने सहायक88 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को निरंतर वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए मरम्मत करते हुए पूरी सर्तकता एवं सजगता से कराया गया था। कार्यपालक अभियंता द्वारा जिला पदाधिकारी को इसकी सूचना पत्रांक 922 दि॰ 08.09.17 के माध्यम से दी गयी थी। अतएव उक्त टूटान के लिये वे दोषी नहीं है। नियमावली 2005 के नियम 27 (ii) (ख) की ओर आकृष्ट करने की अनुमति चाहता हूँ। अपीलीय प्राधिकार विचार करेगा कि क्या अनुशासनिक प्राधिकार का निष्कर्ष अभिलेख पर रख साक्ष्य द्वारा समर्पित है। उपरोक्त साक्ष्य समर्पित तथ्यों के आलोक में अधिरोपित एवं संसूचित वृहद दण्ड अभिलेख पर समर्थन नहीं है क्योंकि मेरे द्वारा सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता के निदेशन में मरम्मत कार्य सतत सर्तकतापूर्ण कराते रहा गया तथा वस्तुस्थिति से सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को अवगत कराये रखा गया था। कार्यपालक अभियंता द्वारा भी जिला पदाधिकारी को भी वस्तुस्थिति की जानकारी दी जा रही थी। पूरक बचाव बयान :- श्री प्रसाद द्वारा अपने पूरक बचाव बयान में कहा गया है कि इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्य से लेकर दण्ड अधिरोपण के बीच कृत कारवाई का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 (3) (ii) (ख) में प्रावधानों के नियम का पालन नहीं किया गया है। उनकी नियुक्ति बिहार लोक सेवा आयोग के अनुशंसा के आधार पर की गयी है। सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 806 दि॰ 16.01.18 के आलोक में दण्ड संसूचन के पूर्व में बिहार लोक सेवा आयोग का परामर्श अपरिहार्य हो जाता है। परन्तु उनके दण्ड संसूचन पत्र में इसका उल्लेख नहीं है।

श्री अनिल कुमार प्रसाद, सहायक अभियंता से प्राप्त पुनर्विचार अभ्यावेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :- श्री अनिल कुमार प्रसाद, सहायक अभियंता विरूद्ध आरोप का मुख्य अंश है कि प्रश्नगत बाँध में हो रहे रिसाव की सूचना एवं उसकी मरम्मति की सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं दी गयी। विभागीय निदेश के बावजूद तटबंधों का सतत निगरानी नहीं करना। बाढ़ संघर्षात्मक जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य में लापरवाही बरतना तथा दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन करने से संबंधित है। श्री अनिल कुमार प्रसाद, सहायक अभियंता द्वारा आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि लोक निर्माण विभाग संहिता की कंडिका-49 के अनुसार सहायक अभियंता अपने कार्यक्षेत्र में कार्य प्रबंधन के लिये तथा अपने कार्यक्षेत्र में कार्य के कार्यान्वयन के लिये कार्यपालक अभियंता के प्रति जिम्मेवार होते है तथा कंडिका 50 के आलोक में सहायक अभियंता के सहायतार्थ कनीय अभियंता का पदस्थापन होता है, जो अपने कार्य प्रशाखा के कार्य के कार्यान्वयन के लिये सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता के प्रति जिम्मेवार होते है। कुछ हद तक स्वीकार योग्य प्रतीत होता है परन्तु जिस प्रकार सहायक अभियंता परिक्षेत्राधीन कार्य के कार्यान्वयन में कार्यपालक अभियंता के प्रति जिम्मेवार होते है। उसी प्रकार कनीय अभियंता भी प्रशाखाधीन कार्य के कार्यान्वयन के लिये सहायक अभियंता के प्रति जिम्मेवार होते है एवं इनका दायित्व था कि तटबंध में किसी प्रकार की गतिविधि की सूचना तुरन्त सहायक अभियंता को देते परन्तु श्री अनिल कुमार प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया जिससे स्थापित हो सके कि श्री अनिल कुमार प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता द्वारा दायित्वों का निर्वहन करते हुए तटबंध में हो रहे गतिविधि की सूचना दी गयी है। श्री अनिल कुमार प्रसाद, सहायक अभियंता द्वारा यह भी कहा गया है कि बाढ़ प्रबंधन हेतु निर्गत मानक संचालन प्रक्रिया के कंडिका 4.4 में अंकित कि कनीय अभियंता द्वारा सूचना अपने सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को देनी है। जिसकी पूरी तरह अनुशील उनके द्वारा बैरगनिया रिंग बाँध के मसहा नरोत्तम ग्राम में सिपेज को रोकने के लिये हर संभव प्रयास किया गया था एवं वस्तुस्थिति से निरन्तर सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को अवगत कराते रहा गया था। परन्तु उक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। जबकि कंडिका 4.4 में स्पष्ट उल्लेख है कि स्थल की संवेदनशीलता के संबंध में सूचना मिलने पर कनीय अभियंता अभियंता आधा घंटा के अन्दर स्थल पर पहुँच कर बाँध की स्थिति से तत्काल सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को अवगत करायेंगे एवं सुरक्षा की प्रारम्भिक कारवाई शुरू कर देंगे। कनीय अभियंता अपने कार्य क्षेत्राधीन अक्राम्य स्थलों पर स्थल पंजी, गेज पंजी, क्रेट लेईंग पंजी, साउन्डींग पंजी एवं भंडार पंजी का संधारण करेंगे। उक्त दिशा निदेश के आलोक में इनके द्वारा कोई भी अभिलेख उपलब्ध नहीं कराया गया यहाँ तक कि उक्त बिन्दु पर हो रहे सिपेज एवं उसकी मरम्मति की सूचना उच्च पदाधिकारी को देने से संबंधित भी कोई अभिलेख नहीं दिया गया है। श्री अनिल कुमार प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता द्वारा अपील अभ्यावेदन के कंडिका 8 में तटबंध टूटान का कारण नदी का जलस्तर में अत्याधिक वृद्धि होना बताया गया है। जबकि मुख्य अभियंता के पत्रांक 2 (c) दिनांक 13.08.17 से स्पष्ट है उक्त बिन्दु पर तटबंध में सिपेज होने से टूटान हुआ है। अतएव उक्त कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। श्री अनिल कुमार प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता द्वारा कहा गया है तटबंध पर सतत चौकसी बरतते हुए तटबंध में हो रहे रिसाव की सूचना एवं उसकी मरम्मति की सूचना सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को ससमय दी गयी थी। साक्ष्य के रूप में कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी के पत्रांक 922 दि॰ 08.09.17 जो जिला पदाधिकारी को संबोधित है। संलग्न किया गया है। उक्त पत्र से स्पष्ट होता है कि प्रश्नगत स्थल पर कनीय अभियंता स्थल पर मौजूद थे। परन्तु इनके द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है जिससे परिलक्षित हो सके कि इनके द्वारा सिपेज/रिसाव होने तथा उसकी मरम्मति कराये जाने की सूचना उच्च पदाधिकारी को दी गयी है।89 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उपरोक्त तथ्यों के आलोक में माना जा सकता है कि इनके द्वारा तटबंध के देख-रेख में विभागीय निदेश के बावजूद लापरवाही बरती गयी है एवं बाढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण अवधि में इनके द्वारा दायित्वों का निर्वहन सही ढंग से नहीं किया जाना प्रतीत होता है। श्री अनिल कुमार प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता द्वारा पूरक अपील अभ्यावेदन में कहा गया है कि इनकी नियुक्ति बिहार लोक सेवा आयोग के द्वारा की गयी है। ऐसी स्थिति में दण्ड संसूचन से पूर्व बिहार लोक सेवा आयोग का परामर्श अपरिहार्य हो जाता है। श्री प्रसाद के अपील अभ्यावेदन के साथ संलग्न कागजात के अवलोकन से प्रतीत होता है कि इनकी नियुक्ति बिहार लोक सेवा की अनुशंसा के आलोक में की गई है। सामान्य प्रशासन विभाग की अधिसूचना सं॰ 9794 दि॰ 22.07.19 की कंडिका (6) में स्पष्ट किया गया है कि राज्य सेवा संवर्ग के लेवल 09 एवं इसमें उच्चतर लेवल के राजपत्रित कोटि के सरकारी सेवकों जिनकी नियुक्ति/प्रोन्नति बिहार लोक सेवा आयोग अथवा राज्य सरकार के किसी अन्य आयोग की अनुशंसा/परामर्श से की जाती हो, उनके अनुशासन संबंधी मामले में पेंशन की कटौती अथवा वृहद दण्ड का आदेश दिये जाने की स्थिति में सरकार के लिए बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्श प्राप्त करना आवश्यक होगा परन्तु वृहद दण्ड अधिरोपित करने अथवा पेंशन से कटौती किए जाने की स्थिति में भी लेवल 9 से नीचे के पद पर मौलिक रूप से किसी भी आयोग की अनुशंसा से निुयक्त किये जाने वाले सरकारी सेवकों के विषय में दण्ड अथवा पेंशन कटौती संबंधी आदेश देने से पहले सरकार के लिए आयोग से परामर्श करना आवश्यक नहीं होगा। चूँकि कनीय अभियंता की नियुक्ति लेवल 07 में होती है। अतः कनीय अभियंता को वृहद दण्ड अधिरोपित किये जाने के पूर्व आयोग की अनुशंसा/परामर्श की आवश्यकता नहीं है। समीक्षोपरांत श्री प्रसाद, तत्कालीन कनीय अभियंता संप्रति सहायक अभियंता के पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में विभागीय आदेश सं0-104 सह-ज्ञापांक-2087 दिनांक-19.09.2018 द्वारा संसूचित दण्ड यथा ''कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति/भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।'' को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है। अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री अनिल कुमार प्रसाद, अवर प्रमंडल पदाधिकारी, तिलैया नहर अवर प्रमंडल-4, वजीरगंज, गया के पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में विभागीय आदेश सं0-104 सह-ज्ञापांक-2087 दिनांक-19.09.2018 द्वारा संसूचित दण्ड यथा ''कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति/भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।'' को यथावत रखते हुए संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

-------

22 अक्तूबर 2019

सं0 22/नि0सि0(ल0सिं0)05-02/2018/2248--श्री राजवंश राय, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध मधुबनी जिलान्तर्गत 50 अद्‌द उदवह सिंचाई योजनाओं के जीर्णोद्धार एवं पुनस्र्थापन कार्य में बरती अनियमितता संबंधी आरोपों के लिए लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना के संकल्प ज्ञापांक-2570, दिनांक 28.6.17 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम-43(बी) के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया।

विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी-सह-अपर विभागीय जाँच आयुक्त द्वारा आरोप पत्र में वर्णित चार आरोपों में से दो आरोपों को प्रमाणित पाया गया। लघु जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा समीक्षोपरांत लिए गए निर्णय के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर द्वितीय कारण पृच्छा किया गया।

लघु जल संसाधन विभाग द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर की समीक्षा के क्रम में यह ज्ञात होने पर कि आरोपित पदाधिकारी का पैतृक विभाग, जल संसाधन विभाग है, दण्ड के बिन्दु पर निर्णय लेने हेतु सभी संगत कागजात, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को प्रेषित किया गया।

श्री राजवंश राय, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर एवं अन्य संगत अभिलेखों की समीक्षा सरकार के स्तर पर किए जाने के उपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए उन्हें ''शत्‌ प्रतिशत पेंशन की स्थायी कटौती'' का दण्ड संसूचित किया गया।

उपर्युक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री राजवंश राय, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर संप्रति सेवानिवृत द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन समर्पित किया गया। पुनर्विचार अभ्यावेदन में अंकित तथ्यों की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत निम्नांकित तथ्य पाए गए :- आरोप :- (i) मधुबनी जिलान्तर्गत 50 अद्‌द उद्‌वह सिंचाई योजनाओं के जिर्णोद्धार एवं पुनस्र्थापन कार्य के एकरारनामा सं॰ 1/2011-12 के लिये कुल 1074.727 लाख की तकनीकी स्वीकृति दिनांक 09.10.11 को दी गयी, जो प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से 12.588 प्रतिशत अधिक है जो बिहार लोक निर्माण संहिता के धारा 292 (iv) के विरूद्ध है, जिसके लिये आप सक्षम नहीं थे।

(ii) इस योजना के तहत पुनरिक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति दि॰ 10.10.13 को दी गयी जिसमें मूल एकरारनामा में वर्णित दर काफी बढ़ाकर उसी संवेदक को पूरक एकरारनामा करने का आदेश दिया गया। जो बिहार लोक निर्माण संहिता के धारा 169 (vi), 292 (iv) (1), 2952 (xvi) (iii) एवं 123 के विरूद्ध है एवं सरकार की निति के विरूद्ध है। पुनः90 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त किये बिना ही पुनरिक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान करना गड़बड़ी किया जाना दर्शाता है। एवं कुल 16,69,09,979/- रूपये का संवेदक को लाभ पहुँचाया जाना परिलक्षित होता है।

बचाव बयान :-

आरोप-1 :-श्री राय द्वारा कंडिका 1 से 13 तक में संचालन पदाधिकारी द्वारा दिये गये मंतव्य का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन योजनाओं के लिये विभागीय पत्रांक 5345 दिनांक-12.09.11 द्वारा 954.96 लाख की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गयी थी। ततपश्चात प्रभावी अनुसूचित दर पर कार्य का प्राक्कलन तैयार किया गया तथा अधीक्षण अभियंता के अनुशंसा के अनुरूप कुल 1074.727 लाख की तकनीकी स्वीकृति प्रदान की गयी। संचालन पदाधिकारी ने वित्त विभाग के पत्रांक 96 दि॰ 03.01.08 के हवाले से यह मंतव्य अंकित किया था कि प्रत्येक वह योजना जिसकी राशि 20 करोड़ रूपये से कम हो पर विभागीय मंत्री तथा योजना एवं विकास विभाग के स्तर से पुनरिक्षित प्रशासनिक स्वीकृति अपेक्षित है। वित्त विभाग के पत्रांक 96 दि॰ 03.01.08 का पत्र संशोधित हो गया है तथा वित्त विभाग के पत्रांक 2190 दि॰ 17.03.2008 द्वारा कंडिका-5 के प्रावधान को विलोपित कर दिया गया है। संशोधित आदेश पत्रांक 2190 दि॰ 07.03.2008 में यह प्रावधान है कि यदि प्राक्कलन की राशि मूल प्रशासनिक स्वीकृति से 20 प्रतिशत की सीमा तक हो तो विभागीय मंत्री स्तर से पुनरिक्षित प्रशासनिक स्वीकृति ली जानी अपेक्षित नहीं है। इस प्रकार संचालन पदाधिकारी का मंतव्य सर्वथा अमान्य है को विभाग द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। परन्तु पथ निर्माण विभाग के पत्रांक 4522 (S) दिनांक 26.03.08 के हवाले से कहा गया है कि जहाँ प्रशासनिक स्वीकृति से 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ोत्तरी हो रही हो। उसे विभाग के संज्ञान में लेकर कार्य कराने की अनुमति दी जायेगी। प्रस्तुत मामले में योजना की निविदा का निष्पादन विभागीय स्तर पर होने को ही आरोपी द्वारा मामले को विभाग के संज्ञान में लाना बताया गया है, जिसे स्वीकार योग्य नहीं माना गया है। उक्त निष्कर्ष की पृष्टभूमि में अंकित किया गया है कि पथ निर्माण विभाग के पत्रांक 10360 दि॰ 18.09.09 के कंडिका-3 में अपर मुख्य अभियंता के भूमिका एवं उनका दायित्व का उल्लेख है प्रसंगाधीन मामले का निविदा अभिलेख अग्रेत्तर कारवाई हेतु विभागीय सचिव के पास समर्पित किया गया था। अन्य प्रमंडलों के निविदाओं के साथ-साथ इस निविदा पर दिनांक 21.12.11 को निविदा समिति की बैठक में निर्णय लिया गया एवं मुख्य अभियंता को पत्रांक 308 दि॰ 03.01.12 से निर्णयादेश उपलब्ध कराया गया। स्पष्ट है कि विभाग को जानकारी थी कि इस योजना की प्रशासनिक स्वीकृति की राशि 954.56 लाख है जबकि तकनीकी स्वीकृति की राशि 12.58 प्रतिशत अधिक है। इस प्रकार प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से 12.58 प्रतिशत अधिक राशि के तकनीकी स्वीकृति विभाग के संज्ञान में थी। कार्य आवंटन के पश्चात इस योजना पर किये गये कार्य के विरूद्ध आवंटन की अधियाचना विभागीय सचिव, को मुख्य अभियंता (उत्तर) के ज्ञापांक 508 दि॰ 07.05.12 द्वारा भेजी गयी। जिसकी प्राक्कलित राशि कॉलम-5 में अंकित है और यह राशि 1063.414 लाख अंकित है। इस मामले की समीक्षा दिनांक 21.03.12 को विभाग स्तर पर की गयी तथा विभाग द्वारा उपलब्ध कराये गये आवंटन से 85.187 लाख रूपये का प्रत्यर्पन स्वीकार किया गया। अगले वित्तीय वर्ष में 22.08.12 को निर्गत आवंटन आदेश की विवरणी के क्रमांक 19(2) के कार्यो के लिये कुल 251.28 लाख का आवंटन उपलब्ध कराया गया। जहाँ तक पुनरिक्षित प्राक्कलन के सरकार के संज्ञान में लाने का प्रश्न है। इस आशय की जानकारी विभाग को थी। पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति दि॰ 10.10.2013 को दी गयी थी एवं दिनांक 31.10.13 को सेवानिवृत हो गये थे। उनके प्रतिस्थानी मुख्य अभियंता श्री विन्देश्वर राम द्वारा अपने पत्रांक 405 दि॰ 27.05.14 द्वारा एकरारित राशि 1113.98 लाख के विरूद्ध किये गये व्यय की राशि 1013.035 लाख प्रतिवेदित करते हुए 100.94 लाख के अतिरिक्त आवंटन की माँग की गयी। ततपश्चात विभागीय पत्रांक 17 दि॰ 18.06.14 द्वारा प्रमंडल मधुबनी में अन्य चार योजनाओं सहित कुल 54 योजनाओं के लिये 1037.11 लाख की प्राक्कलित राशि, 1189.88 लाख रूपये की लागत राशि वर्ष 2013-14 तक व्यय राशि 1074.15 लाख के आलोक में 115.75 लाख रूपये का अतिरिक्त आवंटन उपलब्ध कराया गया है। इस प्रकार स्थापित होता है कि यह मामला विभाग के संज्ञान में प्रारम्भ से ही था। अतः आरोप प्रमाणित नहीं होता है। आरोप-2 :- सम्यक विचारोपरान्त राज्य सरकार द्वारा यह निर्णय लिया गया कि जिन योजनाओं की प्रशासनिक अनुमोदन एवं प्रावैद्यिक स्वीकृति के बाद निविदा आमंत्रण की स्थिति तक पहुँचने में लगे समय के बीच अनुसूचित दरों में पुनरीक्षण हो जाता है और इसके फलस्वरूप लागत व्यय अनुज्ञेय सीमा से अधिक आ रही हो तो पुनरीक्षित प्रशासनिक अनुमोदन के प्रत्याशा में निम्न शर्त्तो के अधीन रहते हुए कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है। यहाँ अनुज्ञेय सीमा 20 प्रतिशत है। पूरक एकरारनामा करने के कारण संवेदक को 166.91 लाख रूपये के लाभ पहुँचाने का प्रश्न है। प्रथम बार एकरारनामा हो जाने के पश्चात बिना वित्त विभाग की अनुमति के एकरारित दर जो मूल एकरारनामा में दिया गया है उसे बदलने की शक्ति मुख्य अभियंता को नहीं है, आधारहीन है। वित्त विभाग के पत्रांक 2190 दि॰ 17.03.08 में ही योजना एवं गैर योजना मद में स्कीमों की स्वीकृति हेतु शक्ति का प्रत्यायोजन किया गया है। मंत्रिपरिषद अथवा सक्षम प्राधिकार इन अनुमोदित योजनाओं के कार्यान्वयन के क्रम में यदि यह पाया जाता है कि किसी स्वीकृत योजना मूल प्राक्कलन से 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि संभावित है तो ऐसी योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन वित्त विभाग के संकल्प 96 दि॰ 03.01.2008 की कंडिका-4 में विहित प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए मंत्रिपरिषद का पुनः अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। इस मामले में प्राक्कलित राशि 954.56 लाख तकनीकी स्वीकृति की राशि 1074.72 लाख तथा संशोधित प्राक्कलन की राशि 1113.90 लाख रूपये है। इस प्रकार प्रशासनिक स्वीकृति से पुनरीक्षित प्राक्कलन की राशि में 16.81 प्रतिशत अधिक है, जो 20 प्रतिशत के अधीन है।91 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 Rule 123 of PWD Code के अनुपालन की स्थिति में कहा गया है कि यह नियम इस मामले में लागू नहीं है। प्रशासनिक स्वीकृति में जिन कार्य मदों का उल्लेख था, उसके मूल्य वृद्धि के कारण प्रशासनिक स्वीकृति 954.56 लाख के विरूद्ध कार्य की प्राक्कलित राशि 12.588 प्रतिशत अधिक होने के कारण 1074.72735 लाख हो गयी थी। यदि पुनरीक्षित प्राक्कलन की राशि जो प्रशासनिक स्वीकृत राशि से 16.81 प्रतिशत अधिक है में 12.588 प्रतिशत पहले कार्य प्रारम्भ होने के पहले का तथा 12.58 प्रतिशत पुनरीक्षित प्राक्कलन के अवधि का है। अतः 16.81 बढोत्तरी में दर वृद्धि के कारण बढ़ोत्तरी है जो 10 प्रतिशत की सीमा में है। Rule 163 of PWD Code के अनुपालन की स्थिति :- इस निविदा में दो निविदादाता की प्राप्त हुई थी। तकनीकी बीड पर विभागीय निविदा समिति का निर्णय में श्री मालती सिंह प्रथम न्यूनतम वैद्य निविदादाता थी के वित्तीय निविदाओं से स्पष्ट हुआ। पुनः विभागीय निविदा समिति द्वारा वित्तीय बीड स्वीकृत हुई। इस प्रकार नियम 163 का पूर्णतः अनुपालन किया गया है। Rule 169 (VI) of PWD Code ः- वित्त विभाग के पत्रांक 2190 दिनांक 17.02.08 में प्रावधान है कि मंत्री परिषद अथवा सक्षम प्राधिकार द्वारा अनुमोदित योजनाओं के कार्यान्वयन के क्रम में यदि पाया जाता है कि किसी स्वीकृत योजना के मूल प्राक्कलन में 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि संभावित है तो ऐसी येाजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन में वित्त विभाग के संकल्प 96 दि॰ 03.01.08 की कंडिका 4 में विहित प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए मंत्रिपरिषद का पुनः अनमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। इस मामले में तकनीकी स्वीकृति प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से 12.588 प्रतिशत अधिक है तथा पुनरीक्षित एकरारनामा की राशि मूल प्रशासनिक स्वीकृति से 16.81 प्रतिशत अधिक है जो 20 प्रतिशत के अधीन है। Rule 292 (IV) of PWD Code :- मुख्य अभियंता ने तकनीकी स्वीकृति की पूर्ण शक्ति प्रत्यारोपित है। इस कार्य की प्रशासनिक स्वीकृति 954.56 लाख भी मूल्य वृद्धि के कारण अनुसूचित दर में हुई वृद्धि के फलस्वरूप तकनीकी स्वीकृति की राशि मूल प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से 12.588 प्रतिशत अधिक थी। चूँकि बिहार लोक निर्माण संहिता के नियम 123 के अनुसार मूल्य वृद्धि के कारण लागत में वृद्धि हुई। इस तकनीकी स्वीकृति के लिये मुख्य अभियंता के रूप में सक्षम प्राधिकार थे। इसे विभाग द्वारा मान्यता प्रदान करते हुए निविदा की स्वीकृति दी गयी तद्‌नुरूप एकरारनामा की गयी। Rule 292 (VI) of PWD Code :- तकनीकी स्वीकृति की राशि से पुनरीक्षित एकरारनामा की राशि 16.81-12.588=4.522 प्रतिशत अधिक है। जो 10 प्रतिशत की सीमा में है। पुनः लोक निर्माण विभाग संहिता के नियम 163 तथा वित्त विभाग के पत्र दि॰ 17.03.08 के अनुसार प्रशासनिक स्वीकृति की राशि 20 प्रतिशत अधिक सीमा में हो तो पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति करने की अपेक्षा नहीं है। अतः यह नियम प्रासंगिक नहीं है। Rule 292 (XVI) of PWD Code :- इस नियम में यथा प्रावधानित सीमा जो वित्त विभाग के पत्रांक दि॰ 17.03.08 के अनुसार मूल प्रशासनिक स्वीकृति से 20 प्रतिशत अधीक तक कहा है तथा इस सीमा तक पुनरीक्षित प्राक्कलन पर सहमति प्राप्त की जानी अपेक्षित नहीं है। अतः इस शर्त्त के साथ मुख्य अभियंता को पूर्ण शक्ति प्रदत्त है। जब वित्त विभाग ने 20 प्रतिशत की अधिसीमा में कार्य करने की अनुमति दी है, तब लोक निर्माण विभाग के पत्रांक 1721 दिनांक 09.04.1991 द्वारा पुनरीक्षित प्राक्कलन स्वीकृति की प्रत्याशा में कार्य कराने की स्वीकृति संबंधी प्रावधान का अक्षरशः पालन हुआ है। इस प्रकार इनके पदस्थापन अवधि में हुए 166.91 लाख रूपये का भुगतान सर्वथा नियमित भुगतान है। समय वृद्धि के बिन्दु पर जाँच पदाधिकारी ने अपीलकर्त्ता को दोषी नहीं माना है। इनके द्वारा जो भी कारवाई की गयी है वह सर्वथा नियम संगत प्रत्यारोपित शक्तियों के अधीन विभागीय प्रावधानों का अनुसरण करते हुए विभाग को लगातार संज्ञान में लाकर किया गया है।। कही भी मनमाने ढंग से कोई कार्य सम्पादित नहीं किया गया है। समीक्षा :- आरोप-1 :- जो मधुबनी जिलान्तर्गत 50 अदद उद्‌वह सिंचाई योजनाओं के जीर्णोद्धार कार्य का बिहार लोक निर्माण संहिता के कंडिका 292(4) के विरूद्ध अपनी सक्षमत से बाहर जाकर कुल 954.56 लाख के प्रशासनिक स्वीकृति से 12.58 प्रतिशत अधिक कुल 1074.723 लाख की मनमाने ढंग से प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति प्रदान करने से संबंधित है। श्री राय द्वारा कहा गया है कि विभागीय पत्रांक 5345 दि॰ 12.09.2011 से 954.96 लाख की प्राप्त प्रशासनिक स्वीकृति के उपरान्त प्रभावी अनुसूचित दर पर कार्य का प्राक्कलन कार्यपालक अभियंता द्वारा तैयार किया गया तथा अधीक्षण अभियंता के अनुशंसा के आलोक में कुल 1074.72735 लाख की तकनीकी स्वीकृति प्रदान की गयी तथा वित्त विभाग के पत्रांक 2190 दिनांक- 17.03.08 के कंडिका 2 के अनुसार स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। प्रस्तुत मामले में मुख्य अभियंता द्वारा प्रशासनिक स्वीकृति से 12.58 प्रतिशत अधिक की तकनीकी स्वीकृति दी गयी है। उक्त के आलोक में श्री राय का कथन स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। परन्तु पथ निर्माण विभाग के पत्रांक 4322 दि॰ 26. 03.08 में वित्त विभाग के संकल्प सं॰ 2190 दिनांक 17.03.08 का व्याख्या करते हुए आदेश किया गया है कि जहाँ प्रशासनिक स्वीकृति से 10 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोत्तरी हो रही हो तो उसे विभाग के संज्ञान में लेकर ही कार्य कराने की स्वीकृति दी जायेगी। प्रस्तुत मामले में श्री राय द्वारा योजना की निविदा का निष्पादन विभागीय स्तर से होने, आवंटन की अधियाचना एवं92 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 आवंटन की प्राप्ति होने को ही मामले को विभाग के संज्ञान में लाने की बात कही गयी, जो स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि इनका दायित्व था कि प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान करते हुए प्राक्कलन कि प्रति के साथ विभाग को उक्त अधिकाई राशि के संदर्भ में सूचना विभाग को देते। आरोपी द्वारा यह भी कहा गया है कि पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति दि॰ 10.10.13 को दी गयी थी एवं दिनांक 31.10.13 को सेवानिवृति हो गये। इनके प्रतिस्थानी मुख्य अभियंता श्री विन्देश्वर राम द्वारा अपने पत्रांक 405 दि॰ 27.05.14 द्वारा प्रश्नगत योजनाओं एकरारित राशि 1113.98 के विरूद्ध किये गये व्यय की राशि 1013.035 लाख प्रतिवेदित करते हुए 100.94 लाख के अतिरिक्त राशि की माँग की गयी। उक्त कथन से इनके द्वारा स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि उक्त पुर्नरिक्षित प्राक्कलन की जानकारी विभाग को दी गयी है। जिसे स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि दिनांक 10.10.13 से 31.10.13 के बीच कुल 20 दिनों के अन्दर इनके द्वारा पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति को विभाग के संज्ञान में नहीं लाया जा सका जो इनकी मनमाने ढंग से कार्य कराना दर्शाता है। इसके अतिरिक्त इनके द्वारा वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा अथवा विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है जिसका पूर्व में समीक्षा किया जा चुका है एवं बचाव बयान को अस्वीकार योग्य पाया गया है। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में आरोप सं॰-1 के संदर्भ में दिये गये बचाव बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप-2 :- जो योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति मूल एकरारनामा में वर्णित Item of Work का दर काफी बढ़ाकर दिनांक 10.10.13 को प्रदान करते हुए उसी संवेदक से पूरक एकरारनामा करने का आदेश दिया गया है जो बिहार लोक निर्माण संहिता के धारा 169 (iv)(1) 292 (vi)(1), 292 (xvi)(iii) एवं 123 के विरूद्ध है। उक्त कृत के कारण 1,66,90,978 रूपये का अतिरिक्त व्यय होने से संबंधित है। इनके द्वारा कहा गया है कि जिन योजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृति एवं प्रावैद्यिक स्वीकृति के बाद निविदा आमंत्रण की स्थिति तक पहुँचने में लगने वाले समय के बीच अनुसूचित दरों में पुनरीक्षण हो जाता है। फलस्वरूप लागत व्यय प्रशासनिक स्वीकृति के अनुज्ञेय सीमा से अधिक हो रही है तो पुनरीक्षित प्रशासनिक अनुमोदन की प्रत्याशा में कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है। यहाँ अनुज्ञेय सीमा 20 प्रतिशत है। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि वित्त विभाग के पत्रांक 1721 दिनांक 09.04.91 में 20 प्रतिशत की अधीसीमा का कोई उल्लेख नहीं है ऐसे भी आरोप है कि मूल एकरारनामा में प्रावधानित Item of Works का दर पुनरीक्षित प्राक्कलन में काफी बढ़ाकर स्वीकृति प्रदान करते हुए पूरक एकरारनामा करने के कारण संवेदक को 166.91 लाख का लाभ पहुँचाने का है। उड़नदस्ता द्वारा माना गया है कि PWD Code के विभिन्न धाराओं में प्रथम बार एकरारनामा हो जाने के पश्चात बिना वित्त विभाग के अनुमति के एकरारित राशि जो मूल प्राक्कलन में दिया गया है। उसे मुख्य अभियंता को बदलने की शक्ति प्रदत्त नहीं है। श्री राय द्वारा पूरक एकरारनामा करने के कारण संवेदक को कुल 166.91 लाख का लाभ पहुँचाने के संदर्भ में कहा गया है कि वित्त विभाग के पत्रांक 2190 दि॰ 17.03.2008 में ही योजना एवं गैर योजना मद में स्कीमों की स्वीकृति हेतु शक्ति का प्रत्यायोजन किया गया है। किसी स्वीकृत योजना के मूल प्राक्कलन में 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि संभावित हो तो ऐसी योजना के पुनरीक्षित प्राक्कलन वित्त विभाग के संकल्प 96 दि॰ 03.01.08 की कंडिका 4 में विहित प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए मंत्री परिषद का पुनः अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक होगा। इस मामले में मूल प्राक्कलन की राशि 954.56 लाख तकनीकी स्वीकृति की राशि 1074.72 लाख तथा संशोधित प्राक्कलन की राशि 1113.90 लाख है। इस प्रकार पुनरीक्षित एकरारनामा की राशि प्रशासनिक स्वीकृति राशि से मात्र 16.81 प्रतिशत अधिक है जो निर्धारित सीमा 20 प्रतिशत के अधीन है। प्रश्न यह नही है कि पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से अधिक किया गया। प्रश्न है कि एक बार एकरारनामा हो जाने के पश्चात उसी कार्य मद की दर में बढ़ोत्तरी कर पूरक एकरारनामा करने का आदेश देना है। जो वित्त विभाग के नियमों के विपरीत है। Rule 123 of PWD Code के अनुपालन के संदर्भ में कहा गया है कि यह नियम इस मामले में लागू नहीं होता है। क्योंकि प्रशासनिक स्वीकृति में जिन कार्य मदों का उल्लेख था। उनके मूल्य वृद्धि के कारण प्रशासनिक स्वीकृति की राशि 954.56 लाख के विरूद्ध कार्य की प्राक्कलित राशि 1074.72735 लाख हो गयी थी। इस प्रकार कुल वृद्धि कार्य प्रारम्भ होने के पूर्व दरों में वृद्धि के कारण ही 12.58 प्रतिशत अधिक थी। यदि पुनरीक्षित प्राक्कलन की राशि जो प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से 16.81 प्रतिशत अधिक है। अतः 4.33 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर वृद्धि के कारण बढ़ोत्तरी है जो 10 प्रतिशत के अन्तर्गत है स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। क्योंकि किसी भी पुनरीक्षित प्राक्कलन की तुलना मूल प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से किया जाना होता है। इस मामले में पुनरीक्षित प्राक्कलन की राशि प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से 16.81 प्रतिशत अधिक है जो 10 प्रतिशत से अधिक है। Rule 163 of PWD Code के अनुपालन के संदर्भ में कहा गया है कि इस मामले में दो निविदादाता से प्राप्त हुई थी। तकनीकी बीड पर विभागीय समिति का निर्णय जिसमें श्री मालती सिंह, दरभंगा प्रथम न्यूनतम वैद्य निविदादाता थी। जैसा की विभागीय निदेश के आलोक में निविदा खोलने पर वित्तीय निविदाओं से स्पष्ट हुआ। पुनः विभागीय निविदा समिति द्वारा वित्तीय निविदा स्वीकृत हुई। अतः इस नियम का पूर्णतः अनुपालन किया गया है। इनके बचाव बयान से स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि दो निविदादाता में से दोनों निविदादाता का तकनीकी बीड वैद्य थे या एक निविदादाता था। चूँकि निविदा का निष्पादन विभागीय स्तर से हुआ है। अतएव नियम 163 का उल्लंघन किया जाना नहीं माना जा सकता है। Rule 169 (vi) of PWD के अनुपालन किये जाने के संदर्भ में कहा गया है इस मामले में दी गयी तकनीकी स्वीकृति प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से 12.588 प्रतिशत अधिक है तथा पुनरीक्षित एकरारनामा की राशि मूल प्रशासनिक93 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 स्वीकृति की राशि से 16.81 प्रतिशत अधिक है। जो इस प्रावधान के द्वारा विहित सीमा 20 प्रतिशत के अधीन है। इसमें 169 (vi) का सर्वथा अनुपालन किया गया है। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि नियम 169 (vi) में प्रावधान है कि The term of a contract once entered into should not be materially varied without the previous consent of the authority competent to enter into the contract as so varied. No. Payment to contractor by way of compensation or other wise, outside the striet terms of contract or in excess of contract rate may be authorised without the previous of finance dept. rule-292 (iv) of PWD Code के अनुपालन के संदर्भ में कहा गया है कि इस नियम के उप नियम (ii), (iii), (iv), (v), (vi), b (v) (i) (ii), (iii), (vi) का (ii), (iii), (vii), (viii), (ix), (x), (xi), (xii), (xiii), (xiv) तथा (xv) इस मामले में लागू नहीं होता है। नियम 292 (vi)(i) के संदर्भ में कहा गया है कि इस नियम के तहत मुख्य अभियंता में तकनीकी स्वीकृति की पूर्ण शक्ति प्रत्यारोपित है स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। नियम 292 (vi) of PWD Code के अनुपालन के संदर्भ में कहा गया है कि इस मामले में तकनीकी स्वीकृति की राशि से पुनरीक्षित एकरारनामा की राशि में 16.81-12.588=4.522% अधिक है जो 10 प्रतिशत की सीमा में है स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि पुनरीक्षित प्राक्कलन की राशि प्रशासनिक स्वीकृति की राशि से 16.81 प्रतिशत अधिक है जो 10 प्रतिशत से अधिक है। Rule 292 (xvi) of PWD Code के संबंध में कहा गया है कि इस नियम में प्रावधानित सीमा जो वित्त विभाग के पत्रांक 17.03.08 के अनुसार मूल प्रशासनिक स्वीकृति के 20 प्रतिशत अधिक तक है तथा इन सीमा तक पुनरीक्षित प्राक्कलन पर सहमति प्राप्त की जानी अपेक्षित नही है स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि इस नियम में कोई अधीसीमा निधार्रित नहीं है। उपरोक्त समीक्षा कंडिका में उद्धित तथ्यों के आलोक में आरोप-2 प्रमाणित होता प्रतीत होता है। समीक्षा कंडिका (i) एवं (ii) में वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री राजवंश राय, तत्कालीन मुख्य अभियंता के विरूद्ध गठित दोनों आरोप प्रमाणित होता है। अतएव इनका अपील अभ्यावेदन स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। उपर्युक्त निष्कर्ष कंडिका के आलोक में श्री राजवंश राय, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध संसूचित दण्डादेश ''शत्‌ प्रतिशत पेंशन की स्थायी कटौती'' को यथावत रखते हुए, इनके पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत करने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया है। सरकार के स्तर पर लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजवंश राय, तत्कालीन मुख्य अभियंता, लघु जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर संप्रति सेवानिवृत के पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए निम्नांकित दण्ड को यथावत रखा जाता है :- ''शत्‌ प्रतिशत पेंशन की स्थायी कटौती।''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

23 अक्तूबर 2019

सं0 22/नि0सि0(डा0)13-01/2016/2252--श्री त्रिभुवन प्रसाद वर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता, ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल-01, गढ़वा संप्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध रमना प्रखंड, गढ़वा, झारखण्ड के अंतर्गत योजना सं0-06/97-98 के तहत निर्मित कब्रिस्तान घेराबन्दी निर्माण में की गयी अनियमितता के लिए जल संसाधन विभाग, झारखण्ड, राँची के संकल्प ज्ञापांक-3287 दिनांक-18.10.2003 द्वारा असैनिक सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 1930 के नियम-55 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-998 दिनांक-28.08.2007 द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। तत्पश्चात जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा जल संसाधन विभाग, झारखंड, राँची द्वारा की गयी एवं समीक्षोपरांत उक्त जाँच प्रतिवेदन पर उपायुक्त गढ़वा का मंतव्य प्राप्त करने का निर्णय लिया गया। तदालोक में उक्त जाँच प्रतिवेदन पर उपायुक्त गढ़वा का मंतव्य प्राप्त किया गया जिसमें उपायुक्त, गढ़वा द्वारा आरोप सं0-01, 02 एवं 03 पर संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमति व्यक्त करते हुए अप्रमाणित पाया गया एवं आरोप सं0-04 एवं 05 को प्रमाणित पाया गया। तत्पश्चात जल संसाधन विभाग, झारखंड, राँची द्वारा श्री वर्मा का कैडर बिहार आवंटित होने के कारण अग्रेतर कार्रवाई हेतु संबंधित अभिलेख विभाग को उपलब्ध कराया गया। तदालोक में श्री वर्मा के दिनांक-28.02.17 को सेवानिवृत हो जाने के कारण विभागीय आदेश सं0-01 दिनांक-03.01.18 द्वारा पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया। तत्पश्चात संचालन पदाधिकारी/उपायुक्त, गढ़वा के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोप सं0-03 एवं 05 के लिए श्री वर्मा से विभागीय पत्रांक-755 दिनांक-16.03.18 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। तदालोक में श्री वर्मा द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब दिया गया है जो निम्न प्रकार से है :-

आरोप सं0-03 ः- ''श्री त्रिभुवन प्रसाद वर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता द्वारा अपूर्ण योजना को पूर्ण बता कर पूर्णता प्रमाण पत्र समेकित किया गया है''।बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 94 बचाव बयान

(i) आरोपी पदाधिकारी द्वारा निर्गत द्वितीय कारण पृच्छा एवं उसके साथ संलग्न संचालन पदाधिकारी द्वारा अभिलेखित आदेश फलक में निहित प्रतिवेदन तथा उक्त संबंध में उपायुक्त, गढ़वा द्वारा अंकित मंतव्य एवं तदोपरांत विभाग द्वारा उपायुक्त, गढ़वा के मंतव्य पर सहमत होने की सम्पूर्ण प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण बताया गया है।

(ii) श्री वर्मा द्वारा विभागीय कार्यवाही में नियुक्त संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना का पत्रांक-15548 दिनांक-06.12.17 में दिये निदेश/अनुदेश का पूरी तरह अवहेलना का आरोप लगाया गया है जिसमें आरोपित पदाधिकारी को सुनने, उन्हें अभिलेखों एवं साक्ष्यों के परीक्षण-प्रतिपरीक्षण एवं पुनः परीक्षण के अवसर देने के उपरांत ही जाँच पदाधिकारी द्वारा स्पष्ट एवं तार्कित आदेश पारित करने की अपेक्षा की गयी है। (iii) संचालन पदाधिकारी द्वारा सम्यक समीक्षा नहीं की गई। (iv) श्री वर्मा द्वारा आरोप सं0-03 के संदर्भ में बचाव-बयान में कहा गया है कि संबंधित पूर्णता प्रमाण-पत्र पर मेरा हस्ताक्षर नहीं है। संचालन पदाधिकारी द्वारा Handwriting विशेषज्ञ से जाँच कराये बिना इस आरोप को प्रमाणित करने में तकनीकी कठिनाई बताने पर उपायुक्त, गढ़वा द्वारा अपने मंतव्य मे किस आधार पर आंशिक स्वीकरात्मक प्रतिवेदित किया गया है। अपने उक्त अभिकथन पुष्टि हेतु हस्ताक्षर का नमूना समेकित किया गया है एवं संदर्भित पूर्णतः प्रमाण पत्र की छायाप्रति भी संलग्न की गई है।

आरोप सं0-05 :- व्यवहृृत सामग्री राशि का रॉयल्टी का सामंजन नहीं कराने, अभिलेख से प्राक्कलन गायब कराने तथा योजना का कार्यान्वयन के लिए मार्ग दर्शिका का स्पष्ट अवहेलना किया गया है।

बचाव-बयान आरोपी द्वारा अपने बचाव-बयान में कहा गया है कि गणितीय जाँच कर व्यवहृत सामग्री का रॉयल्टी का सामंजन का कार्य प्रखंड कार्यालय एवं प्रखंड विकास पदाधिकारी का है न कि तकनीकी पदाधिकारी का।

(i) अभिलेख गायब कराने के संबंध में कहा गया है कि अभिलेख का संधारण एवं संरक्षता की जिम्मेवारी प्रखंड कार्यालय एवं कार्यालय प्रधान की है, मुझे जिम्मेवार नहीं माना जा सकता।

(ii) मार्गदर्शिका का उल्लंघन करने से संबंधित आरोप के संबंध में आरोपी द्वारा तथ्यहीन एवं निराधार बताया गया है।

(iii) उपायुक्त, गढ़वा द्वारा बगैर तर्क एवं साक्ष्य के मंतव्य का कोई औचित्य नहीं बताया गया है। (iv) आरोपी द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा को बिहार सरकारी सेवक नियमावली, 2005 के नियम-17 के नियम-23(i), 23(ii) एवं नियम-18 के अधिनियम-(2) में निहित प्रावधान के अनुरूप नहीं बताया गया है।

उपर्युक्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी, जो निम्न प्रकार से है :- आरोपी पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव-बयान में खासकर संचालन पदाधिकारी द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग, पटना का पत्रांक-15548 दिनांक-16.12.17 में दिये निदेश/अनुदेश का जिक्र किया गया है जिसमें आरोपी पदाधिकारी को सुनने, उन्हें अभिलेखों/साक्ष्यों के परीक्षण, प्रतिपरीक्षण के अवसर देने के उपरांत जाँच प्रतिवेदन देने के संबंध में है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि दिनांक-01.12.03 की कार्रवाई में श्री वर्मा से 15.12.03 को अपने लिखित बयान संचालन पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने का निदेश अंकित है। इसके उपरांत दिनांक-15.12.03 की बैठक हुई जिसमें श्री वर्मा उपस्थित नहीं हो सके। अन्तिम अवसर के साथ पुनः अभिलेख के साथ 05.01.04 को उपस्थापित करने का निदेश दिया गया। दिनांक-05.01.2004 को राजपत्रित अवकाश घोषित होने के कारण दिनांक-06.01.04 को प्रोसीडिंग शुरू हुई जिसमें श्री त्रिभुवन प्रसाद वर्मा, प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी, डॉ0 यमुना प्रसाद, स0परि0पदा0, डी0आर0डी0ए0, गढ़वा उपस्थित हुए। संचालन पदाधिकारी द्वारा उल्लेख किया गया है कि प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों की सत्यापन प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी से कराया गया। अभियोजन के रूप में प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी के पास प्रस्तुत किये गये साक्ष्य के अतिरिक्त अन्य कोई कागजात नहीं है। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी पदाधिकारी को सुनने, अभिलेखों एवं साक्ष्यों के परीक्षण आदि का पूरा अवसर दिया गया। इस प्रकार आरोपी पदाधिकारी का यह कथन कि उन्हें सुनने, अभिलेखोंं/साक्ष्यों के परीक्षण, प्रतिपरिक्षण का अवसर नहीं दिया स्वीकार योग्य नहीं है।

योजना पूर्ण प्रमाण पत्र पर आरोपी पदाधिकारी के दिनांक-12.02.99 (उनके बयान के अनुसार) के पदस्थापन के बाद दिनांक-20.02.99 को हस्ताक्षर किया गया जिसे आरोपी पदाधिकारी द्वारा अपना हस्ताक्षर मानने से इंकार किया जाता रहा परन्तु तत्संबंधी कोई साक्ष्य संलग्नित नहीं किया गया है जिससे यह स्थापित किया जा सके की योजना पूर्ण प्रतिवेदन पत्र पर उनका हस्ताक्षर नहीं है। आरोपी पदाधिकारी जो सहायक अभियंता के रूप में पदस्थापित थें, इनके द्वारा कनीय अभियंता का दिनांक-05.02.98 की तिथि में योजना पूर्णता प्रतिवेदन पर किये गये हस्ताक्षर पर कोई प्रतिक्रिया या आरोप बयान में उल्लेख नहीं है। संबंधित कनीय अभियंता का बचाव बयान संलग्नित नहीं है। यद्यपि आरोपी पदाधिकारी द्वारा अपना हस्ताक्षर मानने से इन्कार किया है एवं साक्ष्य के रूप में हस्ताक्षर का नमूना एवं योजना पूर्णतः प्रतिवेदन की छायाप्रति संलग्न किया गया है। संचिका में रक्षित योजना पूर्ण प्रमाण पत्र एवं संचिका में रक्षित उपायुक्त, गढ़वा को दिये आरोपी पदाधिकारी के प्रतिवेदन पर किये गये हस्ताक्षर में काफी समानता परिलक्षित होता है। उक्त के आलोक में उपायुक्त, गढ़वा द्वारा संचालन पदाधिकारी के प्रतिवेदन पर आरोप आंशिक स्वीकरात्मक के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप को आंशिक प्रमाणित पाया गया है।95 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 श्री त्रिभुवन प्रसाद वर्मा एक तकनीकी पदाधिकारी है। स्वीकृत प्राक्कलन या बिना स्वीकृत प्राक्कलन की एक कार्यालय प्रति स्वंय उनके पास होना चाहिए था जो नहीं था।

श्री वर्मा द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिये गये स्पष्टीकरण से स्पष्ट होता है कि उक्त कार्य से संबंधित अग्रिम राशि के समायोजन हेतु संबंधित विपत्र इनके समक्ष आने पर कार्य स्थल की जाँच कर मापी ली गई। कतिपय कारणों से नींव की जाँच किये बिना ही माप पुस्त पर इनके द्वारा हस्ताक्षर की गई। चूँकि नींव का कार्य इनके पूर्व पदस्थापित सहायक अभियंता की देख-रेख एवं कार्यकाल में हुआ इसलिए एक तकनीकी पदाधिकारी होने के नाते पूर्व से कराये जा रहे कार्यों को स्थल जाँचोपरांत स्वीकृत प्राक्कलन के प्रावधानों से मिलान कर ही मापपुस्त पर हस्ताक्षर करना चाहिए था। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि या तो स्वीकृत प्राक्कलन की प्रति आरोपी पदाधिकारी के पास थी या बिना ही संबंधित विपत्र/मापपुस्त पर हस्ताक्षर किया गया परिलक्षित होता है। इस प्रकार आरोपी पदाधिकारी के योगदान के बाद भी योजना अपूर्णता की स्थिति में बिना स्वीकृत प्राक्कलन/मार्गदर्शिका के अवलोकन किये माप-पुस्त पर हस्ताक्षर किये जाने से निर्धारित मार्गदर्शिका के अवहेलना करने का आरोप प्रमाणित पाया गया है।

अतएव वर्णित संदर्भ में मामले के समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोप के लिए श्री त्रिभुवन प्रसाद वर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता, ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल-01, गढ़वा झारखंड संप्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के ''पेंशन से 5% (पाँच प्रतिशत) की कटौती तीन वर्षों के लिए रोक'' का दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है जिसपर सक्षम प्राधिकार एवं बिहार लोक सेवा आयोग का सहमति प्राप्त है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री त्रिभुवन प्रसाद वर्मा, तत्कालीन सहायक अभियंता, ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल-01, गढ़वा, झारखंड संप्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता है :-

''पेंशन से 5% (पाँच प्रतिशत) की कटौती तीन वर्षों के लिए रोक''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

31 अक्तूबर 2019

सं0 22/नि॰सि॰(अभि॰)डि0-22-08/2014/2283--श्री देवराज रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, डिहरी प्रमंडल डिहरी, सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, खेत विकास प्रमंडल, काडा, दरभंगा, शिविर झंझारपुर के पदस्थापन अवधि में मौजा धौड़ाढ़ में स्वीकृत खनन पट्टा क्षेत्र से बाहर लोगों द्वारा खनन किए जाने की सूचना खनन एवं भूतत्व विभाग को नहीं देने, सरकार को खनिज एवं राजस्व की क्षति पहूॅचाने के आरोप के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2260 दिनांक-01.10.2015 द्वरा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के अन्तर्गत निम्न आरोपां के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गईः- आरोप सं0-1ः- मौजा धौड़ाढ़ में स्वीकृत खनन पट्टा क्षेत्र से बाहर लोगों द्वारा अवैध खनन किया गया था। उक्त क्षेत्र डिहरी प्रमंडल, डिहरी के अधीन है। आपके कार्यपालक अभियंता, डिहरी प्रमंडल, डिहरी के पद पर कार्यरत रहते हुए अवैध खनन के संबंध में खनन एवं भूतत्व विभाग रोहतास को सूचित नहीं किया गया जो आपकी कर्तव्य में लापरवाही एवं उदासीनता का घोतक है, जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी हैं। आरोप सं0-2ः- आपके द्वारा अवैध खनन की सूचना ससमय खनन एवं भूतत्व विभाग, रोहतास को नहीं देने के कारण सरकारी को खनिज एवं राजस्व की क्षति हुई, जिसके लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी हैं। उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही से संबंधित संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन में सभी आरोपों को प्रमाणित पाया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। सम्यक्‌ समीक्षोपरान्त जाँच प्रतिवेदन से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-1787 दिनांक7 06.10.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई। उक्त के आलोक में श्री रजक द्वारा द्वितीय कररण पृच्छा का प्रत्युत्तर समर्पित किया गया, जिसकी समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। आरोप सं0-1ः- प्रस्तुत आरोप में मौजा धोड़ा में नियंत्रणाधीन पहाड़ से अवैध खनन की सूचना खन एवं भुतत्व विभाग, रोहतास को नहीं देने के लिए आरोपित पदाधिकारी को कर्त्तव्य में लापरवाही एवं उदासीनता के लिए दोषी माना गया है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिये बयान के सदृश ही विषयांकित पहाड़ श्री विनोद कुमार दास, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के नियंत्रणाधीन होने दिनांक-07.07.09 को प्रभार में आने के बाद पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता श्री दास एवं सम्बद्ध अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा इसकी जानकारी नहीं देने, प्रतिनियुक्त कर्मचारी को अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा हटा लिय जाने को प्रतिवेदित किया गया है। कार्यपालक अभियंता (आरोपित पदाधिकारी) को अपने कार्यक्षेत्र की जानकारी नहीं होना उनकी कर्तव्य के प्रति उदासीनता एवं लापरवाही ही परिलक्षित करता है। प्रतिनियुक्त कर्मचारियों को हटाये जाने एवं उसके कार्यकलाप की जानकारी नहीं होने के कारण उनका कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी द्वारा भी उनके उपरोक्त कथन को स्वीकार योग्य नहीं माना गया है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर के विभिन्न पारा में अवैध खनन के संबंध में किए गए विभिनन पत्राचार एवं प्राथमिकी दर्ज कराये जाने को प्रतिवेदित किया गया है। किये गये पत्राचारों के अवलोकन से स्पष्ट होता हैं कि सभी पत्राचार एवं प्राथमिकी दर्ज खनन विभाग द्वारा दिनांक-20.05.10 को प्राथमिकी कराने के बाद कराया गया96 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 है जबकि अवैध खनन पूर्व से ही होते रहना परिलक्षित होता है। उपरोक्त से नियंत्रणाधीन पत्थर भूखंड से अवैध खनन की रोकथाम/सूचना आरोपित पदाधिकारी द्वार नहीं दिया जाना परिलक्षित होता है। विषयांकित पत्थर भूखंड डिहरी प्रमंडल, डिहरी के नियंत्रणधीन है जहाँ आरोपित पदाधिकारी पदस्थापित रहे है। जल संसाधन विभाग के अनापत्ति प्रमाण-पत्र के आधार पर नागार्जुन कन्स्ट्रक्शन को 30.03.2008 तक दी गई लीज को दिनांक-12.06.06 को समाप्त कर दिया गया। उसी भूखंड को बिना अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्राप्त किये सहायक निदेशक, खान एवं भूतत्व विभाग द्वारा दो पट्टाधारियों को पट्टा पर दिया गया। खान एवं भूतत्व विभाग के स्थलीन जाँच में कतिपय लोगों द्वारा अवैध खनन होते हुए पाया गया। पहाड़ से हटाये गये प्रतिनियुक्त कर्मचारियों को वेतन भुगतान किये जाने को संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपित पदाधिकारी के कार्यक्षेत्र में भ्रमण नहीं किया जाना मान गया है। उक्त के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी Log Book की छायाप्रति संलग्न करते हुए कर्त्तव्य का पालन नहीं करने के आरोप को गलत बताया गया है। आरोपित पदाधिािरी द्वारा संलग्न Log Book से यह वर्ष 2011 का होना स्पष्ट होता है जबकि आरोप दिनाक-20. 05.10 के पूर्व का है। इससे अवैध खनन के दौरान कार्यक्षेत्र के भ्रमण किया जाना स्पष्ट नहीं होता है। अतएव उनका कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अवैध खनन के लिए सहायक निदेशक खान एवं भूतत्व विभाग, रोहतास को जिम्मेवार माना गया है। आरोपित पदाधिकारी अपने कर्त्तव्य निर्वहन के लिए जिम्मेवार होते हैं आरोप उनके कर्त्तव्य निर्वहन से संबंधित है न कि सहायक निदेशक खान एवं भूतत्व विभाग से। उपरोक्त से सहायक निदश्ेाक को जिम्मेवार बताकर स्वयं को इसके लिए जिम्मेवार नहीं होने का आधार होने के उनका कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त तथ्यों एवं संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन के परिप्रेक्ष्य में आरोपित पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर आरोप संख्या-1 के सन्दर्भ में स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आरोप सं0-2ः- प्रस्तुत आरोप अवैध खनन की सूचना नहीं दिये जाने के कारण सरकारी राजस्व एवं खनन की क्षति होने से संबंधित है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिये बयान के सदृश ही बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र के सहायक निदेशक खान एवं भूतत्व विभाग द्वारा नीलामी किये जाने एवं जिला पदाधिकारी के पत्रांक-189, 190 दिनांक-21.02.2011 से भूखण्ड, जल संसाधन विभाग को सौंपे जाने का निदेश का अनुपालन नहीं करने के लिए सहायक निदेशक को जिम्मेवार माना गया है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा मूल आरोप से हटकर उत्तर दिया जाना स्पष्ट होता है। जिला पदाधिकारी के उक्त पत्र द्वारा वर्ष 2011 में पट्टा को रद्द करते हुए भूखंड जल संसाधन विभाग को वापस करने का निदेश दिया गया । जबकि आरोप मई 2010 के पूर्व अवैध खनन से संबंधित है। जो समय पर निरीक्षण करते हुए अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते हुए बचाया जा सकता था। परन्तु अवैध खनन हुआ जिसके जाँचोपरांत समबद्ध पदाधिकारी के विरूद्ध कार्रवाई प्रारम्भ की गई। उपलब्ध अभिलेख से अवैध पत्थर खनन के कारण हुई राजस्व/पत्थर की क्षति का आकलन किया जाना संभव प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त तथ्यों, संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन के आलोक में आरोपित पदाधिकारी का आरोप सं0-2 के संदर्भ में द्वितीय कारण पृच्छा बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त तथ्यों द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन के आलोक में आरोप सं0-1 एवं 2 के आलोक में श्री देवराज रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, डिहरी प्रमंडल, डिहरी का द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप प्रमाणित पाया गया है। समीक्षोपरांत उक्त आरोप-1 एवं 2 को प्रमाणित पाया गया। प्रमाणित आरोपों के लिए श्री रजक को निम्न दंड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया है। (1) संगत वर्ष (2010-11) के लिए निंदन की सजा। (2) दो वार्षिक वेतनवृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोका जाए। (3) प्रोन्नति की देय तिथि से 2 वर्षों तक प्रोन्नति पर रोक।

उक्त निर्णित दण्डादेश के विरुद्ध पुनर्विचार करने हेतु श्री रजक द्वारा पुनर्विचार अर्जी समर्पित किया गया। पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरान्त पाया गया कि पुनर्विलोकन अर्जी में जो तथ्य समर्पित किये गये हैं, वह स्वीकार योग्य नहीं है और लगभग उन्हीं तथ्यों को दोहराया गया है, जो उनके द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में अंकित किया गया था। पुनर्विलोकन अर्जी में कोई नया तथ्य नहीं रहने के कारण तथ्यहीन पाते हुए पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया।

अतएव सरकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0 2455 दिनांक 28.11.2018 द्वारा निम्न संसूचित दंड-97 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 (1) संगत वर्ष (2010-11) के लिए निंदन की सजा। (2) दो वार्षिक वेतनवृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोका जाए। (3) प्रोन्नति की देय तिथि से 2 वर्षों तक प्रोन्नति पर रोक।

को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव।

------

28 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(पट0)-03-10/2019/1850--श्री सुरेश राम (आई0डी0 सं०-4559), तत0 सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमंडल-2, बेलहर को जालसाजी एवं सॉठ-गॉठ कर संदिग्ध परिस्थितियों में सरकारी सेवा करने के कारण विभागीय त्रिस्तरीय जाँच समिति के प्रतिवेदन के आधार पर बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री सुरेश राम का मुख्यालय संयुक्त सचिव (प्रबंधन), जल संसाधन विभाग, पटना निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री राम को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------

26 अगस्त 2019

सं0 22नि0सि0(भाग0)-09-02/2009/1822--श्री संजीवन चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल सं0-1, जमुई शिविर, खड़गपुर सम्प्रति सेवानिवृत्त के पदस्थापन अवधि में निविदा निष्पादन में बरती गयी अनियमितता के लिए विभागीय आदेश संख्या-352, दिनांक 18.02.2009 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक 383, दिनांक 14.05. 2009 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

उक्त विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में समीक्षोपरान्त जाँच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए असहमति के बिन्दुओं पर श्री चौधरी से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। प्राप्त प्रत्युत्तर की समीक्षोपरान्त विभागीय अधिसूचना संख्या 175, दिनांक 28.01.2010 द्वारा निम्नांकित दंड संसूचित किया गया :-

1. निन्दन वर्ष 2008-09, 2. एक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक, 3. निलंबन अवधि में जीवन यापन भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा, परन्तु इसकी गणना पेंशन प्रयोजनार्थ की जायेगी।

उपर्युक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री चौधरी द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया, जिसे समीक्षोपरान्त विभागीय अधिसूचना संख्या-1276, दिनांक 31.08.2010 द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया।

उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री चौधरी द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्ल्यू0जे0सी0 सं0-15212/2010 दायर किया गया, जिसमें दिनांक 16.05.2018 को पारित न्याय निर्णय में उपर्युक्त दण्डादेश संबंधी अधिसूचनाओं को निरस्त करते हुए आदेश दिया गया कि श्री चौधरी सेवानिवृत्त हो गये हैं, इसलिए विभाग चाहे तो बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43 (बी) के तहत कार्रवाई कर सकता है।

माननीय उच्च न्यायालय, पटना के उक्त आदेश के आलोक में सम्यक्‌ समीक्षोपरान्त पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को नियम 43 (बी) के तहत सम्परिवर्तित करते हुए श्री चौधरी से विभागीय पत्रांक 1816, दिनांक 23.08.2018 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी।

श्री संजीवन चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर एवं अन्य संगत अभिलेखों की समीक्षा सक्षम प्राधिकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत निम्नांकित तथ्य पाए गए :- द्वितीय कारण पृच्छा का आरोप

1. सिंचाई प्रमण्डल, तारापुर के निविदा आमंत्रण सूचना सं0-03/08-09 के द्वारा आमंत्रित निविदा में कागजात की बिक्री दिनांक 13.10.2008 से 21.10.2008 तक एवं निविदा प्राप्ति की तिथि दिनांक 21.10.2008 को निर्धारित थी अर्थात्‌ उक्त निविदा बिहार ठीकेदारी निबंधन नियमावली-1982 के तहत आमंत्रित की गयी थी, क्योंकि उक्त तिथि में वही नियमावली जल संसाधन विभाग में प्रभावी थी। अतएव, निविदा निष्पादन प्रक्रिया उसी नियमावली के अधीन की जानी थी। नई नियमावली बिहार ठीकेदारी निबंधन नियमावली-2007 जल संसाधन विभाग में दिनांक 12.11.2008 से प्रभावी मानी गयी थी, जो उक्त तिथि के बाद आमंत्रित निविदा पर प्रभावी समझी जायेगी। उक्त के आलोक में निविदा निष्पादन की प्रक्रिया गलत पायी गयी।98 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 2. कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमण्डल, तारापुर से निविदा संबंधी संचिका दिनांक 13.11.2008 को प्राप्त होने पर श्री चौधरी द्वारा दिनांक 23.11.2008 को संचिका अपने अधीनस्थ को भेजा जाना मामले में संदेह पैदा करता है।

3. निविदा सूचना के साथ प्रस्तुत शर्त्तों का अनुमोदन श्री चौधरी के स्तर से माना जायेगा। खासतौर पर जब निविदा निष्पादन हेतु तत्समय वही सक्षम प्राधिकार थे। उनके द्वारा निविदा निष्पादन तक या उसके बाद भी कभी भी यह नहीं कहा गया कि निविदा सूचना में निहित शर्त्तों का निर्धारण उनकी सहमति के बिना किया गया।

आरोपित पदाधिकारी का बचाव बयान :-

1. बचाव बयान में उल्लेख किया गया है कि निविदा का निष्पादन पी0डब्ल्यू0डी0 कोड एवं एन0आई0टी0 में अंकित शर्त्तों एवं निदेशों के अनुरूप नियमतः किया गया है, जिसमें किसी प्रकार की अनियमितता नहीं बरती गयी है।

2. बचाव बयान में कहा गया है कि माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा दिनांक 16.05.2018 में संवेदकों के कागजातों के आधार पर तुलनात्मक रूप से अध्ययन करने पर पाया गया कि एक ही संवेदक का कागज साफ-सुथरा एवं निविदा शर्त्तों के अनुरूप और मजबूत है और निविदा निष्पादन को नियमतः सही माना तो न्यायालय से ऊपर कोई संस्था नहीं है।

3. द्वितीय कारण पृच्छा के आरोप संख्या-01 के जवाब में उल्लेख किया गया कि एन0आई0टी0 के कंडिका-21 जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार द्वारा निविदा से संबंधित सभी अद्यतन अनुदेश एवं शर्त्त निविदा के लिए मान्य होगा।

4. श्री मिश्रा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता ने अपने पत्रांक 1773, दिनांक 15.11.2008 से निविदा कागजात संचिका सहित इनके कार्यालय (अंचल कार्यालय) में भेजे जो दिनांक 23.11.2008 को दैनिक-पत्र प्राप्ति संख्या 2671, दिनांक 23.11.2008 का है और उसी दिन उनके द्वारा डाक में देखा गया।

5. श्री मिश्र, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता दिनांक 21.10.2008 से 19.11..2008 तक (करीब एक माह) तुलनात्मक विवरणी संचिका अपने पास रखे, जबकि नियम यह है कि निविदा प्राप्ति होने के सात दिनों के अंदर निष्पादन हेतु सक्षम प्राधिकार के यहां पहुंच जाना चाहिए। अतः दोषी कार्यपालक अभियंता हैं।

6. निविदा का निष्पादन एन0आई0टी0 में अंकित शर्त्तों एवं निदेशों के अनुसार ही किया जाता है। विभाग से कोई अधिसूचना प्राप्त नहीं हुआ कि किस नियम से निष्पादन होगा। पूर्व की नियमावली-1982 विलोपित थी। दिनांक 12.11.2008 के बाद प्रकाशन होने वाले निविदा पर लागू होगा ऐसा कहीं उल्लेख नहीं है। इस प्रकार निविदा का निष्पादन प्रक्रिया के अनुसार गलत नहीं कहा जा सकता है।

7. आरोप संख्या-02 के संबंध में बचाव बयान में कहा गया है कि कार्यपालक अभियंता का पत्रांक 1773, दिनांक 15.11.2008 से संचिका में तुलनात्मक विवरणी अंचलीय कार्यालय से प्राप्त हुआ तो दिनांक 13.11.2008 को अंचल में प्राप्त कैसे किया गया। इस तरह संदेह पैदा करने के कारण निराधार एवं झुठा है।

8. निविदा निष्पादन में विलम्ब नहीं हुआ। दर वार्त्ता में भी समय लगता है। निबंधित डाक से संवेदकाें को भी सूचना दिया गया था, फिर भी ससमय निष्पादन कर दिया गया।

9. बचाव बयान आरोप संख्या-03 के संबंध में लिखा गया है कि जब निविदा प्रकाशन हो गया तो निविदा सूचना के साथ शर्त्त एवं अनुदेशों पर सहमति प्रकाशन के बाद मान्य है तभी तो मेरे द्वारा शर्त्तों की परिधि में निविदा का निष्पादन किया गया।

10. बयान में उल्लेख है कि कार्यपालक अभियंता, एन0आई0टी0 सीधे अभियंता प्रमुख, श्री देवी रजक को दिये। मेरी सहमति का प्रश्न ही नहीं उठता है।

विभागीय समीक्षा (1) :- आरोप संख्या-01 निविदा निष्पादन की प्रक्रिया के क्रम में अपनाये गये नियमावली से संबंधित है। सिंचाई प्रमण्डल, तारापुर द्वारा 69.06 लाख रुपये की निविदा आमंत्रण सूचना 03/2008-09, दिनांक 20.09.2008 को ही निर्गत है, जिसमें निविदा कागजात की बिक्री दिनांक 13.10.2008 से 20.10.2008 तथा निविदा प्राप्ति की तिथि दिनांक 21.10.2008 को पूरी हो गई। तत्कालीन कार्यपालक अभियंता ने अपने पत्रांक 1773, दिनांक 15.11.2008 द्वारा संचिका तुलनात्मक विवरणी संलग्न कर निविदा निष्पादन में सक्षम प्राधिकार यानी आरोपी अधीक्षण अभियंता को भेजा गया, जिसके तकनीकी बीड का निष्पादन आरोपी पदाधिकारी के स्तर से किया गया। निविदा निस्तार के क्रम में मेसर्स रिकी कंस्ट्रक्शन प्रा0लि0, मुंगेर के तकनीकी बीड को उच्चतम श्रेणी में निबंधित होने के आधार पर अमान्य कर दिया गया। आरोपी का यह बयान कि माननीय उच्च न्यायालय, पटना के दिनांक 16.05.2018 के न्यायादेश में निविदा निष्पादन को नियमतः सही नहीं माना है, स्वीकार योग्य नहीं है। चूंकि न्यायादेश में यह स्पष्ट उल्लेखित है कि "This Court is not deciding that who was the fit Contrator for Executing of Work." निविदा का प्रकाशन बिहार ठीकेदारी निबंधन नियमावली 1992 के तहत आमंत्रित की गई परिलक्षित होती है। चूंकि उक्त तिथि में वही नियमावली जल संसाधन विभाग में प्रभावी थी, जिसके नियम-2 (iii) के अनुसार एक श्रेणी के उपर की श्रेणी में निबंधित संवेदक ठीक निचले श्रेणी के कार्य में निविदा डाल सकते थे एवं कंडिका-2(i), (b), (c) में 50 लाख के99 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 उपर एवं 200 लाख के कार्य के लिए Class I-A में निबंधित संवेदक अर्हत्ता रखते हैं। इस नियम के अनुसार मेसर्स रिकी कंस्ट्रक्शन प्रा0लि0, मुंगेर उच्चतम श्रेणी-1S में निबंधित होने के कारण ठीक निचले श्रेणी यानी I-A श्रेणी के कार्य में निविदा डाल सकते थे। एन0आई0टी0 की कंडिका-19 में यह शर्त्त रखी गयी है कि जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार के अधीन समुचित श्रेणी में निबंधित संवेदक निविदा में भाग ले सकते हैं एवं कंडिका-21 में जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार द्वारा निविदा से संबंधित सभी अनुदेश एवं शर्त्तें निविदा के लिए मान्य होगी। आरोपी पदाधिकारी द्वारा मेसर्स रिकी कंस्ट्रक्शन प्रा0लि0, मुंगेर उच्चतम श्रेणी-1S में निबंधित होने के कारण उक्त शर्त्तों का पालन कर संवेदक को अयोग्य ठहराते हुए निविदा निष्पादन का बचाव बयान अंकित किया गया है।

उसी प्रकार विभागीय पत्रांक 90, दिनांक 16.10.2006 द्वारा निविदा के प्री-क्वालिफिकेशन हेतु निर्धारित मापदंड, जिसमें मात्र तीन बिन्दुओं यथाः-अद्यतन बिक्री कर सफाया प्रमाण-पत्र, अद्यतन निबंधन प्रमाण-पत्र तथा अग्रधन की राशि का मापदंड निर्धारित था। परन्तु एन0आई0टी0 के निविदा शर्त्त कंडिका-16 में विभागीय मापदंड के विरूद्ध अनावश्यक शर्त्तों को जोड़कर निविदा प्रकाशित की गयी एवं आरोपी पदाधिकारी द्वारा मे0 सदानन्द सिंह प्रा0लि0, मुंगेर के तकनीकी बीड को एन0आई0टी0 में जोड़े गये अनावश्यक शर्त्तों के आलोक में अमान्य किया गया।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि निविदा का निष्पादन एन0आई0टी0 के निविदा शर्त्तों के अनुरूप ही किया जाता है परन्तु दिनांक 20.09.2008 को निर्गत आमंत्रण सूचना संख्या-3/2008-09 जो उस वक्त प्रचलित बिहार ठीकेदारी निबंधन नियमावली-1982 के तहत आमंत्रित की गयी थी, में सभी निहित निविदा शर्त्तों का निर्धारण इसी नियमावली एवं लागू विभागीय निदेश यथा-विभागीय पत्रांक 90, दिनांक 16.10.2006 के अनुरूप ही निविदा की शर्त्तों का निर्धारण किया जाना चाहिए था। खासतौर पर जब निविदा निष्पादन हेतु आरोपी पदाधिकारी ही सक्षम प्राधिकार थे एवं परिमाण विपत्र की स्वीकृति भी इन्हीं के कार्यालय द्वारा प्रदान की गयी थी। इसके अतिरिक्त निविदा के शर्त्तों के निर्धारण के संबंध में एक तरफ अपने बचाव बयान में ''मेरा सहमति का प्रश्न ही नहीं उठता'' का उल्लेख है तो दूसरी तरफ ''निविदा सूचना के साथ शर्त्तों एवं अनुदेशों पर सहमति निविदा प्रकाशन के बाद मान्य है तभी तो मेरे द्वारा शर्त्तों के परिधि में निविदा का निष्पादन किया गया'' का विरोधाभाषी बयान अंकित किया गया है। अगर निविदा शर्त्त प्रचलित नियमावली एवं सरकारी निदेश/अनुदेश के अनुरूप नहीं था या विभागीय अधिसूचना सं0-3167, दिनांक 12.11.2008 से नई बिहार ठीकेदारी निबंधन नियमावली-2007 निर्गत की तिथि से लागू कर दी गयी थी, वैसी स्थिति में आरोपी पदाधिकारी द्वारा निविदा प्रकाशन के बाद न तो शुद्धि पत्र हेतु निदेशित किये जाने का साक्ष्य है और न ही विभागीय मंतव्य प्राप्त किया गया है। निविदा निष्पादन के क्रम में भी प्रचलित पूर्व की नियमावली से प्रकाशित विभागीय निदेश के विपरीत निविदा शर्त्तों में अनावश्यक शर्त्तों को जोड़ने एवं त्रुटिपूर्ण निविदा शर्त्तों के आधार पर निविदा को रद्द करने का निदेश दिया जा सकता था ताकि विवाद से बचा जा सके।

इस प्रकार निविदा निष्पादन की प्रक्रिया को सही नहीं ठहराये जाने के कारण आरोप संख्या-01 पूर्णतः प्रमाणित परिलक्षित होता है। विभागीय समीक्षा (2) :-

आरोप संख्या-02 निविदा निष्पादन संबंधी संचिका अंचल कार्यालय में दिनांक 13.10.2008 को प्राप्त होने पर इनके द्वारा विलम्ब से 23.11.2008 को संचिका अपने अधीनस्थों को भेजने से संबंधित है।

आरोपी के बयान में उल्लेख है कि तत्कालीन कार्यपालक अभियंता ने अपने पत्रांक 1773, दिनांक 15.11.2008 से निविदा कागजात संचिका सहित अंचलीय कार्यालय में भेजा गया, जिसका दिनांक 23.11.2008 को डायरी नं0-2671, दिनांक 23.11.2008 अंकित है एवं इनके द्वारा दिनांक 23.11.2008 को ही डाक में देखा गया है। बचाव बयान में संलग्न पत्रांक 1773, दिनांक 15.11.2008 के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि इस पत्र पर दिनांक 19.11.2008 को किसी कर्मचारी द्वारा हस्ताक्षर किया गया है एवं दिनांक 23.11.2008 को आरोपी पदाधिकारी का हस्ताक्षर एवं इसी तिथि को डायरी की गयी परिलक्षित होती है, जिससे दिनांक 19.11.2008 को अंचल कार्यालय मे प्राप्ति माना जा सकता है, जिस पर दिनांक 23.11.2008 को उक्त पत्र को देखा गया है एवं अधीनस्थों को भेजा गया। इस प्रकार संचिका दिनांक 13.10.2008 को प्राप्त होने का आरोप उपलब्ध कराये गय अभिलेख के आधार पर प्रमाणित नहीं होता है एवं दिनांक 23.11.2008 को संचिका अपने अधीनस्थों को भेजे जाने के मामले में कोई विशेष संदेह उत्पन्न नहीं होता है। विदित हो कि प्रमंडलीय स्तर से भी तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा काफी विलम्ब से (लगभग एक माह) निविदा निष्पादन हेतु संचिका उपलब्ध कराया गया, जिसे उचित नहीं कहा जा सकता है। विभागीय समीक्षा (3) :-

आरोप संख्या-03 निविदा सूचना के साथ प्रस्तुत अनुमोदन एवं शर्त्तों के निर्धारण में सहमति से संबंधित है। निविदा निर्गत करने के समय प्रचलित नियमावली एवं सरकारी निदेश/अनुदेश के आलोक में तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा आमंत्रित निविदा सूचना संख्या-03/08-09 के साथ निहित शर्त्तों की जाँच निविदा निष्पादन हेतु सक्षम प्राधिकार होने के नाते आरोपी पदाधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए था। आरोपी पदाधिकारी को निविदा शर्त्तों के निर्धारण के संबंध में एक तरफ अपने बयान में ''मेरा सहमति का प्रश्न ही नहीं उठता'' का उल्लेख है, तो दूसरी तरफ ''निविदा शर्त्तों के परिधि में निविदा शर्त्तों एवं अनुदेशों पर सहमति निविदा प्रकाशन के बाद मान्य है तभी तो मेरे द्वारा शर्त्तों के परिधि में निविदा का निष्पादन किया गया।'' का परस्पर विरोधाभाषी बयान अंकित किया गया है। आरोपी पदाधिकारी ही निविदा निस्तार के सक्षम प्राधिकार थे। अगर निविदा शर्त्त प्रचलित नियमावली एवं सरकारी निदेश/अनुदेश के अनुरूप नहीं थी वैसी स्थिति में100 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020 निविदा प्रकाशन के बाद न तो शुद्धि पत्र निर्गत होने का साक्ष्य है और न ही विभाग से कोई मंतव्य प्राप्त किये जाने का प्रमाण है।

निविदा निष्पादन के क्रम में भी त्रुटिपूर्ण निविदा शर्त्तों के आधार पर निविदा को रद्द करने का निदेश दिया जा सकता था ताकि विवाद से बचा जा सके। इस प्रकार निविदा सूचना में निहित शर्त्तों का निर्धारण बगैर इनकी सहमति से की गई हो, यह स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होने से आरोप संख्या-03 प्रमाणित होता है।

उपरोक्त समीक्षा कंडिका (1), (2), (3) एवं द्वितीय कारण पृच्छा के बचाव बयान के आलोक में श्री संजीवन चौधरी, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल संख्या-1, जमुई सम्प्रति सेवानिवृत के पदस्थापन काल में निविदा निष्पादन की प्रक्रिया गलत पाये जाने एवं निविदा सूचना में निहित्त शर्त्तों में इनकी सहमति के लिए आरोप संख्या-(1) एवं (3) प्रमाणित होता है तथा निविदा की संचिका प्रमंडलीय पत्रांक 1773, दिनांक 15.11.2008 से अंचल को भेजने जाने के कारण दिनांक 19. 11.2008 को प्राप्ति के पश्चात्‌ दिनांक 23.11.2018 को मामूली विलंब से संचिका अपने अधीनस्थों को भेजे जाने संबंधी मामले में आरोपी पदाधिकारी को संदेह का लाभ दिया जा सकता है और इसे अप्रमाणित माना जा सकता है।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री संजीवन चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल-01, जमुई शिविर-खड़गपुर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध आरोप सं0-01 एवं 03 के प्रमाणित पाए जाने के कारण निम्न दण्ड देने का निर्णय सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिया गया है।

"अगले एक साल तक 10 (दस) प्रतिशत पेंशन की राशि में कटौती"। उक्त निर्णित दण्ड पर माननीय मंत्री का अनुमोदन एवं बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है। सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री संजीवन चौधरी, तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल-01, जमुई शिविर-खड़गपुर सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है :-

"अगले एक साल तक 10 (दस) प्रतिशत पेंशन की राशि में कटौती "।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 रसूल मियाँ, अवर सचिव। ————— अधीक्षक, सचिवालय मु(cid:7076)णालय बिहार, पटना द्वारा प्रकाशित एवं मु(िcid:7076)त। बिहार गजट, 47—571+10-डी0टी0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in101 बिहार गजट, 12 फरवरी 2020

भाग-2

————— बिहार-jkT;iky और dk;kZ/;kksa द्वारा निकाले गये विनियम, आदेश,

अधिसूचनाएं और नियम आदि। ------

जल संसाधन विभाग

-------

शुद्धि-पत्र

21 अगस्त 2019

सं0 22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015/1777--विभागीय अधिसूचना संख्या-22/नि0सि0(पू0)-01-03/2015/ 1730, दिनांक 09.08.2019 में श्री मुकेश कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, अररिया का आई0डी0-4099 में त्रुटि दृष्टिगत होने के फलस्वरूप उक्त में निम्नरूपेण संशोधन किया जाता हैः-

1. श्री मुकेश कुमार सिंह, सहायक अभियंता का आई0डी0-4099 के स्थान पर आई0डी0-4499 पढ़ा जाय। 2. विभागीय अधिसूचना संख्या-22/नि0सि0(पू0)01-03/2015-1730, दिनांक 09.08.2019 को इस हद तक संशोधित समझा जाय, उक्त अधिसूचना की शेष प्रविष्टियाँ यथावत रहेगी।

आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव। ————— अधीक्षक, सचिवालय मु(cid:7076)णालय बिहार, पटना द्वारा प्रकाशित एवं मु(िcid:7076)त। बिहार गजट, 47—571+10-डी0टी0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.inबिहार गजट, 12 फरवरी 2020 102

भाग-9-ख

निविदा सूचनाएं, परिवहन सूचनाएं, U;k;ky; सूचनाएं और सर्वसाधारण सूचनाएं bR;kfnA —————

सूचना --------

No. 207— I, SACHCHIDA Kumar, S/o Ram Dular Singh, At present residing at A/13, Indrasan Anandpuri West Boring Canal Road, Patna-1 vide affidavit no. 4710 dated 10.12.2019 shall be known as Sachchidanand Kumar.

Sachchida Kumar.

--------

सं0 277--मैं सौरभ पिता श्री राम उजागर यादव R/o 203/A हरिओम अपार्टमेंट, एक्जीविशन रोड, पटना शपथ पत्र सं0 057, दिनांक 30.12.2019 द्वारा सौरभ यादव के नाम से जाना जाऊंगा।

सौरभ। No. 277—I, SAURABH S/o Ram Ujagar Yadav R/o 203/A, Hariom Apartment, Exhibition Road, Patna, Bihar vide affidavit no. 057 dated 30.12.2019 shall be known as Saurabh Yadav.

SAURABH.

--------

सं0 278--मैं विभा कुमार उर्फ विभा सिंह, विभा कुमारी पति गिरीश कुमार, पता-छपरा निवास, ईस्ट बुद्धा कॉलोनी, नियर कृष्णा निकेतन स्कूल के पास, पटना-800001, शपथ पत्र संख्या-5818 दिनांक 18.9.2019 से विभा कुमार के नाम से जानी जाऊंगी।

विभा कुमार उर्फ विभा सिंह।

--------

No. 279—I, Shashikant S/O Bindu Singh R/O Vill+P.O-Bedauli P.S-Bhagwanganj, Dist- Patna declare vide Affidavit no. 12439 dated 19.09.2019 that now I shall be known as Shashikant Singh.

Shashikant.

--------

सं0 280--मैं श्री प्रकाश सिंह, पिता रामेश्वर सिंह, पता-पाटलिपुत्रा टोबैको कम्पनी, अशोक राजपथ, पटना-800004, शपथ पत्र संख्या-7269 दिनांक 27.11.2019 द्वारा घोषणा करता हूं कि श्री प्रकाश सिंह और प्रकाश सिंह दोनों मेरा ही नाम है तथा दोनों नामों से जाना एवं पहचाना जाता हूं। मैं भविष्य में भी श्री प्रकाश सिंह के नाम से जाना जाऊंगा।

श्री प्रकाश सिंह।

--------

No. 292—I, Md Sharique Uddin S/o –JAMAL UDDIN, R/o-House No-121, Karbala Road, Taj Nagar, Behind Taj Darbar, Phulwarisharif, Patna-801505, declare vide Affidavit no- 1107 Dated 22/01/2020 that I will be known as Mohammad Sharique Uddin for all purposes.

Md Sharique Uddin.

--------

सं0 293--मैं माया देवी पति प्रमोद कुमार निवासी माया प्लेस फ्लैट नं॰ 302 राजेन्द्र नगर, रोड नं॰ 6B पटना-16 शपथपत्र संख्या 201 दिनांक 22.11.2019 है अब से माया कुमारी के नाम से जानी व पहचानी जाउँ गी। माया देवी। ————— अधीक्षक, सचिवालय मु(cid:7076)णालय बिहार, पटना द्वारा प्रकाशित एवं मु(िcid:7076)त। बिहार गजट, 47—571+10-डी0टी0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in

Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 12 February 2020. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2020-02-12.7/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2020-02-12.7.