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Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 07 October 2020

Published 07 October 2020

Type
Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2020-10-07.35
Languages
English, Hindi

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निबंधन संख्या पी0टी0-40

बिहार गजट

बिहार सरकार kjk प्रकाशित भाग-1—नियुक्ति, inLFkkiu, बदली, शक्ति, छु (cid:7349)ी और vU; O;fDrxr सूचनाएं। 2-192 भाग-1-क—Lo;alsod xqYeksa के समादे"Vkओं के आदेश। --- भाग-1-ख—मैट्रीकु लेशन, आई0ए0, आई0एससी0, बी0ए0, बी0एससी0, एम0ए0, एम0एससी0, लॉ भाग-1 और 2, एम0बी0बी0एस0, बी0एस0ई0, डीप0- इन-एड0, एम0एस0 और eq[rkjh परीक्षाओं के परीक्षा-फल, कार्य(cid:7059)म, छात्रवृत्ति प्रदान, आदि।

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भाग-1-ग—शिक्षा संबंधी सूचनाएं, परीक्षाफल आदि ---

भाग-2—बिहार-jkT;iky और dk;kZ/;kksa द्वारा निकाले गये विनियम, आदेश, अधिसूचनाएं और नियम आदि। ---

भाग-3—भारत सरकार, प(िcid:7391)म बंगाल सरकार और mPp U;k;ky; के आदेश, अधिसूचनाएं और नियम, 'भारत गजट' और jkT; गजटों के उ(cid:7373)रण।

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भाग-4—बिहार अधिनियम ---

विषय-सूची i"B

i"B भाग-5—बिहार विधान मंडल में पुर:LFkkपित विधेयक,उDr विधान मंडल में उपLFkkपित या उपLFkkपित किये जानेवाले प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और mDr विधान मंडल में पुर:LFkkपन के पूर्व प्रकाशित विधेयक। ---

भाग-7—संसद के अधिनियम जिनपर राष्ट्रपति की T;ss"B अनुमति मिल चुकी है। ---

भाग-8—भारत की संसद में पुर:LFkkfir विधेयक, संसद में उपLFkkपित प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और संसद में उपLFkkपित प्रवर समितियों के प्रतिवेदन और संसद में पुर:LFkkiu के पूर्व प्रकाशित विधेयक। ---

भाग-9—वि(cid:6980)ापन ---

भाग-9-क—वन विभाग की नीलामी संबंधी सूचनाएं ---

भाग-9-ख—निविदा सूचनाएं, परिवहन सूचनाएं, U;k;ky; सूचनाएं और सर्वसाधारण सूचनाएं bR;kfnA ---

पूरक

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पूरक-क

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बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 2

भाग-1 नियुक्ति, inLFkkiu] बदली, शक्ति, छु (cid:7349)ी और vU; O;fDrxr सूचनाएं। —————

(cid:356)ामीण िवकास िवभाग

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अिधसूचना 22 सितम्बर 2020 सं0 (cid:356)ा0कव0-14(द0)मधु0-सू0अ0-07/2019-294293/(cid:356)ा0कव0--(cid:373)ी तेज (cid:366)ताप त्यागी, तत्कालीन (cid:366)खंड कवािस पदाकधािरी, मधेपुर, कजला-मधुबनी ेि कव(cid:349)(cid:544) राज्य सूचना आर्योग, कबहार, पटना ेि (cid:466)ापांि- 2851 कदनांि 25.07.2019 (cid:554)ारा (cid:366)कतवेकदत वाद संख्या-A 4511/2018 म(cid:336) राज्य सूचना आर्योग, कबहार, पटना ेि आदे कदनांि 15.07.2019 ेि आर्लोि म(cid:336) सूचना ाि अकधािर अकधकनयम-2005 ीि धारा 20(2) ेि तहत समय अनुसार सूचना नही ं (cid:366)दान रिने ेि आर्रोप म(cid:336) (cid:373)ी त्यागी से स्पष्टीकरण ीि मँग ीि गयी । (cid:373)ी त्यागी ेि प(cid:361)ांि-297 कदनांि 09.03.2020 से समकप(cid:330)त स्पष्टीकरण कवभाग (cid:554)ारा समी(cid:407)ा ीि गयी। समी(cid:407)ा ेि (cid:354)म पाया गया कि (cid:373)ी त्यागी मह(cid:533)पूण(cid:330) ासीिय दाकयत्वं ाि कनव(cid:330)हन न रिने ेि कलए जिम्मेवार ह(cid:339)। उन्हें राज्य सूचना आर्योग, ेि कनदें ाि पालन नही ं रिने ेि ािरणं से अपने वरीय पदाकधािरी र्ोि ससमय अवगत रिाना चाकहए था।

सम्यक विचारोपरान्त (cid:373)ी त्यागी ेि उक्त चूि ेि कलए 'चेतावनी' ाि दं ड कदया जाता है। उक्त आदे पर स(cid:407)म (cid:366)ाकधािर ाि अनुर्मोदन प्राप्त है।

कबहार-राज्यपाल ेि आदे से,

रा(cid:352)ल रं जन मिहवाल, कवेष सकचव।

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पथ निर्माण विभाग

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अधिसूचनाएं

28 सितम्बर 2020

सं0 निग/सारा-4(पथ) पु॰भ॰नि॰ (नि॰वि॰)-03/2015-5648(S)--श्री जीवेन्द्र प्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पुलिस भवन निर्माण निगम, मुजफ्फरपुर, सम्प्रतिः निलंबित कार्यपालक अभियंता, अभियंता प्रमुख का कार्यालय, पथ निर्माण विभाग, बिहार, पटना के द्वारा पुलिस भवन निर्माण निगम, मुजफ्फरपुर प्रमंडल के पदस्थापन काल में परिवादी से रिश्वत लेते हुए निगरानी अन्वेषण ब्यूराें, पटना के गठित धावादल द्वारा दिनांक 16.07.2015 को रंगे हाथ गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजे जाने तथा निगरानी थाना कांड संख्या-56/15 दिनांक 16.07.15 धारा-7/13 (2) सहपठित धारा-13 (1) (डी) भ्र0नि0अधि0, 1988 दर्ज किये जाने संबंधी आरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-8001 दिनांक 24.08.2015 द्वारा हिरासत में लिये जाने की तिथि दिनांक 16.07.2015 के प्रभाव से निलंबित करते हुए एतद्‌्‌ संबंधी आरोपों के लिए प्रपत्र-''क'' गठित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-8441 (एस) अनु॰, दि॰ 04.09.2015 के द्वारा अपर विभागीय जाँच आयुक्त के अधीन विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। 2. श्री सिंह के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के तहत्‌ ही पुलिस भवन निर्माण निगम के अन्तर्गत राजगीर प्रमंडल के पदस्थानकाल के दौरान उनके विरूद्ध राजगीर, तेलहाड़ा, कतरीसराय एवं हिलसा में हेलीपैड के निर्माण के क्रम में स्वीकृत स्थल के बदले परिवर्तित स्थल पर बिना सक्षम पदाधिकारी से आदेश प्राप्त किये तथा स्थल चित्र का जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक से बिना अनुमोदन कराये कार्य कराये जाने संबंधी कुल-4 आरोप भी पूरक आरोप के रूप में गठित करते हुए संकल्प ज्ञापांक-10247, दिनांक 06.11.2015 द्वारा शामिल किया गया। 3. उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-452/गो॰, दिनांक 06.08.2019 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध गठित पूरक आरोप, जो राजगीर, तेलहाड़ा, कतरीसराय एवं हिलसा में हेलीपैड के निर्माण के क्रम में स्वीकृत स्थल के बदले परिवर्त्तित स्थल पर बिना सक्षम पदाधिकारी से आदेश प्राप्त किये तथा स्थल चित्र का जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक से बिना अनुमोदन के कार्य कराये जाने से संबंधित है- के बिन्दु पर यह निष्कर्ष दिया गया है कि आरोपी पदाधिकारी ने कुल चार जगहों पर हेलीपैड का निर्माण कराये जाने के प्रकरण में स्थल परिवर्त्तन के कारणों का उल्लेख किया है तथा संबंधित पदाधिकारी से सहमति प्राप्त कर ही निर्माण3 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 स्थल बदला गया। तद्‌नुसार संचालन पदाधिकारी के द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध गठित पूरक आरोपों को अप्रमाणित होने का निष्कर्ष दिया गया है। 4. इसके अतिरिक्त श्री सिंह के विरूद्ध गठित मूल आरोप के बिन्दु पर संचालन पदाधिकारी के द्वारा जाँच प्रतिवेदन के तहत निष्कर्ष दिया गया है कि संवेदक श्री सुनील कुमार के द्वारा सिवान जिला के बसंतपुर थाना भवन का निर्माण कराये जाने के मामले में कोई विपत्र श्री सिंह के स्तर पर C & P (Check & Pass) हेतु लंबित नहीं था। इस बिन्दु पर श्री सिंह के विरूद्ध दोष प्रमाणित नहीं होता है। परन्तु निगरानी अन्वेषण ब्यूरों की टीम (धावा दल) द्वारा रिश्वत्‌्‌ लेते पकड़ेे जाने के बिन्दु पर संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन के तहत यह निष्कर्ष दिया गया है कि संवेदक द्वारा किये गये कार्य की नापी कराने तदोपरांत अन्तिम भुगतान के पूर्व श्री सिंह द्वारा रिश्वत्‌्‌ की मांग की गयी एवं निगरानी धावा दल द्वारा श्री सिंह को साक्षात रिश्वत्‌ लेते हुए पकड़ा गया। इसलिए श्री सिंह के विरूद्ध रिश्वत्‌्‌ लेने का आरोप प्रमाणित होता है। 5. संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षा की गई। समीक्षोंपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा मूल आरोप एवं पूरक आरोपों के संदर्भ में दिये गये निष्कर्ष से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक- 10085 (एस) अनु॰ दिनांक 21.11.2019 द्वारा श्री सिंह से द्वितीय कारण-पृच्छा की मांग की गयी। श्री सिंह के पत्रांक- 01/कैम्प, दिनांक 03.01.2020 द्वारा समर्पित द्वितीय कारण-पृच्छा उत्तर की सम्यक समीक्षा में श्री सिंह द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्क को सुसंगत तथ्यों एवं साक्ष्यों पर आधारित नहीं पाया गया। फलतः श्री सिंह के विरूद्ध रिष्वत्‌ लेने का आरोप प्रमाणित पाये जाने की स्थिति में श्री सिंह के द्वितीय कारण-पृच्छा उत्तर को विचारणीय नहीं पाते हुए अस्वीकृत करने एवं गंभीर कदाचार का दोषी पाते हुए इनके विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली-2005 यथा संशोधित 2007 के नियम-14 (xi) के तहत्‌ सेवा से बर्खास्तगी के दण्ड प्रस्ताव पर सक्षम अनुशासनिक प्राधिकार के रूप में माननीय मुख्यमंत्री का अनुमोदन प्राप्त किया गया। 6. सरकार का उक्त निर्णय वृहददंड की श्रेणी में होने की स्थिति में एतद्‌ संबंधी अनुमोदित दंड प्रस्ताव पर विभागीय पत्रांक-2430 (एस) दिनांक 24.04.2020, द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग से सहमति/परामर्श की अपेक्षा की गयी। बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा अपने पत्रांक-1068 दिनांक 18.08.2020 द्वारा श्री सिंह को सेवा से बर्खास्त करने संबंधी विभागीय दंड प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त किया गया। 7. तद्‌ालोक में श्री जीवेन्द ्रप्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पुलिस भवन निर्माण निगम, मुजफ्फरपुर, सम्प्रतिः निलंबित कार्यपालक अभियंता, अभियंता प्रमुख का कार्यालय, पथ निर्माण विभाग, बिहार, पटना के विरूद्ध रिश्वत लेने का आरोप प्रमाणित पाये जाने के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली-2005 यथा संशोधित 2007 के नियम-14 (xi) में निहित प्रावधानों के अनुसार इन्हें सेवा से बर्खास्त करने के प्रस्ताव पर मंत्री परिषद्‌ की स्वीकृति प्राप्त की गयी। उक्त स्वीकृति के आलोक में श्री जीवेन्द्र प्रसाद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पुलिस भवन निर्माण निगम, मुजफ्फरपुर, सम्प्रतिः निलंबित कार्यपालक अभियंता, अभियंता प्रमुख का कार्यालय, पथ निर्माण विभाग, बिहार, पटना को उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही में प्रमाणित आरोपों के लिए निम्न दण्ड संसूचित किया जाता हैः-

(i) तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, (ह॰) अस्पष्ट, विशेष सचिव।

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24 सितम्बर 2020

सं0 निग/सारा-4(पथ)-आरोप-32/2020-5532(S)--पथ प्रमंडल, पूर्णियाँ अन्तर्गत IRQP के तहत पलसा-काली मंदीर से बरैली पथ के कि॰मी॰ 0.00 से 10.00 (P) तक CMBD अन्तर्गत कराये गये कार्यो की उड़नदस्ता प्रमंडल संख्या-3, के द्वारा जाँचोपरांत समर्पित तत्‌संबंधी प्रारंभिक/गुणवत्ता जाँच प्रतिवेदन की विभागीय तकनीकी समिति के द्वारा समीक्षोंपरांत उपलब्ध कराये गये अनुसंशा के अनुरूप आलोच्य पथ में पायी गयी कतिपय त्रुटियों/अनियमितताओं के लिए विभागीय पत्रांक-9582 (S)We दिनांक 18.12.2018 द्वारा पूछे गये स्पष्टीकरण के आलोक में श्री प्रभाशंकर कोकिल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पथप्रमंडल, पूणियाँ सम्प्रति अधीक्षण अभियंता, पथ निर्माण विभाग, पूर्व बिहार पथ अंचल, भागलपुर के पत्रांक- 396 अनु॰दिनांक- 07.03.2019 द्वारा स्पष्टीकरण उत्तर समर्पित किया गया। 2. प्रश्नगत मामले में उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षा के क्रम में निम्न त्रुटियाँ पायी गयीः- (i) आलोच्य पथ के कि॰मी॰ 7वें, में कराये गये SDBC Gr-II एवं BM Gr-II कार्य में प्रयुक्त अलकतरा की औसतन मात्रा क्रमशः 3.407% एवं 2.76% पाया गया है, जो विभाग द्वारा निर्धारित विचलन के साथ अनुमान्य मात्रा के अनुरूप नहीं है।

3. वर्णित पायी गयी त्रुटियों के संदर्भ में श्री कोकिल द्वारा स्पष्टीकरण समर्पित किया गया। जिसके तहत्‌ मुख्य रूप से आलोच्य कार्य संपन्न होने के पश्चात्‌ TRI के द्वारा जाँच किये जाने, प्राप्त जाँचफल विश्वसनीय नहीं होने एवं सम्पादित Bituminous परत पर यातायात चालू हो जाने के पश्चात्‌ Wear & Tear के कारण Bitumen में स्वभाविक रूप से कमी होने जैसे संभावनाओं पर आधारित तर्को का उल्लेख किया गया है।

4. श्री कोकिल के समर्पित स्पष्टीकरण की समीक्षा की गयी समीक्षोंपरांत पाया गया कि श्री कोकिल के द्वारा जिन व्यवहारिक/तकनीकी तर्को का संदर्भ दिया जा रहा है, वस्तुत इन्ही कारणों से विभागीय मार्गदर्शिकानुसार टॉलरेन्स अनुमान्य4 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 किया गया है, परन्तु प्रस्तुत मामले में पायी गई अलकतरा की औसत मात्रा टॉलरेन्स लिमिट से भी कम है। अतएव श्री कोकिल के समर्पित स्पष्टीकरण को अस्वीकार योग्य पाया गया। तद्‌ालोक में विभागीय स्तर पर की गयी समीक्षा में पाया गया कि श्री कोकिल के द्वारा अपने स्पष्टीकरण उत्तर में कोई ऐसा ठोस एवं खंडनयुक्त तथ्य अथवा साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिसपर युक्तिसंगत ढंग से विचार किया जा सके जिसके फलस्वरूप उनके स्पष्टीकरण को स्वीकार किये जाने का कोई अवसर प्रतीत नही होता है। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में विभागीय स्तर पर की गयी समीक्षा के उपरांत श्री कोकिल के पत्रांक-396 अनु॰ दिनांक 07.03.2019 द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण उत्तर को अस्वीकृत करते हुए सम्यक्‌ विचारोपरांत बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील नियमावली-2005) के नियम-14 के उपनियम-v के तहत निम्न शास्ति अधिरोपित किये जाने का निर्णय लिया जाता है। (1) ''एक वार्षिक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, (ह॰) अस्पष्ट, विशेष सचिव।

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23 सितम्बर 2020

सं0 निग/सारा-4 (पथ) आरोप-34/15-5524 (S)--श्री अजय कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, पथ प्रमंडल संख्या-1, मुजफ्फरपुर सम्प्रति : सहायक अभियंता, पथ अवर प्रमंडल, पीपरा (सुपौल) द्वारा पथ प्रमंडल संख्या-1, मुजफ्फरपुर के पदस्थापन काल मे ंमुजफ्फरपुर अंतर्गत मुजफ्फरपुर-दरभंगा पुरानी पथ में कुल 350 मीटर में गैर योजना मद से कराये गये कार्यों की जाँच उड़नदस्ता प्रमंडल द्वारा की गयी एवं उड़नदस्ता द्वारा जाँचोपरांत समर्पित प्रतिवेदन के आधार पर पथ में WMM एवं BUSG की मुटाई प्रावधान से कम पाये जाने तथा BUSG कार्य में प्रयुक्त अलकतरा की औसत मात्रा में कमी पाये जाने संबंधी निम्नांकित कुल तीन आरोपों के लिए प्रपत्र-'क' गठित करते हुए श्री कुमार के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के अन्तर्गत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-7660 (एस) अनु0 दिनांक 17.08.15 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गयीः-

(i) पथ प्रमंडल संख्या-1, मुजफ्फरपुर अन्तर्गत मुजफ्फरपुर-दरभंगा पुरानी पथ के कि0मी0 8 में कराये गये WMM एवं BUSG की औसत मुटाई क्रमशः 132.75 mm एवं 41.50 mm पाई गई है जबकि प्रावधान 150 mm एवं 50 mm का है।

(ii) पथ के कि0मी0 8 में हीं BUSG कार्य में प्रयुक्त अलकतरा की औसत मात्रा 1.13 प्रतिशत पाई गई है जबकि प्रावधान न्यूनतम 1.40 प्रतिशत का है।

(iii) पथ के कि0मी0 9 में कराये गये WMM एवं BUSG की औसत मुटाई क्रमशः 91 एम0एम0 एवं 29. 50mm पाई गई है जबकि प्रावधान क्रमशः 150 mm तथा 50 mm का है।

2. उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही के तहत संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-803 अनु॰ दिनांक 27.02.2020 द्वारा उपलब्ध कराये गये जाँच प्रतिवेदन में श्री कुमार के विरूद्ध प्रपत्र-'क' के तहत गठित सभी आरोपों को अप्रमाणित प्रतिवेदित किया गया। उक्त आरोप संख्या-(i) एवं (iii) को संचालन पदाधिकारी के द्वारा इस आधार पर अप्रमाणित पाया गया है कि चूँकि आरोपों का संबंध WMM एवं BUSG की औसत मोटाई में कमी पाये जाने से संबंधित है, जबकि आरोपी गुण नियंत्रण ईकाई में सहायक अभियंता के रूप में पदस्थापित रहे हैं अर्थात इन आरोपों का संबंध कार्य अवर प्रमंडल में पदस्थापित सहायक अभियंता से है। 3. आरोप संख्या-2 को संचालन पदाधिकारी के द्वारा मुख्य रूप से इस आधार पर अप्रमाणित होने का निष्कर्ष दिया गया है कि BUSG कार्य Manual होने के कारण अलकतरा की मात्रा कम अथवा ज्यादा हो सकता है। जैसे पथ के 8वें कि॰मी॰ में औसत 1.13 प्रतिशत एवं पथ के 9वें कि॰मी॰ में औसत 1.86 प्रतिशत पाया गया है। 4. संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षा की गयी। समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी के द्वारा आरोप अप्रमाणित प्रतिवेदित किये जाने के गठित निष्कर्ष/मंतव्य से सहमत होते हुए श्री अजय कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता (अनुश्रवण), अतिरिक्त प्रभार गुण नियंत्रण ईकाई, पथ प्रमंडल संख्या-1, मुजफ्फरपुर सम्प्रतिः सहायक अभियंता, पथ अवर प्रमंडल, पीपरा (सुपौल) कोसम्यक्‌ विचारोपरांत प्रपत्र-'क' के तहत गठित आरोपों से मुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, (ह॰) अस्पष्ट, विशेष सचिव।5 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 जल संसाधन विभाग ------- अधिसूचनाएं 21 नवम्बर 2019 सं॰ 22/नि॰सि॰(डि॰) 14-01/2014-2394--श्री आदित्य नारायण झा 'अनल', (आई0डी0-1953) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, नावानगर, सम्प्रति (सेवानिवृत) के पदस्थापन अवधि में रोहतास (सासाराम) मलई बराज के निर्माण कार्य में बरती गई अनियमितता के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-447 दिनांक 12.02.15 द्वारा बिहार नियमावली के नियम 43 (बी0) के तहत निम्न आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री अनल से निम्न आरोप के लिए प्रपत्र 'क' के साथ स्पष्टीकरण की माँग की गयीः-

आरोप सं0-1. मलई बराज योजना में Finish Rate पर बोल्डर पीचिंग/Stone metal filter supply and Rate में तोड़कर प्रक्कलन (सं0-SCMC-4701-04/2012-13 एवं SCMC-4701-01/2013-14) तैयार एवं अग्रसारण हेतु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका-6.1.0,6.3.0,6.6.0 के आलोक में आप द्रष्टया दोषी प्रतीत होते है।

आरोप सं0-2. मलई बराज योजना में Inferior Quality के बोल्डर की आपूर्ति लेकर (जिसकी निकट में आवश्यकता नहीं है और जिसका ज्यादा हिस्सा Specification के अनुरूप नहीं है) तथा नकशे के अनुरूप Stone Metal की आवश्यकता नहीं होने पर भी उसका संवेदक को रू0-48,45,670,40/- का भुगतान किया जाना एवं दोनों एकरारनाम के विरूद्ध कुल मिलाकर रू0-1,71,78,746.00/- के अनुत्पादक व्यय के लिए उड़नदस्ता अंचल के जाँच प्रतिवेदन की कंडिका-6.2.0,6.5.0 एवं 6.6.0 के आलोक में आप प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत होते है।

आरोप सं0-3. मलई बराज के दायॉ एवं बायां गाइड बांध के कार्यादेश की तिथि 15.12.2012 के लगभग 3 महीने के बाद दिनांक-16.03.2013 को एकरारनामा संपादित कराया जाना किसी भी परिस्थिति में नियमानुकूल से पूर्व ही आपके द्वारा दिये गये कार्यादेश से उत्पन्न जटिलताओं का विभाग को सम्भवतः निकट भविष्य में सामना करना पड़ सकता है। उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन के कंडिका-6.4.0,6.13.0 के आलोक में आप प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते है।

आरोप सं0-4. आपूर्ति लिए गये बोल्डर एवं स्टोन मेटल जॉच की तिथि में बिना लोकेशन डिटेल के अव्यवस्थित रूप से जहां-तहां स्टैकनुमा डम्प किये थे जिससे उनकी मापी नहीं ली जा सकी। एकरारनामा के लगभग 3 महीने पूर्व कार्यादेश निर्गत कर लिय गये उक्त आपूर्ति को वैध की श्रेणी में नही माना जा सकता है। इस स्थिति को उत्पन्न करने के लिए एवं काल्पनिक स्टेक की मापी तथा काल्पनिक Void के अनुसार विपत्र तैयार करने और भुगतान करने के लिए उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन की कंउिका-6.7 एवं 6.8 के आलोक में आप प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते है।

आरोप सं0-5. प्राक्कलन में Quarrysite का जिक्र नहीं किया गया है। भुगतान के पहले कार्यपालक अभियंता द्वारा खदान से सटैक प्वांइट तक की लीड (देरी) से सत्यापन/जांच स्वयं या सक्षम प्राधिकार द्वारा कर लेना अनिवार्य था। वास्तविक दूरी एकरारित लीड से काफी कम है। अतएव Excess Lead के लिए रूपये-40,37,260.00/- Excess भुगतान (प्राक्कलन में वर्णित Carrige Charge) गणना के आधार पर हुआ। उक्त किये गये Extra भुगतान जांच प्रतिवेदन की कंडिका 6.9.0 के आलोक में आप प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते है।

आरोप सं0-6. गुण नियंत्रण प्रतिवेदन की अनुपलब्धता की स्थिति में भुगतान किये गये विपत्रों में Quality Control के लिए आवश्यक मानक राशि की कटौती कर लिया जाना था जो नहीं किया गया। इसके लिए उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका-6.2.0 के आलोक में आप प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते है।

आरोप सं0-7. बिना विधिवत रूप से सामग्रियों को लेखा में लिए किसी आपूर्ति मद (Supply item) का भुगतान किया जाना किसी भी प्रकार से नियमानुकूल नहीं है। इसके लिए उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन की कंडिका 6.11.0 के आलोक में आप प्रथम द्रष्टया दोषी प्रतीत होते है। उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा उपरोक्त आरोपों को प्रमाणित पाया गया । संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जॉच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। श्री अनल से विभागीय पत्रांक-266 दिनांक-21. 02.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा भी पूछा गया किन्तु श्री अनल द्वारा द्वितीय कारणपृच्छा का जवाब अभी तक नहीं समर्पित किया गया अतः संचालन पदाधिकारी द्वारा प्राप्त प्रतिवेदन की समीक्षा की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए निम्न दंड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गयाः- ''पेशन से 20 प्रतिशत की कटौती 10 साल तक।'' उक्त दंड निर्णय पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णित दंड पर बी0पी0एस0सी0 के पत्रांक-1160 दिनांक-14.8.19 द्वारा सहमति प्रदान की गई है। अतएव श्री आदित्य नारायण झा 'अनल' को निम्न दंड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है। ''पेशन से 20 प्रतिशत की कटौती 10 साल तक।''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 6

28 नवम्बर 2019

सं0 22/नि0सि0(वीर0)-07-10/2017-2458--श्री प्रकाश दास (आई0डी0-3844) मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, वीरपुर के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध पश्चिमी तटबंध प्रमंडल, निर्मली के अधीन विस्तारित सिकरहट्टा मंझारी निम्न बाँध के कि0मी0 6.00 से 11.20 एवं 12.30 से 13.55 के बीच बाढ़ 2017 के पूर्व कराये जा रहे कटाव निरोधक कार्य (एजेण्डा सं0 WKE/N/01/2017 एवं 02/17) को माननीय मंत्री महोदय, प्रधान सचिव एवं विभागीय वरीय पदाधिकारी के स्थलीय जॉच में त्रुटि पाये जाने के फलस्वरूप मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा की गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जॉच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत निम्न आरोप के लिए श्री प्रकाश दास से विभागीय पत्रांक 1404 दिनांक 23.08.2017 द्वारा प्रपत्र "क" गठित करते हुए स्पटीकरण की मॉग की गई। (1) "आलोच्य कार्य के अंतर्गत कि0 मी0 9.40 स्टड पर वर्ष 2017 बाढ़ पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्य के प्राक्कलन में छह मीटर की लंबाई में नोज के D-portion के बाद 12 (बारह) मीटर से घटाते हुए छह मीटर चौड़ाई में D/S 'Shank' का प्रावधान है, जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई है। कोशी उच्च स्तरीय समिति/योजना समिति द्वारा BIS Code के अनुसार नोज U/S Shank एवं D/s Shank बनाकर 9.40 कि0मी0 स्थित स्टड का Restoration बोल्डर क्रेट से करने की अनुशंसा की गयी है। मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, वीरपुर से प्राप्त वीरपुर प्रक्षेत्र में कोशी नदी के लिए पूर्व एवं वर्तमान में स्वीकृत किये जा रहे स्पर के Restoration निर्माण के प्रस्ताव से संबंधित नक्शा में D/S Shank की लंबाई 38मी0 (U/S Shank की लंबाई का 50%) होना परिलक्षित होता है। जबकि आलोच्य कार्य के स्वीकृत प्राक्कलन में U/S Shank की लंबाई 70 मी0 एवं D/S Shank की लंबाई 6मी0 रखी गयी है। अध्यक्ष विशेष जाँच दल ने भी 30-05-17 के स्थलीय निरीक्षण के दौरान स्टड के D/S में मात्र 6मी0 का प्रावधान को कम पाते हुए इसे बढ़ाकर नदी के किनारे तक ले जाकर सुरक्षात्मक कार्य कराये जाने की अनुशंसा की गई है। इस प्रकार 9.40कि0मी0 स्टड के डाउन स्ट्रीम शैंक का पुनस्र्थापन प्रस्ताव/प्राक्कलन में BIS code/रूपांकण/मानक के विपरीत पर्याप्त लंबाई से कम लंबाई का डाउन स्ट्रीम शैंक का प्रावधान, अनुशंसा, जाँच एवं स्वीकृत किये जाने का मामला बनता प्रतीत होता है, जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत होते हैं।"

श्री प्रकाश दास से प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। इनके द्वारा कहा गया है कि विस्तारित सिरकहट्टा मंझरी निम्न बाँध के कि0मी0 9.40 पर पूर्व से स्टड निर्मित है, न कि स्पर/नदी के बहाव को तटबंध से दूर रखने हेतु स्टड का निर्माण किया गया है।

इनके द्वारा कहा गया है कि स्टड निर्माण/पुनस्र्थापन के लिए कोई BIS code निर्धारित नहीं है। इस संरचना की उत्पति स्थानीय अनुभवों एवं आवश्यकताओं के आधार पर कालखंड में हुआ है, जबकि स्पर के लिए BIS code 8408 निर्धारित है। प्रसंगाधीन योजना में Restoration of Shank एवं Nose by boulder crate BIS code के अनुरूप किये जाने का प्रश्न है। यह मात्र नदी तल में होने वाले अधिकतम Scour के अनुरूप एप्रोन में cum/m बोल्डर की मात्रा निर्धारण करने के उद्‌देश्य से है। यह एक Restoration योजना है जो पूर्व से निर्मित थी। इसमें कही भी Shank की लंबाई में Extension की अनुशंसा नहीं की गई है।

उक्त की समीक्षा के आलोक में अध्यक्ष तकनीकी सलाहकार समिति सह मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध, पटना सह अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध पटना सह अभियंता प्रमुख, सिंचाई सृजन, पटना के स्टड के पुनस्र्थापन/निर्माण कार्य हेतु BIS Code लागू होता है अथवा नहीं। अगर होता है तो उसकी प्रति मंतव्य के साथ विभागीय पत्रांक-2419, दिनांक 26.11.18 से माँग की गयी थी। जिसके अनुसार स्टड के पुनस्र्थापन/निर्माण कार्य हेतु BIS Code निर्धारित नहीं है। फलस्वरूप इसके लागू होने का मामला नहीं बनता है।

विभागीय समीक्षा में पाया गया कि SRC के अनुशंसा के विपरीत प्रश्नगत स्टड के पुनस्र्थापन कार्य का प्राक्कलन की अनुशंसा करने एवं स्वीकृत करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।

उपरोक्त वर्णित स्थिति में श्री प्रकाश दास, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, वीरपुर से प्राप्त स्पष्टीकरण को स्वीकार करने का निर्णय विभाग के स्तर पर लिया गया है।

अतः उक्त निर्णय के आलोक में श्री प्रकाश दास, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, वीरपुर से प्राप्त स्पष्टीकरण को स्वीकार किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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28 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(वीर0)-07-10/2017-2457--श्री दिनेश प्रसाद (आई0डी0-3274) तत0 अधीक्षण अभियंता, कोशी बराज अंचल, वीरपुर के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध पश्चिमी तटबंध प्रमंडल, निर्मली के अधीन विस्तारित सिकरहट्टा मंझारी निम्न बाँध के कि0मी0 6.00 से 11.20 एवं 12.30 से 13.55 के बीच बाढ़ 2017 के पूर्व कराये जा रहे कटाव निरोधक कार्य (एजेण्डा सं0 WKE/N/01/2017 एवं 02/17) को माननीय मंत्री महोदय, प्रधान सचिव एवं विभागीय वरीय पदाधिकारी के स्थलीय जॉच में त्रुटि पाये जाने के फलस्वरूप मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा की गई। उड़नदस्ता7 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 से प्राप्त जॉच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत निम्न आरोप के लिए श्री प्रसाद से विभागीय पत्रांक 1406 दिनांक 23.08.2017 द्वारा प्रपत्र "क" गठित करते हुए स्पटीकरण की मॉग की गई।

(1) "आलोच्य कार्य के अंतर्गत कि0 मी0 9.40 स्टड पर वर्ष 2017 बाढ़ पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्य के प्राक्कलन में छह मीटर की लंबाई में नोज के D-portion के बाद 12 (बारह) मीटर से घटाते हुए छह मीटर चौड़ाई में D/S 'Shank' का प्रावधान है, जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई है। कोशी उच्च स्तरीय समिति/योजना समिति द्वारा BIS Code के अनुसार नोज U/S Shank एवं D/s Shank बनाकर 9.40 कि0मी0 स्थित स्टड का Restoration बोल्डर क्रेट से करने की अनुशंसा की गयी है। मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, वीरपुर से प्राप्त वीरपुर प्रक्षेत्र में कोशी नदी के लिए पूर्व एवं वर्तमान में स्वीकृत किये जा रहे स्पर के Restoration निर्माण के प्रस्ताव से संबंधित नक्शा में D/S Shank की लंबाई 38मी0 (U/S Shank की लंबाई का 50%) होना परिलक्षित होता है। जबकि आलोच्य कार्य के स्वीकृत प्राक्कलन में U/S Shank की लंबाई 70 मी0 एवं D/S Shank की लंबाई 6मी0 रखी गयी है। अध्यक्ष विशेष जाँच दल ने भी 30-05-17 के स्थलीय निरीक्षण के दौरान स्टड के D/S में मात्र 6मी0 का प्रावधान को कम पाते हुए इसे बढ़ाकर नदी के किनारे तक ले जाकर सुरक्षात्मक कार्य कराये जाने की अनुशंसा की गई है। इस प्रकार 9.40कि0मी0 स्टड के डाउन स्ट्रीम शैंक का पुनस्र्थापन प्रस्ताव/प्राक्कलन में BIS code/रूपांकण/मानक के विपरीत पर्याप्त लंबाई से कम लंबाई का डाउन स्ट्रीम शैंक का प्रावधान, अनुशंसा, जाँच एवं स्वीकृत किये जाने का मामला बनता प्रतीत होता है, जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत होते हैं।"

श्री प्रसाद से प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। इनके द्वारा कहा गया है कि विस्तारित सिरकहट्टा मंझरी निम्न बाँध के कि0मी0 9.40 पर पूर्व से स्टड निर्मित है, न कि स्पर/नदी के बहाव को तटबंध से दूर रखने हेतु स्टड का निर्माण किया गया है।

इनके द्वारा कहा गया है कि स्टड निर्माण/पुनस्र्थापन के लिए कोई BIS code निर्धारित नहीं है। इस संरचना की उत्पति स्थानीय अनुभवों एवं आवश्यकताओं के आधार पर कालखंड में हुआ है, जबकि स्पर के लिए BIS code 8408 निर्धारित है। प्रसंगाधीन योजना में Restoration of Shank एवं Nose by boulder crate BIS code के अनुरूप किये जाने का प्रश्न है। यह मात्र नदी तल में होने वाले अधिकतम Scour के अनुरूप एप्रोन में cum/m बोल्डर की मात्रा निर्धारण करने के उद्‌देश्य से है। यह एक Restoration योजना है जो पूर्व से निर्मित थी। इसमें कही भी Shank की लंबाई में Extension की अनुशंसा नहीं की गई है।

उक्त की समीक्षा के आलोक में अध्यक्ष तकनीकी सलाहकार समिति सह मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध, पटना सह अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध पटना सह अभियंता प्रमुख, सिंचाई सृजन, पटना के स्टड के पुनस्र्थापन/निर्माण कार्य हेतु BIS Code लागू होता है अथवा नहीं। अगर होता है तो उसकी प्रति मंतव्य के साथ विभागीय पत्रांक-2419, दिनांक 26.11.18 से माँग की गयी थी। जिसके अनुसार स्टड के पुनस्र्थापन/निर्माण कार्य हेतु BIS Code निर्धारित नहीं है। फलस्वरूप इसके लागू होने का मामला नहीं बनता है।

विभागीय समीक्षा में पाया गया कि SRC के अनुशंसा के विपरीत प्रश्नगत स्टड के पुनस्र्थापन कार्य का प्राक्कलन की अनुशंसा करने एवं स्वीकृत करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।

उपरोक्त वर्णित स्थिति में श्री प्रसाद से प्राप्त स्पष्टीकरण को स्वीकार करने का निर्णय विभाग के स्तर पर लिया गया है।

अतः उक्त निर्णय के आलोक में श्री दिनेश प्रसाद (आई0डी0-3274), तत0 अधीक्षण अभियंता, कोशी बराज अंचल, वीरपुर से प्राप्त स्पष्टीकरण को स्वीकार किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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28 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(वीर0)-07-10/2017-2456--श्री शशिभूषण प्रसाद (आई0डी0-3534) तत0 अधीक्षण अभियंता, रूपांकण आयोजन एवं मोनिटरिंग अंचल, वीरपुर सम्प्रति सेवानिवृत के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध पश्चिमी तटबंध प्रमंडल, निर्मली के अधीन विस्तारित सिकरहट्टा मंझारी निम्न बाँध के कि0मी0 6.00 से 11.20 एवं 12.30 से 13.55 के बीच बाढ़ 2017 के पूर्व कराये जा रहे कटाव निरोधक कार्य (एजेण्डा सं0 WKE/N/01/2017 एवं 02/17) को माननीय मंत्री महोदय, प्रधान सचिव एवं विभागीय वरीय पदाधिकारी के स्थलीय जॉच में त्रुटि पाये जाने के फलस्वरूप मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा की गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जॉच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत निम्न आरोप के लिए श्री प्रसाद से विभागीय पत्रांक 1405 दिनांक 23.08.2017 द्वारा प्रपत्र "क" गठित करते हुए स्पटीकरण की मॉग की गई।

(1) "आलोच्य कार्य के अंतर्गत कि0 मी0 9.40 स्टड पर वर्ष 2017 बाढ़ पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्य के प्राक्कलन में छह मीटर की लंबाई में नोज के D-portion के बाद 12 (बारह) मीटर से घटाते हुए छह मीटर चौड़ाई में D/S 'Shank' का प्रावधान है, जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई है। कोशी उच्च स्तरीय समिति/योजना समिति द्वाराबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 8 BIS Code के अनुसार नोज U/S Shank एवं D/s Shank बनाकर 9.40 कि0मी0 स्थित स्टड का Restoration बोल्डर क्रेट से करने की अनुशंसा की गयी है। मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, वीरपुर से प्राप्त वीरपुर प्रक्षेत्र में कोशी नदी के लिए पूर्व एवं वर्तमान में स्वीकृत किये जा रहे स्पर के Restoration निर्माण के प्रस्ताव से संबंधित नक्शा में D/S Shank की लंबाई 38मी0 (U/S Shank की लंबाई का 50%) होना परिलक्षित होता है। जबकि आलोच्य कार्य के स्वीकृत प्राक्कलन में U/S Shank की लंबाई 70 मी0 एवं D/S Shank की लंबाई 6मी0 रखी गयी है। अध्यक्ष विशेष जाँच दल ने भी 30-05-17 के स्थलीय निरीक्षण के दौरान स्टड के D/S में मात्र 6मी0 का प्रावधान को कम पाते हुए इसे बढ़ाकर नदी के किनारे तक ले जाकर सुरक्षात्मक कार्य कराये जाने की अनुशंसा की गई है। इस प्रकार 9.40कि0मी0 स्टड के डाउन स्ट्रीम शैंक का पुनस्र्थापन प्रस्ताव/प्राक्कलन में BIS code/रूपांकण/मानक के विपरीत पर्याप्त लंबाई से कम लंबाई का डाउन स्ट्रीम शैंक का प्रावधान, अनुशंसा, जाँच एवं स्वीकृत किये जाने का मामला बनता प्रतीत होता है, जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत होते हैं।"

श्री प्रसाद से प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। इनके द्वारा कहा गया है कि विस्तारित सिरकहट्टा मंझरी निम्न बाँध के कि0मी0 9.40 पर पूर्व से स्टड निर्मित है, न कि स्पर/नदी के बहाव को तटबंध से दूर रखने हेतु स्टड का निर्माण किया गया है।

इनके द्वारा कहा गया है कि स्टड निर्माण/पुनस्र्थापन के लिए कोई BIS code निर्धारित नहीं है। इस संरचना की उत्पति स्थानीय अनुभवों एवं आवश्यकताओं के आधार पर कालखंड में हुआ है, जबकि स्पर के लिए BIS code 8408 निर्धारित है। प्रसंगाधीन योजना में Restoration of Shank एवं Nose by boulder crate BIS code के अनुरूप किये जाने का प्रश्न है। यह मात्र नदी तल में होने वाले अधिकतम Scour के अनुरूप एप्रोन में cum/m बोल्डर की मात्रा निर्धारण करने के उद्‌देश्य से है। यह एक Restoration योजना है जो पूर्व से निर्मित थी। इसमें कही भी Shank की लंबाई में Extension की अनुशंसा नहीं की गई है।

उक्त की समीक्षा के आलोक में अध्यक्ष तकनीकी सलाहकार समिति सह मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध, पटना सह अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध पटना सह अभियंता प्रमुख, सिंचाई सृजन, पटना के स्टड के पुनस्र्थापन/निर्माण कार्य हेतु BIS Code लागू होता है अथवा नहीं। अगर होता है तो उसकी प्रति मंतव्य के साथ विभागीय पत्रांक-2419, दिनांक 26.11.18 से माँग की गयी थी। जिसके अनुसार स्टड के पुनस्र्थापन/निर्माण कार्य हेतु BIS Code निर्धारित नहीं है। फलस्वरूप इसके लागू होने का मामला नहीं बनता है।

विभागीय समीक्षा में पाया गया कि SRC के अनुशंसा के विपरीत प्रश्नगत स्टड के पुनस्र्थापन कार्य का प्राक्कलन की अनुशंसा करने एवं स्वीकृत करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।

उपरोक्त वर्णित स्थिति में श्री प्रसाद से प्राप्त स्पष्टीकरण को स्वीकार करने का निर्णय विभाग के स्तर पर लिया गया है।

अतः उक्त निर्णय के आलोक में श्री शशिभूषण प्रसाद (आई0डी0-3534), तत0 अधीक्षण अभियंता, रूपांकण आयोजन एवं मोनिटरिंग अंचल, वीरपुर सम्प्रति सेवानिवृत से प्राप्त स्पष्टीकरण को स्वीकार किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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26 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(सह0)-26-06/2018-2440--श्री अमरेन्द्र नारायण (आई0डी0-3664) तत0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर के विरूद्ध उनके पदस्थापन अवधि में सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर के तहत फुलकाहा वितरणी के बाँध कटान/टूटान की मरम्मति के नाम पर वित्तीय वर्ष 2017-18 में अनावश्यक रूप से प्राक्कलन तैयार करने संबंधी बरती गई अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल, पटना से कराई गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री नारायण से निम्न आरोप के लिए आरोप पत्र के साथ विभागीय पत्रांक-350, दिनांक 25. 02.2019 द्वारा स्पष्टीकरण की मांग की गई :-

विभागीय स्तर से शीर्ष 2245 में फुलकाहा वितरणी के विभिन्न बिन्दुओं पर हुए टूटान/कटान की मरम्मति हेतु कुल 68.861लाख रूपये की प्रशासनिक स्वीकृति निर्गत किया गया। आपात स्थिति में उक्त टूटान/कटान की मरम्मति विभागीय रूप से कराये गये कार्यों में कार्यरत श्रमिकों का भुगतान श्रम बल स्वीकृति के पश्चात मास्टर रौल पर किया गया था। परन्तु प्रश्नगत कार्य तो विभागीय स्तर पर कराये गये कार्यों का भुगतान मास्टर रौल पर नहीं कर Petty voucher के माध्यम से नियम के विरूद्ध किया गया। यहाँ तक की विभागीय रूप से कराये गये कार्यों का विभाग द्वारा दिये गये घटनोत्तर स्वीकृति जिसमें Mechanical means एवं श्रमबल के माध्यम से नियमानुसार भुगतान करने का भी निदेश दिया गया है। जिसे नियमानुकूल नहीं माना जा सकता है। अतः नियम के विरूद्ध भुगतान करने के लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। इनके द्वारा कहा गया है कि विभागीय रूप से बरसात के मौसम के कई बिन्दुओं पर क्षतिग्रस्त सेवा पथ बाधित होने की स्थिति में प्रतिवेदन एक साथ कई स्थलों पर कराये जाने वाले कार्यों/मजदूरों सीमित समय में सत्यापन कर मशीन एवं श्रम बल के आधार पर अलग कर भुगतान करना संभव नहीं होने एवं इतने बडे पैमाने पर हुए टूटान/कटान की मरम्मति सीमित तकनीकी बल के आधार पर सीमित समय में विभागीय9 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 रूप से कराने के अव्यवहारिक/असंभव मौखिक निदेश दिया गया। श्रम बल के आधार पर कार्य कराने के लिए एजेंसी के रूप में कार्यरत एक मात्र कनीय अभियंता को प्रतिदिन हर टूटान/कटान पर कम से कम दो बार मजदूराें की उपस्थिति एवं कराये गये कार्यों का सत्यापन करना आवश्यक था। जो संभव नहीं था। साथ ही नियोजित मजदूरों का भुगतान प्रतिदिन करना संभव नहीं था क्योंकि न तो आवंटन था न ही बिना पारित प्रमाणकों के कोषागार से राशि अग्रिम निकासी संभव था। ऐसे में विभागीय रूप से कार्य कराना संभव नहीं था। खरीफ पटवन के दरम्यान ही जलश्राव देकर सिंचाई कराने के बाध्यकारी विभागीय निदेश के ध्यान में रखते हुए एक मात्र उपाय Petty voucher से भुगतान किया जाना व्यवहारिक एवं संभव प्रतीत हुआ। परिस्थितिजन्य स्वीकार योग्य माना जा सकता है परन्तु अगर कनीय अभियंता/सहायक अभियंता की कमी थी तो इन्हें उच्च पदाधिकारी को अवगत कराते हुए वांछित आदेश की मांग की जानी चाहिए थी। परन्तु ऐसा कोई कार्य नहीं कर अपने मन से नियम के विरूद्ध भुगतान की प्रक्रिया अपनाया जाना परिलक्षित होता है। इनके द्वारा कहा गया है कि विभागीय पत्रांक-15, दिनांक 04.01.18 द्वारा विभागीय रूप से कार्य कराने के प्रस्ताव पर घटनोत्तर अनुमति प्रदान किया गया। जबकि टूटान कटान की मरम्मति का कार्य उच्चाधिकारियों के निदेशानुसार अगस्त 2017 में ही प्रारंभ किया गया था। विभागीय रूप से कार्य कराने के प्रस्ताव पर विभागीय अनुमति प्राप्त होने पर श्रमबल की अधियाचना एवं स्वीकृति मिलने के उपरांत Back Date में मास्टर रौल पर श्रमबल से कार्य कराया जाना संभव एवं नियमानुकूल नहीं होता तथा ससमय आवश्यक नहर मरम्मति कार्य नहीं होने से विभागीय उच्चाधिकारी द्वारा पूर्व में स्थल पर दिये गये निदेश का अनुपालन नहीं पाता, स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि इनके द्वारा उक्त प्रस्ताव दिनांक 16.12.17 को अधीक्षण अभियंता को दिया गया जबकि इनके द्वारा टूटान/कटान का कार्य विभागीय रूप से अगस्त में ही प्रारंभ किया गया है। इनका प्रथम दायित्व था कि नियमानुसार कार्य प्रारंभ करने के पूर्व ही विभागीय रूप से कार्य कराने का प्रस्ताव देते।

इनके द्वारा यह कहा जाना की वैकल्पिक व्यवस्था के तहत Petty voucher के माध्यम से भुगतान करना श्रेष्कर एवं व्यवहारिक समझा गया स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि यदि विभागीय रूप से कार्य कराने का लिखित आदेश प्राप्त नहीं था तो विभागीय रूप से कार्य कैसे प्रारंभ किया गया। अगर मौखिक रूप से विभागीय रूप से कार्य कराने का आदेश दिया गया तो उसकी सम्पुष्टि हेतु इनके स्तर से कौन सी कार्रवाई की गई का उल्लेख नहीं किया गया है। इनके द्वारा कहा गया है कि कार्य की मात्रा तथा जटिलता को देखते हुए अधिकाशतः मशीनो द्वारा कार्य कराया गया है। इस कारण Petty voucher से भुगतान किया गया है। प्राक्कलन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि प्राक्कलन में व्यवधानित कार्य मद यथा राजस्थानी ट्रैक्टर से मिट्टी भराई कार्य, EC Bag, Pitching bamboo pilling के कार्य एवं NC कार्य में मजदूरों को नियोजित करने का प्रावधान है। अतएव इनका कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री अमरेन्द्र नारायण को प्रश्नगत कार्य में नियम के विरूद्ध विभागीय रूप से कराये गये कार्यों का मास्टर रौल पर नहीं कर Petty voucher पर भुगतान कर बरती गयी प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिए दोषी प्रतीत होते हैं।

उक्त प्रमाणित आरोप के लिए सरकार द्वारा श्री अमरेन्द्र नारायण को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है :- (i) "दो वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"। उक्त निर्णय के आलोक में श्री अमरेन्द्र नारायण (आई0डी0-3664), तत0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता है :-

(i) "दो वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 26 नवम्बर 2019 सं॰ 22/नि॰सि॰(पू॰)01-04/2009-2439--श्री अमरेन्द्र कुमार अमन (आई0डी0-3483), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल नरपतगंज के विरूद्ध मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के परिक्षेत्राधीन नहर प्रमंडल, नरपतगंज के अन्तर्गत वर्ष 2000-01 में जानकी शाखा नहर के पुर्नस्थापन कार्य एवं सी0डी0 संरचना की मरम्मति संबंधित एकरारनामा सं0-25F2/2000-01 एवं 29F2/2000-01 के तहत कराये गये कार्य का भुगतान लंबित रहने के कारण संवेदक श्री किशोर जयसवाल द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में वाद सं0-14371/07 एवं 15090/07 दायर किया गया। उक्त वाद में पारित न्याय निर्णय के आलोक में दोषी पदाधिकारियों को चिन्हित करने हेतु विभागीय उड़नदस्ता से जाँच करायी गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत निम्नांकित आरोप (i) असम्बद्ध गुण नियंत्रण प्रमंडल से प्री लेवल की जाँच कराये बिना ही कार्य प्रारम्भ कर दिया गया एवं स्वंय द्वारा भी प्री लेवल की जाँच नहीं की गयी। (ii) दिनांक-26.06.2001 को कार्य समाप्त होने के पश्चात पोस्ट लेवल की जाँच बरसात पूर्व नहीं की गयी। के लिए श्री अमरेन्द्र कुमार अमन के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-576 दिनांक- 05.04.2010 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 के तहत विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ की गयी। विभागीय कार्यवाही में विभागीय जाँच आयुक्त को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जिसमें लगाये गये आरोप को प्रमाणित नहीं होने10 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 का मंतव्य दिया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी, सम्यक समीक्षोपरांत जाँच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए असहमति के बिन्दु पर श्री अमन से विभागीय पत्रांक-97 दिनांक-22.01. 2013 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। श्री अमन से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की सम्यक समीक्षोपरांत एकरारनामा सं0-25F2/2000-01 से संबंधित कार्य प्रारम्भ कराने हेतु कोई कार्रवाई नहीं करने के प्रमाणित आरोप के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया :- (i) निन्दन वर्ष 2000-01 (ii) दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। उक्त दण्ड पर माननीय मुख्यमंत्री महोदय के अनुमोदन प्राप्त करने के क्रम में माननीय मुख्यमंत्री द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर अनुमोदन नहीं देकर मामले की पुनः नये सिरे से जाँच हेतु विभागीय जाँच आयुक्त को Remand कर दिया गया। तदोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा पुनः जाँच कर जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जिसमें आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की सम्यक समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोप के लिए श्री अमन से विभागीय पत्रांक-1818 दिनांक-09.10.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी। श्री अमन से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के सम्यक समीक्षोपरांत श्री अमरेन्द्र कुमार अमन, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, नरपतगंज संप्रति अधीक्षण अभियंता को विभागीय अधिसूचना संख्या-845, दिनांक 29.04.2019 द्वारा निम्न दण्ड अधिरोपित किया गया :- ''तीन वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक''। उक्त अधिरोपित दण्ड के विरूद्ध श्री अमन द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी उपलब्ध कराया गया है जिसका मुख्य अंश निम्नवत्‌ है :- आरोप :- (i) प्रश्नगत कार्य के कार्यान्वयन के पूर्व असम्बद्ध गुण नियंत्रण प्रमंडल से प्री-लेवल की जाँच कराये बिना कार्य प्रारम्भ कर दिया गया है एवं स्वयं के द्वारा प्री-लेवल की जाँच नहीं करना।

(ii) दिनांक 26.06.2000 तक कार्य समाप्त होने के पश्चात पोस्ट लेवल की जाँच नियमानुसार नहीं की गयी। बचाव बयान :- आरोप-1 :- एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 जानकी शाखा नहर के वि॰दु॰ 40.0 से निस्तृत प्रणाली का पुनस्र्थापन एवं C.D संरचना की मरम्मति से संबंधित है जिसकी एकरारित राशि 129432/- रूपये है। जिसमें मिट्‌टी कार्य मात्र 12684/- रूपये है शेष 116745/- रूपये संरचना मरम्मति की राशि सम्मिलित है। संवेदक को पुनस्र्थापन के तहत मिट्‌टी कार्य हरहाल में 15 जून 2000 तक पूर्ण करने का आदेश दिया गया। इसी क्रम में पत्रांक 919 दि॰ 20.06.2000 द्वारा जून 2000 तक किये गये मिट्‌टी कार्य का अंतिम मापी (पोस्ट लेवल) लेने हेतु दिनांक 25.06.2000 से 30.06.2000 तक की तिथि निर्धारण की सूचना संवेदक एवं अभियंता को दी गयी। उक्त निर्धारित अवधि में एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 को छोड़कर अन्य सभी कार्यो की जाँच उनके द्वारा एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल, पूर्णिया द्वारा की गयी। कार्यकारी मौसम तक उक्त एकरारनामा से संबंधित कार्य का प्री-लेवल की जाँच हेतु माप पुस्त उपस्थापित नहीं किया गया। फलतः प्री-लेवल की जाँच उनके अथवा गुण नियंत्रण प्रमंडल से नहीं की जा सकी। 25F2/2000-2001 से संबंधित कार्य संवेदक द्वारा बरसात 2000 के पूर्व प्रारम्भ नहीं किया गया था जैसा की माप पुस्त सं॰ 155 के पृ॰ 1-4 तक में सहायक अभियंता द्वारा दिनांक 20.06.2000 में जाँचित प्री-लेवल एवं दि॰ 26.06.2000 को की गयी है। उनके पदस्थापन अवधि तक संवेदक अथवा अभियंता द्वारा कार्य कराये जाने की सूचना नहीं दी गयी। माप पुस्त 155 के पेज सं॰ 1-7 तक में कुछ प्रविष्टि कनीय अभियंता द्वारा की गयी। इसके पृ॰ 1-4 तक प्रश्नगत कार्य का प्री-लेवल है जो दि॰ 05.06.2000 को कनीय अभियंता द्वारा हस्ताक्षरित है इसकी जाँच सहायक अभियंता द्वारा 20. 06.2000 को की गयी है। उसी माप पुस्त में पृ॰ 1-4 तक जाँच सहायक अभियंता द्वारा दि॰ 20.06.2000 एवं पृ॰ 5-7 तक की जाँच दि॰ 09.06.2000 एवं 12.06.2000 का होना यह स्वयं सिद्ध करता है कि ये सारे प्रविष्टि छलपूर्ण है एवं बैक डेटिंग है। एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 से संबंधित माप पुस्त सं॰ 155 के पृ॰ 1-45 तक में प्री-लेवल एवं रेकर्ड इंट्री दर्ज है। कनीय अभियंता द्वारा इन्ट्री दिनांक 05.06.2000, 09.06.2000, 24.06.2000, 25.06.2000, 26.06.2000 एवं 27.096. 2000 में किया गया है। जो दर्शाता है कि कनीय अभियंता द्वारा प्रतिदिन कार्य की मापी अंकित की जाती थी। जिसके फलस्वरूप उनके समक्ष न तो कनीय अभियंता एवं न ही सहायक अभियंता द्वारा प्री-लेवल एवं पोस्ट लेवल की जाँच हेतु माप पुस्त प्रस्तुत की गयी और न ही कोई सूचना प्रमंडल को दी गयी। माप पुस्त 155 पेज सं॰ 29-31 से स्पष्ट है कि मिट्‌टी कार्य दिनांक 20.06.2000 से 26.06.2000 के बीच सम्पन्न किया गया है जबकि उक्त अवधि में पूरे नहर कमाण्ड क्षेत्र में अतिवृष्टि हुई है जिससे जानकी शाखा नहर एवं इससे निस्तृत प्रणालियों में 2 फीट से 2.5 फीट पानी लगे होने की सूचना उच्च पदाधिकारी को पत्रांक 960 दि॰ 28.06.2000 द्वारा दी गयी है। उनके पत्रांक 1 दि॰ 30.12.2009 से बचाव बयान देने हेतु कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्य एवं दिनांक 30.06.2000 तक कराये गये कार्यो की वित्तीय एवं भौतिक प्रगति प्रतिवेदन की माँग की गयी परन्तु उपलब्ध नहीं कराया गया।11 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 से संबंधित कार्य बरसात 2000 के पूर्व सम्पन्न नहीं कराया गया था। फलस्वरूप प्री-लेवल की जाँच नहीं की जा सकी और न ही गुण नियंत्रण प्रमंडल से करायी जा सकी। आरोप-2 :- आलोच्य अवधि में वे उक्त प्रमंडल में कार्यरत नहीं थे क्योंकि वे दिनांक 25.10.2000 को प्रभार सौंप चुके थे। नहरों के पुनस्र्थापन कार्य जिसमें मिट्‌टी कार्य भी शामिल है को विभागीय निदेशानुसार हरहाल में बरसात अवधि अर्थात जून 2000 तक पूर्ण करना था। इसके लिए अधीक्षण अभियंता द्वारा भी समय-समय पर प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से संवेदक को अगाह किया जाता रहा। इसके बावजूद भी एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-01 से संबंधित कार्य संवेदक द्वारा उनके कार्यकाल में नहीं प्रारम्भ किया गया। फलस्वरूप संबंधित किसी भी प्रकार की न तो जाँच की जा सकी न ही कार्य की प्रगति से उच्च पदाधिकारी को अवगत कराया गया। जहाँ तक माप पुस्त में प्री-लेवल एवं पोस्ट लेवल के प्रविष्टि का प्रश्न है उनके स्थानान्तरण के पश्चात बैक डेट करके 20.03.2001 को किये गये कार्य की राशि 107654/- का 40 प्रतिशत रू॰ 43062/- का भुगतान संवेदक को तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा भुगतान किया गया है। Ground of Review :- उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान आरोप से संबंधित अभिलेख की माँग किया गया। परन्तु न संचालन पदाधिकारी एवं न प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराया गया जो CCA Rule 2005 का उल्लंघन है। विभागीय जाँच के क्रम में एक भी गवाह का परिक्षण नहीं किया गया न ही प्रतिपरीक्षण का कोई अवसर दिया गया जो CCA Rule 173 (3) का उल्लंघन है। पुनः नियुक्त संचालन पदाधिकारी द्वारा मामले की जाँच निष्पक्ष रूप से नहीं किया गया। उनके बचाव बयान को अनदेखी की गयी एवं विभाग द्वारा समर्पित अभिलेख एवं अभिमत को आधार मानकर दोष सिद्ध कर दिया गया। जो नियमानुकूल नहीं है। कराये गये कार्य में किसी प्रकार का त्रुटि नहीं पाया गया, परन्तु संवेदक ने अपने लंबित भुगतान के लिये काफी विलम्ब से माननीय उच्च न्यायालय पटना में CWJC No. 14371/07 दायर किया गया। सुनवाई के क्रम में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा निदेश दिया गया है कि मामले को निगरानी ईकाई से जाँच कराकर दोषी पदाधिकरी के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज किया जाय के अनुपालन में निगरानी ईकाई द्वारा जाँच किया गया एवं उनके विरूद्ध कोई अनियमितता नहीं पायी गयी। फिर भी आरोप लगाकर वृहत दण्ड दिया गया। जो न्यायपूर्ण नहीं है। समीक्षा :- आरोप-1 :- जो वर्ष 2000-2001 में प्रमंडलाधीन एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 के तहत कराये गये मिट्‌टी कार्य का प्री-लेवल की जाँच न तो स्वयं की गयी। न ही असम्बद्ध प्रमंडल से कराये जाने से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में श्री अमन द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी में वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को अथवा द्वितीय कारण के जबाव में दिया गया है। जिसमें प्रश्नगत कार्य के प्री-लेवल की असम्बद्ध प्रमंडल एवं स्वयं के स्तर से बिना जाँच कराये ही कार्य प्रारम्भ करने का आरोप प्रमाणित पाया गया है। एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 के प्री-लेवल के जाँच के संदर्भ में कहा गया है कि इस एकरारनामा में मिट्‌टी कार्य की राशि 12684/- रूपये एवं शेष 116748/- रूपये संरचना की मरम्मति कार्य का है। परन्तु कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। यह भी कहा गया है कि पत्रांक 919 दि॰ 20.06.2000 द्वारा 15 जून 2000 तक किये गये कार्यो का अंतिम मापी लेने हेतु दिनांक 25.06.2000 से 30.06.2000 तक तिथि निर्धारित की सूचना सभी संवेदकों एवं संबंधित अभियंताओं को दी गयी है। उक्त निर्धारित अवधि में एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 को छोड़कर अन्य सभी कार्यो की जाँच उनके एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल द्वारा की गयी। कार्यकारी मौसम तक उक्त एकरारनामा से संबंधित कार्य का प्री-लेवल की जाँच हेतु माप पुस्त उपस्थापित नहीं किया गया। फलतः प्री-लेवल की जाँच नहीं हो सकी। इस कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया। यह भी कहा गया है कि कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा बरसात 2000 के पश्चात कार्य कराकर बैक डेटिंग कर माप पुस्त में प्री-लेवल अंकित कर किया गया है परन्तु उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 2.0.2 में एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 के संदर्भ में उल्लेख किया गया है कि माप पुस्त सं॰ 155 के पेज सं॰ 1-7 में प्री-लेवल की प्रविष्टि 5.6.2000 एवं पृ॰ 2 से 28 में अन्य कार्र्याे की रेकर्ड इंट्री दिनांक 14.06.2000 को की गयी है। तथा सहायक अभियंता द्वारा उक्त रेकर्ड इंट्री की भी जाँच दिनांक 20.06.2000 एवं 08.07.2000 को की गयी है। लेकिन कार्यपालक अभियंता द्वारा इसकी जाँच न तो स्वयं की गयी न ही असम्बद्ध प्रमंडल से करायी गयी। इनके द्वारा कहा गया है कि माप पुस्त सं॰ 155 के पेज सं॰ 29-31 में मिट्‌टी कार्य 20.06.2000 से 26.06.2000 के बीच सम्पन्न दिखाई गयी है। जबकि उक्त अवधि में पूरे नहर के कमाण्ड क्षेत्र में भारी अतिवृष्टि हुई है। जिससे जानकी शाखा नहर एवं इससे निस्तृत प्रणालियों में 2 फीट 2.5 फीट पानी लगे होने की सूचना उच्च पदाधिकारी को कार्यपालक अभियंता द्वारा दी गयी है। परन्तु इनके द्वारा दिनांक 20.06.2000 से 26.06.2000 के बीच अतिवृष्टि होने से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 960 दि॰ 28.06.2000 (पृ॰ 1320/प॰) के अवलोकन से स्पष्ट है कि यह पत्र दिनांक 28.06.2000 को निर्गत है इसके आधार पर स्थापित किया जाना कि दिनांक 20.06.2000 से 26.06.2000 के बीच उस क्षेत्र में अतिवृष्टि हुआ है उचित प्रतीत नहीं होता है।12 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 इनके द्वारा माप पुस्त सं॰ 155 के पेज सं॰ 5-7 पर सहायक अभियंता द्वारा दिनांक 09.06.2000 एवं 12.06.2000 एवं पृ॰ 1-4/प॰ पर दिनांक 20.06.2000 में सहायक अभियंता द्वारा किये गये हस्ताक्षर के आधार पर कहा गया है कि इनके प्रभार मुक्त होने के पश्चात बैक डेट में माप पुस्त पर मापी अंकित किया गया है स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि नियमानुसार किसी कार्य की मापी कनीय अभियंता द्वारा अंकित की जाती है जिसकी जाँच सहायक अभियंता द्वारा की जाती है। चूँकि सहायक अभियंता एक जाँच पदाधिकारी है ऐसी स्थिति में कनीय अभियंता द्वारा तिथिवार दर्ज मापी के बाद की तिथि में सहायक अभियंता द्वारा किये गये जाँच के आधार पर कहना की बैक डेट में मापी दर्ज किया गया है उचित नहीं माना जा सकता है। आरोपी द्वारा कहा गया है कि इनके समक्ष प्रश्नगत कार्य का माप पुस्त प्रस्तुत नहीं किया गया। फलतः प्री-लेवल की जाँच नहीं हो सकी स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि यदि एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 के संवेदक कार्य प्रारम्भ नहीं कर रहा था। कनीय अभियंता/सहायक अभियंता द्वारा प्री-लेवल/पोस्ट लेवल जाँच हेतु माप पुस्त उपलब्ध नहीं कराने पर इसके स्तर से की गयी कारवाई से संबंधित कोई पत्राचार का साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया। इस प्रकार इनका कथन कि एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 से संबंधित कार्य बरसात के पूर्व नहीं कराया गया है स्वीकार योग्य नहीं है। अतएव प्रश्गनत कार्य से संबंधित प्री-लेवल, पोस्ट लेवल की जाँच स्वयं के स्तर से किये बिना एवं असम्बद्ध प्रमंडल के अभियंता से कराये बगैर ही कार्य प्रारम्भ करने के लिये दोषी पाये गये है। आरोप-2 :- जो आलोच्य कार्य का दिनांक 26.06.01 को कार्य समाप्त होने के पश्चात पोस्ट लेवल की जाँच नहीं करने से संबंधित है। इनके द्वारा कहा गया है कि वे दिनांक 25.10.2000 तक ही उक्त प्रमंडल में कार्यरत थे। अतएव दिनांक 20.06.2001 को समाप्त हुए कार्य का पोस्ट लेवल की जाँच उनके मामले में अप्रासंगिक है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.0.2 से स्पष्ट है कि एकरारनामा सं॰ 29F2/2000-2001 से संबंधित माप पुस्त 136 के पेज सं॰ 35-43 पर आरोपी द्वारा पोस्ट लेवल की जाँच की गयी है परन्तु कंडिका 2.0.2 में एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 के तहत पोस्ट लेवल जाँचित नहीं है। माप पुस्त सं॰ 155 के पृ॰ 29-31 से स्पष्ट है कि एकरारनामा सं॰ 25F2/2000-2001 का कार्य वस्तुत दिनांक 26.06.2000 को समाप्त हुआ है, न कि 26.06.2009 को जिसकी जाँच इनके द्वारा किया जाना परिलक्षित नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी ने भी आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया है। इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री अमरेन्द्र कुमार अमन, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, रतवारा से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड "तीन वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" का दण्ड को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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26 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(सह0)-26-06/2018-2438--श्री दयाशंकर राय (आई0डी0-जे-7719) सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर के विरूद्ध उनके पदस्थापन अवधि में सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर के तहत फुलकाहा वितरणी के बाँध कटान/टूटान की मरम्मति के नाम पर वित्तीय वर्ष 2017-18 में अनावश्यक रूप से प्राक्कलन तैयार करने संबंधी बरती गई अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल, पटना से कराई गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री राय से निम्न आरोप के लिए आरोप पत्र के साथ विभागीय पत्रांक-348, दिनांक 25.02. 2019 द्वारा स्पष्टीकरण की मांग की गई :-

विभागीय स्तर से शीर्ष 2245 में फुलकाहा वितरणी के विभिन्न बिन्दुओं पर हुए टूटान/कटान की मरम्मति हेतु कुल 68.861लाख रूपये की प्रशासनिक स्वीकृति निर्गत किया गया। आपात स्थिति में उक्त टूटान/कटान की मरम्मति विभागीय रूप से कराये गये कार्यों में कार्यरत श्रमिकों का भुगतान श्रम बल स्वीकृति के पश्चात मास्टर रौल पर किया गया था। परन्तु प्रश्नगत कार्य तो विभागीय स्तर पर कराये गये कार्यों का भुगतान मास्टर रौल पर नहीं कर Petty voucher के माध्यम से नियम के विरूद्ध किया गया। यहाँ तक की विभागीय रूप से कराये गये कार्यों का विभाग द्वारा दिये गये घटनोत्तर स्वीकृति जिसमें Mechanical means एवं श्रमबल के माध्यम से नियमानुसार भुगतान करने का भी निदेश दिया गया है। जिसे नियमानुकूल नहीं माना जा सकता है। अतः नियम के विरूद्ध भुगतान करने के लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। इनके द्वारा कहा गया है कि विभागीय रूप से बरसात के मौसम के कई बिन्दुओं पर क्षतिग्रस्त सेवा पथ बाधित होने की स्थिति में प्रतिवेदन एक साथ कई स्थलों पर कराये जाने वाले कार्यों/मजदूरों सीमित समय में सत्यापन कर मशीन एवं श्रम बल के आधार पर अलग कर भुगतान करना संभव नहीं होने एवं इतने बडे पैमाने पर हुए टूटान/कटान की मरम्मति सीमित तकनीकी बल के आधार पर सीमित समय में विभागीय रूप से कराने के अव्यवहारिक/असंभव मौखिक निदेश दिया गया। श्रम बल के आधार पर कार्य कराने के लिए एजेंसी के रूप में कार्यरत एक मात्र कनीय अभियंता को प्रतिदिन हर टूटान/कटान पर कम से कम दो बार मजदूराें की उपस्थिति एवं कराये गये कार्यों का सत्यापन करना आवश्यक था। जो संभव नहीं था। साथ ही नियोजित मजदूरों का भुगतान प्रतिदिन करना संभव नहीं था क्योंकि न तो आवंटन था न ही बिना पारित प्रमाणकों के कोषागार से राशि अग्रिम निकासी संभव था। ऐसे में विभागीय रूप से कार्य कराना संभव नहीं था। खरीफ पटवन के दरम्यान ही जलश्राव देकर सिंचाई कराने के बाध्यकारी विभागीय निदेश के ध्यान में रखते हुए एक मात्र उपाय Petty voucher से भुगतान किया जाना व्यवहारिक एवं13 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संभव प्रतीत हुआ। परिस्थितिजन्य स्वीकार योग्य माना जा सकता है परन्तु अगर कनीय अभियंता/सहायक अभियंता की कमी थी तो इन्हें उच्च पदाधिकारी को अवगत कराते हुए वांछित आदेश की मांग की जानी चाहिए थी। परन्तु ऐसा कोई कार्य नहीं कर अपने मन से नियम के विरूद्ध भुगतान की प्रक्रिया अपनाया जाना परिलक्षित होता है। इनके द्वारा कहा गया है कि विभागीय पत्रांक-15, दिनांक 04.01.18 द्वारा विभागीय रूप से कार्य कराने के प्रस्ताव पर घटनोत्तर अनुमति प्रदान किया गया। जबकि टूटान कटान की मरम्मति का कार्य उच्चाधिकारियों के निदेशानुसार अगस्त 2017 में ही प्रारंभ किया गया था। विभागीय रूप से कार्य कराने के प्रस्ताव पर विभागीय अनुमति प्राप्त होने पर श्रमबल की अधियाचना एवं स्वीकृति मिलने के उपरांत Back Date में मास्टर रौल पर श्रमबल से कार्य कराया जाना संभव एवं नियमानुकूल नहीं होता तथा ससमय आवश्यक नहर मरम्मति कार्य नहीं होने से विभागीय उच्चाधिकारी द्वारा पूर्व में स्थल पर दिये गये निदेश का अनुपालन नहीं पाता, स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि इनके द्वारा टूटान/कटान का कार्य विभागीय रूप से पहले ही प्रारंभ किया गया है। इनका प्रथम दायित्व था कि नियमानुसार कार्य प्रारंभ करने के पूर्व ही विभागीय रूप से कार्य कराने का प्रस्ताव देते। इनके द्वारा यह कहा जाना की वैकल्पिक व्यवस्था के तहत Petty voucher के माध्यम से भुगतान करना श्रेष्कर एवं व्यवहारिक समझा गया स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि यदि विभागीय रूप से कार्य कराने का लिखित आदेश प्राप्त नहीं था तो विभागीय रूप से कार्य कैसे प्रारंभ किया गया। अगर मौखिक रूप से विभागीय रूप से कार्य कराने का आदेश दिया गया तो उसकी सम्पुष्टि हेतु इनके स्तर से कौन सी कार्रवाई की गई का उल्लेख नहीं किया गया है। इनके द्वारा कहा गया है कि कार्य की मात्रा तथा जटिलता को देखते हुए अधिकाशतः मशीनो द्वारा कार्य कराया गया है। इस कारण Petty voucher से भुगतान किया गया है। प्राक्कलन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि प्राक्कलन में व्यवधानित कार्य मद यथा राजस्थानी ट्रैक्टर से मिट्टी भराई कार्य, EC Bag, Pitching bamboo pilling के कार्य एवं NC कार्य में मजदूरों को नियोजित करने का प्रावधान है। अतएव इनका कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री दयाशंकर राय, सहायक अभियंता को प्रश्नगत कार्य में नियम के विरूद्ध विभागीय रूप से कराये गये कार्यों का मास्टर रौल पर नहीं कर Petty voucher पर भुगतान कर बरती गयी प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिए दोषी प्रतीत होते हैं।

उक्त प्रमाणित आरोप के लिए सरकार द्वारा श्री दयाशंकर राय को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है :- (i) "तीन वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"। उक्त निर्णय के आलोक में श्री दयाशंकर राय (आई0डी0-जे-7719), तत0 सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता है :-

(i) "तीन वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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26 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(सह0)-26-06/2018-2437--श्री प्रदीप कुमार पासवान (आई0डी0-3897) तत0 मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, सहरसा के विरूद्ध उनके पदस्थापन अवधि में सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर के तहत फुलकाहा वितरणी के बाँध कटान/टूटान की मरम्मति के नाम पर वित्तीय वर्ष 2017-18 में अनावश्यक रूप से प्राक्कलन तैयार करने संबंधी बरती गई अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल, पटना से कराई गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री पासवान से निम्न आरोप के लिए आरोप पत्र के साथ विभागीय पत्रांक-351, दिनांक 25.02.2019 द्वारा स्पष्टीकरण की मांग की गई :-

प्रश्नगत कार्यों के कार्यान्वयन के दौरान कटान/टूटान के मरम्मति विभागीय रूप से कराने हेतु स्थल पर निरीक्षण के दौरान आदेश दिया गया। साथ ही अधीक्षण अभियंता, सहरसा के अनुशंसा के आलोक में प्रश्नगत कार्य को विभागीय रूप से Mechanical means एवं श्रमबल के आधार पर कार्यान्वयन हेतु प्रस्ताव विभाग को दिया गया। आपके अनुशंसा के आलोक में विभागीय पत्रांक-15 दिनांक 04.01.18 द्वारा घटनोत्तर स्वीकृति प्रदान करने के संसूचन पत्र को उक्त सूचनार्थ एवं आवश्यक त्वरित कार्रवाई हेतु संंबंधित अधीक्षण अभियंता को पृष्ठांकित किया गया, इसके बाद भी आपके द्वारा श्रमशक्ति की स्वीकृति के दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई। यहाँ तक कि प्रश्नगत कार्यो का समीक्षात्मक बैठक में व्यय की समीक्षा करने के बावजूद कार्यपालक अभियंता द्वारा बिना श्रम शक्ति की स्वीकृति प्राप्त किये ही श्रमिकों का भुगतान पर व्यय किये जाने के संदर्भ में कोई टीका-टिप्पणी नहीं की गयी। इससे स्पष्ट है कि आप भली-भाँति नियम के विरूद्ध प्रश्नगत कार्य में श्रमिकों का भुगतान Master roll पर नहीं कर Petty Voucher पर किये जा रहे है। इसके बाद भी आपके द्वारा उक्त प्रक्रियात्मक त्रुटि पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। इससे स्पष्ट है कि उक्त अनियमित कृत में आपकी सहभागिता रही है जो आपके कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता एवं कार्य के प्रति लापरवाही को दर्शाता है। आपका यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली के नियम-3(1) का उल्लंघन है।

श्री पासवान से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पे की गई। श्री पासवान द्वारा कहा गया है कि वे दिनांक 22.10.17 तक ही मुख्य अभियंता, सहरसा के पद पर कार्यरत रहे हैं। अभियंता प्रमुख, सिंचाई सृजन के पत्रांक-929, दिनांक 07.09.17 के अनुपालन में कटान/टूटान की मरम्मति कार्य प्रारंभ किया गया। निरीक्षण के दौरान उनके द्वारा विभागीय रूप से कराये जा रहे कार्यों का विस्तृत आकलन कर विभागीय कार्य कराने का प्रस्ताव देने हेतु अधीक्षण अभियंता14 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 को मौखिक रूप से निदेशित किया गया लेकिन दिनांक 22.10.17 (प्रभार सौंपने की तिथि तक) उपलब्ध नहीं कराया गया। उनके कार्यकाल तक मरम्मति संबंधी भुगतान की कोई प्रक्रिया आरंभ नहीं हुई थी।

उपरोक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है। मात्र प्रभार रिपोर्ट दिया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि श्री पासवान दिनांक 22.10.17 तक मुख्य अभियंता, सहरसा के पद पर कार्यरत रहे है। प्रश्न यह भी है कि यदि कार्यपालक अभियंता/अधीक्षण अभियंता से टूटान मरम्मति का प्रस्ताव प्राप्त नहीं हो रहा था तो इनके स्तर से कौन सी कार्रवाई की गयी, का उल्लेख इनके बचाव बयान में नहीं है।

श्री पासवान द्वारा कहा गया है कि कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-1192, दिनांक 16.12.17 से कटान/टूटान की मरम्मति हेतु विभागीय रूप से कराये जाने वाली कार्यों की सम्पुष्टि के लिए आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध किया गया, जिसे मुख्य अभियंता द्वारा विभाग को Mechanical Means एवं श्रमबल के माध्यम से कार्य कराये जाने का प्रस्ताव पर विभागीय अनुमति संसूचित करने का अनुरोध किया गया। चूँकि वे दिनांक 22.10.17 को ही प्रभार सौंप दिये थे। ऐसी स्थिति में मरम्मति कार्य एवं इसकी पूर्णता तथा संबंधित भुगतान की समस्त प्रक्रिया तत0 मुख्य अभियंता श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा के समय में हुआ है। अतएव भुगतान की प्रक्रिया की प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिए उन्हें दोषी नहीं माना जाय। विभागीय नियमानुसार किसी तरह के विभागीय कार्य प्रारंभ होने के समय ही श्रम शक्ति की स्वीकृति के पश्चात मास्टर रौल निर्गत किया जाना होता है तथा प्रतिदिन कार्यरत श्रमिकों की उपस्थिति मास्टर रौल पर दर्ज की जाती है। चूँकि प्रश्नगत कटान/टूटान की मरम्मति इनके कार्यरत अवधि में प्रारंभ हुआ है। ऐसी स्थिति में श्री पासवान का दायित्व बनता था कि कटान/टूटान मरम्मति कार्य में कार्यरत श्रमिकों का श्रमबल अधियाचना कार्य0 अभि0/अधी0 अभि0 से प्राप्त कर स्वीकृति प्रदान करते। यदि कार्यपालक अभियंता द्वारा श्रमबल अधियाचना प्राप्त नहीं हो रहा था तो उनके विरूद्ध कार्रवाई करने हेतु विभाग को संसूचित करते। यह कहना कि उनके कार्यकाल में किसी तरह का भुगतान नहीं हुआ है तो उनके कार्यकाल अवधि में विभागीय रूप से कार्य कैसे कराया जा रहा था। यह विचारणीय प्रतीत होता है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री पासवान को प्रश्नगत कार्य के भुगतान नियमानुसार मास्टर रौल पर नहीं कर Petty Voucher से करने के प्रक्रियात्मक त्रुटि को रोकने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए दोषी प्रतीत होते है।

उक्त प्रमाणित आरोप के लिए सरकार द्वारा निम्न दंड देने का निर्णय लिया गया है :- (i) निन्दन वर्ष 2017-2018 उक्त निर्णय के आलोक में श्री प्रदीप कुमार पासवान (आई0डी0-3897) तत0 मुख्य अभियंता सम्प्रति अधीक्षण अभियंता, रूपांकण आयोजन एवं मोनिटरिंग अंचल, सीवान को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता है :-

(i) निन्दन वर्ष 2017-2018

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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26 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(सह0)-26-06/2018-2436--मो0 शफी अहमद (आई0डी0-3257) तत0 अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, सहरसा के विरूद्ध उनके पदस्थापन अवधि में सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर के तहत फुलकाहा वितरणी के बाँध कटान/टूटान की मरम्मति के नाम पर वित्तीय वर्ष 2017-18 में अनावश्यक रूप से प्राक्कलन तैयार करने संबंधी बरती गई अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल, पटना से कराई गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत मो0 अहमद से निम्न आरोप के लिए आरोप पत्र के साथ विभागीय पत्रांक-349, दिनांक 25.02. 2019 द्वारा स्पष्टीकरण की मांग की गई :-

प्रश्नगत कार्य का प्राक्कलन आपके स्तर से संवेदक लाभ एवं Over head charge घटाकर स्वीकृत किया गया तथा उक्त कार्यों का विभागीय रूप से कराने हेतु आपके द्वारा अनुशंसा का प्रस्ताव मुख्य अभियंता को समर्पित किया गया। तत्पश्चात विभाग से प्रश्नगत कार्य को Mechanical means एवं श्रमबल से कराने की घटनोत्तर स्वीकृति के पत्र को आपके द्वारा पृष्ठांकित करते हुए प्राक्कलन एवं अन्य अभिलेखों की माँग की गयी। इससे स्पष्ट है कि आप भली-भाँति अवगत थे कि प्रश्नगत कार्य विभागीय रूप से कराया जा रहा है। उक्त कार्यों के व्यय की समीक्षा भी की गयी, परन्तु नियमानुसार उक्त कार्य में कार्यरत श्रमिकों का श्रमशक्ति की अधियाचना एवं उसकी स्वीकृति के दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई। फलतः नियम विरूद्ध कार्यपालक अभियंता द्वारा श्रमिकों का भुगतान Master roll पर नहीं कर Petty Voucher से करने की पूरी छूट मिल गयी, जबकि आपके स्तर से विभागीय रूप से कराये जा रहे कार्यों का नियमानुसार Master roll पर भुगतान कराना चाहिए था। इससे स्पष्ट है कि उक्त प्रक्रियात्मक त्रुटि होने में आपकी सहभागिता रही है एवं आपके द्वारा अपने कर्त्तव्य का निर्वहन में लापरवाही बरती गयी है। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

मो0 अहमद से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। मो0 अहमद द्वारा अपने स्पष्टीकरण में कहा गया है कि वर्ष 2017-18 में नहर टूटान के पश्चात पत्रांक-18, दिनांक 05.01.18 द्वारा कार्यपालक अभियंता से कार्यक्रम एवं प्राक्कलन सभी वांछित अभिलेख के साथ मांग की गई। कार्यपालक अभियंता द्वारा विषयांकित कार्य का प्राक्कलन एवं कार्यक्रम वित्तीय वर्ष के अंतिम समय दिनांक 08.02.2018 को प्राप्त करायी गयी एवं श्रमबल प्राप्त नहीं कराई गई। जिसके प्राक्कलन की स्वीकृति दिनांक 16.02.18 को स्वीकृत कार्यक्रम के आधार पर दी गई। प्राक्कलन की स्वीकृति के पश्चात भी श्रमबल अधियाचना उपलब्ध नहीं कराया गया। इनके द्वारा उपलब्ध कराये गये अभिलेखों के आधार स्वीकार योग्य प्रतीत होते15 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 है। परन्तु उनका उक्त कार्रवाई कार्य समाप्ति के पश्चात की गई। जबकि मो0 अहमद टूटान मरम्मति के प्रारंभ से लेकर अंत तक प्रश्नगत कार्य का पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण किया गया है। इनका दायित्व था कि कार्य के प्रारंभ से ही कराये गये कार्यों के विभागीय नियम का अनुपालन कराते ताकि भुगतान की प्रक्रिया में किसी तरह की त्रुटि नहीं हो सके। अगर कार्य0 अभि0 द्वारा इनकी बात नहीं सुन रहे थे तो उनके विरूद्ध कार्रवाई करने की अनुशंसा करते। इनके द्वारा कहा गया है कि कार्यपालक अभियंता से Petty Voucher के आधार पर भुगतान करने की सहमति पर उनकी कोई वार्ता नहीं हुई थी एवं न ही इसके लिए कोई आदेश दिया गया है, स्वीकार योग्य प्रतीत होता है क्योंकि जाँच प्रतिवेदन अथवा कार्यपालक अभियंता द्वारा दिये गये बचाव बयान में ऐसा कोई अभिलेख नहीं है जिससे स्थापित हो सके की Petty Voucher से भुगतान करने का आदेश इनके द्वारा निर्गत किया गया है अतएव माना जा सकता है कि Petty Voucher से भुगतान होने में इनकी सहभागिता नहीं रही है परन्तु उक्त प्रक्रियात्मक त्रुटि पर रोक लगाने की दिशा में कोई कार्रवाई किया जाना प्रतीत नहीं होता है। अतएव नियम के विपरीत Master roll की जगह पर Petty Voucher पर भुगतान होने में प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिए कुछ हद तक जिम्मेवार प्रतीत होते है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में मो0 शफी अहमद, अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, सहरसा को प्रश्नगत विभागीय रूप से कराये गये कार्यों के तहत विभागीय नियम के विरूद्ध मास्टर रौल पर नहीं कर Petty voucher पर किये गये भुगतान में बरती गयी प्रक्रियात्मक त्रुटि पर रोक लगाने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं करने के लिए दोषी प्रतीत होते हैं। उक्त प्रमाणित आरोप के लिए सरकार द्वारा निम्न दंड देने का निर्णय लिया गया है :- (i) निन्दन वर्ष 2017-2018 उक्त निर्णय के आलोक में मो0 शफी अहमद (आई0डी0-3257) अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, सहरसा को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता है :-

(i) निन्दन वर्ष 2017-2018

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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26 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(सह0)-26-06/2018-2435--श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा (आई0डी0-3526) तत0 मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, सहरसा सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध उनके पदस्थापन अवधि में सिंचाई प्रमंडल, वीरपुर के तहत फुलकाहा वितरणी के बाँध कटान/टूटान की मरम्मति के नाम पर वित्तीय वर्ष 2017-18 में अनावश्यक रूप से प्राक्कलन तैयार करने संबंधी बरती गई अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल, पटना से कराई गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री शर्मा से निम्न आरोप के लिए आरोप पत्र के साथ विभागीय पत्रांक-352, दिनांक 25.02.19 द्वारा स्पष्टीकरण की माँग की गई :-

"प्रश्नगत कार्यो के क्रियान्वयन के दौरान कटान/टूटान के मरम्मति विभागीय रूप से कराने हेतु स्थल निरीक्षण के दौरान आदेश दिया गया। साथ ही अधीक्षण अभियंता, सहरसा के अनुशंसा के आलोक में प्रशनगत कार्य को विभागीय रूप से Mechanical means एवं श्रमबल के आधार पर कार्यान्वयन हेतु प्रस्ताव विभाग को दिया गया। आपके अनुशंसा के आलोक में विभागीय पत्रांक-15, दिनांक 04.01.18 द्वारा घटनोत्तर स्वीकृति प्रदान करने के संसूचना पत्र को उक्त सूचनार्थ एवं आवश्यक त्वरित कार्रवाई हेतु संबंधित अधीक्षण अभियंता को पृष्ठांकित किया गया। इसके बाद भी आपके द्वारा श्रम शक्ति की स्वीकृति के दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई। यहाँ तक कि प्रश्नगत कार्याें की समीक्षात्मक बैठक व्यय की समीक्षा करने के बावजूद कार्यपालक अभियंता द्वारा बिना श्रम शक्ति की स्वीकृति प्राप्त किये ही श्रमिकों का भुगतान पर व्यय किये जाने की संदर्भ में कोई टीका टिप्पणी नहीं की गयी। इससे स्पष्ट है कि आप भली भाँति नियम के विरूद्ध प्रश्नगत कार्य में श्रमिकों का भुगतान Master roll पर नहीं कर Petty Voucher पर किये जा रहे है। इसके बाद भी आपके द्वारा प्रक्रियात्मक त्रुटि पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। इससे स्पष्ट है कि उक्त अनियमित कृत में आपकी सहभागिता रही है जो आपके कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता एवं कार्यों के प्रति लापरवाही को दर्शाता है। आपका यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली के नियम-3(1) का उल्लंघन है।

श्री शर्मा से प्राप्त जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। श्री शर्मा द्वारा कहा गया है कि ये दिनांक 22.10. 17 को प्रभार ग्रहण करने के पूर्व ही बाढ़ वर्ष 2017 में नहर में हुए टूटान/कटान की मरम्मति का अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका था एवं श्रमिकों की उपस्थिति नियमानुसार मास्टर रौल पर बनाने हेतु कार्य प्रारंभ होने के पूर्व ही मास्टर रौल निर्गत करना होता है, स्वीकार योग्य प्रतीत होता है क्योंकि नियमानुसार किसी तरह के विभागीय रूप से कार्य कराने के पूर्व स्वीकृत प्राक्कलन/स्वीकृत श्रमशक्ति के पश्चात मास्टर रौल के आधार पर भुगतान की कार्रवाई की जानी है। चूँकि टूटान/कटान की मरम्मति इनके पदस्थापन कार्य के पूर्व से ही प्रारंभ था। ऐसी स्थिति में उपरोक्त कथन सही प्रतीत होता है। श्री शर्मा द्वारा कहा गया है कि विभागीय रूप से कार्य कराये जाने की घटनोत्तर स्वीकृति विभागीय पत्रांक-15, दिनांक 04.01.18 से संसूचन के पश्चात यह प्रकाश में नहीं लाया गया कि प्रमंडल द्वारा कार्यों का भुगतान मास्टर रौल से नहीं कराकर Petty voucher से कराया जा रहा है, स्वीकार योग्य प्रतीत होता है क्योंकि कराये गये कार्यों का किसी तरह के भुगतान की प्रक्रिया प्रमंडल स्तर पर अपनाई जाती है। मात्र कार्य पर किये गये व्यय की सूचना मुख्य अभियंता कार्यालय16 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 को दिया जाता है। चूँकि उक्त अनियमित कृत्य की सूचना न तो अधीक्षण अभियंता द्वारा दी गयी न ही कार्यपालक अभियंता द्वारा दी गई। श्री शर्मा द्वारा लगभग प्रश्नगत कार्य की समाप्ति के पश्चात मुख्य अभियंता का प्रभार ग्रहण किया गया है। श्री शर्मा द्वारा यह भी कहा गया है कि जाँच प्रतिवेदन में किसी तरह का वित्तीय अनियमितता अथवा सरकार का Pecuniary loss का मामला उजागर होने का उल्लेख नहीं है। एकमात्र निर्णायक निष्कर्ष प्रक्रियात्मक चूक की है जो कनीय अभियंता से कार्यपालक अभियंता तक ही सीमित है। नियमानुसार भुगतान कर उसकी प्रक्रिया पर पूर्ण रूप से प्रमंडल स्तर तक के पदाधिकारी की जवाबदेही है जिसकी पुष्टि लोक निर्माण लेखा संहिता के कंडिका 243, 244 एवं 245 से होती है। उपरोक्त वर्णित स्थिति में श्री शर्मा, तत0 मुख्य अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को प्रश्नगत कार्य में नियम के विपरीत कराये गये कार्यों का भुगतान मास्टर रौल पर नहीं कर Petty voucher पर करने की प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिए दोषी प्रतीत नहीं होते है। समीक्षोपरांत इनके विरूद्ध गठित आरोप से मुक्त करने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया है। उक्त निर्णय के आलोक में श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा, तत0 मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, सहरसा सम्प्रति सेवानिवृत को आरोपमुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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25 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-07/2016-2422-श्री प्रभु नारायण पाण्डेय (ID-5255), तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान वर्ष 2016 में बगहा शहर के नजदीक रतनमाला एवं पुअर हाउस में कराये गये कटाव निरोधक कार्य में बरती गई विाीय अनियमितता एवं सरकारी राशि की क्षति के लिए विभागीय अधिसूचना सं0-1527 दिनांक-27.07.2016 द्वारा श्री पाण्डेय को निलंबित किया गया एवं तदोपरांत विभागीय अधिसूचना सं0-1586 दिनांक-29.07.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 में विहित रीति से प्रपत्र-'क' गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में ही दिनांक 31.01.2017 को श्री पाण्डेय के सेवानिवृत हो जाने के कारण उन्हें दिनांक 31.01.2017 के प्रभाव से निलंबन मुक्त करते हुए उनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय अधिसूचना संख्या-475, दिनांक 06.04.2017 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) सम्परिवर्तित किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति श्री पाण्डेय को विभागीय पत्रांक-495 दिनांक-10.04.2017 द्वारा उपलब्ध कराते हुए उनसे द्वितीय कारण पृच्छा की गई। जिसमें उनसे प्राप्त जवाब के समीक्षोपरांत आरोप सं0-01, 03, 04, 06, 07, 08 एवं 09 को प्रमाणित पाया एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्शोपरांत विभागीय अधिसूचना सं0-2287, दिनांक 21.12.17 द्वारा श्री प्रभु नारायण पाण्डेय, तत्कालीन सहायक अभियंता को निम्न दण्ड संसूचित किया गया :-

"15 % पेंशन की स्थायी रूप से कटौती "

साथ ही श्री प्रभु नारायण पाण्डेय, तत्कालीन सहायक अभियंता के निलंबन अवधि के विनियमन हेतु विभागीय पत्रांक-1768 दिनांक-16.08.2018 से बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-11(5) के निहित प्रावधान के आलोक में निलंबन के पश्चात पुनः स्थापित किए जाने पर सेवा का निरूपन तथा वेतनभाा के अनुमान्यता के संबंध में अभ्यावेदन की माँग की गयी। श्री प्रभु नारायण पाण्डेय, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत से निलंबन अवधि के विनियमन के संबंध में पूछे गये स्पष्टीकरण का जवाब अप्राप्त रहने के कारण मामले की समीक्षा विभाग द्वारा की गई। समीक्षा में पाया गया कि इनके द्वारा पत्र प्राप्ति के बावजूद भी स्पष्टीकरण समर्पित नहीं किया गया। जो इस बात का परिचायक है कि इनका निलंबन औचित्यपूर्ण था। विदित हो कि कार्य समाप्ति के पश्चात विभागीय उड़नदस्ता द्वारा की गई स्थल जाँच में कई प्रकार की त्रुटियाँ पाई गई। जिसमें वित्तीय अनियमितता जैसे गंभीर आरोप भी पाया गया। समीक्षोपरांत श्री प्रभु नारायण पाण्डेय, तत्कालीन सहायक अभियंता का निलंबन अवधि के विनियमन से संबंधित अभ्यावेदन के अप्राप्त रहने के कारण निलंबन अवधि (दिनांक-27.07.2016 से दिनांक-30.01.2017 तक) को निम्नरूपेन विनियमित करने का निर्णय अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिया गया है। ''निलंबन अवधि (दिनांक-27.07.2016 से दिनांक-30.01.2017 तक) में जीवन निर्वाह भाा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी देय नहीं होगा। निलंबन अवधि कर्तव्य अवधि नहीं मानी जाएगी'' अतएव अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री प्रभु नारायण पाण्डेय, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत का निलंबन अवधि के विनियमन से संबंधित अभ्यावेदन के अप्राप्त रहने के कारण निलंबन अवधि (दिनांक-27.07.2016 से दिनांक-30.01.2017 तक) को निम्नरूपेन विनियमित करते हुए संसूचित किया जाता है। ''निलंबन अवधि (दिनांक-27.07.2016 से दिनांक-30.01.2017 तक) में जीवन निर्वाह भाा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी देय नहीं होगा। निलंबन अवधि कर्तव्य अवधि नहीं मानी जाएगी''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।17 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020

25 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-07/2016-2421--श्री अंशुमान ठाकुर (ID-3501), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान वर्ष 2016 में बगहा शहर के नजदीक रतनमाला एवं पुअर हाउस में कराये गये कटाव निरोधक कार्य में बरती गई विाीय अनियमितता एवं सरकारी राशि की क्षति के लिए विभागीय अधिसूचना सं0-1532 दिनांक-27.07.2016 द्वारा श्री ठाकुर, तत0 कार्यपालक अभियंता को निलंबित किया गया एवं तदोपरांत विभागीय अधिसूचना सं0-1585, दिनांक-29.07.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 में विहित रीति से प्रपत्र-'क' गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति श्री ठाकुर को विभागीय पत्रांक-494 दिनांक-10.04.2017 द्वारा उपलब्ध कराते हुए उनसे द्वितीय कारण पृच्छा की गई। जिसमें उनसे प्राप्त जवाब के समीक्षोपरांत आरोप सं0-01, 03, 04, 06, 07, 08 एवं 09 को प्रमाणित पाया एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना सं0-1584, दिनांक 11.09.2017 द्वारा श्री ठाकुर, को निलंबन से मुक्त किया गया एवं तत्पश्चात बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्शोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-2288, दिनांक 21.12.17 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया :-

"तीन वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"।

साथ ही श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के निलंबन अवधि के विनियमन हेतु विभागीय पत्रांक-1767 दिनांक-16.08.2018 से बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-11(5) के निहित प्रावधान के आलोक में निलंबन के पश्चात पुनः स्थापित किए जाने पर सेवा का निरूपन तथा वेतनभाा के अनुमान्यता के संबंध में अभ्यावेदन की माँग की गयी। जिसके आलोक में श्री ठाकुर द्वारा अपने पत्रांक-43 दिनांक-19.03.2019 से अपना जवाब विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बाते कही गयी है :- श्री ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध विधिवत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी ततपश्चात संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार स्तर पर की गयी। जिसके समीक्षोपरान्त उनसे द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। जिनमें उनसे प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव के समीक्षोपरान्त दण्ड संसूचित किया गया एवं बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 11(5) में निहित प्रावधान के आलोक में निलंबन के पश्चात पुनः स्थापित किये जाने पर सेवा का निरूपण तथा वेतन भत्ता की अनुमान्यता के संबंध में कहना है कि उन्हें निलंबन किया जाना उचित नहीं था। किस सरकारी सेवक को निलंबित करने के प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुसार यदि संबंधित सरकारी सेवक गंभीर कदाचार के दोषी हो तो निलंबन किया जाना है। उन्हें ऐसे आरोप में निलंबित किया गया जिसके लिये सक्षम प्राधिकार से अनुमोदन प्राप्त होने के बाद ही कार्य कराया था। सभी आरोपों का जबाव उनके द्वारा प्रथम बचाव बयान, द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में दिये गये स्पष्टीकरण एवं दण्ड पर पुनर्विचार करने पर दिये गये अपील प्रतिवेदन में विस्तृत रूप से दिया जा चुका है। मुख्यतः दर निर्धारण, एलाईमेंट एवं सामग्री की गुणवत्ता हेतु उन्हें आरोपित किया गया जबकि क्रमशः इसके लिये अंतिम रूप से संबंधित अधीक्षण अभियंता, मुख्य अभियंता एवं गुण नियंत्रण ईकाई जबावदेह है क्योंकि सारे दर अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुमोदित है एवं मुख्य अभियंता द्वारा प्राप्त निदेश के आलोक में एवं उनके देख-रेख में स्थल के रेखांकण पर कार्य कराया गया तथा गुण नियंत्रण के जाँच प्रतिवेदन के आधार पर ही विपत्र तैयार कर भुगतान किया गया है। सम्पूर्ण कार्य अवधि में अध्यक्ष अनुविक्षण दल द्वारा चार बार, कार्यपालक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-2, खगौल द्वारा दो बार, अधीक्षण अभियंता चार बार, मुख्य अभियंता दिनांक 01.04.16 को निरीक्षण किया गया था। किन्तु कार्य में किसी भी पदाधिकारी द्वारा कोई त्रुटि नहीं प्रतिवेदित की गयी। उड़नदस्ता द्वारा भी दिनांक 12.05.16 को कार्य समाप्ति के बाद स्थल का निरीक्षण किया गया एवं कार्य को प्राक्कलन एवं विशिष्टि के प्रावधान के अनुरूप पाया गया फिर भी उड़नदस्ता अंचल के प्रतिवेदन के आधार पर निलंबित किया गया। जिसकी कोई आवश्कयता नहीं थी। यह निलंबन अनुचित था। चूँकि उनका निलंबन न तो नियमानुकूल था न ही न्यायोचित था। इस स्थिति में निलंबन अवधि के अनुमान्य अन्य शेष वेतन एवं बाकी भत्तो का न मिलना उनके लिये दोहरा दण्ड साबित होगा जो न्याय के विरूद्ध है। निलंबन अवधि में निर्धारित मुख्यालय में नियमित रूप से पूर्ण कार्यालय अवधि में उपस्थित रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज करता रहा हूँ एवं जीवन निर्वाह भत्ता प्राप्त करता रहा हूँ। निलंबन के कारण मैं मानसिक यंत्रणा एवं आर्थिक तंगी से गुजर रहा हूँ।

श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से प्राप्त बचाव-बयान की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गयी। जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :- श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा कहा गया है कि इन्हें बिहार सरकारी सेवक नियमावली 2005 के नियम-9 में निहित प्रावधान के आलोक में निलंबन किया जाना उचित नहीं था क्याेंकि किसी सरकारी सेवक को निलंबित करने के प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुसार यदि संबंधित सरकारी सेवक गंभीर कदाचार का आरोप हो तो उसे निलंबित किया जाना चाहिए। परन्तु उन्हें ऐसे आरोप के लिये निलंबित किया गया जिसके लिये उन्हें सभी सक्षम प्राधिकार से अनुमोदन प्राप्त होने के बाद ही कार्य कराया गया था स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि इनके विरूद्ध गठित आरोप यथा मात्र बोल्डर ढुलाई मद में एक बड़ी राशि 69,22,650/- रूपये के अनियमित भुगतान तथा अन्य आरोप प्रावधान के अनुरूप कार्य नहीं कराकर न्यून विशिष्टि के कार्य कराने तथा गलत एलाईमेंट पर कार्य कराने के बाद भी प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने का आरोप प्रमाणित पाया गया है जो एक गंभीर वित्तीय अनियमितता है।18 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा यह भी कहा गया है कि दर निर्धारण, एलाईमेंट एवं सामग्री की गुणवत्ता हेतु इसके अंतिम रूप से संबंधित अधीक्षण अभियंता, मुख्य अभियंता तथा गुण नियंत्रण ईकाइ जबावदेह है। क्योंकि सभी दर अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुमोदित है एवं मुख्य अभियंता द्वारा दिये गये निदेश के आलोक में स्थल का रेखांकण कर कार्य कराया गया है स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं हेाता है क्योंकि गलत दर अनुमोदित करने एवं एलाईमेंट स्वीकृति के दिशा में कारवाई नहीं करने के लिये कार्य में संलग्न अधीक्षण अभियंता, श्री अरूण कुमार एवं एलाईमेंट अनुमोदन नहीं करने के लिये तत्कालीन मुख्य अभियंता, श्री कैलु सरदार के विरूद्ध भी विभागीय कार्यवाही संचालित है। साथ ही गुण नियंत्रण ईकाई के विरूद्ध कारवाई करने हेतु स्पष्टीकरण किया गया है।

श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा यह भी कहा गया है कि कार्य के कार्यान्वयन के दौरान अध्यक्ष, अनुवीक्षण दल द्वारा कुल चार बार, कार्यपालक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-2, खगौल द्वारा दो बार अधीक्षण अभियंता, मोतिहारी द्वारा चार बार तथा मुख्य अभियंता द्वारा एक बार स्थल निरीक्षण किया गया किन्तु कार्य में किसी भी पदाधिकारी द्वारा कोई त्रुटि नहीं प्रतिवेदित किया गया। स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि उपरोक्त पदाधिकारी के द्वारा स्थल निरीक्षण में कोई त्रुटि को इंगित नहीं करने से कार्य प्रावधान के अनुरूप हुआ है माना जाना उचित नहीं है। विदित हो कि कार्य समाप्ति के पश्चात विभागीय उड़नदस्ता द्वारा की गयी स्थल जाँच में कई प्रकार की त्रुटियाँ पायी गयी। जिसमें वित्तीय अनियमितता जैसे गंभीर आरोप भी पाया गया। अतएव श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का अभ्यावेदन स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है।

समीक्षोपरांत श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का निलंबन अवधि के विनियमन से संबंधित अभ्यावेदन को स्वीकार योग्य नहीं पाते हुए निलंबन अवधि (दिनांक-27.07.2016 से दिनांक-10.09.2017 तक) को निम्नरूपेन विनियमित करने का निर्णय अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिया गया है। ''निलंबन अवधि (दिनांक-27.07.2016 से दिनांक-10.09.2017 तक) में जीवन निर्वाह भाा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी देय नहीं होगा। निलंबन अवधि कर्तव्य अवधि नहीं मानी जाएगी'' अतएव अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का निलंबन अवधि के विनियमन से संबंधित अभ्यावेदन को स्वीकार योग्य नहीं पाते हुए निलंबन अवधि (दिनांक-27.07.2016 से दिनांक-10.09.2017 तक) को निम्नरूपेन विनियमित करते हुए संसूचित किया जाता है। ''निलंबन अवधि (दिनांक-27.07.2016 से दिनांक-10.09.2017 तक) में जीवन निर्वाह भाा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी देय नहीं होगा। निलंबन अवधि कर्तव्य अवधि नहीं मानी जाएगी''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 20 नवम्बर 2019 सं॰ 22/नि॰सि॰(औ॰)-17-04/2015-2389--श्री रविन्द्र नारायण (आई0डी0-3541) कार्यपालक अभियंता, पूर्वी सोन उच्चस्तरीय नहर प्रमंडल, टेकारी से विभागीय पत्रांक-315, दिनांक-19.02.2016 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र 'क' गठित करते हुए निम्न आरोपों के लिए स्पष्टीकरण किया गया :- आपके द्वारा भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन वर्ष 2007-08 की कंडिका 6.1 एवं 6.2 (संयुक्त कंडिका) का उार प्रतिवेदन समर्पित करने हेतु वांछित अभिलेख अधीक्षण अभियंता, सोन नहर अंचल, औरंगाबाद को उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण मामले का निष्पादन लम्बित रहा। अमरपुर लाईन 20 आर0डी0 से अमरपुर माईनर में नल सुधार हेतु अनेक स्मार के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। माननीय मुख्यमंत्री सचिवालय से प्राप्त जन शिकायत से संबधित मामले के निष्पादन में कई स्मार के बावजूद आपके द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। दिनांक-09.12.2014 को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद द्वारा आहूत मासिक बैठक में आपके द्वारा भाग नहीं लिया गया जो आपकी कार्य के प्रति उदासीनता बरते जाने का घोतक है। आपके द्वारा कार्य में बरती जा रही लापरवाही के कारण भगवतीपुर वितरणी एवं अन्य नहर प्रणालियों में सिंचाई बाधित हो गया है।इसके साथ ही उार कोयल वितरणी प्रमंडल, कुर्था को भी जलापूर्ति नहीं हो पा रही है। मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद द्वारा दिनांक-04.07.2015 को सी0ए0जी0 की कंडिकाओं के संबंध में वार्ता हेतु सम्पर्क करने पर आपका मोबाईल बन्द पाया गया जिसके कारण वार्ता नहीं हो सकी। पूर्व में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद द्वारा लिखित एवं मौखिक रूप से मोबाईल चालू रखने के निदेश के बावजूद खरीफ सिंचाई अवधि में भी मोबाईल बन्द रखना आपकी कार्य के प्रति उदासीनता एवं उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना दर्शाती है। श्री रविन्द्र नारायण, कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने बचाव बयान में मुख्य रूप से बताया गया कि अमरपुर लघु नहर के वि0दू0 6.75 पर नाला निर्माण का कार्य वर्ष 2014-15 में ही पूरा कर दिया गया है। साथ ही भगवतीपुर वितरणी के वि0दू0 020.00 से निसृत अमरपुर माईनर का पुनस्र्थापन कार्य अब समाप्ति की ओर है। अतः इस कार्य में उनके द्वारा किसी प्रकार की शिथिलता नहीं बरती गई है। बिहार विधान सभा चुनाव कार्य के पश्चात उनके द्वारा लगातार मुख्यालय में रहकर दिनांक-17.10.2015 से नहरों पर सघन भ्रमण कर खरीफ सिंचाई कार्य सम्पन्न कराया गया है और उनके सघन भ्रमण का ही परिणाम रहा है कि उपलब्ध जल स्त्राव के अनुसार नहर के निचले छोर के किसानों से लेकर कुर्था प्रमंडल को भी पानी उपलब्ध कराया गया।19 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 मोबाईल बन्द रहने के संबंध में श्री नारायण द्वारा बताया गया कि नहरों पर भ्रमण के दौरान नहरी क्षेत्र के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र मे नेटवर्क की समस्या के कारण या मोबाईल चार्ज नहीं रहने की स्थिति में मोबाईल पर फोन करने पर मोबाईल स्वीच ऑफ या कवरेज एरिया से बाहर बताता है। श्री नारायण से प्राप्त स्पष्टीकरण पर मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद का मन्तव्य प्राप्त किया गया। उनके द्वारा दिए गए मन्तव्य में बताया गया कि आरोप पत्र प्रपत्र 'क' के साथ संलग्न साक्ष्यों से स्वतः स्पष्ट है कि श्री नारायण के विरूद्ध कार्यो के निष्पादन में शिथिलता बरतने, उच्चाधिकारियों की बैठक में भाग नहीं लेना, मोबाईल बन्द रखना एवं मनमाने ढंग से मुख्यालय से अनुपस्थित रहने का आरोप बनता है एवं उनके स्पष्टीकरण से सहमत नहीं हुआ जा सकता है। श्री नारायण के स्पष्टीकरण में दिए गए तथ्य को उपलब्ध साक्ष्यों एवं मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, औरंगाबाद के मन्तव्य के आलोक में सम्यक विचारोपरांत स्वीकार योग्य नहीं पाया गया। अतएव मामले के सम्यक समीक्षोपरांत श्री रविन्द्र नारायण, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पूर्वी सोन उच्चस्तरीय नहर प्रमंडल, टेकारी के विरूद्ध प्रमाणित आरोपों के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-2242 दिनांक-18.12.2017 द्वारा निम्न दण्ड अधिरोपित किया गया :- (i) दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। (ii) भविष्य के लिए चेतावनी। श्री नारायण द्वारा उक्त दण्डादेश के विरूद्ध पुनर्विलोकन आवेदन समर्पित किया गया। जिसके सम्यक समीक्षोपरांत आवेदन में कोई नया तथ्य समाहित नहीं होने के कारण पुनर्विलोकन आवेदन को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में श्री रविन्द्र नारायण, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, पूर्वी सोन उच्चस्तरीय नहर प्रमंडल, टेकारी के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं0-2242 दिनांक-18.12.2017 द्वारा अधिरोपित दण्ड को बरकरार रखते हुए श्री नारायण द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन आवेदन को अस्वीकृत किया जाता है। सरकार का उक्त निर्णय श्री नारायण को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

------- 20 नवम्बर 2019 सं॰ 22/नि॰सि॰(भाग॰)09-02/2017-2388--श्री चन्द्रशेखर प्रसाद (आई0डी0-3951) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमण्डल, शिवनारायणपुर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमण्डल, दरभंगा के विरूद्ध विभागीय उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर का अंतिम मापी लिए जाने के निदेश का लगभग एक वर्ष तक अनुपालन नहीं किए जाने, पुनर्निविदा में अप्रत्याशित विलम्ब, समयवृद्धि के प्रस्ताव को समय पर नही भेंजने आदि आरोपों के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर विभगीय पत्रांक 1675 दिनांक 20.09. 2017 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया। उक्त के आलोक में श्री प्रसाद के पत्रांक 244 दिनांक 27.11.2017 द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण में अंकित बिन्दु निम्नवत हैः-

1. मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के निदेश के अनुपालन में पत्रांक-735 दिनांक 19.12.2015 के द्वारा अवर प्रमण्डल पदाधिकारी-4, शिवनारायणपुर को अंतिम मापी लेकर विपत्र तैयार करने का निदेश दिया गया। साथ ही पत्रांक- 727 दिनांक 17.12.2015 से संवेदक को अंतिम मापी के समय उपस्थित रहने का निदेश दिया गया। कनीय अभियंता द्वारा अंतिम मापी लेकर समर्पित विपत्र में संवेदक का हस्ताक्षर नहीं पाया गया, जो नियमानुसार अनिवार्य है। इसकी सूचना संवेदक को दिए जाने पर उनके द्वारा मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के पास लम्बित समयवृद्धि प्रस्ताव के निष्पादन के उपरांत ही मापी पुस्त पर हस्ताक्षर किए जाने की बात कही गई।

2. अवशेष कार्याे का पूर्ण प्राक्कलन लगभग एक वर्ष पश्चात भी तैयार नहीं करवाने के संबंध में उल्लेख किया गया है कि पत्रांक 735 दिनांक 19.12.2015 से अवर प्रमण्डल पदाधिकारी-4 को कासरी वितरणी के अवशेष कार्यों का प्राक्कलन 15 दिनों के अंदर समर्पित करने का निदेश दिया गया। तदनुसार 15 दिनों में प्राप्त प्राक्कलन की राशि 3 करोड़ अधिक होने के कारण अधीक्षण अभियंता को समर्पित किया गया जो उनके द्वारा मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर को भेजा गया। मुख्य अभियंता द्वारा जाँच कर राशि अधिक बतायी गयी एवं उनके स्तर से गठित असम्बद्ध कनीय अभियंता की टीम द्वारा प्रतिवेदित एवं पुनरीक्षित प्राक्कलन कार्यपालक अभियंता (आरोपित पदाधिकारी) को समर्पित किया गया। तदनुसार लीड चार्ट वगैरह तैयार कर पुनरीक्षित प्राक्कलन पत्रांक 246 दिनांक 24.07.2016 द्वारा अधीक्षण अभियंता/मुख्य अभियंता को समर्पित किया गया। तदोपरांत मुख्य अभियंता के निदेशानुसार निविदा आमंत्रण सूचना सं0- 01/16-17 प्रकाशित कराया गया। परन्तु अंतिम विपत्र पर संवेदक का हस्ताक्षर नहीं रहने के कारण मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा परिमाण विपत्र अनुमोदित नहीं होने पर निविदा रद्द किया गया। फलतः कासरी वितरणी का निविदा क्रियान्वित नहीं हो सका। 3. पुराने एकरारनामा को बंद करने के क्रम में संबंधित समय वृद्धि एक ही साथ न भेंजकर अनावश्यक रूप से विलम्ब किए जानेे के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अंकित किया गया है कि संबंधित समयवृद्धि प्रस्ताव उनके योगदान के पूर्व ही अधीक्षण अभियंता के माध्यम से मुख्य अभियंता को समर्पित था। मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के20 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 पत्रांक 1409 दिनांक 31.05.2016 द्वारा नए प्रपत्र में पूर्ण सूचना उपलब्ध कराने के निदेश के अनुपालन में पत्रांक 74 दिनांक 14.07.2016 द्वारा कासरी वितरणी के समयवृद्धि प्रस्ताव को उच्चाधिकारियों को भेजा गया।

4. पुराने एकरारनामा को बंद कर अवशेष कार्यों के पुनर्निविदा के लिए मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के निदेशों का अनुपालन नही करने के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता द्वारा सर्वप्रथम कासरी वितरणी का निविदा प्रकाशित करने का निदेश दिया गया। कासरी वितरणी का पत्रांक 246 दिनांक 24.07. 2016 द्वारा समर्पित पुनर्निविदा प्रस्ताव के क्रम में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा परिमाण विपत्र अनुमोदित नहीं करने के कारण निविदा सूचना रद्द करना पड़ा। दिनांक 21.11.2016 को प्रधान सचिव द्वारा आहूत समीक्षात्मक बैठक में दिए गए निदेश के अनुपालन में पत्रांक 299 दिनांक 06.12.2016 द्वारा अवर प्रमण्डल पदाधिकारी शिवनारायणपुर को निदेशित किया गया। परन्तु उनके द्वारा कार्य में शिथिलता बरतने पर वेतन अवरूद्ध करने की चेतावनी की सूचना पत्रांक 349 दिनांक 21.12.2016 द्वारा देते हुए अधीक्षण अभियंता एवं मुख्य अभियंता को भी सूचित किया गया।

हरिश्चन्द्रपुर वितरणी का अंतिम विपत्र तैयार करने हेतु पत्रांक 735 दिनांक 19.12.2015 के द्वारा एक टीम गठित किया गया एवं संवेदक को भी उपस्थित रहने एवं मापी पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने हेतु पत्रांक 244 दिनांक 12.11.2016, पत्रांक 271 दिनांक 26.11.2016 एवं पत्रांक 301 दिनांक- 06.12.2016 द्वारा स्मारित किया गया एवं पत्रांक 347 दिनांक 21.12. 2016 द्वारा प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से अंतिम रूप से निदेशित किया गया। कनीय अभियंता एवं अवर प्रमण्डल पदाधिकारी द्वारा हरिश्चन्द्रपुर वितरणी में गैर जिम्मेदराना हरकत किया गया और लेवल लेकर लेवल बुक खो दिया गया तथा कार्यपालक अभियंता को अंतिम विपत्र तैयार होने को कहकर बहकावें में रखा गया। श्री प्रसाद द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण की सम्यक समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा के क्रम में निम्न तथ्य पाए गएः-

1. आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 22.12.2015 को संवेदक को अंतिम मापी के समय उपस्थित रहने का निदेश दिया गया। दिनांक 21.01.2016 को कासरी वितरणी का अंतित विपत्र प्राप्त हो जाने को सूचित किया गया। दिनांक 15.10. 2016 को शाखा नहर एवं कासरी वितरणी के अंतिम मापी पर संवेदक को हस्ताक्षर करने के लिए सम्पर्क करने हेतु सूचित किया गया। पुनः दिनांक 06.12.2016 को शाखा नहर का दिनांक 10.12.2016 को संयुक्त अंतिम मापी के समय संवेदक को उपस्थित रहने हेतु निदेशित किया गया। उक्त दोनों पत्र दिनांक 15.10.2016 एवं 06.12.2016 से संवेदक को की गई सूचना विरोधाभाषी प्रतीत होता है।

उपर्युक्त तथ्यों एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका- 4.0.0 एवं 5.1.0 के विभिन्न उपकंडिकाओं में उल्लिखित तथ्यों से मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग,भागलपुर के अंतिम मापी लिए जाने के निदेश का लगभग एक वर्ष तक अनुपालन नहीं किए जाने, मापी के संदर्भ में गलत सूचना देने एवं मापी की अद्यतन जानकारी नहीं रखना परिलक्षित होता है। 2. दिनांक 12.12.2015 को राज्यस्तरीय बैठक में बटेश्वर गंगा पम्प नहर योजना के पुराने एकरारनामा की अंतिम मापी लेकर अवशेष कार्य का पुनर्निविदा कर पूरा करने के निदेश की सूचना मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के पत्रांक 01 दिनांक 04.01.2016 द्वारा आरोपित कार्यपालक अभियंता को दी गई। बचाव बयान में उल्लिखित उनके पत्रांक 735 दिनांक 19.12.2015 द्वारा अंतिम विपत्र तैयार करने का निदेश दिया गया है, न कि अवशेष कार्य का प्राक्कलन तैयार करने का। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव बयान में मात्र कासरी वितरणी का प्राक्कलन समर्पित किए जाने एवं निदेशानुसार सुधारोपरांत अपने पत्रांक 246 दिनांक 24.07.2016 द्वारा प्राक्कलन समर्पित करने का उल्लेख किया गया है। जाँच प्रतिवेदन कंडिका-4.1.1 से 4.1.9 में अंकित तथ्यों से विदित होता है कि दिनांक 25.01.2016 को भी मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा अवशेष कार्यों का निविदा आमंत्रित करने का निदेश दिया गया एवं अलग-अलग पत्राें से दिनांक 01.04.2016, 22.04.2016, 27.04.2016, 31.05.2016 एवं दिनांक 27.09.2016 को कासरी वितरणी के अवशेष कार्यों का पुनरीक्षित प्राक्कलन में निदेशानुसार संशोधित किए जाने तथा शेष वितरणियों का वांछित प्राक्कलन उपलब्ध कराने का निदेश दिया गया। तदोपरांत आरोपित पदाधिकारी के पत्रांक 166 दिनांक 11.09.2016 द्वारा अधीक्षण अभियंता को कासरी वितरणी का प्राक्कलन उपलब्ध कराया गया है। जहाँ तक अन्य वितरणी यथा शाखा नहर II, हरिश्चन्द्र वितरणी की स्थिति है, उपलब्ध अभिलेख एवं जाँच प्रतिवेदन से विदित होता है। कि आरोपित कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक 253 दिनांक 05.05.2016 से अवर प्रमण्डल पदाधिकारी-2 एवं अन्य पाँच कनीय अभियंताओं की टीम शाखा नहर- II के अवशेष कार्यों के प्राक्कलन तैयार करने हेतु गठित की गई, जबकि दिसम्बर 2015 में ही पुनर्निविदा करने हेतु निदेश है। उनके पत्रांक 299 दिनांक 6.12.2016 से अवर प्रमण्डल पदाधिकारी को शाखा नहर के वि0दू0 8.20 से 30.00 के अवशेष कार्यों के प्राक्कलन के लिए आउटसोर्सिंग से कम्प्यूटरराइज्ड ग्राफ तैयार कर मिट्टी की गणना करने का निदेश दिया गया एवं दिनांक 21.12.2016 को अवर प्रमण्डल पदाधिकारी को निदेशित किया गया। पुनः आरोपित पदाधिकारी द्वारा आपने पत्रांक 26 दिनांक 16.01.2017 से कासरी वितरणी, हरिश्चंद्रपुर वितरणी एवं शाखा नहर का प्राक्कलन एक सप्ताह के अंदर उपलब्ध कराने का निदेश अवर प्रमण्डल पदाधिकारी, शिवनारायणपुर को दिया गया। जाँच प्रतिवेदन कंडिका 4.0.0 एवं 5.2.0 के विभिन्न उप कंडिकाओं में अंकित विभिन्न पत्राचारों एवं समीक्षा से आरोपी कार्यपालक अभियंता द्वारा मुख्य अभियंता एवं विभागीय निदेश के बावजूद अपने अधीनस्थों के सहयोग एवं अपने मार्ग दर्शन में प्रभावी एवं कालबद्ध तरीके से अवशेष कार्यों का पुनरीक्षित प्राक्कलन लगभग एक वर्ष बाद भी तैयार नहीं करवाया जाना परिलक्षित होता है, जो पुनर्निविदा में अप्रत्याशित विलम्ब का कारण हुआ। 3. प्रस्तुत आरोप पुराने एकरारनामा को बंद करने के क्रम में समयवृ़द्धि प्रस्ताव एक ही साथ जनवरी 2016 में नहीं भेजकर अनावश्यक विलम्ब किये जाने सें संबंधित है।21 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोपित पदाधिकारी द्वारा उनके योगदान दिनांक- 15.07.15 के पूर्व पूर्ववर्ती द्वारा समयवृद्धि प्रस्ताव मुख्य अभियंता, भागलपुर को समर्पित किये जाने को प्रतिवेदित किया गया है। इस संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी द्वारा साक्ष्य संलग्न नहीं किये जाने एवं जाँच प्रतिवेदन में तत्संबंधी उल्लेख/साक्ष्य नहीं रहने से उनके बयान की सत्यता स्थापित करना संभव प्रतीत नहीं होता है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा मुख्य अभियंता, भागलपुर के पत्रांक-1409 दिनांक- 31.05.2016 से नये प्रपत्र में पूर्ण सूचना उपलब्ध कराने के निदेश के क्रम में जुलाई- 16 में अलग-अलग पत्रों से शाखा नहर एवं कासरी वितरणी का समयवृद्धि प्रस्ताव समर्पित करने को प्रतिवेदित किया गया है। जाँच प्रतिवेदन में उक्त संदर्भित पत्र दिनांक- 31.05.2016 का उल्लेख अथवा आरोपित पदाधिकारी साक्ष्य के रूप में संलग्न होना परिलक्षित नहीं होता है जिससे उक्त संदर्भित पत्र में बयान के अनुरूप अथवा समयवृद्धि प्रस्ताव समर्पित करने का निदेश होने को स्थापित करना संभव प्रतीत नहीं होता है। परन्तु आरोपित पदाधिकारी का पत्रांक- 40 दिनांक- 21.01.2016, जिसका उल्लेख जाँच प्रतिवेदन कंडिका 4.2.3 में किया गया है, में कासरी वितरणी का समयवृद्धि प्रस्ताव मुख्य अभियंता, भागलपुर में लम्बित होने का उल्लेख मिलता है। जबकि शाखा नहर II का समयवृद्धि प्रस्ताव आरोपित पदाधिकारी का पत्रांक- 74 दिनांक- 14.07.2016 से अधीक्षण अभियंता को उपलब्ध कराने एवं अधीक्षण अभियंता के पत्रांक- 657 दिनांक- 03.12.2016 से मुख्य अभियंता को उपलब्ध होना परिलक्षित होता है जिसके संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता के पत्रांक -1409 दिनांक- 31.05.2016 के क्रम में पूर्व समर्पित समयवृद्धि प्रस्ताव को नये प्रपत्र में समर्पित किया गया है। उक्त पत्र दिनांक- 31.05.2016 की अनुपलब्धता की स्थिति में समयवृद्धि प्रस्ताव पूर्व में समर्पित होना स्थापित करना संभव प्रतीत नहीं होता है। उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा आरोपित पदाधिकारी के उपरोक्त उल्लिखित पत्रांक-40 दिनांक- 21.01.2016 एवं पत्रांक- 74 दिनांक- 14.07.2016 के आलोक में समयवृद्धि प्रस्ताव एक ही समय जनवरी 2016 में नहीं भेजने के लिए आरोपित पदाधिकारी को उत्तरदायी माना गया है। 4. प्रस्तुत आरोप गंगा पम्प नहर परियोजना के अन्तर्गत वितरणी प्रणाली के पुराने एकरारनामा के तहत कार्यों का अंतिम मापी लेकर एकरारनामा बंद कर अवशेष कार्याें के पुनर्निविदा के लिए मुख्य अभियंता, भागलपुर के निदेशों का अनुपालन नहीं किये जाने से संबंधित है। उपरोक्त के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि मुख्य अभियंता, भागलपुर के कासरी वितरणी का पहले निविदा प्रकाशित कराने के निदेश के अनुपालन में पत्रांक- 246 दिनांक-24.07.2016 से पुनर्निविदा प्रस्ताव मुख्य अभियंता द्वारा परिमाण विपत्र अनुमोदित नहीं किये जाने के कारण रदद्‌ करना पड़ा। साथ ही यह भी कहना है कि दिनांक- 21.11. 2016 के समीक्षात्मक बैठक में 10 दिनों के अंदर निविदा प्रकाशित करने के निदेश के अनुपालन में पत्रांक- 299 दिनांक- 06.12.2016 से अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शिवनारायणपुर को निदेशित किया गया एवं पत्रांक-735 दिनांक- 19.12.2015 से सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता की एक टीम गठित की गयी। संवेदक को उपस्थित रहने हेतु कई स्मार एवं प्रेस विज्ञप्ति से सूचित किया गया। परन्तु अवर प्रमंडल पदाधिकारी एवं कनीय के लेवल बुक खो दिये जाने जैसे गैर जिम्मेदाराना हरकत करते हुए विपत्र तैयार करने को कहकर बहकावे में रखा गया। आरोप विन्दु 1 एवं 2 से स्पष्ट है कि मुख्य अभियंता, भागलपुर एवं विभागीय निदेश के बावजूद पुराने एकरारनामा को बंद करने के लिए अंतिम मापी लेने एवं तद्‌दोपरान्त अवशेष कार्यों का प्राक्कलन ससमय तैयार नहीं करने के लिए उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा आरोपित पदाधिकारी को उत्तरदायी माना गया है। प्राक्कलन ससमय तैयार नहीं होना ही निविदा प्रकाशन में अप्रत्याशित विलम्ब का कारक माना जा सकता है। उड़नदस्ता जाँच पदाधिकारी द्वारा उक्त के आलोक में पुनर्निविदा के क्रम में मुख्य अभियंता, भागलपुर के दिये निदेश का अनुपालन आरोपित पदाधिकारी द्वारा नहीं किये जाने को पाया गया है। इस प्रकार श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमंंंंंंंंंंंडल, शिवनारायणपुर के विरूद्ध उड़नदस्ता के द्वारा किये गये जाँच एवं श्री प्रसाद से प्राप्त स्पष्टीकरण के समीक्षोपरांत श्री प्रसाद को मुख्य अभियंता, भागलपुर के अंतिम मापी लिये जाने का निदेश का लगभग एक वर्ष तक अनुपालन नहीं किया जाना, मापी की अद्यतन जानकारी नहीं रखने तथा पुनर्निविदा में अप्रत्याशित विलंब, समय वृद्धि के प्रस्ताव को समय पर नही भेंजने के लिए श्री प्रसाद दोषी है। अतएव उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के सम्यक समीक्षोपरांत श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमण्डल, शिवनारायणपुर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमण्डल, दरभंगा के विरूद्ध लघु दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय सरकार के स्तर से लिया गया है। अतः सरकार के उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-1312, दिनांक 14.06.2018 द्वारा श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमण्डल, शिवनारायणपुर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमण्डल, दरभंगा के विरूद्ध निम्नांकित लघु दण्ड अधिरोपित किया गया है :- (i) संगत वर्ष 2015-16 तथा 2016-17 के लिए निन्दन। (ii) दो वार्षिक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमंडल, शिवनारायणपुर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं मोनिटरिंग प्रमंडल, दरभंगा द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया। पुनर्विलोकन अर्जी में पूर्व में समर्पित अपने स्पष्टीकरण के अधिकांश तथ्यों का ही उल्लेख किया गया है। अभ्यावेदन में अंकित कुछ नए तथ्य निम्नवत है :-

22

बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 1. आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि मेरे योगदान (दिनांक-15.07.2015) के पूर्व पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-256 दिनांक-27.03.2014 द्वारा हरिश्चन्द्रपुर वितरणी के 0.00 से 69.10 आर॰डी॰ तक मिट्टी एवं संरचना निर्माण कार्य में समयवृद्धि का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसका साक्ष्य के रूप में पत्र की अभिप्रमाणित छायाप्रति संलग्न की गयी है। इसी तरह कासरी वितरणी एवं शाखा नहर-2 का समयवृद्धि का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसका साक्ष्य के रूप में अभिप्रमाणित छायाप्रति संलग्न किया गया है।

2. पुनः मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, भागलपुर का पत्रांक-1409 दिनांक-31.05.2016 द्वारा प्रमाण पत्र एवं सूचनाओं के साथ समयवृद्धि के प्रस्ताव की मांग की गई जिसके साक्ष्य के रूप में पत्र की छायाप्रति संलग्न की गई है, जिसके आलोक में आरोपी पदाधिकारी अपने पत्रांक-73 दिनांक-14.07.2016 एवं 74 दिनांक-14.07.2016 द्वारा क्रमशः कासरी वितरणी के वि॰दू॰ 0.00 से 22.25 एवं शाखा नहर के वि॰दू॰ 20.00 से 36.00 तक मिट्टी एवं संरचना कार्य से संबंधित समयवृद्धि की स्वी—ति हेतु प्रस्ताव उच्चाधिकारी को भेजे जाने का उल्लेख करते हुए साक्ष्य के रूप मंें पत्र की छायाप्रति संलग्न की गई है।

3. पूर्व में तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का पत्रांक-256 दिनांक-27.03.2014 द्वारा समयवृद्धि हेतु समर्पित प्रस्ताव के आलोक में ही बाद के मुख्य अभियंता, भागलपुर के द्वारा अपने पत्रांक-59 दिनांक-10.01.2018 एवं 60 दिनांक-10. 01.2018 द्वारा क्रमशः शाखा नहर के वि॰दू॰ 20.00 से 36 एवं कासरी वितरणी के वि॰दू॰ 0.0 से 22.25 के कार्यों से संबंधित समयवृद्धि की स्वी—ति प्रदान की गई।

4. आरोपी पदाधिकारी द्वारा अपने पुनरावलोकन अर्जी में उल्लेख किया गया है कि दिनांक-21.11.2016 को समीक्षात्मक बैठक में 10 दिनों के अन्दर निविदा प्रकाशित करने संबंधी निदेश के अनुपालन में अपने पत्रांक-299 दिनांक-08.12. 2016 से अवर प्रमंडल पदाधिकारी, शिवनारायणपुर एवं पत्रांक-735 दिनांक-19.12.2015 से सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता की टीम गठित की गई, परंतु उनलोगों द्वारा गैर-जिम्मेदाराना हरकत करते हुए विपत्र तैयार करने को कहकर बहकावे में रखा गया। श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमंडल, शिवनारायणपुर के विरूद्ध मुख्य अभियंता, भागलपुर के द्वारा दिये गये निदेश का एक वर्ष तक अनुपालन नहीं होने, अंतिम मापी लिये जाने के संबंध में उन्हें गलत सूचना देने एवं अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा मापीपुस्त पर अंकित मापी की अद्यतन जानकारी नहीं रखने के साथ-साथ कार्य में लापरवाही एवं उदासीनता संबंधी आरोप है।

उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका-4.1.1 के अनुसार दिनांक-12.12.2015 को राज्य स्तरीय बैठक की कार्यवाही के आलोक में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के पत्रांक-3604 दिनांक-15.12.2015 द्वारा कार्यपालक अभियंता को शाखा नहर एवं वितरणी प्रणाली, जो वर्षाें पूर्व एकरारित है एवं कार्य भी कतिपय कारणों से बंद है, की अंतिम मापी लेकर आत्मभारित प्रतिवेदन के साथ इसी माह में हीं प्रस्तुत करने का निदेश दिया गया है। पुनः मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, भागलपुर द्वारा पत्रांक-01 दिनांक-04.01.2016 से राज्य स्तरीय बैठक की कार्यवाही संलग्न करते हुए बटेश्वर स्थान गंगा पम्प नहर परियोजना के पुराने एकरारनामा को बंद कर अवशेष कार्याें की निविदा के लिए त्वरित कार्रवाई का निदेश भी श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता को दिया गया। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-735 दिनांक-19.12.2015 से अपने अधीनस्थ अभियंताओं को अंतिम मापी लेकर विपत्र तैयार करने का निदेश दिया गया, परन्तु उक्त प्रमंडल में दिनांक-21.01.2017 तक के पदस्थापन अवधि में भी समुचित कार्रवाई नहीं की जा सकी। श्री प्रसाद का यह कहना है कि कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा गैर जिम्मेदाराना हरकत की गई और Level लेने के पश्चात Level Book खो दिया गया तथा कार्यपालक अभियंता को बहकावे में रखा गया, जो स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि उनके द्वारा संबंधित कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता के विरूद्ध उच्चाधिकारियों के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित कराने हेतु कोई ठोस कार्रवाई किये जाने का प्रस्ताव भी नहीं दिया गया, ना हीं उनके विरूद्ध कार्रवाई प्रारंभ की गई।

श्री प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने आवेदन में उल्लेख किया गया है कि मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, भागलपुर का पत्रांक-1409 दिनांक-31.05.2016 द्वारा समय वृ़द्धि के प्रस्ताव की माँग पर उनके द्वारा अपने पत्रांक-73 दिनांक-14.07.2016 एवं 74 दिनांक-14.07.2016 से क्रमशः कासरी वितरणी एवं शाखा नहर से संबंधित कार्याें के समयवृद्धि का प्रस्ताव उच्चाधिकारी के पास भेजा गया। भेजे गये इन पत्रों में पूर्व से भेजे गये समयवृद्धि संबंधित प्रस्ताव का कोई उल्लेख नहीं है। पुनर्विलोकन अर्जी के नये तथ्य में यह कहा गया है कि मेरे योगदान के पूर्व पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-256 दिनांक-27.03.2014 से हरिशचन्द्रपुर वितरणी से संबंधित कार्याें का समयवृद्धि का प्रस्ताव भेजा गया था। भेजे गये पत्रों का उल्लेख करते हुए पत्र की अभिप्रमाणित छायाप्रति संलग्न की गई है। परन्तु यह पत्र न तो विधिवत डायरी किया हुआ प्रतीत होता है और न ही भेजे गये कार्यालय में प्राप्ति होने की पुष्टि होती है। इसके अतिरिक्त मुख्य अभियंता, भागलपुर का पत्रांक-59 दिनांक-10.01.2018 एवं 60 दिनांक-10.01.2018 द्वारा स्वीकृत किये समयवृद्धि के प्रस्ताव में भी पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता का पत्रांक-256 दिनांक-27.03.2014 का उल्लेख नहीं है, जिससे दिये गये नया तथ्य स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। श्री प्रसाद द्वारा पूर्व में दिये गये स्पष्टीकरण की विस्तृत समीक्षा के उपरांत आरोपों को प्रमाणित पाये जाने पर दंड संसूचित किया गया है तथा इनके द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी में दिया गया नया तथ्य स्वीकार योग्य नहीं पाया गया है। इस प्रकार आरोपी पदाधिकारी का पुनर्विलोकन अर्जी अस्वीकार करने योग्य है।

उपर्युक्त वर्णित स्थिति में श्री चन्द्रशेखर प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गंगा पम्प नहर प्रमंडल, शिवनारायणपुर से प्रमाणित अरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-1312, दिनांक-14.06.2018 द्वारा संसूचित दंड के23 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 विरूद्ध प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी में दिये गये तथ्य स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होने के कारण पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार किए जाने एवं पूर्व में अधिरोपित दंड को यथावत रखे जाने का निर्णय सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिया गया है। उक्त निर्णय के आलोक में श्री प्रसाद के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं0-1312, दिनांक 14.06.2018 द्वारा अधिरोपित निम्नांकित दण्ड को यथावत रखते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।

(i) संगत वर्ष 2015-16 तथा 2016-17 के लिए निन्दन।

(ii) दो वार्षिक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

18 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-01/2014-2362--श्री सुभाष चन्द्र भट्ट (आई0डी0-जे-9118), तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी के उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान (आरोप वर्ष 2013-14) अधवारा समूह की नदी झीम, जमुरा एवं बांके नदी पर हो रहे तटबंध निर्माण तथा 10 अद्‌द एन्टी फ्लड स्लूईस के निर्माण में दिये गये परिवाद पत्र के आलोक में मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा कराई गई। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन में उद्धृत तथ्यों एवं साक्ष्यों की विभागीय समीक्षा की गई। समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित निम्नलिखित आरोपों के लिए श्री भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र-'क' गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2296, दिनांक 07.10.2015 से स्पष्टीकरण पूछा गया। आरोप -1- लीड प्लान तैयार करने में अत्यधिक विलंब करना तथा सक्षम प्राधिकार से लीड प्लान की स्वीकृति के बिना अनियमित भुगतान किया जाना। आरोप-2- BIS CODE-11532 के प्रावधान के विरूद्ध तटबंध के टो के 25मी0 के अन्दर मिट्टी काट लेने से BIS CODE- 11532 के प्रावधानों के अनरूप कार्य नहीं कराना। आरोप-3- मिट्टी कार्य में सेटलमेंट की कटौती न कर संवेदक को अधिक भुगतान किया जाना। आरोप-4- मिट्टी कार्य की मात्रा का वर्गीकरण वास्तविक लीड के आधार पर नहीं किया जाना। आरोप-5- संरचना के निर्माण स्टोन चिप्स का ग्रेडेशन ओवर साईज का पाया जाना।

उक्त के आलोक में श्री भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियंता के पत्रांक-0, दिनांक-14.02.16 से स्पष्टीकरण का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसके सम्यक समीक्षोपरांत निम्न तथ्य पाये गये :- (क) आरोप सं॰-1 ः- आरोपी श्री भट्ट द्वारा कहा गया है कि कार्य का एकरारमाना वर्ष 2011-12 में हुआ था। परन्तु भू-अर्जन की समस्या के कारण कार्य 2012-13 में कार्य प्रारम्भ हुआ तथा समय पर ग्रामीणों के विरोध के कारण कार्य अवरूद्ध भी होता रहा। कार्य में ली गयी मिट्‌टी से संबंधित पीट की वास्तविक मापी ली गयी और उसी आधार पर लीड प्लान तैयार कर दिनांक 29.06.13 को कनीय अभियंता द्वारा सहायक अभियंता को समर्पित की गयी एवं दिनांक 30.06.13 को कार्यपालक अभियंता को प्रेषित किया गया तथा कार्यपालक अभियंता के स्तर से संबंधित कागजात के साथ पत्रांक 954 दिनांक 25.08.13 को अधीक्षण अभियंता को भुगतान से पूर्व भेजा गया। माप पुस्त सं॰ 1842 तथा उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 5.1.8 से स्पष्ट है प्रथम चालू विपत्र दिनांक 15.03. 13 को तैयार किया गया है जिसमें यांत्रिक विधि से ढुलाई की गई मिट्‌टी को भी सम्मिलित किया गया है। इससे स्पष्ट है कि दिनांक 15.03.13 के पूर्व लीड युक्त मिट्‌टी का कार्य कराया गया है तो इस स्थिति में प्रथम चालू विपत्र तैयार करने के पूर्व लीड युक्त मिट्‌टी ढुलाई कार्य का लीड प्लान तैयार कर समर्पित करना चाहिये था। ऐसा न कर सीधे विपत्र तैयार कर भुगतान हेतु कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया एवं अधीक्षण अभियंता के बचाव बयान के साथ संलग्न पत्रों से स्पष्ट होता है कि अधीक्षण अभियंता द्वारा दिये गये अथक दबाव के पश्चात त्रुटिपूर्ण लीड प्लान तैयार कर आरोपी द्वारा प्रमंडल कार्यालय में दिनांक 30.06.13 को समर्पित किया गया। पुनः इन आरोपी पदाधिकारी द्वारा बिना लीड प्लान के स्वीकृति के ही द्वितीय चालू विपत्र में लीड युक्त मिट्‌टी की मात्रा को समावेशित करते हुए विपत्र तैयार कर दिनांक 01.09.13 को कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया है जो परिलक्षित करता है कि दोनाें पदाधिकारी की लापरवाही के कारण लीड प्लान समय पर तैयार नहीं हो सका जिसके लिए इन्हें दोषी माना जा सकता है। बिना लीड प्लान के अनुमोदन के लीड युक्त मिट्‌टी की मात्रा के भुगतान के संबंध में आरोपी द्वारा कहा गया है कि मंत्री मंडल निगरानी विभाग के पत्रांक 2347 दिनांक 31.12.83 के कंडिका 8(ड़) के अनुपालन में कराये गये कार्यो की मापी लेकर विपत्र तैयार किया गया। जिसका भुगतान करने के लिये कार्यपालक अभियंता दोषी है को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि लीड युक्त कार्य का बिना लीड प्लान के स्वीकृति का विपत्र तैयार करना एवं माप पुस्त पर इस तथ्य को उद्धित नहीं करना परिलक्षित करता है कि उक्त अनियमित भुगतान में इनकी सहमति रही है। वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप प्रमाणित होता है। (ख) आरोप सं॰-2 :- BIS CODE-11532 के प्रावधान के विरूद्ध तटबंध के टो से 25 मी॰ के अन्दर मिट्‌टी काटकर तटबंध निर्माण कराने से संबंधित है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 10.0.0(घ) से स्पष्ट है कि स्थलीय जाँच में BIS Code के प्रावधान के विपरीत कतिपय स्थलों पर तटबंध के टो से 25 मी॰ के अन्दर 1 मी॰ से अधिक गहराई तक बौरो पिट बनाकर मिट्‌टी काटी गयी है।24 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 इस संबंध में आरोपी द्वारा तकनीकी समिति का दिनांक 28.06.13 एवं 29.06.13 का स्थल निरीक्षण प्रतिवेदन संलग्न करते हुए कहा गया है कि समिति के स्थलीय जाँच में कि॰मी॰ 13.10 से 16.40 के बीच तटबंध से पीट की दूरी प्रर्याप्त पायी गयी थी। मुख्य अभियंता के दिनांक 19.04.14 के निरीक्षण प्रतिवेदन के अनुसार कि॰मी॰ 13.17 से 15.920 के बीच तटबंध निर्माण कार्य प्रगति पर पाया गया है। अतएव आरोपी का कथन कि दिनांक 28.06.13 से 29.06.13 के बीच तकनीकी समिति द्वारा स्थलीय जाँच में BIS Code का उल्लंघन नहीं पाया गया है को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि संभव है कि समिति की जाँच के बाद में कराये गये कार्य में तटबंध के टो से 25 मी॰ के अन्दर मिट्‌टी काटकर BIS Code का उल्लंघन किया गया हो। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। (ग) आरोप सं॰-3 :- मिट्‌टी कार्य में सेटलमेंट की कटौती न कर संवेदक को अधिक भुगतान करने से संबंधित है। एकरारनामा के साथ संलग्न Technical Specification के कंडिका 10.2(B) के अनुसार मिट्‌टी कार्य में Uncompacted earth (done by either labour or tractor) में 1/9th तथा Compacted earth by sheep foot में 1/49th Settlement के रूप में मिट्‌टी की कटौती करने का प्रावधान है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.1.8 (i), (ii), (iii) एवं (iv) से स्पष्ट है कि प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय चालू विपत्र तक में कराये गये मिट्‌टी कार्य में Settlement का duduction किये बिना ही भुगतान किया गया है। Settlement के लिये deduction नहीं करने के संदर्भ में श्री भट्ट द्वारा कहा गया है कि इस आशय का निदेश वरीय पदाधिकारी द्वारा नहीं मिला था। उड़नदस्ता जाँच के पश्चात बाद के चालू विपत्र से सेटलमेंट की कटौती विधिवत कर ली गयी है। श्री भट्ट के उक्त कथन को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। क्योंकि कार्य प्रारम्भ कराने के पूर्व ही उनका दायित्व था कि कार्य के एकरारनामा से पूर्णतः भिन्न होते एवं इनके द्वारा एकरारनामा के शर्त्तो के अनुरूप ही विपत्र तैयार कर भुगतान हेतु समर्पित करते। परन्तु इनके द्वारा ऐसा नहीं करने के कारण प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय चालू विपत्र के भुगतान के समय संवेदक को अधिक भुगतान होना स्थापित होता है। श्री भट्ट का यह कहना की उड़नदस्ता जाँच के पश्चात बाद के विपत्र से इस मद में कटौती कर ली गयी है को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि अगर उड़नदस्ता जाँच नहीं होता तो निश्चित तौर पर संवेदक को अधिकाई भुगतान की वसूली नहीं हो पाती। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री भट्ट के कथन को अस्वीकार योग्य मानते हुए उनके विरूद्ध अधिकाई भुगतान होने में सहयोग करने के लिये दोषी माना जाता है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। (घ) आरोप सं॰-4 :- यांत्रिक विधि से कराये गये मिट्‌टी कार्य की मात्रा का वर्गीकरण वास्तविक लीड के आधार पर नहीं कर प्राक्कलन में प्रावधान के अनुरूप करते हुए भुगतान की कारवाई करना। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.1.7.2, 10.0.0 (क) से स्पष्ट है कि प्रथम एवं द्वितीय विपत्र में विभिन्न लीड से यांत्रिक विधि से कराये गये मिट्‌टी कार्य का वर्गीकरण वास्तविकता के आधार पर न कर स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप प्रतिशत में गणना कर बिना लीड स्वीकृत कराये ही भुगतान किया गया है। जिसे नियमानुकूल नहीं माना गया है। श्री भट्ट द्वारा कहा गया है कि विपत्र बनाने के लिये विधिवत मापी ली गयी एवं लीड प्लान तैयार करने के बाद विपत्र बनाया गया है को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि प्रथम विपत्र 15.03.12 को तैयार किया गया है जबकि यांत्रिक विधि से कराये गये मिट्‌टी कार्य का लीड प्लान कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा दिनांक 30.06.13 को प्रथम बार कार्यपालक अभियंता को भेजा गया है। श्री भट्ट द्वारा यह भी कहा गया है कि कराये गये कार्य का विपत्र के अनुरूप ही मुख्य अभियंता के पत्रांक 3141 दिनांक 04.12.15 को लीड प्लान की स्वीकृति प्रदान की गयी है परन्तु लीड प्लान संलग्न नहीं होने की स्थिति में यह स्थापित करना संभव नहीं है कि मुख्य अभियंता द्वारा विपत्र के अनुरूप ही लीड प्लान की स्वीकृति प्रदान की गयी है। परन्तु प्रथम एवं द्वितीय विपत्र से यह तो स्पष्ट स्थापित है कि यांत्रिक विधि से कराये गये मिट्‌टी कार्य की मात्रा वास्तविकता के आधार पर न कर प्राक्कलन में प्रावधानित Tentetive/Assumed प्रतिशत के आधार पर करते हुए भुगतान की कारवाई की गयी है अतएव आरोप प्रमाणित होता है। (ड़) आरोप सं॰-5 :- जो संरचना निर्माण कार्य में ओभर साईज का स्टोन चिप्स का उपयोग करने से संबंधित है। इस आरोप के संदर्भ में श्री भट्ट द्वारा कहा गया है कि यह कार्य मेरे कार्यकाल में नहीं कराया गया है। श्री भट्‌ट, तत्कालीन सहायक अभियंता के बचाव बयान से स्पष्ट है कि श्री भट्‌ट दिनांक 21.07.14 उक्त प्रमंडल में कार्यरत रहे है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन 6.0.0(B) से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य के स्थलीय जाँच में दिनांक 10.04.15 को झीम नदी के बाँये तटबंध के कि॰मी॰ 15-90(L) पर एन्टी फ्लड स्लुईस का निर्माण कार्य कराया जा रहा था एवं इसी एन्टी फ्लड स्लुईश में उपयोग हो रहे सामग्री का नमूना संग्रह कर सिंचाई शोध संस्थान खगौल, पटना से जाँच करायी गयी है। जाँचफल के अनुसार स्टोन चिप्स ग्रेडेशन ओभर साईज पाया गया है रक्षित माप पुस्त सं॰ 1962 के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि कि॰मी॰ 15.90(L) पर निर्माणाधीन स्लुईस का कार्य माह फरवरी, 2015 में प्रारम्भ किया गया है क्योंकि स्लुईस के फाउन्डेशन कटिंग का प्रारम्भिक entry माह फरवरी, 2015 की तिथि में किया गया है। उक्त के आलोक में श्री भट्ट का कथन कि यह कार्य मेरे कार्यकाल के बाद कराया गया है को स्वीकार योग्य माना जा सकता है एवं संरचना कार्य में ओभर साईज का स्टोन चिप्स का उपयोग करने का आरोप श्री भट्ट विरूद्ध प्रमाणित नहीं होता है।

समीक्षोपरांत श्री सुभाष चन्द्र भट्‌ट, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप सं॰-1, 2, 3 एवं 4 को प्रमाणित एवं आरोप संख्या-5 का अप्रमाणित पाया गया एवं तदोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक संख्या-2673,25 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 दिनांक 30.12.16 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति से संचालन पदाधिकारी एवं प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी की नियुक्ति करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। उक्त के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-291, दिनांक 06.11.17 से जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :-

आरोप-1-आरोपित पदाधिकारी के आरोप प्रपत्र-'क' में अंकित आरोप की समीक्षा उड़नदस्ता अंचल के जाँच प्रतिवेदन एवं आरोपित पदाधिकारी द्वारा समर्पित लिखित बचाव बयान के आधार पर की गयी।

1. SBD एकरारनामा के कंडिका 9.1(C) में स्पष्ट अंकित है कि यांत्रिक विधि से मिट्टी ढुलाई करने से संबंधित लीड प्लान का अनुमोदन मुख्य अभियंता के द्वारा किया जायेगा। (Annexure-1 एवं 2) आरोपित पदाधिकारी द्वारा प्रथम चालू विपत्र एवं द्वितीय चालू विपत्र तैयार कर क्रमशः दिनांक 15.03.2013 एवं दिनांक 01.09.2013 को कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया। Annexure-3 (मापीपुस्त पृष्ठ संख्या-1 एवं 5) तथा Annexure-4 (मापीपुस्त पृष्ठ संख्या-10 एवं 22) जिसमें याँत्रिक विधि से ढुलाई की गयी मिट्टी की मात्रा को भी सम्मिलित किया गया है। जबकि इसके पूर्व ही आरोपित पदाधिकारी द्वारा लीड प्लान तैयार कर अनुमोदन हेतु उच्च पदाधिकारी को समर्पित करते हुए इसकी स्वीकृति भी प्राप्त कर लेनी चाहिए थी। अभिलेख से पता चलता है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 30.06.2013 को त्रुटिपूर्ण लीड प्लान प्रमंडल में समर्पित किया गया। पुनः आरोपित पदाधिकारी द्वारा त्रुटि का निराकरण कर लीड प्लान दिनांक 27.01.2014 को कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने लिखित बचाव बयान में उक्त तथ्य को स्वीकार भी किया गया है।

उक्त से स्पष्ट होता है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा लीड प्लान तैयार करने में अत्यधिक विलंब किया गया एवं अनियमित विपत्र तैयार किया गया। अतएव आरोपित पदाधिकारी पर लगाये गये आरोप सही प्रतीत होते है।

2. उड़नदस्ता दल द्वारा स्थलीय जाँच के क्रम में पाया गया कि तटबंध के टो से रिभर साईड में BIS CODE- 11532 के प्रावधानों के विपरीत 25 मीटर के अन्दर अनेकों स्थान पर बौरों एरिया से अधिक गहराई में मिट्टी की खुदाई कर तटबंध का निर्माण का कार्य कराया गया है। उड़नदस्ता जाँच दल द्वारा स्थल निरीक्षण के क्रम में यह भी पाया गया कि झीम नदी के प्रस्तावित तटबंध के 15.05(L)कि0मी0 एवं 14.80(L) कि0मी0 के निकट तटबंध के टो से 10 से 15मी0 के बीच लगभग 60मी0 के लंबाई में 1.2 से 1.5 मी0 गहराई में मिट्टी काटा गया था। जो BIS CODE में निर्धारित प्रावधान के विपरीत था। BIS CODE-11532 में दिये गये प्रावधान Annexure-5 पर संलग्न है।

उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा तटबंध के निर्माण कार्य में BIS CODE-11532 के प्रावधानों का अनुपालन नहीं कराया गया। अतएव आरोपित पदाधिकारी पर लगाये गये आरोप प्रमाणित होता है। 3. कार्य के एकरारनामा दस्तावेज के कंडिका-10.2B के अनुसार मिट्टी कार्य में Settelment की कटौती करने का प्रावधान है। (Annexure-6) परन्तु आरोपित पदाधिकारी द्वारा पारित विपत्रों में मिट्टी कार्य के Settelment मद में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गयी। आरोपित पदाधिकारी द्वारा एकरारनामा के शर्तों के अनुरूप विपत्र तैयार कर भुगतान हेतु प्रस्तुत करना चाहिए था ऐसा नहीं किये जाने के कारण ही संवेदक को अधिक भुगतान का मामला बना। अतएव आरोपित पदाधिकारी पर लगाये गये आरोप प्रमाणित होते हैं।

4. आरोपित पदाधिकारी द्वारा प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र में मिट्टी कार्य की गणना वास्तविक लीड के बदले बिना लीड प्लान की स्वीकृति प्राप्त किये हुए प्रतिशत के आधार पर किया गया है। राजस्थानी टै्रक्टर से किये गये मिट्टी कार्य एवं यांत्रिक विधि से किये गये कार्य के मदों में मिट्टी कार्य का विपत्र प्रतिशत में अनुमान के आधार पर तैयार किया गया। जबकि आरोपित पदाधिकारी को उक्त दोनों विधि से वास्तविक रूप से कराये गये मिट्टी कार्य का भुगतान करना चाहिए था। इस संदर्भ में मापीपुस्त की संदर्भित तीन अद्‌द (Annexure 7, 8 एवं 9)पृष्ठ के रूप में संलग्न किया जाता है। अतएव आरोपित पदाधिकारी पर लगाये गये आरोप प्रमाणित होते है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1275 दिनांक 11.06.18 से श्री भट्ट से अभ्यावेदन(द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई। जिसके आलोक में श्री भट्ट द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 11.07.18 अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा ) समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई :-

(1) आरोप-1 :- तटबंध निर्माण के क्रम में भू-धारियों का नाम एवं रकवा से काटी गयी मिट्‌टी की मात्रा विभिन्न तिथियों में हस्ताक्षरित है। उन्हें वास्तविक रूप से दरकिनार करते हुए लीड की जाँच हेतु उपस्थापित करने की जिम्मेवारी कनीय अभियंता एवं अन्य को दी गयी। लीड प्लान कनीय अभियंता द्वारा दिनांक 29.06.13 को समर्पित किया गया था, जिसे जाँचित कर उनके द्वारा दि॰ 30.06.13 को ही कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया। जिसे अधीक्षण अभियंता को दि॰ 25.08.13 को कार्यपालक अभियंता द्वारा समर्पित कर दिया गया। अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 62 दि॰ 21.01.14 से लौटायी गयी लीड प्लान को सुधारोपरान्त 27.01.14 को कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया। उक्त से स्पष्ट है कि उनके स्तर से लीड प्लान समपर्ण में कोई विलम्ब नहीं किया गया। साक्ष्य के रूप में अधीक्षण अभियंता, मोनिटरिंग का पत्रांक 359 दि॰ 06.03.17 की प्रति दी गयी है।

मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के द्वारा कुल मिट्‌टी के कार्यो के लिये 0.15 से 0.50 कि॰मी॰ लीड में 1008699 घन मी॰ @ 87.80/घन मी॰ तथा 0.50 मी॰ से 1.0 किलो॰मी॰ के लीड में 821232 घन मी॰ @ 108.20/घन मी॰ के लिये26 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति प्राप्त है। तदनुरूप दि॰ 27.01.17 तक कराये गये मिट्‌टी कार्य का वास्तविक लीड स्वीकृति हेतु मुख्य अभियंता को समर्पित किया गया। जो निम्न प्रकार है :-

क्रम मापी पुस्त सं॰ पृष्ट सं॰ वर्गीकरण लीड (Km.) प्रस्तावित एवं माप पुस्त में अंकित मिट्‌टी की मात्रा मुख्य अभियंता द्वारा स्वीकृत
लीड मात्रा
1. 1884 18 0.15 से 0.50 कि॰मी॰ 302184.067 घन मी॰ 0.15 से 0.50 कि॰मी॰ 302383.67 घन मी॰
2. 1884 18 0.50 कि॰मी॰ से 1. 0 कि॰मी॰ 259014.915 घन मी॰ 0.50 से 1.0 कि॰मी॰ 2590151.85 घन मी॰

तकनीकी परीक्षक कोषांग के पत्रांक 2347 दि॰ 31.12.83 कंडिका 8 (ड़) में निदेशित है कि कार्यो की मापी दर्ज करना, उसकी जाँच अथवा विपत्र बनाना लंबित नहीं रखा जाय, चाहे किसी कारणवश विपत्र का भुगतान तुरन्त करने में कठिनाई क्यों न हो। सिंचाई विभाग के पत्रांक 975 दि॰ 21.02.82 के कंडिका -3 में निदेशित है कि बहुत ऐसे कार्य जिसका मापी बाद में करना कठिन या उसकी मापी नहीं किया जा सकता है। इस संबंध में कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता की जिम्मेवारी होगी कि समय पर मापी कार्यपालक अभियंता को प्रस्तुत कर दे। निदेशानुसार कनीय अभियंता द्वारा प्रविष्टि की गयी। प्रथम विपत्र की मापी की जाँच दि॰ 15.03.13 को की गयी। चूँकि सक्षम प्राधिकार से लीड प्लान की स्वीकृति प्राप्त नहीं थी के कारण उनके द्वारा प्रथम विपत्र के भुगतान हेतु विपत्र सार एवं द्वितीय विपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया गया। मापी पुस्त पृ॰ सं॰ 9, 26, 33 से आगत भुगतान पर सीधे कनीय अभियंता द्वारा कार्यपालक अभियंता के विपत्र उपस्थापित किया गया एवं कार्यपालक अभियंता द्वारा विपत्र के भुगतान की कारवाई की गयी है।

उड़नदस्ता द्वारा बगैर सक्षम प्राधिकार के लीड प्लान की स्वीकृति के लिये इस मद में भुगतान रोके रखे गये भुगतान को रिलिज करने के लिये तत्कालीन कार्यपालक अभियंता लेखा पदाधिकारी एवं लेखा लिपिक को जिम्मेवार माना गया है।

आरोप-2 :- विभाग द्वारा गठित चार सदस्यीय समिति द्वारा दिनांक 28.06.13 से 29.06.13 को स्थल जाँच प्रतिवेदन की कंडिका में अंकित है कि the borrow area Pit are sufficeint away from toe of the embankment उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 6.0 में उल्लेखित है कि तटबंध के कि॰मी॰ 15.05 (L) के पास नदी के किनारे से काटे गये pit दिखलाया गया, जिसकी दूरी 100 कि॰मी॰ थी। तथा कि॰मी॰ 14.80 (L) के निकट तटबंध के टो से नदी की दूरी 10 से 15 मी॰ के बीच पाया गया। इस भाग में नदी का मुख्य किनारा औसत 30 मी॰ दूर था। वहाँ तटबंध के टो से 15 से 30 मी॰ के बीच 60 मी॰ लम्बाई में 1.2 से 1.5 मी॰ की गहराई का pit नदी के एज से कटा हुआ पाया गया। स्वभाविक है कि तटबंध से औसतन 30 मी॰ की दूरी पर नदी के किनारे हो और किनारे के नजदीक औसतन 10-15 मी॰ चौड़ाई में भू-धारियों द्वारा स्वयं मिट्‌टी काट लिया गया है।

उच्चाधिकारियों के औचक निरीक्षण/प्रत्येक माह के अनुश्रवण जाँच दल के स्थलीय जाँच प्रतिवेदन में भी BIS Code का उल्लंघन प्रतिवेदित नहीं है। साक्ष्य के रूप में अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 359 दि॰ 06.03.17 के क्रमांक III के क्रम में कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 477 दि॰ 18.04.17 से उपलब्ध करायी गयी है।

तथ्यों के विवेचन से स्पष्ट है कि तटबंध के निर्माण में उनके द्वारा BIS Code का उल्लंघन किया गया। साक्ष्य आधारित नहीं है मापी पुस्त सं॰ 1884 के पेज 06 से स्पष्ट है कि कि॰मी॰ 14.805 से 14.865 के बीच अधिकांश मिट्‌टी याँत्रिक विधि से ढुलाई की गयी है।

आरोप वर्ष 2012-13 एवं 2013-14 का है जबकि उड़नदस्ता जाँच दि॰ 21.10.14 से 22.10.14 एवं 09.04.15 से 10.

04.15 को स्थलीय जाँच पर आधारित है। आलोच्य कार्य में वे दिनांक 20.07.14 तक ही संलग्न रहे है। उनके पदस्थापन अवधि में इस प्रकार का कोई पीट नहीं था। प्रभार देने के पश्चात किसानों द्वारा अपने निजी जमीन से मिट्‌टी काटकर बेचा गया होगा।

आरोप-3 :- एकरारनामा/BOQ एवं स्वीकृत प्राक्कलन में मिट्‌टी के Compaction के मद अलग-अलग होने, Compaction किये जाने एवं प्रभारी अभियंता द्वारा कोई निदेश नहीं दिये जाने के क्रम में संवेदक को अधिक भुगतान नहीं हो सके। इस हेतु उनके द्वारा Settlement Allowance की प्रक्रिया अपनाते हुए सेटलमेंट की कटौती वास्तविक रूप से की गयी है। (क) Technical Specification (b) में अंकति निदेश के आलोक में Settlement Allownace मद में प्रत्येक आड़ी काट पर भराई की गयी मिट्‌टी के पोस्ट लेवल में 0-625 Cm Per 30 Meter Hight of Bank से अधिक का Allowance दर्शाते हुए graph plotting करते हुए मिट्‌टी की गणना की गयी है। साक्ष्य के रूप में मिट्‌टी कार्य का Volume Sheet एवं ग्राफ सीट नमूना के तौर पर दिया जा रहा है।

आरोप-4 :- माप पुस्त में लीड मापी की प्रविष्टि प्राक्कलन के प्रावधानों के अन्तर्गत प्रतिशत के आधार पर कनीय अभियंता द्वारा की गयी है। उक्त के जाँच वास्तविकता के आधार पर सत्यापित की गयी है जिसे परि॰-20 पर देखा जा सकता है। वास्तविकता रूप से वर्गीकृत कर प्रस्तावित लीड प्लान में लीड से ढुलाई गयी मिट्‌टी के मात्रा के अनुरूप पाया गया। जो निम्न तालिका के अनुरूप स्वीकृत है।27 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020

क्रम माप पुस्त सं॰ पेज सं॰ वर्गीकृत लीड कि॰मी॰ में प्रस्तावित एवं माप पुस्त के अनुसार मिट्‌टी की मात्रा मुख्य अभियंता के पत्रांक 3141 दि॰ 04.12.15 द्वारा स्वीकृत
1. 1884 18 0.15 to 0.50 Km 302184.067 M3 0.15 to 0.50 Km. 302383.67 M3
2. 1884 18 0.50 to 1.0 Km 259014.915 M3 0.50 to 1.0 Km 259051.85 M3

इसी संदर्भ में मुख्य अभियंता के पत्रांक 356 दि॰ 07.02.16 में अंकित है कि लीड प्लान की स्वीकृति वास्तविकता के आधार पर कराये गये कार्य के अनुसार दी जा चुकी है एवं तद्‌नुसार भुगतान की कारवाई कार्यपालक अभियंता द्वारा की गयी है। इस प्रकार उनके द्वारा जाँचित मिट्‌टी कार्य की मात्रा का वर्गीकरण वास्तविकता के आधार पर किये जाने की सम्पुष्टि होती है।

श्री भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) के जवाब की समीक्षा अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

आरोप-1 :- लीड प्लान तैयार करने में अत्याधिक विलम्ब करने तथा सक्षम प्राधिकार से बिना स्वीकृति प्राप्त किये ही अनियमित भुगतान करने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने आरोपित पदाधिकारी के द्वारा प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र तैयार पर क्रमशः दि॰ 15.03.13 एवं दि॰ 01.09.13 को कार्यपालक अभियंता को समर्पित करने जिसमें याँत्रिक विधि से मिट्‌टी ढुलाई की मात्रा सम्मिलित किया गया है। जबकि इसके पूर्व लीड प्लान तैयार कर उच्च पदाधिकारी को समर्पित करते हुए इसकी स्वीकृति प्राप्त करना चाहिये था के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

श्री भट्‌ट द्वारा लीड प्लान विलम्ब से तैयार करने के संबंध में कहा गया है कि उन्हें कनीय अभियंता से दिनांक 29.06.13 को प्राप्त हुआ एवं जाँचोपरान्त उनके द्वारा दि॰ 30.06.13 को कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया था। कार्यपालक अभियंता द्वारा लीड प्लान संबंधित कागजात के साथ अधीक्षण अभियंता को पत्रांक 954 दि॰ 28.08.13 से समर्पित किया गया था। जिसकी पुष्टि संचिका में रक्षित चेक स्लिप एवं संचिका में रक्षित कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 954 दि॰ 25. 08.13 से होती है। श्री भट्‌ट द्वारा यह भी कहा गया है कि अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 62 दि॰ 21.01.2014 से त्रुटियों का निराकरण हेतु लौटाई गयी लीड प्लान को आवश्यक सुधारोपरान्त दि॰ 27.01.14 को कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया। अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 62 दि॰ 21.01.14 एवं लीड प्लान पर किये गये हस्ताक्षर की तिथि से उक्त कथन की पुष्टि होती है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में माना जा सकता है कि श्री भट्‌ट द्वारा तैयार लीड प्लान को जाँचोपरान्त समर्पित करने में विलम्ब नहीं की गयी है।

आरोप के दूसरे अंश के संदर्भ में कहा गया है कि निगरानी विभाग तकनीकी परीक्षक कोषांग के पत्रांक 2347 दि॰ 31.12.1983 के कंडिका 8 (5) में निदेशित है कि कार्यो की मापी दर्ज करना, उसकी जाँच करना अथवा विपत्र बनाना लंबित नहीं रखा जाय, चाहे किसी कारणवश इस मापी से संबंधित विपत्र तुरन्त भुगतान में कठिनाई क्योंकि न हो एवं सिंचाई विभाग के पत्रांक 975 दि॰ 21.02.82 के कंडिका 3 में निदेशित है कि बहुत ऐसे कार्य जिसकी मापी बाद में करना कठिन है या उसकी मापी नहीं की जा सकती है। इस संबंध में कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता की जिम्मेवारी होगी की समय पर मापी कार्यपालक अभियंता को प्रस्तुत कर दे। उक्त दोनों निदेश के अनुपालन में कनीय अभियंता द्वारा प्रविष्टि की गयी मापी/प्रथम एवं द्वितीय विपत्र की मापी की जाँच इनके द्वारा क्रमशः दि॰ 15.03.13 एवं 01.09.13 को की गयी । चूँकि सक्षम पदाधिकारी से लीड प्लान स्वीकृत नहीं किये जाने के कारण प्रथम एवं द्वितीय विपत्र हेतु विपत्र सार पर हस्ताक्षर नहीं किया गया। भुगतान से संबंधित विपत्र कनीय अभियंता द्वारा सीधे कनीय अभियंता द्वारा कार्यपालक अभियंता को उपस्थापित किया गया। उक्त कथन की पुष्टि संचिका में रक्षित माप पुस्त 1842 के पेज सं॰ 1 से 9 तक से परिलक्षित होता है कि श्री भट्‌ट द्वारा प्रथम विपत्र की मापी पर जाँच तो की गयी है लेकिन Abstract of Cost पर उनके द्वारा हस्ताक्षर नहीं की गयी है। माप पुस्त 1842 के पेज सं॰ 23 से 33 पर तैयार किये गये द्वितीय चालू विपत्र पर श्री भट्‌ट का हस्ताक्षर नहीं होने से उनके कथन की पुष्टि होती है। परन्तु माप पुस्त 1842 के पेज सं॰ 34-45 में अंकित तृतीय चालू विपत्र पर श्री भट्‌ट का दिनांक 22.03.14 में हस्ताक्षर किया गया जिसका भुगतान दि॰ 28.03.14 को किया गया है। जो मुख्य अभियंता के स्तर से पत्रांक 3141 दि॰ 04.12.15 से स्वीकृत लीड प्लान के पूर्व का है। अतएव श्री भट्‌ट लीड प्लान की स्वीकृति प्राप्त किये ही विपत्र समर्पित करने के लिये दोषी प्रतीत होते है। परन्तु चूँकि मुख्य अभियंता द्वारा तृतीय विपत्र में प्रावधानित मिट्‌टी की मात्रा यथा 150 मी॰ से 500 मी॰ लीड के 302184.06M3 एवं 500 मी॰ से 1 Km. के लीड के लिये कुल 259014.91M3 का लीड प्लान दिनांक 04.12.15 को स्वीकृत किया जा चुका है। अतएव अधिकाई भुगतान का मामला बनता प्रतीत नहीं होता है। अतएव बिना लीड प्लान स्वीकृति के तृतीय विपत्र समर्पित करने के प्रक्रियात्मक त्रुटि होने के लिये श्री भट्‌ट दोषी प्रतीत होते है एवं आरोप का उक्त अंश प्रमाणित होता है।

आरोप-2 :- BIS Code 11532 के प्रावधान के विपरीत तटबंध के टो के 25 मी॰ के अन्दर मिट्‌टी काटे जाने से संबंधित है।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 28 संचालन पदाधिकारी ने उड़नदस्ता जाँच दल के स्थलीय जाँच के क्रम में तटबंध के R/S में BIS Code 11532 के प्रावधानों के विपरीत 25 मी॰ के अन्दर अनेकों स्थल पर अधिक गहरायी में मिट्‌टी खुदायी कराने तथा प्रस्तावित तटबंध के 15.0 (L) KM एवं 14.80 कि॰मी॰ के निकट तटबंध के टो से 10 से 15 मी॰ के बीच लगभग 60 मी॰ लम्बाई में 1.2 मी॰ से 1.5 मी॰ गहराई के मिट्‌टी काटे जाने के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से स्पष्ट होता है कि आरोपी द्वारा दिये तथ्यों का कोई विशलेषण नहीं किया गया है एवं उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में उद्धित तथ्यों के आधार पर आरोप की प्रमाणिकता निर्धारित किया जाना परिलक्षित होता है।

श्री भट्‌ट द्वारा इस आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि तटबंध के कि॰मी॰ 14.80 के पास औसत 300 मी॰ की दूरी पर नदी का किनारा हो एवं किनारे के नजदीक से औसतन 10-5 मी॰ चौड़ाई में स्वयं भू-धारियों द्वारा मिट्‌टी काट कर बेचे जाने के कारण पीट तटबंध के टो से 15-30 मी॰ देखा गया होगा। यही कारण है कि उच्च पदाधिकारी के औचक निरीक्षण प्रतिवेदन में BIS Code का उल्लंघन करना प्रतिवेदित नहीं है।

श्री भट्‌ट द्वारा यह भी कहा गया है कि आरोप वर्ष 2012-13 एवं 2013-14 का है स्थलीय जाँच दि॰ 21.10.14 से 22.10.14 एवं 09.04.15 से 10.04.15 पर आधारित है जबकि वे दि॰ 20.07.14 तक ही इस कार्य से संलग्न रहे है। उनके पदस्थापना अवधि में इस प्रकार की कोई पीट नहीं था। संभव है कि उनके प्रभार सौंपने के बाद किसानों द्वारा अपने निजी जमीन में मिट्‌टी काट कर बेचा गया होगा।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि प्रश्नगत कार्य के दौरान BIS Code के विपरीत स्थलीय जाँच में तटबंध के टो से 25 मी॰ के अन्दर मिट्‌टी काटी गयी है। भले ही श्री भट्‌ट के कार्यकाल में काटा गया हो अथवा नहीं। उड़नदस्ता जाँच के पश्चात अनुवर्ति कारवाई के अनुपालन में मुख्य अभियंता के पत्रांक 356 दि॰ 07.02.16 के कंडिका-II से स्पष्ट होता है कि संवेदक द्वारा रीभर साईड के टो से निकट मिट्‌टी काटने से बने गड्‌ढ़े को अपने खर्च पर भर दिया गया है। चूँकि प्रश्नगत गड्‌ढ़े भर दिया गया है एवं आरोपी द्वारा कहा जाना कि उनके प्रभार सौंपने के बाद तटबंध के निकट मिट्‌टी काटी गयी है की स्थिति में आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप-3 :- मिट्‌टी कार्य में सेटलमेंट की कटौती न कर संवेदक को अधिक भुगतान किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने एकरारनामा के कंडिका 10.2B के अनुसार मिट्‌टी कार्य में सेटलमेंट की कटौती करने का प्रावधान है परन्तु आरोपी द्वारा पारित विपत्र में मिट्‌टी कार्य के सेटलमेंट मद में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गयी। ऐसा नहीं किये जाने के कारण संवेदक को अधिकाई भुगतान का मामला बना जिसके आधार पर आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

श्री भट्‌ट द्वारा प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र जो इनके द्वारा जाँचित नहीं है संबंधित माप पुस्त तथा सेटलमेंट Allowance & deduction of settlement जो एकरारनामा के Special Condition में उद्धित का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उनके द्वारा तृतीय विपत्र में प्रस्तावित मिट्‌टी की मात्रा में Settlement Allowance की प्रक्रिया अपनाते हुए सेटलमेंट की कटौती वास्तविक रूप से की गयी यथा सेटलमेंट मद में प्रत्येक आड़ीकाट पर भराई गयी मिट्‌टी के पोस्ट लेवल में 1/49 से अधिक का Allownace दर्शाते हुए Graph plotting करते हुए मिट्‌टी कार्य की मात्रा की गणना की गयी है साक्ष्य के रूप में गणना सीट एवं आड़ी काट उपलब्ध कराया गया है।

अभिलेखों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि श्री भट्‌ट द्वारा प्रथम चालू विपत्र के लिये कनीय अभियंता द्वारा दर्ज की गयी मिट्‌टी की गणना की जाँच की गयी है परन्तु इनके द्वारा प्रथम एवं द्वितीय विपत्र के सार (Abstract of Amount) पर हस्ताक्षर नहीं किया गया है अर्थात्‌ प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र में इनकी कोई सहभागिता परिलक्षित नहीं होता है। तृतीय विपत्र की जाँच इनके द्वारा करते हुए भुगतान हेतु कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया है जिसमें प्रथम एवं द्वितीय विपत्र के अतिरिक्त कुल 50969 घन मी॰ मिट्‌टी की मात्रा का समावेश किया गया है। इनके द्वारा कहा गया है कि उक्त मिट्‌टी की मात्रा में सेटलमेंट की कटौती कर प्रावधान किया गया है। संचिका में रक्षित गणना सीट एवं आड़ीकाट से स्पष्ट होता है कि तृतीय विपत्र हेतु आड़ीकाट के आधार पर विभिन्न बाँध के निर्माण हेतु कुल 19577. 7924409.6412469.67=56457.10 घन मी॰ मिट्‌टी की गणना की गयी है। परन्तु भुगतान मात्र 50696.0 घन मी॰ का किया गया है। इस प्रकार 56457.10-50696.0=5488.10 घन मी॰ कम का भुगतान होना परिलक्षित होता है। जो कराये गये कार्यो का कुल 9.72 प्रतिशत होता है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.1.10 से परिलक्षित होता है कि जाँच के समय लगभग 325000 घन मी॰ मिट्‌टी का भुगतान नहीं किया गया था। अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र में सेटलमेंट की कटौती नहीं किया गया है चूँकि प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र का भुगतान होने में श्री भट्‌ट की सहभागिता नहीं रही है। ऐसी स्थिति में उक्त दोनों विपत्र में पायी गयी त्रुटियों के लिये श्री भट्‌ट को जिम्मेवार माना जाना उचित प्रतीत नहीं होता है एवं चूँकि तृतीय विपत्र में सेटलमेंट की कटौती किया जाना परिलक्षित है। ऐसी स्थिति में इनके विरूद्ध सेटलमेंट की कटौती नहीं कर अधिकाई भुगतान करने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।

उल्लेखनीय है कि उड़नदस्ता जाँच के पश्चात अनुवर्ति कारवाई के तहत की गणना कारवाई से संबंधित मुख्य अभियंता के पत्रांक 356 दि॰ 07.02.16 के कंडिका (iii) से स्पष्ट होता है कि समेकित रूप से प्रावधान के अनुरूप सेटलमेंट की कटौती कर ली गयी है। अतएव अधिकाई भुगतान का मामला वर्त्तमान में बनता प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप-4 :- मिट्‌टी कार्य की मात्रा का वर्गीकरण लीड के आधार पर नहीं किये जाने से संबंधित है।29 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संचालन पदाधिकारी ने प्रथम एवं द्वितीय विपत्र में मिट्‌टी कार्य की गणना वास्तविक लीड के बदले बिना लीड प्लान की स्वीकृति प्राप्त किये ही प्रतिशत के आधार पर किये जाने तथा राजस्थानी टै्रक्टर से किये गये मिट्‌टी कार्य एवं याँत्रिक विधि से किये गये मिट्‌टी कार्य का विपत्र प्रतिशत के आधार पर तैयार किया गया। जबकि वास्तविक रूप से कराये गये मिट्‌टी कार्य का भुगतान नहीं किये जाने के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया।

श्री भट्‌ट द्वारा कहा गया है कि माप पुस्त में कनीय अभियंता द्वारा प्राक्कलन के प्रावधानों के अन्तर्गत प्रतिशत के आधार पर प्रविष्टि की गयी। परन्तु उनके द्वारा प्रविष्टि की जाँच वास्तविकता के आधार पर गणित कर सत्यापित की गयी एवं कनीय अभियंता द्वारा प्रतिशत में की गयी प्रविष्टि के वर्गीकरण तथा तदनुरूप मिट्‌टी की मात्रा के अन्तर्गत ही पाया गया साक्ष्य के रूप में गणना सीट दिया गया है।

माप पुस्त के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि प्रश्नगत योजना के तहत कराये गये कुल मिट्‌टी कार्य की कुल मात्रा का 35 प्रतिशत राजस्थानी टै्रक्टर से एवं 35 प्रतिशत याँत्रिक विधि से 150 मी॰ से 500 मी॰ लीड में तथा 30 प्रतिशत याँत्रिक विधि से 500 मी॰ से 1.0 कि॰मी॰ लीड में विभक्त कर भुगतान की कारवाई की गयी है। श्री भट्‌ट द्वारा उपलब्ध कराये गये गणना सीट से स्पष्ट होता है कि प्रश्नगत योजना में तटबंध बार याँत्रिक विधि से 150 मी॰ से 500 मी॰ एवं 500 मी॰ से 1.0 कि॰मी॰ लीड से ढुलाई गयी मिट्‌टी का रीचवार गणना की गयी है। साथ ही राजस्थानी ट्रैक्टर से कराये गये मिट्‌टी कार्य की भी गणना की गयी है जो निम्नवत्‌ है।

राजस्थानी टै्रक्टर से (0.0 मी॰ से 150 मी॰)- 301954.93M3 याँत्रिक विधि से (150 मी॰ से 500 मी॰ लीड)- 302383.67M3 याँत्रिक विधि से (500 मी॰ से 1.0 कि॰मी॰ लीड)- 259051.85M3 कनीय अभियंता द्वारा प्रतिशत के आधार पर मिट्‌टी कार्य की मात्रा का की गयी प्रविष्टि एवं सहायक अभियंता श्री भट्‌ट द्वारा उपलब्ध कराये गये मिट्‌टी की गणना सीट में अंकित मिट्‌टी की मात्रा तथा लीड लगभग अनुरूप होना परिलक्षित होता है। चूँकि याँत्रिक विधि से ढुलाई गयी मिट्‌टी की मात्रा (जो माप पुस्त में दर्ज है) के अनुरूप ही लीड प्लान की स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा प्रदान की गयी है। ऐसी स्थिति में अनियमित भुगतान का मामला बनता प्रतीत नहीं होता है परन्तु लीड प्लान स्वीकृति प्राप्त किये ही याँत्रिक विधि से भुगतान करने की प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिये इन्हें दोषी माना जा सकता है एवं आरोप का उक्त अंश प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत उक्त के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से आंशिक सहमत होते हुए श्री भट्‌ट के विरूद्ध आरोप-1 एवं 4 का आंशिक भाग बिना लीड प्लान के स्वीकृति के बिना ही तृतीय विपत्र के माध्यम से याँत्रिक विधि से भुगतान करने के प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिये दोषी पाये गये है तथा शेष आरोप सं॰ 2 एवं 3 यथा BIS Code के अनुरूप कार्य नहीं कराने तथा मिट्‌टी भराई कार्य में सेटलमेंट की कटौती नहीं करने के लिये दोषी नहीं पाये गये है। अतएव उक्त आंशिक प्रमाणित आरोपों के लिए श्री भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी को निम्न दण्ड देने का विनिश्चय अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिया गया है।

"आरोप वर्ष (2013-14) के लिए निन्दन"। अतएव अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुभाष चन्द्र भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी सम्प्रति सहायक अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-3, पटना को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

"आरोप वर्ष (2013-14) के लिए निन्दन"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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18 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-01/2014-2361--श्री ओम प्रकाश अम्बरकर (आई0डी0-3467), तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर के उनके उक्त पद पर पदस्थापन अवधि के दौरान (आरोप वर्ष 2013-14) अधवारा समूह की नदी झीम, जमुरा एवं बांके नदी पर हो रहे तटबंध निर्माण तथा 10 अद्‌द एन्टी फ्लड स्लूईस के निर्माण में दिये गये परिवाद पत्र के आलोक में मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा कराई गई। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन में उद्धृत तथ्यों एवं साक्ष्यों की विभागीय समीक्षा की गई। समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित निम्नलिखित आरोपों के लिए श्री अम्बरकर, तत्कालीन मुख्य अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र-'क' गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2292, दिनांक 07.10. 2015 से स्पष्टीकरण पूछा गया। आरोप- BIS CODE-11532 के प्रावधानाें का अनुपालन सुनिश्चित नहीं कराना तथा लीड प्लान/बौरो एरिया का सत्यापन अथवा इसे तैयार करा कर स्वीकृत की कार्रवाई नहीं किया जाना।

उक्त के आलोक में श्री अम्बरकर, तत्कालीन मुख्य अभियंता नेे पत्रांक-3335, दिनांक-26.12.15 से स्पष्टीकरण का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसके सम्यक समीक्षोपरांत निम्न तथ्य पाये गये :- आरोप -1 :- उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.1.6 में उद्धित तथ्यों से स्पष्ट है तटबंध निर्माण कार्य हेतु BIS Code IS-11532-1995 में तटबंध के टो से वैरोपिट का निर्धारण निम्नवत्‌ रूप से किया गया है।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 30

Distance of Maximum Borrow Pits from toe of embankment Depth of Borrow Pits
River Side Country Side
25 to 50 Meter 1 m 0.6 m
Over 50 Meter up to 75 M 1.5 m 0.6 m
Over 75 Meter up to 100 M 2.0 m 0.6 m

BIS Code 11532 में यह अंकित है कि 6 Meter Height तक के तटबंध निर्माण में तटबंध के टो से 25 मी॰ तथा 6 Meter Height से अधिक के तटबंध के निर्माण में तटबंध के टो से 50 मी॰ के अन्दर Borrow Area का प्रावधान नहीं करना है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के समीक्षित कंडिका 10.0.0 (घ) में स्पष्ट उद्धित है कि तटबंध के टो से Rive Side में BIS Code के प्रावधान के विपरीत 25 मी॰ के अन्दर में भी कतिपय स्थानों पर Pit/Borrow Area से अधिक गहराई में मिट्‌टी खुदायी की गयी है। उक्त से स्पष्ट है कि कार्य के दौरान BIS Code का अनुपालन नहीं किया गया है एवं पर्यवेक्षण कार्य के लिये मुख्य अभियंता/अधीक्षण अभियंता को जिम्मेवार माना गया है। श्री अम्बरकर, तत0 मुख्य अभियंता अपने बचाव बयान में इस आरोप के संदर्भ में उड़नदस्ता जाँच के पश्चात जाँच प्रतिवेदन के आलोक में पाये गये त्रुटियों के निराकरण के संदर्भ में विभागीय पत्रांक 1745 दिनांक 09.07.15 द्वारा अनुवर्त्ति कारवाई हेतु दिये गये निदेश के अनुपालन से संबंधित मुख्य अभियंता कार्यालय से विभिन्न निर्गत पत्र को संलग्न करते हुए कृत कारवाई का उल्लेख किया गया है एवं कहा गया है कि समुचित पर्यवेक्षण के बाद भी प्रमंडलीय/अंचलीय पदाधिकारियों के शिथिलता के कारण संवेदक द्वारा एक बिन्दु पर River Side में ऐसा पिट बनाया गया था जिसे संवेदक के द्वारा अपने मूल्'य पर भर दिया गया है। जबकि उड़नदस्ता द्वारा स्थलीय जाँच में कतिपय स्थलों पर तटबंध के टो से 25 मी॰ के अन्दर प्रावधान से अधिक गहराई में मिट्‌टी खुदायी किया हुआ पाया गया है। आरोपी द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है जिससे परिलक्षित हो सके की कार्य के दौरान इनके द्वारा उक्त अनियमित कृत को रोकने का प्रयास किया गया है। अथवा BIS Code का अनुपालन कराने हेतु निदेश निर्गत किया गया है तथा न कोई निरीक्षण प्रतिवेदन ही उपलब्ध कराया गया है। इससे स्पष्ट है कि इनके द्वारा कार्यो के पर्यवेक्षण कार्य में रूचि नहीं ली गयी है। उपरोक्त वर्णित तथ्यों तथा जाँच प्रतिवेदन के आलोक में BIS Code के प्रावधान का अनुपालन कराने के दिशा में कोई कारवाई नहीं करने तथा पर्यवेक्षण कार्य में शिथिलता बरतने के आरोप को प्रमाणित माना जा सकता है। आरोप सं॰ -2- जो मिट्‌टी ढुलाई कार्य में लीड प्लान/बैरों एरिया का सत्यापन नहीं करने तथा इसे तैयार कराकर स्वीकृति की कारवाई नहीं किये जाने से संबंधित है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.1.8(ii) एवं (iii), 10.0.0 (ज) तथा 11.0.0 (iii), (iv) एवं (v) से स्पष्ट है कि प्रथम एवं द्वितीय विपत्र में बिना लीड प्लान की स्वीकृति के लीड युक्त मिट्‌टी ढुलाई का अनियमित ढंग से भुगतान किया गया है फलतः संवेदक को नियम के विरूद्ध अघिक भुगतान करने का मामला बना है। लीड प्लान विलम्ब से समपर्ण करने के लिये कार्य में संलग्न कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता तथा कनीय अभियंता को जिम्मेवार माना गया है साथ ही पर्यवेक्षण पदाधिकारी यथा अधीक्षण अभियंता एवं मुख्य अभियंता को कराये जा रहे कार्य के समय इनके स्तर से लीड प्लान/बौरो एरिया का सत्यापन अथवा इसे तैयार कराकर स्वीकृति की कार्रवाई नहीं करने तथा पर्यवेक्षण में कमी के लिये दोषी माना गया है। आरोपी श्री अम्बरकर अपने बचाव बयान के साथ लीड प्लान से संदर्भित अधीक्षण अभियंता शीर्ष कार्य अंचल सीतामढ़ी के अनेकों पत्रों जो कार्यपालक अभियंता को संबोधित है तथा मुख्य अभियंता को दिये गये है को संलग्न करते हुए कहा गया है कि दिनांक 24.02.14 को प्रभार ग्रहण के पश्चात से ही अधोहस्ताक्षरी द्वारा संदर्भित लीड प्लान की स्वीकृति हेतु हर संभव प्रयास किया गया। चूंकि यह मामला काफी पुराना एवं गंभीर वित्तीय से संबंधित था तथा अन्य कार्यो में व्यस्तता के कारण थोड़ा विलम्ब से पत्रांक 3141 दिनांक 01.12.15 द्वारा लीड प्लान की स्वीकृति प्रदान की गयी है। आरोप के बचाव बयान के साथ संलग्न अधीक्षण अभियंता शीर्ष कार्य अंचल, सीतामढ़ी के पत्रांक 1332 दिनांक 09. 09.14 से स्पष्ट होता है कि कार्यपालक अभियंता से प्राप्त लीड प्लान को आवश्यक सुधार हेतु प्रमंडल को लौटाया गया है एवं पुनः समर्पण हेतु स्मारित किया गया है इसके अतिरिक्त अधीक्षण अभियंता द्वारा 1417 दिनांक 17.09.15, 1466 दिनांक 21. 09.14, 1587 दिनांक 14.10.14, 1810 दिनांक 01.12.14 से कार्यपालक अभियंता को स्मारित करने के पश्चात अंचल को प्राप्त लीड प्लान दिनांक 25.02.15 को मुख्य अभियंता कार्यालय को प्राप्त हुआ। इसी बीच मुख्य अभियंता अपने पत्रांक 2334 दिनांक 14.09.14, 2900 दिनांक 24.11.14, 3145 दिनांक 19.12.14 से अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता को लीड प्लान सुधारोपरान्त समर्पण एवं बिना लीड प्लान की स्वीकृति के भुगतान नहीं करने का निदेश दिया गया है। मुख्य अभियंता अपने पत्रांक 36 दिनांक 07.01.15 के द्वारा बिना लीड प्लान के स्वीकृति के किये गये भुगतान में संलग्न पदाधिकारी के संर्दभ में अभियंता प्रमुख (उत्तर) को अवगत कराया गया। पुनः पत्रांक 381 दिनांक 06.12.15 से लीड प्लान स्थिति के संबंध में विभाग को अवगत कराया गया है। अंततः अधीक्षण अभियंता के द्वारा दिनांक 25.02.15 को आरोपी पदाधिकारी को लीड प्लान सुधारोपरान्त प्राप्त कराया जाना परिलक्षित है। अभियंता प्रमुख (उत्तर) अपने पत्रांक 461 दिनांक 12.02.15 से बिना लीड प्लान के स्वीकृति के अनियमित भुगतान करने वाले पदाधिकारी को चिन्हि्‌त करते हुए प्रपत्र 'क' की मांग की गयी है। उक्त के31 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 अनुपालन में मुख्य अभियंता द्वारा अधीक्षण अभियंता से प्रतिवेदन की मांग की गयी है। साथ ही कार्यपालक अभियंता, योजना एवं रूपांकण प्रमंडल-3, मुजफ्फरपुर से लीड प्लान की जाँच करायी गयी तथा लीड प्लान में वांछित सुधार हेतु कार्यपालक अभियंता/अधीक्षण अभियंता को निदेश दिया गया। अन्ततः मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 10.10.15 को सुधारोपरान्त प्राप्त लीड प्लान की स्वीकृति दिनांक 01.12.15 को दी गयी। उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि श्री अम्बरकर द्वारा दिनांक 24.02.14 को मुख्य अभियंता का प्रभार ग्रहण के पश्चात लीड प्लान की स्वीकृति की दिशा में प्रयास किया गया परन्तु कार्यपालक अभियंता के असहयोगात्मक रवैया के कारण लीड प्लान की स्वीकृति में विलम्ब होना परिलक्षित होता है। अतएव श्री अम्बरकर, तत्कालीन मुख्य अभियंता को लीड प्लान की स्वीकृति के दिशा में कारवाई नहीं करने के लिए दोषी नहीं माना जा सकता है।

समीक्षोपरांत श्री ओम प्रकाश अम्बरकर, तत्कालीन मुख्य अभियंता के विरूद्ध आरोप सं॰-1 का अंश BIS Code के प्रावधानों को ससमय अनुपालन नहीं कराने तथा पर्यवेक्षण में कमी के आरोप को प्रमाणित परन्तु मिट्‌टी ढुलाई कार्य के लीड प्लान तैयार कराकर स्वीकृति प्रदान नहीं करने के आरोप को अप्रमाणित पाया गया एवं तदोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक संख्या-2674, दिनांक 30.12.16 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17(2) में विहित रीति से संचालन पदाधिकारी एवं प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी की नियुक्ति करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

उक्त के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-148, दिनांक 07.04.17 से जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :-

आरोपित पदाधिकारी के प्रपत्र-'क' में अंकित आरोप एवं साक्ष्य के रूप में संलग्न उड़नदस्ता का जाँच प्रतिवेदन तथा लिखित बचाव बयान की समीक्षा की गयी। सीतामढ़ी जिलान्तर्गत अधवारा समूह की नदियों झीम जमूरा एवं बांके नदी पर तटबंध निर्माण एवं 10 अद्‌द प्रस्तावित संरचना के निर्माण कार्य के अन्तर्गत तटबंध का निर्माण किया गया। उड़नदस्ता दल द्वारा स्थलीय जाँच के क्रम में पाया गया कि तटबंध के टो से रिभर साईड में BIS code-11532 के प्रावधानों के विपरीत 25मी0 के अन्दर अनेकों स्थान पर बौरो एरिया से अधिक गहराई में मिट्टी की खुदाई कर तटबंध का निर्माण का कार्य कराया गया है। उड़नदस्ता जाँच दल द्वारा स्थल निरीक्षण के क्रम में यह भी पाया गया कि झीम नदी के प्रस्तावित तटबंध के 15.05 (L) कि0मी0 एवं 14.80 (L) कि0मी0 के निकट तटबंध के टो से 10 से 15 मीटर के बीच लगभग 60 मीटर के लंबाई में 1.2 से 1.5मी0 गहराई में मिट्टी काटा गया था। जो BIS code में निर्धारित प्रावधान के विपरीत था। BIS code 11532 में दिये गये प्रावधान Annexure-1 पर संलग्न है।

उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा तटबंध के निर्माण कार्य में BIS code 11532 के प्रावधानों का अनुपालन नहीं कराया गया। अतएव इन पर लगाये गये आरोप प्रमाणित होते है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1273 दिनांक 11.06.18 से श्री अम्बरकर से अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई। जिसके आलोक में श्री अम्बरकर द्वारा अपने पत्रांक-803 दिनांक 01. 10.18 से अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा ) समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई :-

उड़नदस्ता जाँच दल द्वारा स्थलीय जाँच के क्रम में पाया गया है कि तटबंध के टो से रिभर साईड में BIS Code 11532 के प्रावधान के विपरीत 25 मी॰ के अन्दर अनेकों स्थल पर बौरो एरिया से अधिक गहराई में मिट्‌टी की खुदायी कर तटबंध का निर्माण करायाा गया है। तथा झीम नदी के प्रस्तावित तटबंध के 15.05 (L) कि॰मी॰ एवं 14.80 (L) कि॰मी॰ के निकट तटबंध के टो से 10 से 15 मी॰ के बीच लगभग 60 मी॰ के लम्बाई में 1.2 से 1.5 मी॰ गहराई में मिट्‌टी काटा गया था। जो BIS Code के विपरीत था। संचालन पदाधिकारी द्वारा इस बात को ध्यान में नहीं रखा गया कि वे मुख्य अभियंता के पद पर पदस्थापित थे एवं उनका कार्यक्षेत्र काफी व्यापक था। मुख्य अभियंता के स्तर के पदाधिकारी के लिये यह कतई संभव नहीं था कि सभी योजनाओं को उनके स्तर से निरीक्षण करते/स्थल निरीक्षण किया गया। परन्तु इस प्रकार की अनियमितता नहीं पायी गयी थी। यह दायित्व कार्यपालक अभियंता से कनीय अभियंता का था।

श्री अम्बरकर, तत्कालीन मुख्य अभियंता से प्राप्त अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) के जवाब की समीक्षा अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

आरोप है कि प्रश्नगत तटबंध के निर्माण कार्य में BIS Code में प्रावधानित कंडिकाओं जिसमें तटबंध के टो से 25 मी॰ के अन्दर मिट्‌टी नहीं काटना है जिसका अनुपालन नहीं कराने से संबंधित है।

उड़नदस्ता जाँच दल के स्थल निरीक्षण के क्रम में पाया गया कि तटबंध के टो (Toe) से रिभर साईड में BIS Code 11532 के प्रावधानों के विपरीत 25 मी॰ के अन्दर प्रस्तावित तटबंध के कि॰मी॰ 15.05 (L) एवं 14.80 (L) के निकट तटबंध के टो से 10 से 15 मी॰ के बीच लगभग 60 मी॰ लम्बाई में 1.2 से 1.5 मी॰ गहराई में मिट्‌टी काटी गयी है। श्री अम्बरकर द्वारा कहा गया है कि वे मुख्य अभियंता के पद पर कार्यरत थे एवं उनका कार्यक्षेत्र काफी व्यापक होने के कारण यह कतई संभव नहीं था की सभी योजनाओं को उनके स्तर से निरीक्षण करते। उनके द्वारा जब भी निरीक्षण किया गया इस प्रकार की अनियमितता नहीं पायी गयी। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के तहत प्रश्नगत कार्य अतिमहत्वपूर्ण एवं काफी बड़ा योजना का कार्यान्वयन चल रहा था। ऐसी स्थिति में कहना कि उक्त योजना का निरीक्षण करना संभव नहीं था। हास्यप्रद प्रतीत होता है।32 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 श्री अम्बरकर द्वारा स्थल निरीक्षण से संबंधित कोई निरीक्षण प्रतिवेदन एवं कोई अन्य अभिलेख उपलब्ध नहीं कराया गया है।

श्री अम्बरकर द्वारा यह भी कहा गया है कि प्रमंडलीय/अंचलीय पदाधिकारी के शिथिलता के कारण संवेदक द्वारा एक बिन्दु पर रिभर साईड में ऐसा पीट बनाया गया था, जिसे संवेदक द्वारा अपने मूल्य पर ही भर दिया गया है। साक्ष्य के रूप में कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 1364 दि॰ 25.12.15 का उल्लेख किया गया है परन्तु उनके द्वारा उक्त पत्र की प्रति उपलब्ध नहीं कराया गया है। ऐसी स्थिति साक्ष्य विहिन कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी द्वारा इस आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत उक्त के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री अम्बरकर, तत0 मुख्य अभियंता के विरूद्ध आरोप-1 BIS Code 11532 में प्रावधानित नियमों का उल्लंघन करते हुए तटबंध के टो से 25 मी॰ के अन्दर मिट्‌टी कटाई को रोकने के दिशा में कोई कारवाई नहीं किये जाने का आरोप प्रमाणित होता है।

अतएव उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अम्बरकर, तत्कालीन मुख्य अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी को निम्न दण्ड देने का विनिश्चय अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिया गया है।

"आरोप वर्ष (2013-14) के लिए निन्दन"। अतएव अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री ओम प्रकाश अम्बरकर, तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर सम्प्रति मुख्य अभियंता, बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड, वीरचंद पटेल पथ, पटना को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

"आरोप वर्ष (2013-14) के लिए निन्दन"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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13 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-14/2010-2339--श्री राजेन्द्र प्रसाद (आई0डी0-4561), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि (आरोप वर्ष 2010-11 एवं 2011-12) के दौरान श्री नवल किशोर शाही (पूर्व मंत्री)-सह-अध्यक्ष कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति से प्राप्त परिवाद पत्र में एच0एस0सी0एल0 द्वारा बागमती नदी के तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण एवं विस्तारीकरण प्राक्कलन के अनुसार नहीं करने सरकार द्वारा आवंटित राशि की लूट एवं कार्य पेटी कान्ट्रैक्टर से कराने से संबंधित मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गई। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई समीक्षोपरांत प्रथम द्रष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-949, दिनांक 24.04.2015 से श्री प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री प्रसाद से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक संख्या-563, दिनांक 05.04.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) में निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित करते हुए संचालन पदाधिकारी एवं प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी की नियुक्ति की गई।

आरोप सं0-1-उड़नदस्ता जाँच के क्रम में इतने महत्वपूर्ण कार्य बागमती बाढ़ प्रबंधन योजना के कार्यान्वयन से संबंधित अभिलेखों यथा स्वीकृत वार्षिक अनुमोदित कार्यक्रम, स्वीकृत प्राक्कलन इनके विरूद्ध भोति एवं वित्तीय प्रगति, लीड प्लान, किसाानों को अस्थाई भू-अर्जन का भुगतान से संबंधित अभिलेख, मुख्य अभियंता का निरीक्षण प्रतिवेदन एवं अन्य वांछित अभिलेखों का संधारण प्रमंडल स्तर पर नहीं किया गया जो एक गंभीर मामला है एवं कर्त्तव्यहीनता का द्योतक है जिसके लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी है।

आरोप सं0-2-बागमती दायाँ तटबंध के कि0मी0 38.825 से 45.30 कि0मी0 के बीच के उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य में मार्च 2009 के पूर्व कुल 480469.99 घनमीटर का मिट्टी कार्य कराया गया है। परन्तु दो वर्षों के बाद आपके द्वारा मापपुस्त सं0-760 के पृष्ठ सं0-26 पर पूर्व में अंकित अर्थ वर्क की कुल मात्रा का Rolling and compaction के मद में 409585.37 घनमी0 का रू0 19.70 प्रति घनमी0 के दर से एवं 70884.62घनमी0 रू0 20.20 प्रति घनमी0 के दर से करने के कारण कुल 35442/- रूपये का अनियमित भुगतान किया गया है। जिसका कोई वैद्य कारण अंकित नहीं है। इतनी लंबी अवधि के बाद पूर्व में कराय्र गये मिट्टी कार्य की मात्रा को दो भिन्न दर से Rolling and compaction के मद में भुगतान करने से प्रथम द्रष्टया इसमें 49,613/-रूपये का अतिरिक्त भुगतान होना परिलक्षित है। उक्त अनियमित/अतिरिक्त भुगतान करने के लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी हैं।

आरोप सं0-3-दिनांक 10.03.2009 तक विभिन्न लीड से ढुलाई की गई मिट्टी का भुगतान उस समय के प्रभावी अनुसूचित दर के अनुसार वाउचर संख्या-17 दिनांक 17.03.2009 से कर दिया गया था। किन्तु उनके द्वारा 5th on A/C bill में उसी अवधि में किये गये कार्य का भुगतान 12.08.2009 तक प्रभावी दर के आधार पर दिनांक 18.03.2011 को किया गया जो MOU में निहित शर्त्तों के विरूद्ध है। इस प्रकार मार्च 2009 में कराये गये 70884 घनमी0 मिट्टी कार्य का अन्य मदों में दिनांक 12.08.2009 के प्रभावी अनुसूचित दर के आधार पर भुगतान किये जाने से कुल 13,08,153/- रूपये का अधिक भुगतान किया गया जिसके लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी हैं।

संचालन पदाधिकारी द्वारा पत्रांक-599, दिनांक 19.08.2016 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री प्रसाद के विरूद्ध प्रपत्र के में गठित तीनों आरोपों के संबंध में निम्नलिखित मंतव्य/निष्कर्ष अंकित किया गया है -33 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोप संख्या-1-बागमती बाढ़ प्रबंधन परियोजना एक विशेष प्रकार का कार्य है जिसे भारत सरकार, जल संसाधन विभाग के एडभाईजरी कमिटि की अनुशंसा के अनुरूप विभिन्न चरणों में कार्यान्वित किया जाना है। इस योजना के अन्तर्गत बागमती नदी के बायें एवं दायें तटों पर निर्मित तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण, विस्तारीकरण एवं अनिर्मित तटबंधों के निर्माण कार्य हेतु सर्वेक्षण, रूपांकण, गुण नियंत्रण आदि तथा विस्तृत योजना प्रतिवेदन तैयार करना एवं योजना का कार्यान्वयन का कार्य टर्नकी (Turnkey) basis पर भारत सरकार के उपक्रम मेसर्स हिन्दुस्तान स्टील वक्र्स कन्स्ट्रक्शन लिमिटेड द्वारा एम0ओ0यू0 के तहत कराये जा रहे है। इस एम0ओ0यू0 का स्वरूप सामान्यतः कार्य विभागों में प्रचलित अन्य एकरारनामा यथा एस0बी0डी0 या एफ 2 आदि के स्वरूप के बिल्कुल अलग है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि एम0ओ0यू0 के अन्तर्गत कराये जाने वाले प्रत्येक कार्य के लिये प्रमंडल स्तर पर कोई औपचारिक एकरारनामा नहीं किया जा रहा है जिसके कारण संवेदक के उपर समय पर कार्य पूरा कराने का दबाव नहीं रहता है एवं पुर्नरीक्षित प्राक्कलन स्वीकृत करने के समय भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

संचालन के क्रम में श्री प्रसाद द्वारा योजना का अनुमोदित विस्तृत योजना प्रतिवेदन की छायाप्रति वर्ष 2007 एवं 2009 का अनुसूचित दर पुस्तक की छायाप्रति संदर्भित कार्य का वर्ष 2008 में मु0 अभि0 द्वारा स्वीकृत प्राक्कलन एवं वर्ष 2010 में मु0 अभि0 द्वारा स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन की छायाप्रति, लेवेल बुक की छाया प्रति, मु0 अभि0 द्वारा अनुमोदित वार्षिक कार्यक्रम की छायाप्रति प्रभार रिपोर्ट की छायाप्रति एवं संबंधित मापीपुस्त सं0-708 एवं 760 की छायाप्रति उपलब्ध कराये गये है। उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.2.1 से स्पष्ट है कि श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता द्वारा माप पुस्त संख्या-678 (पृ0 12 से 18), 708 (पृ0 1 से 14), 760 (पृ0 1 से 41) एवं 709 (पृ0 1 से 24) की छायाप्रति उड़नदस्ता जाँच दल को भी उपलब्ध करायी गयी। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 6(x) में वांछित अभिलेखों का संधारण समुचित रूप से नहीं करने के लिये मुख्य रूप से जिम्मेवार पदाधिकारियों की सूची में श्री प्रसाद का नाम अंकित नहीं है। संचालन के दौरान पृच्छा के क्रम में श्री राजेन्द्र प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, शिवहर द्वारा बताया गया कि वे दिनांक 30.06.2010 को उक्त पद का प्रभार ग्रहण किये। साक्ष्य के रूप में प्रभार प्रतिवेदन (प्रपत्र-202) की छायाप्रति उनके द्वारा उपलब्ध कराया गया है। निष्कर्ष -उपरोक्त कंडिका में उल्लेखित अभिलेख संधारण किये गये परिलक्षित होते है।

आरोप संख्या-2- बागमती बाढ़ प्रबंधन परियोजना एक विशेष प्रकार का कार्य है जिसे भारत सरकार, जल संसाधन विभाग के एडभाईजरी कमिटि की अनुशंसा के अनुरूप विभिन्न चरणों में कार्यान्वित किया जाना है। इस योजना के अन्तर्गत बागमती नदी के बायें एवं दायें तटों पर निर्मित तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण, विस्तारीकरण एवं अनिर्मित तटबंधों के निर्माण कार्य हेतु सर्वेक्षण, रूपांकण, गुण नियंत्रण आदि तथा विस्तृत योजना प्रतिवेदन तैयार करना एवं योजना का कार्यान्वयन का कार्य टर्नकी (Turnkey) basis पर भारत सरकार के उपक्रम मेसर्स हिन्दुस्तान स्टील वक्र्स कन्स्ट्रक्शन लिमिटेड द्वारा एम0ओ0यू0 के तहत कराये जा रहे है। इस एम0ओ0यू0 का स्वरूप सामान्यतः कार्य विभागों में प्रचलित अन्य एकरारनामा यथा एस0बी0डी0 या एफ-2 आदि के स्वरूप के बिल्कुल अलग है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि एम0ओ0यू0 के अन्तर्गत कराये जाने वाले प्रत्येक कार्य के लिये प्रमंडल स्तर पर कोई औपचारिक एकरारनामा नहीं किया जा रहा है जिसके कारण संवेदक के उपर समय पर कार्य पूरा कराने का दबाव नहीं रहता है एवं पुर्नरीक्षित प्राक्कलन स्वीकृत करने के समय भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

विषयांकित परिवाद बागमती दायाँ तटबंध के कि0मी0 38.825 से 45.30 कि0मी0 के बीच उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य से संबंधित है जो योजना आयोग भारत सरकार के पत्रांक-2 (221) 2006-WR दिनांक 15.02.2008 द्वारा Raising and strengthening of embankment along river Bagmati North Bihar (First Phase Work upto 54KM) के लिये 135.16 करोड की परियोजना का एक अंश है जिसे मार्च 2010 तक पुरा किया जाना था। मई 2008 में विषयांकित कार्य का प्राक्कलन संवेदक द्वारा तैयार किया गया जिसकी औपबंधिक तकनीकी स्वीकृति परियोजना के नियंत्री पदाधिकारी मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा 27 जून 2008 को दी गयी। औपबंधिक प्राक्कलन उस समय के प्रभावी Shedule of rate (SOR effective from 1-10-2007) के आधार पर स्वीकृत किया गया था। वर्ष 2007 के अनुसूचित दर (SOR) में Rolling and compaction (SOR item no. 7.1.30) के मद में रू0 19.70 का दर अंकित है। उक्त स्वीकृत प्राक्कलन के आधार पर रू0 4,09,585.37 घनमी0 मिट्‌टी का कार्य जून 2008 में कराया गया जिसका भुगतान रू0 19.70 के दर से किया गया। शेष 70, 884.62 घनमी0 मिट्‌टी का कार्य मार्च 2009 में कराया गया। फरवरी 2009 में ही राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति के पत्रांक-23(अनु0) दिनांक 25.02.2009 द्वारा लेवर, मैटेरियल, मशीन पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये दर स्वीकृत किये गये जो दिनांक 25.02.2009 से ही प्रभावी माने गये। एम0ओ0यू0 के Clause 21 में यथा "At the time of beginning of execution of project work, the then existing rate of labour, material (including cement, Steel brick etc) and POL would be incorporated in the estimate and accordingly agreement would be arrived at" के आलोक में राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, मैटेरियल, मशीन, पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये स्वीकृत दर के आधार पर दर विश्लेषण कर तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा विभिन्न मदों का दर स्वीकृत किया जिसमें Rolling and compaction के मद में दर रू0 20.20 स्वीकृत किया गया। विभिन्न मदों के संशोधित दरों के आधार पर पुनरिक्षित प्राक्कलन तैयार किया गया जिसकी स्वीकृति परियोजना के नियंत्री पदाधिकारी तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर द्वारा दिनांक 27.04.2010 को प्रदान की गयी। दिनांक 30.06.2010 को श्री राजेन्द्र प्रसाद, कार्यपालक34 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 अभियंता ने उक्त प्रमंडल का प्रभार ग्रहण किया। श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता ने प्रतिवेदित किया है कि कतिपय कारणों (LAW and Order problem) से फरवरी, 2011 तक कार्य स्थल पर कार्य बंद रहा। मार्च 2011 में 5th RA Bill पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर नये दर से तैयार किया गया एवं भुगतान हुआ।

जल संसाधन विभाग द्वारा अगस्त 2009 में SOR (Effective from 12.08.2009) प्रकाशित किया गया जिसमें Rolling and compaction के मद में दर रू0 20.20 अंकित है। उक्त परिप्रेक्ष्य में दिनांक 25.02.2009 के प्रभाव से राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, मैटेरियल, मशीन, पी0ओ0एत0 इत्यादि के नये दरों के आधार पर विश्लेषण कर विभिन्न मदों के संशोधित दरों की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से कराना चाहिए था। निष्कर्ष -प्रक्रियात्मक त्रुटि आंशिक रूप से परिलक्षित होती है। आरोप संख्या-3-बागमती बाढ़ प्रबंधन परियोजना एक विशेष प्रकार का कार्य है जिसे भारत सरकार, जल संसाधन विभाग के एडभाईजरी कमिटि की अनुशंसा के अनुरूप विभिन्न चरणों में कार्यान्वित किया जाना है। इस योजना के अन्तर्गत बागमती नदी के बायें एवं दायें तटों पर निर्मित तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण, विस्तारीकरण एवं अनिर्मित तटबंधों के निर्माण कार्य हेतु सर्वेक्षण, रूपांकण, गुण नियंत्रण आदि तथा विस्तृत योजना प्रतिवेदन तैयार करना एवं योजना का कार्यान्वयन का कार्य टर्नकी (Turnkey) basis पर भारत सरकार के उपक्रम मेसर्स हिन्दुस्तान स्टील वक्र्स कन्स्ट्रक्शन लिमिटेड द्वारा एम0ओ0यू0 के तहत कराये जा रहे है। इस एम0ओ0यू0 का स्वरूप सामान्यतः कार्य विभागों में प्रचलित अन्य एकरारनामा यथा एस0बी0डी0 या एफ 2 आदि के स्वरूप के बिल्कुल अलग है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि एम0ओ0यू0 के अन्तर्गत कराये जाने वाले प्रत्येक कार्य के लिये प्रमंडल स्तर पर कोई औपचारिक एकरारनामा नहीं किया जा रहा है जिसके कारण संवेदक के उपर समय पर कार्य पूरा कराने का दबाव नहीं रहता है एवं पुर्नरीक्षित प्राक्कलन स्वीकृत करने के समय भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 3rd on A/C bill में विभिन्न लीड के अर्थ वर्क के लिए भुगतान की समीक्षा मुख्य अभियंता के स्तर से किये जाने की अनुशंसा उड़नदस्ता जाँच दल द्वारा की गई है जिसका फलाफल अप्राप्त है। विषयांकित परिवाद बागमती दायाँ तटबंध के कि0मी0 38.825 से 45.30 कि0मी0 के बीच उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य से संबंधित है जो योजना आयोग भारत सरकार के पत्रांक 2 (221) 2006 WR दिनांक 15.02.2008 द्वारा Raising and strengthening of embankment along river Bagmati North Bihar (First Phase Work upto 54KM) के लिये 135.16 करोड की परियोजना का एक अंश है जिसे मार्च 2010 तक पुरा किया जाना था। मई 2008 में विषयांकित कार्य का प्राक्कलन संवेदक द्वारा तैयार किया गया जिसकी औपबंधिक तकनीकी स्वीकृति परियोजना के नियंत्री पदाधिकारी मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा 27 जून 2008 को दी गयी। औपबंधिक प्राक्कलन उस समय के प्रभावी Shedule of rate (SOR effective from 1-10-2007) के आधार पर स्वीकृत किया गया था। वर्ष 2007 के अनुसूचित दर (SOR) के अनुसार Earth Work by mechanical means (SOR item no. 5.1.46) के मद में 150मी0 1/2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 84.10, 1/2 कि0मी0 से 1कि0मी0 के लिए रू0 97.00, 1 कि0मी0 से 1/2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 112.20, 1 1/2 कि0मी0 से 2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 127.30, 2 कि0मी0 से 2 1/2 होता है जिसके आधार पर 25 फरवरी 2009 के पूर्व Earth Work by mechanical means कार्य के लिए भुगतान किया गया है। शेष कार्य मार्च 2009 में कराया गया। फरवरी 2009 में ही राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति के पत्रांक-23(अनु0) दिनांक 25.02.2009 द्वारा लेवर, मैटेरियल, मशीन, पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये दर स्वीकृत किये गये जो दिनांक 25.02.2009 से ही प्रभावी माने गये। एम0ओ0यू0 के Clause 21 में यथा "At the time of beginning of execution of project work, the then existing rate of labour, material (including cement, Steel brick etc) and POL would be incorporated in the estimate and accordingly agreement would be arrived at" के आलोक में राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, मैटेरियल, मशीन, पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये स्वीकृत दर के आधार पर दर विश्लेषण कर तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा विभिन्न मदों का दर स्वीकृत किया गया जिसके अनुसार Earth work by mechanical means (SOR Item no. 5.1.46) के मद में 150मी0 से 1/2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 96.20, 1/2कि0मी0 से 1कि0मी0 के लिए रू0 113.90, 1कि0मी0 से 1 1/2 कि0मी0 लीड के लिय रू0 134.80, 1 1/2 कि0मी0 से 2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 155.70, 2 कि0मी0 से 2 1/2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 176.60 तथा 2 1/2 कि0मी0 से 3 कि0मी0 लीड के लिए रू0 197.50 दर संशोधित किया गया है। विभिन्न मदों के संशोधित दरों के आधार पर पुर्नरिक्षित प्राक्कलन तैयार किया गया जिसकी स्वीकृति परियोजना के नियंत्रण पदाधिकारी तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर द्वारा दिनांक 27.04.2010 को प्रदान की गयी। दिनांक 30.06.2010 को श्री राजेन्द्र प्रसाद, कार्यपालक अभियंता ने उक्त प्रमंडल का प्रभार ग्रहण किया। श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता ने प्रतिवेदित किया है कि कतिपय कारणों (Law and order Problem) से फरवरी, 2011 तक कार्य स्थल पर कार्य बंद रहा। मार्च 2011 में 5th RA bill पुनरिक्षित प्राक्कलन के आधार पर नये दर से तैयार किया गया एवं भुगतान हुआ। जल संसाधन विभाग द्वारा अगस्त 2009 में SOR (effective from 12.8.2009) प्रकाशित किया गया जिसके आधार पर Earth work by mechanical means के मद में उपरोक्त दर निर्धारित है। उक्त परिप्रेक्ष्य में दिनांक 25.02. 2009 के प्रभाव में राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, मैटेरियल, मशीन पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये दरों के आधार पर विश्लेषण कर विभिन्न मदों के संशोधित दरों की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से कराना चाहिए था। निष्कर्ष- प्रक्रियात्मक त्रुटि आंशिक रूप से परिलक्षित होती है।35 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री प्रसाद के विरूद्ध आरोप संख्या-02 एवं 03 को आंशिक रूप से प्रमाणित एवं असहमत होते हुए आरोप संख्या-01 को प्रमाणित पाया गया तथा असहमति के निम्न बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-206 दिनांक 09.02.17 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

आरोप संख्या-01 जो उड़नदस्ता जाँच दल को वांछित कागजात उपलब्ध नहीं कराने से संबंधित है। उक्त के संबंध में संचालन पदाधिकारी के द्वारा यह मंतव्य दिया गया है कि श्री प्रसाद दिनांक 30.06.2010 को उक्त पद का प्रभार ग्रहण किये। इसलिए अभिलेखों का संधारण एवं उड़नदस्ता जाँच दल को अभिलेख उपलब्ध नहीं कराने का आरोप श्री प्रसाद पर प्रमाणित नहीं होता है। जबकि श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता के बायोडाटा से स्पष्ट होता है कि वे दिनांक 30.06.2010 को उक्त पद का प्रभार ग्रहण किये और द्वितीय कारण पृच्छा किये जाने तक वे उसी पद पर बने हुए थे। उड़नदस्ता द्वारा दिनांक 22.11.12 को योजनाओं की जाँच की गई। इसलिए श्री प्रसाद का यह दायित्व था कि उड़नदस्ता द्वारा मांगे गये कागजात/अभिलेख को आप उपलब्ध कराते किन्तु आपके द्वारा ऐसा नहीं किया गया। अतएव आरोप संख्या-1 प्रमाणित पाया जाता है।

उक्त के आलोक में श्री राजेन्द्र प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 30.04.17 से द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :- (i) आरोप संख्या-1 के संबंध में कहा गया है कि वे दिनांक 30.036.10 से बागमती प्रमंडल, शिवहर से प्रभार में है एवं अभी तक है। उक्त प्रमंडल से संबंधित अभिलेख उड़नदस्ता जाँच दल को उपलब्ध कराया गया है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में भी वांछित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराने वाले कार्यालयों में शिवहर का नाम नहीं है। संचालन के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा अभिलेख संधारण के साक्ष्य के साथ प्रभार प्रतिवेदन 202 की माँग की गयी जो उन्हें हस्तगत कराया गया। फलतः संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने निष्कर्ष में उनके द्वारा अभिलेख संधारण करना परिलक्षित होता है का मंतव्य दिया गया है।

(ii) आरोप संख्या-2 के संबंध में कहा गया है कि MOU के प्रावधानों के तहत सक्षम प्राधिकार (अधीक्षण अभियंता) द्वारा दर विश्लेषित एवं सक्षम प्राधिकार (मुख्य अभियंता) द्वारा स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आलोक में मार्च, 2009 में कराये गये 70884.62 घन मी॰ मिट्‌टी कार्य के कार्य मद Rolling and Compaction के लिये स्वीकृत दर रू॰ 20.20 प्रति घन मी॰ का विपत्र कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा समर्पित किया गया एवं जाँचोपरान्त प्रमंडलीय स्तर से विपत्र पारित कर भुगतान किया गया। जहाँ तक सक्षम प्राधिकार (अधीक्षण अभियंता) द्वारा विश्लेषित संशोधित पुनरीक्षित दरों एवं सक्षम प्राधिकृत (मुख्य अभियंता) द्वारा स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से कराने की बात है तो कार्यपालक अभियंता उक्त कारवाई हेतु सक्षम प्राधिकार नहीं होते है। इस कारवाई हेतु सक्षम प्राधिकार द्वारा ही विभागीय सम्पुष्टि हेतु भेजा जाता है। इस पर कुछ भी करना विभागीय प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन एवं अनुशासनहीनता माना जाता।

(iii) आरोप संख्या-3 के संबंध में कहा गया है कि MOUके प्रावधानों के तहत सक्षम प्राधिकार (अधीक्षण अभियंता) द्वारा दर विश्लेषित एवं सक्षम प्राधिकार (मुख्य अभियंता) द्वारा स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आलोक में मार्च, 2009 में कराये गये कुल 70884.62 घन मी॰ मिट्‌टी कार्य के कार्यमद E/W by Mechanical means के लिये स्वीकृत दर पर कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा विपत्र समर्पित किया गया एवं जाँचोपरान्त विपत्र पारित कर भुगतान किया गया। जहाँ तक स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से कराने का प्रश्न है इसके लिए वे सक्षम प्राधिकार नहीं है। यह कारवाई मुख्य अभियंता के स्तर से की जाती है। सक्षम प्राधिकार द्वारा दर विश्लेषित एवं स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन विभागीय सम्पुष्टि हेतु भेजा जाता है। इस पर कुछ भी करना विभागीय प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन एवं अनुशासनहीनता माना जाता।

श्री राजेन्द्र प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा की गई। जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :- आरोप संख्या-1- जो दिनांक 30.06.10 से अबतक प्रमंडल के प्रभार में रहने के बावजूद कार्य से संबंधित अभिलेखों का सही ढंग से संधारण नहीं करने एवं दिनांक 22.11.12 को उड़नदस्ता जाँच के क्रम में माँगे गये वांछित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराकर दायित्वों का निर्वहन नहीं करने एवं जाँच कार्य में सहयोग नहीं करने से संबंधित है। श्री प्रसाद कार्यपालक अभियंता द्वारा कहा गया कि वे बागमती प्रमंडल, शिवहर के प्रभार में थे। उक्त प्रमंडल से संबंधित सभी अभिलेख जाँच दल को उपलब्ध कराया गया था। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में अभिलेख उपलब्ध नहीं कराने वाले कार्यालय में बागमती प्रमंडल, शिवहर का नाम नहीं है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 6.0.0 के उप कंडिका (X) में अभिलेख उपलब्ध नहीं कराने वाले कार्यालय के नाम में शिवहर प्रमंडल का नाम अंकित नहीं है। जिसकी पुष्टि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के निष्कर्ष कंडिका (iii) से भी होती है। उक्त के आलोक में उड़नदस्ता जाँच के क्रम में माँगे गये वांछित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराने का आरोप बनता प्रतीत नहीं हो पा रहा है।

जहाँ तक अभिलेखों का संधारण नहीं करने का प्रश्न है इस संदर्भ में संचालन पदाधिकारी ने जाँच प्रतिवेदन में अंकित किया है कि संचालन के क्रम में श्री प्रसाद द्वारा योजना का अनुमोदित विस्तृत योजना प्रतिवेदन की छायाप्रति, वर्ष 2009 का अनुसूचित दर तालिका की छायाप्रति, संदर्भित कार्य का वर्ष 2008 में मुख्य अभियंता द्वारा स्वीकृत प्राक्कलन एवं वर्ष 2010 में स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन की प्रति, लेवल बुक की प्रति, मुख्य अभियंता द्वारा अनुमोदित वार्षिक कार्यक्रम की प्रति36 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 तथा प्रभार रिर्पोट की प्रति एवं संबंधित मापपुस्त 708 एवं 760 की छायाप्रति उपलब्ध कराये गये। उक्त के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा अभिलेखों का संधारण किये जाने का मंतव्य दिया गया है। जो फोल्डर में रक्षित अभिलेखों के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत हुआ जा सकता है। अतएव आरोप सं0-1 प्रमाणित नहीं होता है। आरोप संख्या-2- जो दिनांक 25.02.09 के प्रभाव से राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, सामग्री, मशीन POL इत्यादि के नये दरों के आधार पर Rolling & Compaction मद का संशोधित दर का विभाग से बिना सम्पुष्ट कराये ही स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर भुगतान किये जाने के प्रक्रियात्मक त्रुटि से संबंधित है। विदित है कि श्री प्रसाद के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के लिये गठित आरोप पत्र में गठित आरोप-2 का मुख्य अंश है कि मार्च, 2009 में कराये गये मिट्‌टी कार्य के तहत Rolling & Compaction कार्य मद में कुल 70884.62 घन मी॰ मिट्‌टी का भुगतान रू॰ 19.70 प्रतिघन मी॰ से नहीं कर MOU के विपरीत दिनांक 12.08.09 से प्रभावी अनुसूचित दर (विभाग द्वारा अगस्त, 2009 में प्रकाशित) के आधार पर रू॰ 20.20 प्रतिघन मी॰ से करने के कारण कुल 35442/- रूपये का अनियमित भुगतान होना परिलक्षित है।

संचालन पदाधिकारी इस आरोप के संदर्भ में अपने समीक्षा कंडिका में अंकित किया गया है कि आलोच्य कार्य के मूल प्राक्कलन की औपबंधिक स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 27.06.08 को प्रदान की गयी है। एकरारनामा के अनुसार यह कार्य मार्च, 2010 तक पूरा करना था। उक्त प्राक्कलन में उस समय के प्रभावी अनुसूचित दर पुस्तिका (effective from 7.1.30) के दर में रू॰ 19.70 प्रतिघन मी॰ अंकित है। उक्त स्वीकृत प्राक्कलन के आधार पर 409585.37 घन मी॰ मिट्‌टी का कार्य जून, 2008 तक कराया गया, का भुगतान रू॰ 19.70 प्रति घन मी॰ के आधार पर किया गया। शेष 70884. 62 घन मी॰ मिट्‌टी का कार्य जो मार्च, 2009 में कराया गया। फरवरी, 2009 में ही राज्य स्तरीय अनुसूचित दर समिति के पत्रांक 23 दि॰ 25.02.09 द्वारा लेवर, सामग्री, मशीन इत्यादि के नये दर स्वीकृत किये गये जो दिनांक 25.02.09 से ही प्रभावी माने गये। उक्त पत्र के आलोक में इस कार्य मद का पुनरीक्षित दर 20.20 प्रति घन मी॰ आता है से भुगतान किया गया है। उल्लेखनीय है कि प्रश्नगत कार्य MOU के तहत HSCL के द्वारा कराया गया है। MOU के Clause-21 में अंकित है कि At the time of beginning of excution of Project Work the then Existing rate of labour, Material (including cement Steel brick etc.) and POL would be incorporated in the estinating accordingly agreement would be arrived at" के आलोक में राज्य अनूसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, सामग्री मशीन, POL इत्यादि के नये स्वीकृत दर (जो दिनांक 25.02.09 से प्रभावी किया गया था) के आधार पर विश्लेषण कर तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा विभिन्न मदों का दर स्वीकृत किया गया। जिसमें Rolling & Compaction का दर 20.20 स्वीकृत किया गया। विभिन्न मदों के संशोधित दर के आधार पर पुनरीक्षित प्राक्कलन तैयार किया गया। जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 27.04.10 को प्रदान की गयी। जिसके आधार पर 5th RA. Bill तैयार कर भुगतान की कारवाई की गयी। जिसे संचालन पदाधिकारी सही मानते हुए अनियमित भुगतान नहीं होने का मंतव्य देते हुए मात्र उक्त विश्लेषित दर की सम्पुष्टि विभाग स्तर से कराये बिना ही भुगतान की कारवाई करने की प्रक्रियात्मक त्रुटि माना गया है। जिसके आलोक में श्री प्रसाद से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। श्री प्रसाद द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में नये दर पर संशोधित विश्लेषित दर का विभागीय स्तर से सम्पुष्टि कराने के संदर्भ में कहा गया है कि संशोधित विश्लेषित दर की सम्पुष्टि विभाग से कराने हेतु सक्षम प्राधिकार मुख्य अभियंता थे। अगर इनके स्तर से कारवाई की जाती तो अनुशासनहीनता माना जाता। PWD Code के कंडिका (XVI) (I) से स्पष्ट है कि तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा अनुमोदित सामग्री दर एवं श्रम विभाग से अनुमोदित श्रम दर के आधार पर किसी भी कार्य मद के विषलेशित दर को अनुमोदन करने के लिए अधीक्षण अभियंता सक्षम प्राधिकार है। चूँकि प्रश्नगत कार्य के तहत Compaction कार्य मद का राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा निर्गत सामग्री एवं मशीन तथा श्रम दर (जो दि॰ 25.02.09 से प्रभावी है) के आधार पर विशलेषित दर को अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुमोदित किया गया है। ततपश्चात कार्यो के पुनरिक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान किया गया है। उक्त के आलोक में अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुमोदित दर की सम्पुष्टि विभाग स्तर पर कराने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। अतएव विशलेषित दर एवं मुख्य अभियंता द्वारा स्वीकृत प्राक्कलन के आधार पर बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये भुगतान अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुमोदित की कारवाई को सही माना जा सकता है। अतएव आरोप सं0-2 प्रमाणित नहीं होता है। आरोप संख्या-3- जो दिनांक 25.02.09 के प्रभाव से राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, सामग्री, मशीन, POL इत्यादि के नये दर के आधार पर Earth Work by Mechanical means मद का विश्लेषित दर को बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये ही मुख्य अभियंता स्तर से स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर भुगतान किये जाने के प्रक्रियात्मक त्रुटि से संबंधित है।

विदित है कि श्री प्रसाद के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के लिये गठित आरोप पत्र में आरोप सं॰-3 का मुख्य अंश है कि एकरारनामा में निहित प्रावधान के विपरीत मार्च, 2009 में कुल 70884.0 घन मी॰ याँत्रिक विधि से ढुलाई गये मिट्‌टी कार्य का भुगतान दिनांक 12.08.09 के प्रभावी अनुसूचित दर के आधार पर किये जाने के कारण कुल 1308153/- रूपये का अधिकाई भुगतान होना परिलक्षित है।

MOU के Clause-21में अंकित है कि At the time of beginning of execution of Project Work, the then rate of labour, Material (Inculding cement, brick, steel etc.) and POL would be incorporated in the estimate and accordingly agreement Would be arrived at.

37 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020

संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में अंकित किया गया है मुख्य अभियंता द्वारा जून, 2008 में उक्त अवधि में प्रभावी अनुसूचित दर तालिका के (SOR effective from 1.10.07) के आधार पर आलोच्य कार्य के प्राक्कलन की औपबंधिक स्वीकृति प्रदान की गयी है। वर्ष 2007 के अनुसूचित दर के अनुसार Earth Work by Mechanical Means (SOR item no. 5.1.46) के मद में 150 मी॰ से 1/2 कि॰मी॰ लीड के लिये 84.10 प्रतिघन मी॰ 1/2 कि॰मी॰ से 1 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 97.00 प्रति घन मी॰, 1 कि॰मी॰ से डेढ़ कि॰मी॰ के लिये रू॰ 112.20 प्रति घन मी॰, डेढ़ कि॰मी॰ से 2.0 कि॰मी॰ लीड के लिये 127.30 प्रति घन मी॰, 2 कि॰मी॰ से ढाई कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 142.50 प्रति घन मी॰ तथा ढाई कि॰मी॰ से 3.0 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 157.70 प्रतिघन मी॰ का दर है। जिसके आधार पर 25.02.09 के पूर्व E/W by mechanical means ढुलाई गयी मिट्‌टी का भुगतान किया गया है। फरवरी, 2009 में ही राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति, पथ निर्माण विभाग के पत्रांक 23 दि॰ 25.02.09 द्वारा श्रम दर, प्लान्ट एवं मशीनरी का दर संशोधित करते हुए पत्र निर्गत की तिथि से प्रभावी किया गया है। जिसकी प्रति अभियंता प्रमुख, जल संसाधन विभाग जो समिति के सदस्य होते है को दिया गया है। फलतः MOU के Clause-21 के आलोक में संशोधित नये दर के आधार पर दर विश्लेषण कर अधीक्षण अभियंता विभिन्न कार्य मदों का दर अनुमोदन करते हुए पुनरीक्षित प्राक्कलन में प्रावधानित करते हुए मुख्य अभियंता को भेजा गया है तथा मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा दिनांक 25.02.09 से प्रभावी नये दर के आधार पर पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान की गयी है। जिसके अनुसार E/W by mechanical means के मद में 150 मी॰ से 1/2 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 96.20 प्रति घन मी॰, 1/2 कि॰मी॰ से 1 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 113.90, 1कि॰मी॰ से डेढ़ कि॰मी॰ से 2 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 134.80 प्रतिघन मी॰, डेढ़ कि॰मी॰ से 2 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 155. 70 प्रतिघन मी॰, 2 कि॰मी॰ से ढाई कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 176.60 प्रतिघन मी॰ तथा ढाई कि॰मी॰ से 3.0 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 197.50 प्रति घन मी॰ का दर संशोधित किया गया है। तथा मुख्य अभियंता के स्तर से स्वीकृत संशोधित प्राक्कलन में प्रावधानित उपरोक्त दर के आधार पर मार्च, 2009 में कराये गये कार्यो का 5th A/C bill से भुगतान किया गया है।

दिनांक 25.02.09 से प्रभावी श्रम दर, प्लान्ट एवं मशीनरी के संशोधित नये दर के आधार पर कार्य मद का विश्लेषित दर एवं विभागीय स्तर से प्रकाशित अनुसूचित दर तालिका जो दिनांक 12.08.09 से प्रभावी है, एवं संशोधित प्राक्कलन में प्रावधानित दर तुल्यनात्मक विवरणी से स्पष्ट है कि याँत्रिक विधि से मिट्‌टी ढुलाई एवं Rolling & Compaction का दर समान है। परन्तु अन्य मदों का दर दिनांक 12.08.09 से प्रभावी दर से कम है। दिनांक 12.08.09 से प्रभावी अनुसूचित दर तालिका के प्रस्तावना प्रतिवेदन से भी स्पष्ट है कि मशीनों एवं सामग्रियों का दर राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति के पत्रांक 23 दिनांक 25.02.09 तथा श्रम दर पत्रांक 67 दिनांक 10.07.09 में अंकित दर के आधार पर प्रकाशित किया गया है। उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि मार्च, 2009 में कराये गये कार्यो का भुगतान दिनांक 12.08.09 से प्रभावी अनुसूचित दर पर नहीं किया गया है। बल्कि समिति के पत्रांक 23 दिनांक 25.02.09 से अनुमोदित दर के आधार पर स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर भुगतान किया गया है जिसे नियमानुकूल माना जा सकता है। अर्थात्‌ अनियमित/अधिकाई भुगतान का मामला बनता प्रतीत नहीं होता है।

संचालन पदाधिकारी इन्हीं तथ्यों के आधार पर मात्र विश्लेषित दर को बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये ही भुगतान करने के प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिये श्री प्रसाद को दोषी होने का मंतव्य दिया गया है। इस संदर्भ में श्री प्रसाद द्वारा कहा गया है कि विश्लेषित दर की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से प्राप्त करने के लिये मुख्य अभियंता ही सक्षम प्राधिकार होते है। इनके स्तर से किसी तरह की कारवाई करना अनुशासनहीनता माना जाता। स्वीकार योग्य प्रतीत होता है पृ॰ 961/प॰ पर रक्षित P.W.D Code के कंडिका (XVI) (1) किसी भी कार्य मद का तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा निर्गत सामग्री दर एवं श्रम विभाग से निर्गत श्रम दर के आधार पर विशलेषित दर को अनुमोदित करने हेतु सक्षम प्राधिकार अधीक्षण अभियंता है। प्रस्तुत मामले में राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति के पत्रांक 23 दि॰ 25.02.09 से निर्गत मशीन, सामग्री एवं श्रम के दर के आधार पर कार्य मद का विशलेषित दर को अधीक्षण अभियंता (सक्षम प्राधिकार) द्वारा अनुमोदित किया गया है ततपश्चात मुख्य अभियंता द्वारा पुनरिक्षित की स्वीकृति प्रदान की गयी है। ऐसी स्थिति में विशलेषित दर की सम्पुष्टि विभाग के कराने की कोई बाध्यता नहीं है। अतएव कार्यपालक अभियंता द्वारा स्वीकृत प्राक्कलन के आधार पर किये गये भुगतान को नियमानुकूल माना जा सकता है। अतएव आरोप सं0-3 प्रमाणित नहीं होता है।

समीक्षोपरांत वर्णित तथ्यों के आलोक में अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा श्री प्रसाद को संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप-1 यथा वांछित अभिलेख संधारित नहीं करने एवं उड़नदस्ता को उपलब्ध नहीं कराने के साथ ही आरोप-2 एवं 3 यथा बिना विभागीय स्तर से सम्पुष्टि कराये विश्लेषित अनुमोदित दर के अनुरूप भुगतान किये जाने के प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिये दोषी नहीं माना गया है एवं उक्त के लिए वर्णित मामले में आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

अतएव अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिये गये निर्णय के आलोक में श्री राजेन्द्र प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, पूर्वी तटबंध प्रमंडल, कोपड़िया को वर्णित मामले में आरोप मुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 38

13 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-14/2010-2338--श्री बलभद्र कुमार शाही (आई0डी0-3503), तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती अवर प्रमंडल-02, शिवहर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि (आरोप वर्ष 2009-10 से 2012-13) के दौरान श्री नवल किशोर शाही (पूर्व मंत्री)-सह-अध्यक्ष कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति से प्राप्त परिवाद पत्र में एच0एस0सी0एल0 द्वारा बागमती नदी के तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण एवं विस्तारीकरण प्राक्कलन के अनुसार नहीं करने सरकार द्वारा आवंटित राशि की लूट एवं कार्य पेटी कान्ट्रैक्टर से कराने से संबंधित मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गई। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई समीक्षोपरांत प्रथम द्रष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1122, दिनांक 15.05.2015 से श्री शाही, तत्कालीन सहायक अभियंता से स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री शाही से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं0-564 दिनांक 05.04.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) में निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित करते हुए संचालन पदाधिकारी एवं प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी की नियुक्ति की गई।

आरोप सं0-1-बागमती दायाँ तटबंध के कि0मी0 38.825 से 45.30 कि0मी0 के बीच के उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य में मार्च 2009 के पूर्व कुल 480469.99 घनमीटर का मिट्टी कार्य कराया गया है। परन्तु दो वर्षों के बाद आपके द्वारा मापपुस्त सं0-760 के पृष्ठ सं0-26 पर पूर्व में अंकित अर्थ वर्क की कुल मात्रा का Rolling and compaction के मद में 409585.37 घनमी0 का रू0 19.70 प्रति घनमी0 के दर से एवं 70884.62घनमी0 रू0 20.20 प्रति घनमी0 के दर से करने के कारण कुल 35442/- रूपये का अनियमित भुगतान किया गया है। जिसका कोई वैद्य कारण अंकित नहीं है। इतनी लंबी अवधि के बाद पूर्व में कराय्र गये मिट्टी कार्य की मात्रा को दो भिन्न दर से Rolling and compaction के मद में भुगतान करने से प्रथम द्रष्टया इसमें 49,613/-रूपये का अतिरिक्त भुगतान होना परिलक्षित है। उक्त अनियमित/अतिरिक्त भुगतान करने के लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी हैं।

आरोप सं0-2-दिनांक 10.03.2009 तक विभिन्न लीड से ढुलाई की गई मिट्टी का भुगतान उस समय के प्रभावी अनुसूचित दर के अनुसार वाउचर संख्या-17 दिनांक 17.03.2009 से कर दिया गया था। किन्तु उनके द्वारा 5th on A/C bill में उसी अवधि में किये गये कार्य का भुगतान 12.08.2009 तक प्रभावी दर के आधार पर दिनांक 18.03.2011 को किया गया जो MOU में निहित शर्त्तों के विरूद्ध है। इस प्रकार मार्च 2009 में कराये गये 70884 घनमी0 मिट्टी कार्य का अन्य मदों में दिनांक 12.08.2009 के प्रभावी अनुसूचित दर के आधार पर भुगतान किये जाने से कुल 13,08,153/- रूपये का अधिक भुगतान किया गया जिसके लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी हैं।

संचालन पदाधिकारी द्वारा पत्रांक-598, दिनांक 19.08.2016 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री कुमार के विरूद्ध प्रपत्र के में गठित दोनों आरोपों के संबंध में निम्नलिखित मंतव्य/निष्कर्ष अंकित किया गया हैः-

आरोप संख्या-1- बागमती बाढ़ प्रबंधन परियोजना एक विशेष प्रकार का कार्य है जिसे भारत सरकार, जल संसाधन विभाग के एडभाईजरी कमिटि की अनुशंसा के अनुरूप विभिन्न चरणों में कार्यान्वित किया जाना है। इस योजना के अन्तर्गत बागमती नदी के बायें एवं दायें तटों पर निर्मित तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण, विस्तारीकरण एवं अनिर्मित तटबंधों के निर्माण कार्य हेतु सर्वेक्षण, रूपांकण, गुण नियंत्रण आदि तथा विस्तृत योजना प्रतिवेदन तैयार करना एवं योजना का कार्यान्वयन का कार्य टर्नकी (Turnkey) basis पर भारत सरकार के उपक्रम मेसर्स हिन्दुस्तान स्टील वक्र्स कन्स्ट्रक्शन लिमिटेड द्वारा एम0ओ0यू0 के तहत कराये जा रहे है। इस एम0ओ0यू0 का स्वरूप सामान्यतः कार्य विभागों में प्रचलित अन्य एकरारनामा यथा एस0बी0डी0 या एफ 2 आदि के स्वरूप के बिल्कुल अलग है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि एम0ओ0यू0 के अन्तर्गत कराये जाने वाले प्रत्येक कार्य के लिये प्रमंडल स्तर पर कोई औपचारिक एकरारनामा नहीं किया जा रहा है जिसके कारण संवेदक के उपर समय पर कार्य पूरा कराने का दबाव नहीं रहता है एवं पुर्नरीक्षित प्राक्कलन स्वीकृत करने के समय भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

विषयांकित परिवाद बागमती दायाँ तटबंध के कि0मी0 38.825 से 45.30 कि0मी0 के बीच उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य से संबंधित है जो योजना आयोग भारत सरकार के पत्रांक-2 (221) 2006-WR दिनांक 15.02.2008 द्वारा Raising and strengthening of embankment along river Bagmati North Bihar (First Phase Work upto 54KM) के लिये 135.16 करोड की परियोजना का एक अंश है जिसे मार्च 2010 तक पुरा किया जाना था। मई 2008 में विषयांकित कार्य का प्राक्कलन संवेदक द्वारा तैयार किया गया जिसकी औपबंधिक तकनीकी स्वीकृति परियोजना के नियंत्री पदाधिकारी मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा 27 जून 2008 को दी गयी। औपबंधिक प्राक्कलन उस समय के प्रभावी Shedule of rate (SOR effective from 1-10-2007) के आधार पर स्वीकृत किया गया था। वर्ष 2007 के अनुसूचित दर (SOR) में Rolling and compaction (SOR item no. 7.1.30) के मद में रू0 19.70 का दर अंकित है। उक्त स्वीकृत प्राक्कलन के आधार पर रू0 4,09,585.37 घनमी0 मिट्‌टी का कार्य जून 2008 में कराया गया जिसका भुगतान रू0 19.70 के दर से किया गया। शेष 70, 884.62 घनमी0 मिट्‌टी का कार्य मार्च 2009 में कराया गया। फरवरी 2009 में ही राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति के पत्रांक-23(अनु0) दिनांक 25.02.2009 द्वारा लेवर, मैटेरियल, मशीन पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये दर स्वीकृत किये गये जो दिनांक 25.02.2009 से ही प्रभावी माने गये। एम0ओ0यू0 के Clause 21 में यथा "At the time of beginning of execution of project work, the then existing rate of labour, material (including cement, Steel brick etc) and POL would be39 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 incorporated in the estimate and accordingly agreement would be arrived at" के आलोक में राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, मैटेरियल, मशीन, पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये स्वीकृत दर के आधार पर दर विश्लेषण कर तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा विभिन्न मदों का दर स्वीकृत किया जिसमें Rolling and compaction के मद में दर रू0 20.20 स्वीकृत किया गया। विभिन्न मदों के संशोधित दरों के आधार पर पुनरिक्षित प्राक्कलन तैयार किया गया जिसकी स्वीकृति परियोजना के नियंत्री पदाधिकारी तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर द्वारा दिनांक 27.04.2010 को प्रदान की गयी। दिनांक 30.06.2010 को श्री राजेन्द्र प्रसाद, कार्यपालक अभियंता ने उक्त प्रमंडल का प्रभार ग्रहण किया। श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता ने प्रतिवेदित किया है कि कतिपय कारणों (LAW and Order problem) से फरवरी, 2011 तक कार्य स्थल पर कार्य बंद रहा। मार्च 2011 में 5th RA Bill पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर नये दर से तैयार किया गया एवं भुगतान हुआ।

जल संसाधन विभाग द्वारा अगस्त 2009 में SOR (Effective from 12.08.2009) प्रकाशित किया गया जिसमें Rolling and compaction के मद में दर रू0 20.20 अंकित है। उक्त परिप्रेक्ष्य में दिनांक 25.02.2009 के प्रभाव से राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, मैटेरियल, मशीन, पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये दरों के आधार पर विश्लेषण कर विभिन्न मदों के संशोधित दरों की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से कराना चाहिए था। निष्कर्ष -प्रक्रियात्मक त्रुटि आंशिक रूप से परिलक्षित होती है।

आरोप संख्या-2- बागमती बाढ़ प्रबंधन परियोजना एक विशेष प्रकार का कार्य है जिसे भारत सरकार, जल संसाधन विभाग के एडभाईजरी कमिटि की अनुशंसा के अनुरूप विभिन्न चरणों में कार्यान्वित किया जाना है। इस योजना के अन्तर्गत बागमती नदी के बायें एवं दायें तटों पर निर्मित तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण, विस्तारीकरण एवं अनिर्मित तटबंधों के निर्माण कार्य हेतु सर्वेक्षण, रूपांकण, गुण नियंत्रण आदि तथा विस्तृत योजना प्रतिवेदन तैयार करना एवं योजना का कार्यान्वयन का कार्य टर्नकी (Turnkey) basis पर भारत सरकार के उपक्रम मेसर्स हिन्दुस्तान स्टील वक्र्स कन्स्ट्रक्शन लिमिटेड द्वारा एम0ओ0यू0 के तहत कराये जा रहे है। इस एम0ओ0यू0 का स्वरूप सामान्यतः कार्य विभागों में प्रचलित अन्य एकरारनामा यथा एस0बी0डी0 या एफ 2 आदि के स्वरूप के बिल्कुल अलग है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि एम0ओ0यू0 के अन्तर्गत कराये जाने वाले प्रत्येक कार्य के लिये प्रमंडल स्तर पर कोई औपचारिक एकरारनामा नहीं किया जा रहा है जिसके कारण संवेदक के उपर समय पर कार्य पूरा कराने का दबाव नहीं रहता है एवं पुर्नरीक्षित प्राक्कलन स्वीकृत करने के समय भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 3rd on A/C bill में विभिन्न लीड के अर्थ वर्क के लिए भुगतान की समीक्षा मुख्य अभियंता के स्तर से किये जाने की अनुशंसा उड़नदस्ता जाँच दल द्वारा की गई है जिसका फलाफल अप्राप्त है। विषयांकित परिवाद बागमती दायाँ तटबंध के कि0मी0 38.825 से 45.30 कि0मी0 के बीच उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य से संबंधित है जो योजना आयोग भारत सरकार के पत्रांक 2 (221) 2006 WR दिनांक 15.02.2008 द्वारा Raising and strengthening of embankment along river Bagmati North Bihar (First Phase Work upto 54KM) के लिये 135.16 करोड की परियोजना का एक अंश है जिसे मार्च 2010 तक पुरा किया जाना था। मई 2008 में विषयांकित कार्य का प्राक्कलन संवेदक द्वारा तैयार किया गया जिसकी औपबंधिक तकनीकी स्वीकृति परियोजना के नियंत्री पदाधिकारी मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा 27 जून 2008 को दी गयी। औपबंधिक प्राक्कलन उस समय के प्रभावी Shedule of rate (SOR effective from 1-10-2007) के आधार पर स्वीकृत किया गया था। वर्ष 2007 के अनुसूचित दर (SOR) के अनुसार Earth Work by mechanical means (SOR item no. 5.1.46) के मद में 150मी0 1/2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 84.10, 1/2 कि0मी0 से 1कि0मी0 के लिए रू0 97.00, 1 कि0मी0 से 1/2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 112.20, 1 1/2 कि0मी0 से 2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 127.30, 2 कि0मी0 से 2 1/2 होता है जिसके आधार पर 25 फरवरी 2009 के पूर्व Earth Work by mechanical means कार्य के लिए भुगतान किया गया है। शेष कार्य मार्च 2009 में कराया गया। फरवरी 2009 में ही राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति के पत्रांक-23(अनु0) दिनांक 25.02.2009 द्वारा लेवर, मैटेरियल, मशीन, पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये दर स्वीकृत किये गये जो दिनांक 25.02.2009 से ही प्रभावी माने गये। एम0ओ0यू0 के Clause 21 में यथा "At the time of beginning of execution of project work, the then existing rate of labour, material (including cement, Steel brick etc) and POL would be incorporated in the estimate and accordingly agreement would be arrived at" के आलोक में राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, मैटेरियल, मशीन, पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये स्वीकृत दर के आधार पर दर विश्लेषण कर तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा विभिन्न मदों का दर स्वीकृत किया गया जिसके अनुसार Earth work by mechanical means (SOR Item no. 5.1.46) के मद में 150मी0 से 1/2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 96.20, 1/2कि0मी0 से 1कि0मी0 के लिए रू0 113.90, 1कि0मी0 से 1 1/2 कि0मी0 लीड के लिय रू0 134.80, 1 1/2 कि0मी0 से 2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 155.70, 2 कि0मी0 से 2 1/2 कि0मी0 लीड के लिए रू0 176.60 तथा 2 1/2 कि0मी0 से 3 कि0मी0 लीड के लिए रू0 197.50 दर संशोधित किया गया है। विभिन्न मदों के संशोधित दरों के आधार पर पुर्नरिक्षित प्राक्कलन तैयार किया गया जिसकी स्वीकृति परियोजना के नियंत्रण पदाधिकारी तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर द्वारा दिनांक 27.04.2010 को प्रदान की गयी। दिनांक 30.06.2010 को श्री राजेन्द्र प्रसाद, कार्यपालक अभियंता ने उक्त प्रमंडल का प्रभार ग्रहण किया। श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता ने प्रतिवेदित किया है किबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 40 कतिपय कारणों (Law and order Problem) से फरवरी, 2011 तक कार्य स्थल पर कार्य बंद रहा। मार्च 2011 में 5th RA bill पुनरिक्षित प्राक्कलन के आधार पर नये दर से तैयार किया गया एवं भुगतान हुआ। जल संसाधन विभाग द्वारा अगस्त 2009 में SOR (effective from 12.8.2009) प्रकाशित किया गया जिसके आधार पर Earth work by mechanical means के मद में उपरोक्त दर निर्धारित है। उक्त परिप्रेक्ष्य में दिनांक 25.02. 2009 के प्रभाव में राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, मैटेरियल, मशीन पी0ओ0एल0 इत्यादि के नये दरों के आधार पर विश्लेषण कर विभिन्न मदों के संशोधित दरों की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से कराना चाहिए था। निष्कर्ष- प्रक्रियात्मक त्रुटि आंशिक रूप से परिलक्षित होती है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री शाही, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप संख्या-01 एवं 02 को आंशिक रूप से प्रमाणित पाया गया तथा उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-207 दिनांक 09.02.17 द्वारा श्री शाही, तत्कालीन सहायक अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

उक्त के आलोक में श्री शाही, तत्कालीन सहायक अभियंता द्वारा पत्रांक-शून्य दिनांक-01.05.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी है :- (i) MOU के प्रावधान के तहत सक्षम प्राधिकार (अधीक्षण अभियंता) द्वारा दर विशलेषित एवं सक्षम प्राधिकार (मुख्य अभियंता) द्वारा स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आलोक में मार्च, 2009 में कराये गये कुल 70884.62 घन मिट्‌टी कार्य के कार्य मद Rolling & Compaction के लिये स्वीकृत दर 20.20 प्रति घन मी॰ प्रस्तावित किया गया। सहायक अभियंता द्वारा जाँचोपरान्त विपत्र प्रमंडल में समर्पित की गयी तथा प्रमंडल स्तर से विपत्र पारित करते हुए भुगतान किया गया। जहाँ तक सक्षम प्राधिकार (अधीक्षण अभियंता) द्वारा विश्लेषित पुनरीक्षित दर एवं सक्षम प्राधिकार (मुख्य अभियंता) से स्वीकृत प्राक्कलन की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से कराने की बात है तो कनीय अभियंता/सहायक अभियंता (अभियंत्रण पद सोपान के छोटी ईकाई) उक्त कारवाई हेतु सक्षम प्राधिकार नहीं थे।

कनीय अभियंता/सहायक अभियंता स्तर से सक्षम प्राधिकार द्वारा दर विश्लेषित दर एवं स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन पर विभागीय सम्पुष्टि का प्रयास करना विभागीय प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन एवं अनुशासनहीनता माना जाता। अगर प्रक्रियात्मक त्रुटि आंशिक रूप से परिलक्षित होती भी है तो मैं कहीं से भी इस हेतु सक्षम एवं जिम्मेवार नहीं है। (ii) MOU के प्रावधानों के तहत सक्षम प्राधिकार (अधीक्षण अभियंता) द्वारा दर विश्लेषित एवं सक्षम प्राधिकार (मुख्य अभियंता) द्वारा स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आलोक में मार्च, 2009 में कराये गये 70884.62 घन मी॰ मिट्‌टी के कार्य मद Earth Work by Mechanical means के लिये कनीय अभियंता द्वारा स्वीकृत दर प्रस्तावित किया गया एवं सहायक अभियंता द्वारा जाँचोपरान्त प्रमंडलीय स्तर से विपत्र पारित कर भुगतान की गयी। जहाँ तक सक्षम प्राधिकार (अधीक्षण अभियंता) द्वारा स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से कराने की बात है तो कनीय अभियंता/सहायक अभियंता (अभियंत्रण पद सोपान के छोटे पदाधिकारी) उक्त कारवाई हेतु सक्षम प्राधिकार नहीं है। अगर सम्पुष्टि हेतु प्रयास किया जाता तो विभागीय प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन एवं अनुशासनहीनता माना जाता। संचालन पदाधिकारी के निष्कर्ष "प्रक्रियात्मक त्रुटि आंशिक रूप से परिलक्षित होती है के संदर्भ में कहना है कि यदि यह स्वीकारात्मक तथ्य है तो भी वे कहीं से भी जिम्मेवार नहीं है।"

श्री बलभद्र कुमार शाही, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा की गई। जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री बलभद्र कुमार शाही, तत्कालीन सहायक अभियंता से संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए निम्न बिन्दुओं पर द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी।

आरोप-1 एवं 2 से संबंधित यथा मार्च, 2009 में कराये गये मिट्‌टी कार्य के तहत Rolling & Compaction मद एवं E/W by Mechanical Means से ढुलाई गयी मिट्‌टी का भुगतान MOU के कंडिका 21 के आलोक में दिनांक 25. 02.09 से प्रभावी श्रम, दर, मशीनरी तथा सामग्री के नये दर के आधार पर विश्लेषित दर का बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये ही भुगतान करने के प्रक्रियात्मक त्रुटि से संबंधित है।

विदित हो कि श्री शाही के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्य में आरोप का मुख्य अंश है कि MOU के कंडिका 21 के विपरीत मार्च, 2009 में कराये गये मिट्‌टी कार्य के तहत Rolling & Compaction मद एवं E/W by Mechanical means मद में दिनांक 12.08.09 से प्रभावी अनुसूचित दर (जल संसाधन विभाग द्वारा प्रकाशित) से कुल 70884.0 घन मी॰ का भुगतान करने के कारण उक्त दोनों मदों में क्रमशः 35442/- रूपये एवं 1308153/- रूपये के अतिरिक्त भुगतान के लिये आप दोषी प्रतीत होते है। इन दोनों मदों के अनियमित भुगतान की समीक्षा संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन एवं आरोपी द्वारा उपलब्ध कराये गये अभिलेख के आधार पर श्री राजेन्द्र प्रसाद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के मामले में द्वितीय कारण पृच्छा के बिन्दु 2 एवं 3 में की गई है जो निम्नवत है :- आरोप संख्या-1 ः- जो दिनांक 25.02.09 के प्रभाव से राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, सामग्री, मशीन POL इत्यादि के नये दरों के आधार पर Rolling & Compaction मद का संशोधित दर का विभाग से बिना सम्पुष्ट कराये ही स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर भुगतान किये जाने के प्रक्रियात्मक त्रुटि से संबंधित है। विदित है कि श्री प्रसाद के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के लिये गठित आरोप पत्र में गठित आरोप-2 का मुख्य अंश है कि मार्च, 2009 में कराये गये मिट्‌टी कार्य के तहत Rolling & Compaction कार्य मद में कुल 70884.6241 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 घन मी॰ मिट्‌टी का भुगतान रू॰ 19.70 प्रतिघन मी॰ से नहीं कर MOU के विपरीत दिनांक 12.08.09 से प्रभावी अनुसूचित दर (विभाग द्वारा अगस्त, 2009 में प्रकाशित) के आधार पर रू॰ 20.20 प्रतिघन मी॰ से करने के कारण कुल 35442/- रूपये का अनियमित भुगतान होना परिलक्षित है। संचालन पदाधिकारी इस आरोप के संदर्भ में अपने समीक्षा में अंकित किया गया है कि आलोच्य कार्य के मूल प्राक्कलन की औपबंधिक स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 27.06.08 को प्रदान की गयी है। एकरारनामा के अनुसार यह कार्य मार्च, 2010 तक पूरा करना था। उक्त प्राक्कलन में उस समय के प्रभावी अनुसूचित दर पुस्तिका (effective from 7.1.30) के दर में रू॰ 19.70 प्रतिघन मी॰ अंकित है। उक्त स्वीकृत प्राक्कलन के आधार पर 409585.37 घन मी॰ मिट्‌टी का कार्य जून, 2008 तक कराया गया, का भुगतान रू॰ 19.70 प्रति घन मी॰ के आधार पर किया गया। शेष 70884.62 घन मी॰ मिट्‌टी का कार्य जो मार्च, 2009 में कराया गया। फरवरी, 2009 में ही राज्य स्तरीय अनुसूचित दर समिति के पत्रांक 23 दि॰ 25.02.09 द्वारा लेवर, सामग्री, मशीन इत्यादि के नये दर स्वीकृत किये गये जो दिनांक 25.02.09 से ही प्रभावी माने गये। उक्त पत्र के आलोक में इस कार्य मद का पुनरीक्षित दर 20.20 प्रति घन मी॰ आता है से भुगतान किया गया है।

उल्लेखनीय है कि प्रश्नगत कार्य MOU के तहत HSCL के द्वारा कराया गया है। MOU के Clause-21 में अंकित है कि At the time of beginning of excution of Project Work the then Existing rate of labour, Material (including cement Steel brick etc.) and POL would be incorporated in the estinating accordingly agreement would be arrived at" के आलोक में राज्य अनूसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, सामग्री मशीन, POL इत्यादि के नये स्वीकृत दर (जो दिनांक 25.02.09 से प्रभावी किया गया था) के आधार पर विश्लेषण कर तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा विभिन्न मदों का दर स्वीकृत किया गया। जिसमें Rolling & Compaction का दर 20.20 स्वीकृत किया गया। विभिन्न मदों के संशोधित दर के आधार पर पुनरीक्षित प्राक्कलन तैयार किया गया। जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दिनांक 27.04.10 को प्रदान की गयी। जिसके आधार पर 5th RA. Bill तैयार कर भुगतान की कारवाई की गयी। जिसे संचालन पदाधिकारी सही मानते हुए अनियमित भुगतान नहीं होने का मंतव्य देते हुए मात्र उक्त विश्लेषित दर की सम्पुष्टि विभाग स्तर से कराये बिना ही भुगतान की कारवाई करने की प्रक्रियात्मक त्रुटि माना गया है। जिसके आलोक में श्री प्रसाद से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। श्री प्रसाद द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में नये दर पर संशोधित विश्लेषित दर का विभागीय स्तर से सम्पुष्टि कराने के संदर्भ में कहा गया है कि संशोधित विश्लेषित दर की सम्पुष्टि विभाग से कराने हेतु सक्षम प्राधिकार मुख्य अभियंता थे। अगर इनके स्तर से कारवाई की जाती तो अनुशासनहीनता माना जाता। PWD Code के कंडिका (XVI) (I) से स्पष्ट है कि तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा अनुमोदित सामग्री दर एवं श्रम विभाग से अनुमोदित श्रम दर के आधार पर किसी भी कार्य मद के विषलेशित दर को अनुमोदन करने के लिए अधीक्षण अभियंता सक्षम प्राधिकार है। चूँकि प्रश्नगत कार्य के तहत Compaction कार्य मद का राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा निर्गत सामग्री एवं मशीन तथा श्रम दर (जो दि॰ 25.02.09 से प्रभावी है) के आधार पर विशलेषित दर को अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुमोदित किया गया है। ततपश्चात कार्यो के पुनरिक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान किया गया है। उक्त के आलोक में अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुमोदित दर की सम्पुष्टि विभाग स्तर पर कराने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। अतएव विशलेषित दर एवं मुख्य अभियंता द्वारा स्वीकृत प्राक्कलन के आधार पर बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये भुगतान अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुमोदित की कारवाई को सही माना जा सकता है। अतएव श्री शाही के विरूद्ध आरोप संख्या-1 प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप संख्या-2 ः-जो दिनांक 25.02.09 के प्रभाव से राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति द्वारा स्वीकृत लेवर, सामग्री, मशीन, POL इत्यादि के नये दर के आधार पर Earth Work by Mechanical means मद का विश्लेषित दर को बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये ही मुख्य अभियंता स्तर से स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर भुगतान किये जाने के प्रक्रियात्मक त्रुटि से संबंधित है।

विदित है कि श्री प्रसाद के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के लिये गठित आरोप पत्र में आरोप सं॰-3 का मुख्य अंश है कि एकरारनामा में निहित प्रावधान के विपरीत मार्च, 2009 में कुल 70884.0 घन मी॰ याँत्रिक विधि से ढुलाई गये मिट्‌टी कार्य का भुगतान दिनांक 12.08.09 के प्रभावी अनुसूचित दर के आधार पर किये जाने के कारण कुल 1308153/- रूपये का अधिकाई भुगतान होना परिलक्षित है।

MOU के Clause-21में अंकित है कि At the time of beginning of execution of Project Work, the then rate of labour, Material (Inculding cement, brick, steel etc.) and POL would be incorporated in the estimate and accordingly agreement Would be arrived at.

संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में अंकित किया गया है मुख्य अभियंता द्वारा जून, 2008 में उक्त अवधि में प्रभावी अनुसूचित दर तालिका के (SOR effective from 1.10.07) के आधार पर आलोच्य कार्य के प्राक्कलन की औपबंधिक स्वीकृति प्रदान की गयी है। वर्ष 2007 के अनुसूचित दर के अनुसार Earth Work by Mechanical Means (SOR item no. 5.1.46) के मद में 150 मी॰ से 1/2 कि॰मी॰ लीड के लिये 84.10 प्रतिघन मी॰ 1/2 कि॰मी॰ से 1 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 97.00 प्रति घन मी॰, 1 कि॰मी॰ से डेढ़ कि॰मी॰ के लिये रू॰ 112.20 प्रति घन मी॰, डेढ़ कि॰मी॰ से 2.0 कि॰मी॰ लीड के लिये 127.30 प्रति घन मी॰, 2 कि॰मी॰ से ढाई कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 142.50 प्रति घन मी॰ तथा ढाई कि॰मी॰ से 3.0 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 157.70 प्रतिघन मी॰ का दर है। जिसके आधार पर 25.02.09बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 42 के पूर्व E/W by mechanical means ढुलाई गयी मिट्‌टी का भुगतान किया गया है। फरवरी, 2009 में ही राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति, पथ निर्माण विभाग के पत्रांक 23 दि॰ 25.02.09 द्वारा श्रम दर, प्लान्ट एवं मशीनरी का दर संशोधित करते हुए पत्र निर्गत की तिथि से प्रभावी किया गया है जिसकी प्रति अभियंता प्रमुख, जल संसाधन विभाग जो समिति के सदस्य होते है को दिया गया है। फलतः MOU के Clause-21 के आलोक में संशोधित नये दर के आधार पर दर विश्लेषण कर अधीक्षण अभियंता विभिन्न कार्य मदों का दर अनुमोदन करते हुए पुनरीक्षित प्राक्कलन में प्रावधानित करते हुए मुख्य अभियंता को भेजा गया है तथा मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा दिनांक 25.02.09 से प्रभावी नये दर के आधार पर पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान की गयी है। जिसके अनुसार E/W by mechanical means के मद में 150 मी॰ से 1/2 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 96.20 प्रति घन मी॰, 1/2 कि॰मी॰ से 1 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 113.90, 1कि॰मी॰ से डेढ़ कि॰मी॰ से 2 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 134.80 प्रतिघन मी॰, डेढ़ कि॰मी॰ से 2 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 155. 70 प्रतिघन मी॰, 2 कि॰मी॰ से ढाई कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 176.60 प्रतिघन मी॰ तथा ढाई कि॰मी॰ से 3.0 कि॰मी॰ लीड के लिये रू॰ 197.50 प्रति घन मी॰ का दर संशोधित किया गया है। तथा मुख्य अभियंता के स्तर से स्वीकृत संशोधित प्राक्कलन में प्रावधानित उपरोक्त दर के आधार पर मार्च, 2009 में कराये गये कार्यो का 5th A/C bill से भुगतान किया गया है।

दिनांक 25.02.09 से प्रभावी श्रम दर, प्लान्ट एवं मशीनरी के संशोधित नये दर के आधार पर कार्य मद का विश्लेषित दर एवं विभागीय स्तर से प्रकाशित अनुसूचित दर तालिका जो दिनांक 12.08.09 से प्रभावी है, एवं संशोधित प्राक्कलन में प्रावधानित तुल्यनात्मक विवरणी से स्पष्ट है कि याँत्रिक विधि से मिट्‌टी ढुलाई एवं Rolling & Compaction का दर समान है। परन्तु अन्य मदों का दर दिनांक 12.08.09 से प्रभावी दर से कम है।

दिनांक 12.08.09 से प्रभावी अनुसूचित दर तालिका के प्रस्तावना प्रतिवेदन से भी स्पष्ट है कि मशीनों एवं सामग्रियों का दर राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति के पत्रांक 23 दिनांक 25.02.09 तथा श्रम दर पत्रांक 67 दिनांक 10.07.09 में अंकित दर के आधार पर प्रकाशित किया गया है। उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि मार्च, 2009 में कराये गये कार्यो का भुगतान दिनांक 12.08.09 से प्रभावी अनुसूचित दर पर नहीं किया गया है। बल्कि समिति के पत्रांक 23 दिनांक 25.02.09 से अनुमोदित दर के आधार पर स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर भुगतान किया गया है जिसे नियमानुकूल माना जा सकता है। अर्थात्‌ अनियमित/अधिकाई भुगतान का मामला बनता प्रतीत नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी इन्हीं तथ्यों के आधार पर मात्र विश्लेषित दर को बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये ही भुगतान करने के प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिये श्री प्रसाद को दोषी होने का मंतव्य दिया गया है। इस संदर्भ में श्री प्रसाद द्वारा कहा गया है कि विश्लेषित दर की सम्पुष्टि विभागीय स्तर से प्राप्त करने के लिये मुख्य अभियंता ही सक्षम प्राधिकार होते है। इनके स्तर से किसी तरह की कारवाई करना अनुशासनहीनता माना जाता। स्वीकार योग्य प्रतीत होता है P.W.D Code के कंडिका (XVI) (1) किसी भी कार्य मद का तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा निर्गत सामग्री दर एवं श्रम विभाग से निर्गत श्रम दर के आधार पर विशलेषित दर को अनुमोदित करने हेतु सक्षम प्राधिकार अधीक्षण अभियंता है। प्रस्तुत मामले में राज्य स्तरीय अनुसूचित दर निर्धारण समिति के पत्रांक 23 दि॰ 25.02.09 से निर्गत मशीन, सामग्री एवं श्रम के दर के आधार पर कार्य मद का विशलेषित दर को अधीक्षण अभियंता (सक्षम प्राधिकार) द्वारा अनुमोदित किया गया है ततपश्चात मुख्य अभियंता द्वारा पुनरिक्षित की स्वीकृति प्रदान की गयी है। ऐसी स्थिति में विशलेषित दर की सम्पुष्टि विभाग के कराने की कोई बाध्यता नहीं है। अतएव कार्यपालक अभियंता द्वारा स्वीकृत प्राक्कलन के आधार पर किये गये भुगतान को नियमानुकूल माना जा सकता है। अतएव उक्त समीक्षा में वर्णित तथ्यों एवं संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के आलोक में अनियमित/अधिकाई भुगतान का मामला बनता प्रतीत नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी द्वारा भी श्री शाही को मात्र दिनांक 23.02.09 से प्रभावी श्रम दर, मशीनरी एवं सामग्री के नये दर के आधार पर विश्लेषित/अनुमोदित दर का बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये ही भुगतान की कारवाई करने के प्रक्रियात्मक त्रुटि के लिये दोषी होने का मंतव्य दिया गया है। जिसके संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में कहा गया है कि विश्लेषित अनुमोदित दर की सम्पुष्टि कराने के लिये कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता के स्तर के पदाधिकारी सक्षम प्राधिकार नहीं है। इसके लिये अधीक्षण अभियंता एवं मुख्य अभियंता जिनके द्वारा उक्त विश्लेषित दर को अनुमोदित किया गया है एवं उक्त अनुमोदित दर के आधार पर पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान की गयी है ही सक्षम प्राधिकार है। स्वीकार योग्य प्रतीत होता है क्योंकि कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता मुख्यतः कराये गये कार्य की गुणवत्ता एवं मात्रा के लिये उत्तरदायी होते है। किसी भी कार्य मद की दर की जाँच सामान्यतः प्रमंडल स्तर से करने के बाद ही भुगतान की कारवाई होती है। प्रस्तुत मामले में कराये गये कार्य की मात्रा एवं गुणवत्ता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है। PWD Code के कंडिका (XVI) (1) के अनुसार विशलेषित दर को अनुमोदित करने के लिये सक्षम प्राधिकार होते है। प्रस्तुत मामले में अधीक्षण अभियंता द्वारा कार्य मद के विशलेषित दर का अनुमोदन दिया गया है एवं मुख्य अभियंता द्वारा स्वीकृत पुनरीक्षित प्राक्कलन के आधार पर भुगतान की कारवाई की गयी है। जिसे नियमानुकूल माना जा सकता है। अतएव विशलेषित दर को विभाग से बिना सम्पुष्ट कराये ही भुगतान करने की कारवाई को सही माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में दिनांक 25.02.09 के प्रभाव से प्रभावी श्रम दर, मशीनरी एवं सामग्री के नये दर के आधार पर अधीक्षण अभियंता द्वारा विशलेषित अनुमोदित दर को विभागीय स्तर से सम्पुष्टि नहीं कराने के लिये श्री शाही, तत0 सहायक अभियंता दोषी प्रतीत नहीं होते है। अतएव आरोप संख्या-2 प्रमाणित नहीं होता है।

समीक्षोपरांत वर्णित तथ्यों के आलोक में अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा श्री शाही को विश्लेषित/अनुमोदित दर को बिना विभाग से सम्पुष्ट कराये ही भुगतान की कारवाई करने के लिये दोषी नहीं माना गया है एवं उक्त के लिए वर्णित मामले में आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।43 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 अतएव अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिये गये निर्णय के आलोक में श्री बलभद्र कुमार शाही, तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती अवर प्रमंडल, शिवहर सम्प्रति सहायक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, सहरसा को वर्णित मामले में आरोप मुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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13 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-14/2010-2337--श्री देवराज रजक (आई0डी0-4574), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि (आरोप वर्ष 2008-2009) के दौरान श्री नवल किशोर शाही (पूर्व मंत्री)-सह-अध्यक्ष कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति से प्राप्त परिवाद पत्र में एच0एस0सी0एल0 द्वारा बागमती नदी के तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण एवं विस्तारीकरण प्राक्कलन के अनुसार नहीं करने सरकार द्वारा आवंटित राशि की लूट एवं कार्य पेटी कान्ट्रैक्टर से कराने से संबंधित मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गई। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई समीक्षोपरांत प्रथम द्रष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1131, दिनांक 15.05.2015 से श्री रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री रजक से स्पष्टीकरण के अप्राप्त रहने के कारण मामले की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक संख्या-565, दिनांक 05.04.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) में निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित करते हुए संचालन पदाधिकारी एवं प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी की नियुक्ति की गई।

आरोप सं0-1-उड़नदस्ता जाँच के क्रम में इतने महत्वपूर्ण कार्य बागमती बाढ़ प्रबंधन योजना के कार्यान्वयन से संबंधित अभिलेखों यथा स्वीकृत वार्षिक अनुमोदित कार्यक्रम, स्वीकृत प्राक्कलन इनके विरूद्ध भोति एवं वित्तीय प्रगति, लीड प्लान, किसाानों को अस्थाई भू-अर्जन का भुगतान से संबंधित अभिलेख, मुख्य अभियंता का निरीक्षण प्रतिवेदन एवं अन्य वांछित अभिलेखों का संधारण प्रमंडल स्तर पर नहीं किया गया जो एक गंभीर मामला है एवं कर्त्तव्यहीनता का द्योतक है जिसके लिए आप प्रथम द्रष्टया दोषी है। विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान संचालन पदाधिकारी के समक्ष श्री रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा अपना बचाव बयान समर्पित किया गया जिसमें उनके द्वारा कहा गया कि वे उड़नदस्ता जाँच के दौरान बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर में पदस्थापित नहीं थे। भूलवश उनका नाम अंकित हो गया है। वे मुख्य रूप से तकनीकी सलाहकार, शीर्ष कार्य अंचल, वाल्मीकिनगर शिविर-सीतामढ़ी में पदस्थापित थे एवं बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर में माह अक्टूबर 2008 से माह जून 2009 तक प्रतिनियुक्त थे।

संचालन पदाधिकारी द्वारा पत्रांक-595, दिनांक 19.08.2016 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री रजक के विरूद्ध प्रपत्र के में गठित आरोप के संबंध में निम्नलिखित मंतव्य अंकित किया गया है -

बागमती बाढ़ प्रबंधन परियोजना एक विशेष प्रकार का कार्य है जिसे भारत सरकार, जल संसाधन विभाग के एडभाईजरी कमिटि की अनुशंसा के अनुरूप विभिन्न चरणों में कार्यान्वित किया जाना है। इस योजना के अन्तर्गत बागमती नदी के बायें एवं दायें तटों पर निर्मित तटबंधों के उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण, विस्तारीकरण एवं अनिर्मित तटबंधों के निर्माण कार्य हेतु सर्वेक्षण, रूपांकण, गुण नियंत्रण आदि तथा विस्तृत योजना प्रतिवेदन तैयार करना एवं योजना का कार्यान्वयन का कार्य टर्नकी (Turnkey) basis पर भारत सरकार के उपक्रम मेसर्स हिन्दुस्तान स्टील वक्र्स कन्स्ट्रक्शन लिमिटेड द्वारा एम0ओ0यू0 के तहत कराये जा रहे है। इस एम0ओ0यू0 का स्वरूप सामान्यतः कार्य विभागों में प्रचलित अन्य एकरारनामा यथा एस0बी0डी0 या एफ 2 आदि के स्वरूप के बिल्कुल अलग है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि एम0ओ0यू0 के अन्तर्गत कराये जाने वाले प्रत्येक कार्य के लिये प्रमंडल स्तर पर कोई औपचारिक एकरारनामा नहीं किया जा रहा है जिसके कारण संवेदक के उपर समय पर कार्य पूरा कराने का दबाव नहीं रहता है एवं पुर्नरीक्षित प्राक्कलन स्वीकृत करने के समय भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

संचालन के दौरान पृच्छा के क्रम में श्री रजक द्वारा बताया गया कि उड़नदस्ता दल द्वारा जाँच के समय वे उक्त प्रमंडल में पदस्थापित नहीं थें। वे मुख्य रूप से तकनीकी सलाहकार, शीर्ष कार्य अंचल, बागमती नगर, शिविर सीतामढ़ी में पदस्थापित थें।

संचालन के क्रम में श्री रजक द्वारा योजना का अनुमोदित विस्तृत योजना प्रतिवेदन की छायाप्रति, शोध एवं प्रशिक्षण अंचल, खगौल द्वारा समर्पित मिट्टी के नमूनों का जाँचफल प्रतिवेदन की छायाप्रति, शोध एवं प्रशिक्षण अंचल, खगौल द्वारा समर्पित ईंटों के नमूनों का जाँचफल प्रतिवेदन की छायाप्रति, सचिव, जल संसाधन विभाग द्वारा दिनांक-24.09.2015 को किये गए स्थल से संबंधित निरीक्षण प्रतिवेदन की छायाप्रति, दिनांक-12.08.2009 से प्रभावी अनुसूचित दर की छायाप्रति, एम0ओ0यू0 की छायाप्रति, मापी पुस्त सं0-639 की छायाप्रति, लीड प्लान की छायाप्रति एवं प्रभार रिपोर्ट की छायाप्रति उपलब्ध कराया गया है। निष्कर्ष :- उपरोक्त कंडिका में उल्लेखित अभिलेख संधारित किये गये परिलक्षित होते हैं। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा अनुशासनिक प्राधिकार के द्वारा की गयी। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री देवराज रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र 'क' में एक मात्र आरोप गठित किया गया था। श्री रजक के विरूद्ध बागमती योजना प्रबंधन से संबंधित अभिलेखों, यथा स्वीकत वार्षिक अनुमोदित कार्यक्रम, स्वीकृत44 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 प्राक्कलन, इसके विरूद्ध भौतिक एवं विाीय प्रगति, लीड प्लान, किसानों को अस्थायी भू-अर्जन का भुगतान से संबंधित अभिलेख, मुख्य अभियंता का निरीक्षण प्रतिवेदन एवं अन्य अभिलेखों का संधारण समुचित ढंग से प्रमंडलीय स्तर पर नहीं करने एवं जाँच कार्य में सहयोग नहीं करने का आरोप है। संचालन पदाधिकारी ने विभागीय कार्यवाही के जाँच प्रतिवेदन में अपने मंतव्य में अंकित किया है कि श्री रजक दिनांक-12.06.2009 को कार्यपालक अभियंता का प्रभार सौंप दिये जबकि उड़नदस्ता द्वारा जाँच दिनांक-22.11.2012 को की गयी। श्री रजक के बायोडाटा के अवलोकन से स्पष्ट है कि श्री रजक उक्त प्रमंडल में दिनांक-24.10.2008 से दिनांक-19.06.2009 तक पदस्थापित रहे हैं। उड़नदस्ता द्वारा योजना की जाँच दिनांक-22.10.2012 को की गयी। इसलिए उड़नदस्ता दल को वांछित कागजात उपलब्ध नहीं कराये जाने के लिए श्री रजक दोषी प्रतीत नहीं होते हैं। अतएव आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री देवराज रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता को वांछित अभिलेख संधारित नहीं करने एवं उड़नदस्ता को उपलब्ध नहीं कराने के लिए दोषी नहीं माना जाता है एवं वर्णित मामले में आरोप मुक्त करने का निर्णय अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिया गया है।

अतएव अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिए गए निर्णय के आलोक में श्री देवराज रजक, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, रजौली, नवादा को वर्णित मामले में आरोप मुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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8 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)-03-06/2016-2303--श्री ज्ञान प्रकाश लाल (आई0डी0-3188), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पटना सम्प्रति सचिव प्रावैधिक, अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भागलपुर के विरूद्ध तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, आपत्ति के साथ कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-01, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-196, दिनांक 02.04.16 एवं पत्रांक-250 दिनांक 15.10.2016 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र-'क' गठित कर अनुशासनिक कार्यवाही करने के अनुशंसा के साथ उपलब्ध कराया गया। उक्त पत्रों में संलग्न आरोप पत्र प्रपत्र-'क' में निम्न आरोपों को उल्लेखित किया गया। पत्रांक-196, दिनांक 02.04.2016 में संलग्न आरोप पत्र प्रपत्र-'क' में अंकित आरोप- 1) यह कि किसी भी तरह के राशि का भुगतान करने के पहले श्री लाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पटना को चाहिए था कि राशि की शुद्धता की जाँच कर ही भुगतान किया जाना चाहिए था, परन्तु श्री लाल द्वारा श्री पासवान, सेवानिवृत कार्यालय परिचारी को लाभ पहुँचाने के उद्‌देश्य से अधिक राशि का भुगतान कर दिया गया तथा रू0 39,226/- सरकार को क्षति पहुँचाई गई। 2) श्री लाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पटना के द्वारा अपने पदीय कर्त्तव्यों के संपादन में सरकार द्वारा प्रदत शक्तियों के प्रयोग में अपने उत्तम विवेक से कार्य नहीं किया, जिससे सरकारी राजस्व की क्षति हुई है तथा जानबूझ कर श्री पासवान, सेवानिवृत कार्यालय परिचारी, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पटना को अनुचित लाभ पहुँचाकर सरकार को रू0 39,226/- की क्षति पहुँचाई गई, जो सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम-(3) के उप नियम-(3) का घोर उल्लंघन किया गया है। पत्रांक-250, दिनांक 15.10.2016 में संलग्न आरोप पत्र प्रपत्र-'क' में अंकित आरोप- 1) श्री ज्ञान प्रकाश लाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-01, पटना द्वारा इस कार्यालय का पत्रांक-754 दिनांक 29.06.2010 द्वारा श्री रामकृष्ण प्रसाद यादव, सेवानिवृत कनीय अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पटना का द्वितीय एवं तृतीय रूपांतरित सुनिश्चित उन्नयन का भुगतान किए जाने के पूर्व से निर्गत आदेश के आलोक में इस कार्यालय के तत्कालीन प्रभारी वेतन विपत्र लिपिक श्री कमल किशोर पाण्डेय, लेखा लिपिक के द्वारा बकाया वेतन विवरणी तैयार कराकर विपत्र संख्या-233/2010-11 रू0 2,32,065/- से भुगतान श्री यादव, को किया गया है। जिसमें निलंबित अवधि का मकान किराया भत्ता के रूप में रू0 20,616/- का भुगतान कर दिया गया, जबकि निलंबित अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता में मकान किराया भत्ता का भुगतान नहीं किया जाना है। 2) श्री लाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1 सम्प्रति अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के द्वारा अपने पदीय कर्त्तव्यों के संपादन में सरकार द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में अपने उत्तम विवेक से कार्य नहीं किया गया, तथा सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार सरकार, पटना के पत्रांक-1893, दिनांक 14.06. 2011 के कंडिका-(5) का घोर उल्लंघन किया गया है। 3) श्री लाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1 सम्प्रति अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, जल संसाधन विभाग, भागलपुर के द्वारा अपने पदीय कर्त्तव्यों के संपादन में सरकार द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में अपने उत्तम विवेक से कार्य नहीं किया गया तथा सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार सरकार, पटना के पत्रांक-1893 दिनांक 14.06. 2011 के कंडिका-(5) का घोर उल्लंघन किया गया है। 4) यह कि श्री ज्ञान प्रकाश लाल, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पटना द्वारा इस कार्यालय के पत्रांक-414, दिनांक 05.05.2011 द्वारा श्री रामकृष्ण प्रसाद यादव, सेवानिवृत कनीय अभियंता के अव्यवहृत उपार्जित अवकाश के बदले रू0 3,19,580/- का भुगतान कर दिया गया। जबकि इन्हे मात्र रू0 2,53,314/- का भुगतान45 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 किया जाना था। इस प्रकार अव्यवहृत उपार्जित अवकाश के बदले नगद राशि के रूप में कुल रूपये 66,266/- का अधिक भुगतान कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाई गई। 5) यह कि किसी भी तरह के राशि का भुगतान करने के पहले श्री लाल, तत्का0 कार्यपालक अभियंता को चाहिए था कि शुद्धता की जाँच कर ही भुगतान किया जाना चाहिए था, परन्तु श्री लाल द्वारा श्री यादव को लाभ पहुँचाने के उद्‌देश्य से अधिक राशि का भुगतान कर सरकार को समेकित रूप से 86,882/- रूपये की क्षति पहुँचाई गई। 6) श्री लाल द्वारा अपने पदीय कर्त्तव्यों के संपादन में सरकार द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में अपने उत्तम विवेक से कार्य नहीं किया, जिससे सरकारी राजस्व की क्षति हुई है तथा जान बूझकर श्री यादव को अनुचित लाभ पहुँचाकर सरकार को रू0 86,882/- की क्षति पहुँचाई गई। जो सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम (3) के उप नियम-(3) का घोर उल्लंघन किया गया है। उक्त आरोप पत्र प्रपत्र-'क' के आलोक में श्री ज्ञान प्रकाश लाल से विभागीय पत्रांक-989, दिनांक 25.07.16 द्वारा एवं पत्रांक-2490, दिनांक 29.11.2016 द्वारा स्पष्टीकरण किया गया। श्री लाल द्वारा उक्त आरोपों के संदर्भ अपना स्पष्टीकरण का जवाब पत्रांक-04, दिनांक 11.11.2016 एवं पत्रांक-01, दिनांक 04.05.2018 द्वारा विभाग को समर्पित किया गया। श्री लाल द्वारा प्राप्त जवाब पर उनके नियंत्री पदाधिकारी मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का मंतव्य प्राप्त किया गया। उक्त प्राप्त मंतव्य एवं जवाब की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। जिसकी विवरणी निम्न है -

श्री लाल द्वारा प्राप्त जवाब पत्रांक-04 दिनांक-11.11.2016 मुख्य अभियंता का मंतव्य पत्रांक-1407 दिनांक-10. 06.2019
1. गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-01 पटना का पत्रांक-1153, दिनांक-04.11.2009 के द्वारा श्री शिवपूजन पासवान, सेवानिवृा कार्यालय परिचारी को 01.01.2006 से 6th pay commission report के अनुसार 01.01.2009 से पुनरीक्षित वेतन निर्धारण किया गया। जिसके अनुसार श्री पासवान को 01.07.2009 को व तन े रू0 11570/-निर्धारित किया गया। 2. दिनांक-30.04.2010 को श्री पासवान सेवानिवृा हो गए, सेवानिवृा होने पर मूल वेतन रू0 11,570/- रूपये के आधार पर अप्रैल माह 2010 का वेतन भुगतान किया गया। 3. पुनः गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-01, पटना के पत्रांक-582 दिनांक-24.05.2010 के द्वारा श्री पासवान के वेतन का पुनर्निर्धारण कर 01.07. 2009 को वेतन रू0 11780/-निर्धारित किया गया, जिसके आधार पर श्री पासवान का उपादान तथा पेंशन पेपर महालेखाकार, पटना को भेजा गया। 4. उल्लेखनीय है कि उक्त कार्रवाई तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-01, पटना द्वारा की गई, जो दिनांक-31. 12.2010 को सेवानिवृा हो गए। श्री लाल द्वारा दिनांक-01.02.2011 को प्रभार ग्रहण किया गया। 5. जिला लेखा पदाधिकारी, पटना के पत्रांक-2686 दिनांक-14.03.2011 द्वारा दिये गये परामर्श के आलोक में पूर्व आदेश संख्या-582, दिनांक-24. 05.11 को निरस्त कर मूल वेतन 11780 से घटाकर 11570 कर दिया गया। 6. इस घटना क्रम में श्री शिवपूजन पासवान को निम्न मदों में की गई अधिकायी भुगतान की वसूली निम्न चरणों मे कर ली गई। ं (क) अव्यवहृत उपार्जित अवकाश में की गई अधिकायी भुगतान राशि रू0 2830/-की वसूली हेतु पत्रांक-272 दिनांक-26.03.2011 द्वारा कोषागार पदाधिकारी, निर्माण भवन, पटना को निदेशित किया गया। (ख) महालेखाकार, पटना द्वारा दिनांक-01.05. 2010 को निर्धारित किया गया पे शन रू0 ं 5785/-के आधार पर श्री पासवान का औपबंधिक पेंशन में की गई अधिकायी भुगतान रू0 9217/-को वसूलने हेतु पत्रांक-539 दिनांक-20.06.2011 द्वारा कोषागार, पटना को लिखा गया। (ग) गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पटना का पत्रांक-1076 दिनांक-28.12.12 द्वारा गुण नियंत्रण प्रमंडल सं॰-1 का पूर्व पत्रांक-177 दिनांक-13.12.12 को रद्‌द कर दिया गया तथा पत्रांक-980 दिनांक-30.09.11 को बहाल कर दिया गया, जिसके आलोक में श्री पासवान को की गई अधिकायी भुगतान की राशि रू0 19304/-की वसूली हेतु पत्रांक-54 दिनांक-29. 01.2013 द्वारा महालेखाकार, पटना को निदेशित किया गया, जिसमें HRA के मद में अधिकायी भुगतान भी शामिल है। मुख्य अभियंता, पटना द्वारा श्री ज्ञान प्रकाश लाल द्वारा समर्पित जवाब के संदर्भ में मंतव्य समर्पित किया गया कि श्री राजीव नन्दन मौर्य, कार्यपालक अभियंता द्वारा संलग्न बकाया वेतन विवरणी में जो अनुमान्य राशि का उल्लेख है, वह अद्यतन अनुमान राशि के आधार पर नहीं है। अतएव अधिकायी भुगतान की राशि का निर्धारण आधारहीन है। उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा समय-समय पर निर्गत संकल्पों के कारण वेतन को भी समय-समय पर पुनरीक्षित किया जाता है। कार्यपालक अभियंता के स्तर से पुनरीक्षण किया जाता है एवं सत्यापन जिला लेखा पदाधिकारी द्वारा किया जाता है। उक्त कारणों से किसी कर्मी का बकाया वेतन कई बार तैयार करने की तकनीकी आवश्यकता हो जाती है। अंतिम रूप से भी वेतन निर्धारित एवं सत्यापित कर सम्यक्‌ कार्रवाई की जा चुकी है। मुख्य अभियंता द्वारा मंतव्य अंकित किया गया कि श्री लाल पर रू0 39226/- की अधिकायी निकासी कर सेवानिवृा कर्मचारी को अनुचित लाभ पहुंचाने का दोषी माना गया है जो जानबूझकर गलत विवरणी का सहारा लेकर मढ़ा गया है। श्री पासवान को जो भी अधिकायी भुगतान गणना के क्रम में हो गई है, उसकी वसूली हेतु ससमय कार्रवाई की जा चुकी है। अतः श्री लाल को उक्त आरोप मे दोषी ठहराने ं का आधार प्रमाणित नहीं होता है। श्री लाल का स्पष्टीकरण स्वीकार योग्य है
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आरोप-पत्र-2- श्री ज्ञान प्रकाश लाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पटना को चाहिए था कि शुद्धता की जांच कर ही भुगतान किया जाए, परंतु श्री लाल द्वारा श्री राम—ष्ण प्रसाद यादव, सेवानिवृा कनीय अभियंता को लाभ पहुंचाने के उद्‌देश्य से अधिक राशि का भुगतान कर दिया गया तथा समेकित रूप से कुल रू0 86,882/- का अधिकायी भुगतान कर सरकार को क्षति पहुंचाई गई।

श्री ज्ञान प्रकाश लाल से प्राप्त जवाब पत्रांक-1(निजी) दिनांक 04.05.18 मुख्य अभियंता का मंतव्य पत्रांक-139, दिनांक 15.01. 2009
1. श्री लाल द्वारा आरोप के संदर्भ में कहा गया कि श्री श्यामानंद सिंह, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल, पटना के प्रभार में दिनांक-31.12.2010 तक रहें तथा श्री मुकेश दास दिनांक-01.01.2011 से 31. 012011 तक प्रभार में रहें हैं। 2. श्री लाल द्वारा गुण नियंत्रण प्रमंडल, पटना का प ्रभार दिनांक-01.02.2011 को ग्रहण किया गया। दिनांक-07.07.2015 को श्री राजीव नन्दन मौर्य द्वारा प्रभार ग्रहण किया गया। 3. विभागीय पत्रांक-558, दिनांक-03.06.2005 द्वारा श्री रामकृष्ण प्रसाद यादव को निलंबित कर मुख्यालय निदेशक, जल प्रबंधन एवं सिंचाई उपलब्ध निदेशालय, पटना (वर्त्तमान में सिंचाई मोनिटरिंग अंचल, पटना) निर्धारित किया गया। श्री यादव दिनांक-03.08.2005 से दिनांक-31.05.2008 तक सिंचाई मोनिटरिंग अंचल, पटना में पदस्थापित रहें। 4. श्री यादव विभागीय पत्रांक-3316, दिनांक-28.06.2008 के आलोक में गुण नियंत्रण प्रमंडल, पटना में योगदान दिए तथा 31.07.2008 को सेवानिवृत्त हो गए। श्री यादव को निलंबन अवधि में वेतन भुगतान सिंचाई मोनिटरिंग अंचल, पटना द्वारा ही किया गया। सिंचाई मोनिटरिंग अ चल, ं पटना के पत्रांक-548 दिनांक-24.07.2008 5. श्री यादव को इसी क्रम में HRA मद में मुख्य अभियंता, पटना द्वारा श्री लाल के स्पष्टीकरण के संदर्भ मे अपना मंतव्य दिया गया कि श्री रामकृष्ण ं प्रसाद यादव को विपत्र संख्या- 233/2010-11 द्वारा रू0 2,32,065/- की निकासी द्वारा भुगतान किया गया। इस वेतन विवरणी में श्री रामकृष्ण प्रसाद यादव के अगस्त 05 से 10.06.2008 तक का मकान किराया भत्ता के रूप में रू0 39,758/- भी शामिल थी। यह अवधि श्री यादव का निलंबन अवधि था। चूंकि निलंबन अवधि में HRA अनुमान्य नहीं होता है। अतः अधीक्षण अभियंता, सिंचाई मो॰ अंचल, पटना द्वारा भुगतान किया गया राशि रू0 19,142/- तथा गुण नियंत्रण प्रमंडल, पटना द्वारा भुगतेय राशि रू0 20,616 शामिल है। इसके अलावा अव्यवहृत उपार्जित अवकाश के लिए निलंबन अवधि की गणना करने पर रू0 66,216/- की अधिकायी भुगतान कर दी गई, जिसकी वसूली हेतु कार्यपालक अभियंता, गुण नियंत्रण प्रमंडल, पटना का पत्रांक-339, दिनांक-29.11.2016, द्वारा महालेखाकार, पटना से अनुरोध किया गया। महालेखाकार, पटना के PPO-201111083507, दिनांक-14.12.2016 द्वारा विभागीय बकाया के रूप में रू0 1,18,094/- की वसूली संबंधी प्राधिकार पत्र कोषागार, पटना को निर्गत किया गया। उल्लेखनीय है कि उक्त वसूलनीय राशि की स्थिति निम्नवत्‌ है :- HRA = 19,14220,616= 39,758 चिकित्सा भत्ता = रू0 3,400 नगर क्षतिपूरक भत्ता = रू0 6,120
निलंबन अवधि में रू0 20616/- का भुगतान किया गया तथा अव्यवहृत अवकाश मद में कुल रू0 66,266/- का अधिकायी भुगतान किया गया। 6. गुण नियंत्रण प्रमंडल, पटना के पत्रांक-251 दिनांक-15.10.2016 के द्वारा श्री यादव सेवानिवृत्त कनीय अभियंता को वेतन तथा पे शन ं मद मे ं अधिकायी भुगतान रू0 1,18,094/- की वसूली हेतु महालेखाकार, पटना से अनुरोध किया। जिसमें निलंबन अवधि में सिंचाई मोनिटरिंग अंचल, पटना द्वारा विभिन्न भत्तों मे अधिकायी भुगतान रू0 ं 31,212/- तथा गुण नियंत्रण प्रमंडल, पटना द्वारा HRA मद में रू0 20,616/- तथा अव्यवहृत उपार्जित अवकाश के बदले रू0 66,266/- की अधिकायी भुगतान की राशि शामिल है। 7. श्री लाल द्वारा कहा गया है कि श्री यादव को जानबूझकर (रू0 20,616 रू0 66,266 = रू0 86,882/-) का अधिकायी भुगतान नहीं किया गया है बल्कि गणना मे हुई त्रुटि के ं कारण हो गई जिसे ससमय वसूली कर ली गई है। परिवहन भत्ता = रू0 2,550
कुल=रू0 51,828/- * रू0 20,616/- HRA गुण नियंत्रण प्रमंडल, पटना से संबंधित है। अव्यवहृत उपार्जित अवकाश = रू0 66,216/- में भुगतेय राशि।
कुल अधिकायी भुगतान =रू0 1,18,094/- मुख्य अभियंता द्वारा कहा गया है कि विभागीय निलंबनादेश में वेतनवृद्धि एवं निलंबन अवधि का उल्लेख नहीं रहने की स्थिति में भ्रमवश HRA एवं अन्य मद जो निलंबन अवधि मे अनुमान्य नहीं है, ं भुगतान कर दिया गया है, जो ससमय वसूली करने संबंधित कार्रवाई कर दी गई है।
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आरोप-पत्र-1 के संदर्भ में श्री ज्ञान प्रकाश लाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण एवं मुख्य अभियंता, पटना द्वारा दिए गए मंतव्य से स्पष्ट प्रतीत होता है कि 6th pay commission के दौरान श्री शिवपूजन पासवान, कार्यालय परिचारी के वेतन पुनर्निर्धारण क्रम में उनके सेवानिवृाि के पश्चात्‌ अधिकायी भुगतान की गई, जिसे ससमय वसूली करने की कार्रवाई कार्यालय द्वारा तत्क्षण किया गया।

आरोप-पत्र-2 के संदर्भ में श्री लाल द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण एवं मुख्य अभियंता, पटना द्वारा दिए गए मंतव्य से स्पष्ट प्रतीत होता है कि श्री राम—ष्ण प्रसाद यादव, सेवानिवृा कनीय अभियंता, जो अगस्त, 2005 से मई, 2008 तक निलंबित थे, निलंबन मुक्त होने पर श्री यादव को HRA एवं अव्यवहृत उपार्जित अवकाश की राशि वेतन सहित प्रदान की गई, जो निलंबन अवधि में अनुमान्य नहीं होता है। ऐसा इसलिए हुआ कि श्री यादव के वेतन निर्धारण के क्रम में भ्रमवश उक्त मदों को समाहित करके भुगतान किया गया। इस प्रकार श्री यादव को अनुमान्यता नहीं रहने की स्थिति में की गई अधिकायी भुगतान कार्यालय द्वारा वसूली संबंधी कार्रवाई की गई।

इस प्रकार, स्पष्ट होता है कि आरोपी पदाधिकारी द्वारा भुगतान के क्रम में आवश्यक सावधानी नहीं बरती गई और सदैव भ्रम की स्थिति में रहे। फलतः दोनों मामलों में पहले अधिकायी भुगतान किया गया, तत्पश्चात्‌ उक्त राशि की वसूली की गई। इस प्रकार कार्य सम्व्यवहार में उनके द्वारा अपेक्षित सावधानी नहीं बरते जाने का आरोप प्रमाणित होता है। अतः उक्त स्थिति में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-14के अंतर्गत श्री ज्ञान प्रकाश लाल, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (आई॰डी॰-3188) सम्प्रति अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, भागलपुर के विरूद्ध निम्न दंड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया है -

संगत वर्ष (2011-12) के लिए निन्दन । उक्त दण्ड प्रस्ताव पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त निर्णीत दण्ड प्रस्ताव के आलोक में श्री ज्ञान प्रकाश लाल को संसूचित एवं अधिरोपित किया जाता है। संगत वर्ष (2011-12) के लिए निन्दन ।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 48

27 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)03-24/2017-1059--श्री सौरभ कुमार शर्मा, प्राक्कलन पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, बक्सर के विरूद्ध मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-2117 दिनांक 01. 08.2017 द्वारा अनधिकृत अनुपस्थिति का आरोप प्रतिवेदित करते हुए प्रपत्र-'क' गठित कर अनुशासनिक कार्रवाई के अनुशंसा के साथ विभाग को उपलब्ध कराया गया। विभागीय पत्रांक-2263 दिनांक 20.12.17 द्वारा श्री शर्मा से प्रपत्र-'क' के आलोक में स्पष्टीकरण किया गया। श्री शर्मा का उार अप्राप्त रहने की स्थिति में उन्हेंं विभाग द्वारा स्मारित किया गया। परन्तु उार अप्राप्त रहने की स्थिति में श्री शर्मा के विरूद्ध अनधिकृत रूप से वर्ष 2016 से कार्यालय में अनुपस्थित रहने, सरकारी पत्रों का उार न देने, आदेशों का उल्लंघन करने एवं कर्तव्यहीनता के आरोप के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2093 दिनांक 19.09.2018 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। 2. विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में श्री दिनेश कुमार चौधरी, अधीक्षण अभियंता-सह-संचालन पदाधिकारी, गुण नियंत्रण (सिंचाई सृजन), अंचल, जल संसाधन विभाग, पटना के पत्रांक-629 दिनांक 06.12.18 द्वारा जांच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने जांच प्रतिवेदन में निम्न मंतव्य अंकित किया गया - ''श्री शर्मा द्वारा अपने लिखित बचाव बयान में कुछ नहीं कहा गया। मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-1161 दिनांक 25.11.16 के द्वारा दैनिक समाचार पत्र के माध्यम से (दिनांक 04.01.17 के प्रभात खबर में प्रकाशित सूचना) कर्तव्य पर उपस्थित होने के दिए गए निदेश के आलोक में श्री शर्मा क्याें नहीं अपने कर्तव्य पर उपस्थित हुए। इस प्रकार श्री शर्मा द्वारा निदेश का अनुपालन नहीं किया गया। उनके द्वारा काफी समय बाद अपने पत्रांक-शून्य दिनांक 20.09.17 से कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, बक्सर को अपने पद से त्याग पत्र समर्पित कर दिया गया, जिसमें उनके द्वारा व्यक्तिगत कारणों से अपने पद की जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में असमर्थता का उल्लेख किया गया। जबकि वे अपने स्वास्थ्य कारणों को लेकर अवकाश पर चले गए थे। श्री शर्मा द्वारा अपने त्याग पत्र के साथ चिकित्सा से संबंधित कोई भी प्रमाण पत्र संलग्न नहीं किया गया। इस प्रकार प्रतिवेदित आरोप प्रमाणित होता है। यह भी प्रमाणित होता है कि श्री शर्मा के द्वारा नियम के विरूद्ध आधारहीन त्याग पत्र स्वेच्छा से अपने हित में नौकरी छोडने के उद्‌ेदश्य से दिया गया है। नियमानुसार श्री शर्मा कर्तव्य पर योगदान कर आवश्यक कागजातों के साथ त्याग पत्र कार्यपालक अभियंता को समर्पित करते तथा विभाग द्वारा स्वीकृति उपरांत अपने कर्तव्य से मुक्त होते। उनके द्वारा नहीं किया गया तथा नौकरी छोड़ने हेतु त्याग पत्र देने की मात्र खानापूर्ति की गई।'' 3. संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जांच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के उक्त मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-66 दिनांक 07.01.2019 द्वारा श्री शर्मा से द्वितीय कारण पृच्छा की गई। श्री शर्मा द्वारा कारण पृच्छा का उार विभाग को समर्पित नहीं किया गया। इस स्थिति में श्री शर्मा को जवाब समर्पित करने हेतु विभागीय पत्रांक-1135 दिनांक 07.06.2019 एवं 2092 दिनांक 27.09.19 द्वारा स्मारित किया गया किन्तु उनके द्वारा उार नहीं दिया गया।

4. उक्त विभागीय कार्यवाही में श्री शर्मा द्वारा निर्धारित अवधि के उपरांत भी जवाब समर्पित नहीं करने के कारण एवं बार-बार स्मारित करने के पश्चात भी जवाब अप्राप्त रहने की स्थिति में मामले की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। स्पष्टतः श्री शर्मा अब सेवा में नहीं रहना चाहते है पर सेवा में नहीं रहने हेतु सरकार के द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप उन्होंने अपना त्याग पत्र आवेदन नहीं दिया। संचालन पदाधिकारी के समक्ष उनके द्वारा न तो अपना बचाव बयान प्रस्तुत किया गया और न ही विभागीय कार्यवाही में सहयोग दिया गया। जिसके कारण श्री शर्मा के विरूद्ध एक पक्षीय निर्णय लेने हेतु विभागीय बाध्यता के क्रम मेें निम्नांकित निर्णय प्रस्तावित किया गया -

(i) श्री सौरभ कुमार शर्मा (ID-5303) को अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दण्ड। (ii) दिनांक 20.02.2016 से अद्यतन तिथि तक कार्य से अनुपस्थिति के आधार पर No Work No Pay के सिद्धांत को मानते हुए इन्हें कोई वेतनादि का भुगतान देय नहीं होगा।

5. उक्त अनुमोदित प्रस्ताव कंडिका-4(i) पर बिहार लोक सेवा आयोग के पत्रांक-364 दिनांक 02.06.20 द्वारा सहमति प्राप्त है।

6. उक्त प्रस्ताव पर दिनांक-18.08.2020 को मंत्री परिषद्‌ की बैठक में प्रस्तावित मद सं0-10 के रूप में स्वीकृति प्राप्त है।

7. अतएव श्री सौरभ कुमार शर्मा (आई0डी0-5303), तत्कालीन प्राक्कलन पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, बक्सर को निम्न अनुमोदित दण्ड संसूचित एवं अधिरोपित किया जाता है।

(i) श्री सौरभ कुमार शर्मा (ID-5303) को अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दण्ड। (ii) दिनांक 20.02.2016 से अद्यतन तिथि तक कार्य से अनुपस्थिति के आधार पर No Work No Pay के सिद्धांत को मानते हुए इन्हें कोई वेतनादि का भुगतान देय नहीं होगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।49 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020

26 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)03-14/2015-1051--श्री जयदेव प्रसाद (आई0डी0-3625), तत्का0 कार्यपालक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, बिहारशरीफ के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना के परिक्षेत्राधीन जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 के अन्तर्गत ग्राम-भैरवा के पूरब उत्तर तरफ पंचाने नदी में वर्ष 2013-14 एवं वर्ष 2014-15 में छिलका का निर्माण किया गया जिसमें सरकारी राशि का बंदरबाट कर घटिया तरीके से उक्त छिलका के निर्माण कार्य में प्रयुक्त निर्माण सामग्रियों की गुणवत्ता की विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई। अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-166 दिनांक 03.05.2016 द्वारा जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-2524 दिनांक 07.12.16 द्वारा संवेदक को अधिकाई भुगतान करने संबंधी आरोप का प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए श्री प्रसाद से स्पष्टीकरण किया गया। प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब से असंतुष्ट रहते हुए श्री प्रसाद के विरूद्ध सरकारी राशि का बंदरबाट करने एवं घटिया निर्माण संबंधी कृत्य के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-134 दिनांक 15.01.18 द्वारा गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोप निमित्त बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। जो आरोप निम्नवत्‌ है - आरोप-जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ अन्तर्गत मध्य पंचाने नदी के जमींदारी बांध का आशानगर से धोबा नदी तक के अवशेष भाग का उच्चीकरण एवं सुदृ़ढ़ीकरण कार्य (एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 दिनांक 09.01.12) में मिट्टी भराई एवं इसके संपीडन मद में एकरारनामा के Technical Specification में प्रावधान के अनुसार sheep foot roller से 95% संपीड़न (cid:2869)

के लिए सेटलमेंट के लिए की कटौती किया जाना है। परन्तु उड़नदस्ता द्वारा जाँच में पाया गया कि रोड रॉलर से (cid:2872)(cid:2877)(cid:3047)(cid:3035)

90% संपीड़न के लिए सेटलमेंट मद में 2.5% कटौती किया गया है। जबकि 90% मिट्टी के संपीड़न के लिए Settlement allowance @ 85% एवं 95% के औसत 6.57% के कटौती के उपरांत भुगतान किया जाना चाहिए था। इस प्रकार एकरारनामा/परिमाण विपत्र के अनुसार मिट्टी कार्य के भुगतान की मात्रा से सेटलमेंट कटौती 6.57% के विपरीत 2.5% कटौती किए जाने से संवेदक को अधिकाई भुगतान किए जाने का मामला बनता प्रतीत होता है। जिसके लिए दोषी प्रतीत होते है। उक्त विभागीय कार्यवाही के क्रम में मुख्य अभियंता-सह-संचालन पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-1865 दिनांक 07.07.18 द्वारा जांच प्रतिवेदन विभाग को उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की तकनीकी समीक्षा विभाग स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण के मंतव्य प्राप्त करने हेतु विभागीय पत्रांक-798 दिनांक 16.04.19 द्वारा निदेशित किया गया। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना का पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा मंतव्य उपस्थापित किया गया। संचालन पदाधिकारी श्री हरिनारायण, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-1865 दिनांक 07.07.18 द्वारा उक्त मामले में जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जिसमें विस्तृत समीक्षा उपरांत निम्न मंतव्य अंकित किया गया -

जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा सं0-4F2/3/11-12, दिनांक 09.01.12 के अधीन संपीडित मिट्टी मामले में आरोपित पदाधिकारी द्वारा 2.5% Settlement कटौती से संबंधित है। उड़नदस्ता द्वारा कार्य की जाँच 95% Compaction के मामले में 1/49th की कटौती एवं 85% Compaction को un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th भाग की कटौती की दर से 90% compaction के मामले में दोनों का औसत 0.0657 अर्थात 6.57% कटौती नहीं किए जाने के कारण संवेदक को अधिकाई भुगतान होने की संभावना बतायी गयी है।

एकरारनामा के साथ संलग्न Specification of earthwork की कंडिका 10.2B में UN-compacted Soil के लिए 1/9th एवं Sheep foot roller से Compaction के मामले में 1/49th भाग की कटौती एवं अन्य स्थिति में प्रभारी अभियंता के उचित निर्णय के आधार पर कटौती किए जाने का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान में Sheep foot Roller से Compaction की मात्रा के सुनिश्चित प्रतिशत का उल्लेख नहीं है यानि Sheep foot roller से किसी भी प्रतिशत तक के Compaction के लिए 1/49th की कटौती समान रूप से मान्य है। मैनुअल एवं ट्रैक्टर द्वारा किए जाने वाला मिट्टी कार्य को Un-Compacted Soil मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती का प्रावधान है।

वर्णित कार्य में Labour for Rolling and compaction earth of 225m thick at OMC by road roller to achieve minimum 90% of maximum and density यानि रोड रोलर से 90% Compaction का कार्यमद शामिल था। चूँकि एकरारनामा की कंडिका के अनुसार Sheep foot Roller से भिन्न उपकरण द्वारा Compaction के मामले में पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने विवके से 2.05% की कटौती करने का निर्णय लिया गया एवं तदनुसार इसका अनुसरण करते हुए अन्य पदाधिकारी द्वारा भी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी द्वारा लिए गए निर्णय के आधार पर ही कटौती की गई।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 50 जल संसाधन विभाग एवं अन्य विभागों द्वारा अनुसूचित दर के कार्य मद संख्या-7.1.31 एवं 7.1.33 में Sheep foot Roller से क्रमशः 95% एवं 90% Compaction के लिए दर संगणना विवरणी अनुसूचित है। इसके साथ ही मद संख्या-5. 1.28 से 85% Compaction कराने के लिए अलग से कार्य मद अनुसूचित है।

उड़दस्ता द्वारा Sheep foot Roller of Compaction के मामले में Settlement कटौती हेतु 95% Compaction को ही आधार माना गया है जबकि Sheep foot Roller से 90% एवं 95% दोनों प्रकार के Compaction अनुसूचित है। अतएव Compacted soil के लिए उड़नदस्ता द्वारा 95% Compaction के लिए निर्धारित कटौती का ही चयन विधि संगत एवं उचित नहीं है।

उड़नदस्ता द्वारा 85% Compaction वाले मिट्टी कार्य को Un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती मान्य की गई है। अनुसूचित दर के कार्य मद 5.1.38 के अवलोकन से स्वतः स्पष्ट है कि 85% Compaction के लिए Watering and consolidation मानव और औजार के प्रयोग से किया जाता है जो Compacted श्रेणी का मिट्टी कार्य है। अतएव 85% Compaction को Un-compacted माना जाना विधि संगत नहीं है।

अतएव उड़नदस्ता द्वारा निर्धारित समीकरण 1/2 (1/9+1/49) 1/9 एवं 1/49 दोनों ही अमान्य है तथा इस आधार पर 6.57% की कटौती की अपेक्षा करने का कोई औचित्य नहीं है।

Sheep foot Roller से 90% Compaction भी अनुसूचित दर में शामिल है। यदि अन्य मशीन 90% Compaction कराया जाए तो वस्तुतः दोनों मामले में Settlement की कटौती समान ही होना चाहिए। यानि एकरारनामा एवं निर्धारित विशिष्टि के अनुसार Road Roller से 90% Compaction के मामले में भी 1/49th यानि 2.04% की कटौती भी विधिसंगत होता। हालांकि इस मामले में 2.50% की कटौती की गई जिससे अधिकाई भुगतान का मामला बनने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। बल्कि सरकारी राशि की बचत की गई है। आरोपित पदाधिकारी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी का पत्रांक-1281 दिनांक 19.09.2011 द्वारा Road Roller से 90% Compaction के मामले में 2.50% की दर से कटौती करने के लिए गए निर्णय को अपनाया है जो एकरारनामा एवं तय मानक की दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जा सकता है और न ही किसी प्रकार के अधिकाई भुगतान को ही समर्पित करता है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना का मंतव्य पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा उपलब्ध कराया गया, जो निम्न है -

मिट्टी के असंपीडित एवं संपीडित 85%, 90% एवं 98% Compacted मिट्टी प्रयोगशाला जाँच के आधार पर Settlement हेतु विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रतिवेदन को संलग्न किया जा रहा है। मिट्टी संरचना के निमित प्रक्रिया से संबंधित प्रचलित गाईड लाईन में संपीडन के दृष्टिकोण से मिट्टी कार्य के दो व्यापक वर्गों के लिए दिशा निर्देश दिया गया है, जिसमें Un-compacted मिट्टी कार्य के लिए Settlement allowance 1.5" प्रतिफुट (12.5%) प्रावधानित है। प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट है कि Settlement से संबंधित विश्लेषणात्मक फलाफल Un-compacted or looses Soil के लिए Settlement 12.5% एवं Compacted Soil (95%, 90%, 85% on proctor density scale) के लिए Settlement 2.04% के अन्तर्गत प्राप्त हुआ है।

उक्त तथ्यों के आलोक में 90% संपीडन वाले मिट्टी कार्य के लिए OMC पर 0.25 इंच प्रतिफुट यानि 2.08% का Settlement allowance अनुमान्य किया जाना युक्तिसंगत है।

उक्त मंतव्य पर अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-504, दिनांक 29.

08.2019 द्वारा मंतव्य प्राप्त किया गया, जो निम्न है -

मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रयोगशाला जाँच एवं अन्य तथ्यों के आधार पर Compacted Soil के विभिन्न संपीडन (85%, 90% एवं 95%) पर Settlement Allowance के लिए कटौती किए जाने पर मंतव्य दिया गया है। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना के उपरोक्त मंतव्य के आधार पर किसी निर्णय पर पहुँचने के पूर्व इस पर विधिवत विभागीय स्तर पर समीक्षोपरांत निर्णय लिया जाए।

उक्त के आलोक में विभाग द्वारा हाई लेवेल तकनीकी समिति गठित की गई। समिति द्वारा समीक्षोपरांत एक विभागीय आदेश सं0-730 दिनांक 17.10.2019 निर्गत किया गया। जिसमें यह निर्णय अंकित है कि 85%, 90% एवं 95% तक संपीडन मिट्टी भराई कार्य हेतु 2.08% Compaction allowance अनुमान्य किया जाता है जिस पर विभागीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है।

उक्त के आलोक में प्रस्तुत मामले में 2.50% की कटौती के पश्चात संवेदक को भुगतान किया गया। इस संबंध में विभागीय तकनीकी पदाधिकारी के समीक्षोपरांत जिसमें वर्णित किया गया है कि हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा समीक्षोपरांत निर्गत उपरोक्त विभागीय पत्र के आलोक में संवेदक को Settlement मद में अधिकाई भुगतान होना प्रमाणित नहीं होने से संवेदक के विरूद्ध वसूली का मामला नहीं बनता है।

अतएव उक्त वर्णित स्थिति में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन, मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रस्तुत मामले में समर्पित मंतव्य एवं विभाग द्वारा हाई लेवल51 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 तकनीकी समिति द्वारा निर्गत आदेश के आलोक में श्री जयदेव प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, बिहारशरीफ को उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोपों के लिए संचालित विभागीय कार्यवाही के क्रम में आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। श्री जयदेव प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, बिहारशरीफ को उक्त अनुमोदित निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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26 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)03-14/2015-1050--श्री नागेन्द्र नाथ मिश्र (आई0डी0-3545), तत्का0 कार्यपालक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ सम्प्रति सेवानिवृत के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना के परिक्षेत्राधीन जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा संख्या-4F2/3/11- 12 के अन्तर्गत ग्राम-भैरवा के पूरब उत्तर तरफ पंचाने नदी में वर्ष 2013-14 एवं वर्ष 2014-15 में छिलका का निर्माण किया गया जिसमें सरकारी राशि का बंदरबाट कर घटिया तरीके से उक्त छिलका के निर्माण कार्य में प्रयुक्त निर्माण सामग्रियों की गुणवत्ता की विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई। अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-166 दिनांक 03.05.2016 द्वारा जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-2521 दिनांक 07.12.16 द्वारा संवेदक को अधिकाई भुगतान करने संबंधी आरोप का प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए श्री मिश्र से स्पष्टीकरण किया गया। प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब से असंतुष्ट रहते हुए श्री मिश्र के विरूद्ध सरकारी राशि का बंदरबाट करने एवं घटिया निर्माण संबंधी कृत्य के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-89 दिनांक 12.01.18 द्वारा गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोप निमित्त बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। जो आरोप निम्नवत्‌ है - आरोप-जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ अन्तर्गत मध्य पंचाने नदी के जमींदारी बांध का आशानगर से धोबा नदी तक के अवशेष भाग का उच्चीकरण एवं सुदृ़ढ़ीकरण कार्य (एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 दिनांक 09.01.12) में मिट्टी भराई एवं इसके संपीडन मद में एकरारनामा के Technical Specification में प्रावधान के अनुसार sheep foot roller से 95% संपीड़न (cid:2869)

के लिए सेटलमेंट के लिए की कटौती किया जाना है। परन्तु उड़नदस्ता द्वारा जाँच में पाया गया कि रोड रॉलर से (cid:2872)(cid:2877)(cid:3047)(cid:3035)

90% संपीड़न के लिए सेटलमेंट मद में 2.5% कटौती किया गया है। जबकि 90% मिट्टी के संपीड़न के लिए Settlement allowance @ 85% एवं 95% के औसत 6.57% के कटौती के उपरांत भुगतान किया जाना चाहिए था। इस प्रकार एकरारनामा/परिमाण विपत्र के अनुसार मिट्टी कार्य के भुगतान की मात्रा से सेटलमेंट कटौती 6.57% के विपरीत 2.5% कटौती किए जाने से संवेदक को अधिकाई भुगतान किए जाने का मामला बनता प्रतीत होता है। जिसके लिए दोषी प्रतीत होते है। उक्त विभागीय कार्यवाही के क्रम में मुख्य अभियंता-सह-संचालन पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-1879 दिनांक 09.07.18 द्वारा जांच प्रतिवेदन विभाग को उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की तकनीकी समीक्षा विभाग स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण के मंतव्य प्राप्त करने हेतु विभागीय पत्रांक-798 दिनांक 16.04.19 द्वारा निदेशित किया गया। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना का पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा मंतव्य उपस्थापित किया गया। संचालन पदाधिकारी श्री हरिनारायण, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-1865 दिनांक 07.07.18 द्वारा उक्त मामले में जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जिसमें विस्तृत समीक्षा उपरांत निम्न मंतव्य अंकित किया गया -

जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा सं0-4F2/3/11-12, दिनांक 09.01.12 के अधीन संपीडित मिट्टी मामले में आरोपित पदाधिकारी द्वारा 2.5% Settlement कटौती से संबंधित है। उड़नदस्ता द्वारा कार्य की जाँच 95% Compaction के मामले में 1/49th की कटौती एवं 85% Compaction को un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th भाग की कटौती की दर से 90% compaction के मामले में दोनों का औसत 0.0657 अर्थात 6.57% कटौती नहीं किए जाने के कारण संवेदक को अधिकाई भुगतान होने की संभावना बतायी गयी है।

एकरारनामा के साथ संलग्न Specification of earthwork की कंडिका 10.2B में UN-compacted Soil के लिए 1/9th एवं Sheep foot roller से Compaction के मामले में 1/49th भाग की कटौती एवं अन्य स्थिति में प्रभारी अभियंता के उचित निर्णय के आधार पर कटौती किए जाने का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान में Sheep foot Roller से Compaction की मात्रा के सुनिश्चित प्रतिशत का उल्लेख नहीं है यानि Sheep foot roller से किसी भीबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 52 प्रतिशत तक के Compaction के लिए 1/49th की कटौती समान रूप से मान्य है। मैनुअल एवं ट्रैक्टर द्वारा किए जाने वाला मिट्टी कार्य को Un-Compacted Soil मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती का प्रावधान है।

वर्णित कार्य में Labour for Rolling and compaction earth of 225m thick at OMC by road roller to achieve minimum 90% of maximum and density यानि रोड रोलर से 90% Compaction का कार्यमद शामिल था। चूँकि एकरारनामा की कंडिका के अनुसार Sheep foot Roller से भिन्न उपकरण द्वारा Compaction के मामले में पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने विवके से 2.05% की कटौती करने का निर्णय लिया गया एवं तदनुसार इसका अनुसरण करते हुए अन्य पदाधिकारी द्वारा भी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी द्वारा लिए गए निर्णय के आधार पर ही कटौती की गई।

जल संसाधन विभाग एवं अन्य विभागों द्वारा अनुसूचित दर के कार्य मद संख्या-7.1.31 एवं 7.1.33 में Sheep foot Roller से क्रमशः 95% एवं 90% Compaction के लिए दर संगणना विवरणी अनुसूचित है। इसके साथ ही मद संख्या-5. 1.28 से 85% Compaction कराने के लिए अलग से कार्य मद अनुसूचित है।

उड़दस्ता द्वारा Sheep foot Roller of Compaction के मामले में Settlement कटौती हेतु 95% Compaction को ही आधार माना गया है जबकि Sheep foot Roller से 90% एवं 95% दोनों प्रकार के Compaction अनुसूचित है। अतएव Compacted soil के लिए उड़नदस्ता द्वारा 95% Compaction के लिए निर्धारित कटौती का ही चयन विधि संगत एवं उचित नहीं है।

उड़नदस्ता द्वारा 85% Compaction वाले मिट्टी कार्य को Un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती मान्य की गई है। अनुसूचित दर के कार्य मद 5.1.38 के अवलोकन से स्वतः स्पष्ट है कि 85% Compaction के लिए Watering and consolidation मानव और औजार के प्रयोग से किया जाता है जो Compacted श्रेणी का मिट्टी कार्य है। अतएव 85% Compaction को Un-compacted माना जाना विधि संगत नहीं है।

अतएव उड़नदस्ता द्वारा निर्धारित समीकरण 1/2 (1/9+1/49) 1/9 एवं 1/49 दोनों ही अमान्य है तथा इस आधार पर 6.57% की कटौती की अपेक्षा करने का कोई औचित्य नहीं है।

Sheep foot Roller से 90% Compaction भी अनुसूचित दर में शामिल है। यदि अन्य मशीन 90% Compaction कराया जाए तो वस्तुतः दोनों मामले में Settlement की कटौती समान ही होना चाहिए। यानि एकरारनामा एवं निर्धारित विशिष्टि के अनुसार Road Roller से 90% Compaction के मामले में भी 1/49th यानि 2.04% की कटौती भी विधिसंगत होता। हालांकि इस मामले में 2.50% की कटौती की गई जिससे अधिकाई भुगतान का मामला बनने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। बल्कि सरकारी राशि की बचत की गई है। आरोपित पदाधिकारी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी का पत्रांक-1281 दिनांक 19.09.2011 द्वारा Road Roller से 90% Compaction के मामले में 2.50% की दर से कटौती करने के लिए गए निर्णय को अपनाया है जो एकरारनामा एवं तय मानक की दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जा सकता है और न ही किसी प्रकार के अधिकाई भुगतान को ही समर्पित करता है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना का मंतव्य पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा उपलब्ध कराया गया, जो निम्न है -

मिट्टी के असंपीडित एवं संपीडित 85%, 90% एवं 98% Compacted मिट्टी प्रयोगशाला जाँच के आधार पर Settlement हेतु विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रतिवेदन को संलग्न किया जा रहा है। मिट्टी संरचना के निमित प्रक्रिया से संबंधित प्रचलित गाईड लाईन में संपीडन के दृष्टिकोण से मिट्टी कार्य के दो व्यापक वर्गों के लिए दिशा निर्देश दिया गया है, जिसमें Un-compacted मिट्टी कार्य के लिए Settlement allowance 1.5" प्रतिफुट (12.5%) प्रावधानित है। प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट है कि Settlement से संबंधित विश्लेषणात्मक फलाफल Un-compacted or looses Soil के लिए Settlement 12.5% एवं Compacted Soil (95%, 90%, 85% on proctor density scale) के लिए Settlement 2.04% के अन्तर्गत प्राप्त हुआ है।

उक्त तथ्यों के आलोक में 90% संपीडन वाले मिट्टी कार्य के लिए OMC पर 0.25 इंच प्रतिफुट यानि 2.08% का Settlement allowance अनुमान्य किया जाना युक्तिसंगत है।

उक्त मंतव्य पर अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-504, दिनांक 29.

08.2019 द्वारा मंतव्य प्राप्त किया गया, जो निम्न है -

मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रयोगशाला जाँच एवं अन्य तथ्यों के आधार पर Compacted Soil के विभिन्न संपीडन (85%, 90% एवं 95%) पर Settlement Allowance के लिए कटौती किए जाने पर मंतव्य दिया गया है। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना के उपरोक्त मंतव्य के आधार पर किसी निर्णय पर पहुँचने के पूर्व इस पर विधिवत विभागीय स्तर पर समीक्षोपरांत निर्णय लिया जाए।53 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उक्त के आलोक में विभाग द्वारा हाई लेवेल तकनीकी समिति गठित की गई। समिति द्वारा समीक्षोपरांत एक विभागीय आदेश सं0-730 दिनांक 17.10.2019 निर्गत किया गया। जिसमें यह निर्णय अंकित है कि 85%, 90% एवं 95% तक संपीडन मिट्टी भराई कार्य हेतु 2.08% Compaction allowance अनुमान्य किया जाता है जिस पर विभागीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है।

उक्त के आलोक में प्रस्तुत मामले में 2.50% की कटौती के पश्चात संवेदक को भुगतान किया गया। इस संबंध में विभागीय तकनीकी पदाधिकारी के समीक्षोपरांत जिसमें वर्णित किया गया है कि हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा समीक्षोपरांत निर्गत उपरोक्त विभागीय पत्र के आलोक में संवेदक को Settlement मद में अधिकाई भुगतान होना प्रमाणित नहीं होने से संवेदक के विरूद्ध वसूली का मामला नहीं बनता है।

अतएव उक्त वर्णित स्थिति में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन, मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रस्तुत मामले में समर्पित मंतव्य एवं विभाग द्वारा हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा निर्गत आदेश के आलोक में श्री नागेन्द्र नाथ मिश्र (आई0डी0-3545), तत्का0 कार्यपालक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ सम्प्रति सेवानिवृत को उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोपों के लिए संचालित विभागीय कार्यवाही के क्रम में आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। श्री नागेन्द्र नाथ मिश्र (आई0डी0-3545), तत्का0 कार्यपालक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ सम्प्रति सेवानिवृत को उक्त अनुमोदित निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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26 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)03-14/2015-1049--श्री अली अख्तर इमाम (आई0डी0-जे 7922), तत्का0 कनीय अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ सम्प्रति सहायक अभियंता, गंगा पम्प नहर अवर प्रमंडल-1, सूर्यगढ़ा, शिविर-मुँगेर के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना के परिक्षेत्राधीन जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 के अन्तर्गत ग्राम-भैरवा के पूरब उत्तर तरफ पंचाने नदी में वर्ष 2013-14 एवं वर्ष 2014-15 में छिलका का निर्माण किया गया जिसमें सरकारी राशि का बंदरबाट कर घटिया तरीके से उक्त छिलका के निर्माण कार्य में प्रयुक्त निर्माण सामग्रियों की गुणवत्ता की विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई। अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-166 दिनांक 03.05.2016 द्वारा जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-2528 दिनांक 08.12.16 द्वारा संवेदक को अधिकाई भुगतान करने संबंधी आरोप का प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए श्री अली अख्तर इमाम से स्पष्टीकरण किया गया। प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब से असंतुष्ट रहते हुए श्री अली अख्तर इमाम के विरूद्ध सरकारी राशि का बंदरबाट करने एवं घटिया निर्माण संबंधी कृत्य के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-156 दिनांक 17.01.18 द्वारा गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोप निमित्त बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। जो आरोप निम्नवत्‌ है - आरोप-जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ अन्तर्गत मध्य पंचाने नदी के जमींदारी बांध का आशानगर से धोबा नदी तक के अवशेष भाग का उच्चीकरण एवं सुदृ़ढ़ीकरण कार्य (एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 दिनांक 09.01.12) में मिट्टी भराई एवं इसके संपीडन मद में एकरारनामा के Technical Specification में प्रावधान के अनुसार sheep foot roller से 95% संपीड़न (cid:2869)

के लिए सेटलमेंट के लिए की कटौती किया जाना है। परन्तु उड़नदस्ता द्वारा जाँच में पाया गया कि रोड रॉलर से (cid:2872)(cid:2877)(cid:3047)

90% संपीड़न के लिए सेटलमेंट मद में 2.5% कटौती किया गया है। जबकि 90% मिट्टी के संपीड़न के लिए Settlement allowance @ 85% एवं 95% के औसत 6.57% के कटौती के उपरांत भुगतान किया जाना चाहिए था। इस प्रकार एकरारनामा/परिमाण विपत्र के अनुसार मिट्टी कार्य के भुगतान की मात्रा से सेटलमेंट कटौती 6.57% के विपरीत 2.5% कटौती किए जाने से संवेदक को अधिकाई भुगतान किए जाने का मामला बनता प्रतीत होता है। जिसके लिए दोषी प्रतीत होते है। उक्त विभागीय कार्यवाही के क्रम में मुख्य अभियंता-सह-संचालन पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-2293 दिनांक 16.08.18 द्वारा जांच प्रतिवेदन विभाग को उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की तकनीकी समीक्षा विभाग स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण के मंतव्य प्राप्त करने हेतु विभागीय पत्रांक-798 दिनांक 16.04.19 द्वारा निदेशित किया गया। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना का पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा मंतव्य उपस्थापित किया गया। संचालन पदाधिकारी श्री हरिनारायण, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-1865 दिनांक 07.07.18 द्वारा उक्त मामले में जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जिसमें विस्तृत समीक्षा उपरांत निम्न मंतव्य अंकित किया गया -बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 54 जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा सं0-4F2/3/11-12, दिनांक 09.01.12 के अधीन संपीडित मिट्टी मामले में आरोपित पदाधिकारी द्वारा 2.5% Settlement कटौती से संबंधित है। उड़नदस्ता द्वारा कार्य की जाँच 95% Compaction के मामले में 1/49th की कटौती एवं 85% Compaction को un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th भाग की कटौती की दर से 90% compaction के मामले में दोनों का औसत 0.0657 अर्थात 6.57% कटौती नहीं किए जाने के कारण संवेदक को अधिकाई भुगतान होने की संभावना बतायी गयी है।

एकरारनामा के साथ संलग्न Specification of earthwork की कंडिका 10.2B में UN-compacted Soil के लिए 1/9th एवं Sheep foot roller से Compaction के मामले में 1/49th भाग की कटौती एवं अन्य स्थिति में प्रभारी अभियंता के उचित निर्णय के आधार पर कटौती किए जाने का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान में Sheep foot Roller से Compaction की मात्रा के सुनिश्चित प्रतिशत का उल्लेख नहीं है यानि Sheep foot roller से किसी भी प्रतिशत तक के Compaction के लिए 1/49th की कटौती समान रूप से मान्य है। मैनुअल एवं ट्रैक्टर द्वारा किए जाने वाला मिट्टी कार्य को Un-Compacted Soil मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती का प्रावधान है।

वर्णित कार्य में Labour for Rolling and compaction earth of 225m thick at OMC by road roller to achieve minimum 90% of maximum and density यानि रोड रोलर से 90% Compaction का कार्यमद शामिल था। चूँकि एकरारनामा की कंडिका के अनुसार Sheep foot Roller से भिन्न उपकरण द्वारा Compaction के मामले में पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने विवके से 2.05% की कटौती करने का निर्णय लिया गया एवं तदनुसार इसका अनुसरण करते हुए अन्य पदाधिकारी द्वारा भी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी द्वारा लिए गए निर्णय के आधार पर ही कटौती की गई।

जल संसाधन विभाग एवं अन्य विभागों द्वारा अनुसूचित दर के कार्य मद संख्या-7.1.31 एवं 7.1.33 में Sheep foot Roller से क्रमशः 95% एवं 90% Compaction के लिए दर संगणना विवरणी अनुसूचित है। इसके साथ ही मद संख्या-5. 1.28 से 85% Compaction कराने के लिए अलग से कार्य मद अनुसूचित है।

उड़दस्ता द्वारा Sheep foot Roller of Compaction के मामले में Settlement कटौती हेतु 95% Compaction को ही आधार माना गया है जबकि Sheep foot Roller से 90% एवं 95% दोनों प्रकार के Compaction अनुसूचित है। अतएव Compacted soil के लिए उड़नदस्ता द्वारा 95% Compaction के लिए निर्धारित कटौती का ही चयन विधि संगत एवं उचित नहीं है।

उड़नदस्ता द्वारा 85% Compaction वाले मिट्टी कार्य को Un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती मान्य की गई है। अनुसूचित दर के कार्य मद 5.1.38 के अवलोकन से स्वतः स्पष्ट है कि 85% Compaction के लिए Watering and consolidation मानव और औजार के प्रयोग से किया जाता है जो Compacted श्रेणी का मिट्टी कार्य है। अतएव 85% Compaction को Un-compacted माना जाना विधि संगत नहीं है।

अतएव उड़नदस्ता द्वारा निर्धारित समीकरण 1/2 (1/9+1/49) 1/9 एवं 1/49 दोनों ही अमान्य है तथा इस आधार पर 6.57% की कटौती की अपेक्षा करने का कोई औचित्य नहीं है।

Sheep foot Roller से 90% Compaction भी अनुसूचित दर में शामिल है। यदि अन्य मशीन 90% Compaction कराया जाए तो वस्तुतः दोनों मामले में Settlement की कटौती समान ही होना चाहिए। यानि एकरारनामा एवं निर्धारित विशिष्टि के अनुसार Road Roller से 90% Compaction के मामले में भी 1/49th यानि 2.04% की कटौती भी विधिसंगत होता। हालांकि इस मामले में 2.50% की कटौती की गई जिससे अधिकाई भुगतान का मामला बनने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। बल्कि सरकारी राशि की बचत की गई है। आरोपित पदाधिकारी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी का पत्रांक-1281 दिनांक 19.09.2011 द्वारा Road Roller से 90% Compaction के मामले में 2.50% की दर से कटौती करने के लिए गए निर्णय को अपनाया है जो एकरारनामा एवं तय मानक की दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जा सकता है और न ही किसी प्रकार के अधिकाई भुगतान को ही समर्पित करता है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना का मंतव्य पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा उपलब्ध कराया गया, जो निम्न है -

मिट्टी के असंपीडित एवं संपीडित 85%, 90% एवं 98% Compacted मिट्टी प्रयोगशाला जाँच के आधार पर Settlement हेतु विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रतिवेदन को संलग्न किया जा रहा है। मिट्टी संरचना के निमित प्रक्रिया से संबंधित प्रचलित गाईड लाईन में संपीडन के दृष्टिकोण से मिट्टी कार्य के दो व्यापक वर्गों के लिए दिशा निर्देश दिया गया है, जिसमें Un-compacted मिट्टी कार्य के लिए Settlement allowance 1.5" प्रतिफुट (12.5%) प्रावधानित है। प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट है कि Settlement से संबंधित विश्लेषणात्मक फलाफल Un-compacted or looses Soil के लिए Settlement 12.5% एवं Compacted Soil (95%, 90%, 85% on proctor density scale) के लिए Settlement 2.04% के अन्तर्गत प्राप्त हुआ है।55 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उक्त तथ्यों के आलोक में 90% संपीडन वाले मिट्टी कार्य के लिए OMC पर 0.25 इंच प्रतिफुट यानि 2.08% का Settlement allowance अनुमान्य किया जाना युक्तिसंगत है।

उक्त मंतव्य पर अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-504, दिनांक 29.

08.2019 द्वारा मंतव्य प्राप्त किया गया, जो निम्न है -

मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रयोगशाला जाँच एवं अन्य तथ्यों के आधार पर Compacted Soil के विभिन्न संपीडन (85%, 90% एवं 95%) पर Settlement Allowance के लिए कटौती किए जाने पर मंतव्य दिया गया है। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना के उपरोक्त मंतव्य के आधार पर किसी निर्णय पर पहुँचने के पूर्व इस पर विधिवत विभागीय स्तर पर समीक्षोपरांत निर्णय लिया जाए।

उक्त के आलोक में विभाग द्वारा हाई लेवेल तकनीकी समिति गठित की गई। समिति द्वारा समीक्षोपरांत एक विभागीय आदेश सं0-730 दिनांक 17.10.2019 निर्गत किया गया। जिसमें यह निर्णय अंकित है कि 85%, 90% एवं 95% तक संपीडन मिट्टी भराई कार्य हेतु 2.08% Compaction allowance अनुमान्य किया जाता है जिस पर विभागीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है।

उक्त के आलोक में प्रस्तुत मामले में 2.50% की कटौती के पश्चात संवेदक को भुगतान किया गया। इस संबंध में विभागीय तकनीकी पदाधिकारी के समीक्षोपरांत जिसमें वर्णित किया गया है कि हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा समीक्षोपरांत निर्गत उपरोक्त विभागीय पत्र के आलोक में संवेदक को Settlement मद में अधिकाई भुगतान होना प्रमाणित नहीं होने से संवेदक के विरूद्ध वसूली का मामला नहीं बनता है।

अतएव उक्त वर्णित स्थिति में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन, मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रस्तुत मामले में समर्पित मंतव्य एवं विभाग द्वारा हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा निर्गत आदेश के आलोक में श्री अली अख्तर इमाम (आई0डी0-जे 7922), तत्का0 कनीय अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ सम्प्रति सहायक अभियंता, गंगा पम्प नहर अवर प्रमंडल-1, सूर्यगढ़ा, शिविर-मुँगेर को उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोपों के लिए संचालित विभागीय कार्यवाही के क्रम में आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। श्री अली अख्तर इमाम (आई0डी0-जे 7922), तत्का0 कनीय अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ सम्प्रति, अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सारण नहर अवर प्रमंडल, एकमा, को उक्त अनुमोदित निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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26 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)03-14/2015-1048--श्री गजेन्द्र कुमार चौधरी (आई0डी0-5013), तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, जल पथ अवर प्रमंडल, हिलसा सम्प्रति सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-2, खगौल, पटना के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना के परिक्षेत्राधीन जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 के अन्तर्गत ग्राम-भैरवा के पूरब उत्तर तरफ पंचाने नदी में वर्ष 2013-14 एवं वर्ष 2014-15 में छिलका का निर्माण किया गया जिसमें सरकारी राशि का बंदरबाट कर घटिया तरीके से उक्त छिलका के निर्माण कार्य में प्रयुक्त निर्माण सामग्रियों की गुणवत्ता की विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई। अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-166 दिनांक 03.05.2016 द्वारा जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-2522 दिनांक 07.12.16 द्वारा संवेदक को अधिकाई भुगतान करने संबंधी आरोप का प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए श्री चौधरी से स्पष्टीकरण किया गया। प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब से असंतुष्ट रहते हुए श्री चौधरी के विरूद्ध सरकारी राशि का बंदरबाट करने एवं घटिया निर्माण संबंधी कृत्य के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-171 दिनांक 18.01.18 द्वारा गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोप निमित्त बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। जो आरोप निम्नवत्‌ है - आरोप-जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ अन्तर्गत मध्य पंचाने नदी के जमींदारी बांध का आशानगर से धोबा नदी तक के अवशेष भाग का उच्चीकरण एवं सुदृ़ढ़ीकरण कार्य (एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 दिनांक 09.01.12) में मिट्टी भराई एवं इसके संपीडन मद में एकरारनामा के Technical Specification में प्रावधान के अनुसार sheep foot roller से 95% संपीड़न (cid:2869)

के लिए सेटलमेंट के लिए की कटौती किया जाना है। परन्तु उड़नदस्ता द्वारा जाँच में पाया गया कि रोड रॉलर से (cid:2872)(cid:2877)(cid:3047)(cid:3035)

90% संपीड़न के लिए सेटलमेंट मद में 2.5% कटौती किया गया है। जबकि 90% मिट्टी के संपीड़न के लिए Settlement allowance @ 85% एवं 95% के औसत 6.57% के कटौती के उपरांत भुगतान किया जाना चाहिए था। इस प्रकार एकरारनामा/परिमाण विपत्र के अनुसार मिट्टी कार्य के भुगतान की मात्रा से सेटलमेंट कटौती 6.57% के विपरीतबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 56 2.5% कटौती किए जाने से संवेदक को अधिकाई भुगतान किए जाने का मामला बनता प्रतीत होता है। जिसके लिए दोषी प्रतीत होते है। उक्त विभागीय कार्यवाही के क्रम में मुख्य अभियंता-सह-संचालन पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-2247 दिनांक 11.08.18 द्वारा जांच प्रतिवेदन विभाग को उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की तकनीकी समीक्षा विभाग स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण के मंतव्य प्राप्त करने हेतु विभागीय पत्रांक-798 दिनांक 16.04.19 द्वारा निदेशित किया गया। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना का पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा मंतव्य उपस्थापित किया गया। संचालन पदाधिकारी श्री हरिनारायण, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-1865 दिनांक 07.07.18 द्वारा उक्त मामले में जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जिसमें विस्तृत समीक्षा उपरांत निम्न मंतव्य अंकित किया गया -

जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा सं0-4F2/3/11-12, दिनांक 09.01.12 के अधीन संपीडित मिट्टी मामले में आरोपित पदाधिकारी द्वारा 2.5% Settlement कटौती से संबंधित है। उड़नदस्ता द्वारा कार्य की जाँच 95% Compaction के मामले में 1/49th की कटौती एवं 85% Compaction को un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th भाग की कटौती की दर से 90% compaction के मामले में दोनों का औसत 0.0657 अर्थात 6.57% कटौती नहीं किए जाने के कारण संवेदक को अधिकाई भुगतान होने की संभावना बतायी गयी है।

एकरारनामा के साथ संलग्न Specification of earthwork की कंडिका 10.2B में UN-compacted Soil के लिए 1/9th एवं Sheep foot roller से Compaction के मामले में 1/49th भाग की कटौती एवं अन्य स्थिति में प्रभारी अभियंता के उचित निर्णय के आधार पर कटौती किए जाने का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान में Sheep foot Roller से Compaction की मात्रा के सुनिश्चित प्रतिशत का उल्लेख नहीं है यानि Sheep foot roller से किसी भी प्रतिशत तक के Compaction के लिए 1/49th की कटौती समान रूप से मान्य है। मैनुअल एवं ट्रैक्टर द्वारा किए जाने वाला मिट्टी कार्य को Un-Compacted Soil मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती का प्रावधान है।

वर्णित कार्य में Labour for Rolling and compaction earth of 225m thick at OMC by road roller to achieve minimum 90% of maximum and density यानि रोड रोलर से 90% Compaction का कार्यमद शामिल था। चूँकि एकरारनामा की कंडिका के अनुसार Sheep foot Roller से भिन्न उपकरण द्वारा Compaction के मामले में पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने विवके से 2.05% की कटौती करने का निर्णय लिया गया एवं तदनुसार इसका अनुसरण करते हुए अन्य पदाधिकारी द्वारा भी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी द्वारा लिए गए निर्णय के आधार पर ही कटौती की गई।

जल संसाधन विभाग एवं अन्य विभागों द्वारा अनुसूचित दर के कार्य मद संख्या-7.1.31 एवं 7.1.33 में Sheep foot Roller से क्रमशः 95% एवं 90% Compaction के लिए दर संगणना विवरणी अनुसूचित है। इसके साथ ही मद संख्या-5. 1.28 से 85% Compaction कराने के लिए अलग से कार्य मद अनुसूचित है।

उड़दस्ता द्वारा Sheep foot Roller of Compaction के मामले में Settlement कटौती हेतु 95% Compaction को ही आधार माना गया है जबकि Sheep foot Roller से 90% एवं 95% दोनों प्रकार के Compaction अनुसूचित है। अतएव Compacted soil के लिए उड़नदस्ता द्वारा 95% Compaction के लिए निर्धारित कटौती का ही चयन विधि संगत एवं उचित नहीं है।

उड़नदस्ता द्वारा 85% Compaction वाले मिट्टी कार्य को Un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती मान्य की गई है। अनुसूचित दर के कार्य मद 5.1.38 के अवलोकन से स्वतः स्पष्ट है कि 85% Compaction के लिए Watering and consolidation मानव और औजार के प्रयोग से किया जाता है जो Compacted श्रेणी का मिट्टी कार्य है। अतएव 85% Compaction को Un-compacted माना जाना विधि संगत नहीं है।

अतएव उड़नदस्ता द्वारा निर्धारित समीकरण 1/2 (1/9+1/49) 1/9 एवं 1/49 दोनों ही अमान्य है तथा इस आधार पर 6.57% की कटौती की अपेक्षा करने का कोई औचित्य नहीं है।

Sheep foot Roller से 90% Compaction भी अनुसूचित दर में शामिल है। यदि अन्य मशीन 90% Compaction कराया जाए तो वस्तुतः दोनों मामले में Settlement की कटौती समान ही होना चाहिए। यानि एकरारनामा एवं निर्धारित विशिष्टि के अनुसार Road Roller से 90% Compaction के मामले में भी 1/49th यानि 2.04% की कटौती भी विधिसंगत होता। हालांकि इस मामले में 2.50% की कटौती की गई जिससे अधिकाई भुगतान का मामला बनने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। बल्कि सरकारी राशि की बचत की गई है। आरोपित पदाधिकारी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी का पत्रांक-1281 दिनांक 19.09.2011 द्वारा Road Roller से 90% Compaction के मामले में 2.50% की दर से कटौती करने के लिए गए निर्णय को अपनाया है जो एकरारनामा एवं तय मानक की दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जा सकता है और न ही किसी प्रकार के अधिकाई भुगतान को ही समर्पित करता है।57 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना का मंतव्य पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा उपलब्ध कराया गया, जो निम्न है -

मिट्टी के असंपीडित एवं संपीडित 85%, 90% एवं 98% Compacted मिट्टी प्रयोगशाला जाँच के आधार पर Settlement हेतु विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रतिवेदन को संलग्न किया जा रहा है। मिट्टी संरचना के निमित प्रक्रिया से संबंधित प्रचलित गाईड लाईन में संपीडन के दृष्टिकोण से मिट्टी कार्य के दो व्यापक वर्गों के लिए दिशा निर्देश दिया गया है, जिसमें Un-compacted मिट्टी कार्य के लिए Settlement allowance 1.5" प्रतिफुट (12.5%) प्रावधानित है। प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट है कि Settlement से संबंधित विश्लेषणात्मक फलाफल Un-compacted or looses Soil के लिए Settlement 12.5% एवं Compacted Soil (95%, 90%, 85% on proctor density scale) के लिए Settlement 2.04% के अन्तर्गत प्राप्त हुआ है।

उक्त तथ्यों के आलोक में 90% संपीडन वाले मिट्टी कार्य के लिए OMC पर 0.25 इंच प्रतिफुट यानि 2.08% का Settlement allowance अनुमान्य किया जाना युक्तिसंगत है।

उक्त मंतव्य पर अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-504, दिनांक 29.

08.2019 द्वारा मंतव्य प्राप्त किया गया, जो निम्न है -

मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रयोगशाला जाँच एवं अन्य तथ्यों के आधार पर Compacted Soil के विभिन्न संपीडन (85%, 90% एवं 95%) पर Settlement Allowance के लिए कटौती किए जाने पर मंतव्य दिया गया है। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना के उपरोक्त मंतव्य के आधार पर किसी निर्णय पर पहुँचने के पूर्व इस पर विधिवत विभागीय स्तर पर समीक्षोपरांत निर्णय लिया जाए।

उक्त के आलोक में विभाग द्वारा हाई लेवेल तकनीकी समिति गठित की गई। समिति द्वारा समीक्षोपरांत एक विभागीय आदेश सं0-730 दिनांक 17.10.2019 निर्गत किया गया। जिसमें यह निर्णय अंकित है कि 85%, 90% एवं 95% तक संपीडन मिट्टी भराई कार्य हेतु 2.08% Compaction allowance अनुमान्य किया जाता है जिस पर विभागीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है।

उक्त के आलोक में प्रस्तुत मामले में 2.50% की कटौती के पश्चात संवेदक को भुगतान किया गया। इस संबंध में विभागीय तकनीकी पदाधिकारी के समीक्षोपरांत जिसमें वर्णित किया गया है कि हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा समीक्षोपरांत निर्गत उपरोक्त विभागीय पत्र के आलोक में संवेदक को Settlement मद में अधिकाई भुगतान होना प्रमाणित नहीं होने से संवेदक के विरूद्ध वसूली का मामला नहीं बनता है।

अतएव उक्त वर्णित स्थिति में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन, मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रस्तुत मामले में समर्पित मंतव्य एवं विभाग द्वारा हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा निर्गत आदेश के आलोक में श्री गजेन्द्र कुमार चौधरी (आई0डी0-5013), तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, जल पथ अवर प्रमंडल, हिलसा सम्प्रति सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-2, खगौल, पटना को उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोपों के लिए संचालित विभागीय कार्यवाही के क्रम में आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। श्री गजेन्द्र कुमार चौधरी (आई0डी0-5013), तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, जल पथ अवर प्रमंडल, हिलसा सम्प्रति सहायक अभियंता, शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल-2, खगौल, पटना को उक्त अनुमोदित निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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26 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पट0)03-14/2015-1047--श्री उमेश कुमार (आई0डी0-5121), तत्का0 सहायक अभियंता, जल पथ अवर प्रमंडल, बिहारशरीफ के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, पटना के परिक्षेत्राधीन जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 के अन्तर्गत ग्राम-भैरवा के पूरब उत्तर तरफ पंचाने नदी में वर्ष 2013-14 एवं वर्ष 2014-15 में छिलका का निर्माण किया गया जिसमें सरकारी राशि का बंदरबाट कर घटिया तरीके से उक्त छिलका के निर्माण कार्य में प्रयुक्त निर्माण सामग्रियों की गुणवत्ता की विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई। अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-166 दिनांक 03. 05.2016 द्वारा जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की विभागीय समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-2523 दिनांक 07.12.16 द्वारा संवेदक को अधिकाई भुगतान करने संबंधी आरोप का प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए श्री कुमार से स्पष्टीकरण किया गया। प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब से असंतुष्ट रहते हुए श्री कुमार के विरूद्ध सरकारी राशि का बंदरबाट करने एवं घटिया निर्माण संबंधी कृत्य के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-155 दिनांक 17.01.18 द्वारा गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोप निमित्त बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। जो आरोप निम्नवत्‌ है -58 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोप-जल पथ प्रमंडल, बिहारशरीफ अन्तर्गत मध्य पंचाने नदी के जमींदारी बांध का आशानगर से धोबा नदी तक के अवशेष भाग का उच्चीकरण एवं सुदृ़ढ़ीकरण कार्य (एकरारनामा संख्या-4F2/3/11-12 दिनांक 09.01.12) में मिट्टी भराई एवं इसके संपीडन मद में एकरारनामा के Technical Specification में प्रावधान के अनुसार sheep foot roller से 95% संपीड़न (cid:2869)

के लिए सेटलमेंट के लिए की कटौती किया जाना है। परन्तु उड़नदस्ता द्वारा जाँच में पाया गया कि रोड रॉलर से (cid:2872)(cid:2877)(cid:3047)(cid:3035)

90% संपीड़न के लिए सेटलमेंट मद में 2.5% कटौती किया गया है। जबकि 90% मिट्टी के संपीड़न के लिए Settlement allowance @ 85% एवं 95% के औसत 6.57% के कटौती के उपरांत भुगतान किया जाना चाहिए था। इस प्रकार एकरारनामा/परिमाण विपत्र के अनुसार मिट्टी कार्य के भुगतान की मात्रा से सेटलमेंट कटौती 6.57% के विपरीत 2.5% कटौती किए जाने से संवेदक को अधिकाई भुगतान किए जाने का मामला बनता प्रतीत होता है। जिसके लिए दोषी प्रतीत होते है। उक्त विभागीय कार्यवाही के क्रम में मुख्य अभियंता-सह-संचालन पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-2264 दिनांक 13.08.18 द्वारा जांच प्रतिवेदन विभाग को उपलब्ध कराया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की तकनीकी समीक्षा विभाग स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण के मंतव्य प्राप्त करने हेतु विभागीय पत्रांक-798 दिनांक 16.04.19 द्वारा निदेशित किया गया। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना का पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा मंतव्य उपस्थापित किया गया। संचालन पदाधिकारी श्री हरिनारायण, मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-1865 दिनांक 07.07.18 द्वारा उक्त मामले में जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जिसमें विस्तृत समीक्षा उपरांत निम्न मंतव्य अंकित किया गया -

जलपथ प्रमंडल, बिहारशरीफ के अन्तर्गत एकरारनामा सं0-4F2/3/11-12, दिनांक 09.01.12 के अधीन संपीडित मिट्टी मामले में आरोपित पदाधिकारी द्वारा 2.5% Settlement कटौती से संबंधित है। उड़नदस्ता द्वारा कार्य की जाँच 95% Compaction के मामले में 1/49th की कटौती एवं 85% Compaction को un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th भाग की कटौती की दर से 90% compaction के मामले में दोनों का औसत 0.0657 अर्थात 6.57% कटौती नहीं किए जाने के कारण संवेदक को अधिकाई भुगतान होने की संभावना बतायी गयी है।

एकरारनामा के साथ संलग्न Specification of earthwork की कंडिका 10.2B में UN-compacted Soil के लिए 1/9th एवं Sheep foot roller से Compaction के मामले में 1/49th भाग की कटौती एवं अन्य स्थिति में प्रभारी अभियंता के उचित निर्णय के आधार पर कटौती किए जाने का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान में Sheep foot Roller से Compaction की मात्रा के सुनिश्चित प्रतिशत का उल्लेख नहीं है यानि Sheep foot roller से किसी भी प्रतिशत तक के Compaction के लिए 1/49th की कटौती समान रूप से मान्य है। मैनुअल एवं ट्रैक्टर द्वारा किए जाने वाला मिट्टी कार्य को Un-Compacted Soil मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती का प्रावधान है।

वर्णित कार्य में Labour for Rolling and compaction earth of 225m thick at OMC by road roller to achieve minimum 90% of maximum and density यानि रोड रोलर से 90% Compaction का कार्यमद शामिल था। चूँकि एकरारनामा की कंडिका के अनुसार Sheep foot Roller से भिन्न उपकरण द्वारा Compaction के मामले में पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने विवके से 2.05% की कटौती करने का निर्णय लिया गया एवं तदनुसार इसका अनुसरण करते हुए अन्य पदाधिकारी द्वारा भी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी द्वारा लिए गए निर्णय के आधार पर ही कटौती की गई।

जल संसाधन विभाग एवं अन्य विभागों द्वारा अनुसूचित दर के कार्य मद संख्या-7.1.31 एवं 7.1.33 में Sheep foot Roller से क्रमशः 95% एवं 90% Compaction के लिए दर संगणना विवरणी अनुसूचित है। इसके साथ ही मद संख्या-5. 1.28 से 85% Compaction कराने के लिए अलग से कार्य मद अनुसूचित है।

उड़दस्ता द्वारा Sheep foot Roller of Compaction के मामले में Settlement कटौती हेतु 95% Compaction को ही आधार माना गया है जबकि Sheep foot Roller से 90% एवं 95% दोनों प्रकार के Compaction अनुसूचित है। अतएव Compacted soil के लिए उड़नदस्ता द्वारा 95% Compaction के लिए निर्धारित कटौती का ही चयन विधि संगत एवं उचित नहीं है।

उड़नदस्ता द्वारा 85% Compaction वाले मिट्टी कार्य को Un-compacted मानते हुए इसके लिए 1/9th की कटौती मान्य की गई है। अनुसूचित दर के कार्य मद 5.1.38 के अवलोकन से स्वतः स्पष्ट है कि 85% Compaction के लिए Watering and consolidation मानव और औजार के प्रयोग से किया जाता है जो Compacted श्रेणी का मिट्टी कार्य है। अतएव 85% Compaction को Un-compacted माना जाना विधि संगत नहीं है।

अतएव उड़नदस्ता द्वारा निर्धारित समीकरण 1/2 (1/9+1/49) 1/9 एवं 1/49 दोनों ही अमान्य है तथा इस आधार पर 6.57% की कटौती की अपेक्षा करने का कोई औचित्य नहीं है।59 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 Sheep foot Roller से 90% Compaction भी अनुसूचित दर में शामिल है। यदि अन्य मशीन 90% Compaction कराया जाए तो वस्तुतः दोनों मामले में Settlement की कटौती समान ही होना चाहिए। यानि एकरारनामा एवं निर्धारित विशिष्टि के अनुसार Road Roller से 90% Compaction के मामले में भी 1/49th यानि 2.04% की कटौती भी विधिसंगत होता। हालांकि इस मामले में 2.50% की कटौती की गई जिससे अधिकाई भुगतान का मामला बनने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। बल्कि सरकारी राशि की बचत की गई है। आरोपित पदाधिकारी अपने पूर्ववर्ती प्रभारी का पत्रांक-1281 दिनांक 19.09.2011 द्वारा Road Roller से 90% Compaction के मामले में 2.50% की दर से कटौती करने के लिए गए निर्णय को अपनाया है जो एकरारनामा एवं तय मानक की दृष्टि से अनुचित नहीं कहा जा सकता है और न ही किसी प्रकार के अधिकाई भुगतान को ही समर्पित करता है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर मुख्य अभियंता केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना का मंतव्य पत्रांक-528 दिनांक 15.05.2019 द्वारा उपलब्ध कराया गया, जो निम्न है -

मिट्टी के असंपीडित एवं संपीडित 85%, 90% एवं 98% Compacted मिट्टी प्रयोगशाला जाँच के आधार पर Settlement हेतु विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रतिवेदन को संलग्न किया जा रहा है। मिट्टी संरचना के निमित प्रक्रिया से संबंधित प्रचलित गाईड लाईन में संपीडन के दृष्टिकोण से मिट्टी कार्य के दो व्यापक वर्गों के लिए दिशा निर्देश दिया गया है, जिसमें Un-compacted मिट्टी कार्य के लिए Settlement allowance 1.5" प्रतिफुट (12.5%) प्रावधानित है। प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट है कि Settlement से संबंधित विश्लेषणात्मक फलाफल Un-compacted or looses Soil के लिए Settlement 12.5% एवं Compacted Soil (95%, 90%, 85% on proctor density scale) के लिए Settlement 2.04% के अन्तर्गत प्राप्त हुआ है।

उक्त तथ्यों के आलोक में 90% संपीडन वाले मिट्टी कार्य के लिए OMC पर 0.25 इंच प्रतिफुट यानि 2.08% का Settlement allowance अनुमान्य किया जाना युक्तिसंगत है।

उक्त मंतव्य पर अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-2, जल संसाधन विभाग, पटना का पत्रांक-504, दिनांक 29.

08.2019 द्वारा मंतव्य प्राप्त किया गया, जो निम्न है -

मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रयोगशाला जाँच एवं अन्य तथ्यों के आधार पर Compacted Soil के विभिन्न संपीडन (85%, 90% एवं 95%) पर Settlement Allowance के लिए कटौती किए जाने पर मंतव्य दिया गया है। मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण, शोध एवं गुण नियंत्रण, पटना के उपरोक्त मंतव्य के आधार पर किसी निर्णय पर पहुँचने के पूर्व इस पर विधिवत विभागीय स्तर पर समीक्षोपरांत निर्णय लिया जाए।

उक्त के आलोक में विभाग द्वारा हाई लेवेल तकनीकी समिति गठित की गई। समिति द्वारा समीक्षोपरांत एक विभागीय आदेश सं0-730 दिनांक 17.10.2019 निर्गत किया गया। जिसमें यह निर्णय अंकित है कि 85%, 90% एवं 95% तक संपीडन मिट्टी भराई कार्य हेतु 2.08% Compaction allowance अनुमान्य किया जाता है जिस पर विभागीय मंत्री का अनुमोदन प्राप्त है।

उक्त के आलोक में प्रस्तुत मामले में 2.50% की कटौती के पश्चात संवेदक को भुगतान किया गया। इस संबंध में विभागीय तकनीकी पदाधिकारी के समीक्षोपरांत जिसमें वर्णित किया गया है कि हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा समीक्षोपरांत निर्गत उपरोक्त विभागीय पत्र के आलोक में संवेदक को Settlement मद में अधिकाई भुगतान होना प्रमाणित नहीं होने से संवेदक के विरूद्ध वसूली का मामला नहीं बनता है।

अतएव उक्त वर्णित स्थिति में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन, मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण शोध एवं गुण नियंत्रण, जल संसाधन विभाग, पटना के द्वारा प्रस्तुत मामले में समर्पित मंतव्य एवं विभाग द्वारा हाई लेवल तकनीकी समिति द्वारा निर्गत आदेश के आलोक में श्री उमेश कुमार (आई0डी0-5121), तत्का0 सहायक अभियंता, जल पथ अवर प्रमंडल, बिहारशरीफ को उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में वर्णित आरोपों के लिए संचालित विभागीय कार्यवाही के क्रम में आरोप मुक्त करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है। श्री उमेश कुमार (आई0डी0-5121), तत्का0 सहायक अभियंता, जल पथ अवर प्रमंडल, बिहारशरीफ संप्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सिंचाई अवर प्रमंडल, भागलपुर को उक्त अनुमोदित निर्णय संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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17 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(सिवान)11-12/2015-1017--श्री विश्वनाथ चौधरी (ID-M0092) तत्कालीन मुख्य अभियंता (यां0) जल संसाधन विभाग, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध मुख्य अभियंता, सिवान परिक्षेत्राधीन सारण नहर प्रमंडल, एकमा एवं सिंचाई यांत्रिक प्रमंडल, छपरा के द्वारा दाहा उद्‌वह सिंचाई योजना के तहत मांझी प्रखंड ताजपुर के निकट दाहा नदी से पानी लिफ्ट कर मांझी उप वितरणी एवं गोबराही उप वितरणी में अतिरिक्त जलश्राव देने हेतु क्रियान्वित योजनाओं में60 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 बरती गयी अनियमितता के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2390 दिनांक 28.11.16 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत आरोप पत्र में गठित निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :- ''दाहा उद्‌वह सिंचाई योजना के यांत्रिक कार्यों का IS Code 5822-1994 एवं IS Code 5330-1984 के अनुरूप पाईप लाईन का बिना अनुमोदित रूपांकण/आलेख्य एवं बिना समुचित Expansion Joint का प्रावधान किये ही संशोधित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान की गयी एवं पाईप लेईंग कार्य भी इनके ही कार्यकाल में कराया गया। स्थल के आवश्यकता के अनुरूप भी इनके द्वारा कार्यान्वयन के दौरान Expansion Joint का समुचित प्रावधान नहीं किया गया एवं कार्य होता रहा तथा कार्यपालक अभियंता द्वारा त्रुटिपूर्ण कार्यों का भुगतान भी किया जाता रहा। पाईप लाईन में समुचित Expansion Joint का प्रावधान नहीं किये जाने के कारण पाईप क्रैक कर गया तथा Pedestal & thrust block भी क्षतिग्रस्त हो गया। फलतः योजना पर किया गया व्यय भी अपव्यय होना परिलक्षित है''। उक्त विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित जांच प्रतिवेदन में आरोपित पदाधिकारी पर लगाया गया आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। विभागीय पत्रांक-882 दिनांक 12.06.17 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन की प्रति संलग्न करते हुए श्री चौधरी से द्वितीय कारण पृच्छा की मांग की गयी। तदालोक में श्री चौधरी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युत्तर, संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन, गठित आरोप एवं अन्य उपलब्ध अभिलेखों की समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा लिये गये निर्णय के आलोक में उन्हें विभागीय अधिसूचना सं0-1580, दिनांक 23.07.2019 द्वारा '10% (दस प्रतिशत) पेंशन की कटौती दो वर्षों के लिए' का दण्ड दिया एवं संसूचित किया गया। उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री चौधरी द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी दिनांक 13.09.2019 समर्पित किया गया है, जिसमें मुख्यतः निम्न तथ्य अंकित किया गया है :- बिहार वित्त नियमावली के नियम 201, 202, 203 में यह प्रावधानित है कि किसी भी कार्य के प्रारंभ होने के पूर्व प्रशासनिक स्वीकृति, विस्तृत डिजाईन तथा प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति निधि का उपबंध अपेक्षित होगा। बिहार लोक निर्माण संहिता के नियम-99(1) के अनुसार यह मेजर वर्क है, इसमें नियम 102 के तहत कराये जाने वाले कार्य का विस्तृत प्राक्कलन तथा राशि का आकलन किया जाता है, जो नियम 103 के अधीन प्रभावी अनुसूचित दर पर आधारित होगा। इसी संहिता के नियम 102, 121, 122,123, 125, 126, 128, 130 से कार्य कराये जाने का प्रावधान उल्लेखित है। पाईप लाईन के ले आउट प्लान असैनिक अधीक्षण अभियंता, छपरा द्वारा स्वीकृत हुआ तथा इस स्वीकृत प्लान के आधार पर कार्यपालक अभियंता, यांत्रिक प्रमंडल, छपरा एवं अधीक्षण अभियंता (यां0) के पर्यवेक्षण में कार्य प्रारंभ हुआ। इस प्रकार तकनीकी स्वीकृति एवं निविदा स्वीकृति में मुख्य अभियंता (यां0) के रूप में इनकी कोई भूमिका नहीं थी, क्योंकि वे दिनांक 14.06.11 को मुख्य अभियंता (यां0) पद पर प्रभार ग्रहण किया था। बिहार लोक निर्माण संहिता का नियम-13 कार्य निष्पादन के दौरान रूपांकण आदि में फेरबदल करने से संबंधित है। इस प्रावधान के अनुसार विभागीय विचलन समिति गठित है। इस समिति के दिनांक 26.09.13 की बैठक में दाहा नदी उद्‌वह सिंचाई एवं नहर प्रणालियों के पुनस्र्थापन योजना के अन्तर्गत असैनिक एवं यांत्रिक कार्य के हुए मात्रात्मक विचलन की समीक्षा की गयी थी। इस बैठक में यांत्रिक कार्यों में M/s Pipe एवं HT Line के विचलन को अनुमोदित किया गया था। इस बैठक में किसी स्तर से Expansion Joint बढाने का न तो प्रस्ताव दिया गया था और न ही कोई तकनीकी परामर्श ही दिया गया। पुनरीक्षित प्राक्कलन की स्वीकृति विभागीय विचलन समिति के अनुमोदन उपरांत उसमें बिना कोई विचलन किया गया था। मुख्य अभियंता यांत्रिक के पद पर से वे दिनांक 31.01.14 को सेवानिवृत हुए थे। इस अवधि में मात्र 1325 मी0 लंबाई में पाईप को पेडस्टल पर रखने का कार्य हुआ था। जबकि पाईप लेईंग का कार्य 6040 मीटर में होना था। इन्होनें योजना स्थल का निरीक्षण मुख्य अभियंता, सिवान के साथ किया। निरीक्षण में Expansion Joint पर कोई अलग से चर्चा नहीं हुई थी। परन्तु असैनिक अधीक्षण अभियंता को निदेश दिया गया कि प्रत्येक 15 दिनों पर संवेदक और अभियंता की बैठक बुलाकर प्रगति की समीक्षा करें तथा कोई समस्या आने पर उसका निदान बतलायेंगे तथा आवश्यकता पड़ने पर दोनों मुख्य अभियंता की मदद लेंगे परन्तु किसी समस्या को संज्ञान में नहीं लाया गया। मुख्य अभियंता केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध पटना के प्रतिवेदन पत्रांक-674 दिनांक 28.02.10 में अंकित है कि प्रस्तावित स्थल का मिट्‌टी का वियरिंग कैपेसिटी उपलब्ध नहीं कराया गया और बाद में असैनिक मुख्य अभियंता, सिवान द्वारा बिना मिट्‌टी का वियरिंग कैपेसिटी जांच कराये हुए ही प्राक्कलन की स्वीकृति दी गयी। श्री चौधरी द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अभ्यावेदन की समीक्षा में पाया गया कि पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को एवं द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युत्तर में दिया गया है। पुनरीक्षित प्राक्कलन की बिना समुचित Expansion Joint के स्वीकृति प्रदान करने के संबंध में कहा गया है कि दिनांक 26.09.13 को विभागीय विचलन समिति की बैठक में लिये गये निर्णय के आलोक में यांत्रिक कार्यों में M/S Pipe & HT Line के विचलन को अनमुोदित किया गया है। इस बैठक में किसी स्तर से Expansion Joint बढाने का न तो प्रस्ताव दिया गया था और न ही कोई तकनीकी परामर्श ही दिया गया, स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि मुख्य अभियंता (यां0) का दायित्व था कि IS Code 5822-1984 के अनुसार Expansion Joint का प्रावधान करते हुए रूपांकण कर प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान करना था। IS Code 5822-1994 के अनुसार कुल 23 अद्‌द Expansion Joint का प्रावधान होना चाहिए था जिसके विरूद्ध स्वीकृत प्राक्कलन के मात्र 6 अद्‌द Expansion Joint प्रावधानित था एवं उसी के अनुरूप कार्य कराने से थर्मल Expansion & Contraction के कारण पाईप लाईन क्षतिग्रस्त होना परिलक्षित है।61 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 जहां तक पाईप लाईन में Expansion Joint का प्रावधान करने का प्रश्न है यह दायित्व यांत्रिक संगठन का था न कि असैनिक अभियंता का। इसी के तहत यांत्रिक कार्य से संबंधित सभी अव्यवों के साथ पाईप लाईन लेईंग का प्राक्कलन मुख्य अभियंता (यां0) द्वारा स्वीकृत किया गया। आरोपी द्वारा भी कार्य के दौरान कुल कार्य में विचलन होने के कारण बिना समुचित Expansion Joint के प्रावधान किये ही संशोधित प्राक्कलन की स्वीकृति प्रदान की गयी। वर्णित तथ्यों का आलोक में मामले की सम्यक समीक्षोपरांत सरकार द्वारा श्री चौधरी के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री विश्वनाथ चौधरी (ID-M 0092) तत्कालीन मुख्य अभियंता (यां0) जल संसाधन विभाग, पटना सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी दिनांक 13.09.2019 को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना सं0-1580 दिनांक 23.07.2019 द्वारा निर्गत दण्डादेश (10% पेंशन की कटौती दो वर्षों के लिए) को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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17 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(सिवान)11-12/2015-1016--श्री सुभाष कुमार वर्मा (ID-M0538) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई यांत्रिक प्रमंडल, छपरा सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध मुख्य अभियंता, सिवान परिक्षेत्राधीन सारण नहर प्रमंडल, एकमा एवं सिंचाई यांत्रिक प्रमंडल, छपरा के द्वारा दाहा उद्‌वह सिंचाई योजना के तहत मांझी प्रखंड, ताजपुर के निकट दाहा नदी से पानी लिफ्ट कर मांझी उप वितरणी एवं गोबराही उप वितरणी में अतिरिक्त जलश्राव देने हेतु क्रियान्वित योजनाओं में बरती गयी अनियमितता के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2392, दिनांक 08.11.16 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत आरोप पत्र में गठित निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

"IS code 5822-1994 एवं IS code 5330-1984 के अनुरूप यांत्रिक कार्य के तहत पाईप लाईन का बिना अनुमोदित रूपांकण/आलेख्य के ही प्राक्कलन में बिना Expansion Joint का प्रावधान किये ही तैयार किया गया तथा बिना समुचित Expansion Joint के प्रावधान किये ही कार्य कराने के कारण पाईप लाईन में Thermal Expansion/Contraction के कारण पाईप कै्रक कर गया तथा Supporting system यथा Pedestal भी क्षतिग्रस्त हो गया। फलतः योजना के अधूरा कार्य पर किया गया व्यय का अपव्यय होने की स्थिति बनी"।

तदुपरांत दिनांक 30.11.16 को श्री वर्मा के सेवानिवृत हो जाने के फलस्वरूप विभागीय आदेश संख्या-08 सहपठित ज्ञापांक-60 दिनांक 18.01.17 द्वारा उक्त विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया गया।

उक्त विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित जांच प्रतिवेदन में आरोपित पदाधिकारी पर लगाया गया आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। विभागीय पत्रांक-137 दिनांक 15.01.18 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन की प्रति संलग्न करते हुए श्री वर्मा से द्वितीय कारण पृच्छा की मांग की गयी। तदालोक में श्री वर्मा से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युत्तर संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन एवं अन्य अभिलेखों की समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा लिये गये निर्णय के आलोक में उन्हें विभागीय अधिसूचना सं0-1578 दिनांक 23.07.2019 द्वारा ''5% (पांच प्रतिशत) पेंशन की कटौती दो वर्षों के लिए'' का दण्ड दिया एवं संसूचित किया गया।

उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री वर्मा द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन दिनांक 25.11.19 समर्पित किया गया है, जिसमें कहा गया है कि दाहा उद्‌वह सिंचाई योजना के कार्य का एग्रीमेंट इनके पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता श्री सतीश कुमार द्वारा किया गया था। कार्य का प्राक्कलन एवं Drawing design भी उनके द्वारा किया गया था। पुनरीक्षित प्राक्कलन भी तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा दिनांक 24.01.13 को समर्पित की गयी जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता (यां0) द्वारा दिनांक 28.10.13 को दी गयी। पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता के कार्यकाल में लगभग 5440मी0 का कार्य लगभग समाप्त कर दिया था। इनके द्वारा दिनांक 24.10.13 को प्रभार ग्रहण किया गया। इसी बीच मुख्य अभियंता एवं विभागीय अभियंता द्वारा निरीक्षण किया गया, परन्तु किसी तरह की पाईप लाईन में गडबड़ी नहीं पायी गयी। परियोजना पूर्ण होने के पश्चात जांच में पाईप में क्रैक पाया गया। इस तरह इनके प्रभार लेने के पूर्व पाईप लेईंग का कार्य पूरा हो गया था, ऐसी स्थिति में आरोप लगाना कि Expansion Joint का प्रावधान नहीं किया गया, बिल्कुल ही तर्कसंगत नहीं है। इतना ही नहीं निरीक्षण के क्रम में उच्चाधिकारी द्वारा भी कभी कोई विपरीत अथवा प्रतिकूल टिप्पणी Design को लेकर नहीं की गयी।

श्री वर्मा द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अभ्यावेदन की समीक्षा में पाया गया कि पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को एवं द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युत्तर में दिया गया है। इनके द्वारा मुख्य रूप से कहा गया है कि इनके प्रभार लेने के पूर्व ही पाईप लेईंग का कार्य पूरा करा लिया गया था। स्थल निरीक्षण के दौरान भी उच्च पदाधिकारियों द्वारा भी कोई विपरीत अथवा प्रतिकूल टिप्पणी Design को लेकर नहीं की गयी है। अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि श्री वर्मा द्वारा दिनांक 26.10.13 को कार्यपालक अभियंता (यां0) का प्रभार62 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 ग्रहण किया गया है जबकि मुख्य अभियंता, सिवान के निरीक्षण प्रतिवेदन दिनांक 24.04.15 आरोपित पदाधिकारी के द्वारा अधीक्षण अभियंता (यां0) को दिये गये प्रगति प्रतिवेदन तथा संवेदक को आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिये गये निदेश से स्पष्ट है कि इनके पदस्थापन काल में भी पाईप लेईंग का कार्य हो रहा था। कार्य से संबंधित 9वें चालू विपत्र का भुगतान इनके द्वारा की गयी है। अतएव इनका कथन स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में मामले की सम्यक समीक्षोपरांत सरकार द्वारा श्री वर्मा के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया।

सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुभाष कुमार वर्मा (आई0डी0-एम 0538) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी दिनांक 25.11.2019 को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना सं0-1578 दिनांक 23.07.2019 द्वारा निर्गत दण्डादेश (5% पेंशन की कटौती दो वर्षों के लिए) को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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12 अगस्त 2020

सं॰ 22/नि0सि0(गोपा0)27-03/2019-995--मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, गोपालगंज के नव निर्मित सरकारी आवास पर दिनांक-29.08.2019 को घटित घटना के संदर्भ में मुख्य अभियंता, गोपालगंज आवास निर्माण योजना के अद्यतन भुगतान एवं लंबित भुगतान से संबंधित अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-01 जल संसाधन विभाग, पटना के पत्रांक-18 दिनांक-31.08.2019 से प्राप्त प्रारंभिक जॉच प्रतिवेदन में मुख्य अभियंता के आवास निर्माण में प्राक्कलन से बाहर जाकर अतिरिक्त कार्य कराने, कार्य कराकर संवेदक को भुगतान नहीं करने, सक्षम प्राधिकार की अनुमति के बगैर अपने मुख्यालय से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने आदि कतिपय प्रतिवेदित आरोपाें के लिए श्री मुरलीधर सिंह (आई0डी0 सं०-3177), मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, गोपालगंज को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 9(1)(क) के प्रावधानों के तहत विभागीय अधिसूचना संख्या-1886 दिनांक 01.09.2019 द्वारा निलंबित किया गया।

2. श्री मुरलीधर सिंह, तत0 मुख्य अभियंता दिनांक 31.01.2020 को सेवानिवृत हो चुके हैं। इसलिए इन्हें दिनांक 31.

01.2020 के प्रभाव से निलंबन मुक्त करते हुए इनके विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित किये जाने का निर्णय सक्षम प्राधिकार द्वारा लिया गया है।

3. उक्त निर्णय के आलोक में श्री मुरलीधर सिंह, तत्कालीन मुख्य अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को दिनांक 31.01.20 के प्रभाव से निलंबन मुक्त किया जाता है।

4. श्री सिंह के विरूद्ध बिहार पेंशन नियामवली के नियम-43(बी) के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित करने संबंधी संकल्प अलग से निर्गत किया जा रहा है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

------- 21 जुलाई 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(डि॰) 14-01/2019-972--श्री कुमार ब्रजेश (आई0डी0-5145), अवर प्रमण्डल पदाधिकारी, सिंचाई अवर प्रमण्डल करगहर का स्थानान्तरण विभागीय अधिसूचना संख्या 2349 दिनांक-22.06.18 द्वारा अवर प्रमण्डल पदाधिकारी बाढ़ नियंत्रण एवं जल निससरण अवर प्रमण्डल सोनपुर के पद पर किया गया, पुनः विभागीय पत्रांक-3685 दिनांक-28.09.2018 द्वारा श्री कुमार को सूचित किया गया कि नियंत्री पदाधिकारी द्वारा विरमित नहीं किये जाने की स्थिति में दिनांक-20.10.18 के प्रभाव से स्वतः विरमित होकर दिनांक-22.10.18 तक निश्चित रूप से नव पदस्थापित स्थान पर प्रभार ग्रहण कर विभाग को ई-मेंल से अवगत कराया जाय। उक्त निदेश के बाद भी श्री कुमार के नव-पदस्थापन स्थान पर दिनांक-22.10.2018 तक योगदान न देकर दिनांक-06.11.2018 को योगदान समर्पित किया। विभागीय आदेश का उल्लंघन करने के कारण विभागीय पत्रांक-4086 दिनांक-05.11.2018 द्वारा श्री कुमार से स्पष्टीकरण की माँग की गयी, तदालोक में श्री कुमार द्वारा स्पष्टीकरण का उत्तर समर्पित किया गया। श्री कुमार से प्राप्त स्पष्टीकरण के सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय आदेश की अवहेलना करने के आरोप को प्रमाणित पाते हुए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया :- (i) ''निन्दन संगत वर्ष के लिए''। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री कुमार ब्रजेश, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमण्डल करगहर सम्प्रति अवर प्रमण्डल पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अवर प्रमण्डल, सोनपुर को अधिसूचना सं0-847 दिनांक-29.04.2019 द्वारा ''निन्दन संगत वर्ष के लिए'' का दण्ड संसूचित किया गया। उक्त निर्णित दण्ड के विरूद्ध श्री कुमार ब्रजेश द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन समर्पित किया गया। पुनर्विचार अभ्यावेदन में वर्णित तथ्यों की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत पुनर्विचार आवेदन को स्वीकृत करने का निर्णय लिया गया है।63 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री कुमार ब्रजेश, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमण्डल करगहर सम्प्रति अवर प्रमण्डल पदाधिकारी, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अवर प्रमण्डल, सोनपुर को विभागीय अधिसूचना सं0-847 दिनांक-29.04.2019 द्वारा अधिरोपित दण्ड ''निन्दन संगत वर्ष के लिए'' से आरोप मुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, हसंजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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21 जुलाई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(दर0)16-33/2007-971--श्री सुजय चन्द्र किशोर, तत्कालीन सहायक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमंडल, अंघराठाढ़ी द्वारा उक्त पदस्थापन अवधि में झंझारपुर शाखा नहर के 23-50 वि0दू0 पर निर्मित अतिरिक्त सी0डी0 संरचना के निर्माण कार्य में अनियमितता बरतने, कार्य विशिष्टि के अनुरूप नहीं कराने एवं निर्माण के कुछ ही वर्ष में सरंचना ध्वस्त हो जाने इत्यादि प्रथम दृष्टया आरोपों के लिए सरकार द्वारा उन्हें विभागीय अधिसूचना सं0-149 दिनांक 08.02. 2008 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय कार्यवाही चलाने का निर्णय लिया गया। तदनुसार विभागीय संकल्प ज्ञापांक-273 दिनांक 26.03.2008 द्वारा श्री सुजय चन्द्र किशोर, सहायक अभियंता के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही में जाँच पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। जाँच प्रतिवेदन में आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत निम्नांकित बिन्दुओं पर जाँच पदाधिकारी के प्रतिवेदन से असहमति व्यक्त करते हुए श्री किशोर से कारण पृच्छा करने का निर्णय लिया गया। 1) जाँच पदाधिकारी द्वारा मंतव्य दिया गया है कि नहर तल के उपर पी0सी0सी0 कार्य कराया गया है। परन्तु इसके उपर मिट्टी का कभर नहीं पाया गया। ऐसा लगता है कि मिट्टी का कार्य कराने के लिए मिट्टी हटाना आवश्यक था और मरम्मति कार्य कराने के बाद मिट्टी कभर नहीं किया गया। जाँच पदाधिकारी द्वारा संभावना व्यक्त किया गया है कोई ठोस साक्ष्य/आधार नहीं दिया गया है।

2) दूसरे आरोप के संबंध में जाँच पदाधिकारी द्वारा मंतव्य दिया गया है कि नहर तल के बलुआही मिट्टी का इरोजन संभव हे। नहर फिलिंग में होने के कारण कमजोर बलुआही मिट्टी धीरे-धीरे इरोज कर पाईप के नीचे का पी0सी0सी0 लटक गया होगा। जिससे पाईप का कॉलर ज्वाईंट खुल गया होगा। इसमें भी जाँच पदाधिकारी द्वारा पी0सी0सी0 लटकने एवं कॉलर ज्वाइंट खुलने के कारणों को संभावनाओं पर बताया गया है। कोई ठोस साक्ष्य एवं आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है। उक्त असहमति के बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-524 दिनांक 10.07.2008 द्वारा श्री सुजय चन्द्र किशोर से द्वितीय कारण पृच्छा किया गया। श्री किशोर से प्राप्त कारण पृच्छा के उत्तर की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरांत आरोप प्रमाणित पाया गया। फलतः लिये गये निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-712 दिनांक 27.08. 08 द्वारा आदेश निर्गत की तिथि से निलंबन मुक्त करते हुए श्री किशोर के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित किया गया- (i) निन्दन वर्ष 2002-03 (ii) पाँच वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। (iii) निलंबन अवधि में निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ देय नहीं होगा, परन्तु उक्त अवधि पेंशन के प्रयोजनार्थ गणना की जाएगी।

उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री किशोर द्वारा पुनर्विचार याचिका समर्पित किया गया। जिसके समीक्षोपरांत पाया गया कि पुनर्विचार याचिका में उन्हीं तथ्यों का उल्लेख किया गया। जो उनके द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के प्रतिउत्तर में कहा गया था। अतः मामले के सम्यक समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-520 दिनांक 06.05.13 द्वारा पुनर्विचार याचिका को अस्वीकृत किये जाने का निर्णय संसूचित किया गया।

दण्डादेश के विरूद्ध श्री किशोर द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-11738/2013 सुजय चन्द्र किशोर बनाम बिहार सरकार एवं अन्य दायर किया गया। दिनांक 21.12.2019 को न्याय निर्णय दिया गया। जिसमें विभागीय अधिसूचना सं0-712 दिनांक 27.08.2008 द्वारा श्री किशोर के विरूद्ध अधिरोपित दण्ड को निरस्त करने का आदेश दिया गया।

मामले के सम्यक समीक्षोपरांत न्याय निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-712 दिनांक 27.08.2008 द्वारा श्री सुजय चन्द्र किशोर, तत0 सहायक अभियंता, पश्चिमी कोशी नहर प्रमंडल, अंघराठाढी सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध अधिरोपित दण्ड को निरस्त किया जाता है।

उक्त निर्णय श्री किशोर को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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21 जुलाई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-10/2017-970--श्री सतीश कुमार (आई0डी0-4045), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 14.08.17 को बागमती नदी के बाँयें तटबंध में सीपेज एवं पाईपिंग के कारण चार स्थलों पर हुए टूटान में जानमाल की व्यापक क्षति सहित अन्य अनियमितताओं के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-1608, दिनांक 14.09.2017 द्वारा श्री कुमार को निलंबित किया गया एवं64 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 तत्पश्चात विभागीय संकल्प ज्ञापांक संख्या-1691, दिनांक 20.09.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई - (1) बागमती नदी पर निर्मित तटबंध के रून्नीसैदपुर में सीपेज के संबंध में ससमय जानकारी आपको नहीं थी। जिससे स्पष्ट होता है कि आपके द्वारा विभागीय निदेशों के प्रतिकूल तटबंध के आक्रमित स्थलों का निरीक्षण नहीं किया गया।

(2) पाईपिंग के कारण तटबंध टूट जाने तक आपके द्वारा स्थल भ्रमण नहीं किया गया। (3) इसके अतिरिक्त घनौर कटरा रिंग बाँध में ओभर टॉपिंग होने के कारण क्षतिग्रस्त हुआ। इस स्थल का भी आपके द्वारा न तो प्रारम्भ में और न ही बाद में निरीक्षण किया गया।

(4) रिसाव एवं पाईपिंग होने के बावजूद इसकी सूचना आपके द्वारा उच्चाधिकारी को नहीं दी गयी और बाँध से रिसाव एवं पाईपिंग को आपके द्वारा ठीक नहीं कराया गया।

(5) तटबंध के चार स्थलों पर टूटने के कारण जानमाल की व्यापक क्षति हुई। (6) दिनांक 15.08.17 को मुख्य अभियंता द्वारा क्षतिग्रस्त भाग का निरीक्षण किया गया। किन्तु आप उस समय में भी टूटान स्थल पर उपस्थित नहीं थे।

(7) दिनांक 14.08.17 एवं 15.08.17 को आपका सरकारी मोबाईल बन्द पाया गया। (8) इस प्रकार विभागीय निर्देशों के बावजूद भी आपके द्वारा बाढ से निपटने हेतु अपेक्षित पूर्व तैयारी नहीं की गयी थी। (9) निरीक्षण के समय कटाव स्थल पर भरे हुए बोरे की मात्रा कम थी और बोरा भरने की गति भी धीमी थी। (10) दिनांक 14.08.17 को टूटान हुआ, लेकिन टूटान के बाद सुरक्षात्मक कार्य दिनांक 16.08.17 के मुख्य अभियंता के निरीक्षण तक आरम्भ नहीं किया गया था।

आपका यह कृत बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो के प्रति घोर लापरवाही एवं कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है। आपका यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम-3(iii) के प्रतिकूल है। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री सतीश कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित आरोपों में से आरोप संख्या-01 एवं 07 को प्रमाणित तथा आरोप संख्या-02, 04, 06 को अंशतः प्रमाणित एवं आरोप संख्या-03, 05, 08, 09 एवं 10 को अप्रमाणित पाया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए अंशतः प्रमाणित/प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1197, दिनांक 29.05.2018 द्वारा संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति संलग्न करते हुए लिखित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई।

उक्त के आलोक में श्री कुमार, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर द्वारा अपने पत्रांक-25, दिनांक 12.06.2018 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया, जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :- बचाव बयान के कंडिका (1) (a) से (g) तक में इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के संदर्भ में आपत्ति, आरोप को अप्रमाणित करने हेतु संदर्भित माँगे गये अभिलेख तथा उक्त के संदर्भ में संचालन पदाधिकारी द्वारा दिये गये पत्र का उल्लेख किया गया है तथा कहा गया है कि सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 12196 दिनांक 07.09.16 के अनुसार आरोपी द्वारा अधियाचित अभिलेख को उपलब्ध कराया जाना है। परन्तु विभाग या संचालन पदाधिकारी द्वारा वांछित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराया गया एवं सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 1893 दिनांक 14.06.11 का बिना अनुपालन किये ही संचालन पदाधिकारी द्वारा बिना तथ्यों के समीक्षा किये ही जाँच प्रतिवेदन दिया गया है। जो नैसर्गिक न्याय सिद्धान्तों के विपरीत है। बचाव बयान के कंडिका-2 :- संचालन पदाधिकारी द्वारा प्रमाणित आरोप-1 के संदर्भ में कहा गया है कि- (क) प्रमंडलीय बेतार संवाद सं॰ 32 दिनांक 14.08.17 को संलग्न करते हुए कहा गया है कि अपने कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत हो रहे रिसाव की ससमय जानकारी थी एवं उक्त बेतार संवाद से रिसाव एवं पाईपिंग की सूचना ससमय उच्चाधिकारी के साथ-साथ विभाग को दी गयी थी।

(ख) विभागीय मोबाईल सं॰ 7463889934 के Call detail report से न्यायहित में सम्पुष्टि की जा सकती है। इस संबंध में संचालन पदाधिकारी का तर्क की आरोपी अभियंता द्वारा समर्पित कॉल डिटेल्स की प्रमाणिकता उनके उच्चाधिकारियों/विभागीय मंतव्य द्वारा भी सम्पुष्ट नहीं की गयी है। उचित नहीं है।

(ग) NR 32 दि॰ 14.08.17 द्वारा नदी के दायाँ एवं बायें बाँध में हो रहे रिसाव की सूचना अधीक्षण अभियंता, सीतामढ़ी, अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल एवं विभागीय उच्चाधिकारियों को ससमय दी गयी थी। उक्त से स्पष्ट है कि सिपेज की जानकारी उन्हें थी एवं तटबंधों का निरीक्षण किया गया था।

(घ) संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप-2 में कहा गया है कि विभिन्न स्थलों पर हो रहे रिसाव/पाईपिंग के रोकथाम में व्यस्त रहने के कारण दिनांक 14.08.17 को टूटान स्थल का निरीक्षण टूटान के पूर्व नहीं किया जा सका है। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप-8 के समीक्षा के क्रम में अंकित किया है कि मुख्य अभियंता के पत्रांक 6 दिनांक 12.07.17 से स्पष्ट है कि बाढ़ पूर्व की गयी तैयारी पर सहमति व्यक्त की गयी है। इससे स्पष्ट है कि उनके द्वारा सभी आक्राम्य स्थलों का निरीक्षण किया गया था।65 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 NR 41 दि॰ 15.08.17 से स्पष्ट है कि आलोच्य स्थल का निरीक्षण ससमय करते हुए बाँध को सुरक्षित रखने हेतु आवश्यक कारवाई की गयी है। स्थल निरीक्षण की सम्पुष्टि प्रमंडलीय निरीक्षण वाहन सं॰ BR-30P- 2775 के लॉग बुक से होती है। अतः यह आरोप साक्ष्यविहीन है।

बचाव बयान के कंडिका-3 :- में आरोप सं॰ 7 यथा दिनांक 14.08.17 एवं 15.08.17 को सरकारी मोबाईल बन्द पाये जाने के संदर्भ में कहा गया है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा माना है कि दिनांक 14.08.17 को सरकारी मोबाईल पूर्ण रूप से चालू था। दिनांक 15.08.17 को मोबाईल बन्द रहने के संदर्भ में कहा गया है कि इस संबंध में विभाग द्वारा स्पष्टीकरण की माँग करने पर बेतार संवाद सं॰ 42 दिनांक 16.08.17 से वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए विभाग को अवगत कराया गया था। जिसमें अंकित है कि दिनांक 14.08.17 को टूटान होने के पश्चात बिजली आपूर्ति पूर्णतः बन्द कर दी गयी है। लगातार स्थल पर रहने के कारण मोबाईल के साथ पावर बैंक भी डिस्चार्ज हो चुका था। रून्नीसैदपुर परिसर में लगभग 4.5 फिट पानी प्रवेश करने के कारण प्रमंडलीय जेनरेटर भी पानी मे डुबा हुआ था। इसके बावजूद दिनांक 15.08.17 को सहायक अभियंता के मोबाईल के माध्यम से मुख्य अभियंता के सम्पर्क में रहने के कारण टूटान निरीक्षण में सम्मिलित थे। साक्ष्य के रूप में दिनांक 15.08.17 का आवासीय परिसर एवं कार्यालय में पानी भरे रहने से संबंधित फोटोग्राफ तथा NR 41 दि॰ 15.08.17 की प्रति दी गयी है। आरोप-2 ः- के संबंध में कहा गया है कि पाईपिंग के कारण तटबंध किस स्थल पर टूटा अंकित नहीं है। अतः आरोप अस्पष्ट है। जो आरोप पत्र गठन नियमावली के अनुरूप नहीं है। आरोप-4 :- के संबंध में कहा गया है कि जाँच प्रतिवेदन में आरोप-4 के मंतव्य के रूप में अंकित किया गया है कि NR 41 दि॰ 14.08.17 से स्पष्ट है कि श्री कुमार द्वारा दिनांक 14.08.17 को बाँयें एवं दाँयें तटबंध में हो रहे रिसाव की सूचना उच्च पदाधिकारी के साथ-साथ विभाग को दी गयी। अतएव ससमय सूचना नहीं देने का आरोप नहीं बनता है। संचालन पदाधिकारी के आरोप-4 में मंतव्य के रूप में उद्धित तथ्यों से स्पष्ट है कि बाँध में हो रहे रिसाव एवं पाईपिंग नियंत्रित करने का प्रयास उनके द्वारा की गयी है। अर्थात्‌ बाँध को सुरक्षित रखने हेतु आवश्यक कारवाई की गयी है। आरोप-6 :- संचालन पदाधिकारी के समीक्षा में उद्धित तथ्यों से स्पष्ट है कि मुख्य अभियंता द्वारा क्षतिग्रस्त भाग का किये गये निरीक्षण के समय टूटान स्थल पर उपस्थित नहीं रहने की बात सत्य से परे है। उपरोक्त सभी कंडिकाओं से स्पष्ट है कि लगाये गये आरोप का कोई अंश प्रमाणित नहीं होता है एवं पदीय दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा तथा वरीय पदाधिकारी के मार्गदर्शन के अनुरूप कार्य कराया गया है। अतएव आरोप से मुक्त करने की कृपा की जाय। श्री कुमार, तत्का0 कार्यपालक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि संचालन पदाधिकारी ने श्री कुमार के विरूद्ध आरोप पत्र में गठित कुल 10 आरोपों में से आरोप सं॰-1 एवं 7 को प्रमाणित, आरोप सं॰ 2, 4 एवं 6 को अंशतः प्रमाणित तथा आरोप 3, 5, 8, 9 एवं 10 को प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है तथा विभाग द्वारा संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री कुमार से द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी है। श्री कुमार से द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव के आलोक में संचालन पदाधिकारी के द्वारा प्रमाणित आरोपों की स्थिति निम्नवत्‌ बनती है। आरोप-1 :- जो आरोपी श्री कुमार को तटबंध में सिपेज की ससमय जानकारी नहीं होने एवं विभागीय निदेशों के अनुरूप तटबंध के आक्राम्य स्थलों का निरीक्षण नहीं करने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने मुख्य अभियंता के प्रतिवेदन के अनुसार दिनांक 14.08.17 को कटौंझा स्थल पर मुलाकात होने के क्रम में श्री कुमार द्वारा सूचना नहीं दी गयी कि कुल कितने स्थलों पर सिपेज हो रहा है एवं कितने पर नियंत्रण पाया गया। इस संदर्भ में कुमार द्वारा कोई तथ्य नहीं दिया गया है एवं न ही किसी भी पदाधिकारी के प्रतिवेदन से यह सम्पुष्ट होता है कि उसके द्वारा रिसाव एवं पाईपिंग होने की सूचना ससमय प्राप्त हुई, के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री कुमार द्वारा कहा गया है कि उन्हें कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत हो रहे सिपेज की ससमय जानकारी रहने के आधार पर ही बेतार संवाद 32 दिनांक 14.08.17 से बागमती नदी के बाँयें एवं दाँयें तटबंध में हो रहे रिसाव एवं पाईपिंग की सूचना उच्चाधिकारियों के साथ-साथ विभाग को दी गयी थी। साथ ही मोबाईल द्वारा भी अधीक्षण अभियंता एवं अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल को रिसाव की सूचना दी गयी थी। इसकी सम्पुष्टि सरकारी मोबाईल के CDR से की जा सकती है। NR-32 दिनांक 14.08.17 से स्पष्ट है कि कार्यपालक अभियंता द्वारा दिनांक 14.08.17 को बागमती तटबंध के बाँयें तटबंध के कि॰मी॰ 28.71 से 57.70 एवं दाँयें तटबंध के कि॰मी॰ 52.428 से 56.97 के बीच कई बिन्दुओं पर सिपेज प्रारम्भ होने तथा धनौर रिंग बाँध के कि॰मी॰ 1.0 पर गैप भराई की सूचना दी गयी है। कॉल डिटेल्स से स्पष्ट होता है कि श्री कुमार दिनांक 12.08.12 से 14.08.11 तक रून्नीसैदपुर, देवना, कटरा, पिंडौली, बोखरा, मुरसण्ड घोरहा, रामपुर, सैदपुर, मघकॉल इत्यादि स्थल का भ्रमण किया जाना परिलक्षित होता है। उपरोक्त तथ्यों एवं साक्ष्य से स्पष्ट होता है कि श्री कुमार द्वारा तटबंधों में सीपेज होने की ससमय सूचना उच्चाधिकारियों एवं विभाग को नहीं देने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है। मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर का कथन कि दिनांक 14.08.17 को मुलाकात होने के क्रम में पृच्छा करने पर श्री कुमार द्वारा कितने जगहों पर सिपेज हो रहा है एवं कितने66 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 जगहों पर नियंत्रण पाया गया के संदर्भ में कोई स्पष्ट जबाव दिया जाना परिलक्षित करता है कि इनके द्वारा सम्पूर्ण स्थलों निरीक्षण नहीं किया गया है परन्तु इनके सरकारी मोबाईल के लोकेशन डिटेल्स से परिलक्षित होता है कि श्री कुमार दिनांक 12.08.17 से 14.08.17 तक तटबंध के विभिन्न बिन्दुओं का निरीक्षण किया गया है। उक्त के आलोक में यह माना जाना कि तटबंध के सम्पूर्ण आक्राम्य स्थलों का इनके द्वारा निरीक्षण किया गया है। उचित प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोप सं॰-1 आंशिक प्रमाणित होता है। आरोप-2 :- जो पाईपिंग के कारण तटबंध के टूट जाने तक आरोपी द्वारा स्थल भ्रमण नहीं किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने श्री कुमार के बयान को आंशिक स्वीकार योग्य मानते हुए इस आरोप को आंशिक प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री कुमार द्वारा आरोप के संदर्भ में कहा है कि आरोप अस्पष्ट है क्योंकि पाईपिंग के कारण तटबंध के किस स्थल पर टूटा अंकित नहीं है। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि श्री कुमार एक कार्यपालक अभियंता के पद पर कार्यरत थे। उन्हें ज्ञात था कि किस-किस स्थल पर टूटान हुआ है। फिर भी आरोप को अस्पष्ट कहना उचित नहीं माना जा सकता है। अतएव आरोप-2 को आंशिक यथा टूटान के पूर्व उक्त स्थल का निरीक्षण नहीं करने के आरोप को प्रमाणित माना जाता है। आरोप-4 :- जो तटबंध में रिसाव एवं पाईपिंग होने के बावजूद उच्चाधिकारियों की सूचना नहीं देने एवं उसे ठीक नहीं कराने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि उनके समीक्षित टिप्पणी में तथ्यों के समीक्षोपरान्त आरोप-4 आंशिक प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है जबकि निष्कर्ष कंडिका-II में इस आरोप को अंशतः प्रमाणित होने का मंतव्य अंकित किया गया है। समीक्षित टिप्पणी में ससमय सूचना नहीं देने का आरोप नहीं बनता है, अंकित किया गया है साथ ही कहा गया है कि श्री कुमार दिनांक 14.08.17 को पूरे रात दिन तटबंध पर उपस्थित रहकर तटबंध के बाँयें बाँध के विभिन्न बिन्दुओं पर हो रहे रिसाव को नियंत्रण करने का प्रयास करते हुए स्थल को सुरक्षित किया गया है। आरोपी द्वारा इन्हीं तथ्यों को उल्लेखित करते हुए कहा गया है कि जाँच प्रतिवेदन में उद्धित मंतव्य के आलोक में आरोप प्रमाणित नहीं होता है। ऐसी स्थिति के संचालन पदाधिकारी के समीक्षित टिप्पणी के आलोक में आरोप-4 प्रमाणित नहीं होता है। आरोप-6 :- जो दिनांक 15.08.17 को मुख्य अभियंता द्वारा क्षतिग्रस्त भाग का निरीक्षण किया गया किन्तु आप उस समय टूटान स्थल पर उपस्थित नहीं होने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने इस आरोप को आंशिक प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया बल्कि है। श्री कुमार द्वारा अपने बचाव बयान में कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया है वही तथ्यों को ठुकराया गया है, जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी का मंतव्य कि श्री कुमार मुख्य अभियंता के टूटान स्थल के निरीक्षण के समय स्थल पर विलम्ब से पहुँचते थे से सहमत होते हुए आरोप संख्या-6 को आंशिक प्रमाणित माना जा सकता है।

आरोप-7 :- जो दिनांक 14.08.17 और दिनांक 15.08.17 को सरकारी मोबाईल बन्द पाये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने श्री कुमार का कथन कि मोबाईल के लोकेशन विवरणी के अनुसार दिनांक 14.08.17 को मोबाईल पूर्ण रूप से खुला था तथा दिनांक 13.08.17 से 14.08.17 तक लगातार कार्यक्षेत्र में रहने के कारण दिनांक 15.08.17 को रखने से मोबाईल एवं पावर बैंक पूर्णतः डिस्चार्ज होने के कारण बन्द हो गया था। विद्युत आपूर्ति बन्द होने के कारण तथा प्रमंडलीय कार्यालय एवं आवासीय उपलब्ध जेनेरेटर पानी में डुब हाने के कारण मोबाईल चार्ज करना संभव नहीं हो सका को, उनके उच्चाधिकारियों/अधीनस्थ/विभागीय मंतव्य द्वारा सम्पुष्ट नहीं की गयी है के आलोक में अस्वीकार योग्य मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। लोकेशन डिटेल्स से स्पष्ट है कि दिनांक 14.08.17 को श्री कुमार का मोबाईल पूर्ण रूप से खुला था तथा दिनांक 13.08.17 से 14.08.17 तक लगातार क्षेत्र में रहने के कारण मोबाईल एवं पावर बैंक डिस्चार्ज हो गया था। तथा दिनांक 14. 08.17 को तटबंघ के हुए टूटान के कारण विद्युत आपूर्ति पूर्णतः बाधित हो जाने तथा प्रमंडलीय कार्यालय में लगभग 4.5 फीट पानी भर जाने के कारण जेनरेटर डुब जाने के कारण मोबाईल 15/18/17 को चार्ज नहीं हो सका। प्रमंडल के पत्रांक 41 दिनांक 15.08.17 तथा फोटोग्राफ से परिलक्षित है कि दिनांक 15.08.17 को रून्नीसैदपुर में विद्युत आपूर्ति बाधित था तथा कार्यालय परिसर में पानी भरा हुआ था। अतएव दिनांक 15.08.12 को श्री कुमार का मोबाईल बन्द रहना परिस्थितिजन प्रतीत होता है। इसमें श्री कुमार के स्तर से लापरवाही बरतना परिलक्षित नहीं होता है। अतएव आरोप संख्या-7 प्रमाणित नहीं होता है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं॰ 1, 2 एवं 6 यथा दिनांक 14.08.2017 के पूर्व सभी आक्राम्य स्थल का निरीक्षण टूटान के पूर्व उक्त स्थल का निरीक्षण नहीं करना, टूटान स्थल का दिनांक 15.08.2017 को मुख्य अभियंता का स्थल निरीक्षण में विलंब से स्थल पर पहुँचने का आरोप आंशिक प्रमाणित पाया गया। एवं आरोप संख्या-03, 05, 08, 09 एवं 10 प्रमाणित नहीं पाया गया। साथ ही संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए आरोप संख्या- 4 एवं 7 यथा दिनांक 14.08.2017 एवं दिनांक 15.08.2017 को सरकारी मोबाईल बन्द रखने तथा तटबंध से हो रहे रिसाव/पैकिंग की ससमय सूचना नहीं देने एवं उसे ठीक कराने का प्रयास नहीं करने का आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया।

समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री कुमार को निलंबन से मुक्त करते हुए बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्शोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1258 दिनांक 25.06.2019 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया- "कालमान वेतनमान में तीन वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।"67 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री सतीश कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर द्वारा अपने पत्रांक-813 दिनांक 07.08.19 से पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया है। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :- आरोप-1 :-इनके द्वारा कहा गया है कि विभागीय समीक्षा के क्रम में इनके द्वारा दिनांक 12.08.17 से 14.08.17 तक विभिन्न बिन्दुओं का निरीक्षण करने के तथ्यों को स्वीकार किया गया है, किन्तु तटबंध के सम्पूर्ण आक्राम्य स्थलों का इनके द्वारा निरीक्षण नहीं किया गया है। जबकि इनके द्वारा किस आक्राम्य स्थल का निरीक्षण नहीं किया गया। इसका उल्लेख विभागीय समीक्षा के क्रम में कहीं भी नहीं किया गया है। स्पष्ट है कि विभागीय समीक्षा तथ्य एवं साक्ष्य पर आधारित नहीं है विदित हो कि बाढ़ पूर्व की गयी तैयारी के अन्तर्गत सभी आक्राम्य स्थलों का निरीक्षण के उपरान्त उसका आकलन कर उस पर बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का भंडारण करवाने का कार्य सम्मिलित रहता है। मुख्य अभियंता द्वारा समीक्षा के आधार पर मासिक बैठक हेतु प्रमंडल द्वारा मुख्य अभियंता को समर्पित अद्यतन प्रतिवेदन है जिसके पृ॰ सं॰ 7 एवं 8 पर सभी बागमती नदी के बाँयें एवं दाँयें बाँध के सभी आक्राम्य स्थलों की सूची तथा बालू भरकर रखे गये बोरा की संख्या अंकित है। उक्त से स्पष्ट है कि सम्पूर्ण आक्राम्य स्थलों का निरीक्षण इनके द्वारा किया गया है। इनके कार्यक्षेत्र में जो चार टूटान हुए है वह फोर्स मेजर का मामला है जिस पर मानव का कोई नियंत्रण नहीं है। प्रधान सचिव द्वारा MJC No. 2270/2016 में माननीय उच्च न्यायालय, पटना में दि॰ 30.08.17 को दायर Supplimentry show cause की कंडिका 5 एवं 9 अवलोकनीय है। जिसके उक्त तथ्य की पुष्टि होती है। कंडिका 9 में उल्लेख किया गया है कि इस बाढ़ अवधि में बागमती नदी 2014 के पूर्ववर्त्ती रिकार्ड उच्चतम स्तर को पारकर 26Cm उपर बह रही थी। इसके अतिरिक्त कंडिका 10 में इस उच्चतम स्तर के परिपेक्ष में टूटान का संभावित कारण तटबंध को दोषपूर्ण डिजाईन या नदी के रास्ते में बदलाव की संभावना व्यक्त की गयी है जिसकी जाँच भारत सरकार के संस्थान CWPRS पुणे से करवाने का उल्लेख अपने द्वितीय कारण पृच्छा में किया गया है। कंडिका 7 प्रधान सचिव द्वारा दिनांक 14.08.17 को हुए टूटान के उपरान्त दि॰ 28.08.17 को टूटान स्थल का निरीक्षण किया गया तथा वहाँ की वस्तुस्थिति से अवगत होने के उपरान्त द्वितीय कारण पृच्छा दि॰ 30.08.17 को माननीय उच्च न्यायालय में दायर किया गया। आरोप-2 :-विभिन्न स्थलों पर एक साथ हो रहे रिसाव/पाईपिंग के रोकथाम में व्यस्त रहने के कारण दि॰ 1408.17 को टूटान स्थल का निरीक्षण टूटान के पूर्व नहीं किये जा सकने की स्वभाविकता को विभाग/संचालन पदाधिकारी द्वारा अंकित किया गया कि विभिन्न स्थलों पर हो रहे रिसाव/पाईपिंग के रोकथाम में व्यस्त रहने के कारण दि॰ 14.08.17 को टूटान स्थल का निरीक्षण टूटान के पूर्व नहीं किया जा सका है। ठीक इसी प्रकार विभाग/संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप-4 के समीक्षा के क्रम में अपने अंतिम जाँच प्रतिवेदन के पृ॰ 7 पर मंतव्य उद्धित किया गया है कि बाँध में हो रहे रिसाव को ठीक करने के संदर्भ में श्री कुमार द्वारा आरोप-2 के संदर्भ में दिये गये तथ्यों से परिलक्षित होता है कि दि॰ 14.08.17 को पूरे दिन रात तटबंध पर उपस्थित रहकर तटबंध के बाँयें बाँध के विभिन्न बिन्दुओं पर हो रहे रिसाव/पाईपिंग को नियंत्रण का प्रयास किया गया है एवं उक्त स्थल को सुरक्षित किया गया है। आरोप-3 :-कहा गया है कि टूटान के पश्चात तटबंध के दोनों तरफ जल प्लावन की स्थिति के कारण आम ग्रामीण द्वारा अपने साजोसामान एवं मवेशियों के साथ तटबंध पर सघन अतिक्रमण किया गया था। ऐसी परिस्थिति में निरीक्षण हेतु अनेक वाहनों पर सवार पदाधिकारी को सघन अतिक्रमण की स्थिति में तटबंध के रास्ते से होकर चार टूटान स्थलों पर ठीक आगे-पिछे पहुँचना सामान्य घटना कही जा सकती है। अगर मुख्य अभियंता के पहुँचने के उपरान्त कुछ विलम्ब से पहुँचने की अवधारणा को मान लिया जाय तो यह स्वभाविक है क्योंकि कटौंझा के U/S में लगभग 6 कि॰मी॰ की दूरी पर तटबंध चार स्थलों पर क्षतिग्रस्त हुआ था। टूटान के उपरान्त टूटान की ओर जाने वाले तटबंध के रास्ते पर सघन अतिक्रमण की स्थिति थी। तटबंध पर मौजूद सघन अतिक्रमण की स्थिति का स्पष्टता के साथ उल्लेख प्रधान सचिव महोदय द्वारा दि॰ 30. 08.17 को माननीय उच्च न्यायालय, पटना में MJC No. 2270/2016 में दाखिल किया गया है।

उपरोक्त निवेदित तथ्यों के अवलोकन से स्पष्ट है कि प्रस्तुत किये गये बचाव बयान, तथ्यों एवं साक्ष्यों की तथ्यपरक समीक्षा नहीं की गयी, जिसके फलस्वरूप निर्दोष होने के बावजूद मुझ पर विभागीय दण्ड अधिरोपित कर दिया गया है। श्री सतीश कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये- आरोप-1 :-जो तटबंध में सीपेज की ससमय जानकारी नहीं होने एवं विभागीय निदेशों के अनुरूप तटबंध के आक्राम्य स्थलों का निरीक्षण नहीं करने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने मुख्य अभियंता के प्रतिवेदन के अनुसार दिनांक 14.08.17 को कटौंझा स्थल पर मुलाकात होने के क्रम में श्री कुमार द्वारा सूचना नहीं दी गयी कि कुल कितने जगहों पर सिपेज हो रहा है एवं कितने स्थलों पर निमंत्रण पाया गया के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री कुमार द्वारा इस आरोप के संदर्भ में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। अथवा द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी है एवं विभागीय निदेशों के अनुरूप तटबंध के आक्राम्य स्थलों का निरीक्षण नहीं करने का आरोप प्रमाणित पाया गया है।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 68 उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त नये साक्ष्य के रूप में MJC No. 2270/2016 में प्रधान सचिव द्वारा दिनांक 30.08.17 को दायर प्रतिशपथ पत्र की प्रति संलग्न करते हुए कहा गया है कि बाँध में हुए टूटान का कारण नेपाल की ओर से नदी का जलग्रहण क्षेत्र में हुई भारी वर्षावात को जिम्मेवार माना गया है यह Force meajure (Act of god) का मामला माना गया है जिस पर मानव का कोई नियंत्रण नहीं होता है। साथ ही उक्त प्रतिशपथ पत्र के कंडिका 9 में उल्लेख है कि इस बाढ़ अवधि में बागमती नदी 2014 के पूर्ववर्त्ती रिकार्ड उच्चतम स्तर को पारकर 26 Cm उपर बह रही थी। उक्त कथन की पुष्टि संचिका में रक्षित Supplimentry Show Cause से होती है। आरोप यह नही है कि तटबंध सिपेज/पाईपिंग से टूटा अथवा Over Toping से टूटान हुआ है। बल्कि आरोप है कि विभागीय निदेशों के अनुरूप आक्राम्य स्थलों का निरीक्षण नहीं किया जाना है। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि बाढ़ पूर्व की गयी तैयारी के तहत सभी आक्राम्य स्थल का निरीक्षण के उपरान्त उसका आकलन कर उस पर बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का भंडारण कराने का कार्य भी सम्मिलित है जिसका जिक्र मुख्य अभियंता के पत्रांक 6 दिनांक 12.07.17 के मासिक बैठक की कार्यवाही में भी किया गया है। संचिका में रक्षित मुख्य अभियंता के दि॰ 10.07.17 को आहूत मासिक बैठक की कार्यवाही प्रतिवेदन के कंडिका 2(ii) से स्पष्ट होता है कि समीक्षा के क्रम में अनावश्यक मात्रा में बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का भंडारण नहीं करने का निदेश दिया गया। उक्त तथ्यों के आधार पर स्थापित किया जाना कि इनके द्वारा प्रमंडलाधीन सभी आक्राम्य स्थल का निरीक्षण किया गया है उचित प्रतीत नहीं होता है क्योंकि मुख्य अभियंता के 14.08.17 के प्रतिवेदन में स्पष्ट उल्लेख है कि स्थल निरीक्षण के क्रम में श्री कुमार द्वारा सूचना नहीं दी गयी है कि कुल कितने जगहों पर सिपेज हो रहा है एवं कितने पर नियंत्रण पा लिया गया। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में इस आरोप से संदर्भित बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है एवं आरोप प्रमाणित होता है। आरोप-2 :-पाईपिंग के कारण तटबंध टूट जाने तक आरोपी द्वारा स्थल भ्रमण नहीं किये जाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने श्री कुमार का बचाव बयान को आंशिक स्वीकार योग्य मानते हुए आरोप को आंशिक प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री कुमार द्वारा इस आरोप के संदर्भ में अपने पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य एवं साक्ष्य दिये गये है जो इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया है अथवा द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी है। इनके द्वारा कहा गया है कि विभिन्न स्थलों पर एक साथ हो रहे रिसाव/पाईपिंग के रोकथाम में व्यस्त रहने के कारण दिनांक 14.08.17 को टूटान स्थल का निरीक्षण टूटान के पूर्व नहीं किये जा सकने की स्वभाविकता को विभाग/संचालन पदाधिकारी द्वारा विभिन्न स्थलों पर हो रहे रिसाव/पाईपिंग के रोकथाम में व्यस्त रहने के कारण दिनांक 14.08.17 को टूटान स्थल का निरीक्षण टूटान के पूर्व नहीं किया गया है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि परिस्थितिवश इनके द्वारा स्वयं स्वीकार किया गया है कि टूटान के पूर्व सभी टूटान स्थल का निरीक्षण नहीं किया जा सका है। जिसे उचित नहीं माना जा सकता है। अतएव आरोप-2 प्रमाणित होता है। आरोप-3 :-दिनांक 14.08.17 को मुख्य अभियंता द्वारा क्षतिग्रस्त भाग का निरीक्षण किया गया किन्तु श्री कुमार उस समय में भी टूटान स्थल पर उपस्थित नहीं हो सके। संचालन पदाधिकारी ने इस आरोप को आंशिक प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री कुमार द्वारा अपने पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी अथवा द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी एवं आरोप प्रमाणित पाया गया है इनके द्वारा कहा गया है कि टूटान के पश्चात तटबंध के दोनों तरफ जल प्लावन की स्थिति में आम जनता द्वारा अपने साजों-समान एवं मवेशियों के साथ तटबंध पर सघन अतिक्रमण किया गया था। फलतः निरीक्षण हेतु अनेक वाहनों पर सवार पदाधिकारी को सघन अतिक्रमण की स्थिति में तटबंध के रास्ते से होकर चारों टूटान स्थलों पर Just आगे-पिछे पहुँचना सामान्य घटना कही जा सकती है। कुछ हद तक स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। परन्तु इस आरोप के संदर्भ में संचालन पदाधिकारी का मंतव्य कि श्री कुमार मुख्य अभियंता के टूटान स्थल के निरीक्षण के समय विलम्ब से पहुँचे थे जिसको नकारा जाना उचित नहीं है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत उपरोक्त समीक्षा एवं संचालन पदाधिकारी के मंतव्य के आलोक में श्री सतीश कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है एवं इनके विरूद्ध पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-1258 दिनांक 25.06.2019 द्वारा संसूचित दण्ड को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

"कालमान वेतनमान में तीन वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री सतीश कुमार, कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी तटबंध प्रमंडल, निमर्ली, सुपौल के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड यथा "कालमान वेतनमान में तीन वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।69 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020

21 जुलाई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-10/2017-969--श्री संजय कुमार (आई0डी0-5379), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, कटरा को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 14.08.17 को बागमती नदी के बाँयें तटबंध में सीपेज एवं पाईपिंग के कारण चार स्थलों पर हुए टूटान में बरती गई अनियमितताओं के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-1611, दिनांक 14.09.2017 द्वारा श्री कुमार को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय संकल्प ज्ञापांक संख्या-1684, दिनांक 20.09.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई - (1) बागमती बायाँ तटबंध के कि॰मी॰ 46.92 से 88.72 के बीच चार स्थलों पर क्रमशः कि॰मी॰ 48.85, 48.70, 48.67 एवं 48.43 कि॰मी॰ पर बागमती नदी में जलस्तर बढ़ने से सीपेज/पाईपिंग के कारण दिनांक 14.08.17 को टूटान हुआ। जो आपके कार्यक्षेत्र में पड़ता है। टूटान के संबंध पूछताछ करने पर ग्रामीणों द्वारा यह जानकारी दी गयी कि आपको रिसाव/पाईपिंग होने की पूर्व सूचना देने पर भी आपके द्वारा इसे गंभीरता से नहीं लिया गया एवं प्रभावित स्थल से चले गये।

(2) दिनांक 16.08.17 को खडका ग्राम में चले रहे बाढ़ संघर्षात्मक कार्य को कराने हेतु मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर द्वारा कनीय अभियंता श्री दिलीप कुमार को भेजने हेतु आपको आदेश दिया गया किन्तु आपके द्वारा श्री दिलीप कुमार के ऑपरेशन होने की गलत सूचना दी गयी एवं उन्हें कटाव स्थल पर नहीं भेजा गया। बाद में जाँच करने पर श्री दिलीप कुमार के ऑपरेशन होने का तथ्य गलत पाया गया। इस प्रकार आपके द्वारा वरीय पदाधिकारी को गलत सूचना देकर दिगभ्रमित किया गया। आपका उक्त कृत बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो के प्रति घोर लापरवाही, कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है। आपका यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम-3(iii) के प्रतिकूल है। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री संजय कुमार, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित सभी आरोपों को प्रमाणित पाया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1036, दिनांक 11.05.2018 द्वारा संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति संलग्न करते हुए लिखित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई।

उक्त के आलोक में श्री कुमार, तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, कटरा द्वारा अपने पत्रांक-0, दिनांक 08.06.2018 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया, जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :- श्री संजय कुमार अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव के कंडिका (iv) से (v) तक में इनके विरूद्ध विभागीय कार्यवाही को प्रारम्भ करने अभिलेख की माँग करने, संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन तैयार करने में सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 1893 दिनांक 14.06.11 का उल्लंघन किये जाने का उल्लेख किया गया है। कंडिका-6 में कहा गया है कि रिसाव/पाईपिंग की सूचना तटबंध पर प्रतिनियुक्त गृह रक्षा वाहिनी द्वारा कनीय अभियंता श्री दिलीप कुमार को दी गयी उनसे प्राप्त हुई। उस समय वे बायाँ तटबंध के कि॰मी॰ 50.06 एवं 50.03 पर रिसाव को नियंत्रित कर रहे थे। कंडिका-7 में संचालन पदाधिकारी के समीक्षा टिप्पणी में विभागीय बाढ़ निदेशिका के उल्लेख के संदर्भ में कहा गया है कि इस निदेशिका का उल्लेख आरोप पत्र में नहीं है। जो C.C.A Rule का उल्लंघन है। कंडिका 8.9.10 एवं 11 में संचालन पदाधिकारी द्वारा तत्कालीन मुख्य अभियंता के साथ किये गये प्रतिपरीक्षण को उचित नहीं माना गया है। कंडिका-13 (घ) में आरोप-1 के संदर्भ में कहा गया है कि दि॰ 14.08.17 को तटबंध में हो रहे रिसाव/पाईपिंग की रोकथाम के लिये उनके द्वारा नामांकण के आधार पर पिंकी कुमारी, संवेदक को नियुक्त किया गया। जिसकी स्वीकृति कंडिका 13 (घ) (e) से (t) तक में दिनांक 14.08.17 को सुबह 6.0 बजे से रात्रि 9.0 बजे तक के क्रियाकलाप का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि कार्यपालक अभियंता को रिसाव की सूचना कनीय अभियंता के मोबाईल से सुबह दे दी गयी थी एवं पल-पल की घटनाक्रम की जानकारी दी जा रही थी। कंडिका (4) से (7) तक में तटबंध क्षतिग्रस्त होने के कारण जनाक्रोश का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि बागमती नदी में अप्रत्याशित जलश्राव एवं घटना स्थल के निम्न प्रवाह में Afflex के प्रभाव के कारण HG Line fail हाने एवं नदी में आयी बदलाव आदि प्राकृतिक कारणों से बाँध क्षतिग्रस्त हुआ। कंडिका (च) में तटबंधों पर सतत निगरानी एवं चौकसी बरतने के संदर्भ में विभागीय निदेशों का उल्लंघन करने के संदर्भ में कहा गया है कि इस तरह का आरोप प्रपत्र 'क' में नहीं रहने के कारण इस बिन्दु का अपना पक्ष रखा था। मुख्य अभियंता को गलत सूचना देने के संदर्भ में कहा गया है कि उनके द्वारा मुख्य अभियंता को कोई गलत सूचना न तो दी गयी है एवं न ही आदेश की अवहेलना की गयी है। अतः तत्कालीन मुख्य अभियंता द्वारा लगा गया आरोप निराधार है एवं सत्य से परे है क्योंकि ई॰ विनोद सिंह, कनीय अभियंता का ऑपरेशन वास्तव में हुआ था। ऐसी स्थिति में उनके स्थान पर ई॰ दिलीप कुमार, कनीय अभियंता का नाम अपने वरीय पदाधिकारी के समक्ष लेने का न तो कोई औचित्य था और न ही कोई कारण था।70 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 श्री कुमार, तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- श्री कुमार के विरूद्ध प्रपत्र 'क' में गठित दोनों आरोपों का मुख्य अंश है कि (1) तटबंध में हो रहे रिसाव/पाईपिंग की सूचना ग्रामीणों द्वारा श्री कुमार को देने में बावजूद उनके द्वारा गंभीरता से नहीं लेते हुए स्थल से चला जाना। एवं उक्त स्थल पर बाँध क्षतिग्रस्त होना।

(2) तत्कालीन मुख्य अभियंता के द्वारा कनीय अभियंता श्री दिलीप कुमार, तत्कालीन कनीय अभियंता को टूटान स्थल पर भेजने का दिये गये निदेश के क्रम में श्री कुमार द्वारा गलत ढंग से श्री दिलीप कुमार के ऑपरेशन होने की गलत सूचना देते हुए स्थल पर नहीं भेजा गया । बाद में श्री दिलीप कुमार के ऑपरेशन होने की बात गलत पाया गया।

(क) संचालन पदाधिकारी ने श्री कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता के द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान दिये गये बचाव बयान तथा तत्कालीन मुख्य अभियंता से प्रतिपरीक्षण करने के पश्चात मामले के समीक्षोपरान्त दोनों आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

श्री संजय कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में वही तथ्य को उलट फेर कर उद्धित किया गया है, जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया है जिसकी सम्यक समीक्षा संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन में किया जो निम्न लिखित है :- प्रस्तुत आरोप मुख्य अभियता, मुजफ्फरपुर के परिक्षेत्राधीन बागमती अवर प्रमंडल, कटरा के अधीन बाढ़ अवधि 2017 में बागमती बायाँ तटबंध के वि0दू0 46.92 कि0मी0 से 88.72कि0मी0 के बीच चार जगहों पर क्रमशः 48.85 कि0मी0, 48. 70कि0मी0, 48.67कि0मी0 एवं 48.43कि0मी0 पर बागमती नदी में जलस्तर बढने से सीपेज/पाईपिंग के कारण दिनांक 14.08. 2017 को टूटान हुआ। यह क्षेत्र बागमती अवर प्रमंडल, कटरा के अन्तर्गत का कार्यक्षेत्र है। टूटान के संबंध में पूछताछ करने पर ग्रामीणों द्वारा यह जानकारी दी गयी की उन्हें रिसाव/पाईपिंग होने की पूर्व सूचना देने पर भी उनके द्वारा इसे गंभीरता से नहीं लिया गया एवं प्रभावित स्थल पर चले गये। दिनांक 16.08.2017 को खड़का ग्राम में चल रहे कार्यों को कराने हेतु तत्कालीन मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर द्वारा कनीय अभियंता, दिलीप कुमार को भेजने हेतु आरोपी को आदेश दिया गया, किन्तु आरोपी के द्वारा श्री दिलीप कुमार के ऑपरेशन होने की गलत सूचना दी गयी एवं उन्हें कटाव स्थल पर नहीं भेजा गया। बाद में जाँच करने पर श्री दिलीप कुमार के ऑपरेशन होने का तथ्य गलत पाया गया। इस प्रकार आरोपी के द्वारा वरीय पदाधिकारी को गलत सूचना देकर दिगभ्रमित किया गया। आरोप पत्र प्रपत्र-'क' उपलब्ध कराये जाने के उपरांत दिनांक 01.11.2017 की सुनवाई के दौरान आरोपी सहायक अभियंता, श्री संजय कुमार द्वारा अपना बचाव बयान समर्पित किया गया। आरोपित पदाधिकारी श्री संजय कुमार को अपने बचाव बयान में आरोप सं0-01 के संबंध में यह कथन कि स्थल पर रिसाव/पाईपिंग की सूचना ग्रामीणों द्वारा उन्हें नहीं वरन्‌ उनके कनीय अभियंता को दी गयी थी, अतः उन्हें बाँध में रिसाव की सूचना मिलने एवं तदनुसार उसे रोकने की कार्रवाई नहीं करने के आरोप सही नहीं है। इस संदर्भ में आरोपी का बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है, क्योंकि विभागीय बाढ़ निर्देशिका में स्पष्ट उल्लेखित है कि संबंधित अभियंता सभी तटबंधो की सतत्‌ निगरानी एवं चौकसी रखेंगे एवं आवश्यकतानुसार अविलम्ब बाँध में रिसाव/पाईपिंग को रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। इस संबंध में यह उनकी जिम्मेवारी थी कि तटबंधाें की सतत निगरानी एवं चौकसी रखी जाय एवं रिसाव/पाईपिंग परिलक्षित होने पर इसे रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। आरोपित सहायक अभियंता द्वारा आरोप सं0-02 के संबंध में अपने बचाव बयान में कहा गया है कि दिनांक 16.08. 2017 को कार्यों को कराने हेतु श्री विनोद सिंह कनीय अभियंता को भेजने को निदेश दिया गया था न कि श्री दिलीप कुमार को भेजने का निदेश दिया गया था। उक्त मामलों में प्रतिपरीक्षण हेतु श्री दिनेश कुमार चौधरी, तत्कालीन मुख्य अभियंता दिनांक 22.11.2017 को उपिस्थत हुए। सुनवाई के दौरान आरोपी द्वारा स्थल पर उपस्थित ग्रामीणों की पहचान एवं उनसे वार्ता के क्रम में रिसाव की जानकारी देने से इन्कार किया गया। उक्त के संबंध में तत्कालीन मुख्य अभियंता द्वारा कहा गया कि उनका प्रतिवेदन ग्रामीणों से हुई पूछताछ के बाद ही समर्पित किया गया था। प्रतिपरीक्षण के दौरान तत्कालीन मुख्य अभियंता ने यह भी कहा कि बाँध में रिसाव/पाईपिंग की घटना को आरोपी अभियंता द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया और वे स्थल से प्रस्थान कर गये। प्रतिपरीक्षण के क्रम में तत्कालीन मुख्य अभियंता ने यह भी बताया कि दिनांक 16.08.2017 को खड़का ग्राम में चल रहे कार्यों को कराने हेतु निदेश दिये जाने के बावजूद आरोपी सहायक अभियंता द्वारा कनीय अभियंता, श्री दिलीप कुमार को उनके आपरेशन का बहाना बनाकर नहीं भेजा गया अपितु उनके स्थान पर अन्य कनीय अभियंता श्री विनोद सिंह को कार्यस्थल पर जाने को कहा गया। तत्कालीन मुख्य अभियंता द्वारा प्रतिपरीक्षण के क्रम में बताया गया कि उनके द्वारा इस घटना को पुनः संज्ञान लेते हुए संबंधित कनीय अभियंता को डाँटने के बाद, कनीय अभियंता टूटान स्थल पर गये। उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि आरोपी अभियंता श्री संजय कुमार द्वारा तटबंध में हो रहे रिसाव/पाईपिंग की सूचना ससमय उपलब्ध हो जाने के बाद भी उसकी रोकथाम के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गयी। उनके द्वारा बाँधों की सतत निगरानी एवं चौकसी बरतने के संबंध में विभागीय दिशा निदेशों का उल्लंघन किया गया। इसके अतिरिक्त उनके द्वारा मुख्य अभियंता को गलत सूचना देने के साथ-साथ आरोपी पदाधिकारी श्री संजय कुमार के द्वारा तत्कालीन मुख्य अभियंता तथा विभागीय निदेशों की अवहेलना की गई। इन परिस्थितियों में आरोपी श्री संजय कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता का बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है।71 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोपी द्वारा आरोप से संदर्भित न तो कोई नया तथ्य ही दिया गया है न ही कोई पूर्व के अतिरिक्त कोई नया साक्ष्य ही दिया गया है। ऐसी स्थिति में श्री कुमार का द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव अस्वीकार योग्य मानते हुए दोनों आरोपों को प्रमाणित माना जा सकता है। अर्थात्‌ इनके द्वारा बाढ़ जैसे आपदा की स्थिति में उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना, कार्य में लापरवाही एवं उदासीनता/दायित्वों के निर्वहन में उपेक्षा बरतना दर्शाता है। अतएव आरोप प्रमाणित होता है। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री संजय कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप-1 एवं 2 यथा तटबंध में रिसाव/पाईपिंग की जानकारी मिलने के बाद भी उसे गंभीरता से नहीं लेना एवं स्थल से चले जाना। फलतः टूटान होना तथा उच्च पदाधिकारी को गलत सूचना देकर दिग्भ्रमित करना। उच्चाधिकारी के आदेश का पालन नहीं करने के आरोप को प्रमाणित पाया गया एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री कुमार को निलंबन से मुक्त करते हुए बिहार लोक सेवा आयोग के परामार्शोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1260 दिनांक 25.06.2019 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया। "आठ (8) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"।

उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री संजय कुमार, तत0 सहायक अभियंता द्वारा अपना पुनर्विलोकन अर्जी पत्रांक-0 दिनांक 08.08.19 द्वारा विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं -

पुनर्विलोकन अर्जी की कंडिका 1 से 8 तक में इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही, दण्ड अधिरोपण को नियम के विरूद्ध बताया गया है। आरोप से संदर्भित निम्न तथ्य अंकित किया गया है। तथाकथित रिसाव/पाईपिंग की सूचना बागमती बाँया तटबंध के कि॰मी॰ 49.0 पर प्रतिनियुक्त गृहरक्षक के द्वारा कनीय अभियंता ई॰ दिलीप कुमार को दी गयी और तद्‌नुसार उनके द्वारा इन्हें सूचना प्राप्त हुई। दिनांक 14.08.17 को ही इनके द्वारा नामांकण के आधार पर संवेदक पिंकी कुमारी को नियमानुकूल नियुक्त किया गया, जिसे प्रमंडल के NR 34 दिनांक 14.08.17 के द्वारा तत्कालीन कनीय अभियंता, कार्यपालक अभियंता एवं इनके द्वारा अनुशंसा सहित नामांकण प्रस्ताव की सूचना विभाग तक को सम्प्रेषित की गयी थी। विदित हो कि इस नामांकण प्रस्ताव की स्वीकृति विभाग द्वारा दी गयी। कार्य की पुष्टि प्रमंडल के NR-40 दि॰ 15.08.17, लेईंग पंजी एवं भुगतान से संबंधित पारित विपत्र से होती है। दिनांक 16.08.17 को कार्य को कराने हेतु श्री विनोद सिंह, कनीय अभियंता को भेजने का निदेश दिया गया था, न कि श्री दिलीप कुमार को भेजने का निदेश दिया गया था। दिनांक 14.08.17 को बागमती बाँया तटबंध जो चार टूटान हुए है। वह वस्तुतः फोर्स मेजर का मामला है अर्थात Act of god है। जिस पर मानव का कोई नियंत्रण नहीं है। टूटान के अप स्ट्रीम में स्थित इसके जलग्रहण क्षेत्र में दिनांक 12.08.17 एवं 13.08.17 को क्रमशः 141.2 mm एवं 342.5mm वर्षापात हुई और अधिकतम जलश्राव 5350 क्यूसेक रहा। जो कि इनके कार्य क्षेत्र में दिनांक 14.08.17 को पहुँचा एवं अप्रत्याशित जलश्राव एवं प्राकृतिक आपदा का कारण बना। दिनांक 14.08.17 को हुए टूटान के उपरान्त दिनांक 30.08.17 को विभागीय प्रधान सचिव द्वारा MJC No. 2270/2016 में माननीय उच्च न्यायालय, पटना में दायर Supplimentry Show Cause के कंडिका 5 एवं 6 में उल्लेख किया गया कि इस बाढ़ अवधि में बागमती नदी 2014 के पूर्ववर्त्ती रिकार्ड उच्चतम स्तर को पारकर 26cm ऊपर बह रही थी। कंडिका 10 में उल्लेख है कि प्रधान सचिव द्वारा दि॰ 14.08.17 को हुए टूटान के बाद दि॰ 28.08.17 को टूटान स्थल के निरीक्षण के उपरान्त वस्तुस्थिति से पूर्णतः अवगत होने के उपरान्त ही माननीय उच्च न्यायालय, पटना में उपर्युक्त द्वितीय कारण पृच्छा दि॰ 30.08.17 को दायर किया गया। किसी अभियंता को दोषी नहीं माना गया है। श्री कुमार द्वारा कंडिका 12(B) से 12(H) तक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के नियम 21, नियम 17 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही नियमानुकूल नहीं है। कंडिका 12(i) एवं 12(j) में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा CWJC 14161/2010 एवं 13155/2018 में पारित आदेश का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि निदोर्ष होने के बावजूद दण्ड अधिरोपित किया गया है जो वैद्यानिक दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं है। अतएव पूर्व के आदेश को निरस्त करते हुए बचाव बयान, तथ्यों एवं साक्ष्यों की तथ्य परक समीक्षोपरान्त वैद्यानिक दृष्टिकोण से As per law संसूचित किया जाना उचित है। श्री संजय कुमार, तत0 सहायक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये - निम्नलिखित दो आरोप के लिये श्री कुमार को आठ वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड संसूचित किया गया है।

(i) तटबंध में हो रहे रिसाव/पाईपिंग की सूचना ग्रामीणों द्वारा देने के बावजूद इनके द्वारा गंभीरता से नहीं लेते हुए स्थल से चला जाना एवं उक्त स्थल पर बाँध क्षतिग्रस्त होना।

(ii) तत्कालीन मुख्य अभियंता के द्वारा श्री दिलीप कुमार तत्कालीन कनीय अभियंता को टूटान स्थल पर भेजने हेतु दिये गये निदेश के क्रम में श्री कुमार द्वारा गलत ढंग से श्री दिलीप कुमार के ऑपरेशन होने की गलत सूचना देते हुए स्थल पर नहीं भेजा गया। बाद में श्री दिलीप कुमार के ऑपरेशन होने की बात गलत पाया गया। संचालन पदाधिकारी ने श्री कुमार तत्कालीन सहायक अभियंता के द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान दिये गये बचाव बयान तथा मुख्य अभियंता से प्रतिपरीक्षण करने के पश्चात मामले के समीक्षोपरान्त दोनों आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।72 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 इनके द्वारा कहा गया है कि रिसाव/पाईपिंग की सूचना ग्रामीणों द्वारा कनीय अभियंता को दी गयी ततपश्चात कनीय अभियंता से सूचना इन्हें प्राप्त होने पर दिनांक 14.08.17 द्वारा अनुशंसा सहित नामांकण प्रस्ताव की सूचना विभाग तक को दी गयी। तथा नामांकण प्रस्ताव की स्वीकृति विभाग द्वारा दी गयी। कार्य कराने की पुष्टि प्रमंडल के NR-40 दि॰ 15. 08.17, लेईंग पंजी एवं भुगतान से होती है। संचिका में रक्षित नामांकण पत्र, दैनिक कार्य की प्रगति प्रतिवेदन विपत्र से श्री कुमार के उपरोक्त कथन की पुष्टि होती है। प्रश्न यह है कि विषयांकित स्थल पर रिसाव होने की सूचना प्राप्त होने पर वे स्थल से चले गये। इस संदर्भ में कोई तथ्य नहीं दिया गया है। टूटान होने के संदर्भ में कहा गया है कि वस्तुतः यह एक Force Meajure का मामला है अर्थात Act of God है जिस पर मानव का कोई नियंत्रण नहीं है इस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया देना उचित प्रतीत नहीं होता है क्याेंकि जब तक यह ज्ञात नहीं होता है कि दिनांक 14.08.19 को नदी का जलस्तर तटबंध के शीर्ष लेवल से उपर है अथवा निचे का आकड़ा ज्ञात नहीं हो जाता है। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि दिनांक 14.08.17 को हुए टूटान के उपरान्त दि॰ 28.08.17 को विभागीय प्रधान सचिव स्थल निरीक्षणोपरान्त MJC 2270/2016 में माननीय उच्च न्यायालय, पटना में दायर Supplementry Show Cause में कहा गया है कि इस बाढ़ अवधि में बागमती नदी वर्ष 2014 के पूर्ववर्त्ती रिकार्ड उच्चतम स्तर को पारकर 26cm उपर बह रही थी एवं किसी भी अभियंता को दोषी नहीं माना गया है। उक्त कथन की पुष्टि संचिका में रक्षित Supplimentry Show Cause से होती है आरोप यह नहीं है तटबंध में रिसाव अथवा ओभर टॉपिंग से टूटान हुआ बल्कि आरोप है कि सिपेज की सूचना प्राप्त होने के बावजूद स्थल से चले गये। आरोप-2 के संदर्भ में कोई तथ्य नहीं दिया गया है। अतएव इनके विरूद्ध दोनों आरोप प्रमाणित होता है। समीक्षोपरांत उपरोक्त समीक्षा एवं संचालन पदाधिकारी के मंतव्य के आलोक में श्री संजय कुमार, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, कटरा का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है एवं इनके विरूद्ध पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-1260 दिनांक 25.06.2019 द्वारा संसूचित दण्ड को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

"आठ (8) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"। अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री संजय कुमार, सहायक अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-02, पटना के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड यथा "आठ (8) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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21 जुलाई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-10/2017-968--श्री अरूण कुमार (आई0डी0-4366), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, रून्नीसैदपुर को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 14.08.17 को बागमती नदी के बाँयें तटबंध में सीपेज एवं पाईपिंग के कारण बलुआ ग्राम, सपही ग्राम एवं फुलवरीया ग्राम में हुए टूटान सहित अन्य अनियमितताओं के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-1609, दिनांक 14.09.2017 द्वारा श्री कुमार को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय संकल्प ज्ञापांक संख्या-1686, दिनांक 20.09.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई - मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर के प्रतिवेदन के अनुसार बाढ़ का पानी कम होने पर टूटान स्थल पर जाने से निम्नांकित चार स्थलों पर टूटान परिलक्षित हुआ :- (1) ललबकैया दायाँ मार्जिनल बाँध के वि॰दू॰ 3.0 कि॰मी॰ पर बलुआ ग्राम के लगभग 65 मी॰, वि॰दू॰ 2.50 पर 128 मी॰, वि॰दू॰ 9.80 कि॰मी॰ सपही ग्राम में 70 मी॰ तथा वि॰दू॰ 1.0 कि॰मी॰ पर फुलवरिया ग्राम मेें 80 मी॰ की लम्बाई में टूटान हुआ।

(2) घनौरा कटरा रिंग बाँध के वि॰दू॰ 1.0 कि॰मी॰ पर बाँध अधूरा है तथा ऊँचाई लगभग 3 फीट है। यह स्थल कटरा प्रखंड के नूनिया टोला के पास है। जिसकी जानकारी आपको थी फिर भी जलस्तर में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि होने की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी, न ही इसके पूर्व पानी की निकासी को रोकने के लिये डाबेल आदि का का निर्माण कराया गया, जिसके कारण बाढ़ का पानी कंट्री साईड के ग्रामों में फैला तथा कटाव हुआ। जिससे जान-माल की व्याप्क क्षति हुई।

आपका यह कृत बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो के प्रति घोर लापरवाही, कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है साथ ही आपका यह आचरण बिहार सरकारी सेवक अचार नियमावली, 1976 के नियम-3(iii) के प्रतिकूल है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री अरूण कुमार, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित आरोपों में से आरोप संख्या-01 को अप्रमाणित तथा आरोप संख्या-02 को प्रमाणित पाया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के73 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1035, दिनांक 11.05.2018 द्वारा संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति संलग्न करते हुए लिखित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई। उक्त के आलोक में श्री कुमार, तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-15, दिनांक 11.06.2018 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया, जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :- श्री कुमार तत्कालीन सहायक अभियंता ने बचाव बयान के कंडिका 1 से 9 तक में उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही, आरोप से संदर्भित साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराने, संचालन पदाधिकारी के स्तर से नियम के विरूद्ध कृत कारवाई, उनके बचाव बयान का संज्ञान नहीं लेने, गलत तरीके से जाँच प्रतिवेदन समर्पित करने तथा विभाग से वांछित अभिलेख की माँग करने पर सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 12196 दिनांक 07.09.16 एवं 15548 दि॰ 06.12.17 तथा 1893 दिनांक 14.06.11 के अनुरूप कारवाई नहीं करने का उल्लेख किया गया है तथा संचालित विभागीय कार्यवाही को उचित नहीं बताया गया है। कंडिका 10 के विभिन्न उप कंडिका में प्रमाणित आरोप सं॰-2 के संदर्भ में निम्नवत्‌ तथ्य उद्धित किया गया है। उप कंडिका (क) से (घ) में विभिन्न तथ्यों को उद्धित करते हुए कहा गया है कि तत्कालीन मुख्य अभियंता द्वारा दिया गया प्रतिवेदन बिना साक्ष्य एवं निरीक्षण किये ही तैयार किया गया। उक्त प्रतिवेदन को साक्ष्य विहिन, आधारहीन एवं असत्य है। उप कंडिका (ड़) में कहा गया है कि मुख्य अभियंता द्वारा घनौर कटरा रिंग बाँध के प्रतिवेदित स्थल पर तटबंध का निर्माण नहीं हुआ था। जब तटबंध ही नही था तो कटाव होने की बात अधारहीन है। उपकंडिका (च) में संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका-5 के संदर्भ में कहा गया है कि दिनांक 03. 08.17 को पूर्व से भरकर रखे गये बोरा से डावेल का निर्माण हेतु प्राप्त निदेश के आलोक में उसी दिन से प्रारम्भ करा दिया गया था। साक्ष्य के रूप में भाउचर एवं स्थल पंजी दी गयी है एवं दिनांक 14.08.17 से 15.08.17 को क्रमशः 5000 एवं 15000 खाली सिमेंट बोरा में बालू भरकर पूर्व निर्मित डावेल को नियुक्त संवेदक से मजबूतीकरण कर सुरक्षित रखा गया जिसकी पुष्टि स्थल पंजी एवं लेईंग पंजी तथा अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 133 दिनांक 08.11.17 तथा फोटोग्राफ से होती है। जलस्तर में हो रहे अप्रत्याशित वृद्धि के कारण निर्मित डावेल की ऊँचाई बढ़ाते रहने के कारण गाँव में तरफ जल का फैलाव नहीं हुआ। फलतः न तो कटाव हुआ और न ही जान-माल की क्षति हुई। डावेल निर्माण कार्य की जाँच अधीक्षण अभियंता द्वारा उनके पत्रांक 1051 दिनांक 26.08.17 से निर्गत से आदेश के आलोक में जाँच कर कार्यपालक अभियंता द्वारा प्रपत्र 24, प्राक्कलन तथा परिमाण विपत्र उनके पत्रांक 1283 दिनांक 04.11.17 से भेजा गया। इससे स्पष्ट है कि निर्मित डाबेल दिनांक 04.11.17 तक सुरक्षित था। निर्मित डावेल में दिनांक 14.08.17 को कराये गये कार्य का विभागीय पत्रांक 1298 दिनांक 24.03.18 से प्राप्त स्वीकृति के पश्चात संवेदक को भुगतान किया गया है। इनके द्वारा कहा गया है कि जल स्तर की सूचना प्रत्येक तीन घंटे पर कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को दिया गया है। जिसे प्रमंडलीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष द्वारा नियमित रूप से बेतार संवाद से उच्चाधिकारी एवं विभाग को दिया गया है। मेरे द्वारा बाढ़ प्रबंधन हेतु मानक संचालन प्रक्रिया के कंडिका 4.4 में निहित निदेश का पालन निष्ठापूर्वक किया गया है। उनके द्वारा बाढ़ पूर्व तैयारी हेतु स्थल का बोरा संग्रहण कर, भरकर दि॰ 10.06.17 को ही रख दिया गया था जिसकी पुष्टि मुख्य अभियंता के पत्रांक 6 दिनांक 12.07.17 से होती है। कार्यपालक अभियंता के आदेशानुसार दिनांक 13. 07.18 से कार्य करते हुए दिनांक 14.07.18 एवं 15.07.18 को कार्य पूर्ण करा दिया गया। तथा खैरियत प्रतिवेदन तथा प्रगति प्रतिवेदन ससमय प्रमंडल को दिया जाता था। अतः लापरवाही, कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता का आरोप स्थापित नहीं होता है।

श्री कुमार, तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री कुमार तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध निम्न दो आरोप गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी है। जिसका मुख्य अंश निम्नवत्‌ है :-

(1) ललबकैया दायाँ बाँध के विभिन्न बिन्दुओं पर टूटान होना।

(2) घरौना कटरा रिंग बाँध के वि॰दू॰ 1.0 कि॰मी॰ पर बाँध अधूरा रहने तथा वहाँ ऊँचाई कम रहने की जानकारी रहने के बावजूद भी जल स्तर में अप्रत्याशित वृद्धि की सूचना नहीं देना तथा पानी को रोकने हेतु डाबेल आदि का निर्माण नहीं करने के कारण कंट्री साईड में पानी का फैलाव होने के कारण जान-माल की व्यापक क्षति होना कार्य के प्रति लापरवाही, उदासीनता, कर्त्तव्य का पालन नहीं करना। मामले के समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी ने आरोप-1 को उक्त कार्य स्थल से असम्बद्ध होने के आधार पर प्रमाणित नहीं होने तथा आरोप-2 प्रमाणित होने का मंतव्य दिया जिसके आलोक में श्री कुमार से मात्र आरोप सं॰-2 के लिये द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी। (क) संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रति से स्पष्ट है कि श्री कुमार के बचाव बयान कि प्रश्नगत स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य हेतु सामग्री का संग्रह किया गया था एवं डाबेल का निर्माण किया गया है, स्वीकार योग्य नहीं माना गया है। आरेापी का कथन कि दिनांक 14.08.17 को नामांकण के आधार पर उक्त स्थल पर बाँध को मजबूतीकरण कर पानी को नियंत्रित किया गया। को मात्र नामांकण प्रस्ताव के आलोक में अस्वीकार योग्य माना गया एवं अन्य तथ्यों को अस्वीकार योग्य मानते हुए श्री कुमार को बाढ़ जैसे आपातबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 74 स्थिति में घोर लापरवाही तथा कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता बरतने तथा स्वेच्छाचारिता बरतने के लिये दोषी माना गया है।

श्री कुमार द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में आरोप के संदर्भ में मुख्य रूप से कहा गया है कि प्रश्नगत स्थल पर कार्यपालक अभियंता के दिनांक 13.08.17 को दिये गये निदेश के आलोक में दिनांक 13.08.17 से घनौरा कटरा रिंग बाँध के 1 कि॰मी॰ के गैप भाग में पूर्व से संग्रहित बालू भरे बोरा से डाबेल का निर्माण कार्य प्रारम्भ कर दिया गया था तथा अधीक्षण अभियंता द्वारा नामांकित संवेदक के द्वारा दिनांक 14.08.17 एवं 15.08.17 को क्रमशः 5000 अदद्‌ EC Bags एवं 15000 अदद्‌ ई॰सी॰ बैग पिचिंग कर मजबूतीकरण कराकर स्थल को सुरक्षित रखा गया। इस भाग से पानी ओभर टॉप नहीं हो पाया। फलतः जान-माल की कोई क्षति नहीं हुई। साक्ष्य के रूप में पारित प्रमाणक, नामांकण प्रस्ताव, तथा अधीक्षण अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता का पत्र दिया गया है। पारित प्रमाण पत्र से स्पष्ट है कि दिनांक 13.08.17 को उक्त रिंग बाँध पर पूर्व से रखे बालू भरे बोरा से डाबेल बनाने का कार्य कराया गया है। तथा कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 1283 दिनांक 04.11.17 से स्पष्ट होता है कि घनौर कटरा रिंग बाँध के कि॰मी॰ 1.0 पर दिनांक 14.08.17 एवं 15.08.17 तक गैप भराई का कार्य कराया गया है। स्पष्ट है कि उक्त स्थल पर दिनांक 14.08.17 एवं 15.08.17 को कुल 20000 अदद्‌ ई॰सी॰ बैग में बालू भराई कर पिचिंग का कार्य कराया गया है। परिलक्षित है कि उक्त कार्य की स्वीकृति विभाग द्वारा प्रदान की गयी।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में आरोपी का कथन कि उक्त स्थल पर दिनांक 13.08.17 से 15.08.17 के बीच डाबेल का निर्माण कराया गया है स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। आरोपी द्वारा उक्त गैप से नदी का पानी कन्ट्री साईड में फैलाव नहीं होने से संबंधित साक्ष्य के रूप में फोटोग्राफ दिया गया है जिसे देखा जा सकता है इसके अतिरिक्त आरोपी द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है जो स्थापित कर सके कि उक्त भाग से पानी का का फैलाव कंट्री साईड में नहीं हुआ है। जबकि मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के पत्रांक 4 दि॰ 18.08.17 कंडिका-2 में स्पष्ट रूप से अंकित है कि जलस्तर में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि होने अथवा इसके पूर्व पानी की निकासी को रोकने के लिये डाबेल आदि का निर्माण नहीं किया। फलतः पानी कन्ट्री साईड के ग्राफों में फैला। ऐसी स्थिति में आरोप के इस अंश को प्रमाणित माना जा सकता है। आरोप के दूसरा अंश नदी में जलस्तर में अप्रत्याशित वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं देने के संदर्भ में दोनों आरोपी द्वारा कहा गया है कि नदी के जलस्तर में हो रहे वृद्धि की सूचना प्रत्येक तीन घंटे पर कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को प्रतिदिन दी जाती थी। परन्तु इन दोनों पदाधिकारी द्वारा उक्त कथन की पुष्टि के लिये कोई साक्ष्य/अभिलेख उपलब्ध नहीं कराया गया है। अतः श्री कुमार के कथन को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। एवं ससमय आवश्यक सूचना देने में इनके द्वारा दायित्वों का निर्वहन नहीं किया जाना प्रतीत होता है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री अरूण कुमार, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध आरोप संख्या-1 अप्रमाणित एवं आरोप संख्या-2 यथा नदी के जल स्तर में हो रहे अप्रत्याशित वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारी को नहीं देने एवं गैप भाग से नदी के पानी का हो रहे फैलाव को नहीं रोकने के आलोक में दायित्वों का निर्वहन नहीं करने तथा कार्य के प्रति लापरवाही बरतने का आरोप प्रमाणित पाया गया। परन्तु इसी आरोप का अंश यथा आदेश का अवहेलना करने तथा स्वेच्छाचारिता का आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया।

समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री कुमार को निलंबन से मुक्त करते हुए बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्शोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1259, दिनांक 25.06.19 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया। "कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।"

उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री अरूण कुमार, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा अपना पुनर्विलोकन अर्जी पत्रांक-60 दिनांक 07.08.19 द्वारा विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं- मुख्य अभियंता का प्रतिवेदन बिना स्थल निरीक्षण किये ही तैयार किया गया है। फलतः उक्त प्रतिवेदन को साक्ष्य के श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। अतएव लगाये गये आरोप निराधार है। आरोप के दूसरे अंश नदी के जलस्तर में अप्रत्याशित वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं देने के संदर्भ में आरोपी द्वारा कहा गया है कि नदी के जलस्तर में हो रही वृद्धि की सूचना प्रत्येक तीन घंटे पर कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को प्रतिदिन दी जाती थी। परन्तु दोनों पदाधिकारी द्वारा उक्त कथन की पुष्टि के लिये कोई साक्ष्य नहीं माना जा सकता है एवं ससमय आवश्यक सूचना देने में इनके द्वारा दायित्व का निर्वहन नहीं किया जाना प्रतीत होता है। जब जल स्तर में अप्रत्याशित वृद्धि होती थी, तब इनके द्वारा हो रही वृद्धि की सूचना तत्क्षण कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को दी जाती रही है। पूर्व के भाँति उस समय भी मैंने जल स्तर में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि की सूचना अपने कनीय अभिंयता से प्राप्त कर अपने कार्यपालक अभियंता/अधीक्षण अभियंता को दिया था। जिसकी पुष्टि उनसे की जा सकती है। न्यायहीत में बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर अन्तर्गत कटौंझा गेज स्थल से संबंधित गेज रजिस्टर का अवलोकन करना चाहेंगे से स्वतः स्पष्ट है कि इनके द्वारा बागमती नदी के जलस्तर में हो रही वृद्धि की सूचना प्रत्येक तीन घंटे के अन्तराल पर उच्चाधिकारी को दिया गया था। NR 32 दि॰ 14.08.17 से स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि दिनांक 13.08.17 एवं 14.08.17 को जलस्तर में हो रही वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारियों को देने पर उनके द्वारा भी अधीक्षण अभियंता, मुख्य अभियंता एवं जिला पदाधिकारी को भी ससमय दी गयी। दैनिक खैरियत प्रतिवेदन से भी स्पष्ट है कि जल स्तर की सूचना उच्चाधिकारियों को नियमित रूप से दी जाती रही है। गेज पठन कार्य हेतु प्रतिनियुक्त गेज रीडर का भुगतान प्रपत्र-24 स्वीकृति के बाद किया गया है। इससे भी स्पष्ट है कि जलस्तर में वृद्धि की सूचना उच्च पदाधिकारियों को दी गयी है।75 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 बागमती नदी का रून्नीसैदपुर गेज स्थल का रूपांकित HFL-59.009मी॰ है जबकि उक्त अवधि में Maximum gauge 58.05 मी॰ था। स्पष्ट है कि उक्त रीच में HFL से लगभग 1.0 मी॰ की बीच की दूरी (79.0-60-90)+1 अर्थात 19.10 कि॰मी॰ है। धनौरा कटरा रिंग बाँध के कि॰मी॰ 1.0 के पास उक्त अवधि में अधिकतम जलस्तर 19.1x29=553.9 Cm=5.539 मी॰ कम आता है। इस प्रकार विषयांकित स्थल पर जलस्तर 58.05-5.539=52.511 मी॰ होना चाहिए। उक्त स्थल का NSL 52.465 मी॰ है। अर्थात्‌ उस दिन प्रस्तावित तटबंध के NSL से मात्र 4.60 से॰मी॰ ही पानी उपर आता है। जबकि पानी HFL से नीचे था। River bed gradient 1:3280 है। इस परिस्थिति में उस समय प्रश्नगत स्थल पर जलस्तर (58.05-19.10/3.28=52.227मी॰) जो Maximum NSL से लगभग 24 से॰मी॰ नीचे आता है। इस परिस्थिति में ओभर टॉपिंग होने की संभावना नहीं है। दि॰ 13.08.17 को ही पूर्व से भरे 725 बोरे द्वारा डावेल बना दिया गया एवं दि॰ 14.08.17 एवं 15.08.17 को भी क्रमशः 5000 एवं 15000 बालू भरे बोरा से डावेल की लम्बाई एवं ऊँचाई पूर्णरूपेण स्थल सुरक्षित कर लिया गया। फलतः इस स्थल पर नदी का पानी C/S के गाँव में नहीं फैला। न कोई जान-माल की क्षति हुई।

श्री अरूण कुमार, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये -

श्री अरूण कुमार को बागमती नदी के जलस्तर में हो रही वृद्धि की सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं देने, तटबंध के गैप भाग से नदी के पानी में हो रहे फैलाव को नहीं रोकने तथा दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं करने, कार्य के प्रति स्थायी रूप से अवनती एवं भावी वेतन वृद्धि देय नहीं होगा का दण्ड संसूचित किया गया है। संचालन पदाधिकारी ने श्री कुमार के बचाव बयान कि प्रश्नगत स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य हेतु सामग्री का संग्रहण किया गया था एवं डावेल निर्माण किया गया है को स्वीकार योग्य नहीं माना गया है। आरोपी का कथन कि दिनांक 14.08.17 को नामांकण के आधार पर उक्त स्थल पर बाँध मजबूतीकरण कर पानी को नियंत्रित किया गया, को मात्र नामांकण प्रस्ताव के आलोक में अस्वीकार योग्य माना गया एवं आपात स्थिति में घोर लापरवाही तथा कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता के आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। इस आरोप के संदर्भ में मुख्य रूप से कहा गया है कि बागमती नदी के रून्नीसैदपुर गेज स्थल पर रूपांकित HFL-59.009 मी॰ है जबकि उक्त अवधि में Maximum gauge 58.05 मी॰ था। स्पष्ट है कि प्रश्नगत रीच में HFL से लगभग 1.0 मी॰ नीचे था। नदी का Flood gradient 1:3500 है। कटौंझा गेज स्थल से घनौर कटरा रिंग बाँध के 1.0 कि॰मी॰ के बीच की दूरी (79.0-60.90) 1 अर्थात 19.10 कि॰मी॰ है। कटौंझा रींग बाँध के कि॰मी॰ 1.0 के पास उक्त अवधि में अधिकतम जलस्तर 19.10x29=553.9Cm यथा 5.539 मी॰ कम आता है। उक्त अवधि में कटौंझा गेज स्थल पर जलस्तर 58.05 मी॰ था। विषयांकित स्थल पर जलस्तर (58.05-5.539)=52.511 मी॰ होना चाहिए। उक्त स्थल पर NSL से मात्र 4.6 Cm ही पानी उपर आता है। इस परिस्थिति में ओभर टॉपिंग होने की संभावना नहीं है। उपरोक्त कथन के समर्थन में न तो कोई साक्ष्य ही दिया गया न ही संबंधित स्थल का HFL, NSL से संबंधित कोई अधिकारिक साक्ष्य ही दिया गया है। ऐसी स्थिति में इनका उपरोक्त कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त इनके द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया है जो इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी अथवा द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी है एवं नदी के जलस्तर में हो रहे अप्रत्याशित वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारी को नहीं देने, गैप भाग से नदी के पानी में हो रहे फैलाव को नहीं रोकने, दायित्वों का निर्वहन नहीं करने तथा कार्य के प्रति लापरवाही बरतने के लिये दोषी हैं।

समीक्षोपरांत उपरोक्त समीक्षा एवं संचालन पदाधिकारी के मंतव्य के आलोक में श्री अरूण कुमार, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, रून्नीसैदपुर का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है एवं इनके विरूद्ध पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-1259 दिनांक 25.06.2019 द्वारा संसूचित दण्ड को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

"कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री अरूण कुमार, अवर प्रमंडल पदाधिकारी, गंगा पम्प नहर, अवर प्रमंडल, धुआवे, कहलगाँव, भागलपुर के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड यथा "कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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21 जुलाई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-10/2017-967--श्री प्रियदर्शी मनोज कुमार (आई0डी0-5335), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, बेनीबाद को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 14.08.17 को बागमती नदी के बाँयें तटबंध में सीपेज एवं पाईपिंग के कारण चार स्थलों पर हुए टूटान में बरती गई अनियमितताओं के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-1610, दिनांक 14.09.2017 द्वारा श्री कुमार को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय76 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संकल्प ज्ञापांक संख्या-1683, दिनांक 20.09.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई -

बागमती अवर प्रमंडल, बेनीबाद का कार्यक्षेत्र बायाँ तटबंध के 38.76कि0मी0 से 46.92कि0मी0 कटाव प्रभावित भाग है। (1) दिनांक 17.08.17 को मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा मोबाईल पर आदेश देने के बावजूद आप कटाव स्थल पर नहीं पहुँचे एवं मोबाईल भी आपके द्वारा बन्द कर लिया गया।

(2) इसके पश्चात लगभग 2.30 बजे अपराह्‌न में आप आये एवं लगभग 3.0 बजे अपराह्‌ण में स्वेच्छा से चले गये एवं मोबाईल बन्द कर लिया गया ।

(3) दिनांक 17.08.17 को ही आप मेडिकल के आधार पर अवकाश का आवेदन देकर बिना अवकाश स्वीकृत कराये चले गये। कटाव के गंभीर स्थिति के दृष्टिगत आपके द्वारा मोबाईल बन्द रखने के कारण अवकाश अस्वीकृति की सूचना आपको नहीं दी जा सकी। आपका उक्त कृत बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो के प्रति घोर लापरवाही, कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता एवं स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है। आपका यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम-3(iii) के प्रतिकूल है। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री प्रियदर्शी मनोज कुमार, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित सभी आरोपों को प्रमाणित पाया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1034, दिनांक 11.05.2018 द्वारा संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति संलग्न करते हुए लिखित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई।

उक्त के आलोक में श्री कुमार, तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, बेनीबाद द्वारा अपने पत्रांक-0, दिनांक 26.06.2018 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया, जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :- श्री कुमार द्वारा बचाव बयान के कंडिका 1 एवं 2 में इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को नियम 17(3) (i) (ii) (क) एवं (ख) के अनुरूप नहीं किया जाना बताया गया है। कंडिका-4 में आरोप सं॰-1 के संदर्भ में कहा गया है कि संचालन पदाधिकारी उनके बचाव बयान को स्वीकार योग्य नहीं माना जा गया है क्योंकि उनका मोबाईल बन्द था। तो उनके द्वारा उस दौरान पदाधिकारी से सम्पर्क में रहने संबंधी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गयी। जबकि अभियंता प्रमुख द्वारा पावर बैंक क्रय करने की अनुमति प्रदान की गयी थी। परन्तु पावर बैंक खरीदने की प्रक्रिया का कोई उल्लेख नहीं है। न ही कोई मार्गदर्शन था तथा पावर बैंक को चालू रखने हेतु बिजली की आवश्यकता होती है जबकि बिजली ही वांछित था तो पावर बैंक कैसे चालू रखा जा सकता था। कंडिका-5 :- में आरोप सं॰ 3 के संदर्भ में कहा गया है कि बिमार होने/घायल होने पर विभाग की स्वीकृति आने तक चिकित्सक से बिना ईलाज कराये कैसे रहा जा सकता था चिकित्सा अवकाश में जाने के लिये स्वीकृति करना संभव नहीं था। गृह रक्षकों एवं ग्रामीणों से पुष्टि की जा सकती है, कि वे दिनांक 17.08.17 को वर्णित स्थल पर मौजूद थे एवं उक्त स्थल कटाव प्रभावित नहीं था। संचालन पदाधिकारी का कहना कि मुझे इस बात की जानकारी थी कि अवकाश की स्वीकृति मुख्यालय स्तर से दी जाती है, उचित नहीं है। क्योंकि छुट्‌टी में जाने का आवेदन उचित माध्यम से दिया जाना है। ऐसी परिस्थति में जबकि वे अस्वस्थ थे तो यह कहा जाना कि मैं अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित था उचित नहीं है। कंडिका-6 ः- में आरोप सं॰-2 के संदर्भ में कहा गया है कि संचालन पदाधिकारी उनके स्पष्टीकरण को यह कहकर अस्वीकार किया गया है कि उनके बचाव बयान में अंकित नहीं है कि किस समय स्थल पर पहुँचा और कब चले गये। संचालन पदाधिकारी का यह मंतव्य साक्ष्य आधारित नहीं है। इस आरोप के संदर्भ में सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 15548 दिनांक 06.12.17 के कंडिका-5 का बिना अनुपालन किये ही जाँच प्रतिवेदन दिया गया है। श्री कुमार, तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के द्वारा निदेश देने के बावजूद दिनांक 17.08.17 को कटाव स्थल पर नहीं पहुँचना, बाढ़ में कार्य स्थल पर पहुँचने एवं स्वेच्छा से कटाव स्थल से चले जाने, मोबाईल बन्द कर देने एवं बिना अनुमति प्राप्त किये ही मेडिकल के आवेदन देकर अवकाश में प्रस्थान करने, बाढ़ संघर्षात्मक की प्रति घोर लापरवाही बरतने, कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता बरतने एवं स्वेच्छाचारिता बरतने से संबंधित है। (क) आरोप-1 :- संचालन पदाधिकारी ने आरोपी पदाधिकारी के अनुरोध पर इस आरोप के संदर्भ में उनका कथन कि निदेश के बावजूद कटाव स्थल पर नहीं पहुँचने एवं मोबाईल बन्द करने का प्रतिपरीक्षण तत्कालीन मुख्य अभियंता से दिनांक 27.11.17 को करायी गयी। ततपश्चात इनके बचाव बयान को अस्वीकार योग्य मानते हुए अभियंता प्रमुख के पत्रांक 2408 दिनांक 23.06.17 से पावर बैंक क्रय करने की अनुमति के साथ-साथ चेतावनी दी गयी कि किसी भी परिस्थति में मोबाईल बन्द न हो। बन्द होने की स्थिति में संबंधित पदाधिकारी दण्ड के भागी होने के आलोक में इस आरोप को प्रमाणित माना गया है। श्री कुमार द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में इस आरोप के संदर्भ में कोई नया तथ्य/साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। फलतः संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए इस आरोप को प्रमाणित माना जाता है।77 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (ख) आरोप-2 :- जो स्वेच्छापूर्वक 2.30 बजे कटाव स्थल पर आने एवं स्वेच्छापूर्वक लगभग 3.0 बजे स्थल से चले जाने तथा मोबाईल बन्द कर लेने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने आरोपी के कथन कि आरोप साक्ष्य विहिन है को अस्वीकार करते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री कुमार द्वितीय कारण पृच्छा में आरोप-2 के संदर्भ में न तो कोई नया तथ्य दिया गया है। न ही स्थल पर कब पहुँचे एवं स्थल से कब गये से संबंधित कोई साक्ष्य ही दिया गया है। ऐसी स्थिति में इस आरोप को प्रमाणित माना जाता है।

(ग) आरोप-3 :- जो बिना अनुमति प्राप्त किये ही मेडिकल के आधार पर आवेदन देकर अवकाश में प्रस्थान करने एवं मोबाईल बन्द रहने के कारण आवेदन की अस्वीकृति की सूचना नहीं देने से संबंधित है।

संचालन पदाधिकारी ने तत्कालीन मुख्य अभियंता से प्रतिपरीक्षण के दौरान श्री कुमार द्वारा आवेदन के साथ मेडिकल कागजात उपलब्ध नहीं कराये जाने तथा कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 1 दिनांक 18.08.17 की प्रति (जो अवकाश के आवेदन को रदद्‌ किये जाने का) उपलब्ध कराये जाने तथा विभागीय पत्रांक 1981 दिनांक 15.05. 17 से अवकाश की स्वीकृति हेतु दिये गये निदेश के आलोक में इस आरोप को प्रमाणित माना गया है। श्री कुमार द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में इस आरोप के संदर्भ में न तो कोई नया तथ्य दिया गया है न ही कोई साक्ष्य उपलब्ध कराया गया है। मात्र संचालन पदाधिकारी के मंतव्य को उचित नहीं होना बताया गया है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए इस आरोप को प्रमाणित माना जाता है। समीक्षोपरांत उपरोक्त समीक्षा के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री प्रियदर्शी मनोज कुमार के विरूद्ध तीनों आरोपों यथा बाढ़ जैसे आपात स्थिति में भी उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना करते हुए कटाव स्थल पर नहीं पहुँचने, मोबाईल बन्द रखने तथा स्वेच्छापूर्वक अवकाश में प्रस्थान करने, कर्त्तव्य का निर्वहन में उदासीनता, लापरवाही एवं संवेदनहीनता तथा स्वेच्छाचारिता बरतने, कटाव स्थल पर नहीं पहुँचने, मोबाईल बन्द रखने का आरोप प्रमाणित पाया गया एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री कुमार को निलंबन से मुक्त करते हुए बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्शोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1261 दिनांक 25.06.19 से निम्न दण्ड संसूचित किया गया। "आठ (8) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"।

उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री प्रियदर्शी मनोज कुमार, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 06.08.19 से पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है -

श्री मनोज द्वारा कहा गया है कि विभागीय संकल्प में बागमती बाँयें तटबंध के विभिन्न जगह पाईपिंग एवं सिपेज से टूटान होने की बात कही गयी है। जबकि आरोप पत्र में ऐसा कोई तथ्य नहीं है और न ही टूटान संबंधी ही कोई प्रतिवेदन है। आरोप पत्र के साथ साक्ष्यस्वरूप संलग्न मुख्य अभियंता के पत्रांक 5 दि॰ 18.08.17 की प्रति का भी अवलोकन करना चाहेंगे। जिसका अवलोकन से स्पष्ट होगा कि संबंधित साक्ष्य इनके अवकाश में प्रस्थान करने से संबंधित है। ना कि पाईपिंग एवं सिपेज के कारण टूटान से। संचालन पदाधिकारी ने अंकित किया है कि इनके द्वारा आरोप सं॰ 1 के संदर्भ में बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि उनका मोबाईल बन्द था तो उनके द्वारा उस दौरान उच्चाधिकारियों से सम्पर्क में रहने संबंधी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गयी थी, जबकि अभियंता प्रमुख द्वारा पावर बैक क्रय करने की अनुमति प्रदान की गयी थी। इस संबंध में यह भी कहना है कि पावर बैंक खरीदने की अनुमति तो दी गयी, लेकिन उसके क्रम का क्या प्रक्रिया होगी। इस संबंध में कोई मार्गदर्शक नहीं था। आरोप सं॰ 3 के संबंध में कहा गया है कि (क) बिमार होने या घायल होने पर विभागीय स्वीकृति आने तक चिकित्सक से बिना ईलाज कराये कैसे रहा जा सकता था।

(ख) चिकित्सा अवकाश में जाने के लिये स्वीकृति संभव नहीं थी। (ग) स्थल पर पदस्थापित गृह रक्षकों एवं ग्रामीणों के द्वारा पुष्टि की जा सकती है कि वे दिनांक 17.08.17 को उक्त वर्णित स्थल पर मौजूद था।

जहाँ तक विभागीय पत्रांक 1981 दि॰ 15.05.17 के दिशा निदेश का प्रश्न है। इस संबंध में कहना है कि संबंधित पत्र में यह दिशा निदेश है कि क्षेत्रीय पदाधिकारी द्वारा बाढ़ अवधि तक किसी प्रकार का अवकाश क्षेत्रीय स्तर से स्वीकृत नहीं किया जायेगा। समीक्षा में कहा गया है कि इन्हें इस बात की जानकारी थी कि अवकाश की स्वीकृति मुख्यालय स्तर से दी जाती है। यह कहना उचित नहीं है क्योंकि छुट्‌टी में जाने का आवेदन उचित माध्यम से दिया जाना है जबकि वे अस्वस्थ थे। आरोप-2 के संदर्भ में कहा गया है कि मुख्य अभियंता के पत्र में समय करीब 2.50 बजे अपराह्‌न अंकित है जबकि आरोप पत्र समय 2.30 बजे अपराह्‌न अंकित है कि मुख्य अभियंता के निदेश पर वे उक्त स्थल पर पहुँचा गया था जिसकी पुष्टि वहाँ के ग्रामीणों एवं उक्त स्थल पर प्रतिनियुक्त गृह रक्षावाहनी के जवानों से की जा सकती है। संचालन पदाधिकारी द्वारा उक्त बयान की सम्पुष्टि हेतु न तो कारवाई की गयी जो सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 15548 दि॰ 06.12.17 के कंडिका 5 का उल्लंघन है। श्री प्रियदर्शी मनोज कुमार, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये - आरोप सं॰ 1ः-जो मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के द्वारा निदेश देने के बावजूद दिनांक 17.08.17 को कटाव स्थल पर नहीं पहुँचना, बाढ़ अवधि में कार्य स्थल पर विलम्ब से पहुँचने एवं स्वेच्छा से कटाव स्थल से चले जाना, मोबाईल बन्द कर देने एवं78 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 बिना अनुमति प्राप्त किये ही मेडिकल का आवेदन देकर अवकाश में प्रस्थान करने, बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के प्रति घोर लापरवाही बरतने, कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता बरतने, स्वेच्छाचारिता बरतने से संबंंधित है। संचालन पदाधिकारी ने आरोपी पदाधिकारी के अनुरोध पर इस आरोप के संदर्भ में प्रतिपरीक्षण तत्कालीन मुख्य अभियंता से दिनांक 27.11.17 को करायी गयी। ततपश्चात इनके बचाव बयान को अस्वीकार योग्य मानते हुए अभियंता प्रमुख के पत्रांक 2408 दि॰ 23.06.17 से पावर बैक क्रय करने की अनुमति के साथ चेतावनी दी गयी कि किसी भी परिस्थिति में मोबाईल बन्द न हो। बन्द होने की स्थिति में संबंधित पदाधिकारी दण्ड के भागी होने के आलोक में इस आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। इनके द्वारा कहा गया है कि अभियंता प्रमुख द्वारा पावर बैंक क्रय करने की अनुमति प्रदान की गयी लेकिन उसके क्रम की क्या प्रक्रिया होगी। इस संबंध में कोई मार्गदर्शन नहीं था। प्रश्न है कि इनको पावर बैंक क्रय की प्रक्रिया पर किसी तरह का उलझन था तो इनके द्वारा उच्च पदाधिकारी से मार्गदर्शन की माँग की जानी चाहिए थी। परन्तु इनके द्वारा न तो कोई तथ्य ही दिया गया है। न ही कोई साक्ष्य ही दिया गया है जिससे उक्त कथन की पुष्टि हो सके। अतएव इनका बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है एवं आरोप-1 प्रमाणित होता है। आरोप-2 :-जो स्वेच्छापूर्वक 2.30 बजे अपराह्‌ण में कटाव स्थल पर आने एवं स्वेच्छापूर्वक लगभग 3.0 बजे स्थल से चले जाने तथा मोबाईल बन्द कर लेने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने आरोपी कथन को साक्ष्यविहिन होने की स्थिति में अस्वीकार योग्य मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री कुमार अपने पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी अथवा द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया है इनके द्वारा न तो कोई नया तथ्य ही दिया गया है न ही कोई साक्ष्य ही दिया गया है। ऐसी स्थिति में आरोप-2 को प्रमाणित होता है। आरोप-3 :-जो बिना अनुमति प्राप्त किये ही मेडिकल का प्रतिवेदन देकर अवकाश में प्रस्थान करने तथा मोबाईल बन्द रहने के कारण आवेदन अस्वीकृति की सूचना नहीं देने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने तत्कालीन मुख्य अभियंता से प्रतिपरीक्षण के दौरान श्री कुमार द्वारा आवेदन के साथ मेडिकल कागजात उपलब्ध नहीं कराये जाने तथा कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 1 दि॰ 18.08.17 की प्रति (जो अवकाश के आवेदन को रद्‌द किये जाने से संबंधित है) उपलब्ध कराये जाने के आलोक में आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। इनके द्वारा कहा गया है कि विभागीय पत्रांक 1981 दि॰ 15.05.17 के दिशा निदेश का प्रश्न है संबंधित पत्र में यह दिशा निदेश है कि क्षेत्रीय पदाधिकारी द्वारा बाढ़ अवधि में किसी प्रकार का अवकाश क्षेत्रीय स्तर से स्वीकृत नहीं किया जायेगा। ऐसी स्थिति में अस्वस्थ पदाधिकारी छुट्‌टी में जाने का आवेदन उचित माध्यम से दिया जाना है। इसलिए कार्यपालक अभियंता को आवेदन दिया गया। स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि कार्यपालक अभियंता द्वारा ही इनका अवकाश को अस्वीकृत कर दिया गया है। इन्हें नियमानुसार अवकाश सक्षम पदाधिकारी से स्वीकृत कराने के पश्चात अवकाश में जाना चाहिए था। जबकि मात्र आवेदन देकर छुट्‌टी में प्रस्थान करना इनकी स्वेच्छाचारिता दर्शाता है। इसके अतिरिक्त इनके द्वारा न तो कोई नया तथ्य दिया गया है न ही कोई नया साक्ष्य ही दिया गया है। अतएव आरोप-3 प्रमाणित होता है। समीक्षोपरांत उपरोक्त समीक्षा एवं संचालन पदाधिकारी के मंतव्य के आलोक में श्री प्रियदर्शी मनोज कुमार, अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, बेनीवाद का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है एवं इनके विरूद्ध पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-1261 दिनांक 25.06.19 द्वारा संसूचित दण्ड को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

"आठ (8) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"। अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री प्रियदर्शी मनोज कुमार, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी सम्प्रति सहायक अभियंता, मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, औरंगाबाद का कार्यालय, औरंगाबाद के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड यथा "आठ (8) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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3 जुलाई 2020

सं॰ 22नि0सि0(भाग0)-09-07/2015-944--श्री अवधेश कुमार झा (आई0डी0-3219), तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, समग्र योजना अन्वेषण एवं प्रोजेक्ट प्रीपरेशन मंडल, बौंसी के विरूद्ध बाढ़ 2014 पूर्व एकरारनामा सं०-3SBD/2014-15 के तहत एजेण्डा संख्या-122/319, 122/320 एवं एजेण्डा संख्या-122/322 के अन्तर्गत कराए गए कार्यों में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल से करायी गयी। उड़नदस्ता अंचल से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर किए जाने के उपरांत प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2516, दिनांक 07.12.2018 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया।

श्री अवधेश कुमार झा, तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण के उत्तर की समीक्षा सक्षम प्राधिकार के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत पाया गया कि श्री अवधेश कुमार झा, तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के विरूद्ध गठित आरोप सं0-1, 2, 3, 4 एवं 5 प्रमाणित प्रतीत नहीं होता है परन्तु79 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोप सं0-6 यथा कार्य के दौरान संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री की वसूली में बरती गयी उदासीनता के लिए आंशिक रूप से दोषी माने जा सकते हैं। उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री अवधेश कुमार झा, तत0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया को अधिसूचना सं0-1684 दिनांक 07.08.19 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया है।

"निन्दन" (आरोप वर्ष 2014-2015)। उक्त अधिरोपित दण्ड के विरूद्ध श्री झा द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया है। पुनर्विलोकन अर्जी के सम्यक समीक्षोपरांत निम्नलिखित तथ्य पाया गया :- आरोप ः-कार्य के कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को विभागीय सामग्री यथा पोलीमर रोप गैबियन (1.8 X 1.8 X 0.5m)1000 अदद तथा बोल्डर 233.51 घन मी॰ दिया गया है। माप पुस्त में अंकित द्वितीय विपत्र के मेमों से पहले विभागीय सामग्री दिये जाने का उल्लेख है। परन्तु उक्त सामग्री की वसूली अथवा नियमानुसार राशि की कटौती किये जाने का कोई उल्लेख नहीं है। इस प्रकार संवेदक को अधिकाई भुगतान होना परिलक्षित है। बचाव बयान :- कहा गया है कि प्रश्नगत कार्य की प्रथम जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा दिनांक 23.06.14 से 24.06.14 की अवधि में की गयी। जाँच प्रतिवेदन उड़नदस्ता अंचल के पत्रांक 24 दि॰ 27.08.14 सचिव महोदय को समर्पित है। द्वितीय जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा दि॰ 11.03.15 से 12.03.15 की अवधि में ही किया गया जिसका जाँच प्रतिवेदन भी उड़नदस्ता अंचल के पत्रांक 14 दि॰ 26.03.15 से विभागीय सचिव को समर्पित है। पोलीमर रोप गैबियन दिनांक 16.03.15 को ही प्रमंडलीय केन्द्रीय गोदाम में लौटा दिया गया। अतएव निष्कर्ष निकालना कि इसकी वसूली उड़नदस्ता जाँच के बाद किया जाना गलत मंशा परिलक्षित होता है प्रमाणित नहीं होता है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के पेज 23 पर कंडिका 9.0.0(vii) में अंकित है कि विभागीय सामग्री की वसूली नियमानुसार अपेक्षित है। परन्तु जाँच प्रतिवेदन को साक्ष्य मानकर तैयार किया गया आरोप पत्र में विभागीय सामग्री की वसूली नहीं करने का आरोप लगा दिया गया। लेकिन दिये गये साक्ष्यों को विभागीय समीक्षा में स्वीकार कर लिया गया है। इस प्रकार यह आरोप आधारहीन होने के कारण प्रमाणित नहीं होने पर नया मनगढ़त आरोप बिना किसी साक्ष्य के इनके उपर लगाकर दण्ड का भी अधिसूचना जारी करना किसी भी तरह से विधिसम्मत नहीं है। लोक निर्माण संहिता के प्रावधानों के तहत अंतिम विपत्र पारित करने के पूर्व कार्यपालक अभियंता का यह दायित्व है कि संवेदक को निर्गत निर्माण सामग्री एवं अन्य सभी प्रकार का बकाया की वसूली संवेदक से करने के बाद ही शेष राशि का भुगतान की जाय। इस कार्य का अंतिम विपत्र इनके द्वारा पारित नहीं किया गया है फिर भी इनके द्वारा चतुर्थ चालू विपत्र में ही संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री यथा 1000 अदद पोलीमर रोप गैबियन एवं 233.51 घन मी॰ बोल्डर की वसूली संवेदक से कर लिया गया। अन्यथा अंतिम विपत्र पारित करने की तिथि 23.09.17 तक इसे वसूल करने में किसी भी वित्तीय प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है। संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री यथा 1000 अद्‌द पोलीमर रोप गैबियन का मूल्य लगभग 10.00 लाख एवं 233.51 घन मी॰ बोल्डर का मूल्य लगभग 4.22 लाख है। जबकि संवेदक द्वारा दिनांक 05.08.14 को पूरे कार्य समाप्त करने के बावजूद प्रथम एवं द्वितीय विपत्र मिलाकर कुल 324.45 लाख का ही भुगतान किया गया। संवेदक का ही करोड़ो रूपया विभिन्न तरह की स्वीकृति के आलोक में विभाग में भुगतान के लिये लंबित था। जिसे विभागीय स्वीकृति के आलोक में तृतीय चालू विपत्र में 395.31 लाख का भुगतान दिनांक 07.02.15 को किया गया। संवेदक को भुगतान की गयी चुतर्थ चालू विपत्र से विभागीय नियमानुसार 233.51 घन मी॰ बोल्डर की कीमत रू॰ 421696/- घटाकर ही दि॰ 25.03.15 को भुगतान किया गया है। संवेदक के द्वारा 1000 अद्‌द पोलीमर रोप गैबियन दिनांक 16.03.15 को ही विभागीय प्रमंडलीय गोदाम में लौटा दिया गया था। जबकि इस समय तक संवेदक का करोड़ो रूपये विभाग के पास Security Deposite एवं अन्य मदों में काटा हुआ राशि उपलब्ध था। इसलिए विभागीय सामग्री की वसूली उड़नदस्ता जाँच के बाद में किया जाना इनकी गलत मंशा को परिलक्षित करती है; पूर्णतः अप्रमाणित है। संवेदक द्वारा दिनांक 05.08.14 को पूरा कार्य समाप्त कर दिया गया था। एकरारनामा के शर्त्तो के अधीन Clause of Contract के Clause-41के अनुसार कार्य समाप्ति के 6 महिने यानी 05.02.15 के बाद संवेदक के द्वारा जमा किये गये एवं विपत्र से काटी गयी करोड़ों रूपये की Security Deposite का 50 प्रतिशत राशि इनके द्वारा संवेदक को एकरारनामा के शर्त्ताे के अधीन लौटाया जा सकता था, जो नहीं लौटाया गया। इस तरह गलत मंशा ठहराना उचित नहीं है। समीक्षा :- उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5.0.0(ii), 8.0.0(4) एवं 9.0.0(vii) से स्पष्ट है कि कार्य के कार्यान्वयन के दौरान संवेदक को विभागीय सामग्री के रूप में 1000 अद्‌द पोलीमर रोप गैबियन तथा 233.51 घन मी॰ बोल्डर दिया गया है जिसकी वसूली द्वितीय चालू विपत्र तक किया जाना परिलक्षित नहीं होता है। इनके पुनर्विलोकन अर्जी के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि संवेदक को विभागीय सामग्री दिये जाने एवं उसकी वसूली किये जाने के संदर्भ में जो तथ्य दिया गया है वह इनके द्वारा स्पष्टीकरण में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी एवं इसकी वसूली उड़नदस्ता जाँच के बाद किये जाने के आलोक में गलत मंशा होने के आलोक में इन्हें निन्दन का दण्ड संसूचित किया गया है।80 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 इनके द्वारा नये तथ्य के रूप में कहा गया है कि लोक निर्माण संहिता के प्रावधानों के तहत अंतिम विपत्र पारित करने के पूर्व कार्यपालक अभियंता का दायित्व है कि संवेदक को निर्गत विभागीय निर्माण सामग्री एवं अन्य सभी प्रकार का बकाया की वसूली संवेदक से करने के बाद ही शेष राशि का भुगतान की जाय। इस कार्य का अंतिम विपत्र इनके द्वारा पारित नहीं किया गया है फिर भी इनके द्वारा चतुर्थ विपत्र में ही संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री यथा 1000 अद्‌द पोलीमर रोप गैबियन तथा 233.51 घन मी॰ बोल्डर की वसूली संवेदक से कर ली गयी है। अन्यथा अंतिम विपत्र पारित करने की तिथि 23.09.17 तक इसे वसूल करने में किसी भी वित्तीय प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है। उपरोक्त कथन के समर्थन में न तो कोई साक्ष्य दिया गया है न ही लोक निर्माण संहिता के कंडिका का उल्लेख किया गया है। अभिलेखों से स्पष्ट रूप से स्थापित होता है कि उड़नदस्ता द्वारा प्रश्नगत कार्य की जाँच 12.03.15 को किया गया है। जबकि आरोपी द्वारा स्वयं स्वीकार किया गया है कि 16.03.15 को संवेदक द्वारा 1000 अद्‌द पोलीमर रोप गैबियन केन्द्रीय प्रमंडलीय गोदाम से वापस किया गया है तथा दिनांक 23.03.15 को चतुर्थ विपत्र पारित किया गया है। अतएव इनका उपरोक्त कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री यथा 1000 अद्‌द पोलीमर रोप गैबियन का मूल्य लगभग 10.0 लाख एवं 233.51 घन मी॰ बोल्डर का मूल्य लगभग 4.22 लाख होता है जबकि संवेदक द्वारा दिनांक 05.08.14 को कार्य पूर्ण करने के बावजूद प्रथम एवं द्वितीय चालू विपत्र मिलाकर कुल 324.45 लाख का ही भुगतान किया गया। संवेदक का ही करोड़ो रूपये विभिन्न तरह की स्वीकृति के आलोक में विभाग में लंबित है। जिसे विभागीय स्वीकृति के आलोक में तृतीय चालू विपत्र में 395.31 लाख का भुगतान 07.02.15 को किया गया। अतएव गलत मंशा नहीं रही है। उपरोक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। अतएव साक्ष्यविहीन बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। अभिलेखों से परिलक्षित होता है कि संवेदक को दिये गये विभागीय सामग्री प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय विपत्र तक वसूली नहीं की गयी है। उक्त सामग्री की वसूली उड़नदस्ता जाँच के पश्चात चतुर्थ विपत्र से की गयी है। अतएव इनका पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है।

उपर्युक्त समीक्षा के आलोक में श्री झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं पाए जाने के कारण निरस्त किए जाने का निर्णय सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री अवधेश झा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, नवगछिया के पुनर्विलोकन अर्जी को निरस्त किए जाने के फलस्वरूप विभागीय अधिसूचना सं0-1684 दिनांक 07.08.19 द्वारा संसूचित निम्नांकित दण्ड यथावत रखा जाता है।

"निन्दन" (आरोप वर्ष 2014-2015)।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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3 जुलाई 2020

सं॰ 22नि0सि0(वीर0)-07-05/2018-939--श्री सतीश कुमार वर्मा (ID-3651), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल, सुपौल सम्प्रति सेवानिवृत के द्वारा अपने पदस्थापन अवधि में बरती गयी निम्न अनियमितता के लिए विभागीय संकल्प सं0-626 दिनांक 25.03.19 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री वर्मा को दिनांक 31.07.19 को सेवानिवृत होने के फलस्वरूप पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0-113 दिनांक 12.09.19 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया :-

आरोप निम्न है :- (1) श्री सतीश कुमार वर्मा, तत0 कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल, सुपौल द्वारा Prefab Structure चेक पोस्ट के लिए कोटेशन आमंत्रित किया गया था। जिसे नियमानुसार सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग के माध्यम से प्रकाशित कराकर निस्तार किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया। यह बिहार PWD Code के विरूद्ध है।

(2) श्री वर्मा द्वारा कोटेशन के तुलनात्मक विवरणी में न्यूनतम दर वाले कोटेशन दाता को विशिष्टि के अनुरूप नहीं होने का हवाला देकर उच्च दर वाले कोटेशन दाता का अनुशंसा किया गया जो बिहार वित्त नियामवली के बिल्कुल विपरीत है।

(3) श्री वर्मा द्वारा जिस कार्य के लिए कोटेशन आमंत्रित किया गया था उस कोटेशन में किसी भी प्रकार की विशिष्टि का जिक्र नहीं किया गया था। फिर भी कोटेशन में न्यूनतम दर वाले को विशिष्टि का हवाला देकर उच्च दर वाले कोटेशन दाता को चयन किया गया जो गलत था।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री वर्मा से विभागीय पत्रांक-1545 दिनांक 22.07.19 द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई।

श्री वर्मा, तत0 कार्यपालक अभियंता से प्राप्त जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में पाया गया कि श्री वर्मा द्वारा अपने अभ्यावेदन में मुख्य रूप से निम्न का उल्लेख किया गया हैः-81 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (1) आकस्मिक/आपातकालीन/अति आवश्यक कार्य जिसकी प्राक्कलित राशि पन्द्रह लाख से कम है के कार्याें के लिए स्थानीय स्तर पर नियत समय के लिए वृहत प्रचार प्रसार सुनिश्चित करते हुए निविदा आमंत्रित कर कार्यों का कार्यान्वयन किया गया। इसके लिए दैनिक समाचार पत्रों/इंटरनेट पर प्रकाशन आवश्यक नहीं है। यह कोटेशन आमंत्रण का मामला था एवं प्री फैब बंक हाउस बिहार शराबबंदी योजना का था, जिसका दर अज्ञात था एवं Non Schedule Item था जो विभिन्न कंपनियों द्वारा विभिन्न तरह का बनाकर रेडीमेड सप्लाई किया जाता है एवं इसे कार्य स्थल पर Install किया जाता है। जब दर ही अज्ञात है तो राशि एवं प्राक्कलन का प्रश्न ही नहीं उठता है। इसी को प्राप्त करने के लिए कोटेशन आमंत्रित की गयी थी। (2) संचालन पदाधिकारी द्वारा सूचित किया गया है कि प्री फैब बंक हाउस के लिए दर एवं विशिष्टियां उत्पादन एवं मद्य निषेध विभाग द्वारा जिला प्रशासन को नहीं दिया गया था। इसमें केवल मानवीय आवश्यकताओं एवं प्रहरी के ठहराव के लिए यथा बिजली, पानी, शौचालय की अनियवर्यता पर विशेष निदेश था, उसी निदेश के आलोक में कोटेशन आमंत्रित एवं प्राप्त की गयी। कोटेशन का तुलनात्मक विवरणी तैयार करते समय यह देखा एवं पाया गया कि न्यूनतम दर वाले कोटेशन दाता M/S Mitra Management, Infra Resources Pvt. Ltd. कंकडबाग वाले का Proposal आमंत्रित कोटेशन के अनुरूप नहीं था। इसमें न तो शौचालाय के अवयवों विधुत पानी की व्यवस्था थी और न तो इसका क्षेत्रफल कोटेशन एवं विभागीय निदेश पत्रांक-584, दिनांक 09. 02.16 का अनुपालन कर रहा था। इस प्रकार शत-प्रतिशत उपयोगी की संभावना नही बनती थी। बिना शौचालय व्यवस्था एवं जल व्यवस्था तथा विद्युत फिटींग के प्रहरी रात्रि में या गर्मी के दिनों में इसका उपयोग कैसे करते।

इस प्रकार जिला प्रशासन एवं अधीक्षण अभियंता भी सहमत नहीं थे। इसे अनुशासित नहीं किया गया एवं इसके बाद वाले कोटेशनदाता APS Enterprises थे। इसकी उपयोगिता एवं ब्रॉड को देखते हुए अनुशंसा पर अधीक्षण अभियंता, सहरसा को समर्पित किया गया तथा अधीक्षण अभियंता के कार्यालय द्वारा पूरी तरह जांच कर दर से संतुष्ट होने के पश्चात ही एजेंसी निर्धारित करते हुए कार्य सम्पन्न करने का आदेश दिया गया। इसमें किसी भी प्रकार के नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ है।

(3) विभाग द्वारा जब विशिष्टि दिया ही नहीं गया तो इसको कोटेशन आमंत्रण में इसे कैसे निकाला जा सकता था।

प्री फैब बंक हाउस एवं Non Schedule Readymade house है जिसे विभिन्न कंपनियों द्वारा बनाया जाता है और इसके विशिष्टियां भी एकरूप नहीं होती है और न ही दर अनुरूप होता है। इस कार्यस्थल पर Install किया जाता है यह Totally supply item है।

यह भी स्मरणीय है कि आज तक इसका सप्लाई अग्रीम के अभाव में प्रशासन द्वारा नहीं लिया गया है। अपना प्रभार दिनांक 12.09.17 को दिया है। कार्यादेश देने के करीब ढाई वर्ष बाद भी उक्त कार्यादेश को न तो कार्यपालक अभियंता, सुपौल न अधीक्षण अभियंता, सहरसा न मुख्य अभियंता, पटना ने ही रद्‌द किया है और न ही निर्णय लिया गया।

श्री वर्मा से प्राप्त अभ्यावेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई, जो मुख्य रूप से निम्न है- पथ निर्माण विभाग के ज्ञापांक-5676(5) दिनांक 24.06.15 के कंडिका 2.1 से स्पष्ट होता है कि PWD Code 159(क) (1) को संशोधित करते हुए योजना एवं विकास विभाग के अधीन गठित स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन के अतिरिक्त सभी विभागों के विभिन्न आकस्मिक/आपातकालीन/अतिआवश्यक कार्य जिसकी प्राक्कलित राशि 15.0 लाख से अधिक है के लिए निविदा का प्रकाशन दैनिक समाचार पत्र/इंटरनेट पर आवश्यक होगा तथा पन्द्रह लाख अथवा उससे कम राशि के लिए स्थानीय स्तर पर एक नियमित समय के लिए वृहत प्रचार प्रसार सुनिश्चित किया जाना है। प्रश्नगत कार्य के आमंत्रित कोटेशन के आलोक में तीनों कोटेशनदाता से प्राप्त कोटेशन की अधिकतम राशि सात लाख अस्सी हजार रूपये होना परिलक्षित होता है जो पन्द्रह लाख से कम है। ऐसी स्थिति में इनके द्वारा आमंत्रित कोटेशन नियमानुकूल प्रतीत होता है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री वर्मा का इस आरोप के संदर्भ में दिये गये बचाव बयान स्वीकार योग्य प्रतीत होता है।

आरोप सं0-2- संचालन पदाधिकारी के द्वारा निम्न तथ्यों के आलोक में आरोप प्रमाणित माना गया है। आमंत्रित कोटेशन में विेशेष तथ्यों का जिक्र नहीं किया गया है। सभी कोटेशन दाता का कोटेशन आमंत्रित कोटेशन के अनुरूप पाया गया। ऐसी परिस्थिति में न्यूनतम दर वाले कोटेशन दाता को छोड़कर उच्च दर वाले कोटेशनदाता का अनुमोदन हेतु इनके द्वारा अनुशंसा किया जाना सही प्रतीत नहीं होता है।

श्री वर्मा द्वारा कहा गया है कि कोटेशन का तुलनात्मक विवरणी तैयार करते समय यह देखा एवं पाया गया कि न्यूनतम दर वाले कोटेशन M/S Mitra Management Infra Resource pvt. ltd. का proposal आमंत्रित कोटेशन के अनुरूप नहीं था। इसमें न तो शौचालय के अवयवों विघुत पानी की व्यवस्था थी और न तो इसका क्षेत्रफल कोटेशन एवं विभागीय निदेश पत्रांक-584 दिनांक 09.02.16 का अनुपालन कर रहा था।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 82 अभिलेखों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि प्रश्नगत कार्य में तीन निविदादाता M/S Mitra Management Infra Resources Pvt. Ltd. का निविदत कर छह लाख तीन हजार सात सौ बीस रूपये मे0 अतरी इन्टरप्राइजेज का निविदत दर सात लाख अस्सी हजार रूपये एवं APS Enterprises का निविदत दर सात लाख पच्चीस हजार रूपये द्वारा कोटेशन दिया गया। उक्त से स्पष्ट है कि M/s Mitra Management Infra Resources Pvt. Ltd. का दर सबसे कम था। तुलनात्मक विवरणी से स्पष्ट है कि M/s Mitra Management Infra Resources Pvt. Ltd. का कोटेशन बिना स्पष्ट कारण दर्ज किये ही मात्र यह अंकित करते हुए कि इनका कोटेशन विशिष्टि के अनुरूप नहीं है, अमान्य कर दिया गया। कोटेशन आमंत्रण सूचना में मात्र प्री फैब रूप एवं प्री फैब शौचालाय का निर्माण करने का उल्लेख है एवं M/S Mitra Management Infra Resources Pvt. Ltd. के द्वारा दिये गये कोटेशन में प्री फैब रूप एवं प्री फैब शौचालय निर्माण हेतु अलग-अलग राशि अंकित किया गया है। इसके अतिरिक्त कोटेशन आमंत्रण सूचना में किसी प्रकार के कोई विशिष्टि का जिक्र नहीं किया गया था। यहां तक की तीसरे कोटेशनदाता यथा अतरी इन्टरप्राईजेज के कोटेशन में भी उक्त सभी कार्य सम्मिलित है जो M/S Mitra Management Infra Resources Pvt. Ltd. में कोटेशन में सम्मिलित है। इसके बावजूद मे0 अतरी इन्टरप्राईजेज के कोटेशन का मान्य किया गया।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री APS Enterprises के कोटेशन दर का न्यूनतम दर बनाने के परिक्षेत्र में मे0 मिश्रा मैनेजमेंट इन्फ्रा रिसर्च प्रा0 लि0 का कोटेशन को बिना स्पष्ट कारण दर्शाते हुए अमान्य कर दिया गया। अतएव आरोप सं0-2 के संदर्भ में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित माना जा सकता है।

आरोप सं0-3- संचालन पदाधिकारी ने अमांत्रित कोटेशन में विशेष विशिष्टि का जिक्र नहीं किये जाने एवं सभी कोटेशनदाता का कोटेशन आमंत्रित कोटेशन के अनुरूप पाया गया। ऐसी परिस्थिति में न्यूनतम दरदाता को छोड़कर उच्च दर वाले कोटेशनदाता को कोटेशन अनुमोदन हेतु तत0 कार्यपालक अभियंता श्री वर्मा द्वारा अनुशंसा किया जाना सही प्रतीत नहीं होता है के आधार पर आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

श्री वर्मा द्वारा लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा आरोप सं0-2 के संदर्भ में दिया गया है। उक्त के आलोक में परिलक्षित है कि इनके द्वारा द्वितीय न्यूनतम दर दाता APS Enterprises के दर को न्यूनतम दर दाता बनाने के लिए M/S Mitra Management Infra Resources Pvt. Ltd. के कोटेशन को गलत ढंग से बिना किसी कारण के अमान्य कर दिया गया है जबकि M/S Mitra Management Infra Resources Pvt. Ltd. के कोटेशन आमंत्रित कोटेशन सूचना के अनुरूप ही था।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में संचालन पदाािधकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं0-3 प्रमाणित माना जा सकता है।

वर्णित स्थिति में श्री सतीश कुमार वर्मा, तत0 कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध प्रमाणित आरोप सं0-2 एवं 3 के लिए निम्न दण्ड देने का सरकार के स्तर पर निर्णय लिया गया है -

'पांच प्रतिशत पेंशन पर एक वर्ष के लिए रोक'। उक्त दण्ड प्रस्ताव पर सक्षम प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त है तथा बिहार लोक सेवा आयोग, पटना का भी सहमति प्राप्त है।

उक्त के आलोक में श्री सतीश कुमार वर्मा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता है -

'पांच प्रतिशत पेंशन पर एक वर्ष के लिए रोक'।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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3 जुलाई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मोति0)08-03/2013(अंश-2)-938--श्री रविन्द्र चौधरी (आई0डी0-4626) तत0 उप निदेशक (कार्यपालक अभियंता), शोध प्रमंडल, वाल्मीकिनगर, शिविर-मोतिहारी अतिरिक्त प्रभार कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी के विरूद्ध नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना के तहत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अधीन कराये गये नहर पुनस्र्थापन कार्य में एकरारनामा के विपरीत स्थानीय सामग्री का उपयोग होने के बावजूद गुणवत्ता जाँचफल में उक्त अनियमित कृत्य को रेखांकित नहीं किये जाने संबंधी निम्न आरोप के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1680 दिनांक 20.09.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गई :-

नेपाल हितकारी योजना 2009 गंडक प्रोजेक्ट के अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर के पुनस्र्थापन कार्य में बरती गयी अनियमितता की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग, पटना द्वारा किया गया। जाँच में पाया गया कि एकरारनामा के विरूद्ध कार्य में स्थानीय सामग्री यथा स्टोन मेटल का उपयोग होने के बावजूद भी सामग्री ढुलाई मद में वास्तविक लीड के बजाय एकरारित दर से अनियमित भुगतान किया गया। फलस्वरूप सरकार को एक बड़ी राशि की क्षति हुई।

उनके द्वारा कार्यों के कार्यान्वयन के दौरान स्थल के प्रत्युक्त सामग्रियों का नमूना संग्रह करते हुए सामग्री की जाँच प्रयोगशाला में की गयी। जाँचोपरांत जाँचफल विभिन्न तिथियों में कार्य प्रमंडल को प्रेषित किया गया है, जिसमें स्थानीय83 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 सामग्री के प्रयोग के अनियमित कृत्य को रेखांकित नहीं किया गया। जबकि कार्य में स्थानीय सामग्री का प्रयोग स्पष्ट रूप से परिलक्षित था। मुख्य अभियंता, वाल्मीकिनगर द्वारा भी अनेक पत्रों के माध्यम से कार्य में स्थानीय सामग्री के अनियमित उपयोग होने का उद्‌घोषणा बार-बार किया जाता रहा। यहाँ तक की उनके द्वारा बिना सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता के नमूना संग्रह किया गया है जिसे नियमानुकूल नहीं माना जायेगा। जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4.0.0 में भी उद्धित है कि स्थल निरीक्षण से स्पष्ट परिलक्षित था कि शेखपुरा से भिन्न स्थानीय पत्थर का इस्तेमाल कार्य में किया गया है। अतएव वे भली-भाँति अवगत थे कि कार्य में स्थानीय सामग्री का प्रयोग हो रहा है। इन सब तथ्यों की अनदेखी करते हुए कार्य में प्रयुक्त हो रहे स्थानीय सामग्री को छिपाकर जाँचफल में उक्त अनियमित कृत्य को रेखांकित नहीं किया गया। फलतः अनियमित भुगतान हुआ जिसके लिए वे दोषी हैं।

उक्त संचालित विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में निम्न मंतव्य दिया गयाः- (1) उप निदेशक, शोध प्रमंडल, वाल्मीकिनगर, शिविर-मोतिहारी के पद पर पदस्थापित रहते हुए कार्य स्थल से सामग्री का संग्रहण का कार्य नहीं किया गया था परन्तु दिनांक 30.09.2011 के पश्चात कुछ काल तक कार्यपालक अभियंता, आयोजन एंव गुण नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी के रूप में रहते हुए कार्य स्थल से सामग्री संग्रहण की जिम्मेदारी इन्हें थी। अतः इस बिन्दू पर श्री चौधरी दोषी प्रतीत होते हैं।

(2) कार्य में प्रयुक्त हो रहे सामग्री की गुणवत्ता की सूचना इन्हें नहीं थी। अतः इस बिन्दू पर लगाये गये आरोप प्रमाणित नहीं होते है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-27 दिनांक 03.01.2019 द्वारा जाँच प्रतिवेदन की प्रति भेजते हुए जाँच प्रतिवेदन से निम्न तथ्यों के आधार पर सहमत/असहमत होते हुए श्री चौधरी से अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की माँग की गयी :-

संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप से संदर्भित तथ्य दिनांक 30.09.2011 के पश्चात कुल अवधि तक कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी के रूप में रहते हुए कार्यस्थल से सामग्री संग्रहण की जिम्मेदारी उनको थी। इस बिन्दू पर आरोप प्रमाणित होते है, से सहमत हुआ जा सकता है तथा कार्य में प्रयुक्त स्थानीय सामग्री की सूचना इन्हें नहीं थी, अतएव आरोप प्रमाणित नहीं होता है से असहमत हुआ जा सकता है क्योंकि अभिलेखों से स्पष्ट रूप से परिलक्षित है कि दिनांक 30.09.2011 के पश्चात श्री चौधरी, शोध प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के साथ आयोजन एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी के अतिरिक्त प्रभार में रहे है। अतएव दिनांक 30.09.2011 के पश्चात श्री चौधरी नमूना संग्रह करने/कराने तथा उसका प्रयोगशाला जाँच में प्रभारी रहे हैं। इनके द्वारा ही दिनांक 30.09.2011 के बाद कई बार स्वयं स्थल से नमूना संग्रह कर प्रयोगशाला जाँच के पश्चात जाँचफल कार्य प्रमंडल को निर्गत किया गया है। उल्लेखनीय है कि इस तिथि तक मुख्य अभियंता द्वारा स्पष्ट रूप से कार्य में स्थानीय सामग्री का उपयोग होने तथा अनियमित भुगतान होने की उद्‌घोषणा पत्रों के माध्यम से किया जा चुका था। यहाँ तक की आयोजन एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल को एकरारनामा की प्रति उपलब्ध कराया गया था। इसके बावजूद इनके स्तर से निर्गत गुणवत्ता जाँचफल में उक्त अनियमित कृत्य का कोई जिक्र नहीं किया गया। जो परिलक्षित करता है कि इनके द्वारा जानबूझ कर उक्त तथ्यों को छिपाते हुए जाँचफल निर्गत किया गया। जिसके कारण उक्त जाँचफल के आधार पर कार्य प्रमंडल द्वारा अनियमित भुगतान किया गया है। जिसके लिए श्री चौधरी दोषी हैं। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से आरोप के प्रथम अंश से सहमत एवं द्वितीय अंश से असहमत होते हुए आरोप के सम्पूर्ण अंश को प्रमाणित माना जा सकता है।

विभागीय पत्रांक-27 दिनांक 03.01.2019 के आलोक में श्री चौधरी द्वारा समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) का मुख्य अंश निम्नवत है :-

विभाग द्वारा उन पर आरोप लगाया गया है कि उनके द्वारा नमूने का संग्रह अतिरिक्त प्रभार में रहने के क्रम में कराया गया। उनके द्वारा अपने कार्यकाल में एक भी नमूना संग्रह नहीं किया गया था। अगर उनके द्वारा स्वयं यह कार्रवाई की गयी है तो नियमानुसार साक्ष्य के रूप में उपलब्ध कराया जाना हे जो उपलब्ध नहीं कराया गया। जहाँ तक दिनांक 30. 09.2011 के बाद कुछ काल के लिए वे प्रभारी थे के संबंध है में कहना आवश्यक है कि उप निदेशक की नमूनें संग्रह की जवाबदेही नहीं है परन्तु गुण नियंत्रण ईकाई के कनीय पदाधिकारी की यह जिम्मेवारी थी कि स्थल से नमूना का संग्रह कर जाँच हेतु प्रयोगशाला में लाते। ऐसी परिस्थति में नमूना संग्रह से संबंधित आरोप का कोई वैद्यानिक औचित्य मुझ पर नहीं बनता है। जहाँ तक प्रयोगशाला जाँच के प्रभारी का प्रश्न है इस क्रम में कहना है कि नमूना संग्रह के पश्चात प्रयोगशाला में जाँचोपरांत प्राप्त जाँचफल उनके हस्ताक्षर से भेजा जाता था। यह जाँच भी शोध प्रमंडल के कार्यालय में पदस्थापित पदाधिकारियों/कर्मियों द्वारा की जाती है।

श्री चौधरी द्वारा समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन एवं उपलब्ध अभिलेख की समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री चौधरी द्वारा समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) में लगभग वही तथ्य उद्धित किया गया है जो उनके द्वारा पूर्व में उपलब्ध कराये गये स्पष्टीकरण एवं विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। जिसकी समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत/असहमत होते हुए उनसे विभागीय पत्रांक-27 दिनांक 03.01.2019 द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की माँग की गयी थी। श्री चौधरी द्वारा मुख्य रूप से कहा गया है कि उनके द्वारा स्वयं के स्तर से एक भी नमूना स्थल से संग्रह नहीं किया गया है, स्वीकार योग्य नहीं है, क्योंकि उपलब्ध अभिलेखों से स्पष्ट है कि श्री चौधरी द्वारा स्वयं कार्यपालक अभियंता आयोजन एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी के प्रभार में रहते हुए स्थल निरीक्षणोपरांत स्थल से कार्य में प्रयुक्त सामग्री का नमूना संग्रह करते हुए उसकी जाँच शोध प्रमंडल को भेजा गया है तथा84 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उनके स्वयं के प्रयोगशाला में शोध सहायक के सहयोग से जाँचोपरांत उनके द्वारा जाँचफल संबंधित प्रमंडल को भेजा गया है। उक्त किसी भी जाँचफल में स्थानीय सामग्री के उपयोग होने संबंधित तथ्य को उद्धित नहीं किया गया है एवं उसी जाँचफल के आधार पर कार्य प्रमंडल द्वारा अनियमित भुगतान किया जाना परिलक्षित है।

उल्लेखनीय है कि तत्कालीन मुख्य अभियंता, वाल्मीकिनगर द्वारा स्पष्ट रूप से कार्य में स्थानीय सामग्री का उपयोग होने तथा अनियमित भुगतान होने की उद्‌घोषणा कई पत्रों के माध्यम से किया गया है। यहाँ तक की कार्य प्रमंडल द्वारा एकरारनामा की प्रति गुण नियंत्रण प्रमंडल को भी उपलब्ध कराया गया है। इसके अतिरिक्त श्री चौधरी द्वारा आरोप से संदर्भित न तो कोई नया तथ्य ही दिया गया है, न ही कोई साक्ष्य ही उपलब्ध कराया गया है। ऐसी स्थिति में श्री चौधरी का अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री चौधरी के विरूद्ध गठित आरोप यथा आलोच्य कार्य में एकरारनामा के विपरीत स्थानीय सामग्री का उपयोग होने के बाबजूद उक्त अनियमित कृत्य को जानबूझ कर जाँचफल में रेखांकित नहीं करने का आरोप प्रमाणित पाया गया।

मामले के समीक्षोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा प्रमाणित आरोप के लिए श्री रविन्द्र चौधरी (आई0डी0-4626) तत0 उप निदेशक (कार्यपालक अभियंता), शोध प्रमंडल, वाल्मीकिनगर अतिरिक्त कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया हैः-

"कालमान वेतनमान में एक वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी"। उक्त निर्णित दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना द्वारा पत्रांक-365, दिनांक 02.06.2020 के माध्यम से सहमति प्रदान की गयी है।

अनुशासनिक प्राधिकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री रविन्द्र चौधरी (आई0डी0-4626) तत0 उप निदेशक (कार्यपालक अभियंता), शोध प्रमंडल, वाल्मीकिनगर, शिविर-मोतिहारी अतिरिक्त प्रभार कार्यपालक अभियंता, आयोजन एवं गुण नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सोन बराज प्रमंडल, इन्द्रपुरी के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है :-

"कालमान वेतनमान में एक वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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26 जून 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-06/2015-924--श्री विभाष मंडल (ID-5124) तत्कालीन सहायक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल, रतवारा मुजफ्फरपुर के उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान एकरारनामा सं0-1/GR/2009-10 के तहत पैकेज सं0-45 के अन्तर्गत तिरहुत मुख्य नहर के वि0दू0 760 से 790 के बीच कराये गये पुनस्र्थापन यथा मिट्‌टी कार्य, लाईनिंग कार्य तथा सरंचना निर्माण/मरम्मति कार्य में बरती गई अनियमितता की जांच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गई। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जांच प्रतिवेदन के सम्यक समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए आरोप प्रपत्र-'क' गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2055 दिनांक 11.09.2015 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री मंडल, सहायक अभियंता से प्राप्त जवाब के आलोक में मामले की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री मंडल, सहायक अभियंता के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों में प्रपत्र-'क' गठित करते हुए विभागीय संकल्प-1922 दिनांक 31.08.16 द्वारा विभागीय कार्यावही संचालित की गई। आरोप सं0-1-उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन में कंडिका-6.2.0 एवं 8.0 (iii) के अनुसार स्थल निरीक्षण के दौरान नहर बाधों के Contry side slope भाग में मिट्‌टी कम पायी गयी है। इससे स्पष्ट होता है कि नहर बांध में मिट्‌टी भराई का काम रूपांकित सेक्सन में (प्राक्कलन के अनुरूप) कराये बिना ही भुगतान किया गया है जिसे अनियमित माना गया है एवं जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी है। आरोप सं0-2-उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन की कंडिका 8.0 (x) एवं एकरारनामा के Technical Specification के कंडिका 10(2)(B) के अनुसार नहर बांध में मिट्‌टी भराई कार्य में 1/9th for un compacted Earth एवं 1/9th for compacted earth by seep foot roller Settlement के रूप में काटकर मिट्‌टी कार्य का भुगतान करना है परन्तु मापपुस्त से स्पष्ट होता है कि बिना सेटलमेंट काटे ही मिट्‌टी भराई कार्य का भुगतान किया गया है। फलतः संवेदक को वास्तविक भुगतेय मात्रा से अधिक भुगतान हो गया है। अतः उक्त अनियमित भुगतान के लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी हैं। विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी के समक्ष श्री मंडल, सहायक अभियंता द्वारा निम्न बातें कही गई :- आरोप सं0-1 का बचाव बयान-तिरहुत मुख्य नहर में मे0 नागार्जुन द्वारा पुनस्र्थापन कार्य वर्ष 2009-10 से प्रारंभ है। मेरी पदस्थापन उक्त प्रमंडल में वर्ष 2012 में हुई जिसका प्रभार मैंने दिनांक 01.03.2012 में लिया। मेरे प्रभार ग्रहण करने के पूर्व से ही पैकेज संख्या-45 के अन्तर्गत उक्त रीच में मिट्‌टी कार्य कराये जा रहे थे जो उड़नदस्ता दल की जांच के क्रम में भी पाया गया। मे0 नागार्जुन द्वारा किए गए एकरारनामा के तहत नहर बांध को रूपांकित सेक्शन में लाना था। उक्त बिन्दू पर रूपांकित सेक्शन अलग से Annexure-1 के रूप में संलग्न किया जा रहा है। रूपांकित सेक्शन के अवलोकन से यह स्पष्ट85 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 86 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोप सं0 2-श्री मंडल, आरोपित पदाधिकारी द्वारा इस आरोप के बचाव में अपना कोई ठोस बयान नहीं दिया गया है कि क्यों उनके द्वारा मिट्‌टी भराई कार्य में Settlement काटे बिना चालू विपत्र तैयार कर प्रमंडल में जमा किया गया जिसके कारण बिना Settlement काटे प्रमंडल में विपत्र पारित हुआ तथा संवेदक को वास्तविक भुगतेय मिट्‌टी कार्य की मात्रा से अधिक मात्रा का अनियमित भुगतान हुआ। इनके द्वारा अपने बयान में इनके द्वारा की गई अनियमितता का निराकरण कैसे हो सकता है से संबंधित तथ्य दिये गये है। इनका कहना है कि यदि अन्य चालू विपत्र/अंतिम विपत्र से मिट्‌टी भराई के Settlement की कटौती अभियंता प्रमुख के पत्र 1069 दिनांक 08.08.15 (अने0-3) के आलोक में कर ली जाती है तो सरकार को कोई क्षति नहीं होगी। मेरे विचार से अभियंता प्रमुख को इस पत्र से Settlement काटने का निर्देश श्री मंडल एवं प्रमंडल के अन्य पदाधिकारी द्वारा कार्य में बरती गयी लापरवाही एवं अनियमितता का उजागर उड़नदस्ता द्वारा किये जाने के कारण देना पड़ा। यह स्थिति इनके तथा प्रमंडल के अन्य पदाधिकारी के कारण ही उत्पन्न हुई। उनका यह भी कहना है कि वर्तमान में सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता द्वारा क्रमशः पत्रांक 213 दिनांक 21.12.16 एवं पत्रांक 1117 दिनांक 18.12.15 (बचाव बयान पत्रांक शून्य दिनांक 09.05.17 का अनुलग्नक) द्वारा स्वीकारोक्ति की गई है कि अगले चालू/अंतिम विपत्र निधि उपलब्धता के पश्चात Settlement की कटौती कर ली जायेगी। श्री मंडल के समर्पित बचाव बयान एवं उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि वे चाहते है कि वे एकरारनामा एवं विशिष्टियों का उल्लंघन करें, अनियमितता बरते जिसका निराकरण दूसरे पदाधिकारी करें तथा यदि नहीं करते है तो वे उत्तरदायी है। यह इनका गैर जिम्मेदाराना एवं लापरवाही पूर्ण कार्रवाई एवं सोच है जो अनियमिता एवं अनियमित भुगतान को बढावा देने वाला है। यह हरेक पदाधिकारी का मूल कर्तव्य है कि वे नियमानुसार अपने दायित्वों का निर्वहन कर नियमानुसार कार्य कराये तथा नियमानुकूल उसका भुगतान संवेदक को करें। श्री मंडल ने नियमानुसार अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं किया तथा एकरारनामा एवं विशिष्टियों का उल्लंघन कर मिट्‌टी भराई कार्य में बिना Settlement काटें विपत्र तैयार कर प्रमंडल में समर्पित कर संवेदक को अनियमित एवं अधिक भुगतान कराया। इसके लिए वे दोषी होते है। श्री विभाष मंडल के विरूद्ध आरोप-2 प्रमाणित होता है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-650 दिनांक 13.03.2018 द्वारा श्री विभाष मंडल, सहायक अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की मांग की गई।

श्री मंडल, सहायक अभियंता से पूछे गये द्वितीय कारण पृच्छा का पत्र उनके स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल सं0-01 जिला नियंत्रण कक्ष मुजफ्फरपुर से इस आशय की सूचना के साथ वापस लौटा दिया गया कि प्राप्तकर्ता अब इस पते पर नहीं है। (दिनांक 4.4.18) पुनः उक्त पत्र के प्रबंधन कोषांग से श्री मंडल, सहायक अभियंता का पता प्राप्त कर विभागीय पत्रांक-934 दिनांक 18.04.2018 द्वारा उनके स्थानीय क्षेत्र एवं अभियंत्रण संगठन, कार्य अंचल, मुंगेर के पते पर पत्र प्रेषित किया गया। जिसे डाक विभाग द्वारा उन्हें दिनांक 23.06.18 को प्राप्त कराया गया। उक्त पत्र में यह स्पष्ट रूप से अंकित किया गया था कि विलंब की स्थिति में विभाग उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर एक पक्षीय निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होगा। चूंकि श्री मंडल, सहायक अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब प्राप्त नहीं हो सका। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप संख्या-1 एवं 2 को प्रमाणित माना जाता है।

समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री विभाष मंडल, तत्कालीन सहायक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल, रतवारा, मुजफ्फरपुर को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है-

''पांच वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक''। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में प्रस्तावित दण्ड पर विभागीय पत्रांक 532 दिनांक 18.03.2020 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना से परामर्श की माँग की गई।

उक्त के आलोक में बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना द्वारा अपने पत्रांक-363 दिनांक 02.06..20 द्वारा श्री मंडल, तत0 सहायक अभियंता के विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर अपनी सहमति प्रदान किया गया। अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त वर्णित निर्णय के आलोक में श्री विभाष मंडल, सहायक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र एवं अभियंत्रण संगठन, कार्य अंचल, मुंगेर के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

''पांच वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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26 जून 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-06/2015-923--श्री अनिल कुमार शर्मा (ID-3301) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, तिरहुत नहर प्रमंडल, रतवारा मुजफ्फरपुर के उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान एकरारनामा सं0-1/GR/2009-10 के तहत पैकेज सं0-45 के अन्तर्गत तिरहुत मुख्य नहर के वि0दू0 760 से 790 के बीच कराये गये पुनस्र्थापन यथा मिट्‌टी कार्य, लाईनिंग कार्य तथा सरंचना निर्माण/मरम्मति कार्य में बरती गई अनियमितता की जांच विभागीय उड़नदस्ता अंचल, पटना द्वारा की गई। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जांच प्रतिवेदन के सम्यक समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए आरोप प्रपत्र-'क' गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-2056 दिनांक 11.09.2015 द्वारा स्पष्टीकरण पूछा गया। श्री शर्मा, कार्यपालक अभियंता से प्राप्त जवाब के आलोक में मामले की समीक्षा सरकार के स्तर पर87 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 88 89 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (11) संवेदक द्वारा अंतिम विपत्र पारित करने हेतु प्रमंडल कार्यालय को समर्पित है (Annex-C) जिसको वर्तमान में पदस्थापित कार्यपालक अभियंताओं को अपने पदीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए इस विपत्र की जांच कराकर एवं लंबित सारे कटौतियों का सामंजन करते हुए एकरारनामा को बंद करने की कार्रवाई करनी चाहिए थी जो कि अभी तक लंबित है जिसके लिये मेरी कोई जिम्मेवारी नहीं बनती है।

अतः अंतिम विपत्र के पारित न होेने की स्थिति में वित्तीय वर्ष 2015-16 एवं 2016-17 में पदस्थापित कार्यपालक अभियंता जिम्मेवार होंगे क्योंकि उनके द्वारा टाल-मटोल की नीति अपनाकर तथा अपने पदीय दायित्वों को निर्वहन नहीं किया जाना एक प्रकार से असहयोगात्मक एवं नकारात्मक कदम ही माना जायेगा। इसकी समीक्षा विभाग द्वारा होनी चाहिए कि जब निधि मांग के अनुसार वित्तीय वर्ष 2015-16 में उपलब्ध करा दिया गया था तो फिर प्रत्यर्पण का क्या कारण था, तथा अंतिम विपत्र पारित होने के पहले ही मेरे द्वारा किए गए भुगतान को अनियमित की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। साथ ही मेरे द्वारा बचाव बयान पत्रांक-365 दिनांक 02.11.2016 तथा पत्रांक-373 दिनांक 11.11.2016 (निबंधित डाक द्वारा)आपको समर्पित किया जा चुका है। कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्य महालेखाकार (लेखा परीक्षा) बिहार, पटना का तिरहुत नहर प्रमंडल, रतवारा का Audit Report (आंकेक्षण प्रतिवेदन सं0-33/2015-16) संलग्न करते हुए आग्रह करना है कि प्रमंडल का (2002 से 2015 तक) 13 वर्षों का लेखा का आंकेक्षण प्रतिवेदन के Para-1&2 (A), 2(B), 2(C) से पूर्णतः स्पष्ट है कि प्रमंडल में मेरे पदस्थापन के पूर्व ही मिट्‌टी कार्य के मद में अनियमित भुगतान एवं अन्य कटौती मद में प्रथम चालू विपत्र एवं द्वितीय चालू विपत्र वर्ष 2010-11 में अनियमितता हुई थी। जिसका रिकभरी मेरे द्वारा 39वीं विपत्र के माध्यम से 28.03.15 को वर्ष 2014-15 में किया गया। यह तथ्य अंकेक्षण प्रतिवेदन (Audit Report) द्वारा स्थापित हो रहा है। अतः उपरोक्त दोनों आरोप निराधार है तथा मुझे इससे दोषमुक्त करने की कृपा की जाय। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जांच प्रतिवेदन में निम्न बातें कही गयी है। आरोप सं0 1- उड़नदस्ता के जांच प्रतिवेदन में वि0दू0 768-790के बीच रैण्डम जांच (वि0दू0 761.85) में नहर बैंक Undersection कार्य में पूर्ण सेक्सन कार्य का अनियमित भुगतान का मामला नहीं पाया है। इनके द्वारा जांच के समय (दिनांक 07.04.15 को) मात्र Country Side slope में मिट्‌टी कार्य कम पाया गया, अर्थात रूपांकन स्लोप 1ः2 नहीं पाया गया जिसके कारण और मिट्‌टी कार्य की आवश्यकता बताई गई। श्री शर्मा का बचाव बयान बिना कार्य कराये ही रूपांकित सेक्सन का अनियमित भुगतान को लेकर दिया है। जबकि उनपर आरोप है कि बिना रूपांकित सेक्सन में कार्य कराये ही संवेदक को भुगतान किया गया है। श्री शर्मा पर लगे आरोप को श्री शर्मा अपने बचाव बयान में स्वीकार करते हुए कहते है कि उनके पूर्वववर्ती अभियंताओं द्वारा भी इसी तरह भुगतान किया गया। यही प्रक्रिया उनके द्वारा भी अपनायी गयी है। यह नियमानुकूल नहीं है। उन्हें चाहिए था कि वे इस प्रक्रिया/अनियमितता को रोकते तथा संवेदक के द्वारा कम से कम पूर्ण सेक्सन में हर लेयर में कार्य करने पर ही भुगतान करते। अभियंता प्रमुख द्वारा दिनांक 13.08.14 को समीक्षात्मक बैठक की कार्यवाही पत्रांक-950 दिनांक 29.08.14 (बचाव बयान पत्रांक-365 दिनांक 02.11.16 का अनुलग्नक परि0-P) की सामान्य निर्देश की कंडिका-2 में कार्यपालक अभियंता को निदेश दिया गया था कि मिट्‌टी कार्य में सुधरात्मक कार्य के बाद ही मिट्‌टी कार्य भुगतान किया जाय, परन्तु श्री शर्मा द्वारा इसका अनुपालन नहीं किया गया तथा संवेदक को भुगतान किया गया। श्री शर्मा, कार्यपालक अभियंता अपने बचाव बयान में स्पष्ट करते है कि संवेदक द्वारा 1ः1.5 स्लोप में कार्य किया गया तथा अन्य पारामीटर का कार्य रूपांकित नक्सा के अनुसार हुआ है। यह उड़नदस्ता के जांच प्रतिवेदन से भी स्पष्ट होता है। ऐसी स्थिति में 1ः1ः5 के स्लोप को 1ः2 के स्लोप में कैनाल बैंक को लाने हेतु अतिरिक्त मिट्‌टी का कार्य कराने पर वांछित Compaction Efficiency प्राप्त नहीं हो सकता तथा वर्ष के कारण अत्याधिक बड़े-बडे रेन कट्‌स हो जाते है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए ही कुछ Over Section में कार्य करा कर नियमानुसार कम्पैक्शन किया जाता है तथा इसके बाद रूपांकित सेक्सन में Slope की Trimming की जाती है। गुण नियंत्रण मैनुअल-1990 की कंडिका 5.03(4) (ann-2)में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रत्येक लेयर रूपांकित सेक्सन की सीमा से कम से कम 1 फीट अधिक होना चाहिए। इस प्रकार श्री शर्मा द्वारा मिट्‌टी कार्य मद में पूर्ण सेक्सन में कार्य कराये बगैर ही संवेदक को अनियमित भुगतान किया गया। अतः श्री शर्मा के विरूद्ध आरोप-1 प्रमाणित होता है। आरोप सं0 2-इस आरोप के विरूद्ध श्री शर्मा द्वारा दिये गये बचाव बयान में भी आरोप को स्वीकार किया गया है कि वर्ष 14-15 तक चालू विपत्र से सेटलमेंट मद में उनके द्वारा कटौती नहीं की गई थी। इसके लिए उनके द्वारा कारण बताया गया कि यदि विपत्र से आवश्यक कटौतियां सेटलमेंट सहित की जाती तो संवेदक को कम भुगतान होता, Cash Flow एवं कार्य की प्रगति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता, प्रगति की निरंतरता बरकरार नहीं रहती, आवंटन राशि प्रत्यार्पित होती है। इनका यह भी कहना है कि चालू विपत्र से भुगतान अग्रिम भुगतान (Advance payment) होता है। यदि कोई कटौतियां रह जाती है तो उसे अंतिम विपत्र में सामंजस्य कर लिये जाने का अवसर होता है। श्री शर्मा द्वारा स्थानांतरण के फलस्वरूप अपना प्रभार दिनांक 28.07.15 को अपने प्रतिस्थानी को सौंप दिया जिसके फलस्वरूप उनका कहना है कि अभियंता प्रमुख के पत्रांक-1069 दिनांक 05.08.15 (बचाव बयान पत्रांक-365 दिनांक 02.11.16) का अनुलग्नक परि0-W) के निदेश के आलोक में प्रतिस्थानी कार्यपालक अभियंता अंतिम विपत्र से शेष सभी कटौतियां कर सकते है। इसके अतिरिक्त उनके द्वारा अपने उपर लगे आरोप के बचाव में तथ्यपरक नियमानुकूल तथ्य से ज्यादा अपने पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता एवं प्रतिस्थानी कार्यपालक अभियंता पर दोषरोपन कर अपना बचाव करने का असफल प्रयास किया गया।90 91 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 की जाती है। साथ ही रूपांकण कसौटी 1990 के कंडिका 5.03(4) (अन॰-2) में प्रत्येक लेयर रूपांकित सेक्सन की सीमा से कम से कम 1 फीट अधिक कराने का प्रावधान है के आधार पर आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री शर्मा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में कहा गया है कि कार्य 2ः1 में कराया गया था। परन्तु जाँच की तिथियों में उक्त स्लोप 1ः1.5 ही पाया गया। उड़नदस्ता द्वारा मात्र एक बिन्दु 761.85 पर स्थलीय जाँच दि॰ 07.04.15 को किया गया था। जबकि विभागीय निदेश के आलोक में सुधार हेतु निर्धारित तिथि 25.04.15 तक रूपांकित सेक्सन के अनुरूप उचित प्रोफाईल में कार्य करा दिया गया है। परन्तु उक्त के संदर्भ में श्री शर्मा द्वारा कोई सम्पुष्ट साक्ष्य नहीं दिया गया है मात्र कहा गया है कि जाँचित बिन्दु 761.85 के U/S एवं D/S में क्रमशः 761.0 से 762.0 के बीच रूपांकित सेक्सन के अनुसार कुल 4968.00 घन मी॰ मिट्‌टी का प्रावधान है जिसके विरूद्ध कुल 4762.00 घन मी॰ कार्य कराया गया था अर्थात कुल 205.74 घन मी॰ मिट्‌टी कार्य कराया जाना शेष था। अतः अतिरिक्त मिट्‌टी कार्य का भुगतान नहीं किया गया हैं। इस कथन की पुष्टि से संबंधित कोई साक्ष्य नहीं दिये जाने के आलोक में श्री शर्मा के विरूद्ध आरोप-1 के संदर्भ में दिये गये बचाव बयान को स्वीकार योग्य नहीं है एवं आरोप प्रमाणित होता है। आरोप-2 :- जो एकरारनामा के साथ संलग्न Techincal Specification के कंडिका 10.2(B) के अनुसार नहर बाँध में मिट्‌टी भराई कार्य में सेटलमेंट काटकर भुगतान किया जाना है, का उल्लंघन करते हुए बिना सेटलमेंट घटाये ही मिट्‌टी भराई कार्य का भुगतान करने के कारण संवेदक को अधिक भुगतान होने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने श्री शर्मा का कथन कि यदि विपत्र से आवश्यक कटौतिया सेटलमेंट सहित की जाती तो संवेदक को कम भुगतान होता, Cash flow एवं कार्य की प्रगति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता, प्रगति की निरंतरता बरकरार नहीं रहती एवं आवंटन प्रत्यापित होता। अभियंता प्रमुख के पत्रांक 1869 दि॰ 05.08.15 के निदेश के आलोक में स्वीकार योग्य मानते हुए संवेदक को अतिरिक्त लाभ पहुँचाया जाना माना गया है एवं कहा गया है कि अनियमितता उजागर होने तथा उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन में अनुशंसा कर अभियंता प्रमुख को पत्रांक 1069 दि॰ 05.08.15 से सेटलमेंट की कटौती का आदेश देना पड़ा। जो कार्य के प्रति घोर अनियमितता है जिसे कार्य की प्रगति, आवंटन व्ययगत आदि के नाम पर जायज ठहराने का प्रयास किया जाना एकरारनामा का उल्लंघन है के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। श्री शर्मा द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के जबाव में इस आरोप के संदर्भ में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। कहा गया है कि कार्यहित में Cash flow को बनाये रखने एवं कार्य की समानुपातिक प्रगति को देखते हुए चालू विपत्र द्वारा पूर्व के कार्यपालक अभियंता के द्वारा किये गये भुगतान के तरह ही भुगतान किया गया है। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि एकारारनामा के साथ संलग्न Technical Specification के कंडिका 10.2(B) के अनुसार मिट्‌टी भराई कार्य में सेटलमेंट की कटौती नियमानुसार करने के पश्चात ही भुगतान किया जाना है। यहाँ तक कि अभियंता प्रमुख के दिनांक 13.08.14 को किये गये समीक्षात्मक बैठक की कार्यवाही के कंडिका 2 के अनुसार मिट्‌टी कार्य में सुधारात्मक कार्य कराने के बाद ही भुगतान करने का निदेश है। इसके बावजूद बिना सेटलमेंट की कटौती किये ही संवेदक को लाभ पहुँचाने हेतु भुगतान की कारवाई किया गया है जो नियम एवं एकरारनामा के विपरीत है। अतएव इनका बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है एवं आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत वर्णित समीक्षा के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री अनिल कुमार शर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध आरोप-1 एवं 2 यथा बाँध के C/S Slope में बिना रूपांकित सेक्सन (1ः2) में कार्य कराये ही अनियमित भुगतान करने तथा विपत्र से नियमानुसार एवं एकारारनामा के अनुरूप बिना सेटलमेंट की कटौती किये ही अधिकाई भुगतान करने का आरोप प्रमाणित होता है एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया।

''पन्द्रह प्रतिशत (15%) पेंशन की कटौती पांच वर्षों के लिए''। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में प्रस्तावित दण्ड पर विभागीय पत्रांक 531 दिनांक 18.03.2020 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना से परामर्श की माँग की गई।

उक्त के आलोक में बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना द्वारा अपने पत्रांक-404 दिनांक 08.06..20 द्वारा श्री शर्मा, तत0 कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर अपनी सहमति प्रदान किया गया। अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त वर्णित निर्णय के आलोक में श्री अनिल कुमार शर्मा, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता, 301, ममता अपॉटमेंट, शिवपुरी, पो0-शास्त्रीनगर, पटना-800023 के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

''पन्द्रह प्रतिशत (15%) पेंशन की कटौती पांच वर्षों के लिए''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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25 जून 2020

सं॰ 22नि0सि0(सिवान)-11-03/2011-922--श्री हरेन्द्र प्रसाद सिंह (ID-3883), तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, छपरा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध सारण बांध मगरपाल छड़की सड़क निर्माण कार्य से संबंधित लेखा समीक्षा (दिसम्बर 2010) द्वारा पायी गयी विसंगतियां तथा उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन में पायी गयी त्रुटियों के आलोक में आरोप पत्र (प्रपत्र-'क') गठित किया गया। श्री सिंह के विरूद्ध गठित आरोप पत्र पर उनसे प्राप्त स्पष्टीकरण केबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 92 समीक्षोपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-356 दिनांक 16.02.2018 द्वारा उनके विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी, जिसमें डॉ0 राजीव कुमार, संयुक्त सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया।

संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-145 दिनांक 17.07.2018 से श्री सिंह के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही का जांच प्रतिवेदन प्राप्त हुआ जिसमें संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध आरोप आंशिक रूप से प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया।

श्री सिंह के विरूद्ध गठित आरोप एवं संचालन पदाधिकारी का जांच प्रतिवेदन में की गई समीक्षा निम्नवत है :-

आरोप :-एकरारनामा सं0-01SBD/07-08 के तहत टूल्स एवं प्लांट मद में SBD के कंडिका-10(बी) के उपकंडिका (iii) में निहित प्रावधान का उल्लंघन कर संवेदक द्वारा उपलब्ध कराये गये बैंक गारंटी के आधार पर कुल 87.10 लाख का अग्रिम का विपत्र आपके द्वारा तैयार कर अनियमित भुगतान में सहयोग करने हेतु उपस्थापित किया गया। जबकि उक्त प्रावधान के अनुसार कार्य स्थल पर संवेदक द्वारा लाये गये टूल्स एवं प्लांट के विरूद्ध अग्रिम दिया जाना है। फलतः आपके उक्त कृत्य के कारण सरकार को राशि की क्षति होना परिलक्षित है, जिसके लिए आप दोषी हैं। जांच पदाधिकारी की समीक्षा :-सारण नहर प्रमंडल, छपरा के अधीन नाबार्ड सम्पोषित तटबंध सड़क योजनान्तर्गत मगरपाल छड़की के कि0मी0 0.00 से 16.0 एवं सारण तटबंध के कि0मी0 20.37 से 35.26 कि0मी0 के बीच उच्चीकरण, सुदृढ़ीकरण एवं शीर्ष पर पक्की सड़क निर्माण कार्य का एस0बी0डी0 एकरारनामा आर0पी0 राय इस्टेट प्रा0 लि0, मैरवा रोड, सिवान के साथ किया गया। इसका एकरारनामा सं0-01SBD/07-08 दिनांक 08.02.2008 प्राक्कलित राशि 1742.01386 लाख रू0 एवं कार्य समाप्ति की तिथि 31.05.2009 थी। उक्त कार्य में श्री हरेन्द्र प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, छपरा के विरूद्ध आरोप मशीन अग्रिम से संबंधित है। SBD के कंडिका-10(बी) (iii) के अनुसार संवेदक द्वारा स्थल पर लाये गये संयंत्र एवं मशीनरी के विरूद्ध एकरारित राशि का अधिकतम 5 प्रतिशत अग्रिम के रूप में भुगतान किये जाने का प्रावधान है। संवेदक द्वारा मशीन अग्रिम के लिए क्रमशः रू0 27,10,100/-, 30,00,000/- एवं 30,00,000/- तथा मोबिलाईजेशन अग्रिम के लिए 35,00,000/- 35,00,000/-35,00,000/-, 35,00,000/- एवं रू0 34,20,139/- दिनांक 07.02.2008 को निर्गत गारंटी समर्पित किया गया। शाखा प्रबंधक, सेन्ट्र्रल बैंक ऑफ इंडिया, अम्बारा चौक, छपरा के पत्रांक-BM/BG/ 2007-08/94 दिनांक 13.03.2018 द्वारा उपरोक्त बैंक गारंटी के निर्गत किये जाने की सम्पुष्टि की गयी। तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, छपरा के पत्रांक-486 दिनांक 18.03.2018 द्वारा तत्कालीन सहायक अभियंता श्री सिंह को एकरारनामा की राशि के 5 प्रतिशत तक अग्रिम का विपत्र यंत्र-संयंत्र की मौजूदगी के प्रमाण पत्र के साथ समर्पित करने का निदेश दिया गया। सहायक अभियंता द्वारा पत्र पर ही अग्रिम का विपत्र समर्पित करने का निर्देश कनीय अभियंता को दिया गया। तत्पश्चात दिनांक 18.03.2018 को सत्यापित बैंक गारंटी के विरूद्ध कनीय अभियंता द्वारा तैयार किये गये मशीन अग्रिम के लिए 87.10 लाख के विपत्र को अनुशंसा के साथ सहायक अभियंता द्वारा कार्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया एवं कार्यपालक अभियंता द्वारा विपत्र को उसी दिन पारित कर दिया गया। कार्यपालक अभियंता द्वारा यंत्र-संयंत्र की मौजूदगी के प्रमाण पत्र के साथ विपत्र मांगे जाने के बावजूद बिना प्रमाण पत्र के विपत्र के पारित किये जाने से कार्यों की शुरूआती प्रगति एवं स्थल पर कार्यों की प्रगति के लिए मौजूद यंत्र-संयंत्र से संतुष्ट होना माना जा सकता है। तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, सिवान द्वारा दिनांक 09.08.2010 को निर्गत तार्किक आदेश में कहा गया है कि विभागीय पैसे से क्रय किये गये यंत्र-संयंत्र को कार्य स्थल से हटाकर संवेदक द्वारा कार्य को बन्द कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि संवेदक को दिनांक 26.02.2018 को मोबिलाईजेशन अग्रिम के रूप में 150.00 लाख रू0 एवं दिनांक 18.03.2018 को मोबिलाईजेशन अग्रिम के रूप में शेष 24.20139 लाख तथा मशीन अग्रिम के रूप में 87.10लाख रू0 दिया गया था। अतः मुख्य अभियंता के तार्किक आदेश से स्थल पर यंत्र-संयंत्र का होना परिलक्षित होता है। संलग्न अभिलेख के अनुसार 46632.61 घनमीटर मिट्‌टी का कार्य राजस्थानी ट्र्रैक्टर से कराया गया है। 990 वर्गमीटर प्रारंभिक रॉलिंग का कार्य भी किया गया है। इससे मशीन का कार्य में उपयोग किया जाना परिलक्षित है। लेकिन आरोपित पदाधिकारी श्री सिंह द्वारा SBD के कंडिका-10 (बी)(iii) के अनुसार स्थल पर उपलब्ध यंत्र-संयंत्र का Valuation तथा बैंक गारंटी की तुलना करते हुए मशीन अग्रिम का भुगतान किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया है। यह एक प्रक्रियाधीन त्रुटि है। कार्य में गति प्रदान करने के लिए ही मोबिलाईजेशन एवं मशीन अग्रिम का प्रावधान एस0बी0डी0 की कंडिकाओं के तहत किया गया है। अतः सहायक अभियंता श्री सिंह द्वारा बिना यंत्र-संयंत्र की मौजूदगी के प्रमाण पत्र के साथ अनुशंसित किया गया मशीन अग्रिम का विपत्र कार्य में प्रगति प्रदान करने के लिए कार्यहित में लिया गया निर्णय माना जा सकता है। संवेदक द्वारा दिये गये बैंक गारंटी का सत्यापन शाखा प्रबंधक द्वारा किये जाने के बावजूद बैंक गारंटी फर्जी निकल गया। बैंक गारंटी फर्जी नहीं होता या संवेदक द्वारा कार्य को पूर्ण कर लिया जाता तो दिये गये अग्रिम की पूर्ण वसूली संवेदक के विपत्रों से कर ली जाती, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया। उड़नदस्ता के जांच प्रतिवेदन के कंडिका 4.50 के अनुसार मात्र बैंक ऑफ बड़ौदा, फ्रेजर रोड शाखा पटना द्वारा दिनांक 02.01.2009 को निर्गत किये गये 87.105 लाख रूपये के बैंक गारंटी को ही भुनाकर सरकारी खजाने में जमा किया जा सका। इस प्रकार संवेदक के दिये गये पूर्ण अग्रिम की वसूली नहीं हो सकी। उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन की कंडिका 4.60 के अनुसार बैंक गारंटी के फर्जी निकलने के मामले में कार्यपालक अभियंता ने दोषियों के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। श्री हरेन्द्र प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, छपरा द्वारा एकरारनामा सं0-1SBD/07- 08 के तहत टुल्स एवं प्लांट मद में SBD के कंडिका-10 (बी) (iii) में निहित प्रावधान का उल्लंघन कर संवेदक द्वारा उपलब्ध93 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 कराये गये बैंक गारंटी के आधार पर कुल 87.10 लाख का अग्रिम का विपत्र तैयार कर अनियमित भुगतान करने हेतु उपस्थापित किया जाना न होकर एक प्रक्रियात्मक त्रुटि परिलक्षित है। बैंक गारंटी के फर्जी निकलने से सरकारी राजस्व की क्षति से बैंक एवं संवेदक की भूमिका परिलक्षित है। निष्कर्ष :- श्री सिंह के विरूद्ध आरोप आंशिक रूप से प्रमाणित होता है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन पर श्री सिंह से विभागीय पत्रांक-1745 दिनांक 13.08.2018 द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गयी। जिसके क्रम में श्री सिंह के पत्रांक-1447 दिनांक 14.12.2018 से द्वितीय कारण पृच्छा का प्रत्युत्तर (अभ्यावेदन) प्राप्त हुआ, जिसमें उनके द्वारा मुख्य रूप से निम्नांकित तथ्यों का उल्लेख करते हुए आंशिक आरोप से मुक्त करने का अनुरोध किया गया :- मामला वित्तीय अनियमितता का न होकर मात्र प्रक्रियात्मक त्रुटि से संबंधित है। कार्यों की शुरूआती प्रगति एवं स्थल पर कार्यों की प्रगति के लिये मौजूद यंत्र-संयंत्र की स्थल पर उनके द्वारा एवं कार्यपालक अभियंता के द्वारा निरीक्षण की सम्पुष्टि के पश्चात कनीय अभियंता के विपत्र पर अनुशंसा की गयी एवं कार्यपालक अभियंता द्वारा उसी दिन संतुष्ट होने के कारण यंत्र-संयंत्र की मौजूदगी के प्रमाण पत्र के बिना ही उनके द्वारा उसी दिन विपत्र पारित कर दिया गया। यंत्र-संयंत्र की मौजूदगी एवं प्रर्याप्त बैंक गारंटी जो तत्कालीन शाखा प्रबंधक द्वारा सत्यापित की गयी थी एवं कार्यो की शुरूआती प्रगति एवं कार्यों में तेजी लाने के मकसद से यंत्र-संयंत्र अग्रिम दी गयी थी परन्तु अग्रिम लेने के पश्चात संवेदक द्वारा कार्यों में अक्रमण्यता की गयी जिस कारण उनके द्वारा भी कार्य धीमा करने एवं गुणवतापूर्वक कार्य नहीं करने का पत्र कार्यपालक अभियंता को दिया गया था। वस्तुतः अगर संवेदक के द्वारा कार्य कार्यक्रम के अनुसार कर दिया गया होता तो स्वभाविक रूप से T&P मदों के अग्रिम की वापसी हो गयी होती। यह विशेष परिस्थिति में संवेदक के कार्य नहीं करने के कारण उत्पन्न हुई। दिये गये T&P अग्रिम की वसूली पूर्व में ही कर ली गयी है। उड़नदस्ता अंचल के पत्रांक-29 दिनांक 27.08.11 के पृ0 4 के 4.50 पर अंकित है कि क्रमांक 11 पर दिया गया बैंक ऑफ बड़ौदा, फ्रेजर रोड शाखा, पटना का बैंक गारंटी सही पाया गया। जिसे कार्यपालक अभियंता, सारण प्रमंडल, छपरा के द्वारा इनभोकेट पर सरकारी खजाने में जमा करा दिया गया है। मुख्य अभियंता, सिवान द्वारा निर्गत तार्किक आदेश स0-2280 दिनांक 09.08.10 में वर्णित है कि विभागीय पैसे से लाये गये यंत्र-संयंत्र को कार्यस्थल से हटाकर संवेदक द्वारा कार्य बन्द कर दिया गया है। श्री सिंह के विरूद्ध गठित आरोप, संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन एवं उनके द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा प्रत्युत्तर/लिखित अभिकथन की विभागीय स्तर पर समीक्षा की गयी जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :- संचालन पदाधिकारी ने मुख्य अभियंता के तार्किक आदेश (दिनांक 09.08.10 को निर्गत) में कहा गया है कि विभागीय पैसे से क्रय किये गये यंत्र-संयंत्र को कार्य स्थल से हटाकर संवेदक द्वारा कार्य बन्द कर दिया गया, के आलोक में माना है कि मशीन का कार्य में उपयोग किया जाना परिलक्षित है लेकिन श्री सिंह द्वारा SBD के कंडिका 10 (b)(iii) के अनुसार स्थल पर उपलब्ध यंत्र-संयंत्र का Valuation तथा बैंक गारंटी की तुलना करते हुए मशीन अग्रिम का भुगतान होना चाहिए था, जो नहीं किया गया। जिसे प्रक्रियात्मक त्रुटि माना गया है तथा संचालन पदाधिकारी द्वारा यह भी कहा गया है कि संवेदक द्वारा दिये गये बैंक गारंटी फर्जी नहीं होता या संवेदक द्वारा कार्य पूर्ण कर लिया जाता तो दिये गये अग्रिम की पूर्ण वसूली विपत्रों से कर ली जाती लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका। उक्त तथ्यों के आलोक में संचालन पदाधिकारी श्री सिंह के विरूद्ध गठित आरोप को आंशिक प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। उल्लेखनीय है कि SBD के कंडिका 10 (b)(iii) के अनुसार संवेदक के द्वारा स्थल पर लाये गये यंत्र-संयंत्र के विरूद्ध अधिकतम एकरारित राशि के 5 प्रतिशत अग्रिम के रूप में भुगतान करने का प्रावधान है। प्रस्तुत मामले में संवेदक द्वारा यंत्र-संयंत्र मद में अग्रिम भुगतान हेतु दिनांक 07.02.08 को कुल 87.10 लाख का बैंक गारंटी आवेदन के साथ कार्यपालक अभियंता को दिया गया तथा कार्यपालक अभियंता ने अपने पत्रांक-486 दिनांक 18.03.08 से श्री हरेन्द्र प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता को एकरारनामा की राशि का 5 प्रतिशत तक अग्रिम का विपत्र स्थल पर यंत्र-संयंत्र की मौजूदगी का प्रमाण पत्र के साथ समर्पित करने का निदेश दिया गया। जिसके अनुपालन में आरोपी द्वारा अपने पत्रांक-13 दिनांक 18.03.08 से कनीय अभियंता, श्री जितलाल मंडल को विपत्र तैयार कर प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया। तत्पश्चात दिनांक 18.03.08 को बैंक गांरटी की राशि के समतुल्य कुल 87.10 लाख का अग्रिम भुगतान हेतु विपत्र की अनुशंसा की गयी। श्री सिंह द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो पूर्व में उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया था। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री सिंह द्वारा स्थल पर उपलब्ध यंत्र संयंत्र का आकलन किये बिना ही एवं SBD के कंडिका-10 (b) (iii) के विपरीत कार्यपालक अभियंता के निदेश का उल्लंघन करते हुए बिना प्रमाण पत्र अंकित किये ही मात्र संवेदक द्वारा उपलब्ध कराये गये बैंक गांरटी को ही प्रमाणक मान कर कनीय अभियंता द्वारा तैयार किये गये विपत्र को भुगतान हेतु अनुशंसा किया जाना परिलक्षित होता है। अतएव श्री सिंह का द्वितीय कारण पृच्छा स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा उक्त तथ्यों के आलोक में श्री सिंह द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा प्रत्युत्तर/अभ्यावेदन को स्वीकार्य योग्य नहीं पाते हुए इसे अस्वीकृत किया गया तथा प्रमाणित पाये गये आरोप के लिए ''कालमान वेतनमान में दो वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतन वृद्धि देय नहीं होगी'' का दंड विनिश्चित किया गया।94 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा विनिश्चित उक्त दंड प्रस्ताव पर विभागीय पत्रांक-613 दिनांक 28.04.2020 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की मांग की गयी। आयोग के पत्रांक-536, दिनांक 16.06.20 के द्वारा उक्त दंड प्रस्ताव में अपनी सहमति व्यक्त की गई। अनुशासनिक प्राधिकारी के निर्णयानुसार श्री हरेन्द्र प्रसाद सिंह (ID-3883) तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, छपरा सम्प्रति कार्यपालक अभियंता को निम्न दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता हैः-

''कालमान वेतनमान में दो वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतन वृद्धि देय नहीं होगी''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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11 जून 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुक0)सम0-19-19/2018-788--वर्ष 2017 बाढ़ के दौरान बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, झंझारपुर अंतर्गत कमला बलान नदी के पश्चिमी तटबंध में रिसाव होने की स्थिति में स्थल से अनुपस्थित रहने एवं जिला पदाधिकारी, दरभंगा एवं पुलिस अधीक्षक, दरभंगा द्वारा खोजबीन करने पर कार्यस्थल से अनुपस्थित रहने, कर्तव्य के प्रति लापरवाही एवं उदासीनता बरतने, विभागीय निदेश के बावजूद आक्रम्य स्थलों पर बाढ़ सुरक्षा हेतु सामग्रियों का भंडारण नही करने, अपात स्थिति में मानव बल उपलब्धता सुनिश्चित नहीं करने जैसे आरोपों के लिए श्री बिजेन्द्र कुमार राम (आई0डी0-3871), तत्कालीन मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर को विभागीय अधिसूचना सं0-1615 दिनांक-14.09. 2017 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1677 दिनांक-20.09.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री राम के विरूद्ध गठित सभी आरोप प्रमाणित पाया गया। प्रमाणित आरोपों के संदर्भ में श्री राम से विभागीय पत्रांक-1031 दिनांक-11.05.2018 द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की माँग की गयी। तत्पश्चात श्री राम द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का उार समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई एवं समीक्षोपरांत श्री राम के द्वितीय कारण पृच्छा को अस्वीकार योग्य पाया गया। इस प्रकार श्री राम के विरूद्ध प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय अधिसूचना सं0-1539 दिनांक-19.07.2018 द्वारा ''सेवा से बर्खास्तगी'' का दण्ड अधिरोपित किया गया। उक्त अधिरोपित दण्ड के विरूद्ध श्री राम द्वारा माननीय पटना उच्च न्यायालय में सी0डब्लूजे0सी0 सं0-13190/2018 दायर किया गया जिसमें दिनांक 05.02.2020 को पारित न्यायादेश का कार्यकारी अंश निम्नवत्‌ है :- "In view of the aforementioned facts and circumstances and having come to the considered opinion that action of the respondents in recommending the termination of the petitioner is in gross violation of the Rules and also the principle of natural justice, this Court is but wholly inclined to quash the impugned order of punishment whereby the petitioner's services have been terminated vide Memo No. 1539 The aforementioned orders stand quashed and the petioner is directed to be reinstated in service. The writ application is allowed with liberty to the disciplinary authority to proceed from the stage where the action impugned has been challenged i.e, after the filing of reply to the show-cause and after due consideration of all facts and circumstances and after giving clear-cut findings on the grounds furnished by the petitioner, the authorities shall pass fresh orders in accordance with law." माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश के आलोक में श्री राम द्वारा समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा उार) की समीक्षा की गयी। श्री राम ने अपने अभ्यावेदन (पत्रांक-11 दिनांक-08.06.2018) में निम्न तथ्यों का उल्लेख किया है :- आरोप संख्या (1) के संबंध में आरोपी पदाधिकारी का बयान :-

(i) मैं दिनांक 12.08.2017 को रात में कमला बलान R/E के 73.00 कि0मी0 कैम्प कार्यालय में रात्रि में रहकर ही कार्यो के तटबंधों की देख-रेख कर रहा था। दिनांक 13.08.2017 को प्रातः 7.30 AM तक वहॉ की स्थिति सामान्य थी। निरीक्षण के क्रम में अधीक्षण अभियंता श्री देवेन्द्र झा के साथ बाएॅ तटबंध के लिए प्रस्थानकिया, वहां करीब 10AM बजे तक तटबंध निरीक्षण किया गया। स्थिति नियंत्रण में थी पर तटबंध पर दवाब था। तटबंध पर जल स्तर काफी उपर तक आ चुका था। पुनः 11.30 AM बजे दायें तटबंध पर आ गया। फिर करीब 12.30 PM बजे बायें तटबंध पर पहुॅचा। वहॉ कई जगहों पर पानी रिसाव हो रहा था। मैं स्वयं रिसाव के मरम्मति कार्य की निगरानी कर रहा था।

(ii) शाम करीब 5.00 बजे विभागीय निदेश मिला कि दायॉ तटबंध पर पहुॅचे। इसके अनुपालन में दायॉ तटबंध के लिए प्रस्थान किया। पर रास्ते में आसमॉ गॉव के पास ग्रामीणों के द्वारा मेरी गाड़ी को रोक दिया गया। लोग काफी अक्रामक थे एवं दुव्र्यवहार पर उतारु थे। तुरन्त इसकी जानकारी माननीय मंत्री महोदय को दी गयी। निदेशानुसार फिर डी0एम0 से बात किया गया। मुझे एस0डी0एम0 बिरौल से बात करने को कहा गया। अन्ततः काफी मसक्कत के बाद95 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 असमॉ गॉव के ग्रामीणों को समझा बुझाकर रसियारी के 73 कि0मी0 के लिए प्रस्थान किया। इस तरह जन प्रतिरोध के चलते वहॉ पहुॅचते पहुॅचते लगभग 8.00 PM बजे गया। इस समय तक तटबंध करीव पूरी ऊॅचाई से भर चुका था यानि नदीं में जलस्तर तटबंध के फॉरमेशन लेवल के आसपास पहुॅचा गया था ।

(iii) इसके समर्थन में अपने बचाव बयान दिनांक 17.11.2017 में मैेने अपने सरकारी एवं निजी मोबाईल का सी0डी0आर0 संलग्न किया है जिससे स्थिति सुस्पष्ट हो जाती है। इससे सत्यापित हो जाता है कि मैं बिल्कुल अपने कर्त्तव्य पर उपस्थित था। यह महज संयोग माना जा सकता है कि जब डी0एम0/एस0डी0एम0 दायें तटबंध पर थे उस समय विभागीय निदेशासार मैं बायें तटबंध पर हो रहे दबाव के कार्यो के निरीक्षण एवं कार्यान्यवन में संलग्न रहा, जिससे कि तटबंध को बचाया जा सका ।

आरोप संख्या (2) के संबंध में आरोपी पदाधिकारी का बयान :- (i) कार्य स्थल चूॅकि आक्राम्य था तदनुसार सारी व्यवस्था की गयी थी। भंडारित सामग्रियों की सूची एवं मात्रा विभाग में पूर्व में उपलब्ध करायी गयी थी एव विभाग के द्वारा कोई प्रतिकूल टिप्पणी प्रतिवेदित नहीं थी ।

(ii) जब पानी तटबंध पर ओभरफ्लो की स्थिति में होता है तो कोई मजदूर/संवेदक सुरक्षा कारणों से काम करने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं होते हैं। उस परिस्थिति में भी मजदूरों/संवेदक को समझा बुझाकर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य को सुचारु रुप से चालू रखा गया, जिसकी सम्पुष्टि जिला पदाधिकारी के पत्र जो कि आरोप पत्र का मुख्य साक्ष्य है, से भी होती है, जिसके संबंध में मैनें पत्र के अग्रभाग में स्थिति स्पष्ट की है ।

(iii) बाढ़ की स्थिति प्रलंयकारी थी, अतएव उस परिस्थति में कोई भी आकलित मात्रा कम पड़ जाती है। फिर भी चुनौती का साहस के साथ सामना किया गया एवं बगल के अन्य स्थल से सामग्रियों की ढुलाई सुनिश्चित करायी गयी, जिसकी सम्पुष्टि प्रमंडल स्तरीय कागजातों से भी की जा सकती है। बाढ़ संघर्षात्मक कार्य को गति में रखा गया। लगातार हो रही वर्षा के बीच ढुलाई में भी भिन्न-भिन्न तरह की बाधा थी पर सभी कार्य को तत्परता से सम्पन्न किया गया। परन्तु उक्त प्राकृतिक आपदा जिसपर किसी स्तर से कारवाई की जानी संभव नहीं थी, फिर भी अथक प्रयास के बाद भी सफलीभूत नहीं हो पाया ।

आरोप संख्या (3) के संबंध में आरोपी पदाधिकारी का बयान :- (i) यह आरोप साक्ष्य विहीन है, क्योंकि मेरे उपर लगाए गए आरोप का मूल साक्ष्य जिला पदाधिकारी का पत्र 2749 दिनांक 14.07.2017 है, जिसमें यह कहीं उल्लेखित नहीं है कि मेरे द्वारा किसी दिशा-निर्देश की अवहेलना की गयी है, जिससे कि मैं अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकता ।

(ii) मेरे द्वारा विभाग के स्तर से निर्गत बाढ प्रबंधन निर्देशिका एवं मुख्यालय द्वारा दिये गये निर्देशों के आलोक में कार्रवाई की पूर्ण दृढता एवं निष्ठापूर्वक की गयी थी जिसमें किसी प्रकार कोई कोताही बरती नहीं गयी थी ।

श्री राम द्वारा समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) एवं उपलब्ध विभागीय अभिलेखों की विभागीय समीक्षा में निम्न तथ्य पाया गया :-

श्री राम के विरुद्ध आरोप पत्र के गठन का आधार जिला पदाधिकारी दरभंगा का पत्र है। इस पत्र में अंकित है कि निरीक्षण के क्रम में मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग समस्तीपुर अनुपस्थित पाए गए। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उनके द्वारा वरीय पुलिस अधीक्षक, दरभंगा के साथ 3.00 बजे अपराह्र्‌ में तटबंध का निरीक्षण किए। उस समय भी मुख्य अभियंता अनुपस्थित पाए गए। संध्या 6.30 बजे उनकी प्रतीक्षा की गई परन्तु वे उपस्थित नहीं हुए। बाद में रात्रि 8.00 बजे वहॉ पहुॅचे।

जिला पदाधिकारी के पत्र के आधार पर श्री राम के विरुद्ध आरोप गठित किया गया। कार्य क्षेत्र से अपनी अनुपस्थिति के संबंध में श्री राम का कहना है कि वे दिनांक 12.08.17 की रात में कमला वलान R/E 73.00 K.M.Camp कार्य में रात्रि में रह कर ही तटबंध की देख रेख कर रहे थे। दिनांक 13.08.17 को प्रातः 7.30 बजे तक वहॉ की स्थिति सामान्य थी। निरीक्षण के क्रम में अधीक्षण अभियंता श्री देवेन्द्र झा के साथ वाये तटबंध के लिए प्रस्थान किया। वहॉ करीब 10.00 A.M. तक तटबंध निरीक्षण किया गया। फिर 12.30 A.M. बजे वायॉ तटबंध पर पहुॅचे जहॉ कई जगहों पर पानी का रिसाब हो रहा था और वह स्वयं रिसाव तथा मरम्मति कार्य की निगरानी कर रहे थे। शाम करीब 5.00 बजे विभागीय निदेश प्राप्त हुआ कि दायॉ तटबंध पर पहुॅचे। इसके अनुपालन में वे दायॉ तटबंध के लिए प्रस्थान किये पर रास्ते में असमा गॉव के साथ ग्रामीणों के द्वारा उनकी गाड़ी को रोक लिया गया तथा उनके साथ वे लोग दुव्र्यवहार पर उतारु हो गये। इसकी सूचना उन्होंने माननीय मंत्री महोदय तथा जिला पदाधिकारी को दी। काफी मसक्कत के बाद असमा गॉव के ग्रामीणों को समझा बुझाकर रसियारी के 73.00 कि0 मि0 के लिए प्रस्थान किये। इसलिए वहॉ पहुॅचते-पहुॅचते लगभग 8 P.M. बज गया। अपने कथन के समर्थन में श्री राम ने सरकारी एवं निजी मोबाईल का C.D.R. संलग्न किया है। संलग्न C.D.R. के अवलोकन से प्रतीत होता है कि श्री राम दिनांक 12.08.17 एवं 13.08.17 को मधुबनी एवं दरभंगा जिले के विभिन्न स्थलों पर उपस्थित रहे हैं इसलिए अपने कार्यक्षेत्र से अनुपस्थित रहने का आरोप श्री राम पर प्रमाणित नहीं होता है।

दूसरे आरोप के संबंध में श्री राम का कहना है कि चूॅकि कार्य स्थल आक्राम्य था इसलिए पहले से ही सारी व्यवस्था की गई थी। भण्डारण सामग्रियों की सूचि एवं मात्रा विभाग को पूर्व में ही उपलब्ध करा दी गई थी। विभाग द्वारा किसी प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणी प्रतिवेदित नहीं थी। चॅूकि बाढ की स्थिति काफी भयावह थी इसलिए इस परिस्थिति में ऑकलित मात्रा का कम पडना स्वाभाविक है। फिर भी युद्वस्तर पर कार्य कराया गया तथा बगल के अन्य स्थल से सामाग्रियों की ढुलाई करायी गयी जिसकी सम्पुष्टि प्रमण्डलीय कागजात से की जा सकती है। लगातार वर्षा हो रही थी। बीच बीच में ढुलाई कार्य96 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 प्रभावित हो रहा था। उनके द्वारा कर्तव्य में किसी प्रकार की ढीलाई नहीं बरती गई है तथा तत्परतापूर्वक बाढ संघर्षात्मक कार्य कराया गया। श्री राम ने अपने कथन के समर्थन में किसी प्रकार का साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है। इसलिए आरोप संख्या-2 आंशिक रुप से प्रमाणित होता है। 2. मामले के सम्यक समीक्षोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा श्री बिजेन्द्र कुमार राम (आई0डी0-3871), तत्कालीन मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर के विरूद्ध 'सेवा से बर्खास्तगी' संबंधी निर्गत दण्डादेश (विभागीय अधिसूचना सं0-1539, दिनांक 19.07.18) को निरस्त करने एवं उक्त विभागीय दण्डादेश निरस्त किए जाने के पश्चात्‌ इस मामले में प्रमाणित पाये गये आरोपों के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-14 के संगत प्रावधानों के तहत श्री राम के विरूद्ध 'दो वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक' का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया।

3. श्री बिजेन्द्र कुमार राम (ID-3871) तत0 मुख्य अभियंता, बाढ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर के विरूद्ध 'सेवा से बर्खास्तगी' संबंधी निर्गत दण्डादेश (विभागीय अधिसूचना सं0-1539, दिनांक 19.07.18) को माननीय पटना उच्च न्यायालय द्वारा सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-13190/2018 में पारित न्यायादेश के आलोक में निरस्त करने संबंधी संलेख/प्रस्ताव पर विभागीय पत्रांक-729 दिनांक 02.06.20 द्वारा राज्य मंत्रिपरिषद के स्वीकृति हेतु भेजा गया। राज्य मंत्रिपरिषद की दिनांक 09.06.20 को सम्पन्न बैठक में मद संख्या-14 के रूप में सम्मिलित करते हुए उक्त संलेख/प्रस्ताव पर स्वीकृति प्रदान की गयी।

4. उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में विभागीय अधिसूचना सं0-1539 दिनांक 19.07.2018 को निरस्त करते हुए श्री बिजेन्द्र कुमार राम (ID-3871) तत0 मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर (सम्प्रति सेवा से बर्खास्त) को सेवा में पुनस्र्थापित किया जाता है।

5. अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री बिजेन्द्र कुमार राम (ID-3871), तत0 मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, समस्तीपुर को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-14 के संगत प्रावधानों के तहत 'दो वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक' का दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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10 जून 2020

सं॰ 22/नि0सि0(सम0)02-04/2014-779--श्री सच्चिदानंद सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता (आई0डी0-जे0 4966), बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या-2, झंझारपुर के पद पर पदस्थापित थे तो कमला-बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं कि0मी0 74.00 के पास कुम्हरौल गाँव एवं बौड़ ग्राम के पास दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान आदि आरोपों के लिए प्रथम द्रष्टया दोषी पाये जाने के कारण विभागीय अधिसूचना सं०-1107, दिनांक 16.08.14 द्वारा निलंबित करते हुए इनके विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही में नियुक्त संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-621, दिनांक 22.07.15 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित किया गया। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर किया गया एवं समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए असहमति के बिन्दुओं पर द्वितीय कारण पृच्छा करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया एवं साथ ही निलंबन अवधि डेढ़ साल व्यतीत हो जाने के कारण निलंबन मुक्त करने का भी निर्णय लिया गया।

उक्त के आलोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-755, दिनांक 10.05.16 द्वारा श्री सिन्हा को निलंबन मुक्त किया गया एवं विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 05.05.16 द्वारा असहमति के निम्न बिन्दु पर द्वितीय कारण पृच्छा की गयी - (1) बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर के कार्यक्षेत्राधीन दायाँ कमला बलान तटबंध के कि0मी0 74.80 एवं कि0मी0 70.00 के पास कुम्हरौल गाँव एवं बौड़ ग्राम के पास दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान एवं कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाही। (2) विभागीय निदेशों के अनुरूप तटबंध की गश्ती नहीं करने का आरोप प्रमाणित नहीं माना जा सकता है, लेकिन तटबंध की सुरक्षा में घोर लापरवाही बरतने, दायित्व के निर्वहन में घोर उदासीनता बरतने एवं सुरक्षा हेतु आवश्यक कार्रवाई नहीं करने के आरोप के आलोक में श्री सिन्हा द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब दिया गया है जो इस प्रकार है :- बिन्दु (1) (i) कमला नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा के फलस्वरूप दिनांक 15.08.14 को नदी का जलस्तर 52.85मी0 हो गया।

(ii) अपने कार्यक्षेत्र 44.00-75.00कि0मी0 के बीच सरकारी जीप BRG-5807 से सघन पेट्रोलिंग कर रहा था। (iii) प्रतिनियुक्त होमगार्ड तटबंध की सुरक्षा हेतु लगाये गये थे। (iv) कि0मी0 48.70 पर संवेदक संतोष कुमार यादव के माध्यम से जलश्राव रोकने का कार्य किया गया। (v) कि0मी0 60.68, 64.00, 67.00, 73.20, 73.40, 73.80, 69.0, 66.0, 70.80, 74.0 पर पाईपिंग पर नियंत्रण एवं कुछ बिन्दुओं पर पुनः नियंत्रण का कार्य श्री योगेन्द्र कुमार, कनीय अभियंता, श्री अशोक कुमार सिन्हा, कनीय अभियंता, श्री मनोज कुमार, कनीय अभियंता, श्री रामपुकार यादव, संवेदक एवं श्री संतोष कुमार यादव, संवेदक से लगातार सम्पर्क किया गया।97 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (vi) कि0मी0 70.80 पर 15.08.14 के अपराह्‌न में पाईपिंग की सूचना प्राप्त होने पर श्री रामपुकार यादव, संवेदक की मदद से पाईपिंग पर नियंत्रण पा लिया गया था कि एकाएक 5.40 बजे अपराह्‌न में श्री अशोक कुमार सिन्हा, कनीय अभियंता द्वारा कि0मी0 70.80 पर बाँध टूटने की सूचना दी गई। तत्‌क्षण 5. 45 बजे कार्यपालक अभियंता का सूचना दी गई।

(vii) टूटान को बाँधने का पहल किया गया। परन्तु अप्रत्याशित पानी के दबाव के कारण टूटान को रोकना संभव नहीं हो सका।

(viii) राशि 10.00बजे श्री सिन्हा, कनीय अभियंता द्वारा कि0मी0 74.00 पर बाँध टूटने की सूचना दी गई उस वक्त मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता के साथ कि0मी0 64.0 पर था।

(ix) खैरियत प्रतिवेदन लेते हुए एवं कार्यपालक अभियंता से प्राप्त निदेश के अनुसार कार्य कराते रहा। बिन्दु (2) (i) नदी का जलस्तर 52.00मी0 से उपर अथवा नीचे दोनों ही परिस्थिति में सघन पेट्रोलिंग की गईं है। (ii) तटबंध की सुरक्षा हेतु बालू का भंडारण स्वीकृत कार्यक्रम के अनुसार किया गया। (iii) दिनांक 15.08.14 को नीजी मोबाईल से 56(छप्पन) अद्‌द call तटबंध की सुरक्षा हेतु किया गया। संवेदक एवं कनीय अभियंता को बराबर निदेश देता रहा हूँ। (iv) तटबंध के कि0मी0 48.70, 60.80, 64.00, 66.00 69.00, 70.80, 73.20, 73.40 एवं 74.00 पर हो रहे पाइपिंग बिन्दु पर पहुँचकर पाइपिंग को नियंत्रित कराया गया। (v) कमला बलान नदी का जलस्तर खतरे के निशान से सुबह ही पार कर गया था। कार्यपालक अभियंता द्वारा दिये गये निदेश एवं मेरे द्वारा की गई वार्त्ता का साक्ष्य मोबाईल के Call detail से प्राप्त किया जा सकता है। (vi) तटबंध के कि0मी0 70.80 पर टूटान की सूचना एकाएक कनीय अभियंता द्वारा 5.40 बजे अपराह्‌न दिया गया जिसकी सूचना कार्यपालक अभियंता को 5.45 बजे दी गई। (vii) तटबंध के कि0मी0 74.00 पर टूटान की सूचना रात्रि 10.00 बजे कनीय अभियंता द्वारा दी गई। तत्पश्चात उक्त सूचना मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को अवगत करा दिया एवं उस समय उनके साथ कि0मी0 64.00 पर था। (viii) द्वितीय कारण पृच्छा के साथ संलग्न संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में कहीं भी आरोप प्रमाणित नहींं पाया गया है। जाँच पदाधिकारी द्वारा श्री मिथिलेश कुमार सिंह, कार्यपालक अभियंता श्री नवल किशोर सिंह, सहायक अभियंता, श्री दिनेश राय, सहायक अभियंता, श्री योगेन्द्र कुमार, कनीय अभियंता एवं श्री रमेश झा, जीप चालक से लिखित सूचना प्राप्त की गई है। प्राप्त सूचना में लापरवाही, उदासीनता या आवश्यक कार्रवाई नहीं करने का आरोप नहीं है। उक्त के आलोक में श्री सिन्हा से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी, जिसमें निम्न तथ्य पाया गया :- कमला बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं 74.00 पर दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान मामले में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2089, दिनांक 24.12.14 से कुल चार आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा गठित सभी आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया। परन्तु विभागीय समीक्षोपरांत प्रथम आरोप एवं चौथा आरोप (अंश) प्रमाणित पाया गया। जिसके लिए विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 05.05.16 से द्वितीय कारण पृच्छा की गई। द्वितीय कारण पृच्छा एवं इसके क्रम में आरोपी पदाधिकारी द्वारा दिए गए बचाव बयान से स्पष्ट होता है कि आरोपी पदाधिकारी द्वारा दोनों ही आरोपों के लिए सदृश बात कही गयी है। आरोपी पदाधिकारी द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान दिये गये बयाव बयान सदृश ही द्वितीय बचाव बयान में तथ्य अंकित किया गया है। अर्थात कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री सिन्हा के विरूद्ध दायाँ कमला बलान तटबंध के कि0मी0 70.80 एवं कि0मी0 74.0 पर दिनांक 15.08.14 को हुए टूटान एवं कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाही बरतने, दायित्व के निर्वहन में घोर उदासीनता बरतने एवं सुरक्षा हेतु आवश्यक कार्रवाई नहीं करने के संबंध में दिया गया द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर स्वीकार योग्य नहीं पाया गया। फलस्वरूप श्री सच्चिदानंद सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर को प्रमाणित आरोप के लिए "एक (01) वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रो क" का दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया।

सरकार के स्तर पर लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-278, दिनांक 09.02.18 द्वारा श्री सच्चिदानंदन सिन्हा, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं०-2, झंझारपुर को निम्न दंड अधिरोपित किया गया :- "एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक।" उक्त दण्ड के आलोक में वित्त (वै0दा0नि0को0) विभाग, बिहार, पटना द्वारा सूचित किया गया है कि श्री सच्चिदानंद सिन्हा की सेवानिवृति की तिथि 31.05.18 होने के कारण उपर्युक्त दण्ड अप्रभावी हो जा रहा है। तत्पश्चात मामले की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-278 दिनांक 09.02.18 द्वारा निर्गत दण्डादेश को विभागीय अधिसूचना सं0-1707 दिनांक 08.08.19 द्वारा निरस्त किया गया एवं साथ ही विभागीय संकल्प98 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 ज्ञापांक-2089 दिनांक 24.12.14 द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0-102 सहपठित ज्ञापांक-1729 दिनांक 08.08.19 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया गया एवं सरकार द्वारा प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिन्हा को ''पेंशन से पांच प्रतिशत की कटौती एक वर्ष के लिए'' का दण्ड देने का निर्णय लिया गया जिस पर सक्षम प्राधिकार माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है।

अतएव वर्णित संदर्भ एवं सरकार के स्तर पर लिये गये निर्णय के आलोक में श्री सच्चिदानंद सिन्हा, तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं0-2, झंझारपुर को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है।

''पेंशन से पांच प्रतिशत की कटौती एक वर्ष के लिए रोक''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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10 जून 2020

सं॰ 22नि0सि0(सम0)-02-08/2009-778--श्री अवधेश प्रसाद सिंह (ID-3997), तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा के विरूद्ध उक्त प्रमण्डलान्तर्गत वर्ष 2007-08 में प्रथम चरण में संपादित जमींदारी बाँधों के उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य में बरती गयी अनियमितता की जाँच उड़नदस्ता अंचल, पटना से करायी गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के विभागीय समीक्षोपरांत कार्य में पायी गयी अनियमितता के लिए विभागीय पत्रांक-314 दिनांक-18. 02.2010 द्वारा श्री सिंह से स्पष्टीकरण पूछा गया। प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए निम्न आरोप गठित करते हुए श्री अवधेश प्रसाद सिंह, सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-103, दिनांक 28.01.11 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी ः-

1. जमींदारी बाँध के कार्यान्वयन हेतु दिये गये विभागीय निदेशों के आलोक में प्री लेवल की जाँच कराये बिना कार्य कराया गया।

2. बाँध का स्लोप विशिष्टि के अनुरूप नहीं पाया गया एवं बिना गुण नियंत्रण से जाँच कराये ही कार्यों का भुगतान किया गया है।

3. स्वीकृत प्राक्कलन में जंगल क्लीयरेंस हेतु अनुचित दर का प्रावधान किया गया है जिसके फलस्वरूप रु 25,361/- राशि का अनियमित भुगतान के लिए आप दोषी हैं।

4. जाँच पदाधिकारी के द्वारा सूचित किये जाने के बावजूद आपके द्वारा जाँच कार्य में सहयोग नहीं किया गया जिसके कारण कार्यों की पूर्ण जाँच नहीं की जा सकी।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में आरोपों को प्रमाणित नहीं पाया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरांत जाँच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए असहमति के निम्नांकित बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-619 दिनांक-22.05.2014 द्वारा श्री सिंह से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी :-

1. संचालन पदाधिकारी द्वारा उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन में प्री लेवल की जाँच विभाग द्वारा गठित जाँच दल द्वारा किये जाने का उल्लेख के आधार पर बिना प्री लेवल की जाँच का ही कार्य कराने के आरोप को प्रमाणित नहीं माना गया है। परन्तु संदर्भित कोई साक्ष्य (जाँचित प्री लेवल बुक) न तो उड़नदस्ता दल एवं न ही आपके द्वारा उपलब्ध कराया गया है। अतः साक्ष्य विहित तथ्य को स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। इस प्रकार संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आपके विरूद्ध आरोप सं0-01 प्रमाणित होता है।

2. जमींदारी बाँध का कार्य राजस्थानी ट्रैक्टर से कराने, प्राक्कलन में Compaction मद का प्रावधान नहीं रहने के कारण मिट्टी गुण नियंत्रण से जाँच का औचित्य नहीं होने तथा उड़नदस्ता द्वारा कराये गये कार्य पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं करने, मिट्टी की गुणवाा की जाँच नहीं करने एवं पायी गयी भिन्नता मामूली एवं मान्य सीमा के अन्तर्गत माने जाने के आधार पर संचालन पदाधिकारी द्वारा आपके विरूद्ध आरोप सं0-2 प्रमाणित नहीं माना गया है। परन्तु जिससे सहमत नहीं हुआ जा सकता है। शाहपुर PWD Road से बरहेता धरनी पट्टी तक जमींदारी बाँध के प्राक्कलन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि इस बाँध में 10 अद्‌द डबल भेट का पाईप कल्बर्ट का प्रावधान है। उक्त संरचना में कंक्रिटिंग कार्य, ब्रीक वर्क तथा अन्य पक्का कार्य कराया गया है। उक्त कार्य का भी गुण नियंत्रण जाँच से संबंधित कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अतः संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से असहमत होते हुए बिना गुण नियंत्रण से जाँच कराये ही भुगतान करने का आरोप प्रमाणित होता है।

श्री सिंह से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उार की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत पाया गया कि बिना प्री लेवल जाँच कराये ही जमींदारी बाँध में मिट्टी कार्य कराने के संबंध में श्री सिंह द्वारा नया साक्ष्य रूप में संलग्न अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि विभागीय पत्रांक-2570 दिनांक-05.12.2007 के आलोक में मुख्य अभियंता, समस्तीपुर ने ज्ञापांक-3092 दिनांक-10.12.2007 से परिक्षेत्राधीन जमींदारी बाँध से संबंधित प्रमंडल के अधीन जमींदारी बाँध के प्री लेवल की जाँच हेतु प्रमंडलावार जाँच टीम गठित किया गया है तथा विभागीय पत्रांक-2665 दिनांक-18.12.2007 से मुख्य अभियंता परिक्षेत्रावार जमींदारी बाँध के प्री लेवल की जाँच हेतु टीम गठित की गयी है तथा मुख्य अभियंता को जमींदारी बाँधो के प्री लेवल की शत प्रतिशत जाँच असम्बद्ध अभियंताओं से कराने का निदेश दिया गया है। श्री सिंह द्वारा प्री लेवल की जाँच से99 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संदर्भित साक्ष्य स्वरूप प्री लेवल बुक की छायाप्रति दी गयी है जिसके अवलोकन से स्पष्ट होता है कि हिचौल से अम्माडीह भाया फरगपुर तथा शाहपुर PWD Road से बरहेता धरनी पट्टी तक जमींदारी बाँधों के प्री लेवल बुक एवं PWD Road (दरभंगा-समस्तीपुर) से मखनाही टोला के खरंजा तक तथा PWD Road (परोरी-विशनपुर) से हब्बीपुर खरंजा तक जमींदारी बाँधो का संबंधित कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता द्वारा लिए गये प्री लेवल का मुख्य अभियंता द्वारा गठित टीम से शत प्रतिशत जाँच कराया गया है तथा विभाग द्वारा गठित टीम द्वारा भी प्री लेवल की रेन्डम जाँच की गयी है। अतएव उड़नदस्ता तथा संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री सिंह के विरूद्ध बिना प्री लेवल की जाँच कराये कार्य कराने का आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

शाहपुर PWD Road से बरहेता घरनी पट्टी तक जमींदारी बाँधो में कराये गये संरचना कार्य में बिना गुण नियंत्रण की जाँच कराये भुगतान कराने संबंधी द्वितीय कारण पृच्छा में श्री सिंह द्वारा स्वीकार किया गया है कि उक्त जमींदारी बाँध में छोटे-छोटे संरचना रहने के कारण कार्यों का गुण नियंत्रण की जाँच नहीं करायी गयी है। जबकि नियमानुसार गुण नियंत्रण की जाँच कराकर ही भुगतान की कार्रवाई करना है। श्री सिंह द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है जिससे प्रमाणित हो सके कि कराये गये संरचनाओं के कार्य के भुगतान से पूर्व गुण नियंत्रण की जाँच करायी गयी है। अतएव श्री सिंह के विरूद्ध बिना गुण नियंत्रण की जाँच कराये ही भुगतान करने का आरोप प्रमाणित होता है।

इस प्रकार समीक्षोपरांत श्री अवधेश प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा के विरूद्ध आरोप सं0-02, संरचना के कार्यों का भुगतान बिना गुण नियंत्रण जाँच कराये ही करने का आरोप प्रमाणित होता है। उक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री अवधेश प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना सं0-1767 दिनांक-26.11.2014 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया :-

1. ''एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।'' उक्त दण्ड के आलोक में महालेखाकार (ले0 एवं ह0) का कार्यालय, बिहार, पटना के पत्रांक-जी0ई0-05-408 दिनांक-05.01.2018 द्वारा विभाग को सूचित किया गया कि श्री अवधेश प्रसाद सिंह की सेवानिवृति की तिथि-31.01.2018 होने के कारण ''एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक'' का दण्ड संचयात्मक हो जा रहा है।

अतएव वर्णित संदर्भ में मामले की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी एवं सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना सं0-1767 दिनांक-26.11.2014 द्वारा निर्गत दण्डादेश को विभागीय अधिसूचना सं0-2018 दिनांक 18.09.2019 द्वारा निरस्त किया एवं पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0-08 सहपठित ज्ञापांक-126 दिनांक 31.01.20 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया। साथ ही प्रमाणित आरोप के लिए संशोधित दण्ड ''पेंशन से पांच प्रतिशत की कटौती एक वर्ष के लिए'' अधिरोपित किये जाने का निर्णय विभाग द्वारा लिया गया, जिस पर सक्षम प्राधिकार के रूप में माननीय मंत्री का अनुमोदन प्रापत है। साथ ही उक्त दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति प्राप्त है।

अतएव वर्णित संदर्भ में प्रमाणित आरोप के लिए श्री अवधेश प्रसाद सिंह (ID-3997) तत0 सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड संसूचित करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है :-

''पेंशन से पांच प्रतिशत (5%) की कटौती एक वर्ष के लिए'' सरकार के निर्णय के आलोक में उक्त दण्ड श्री अवधेश प्रसाद सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, दरभंगा सम्प्रति सेवानिवृत को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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10 जून 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-07/2016-777--श्री अरूण कुमार (आई0डी0-4366) तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अंचल, मोतिहारी को उनके उक्त अंचल में पदस्थापन अवधि के दौरान वर्ष 2016 के पूर्व बगहा शहर के नजदीक रतनमाला एवं पुअर हाउस में कराये गये कटाव निरोधक कार्य में बरती गई वित्तीय अनियमितता एवं सरकारी राशि की क्षति के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं०-1247 दिनांक 07.06.2018 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17 में विहित रीति से आरोप पत्र में उल्लेखित निम्न आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

(1) (क) उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन के कंडिका 2.0.1 एवं 5.0.0(1) से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य के स्वीकृत प्राक्कलन के मद सं0-4 एवं 5 (बोल्डर क्रेटिंग एवं बोल्डर पिचिंग) में बोल्डर ढुलाई मद में एक अतिरिक्त लोडिंग एवं अनलोडिंग के लिये रू0 145.04 प्रति घन मी0 का अधिक दर स्वीकृत करने के कारण व्यवहृत कुल बोल्डर की मात्रा पर एकरारित दर से भुगतान करने के कारण कुल 6922650/- रूपये का अधिकाई भुगतान होना परिलक्षित है। उक्त दोनों मदों का दर आपके द्वारा अनुमोदित किया गया है। अतएव गलत दर अनुमोदन करने के कारण इस मद में किया गया अधिकाई भुगतान में आपकी सहभागिता परिलक्षित होता है।

(ख) उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन के कंडिका 3.0.1 एवं 5.0.0(3) से स्पष्ट है कि प्रश्नगत कार्य के अन्तर्गत एप्रोन लेईंग का रेखांकण (एलाईमेंट) के स्वीकृति के बिना ही कार्य प्रारंभ किया गया तथा कार्य के दौरान भी एलाईमेंट की स्वीकृति100 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 के दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गयी एवं रेखांकण स्वीकृति के बिना ही नियम के विरूद्ध कार्य प्रारम्भ कराते हुए सम्पन्न किया गया जो आपकी पदीय दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही दर्शाता है।

(ग) जांच प्रतिवेदन के विभिन्न कंडिकाओं से स्पष्ट है कि बोल्डर रिभेटमेंट कार्य LWL के उपर से नियम के विरूद्ध कार्य प्रारम्भ कराया गया है तथा प्रावधान के विपरीत बोल्डर क्रेटिंग एवं बोल्डर पिचिंग कार्य में मानक से अधिक ओभर साईज एवं अंडर साईज बोल्डर का उपयोग किया गया है साथ ही प्रावधान के अनुरूप के्रट बांधने में G.I. Binding Wire का उपयोग नहीं किया जाना, कार्य में भरा एवं समतल बोल्डर का उपयोग करना तथा एप्रोन एवं स्लोप के बीच 1'0" का गैप पाया जाना तथा कार्य क्षतिग्रस्त होना परिलक्षित करता है कि आपके द्वारा प्रश्नगत कार्यों का सही ढंग से निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण नहीं किया गया है जो आपके पदीय दायित्वों के प्रति लापरवाही दर्शाता है।

(2) श्री अरूण कुमार, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता द्वारा उपर्युक्त कंडिका-1 में वर्णित कटाव निरोधक कार्य जैसे महत्वपूर्ण कार्य में अनियमितता बरतते हुए अपने पदीय दायित्वों में लापरवाही बरती गयी है। फलतः प्रश्नगत कार्य में बोल्डर ढुलाई मद में कुल 6922650/- रूपये का सरकारी राशि का अधिकाई भुगतान का मामला बना है। साथ ही गुणवत्ता के अनुरूप कार्य नहीं होने एवं भुगतान प्रावधान के अनुरूप होने के कारण सरकारी राशि का दुरूपयोग होना परिलक्षित है। आपका उक्त अनियमित कृत बिहार वित्त नियमावली में प्रावधानित नियम का उल्लंघन होना स्वभाविक है।

(3) उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्री अरूण कुमार, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता ने प्रश्नगत स्थल पर बाढ़ 2016 के पूर्व कराये गये कटाव निरोधक जैसे महत्वपूर्ण कार्य में दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं किया गया है। फलतः बोल्डर ढुलाई मद में कुल 6922650/- रूपये का अधिकाई भुगतान होने के साथ ही गुणवत्ता विहिन कार्य होने के बावजूद प्रावधान के अनुरूप भुगतान होने के कारण सरकारी राशि का दुरूपयोग/क्षति होना परिलक्षित है। जो बिहार वित्त नियमावली में प्रावधानित नियम का उल्लंघन है एवं इनका यह आचरण बिहार सरकारी सेवक आचार संहिता के नियम-3(1) भी उल्लंघन है जिसके लिये आप दोषी हैं।

उक्त के आलोक में विभागीय जांच आयुक्त-सह-संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक-655 दिनांक 06.08.2018 से विभागीय कार्यवाही का जांच प्रतिवेदन विभाग में समर्पित किया गया, जिसमें आरोपवार स्थिति निम्नवत हैः-

आरोपित पदाधिकारी श्री अरूण कुमार के विरूद्ध आरोप पत्र, आरोपित पदाधिकारी का बचाव बयान विभागीय मंतव्य, सुनवाई तथा दोनों पक्षों द्वारा दिये गये साक्ष्यों/कागजात के विवेचन से निम्नलखित वस्तुस्थिति परिलक्षित होती है : आरोप सं0-(1) आरोपित पदाधिकारी पर पहला आरोप है कि उन्होेने बाढ़ से रोकथाम के लिए मिर्जापुर जिले में स्थित क्वैरी से बगहा तक बोल्डर की ढुलाई के मद में चार बार लोडिंग-अनलोडिंग का प्रावधान निर्धारित किया था, जिसकी वजह से संवेदक को 69,22,650/- रूपये का भुगतान अधिक करने से उतनी वित्तीय क्षति सरकार को हुई। इस संबंध में आरोपित पदाधिकारी ने अपने बचाव बयान में कहा है कि व्यवहारिक दृष्टि से चार बार लोडिंग-अनलोडिंग का प्रावधान उचित था क्योंकि रेलवे के नियमों के आलोक में प्लेटफार्म पर बोल्डर को सीधे अनलोड नहीं किया जा सकता था, बल्कि पहले रेलवे यार्ड में अनलोड किया जाता था और वहां से बाद में बोगी/बैगन में लोड किया जाता था। दूसरे, उनका कहना है कि वास्तव में रेल और सड़क मार्ग से ढुलाई में जो कम व्यय वाला हो वह दर अनुमान्य है। यद्यपि रेल से ढुलाई का खर्च कम पड़ता है, किन्तु वास्तव में सड़क मार्ग से इसमें ट्र्रकों से बोल्डरों की ढुलाई की गयी थी किन्तु रेल मार्ग से ढुलाई की कम दर संवेदक को दी गयी। उनका यह भी कहना है कि उनके द्वारा चार बार लोडिंग-अनलोडिंग के प्रावधान को मुख्य अभियंता (डिजाइन) ने मान्यता दी थी। इसके अलावा वर्तमान में बोल्डर ढुलाई हेतु अनेक कार्यों में सड़क मार्ग से ढुलाई की दर स्वीकृत की जा रही है। उनके अनुसार सड़क मार्ग से ढुलाई करने पर विभाग के द्वारा 3,21,76,050/- रूपये का कम भुगतान संवेदक को किया गया। विभागीय मंतव्य में उनके बचाव बयान को अस्वीकृत किया गया है और संवेदक को अनियमित भुगतान करने में आरोपित पदाधिकारी के द्वारा सहयोग करने की बात कही गयी है। विभाग ने पूर्व में यह भी स्पष्ट किया था कि उड़नदस्ता दल के जांच प्रतिवेदन में पाया गया है कि लोडिंग एवं अनलोडिंग हेतु 145.04 रूपये प्रति घन मीटर का अधिक प्रावधान आरोपित पदाधिकारी ने किया था। विभाग के अनुसार स्वीकृत प्राक्कलन में मैनुअली लोडिंग-अनलोडिंग का प्रावधान नहीं है। इसलिए आरोपित पदाधिकारी का यह कथन कि मिर्जापुर स्टेशन पर रैक में मैनुअल लोडिंग एवं बेतिया स्टेशन पर मैनुअल अनलोडिंग की गयी, स्वीकार योग्य नहीं है। यह भी कहा गया है कि आरोपित पदाधिकारी का यह कहना सही नहीं है कि एक रैक की क्षमता 55000 घन मीटर होती है। ट्र्रकों की संख्या ट्र्रक रैक की क्षमता पर निर्भर करती है, किन्तु ट्र्रक रैक की क्षमता से संबंधित कोई अभिलेख संचिका में नहीं रहने के कारण ट्र्रक टिपर की गणना करना संभव नहीं है। विभाग द्वारा यह भी कहा गया है कि इस संबंध में दूसरे अभियंता प्रमुख से भी तकनीकी मंतव्य लिया गया था, उन्होंने भी कहा है कि बोल्डर ढुलाई में स्रोत एवं गंतव्य स्टेशन पर मात्र एक लोडिंग एवं मात्र एक अनलोडिंग का प्रावधान होना चाहिए था। विभाग के द्वारा उड़नदस्ता अंचल-1 के जांच प्रतिवेदन (पत्रांक-01 दिनांक 27.06.2016) को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें पाया गया है कि संबंधित कार्य स्वीकृत प्राक्कलित राशि 77.961 करोड़ थी, उसमें रतनमाला, पुअर हाउस और मंगलपुर स्थल के प्राक्कलन शामिल थे। प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति मुख्य अभियंता, केन्द्रीय रूपांकण एवं शोध, पटना द्वारा दी गई, किन्तु प्राक्कलन के मद संख्या-4 की जांच में पाया गया कि मिर्जापुर रेलवे स्टेशन पर मात्र एक लोडिंग का प्रावधान होना चाहिए था और बेतिया स्टेशन पर बोल्डर पहुंचने पर मात्र एक अनलोडिंग का प्रावधान होना चाहिए था किन्तु मिर्जापुर स्टेशन पर दो बार लोडिंग-अनलोडिंग का प्रावधान 143.60 रूपये की दर से किया गया, तद्‌नुसार संवेदक को 145.04 रूपये प्रति घन मीटर की दर से अधिक भुगतान हुआ, जो अधिकाई भुगतान की श्रेणी में आता है, जिसके101 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 लिए जांच गणना एवं दर स्वीकृत करने वाले कनीय अभियंता, सहायक अभियंता, कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को जिम्मेवार माना गया है। सुनवाई के दौरान आरोपित पदाधिकारी ने कहा कि बोल्डर की मात्रा काफी अधिक थी और तीन महीने के अंदर कार्य पूरा करना था और मुख्य अभियंता (डिजाइन) ने तकनीकी स्वीकृति दी थी, जिसमें चार बार लोडिंग-अनलोडिंग का खर्च मान्य किया था। दूसरे, उन्होंने यह भी कहा कि दूसरे अभियंता प्रमुख ने तीन बार लोडिंग-अनलोडिंग संभावित बताया है। तीसरे, उन्होने यह भी कहा कि अपने पूरे सेवाकाल में उनके विरूद्ध कोई भी अनुशासनिक कार्रवाई नहीं की गई तथा उनकी प्रोन्नति विभिन्न पदों (अभियंता प्रमुख सहित) समय-समय पर होती रही। उनके अनुसार वह नवम्बर 2018 में सेवानिवृत होने वाले हैं, किन्तु प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी ने जोर देकर कहा कि बोल्डर ढुलाइ्र में तीन बार ही लोडिंग-अनलोडिंग अनुमान्य है। सभी तथ्यों एवं परिस्थतियों की समीक्षा करने से यह तर्क उभरकर सामने आता है कि उस समय रेलमार्ग से ढुलाई को ही सड़क मार्ग से ढुलाई की अपेक्षा कम खर्च वाला माना जाता था और उसी हिसाब से ढुलाई का प्रावधान होता था, किन्तु वर्तमान में सड़क मार्ग से बोल्डर ढुलाई की दर प्राक्कलन में विभाग द्वारा स्वीकृत की जा रही है। दूसरे, यद्यपि आरोपित पदाधिकारी श्री अरूण कुमार ने ही बोल्डर ढुलाई के लिए चार बार लोडिंग-अनलोडिंग का प्रावधान करते हुए इसकी दर निर्धारित की, किन्तु यह भी सही है कि मुख्य अभियंता (डिजाइन) ने उसे मान्यता दी। अर्थात उनके वरीय पदाधिकारी ने उस प्रावधानित दर पर सवाल नहीं उठाया। तीसरे, संभावित बाढ़ के आलोक में कटाव रोकने के लिए तीन महीने के अंदर सारा कार्य पूरा करना था जिसमें किसी प्रकार का विलंब राज्य सरकार तथा जनता के लिए अहितकर हो सकता था। ऐसी व्यवहारिक बाध्यता के चलते यह माना जा सकता है कि विभाग द्वारा गणना की गई 145.04 रूपये प्रति घनमीटर की दर से 69लाख 22 हजार 650 रूपये का अधिक भुगतान, अधिक प्रतीत होता है मगर यह भी सही है कि मात्र तीन बार लोडिंग-अनलोडिंग की अनुमान्यता के बावजूद चार बार लोडिंग-अनलोडिंग का प्रावधान करना और उसकी दर निर्धारित करने के लिए आरोपित पदाधिकारी जैसे तकनीकी पदाधिकारी (जो अधीक्षण अभियंता के रूप में वहां पदस्थापित थे और जिन्होंने ढुलाई दर निर्धारित की थी) को दोषी माना जा सकता है। अतः तर्को, तथ्यों, सरकारी नियमों आदि के आलोक में आरोप संख्या-(1) प्रमाणित होता है। आरोप सं0-(2) जहां तक आरोप संख्या (2) का सवाल है कि बिना एलाइनमेंट निर्धारित किये कार्य सम्पन्न कराया गया और कार्यपालक अभियंता द्वारा एलाइनमेंट का प्रस्ताव नहीं दिये जाने पर उनके विरूद्ध कार्रवाई की अनुशंसा भी आरोपित पदाधिकारी ने नहीं की, इस संबंध में आरोपित पदाधिकारी ने अपने बचाव बयान में कहा है कि बांध, तटबंध, स्पर आदि, जिसके रेखांकन में बदलाव होने की संभावना नहीं होती है, के निर्माण हेतु रेखांकन की स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी जाती है, लेकिन नदी के तट के किनारे के रिभेटमेंट कार्य, जिसमें नदी के बहाव में बदलाव के फलस्वरूप रेखांकन में बदलाव की आवश्यकता संभावित होती है, की स्वीकृति लेने की आवश्यता नहीं पड़ती और इस तरह का नियम/परम्परा भी नहीं पाया जाता है। उन्होंने यह भी कहा है कि कार्यपालक अभियंता ने अपने पत्रांक-2288 दिनांक 21.12.2017 के द्वारा विभाग को स्पष्ट किया था कि कार्य प्रारंभ किये जाने के पूर्व संबंधित मुख्य अभियंता से वार्ता होने के बाद एलाइनमेंट निर्धारित किया गया और इस बिन्दु पर आरोपित कार्यपालक अभियंता श्री अंशुमन ठाकुर के बचाव बयान को सरकार को मान लिया है कि कार्य सही रेखांकन पर कराया गया है। विभागीय मंतव्य में आरोप सं0-2 को आंशिक रूप में प्रमाणित किया गया है तथा सुनवाई के दौरान प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी ने स्वीकार किया कि एलाइनमेंट निर्धारण नहीं करने के आरोप पर विभागीय मंतव्य पर नरमी बरती गई है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस कार्यपालक अभियंता (श्री अंशुमन ठाकुर) को एलाइनमेंट तैयार करना था, उसके बचाव बयान को विभाग ने स्वीकार कर लिया है तथा प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी ने भी स्वीकार किया है कि विभाग इस आरोप पर कमोबेश आरोपित पदाधिकारी के बचाव बयान से सहमत है तथा आरोपित पदाधिकारी के इस कथन में दम है कि नदी के बहाव में बदलाव के फलस्वरूप रेखांकन में बदलाव की आवश्यकता होती है, इसलिए नदी के किनारे रिभेटमेंट कार्य की स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अतः सभी तथ्यों और परिस्थतियों के आलोक में उपर्युक्त साक्ष्य के अभाव में यह आरोप प्रमाणित नहीं होता है। आरोप सं0-(3) तीसरे आरोप के संबंध में IS Code के अनुसार अधीक्षण अभियंता का दायित्व है कि अपने अंचल में चल रहे कार्याें के निरीक्षण/पर्यवेक्षण ससमय करें तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करें तथा सरकारी राशि के दुरूपयोग पर रोक लगायें, किन्तु उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जांच प्रतिवेदन के अनुसार न्यूनतम जल स्तर (LWL) के उपर से कार्य प्रारंभ कराया गया तथा बोल्डर क्रेटिंग कार्य में 39.95 प्रतिशत ओभर साईज एवं 48.22 प्रतिशत अंडर साईज तथा अनक्रेटेड बोल्डर पिचिंग कार्य में 49.37 प्रतिशत ओभर साइज एवं 30.22 प्रतिशत अंडर साइज बोल्डर का उपयोग किया गया है तथा उक्त कार्य में भरे एवं समतल बोल्डर का भी उपयोग किया गया है, किन्तु आरोपित पदाधिकारी ने समय-समय पर उन कार्यों का निरीक्षण/पर्यवेक्षण नहीं किया, इसके कारण कार्यों की गुणवत्ता और विशिष्टि खराब हुई तथा अनियमित भुगतान भी हुआ। अपने बचाव बयान में आरोपित पदाधिकारी ने कहा है कि अधीक्षण अभियंता की कोई भूमिका वास्तविक कार्य सम्पादन में नहीं होती और न उनके द्वारा कार्य की मापी की जाती है। उनका कार्यक्षेत्र काफी विस्तृत था, इसके बावजूद उन्होने 15.02.2016, 10.03.2016, 30.03.2016, 17.04.2016 तथा 30.04.2016 को स्थल निरीक्षण किया था, किन्तु उनके अनुसार निम्न विशिष्टि के कार्यों के लिए अधीक्षण अभियंता को जिम्मेवार जांच दल ने नहीं माना है, बल्कि प्रमंडलीय अभियंताओं को इसके लिए जिम्मेवार माना गया है। उनके अनुसार IS Code 14262:1995 के अनुसार कार्य प्रारंभ करने के समय यथा संभव निम्न जल स्तर (LWL) पर कार्य कराने का प्रावधान किया गया है, क्योंकि हर नदी में अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग तिथियों को निम्न जल स्तर पहुंचता है। उन्होंने पुनः कहा कि IS Code में यह नहीं अंकित किया गया है कि एप्रॉन लेईंग के कार्य102 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 को निम्न जल स्तर पर सम्पादित कराया जाता है। उन्होंने आगे कहा है कि एलाइनमेंट एवं स्लोप के बीच एक फीट का गैप कार्य सम्पादन तक वहां नहीं पाया गया था, किन्तु नदी में जल स्तर बढने के उपरांत एप्रॉन में सेटलमेंट होने के कारण एलाइनमेंट एवं स्लोप के बीच कुछ गैप परिलक्षित हुआ और ऐसी त्रुटियों के निराकरण के लिए एकरारनामा में डिफेक्ट लाइबलिटी पीरियड का प्रावधान किया गया था। तदनुसार संवेदक ने उन त्रुटियों का निराकरण भी कर दिया। उन्होंने यह भी कहा है कि शोध एवं प्रशिक्षण प्रमंडल सं0-2 खगौल, पटना द्वारा उपलब्ध कराये गये गुणवत्ता जांच प्रतिवेदन में बोल्डर की गुणवत्ता सही बताई गई है, जबकि उड़नदस्ता जांच दल द्वारा कार्य मे व्यवहृत कुछ बोल्डर को नेत्रानुमान के आधार पर भरा एवं समतल बोल्डर बताया गया है। इसके अलावा जहां तक ओभर साईज एवं अंडर साईज बोल्डर का उपयोग का सवाल है, IS Code के अनुसार ओभर साईज बोल्डर का उपयोग रूपांकन के अनुसार किया जाता है, लेकिन हैण्डलिंग और प्लेसिंग में आने वाली दिक्कतों के कारण छोटे आकार को बोल्डर के्रेट में व्यवहार करने की अनुशंसा की गई है। वर्तमान में बडे आकार के बोल्डर की हैण्डलिंग और प्लेसिंग जे0सी0बी0 के द्वारा किये जाने में कोई कठिनाई नहीं है उनके अनुसार CWC से प्रकाशित हैण्डबुक फॉर फ्लड प्रोटेक्सन एंटी इरोजन एण्ड रिभर ट्र्रेनिंग वक्र्स के अनुसार रिभेटमेंट में बोल्डर सभी जगहों पर वेल-ग्रेडेड होना चाहिए तथा गैबियन या के्रटस की ओपनिंग छोटे बोल्डर से होनी चाहिए तथा बोल्डर का आकार 0.15 मी0 और 0.25 मीटर के बीच होना चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि जहां आवश्यक आकार के बोल्डर उपलब्ध नहीं है, वहां छोटे साईज के पत्थरों का इस्तेमाल पिचिंग के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने आगे यह भी कहा है कि अनूसूचित दर पुस्तिका के क्रम संख्या 15, 16 एवं 17 पर विभिन्न आकारों के बोल्डर एम-001, एम-002एवं एम-003 की दर एक समान है। इस प्रकार उनका मानना है कि खदान में उपलब्ध छोटे आकार के बोल्डर, जो के्रट के मेश आकार से अधिक हों का उपयोग बोल्डर के्रटिंग में किया जा सकता है और विभिन्न आकार के बोल्डरों की दर समान होने के कारण इनमें किसी वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बनता है। इस प्रकार उनका कहना है कि अंडर साईज, विदइन साईज तथा ओभर साईज मिलाकर बोल्डर के्रेटिंग प्रयोग करने से पैकिंग अच्छी होती है। विभागीय मंतव्य में इस संबंध में सिर्फ इतना कहा गया है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा निरीक्षण/पर्यवेक्षण नहीं कर पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं किया गया है। किन्तु जिस प्रकार से आरोपित पदाधिकारी ने CWC की गाइइलाइन्स, आई0एस0 कोड अनुसूचित दर पुस्तिका एकरारनामा आदि के प्रावधानों का साक्ष्य सहित उल्लेख करते हुए आरोपों का खंडन किया है, उसका विशिष्टि एवं साक्ष्य सहित जवाब विभाग या प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी ने नहीं दिया है। सुनवाई के दौरान प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी ने स्वीकार किया कि निम्न जलस्तर के आरोप पर विभाग ने आरोपित पदाधिकारी के बचान बयान से कमोवेश सहमत होते हुए नरमी बरती है। इस प्रकार सभी तथ्यों, तर्कों, परिस्थतियों एवं नियमों/प्रावधानों की विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि इस आरोप के कारण कोई वित्तीय अनियमितता नहीं हुई तथा किसी न किसी तकनीकी प्रावधान (एकरारनामा, आई0एस0 कोड, सी0डब्लू0सी0 अनुसूचित दर पुस्तिका आदि) के आलोक में आरोपित पदाधिकारी ने आवश्यक कार्य सम्पन्न किया था। ऐसी परिस्थिति में इस आरोप को स्पष्टतः सिद्ध करने में विभाग/प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी सफल नहीं रहे। अतः साक्ष्य के अभाव में यह आरोप प्रमाणित नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं0-1 को प्रमाणित एवं आरोप सं0-2 एवं 3 को अप्रमाणित पाया गया एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-2421 दिनांक 26.11.18 से श्री अरूण कुमार, तत0 अधीक्षण अभियंता से अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई। विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान ही श्री अरूण कुमार, तत0 अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अंचल, मोतिहारी के दिनांक 30.11.2018 को सेवानिवृत हो जाने के कारण उनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0-60 सहज्ञापांक-955 दिनांक 10.05.19 से बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43बी0 में सम्परिवर्तित किया गया।

श्री अरूण कुमार, तत0 अधीक्षण अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत अभियंता प्रमुख में अपने पत्रांक-0 दिनांक 14.12.18 से द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है- संचालन पदाधिकारी सह विभागीय जाँच आयुक्त द्वारा अपने मंतव्य में रेल मार्ग से बोल्डर ढुलाई कंडिका (1) में उल्लेखित सीमित समय की व्यवहारिक बाध्यता सहित अन्य दो कारकों को स्वीकार किया गया गया है लेकिन अपने ही मंतव्य को निष्कर्ष में समावेश किये बिना वास्तविक रूप से कराये गये कार्य के समतुल्य एक अतिरिक्त लोडिंग एवं अनलोडिंग के प्रावधान को अमान्य किया गया है। उनके द्वारा मंतव्य दिया गया है कि उस समय रेल मार्ग से ढुलाई को ही सड़क मार्ग से ढुलाई की अपेक्षा कम खर्च वाला माना जाता था और उसी हिसाब से ढुलाई का प्रावधान होता था। वर्त्तमान में सड़क मार्ग से बोल्डर ढुलाई की दर प्राक्कलन में विभाग द्वारा स्वीकृत की जा रही है। जिस स्थल पर रेलवे द्वारा निर्माण सामग्रियों की ढुलाई संभव हो वैसे स्थल पर रोड एवं रेलवे दोनों के द्वारा ढुलाई का दर की गणना कर दोनों में से जो न्यूनतम हो उसे प्रयोग में लाया जाय। फिर भी वर्त्तमान में रेल मार्ग से ढुलाई की दर न्यूनतम आने के बावजूद सड़क मार्ग से ढुलाई की अधिक दर विभाग द्वारा स्वीकृत की जा रही है। संचालन पदाधिकारी द्वारा व्यवहारिक बाध्यता का उल्लेख किया गया है। इसी व्यवहारिक बाध्यता के चलते ही अनुसूचित दर पुस्तिका में प्रावधान के विपरीत कार्य में रेल मार्ग से आकलित न्यूनतम दर को स्वीकृत नहीं कर सड़क मार्ग से ढुलाई की दर विभाग द्वारा स्वीकृत की जा रही है। इसे नियमानुसार विभागीय अनुसूचित दर पुस्तिका में प्रावधान (T.E.C Norms के अनुसार) का उल्लंघन माना जायेगा। इनके द्वारा विभागीय अनुसूचित दर पुस्तिका के प्रावधान के अनुसार ही रेल मार्ग से ढुलाई की दर स्वीकृत किया गया। तथा वास्तविक रूप से कराये गये कार्य के समतुल्य एक अतिरिक्त लोडिंग एवं103 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 अनलोडिंग का प्रावधान किया गया है। जब विभाग द्वारा व्यवहारिक बाध्यता के मददेनजर TEC Norms में संशोधन कराये बिना रेल मार्ग की तुलना में सड़क मार्ग से ढुलाई का दर की स्वीकृति दी जा रही है। वैसी स्थिति में इनके द्वारा वास्तविक रूप से कराये गये कार्य के समतुल्य एक अतिरिक्त लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान को तकनीकी दृष्टिकोण से अमान्य करते हुए दोषी माना जाना उचित नहीं है। एवं वास्तविक रूप से कराये गये सड़क मार्ग से ढुलाई कार्य मद को भी नियमानुसार TEC Norms के अनुसार स्वीकृति प्रदान कर नियम का अनुपालन करते हुए कुल 3,21,76,050/- का बचत किया गया। विषयांकित कार्य में व्यवहारिक बाध्यता के चलते वास्तविक रूप से बोल्डर ढुलाई रेल मार्ग से ज्यादा खर्च आने के बावजूद सड़क मार्ग से की गयी है। फिर भी वास्तविक रूप से सड़क मार्ग से कराये गये ढुलाई की स्वीकृति TEC Norms के आलोक में रेल मार्ग से दी गयी है। कंडिका (iii) में अंकित वास्तविक रूप से कराये गये कार्य के समतुल्य एक अतिरिक्त लोडिंग एवं अनलोडिंग को Assumption के आधार पर लिया गया। चूँकि वास्तव में न तो रेल मार्ग से ढुलाई करायी गयी एवं न ही रेलवे बैगन में कोई लोडिंग-अनलोडिंग का कार्य किया गया है। रेल मार्ग से ढुलाई कराने में संभावित कार्य मद के आकलन के आधार पर एक अतिरिक्त लोडिंग-अनलोडिंग के समतुल्य कार्य के दर को Assume कर दर स्वीकृति में प्रावधान किया गया है। अभियंता प्रमुख द्वारा दिये गये मंतव्य भी Assumption के आधार पर दिया गया है क्योंकि वास्तविक रूप से रेल मार्ग से ढुलाई कार्य कराया ही नहीं गया है। उपर के कंडिका के अनुसार बेतिया स्टेशन में स्टैक यार्ड उपलब्ध नहीं रहने के कारण बड़े पैमाने पर रेल मार्ग से बोल्डर ढुलाई कार्य कराया भी नहीं जा सकता है। अभियंता प्रमुख द्वारा Originating स्टेशन पर मात्र एक टीपर के बोल्डर को रेलवे बैगन में लोडिंग एवं पुनः Destination स्टेशन पर मात्र एक टीपर से रेलवे वैगन से अनलोडिंग के Assumption के आधार पर मंतव्य दिया गया है। वास्तविक स्थिति यह है कि इस योजना के लिये कुल 55000 घन मी॰ बोल्डर के लिये कुल 55 बोगी वाले 27 मालगाड़ी की आवश्यकता थी जबकि बेतिया यार्ड में एक मालगाड़ी बोल्डर रखने के लिये प्रर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं होने का प्रमाण पत्र माल अधीक्षक द्वारा दिया गया है। वास्तविक रूप से कराये गये सड़क मार्ग से बोल्डर ढुलाई कार्य के चलते अधिकाई भुगतान का कोई मामला भी परिलक्षित नहीं होता है।

श्री कुमार सेवानिृत अभियंता प्रमुख से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- आरोप-1 :-जो प्रश्नगत कार्य में स्वीकृत प्राक्कलन के मद सं॰ 4 एवं 5 (यथा बोल्डर क्रेटिंग एवं पिचिंग) में बोल्डर ढुलाई मद में एक अतिरिक्त लोडिंग एवं अनलोडिंग के लिये रू॰ 154.04 प्रति घन मी॰ का अधिक दर स्वीकृत करने के कारण एकरारित दर से भुगतान करने के फलस्वरूप कुल 69,22,650/- का अधिकाई भुगतान होने में इनकी सहभागिता होने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने निम्न तथ्य के आलोक में आरोप सं॰-1 प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। सभी तथ्यों एवं परिस्थितियों की समीक्षा करने से यह तथ्य उभरकर आता है कि उस समय रेल मार्ग से बोल्डर ढुलाई को ही सडक मार्ग से ढुलाई के अपेक्षा कम खर्च वाला माना जाता था और उसी हिसाब से ढुलाई का दर प्रावधान होता था किन्तु वर्तमान में सड़क मार्ग से बोल्डर ढुलाई का दर प्राक्कलन में विभाग द्वारा स्वीकृत की जा रही है। दूसरे यद्यपि श्री अरूण कुमार ने ही बोल्डर ढुलाई के लिये चार बार लोडिंग एवं अनलोडिंग का प्रावधान करते हुए इसकी दर निर्धारित की तिसरे संभावित बाढ़ के आलोक में कटाव रोकने के लिये तीन महिने के अन्दर सारे कार्य पूरा करना था जिसमें किसी प्रकार का विलम्ब राज्य सरकार एवं जनता के लिये अहितकर हो सकता था। ऐसे व्यवहारिक बाध्यता के चलते हुए माना जा सकता है कि विभाग द्वारा गणना की गयी 154.04 रूपये प्रति घन मी॰ की दर से 6922650/- का भुगतान अधिक प्रतीत होता है, मगर यह भी सही है कि मात्र दो बार लोडिंग एवं अनलोडिंग की अनुमान्यता के बावजूद चार बार लोडिंग-अनलोडिंग का प्रावधान करना और उसकी दर निर्धारित करने के लिये आरोपित पदाधिकारी को दोषी माना जा सकता है। अतः तर्को तथ्यों, सरकारी नियमों आदि के आलोक में आरोप सं॰-1 प्रमाणित होता है। श्री कुमार द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में लगभग वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है जिसका विस्तृत रूप से संचालन पदाधिकारी द्वारा समीक्षा करते हुए इनके द्वारा रेलवे से बोल्डर ढुलाई का दर अनुमोदित किया गया है जिसमें लोडिंग एवं अनलोडिंग कार्य में अधिक दर की स्वीकृति दी गयी है के आलोक में आरोप सं॰-1 प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। इनके द्वारा मुख्य रूप से कहा गया है कि वास्तविक रूप से कराये गये कार्य के समतुल्य एक अतिरिक्त लोडिंग एवं अनलोडिंग को Assumption के आधार पर दिया गया है चूँकि वास्तव में न तो रेल मार्ग से ढुलाई करायी गयी है एवं न ही रेलवे वैगन में कोई लोडिंग-अनलोडिंग का कार्य किया गया है। रेल मार्ग से ढुलाई कराने में संभावित कार्य मद के आकलन के आधार पर एक अतिरिक्त लोडिंग एवं अनलोडिंग के समतुल्य कार्य में दर को Assume के आधार पर दर प्रावधानित किया गया है स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि किसी भी कार्यमद का दर उक्त कार्य में वास्तविक रूप से की गयी क्रिया के आधार पर निर्धारित की जाती है न की Assumtion के आधार पर। जबकि दूसरे अभियंता प्रमुख द्वारा भी इस कार्य मद के दर में एक ही अदद लोडिंग एवं अनलोडिंग को सही माना गया है। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि बेतिया स्टेशन पर स्टैक यार्ड उपलब्ध नहीं रहने के कारण बड़े पैमाने पर रेल मार्ग से बोल्डर ढुलाई कार्य कराया भी नहीं जा सकता है। जब इन्हें ज्ञात था कि बेतिया स्टेशन पर स्टैक यार्ड नहीं है तो104 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 इनके द्वारा प्राक्कलन में रेल मार्ग का उपबंध क्यों किया गया। विचारणीय है। इससे स्पष्ट है कि इनके द्वारा प्राक्कलन में गलत प्रावधान होने के बावजूद रेल से बोल्डर ढुलाई का दर अनुमोदित किया गया। वह भी गलत ढंग से। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं॰-1 प्रमाणित होता है। आरोप-2 :-प्रश्नगत कार्य के तहत एप्रोन लेईंग का रेखांकण की स्वीकृति कराये बिना ही कार्य प्रारम्भ किया गया तथा कार्य के दौरान भी रेखांकण की स्वीकृति के दिशा में कारवाई नहीं करने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी द्वारा कहा गया है कि नदी के बहाव में बदलाव के फलस्वरूप रेखांकण में बदलाव की आवश्यकता होती है इसलिए नदी के किनारे रिभेटमेंट कार्य की स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। अतः सभी तथ्यों एवं परिस्थितियों के आलोक में आरोप सं॰ 2 को प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है। चंूँकि संचालन पदाधिकारी ने आरोप को अप्रमाणित होने के दिये गये मंतव्य के आलोक में आरोपी से इस आरोप के लिये द्वितीय कारण पृच्छा की न तो माँग की गयी न ही आरोपी द्वारा इस आरोप के संदर्भ में किसी प्रकार का बचाव बयान ही दिया गया है ऐसी स्थिति संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं॰-2 को अप्रमाणित माना जाता है। आरोप-3 :-जो बोल्डर रिभेटमेंट कार्य में LWL से उपर नियम के विपरीत कार्य प्रारम्भ करना तथा प्रावधान के विपरीत बोल्डर क्रेटिंग कार्य में मानक से अधिक ओभर साईज एवं अंडर साईज बोल्डर का उपयोग करना। साथ ही प्रावधान के अनुरूप क्रेट बाँधने में GI winding wire का उपयोग नहीं करने संबंधि पाये गये त्रुटियों के मद्‌देनजर कार्य का सहीं ढंग से निरीक्षण/पर्यवेक्षण नहीं करने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने आरोपी के कथन, विभाग द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्य तथा अन्य सभी तथ्यों, तर्को, परिस्थितियों एवं नियमों/प्रावधानों की विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि इस आरोप के कारण कोई वित्तीय अनियमितता नहीं हुई तथा किसी न किसी तकनीकी प्रावधान (एकरारनामा, IS Code, CWC, अनुसूचित दर पुस्तिका आदि) के आलोक में आरोपित पदाधिकारी द्वारा आवश्यक कार्य सम्पन्न किया था के आधार पर आरोप प्रमाणित नहीं होने का मंतव्य दिया गया है। उल्लेखनीय है कि आरोपी पदाधिकारी से मात्र आरोप सं॰-1 जिसे संचालन पदाधिकारी ने प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है के संदर्भ में द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी है। अर्थात इस आरोप सं॰-3 के संदर्भ में न तो विभाग द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की माँग ही की गयी, न ही आरोपी पदाधिकारी द्वारा इस आरोप के संदर्भ में बचाव बयान ही दिया गया है। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए इस आरोप सं॰-3 को अप्रमाणित माना जाता है। समीक्षोपरांत वर्णित समीक्षा के आलोक में सरकार द्वारा संचालन पदधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री कुमार के विरूद्ध आरोप संख्या-1 प्रश्नगत कार्य में बोल्डर ढुलाई मद (रेलवे से) बैगन में लोडिंग एवं अनलोडिंग में एक अतिरिक्त दर अनुमोदित करने का आरोप प्रमाणित होता है एवं आरोप संख्या-2 तथा 3 यथा प्रश्नगत कार्य के एप्रॉन लेईंग कार्य के एलाईनमेंट के अनुमोदन की दिशा में कार्रवाई नहीं करने तथा प्रश्नगत कार्य के कार्यान्वयन के दौरान निरीक्षण /पर्यवेक्षण सही ढंग से नहीं करने का आरोप अप्रमाणित होता है।

अतएव उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री अरूण कुमार तत0 अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण अंचल, मोतिहारी सम्प्रति सेवानिवृत अभियंता प्रमुख को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है। 'पेंशन से पांच प्रतिशत (5%)की स्थायी कटौती' सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में प्रस्तावित दण्ड पर विभागीय पत्रांक 148 दिनांक 04.02.2020 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना से परामर्श की माँग की गई। उक्त के आलोक में बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना द्वारा अपने पत्रांक-197 दिनांक 20.05.20 द्वारा श्री कुमार, तत0 अधीक्षण अभियंता के विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर अपनी सहमति प्रदान किया गया। अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त वर्णित निर्णय के आलोक में श्री अरूण कुमार, सेवानिवृत अभियंता प्रमुख, Flat no. 103 अनुभूति अपॉटमेंट, आनन्द पुरी, बोरिंग कैनाल रोड, पटना-1 के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है।

'पेंशन से पांच प्रतिशत (5%)की स्थायी कटौती'

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

------- 10 जून 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(सिवान)11-21/2012-A-776--श्री पृथ्वीराज सिंह (आई0डी0-जे 5117), तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर अवर प्रमंडल, बसंतपुर संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध श्रीमती गीता देवी, शिक्षिका को गंडक कॉलोनी वसंतपुर में नियम विरूद्ध तरीके से आवासित कर विभाग को आर्थिक क्षति पहुँचाने के आरोप के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2655 दिनांक-26.12.2018 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम-43(बी) के अधीन विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-244 दिनांक 27.03.2019 द्वारा समर्पित किया गया। जिसमें संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध गठित सभी आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-929 दिनांक-09.05.2019105 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति उपलब्ध कराते हुए श्री सिंह से द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी। तदलोक में श्री सिंह से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युार, संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन एवं अन्य अभिलेखों की समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा उन्हें ''10% (दस प्रतिशत) पेंशन की कटौती एक वर्ष के लिए'' का दण्ड देने का निर्णय लिया गया। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में प्रस्तावित दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्श की माँग की गई। तदालोक में बिहार लोक सेवा आयोग के पत्रांक-2599 दिनांक-09.01.2020 द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर सहमति संसूचित की गयी। प्रस्तावित दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग से प्राप्त सहमति के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-138 दिनांक-03.02.2020 द्वारा ''10% (दस प्रतिशत) पेंशन की कटौती एक वर्ष के लिए'' का दण्ड दिया एवं संसूचित किया गया। उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री सिंह द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन दिनांक-09.03.2020 समर्पित किया गया है, जिसमें कहा गया है कि उनका पेंशन 43,050/- रूपये है, जिसका एक वर्ष में महँगाई भाा 17% सहित राशि 87,828/- रूपये होता है। जबकि सरकारी राशि की क्षति मात्र 13,650/- रूपये ही है। मामला कालबाधित की श्रेणी में आता है। बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) 3 में आर्थिक क्षति के मामले में क्षति की राशि वसूलने का प्रावधान है। श्री सिंह द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अभ्यावेदन की समीक्षा में पाया गया कि एक वर्ष में महँगाई भाा 17% सहित राशि 87,828/- रूपये होने का कोई साक्ष्य उनके द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी के साथ संलग्न नहीं किया गया है। पुनर्विलोकन अर्जी में मुख्य रूप से उन्हीं बिन्दुओं का जिक्र किया गया है, जिनका जिक्र उन्होंने संचालन पदाधिकारी के समक्ष अपने बचाव बयान में तथा द्वितीय कारण-पृच्छा के जवाब में किया है। पुनर्विलोकन अर्जी में श्री सिंह के द्वारा किसी नये तथ्य का साक्ष्य के साथ उल्लेख नहीं किया गया है। वर्णित तथ्यों के आलोक में मामले की सम्यक समीक्षोपरांत सक्षम प्राधिकार द्वारा श्री सिंह के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में श्री पृथ्वीराज सिंह (आई0डी0-जे॰ 5117), तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर अवर प्रमंडल, बसंतपुर संप्रति सेवानिवृत द्वारा समर्पित पुनर्विलोकन अर्जी दिनांक-09.03.2020 को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना सं0-138 दिनांक-03.02.2020 द्वारा निर्गत दण्डादेश (10% (दस प्रतिशत) पेंशन की कटौती एक वर्ष के लिए) को यथावत्‌ रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, राशिद कलीम अंसारी, उप-सचिव।

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3 जून 2020

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)-14-13/2016-734--श्री ईश्वर सहाय राम (आई0डी0-4570) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सोन कमाण्ड क्षेत्र विकास एजेन्सी, भभुआ के पद पर पदस्थापन काल में सियापोखर पार्ट-2, आलाडाही, तुलसीपुर, ममरेजपुर पार्ट-2 एवं जिगना में पक्की सिंचाई नाली निर्माण कार्य में बरती गई अनियमितता के लिए विभागीय पत्रांक-770, दिनांक 29.05.2017 द्वारा स्पष्टीकरण की माँग की गई। उक्त आलोक में प्राप्त स्पष्टीकरण के समीक्षोपरांत निम्न आरोपों के लिए आरोप पत्र गठित कर श्री ईश्वर सहाय राम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2293, दिनांक 21.12.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई :- आरोप सं0-1 :-सियापोखर पार्ट-2, आलाडाही, तुलसीपुर, ममरेजपुर पार्ट-2 एवं जिगना में पक्की सिंचाई नाली निर्माण में वास्तविक कार्य से अधिक मापी मापीपुस्त में दर्ज किया गया। आरोप सं0-2 :-सियापोखर पार्ट-2, आलाडाही, तुलसीपुर, ममरेजपुर पार्ट-2 एवं जिगना ग्राम में कराये गये नाली निर्माण कार्य के विपत्र के अनुसार संवेदकों को भुगतेय राशि से अधिक भुगतान किया गया। इसके अतिरिक्त बिना विपत्र पारित किये भी मनमाने ढंग से संवेदकों को भुगतान किया गया। आरोप सं0-3 :-उक्त कार्यों के विपत्र से न तो रॉयल्टी, वैट, लेबर सेस आदि की कटौती की गयी और न ही सरकार के खजाने में जमा की गई। आरोप सं0-4 :-अधीनस्थों पर प्रशासनिक नियंत्रण का पूर्णतः अभाव पाया गया। इस प्रकार सरकारी राशि का गबन करने, सरकार को आर्थिक क्षति पहुँचाने, कर्त्तव्य में लापरवाही एवं उदासीनता बरतने के लिए प्रथम दृष्टया दोषी हैं। विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा उनके विरूद्ध गठित आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की प्रति श्री ईश्वर सहाय राम को उपलब्ध कराते हुए विभागीय पत्रांक-1880 दिनांक 30.08.2018 द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की माँग की गई। श्री राम द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर) समर्पित नहीं किया गया। फलस्वरूप श्री राम के विरूद्ध गठित आरोप, आरोप पत्र के साथ संलग्न साक्ष्य एवं उपलब्ध कागजात के आधार पर मामले की सरकार के स्तर पर समीक्षा के उपरांत निम्न तथ्य पाए गए :-

आरोप सं0-1 के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी पर वास्तविक कार्य से अधिक कार्य की मापी मापीपुस्त में दर्ज करने के लांछन की समीक्षा में पाया गया कि मापीपुस्त पर न तो मापी दर्ज करने वाले पदाधिकारी का हस्ताक्षर है और न ही मापी106 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 का सत्यापन करने वाले पदाधिकारी का, यानि कि असंपुष्ट मापी के आधार पर कार्यपालक अभियंता द्वारा विपत्र पारित किया गया। इस प्रकार मापी अवैध एवं अमान्य परिलक्षित होता है। तकनीकी परीक्षक कोषांग (निगरानी विभाग) का पत्रांक-462 दिनांक 30.03.1982 एवं बिहार वित्त नियमावली की कंडिका-266 में अवर प्रमंडल पदाधिकारी (सहायक अभियंता के समकक्ष पदाधिकारी) को अधीनस्थों द्वारा ली गयी मापी का कम से कम 50% (प्रतिशत) एवं कंडिका-267 में प्रमंडल पदाधिकारी (कार्यपालक अभियंता) को कम से कम 10% (प्रतिशत) जाँच करने संबंधी प्रावधान है। इस मामले में किसी भी स्तर से मापी की जाँच नहीं की गयी है। मापी में की गई प्रविष्टि का सत्यापन कराए बगैर श्री राम द्वारा संवेदक को भुगतान किया गया है।

चूँकि कार्य की मापी मात्र प्रविष्टि के आधार पर आरोपित पदाधिकारी द्वारा भुगतान किया गया है इसलिए यह स्पष्ट हो जाता है कि वस्तुतः यह बिना उचित मापी के भुगतान का मामला है। सामान्यतः कनीय अभियंता मापी लेते हैं, सहायक अभियंता स्तर के पदाधिकारी इसकी जाँच करते हैं। तदुपरांत कार्यपालक अभियंता द्वारा जाँच कर इसे पारित किया जाता है एवं पारित राशि का भुगतान होता है। इस प्रक्रिया में मापपुस्त का विधिवत संधारण करते हुए मापपुस्त मुवमेंट रजिस्टर पर हस्तगत एवं पावती दर्ज की जाती है। सहायक अभियंता स्तर के पदाधिकारी एवं कनीय अभियंता द्वारा विशेष रूप से सियापोखर पार्ट-2, आलाडाही एवं तुलसीपुर में स्थल निरीक्षण के दौरान मापीपुस्त में दर्ज मापी से स्थल पर कम कार्य पाया गया एवं इनके द्वारा संयुक्त रूप से निरीक्षण प्रतिवेदन हस्ताक्षरित है। चूँकि मापी लेने के लिए ये अधिकारी अधिकृत है; अतएव इनके द्वारा की गयी जाँच मान्य है। कार्यपालक अभियंता (आरोपित पदाधिकारी) द्वारा कनीय अभियंता एवं सहायक अभियंता को दरकिनार करते हुए स्वयं मापीपुस्त में मापीदर्ज किया गया है जो संपुष्ट नहीं है। यदि मातहत द्वारा कार्य में टाल-मटोल किया जा रहा था तो किसी अन्य सहायक अभियंता या कनीय अभियंता के प्रतिनियुक्ति पर विचार किया जा सकता था या यदि यह संभव नहीं था तो अधीक्षण अभियंता या उच्चाधिकारी के संज्ञान में लाकर मजबूरी में अधीनस्थ पदाधिकारियों के स्तर का कार्य भी कर सकते थे। उक्त के आलोक में एक अहस्ताक्षरित मापी के विरूद्ध एक हस्ताक्षरित प्रतिवेदन को माना जाना तर्क संगत है। यानि सियापोखर-2, आलाडाही एवं तुलसीपुर में नाली निर्माण का कार्य वास्तविकता से ज्यादा मापपुस्त पर दर्ज मानने का आधार पर्याप्त है। संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में उक्त मंतव्य देते हुए आरोप को प्रमाणित माना है, जिससे सहमत होते हुए आरोप सं0-1 प्रमाणित होता है।

आरोप सं0-2 के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी पर पक्की सिंचाई नाली निर्माण में विपत्र के अनुसार संवेदक को अधिक भुगतान किए जाने एवं कतिपय विपत्र बिना पारित किए मनमाने ढंग से भुगतान किए जाने से संबंधित है। आरोपित पदाधिकारी का मुख्यतः कहना है कि कार्य 100% पूर्ण था एवं विपत्र की राशि से कम भुगतान संवेदक को किया गया है साथ ही कहना है कि योजना तुलसीपुर एवं जिगना के विपत्र पर चुनाव ड्‌यूटी में व्यस्तता एवं अन्य कारण से हस्ताक्षर छूट गया होगा। सोन काडा स्तर से समर्पित जाँच प्रतिवेदन एवं साक्ष्य से निम्न तथ्य की पुष्टि होती है -

योजना का नाम विपत्र पारित होने की स्थिति JE/AE/ EE के हस्ताक्षर की स्थिति एकरारनामा सं0 मापीपुस्त सं0 विपत्र राशि (रू0) विपत्र के अनुसार संवेदक को भुगतान की जाने वाली राशि (रू0) वास्तविक रूप से संवेदक को भुगतान की गई राशि (रू0)
1 2 3 4 5 6 7 8
आलाडाही पारित 9.4.16 नहीं 26F2/15-16 2/16-17 6,17,489/- 3,81,466/- 5,00,000/-
सियापोखर-2 पारित 27.4.16 नहीं 06F2/16-17 4/16-17 8,15,315/- 5,18,088/- 6,00,000/-
जिगना नहीं नहीं 07F2/16-17 6/16-17 7,18,586/- 4,56,466/- 5,00,000/-
ममरेजपुर-2 पारित 12.5.16 नहीं 03F2/16-17 26/16-17 7,52,896/- 4,79,134/- 6,00,000/-
तुलसीपुर नहीं नहीं 04F2/16-17 36/16-17 6,07,475/- 3,86,697/- 3,00,000/-

स्तम्भ (8) में संवेदक को भुगतान की गई राशि एवं स्तम्भ (6) में अंकित विपत्र की राशि के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी द्वारा आरोप सं0-1 के अपने बयान में स्वीकार किया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि आरोपित पदाधिकारी स्तम्भ (6) में अंकित विपत्र की राशि के विरूद्ध स्तम्भ (8) में अंकित राशि का भुगतान किया गया जो संवेदक को भुगतान की जाने वाली राशि से भिन्न है, जिसे नियमसंगत भुगतान नहीं माना जा सकता है।

उपरोक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि मनमाने ढंग से चार योजनाओं में विपत्र के अनुसार संवेदक को वास्तविक रूप से भुगतान की जाने वाली राशि से अधिक एवं एक योजना (तुलसीपुर) में कम भुगतान किया गया जो नियमसंगत भुगतान नहीं है।

उपरोक्त तालिकाओं से विपत्र की राशि से कम भुगतान किए जाने की आरोपित पदाधिकारी के कथन की पुष्टि होती है। परन्तु संवेदक को किया गया भुगतान वास्तविक रूप से भुगतान की जाने वाली राशि से अधिक किया जाना प्रमाणित होता है।107 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 मापीपुस्त की प्रति के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि मापीपुस्त न तो निर्गत है और अंकित मापी सहायक अभियंता/कार्यपालक अभियंता द्वारा जाँचित नहीं है, जो कि विपत्र पारित करने के पूर्व नियमानुसार आवश्यक होता है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा आलाडाही, सियापोखर-2 एवं ममरेजपुर-2 के विपत्र को C&P कर पारित किया गया है जबकि जिगना एवं तुलसीपुर का मनमाने ढंग से नियमों को ताक पर रखकर बिना पारित किये संवेदक को भुगतान किया गया। अतः विभागीय दिशा निदेशों के बिना अनुपालन किए मनमाने ढंग से विपत्र पारित/बिना पारित के संवेदक को भुगतान किया गया।

इस प्रकार विपत्र के अनुसार संवेदक को वास्तविक रूप से भुगतान की जानेवाली राशि से मनमाने ढंग से अधिक राशि भुगतान किए जाने के मामला को संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप को प्रमाणित माना है जिससे सहमत होते हुए आरोप प्रमाणित होता है।

आरोप सं0-3 उक्त कार्यों के विपत्र से न तो रॉयल्टी, वैट, लेबर सेस आदि की कटौती की गई है और न ही सरकार के खजाने में जमा किए जाने का आरोप है।

इस संबंध में समीक्षा में पाया गया कि मापीपुस्त सं0-4/2016-17, 2/2016-17, 36/2016-17, 26/2016-17 एवं 6/2016-17 के अवलोकन से ज्ञात होता है कि संदर्भित 5 अद्‌द कार्यों के विपत्रों से इनकम टैक्स 1 प्रतिशत सुरक्षित जमा राशि, रॉयल्टी, भैट, लाभुक का हिस्सा, लेबर सेस की राशि सरकारी खजाने में उचित शीर्ष में Book Transfer या चालान द्वारा जमा की जाती है। Memo of payment के अनुसार संवेदक की चेक की राशि से भिन्न राशि का भुगतान किया गया है, ऐसी स्थिति में Memo में प्रविष्टि की गई अन्य कटौतियों की राशि वास्तविक नहीं रह गई है। इन राशियों का लेखा-जोखा निश्चित रूप से संधारित किया जाना संभव नहीं होता है जब तक Memo of Payment को रद्‌द नहीं किया जाय। चूँकि संशोधित Memo of payment तैयार नहीं किया गया है अतएव विपत्रों में की गई कटौती की राशि का उल्लेख सिर्फ कागजी एवं अनियमित है। इन Memo में वर्णित राशियों को अग्रेसित कर भविष्य में अंतिम विपत्र के साथ भी आकलित कर सरकारी खजाने में नहीं जमा किया जा सकता बशर्त्ते कि संशोधित Memo न बनाया जाय। जाहिर है कि कटौती की राशियाँ केवल कागजी है। ये राशियाँ भविष्य में जमा करने योग्य है जब तक कि Memo को Revise नहीं किया जाय। इस प्रकार संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप प्रमाणित होता है।

आरोप सं0-4 के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने नियंत्री पदाधिकारी अधीक्षण अभियंता तथा अपने अधीनस्थ सहायक अभियंता, कनीय अभियंता, प्रधान लिपिक, लेखा लिपिक आदि पर कतिपय गंभीर अनियमितता करने का उल्लेख किया है, जिसे संचालन पदाधिकारी द्वारा विचारणाीय नहीं कहा गया है। यदि गंभीर अनियमितता का मामला प्रकाश में आया तो आरोपित पदाधिकारी को सक्षम स्तर के पदाधिकारियों को प्रतिवेदित किया जाना चाहिए था। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने प्रमंडल अंतर्गत कार्यों की मापी कनीय अभियंता से नहीं की तो उनके विरूद्ध, सहायक अभियंता ने जाँच नहीं की तो उनके विरूद्ध, कार्यालय के कर्मी ने यदि विपत्र को चेक करने या भुगतान करने में उदासीनता दिखलाई तो उनके विरूद्ध उचित अनुशासनिक कार्रवाई का प्रस्ताव भेजना इनका उत्तरदायित्व था। उनका स्थानांतरण का प्रस्ताव भी उच्चाधिकारी को भेजकर अन्य कर्मियों का पदस्थापन/प्रतिनियुक्ति कराया जा सकता था। इस प्रकार कोई कार्रवाई किए जाने का उल्लेख आरोपित पदाधिकारी ने नहीं किया है जो अधीनस्थों पर पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण लाने के प्रयास का अभाव को प्रतिबंधित करता है। संचालन पदाधिकारी द्वारा उक्त मंतव्य देेते हुए आरोप को प्रमाणित माना है, जिससे सहमत होते हुए आरोप प्रमाणित माना जा सकता है।

उपरोक्त समीक्षा, संचालन पदाधिकारी का जाँच प्रतिवेदन एवं आरोपी पदाधिकारी से पूछे गये द्वितीय कारण पृच्छा का प्रत्युत्तर साढ़े तीन माह से अधिक अवधि बीत जाने के बावजूद उपलब्ध कराने में विफल रहने के फलस्वरूप विभागीय कार्यवाही के क्रम में प्राप्त बचाव-बयान के आलोक में श्री ईश्वर सहाय राम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सोन कमाण्ड क्षेत्र विकास एजेन्सी, भभुआ के पदस्थापन काल में पक्की सिंचाई नाली निर्माण कार्य में मनमाने ढंग से विभागीय दिशा-निर्देशों एवं संहिता का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करते हुए पक्की नाली निर्माण में वास्तविकता से अधिक का मापीपुस्त में मापी दर्ज करने, संवेदक को भुगतेय राशि से अधिक मनमाने ढंग से कुछ विपत्रों को नियमों की अनदेखी करते हुए विपत्र पारित कर भुगतान करने एवं कुछ में बिना विपत्र पारित के भी संवेदक को भुगतान किए जाने, विपत्रों से काटी गई रॉयल्टी, भैट, लेवर सेस आदि की राशि का उल्लेख मात्र कागजी एवं अनियमित करते हुए सरकारी खजाने में राशि जमा नहीं करने तथा अधीनस्थों पर पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण लाने के प्रयास में कोई कार्रवाई नहीं किये जाने के सभी चार आरोपों को संचालन पदाधिकारी द्वारा भी प्रमाणित पाये जाने के मंतव्य पर सहमत होते हुए आरोप सं0-1, 2, 3 एवं 4 के आरोप प्रमाणित पाया गया।

साथ ही उल्लेखनीय है कि श्री ईश्वर सहाय राम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति तकनीकी सलाहकार उत्तर कोयल नहर अंचल, औरंगाबाद तथा कार्यपालक अभियंता, रूपांकण प्रमंडल, औरंगाबाद के विरूद्ध पूर्व से अब तक निम्न दण्ड दिया जा चुका है -

क्र0. संक्षिप्त आरोप अधिसूचना सं0/दिनांक संचालन पदा0 का मंतव्य/निष्कर्ष निर्गत दण्ड
01. श्री ईश्वर सहाय राम (आई0डी0-4570) तत्कालीन कार्यपालक अधिसूचना सं0-1178 दिनांक 25.08.2013 केवल स्पष्टीकरण पूछा गया। (1) दिनांक 12.04.2005 से 06.12.2005 तक कार्य नहीं तो वेतन नहीं। परन्तु उक्त
अभियंता ग्रामीण विकास विभाग, बिहार, पटना के विरूद्ध दिनांक 12.04.2005 से 06. 12.2005 तक कार्य स े अनुपस्थित रहने के संबंध में गठित आरोप। अवधि को पे शन प्रदायी माना ं जाएगा। (2) आदेश निर्गत की तिथि से दो वर्षों तक प्रोन्नति पर रोक।
02. श्री ईश्वर सहाय राम, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, पूर्वी कोशी तटबंध प्रमंडल सं0-02, वीरपुर, सुपौल में पदस्थापन के दौरान वर्ष 2006-07 एवं 2007-08 में सम विकास योजना के तहत निर्मित सात अद्‌द स्लूईस गेटों के कार्य में अनियमितता बरतने क े संबंध मे । ं अधिसूचना सं0-131 दिनांक 31.01.2013 संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप को प्रमाणित नहीं पाया गया। (1) निन्दन वर्ष 2006-07 (2) संचयात्मक प्रभाव से एक वेतनवृद्धि।
03. श्री ईश्वर सहाय राम, तत्का0 कार्यपालक अभियंता तटबंध प्रमंडल सं0-02, वीरपुर के विरूद्ध सम विकास योजना से संबंधित मूल अभिलेख आदि गायब करने के संबंध में। अधिसूचना सं0-1971 दिनांक 02.09.2015 श्री ईश्वर सहाय राम, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता को दोषी माना है। दो वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक।
04. श्री ईश्वर सहाय राम, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, मोहनियाँ द्वारा अपने कार्य स्थल से गायब रहने, नहर के टूटान की सूचना नहीं देने, गाली-गलौज करने, धमकी देने आदि क े आरोप। अधिसूचना सं0-1107 दिनांक 15.06.2016 केवल स्पष्टीकरण पूछा गया। चेतावनी।
05. श्री ईश्वर सहाय राम, तकनीकी सलाहकार, उत्तर कोयल नहर अ चल, ं औरंगाबाद तथा कार्य0 अभि0, रूपांकण प ्रमंडल, औरंगाबाद (अतिरिक्त प्रभार) के विरूद्ध सरकारी कार्यों का ससमय निष्पादन नहीं करने उच्चाधिकारियों के आदेश के अवहेलना, मनमाने ढंग से मुख्यालय से बाहर रहने, कर्मचारियों को प्रताडित करने एवं सरकारी आवास खाली नहीं करने का आरोप। अधिसूचना सं0-457 दिनांक 01.03.2019 प्रपत्र-'क' के साथ स्पष्टीकरण प छा ू गया। दो वार्षिक व तनवृद्धि े पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।
बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 108

उपरोक्त वर्णित तथ्यों से स्पष्ट होता है कि श्री राम को सेवाकाल में पाँच विभागीय कार्यवाही में दंडित किया जा चुका है, तथा वर्तमान में एक मामला लंबित है। इससे स्पष्टतः परिलक्षित होता है कि श्री राम का सेवाकाल पूर्णतः दागदार रहा है।109 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 2. मामले की सम्यक समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री ईश्वर सहाय राम (आई0डी0-4570) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सोन कमाण्ड क्षेत्र विकास एजेन्सी भभुआ सम्प्रति तकनीकी सलाहकार उत्तर कोयल नहर अंचल, औरंगाबाद को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 14 के तहत "आदेश निर्गत की तिथि से अनिवार्य सेवानिवृति" करने का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-1444 दिनांक 10.07.2019 द्वारा आदेश निर्गत की तिथि से अनिवार्य सेवानिवृति का दंड संसूचित किया गया।

उक्त निर्णय दंडादेश के विरूद्ध श्री ईश्वर सहाय राम द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया। पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत पाया गया कि पुनर्विचार आवेदन में कोई नया तथ्य या साक्ष्य श्री राम द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया जिसके आधार पर उन्हें निर्दोष ठहराया जा सके। पुनर्विलोकन आवेदन में कोई नया तथ्य या साक्ष्य नहीं रहने के कारण उनके पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया।

अतएव सरकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में अधिसूचना संख्या-1444 दिनांक 10.07.2019 द्वारा संसूचित दंड ''आदेश निर्गत की तिथि से अनिवार्य सेवानिवृति'' को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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3 जून 2020

सं0 22/नि0सि0(सह0)-26-02/2018-733--श्री राम पदारथ नारायण (आई0डी0-4583) तत0 तकनीकी सलाहकार, कार्य अंचल-2, पूर्णियां सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, एकमा (छपरा) के विरूद्ध ग्रामीण कार्य विभाग, पटना से प्राप्त निम्न आरोप के लिए आरोप पत्र के साथ विभागीय पत्रांक-928 (अनु0 सहित) दिनांक 09.05.19 द्वारा स्पष्टीकरण की मांग की गयी :-

''कार्य प्रमंडल-2 अररिया के पत्रांक-351 दिनांक 14.03.11 के द्वारा अल्पकालीन निविदा आमंत्रण सूचना 11/10-11 के निविदा क्रमांक 6, 18 एवं 24 पर अंकित क्रमशः (i) अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, पदमपुर, जोकिहाट (ii) अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सिमराहा, फारविसगंज एवं (iii) अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, मिर्जापुर, रानीगंज की निविदा तकनीकी बीड का मूल्यांकन निविदा के शत्र्तो के अनुरूप नहीं किया गया है। इस प्रक्रियात्मक अनियमितता के लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत होते हैं।''

श्री नारायण द्वारा अपने स्पष्टीकरण के जवाब में मुख्य रूप से निम्न अंकित किया गया है :- तकनीकी परीक्षक कोषांग के जांच प्रतिवेदन के निष्कर्षित कंडिका 6.0.0 में अंकित है कि कंडिका 4.0.2, 4.0.4, 4.0.6 एवं कंडिका 5.0.0 के आलोक में गु्रप सं0-6, 18, 24 के तकनीकी बीड मूल्यांकण में त्रुटि, जो कि सभी निविदाओं के लिए किया गया है, के अवलोकन से यह लगता है कि निविदाशर्त के अनुरूप कार्रवाई नहीं की गई है, चूंकि इन शत्र्तों की अवहेलना प्रायः सभी प्राप्त निविदाओं के निविदाकारों के लिए किया गया है। अतः यह आवश्यक है कि प्रशासी विभाग अपने स्तर से एक दिशा निदेश निर्गत करने की कार्रवाई करें। निविदा के निष्पादन में निविदा की शर्त के अनुरूप कार्रवाई करते हुए निष्पादन की जाय। इससे स्वतः स्पष्ट है कि जांच पदाधिकारी द्वारा यह अनुशंसा किया गया था कि उक्त संबंध में दिशा निर्गत की जाय।

(ii) जांच प्रतिवेदन की कंडिका 4.0.2 में अंकित है कि पथ निर्माण विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक-326 दिनांक 22.

01.08 में उल्लेखित है कि उच्च श्रेणी में निबंधित निविदाकार अपने श्रेणी से नीचे की श्रेणी में निविदा डालने हेतु योग्य माना जायेगा। अतः निविदा समिति द्वारा मगध मनीषा कन्स0 प्रा0 लि0 को प्रथम श्रेणी में निबंधित होने के आधार पर निविदा में योग्य माना जाना उचित नहीं है। उक्त पत्र पथ निर्माण विभाग के पदाधिकारी के लिए निर्गत है, न कि सभी कार्य विभागों के पदाधिकारी के लिए है। अतः यह ग्रामीण कार्य विभाग के पदाधिकारी के लिए लागू नहीं माना जा सकता है।

श्री नारायण, कार्य0 अभि0 से प्राप्त स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में मुख्य रूप से पाया गया है जो निम्न है -

श्री नारायण द्वारा पथ निर्माण विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक-326 दिनांक 22.01.08 में उद्धृत है कि उच्च श्रेणी के ठेकेदार अपने श्रेणी से नीचे की श्रेणी में निविदा डालने हेतु योग्य माने जायेगे के संदर्भ में कहा गया है कि पथ निर्माण विभाग के उक्त पत्र पथ निर्माण विभाग के पदाधिकारी के लिए निर्गत है, न कि सभी कार्य विभागों के पदाधिकारी के लिए। पथ निर्माण विभाग के पत्रांक-326 दिनांक 22.01.08 से स्पष्ट होता है कि यह पत्र अभियंता प्रमुख-सह-अपर आयुक्त-सह-विशेष सचिव, द्वारा पथ निर्माण विभाग के सभी मुख्य अभियंता, सभी अधीक्षण अभियंता एवं सभी कार्यपालक अभियंता को संबोधित किया गया है। लेकिन तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा जांच प्रतिवेदन में उल्लेख करते हुए उक्त पत्र का अनुपालन नहीं होना बताया गया है।

मामले की सम्यक समीक्षोपरांत श्री नारायण, तकनीकी सलाहकार, कार्य अंचल, पूर्णियां को निविदा समिति के सदस्य होने के नाते प्रश्नगत कार्य में निविदा के तकनीकी बीड में पायी गयी त्रुटियों के लिए जिम्मेदार मानते हुए आरोप वर्ष के लिए 'निन्दन' का दंड संसूचित करने का निर्णय लिया गया हैं।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 110 उक्त निर्णय के आलोक में श्री राम पदारथ नारायण (ID-4583) तत0 तकनीकी सलाहकार, कार्य अंचल-2, पूर्णियां सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, एकमा (छपरा) को निम्न दण्ड संसूचित किया जाता है-

'निन्दन वर्ष 2010-11'

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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15 मई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-09/2017-678--श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह (आई0डी0-जे-7886) तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, बैरगनियाँ को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 13.08.2017 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ रिंग बाँध के मसान नरोत्तम ग्राम में सीपेज के कारण क्षतिग्रस्त होने, कर्त्तव्य में लापरवाही बरतने सहित अन्य अनियमितताओं के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-1605, दिनांक 14.09.17 द्वारा श्री सिंह को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं0-1688 दिनांक 20.09.17 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17(2) में निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

आरोप-दिनांक 13.08.2017 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ रिंग बाँध मसान नरोतम ग्राम में सीपेज के कारण टूट गया जिसके कारण जान-माल की व्यापक क्षति हुई। रिंग बाँध में सीपेज की मरम्मति की सूचना आपके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। विभागीय स्तर से आपको स्पष्ट रूप से निदेशित किया गया था कि बाँध की सतत निगरानी करायी जाय एवं आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति करा ली जाय। किन्तु आपके द्वारा विभागीय दिशा निर्देश का उल्लंघन किया गया। आपका यह कृत्य बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों के प्रति घोर लापरवाही एवं कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता, स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है। आपका यह कृत्य बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 3(iii) के प्रतिकूल है। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित आरोप को प्रमाणित पाया गया।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिंह, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी से विभागीय पत्रांक-1040, दिनांक 11.05.18 द्वारा लिखित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की गई।

उक्त के आलोक में श्री सिंह द्वारा अपने पत्रांक-25, दिनांक 08.06.18 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :-

श्री सिंह द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के कंडिका 1 से 5 तक में विभागीय कार्यवाही के संचालन के नियम, वांछित दस्तावेज उपलब्ध नहीं करोकर सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक-1893, दिनांक 14.06.11 के कंडिका 5(क) का अनुपालन नहीं होने, आरोप के संदर्भ में संचालन पदाधिकारी की समीक्षा बिना साक्ष्य के होने, प्रतिपरीक्षण का अवसर नहीं देना तथा मुख्य सचिव निगरानी के पत्रांक-1992 दिनांक 01.11.2017 के अनुरूप साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराने का उल्लेख किया गया है। साथ ही इनके द्वारा दिये गये तथ्यों एवं साक्ष्य का सही ढंग से विशलेषण किये बिना ही जाँच प्रतिवेदन देने से संबंधित तथ्यों का भी उल्लेख किया गया है। साथ ही आरोप से संदर्भित तथ्यों को चार भागों मेंं विभक्त कर निम्न बातें कही गयी हैं :-

(क) प्रथम भाग-संचालन पदाधिकारी का कथन कि कॉल डिटेल से बातचीत की प्रकृति का पता नहीं चलता है कि बातचीत सीपेज/मरम्मति के बारे में हुई है के संदर्भ में कहा गया है कि विषय बाढ़ जैसे स्थिति में मैं सात बार कार्यपालक अभियंता/अधीक्षण अभियंता से क्या बात करूँगा। बाढ़ग्रस्त हाल में अपने अन्य पदाधिकारी से हुई बातचीत में कराये जा रहे कार्यों से हटकर कोई दूसरी जानकारी देना कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

(ख) द्वितीय भाग- संचालन पदाधिकारी का कहना है कराये गये कार्यों के साक्ष्य स्वरूप समर्पित फोटो से पता नहीं चलता है कि यह फोटो उक्त स्थल पर कराये गये कार्य के है इस संदर्भ में कहा गया है कि समर्पित NR में कार्य स्थल के कॉलम में बाँधाें का जिक्र किया गया है।

(ग) तृतीय भाग-कराये गये कार्यों का स्पष्ट प्रमाण नहीं है के संदर्भ में कहा गया है कि कार्य से संबंधित NR एवं HR से भी यह स्पष्ट हो गया कि कार्य इन्हीं बाँधों से संबंधित है। साथ ही प्रपत्र-24 की छायाप्रति संलग्न है, जिसे मुख्य अभियंता द्वारा विभाग को प्रेषित है।

(घ) चतुर्थ भाग-बाँध की सतत निगरानी नहीं करने एवं आवश्यकतानुसार मरम्मति कार्य नहीं कराने के संबंध में कहा गया है कि तटबंध की निगरानी हेतु होम गार्ड के 31 जवानों को बाँध पर प्रतिनियुक्त किया गया था तथा कनीय अभियंता द्वारा लगातार चौकसी की जा रही थी एवं उनके द्वारा भी सतत पर्यवेक्षण किया जा रहा था। जिसके साक्ष्य स्वरूप लॉग बुक तथा तेल भाउचर की प्रति संलग्न किया गया। संयुक्त निरीक्षण में भी उक्त तटबंध की मरम्मति की आवश्यकता नहीं पायी गयी। संचालन पदाधिकारी के उपरोक्त टिप्पणी साक्ष्य आधारित नहीं है। जिसे विधिसंगत नहीं माना जा सकता है। श्री सिंह, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री सिंह के विरूद्ध आरोप का मुख्य अंश है कि -111 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (1) दिनांक 13.08.17 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ रिंग बाँध के मसान नरोत्तम ग्राम में सीपेज होने एवं सीपेज की मरम्मति की सूचना उच्चाधिकारी को नहीं दी गयी एवं बाँध टूट गया।

(2) बाँधों की सतत निगरानी एवं आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति का विभागीय दिशा निदेशों का उल्लंघन किया गया जो बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों के प्रति लापरवाही एवं कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता, स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है। संचालन पदाधिकारी ने आरोपी श्री सिंह द्वारा उपलब्ध कराये गये बचाव बयान के आलोक में समर्पित जाँच प्रतिवेदन में निम्न बातें कहीं हैं :-

मुख्य आरोप यह है कि दिनांक 13.08.17 ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ, रिंग बाँध मसान नरोत्तम ग्राम में टूटान मरम्मती की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी। साथ ही बाँध की सतत निगरानी एवं आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति का विभागीय दिशा निदेशों का उल्लंघन किया गया जो बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों के प्रति घोर लापरवाही एवं कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता, स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है।

आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि लोक निर्माण विभाग के कंडिका 49 के आलोक में सहायक अभियंता का पदीय दायित्व का निर्वहन करते हुए उनके द्वारा बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के संदर्भ में कार्रवाईयों की सूचना कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को दी गई है। जिससे इसकी पुष्टि में मोबाईल सं0-7250918599 का कॉल डिटेल संलग्न किया गया है। जिससे आरोपित पदाधिकारी द्वारा क्रमशः कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता का मोबाईल बताया गया है। परन्तु उक्त कॉल डिटेल से संवाद की प्रकृति स्थापित करना संभव नहीं है जिससे यह स्थापित किया जा सके कि संवाद विषयांकित सीपेज/टूटान से ही संबंधित है। मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर अपने परिक्षेत्र के वरिष्ठतम पदाधिकारी होते है। उनके द्वारा अपने पत्रांक-2(सी), दिनांक 13.08.2017 में स्पष्ट प्रतिवेदित किया गया है कि बाँध के प्रभारी अवर प्रमंडल पदाधिकारी (आरोपित पदाधिकारी) द्वारा भी तटबंध से सीपेज की सूचना नहीं उपलब्ध करायी गई। जबकि गश्ती नियमावली बाढ़ नियंत्रण आदेश एवं अन्य विभागीय पत्रों से सूचना प्रेषण एवं अन्य दिशा-निर्देश विभाग के द्वारा निर्गत किया गया था। इस प्रकार उपरोक्त से विषयांकित रिंग बाँध से सीपेज/मरम्मति की सूचना उच्चाधिकारियों को दिये जाने को स्थापित नहीं होता है।

सीपेज मरम्मति के संदर्भमें आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि नेपाल और बिहार के उतरी जिलों में अतिवृष्टि के कारण एकाएक लालबकिया, झाझा एवं बागमती नदी में उफान आया एवं बैरगनियाँ, रिंग बाँध मसान पर नरोत्तम ग्राम के नेपाल की ओर से Flash Flood में अत्याधिक वेग से जल प्रवाह हुआ जिससे बैरगनियाँ, रिंग बाँध पर भारी दबाव एकाएक बढ गया। उक्त बाँध से हो रहे रिसाव को रोकने के लिए River Side में बालू भरे बोरे से पीचींग एवं Country Side में well बनाकर सीपेज नियंत्रण का प्रयास किया गया परन्तु रिसाव नियंत्रित नहीं हुआ और 05ः15 बजे रिंग बाँध क्षतिग्रस्त हो गया। सम्पुष्टि में फोटोग्राफ, हस्तपावती रसीद, विभागीय एन0आर0 एवं समाचार पत्र का कतरन संलग्न किया गया है। इस संदर्भ में विभागीय मंतव्य में "बाँध में हो रहे सीपेज को नियंत्रित करने हेतु किये गये प्रयास के संबंध में आरोपी पदाधिकारी द्वारा कोई स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है," यह प्रतिवेदित किया गया है। स्पष्ट है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराये गये साक्ष्य विभाग द्वारा संतोषप्रद नहीं माना गया। फोटोग्राफ्स के अवलोकन से यह स्थापित नहीं किया जा सकता है कि फोटोग्राफ्स में दिखाये गये कार्य विषयांकित मसान नरोत्तम ग्राम में बाढ़ संघर्षात्मक कार्य से ही संबंधित है। इस प्रकार हस्तपावती रसीद से प्राप्त सामग्री विषयांकित स्थल के मरम्मती में ही प्रयोग किया गया है इससे स्थापित नहीं होता है। इस प्रकार विभागीय मंतव्य से सहमत होने का आधार बनता है।

उपरोक्त से आरोपित पदाधिकारी द्वारा आपात स्थिति की सूचना वरीय पदाधिकारी को नहीं देने, बाँध की सतत चौकसी नहीं बरतने एवं आवश्यकतानुसार मरम्मती कार्य नहीं कराने संबंधित विभागीय दिशा निदेशों का उल्लंघन का मामला बनता है जिसके कारण सीपेज की जानकारी एवं इसकी ससमय मरम्मती नहीं होने के कारण रिंग बाँध क्षतिग्रस्त हुआ। अगर ससमय सीपेज की रोकथाम के लिए आरोपित पदाधिकारी द्वारा कार्रवाई की जाती तो बाँध के सुरक्षित होने की संभावना बनती। कॉल डिटेल से संवाद की प्रकृति स्थापित करना संभव नहीं है के आलोक में आरोपी का कथन कि उनके द्वारा अधीक्षण अभियंता को सीपेज एवं उसकी मरम्मति की सूचना दी गयी को मुख्य अभियंता के पत्रांक-2(सी) दिनांक 13.08.17 में प्रतिवेदित किया जाना कि तटबंध से सीपेज की सूचना नहीं उपलब्ध करायी गयी, के आलोक में अस्वीकार योग्य माना गया है। सीपेज/मरम्मति की सूचना उपलब्ध कराने के संदर्भ में आरोपी द्वारा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं करायी गयी है। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आपात स्थिति की सूचना वरीय पदाधिकारी को नहीं देने, बाँध की सतत चौकसी नहीं करने एवं आवश्यतानुसार मरम्मति कार्य नहीं करा कर विभागीय निदेशों का उल्लंघन करने के कारण सीपेज का ससमय मरम्मति नहीं होने से रिंग बाँध क्षतिग्रस्त होने से संबंधित आरोप श्री सिंह के विरूद्ध आरोप प्रमाणित पाया जाता है।

समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिंह को विभागीय अधिसूचना संख्या-2083, दिनांक 18.09.18 द्वारा श्री सिंह को निलंबन से मुक्त किया गया एवं उनके विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर विभागीय पत्रांक 2231 दिनांक 04.10.2018 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना से परामर्श की माँग की गई। उक्त के आलोक में बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना द्वारा अपने पत्रांक-699, दिनांक 26.06.2019 द्वारा श्री सिंह, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर अपनी सहमति प्रदान किया गया। ततपश्चात विभागीय अधिसूचना सं0-1431 दिनांक 09.07.19 से निम्न दण्ड श्री सिंह, अवर प्रमंडल पदाधिकारी को संसूचति किया गया।

"कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।"112 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री सिंह, सहायक अभियंता द्वारा अपने ज्ञापांक-0 दिनांक-19.08.19 से पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :-

श्री सिंह द्वारा अपने पुनर्विलोकन अर्जी की कंडिका 1 से 10 (viii) तक में इनका निलंबन आदेश विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी की कृत कारवाई वांछित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराना द्वितीय कारण पृच्छा तथा अधिरोपित दण्ड का विस्तृत वर्णन किया गया है एवं कहा गया है कि उनके द्वारा दिये गये साक्ष्य एवं तथ्य पर बिना विचार किये ही एवं बिना अभिलेख उपलब्ध कराये ही एक पक्षीय निर्णय लते हुए दण्ड अधिरोपण किया गया है जो न्याय संगत नहीं है एवं नियम के विरूद्ध है।

The appellant has already informed his superior i.e. ex. engg. and superintendent engg. And he was not authorized to inform the higher authorities but during enquiry such crucial point was ignored.

श्री विरेन्द्र कुमार सिंह, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये।

(क) दिनांक 13.08.17 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनिया रिंग बांध के मशान नरोत्तम ग्राम में सीपेज होने एवं उसकी मरम्मति की सूचना उच्चाधिकारी को नहीं दी गयी एवं बांध टूट गया।

(ख) बांधाें का सतत निगरानी एवं आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति नहीं कर विभागीय दिशा निदेशों का उल्लंघन किया गया, जो बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों के प्रति लापरवाही एवं कत्र्तव्य के प्रति उदासीनता, स्वेच्छाचारिता दर्शाता है।

श्री सिंह द्वारा आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि The appellent has already informed his superior i.e. Executive Engineer and superintendent engineer and he was not authorized to inform the heigher authorities but during enquiry such crucial point was ignored परन्तु उक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। जबकि मुख्य अभियंता का पत्रांक 2(C) दिनांक 13.08.17 में प्रतिवेदित किया गया है कि तटबंध में सीपेज होने की सूचना उपलब्ध नहीं करायी गयी के आलोक में इनका उपरोक्त कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। आपात स्थिति में वरीय पदाधिकारी को सूचना नहीं देने, बांध पर सतत चौकसी नहीं करने एवं आवश्यतानुसार मरम्मति कार्य ससमय नहीं कराकर विभागीय निदेशों का उल्लंघन करने के कारण सीपेज पर ससमय नियंत्रण नहीं होने से रिंग बांध टूटने के लिये दोषी प्रतीत होते हैं। उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त आरोपी द्वारा इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही से लेकर दण्ड अधिरोपण तक का विस्तृत रूप से वर्णन कर संचालित विभागीय कार्यवाही को त्रुटिपूर्ण बताया गया है परन्तु इनके विरूद्ध कृत सभी कार्रवाई नियमानुकूल है।

उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त श्री सिंह, तत0 सहायक अभियंता द्वारा कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है। ऐसी स्थिति में श्री सिंह का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है।

समीक्षोपरांत श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह, सहायक अभियंता के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड "कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह, अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सोन नहर अवर प्रमंडल, सिद्धीपुर (सोन नहर प्रमंडल, विक्रमगंज), रोहतास के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड "कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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15 मई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)06-09/2017-677--श्री राम विनय सिन्हा (आई0डी0-3574) तत0 कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, सीतामढ़ी को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 13.08.2017 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ रिंग बाँध के मसान नरोत्तम ग्राम में क्षतिग्रस्त होने, कर्त्तव्य में लापरवाही बरतने सहित अन्य अनियमितताओं के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-1604, दिनांक 14.09.17 द्वारा श्री सिन्हा को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं0-1687 दिनांक 20.09.17 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17(2) में निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

आरोप - दिनांक 13.08.2017 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ रिंग बाँध मसान नरोतम ग्राम में सीपेज के कारण टूट गया जिसके कारण जान-माल की व्यापक क्षति हुई। रिंग बाँध में सीपेज की मरम्मति की सूचना आपके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। विभागीय स्तर से आपको स्पष्ट रूप से निदेशित किया गया था कि बाँध की सतत निगरानी करायी जाय एवं आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति करा ली जाय। किन्तु आपके द्वारा विभागीय दिशा निर्देश का उल्लंघन किया गया। आपका यह कृत्य बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों के प्रति घोर लापरवाही एवं कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता, स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है। आपका यह कृत्य बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 3(iii) के प्रतिकूल है।113 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री राम विनय सिन्हा, तत0 कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित आरोप को प्रमाणित पाया गया।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिन्हा, तत0 कार्यपालक अभियंता से विभागीय पत्रांक-1039, दिनांक 11.05.18 द्वारा लिखित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की गई।

उक्त के आलोक में श्री सिन्हा द्वारा अपने पत्रांक-16, दिनांक 08.06.18 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई है :-

श्री सिन्हा द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के कंडिका 1 से 5 तक में इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्य के नियम के तहत साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया, सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक-1893, दिनांक 14.06.11 के विपरीत कार्यवाही करना, तथा संचालन पदाधिकारी द्वारा किये गये समीक्षा के कई बिन्दु पर अपना आपत्ति दर्ज किया गया है। आरोप से संदर्भित द्वितीय कारण पृच्छा में निम्न तथ्य अंकित किया गया है -

(क) आरोप खण्ड-i- यह स्पष्ट नहीं है कि बैरगनियाँ रिंग बाँध में सीपेज की सूचना प्राप्त होने पर स्थल पर गये। BSNL मोबाईल के CDR (मो0 9431276371) से स्पष्ट है कि दिनांक 13.08.17 को सबेरे 05ः38 बजे Sisaula Kalan Tower Range में था। पुनः 05ः49 बजे बैरगनियाँ के Tower Range में था जिस समय बैरगनियाँ रिंग बाँध पर पहुँच चुके थे। इस प्रकार सीपेज की सूचना के पश्चात 1 घंटे के भीतर उस स्थल पर पहुँच चुका था। इससे स्पष्ट है कि जानबूझ कर अस्वीकार कर Intentionally आरोपित करने का प्रयास किया गया है। (ख) आरोप खण्ड-ii- संचालन पदाधिकारी के जाँच पत्र के अनुसार आरोपित पदाधिकारी द्वारा सीपेज की सूचना उच्चाधिकारियों को दे दिये जाने के बचाव बयान स्थापित नहीं होता है। क्योंकि रिंग बाँध में सीपेज मरम्मति नहीं होने से टूटान हुआ एवं मुख्य अभियंता जो परिक्षेत्र के वरीय पदाधिकारी है द्वारा सूचना नहीं दिये जाने का प्रतिवेदित किया गया। सीपेज मरम्मति की सूचना सभी उच्च पदाधिकारी को अपने निजी मोबाईल से दिया। साक्ष्य के रूप में CDR संलग्न किया गया है। श्री सिन्हा द्वारा एक सारणीबद्ध तथ्य अंकित किया गया है एवं निम्न तथ्य अंकित किया गया है - (i) जिला पदाधिकारी से कुल 11 बार सम्पर्क में था एवं बातचीत हुआ। (ii) जिला बाढ़ नियंत्रण कक्ष से 2 बार वार्ता हुई। (iii) अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढ़ी से 6 बार वार्ता हुई। (iv) अध्यक्ष, बाढ़ संघर्षात्मक दल से 7 बार बातचीत हुई। (v) मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर से जिला पदाधिकारी, सीतामढी द्वारा 2 बार बातचीत हुई। (vi) मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के बाढ़ नियंत्रण कक्ष से एक बार बातचीत हुई। (vii) श्री रामाशंकर प्रसाद, सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना से 8 बार बातचीत हुई। (viii) अनुमंडल पदाधिकारी, सीतामढी से 3 बार बातचीत हुई।

मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर से सम्पर्क करने पर बात नहीं हो सकी, परन्तु उनके कार्यालय से बातचीत हुई एवं मरम्मति कार्य की पुरी जानकारी दी गयी। बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराकर परिस्थति को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा था, परन्तु जल स्तर के वृद्धि के चलते सीपेज नियंत्रित नहीं हो पा रही थी तथा H.G. Line Failure के कारण तटबंध क्षतिग्रस्त हो गया। (ग) आरोप खण्ड-iii- बिहार लोक निर्माण संहिता के कंडिका 30, 33, 143 में उल्लेखित तथ्य कार्यपालक अभियंता के दायित्वों से संबंधित है तथा मुख्य सचिव के पत्रांक-1934 दिनांक 11.06.17 से निर्गत बाढ़ नियंत्रण आदेश 2017 के कंडिका 8.02 का अभिकथन अंकित है का अनुपालन नहीं करने से संबंधित है। (ग) आरोप खण्ड-iv- वर्षा एवं लगातार बढते जलस्तर की स्थिति में सतत निगरानी चौकसी बरती जाती तो प्रारंभिक अवस्था में ही सीपेज पर नियंत्रण संभव हो पाता। तटबंध की देख रेख हेतु एक-एक कि0मी0 पर होम गार्ड तैनात किया गया था तथा सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता द्वारा भी निगरानी की जा रही थी। यह स्थल संवेदनशीलता की दृष्टि से सामान्य स्थल के रूप में चिन्हित था। नदी की अप्रत्याशित जल प्रवाहित होने के कारण Overtop करने के चलत बायाँ तटबंध करीब 17 जगहों पर क्षतिग्रस्त हुआ तथा बागमती दायाँ तटबंध करीब तीन जगहों पर क्षति हुआ। बैरगनियाँ रिंग बाँध में कई जगहों पर रिसाव की सूचना 05ः38 बजे सबेरे मिली। तुरन्त मसहा स्थल पर प्रस्थान किया। सूखी मिट्टी की अनुपलब्धता के बावजूद कार्य प्रारंभ किया गया। जलस्तर बढते रहने के कारण रिसाव भी तेज होता जा रहा था, स्थानीय जन विरोध के कारण सुरक्षात्मक कार्य में कठिनाई होने के बावजूद कार्य जारी रखा गया। परन्तु H.G. Line Fail होने के कारण तटबंध क्षतिग्रस्त हुआ। अतः यह तर्क देना कि सतत निगरानी बरती जाती तो प्रारंभिक अवस्था में ही सीपेज पर नियंत्रण संभव हो पाता, बेबुनियाद है। शाम को मसान स्थल पर पिछले HFL-72.81M से बढ़कर 73.90M एवं बागमती नदी का जलस्तर ढेंग पुल पर पिछले HFL- 72.34M से बढ़कर 72.95M हो गया। (घ) आरोप खण्ड-V- स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराया गया। परन्तु उनके द्वारा कराये गये कार्य की पुष्टि नहीं होती है फलतः सीपेज के कारण टूटान हुआ। विभाग द्वारा भी इस सम्पुष्ट नहीं बताया गया तथा मुख्य अभियंता के पत्रांक-2,बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 114 दिनांक 13.08.17 से भी आरोप प्रमाणित पाया गया है। दिनांक 13.08.17 को कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य का NR (108 दिनांक 30.08.17) से कार्य का प्रतिवेदन समर्पित है तथा प्रपत्र-24 की छायाप्रति संलग्न है। जिससे 13.08.17 को बैरगनियाँ रिंग बाँध पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की पुष्टि होती है। (ड) आरोप खण्ड-VI- आरोपी पदाधिकारी का कृत्य संतोषजनक एवं विभागीय दिशा निदेशों के अनुकूल नहीं रहा जो उनके संवेदनशील कार्य के प्रति लापरवाही एवं कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता दर्शाता है। इस संदर्भ में कहा गया है कि संचालन पदाधिकारी लोक निर्माण विभाग संहिता vol-1 की कंडिका 30, 33 एवं 143 तथा बिहार वित्त नियमावली vol-1 के नियम-33 का गलत ढंग से विशलेषण करते हुए आरोप प्रमाणित होने का निष्कर्ष अंकित किया गया है। कार्यपालक अभियंता अपने अधीक्षण अभियंता के प्रति अपने कार्यों के कार्यान्वयन एवं प्रबंधन के लिये जिम्मेवार है।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि संचालन पदाधिकारी के समक्ष दिये गये बचाव बयान जो साक्ष्य आधारित थे पर बिना विचार किये एवं बिना जाँचे ही प्रतिवेदन समर्पित किया गया। अतः तथ्यों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए आरोप से मुक्त किया जाय।

श्री सिन्हा, तत0 कार्यपालक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री सिन्हा के विरूद्ध आरोप का मुख्य अंश है कि दिनांक 13.08.17 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनियाँ रिंग बाँध मशान नरोत्तम में सीपेज के कारण टूटने से व्यापक क्षति पहुँची एवं सीपेज मरम्मति की सूचना उच्चाधिकारी को नहीं दी गयी। साथ ही, बाँध की सतत निगरानी एवं आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति हेतु निर्गत विभागीय दिशा निदेशों का उल्लंघन किया गया जो बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 3(iii) का उल्लंघन है तथा कार्यों के प्रति लापरवाही एवं कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता, स्वेच्छाचारिता से संबंधित है।

आरोपी द्वारा कहा गया है कि सीपेज होने की सूचना प्राप्त होने पर प्रातः 6.49 बजे बैरगनिया रिंग बाँध पर पहुँच चुका था। (साक्ष्य के रूप में अपना मोबाईल सं0 9431276371 का CDR संलग्न किया गया है) संचालन पदाधिकारी ने सीपेज होने की सूचना प्राप्त होने पर स्थल पर जाने एवं इसकी सूचना उच्चाधिकारी को दिये जाने संबंधी कोई साक्ष्य संलग्न नहीं है तथा मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा कहा गया कि शाम 5.20 बजे टूटान होने की सूचना दी गयी, के आलोक में मोबाईल के CDR को औचित्यहीन मानते हुए सीपेज की सूचना उच्चाधिकारियों को दिये जाने का आरोपी के बयान को स्वीकार योग्य नहीं माना गया है जिससे सहमत हुआ जा सकता है।

श्री सिन्हा द्वारा यह भी कहा गया है कि सीपेज की मरम्मति की सूचना सभी पदाधिकारी को निजी मोबाईल के माध्यम से दिया गया था तथा CDR के आधार पर दिनांक 13.08.17 को विभिन्न पदाधिकारी से किये गये सम्पर्क एवं हुई बातचीत से संबंधित एक सारणी अंकित किया गया है। परन्तु उनके द्वारा एक भी ऐसा साक्ष्य नहीं दिया गया है जिससे स्थापित हो सके कि उनके द्वारा तटबंध में हो रहे सीपेज एवं उसकी मरम्मति से संदर्भित सूचना उच्चाधिकारी को दी गयी हो। ऐसी स्थिति मात्र CDR के आधार पर यह स्थापित करना संभव नहीं है कि उनके द्वारा सीपेज होने एवं उसकी मरम्मति की सूचना मुख्य अभियंता एवं अन्य उच्च पदाधिकारी को दी गयी है। परन्तु CDR से परिलक्षित है कि 13.08.17 के 11.58 बजे मुख्य अभियंता से श्री सिन्हा के द्वारा सम्पर्क किया गया है।

श्री सिन्हा द्वारा बिहार लोक निर्माण संहिता vol-1 की कंडिका 30, 33 एवं 143 तथा मुख्य सचिव, पटना के पत्रांक-1934 दिनांक 11.05.17 से निर्गत बाढ़ नियंत्रण आदेश 2017 के कंडिका 8.02 के उल्लंघन करने के संदर्भ में मूल आरोप प्रपत्र-'क' के कंडिकाओं का उल्लेखित करते हुए कहा गया है कि आरोप पत्र-'क' में ऐसा कोई आरोप नहीं है तथा यह कार्रवाई सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक-1893, दिनांक 14.06.11 के कंडिका-5(क) के आलोक में उचित नहीं है। जबकि संचालन पदाधिकारी ने बिहार लोक निर्माण संहिता vol-1 की कंडिका 30, 33 एवं 143 तथा मुख्य सचिव के पत्रांक 1934 दिनांक 11.05.17 के कंडिका 8.02 के अनुसार मुख्य अभियंता से कार्यपालक अभियंता तक के पदाधिकारी बाढ की स्थिति की सूचना तुरन्त संबंधित जिला पदाधिकारी तथा केन्द्रीय बाढ़ नियंत्रण कोषांग, पटना को देना है, का भी उल्लंघन किया जाना माना गया है।

संचालन पदाधिकारी का मत कि वर्षा एवं लगातार बढते जलस्तर की स्थिति में सतत निगरानी एवं चौकसी बरती जाती तो प्रारंभिक अवस्था में सीपेज पर नियंत्रण संभव हो पाता। इस संदर्भ में आरोपी द्वारा कहा गया कि तटबंधों की निगरानी हेतु होम गार्ड के पाँच जवान करीब एक-एक कि0मी0 के अन्तराल पर प्रतिनियुक्त था। उक्त स्थल पर सीपेज को रोकने हेतु सुरक्षात्मक कार्य कराया जा रहा था, परन्तु जलस्तर में लगातार बढ़ोतरी होने एवं पुराने एच0एफ0एल0 से करीब 4 फीट उपर जलस्तर हो जाने पर H.G. Line के उपर Cover कमजोर होने के कारण स्थिति अनियंत्रित हो गयी। अंततः तटबंध क्षतिग्रस्त हुआ। संचिका में रक्षित अभिलेखों से स्पष्ट है कि ढेंग पुल पर दिनांक 13.08.17 को जलस्तर 72.95मी0 तथा Goabari वीयर पर जलस्तर 73.80मी0 पाया गया है। जो क्रमशः उक्त स्थल के HFL-72.34M एवं 73.81M से अधिक है।

उक्त स्थल पर सीपेज को रोकने हेतु कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की सम्पुष्टि हेतु NR एवं प्रपत्र-24 दिया गया है। परन्तु बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना द्वारा दिये गये मंतव्य में अंकित किया गया है कि आरोपी द्वारा उपलब्ध कराये गये साक्ष्य की पुष्टि भी इस कार्यालय से संबंधित नहीं होने के कारण संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में115 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत हुआ जा सकता है। इसके अतिरिक्त आरोपी पदाधिकारी द्वारा वहीं तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया एवं जिसकी समीक्षा संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में करते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। अतएव आरोप प्रमाणित होता है।

समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिन्हा को विभागीय अधिसूचना संख्या-2082, दिनांक 18.09.18 द्वारा श्री सिन्हा को निलंबन से मुक्त किया गया एवं उनके विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर विभागीय पत्रांक 2232 दिनांक 04.10.2018 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना से परामर्श की माँग की गई। उक्त के आलोक में बिहार लोक सेवा आयोग, बिहार, पटना द्वारा अपने पत्रांक-521, दिनांक 07.06.19 द्वारा श्री सिन्हा, तत0 कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध प्रस्तावित दण्ड पर अपनी सहमति प्रदान किया गया। ततपश्चात विभागीय अधिसूचना सं0-1231 दिनांक 20.06.19 द्वारा श्री राम विनय सिन्हा, कार्यपालक अभियंता को निम्न दण्ड संसूचित किया गया है।

"कालमान वेतनमान में पाँच वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री राम विनय सिन्हा द्वारा अपने पत्रांक-01 दिनांक 29.07.19 से पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही कई है :-

श्री सिन्हा द्वारा दिये गये पुनर्विलोकन अर्जी की कंडिका 1 से 6 तक यथा प्रारम्भ के पाँच पृष्ठों में इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही से लेकर दण्ड संसूचन तक के क्रियाओं का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा गया है कि विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा तथा द्वितीय कारण पृच्छा में दिये गये तथ्य पर विभाग द्वारा विचार नहीं किया गया है। आरोप के संदर्भ में कहा गया है कि सीपेज होने की सूचना प्राप्तः 6.49 बजे बैरगनिया रिंग बाँध पर पहुँच चुका था। साक्ष्य के रूप में अपने निजी BSNL Mob.No. 9431276371 का CDR एवं टेलीनार मोबाइल सं0 8271121664 का CDR को संलग्न किया गया है ।एसी स्थिति में विभागीय पत्रांक 1231 दि0 20.06.19 के पृष्ट 4 के शीर्ष में अंंकित किाय गया है कि 5.20 बजे हुए टुटान की सूचना इनके द्वारा मुख्य अभियंता को दिए जाने के संबंध में मोबाइल के CDR को औचित्यहीन मानते हुए द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर को स्वीकार योग्य नहीं मानना नियम सम्मत एवं न्याय संगत नहीे है । मुख्य अभियंता के पत्रांक 2(S) दि0 13.08.17 से यह सम्पुष्ट होता है कि मुझसे मोबाइल पर मुख्य अभियंता से बात हुई थी । बाढ़ की उपर्युक्त परिस्थिति में कार्य स्थल पर मौजूद कार्यपालक अभियंता जब मुख्य अभ्यिंता से सूचना देने के लिए वार्त्ता करेगा तो यह र्निविवाद तथ्य है कि कार्यपालक अभियंता बाँध में हो रहे सिपेज एवं उसे रोकने के लिये किये जा रहे उपाय पर चर्चा ही करेगा। इनके द्वारा ऐसा कोई काम नही किया गया जो सरकारी सेवक के लिये अशोभनीय है। विभागीय पत्रांक 1231 दि0 20.06.19 के पृ04 के मघ्य भाग में लोक निर्माण विभाग संहिता भाग-1 के कंडिका 30, 33, 143 तथा मुख्य सचिव के पत्रांक 1934 दि0 11.05.2017 से निर्गत बाढ़ नियंत्रण आदेश 2017 की कंडिका 8.02 का उल्लंघन मेरे द्वारा किये जाने का उल्लेख है। इस संदर्भ में निवेदित तथ्यों के आलोक में यह स्थापित है कि दि0 13.08.17 को इनके द्वारा जिला पदाधिकारी के समक्ष मुख्य अभियंता से विस्तार से वार्त्ता हुई जिसमें बाँध में हो रहे सीपेज एवं उसकी मरम्मति के लिये किये जा रहे हर संभव प्रयास की जानकारी दी गई थी। संचालन पदाधिकारी का मत कि वर्षा एवं लगातार बढ़ते जलस्तर की स्थिति में सतत निगरानी एवं चौकसी बरती जाती तो प्रारम्भिक अवस्था में सीपेज पर नियंत्रण संभव हो पाता जिसका कोइ ठोस आधार नहीं है क्योंकि एक-एक कि0मी0 पर प्रतिनियुक्त होमगार्ड के जवान द्वारा सतत निगरानी की जा रही थी । विभागीय पत्रांक 1231 दि0 20.06.19 मे अंकित है कि उक्त स्थल पर सीपेज रोकने हेतु सुराक्षात्मक कार्य कराया जा रहा था ंपरन्तु जलस्तर में लगातार बढोतरी होने एवं पुराने HFL के करीब 4 फीट उपर जल स्तर पर हो जाने पर HG Line के उपर मिट्‌टी का cover कमजोर होने के कारण स्थिति अनियंत्रित हो गयी एवं अंतत तटबंध क्षतिग्रस्त हुआ। नदी के जलस्तर में अप्रत्याशित वृद्वि Force Majeure का परिचायक ही नही अपितु सम्पूष्ट प्र्रमाण है। SBD के Clause-52 के अनुसार Force Majeure में Unprecedented flood को Act of god माना गया है। Clause-52 के अंंश आगे उद्वत है। Neither Party shall be liable to the other for any loss or damage occasioned or arising out of Act of god such as unprecedental flood ढ़ेगे पुल पर दि0 13.08.17 का जलस्तर 72.95 एवं गोवाहाटी वियर पर जलस्तर 73.90 मी0 पाया गया है जो क्रमशः HFL 72.34 एवं 72.81 मी0 से उपर है। कराये जा रहे बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की सम्पुष्टि हेतु NR एवं प्रपत्र 24 का उल्लेख है, परन्तु बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना द्वारा दिये गये मंतव्य मे ंअंकित है कि आरोपी द्वारा उपलब्ध कराये गये साक्ष्य की पुष्टि इस कार्यालय से संबंधित नहीं होने के कारण संभव नहीें है। वस्तुतः योजना एवं मोनिटरिंग का आशय था कि संबंधित कार्यालय से संबंधित नहीं होने के कारण संभव नहीं है। वस्तुतः योजना एवं मोनिटरिग का आशय था कि संबंधित कार्यालय यथा अधीक्षण अभियंता /मुख्य अभियंता से मेरे द्वारा समर्पित NR को सम्पुष्ट किया जाना अपेक्षित था। निवेदन है कि शास्ति Exorbitant तथा Excessive है। कथन के समर्थन में निम्न तथ्य विचारार्थ एवं निर्णयार्थ निवेदन है। (क) मैं दि0 30.11.2021 को सेवानिवृति हो जाऊँगा। (ख) उक्त सारित के फलस्वरूप मेरा कालमान वेतन पाँच प्रक्रम नीचे पर 96000 प्रति माह हो जायेगा। (ग) संसूचित दण्ड के अनुसार इसके बाद मेरी सेवानिवृति की तिथी 30.11.21 तक कोई वेतन वृद्विबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 116 देय नहीं होगी। (घ) उक्त तथ्य से स्पष्ट है कि वत्तमान वेतन 1,12,400 से मेरा वेतन घटकर 96000/- प्रति माह हो जाएगा। (ड़) फलतः इसी वेतन पर मेरा पेंशन /उपादान निर्धारित होगा। जिसके फलस्वरूप आजीवन पेशन /उपादान में भी स्थायी रूप से वित्तीय क्ष्ति होती रहेगी। श्री राम विनय सिन्हा, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये -

श्री सिन्हा के विरूद्व आरोप का मुख्य अंश है कि दि0 13.08.07 को ललबकिया नदी पर निर्मित बैरगनिया र्रिग बाँध के नरोत्तम स्थल पर सिपेज के कारण टूट गया। रिंग बांध मेंसिपेज होने एवं उसकी मरम्मति की सूचना उच्च पदाधिकारियों को नहींदी गयी। विभाग स्तर से उनको स्पष्ट रूप से निदेशित किया गया था कि बाँध पर सतत निगरानी करायी जाय एवं आवश्यकतानुसार उसकी मरम्मति करा ली जाय। किन्तु उनके द्वारा विभागीय दिशा निदेश का उल्लंघन किया गया। उनका उक्त कृत्य बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो के प्रति लापरवाही एवं कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता दर्शाता है। श्री सिन्हा के पुनर्विलोकन अर्जी के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया है जो इनके द्वारा विभगीय कार्यवाही के संचालन के दौरान संचालन पदाधिकारी अथवा द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में दिया गया है जिसकी विस्तृत समीक्षा पूर्व में इनके विरूद्ध निर्गत दण्डादेश में की जा चुकी है। इनके द्वारा कहा गया है कि सिपेज होने की सूचना प्राप्त होने पर प्रातः 6.49 बजे स्थल पर पहुंचा था। साक्ष्य के रूप में अपने निजी मोबाईल सं॰ 9431276371 का CDR एवं टेलीनॉर मोबाईल सं॰-8271121664 का CDR संलग्न द्वितीय कारण पृच्छा में किया गया था। परन्तु विचार नही किया गया। टुटने की सूचना मुख्य अभियंता को दिये जाने के संबंध में मोबाईल के CDR को औचित्यहीन मानते हुए स्वीकार नहीं किया गया। संचालन पदाधिकारी ने सिपेज होने की सूचना प्राप्त होने पर स्थल पर जाकर इसकी सूचना देने संबंधी साक्ष्य के अभाव में स्वीकार योग्य नहीं माना है। मुख्य अभियंता मुजफ्फरपुर द्वारा कहा गया है कि 5.20 बजे टूटान होने की सूचना दी गयी के आलोक में श्री सिन्हा का कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। क्योंकि इनके द्वारा एक भी ऐसा साक्ष्य नहीं दिया गया है जिससे स्थापित हो सके कि उनके द्वारा तटबंध में हो रहे रिसाव एवं उसकी मरम्मति की सूचना उच्चाधिकारी को दी गयी हो ऐसी स्थिति में मात्र CDR के आधार पर स्थापित किया जाना संभव नहीं है कि उनके द्वारा वांछित सूचना मुख्य अभियंता एवं अन्य पदाधिकारी को दी गयी। संचालन पदाधिकारी का मत कि वर्षा एवं लगातार बढते जलस्तर की स्थिति में सतत निगरानी एवं चौकसी बरती जाती तो प्रारंभिक अवस्था में सीपेज का नियंत्रण संभव हो पाता । इस संदर्भ में आरोपी द्वारा कहा गया है कि तटबंधों की निगरानी हेतु होमगार्ड के पांच जवान प्रति कि0मी0 के अन्तराल पर प्रतिनियुक्त थे। स्थल पर सीपेज को रोकने हेतु सुरक्षात्मक कार्य कराया जा रहा था, परन्तु जल स्तर के लगातार बढोतरी होने एवं पुराने HFL के करीब 4 फीट उपर जल स्तर हो जाने पर H. G. Line के उपर कभर कमजोर होने के कारण स्थिति अनियंत्रित हो गयी। अतः तटबंध टूट गया। इनके द्वारा कहा गया है कि उक्त स्थल पर सीपेज को रोकने हेतु कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की सम्पुष्टि हेतु NR एवं प्रपत्र-24 देखा जा सकता है परन्तु बाढ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना द्वारा दिये गये मंतव्य में अंकित किया गया है कि आरोपी द्वारा उपलब्ध कराये गये साक्ष्य की पुष्टि भी इस कार्यालय से संबंधित नहीं होने के कारण संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत हुआ जा सकता है।

समीक्षोपरांत श्री राम विनय सिन्हा, कार्यपालक अभियंता के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड "कालमान वेतनमान में पाँच वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री राम विनय सिन्हा, कार्यपालक अभियंता, सोन बराज प्रमंडल, इन्द्रपुरी, रोहतास के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड "कालमान वेतनमान में पाँच वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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13 मई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(राँँ0)15-03/2009-672--श्री शशिभूषण पाण्डेय, (ID-1994) तत्कालीन सहायक अभियंता, जलपथ प्रमंडल, बरही (झारखंड) प्रमंडल के पदस्थापन अवधि के दौरान पंचखेरो जलाशय योजना के अन्तर्गत एप्रोच चैनल की मिट्‌टी कटाई हेतु वास्तविकता से 13342 घन मीटर मिट्‌टी की अधिक मात्रा अंकित कर गलत प्राक्कलन तैयार करने एवं निविदा आमंत्रित कर गलत प्राक्कलन तैयार करने एवं निविदा आमंत्रित कर कार्य आवंटन करते हुए रू0 13,47,185/- का अधिक भुगतान करने जैसी अनियमितता से संबंधित अभिलेख जल संसाधन विभाग, झारखंड, रांची द्वारा श्री पाण्डेय का कैडर बिहार आवंटित होने के कारण उपलब्ध कराया गया है। जल संसाधन विभाग, झारखंड, रांची से प्राप्त अभिलेखों की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत श्री पाण्डेय के विरूद्ध प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित पाया गया। तदालोक में प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोप के लिए विभागीय अधिसूचना संख्या-964, दिनांक 05.09.2012 द्वारा जेल अवधि दिनांक 20.03. 12 से 16.05.12 तक निलंबित किया गया। तत्पश्चात मामले के समीक्षोपरांत श्री पाण्डेय के विरूद्ध सरकारी राशि के गबन का आरोप रहने के कारण विभागीय अधिसूचना सं0-967, दिनांक 06.09.2012 द्वारा पुनः निलंबित करते हुए बिहार सरकारी सेवक117 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में विहित रीति के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-972, दिनांक 09.06.2012 द्वारा विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही संचालन के क्रम में श्री पाण्डेय के दिनांक 31.05.2016 को सेवानिवृत होने के कारण विभागीय आदेश सं0-211, सह पठित ज्ञापांक-1159, दिनांक 23.06.2016 द्वारा पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43बी में सम्परिवर्तित किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-628. दिनांक 23.05.2014 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। तदालोक में श्री पाण्डेय द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया जो निम्नवत है :- (i) बरही थाना कांड सं0-7/10 जी0 आर0 42/10 एप्रोच चैनल से संबंधित नहीं है और न जल संसाधन विभाग, झारखंड द्वारा इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है।

(ii) संचालन पदाधिकारी द्वारा मेरे बचाव-बयान के बिना सूक्ष्म विश्लेषण के दिनांक 30.11.12 से एक वर्ष तक बिना किसी सुनवायी एवं गवाही के अटकलबाजी एवं संदेह के आधार पर दिनांक 10.12.13 को प्रतिवेदन दिया गया जो Conducting Enquiry के लिए अपनायी जाने वाली प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है जिससे इस अर्द्धन्यायिक प्रक्रिया से मुझे यथोचित न्याय नहीं मिल सका।

(iii) उड़नदस्ता जांच प्रतिवेदन से यह स्थापित नहीं होता है कि कार्यपालक अभियंता द्वारा जांच के दौरान उपस्थित रहने का निदेश नहीं दिया गया जिसे मेरे द्वारा Ignore कर जांच के समय उपस्थित नहीं हुआ गया, जो स्पष्ट करता है कि मेरे अनुपस्थिति में लेवल लिया गया। जब उड़नदस्ता दल के द्वारा स्थल निरीक्षण की सूचना मुझे दी ही गई, तो संचालन पदाधिकारी द्वारा बिना किसी प्रमाण के इसे सही मानकर जांच में सहयोग नहीं दिये जाने का निष्कर्ष निकालकर आरोपित किया गया है।

सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता, झारखंड के पत्रांक-22, दिनांक 17.01. 2017 द्वारा निर्गत पत्र से स्पष्ट है कि कार्यपालक अभियंता, बरही द्वारा कनीय अभियंता एवं वाहन जांच दल को उपलब्ध नहीं कराया गया तो जांच दल स्थल पर कैसे पहुंचा ? यह भी स्पष्ट होता है कि सहायक अभियंता/कनीय अभियंता स्थल पर उपस्थित ही नहीं हुए तो जांच दल को लेवल लेने के आवश्यक वस्तुओं एवं अन्य संसाधन कहां से एवं कैसे उपलब्ध हुआ। विभागीय जांच में इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त किये बिना लेवल की जांच में किसी प्रकार का विरोधाभाष नहीं होना प्रतिवेदित किया जाना एकपक्षीय निर्णय प्रतीत होता है जिसे विवेकपूर्ण न्याय का द्योतक नहीं माना जा सकता है।

(iv) जांच दल द्वारा दिनांक 18.01.2007 को स्थल जांच करने एवं संदर्भित अभिलेख दिनांक 01.03.07 को कार्यपालक अभियंता द्वारा उपलब्ध कराये जाने की स्थिति में संचालन पदाधिकारी जांच दल द्वारा अभिलेख उपलब्ध होने के बाद अपने पूर्व जांच/मापी से संतुष्ट होकर आरोप स्थापित किये जाने के प्रतिवेदन के संदर्भ में कहना है कि- संचालन पदाधिकारी के पास पूर्ण संतुष्टि के लिए कोई साक्ष्य नहीं था कि जांच दल द्वारा स्थल का सीमांकन, उसके अनुसार लेवल मापी, प्राक्कलन के Reference point एवं Bench Mark के अनुरूप था। इस संदर्भ में सूचना का अधिकार के तहत मांगी गयी विषयांकित जांच का विस्तृत लेवल के लेवल बुक, Bench Mark एवं Datum की सूचना के क्रम में लेवल बुक उपलब्ध नहीं रहने को सूचित किया गया जिससे स्पष्ट है कि लिये गये स्थल एवं लेवल को पूर्ण रूप से प्राक्कलित लेवल से तुलना की योग्यता नहीं रखता है। यहां स्पष्ट करना है कि Reservoir side से एक छोटा-मोटा Hillock पानी के निकाल के लिए अवरोधक था जिसे काटकर एप्रोच चैनल बनाने की आवश्यकता हुई। इस स्थिति में थोड़ा-मोड़ा फर्क भी Derived level में काफी फेरबदल ला सकता है। अतः जांच दल द्वारा स्वतः लिया गया लेवल Reference point एवं Bench Mark की अनियमितता में Derived लेवल पर विश्वास कर दोषी करार दिये जाने की औचित्य पर विचार किया जाय जिससे न्याय मिल सके।

(v) विवादास्पद प्रस्तावित तल की चौड़ाई 80 मीटर के विरूद्ध जांच दल द्वार 72 मीटर की चौड़ाई मानकर की गई गणना को साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराये जाने के आधार पर अमान्य करार दिये जाने के संदर्भ में कहना है कि जल संसाधन विभाग, झारखंड को दी गई मेरा बचाव बयान दिनांक 28.06.07 जल संसाधन विभाग, बिहार एवं संचालन पदाधिकारी को दी गई बचाव बयान क्रमशः दिनांक 14.01.2011 एवं 30.11.2012 में तल की चौड़ाई 80 मीटर बतायी गयी। परन्तु उक्त बयान को बिना संज्ञान में लिये एवं इसकी सत्यता जांच कराये बिना किसी यर्थेष्ठ प्रमाण के मेरे 80 मीटर के प्रतिवेदन को अमान्य कर दिया गया।

इस संदर्भ में सूचना के अधिकार के तहत एप्रोच चैनल के प्राक्कलन मांग की गयी जो प्राप्त नहीं हो सका। इसी क्रम में परोक्ष रूप से प्रमाणित करने हेतु प्रमंडलीय लेवल के आधार पर 80 मीटर चौड़ाई के लिए ग्राफ आधारित गणना स्वीकृत Average Depth पर आधारित गणना से काफी नजदीक है। जो अप्रत्यक्ष रूप से 80 मीटर चौडाई होने को प्रमाणित करता है। इसी मामले में श्री उदय नारायण, कनीय अभियंता के विरूद्ध झारखंड में संचालित विभागीय कार्यवाही में 80 मीटर तल चौड़ाई के लिए आधारित गणना को संचालन पदाधिकारी एवं जल संसाधन विभाग, रांची द्वारा स्वीकार किया गया है।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 118 (vi) कंडिका-4 एवं 5 से मेरा सीधा संबंध नहीं है परन्तु आरोप का मुख्य आधार जांच दल द्वारा स्वतः स्थल को चिन्हित कर बगैर किसी Reference Point एवं Bench Mark को Indicate किये एक पहाडीनुमा स्थल का Derived level परिस्थतिजन्य साक्ष्य के आधार पर स्वीकार किया जाना न्यायोचित नहीं होगा।

(vii) जांच में पाये गये सभी दोषी अभियंता (मुझे छोडकर) को जल संसाधन विभाग, झारखंड द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही में आरोपमुक्त किया जा चुका है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी सूचना अप्राप्त रहने की स्थिति में अन्य स्रोतों से प्राप्त श्री उदयनारायण, श्री अर्जुन प्रसाद सिंह एवं श्री गोपाल प्रसाद सभी कनीय अभियंता को संचालन पदाधिकारी द्वारा स्थल का पहाडीनुमा होने के अनुमान के आधार पर रेखांकन कर लेवल लिये जाने का संचालन पदाधिकारी द्वारा सही नही बताया गया एवं आरोप अप्रमाणित पाया गया।

(viii) अंत में नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर तथा Equality before law के Fundamental rights के तहत समुचित न्याय प्रदान करने का अनुरोध किया गया। श्री पाण्डेय से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा विभाग के स्तर पर किया गया एवं समीक्षोपरांत निम्न तथ्य पाया गया :-

पृच्छा-1- इस पृच्छा का संबंध जांच दल को जांच के समय आरोपित पदाधिकारी द्वारा असहयोग करने से संबंधित है। उड़नदस्ता जांच दल द्वारा अपने जांच प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया है कि वर्णित कार्य की जांच दिनांक 29.11.2006 को निर्धारित की गई एवं संबंधित अभिलेखों की मांग कार्यपालक अभियंता, जलपथ प्रमंडल, बरही से पत्रांक-538, दिनांक 22.11.2006 द्वारा करते हुए तत्संबंधी सूचना संबंधित मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, रांची एवं अधीक्षण अभियंता, जलपथ अंचल, हजारीबाग को भी अपने स्तर से संबंधित अभिलेख भेजने का निदेश दिये जाने का अनुरोध किया गया। परन्तु संबंधित कार्यपालक अभियंता द्वारा दिनांक-11.12.2006 के बाद जांच हेतु तिथि निर्धारित करने का अनुरोध किया गया, जिसके आलोक में जांच दल द्वारा पत्रांक-551 दिनांक 30.11.2006 द्वारा संबंधित कार्यपालक अभियंता से दूरभाष पर विचारो विमर्श उपरांत दिनांक 18.12.2006 को तिथि निर्धारित करते हुए संबंधित अभिलेख विशेषदूत से भेजने का अनुरोध किया गया। पुनः पत्रांक-554 दिनांक 12.12.2006 को तृतीय स्मार दिया गया। इतने प्रयास के उपरांत भी अभिलेख जांच दल को प्राप्त नहीं कराया गया। तत्पश्चात पत्रांक-01, कैम्प रांची दिनांक 18.11.16 द्वारा संबंधित कार्य0 अभि0 ने कुछ कठिनाईयों का जिक्र करते हुए जनवरी, 2007 के तृतीय सप्ताह में जांच करने का अनुरोध किया गया। जांच दल द्वारा अपने पत्रांक-22 दिनांक 11.01.2007 से संबंधित कार्य0 अभि0, जलपथ प्रमंडल, बरही को मुख्य अभियंता, रांची के मार्फत चतुर्थ स्मार देते हुए संबंधित अभिलेख उपलब्ध कराने के साथ-साथ दिनांक 18.01.17 को स्थलीय जांच की तिथि निर्धारित कर सूचित किया गया जिसमें जांच दल को दिनांक 17.01.2007 के अपराह्‌न 4 बजे तक वाहन एक कनीय अभियंता के साथ उपलब्ध कराना सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया। इसके बावजूद भी कार्य से संबंधित पदाधिकारी जांच के दौरान उपस्थिति सुनिश्चित नहीं कर सके।

आरोपी का यह बयान कि कार्य0 अभि0, बरही द्वारा विभिन्न तिथियों में स्थल जांच के संदर्भ में लिखित सूचना दिया जाना स्थापित नहीं होने का बचाव बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। चूंकि आरोपी श्री पाण्डेय, सहायक अभियंता के रूप में कार्यपालक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बरही के ही अधीनस्थ पदस्थापित थे एवं एक जिम्मेवार राजपत्रित पदाधिकारी होने के नाते कार्यपालक अभियंता द्वारा अभिलेख एवं स्थल जांच में टाल-मटोल करने के स्थिति में श्री पाण्डेय, सहायक अभियंता को सभी अभिलेखों को उपलब्ध कराते हुए उड़नदस्ता जांच दल को स्थल जांच करने हेतु अनुरोध पत्र लिखकर सहयोग दिया जाना चाहिए था परन्तु ऐसा नहीं कर इनकी अनुपस्थिति में उड़नदस्ता जांच दल द्वारा लिये गये लेवल पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना उचित प्रतीत नहीं होता है एवं जांच कार्य में असहयोग का मामला परिलक्षित होता है।

पृच्छा-2-इस पृच्छा का संबंध जांच दल द्वारा कार्य से संबंधित अभिलेख मिलने के पूर्व जांच किये जाने से संबंधित है। जांच प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि कई स्मार के बाद कार्यपालक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बरही जो स्वयं आरोपित थे, टाल-मटोल के उपरांत दिनांक 01.03.2007 को संबंधित अभिलेख उपलब्ध कराया गया। यद्यपि स्थलीय जांच दिनांक 18.01. 2007 को की गई परन्तु जांच प्रतिवेदन संबंधित अभिलेख उपलब्ध होने के उपरांत ही अभिलेखों से संतुष्ट होने के पश्चात जांच प्रतिवेदन तैयार किया गया। जिसमें आरोपी का यह बयान की संचालन पदाधिकारी के पास पूर्ण संतुष्टि के लिए कोई साक्ष्य नहीं था, स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है एवं जांच प्रतिवेदन के आधार पर समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा मिट्‌टी कटाई से संबंधित कमी का आकलन सही प्रतीत होने का मंतव्य उचित प्रतीत होता है।

पृच्छा-3, 4 एवं 5-इस पृच्छा का संबंध तल की चौडाई 80 मी0 होने संबंधी साक्ष्य उपलब्ध कराने से है तथा मिट्‌टी कटाई की मात्रा वास्तविकता से 13342.43 घनमीटर राशि रू0 13.47,185/- अधिक की निविदा आमंत्रित किये जाने से है। जांच प्रतिवेदन में संबंधित कार्यपालक अभियंता, बरही द्वारा उपलब्ध कराये गये अभिलेखों के आधार पर दिये गये प्रतिवेदन में तल की चौडाई 72मी0 एवं लंबाई 95 मी0 ली गई है।

जांच प्रतिवेदन में स्थल पर लिये गये लेवल के आलोक में की गई गणना के आधार पर प्राक्कलन में एप्रोच चैनल के औसत एन0एस0एल0 से औसतन 1.699 मी0 अधिक दर्शाया गया है। इस प्रकार मात्र 11557.57 घनमीटर की कटाई की गई जबकि प्राक्कलन में 24900 घनमीटर गणना कर निविदा आमंत्रित की गई। संचिका के अवलोकन एवं आरोप से स्पष्ट होता है कि 13342 घनमीटर राशि रू0 13,47,185/- अधिक का प्राक्कलन गठन कर स्वीकृति प्रदान की गई। 26 लाख को कुल स्वीकृति प्राक्कलित राशि के विरूद्ध 15% (पन्द्रह प्रतिशत) कम दर पर करीब 22 लाख रूपये का एकरारनामा कर कार्य पूरा करते हुए करीब 20 (बीस) लाख रूपये का एकरारनामा कर कार्य पुरा करते हुए करीब 20 (बीस) लाख रूपये का भुगतान भी हो चुका है।119 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 जांच प्रतिवेदन में जल पथ प्रमंडल, बरही द्वारा तैयार किये गये प्राक्कलन के आधार पर अंकित लेवल एवं आरोपी पदाधिकारी के बचाव बयान में बेड की चौडाई 72 मी0 के जगह 80मी0, स्लोप 1:1 एवं 349.00 मी0 तक प्रस्तावित कटिंग लेवल का उल्लेख है। इस प्रकार मिट्‌टी कटिंग का अंतर क्रमशः 1.61M, 2.43M, 3.36M, 3.65M, 4.30M, 4.84M, 3.93M, 3.74M एवं 1.73M आता है, जिसका औसत मिट्‌टी कटिंग 3.373M होता है।

इस प्रकार 80M तल की चौड़ाई के आधार पर मिट्‌टी की कुल मात्रा (B+D)DxL गणना के आधार पर (80+3.373)x3.373x95=26715.6 घनमी0 जबकि 72मी0 तल की चौडाई के आधार (72+3.373)x3.373x95= 24152 घनमीटर आता है।

उक्त गणना से स्पष्ट है कि प्राक्कलन/निविदा में प्रावधानित मात्रा 24900 घनमीटर 72मी0 के आधार पर आकलित कुल मिट्‌टी की मात्रा 24152 घनमीटर के सन्निकट है जिससे आरोपी द्वारा बिना पर्याप्त साक्ष्य संलग्न किये Indirect विधि से संलग्न की गणना के आधार पर तल की चौड़ाई 80मी0 प्रमाणित करना स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। इस प्रकार जांच प्रतिवेदन में मात्रा 11557.57 घनमीटर मिट्‌टी की कटाई के विरूद्ध 13342.43 घनमीटर अधिक मिट्‌टी यानि राशि 1347185/- रूपये अधिक का प्राक्कलन गठन कर निविदा करने एवं भुगतान करने का आरोप प्रमाणित होता है, जिसकी पुष्टि कार्य के भुगतान 22 लाख के विरूद्ध 20 लाख रूपये हो जाने का उल्लेख से भी होता है। संचालन पदाधिकारी के मंतव्य में आरोपों को प्रमाणित प्रतिवेदन किये जाने एवं आरोपी पदाधिकारी से प्राप्त स्पष्टीकरण पर जल संसाधन विभाग, झारखंड से मंतव्य की मांग की गई। तदालोक में जल संसाधन विभाग, झारखंड, रांची द्वारा प्रमाणित आरोपों से सहमत होने का मंतव्य दिया गया है। जिससे भी आरोपी का बचाव बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है।

प्राक्कलन का गठन कनीय अभियंता के द्वारा स्थलीय सर्वेक्षणोपरांत मापी/लेवल लेकर प्राक्कलन का गठन किया जाता है जिसकी जांच सहायक अभियंता (प्रस्तुत मामले में श्री शशिभूषण पाण्डेय आरोपित तत0 सहायक अभियंता) द्वारा करते हुए प्राक्कलन की स्वीकृति हेतु वरीय पदाधिकारी को उपस्थापित किया जाता है। स्वीकृत्योपरांत एवं वांछित प्रक्रिया पूरी करते हुए कार्यावंटन के अनुसार कार्य का कार्यान्वयन किया जाता है एवं कराये गये कार्य का कनीय अभियंता द्वारा मापी अंकित की जाती है, जिसकी जांच सहायक अभियंता स्तर से किये जाने के उपरांत विपत्र के साथ कार्यपालक अभियंता को उपस्थापित किया जाता है। प्रस्तुत मामले में प्राक्कलन गठन कर मापी की जांच के कारण 13342 घनमीटर मिट्‌टी की अधिकाई भुगतान के मामले में श्री पाण्डेय, सहायक अभियंता (सेवानिवृत) के विरूद्ध जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही में आरोप प्रमाणित होने से सहमत होने का मंतव्य जल संसाधन विभाग, झारखंड सरकार द्वारा दिया गया है। इस प्रकार उड़नदस्ता के जांच प्रतिवेदन तथा संचालन पदाधिकारी के प्रतिवेदन में आरोपों को प्रमाणित करने के मंतव्य पर झारखंड सरकार का मंतव्य एवं उपर्युक्त समीक्षा के आलोक में श्री पाण्डेय, तत0 सहायक अभियंता, जल पथ प्रमंडल, बरही सम्प्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के द्वितीय कारण पृच्छा पर प्राप्त प्रतिउत्तर स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होने से पंचखेरों जलाशय योजना अंतर्गत एप्रोच चैनल की मिट्‌टी कटाई हेतु वास्तविकता से 13342 घनमीटर मिट्‌टी की अधिक मात्रा का गलत प्राक्कलन गठन करते हुए निविदा उपरांत 13,47,185/- का अधिक भुगतान करने का आरोप प्रमाणित होता है तथा इसके लिए आपको दोषी पाया गया है। तदालोक में सरकार द्वारा आपके विरूद्ध प्रमाणित आरोप के लिए '10 (दस) वर्षों के लिए 50% पेंशन की राशि की कटौती' दण्ड देने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय पर सक्षम प्राधिकार एवं बिहार लोक सेवा आयोग की परामर्श सहमति प्राप्त है।

सराकर के स्तर पर लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री शशिभूषण पाण्डेय (आई0डी0-1994) तत0 सहायक अभियंता, जलपथ प्रमंडल, बरही, झारखंड सम्प्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है :-

'10 (दस) वर्षों के लिए 50% पेंशन की राशि की कटौती'

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

------- 13 मई 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(पट॰)03-17/2017-671--श्री शैलेन्द्र कुमार (आई0डी0-3803), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, आरा के पद पर पदस्थापन काल में इनके विरूद्ध बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, आरा के अन्तर्गत बाढ़ 2016 के दौरान विभिन्न स्थल पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में बरती गयी अनियमितता के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-850 दिनांक-29.04.2019 द्वारा आरोप पत्र गठित कर बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री कुमार दिनांक-29.02.2020 को सेवानिवृत हो गए हैं। अतएव श्री शैलेन्द्र कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध संचालित उक्त विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

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11 मई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुक0)गोपा019-21/2018-660--वर्ष 2017 बाढ के दौरान बाढ नियंत्रण प्रमंडल-1 पडरौना के अन्तर्गत सी0आर0एल0 के बिन्दु 0.88 कि0मी0 से 0.98 कि0मी0 के बीच दिनांक 15.08.17 को सुबह लगभग 4 बजे पाईपिंग120 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 के कारण बांध के क्षतिग्रस्त होने की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को नहीं देने, कार्य स्थल पर उपस्थित नहीं रहने एवं बाढ़ संघर्षात्मक कार्य जैसे संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण कार्य के प्रति घोर लापरवाही तथा कर्तव्य के प्रति उदासीनता बरतने के आरोपों के लिए श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ नियंत्रण प्रमंडल संख्या-1, पडरौना को विभागीय अधिसूचना सं0-1612 दिनांक 14.09.17 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1672, दिनांक 20.09.17 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जांच प्रतिवेदन में श्री सिंह के विरूद्ध गठित सभी आरोपों को प्रमाणित पाया गया। प्रमाणित आरोपों के संदर्भ में श्री सिंह से विभागीय पत्रांक-970, दिनांक 26.04.18 द्वारा अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की मांग की गई। पत्र प्राप्त होने के पश्चात भी निर्धारित अवधि तक उत्तर समर्पित नहीं किए जाने के कारण उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार विभागीय अधिसूचना संख्या-1540 दिनांक 19.07.18 द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध 'सेवा से बर्खास्तगी' का दण्ड अधिरोपित किया गया। उक्त अधिरोपित दण्ड के विरूद्ध श्री सिंह द्वारा माननीय पटना उच्च न्यायालय में सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-13155/18 दायर किया गया, जिसमें दिनांक 08.07.2019 को न्यायादेश पारित किया गया जिसका कार्यकारी अंश निम्नवत है :- "13. Coming to the case at hand, I am of the view that the disciplinary authority did not at all consider the explanation furnished by the petitioner and the punishment awarded to him for the kind of misconduct is grossly disproportionate. 14. For the aforesaid two reasons, I hold the order dated 19.07.2018, dismissing the petitioner, to be unsustainable in the eyes of law and therefore, set It aside. 15. The matter is remitted to the disciplinary authority for writing out a fresh order in accordance with law after adverting to the explanation offered by the petitioner. The order shall be passed by the disciplinary authority within a period of three months from the date of receipt/production of a copy of this order. The decision to keep the petitioner under suspension during this period shall lie with the disciplinary authority.

16. The petition stands allowed to the extent indicated above". माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश के संबंध में एल0पी0ए0 दायर किये जाने के बिन्दु पर विधि विभाग से प्राप्त मंतव्य में कहा गया कि इस मामले को माननीय उच्च न्यायालय द्वारा Fresh Order पारित करने हेतु Remand back किया गया है, इसलिए इस मामले में एल0पी0ए0 दायर करने की आवश्यकता नहीं है।

उपरोक्त के आलोक में श्री सिंह द्वारा समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर) पर विचार किया गया जिसमें पाया गया कि श्री सिंह ने अपने अभ्यावेदन (पत्रांक-28, दिनांक 15.06.2018) में निम्न तथ्यों को उल्लेख किया है - (1) दिनांक 14.08.2017 को अपराह्‌न में अद्योहस्ताक्षरी के साथ अध्यक्ष, बाढ संघर्षात्मक बल, मुख्य अभियंता, गोपालगंज एवं अधीक्षण अभियंता, पडरौना द्वारा पूरे पी0पी0 तटबंध के साथ-साथ ठकराहा में GH तटबंध के कटाव स्थल का संयुक्त निरीक्षण किया गया था। मुख्य अभियंता द्वारा तटबंध पर खराब मोबाईल नेटवर्क के मद्‌देनजर दस तटबंध कटाव स्थल पर अद्योहस्ताक्षरी को स्वयं उपस्थित रहकर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य तुरन्त प्रारंभ कराने का निदेश दिया गया। उक्त आशय का लिखित निदेश भी स्थल पंजी पर दिया गया। (2) दिनांक 14.08.2017 की रात्रि लगभग 10ः00 बजे के आसपास जब अद्योहस्ताक्षरी पी0पी0 तटबंध के भितहा में थे तो विभागीय बाढ़ मोनिटरिंग के कार्यपालक अभियंता ई0 आलोक कुमार एवं मुख्य अभियंता, गोपालगंज द्वारा दूरभाष पर अद्योहस्ताक्षरी को पी0पी0 तटबंध के भितहा से GH तटबंध के कटाव स्थल पर पहुंचने का निदेश दिया गया, जिसके आलोक में अद्योहस्ताक्षरी रात्रि लगभग 10 बजे तटबंध के कटाव स्थल पर पहुंच कर बाढ संघर्षात्मक कार्य 14-15 अगस्त की रात्रि में प्रारंभ कराया। (3) दिनांक 15.08.2017 को सुबह करीब 5-6 बजे के बीच पी0पी0 तटबंध के उक्त टूटान स्थल के प्रभारी सहायक अभियंता श्री कुमार अभिषेक किशोर द्वारा तटबंध क्षतिग्रस्त/पाईपिंग शुरू होने की पहली बार सूचना दी गई। उन्हें अविलंब बाढ़ संघर्षात्मक कार्य शुरू करने का निदेश देते हुए अधीक्षण अभियंता, पडरौना को सूचित करते हुए वे सुबह लगभग 6ः30 बजे CRL Cut end side तटबंध क्षतिग्रस्त स्थल पर पहुंच कर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य युद्ध स्तर पर कराने लगे। कार्य स्थल पर अनियंत्रित भीड़ तथा भगदड़ की स्थिति थी। भितहा थाना एवं SDM बगहा से सुबह लगभग 6ः30 बजे सूचना देते हुए सहायता की मांग की गई। अथक प्रयास के बावजूद तटबंध लगभग 8ः00 बजे के आसपास क्षतिग्रस्त हो गया। स्थल पर पूरी स्थिति अनियंत्रित हो गई तथा अद्योहस्ताक्षरी का मोबाईल स्थल पर ही कहीं गिर जाने के कारण सहायक अभियंता श्री रामचन्द्र प्रसाद एवं अन्य ग्रामीणों के मोबाईल का उपयोग करते हुए अद्योहस्ताक्षरी सुबह करीब 8ः15-8ः30 बजे के आसपास पी0पी0 तटबंध के 35.00 कि0मी0 के पास से अधीक्षण अभियंता, पडरौना, मुख्य अभियंता, गोपालगंज एवं विभागीय प्रधान सचिव महोदय को वस्तुस्थिति से अवगत कराया तथा कार्यालय के माध्यम से उच्चाधिकारियों एवं विभाग को बेतार संवाद 132 पत्रांक-533 दिनांक 15.08.2017 के द्वारा अवगत कराने की कार्रवाई की गयी, जिसे बेतार संवाद भेजने से इनकार यह कहते हुए किया गया कि अधीक्षण अभियंता द्वारा बेतार संवाद नहीं भेजने का निर्देश दिया गया है। तत्संबंधी उक्त पत्र पर121 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 प्रमंडलीय लेखा लिपिक के प्रतिवेदन का अवलोकन किया जा सकता है। उक्त बेतार संवाद पर श्री रामचन्द्र प्रसाद, सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल सं0-2, मधुबनी का भी अभिमत अंकित है। जिसके अवलोकन से स्पष्ट होगा कि वे पी0पी0 तटबंध के कि0मी0 35 पर उपस्थित थे। (4) उनके कार्यालय से भेजा गया बेतार संवाद 132 दिनांक 15.08.17 को पूर्व में अधीक्षण अभियंता कार्यालय में प्राप्त किया गया था, परन्तु बाद में किस परिस्थिति में उसे प्राप्ति पंजी से काट दिया गया एवं पुनः दिनांक 21.08.17 को प्राप्ति दिखाया गया, जो स्वतः अभिलेखों के साथ छेड़छाड़ को दर्शाता है। (5) उनके एन0आर0 संख्या-61 दिनांक 14.08.2017 जो कि मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, गोपालगंज एवं जिसकी प्रतिलिपि अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण मोनिटरिंग अंचल, पटना एवं जिला पदाधिकारी, पश्चिम चम्पारण बेतिया को दिया गया है, का अवलोकन करना चाहेंगे। ये प्रतिवेदन दिनांक 13.08.17 के 8ः00 बजे सुबह से 14.08.17 के 8ः00 बजे सुबह तक का खैरियत प्रतिवेदन है। उक्त प्रतिवेदन में यह अंकित है कि नदी का जल स्तर बढने के कारण 1.2 कि0मी0 CRL Cut end के पास आज दिनांक 14.08.2017 को बाढ संघर्षात्मक कार्य बंद है। CRL के 0.00 कि0मी0 से 1.20 कि0मी0, PPE के 32.40 कि0मी0 से 33.00 कि0मी0 एवं GHE के 0.80 कि0मी0 से 0.9 कि0मी0 के बीच रात्रि में C/S में कुछ जगहो पर पानी का बुलबुला निकलते देखा जिसे रात्रि में Well बनाकर सुरक्षित कर लिया गया है। स्थिति नियंत्रण में है तथा सतत निगरानी की जा रही है। तटबंध सुरक्षित है। इससे यह स्पष्ट है कि उनके द्वारा प्रतिवेदन सभी स्तर पर भेजा गया था। उक्त पत्र की सूचना अधीक्षण अभियंता को भी गयी थी। (6) संचालन पदाधिकारी द्वारा बिहार लोक निर्माण विभागीय संहिता के कंडिका-30 का उल्लेख किया गया, जिसका उनके विरूद्ध आरोप प्रमाणित किये जाने के संदर्भ में कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि उनके द्वारा अधीक्षण अभियंता को वस्तुस्थिति से निरंतर अवगत कराया जाता रहा था। (7) बिहार लोक निर्माण संहिता की कंडिका-33 कार्यपालक अभियंता से अपेक्षित दायित्वों के निष्ठापूर्वक निर्वहन से संबंधित है, का उल्लेख किया गया है इस संबंध में उनके द्वारा अपने दायित्वों का निर्वहन निष्ठा पूर्वक किया गया है। (8) इसी प्रकार कंडिका-143 का भी पूर्ण अनुपालन किया गया है जो प्रायः कंडिका-33 की ही पुनरावृति है। (9) लोक निर्माण विभागीय संहिता की कंडिका-33 एवं 143 के साथ-साथ बिहार वित्तीय नियमावली खंड-1 के नियम-33 को उल्लेख किया गया है, जिसमें प्रमंडलाधीन किसी तरह की दुर्घटना आदि की सूचना अधीक्षण अभियंता को देने का प्रावधान है। इसका पूर्ण अनुपालन उनके द्वारा किया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा लोक निर्माण विभागीय संहिता की कंडिका-33 एवं 143 तथा बिहार वित्तीय नियमावली के नियम-33 का अनुपालन उनके द्वारा नहीं किये जाने का निष्कर्ष निकाल लिया गया है एवं उनके विरूद्ध आरोप को प्रमाणित मान लिया गया है, जो सही नहीं है एवं तथ्य से परे है। क्योंकि इस संबंध में पूर्व आरोप पत्र में ही उल्लेख किया गया था और न ही पूर्व में इस पर स्पष्टीकरण की मांग की गयी थी।

श्री सिंह द्वारा समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) एवं उपलब्ध अभिलेखों की विभागीय समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- श्री सिंह ने अपने स्पष्टीकरण में मुख्य रूप से दो बातों का उल्लेख किया है। श्री सिंह का कहना है कि वे दिनांक 14.08.17 को अपराह्‌न में अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल, मुख्य अभियंता, गोपालगंज एवं अधीक्षण अभियंता, पडरौना के साथ पी0पी0 तटबंध एवं ठकराहा के GH तटबंध के कटाव स्थल का संयुक्त निरीक्षण किए थे। इस आशय की पुष्टि मुख्य अभियंता द्वारा स्थल पंजी पर अंकित निदेश से की जा सकती है। साक्ष्य के रूप में स्पष्टीकरण के साथ स्थल पंजी की छायाप्रति संलग्न की गई है। श्री सिंह ने अपने बचाव बयान में यह भी उल्लेखित है कि उन्होंने अपने पत्रांक-225 दिनांक 12.09.2016 द्वारा बाढ वर्ष 2017 के पूर्व कटाव निरोधक योजना का प्रस्ताव अधीक्षण अभियंता को समर्पित किया था किन्तु उनके द्वारा भेजे गए प्रस्ताव के आंशिक भाग में ही कार्य कराया गया। जिस भाग में कार्य नहीं कराया गया है, उसी भाग में पाईपिंग के कारण टूटान हुआ। श्री सिंह द्वारा गंडक नदी के पी0पी0 तटबंध के CRL के बिन्दू 0.44KM से 1.10 KM के बीच कटाव निरोधक कार्य का प्रस्ताव समर्पित किया गया था। इसी बिन्दु के बीच (0.88KM से 0.98KM) पाईपिंग के कारण तटबंध टूट गया। Anti Erosion committee के प्रतिवेदन के अवलोकन से प्रतीत होता है कि कमिटी द्वारा केवल 0.62KM से 0.88KM तक ही कार्य कराने की अनुशंसा की गई। अगर भेजे गए प्रस्ताव के सम्पूर्ण भाग (0.44KM से 1.10KM) पर कटाव निरोधक कार्य कराया जाता तो हो सकता था कि तटबंध क्षतिग्रस्त नहीं होता। अतः बाढ पूर्व तैयारी में लापरवाही बरतने, अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करने का आरोप श्री सिंह पर प्रमाणित नहीं होता है। श्री सिंह के विरूद्ध दूसरा आरोप यह है कि दिनांक 15.08.2017 को सुबह लगभग 4ः00 बजे CRL के बिन्दू 0.88KM से 0.98KM के बीच पाईपिंग शुरू हो गया जिसकी सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई जिसके कारण 7.45AM में 15 मी0 की लंबाई में बांध टूट गया। पाईपिंग के कारण बांध कट जाने तक ये कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं पाए गए। इस आरोप के संदर्भ में श्री सिंह का कहना है कि दिनांक 15.08.17 को प्रातः 5-6 बजे पी0पी0 तटबंध के प्रभारी सहायक अभियंता द्वारा पाईपिंग होने की सूचना दी गई। सूचना पाकर वे 6.30 बजे प्रभावित स्थल पर पहुंचकर क्षतिग्रस्त तटबंध की मरम्मति का कार्य कराने लगे। अनियंत्रित भीड़ एवं भगदड के कारण मरम्मति कार्य में बाधा उत्पन्न हुई एवं अथक122 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 प्रयास के बावजूद तटबंध टूट गया। उनके द्वारा ही तटबंध टूटने की सूचना उच्चाधिकारियों को दी गई। श्री सिंह के स्पष्टीकरण के साथ ऐसा कोई साक्ष्य संलग्न नहीं है जो इस बात को प्रमाणित करता हो कि पाईपिंग की सूचना पाकर श्री सिंह प्रभावित स्थल पर उपस्थित रहे हों। अधीक्षण अभियंता, बाढ नियंत्रण, पडरौना के बेतार संवाद जो दिनांक 15.08.17 को 8ः15 am में प्राप्त हुआ है, के अवलोकन से स्पष्ट है कि बांध कट जाने तक कार्यपालक अभियंता-1 पडरौना श्री विजय कुमार सिंह कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं थे। इसलिए श्री सिंह का यह कहना है कि वे प्रभावित स्थल की मरम्मति कराने का अथक प्रयास किए स्वीकार योग्य नहीं है। अतः आरोप पत्र में गठित आरोप का यह अंश प्रमाणित होता है। माननीय उच्च न्यायालय ने श्री ंिसह द्वारा दायर याचिका संख्या-13155/18 में पारित आदेश में विभागीय दण्डादेश को आरोपों के परिप्रेक्ष्य में समानुपातिक नहीं माना है। उपर वर्णित तथ्यों के अनुशीलन से स्पष्ट है कि श्री सिंह द्वारा बाढ़ पूर्व तैयारी के क्रम में क्षतिग्रस्त भाग पर कार्य कराने का प्रस्ताव भेजा गया था परन्तु Anti Erosion Committee द्वारा प्राप्त प्रस्ताव के आंशिक भाग पर ही कार्य कराने की अनुशंसा की गई। जिस भाग पर कार्य नहीं कराया गया वही भाग क्षतिग्रस्त हुआ। अतः बाढ पूर्व तैयारी में अपने कर्तव्य में लापरवाही बरतने का आरोप अप्रमाणित परन्तु बांध क्षतिग्रस्त होने की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं देने एवं कटाव स्थल पर उपस्थित नहीं होने का आरोप प्रमाणित होता है। 2. मामले की सम्यक समीक्षोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-01, पडरौना के विरूद्ध 'सेवा से बर्खास्तगी' संबंधी निर्गत दण्डादेश (विभागीय अधिसूचना सं0-1540, दिनांक 19.07.2018) को निरस्त करने एवं उक्त विभागीय दण्डादेश निरस्त किए जाने के पश्चात इस मामले में प्रमाणित पाये गये आरोपों के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 14 के संगत प्रावधानों के तहत श्री सिंह के विरूद्ध 'कालमान वेतनमान में दो प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी' का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया। 3. श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-01, पडरौना के विरूद्ध 'सेवा से बर्खास्तगी' संबंधी निर्गत दण्डादेश (विभागीय अधिसूचना सं0-1540 दिनांक 19.07.2018) को मा0 पटना उच्च न्यायालय द्वारा सी0डब्लू0जे0सी0 सं0-13155/2018 में पारित न्यायादेश के आलोक में निरस्त करने संबंधी संलेख/प्रस्ताव पर विभागीय पत्रांक-611 दिनांक 28.04.2020 द्वारा राज्य मंत्रिपरिषद के स्वीकृति हेतु भेजा गया। राज्य मंत्रिपरिषद की दिनांक 06.05.2020 को सम्पन्न बैठक में मद संख्या-03 के रूप में सम्मिलत करते हुए उक्त संलेख/प्रस्ताव पर स्वीकृति प्रदान की गयी।

4. उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में विभागीय अधिसूचना संख्या-1540 दिनांक 19.07.2018 को निरस्त करते हुए श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-01, पडरौना (सम्प्रति सेवा से बर्खास्त) को सेवा में पुनस्र्थापित किया जाता है।

5. अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री विजय कुमार सिंह (आई0डी0-3516), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-01, पडरौना को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील), नियमावली 2005 के नियम-14 के संगत प्रावधानों के तहत 'कालमान वेतनमान में दो प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी' का दंड दिया एवं संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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5 मई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)01-03/2014-657--मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ परिक्षेत्राधीन तत्का0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा के पदस्थापन अवधि के दौरान पूर्वी कोशी नहर प्रणाली पुनस्र्थापन कार्य योजना के तहत कुर्सेला वितरणी 61.90 पर निर्माणाधीन कैनाल साईफन हेतु सम्बद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराये जाने समुचित ढ़ग से सरकारी राशि 17,17,04,202 (सतरह करोड़ सतरह लाख चार हजार दो सौ दो रूपये) के विरूद्ध 8,06,71,790 (आठ करोड़ छः लाख एकहत्तर हजार सात सौ नब्बे रूपये) के अनुचित भुगतान के प्रथम द्रष्टया प्रमाणित आरोपो के लिए श्री महेन्द्र चौधरी, तत0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली-2005 के नियम 17 के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक 1513, दिनांक 16.10.14 द्वारा विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के लिए श्री रामपुकार रंजन, अभियंता प्रमुख (मध्य) को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया जिसमें आरोप को प्रमाणित पाया गया।

उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच-प्रतिवेदन की छायाप्रति देते हुए श्री महेन्द्र चौधरी,तत0 कार्य0 अभि0 से विभागीय पत्रांक-2317, दिनांक 24.10.16 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी, तदालोक में श्री महेन्द्र चौधरी द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर समर्पित किया गया। श्री चौधरी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा उच्च स्तर पर निम्नरूपेण की गयी :-

श्री महेन्द्र चौधरी, तत0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा123 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोप ः- "पूवी कोशी नहर प्रणाली पुनस्र्थापन (ERM) कार्य योजना के तहत कुर्सेला वितरणी 61.90 पर निर्माणाधीन कैनाल सायफन हेतु समयबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराये जाने, समुचित ढ़ग से पर्यवेक्षण नहीं किये जाने, डिवाटरिंग जैसे कार्य को अनियंत्रित ढ़ग से कराये जाने तथा सुनियोजित ढ़ग से सरकारी राशि का 17,17,04,202/- रूपये के विरूद्ध 8,06,71,790/- रूपये का अनुचित भुगतान के लिए प्रथम दृष्टया आप दोषी हैं।" संचालन पदाधिकारी का मंतव्य ः-समीक्षोपरांत आरोपित पदाधिकारी श्री महेन्द्र चौधरी ( ID-4372) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा के विरूद्ध गठित विभागीय आरोप प्रमाणित होता है।

आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा के क्रम में बचाव बयान का सार :- श्री चौधरी द्वारा अपने बचाव बयान के कंडिका 01 से 10 में डिवाटरिंग मद से संबंधित मात्र एक आरोप गठित किये जाने, 31.01.15 को मूल बचाव बयान एवं दिनांक 09.07.15 को पूरक बचाव बयान दिये जाने, पूरक बचाव बयान के कंडिका 5 एवं 7 को उद्‌दृत किया गया है। कंडिका -1 - संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्नांकित महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार नहीं किया गया है। (क) विषयांकित कार्य के स्वीकृत प्राक्कलन में डिवाटरिंग मद का प्रावधान मुख्य अभियंता, पूर्णियां द्वारा नहीं किया गया था और न डिवाटरिंग मद के भुगतान में 5 प्रतिशत की राशि सीमित की गई थी। मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ के पत्रांक-2659, दिनांक 09.12.11 से दिये गये आदेश में डिवाटरिंग मद में प्रयुक्त Well point system के मशीनों का लॉगबुक संधारित करते हुए उसके आधार पर भुगतान किये जाने का आदेश है। भुगतान की राशि 5 प्रतिशत सीमित नहीं की गयी है। अनुचित भुगतान रोकने में कार्यपालक अभियंता के रूप में अक्षम होने की संचालन पदाधिकारी की समीक्षा तथ्य पर आधारित नहीं है। मेरे द्वारा भुगतान पर समुचित नियंत्रण रखने हेतु भरपूर प्रयास किया गया एवं पूरक बचाव बयान दिनांक 09.07.15 के कंडिका-7 में भुगतान को लॉगबुक के घंटो को Disallowed करते हुए विपत्र की राशि को सीमित करते हुए अंतरिम विपत्र पारित किया गया क्योंकि डिवाटरिंग पर अंतिम निर्णय बाकी था। आलोच्य सायफन का निर्माण पूर्ण हो चुका है एवं नियमित रूप से जल प्रवाह हो रहा है। एकरारनामा के Clause-7 एवं लोक निर्माण लेख संहिता के नियम 247 ( b) के अनुसार अंतिम विपत्र, जो अभी निष्पादित नहीं है, से सभी चालू विपत्रों का समायोजन करने का प्रावधान है। उक्त वर्णित परिस्थिति में सरकार को कोई वित्तीय क्षति किसी रूप में नहीं हुई है तथा सायफन का निर्माण का उद्‌देश्य प्राप्त हो चुका है। (ख) संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में मेरे द्वारा संरचना को पूर्ण कराने के लिए तैयार किए गए कार्यक्रम में खानापुरी बताया गया जो सत्य नहीं है। मेरे प्रतिनियुक्ति के पूर्व बिना कार्यक्रम के डिवाटरिंग एवं संरचना कार्य कराया जा रहा था। प्रतिनियुक्ति के बाद प्रथम बार संरचना पूर्ण कराने के लिए कार्यक्रम दिया गया एवं निर्माण पूर्ण कराया गया। सामान्यतया कार्य प्रारंभ के पूर्व ही समयबद्ध कार्यक्रम तैयार कर तदनुसार कार्य कराया जाता है जो विषयांकित निर्माण में नहीं किया गया है। (ग) संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में मात्र कार्यपालक अभियंता के स्तर पर ही जिम्मेवारी निर्वहन नहीं किये जाने का उल्लेख करते हुए डिवाटरिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्य की जाँच Routine आधारित करने के आधार पर मेरे स्तर से अधूरे रूप से पर्यवेक्षण करने का लांछन का उल्लेख किया गया है जो सत्य से परे है। वस्तुतः डिवाटरिंग मद में भुगतान का मूल स्रोत लॉगबुक है, जो स्वीकृत प्राक्कलन में चूक के कारण है। कार्यपालक अभियंता के रूप में सदैव भुगतान पर नियंत्रण रखने के उद्‌देश्य से लॉगबुक के घंटो को Disallowed कर अंतरिम भुगतान किया गया। जिसका आधार था कि डिवाटरिंग के भुगतान के संबंध में सक्षम प्राधिकार का अंतिम निर्णय बाकी है। (घ) संचालन पदाधिकारी द्वारा सायफन निर्माण में आदि से अंत तक के सभी activity पर सम्यक विचार किये बिना आरोप प्रमाणित प्रतिवेदित किया गया जो युक्तिसंगत एवं न्यायसंगत नहीं है। (च) मूल पदस्थापन के अतिरिक्त तीन अन्य प्रमंडलों के प्रभार में रहते हुए डिवाटरिंग कार्य को भी नियंत्रित ढ़ग से करने का प्रयास के तथ्य को संचालन पदाधिकारी द्वारा ध्यान नहीं दिया गया है। (छ) LWL से 30'-4" नीचे तक कार्य कराने एवं Ground Water flow को नियंत्रित करने का कोई प्रावधान स्वीकृत नक्शा में नहीं है। जबकि सामन्यतया बैरल की Stability एवं नींव की खुदाई के क्रम में भूगर्भ जल प्रवाह को नियंत्रित/कम करने के लिए सीट पाइल का प्रावधान किया जाता है, जो स्वीकृत नक्शा में नहीं है। संचालन पदाधिकारी द्वारा इस तथ्य को ध्यान नहीं देकर अनियंत्रित डिवाटरिंग कहते हुए दोषी मान लिया जाना न्यायसंगत नहीं है। (ज) आलोच्य संरचना के निर्माण के दौरान स्थलीय जटिलता एवं अप्रत्याशित डिवाटरिंग को देखते हुए विभागीय दिशा निदेश की माँग की गयी। जिसके क्रम में अभियंता प्रमुख, विभागीय तकनीकी विशेषज्ञ समिति द्वारा Well Point से डिवाटरिंग को सही ठहराया गया। (झ) संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में हुई उक्त चूक पर विभागीय समीक्षा में नहीं होने के कारण मूझसे द्वितीय कारण पृच्छा की गयी जो तर्क संगत एवं न्यायसंगत नहीं है।

अंत में उक्त तथ्यगत कारण पृच्छा को स्वीकार करते हुए आरोप से मुक्त करने का अनुरोध किया गया है।124 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 समीक्षा :- आरोपी श्री चौधरी संभवतः 1.3.13 से सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा के प्रभार में रहे क्योंकि इनके पूर्ववर्ती कार्यपालक अभियंता, श्री राजवल्लभ यादव दिनांक 28.02.13 को सेवानिवृत हुए। इस प्रकार 1.3.13 से 1.7.13 तक कैनाल सायफन कार्य में डिवाटरिंग का कार्य इनके पदस्थापन अवधि में किया जाना परिलक्षित होता है। श्री चौधरी द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में संचालन पदाधिकारी द्वारा कतिपय बिन्दुओं पर समीक्षा में हुई चूक पर विभागीय समीक्षा नहीं होने के कारण द्वितीय कारण पृच्छा किये जाने को प्रतिवेदित किया गया है। उनके द्वारा वैसे अंकित बयान का संक्षिप्त ब्योरा उपरोक्त कंडिका 'क' से 'झ' में अंकित किया गया है। हालांकि संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री चौधरी के बयान के समीक्षोपरांत तथ्यों को उद्‌दृत करते हुए आरोप प्रमाणित होने को निष्कर्षित किया गया है। कैनाल सायफन के प्राक्कलन में डिवाटरिंग मद का प्रावधान नहीं होना, मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ द्वारा डिवाटरिंग कार्य में लॉगबुक संधारित करते हुए उसके आधार पर भुगतान किये जाने का आदेश दिया जाना, डिवाटरिंग मद की राशि 5 प्रतिशत सीमित नहीं होना, लॉगबुक के घंटों को Disallowed (कुल 45404 घंटा) करते हुए अंतरिम भुगतान किये जाने के श्री चौधरी के कथन कंडिका-क की पुष्टि संगत अभिलेखों से होती है। श्री चौधरी का कहना है कि मेरे प्रतिनियुक्ति के पूर्व बिना कार्यक्रम के डिवाटरिंग का कार्य कराया जा रहा था जबकि प्रतिनियुक्ति के बाद प्रथम बार उनके द्वारा कार्यक्रम तैयार किया गया एवं निर्माण पूर्ण किया गया। अधीक्षण अभियंता, पूर्णियां के बचाव बयान के साथ संलग्न मुख्य अभियंता पूर्णियां के पत्रांक 1469, दिनांक 09.06.10 से पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य का समग्र रूप से कार्यक्रम विभागीय अनुमोदन हेतु भेजे जाने का बोध होता है। आलोच्य कैनाल सायफन उक्त परियोजना का अंश है। इस आशय की टिप्पणी जाँच समिति के जाँच प्रतिवेदनों में भी किया जाना परिलक्षित होता है जिससे बिना कार्यक्रम के संरचना निर्माण कराये जाने के श्री चौधरी के कथन की पुष्टि होती है। श्री चौधरी द्वारा प्रतिनियुक्ति के बाद कार्यक्रम तैयार करने को मात्र एक खानापूर्ति करने को संचालन पदाधिकारी द्वारा अंकित किया गया है क्योंकि कार्यक्रम के अनुसार कार्य पूरा कराने की जिम्मेवारी कार्यपालक अभियंता की होती है। जो पूर्ण होना परिलक्षित नहीं होता है। संचालन पदाधिकारी जाँच प्रतिवेदन में मात्र कार्यपालक अभियंता के स्तर पर जिम्मेवारी निर्वहन नहीं किये जाने का उल्लेख करते हुए अधूरे रूप से पर्यवेक्षण का लांक्षण लगाने के श्री चौधरी का कथन (कंडिका-ग) में सत्य प्रतीत नहीं होता है। क्योंकि संचालन पदाधिकारी द्वारा सभी संलग्नित पदाधिकारियों के मामले में पर्यवेक्षण में कमी पाये जाने को निष्कर्षित किया गया है।

श्री चौधरी द्वारा कंडिका 'घ' एवं 'च' में प्रतिवेदित किया गया है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा सायफन निर्माण में आदि से अंत के सभी activity पर विचार नहीं एवं अतिरिक्त प्रभार में रहते हुए डिवाटरिंग कार्य को नियंत्रित करने के मेरे प्रयास के तथ्यों पर बिना ध्यान दिये आरोप प्रमाणित प्रतिवेदित किया गया है जो न्यायसंगत नहीं है। श्री चौधरी द्वारा मशीन, श्रमबल, सामग्री की कमी का उल्लेख किया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा यह भी उल्लेख किया गया है कि इनके कई प्रयास के उल्लेख के बावजूद तीना पालियों में डिवाटरिंग का कार्य नहीं कराया गया जो स्पष्टतः समयबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराये जाने, समुचित ढ़ग से पर्यवेक्षण नहीं किये जाने एवं अनियंत्रित ढ़ग से डिवाटरिंग कार्य कराया जाना परिलक्षित करता है। इस प्रकार श्री चौधरी के उक्त तथ्य की पुष्टि नहीं होती है।

संरचना निर्माण के दौरान स्थलीय जटिलता, एवं अप्रत्याशित डिवाटरिंग को देखते हुए विभागीय दिशा-निदेश की माँग की गठित जाँच द्वारा Well point system से डिवाटरिंग को सही ठहराये जाने का उल्लेख किया गया (कंडिका-ज)। Well point system से डिवाटरिंग कार्य को जाँच समिति द्वारा सही ठहराये जाने के बयान की पुष्टि जाँच प्रतिवेदनों से होती है। परन्तु जाँच प्रतिवेदन में निर्माण के दौरान मशीन तथा निर्माण सामग्री की कमी, डिवाटरिंग कार्य होते हुए भी concreting का कार्य नहीं होने का उल्लेख है। साथ ही तीन पाली में कार्य कराने का Mile stone तैयार कर कार्य कराया जाता तो डिवाटरिंग पर भुगतान कम होने को भी अंकित किया गया है। उपरोक्त से समबद्ध कार्यक्रम तैयार कर कार्यान्वयन नहीं किये जाने एवं अनियंत्रित ढ़ग से डिवाटरिंग कार्य कराया जाना परिलक्षित होता है।

आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि मेरे पदस्थापन के पूर्व पूर्ववर्ती द्वारा रू0 1,86,21,640/- एवं प्रतिनियुक्ति के बाद इनके द्वारा रू0 4,02,43,223/- कुल रू0 5,88,64,863/- डिवाटरिंग मद में भुगतान किया गया है। इस तरह स्पष्ट होता है कि कुल 45404 घंटो का Disallowed किया गया है एवं allowed घंटो की राशि रू0 5,93,15,929.48 होता है। स्पष्ट है कि संवेदक द्वारा लॉगबुक के आधार पर रू0 17,17,04,202/- का मुकदमा दायर किया गया है क्योंकि Disallowed घंटो को लॉगबुक में Disallowed नहीं किया गया। साथ ही डवाटरिंग मद (अतिरिक्त मद) का भुगतान सक्षम प्राधिकार के बिना स्वीकृति किया गया है जो अनियमित श्रेणी में परिलक्षित होता है।

उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री महेन्द्र चौधरी, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित होता है।

इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री महेन्द्र चौधरी, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा को उक्त प्रमाणित आरोप के लिये "तीन वेतन वृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक तथा देय तिथि से तीन वर्षों तक प्रोन्नति पर रोक" का दण्ड देने का निर्णय लिया गया है।

सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री महेन्द्र चौधरी, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा को विभागीय अधिसूचना संख्या-45, दिनांक 05.01.2018 द्वारा "तीन वेतन वृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक तथा देय तिथि से तीन वर्षों तक प्रोन्नति पर रोक" का दण्ड दिया गया।

उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री चौधरी द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन समर्पित किया गया, जिसकी समीक्षा की गयी, समीक्षा में पाया गया कि श्री चौधरी द्वारा वही तथ्य अंकित किया गया है जो उनके द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही के दौरान125 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संचालन पदाधिकारी तथा द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में दिया गया है। जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी है तथा श्री चौधरी का बचाव बयान को अस्वीकार योग्य मानते हुए आरोप प्रमाणित पाया है।

आरोप अंश-'क' के संदर्भ में कहा गया है कि दि0 08.03.13 का सिंचाई नहर प्रमंडल, बथनाहा का अतिरिक्त प्रभार ग्रहण के पश्चात अवशेष कार्यों को दि0 28.06.13 तक पूर्ण करने हेतु समयवद्ध कार्यक्रम पत्रांक-454 दिनांक 11.04.13 द्वारा संवेदक को दिया गया एवं इसकी सूचना अधीक्षण अभियंता/मुख्य अभियंता को भी दी गयी तथा सहायक अभियंता को कार्यक्रम के अनुसार युद्धस्तर पर कार्य कराने हेतु निदेश दिया गया। पूर्व में भी पत्रांक-386, दिनांक 20.03.13 द्वारा संवेदक को तीन पालियों में कार्य कराने का निदेश दिया गया तथा अवर प्रमंडल पदाधिकारी को कैम्प कर कार्य कराने का निदेश दिया गया। उक्त कथन के समर्थन में इनके द्वारा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है ऐसे भी मात्र कार्यक्रम देकर एवं मात्र सहायक अभियंता को निदेश देकर अपने दायित्व की इतिश्री मान लेना एक कार्यपालक अभियंता स्तर के पदाधिकारी के लिये उचित नहीं माना जा सकता है।

आरोप के द्वितीय अंश के संदर्भ में कहा गया है कि मूलतः वे सिंचाई प्रमंडल, अररिया में पदस्थापित होने के बावजूद सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा एवं सिंचाई प्रमंडल, नरपतगंज के अतिरिक्त प्रभार में थे। तीनों प्रमंडलों में चह रहे कार्यों का सघन पर्यवेक्षण किया गया है तथा विशिष्टि एवं गुणवत्ता के अनुरूप कार्य कराने का प्रयास किया गया। कार्यक्षेत्र विस्तृत रहने एवं अभियंताओं की घोर कमी के बावजूद कार्यरत अभियंताओं से तीनो पाली में कार्य कराने का प्रयास किया गया। आलोच्य कार्य का स्थल काफी जटिल एवं असामान्य प्रकृति के होने के कारण मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता द्वारा स्थल निरीक्षण में दिये गये निदेश का अनुपालन करने का यथा संभव प्रयास किया गया। इनके द्वारा उपरोक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। अतएव इनका उक्त कथन स्वीकार योग्य नहीं है, क्योंकि मात्र डिवाटरिंग मद में ही काफी राशि का व्यय किया जाना परिलक्षित करता है कि इनके द्वारा सुनियोजित ढंग से उक्त संरचना के कार्यों का पर्यवेक्षण नहीं किया गया है।

आरोप के तृतीय अंश के संदर्भ में इनके बचाव बयान से परिलक्षित होता है कि इनके द्वारा स्वीकार किया गया है कि डिवाटरिंग में 35763870 रूपये 20.03.13 के मद के द्वितीय चालू विपत्र के माध्यम से रू0 35763870/- का औपबंधिक भुगतान किया गया है तथा अगले विपत्र को सीमित करते हुए कुल 4479350/- रूपये का भुगतान किया गया है। अर्थात इनके द्वारा इस मद में कुल (35763870+4479310)=40243220/- रूपये का भुगतान किया गया है।

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री चौधरी के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-45, दिनांक 05.01.2018 द्वारा अधिरोपित दण्ड "तीन वेतन वृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक तथा देय तिथि से तीन वर्षों तक प्रोन्नति पर रोक" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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5 मई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)01-03/2014-656--मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के पदस्थापन अवधि के दौरान पूर्वी कोशी नहर प्रणाली पुनस्र्थापन कार्य योजना के तहत कुर्सेला वितरणी 61.90 पर निर्माणाधीन कैनाल साईफन हेतु सम्बद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराये जाने समुचित ढ़ग से सरकारी राशि 17,17,04,202 (सतरह करोड़ सतरह लाख चार हजार दो सौ दो रूपये) के विरूद्ध 8,06,71,790 (आठ करोड़ छः लाख एकहत्तर हजार सात सौ नब्बे रूपये) के अनुचित भुगतान के प्रथम द्रष्टया प्रमाणित आरोपो के लिए श्री सुरेश चौधरी, तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली-2005 के नियम 17 के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक 1510, दिनांक 16.10.14 द्वारा विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के लिए श्री रामपुकार रंजन, अभियंता प्रमुख (मध्य) को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया जिसमें आरोप को प्रमाणित पाया गया।

उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच-प्रतिवेदन की छायाप्रति देते हुए श्री चौधरी से विभागीय पत्रांक-2320, दिनांक 24.10.16 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी, तदालोक में श्री सुरेश चौधरी द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर समर्पित किया गया। श्री चौधरी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा उच्च स्तर पर निम्नरूपेण की गयी :-

श्री सुरेश चौधरी, तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ आरोप ः- "पूवी कोशी नहर प्रणाली पुनस्र्थापन (ERM) कार्य योजना के तहत कुर्सेला वितरणी 61.90 पर निर्माणाधीन कैनाल सायफन हेतु समयबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराये जाने, समुचित ढ़ग से पर्यवेक्षण नहीं किये जाने, डिवाटरिंग जैसे कार्य को अनियंत्रित ढ़ग से कराये जाने तथा सुनियोजित ढ़ग से सरकारी राशि का 17,17,04,202/- रूपये के विरूद्ध 8,06,71,790/- रूपये का अनुचित भुगतान के लिए प्रथम दृष्टया आप दोषी हैं।" संचालन पदाधिकारी का मंतव्य :-समीक्षोपरांत आरोपित पदाधिकारी श्री सुरेश चौधरी ( ID-3487) तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ के विरूद्ध गठित विभागीय आरोप प्रमाणित होता है।

आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा के क्रम में बचाव बयान का सार :-

बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 126

(i) संचालन पदाधिकारी द्वारा मेरे स्पष्टीकरण प्रतिवेदन की यथोचित एवं न्यायसंगत समीक्षा नहीं की जा सकी है।

(ii) संचालन पदाधिकारी द्वारा कहा जाना कि आलोच्य संरचना कार्य के लिये अलग से कोई कार्यक्रम निर्धारित नहीं किया गया था विभागीय प्रचलित कार्यपद्धति के अनुरूप नहीं है।

(iii) इतने विशाल कार्य पैकेज जिसमें अन्य कार्य के साथ 2314 अद्‌द संरचनाओं का निर्माण/पुनस्र्थापन कार्य समावेशित हो, के प्रत्येक संरचना का अलग-अलग कार्यक्रम तैयार करना न तो प्रचलित परम्परा के अनुरूप था और न व्यवहारिक। जैसा कि स्पष्टीकरण प्रतिवेदन की कंडिका-4 में वर्णित है। पूरे कार्य पैकेज का अवयववार मासिक कार्यक्रम तैयार कराकर विधिवत अनुमोदनोपरांत ही कार्यान्वयन कराया गया था।

(iv) जहाँ तक नींव से जल निकासी कार्य के कार्यक्रम को तैयार करने का प्रश्न है यह संभव नहीं था, क्योंकि जब कार्य की मात्रा अनिश्चित हो तो निश्चित कार्यक्रम कैसे बनाया जा सकता था।

(v) पूर्व में समर्पित स्पष्टीकरण प्रतिवेदन की कंडिका-8 से 13 के पुनर्विलोकन से स्पष्ट है कि कार्य में संलग्नित अभियंता एवं संवेदक ने स्वार्थ से अभिप्रेरित होकर इस घिनौने षड़यंत्र को अंजाम दिया जिसके लिए परोक्षतः मुझे भी दोषी माना जा रहा है जो न्यायोचित नहीं होने के साथ नैसर्गिक न्याय सिद्धांतों के प्रतिकूल है।

(vi) पुनः स्पष्टीकरण प्रतिवेदन की कंडिका 7 एवं 11 तथा अन्यान्य कंडिकाओं में वर्णित है कि अपने विवेकानुसार अनुचित भुगतान को रोकने का हर संभव प्रयास किया। संचालन पदाधिकारी की टिप्पणी में किस ठोस प्रयास की बात कही गयी मेरे समझ से परे है।

संचालन पदाधिकारी की समीक्षा टिप्पणी में मुझ पर कोई सीधा आरोप प्रमाणित नहीं होता है। अतः मेरे शुद्ध अंतःकरण एवं स्वच्छ सेवा इतिहास के मद्‌देनजर मामले की तार्किक एवं न्याय संगत समीक्षा कर मुझे आरोप मुक्त किया जाय।

समीक्षा :- प्रस्तुत आरोप के निम्न भाग परिलक्षित होता है - (i) समयबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराया जाना। (ii) समुचित ढ़ग से पर्यवेक्षण नहीं किया जाना। (iii) अनियंत्रित ढ़ग से डिवाटरिंग कार्य कराया जाना तथा सुनियोजित ढ़ग से सरकारी राशि रू0 17,17,04,202/- के विरूद्ध रू0 8,06,71,790/- का अनुचित भुगतान किया जाना।

आरोपी पदाधिकारी द्वारा पुनः प्रतिवेदित किया गया है कि पूरे पैकेज का अवयववार कार्यक्रम तैयार कराकर ही कार्यान्वयन कराया गया था। साथ ही कहना है कि इतन विशाल कार्य पैकेज जिसमें 2314 संरचना समावेशित हो के प्रत्येक संरचना का अलग-अलग कार्यक्रम तैयार करना न प्रचलित परम्परा के अनुरूप और न व्यवहारिक। साथ ही कहना है कि आलोच्य संरचना के जल निकासी का कार्यक्रम, कार्यमात्रा की अनिश्चिता की स्थिति में बनाया जाना संभव नहीं था। आरोपी पदाधिकारी के उक्त स्वीकारोकित बयान से विदित होता है कि आलोच्य संरचना का अलग से बिना समयबद्ध कार्यक्रम तैयार किये कार्यान्वयन किया गया एवं जाँच समितियों के जाँच प्रतिवेदनों में भी समयबद्ध कार्यक्रम बिना ही कार्य प्रारंभ किये जाने का उल्लेख मिलता है।

आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि कार्य में संलग्नित अभियंताओं एवं संवेदक द्वारा कृत धिनौने षड़यंत्र के लिए परोक्षतः उन्हें दोषी माना जाना नैसर्गिक न्याय के प्रतिकूल है। आरेापित पदाधिकारी का कहना है कि पूर्व प्रतिवेदन के कंडिका 7 एवं 11 से स्पष्ट है कि अपने विवेकानुसार अनुचति भाग को रोकने का हर संभव प्रयास किया। संचालन पदाधिकारी की टिप्पणी किस ठोस प्रयास की बात कही गयी समझ से परे है। ओरापित पदाधिकारी द्वारा पूर्व प्रतिवेदन के कंडिका-7 में साईफन संरचना स्थल का सतत निरीक्षण/पर्यवेक्षण किया जाना तथा स्थलीय स्थिति के अनुरूप प्रभारी अभियंताओं को निदेश दिया जाना को उल्लेखित करते हुए साक्ष्य के रूप में स्थल निरीक्षण पंजी एवं स्थल निरीक्षण पंजी की छायाप्रति संलग्न की गई है।

आरोपित पदाधिकारी द्वारा अनुचित भुगतान को रोकने का उनके स्तर से की गई प्रयास को उल्लेखित नहीं किया गया है। दिनांक 08.12.11 के स्थल निरीक्षण प्रतिवेदन संलग्न किया गया है जबकि डिवाटरिंग कार्य 19.02.12 से प्रारंभ है। अन्य स्थल निरीक्षण प्रतिवेदन अन्य पदाधिकारियों से संबंधित है। इसी प्रकार कई तिथियों में स्थल निरीक्षण पंजी में डिवाटरिंग पम्प की कमी, मानव बल एवं सामग्री की कमी, उसे बढाने का निदेश वास्तविक कराये गये डिवाटरिंग कार्य का ही भुगतान किये जाने जैसे तथ्यों का उल्लेखित किया जाना परिलक्षित होता है। उक्त से यह स्पष्ट नहीं होता है कि उनके स्तर से अनुचित भुगतान रोकने का कोई प्रयास किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा समीक्षा में अंकित किया गया है कि उक्त तो निदेश दिये गये परन्तु न तो वस्तुतः पम्प की आवश्यकता (संख्या) आकलित की गयी और न तीनों पालियों में डिवाटरिंग कार्य कराया गया।

आरोपित पदाधिकारी भुगतान के लिए सीधे जवाबदेही नहीं है। परन्तु एकरारनामा शर्त्तों का सेक्सन-6 के कंडिका-7 का Note (i) " Each and every package comprise so many components like various structure and sections of canal etc. For this purpose amount of extra item of work for each component will treated as seprate." का उल्लंघन करते हुए रू0 2.0 करोड भुगतान की स्वीकृति दी गई एवं127 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 कुल रू0 5,88,64,860/- अनुचित भुगतान को रोकने की कोई कारवाई किया जाना परिलक्षित नहीं होता है। इस प्रकार अनुचित भुगतान रोकेने के लिए आरोपित पदाधिकारी द्वारा सफल प्रयास किया जाना परिलक्षित नहीं होता है।

उपर्युक्त वर्णित तथ्यों, बचाव-बयान के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री सुरेश चौधरी, तत्कालीन मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित होता है।

इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री सुरेश चौधरी , तत0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ को उक्त प्रमाणित आरोप के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है -

"दो वेतन वृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक तथा संगत वर्ष के लिए निन्दन"। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुरेश चौधरी, तत्का0 मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, पूर्णियाँ को विभागीय अधिसूचना संख्या-38 दिनांक 05.01.18 द्वारा "दो वेतन वृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक तथा संगत वर्ष के लिए निन्दन" का दण्ड अधिरोपित किया गया।

उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री चौधरी द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन समर्पित किया गया, जिसकी समीक्षा की गयी। समीक्षा में पाया गया कि श्री चौधरी द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में आरोप से संदर्भित कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया गया, जिससे गठित आरोप अप्रमाणित होने जैसे स्थिति बने। उनके द्वारा मात्र वही तथ्य को दुहराया गया है जो उनके द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में दिया है। उनके द्वारा मुख्य रूप से कहा गया है कि एकमुस्त कार्यमद जिसकी मात्रा अनिश्चित हो उसका कोई निश्चित कार्यक्रम तैयार करना संभव नहीं है तथा दूसरे तरफ यह भी कहा गया है कि प्रश्नगत कार्य का विधिवत कार्यक्रम तैयार कर कार्यों का कार्यान्वयन कराया गया है जो अपने आप में विरोधाभाषी है। इनके द्वारा इस कथन की पुष्टि में कोई अभिलेख नहीं दिया गया, उसी प्रकार इनके द्वारा कहा गया है कि कर्तव्यनिष्ठा के साथ यथा संभव कार्यों का निरीक्षण/पर्यवेक्षण करते हुए वांछित निदेश/अनुदेश, लिखित/मौखिक रूप से दिया है परन्तु कोई समर्पित साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है। भुगतान के संदर्भ में इनका कहना है कि अनियमितता पूरी तरह स्थानीय स्तर पर नियोजित था उससे उनका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था इससे वे पूर्णतः अनभिज्ञ थे, यह कथन हास्यप्रद है। क्योंकि मुख्य अभियंता का प्रथम दायित्व है कि परिक्षेत्राधीन बरती जा रही अनियमितता पर रोक लगाया जाए जिसमें श्री चौधरी नाकाम रहे।

इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री चौधरी के पुनर्विलोकन अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-38, दिनांक 05.01.2018 द्वारा अधिरोपित दण्डादेश 'दो वेतन वृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक तथा संगत वर्ष के लिए निन्दन' को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 5 मई 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(मुज0)06-12/2018-655--श्री बलभद्र कुमार शाही (आई0डी0-3503) तत्कालीन सहायक अभियंता, ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, सीतामढ़ी में पदस्थापन अवधि के दौरान सीतामढ़ी जिलान्तर्गत डुमरा प्रखंड के फतहपुर गिरमिशानी में सिंचाई हेतु नहर की उड़ाही एवं मो0 मियां के घर से लखनदेई नदी जाने वाली पथ में टूटान की मरम्मत एवं जीर्णोद्धार कार्य के कार्यान्वयन में बरती गई अनियमितता के लिए ग्रामीण कार्य विभाग के विभागीय अधिसूचना सं0-1195, दिनांक 05.04.2016 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में निम्नलिखित आरोपों के लिए प्रपत्र-क गठित करते हुए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

आरोप सं0-1- कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण विकास, विशेष प्रमंडल, सीतामढ़ी के कार्यकाल में सहायक अभियंता के रूप में पदस्थापन की अवधि में उप विकास आयुक्त, सीतामढ़ी के आदेश ज्ञापांक -953, दिनांक 27.05.2008 द्वारा श्री दिलीप कुमार यादव, माननीय पूर्व विधान पार्षद की पार्षद ऐच्छिक निधि से डुमरा प्रखंड अन्तर्गत फतहपुर गिरमिशानी में सिंचाई हेतु नहर की उड़ाही एव मो0 मियाँ के घर से लखनदेई नदी जानेवाले पथ में टूटान का मरम्मत एवं जीर्णोद्धार कार्य के कार्यान्वयन का दायित्व आपको सौपा गया था। आपके द्वारा योजना पूर्ण करने की निर्धारित अवधि में कार्य पूर्ण नहीं कराया गया है।

आरोप सं0-2- योजना में प्राक्कलन के अनुसार कार्य नहीं कराया गया जबकि मापीपुस्त में आपके द्वारा प्राक्कलन के अनुरूप कार्य का सत्यापन मापी अंकित की गयी है। स्थल पर कृत कार्य मापी से बिल्कुल समानता नहीं रखता है, जिसमें प्रतीत होता है कि बिना स्थल निरीक्षण के मापीपुस्त का सत्यापन किया गया है।

आरोप सं0-3- योजना स्थल के जांच के समय आप उपस्थित थे परन्तु जांच पदाधिकारी को मापीपुस्त में दर्ज मापी के अनुसार योजना स्थल के किसी भाग में कार्य की सम्पुष्टि आपके द्वारा नहीं कराया गया। योजना स्थल पर लिये गये cross section पर आपके द्वारा हस्ताक्षर अंकित नही किया गया है, जिससे प्रतीत होता है कि सरकारी राशि का गबन पूर्व सुनियोजित शडयंत्र के तहत की गयी है।

आरोप सं0-4- योजना की मापीपुस्त के प्रथम विपत्र 16.06.2008 को तैयार किया गया, ़द्वितीय विपत्र 18.06.2011 को तैयार किया गया तथा 03.07.2009 को 20 प्रतिशत राशि सुधार के लिये घटाते हुए 3,81,333 का विपत्र तैयार किया गया है। प्रथम विपत्र 11.09.2008 को पारित करने के पश्चात दिनांक 18.06.2008 का द्वितीय विपत्र की प्रविष्टि मापीपुस्त में करना मापीपुस्त को संदिग्ध बनाता है। जिसका सत्यापन आपके स्तर से की गयी है, जिसमें आपकी भी सहभागिता है।128 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोप सं0-5- योजना का अंतिम विपत्र आजतक नहीं तैयार किया गया है। आपके द्वारा बिना स्थल निरीक्षण किये मापीपुस्त में कार्य प्रविष्टि का सत्यापन कर राशि की निकासी कर ली गई है, जो प्रथम दृष्टया राशि का गबन का मामला बनता है। यह सरकारी सेवक के लिये निर्धारित आचार संहिता के प्रतिकूल एवं दण्डनीय है। संचालन पदाधिकारी के समक्ष श्री शाही द्वारा समर्पित बचाव बयान में निम्नलिखित बातें कही गई हैः- आरोप सं0-01 का बचाव बयान- (क) निवेदन है कि आलोच्य योजना की प्रशासनिक स्वीकृति उपविकास आयुक्त सीतामढ़ी के द्वारा प्रदान की गयी थी जिसकी कुल राशि 9,88,500/- है। प्रथम किस्त में मात्र रू0 4,94,250/- की राशि कार्यपालक अभियंता,ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, सीतामढ़ी को विमुक्त की गयी थी, क्योंकि कार्यपालक अभियंता को ही कार्यकारी एजेंसी नियुक्त किया गया था। सुलभ प्रसंग हेतु उपविकास आयुक्त सीतामढ़ी का आदेश ज्ञापांक-953, दिनांक 27. 05.2008 की छायाप्रति परिशिष्टि-1 के रूप में संलग्न है।

(ख) निवेदन है कि कार्यपालक अभियंता को दिनांक 27.05.2008 को प्रथम किस्त की विमुक्त राशि,जो प्रशासनिक स्वीकृति की राशि का 50 प्रतिशत है, के बाद कार्यपालक अभियंता द्वारा पत्रांक 577 दिनांक 03.06.2008 के माध्यम से कार्यादेश निर्गत किया गया एवं मुझे कार्य कराने हेतु अग्रिम की राशि दी गयी। इसके बाद मेरे स्तर से कनीय अभियंता को अग्रिम की राशि उपलब्ध करायी गयी, क्योंकी कनीय अभियंता के द्वारा ही नहर उड़ाही में लगाये गये श्रमिकों का भुगतान किया जाना था। कनीय अभियंता द्वारा लोक निर्माण विभाग संहिता की कंडिका 241 एवं 242 के अनुसार मास्टर रोल उड़ाही में लगाये गये श्रमिकों का बनाया गया था एवं श्रमिकों की मजदूरी का भुगतान किया गया था। कार्यपालक अभियंता द्वारा नहर उड़ाही में किये गये मिट्टी कार्य का विपत्र अनुसूचित दर पर तैयार किया जाता था। जिसमें से संवेदक लाभांश (Contractor Profits) 10 प्रतिशत की कटौती की जाती थी, क्योंकी प्राक्कलन की स्वीकृति 10 प्रतिशत (Contractor Profits) काटकर दी गयी थी। सहायक अभियंता के रूप में मेरे द्वारा विपत्र एवं मास्टर रोल एवं मापी पुस्त में हस्ताक्षर करने के बाद कर्यपालक अभियंता को समर्पित किया गया था। जिनके द्वारा विपत्र पारित किया गया था तथा मेरे नाम में निर्गत अग्रिम की राशि को समायोजित किया गया था मेरे द्वारा प्रमंडल में मापी पुस्त विपत्र एवं मास्टर रोल समर्पित करने के पूर्व मेरे द्वारा कनीय अभियंता को दी गयी अग्रिम की राशी समायोजित की जाती थी।

(ग) उपयुक्त प्रक्रिया के तहत मात्र जून महीने में फतेहपुर गिरमिशानी सिंचाई नहर की उड़ाही करायी गयी, क्योंकी जून के अंत से ही वर्षा होना प्रारंभ हो गयी थी। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक प्रतीत होता है कि नहर की अपेक्षित उड़ाही पूरी कर ली गयी थी जिसका सम्पुष्ट प्रमाण यह है कि वर्ष 2008 की वर्षा, ऋतु में फतेहपुर गिरमीशानी नहर से सुचारू रूप से सिंचाई हुई तथा कृषकों के खेत में पानी पहुंचाया गया, जो इस नहर उड़ाही का मुख्य उद्‌देश्य था। इस तरह निर्धारित अवधि तीन महीने के पूर्व ही नहर उड़ाही का कार्य पूरी तरह संपन्न करा दिया गया था। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य मे आरोप सं0-1 किसी भी रूप में मेरे विरूद्ध लेशमात्र भी प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप सं0-02 का बचाव बयान-(क) निवेदन है कि उड़ाही का कार्य दिनांक 18.06.2008 तक कराया गया था, जबकि जाँच दल (उपविकास आयुक्त सीतामढी एवं कार्यपालक अभियंता, पथ प्रमण्डल, सीतामढ़ी) द्वारा स्थल जाँच लगभग दो वर्षो के बाद दिनांक 10.06.2010 को की गयी थी। इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि फतेहपुर गिरमिशानी नहर लखनदेई नदी से सम्पोषित Inundation canal है अर्थात लखनदेई नदी में जलस्तर पर्याप्त रूप से बढ़ने पर लखनदेई नदी का जल प्रवाह इस फतेहपुर गिरमिशानि Inudation canal में होता है। लखनदेई नदी एवं फतेहपुर गिरमिशानि नहर के मिलन बिंदु पर कोई स्ट्रक्चर निर्मित नही है,जिससे नहर में लखनदेई नदी से होनेवाले जल प्रवाह पर कोई नियंत्रण हो सके (ख) वर्णित परिस्थिति में दिनांक 18.06.2008 तक नहर उड़ाही का कार्य कराकर मापी पुस्त में अंकित मापी की तुलना जाँच दल द्वारा दो वर्षो के बाद दिनांक 10.06.2010 को की गयी स्थल जाँच मे मापी लेकर करने की कोई तकनीकी प्रासंगिकता नहीं है तथा ऐसी तुलना युक्तिसंगत एवं समीचीन नहीं है।

(ग) कनीय अभियंता द्वारा अंकित मापी की जाँच में मेरे द्वारा पूरी सतर्कता एवं सजगता बरती गयी है। दिनांक 10.

06.2008 को प्रथम विपत्र की मापी अंकित किये जाने के बाद दिनांक 18.06.2008 को 10.06.2008 के बाद 18.06.2008 के बीच की गयी उड़ाही की मापी की जाँच में दिनांक 18.06.2008 को पायी गयी विसंगति के आलोक में मेरे द्वारा दिनांक 10. 06.2008 एवं 18.06.2008 के बीच संपादित कार्य की मापी में 20 प्रतिशत की कटौती की गयी। मेरी इसी कार्रवाई से यह सम्पुष्ट होता है कि मापी की जांच में मेरे द्वारा पूरी सतर्कता बरती गयी।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में आरोप सं0-2 को कोई अंश किसी भी रूप में मेरे विरूद्ध लेशमात्र भी प्रमाणित नहीं होता है। आरोप सं0-03 का बचाव बयान-(क) निवेदन है कि पूर्वगामी कंडिका 2 में निवेदित सविस्तार बचाव बयान में आरोप सं0-3 का बचाव बयान पूरी तरह समावेशित है। कंडिका 2 में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि जून 2008 में ली गयी मापी की तुलना में दो वर्षों बाद जांच दल द्वारा ली गयी मापी से तुलना करने का कोई तकनीकी औचित्य नहीं है। दो वर्षों के अंतराल में Inundation Canal में गाद काफी मात्रा में जमा हो गयी थी। ऐसी स्थिति में दिनांक 12.06.2010 को दिनांक 10.06.2010 को ली गयी मापी के आधार पर तैयार किये गये क्रॉस सेक्शन का जांच दल द्वारा मुझे हस्ताक्षर करने के लिए दबाव देने का कोई औचित्य नहीं है इसी पृष्ठभूमि में मेरे द्वारा संयुक्त जांच दल द्वारा तैयार किये गये क्रॉस सेक्सन पर अपना हस्ताक्षर करने से इन्कार किया गया जो पूर्णतः नियम सम्मत एवं न्याय संगत है।

अतः उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में आरोप सं0-3 को कोई अंश किसी भी रूप में मेरे विरूद्ध लेशमात्र भी प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप सं0-4 का बचाव बयान- (क) निवेदन है कि आरोप सं0-4 की परिकल्पना पूर्णतः आधारहीन एवं औचित्यविहीन है। आरोप सं0-4 में प्रथम विपत्र अंकित करने की तिथि भी गलत है। द्वितीय विपत्र तैयार करने की भी तिथि129 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 में वर्ष गलत अंकित है। 03.07.2009 को 20 प्रतिशत की राशि सुधार के लिए घटाते हुए 3,81,333/- रूपये का विपत्र कनीय अभियंता द्वारा तैयार नहीं किया गया है और न मेरे द्वारा हस्ताक्षर किया गया है, अपितु 03.07.2009 को प्रमंडल स्तर पर विपत्र पारित किया गया है।

(ख) दिनांक 18.06.2008 को द्वितीय विपत्र की प्रविष्टि मापी पुस्त में की जाने को संदिग्ध मानने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि प्रमंडल में मापीपुस्त एवं विपत्र प्रथम चालू विपत्र के लिये समर्पित किये जाने के बाद प्रमंडल स्तर पर पारित करने में विलंब होने तथा उड़ाही का कार्य दिनांक 18.06.2008 को पूरा हो जाने तथा बाद में वर्षा ऋतु में इसकी सही मापी अंकित नहीं होने की स्थिति के कारण प्रमंडल स्तर से मापी पुस्त कनीय अभियंता द्वारा वापस लेकर मापी पुस्त में मापी अंकित करना पूर्णतः नियमसम्मत एवं कार्यहित में है तथा यह कार्रवाई पूर्णतः संदेहमुक्त है।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में आरोप सं0-4 को कोई अंश किसी भी रूप में मेरे विरूद्ध लेशमात्र भी प्रमाणित नहीं होता है। आरोप सं0-5 का बचाव बयान- (क) निवेदन है कि पूर्वगामी कंडिकाओं 1, 2, 3 एवं 4 में क्रमशः आरोप सं0-1, 2, 3 एवं 4 के संदर्भ में सविस्तार/सप्रमाण बचाव बयान के आलोक में आरोप सं0-5 की परिकल्पना पूर्णतः काल्पनिक है। (ख) संवेदक के माध्यम से आलोच्य कार्य का कार्यान्वयन नहीं होने की पृष्ठभूमि में दिनांक 18.06.2008 को कार्य समाप्ति के बाद अंतिम विपत्र का निर्माण करने की औपचारिकता की कोई आवश्यकता ही नहीं है। मेरे द्वारा मापी पुस्त में कार्य की अंकित मापी का सत्यापन किया गया है जो पूर्वगामी कंडिकाओं में निवेदित विभिन्न आरोपों के बचाव बयान के आलोक में पूर्णतः सम्पुष्ट है।

(ग) प्रथम दृष्टया राशि गबन का मामला बनने की अवधारणा पूर्णतः आधारहीन एवं औचित्यहीन है, क्योंकि जिला प्रशासन द्वारा कार्यकारी एजेंसी कार्यपालक अभियंता को विमुक्त की गयी राशि का पूर्ण सदुपयोग आलोच्य नहर की उड़ाही में किया गया है।

(घ) पूर्वगामी कंडिकाओं में निवेदित आरोपवार बचाव बयान के आलोक में यह निर्विवाद एवं अकाट्‌य सत्य है कि मेरे द्वारा सरकारी सेवक संहिता 1976 की कंडिका 3 (1) (i) (ii) (iii) में अपेक्षित सभी आचरण को पूरी शील निष्ठा से कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहते हुए ऐसा कोई काम नहीं किया गया है जो सरकारी सेवक के लिए अशोभनीय है।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में आरोप सं0-5 को कोई अंश मेरे विरूद्ध लेशमात्र भी प्रमाणित नहीं होता है।

आरोपी अभियंता से प्राप्त बचाव बयान के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा अपना जांच प्रतिवेदन समर्पित किया गया है। जिसमें निम्नलिखित बातें कही गई है :-

आरोप सं0-1 :- आरोपित पदाधिकारी द्वारा समर्पित बचाव बयान एवं साक्ष्य के अवलोकन से परिलक्षित होता है कि आलोच्य कार्य का कार्यादेश उप विकास आयुक्त, सीतामढ़ी के ज्ञापांक 953 दिनांक 27.05.2008 द्वारा निर्गत किया गया, जिसमें कार्य पूर्ण करने की अवधि तीन माह निर्धारित थी। तदुपरांत कार्यपालक अभियंता, सीतामढ़ी के पत्रांक 577 दिनांक 03. 06.2008 द्वारा आरोपित पदाधिकारी को कार्य कराने हेतु आदेश दिया गया। योजना की प्राक्कलित राशि 9,88,500/-रू0 थी। प्रथम चाल विपत्र की राशि से 5,03,644/-रू0 एवं द्वितीय चाल ूविपत्र की राशि 4,76,666/-रू0 यानी कुल 9,80,310/-रू0 का विपत्र तैयार किया गया था। जिसके विरूध प्रथम विपत्र से 5,03,644/-रू0 एवं द्वितीय चालू विपत्र कार्य के rectification हेतु 20 % कटौती कर 3,81,333 /- यानी कुल 8,84,977/-रू0 का भुगतान किया गया, जो प्राक्कलित राशि के लगभग बराबर है एवं कार्यादेश में निर्धारित अवधि के पूर्व की तिथि में कराये गये कार्य का विपत्र अंकित किया गया है। इस प्रकार कार्य को निर्धारित अवधि के अंदर माना जा सकता है। अतएव आरोप प्रमाणित नहीं होता है। आरोप सं0-2 : - आरोपित पदाधिकारी के बचाव बयान एवं साक्ष्य (मापी पुस्त की छायाप्रति संलग्न) के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि विषयगत नहर उड़ाही का कार्य दिनांक 18.06.2008 तक कराया गया था और जाँच दल द्वारा उक्त कार्य की जाँच दिनांक 10.06.2010 की गयी थी ।इस प्रकार दिनांक 18.06.2008 तक कराये गये कार्य की जाँच दो र्वषों के उपरांत दिनांक 10.06.2010 को करने पर स्थल पर पाये गये कार्य एवं मापी पुस्तिका में दर्ज कार्य के तारत्मय में भिन्नता पाया जाना कुछ हद तक स्वभाविक है। साथ ही आरोपित पदाधिकारी द्वारा द्वितीय विपत्र की दर्ज राशि में 20% किये जाने का साक्ष्य मापी पुस्तिका में दर्ज है। इस प्राकर यह आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप सं0-3 :-आरोपित पदाधिकारी के बचाव बयान एवं साक्ष्य (मापीपुस्त की छायाप्रति संलग्न) के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि विषयगत नहर उड़ाही का कार्य दिनांक 18.06.2008 तक कराया गया था और जांच दल द्वारा उक्त कार्य की जांच दिनांक 10.06.2010 की गयी थी। इस प्रकार दिनांक 18.06.2008 तक कराये गये कार्य की जांच दो वर्षों के उपरांत दिनांक 10.06.2010 को करने पर स्वभाविक है। स्थल पर पाये गये कार्य एवं मापीपुस्तिका में दर्ज कार्य के तारत्मय में भिन्नता पाया जाना कुछ हद तक स्वभाविक है। इस आधार पर आरोपित पदाधिकारी द्वारा जांच के दौरान cross section का हस्ताक्षर नहीं किये जाने का औचित्य नहीं है। अतएव यह आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप सं0-4 ः-आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव बयान के समर्थन में उपलब्ध कराये गये एम0बी0 के अवलोकन से ऐसा प्रतीत होता है कि नहर उड़ाही का कार्य दिनांक 18.06.2008 को पूर्ण होने के बाद उसी तिथि को द्वितीय विपत्र की प्रविष्टि मापी पुस्त में की गयी, जो बाद की तिथियों में प्रमंडल स्तर पर पारित हुआ है। इस प्रकार आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध आरोप प्रमाणित नहीं होता है।

आरोप सं0-5 ः- विभागीय रूप से कराये गये कार्य के विरूद्ध प्राप्त वाउचर का अंकन मापी पुस्तिका में किया जाता है। मापीपुस्त में कनीय अभियंता, कार्यपालक अभियंता एवं सहायक अभियंता का हस्ताक्षर अंकित है, जो स्पष्ट करता है कि कनीय अभियंता द्वारा ली गई मापी को सहायक अभियंता एवं कार्यपालक अभियंता द्वारा सत्यापित किया गया है। अतः बिना स्थल निरीक्षण किये मापी पुस्त में कार्य की प्रविष्टि की गयी है ऐसा प्रमाणित नहीं होता है।130 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन एवं संदर्भित साक्ष्यो को श्री शाही, सहायक अभियंता का कैडर जल संसाधन विभाग होने के कारण अग्रेत्तर कार्रवाई हेतु ग्रामीण कार्य विभाग, पटना द्वारा उपलब्ध कराया गया। ग्रामीण कार्य विभाग से प्राप्त पत्र के सम्यक समीक्षोपरांत उनसे असहमति की स्थिति में असहमति के बिन्दु को उल्लेखित करते हुए विभागीय पत्रांक-284, दिनांक 13.02.19 से पत्र प्रेषित किया गया। जिसके क्रम में ग्रामीण कार्य विभाग के पत्रांक-1753, दिनांक 27.06.2019 से असहमति के बिन्दु को उल्लेखित करते हुए पत्र विभाग में समर्पित किया गया। जिसके समीक्षोपरांत विभाग द्वारा असहमति के निम्न बिन्दुओं पर विभागीय पत्रांक-1618, दिनांक 30.07.19 के द्वारा श्री शाही से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की मांग की गई। संचालन पदाधिकारी के जांच प्रतिवेदन एवं मंतव्य से आरोप सं0-2 के बचाव बयान में उल्लेख है कि Rectification के लिए 20 प्रतिशत (20%) की राशि सहायक अभियंता द्वारा कटौती की गई। कटौती करना यह दर्शाता हैकि कार्य विशिष्टि के अनुरूप नहीं किया गया था। 20 प्रतिशत का क्या आधार था। उक्त के आलोक में श्री शाही, सहायक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, सहरसा द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 15.10.19 से द्वितीयकारण पृच्छा का जवाब समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :- उनके द्वारा कहा गया है कि दिनांक 10.06.08 को प्रथम विपत्र की मापी अंकित किये जाने के बाद दिनांक 10.06. 08 से 18.06.08 के बीच की गयी उड़ाही की मापी दि० 18.06.08 को अंकित किये जाने के आलोक में दिनांक 10.06.08 से 18.06.08 के बीच अंकित कार्य की मापी में 20 प्रतिशत की कटौती की गयी है। इस संदर्भ में विदित हो कि विभागीय रूप में कनीय अभियंता द्वारा कराये गये कार्य से सरकारी निधि की सुरक्षा के दृष्टिकोण से उक्त अवधि में उड़ाही की मापी का 20 प्रतिशत की कटौती की गयी थी । अंतरिम विपत्र में 20 प्रतिशत कटौती के आधार के संदर्भ में ग्रामीण कार्य विभाग के परामर्श के आलोक में जल संसाधन विभाग द्वारा द्वितीयकारण पृच्छा की गई है। जिसका कोई नियम संगत आधार नहीं है। बिहार लोक निर्माण लेखा संहिता की कंडिका 244, 245 (नोट-1) तथा अपेंडिक्स-6 के प्रावधान के आलोक में सहायक अभियंता जांच पदाधिकारी है। सहायक अभियंता द्वारा स्वविवेक से जून माह के मध्य में नहर उड़ाही में कनीय अभियंता द्वारा विभागीय रूप से कराई गई नहर उड़ाही में 20 प्रतिशत कटौती की गई है। ऐसी स्थिति में माह जून के मध्य में कराई गई नहर उड़ाही में 20 प्रतिशत की गई कटौती के आधार के लिए पृच्छा करने का कोई औचित्य नहीं है। संचालन पदाधिकारी के स्पष्ट प्रतिवेदन एवं निष्कर्ष के संदर्भ में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-18 के अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा जांच प्राधिकार के निष्कर्ष से असहमत होने की स्थिति में यह अनिवार्य है कि ऐसी असहमति के लिए अपने कारणों का अभिलेखित करेगा तथा आरोप से संबंधित स्वयं का निष्कर्ष अभिलेखित करेगा यदि उस प्रयोजनार्थ अभिलेख में उल्लेखित साक्ष्य प्रर्याप्त हो। श्री शाही से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये - श्री शाही से प्रश्नगत कार्य के मापपुस्त पर Rectification के लिये 20 प्रतिशत की राशि की कटौती करने से स्पष्ट है कि कार्य विशिष्टि के अनुरूप नहीं कराये गए थे। श्री शाही द्वारा कहा गया है कि प्रथम विपत्र की मापी अंकित किये जाने के पश्चात दिनांक 10.06.2008 से 18.06. 08 के बीच की गयी नहर उड़ाही कार्य की मापी दिनांक 18.06.08 को अंकित किये गये मापी में सरकारी राशि की सुरक्षा के दृष्टिकोण से उक्त अवधि में उड़ाही की मापी का 20 प्रतिशत की कटौती की गयी है। मापपुस्त 1142 के पेज सं0-1 से 5 पर अंकित मापी से स्पष्ट है कि इनके द्वारा द्वितीय चालू विपत्र की कुल राशि का 20 प्रतिशत अर्थात 95333/- रूपये की कटौती Rectification के लिये काटा गया है जिसे नियमानुसार सही नहीं माना जा सकता है क्योंकि PWD Code के अनुसार विशिष्टि के अनुरूप कराये गये कार्यों की मापी मापपुस्त में दर्ज करना है एवं उसी के अनुरूप सहायक अभियंता द्वारा जांच करना है। यदि कनीय अभियंता द्वारा गलत मापी दर्ज की गयी है तो उसे जांच के दौरान काट कर सही मापी दर्ज करना जांच पदाधिकारी का कर्तव्य है। उक्त माप पुस्त में स्पष्ट नहीं होता है कि किस तरह के Rectification के लिये कटौती की गयी है। इससे स्पष्ट है कि या तो कनीय अभियंता द्वारा बिना कार्य कराये ही मापी दर्ज किया गया है अथवा गुणवत्ता विहीन कार्य की मापी दर्ज किया गया है। यदि सही ढंग से सहायक अभियंता द्वारा दर्ज मापी की जांच किया जाता तो संभव था कि उसी समय गुणवत्ताविहीन कार्य में सुधार हो जाता, परन्तु ऐसा नहीं कर इनके द्वारा अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं किया गया एवं गलत ढंग से 20 प्रतिशत की कटौती की गयी जिसे नियम के विरूद्ध माना जाता है। अतएव आरोप सं0-2 प्रमाणित होता है। समीक्षोपरांत प्रमाणित अरोपों के लिए श्री बलभद्र कुमार शाही, तत0 सहायक अभियंता, ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, सीतामढी सम्प्रति सहायक अभियंता, जल संसाधन विभाग को निम्न दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है। "एक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"। अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री बलभद्र कुमार शाही, सहायक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल सहरसा को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है। "एक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।131 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020

5 मई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)01-03/2014-654--मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ परिक्षेत्राधीन तत्का0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा के पदस्थापन अवधि के दौरान पूर्वी कोशी नहर प्रणाली पुनस्र्थापन कार्य योजना के तहत कुर्सेला वितरणी 61.90 पर निर्माणाधीन कैनाल साईफन हेतु सम्बद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराये जाने समुचित ढ़ग से सरकारी राशि 17,17,04,202 (सतरह करोड़ सतरह लाख चार हजार दो सौ दो रूपये) के विरूद्ध 8,06,71,790 (आठ करोड़ छः लाख एकहत्तर हजार सात सौ नब्बे रूपये) के अनुचित भुगतान के प्रथम द्रष्टया प्रमाणित आरोपो के लिए श्री राजवल्लभ यादव, तत0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी0) के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक 1511, दिनांक 16.10.14 द्वारा विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के लिए श्री रामपुकार रंजन, अभियंता प्रमुख (मध्य) को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया जिसमें आरोप को प्रमाणित पाया गया।

उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच-प्रतिवेदन की छायाप्रति देते हुए श्री राजवल्लभ यादव से विभागीय पत्रांक-2316, दिनांक 24.10.16 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी, तदालोक में श्री राजवल्लभ यादव द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर समर्पित किया गया। श्री यादव से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा उच्च स्तर पर निम्नरूपेण की गयी :- श्री राजवल्लभ यादव, तत0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा सम्प्रति सेवानिवृत

आरोप ः- "पूवी कोशी नहर प्रणाली पुनस्र्थापन (ERM) कार्य योजना के तहत कुर्सेला वितरणी 61.90 पर निर्माणाधीन कैनाल सायफन हेतु समयबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराये जाने, समुचित ढ़ग से पर्यवेक्षण नहीं किये जाने, डिवाटरिंग जैसे कार्य को अनियंत्रित ढ़ग से कराये जाने तथा सुनियोजित ढ़ग से सरकारी राशि का 17,17,04,202/- रूपये के विरूद्ध 8,06,71,790/- रूपये का अनुचित भुगतान के लिए प्रथम दृष्टया आप दोषी हैं।" संचालन पदाधिकारी का मंतव्य :-समीक्षोपरांत आरोपित पदाधिकारी श्री राजवल्लभ यादव ( ID-2211) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा के विरूद्ध गठित विभागीय आरोप प्रमाणित होता है। आरोपी पदाधिकारी का द्वितीय कारण पृच्छा के क्रम में बचाव बयान का सार ः-कुर्सेला वितरणी के वि0दू0 61.90 पर निर्माणाधीन सायफन निर्माण में समयबद्ध कार्य कराया गया था। Programme of works बनाया गया था एवं इसकी जानकारी उच्चाधिकारियों को दी गई थी। पर्याप्त संख्या में डिवाटरिंग मशीन एवं Stand by में अतिरिक्त मशीन नहीं रखे जाने के कारण कार्य में विलंब हुआ। मशीन की संख्या बढाने हेतु मेरे एवं अधीक्षण अभियंता द्वारा अनेकों बार लिखित एवं मौखिक संवेदक को कहा गया जिसकी पुष्टि स्थल आदेश पंजी से की जा सकती है।

पर्यवेक्षण के संबंध में कहना है कि प्रमंडल बथनाहा के अतिरिक्त प्रमंडल, नरपतगंज एवं कटिहार का अतिरिक्त प्रभार एव कार्यक्षेत्र पूर्णियाँ एवं कटिहार जिला था। फिर भी इस स्थल पर विशेष ध्यान देकर पर्याप्त पर्यवेक्षण किया गया। नदी तल से 7 मीटर नीचे से पानी निकाल कर कार्य कराना अपने आप में जटिल एवं कठिन कार्य के लिए अनुभवी एवं साधन सम्पन्न संवेदक की आवश्यकता थी जो नहीं थे जिसके कारण कार्य में बाधा हुई।

विपत्र का भुगतान के पूर्व अपने पत्रांक 129 दिनांक 28.01.13 से एकरारनामा का सेक्सन-6 कंडिका-7 को उल्लेखित करते हुए Extra items के भुगतान के लिए सक्षम नहीं होने एवं सक्षम प्राधिकार से स्वीकृति प्राप्त करने के लिए अधीक्षण अभियंता, पूर्णियां से अनुरोध किया एवं इसकी सूचना मोनिटरिंग अंचल-2, पटना को दी । उक्त के आलोक में मुख्य अभियंता के पत्रांक-184, दिनांक 23.01.13 एवं अधीक्षण अभियंता, पूर्णियां के पत्रांक 143, दिनांक 02.02.13 से रू0 2,07,66,096/- भुगतान की स्वीकृति दी गई एवं साथ ही कहा गया कि भुगतान के आदेश के बावजूद गैर तकनीकी रूप में मामले को उलझाया जा रहा है। विपत्र के भुगतान हेतु विभाग से मौखिक रूप से डराया-धमकाया एवं दबाव बनाया बया। अवर प्रमंडल पदाधिकारी चम्पानगर द्वारा रू0 4,86,13,672/- के प्रस्तुत विपत्र को अमान्य करते हुए स्वीकृत राशि रू0 2,07,66,096/- का ही भुगतान किया गया।

अंत में आरोप मुक्त करने का अनुरोध किया गया है। समीक्षा :- प्रस्तुत आरोप के निम्न भाग है - (i) समयबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराया जाना। (ii) समुचित ढ़ग से पर्यवेक्षण नहीं किया जाना। (iii) डिवाटरिंग कार्य अनियंत्रित ढ़ग से कराया जाना तथा सुनियोजित ढ़ग से सरकारी राशि रू0 17,17,04,202/- के विरूद्ध रू0 8,06,71,790/- का अनुचित भुगतान किया जाना।

आरोपित पदाधिकारी श्री राजवल्लभ यादव, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का द्वितीय कारण पृच्छा उत्तर जिसका संक्षिप्त ब्योरा उपर अंकित है, एवं संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में अंकित श्री यादव का बयान में लगभग सदृश तथ्य अंकित किये जाने का बोध होता है एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा उनके बयान के समीक्षोपरांत आरोप प्रमाणित पाये जाने का निष्कर्षित किया गया है।

श्री यादव का समयबद्ध कार्य कराने, कार्यक्रम तैयार किये जाने एवं उच्चाधिकारियों को जानकारी होने को उल्लेखित किया गया है। इनके द्वारा कोई साक्ष्य संलग्न नहीं किया गया है जिससे इनके कथन की प्रमाणिकता भी अभिलेखीय पुष्टि नहीं हो पाती है।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 132 श्री यादव द्वारा पर्याप्त संख्या में डिवाटरिंग मशीन Stand by में अतिरिक्त मशीन नहीं रहने के कारण डिवाटरिंग में विलम्ब होने को प्रतिवेदित किया गया है। इसके अतिरिक्त स्थल निरीक्षण प्रतिवेदनों स्थल निरीक्षण पंजी, तथा विभागीय/मुख्य अभियंता स्तर से गठित जाँच समितियों के प्रतिवेदनों से श्रमबल/निर्माण सामग्री की कमी, डिवाटरिंग के बावजूद Concreting नहीं होना, स्थल सूखा रहने के बावजूद मिट्‌टी कटाई नहीं होना, तीनों पालियों में कार्य नहीं होने का बोध होता है जिससे समयबद्ध क्रियान्वयन नहीं किया जाना पर्यवेक्षण का अभाव एवं अनियंत्रित डिवाटरिंग कार्य कराया जाना परिलक्षित होता है।

भुगतान के संदर्भ में श्री यादव का कहना है कि पत्रांक-129 दिनांक 28.01.13 से अतिरिक्त मद (डिवाटरिंग मद) की सक्षम प्राधिकार से स्वीकृति प्राप्त करने के प्रस्ताव के आलोक में मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ के पत्रांक 184, दिनांक एवं अधीक्षण अभियंता, पूर्णियाँ के पत्रांक-143, दिनांक 02.02.13 द्वारा रू0 2,07,66,096/- का स्वीकृति दिये जाने के उपरांत रू0 1,86,21,640/- का भुगतान किया गया है। श्री यादव 28.02.13 तक सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा में कार्यरत रहे एवं दिनांक 19.02.12 से पदस्थापन अवधि (बाद में भी हुआ है) तक डिवाटरिंग हेतु मशीन चलाये गये है। श्री यादव द्वारा 19.02.12 से 23.07.12 तक के डिवाटरिंग मद के 48192.47 घंटो के लिए रू0 4,86,13,672/- का अंकित विपत्र को मुख्य अभियंता स्तर से स्वीकृत राशि तक भुगतान किया गया है। भुगतान के मामले में श्री यादव कार्यपालक अभियंता पूर्ण जिम्मेवार होते है। श्री यादव द्वारा पर्याप्त डिवाटरिंग मशीन एवं Stand by में अतिरिक्त मशीन की कमी रहने को स्वीकार किया गया है। इसके बावजूद स्वीकृत राशि का भुगतान किया गया है। डिवाटरिंग मद में संभावित कुल व्यय को आकलित करते हुए प्रस्ताव दिया जाना चाहिये, चूँकि यह अतिरिक्त मद है परन्तु आंशिक अवधि 19.02.12 से 23.07.12 तक का ही प्रस्ताव दिये जाने का बोध होता है। अनुपयोगी घंटो को भी लॉगबुक में अमान्य किये जाने का कोई साक्ष्य नहीं दिया गया जिसके कारण 19.02.12 से 01.07.13 तक के डिवाटरिंग के लिए संवेदक द्वारा माननीय न्यायालय में रू0 17,17,04,202/- का दावा किया गया है। उपरोक्त से अनियमित भुगतान में संलिप्तता परिलक्षित होता है।

उपर्युक्त तथ्यों, साक्ष्य एवं जाँच प्रतिवेदनों के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री राजवल्लभ यादव, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित होता है।

इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री राजवल्लभ यादव, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा सम्प्रति से0नि0 को उक्त प्रमाणित आरोप के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है -

"पेंशन से 10 प्रतिशत की स्थायी कटौती।" सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजवल्लभ यादव, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, बथनाहा सम्प्रति से0नि0 को विभागीय अधिसूचना सं0-46, दिनांक 05.01.2018 द्वारा "पेंशन से 10 प्रतिशत की स्थायी कटौती' का दण्ड संसूचित किया गया।

उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री यादव द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन समर्पित किया गया, जिसकी समीक्षा की गयी समीक्षा में पाया गया कि श्री यादव द्वारा अपने पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में वही तथ्य दिया है जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में प्रस्तुत किया है।

इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं रहने के कारण श्री राजवल्लभ यादव, तत0 कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत से प्राप्त पुनर्विलोकन अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना सं0-46, दिनांक 05.01.2018 द्वारा अधिरोपित दण्ड 'पेंशन से 10% की स्थायी कटौती' को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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5 मई 2020

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)01-03/2014-653--मुख्य अभियंता, पूर्णियाँ परिक्षेत्राधीन अधीक्षण अभियंता नहर अंचल पूर्णियाँ के पदस्थापन अवधि के दौरान पूर्वी कोशी नहर प्रणाली पुनस्र्थापन कार्य योजना के तहत कुर्सेला वितरणी 61.90 पर निर्माणाधीन कैनाल साईफन हेतु सम्बद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराये जाने समुचित ढ़ग से सरकारी राशि 17,17,04,202 (सतरह करोड़ सतरह लाख चार हजार दो सौ दो रूपये) के विरूद्ध 8,06,71,790 (आठ करोड़ छः लाख एकहत्तर हजार सात सौ नब्बे रूपये) के अनुचित भुगतान के प्रथम द्रष्टया प्रमाणित आरोपो के लिए श्री लक्ष्मण राम (ID- 3494), तत्कालीन अधीक्षण अभियंता नहर अंचल, पूर्णियाँ के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली-2005 के नियम 17 के तहत विभागीय संकल्प ज्ञापांक 1514, दिनांक 16.10.14 द्वारा विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के लिए श्री रामपुकार रंजन, अभियंता प्रमुख (मध्य) को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया जिसमें आरोप को प्रमाणित पाया गया।

उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच-प्रतिवेदन की छायाप्रति देते हुए श्री लक्ष्मण राम से विभागीय पत्रांक-2315, दिनांक 24.10.16 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी, तदालोक में श्री लक्ष्मण राम द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर समर्पित किया गया। श्री राम से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा उच्च स्तर पर निम्नरूपेण की गयी :-

133 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020

समीक्षा :- प्रस्तुत आरोप के निम्न भाग है - (i) समयबद्ध कार्यक्रम का निर्धारण कर संरचना कार्य नहीं कराया जाना। (ii) समुचित ढ़ग से पर्यवेक्षण नहीं किया जाना। (iii) अनियंत्रित ढ़ग से डिवाटरिंग कार्य कराया जाना तथा सुनियोजित ढ़ग से सरकारी राशि रू0 17,17,04,202/- के विरूद्ध रू0 8,06,71,790/- का अनुचित भुगतान किया जाना।

आरोपी पदाधिकारी श्री लक्ष्मण राम, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता का द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा अंकित उनका बचाव बयान में लगभग सदृश तथ्य अंकित किये जाने का बोध होता है एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा उनके बचाव बयान के समीक्षोपरांत आरोप प्रमाणित पाये जाने को निष्कर्षित किया गया है।

मुख्य अभियंता, पूर्णियां के पत्रांक 1469 दिनांक 09.06.10 एवं पत्रांक 929 दिनांक 02.04.11 से एकरारित संरचनाओं का समेकित रूप से कार्यक्रम तैयार किये जाने के आरोपी पदाधिकारी के अंकित बयान की पुष्टि होती है।

आरोपित पदाधिकारी द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि एकरारित सभी संरचनाओं (2314 अद्‌द) का अलग-अलग समयबद्ध कार्यक्रम तैयार करना संभव नहीं है। साथ ही आलोच्य संरचना के संदर्भ में कहना है कि Well point system से जटिल डिवाटरिंग की स्थिति में समयबद्ध कार्यक्रम तैयार करना संभव नहीं था। इस प्रकार बिना समयबद्ध कार्यक्रम के आलोच्य संरचना का निर्माण कराया जाना परिलक्षित होता है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि नदी तल से करीब 21'-0" नीचे नींव तल होने एवं फरियानी नदी में संरचना निर्माण कराये जाने में जटिल डिवाटरिंग की स्थिति में जटिल संरचना का निर्माण कराया जाना है। उक्त परिस्थिति में प्रत्येक बैरल निर्माण में लगने वाले डिवाटरिंग में समय को आकलित करते हुए एक समयवद्ध कार्यक्रम जिसका अनुपालन संवेदक की भी बाध्यता होती, तैयार कर निर्माण कराये जाने से डिवाटरिंग मद एवं समय की बचत होती। परन्तु ऐसा प्रयास किया जाना परिलक्षित नहीं होता है।

पर्यवेक्षण में कमी के संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी द्वारा संलग्न किये गये स्थल निरीक्षण प्रतिवेदनों एवं स्थल निरीक्षण पंजी के अवलोकन से विभिन्न तिथियों में आरोपी पदाधिकारी द्वारा स्थल निरीक्षण किये जाने के कथन की पुष्टि होती है। उक्त प्रतिवेदनों एवं पंजी में अपर्याप्त मात्रा में डिवाटरिंग पम्प चालू रहने, श्रमबल एवं सामग्री में कमी के कारण कार्य नहीं होने डिवाटरिंग मद के भुगतान हेतु सरकार की जवाबदेही नहीं होने अािद जैसे तथ्यों को अंकित करते हुए निदेशित किया गया है। परन्तु आरोपित पदाधिकारी कार्य प्रभारी कार्यपालक अभियंता के नियंत्री पदाधिकारी होते हुए भी उसका अनुपालन सुनिश्चित कराये जाने कमी को आकलित कर सुझाव दिये जाने जैसे कोई कार्रवाई किये जाने का बोध नहीं होता है जिसमें समुचित ढ़ग से पर्यवेक्षण नहीं किया जाना परिलक्षित होता है।

अनियंत्रित तरीके से डिवाटरिंग कार्य कराये जाने के संबंध में अपने स्थल निरीक्षण प्रतिवेदनों एवं स्थल निरीक्षण पंजी को संदर्भित करते हुए प्रतिवेदित किया गया है कि पर्याप्त संख्या में डिवाटरिंग पम्प, श्रमबल एवं सामग्री को लगाकर दिन-रात कार्य करने एवं स्थल उपलब्ध रहने की स्थिति में तीनों शिफ्ट में कार्य नहीं करने पर बिना कार्य अवधि का भुगतान नहीं करने की चेतावनी दी जाती रही। उपरोक्त की पुष्टि उनके स्थल निरीक्षण प्रतिवेदनों एवं स्थल निरीक्षण पंजी से होती है। परन्तु उनके स्थल निरीक्षण के दौरान डिवाटरिंग हेतु पम्प की आवश्यकता का आकलन तीनों पालियों में डिवाटरिंग एवं निर्वाध रूप निर्माण होते रहना, अलाभकारी अपर्याप्त मात्रा में पम्प चलाये जाने अथवा श्रमबल एवं सामग्री के कमी के कारण कार्यस्थल उपलब्ध नहीं रहने के बावजूद कार्य नहीं होने की स्थिति में लॉगबुक में उन घंटो को अमान्य किये जाने जैसी कोई कारवाई नहीं किये जाने का बोध होता है जिससे अनियंत्रित तरीके से डिवाटरिंग होते रहा एवं इस मद में अधिक व्यय तथा संवेदक द्वारा अनुचित दावा किये जाने की स्थिति बनी। जबकि आरोपित पदाधिकारी प्रभारी कार्यपालक अभियंता के नियंत्री पदाधिकारी रहे। इस प्रकार अनियंत्रित ढ़ग से डिवाटरिंग कार्य कराया जाना परिलक्षित होता है।

डिवाटरिंग मद में सुनियोजित ढ़ग से अनुचित भुगतान का आरोप है। इस संदर्भ में आरोपित पदाधिकारी के स्थल निरीक्षण प्रतिवेदनों एवं स्थल निरीक्षण पंजी से अपर्याप्त मात्रा में डिवाटरिंग पम्प चालू रहने एवं डिवाटरिंग होते रहने की स्थिति में उपरोक्त उल्लेखित कारणों से निर्वाध रूप से कार्य नहीं होने अथवा नहीं होने, जिसके लिए संवेदक मुख्य रूप से जवाबदेह है, की स्थिति में अपने निरीक्षण के दौरान अलाभकारी डिवाटरिंग के घंटो को अमान्य नहीं किये जाने का बोध होता है जिससे सुनियोजित तरीके से डिवाटरिंग कार्य कराया जाना परिलक्षित होता है। फलतः डिवाटरिंग मद से अधिक भुगतान होने एवं संवेदक के अनुचित दावा की स्थिति बनी।

जहाँ तक डिवाटरिंग मद में अनुचित भुगतान का अरोप है। इस संदर्भ में स्पष्ट है कि प्राक्कलन में डिवाटरिंग मद का प्रावधान नहीं रहने की स्थिति में यह अतिरिक्त कार्यमद की श्रेणी में माना जा सकता है। इस संदर्भ में एकरारनामा का सेक्सन-6 का कंडिका-7 में स्पष्ट उल्लेख है कि "Extra item of work:- package wise approval of increased amount against extra item of work (Item wise and overall cost both) will be given by Executive Engineer, Superintending Engineer and Chief Engineer upto a limit of 10%, 15% and 20% respectively against total amount of that package, if it is more than 20% the departmental approval will be required.

Note - (i) Each and Every Package Comprises so many components like various structure and sections of canal etc. For this purpose, amount of extra item of work for each component will be treated as separate.

बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 134

(ii) The Overall cost will include the amount approved against the increased quantity of item of work if any" प्रस्तुत मामले में आलोच्य संरचना पूर्वी कोशी नहर प्रणाली पुनस्र्थापन कार्य (पैकेज) का अंश (Seperate component) है एवं Note-(i) से स्पष्ट है कि Extra item (डिवाटरिंग मद) के मात्रा/राशि की स्वीकृति के सक्षम प्राधिकार का निर्धारण उसके राशि के आधार पर किया जायेगा न कि पैकेज के मात्रा/राशि के आधार पर। प्रस्तुत मामले के आलोच्य संरचना की प्राक्कलित राशि रू0 409.00 लाख एवं डिवाटरिंग मद में भुगतान 5,88,64,860/- किया गया है जिसके स्वीकृति का सक्षम प्राधिकार विभाग है जिसकी स्वीकृति बिना किया गया जो अनुचित श्रेणी में परिलक्षित होता है। साथ ही अनियंत्रित ढ़ग से डिवाटरिंग कराते हुए इस मद में किया गया भुगतान भी अनुचित श्रेणी मे होना का बोध होता है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने पत्रांक 143, दिनांक 02.02.13 से मुख्य अभियंता के पत्रांक 184 दिनांक 23.01.13 के आलोक में रू0 2,07,88,096/- भुगतान हेतु निदेशित किया गया एवं इस प्रकार किये गये कुल भुगतान रू0 5,88,64,860/- को रोकने की कोई कार्रवाई किया जाना परिलक्षित नहीं होता है जिससे गठित आरोप प्रमाणित होता है।

उपर्युक्त तथ्यों, बचाव-बयान एवं जाँच प्रतिवेदन के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री लक्ष्मण राम, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, सिंचाई नहर पूर्णियाँ के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित होता है।

इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री लक्ष्मण राम, तत्का0 अधीक्षण अभियंता नहर अंचल, पूर्णियां को उक्त प्रमाणित आरोप के लिए निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गया है - "कालमान वेतन में तीन प्रक्रम अवनति।" सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री लक्ष्मण राम, तत्का0 अधीक्षण अभियंता, नहर अंचल, पूर्णियाँ को विभागीय अधिसूचना संख्या-39 दिनांक 05.01.2018 द्वारा "कालमान वेतन में तीन प्रक्रम अवनति का दण्ड अधिरोपित किया गया।

उक्त अधिरोपित दण्ड के विरूद्ध श्री लक्ष्मण राम द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन समर्पित किया गया, जिसकी समीक्षा की गयी। समीक्षा में पाया गया कि श्री राम द्वारा अपने पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में बिना साक्ष्य के वही तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को एवं द्वितीय कारण पृच्छा में दिया है।

इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं रहने के कारण श्री राम से प्राप्त पुनर्विलोकन अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-39, दिनांक 05.01.2018 द्वारा 'कालमान वेतन में तीन प्रक्रम अवनति' का दण्ड को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 29 अप्रील 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(पट॰)03-16/2017-640--श्री शैलेन्द्र कुमार (आई0डी0-3803), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, आरा के पद पर पदस्थापन काल में इनके विरूद्ध बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, आरा के अन्तर्गत बाढ़ 2016 के पूर्व कराए गए उच्चीकरण एवं सुदृढ़ीकरण कार्य में बरती गयी अनियमितता के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1984 दिनांक- 07.09.2018 द्वारा आरोप पत्र गठित कर बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री कुमार दिनांक-29.02.2020 को सेवानिवृत हो गए हैं। अतएव श्री शैलेन्द्र कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध संचालित उक्त विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

------- 29 अप्रील 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(अभि॰)जम0-22-06/2012-639--श्री विजय कुमार (आई0डी0-2045), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, खरकई नहर प्रमंडल, चालियामा, शिविर-चाईबासा सम्प्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता (तकनीकी सलाहकार) के विरूद्ध खरकई नहर प्रमंडल, चाईबासा के ईचा दाँयी मुख्य नहर के 4.65 कि0मी0 से 6.03 कि0मी0 के बीच साजिश पूर्वक साधारण पत्थर खनन स्थान पर सॉफ्ट रॉक विथ ब्लास्टिंग का झुठा खनन दिखाकर परिमाण में बढोतरी करने इत्यादि अनियमितता के लिए आरोप पत्र प्रपत्र-'क' गठित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1240, दिनांक 04.10.13 द्वारा निम्नांकित आरोप के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :- (1) खरकई नहर प्रमंडल, चालियामा, चाईबासा के ईचा दायीं मुख्य नहर के कि0मी0 4.45 से कि0मी0 6.03 के बीच साजिश पूर्वक साधारण पत्थर खनन के स्थान पर Soft Rock With Blasting का झुठा खनन दिखाकर परिमाण में बढोतरी कराकर तथा लीड संबंधित अतिरिक्त मद से सृजित कराकर संबंधित लोक संवेदक द्वारा अपने पद का दुरूपयोग करके संबंधित संवेदक मेसर्स, अजन्ता कन्सट्रक्शन कम्पनी, पटना के सभी पार्टनरों को 2,45,00,000/- (दो करोड़ पैतालीस लाख रूपये) का नाजायज भुगतान कर सरकारी राशि की क्षति पहुँचायी गयी।135 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (2) श्री कुमार जब अवर प्रमंडल पदाधिकारी, खरकई नहर अवर प्रमंडल, चालियामा, शिविर-चाईबासा के पद पर पदस्थापित थे तब Soft Rock with Blasting 14.00 रूपये प्रति घनमीटर के स्थान पर 40.55 रूपये प्रति घनमीटर की दर से भुगतान करने के विपत्र पर इनका हस्ताक्षर है। (3) मापी पुस्तिका सं०-350 में जो पेमेंट On A/c Bill of Machinery advance section vie C/I.G.C/जमशेदपुर लेटर नं0-1142, दिनांक 26.04.91 For Rs. Thirty Lakh (30,00,000/-) अंकित है, जिसमें श्री कुमार का हस्ताक्षर है। मशीनरी एडवांस फॉर परचेजिंग सटरिंग एरेंजमेंट फॉर सी0सी0 वैरल इन कट इन्उ कवर पोर्शन कन्डयूट पर भी इनका हस्ताक्षर है। विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में श्री विजय कुमार के दिनांक 31-03-14 को सेवानिवृत होने के कारण पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0-77 दिनांक 11.07.14 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत अपर विभागीय जाँच आयुक्त, बिहार, पटना के पत्रांक-147, दिनांक 03.11. 2017 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग में समर्पित किया गया जिसमें आरोप सं0-01 को पूर्णतः प्रमाणित एवं आरोप सं0-02 एवं 03 को अंशतः प्रमाणित किया गया। अपर विभागीय जाँच आयुक्त के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-571, दिनांक 07.03.18 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। तदालोक में श्री कुमार द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब दिया गया जो निम्नवत है- (प) बचाव बयान में उल्लेख है कि आरोप सं0-1 एवं 2 के संबंध में विभाग द्वारा कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।

(पप) आरोप सं0-3 के संबंध में पर्याप्त वर्णन किया गया है, परन्तु विभागीय जाँच पदाधिकारी जाँच आयुक्त-सह-प्रधान सचिव, पर्यावरण एवं वन विभाग, बिहार, पटना द्वारा आरोपों को पूर्णतः/अंशतः प्रमाणित किया गया है। उक्त जाँच प्रतिवेदन से मैं सहमत नहीं हूँ।

(पपप) अन्त में अनुरोध किया गया है कि लगाये गये आरोपों की जाँच किसी अन्य विभागीय जाँच पदाधिकारी द्वारा करायी जाय, जिसमें सहयोग के लिए तैयार है।

श्री कुमार से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा विभाग के स्तर पर किया गया एवं समीक्षोपरांत निम्न बातें पायी गयी- पुलिस अधीक्षक, निगरानी ब्यूरो, राँची के पत्रांक-4685, दिनांक 30.07.12 से पुलिस उपाधीक्षक, निगरानी ब्यूरो, राँची के संलग्न पत्र में श्री कुमार के विरूद्ध अभियोजन स्वीकृत्यादेश निर्गत करने हेतु दिये गये समीक्षात्मक प्रस्ताव में निगरानी काण्ड सं0-20/93 दिनांक 10.07.93 के अप्राथमिकी अभियुक्त बताते हुए आरोप पत्र का पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध होना बताया गया है। निगरानी प्रतिवेदन में उल्लेखित है कि श्री विजय कुमार का नाम अनुसंधान के क्रम में प्रकाश में आया तथा जाँच समिति के समक्ष अपने बयान में स्वीकार किया गया है कि निविदा समिति के अध्यक्ष एवं सदस्यों द्वारा स्थल निरीक्षण के समय Soft Rock with Blasting की स्वीकृति एकस्ट्रा आईटम के रूप में दी गयी थी, जिसके परिणामस्वरूप रू0 14/- प्रति घनमीटर के स्थान पर रू0 40.55 पैसे प्रति घनमीटर की दर से संवेदक को भुगतान किया गया। इसी प्रकार आरोप सं0-1 एवं 3 के संबंध में भी आरोप है, जिसके आलोक में अभियोजन स्वीकृत्यादेश निर्गत करने का अनुरोध किया गया। अपर विभागीय जाँच आयुक्त द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन के विश्लेषण में उल्लेखित किया गया है कि श्री कुमार दिनांक 03.02.1991 से 15.01.94 तक खरकई अवर प्रमंडल, चालियामा में अवर प्रमंडल पदाधिकारी के रूप में पदस्थापित थे। कार्य की उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन पत्रांक-24, दिनांक 29.05.91 का उल्लेख करते हुए प्रश्नगत कार्य की जाँच दिनांक 24. 04.1991 को लगभग सम्पन्न हुआ बताया गया है एवं उक्त अवधि में कार्य प्रगति में रहने, आरोपी के प्रभार ग्रहण करने की तिथि 02.02.1991 के पश्चात भी भुगतान की कार्रवाई होने, उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन में 2,45,37,166/- का अनियमित भुगतान परिलक्षित होना तथा आरोपी पदाधिकारी जाँच समिति के जाँच के दौरान उपस्थित रहने के साथ-साथ दोनों जाँच प्रतिवेदन में इस तरह की अनियमितता का उल्लेख रहने से ईचा दाँयी मुख्य नहर के कि0मी0 4.65 से कि0मी0 6.03 के बीच झुठा खनन दिखाकर एवं लीड संबंधी अतिरिक्त मद का सृजन करने संबंधी आरोप सं0-1 को पूर्णतः प्रमाणित करार दिया गया है। जाँच प्रतिवेदन सं0-25/91 दिनांक 14.05.1991 की कंडिका 6.2 में अंकित उत्तरदायी पदाधिकारियों की सूची में श्री विजय कुमार, तत्का0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी का नाम अंकित किया हुआ प्रतीत नहीं होता है। श्री कुमार द्वारा अपना बचाव-बयान में भी उल्लेख किया है कि बिहार सरकार, जल संसाधन विभाग, पटना द्वारा गठित जाँच समिति द्वारा मेरे विरूद्ध कोई भी आरोप गठित नहीं किया गया है एवं आरोप सं0-1 तथा 2 से संबंधित विपत्र की छायाप्रति सहित अन्य साक्ष्य की मांग की गयी। परन्तु साक्ष्य के रूप में इन्हें निगरानी ब्यूरो, राँची का पत्रांक-4685, दिनांक 30.07.12 से प्राप्त अभिलेख उपलब्ध कराया गया है। निगरानी ब्यूरो, राँची के समीक्षा प्रतिवेदन में उल्लेख है कि भुगतान किये गये विपत्र पर इनका हस्ताक्षर है। संचालन पदाधिकारी द्वारा भी आरोप सं0-2 के विश्लेषण में उल्लेखित किया गया है कि निगरानी द्वारा मामले की जाँच के क्रम में पाया गया कि उक्त भुगतान में आरोपित पदाधिकारी की सहभागिता रही है। इस प्रकार संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप सं0-2 को अंशतः प्रमाणित बताया गया है। विभागीय कार्यवाही के आरोप सं0-1 एवं 2 पुलिस अधीक्षक, निगरानी ब्यूरो, राँची के अनुसंंधानकर्त्ता द्वारा अनुसंधान के क्रम में श्री विजय कुमार की पायी गयी सहभागिता पर136 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आधारित है। जिस आरोप सं0-3 के संदर्भ में आरोपी पदाधिकारी द्वारा कोई साक्ष्य संलग्न नहीं करते हुए मात्र विभागीय जाँच आयुक्त के जाँच प्रतिवेदन से सहमत नहीं हूँ के बयान के रूप में संचालन पदाधिकारी अपर विभागीय जाँच आयुक्त से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन, आरोपी पदाधिकारी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा का प्रतिउत्तर एवं उपरोक्त समीक्षा के आलोक में आरोपी पदाधिकारी, श्री विजय कुमार, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध उच्चाधिकारियों के गलत आदेश को आधार बनाकर किये गये अनियमित भुगतान को माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा समरूप मामले में अन्य कनीय अभियंताओं द्वारा दायर रिट याचिका में निर्गत आदेश "When a superior authority decided to a thing in a particular manner no juior officer working under his supervision could decided to do sometihng contrary to such decision." के आधार पर आंशिक रूप से प्रमाणित माने जाने के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोपी पदाधिकारी के विरूद्ध आरोप सं0-1 को पूर्णतः एवं आरोप सं0-2 को आंशिक प्रमाणित पाया गया है। इस प्रकार श्री कुमार आरोप सं0-1 के लिए पूर्णतः दोषी है, आरोप सं0-2 के लिए आंशिक रूप से दोषी है एवं आरोप सं0-3 के संदर्भ में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें वरीय प्राधिकार द्वारा दिये गये निर्देश के आलोक में किये गये कार्य सम्पादन के कारण ही संदेह का लाभ देते हुए आंशिक रूप से प्रमाणित पाया गया है। उपर्युक्त विभागीय समीक्षोपरांत श्री विजय कुमार के विरूद्ध आरोप सं0-1 को पूर्णतः प्रमाणित एवं आरोप सं0-2 एवं 03 को आंशिक प्रमाणित पाया गया है। जिसके लिए "स्थायी रूप से 50 प्रतिशत पेंशन की राशि पर रोक" का दण्ड देने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया है। जिस पर सक्षम प्राधिकार एवं बिहार लोक सेवा आयोग का परामर्श प्राप्त है। अतएव उक्त निर्णय के आलोक में श्री विजय कुमार, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, चालियामा शिविर-चाईबासा सम्प्रति सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता को निम्न दण्ड अधिरोपित करे संसूचित किया जाता है- "स्थायी रूप से 50 प्रतिशत पेंशन की राशि पर रोक"

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, संजीव कुमार सिन्हा, संयुक्त सचिव।

------- 20 मार्च 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(सम॰)-02-03/2018-555--श्री सुरेश्वर बैठा (आई0डी0-जे 8968), तत्कालीन सहायक अभियंता स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल, खगड़िया के विरूद्ध जिलास्तरीय बैठको में बिना पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहने, मुख्यमंत्री सात (07) निश्चय योजना से संबंधित गली-नाली निर्माण योजनाओं के प्राक्कलन निर्माण, निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण में कोताही बरतने, मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के अन्तर्गत खगड़िया के विधानसभा क्षेत्र से संबंधित वर्ष 2015-16 की योजनाओं को लंबित रखने, प्रशासनिक स्वीकृति के बावजूद भी कई योजनाओं में कार्य प्रारंभ नहीं करने संबंंधित जिलाधिकारी, खगड़िया द्वारा प्रतिवेदित आरोप को समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई एवं प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोप के लिए विभागीय अधिसूचना सं०-337, दिनांक 21.02.2019 द्वारा श्री बैठा को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय पत्रांक-480, दिनांक 05.03.2019 द्वारा श्री बैठा से आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण किया गया। तदालोक में श्री बैठा द्वारा अपना जवाब विभाग में समर्पित किया गया। श्री बैठा के जवाब की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत श्री बैठा के विरूद्ध आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया एवं इस प्रकार श्री बैठा के स्पष्टीकरण को स्वीकार योग्य पाया गया। जिसके आलोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-262, दिनांक 14.02.20 द्वारा श्री बैठा को निलंबन मुक्त किया गया। इस बीच श्री बैठा दिनांक 21.02.19 से दिनांक 13.02.20 तक निल्रबित रहे।

बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 कि नियम-11 के उप नियम-3 में उपबंधित है कि जहां अनुशासनिक प्राधिकार की राय हो कि निलंबन पूर्णरुपेण अनुचित था तो सरकारी सेवक को इस नियम के उप-नियम-8 के उपबंधों के अधीन वैसे पूरे वेतन एवं भत्ते का भुगतान किया जायेगा, जिसके लिए वह निलंबित नहीं किए जाने पर हकदार होता। ऐसे भुगतान करने के क्रम में पूर्व में दिए गए जीवन निर्वाह भत्ता एवं अन्य भत्तों का समायोजन किया जाएगा।

चूंकि श्री बैठा के विरुद्ध आरोप पत्र में गठित आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया, इसलिए इन्हें निलंबन से मुक्त किया गया। श्री बैठा की निलंबन अवधि (दिनांक 21.02.2019 से दिनांक 13.02.2020 तक) को निम्नरुपेण विनियमित किया जाता है-

'निलंबन अवधि कर्तव्य अवधि मानी जाएगी एवं इस अवधि का पूर्ण वेतनादि का भुगतान (पूर्व में लिए गए जीवन-निर्वाह को घटाकर) किया जाएगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 12 मार्च 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(पट॰)-03-05/2014-485--श्री राम विलास चौधरी (आई0डी0-2603), मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, दरभंगा के विरूद्ध सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना का पत्रांक-54, दिनांक 11.02.2014 द्वारा उनके विरूद्ध दर्ज FIR No.-01/2014 दिनांक 23.01.14 की छायाप्रति संलग्न करते हुए कार्रवाई हेतु प्रेषित की गई, श्री चौधरी के विरूद्ध थाना कांड विशेष निगरानी ईकाई द्वारा Prevention Of Corruption Act 1988 के तहत दर्ज की गई, जो उनके द्वारा आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने से संबंधित है।137 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उक्त के आलोक में बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 बी॰ के तहत आरोप पत्र गठित कर स्पष्टीकरण किया गया, जिसमें निम्न आरोपों को उल्लेखित किया गया। स्पेशल विजिलेंश यूनिट, पटना द्वारा आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के आरोप में स्पेशल विजिलेंस यूनिट प्राथमिकी संख्या-01/2014, दिनांक-23.01.2014 धारा-13(2) r/w13(1)(e) भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 1988 दर्ज किया गया है। 1. अनुसंधान में पाए गए तथ्यों के अनुसार आपके द्वारा सभी स्त्रोतों से अर्जित आय कुल रु0 1,05,24,606/- है। उक्त आय के विरूद्ध खर्च रु0 60,54,000/- मात्र है। इस प्रकार बचत (रु0 1,05,24,606 - रु0 60,54,000) = रु0 44,70,606/- है। जाँच के क्रम में आपके पास कुल रु0 1,27,44,261/- का चल एवं अचल सम्पति पाए गए है। इस प्रकार कुल बचत से रु0 82,73,655/- रूपये अधिक पाए गए है जो नाजायज एवं पदीय कर्त्तव्य का दुरूपयोग कर अवैध तरीके से अर्जित की गई है, जो घोर कदाचार है जिसके लिए श्री चौधरी दोषी है। 2. स्पेशल विजिलेंश यूनिट, पटना द्वारा समर्पित चल-अचल सम्पति संबंधी प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि श्री चौधरी द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से कई ऐसी चल अचल सम्पति का अर्जन किया गया है, जिसका उल्लेख श्री चौधरी द्वारा समर्पित वार्षिक सम्पति विवरणी में नहीं किया गया है। यह बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के आलोक में गंभीर कदाचार है तथा सरकारी सेवक के प्रतिकूल आचरण है। इस कदाचार के लिए श्री चौधरी दोषी है। उक्त आरोप के लिए विभागीय ज्ञापांक-401 दिनांक-02.04.2014 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43बी के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

श्री राम बिलास चौधरी का बचाव-बयान विभागीय मंतव्य
मेरे द्वारा संबंधित स्पष्टीकरण पर विभागीय मंतव्य की मांगी गई थी। जल संसाधन विभाग द्वारा अपने पत्रांक-213, दिनांक-19.02.2016 द्वारा अपना मंतव्य समर्पित किया है। कृपया उक्त मंतव्य का अवलोकन करना चाहेंगे। मेरे पृच्छा की बिंदु पर यही मुख्य अभियंता के विरूद्ध स्पेशल विजिले श यूनिट, पटना ं द्वारा ही आरोप गठित किया गया है तथा आय और सम्पति का आकलन भी स्पेशल विजिलेंश यूनिट, पटना के प्रतिवेदन के आधार पर किया गया है। इससे स्पष्ट है कि मरे द्वारा दिये गये तथ्यों पर विचार नहीं किया गया है। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में आरोपित पदाधिकारी श्री चौधरी द्वारा उनके द्वारा अभ्यावेदन में उठाए गए बिंदु पर विधिसम्मत कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया । उक्त के संदर्भ में विभाग द्वारा अंकित किया गया कि श्री राम बिलास चौधरी के द्वारा समर्पित बचाव-बयान एवं आय-व्यय विवरणी के आधार पर वर्ष 1989-2014 तक की समेकित आय रु0 2,43,46,677.38/- है। बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम-16(1) के आधार पर कोई सरकारी सेवक सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से न तो कोई व्यापार करेगा या कारोबार करेगा और न कोई नियोजन स्वीकार करेगा। श्री चौधरी द्वारा सेवा में रहते हुए आय का अन्य स्रोत तथा ताड़ी दुकान, पॉल्ट्री फॉर्म, डेयरी में आय जनित करना उक्त के आलोक में गंभीर कदाचार है। श्री चौधरी द्वारा समर्पित बचाव-बयान को अस्वीकृत किया गया।

इसी क्रम में श्री चौधरी द्वारा समर्पित एक अन्य बचाव-बयान प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराया गया। जिसपर विभागीय मंतव्य उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया, जिसे विभाग द्वारा पत्रांक-1121, दिनांक-11.07.2017 द्वारा उपलब्ध कराया गया। जिसमें विभाग द्वारा कहा गया कि श्री राम विलास चौधरी द्वारा अपने बचाव-बयान में किसी भी प्रकार का साक्ष्य नहीं समर्पित किया गया है। श्री चौधरी द्वारा दिये गये शपथ-पत्र के संदर्भ में कहा गया है कि उनके शपथ-पत्र से सहमत हुआ भी जाय तो श्री चौधरी द्वारा अपने अतिरिक्त आय के संदर्भ में विभाग को सूचना उपलब्ध कराया जाना चाहिए था। परन्तु श्री चौधरी द्वारा ऐसा नहीं किया गया। अतः श्री चौधरी के बचाव-बयान को विभाग के मंतव्य में अस्वीकृत कर दिया गया। उक्त विभागीय कार्यवाही के क्रम में विभागीय जाँच आयुक्त द्वारा पत्रांक-13, दिनांक-04.10.2018 द्वारा जाँच प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया। जिसमें जाँच पदाधिकारी द्वारा निम्न मंतव्य उपलब्ध कराया गया है :-

1. श्री राम बिलास चौधरी 29.01.1979 को सहायक अभियंता के रूप में अभियंत्रण सेवा में आए तथा दिनांक-31.

08.2013 को मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, दरभंगा के पद से सेवानिवृत्त हो गए।

2. उक्त सेवा में अपने आय के ज्ञात स्रोतो से रु0 1,05,24,606/- प्राप्त किया। जिसके विरूद्ध विभिन्न मदाें में रु0 60,54,000/- खर्च किए गए। इस प्रकार उनके द्वारा रु0 1,05,24,606 - रु0 60,54,000 = रु0 44,70,606/- बचत होनी चाहिए थी, जबकि विशेष निगरानी इकाई द्वारा उनके पास से चल एवं अचल सम्पति के रूप में रु0 1,27,44,261/- पाये गये, जो रु0 1,27,44,261 - रु0 44,70,606 = रु0 82,73,655/- उनके पास अप्रत्यानुपातिक आय से संबंधित चल एवं अचल सम्पति अवैध तरीके से अर्जित करने का मामला विशेष निगरानी ईकाई द्वारा दर्ज किया गया।138 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 3. श्री चौधरी द्वारा अपने समथर्न में वर्ष 1976 से 2014 तक समेकित रूप से सकल आय कुल रु0 2,96,46,074. 37/- सभी स्रोतों से प्राप्त होने का उल्लेख किया गया है। परन्तु श्री चौधरी द्वारा इस संदर्भ में किसी प्रकार का समुचित साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया है। श्री चौधरी द्वारा अपने जवाब में जो पारिवारिक आय से आधा उन्हें प्राप्त होने की बात उल्लेखित किया गया है वह भी नियमानुसार नहीं है। क्याेंकि ''बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली-1976 के नियम-16 के तहत कोई सरकारी सेवक सरकार के पूर्व मंजूरी के बिना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई व्यापार या कारोबार न तो कर सकता है ओर न ही कोई नियोजन ही स्वीकार कर सकता है। ऐसी स्थिति में आरोपित पदाधिकारी अपने संयुक्त परिवार में अन्य कारोबार/व्यवसाय से प्राप्त आय नियमानुकूल नहीं प्रतीत होता है।

4. सामान्य प्रशासन विभाग का पत्रांक-4754 दिनांक-25.07.2008 में निहित निदेश के आलोक में प्रत्येक वर्ष 31 दिसम्बर तक सरकारी सेवक से सम्पति एवं दायित्व की विवरणी प्राप्त की जाती है। परन्तु प्रासंगिक मामले में श्री चौधरी द्वारा मात्र दो वर्ष यथा 2011-12 एवं 2012-13 की ही सम्पति एवं दायित्व की घोषणा की प्रतियाँ प्रस्तुत की गई जिसमें उनके द्वारा अपने अभिकथित तथ्याें की पुष्टि नहीं की गई है। उक्त मंतव्य के आलोक में विभागीय जाँच आयुक्त द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में श्री राम विलास चौधरी मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, दरभंगा के विरूद्ध सेवा अवधि में अपने पदीय कर्त्तव्यों का दुरूपयोग कर नाजायज तरीके से अप्रत्यानुपातिक आय के लिए दोषी पाया गया है। तदालोक में आरोप सं॰-1 प्रमाणित पाया गया है। तथा आरोप संख्या-2 के सदर्भ में कहा गया है कि श्री चौधरी दिनांक-31.08.2013 को बार्धक्य सेवानिवृत हो चुके है। अतः ऐसी स्थिति में दिनांक-31.08.2013 के पश्चात वे सरकारी सेवक की श्रेणी में नहीं रखे जा सकते हैं।

संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में अंकित मंतव्य से सहमत होते हुए श्री चौधरी से विभागीय पत्रांक-772, दिनांक 15.04.19 द्वितीय कारण पृच्छा की गई, जिसके आलोक में श्री चौधरी ने अपने जवाब में कहा है किः- 1. श्री चौधरी द्वारा सर्वाेच्च न्यायालय के न्याय निर्णय का हवाला देत हुए कहा गया है कि विभागीय कार्यवाही का आधार उनके उपर आरंभ किए प्राथमिकी संख्या-01/2014 के आधार पर किया गया है तथा मामला न्यायालय में लंबित है। ऐसी परिस्थिति में बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43बी॰ में संचालित विभागीय कार्यवाही न्यायदेश के विपरित है।

2. संचालन के क्रम में बचाव-बयान में आय के ज्ञात स्रोताें से संबंधित तथ्यों को रखा गया था। जिसमें वर्ष 1979 से 2013 तक कुल वेतन 78 लाख होता है जबकि प्राथमिकी में 70 लाख रूपया ही दर्शाया गया है। 3. भवन निर्माण में 23 लाख रूपये की जगह 56 लाख रूपया दर्शाया गया है जो साक्ष्य विहीन है। उनके द्वारा कहा गया है कि उनके एवं उनके परिजनों द्वारा विभिन्न स्रोतों से आय तथा कृषि एवं डेयरी से प्राप्त आय को नहीं जोड़ा गया है। साथ ही स्त्रीधन से प्राप्त आय का उल्लेख संचालन के क्रम में नहीं किया गया है। 4. उक्त के संबंध में कहना है कि उनके उपर विभागीय कार्यवाही का आधार विशेष निगरानी ईकाई द्वारा दर्ज प्राथमिकी है, जो अभी माननीय विशेष न्यायालय, निगरानी, मुजफ्फरपुर में विचाराधीन है, जिसमें गुण दोष पर विचार होना बाकी है, तो विभागीय कार्यवाही जो मेरे तथ्यों पर बिना विचार किए ही प्रतिवेदन समर्पित किया है, नियमानुसार नहीं है।

श्री चौधरी द्वारा समर्पित द्वितीय बचाव-बयान में अपने उपर लगाये गये आरोपों के संदर्भ में जवाब समर्पित नहीं किया गया है। विभागीय जाँच आयुक्त द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में जिन बिन्दुओं को अंकित किए है उस संदर्भ में श्री चौधरी द्वारा अस्पष्ट जवाब समर्पित किया गया है। एसा प्रतीत होता है कि श्री चौधरी अपने बचाव बयान में उनके द्वारा अंकित बिंदुओं पर जवाब समर्पित करने में असमर्थ हैं। अतः द्वितीय कारण पृच्छा के रूप में समर्पित जवाब तथ्यहीन पाते हुए अस्वीकृत किये जाने योग्य है। उपर्युक्त समीक्षा से स्पष्ट है कि श्री चौधरी के विरूद्ध गठित आरोप प्रमाणित है और आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने के मामले में वह पूर्णतः दोषी हैं। उनका यह कृत्य उनके भ्रष्ट आचरण का प्रतीक है तथा बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 में वर्णित नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। अतएव श्री राम विलास चौधरी, सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, दरभंगा के विरूद्ध बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43बी के अन्तर्गत "स्थायी रूप से 75% पेंशन की राशि की कटौती" का दंड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया। उक्त दण्ड निर्णय पर माननीय मंत्री महोदय का अनुमोदन प्राप्त है। उक्त अनुमोदित विभागीय निर्णय पर बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति पत्रांक-2993, दिनांक 14.02.2020 द्वारा प्राप्त है। अतएव श्री राम विलास चौधरी, मुख्य अभियंता, सेवानिवृत को निम्न अनुमोदित दण्ड निर्णय अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है- "स्थायी रूप से 75% पेंशन की राशि की कटौती"

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, गोरखनाथ, अपर सचिव।139 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 5 मार्च 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(मुज॰)-06-11/2008-462--श्री रविन्द्र कुमार (आई0डी0-3276) तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल शिवहर सम्प्रति तकनीकी सलाहकार को उनके उक्त प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान बागमती नदी के दायाँ एफलक्स बाँध के कटएण्ड के 2362मी0 से 3262मी0 तक बेलवा इनरवा के पास बाढ़ 2008 के पूर्व HSCL द्वारा कराए गए रिभर्टमेंट कार्याें में बरती गयी अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा की गयी। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत विभागीय पत्रांक-1143 दिनांक-16.10.2012 द्वारा श्री कुमार से स्पष्टीकरण पूछा गया एवं तत्पश्चात विभागीय अधिसूचना सं0-1720 दिनांक-05.04.2015 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17(2) में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

आरोप सं0-01 :- बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई कार्य विशिष्टि के विपरीत डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का क्रेट तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाया गया। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

आरोप सं0-02 :- ब्रीक रेटिंग कार्य में विशिष्टि के विपरीत कमतर गुणवाा के 10 से 15 प्रतिशत ईंट के टुकड़े का उपयोग कर सरकारी राजस्व का क्षति पहुँचाना। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

आरोप सं0-03 :-उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के अनुसार जाँच की तिथि 16.01.2009 तक भुगतान नहीं हुआ था। मुख्य अभियंता के पत्रांक-593 दिनांक-25.02.2015 से स्पष्ट है कि कराए गए कार्य का भुगतान दिनांक-10.10.2009 को किया गया है। चूँकि उड़नदस्ता जाँच में न्यून विशिष्टि का वी0ए0 वायर क्रेट (Double knot के जगह पर Single knot) का तथा ब्रीक क्रेटिंग कार्य में न्यून विशिष्टि के ईंट एवं ईंट के टुकड़े (10 से 15 प्रतिशत तक) का उपयोग करने की अनियमितता प्रकाश में आ गयी थी। जिसके बावजूद भी प्रावधानित बी0ए0 वायर क्रेट के अनुरूप ही 24.67 प्रति क्रेट की दर से भुगतान कर दिया गया तथा न्यून विशिष्टि के ईंट एवं ईंट के टुकड़े का उपयोग होने के बावजूद ईंट के गुणवाा जाँच हेतु काटी गई राशि 10 प्रतिशत को मात्र एक फॉग मार्क (आरती) की गुणवाा जाँच प्रतिवेदन के आधार पर विमुक्त कर दिया गया है जबकि कार्य में कई मार्कों के ईंटों का प्रयोग किया गया है साथ ही 10 से 15 प्रतिशत ईंट के टुकड़े का भी उपयोग किया गया है। इस प्रकार अनियमितता प्रकाश में आने के बावजूद भी जान बूझ कर अतिरेक भुगतान कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचायी गयी। जिसके लिए आप दोषी प्रतीत होते हैं।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री कुमार, तत0 सहायक अभियंता के विरूद्ध प्रपत्र 'क' में गठित तीनों आरोपों यथा आरोप सं0-1, आरोप सं0-2 एवं आरोप सं0-3 को अप्रमाणित पाया गया। फलस्वरूप संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप सं0-2 एवं आरोप सं0-3 को अप्रमाणित एवं असहमत होते हुए आरोप सं0-1 को प्रमाणित पाया गया एवं असहमति के निम्न बिन्दु पर विभागीय पत्रांक-839 दिनांक-05.06.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी। आरोप सं0-01 जो विशिष्टि के विपरीत बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई कार्य में डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का क्रेट तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर सरकारी राशि की क्षति पहुँचाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी ने अपने निष्कर्ष कंडिका में अंकित किया है कि डबल नॉट की जगह पर सिंगल नॉट का क्रेट तैयार किया गया था। बेलवा इनरवा स्थल बागमती नदी एवं ललबकिया नदी के मिलन बिन्दु पर अत्यधिक जल दबाव के कारण डबल नॉट का सिंगल नॉट में प्रतीत होना स्वभाविक है। निरीक्षण दल द्वारा क्रेट का तौल होना संभव नहीं हो सका तथा अनुमान के आधार पर तौल में कमी बताया गया है। संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से निम्न बिन्दुओं पर असहमत हुआ गया है :-

जलीय दबाव के कारण किसी भी क्षतिग्रस्त ईंट भरे बी0ए0 वायर क्रेट में तनाव आना स्वाभाविक है। जिसे माना जा सकता है। उक्त दबाव/तनाव के कारण किसी भी क्रेट के मेस साईज में अंतर आ सकता है परन्तु क्रेट की बुनाई अगर डबल नॉट देकर की गयी है तो तनाव/दबाव के कारण नॉट का साईज छोटा हो सकता है परन्तु डबल नॉट सिंगल नॉट में प्रतीत होना संभव नहीं है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.2.3 एवं 3.2.2 में स्पष्ट रूप से अंकित है कि खुले बी0ए0 वायर क्रेट के मेस साईज प्रावधानित 4''x4'' की जगह 5''x4.5'' पाया गया तथा डबल नॉट की जगह सिंगल नॉट पाया गया इसलिए क्रेट के तौल में कमी निश्चित है। क्योंिक जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट होता है कि क्रेट का वजन नहीं लिया गया है। परन्तु क्रेट में नॉट की संख्या देखकर ही स्थापित किया जा सकता है कि क्रेट सिंगल नॉट अथवा डबल नॉट से बुनाई की गयी है। उड़नदस्ता द्वारा की गयी स्थलीय जाँच में क्रेट के डबल नॉट की जगह पर सिंगल नॉट पाया गया है। हालॉकि क्रेट के वजन में वास्तविक रूप से कितने की कमी है उसे तौल कर ही ज्ञात किया जा सकता है परन्तु यह तो परिलक्षित है कि कार्य मे न्यून विशिष्टि के बी0ए0 वायर क्रेट का उपयोग हुआ है एवं प्रावधान के अनुरूप भुगतान कर अनियमितता बरती गयी है। उड़नदस्ता द्वारा क्रेट का वजन नहीं लिया गया है परन्तु स्वभाविक है कि क्रेट में डबल नॉट की जगह सिंगल नॉट से बुनाई करने पर बी0ए0 वायर क्रेट की बचत होगी एवं डबल नॉट की जगह पर सिंगल नॉट का बी0ए0 वायर क्रेट का वजन कम होना भी स्वभाविक है। जहाँ तक अनुवीक्षण दल के जाँच प्रतिवेदन में बी0ए0 वायर क्रेट संतोषप्रद उद्धित होने का प्रश्न है, वो अनुवीक्षण दल के जाँच प्रतिवेदन में कडिका 4(ख) में विभागीय सामग्री जो उपयोग मेें लाया गया है के संदर्भ में संतोषप्रद अंकित किया गया है। इस कार्य में क्रेट बुनाई का कार्य संवेदक द्वारा किया गया है। ऐसी स्थिति में इस प्रतिवेदन के आधार पर उड़नदस्ता द्वारा स्थलीय जाँचोपरांत की गयी टिप्पणी को नाकारा नहीं जा सकता। अतएव आरोप सं0-1 प्रमाणित होता है। उक्त के आलोक में श्री कुमार, कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-1487 दिनांक 11.12.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी हैं :-

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बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 1 :- इस संबंध में पूर्व में भी सूचित किया गया है कि उपर्युक्त कार्य एच0एस0सी0एल0 द्वारा एम0ओ0यू0 के आधार पर कराया गया था। जिसमें कम्पनी द्वारा समेकित रूप से अन्यत्र क्रेट की बुनाई की गई थी तथा आवश्यकतानुसार सभी तीन प्रमंडलों के स्थलों पर ढोकर पहुँचाया गया था फिर भी स्थल पर नियमानुसार क्रेटों को तौलकर ही सही तौल के क्रेटों को ही व्यवहार में लाया गया था।

2 :- इस स्थल का उच्चाधिकारियों एवं अनुवीक्षण दल द्वारा बराबर निरीक्षण किया जाता था, परन्तु किसी स्तर पर किसी पदाधिकारी द्वारा इस संबंध में कोई टिप्पणी नहीं किया गया। साथ ही स्थल पर व्यवहृत निर्माण सामग्री को संतोषप्रद बताया गया। इससे स्पष्ट होता है कि इस संबंध में कोई गड़बड़ी न थी और न ही परिलक्षित हुआ।

3 :- इस कार्य को सिमित समय-सीमा के अन्दर सम्पन्न कराया गया तथा अपन उद्‌देश्य में सफल भी रहा। बाढ़ अवधि के बाद भारी दबाव के कारण खुले हुए मात्र एक क्रेट का स्थलीय जाँचोपरांत टिप्पणी युक्तसंगत नहीं प्रतीत होता है। 4 :- उड़नदस्ता द्वारा व्यापक रूप से फैले कार्य क्षेत्र में क्रेटों के कतिपय क्रय में कुछ नॉट यदि सिंगल संज्ञान में आया तथा उससे न्यून विशिष्टि का क्रेट तथा राजस्व की क्षति का आभास हुआ तो उसे इंकित कर संख्या, तौल इत्यादि में कमी को विभाग के संज्ञान में देना चाहिए था ताकि एच0एस0सी0एल0 द्वारा विभाग के साथ एम0ओ0यू0 की कंडिका-13 यथा "HSCL Shall be responsible for rectification of defects during defects liability period of 12 Months after completion of work." कार्रवाई की जाती तथा ससमय समुचित निराकरण कर लिया जाता क्याेंकि उड़नदस्ता का जाँच Defect liability period के अन्तर्गत किया गया था तथा कार्य का प्रथम चलन्त भुगतान किया गया था, परन्तु ऐसा क्यों नहीं किया गया। यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। वर्णित तथ्यों के आलोक में स्पष्ट होगा कि आरोप संख्या-01 निराधार एवं तथ्यों से परे है। साथ ही मेरे द्वारा किसी भी स्तर शिथिलता बरती गई है और न ही कोई गलत मंशा से कार्रवाई की गई है। वर्णित तथ्यों के आलोक में मेरा बचाव पत्र स्वीकार करने की कृपा की जाय। श्री कुमार, कार्यपलाक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- आरोप-1 :- जो विशिष्टि के विपरीत बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई कार्य में डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर सरकारी राजस्व की क्षति पहुँचाने से संबंधित है। संचालन पदाधिकारी के द्वारा उड़नदस्ता के स्तर से केवल कुछ क्षतिग्रस्त क्रेटों के अवलोकन कर यह निष्कर्ष देना कि डबल नॉट के जगह पर सिंगल नॉट प्रतीत होता है। जबकि अत्याधिक जलीय दबाव के कारण डबल नॉट सिंगल नॉट में प्रतीत होना की संभावना है। जाँच दल द्वारा क्रेटों का तौल नहीं लिया गया तथा अनुमान के आधार पर तौल में कमी होना बतायी गया है। उक्त से स्पष्ट है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा इस आरोप के संदर्भ में आरोप की प्रमाणिकता के संदर्भ में कोई स्पष्ट मंतव्य नहीं दिया गया हैं फलतः द्वितीय कारण पृच्छा की माँग श्री कुमार से की गयी। श्री कुमार द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में मुख्यतः वही तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। इनके द्वारा कार्य में आवश्यकतानुसार स्थल पर तौल कर क्रेटों का व्यवहार किया जाना कहा गया है। जिसकी जाँच कार्य के दौरान उच्चाधिकारियों द्वारा करते हुए कार्य को संतोषप्रद बताया गया है एवं कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई है। उड़नदस्ता द्वारा बाढ़ अवधि 2008 के बाद खुले हुए एक मात्र क्रेट का स्थलीय जाँच कर किये गये टिप्पणी युक्तिसंगत नहीं है। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 3.2.3 से 3.2.2 मेें स्पष्ट अंकित है कि खुले हुए बी0ए0 वायर क्रेट में मेस साईज प्रावधानित 4"x4" के जगह पर 5"x4.5" पाया गया तथा डबल नॉट के जगह पर सिंगल नॉट पाया गया। फलतः क्रेट के तौल में कमी निश्चित होना बताया गया है। हालांकि उड़नदस्ता द्वारा स्थलीय जाँच में क्रेट का वजन नहीं लिया गया परन्तु जाँच में पाई गयी कमी के आधार पर क्रेट के वजन में कमी आना स्वभाविक है। उक्त कार्य का भुगतान प्रावधान के अनुरूप किया जाना परिलक्षित है। विभागीय उड़नदस्ता के जाँच प्रतिवेदन में आर्थिक क्षति का उल्लेख नहीं होने के कारण विभागीय पत्रांक-730, दिनांक 16.03.2018 द्वारा मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर से वित्तीय क्षति का आकलन कर प्रतिवेदन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया जिसके आलोक में मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर द्वारा अपने पत्रांक-1296, दिनांक 05.05.18 द्वारा सैद्धांतिक रूप से आर्थिक क्षति का आकलन प्रतिवेदन समर्पित किया गया। बागमती प्रमंडल, शिवहर के अन्तर्गत बागमती नदी के दायाँ एफ्लैक्स बाँध के कटिंग के 2362मी0 से 3262मी0 के बीच बेलवा इनरवा स्थल के पास बाढ़ 2008 के पूर्व कराये गये रिभेंटमेंट कार्य में प्रयोग किये गये बी0ए0 वायर क्रेट की संख्या कार्यपालक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर के पत्रांक-660 दिनांक-15.12.18 से उपलब्ध कराया गया। उक्त प्रतिवेदन के कंडिका-3 में उपरोक्त स्थल पर कराये गये रिभेंटमेंट कार्य में कुल 5270 अदद्‌ बी0ए0 वायर क्रेट का उपयोग किया गया तथा मुख्य अभियंता के पत्रांक-1296 दिनांक-05.05.18 से प्रति क्रेट 76.39 रूपये की क्षति होना प्रतिवेदित किया गया है। इस प्रकार प्रश्नगत स्थल पर रिभेंटमेंट कार्य में उपयोग किये गये न्यून विश्ष्टिि के क्रेट के कारण कुल 5270x76.39=402575.30 रूपये की क्षति होना परिलक्षित होता है। जिसके लिए कार्य में संलग्न तीनों पदाधिकारी यथा कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता को दोषी माने जाते हैं। अतएव श्री कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, शिवहर सम्प्रति तकनीकी सलाहकार के विरूद्ध आरोप संख्या-01 यथा विशिष्टि के विपरीत कार्य में न्यून विशिष्टि यथा डबल नॉट के स्थान सिंगल नॉट के बी0ए0 वायर क्रेट बुनाई करा कर कार्य में उपयोग करने एवं भुगतान प्रावधान के अनुरूप कर सरकारी राशि की क्षति पहुँचाने का आरोप प्रमाणित पाया गया एवं उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री रविन्द्र कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता, बागमती प्रमंडल, शिवहर सम्प्रति तकनीकी सलाहकार, अधीक्षण अभियंता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढ़ी को विभागीय अधिसूचना संख्या-1918, दिनांक 03.09.19 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्शोपरांत निम्न दण्ड संसूचित किया गया-141 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 1. "एक वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक"। 2. वेतन से रूपये 1,34,192/- (एक लाख चौतीस हजार एक सौ बानवे रूपये) की वसूली।

उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री रविन्द्र कुमार, तकनीकी सलाहकार, बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढ़ी द्वारा अपना पुनर्विलोकन अर्जी पत्रांक-1402, दिनांक 16.10.19 को विभाग में समर्पित किया गया। जिमसें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं -

उनके पुनर्विलोकन अर्जी की कंडिका-1 से 8 तक में इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही, संचालन पदाधिकारी द्वारा दिये गये निर्णय, असहमति के बिन्दु तथा अधिरोपित दण्ड के संदर्भ में उल्लेख किया गया है एवं उनके विरूद्ध अधिरोपित दण्ड को न्याय संगत नहीं बताया गया है।

कंडिका 9 में सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 9407 दिनांक 02.07.2012 की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए अंकित किया गया है कि विभागीय कार्यवाहियों का निष्पादन तथा इसके क्रम में अपील अभ्यावेदनों का निष्पादन एक अर्द्धन्यायिक प्रक्रिया है। अतः इनका निष्पादन नियमानुसार तथा नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का अनुपालन करते हुए किया जाय, जो निम्नवत्‌ है :-

(i) Audi alteram partem (ii) Nemo debate esse judex propria causa (iii) The final order must be speaking order (iv) The decision must be made good faith i.e. "justice should not only be done but it should manifestly appear to have been done".

उक्त दिशा निदेश के आलोक में यह स्पष्ट रूप से अंकित है कि किसी को भी उसका पक्ष सुने बगैर दोषी नहीं माना जा सकता है।

इससे स्वतः स्पष्ट है कि उनके विरूद्ध गठित आरोप के क्रम में संचालन पदाधिकारी के द्वारा आरोप अप्रमाणित माने जाने की बात कही तो उसे नहीं मानते हुए द्वितीय कारण पृच्छा पूछी गयी एवं उनके द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में दिये गये तर्को को नकारते हुए मुख्य अभियंता से आर्थिक क्षति का आकलन कराया गया। उनके द्वारा वास्तविकता के आधार पर अपना मंतव्य न देकर सैद्धांतिक रूप से अपना आकलन किया गया, जो स्थापित नियमों के विरूद्ध है।

उपरोक्त कंडिका में अंकित तथ्यों के आलोक एवं उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी के समक्ष दिये गये बचाव बयान के क्रम में उनके प्रतिवेदन, असहमति के बिन्दु के आलोक में उनका स्पष्टीकरण पर पुनः विचार सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 9407 दि॰ 02.07.12 के आलोक में करने की कृपा की जाय। जिससे न्याय मिल सके। इसी के क्रम में यह कहना आवश्यक है कि जल संसाधन विभाग से संबंधित एक मामले में उक्त विभाग द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में दायर LPA No. 1284/2010 बिहार राज्य एवं अन्य बनाम रतन कुमार सिंह में दिनांक 13.07.11 को पारित न्यायादेश में उक्त स्थिति पर गंभीर चिन्ता व्यक्त की गयी है एवं उक्त अपील को ही gross abuse of the process of the Court attributable to the state govt. gone rating unwanted and clearly avidable litigation माना है। श्री रविन्द्र कुमार, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति तकनीकी सलाहकार, बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढ़ी से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री कुमार के विरूद्ध आरोप है कि वेलवा इनरवा स्थल पर विशिष्टि के विपरीत बी॰ए॰वायर क्रेट बुनाई डबल नॉट के स्थान पर सिंगल नॉट का तैयार कर कम वजन वाले क्रेट को कार्य में उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप अनियमित भुगतान करने से सरकारी राजस्व की क्षति होने से संबंधित है।

श्री कुमार द्वारा आरोप से संदर्भित कोई न तो तथ्य ही दिया गया है न ही कोई नया साक्ष्य ही दिया गया है इनके द्वारा इनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिये गये तथ्यों का उल्लेख किया गया तथा संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से विभाग द्वारा समीक्षोपरान्त असहमति के बिन्दु पर दिये गये द्वितीय कारण पृच्छा का जबाव तथा अधिरोपित दण्ड का उल्लेख किया गया है। इनके विरूद्ध के मामले एवं इनके द्वारा दिये गये द्वितीय कारण पृच्छा का जबाव की विस्तृत समीक्षा पूर्व में की गयी है एवं आरोप प्रमाणित होने की स्थिति में इन्हें "वेतन से रू॰ 134192/- रूपये की वसूली एवं एक वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक का दण्ड" संसूचित है।

चूँकि इनकेे द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी में आरोप से संदर्भित न तो कोई तथ्य ही दिया गया है न ही कोई ऐसा साक्ष्य ही दिया गया है जिससे आरोप की प्रमाणिकता नहीं बनती हो ऐसी स्थिति में श्री कुमार का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं माना जाता है।

समीक्षोपरांत वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री कुमार का पुनर्विलोकन अर्जी अस्वीकार करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-1918, दिनांक-03.09.19 से संसूचित दण्ड यथा 1. एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" 2. वेतन से रूपये 1,34,192/- (एक लाख चौतीस हजार एक सौ बानवे रूपये) की वसूली को बरकरार रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।142 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री रविन्द्र कुमार, तकनीकी सलाहकार, अधीक्षण अभियंता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढी का पुनर्विलोकन अर्जी अस्वीकार करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना संख्या-1918, दिनांक-03.09.19 से संसूचित दण्ड यथा 1. एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" 2. वेतन से रूपये 1,34,192/- (एक लाख चौतीस हजार एक सौ बानवे रूपये) की वसूली को बरकरार रखते हुए संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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28 फरवरी 2020

सं॰ 22/नि॰सि॰(कटि0)-25-06/2017-414--श्री राजेन्द्र प्रसाद गौड़ (आई0डी0-3804), तत्का0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, किशनगंज के विरूद्ध बाढ़ अवधि में दिनांक 10.07.2017 एवं 18.07.2017 को अपने कार्य क्षेत्र एवं मुख्यालय से अनुपस्थित रहने, स्थानांतरित कर्मियों को विरमित नहीं करने तथा नव पदस्थापित कर्मियों का योगदान स्वीकृत नहीं करने के आरोप के लिए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय संकल्प-1733, दिनांक 13.08.2018 द्वारा विभागीय कार्यवाही प्रारंभ की गयी। विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। जिसके आरोप संख्या-01 एवं 02 को अप्रमाणित तथा आरोप संख्या-03 को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोप के लिए विभागीय पत्रांक-499, दिनांक 07.03.2019 द्वारा श्री गौड़ से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी, तदालोक में श्री गौड़ द्वारा पत्रांक-561, दिनांक 05.06.2019 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का उत्तर समर्पित किया गया।

श्री गौड़ से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की सम्यक समीक्षोपरांत उन पर लगाये गये आरोप दिनांक 10.07.2017 एवं 18.07.2017 को अपने कार्य क्षेत्र एवं मुख्यालय से अनुपस्थित रहने, स्थानांतरित कर्मियों को विरमित नहीं करने तथा नव पदस्थापित कर्मियों का योगदान स्वीकृत नहीं करने के आरोप से मुक्त करते हुए विभागीय कार्यवाही को समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

सक्षम प्राधिकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री राजेन्द्र प्रसाद गौड़, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, किशनगंज को लगाये गये उक्त आरोप से मुक्त करते हुए विभागीय कार्यवाही को समाप्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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28 फरवरी 2020

सं॰ 22/नि0सि0(बिहा0)28-09/2018-413--श्री रामप्रवेश पासवान (ID-4599), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमंडल-02, उदेरास्थान के पद पर जब पदस्थापित थे, तब विभागीय अधिसूचना सं0-3564 दिनांक-30.06.2016 द्वारा इनका स्थानांतरण बाढ़ नियंत्रण अवर प्रमंडल, सिउरीघाट किया गया। परन्तु श्री पासवान द्वारा इसका अनुपालन नहीं किया गया। नव-पदस्थापित पद पर योगदान नहीं किए जाने के फलस्वरूप विभागीय पत्रांक-3891 दिनांक-15.10.2018 द्वारा श्री पासवान को दिनांक-27.10.2018 के प्रभाव से स्वतः विरमित समझे जाने का निदेश संसूचित करते हुए दिनांक-29.10. 2018 तक नव-पदस्थापित पद का प्रभार ग्रहण कर इसकी सूचना विभाग को उपलब्ध कराने का निर्देश संसूचित किया गया परन्तु उनके द्वारा इस आदेश का भी अनुपालन नहीं किया गया।

उक्त कृत्य के लिए श्री पासवान को विभागीय अधिसूचना सं0-2704 दिनांक 31.12.2018 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प सं0-314 दिनांक-18.02.2019 द्वारा उनके विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में निहित प्रावधानांतर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी का पत्रांक-79 दिनांक-03.06.2019 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्न तथ्य पाया गया :-

(1) श्री रामप्रवेश पासवान द्वारा प्रतिवेदित किया गया है कि वे नव-पदस्थापित स्थान पर योगदान करने हेतु प्रयासरत थें, परन्तु प्रमंडल के अधीन अतिमहत्वपूर्ण कार्यों से संबद्ध रहने के कारण कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, उदेरास्थान के पत्रांक-733 दिनांक-23.10.2018 द्वारा उन्हें माह जून 2019 तक उक्त प्रमंडल में पदस्थापित रखने का अनुरोध अधीक्षण अभियंता से किया गया। इसी क्रम में अधीक्षण अभियंता, सिंचाई अंचल, नालंदा, बिहारशरीफ के पत्रांक-1031 दिनांक-23.10.2018 द्वारा मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, नालंदा, बिहारशरीफ से श्री पासवान को पदस्थापित रहने देने का अनुरोध किया गया, जिसके आलोक में मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, बिहारशरीफ द्वारा उनके पत्रांक-1361 दिनांक-24.10. 2018 द्वारा श्री पासवान को प्रमंडल में जून 2019 तक पदस्थापित रखने हेतु विभाग से अनुशंसा की गयी। (2) बचाव बयान में श्री पासवान द्वारा अपने उपर आरोपों के बचाव में प्रतिवेदित किया गया कि उनके प्रमंडल के अन्तर्गत मुहाने बहुउद्देशीय मध्यम सिंचाई योजना से विभिन्न नहरों से निःसृत लघु नहर एवं जल स्त्राव का आधुनिकीकरण एवं लाईनिंग कार्य तथा मुहाने नदी के कि॰मी॰ 0.00 से 12.40 कि॰मी॰ तक नदी तल की उड़ाही, तटबंध एवं संरचना का निर्माण143 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 कार्य का विस्तृत योजना प्रतिवेदन तैयार करने एवं अन्य महत्वपूर्ण कार्यों से संबद्ध रहने के कारण उच्चाधिकारियों द्वारा कार्यहित में विभाग से माह जून-2019 तक यथावत पदस्थापित रखने का अनुरोध किया गया था। संचालन पदाधिकारी द्वारा निष्कर्षतः पाया गया कि श्री पासवान, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमण्डल-2, उदेरास्थान सम्प्रति निलंबित को विभाग द्वारा स्थानांतरित किए जाने के पश्चात संबंधित उच्चाधिकारियों/वरीय पदाधिकारियों द्वारा विशेष परिस्थिति में माह जून-2019 तक उक्त प्रमण्डल में ही पदस्थापित रखने का अनुरोध किया, परन्तु विभागीय स्तर से कोई आदेश प्राप्त नही हो पाया। विभागीय आदेश के द्वारा श्री पासवान को दिनांक-27.10.2018 से स्वतः विरमित किया गया परन्तु उनके द्वारा विभागीय आदेश का अनुपालन नही किया गया। फलतः संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री पासवान के विरूद्ध लगाए गए आरोप को प्रमाणित पाया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के आलोक में श्री रामप्रवेश पासवान, निलंबित सहायक अभियंता से विभागीय पत्रांक-1534 दिनांक-19.07.2019 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा की गयी एवं प्राप्त जवाब में भी उनके द्वारा वही तथ्य का उल्लेख किया गया जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया एवं समीक्षा से विदित है कि श्री रामप्रवेश पासवान, निलंबित सहायक अभियंता को विभाग द्वारा स्थानांतरित किए जाने के पश्चात यधपि संबंधित उच्चाधिकारियों द्वारा विशेष परिस्थिति में माह जून 2019 तक उक्त प्रमण्डल में ही पदस्थापित रखने का अनुरोध किया गया परन्तु उक्त अनुरोध को विभाग द्वारा स्वीकार नहीं किया गया और उनके स्थानांतरण पर कोई स्थगन आदेश सक्षम स्तर पर निर्गत नहीं हुआ, विभाग द्वारा उसके विपरीत दिनांक-27.10.2018 के प्रभाव से श्री पासवान को स्वतः विरमित करते हुए निदेश दिया गया कि वह नव-पदस्थापित स्थान पर अपना योगदान समर्पित करें परन्तु उक्त आदेश का भी उनके द्वारा अनुपालन नहीं किया गया। जिससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने जान-बूझ कर विभागीय आदेशों की अवहेलना की एवं पूर्व पद पर बने रहें। इस प्रकार श्री राम प्रवेश पासवान, तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमण्डल-2, उदेरास्थान सम्प्रति निलंबित को विभागीय आदेश की अवहेलना के लिए दोषी पाया गया । वर्णित तथ्यों के आधार पर मामले की सम्यक समक्षोपरांत सरकार द्वारा श्री राम प्रवेश पासवान (आई0डी0-4599), तत्कालीन सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमण्डल-2, उदेरास्थान सम्प्रति निलंबित को निलंबन से मुक्त करते हुए विभागीय अधिसूचना संख्या-2002, दिनांक 17.09.2019 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया - ''असंचयात्मक प्रभाव से दो वेतनवृद्धि पर रोक।'' उक्त दण्डादेश के विरूद्ध श्री रामप्रवेश पासवान अपने पत्रांक-01, दिनांक 20.01.2020 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी समर्पित किया गया। जिसकी समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई एवं पाया गया कि श्री पासवान के द्वारा सरकार के स्पष्ट आदेशों का उल्लंघन किया गया। वह एक राजपत्रित पदाधिकारी हैं और विभाग द्वारा इनकी हठधर्मिता के कारण इन्हें स्वतः विरमित करने का आदेश दिया गया था, इसके बावजूद भी उन्होंने इसका अनुपालन नहीं किया। इस प्रकार वह विभागीय आदेश के उल्लंघन के दोषी पाये गये जिसके लिए उन्हें उक्त दण्ड संसूचित किया गया। इस प्रकार श्री पासवान द्वारा प्रस्तुत पुनर्विलोकन अर्जी को खारिज करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है। अतएव सरकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री रामप्रवेश पासवान (आई0डी0-4599), तत0 सहायक अभियंता, सिंचाई अवर प्रमंडल-2, उदेरास्थान सम्प्रति सहायक अभियंता (पदस्थापन की प्रतिक्षा में) मुख्य अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग, जल संसाधन विभाग, पटना के पुनर्विलोन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना-2002, दिनांक 17. 09.2019 द्वारा संसूचित दण्ड "असंचयात्मक प्रभाव से दो वेतनवृद्धि पर रोक" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, गोरखनाथ, अपर सचिव।

------- 25 फरवरी 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(भाग॰)-09-13/2007-323--श्री विनीत कुमार (ID-3581), तत्कालीन सहायक अभियंता, ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, शेखपुरा संप्रति सहायक अभियंता (निलंबित), जल संसाधन विभाग को उनके ग्रामीण कार्य विभाग के पदस्थापन काल में बरती गयी वित्तीय अनियमितताओं एवं जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना के मुख्यालय स्थित कार्यालय से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने तथा सरकारी आदेश की अवहेलना करने आदि आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-458, दिनांक 17.03.10 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया। श्री कुमार को शेखोपुरसराय थाना कांड सं0-25/07 (विशेष वाद सं0-30/09) एवं अन्य के मामले में न्यायिक हिरासत में लिए जाने के कारण विभागीय अधिसूचना संख्या-1041 दिनांक-02. 09.2013 द्वारा दिनांक-18.02.2013 के प्रभाव से निलंबित किया गया एवं न्यायिक हिरासत से मुक्त होने पर योगदान की तिथि 14.05.2018 से निलंबन मुक्त किया गया। विभागीय अधिसूचना संख्या-1488, दिनांक 13.07.18 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9(1)(क) में निहित प्रावधान के तहत श्री कुमार को पुनः निलंबित किया गया।

2. श्री विनीत कुमार, सहायक अभियंता (निलंबित) के विरूद्ध संचालित उक्त विभागीय कार्यवाही के निष्पादन के पूर्व, वे दिनांक 31.01.2020 को सेवानिवृत हो गये हैं। फलतः श्री कुमार को दिनांक 31.01.2020 के प्रभाव से निलंबन से मुक्त करते हुए उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित करने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया है।144 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 3. उक्त निर्णय के आलोक में श्री विनीत कुमार, सहायक अभियंता (निलंबित) सम्प्रति सेवानिवृत को दिनांक 31.01.2020 के प्रभाव से निलंबन मुक्त करते हुए पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43(बी) में सम्परिवर्तित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, गोरखनाथ, अपर सचिव।

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25 फरवरी 2020

सं0 22/नि0सि0(मोति0)-08-08/2014-316--चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी (सम्प्रति परिवर्तित नाम बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी) के अन्तर्गत बाढ़ 2013 के दौरान घोड़हिया स्थल पर कराए गए बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो में बरती गई अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई। उडनदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन एवं उक्त प्रतिवेदन पर अभियंता प्रमुख (बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण) से प्राप्त मंतव्य के समीक्षोपरान्त श्री सतीश प्रसाद सिंह (आई0डी0-3929), तत0 सहायक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी (सम्प्रति परिवर्तित नाम बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी) के विरूद्ध निम्नांकित आरोपों के लिए आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-1737, दिनांक 13.08.2018 द्वारा स्पष्टीकरण की माँग की गई :-

(i) प्रश्नगत कार्य में गलत मंशा एवं दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही एवं कार्य के प्रति उदासीनता बरतते हुए कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में बोल्डर क्रेटिंग कार्य में प्रत्युक्त 368 अद्‌द B.A.Wire Crate में कुल 368x2.16=794.88 घन मी॰ बोल्डर की मापी दर्शायी गयी है। उड़नदस्ता जाँच में Randomly Selected बोल्डर क्रेटिंग की मापी के अनुसार 20% Voids घटाने के पश्चात कुल 564.07 घन मी॰ पाया गया। इस प्रकार कुल 230.81 घन मी॰ बोल्डर की गलत ढंग से अधिक मापी दर्ज कर अनियमितता बरती गयी। जो एक गंभीर वित्तीय अनियमितता है। अगर उड़नदस्ता जाँच नहीं होती तो संभव था कि उक्त बोल्डर की मात्रा का भुगतान हो जाता।

(ii) आलोच्य बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में प्रत्युक्त B.A.Wire Crate में प्रति क्रेट 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के बदले बोरा में कम बालू भराई कराने के कारण 80 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के समतुल्य भुगतान करने का आदेश दिया गया। शेष 20 अद्‌द ई॰सी॰ बैग की कीमत संवदेक से दुगनी दर पर कटौती कर भुगतान का आदेश निर्गत किया गया है। उक्त से स्पष्ट है कि उनके द्वारा गलत मंशा से कार्य के प्रति लापरवाही/उदासीनता बरतने के कारण संवेदक के द्वारा B.A. Wire Crate में न्यून विशिष्टि के ई॰सी॰ बैग पिचिंग का कार्य कराया गया। जो उनकी कर्त्तव्यहीनता, उदासीनता एवं निदेशो का उल्लंघन होना दर्शाता है।

(iii) प्रश्नगत स्थल पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की जाँच में निर्धारित आकार के B.A. Wire Crate की बुनाई नहीं पाये जाने के संबंध में मुख्य अभियंता द्वारा समानुपातिक कटौती कर विपत्र पारित कर भुगतान का आदेश निर्गत किया गया है। इससे स्पष्ट है कि उनकी लापरवाही/उदासीनता के कारण न ही B.A.Wire Crate की बुनाई प्रावधानित आकार में हो पाया न ही कार्य विशिष्टि के अनुरूप B.A.Wire Crate का उपयोग हो पाया। परन्तु प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज किया गया एवं उसकी जाँच भी की गयी। अतएव न्यून विशिष्टि के B.A.Wire Crate की बुनाई कराकर कार्य में उपयोग होने के बावजूद गलत मंशा से प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज कर अनियमित भुगतान करने का प्रयास किया जाना परिलक्षित होता है।

उक्त आलोक में श्री सिंह द्वारा समर्पित आरोप बार दिये गये बचाव बयान का मुख्य अंश निम्नवत्‌ है :- इनके द्वारा कहा गया है कि निलंबन होने के पश्चात दि॰ 07.08.13 तक ही प्रश्नगत कार्य के प्रभारी रहे है। इनके द्वारा कहा गया है कि वर्णित कार्य उनके द्वारा नहीं कराया गया है। इसके कार्यान्वयन के अलावा इससे संबंधित प्रतिवेदन उनके स्तर से नहीं भेजा गया है जो कार्य से संबंधित NR, प्रपत्र 24 एवं लेईंग पंजी के पृष्ट 7 पर दिनांक 25.07.13, पृ॰ 10 पर 26.07.13, पृ॰ 14 दि॰ 27.07.13, पृ॰ 18 दि॰ 29.07.13, पृ॰ 22 दि॰ 30.07.13, पृ॰ 25 दि॰ 31.07.13, पृ॰ 29 दि॰ 01.08.13 एवं पृ॰ 34 दि॰ 02.08.13 को दर्ज है। उनके द्वारा मात्र NC का कार्य कराया गया है। जिसे उड़नदस्ता द्वारा सही ठहराया गया है। नियमानुसार स्थल पर कराये गये कार्यो की मापी करने, प्रगति प्रतिवेदन तैयार करने का दायित्व कनीय अभियंता का होता है जो उन लोगों के स्तर से विषम स्थिति के कारणवश ठीक से नहीं किया गया। आरोप-2 :- B.A. Wire Crate में प्रति क्रेट 80 अद्‌द E. C. bags के बदले 100 अद्‌द न्यून विशिष्टि के E.C bags से संबंधित है, के संदर्भ में कहा गया है कि बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में होने वाले इस तरह के कई महत्वपूर्ण कार्य के आईटम के कार्यो के प्रगति प्रतिवेदन में भिन्नता होना सामान्य घटना बन जाती है। उड़नदस्ता एवं अन्य पदाधिकारी द्वारा बिना कार्य में उपयोग हुए सामग्री यथा बी॰ए॰ वायर क्रेट्‌स, E.C. works एवं आदि जो Non sechedule items है। स्थल पर जाँच किये बिना किसी तरह का अभ्युक्ति देना प्रासंगिक नहीं है। घोड़हिया स्थल पर अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक कार्य एवं वरीय अभियंता के उपस्थिति एवं निदेशन में प्रतिनियुक्त पदाधिकारी द्वारा पालियों में प्रश्नगत कार्य कराया गया। कराये गये कार्यो का विस्तृत विवरणी प्रतिवेदन NR तैयार कर बेतार संवाद के माध्यम से प्रतिदिन प्रभारी बाढ़ नियंत्रण कक्ष, पटना/मोतिहारी को ससमय भेजा जाता था। जिसमें प्रति क्रेट 100 अद्‌द EC bags की सूचना दर्ज थी। लेकिन जाँच कर उचित दिशा निदेश क्षेत्रीय अभियंताओं को कार्य के दौरान नहीं दी गयी। जिससे सुधार नहीं हुआ एवं गलती होते चली गयी एवं सभी पदाधिकारी द्वारा NR प्रतिदिन स्वीकार किया गया। यह145 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 कार्य प्रतिनियुक्त अभियंता द्वारा कराया गया है एवं प्रतिवेदन भी उनके द्वारा नहीं भेजा गया है। उच्च पदाधिकारी द्वारा इस कार्य को स्वीकार करते हुए सुधार का निदेश नहीं दिया गया। आरोप-3 ः- यह कार्य उनसे संबंधित नहीं है क्योंकि क्रेट बुनाई का कार्य याँत्रिक अवर प्रमंडल द्वारा कराया गया है। आरोप सं॰ 1 'क', 'ख' एवं 'ग' के कार्यान्वयन, प्रतिवेदन, प्रपत्र-24, प्राक्कलन बनाने, विपत्र बनाने आदि में इनका कोई भागीदारी एवं संबंध नहीं है। अतएव उक्त विषम परिस्थिति जनित इन सामान्य मानवीय भूल/गलतियों के लिये वे किसी भी रूप में उत्तरदायी एवं जबावदेह नहीं है।

श्री सिंह द्वारा समर्पित बचाव बयान एवं उपलब्ध अभिलेख के समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

आरोप-1 :- जो बाढ़ अवधि 2013 के दौरान घोड़हिया स्थल पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में प्रत्युक्त कुल 368 अद्‌द B.A. Wire Crate में कुल 368x2.16=794.88 घन मी॰ बोल्डर की मापी दर्ज की गयी। परन्तु उड़नदस्ता जाँच में बोल्डर क्रेटिंग कार्य की मापी के अनुसार 20% Voids घटाने के पश्चात 368x1.91x0.80=564.67 घन मी॰ बोल्डर पाया गया। इस प्रकार कुल 230.81 घन मी॰ बोल्डर का गलत ढंग से अधिक मापी दर्ज कर अनियमितता बरतने से संबंधित है। श्री सिंह द्वारा कहा गया है कि प्रश्नगत स्थल पर बाढ़ 2013 में कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में उनकी प्रतिनियुक्ति रात्री पाली में थी। उनके द्वारा प्रमंडलाधीन कनीय अभियंता के साथ कार्यपालक अभियंता के निर्देशन में प्रश्नगत स्थल पर मात्र NC कार्य कराया गया है। उड़नदस्ता द्वारा उक्त कार्य को सही ठहराया गया है। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि कोई बोल्डर क्रेटिंग कार्य नहीं कराया गया है न ही मापी दर्ज की गयी है। अभिलेखों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि इसी स्थल पर कार्य में लापरवाही के लिये इन्हें विभागीय पत्रांक 905 दि॰ 01.08.13 से निलंबन किया गया तथा निलंबन के आलोक में श्री सिंह द्वारा दिनांक 07.08.13 को अपना प्रभार श्री अशोक कुमार सहायक अभियंता को सौंपा गया है। इनके द्वारा दिनांक 24.07.13 से 01.08.13 तक के उपलब्ध कराये गये पाली पंजी से स्पष्ट होता है कि दिनांक 01.08.13 तक उक्त स्थल पर बोल्डर क्रेटिंग कार्य नहीं कराया गया है। दिनांक 02.08.13 से 06.08.13 तक कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो के पाली पंजी से स्पष्ट है कि दिनांक 02.08.17 को प्रथम पाली में 8 अद्‌द, द्वितीय पाली में 7 अद्‌द, दिनांक 05.08.13 को प्रथम पाली में 23 अद्‌द, द्वितीय पाली में 41 अद्‌द तथा दिनांक 06.08.13 को द्वितीय पाली में 19 अद्‌द बोल्डर क्रेटिंग कार्य कराया जाना परिलक्षित है। चूँकि श्री सिंह प्रश्नगत स्थल पर तृतीय पाली में दि॰ 06.08.13 ही कार्यरत रहे है ऐसी स्थिति में इनका कथन कि इनके द्वारा स्थल पर कोई बोल्डर क्रेटिंग कार्य नहीं कराया गया है, स्वीकार योग्य प्रतीत है। उपरोक्त के आलोक में गलत ढंग से अधिक बोल्डर की मापी दर्ज कर अनियमितता बरतने का आरोप बनता प्रतीत नहीं होता है।

आरोप-2 :- जो प्रश्नगत कार्य के तहत प्रत्युक्त B.A. Wire Crate में प्रति क्रेट 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के जगह पर कम बालू भराई के कारण 80 अदद्‌ बैग के समतुल्य भुगतान करने के आदेश दिया गया शेष 20 अद्‌द ई॰सी॰ बैग की कीमत संवेदक से दुगनी दर पर कटौती करने का आदेश निर्गत किया गया। इस प्रकार न्यून विशिष्टि के B.A. Wire Crate में बोरा भराई कर पिचिंग किया जाना परिलक्षित है जो कार्य के प्रति उदासीनता/लापरवाही दर्शाता है। B.A. Wire Crate में प्रति क्रेट 80 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के बदले 100 अद्‌द न्यून विशिष्टि के ई॰सी॰ बैग (कम बालू भरे ई॰सी॰बैग) के संबंध में कहा गया है कि बाढ़ संघर्षात्मक कार्य आपातकालीन प्रकृति के होने एवं इसे भयंकर एवं व्यापक हो जाने की स्थिति में क्षेत्रीय अभियंता को स्थल पर काफी व्यस्तता बनी रहती है। इस स्थल पर संवेदकों की सं॰ काफी अधिक रहने पर प्रतिवेदन समेकित कर भेजना भी बड़ा कठीन कार्य है। जिसके कारण कार्य को मानक एवं मापदण्ड में समरूपता नहीं रह पाता है। फलतः क्षेत्रीय पदाधिकारी द्वारा भेजा गया कार्य की मात्रा, दर, राशि एवं विभाग द्वारा स्वीकृत मात्रा/दर/राशि से प्रायः भिन्नता होती है। यह भी कहा गया है कि कार्य में लगने वाले ई॰सी॰ बैग पुराने/कटे-फटे होते है जिसे उस समय छांटना संभव नहीं है। श्री सिंह का उपरोक्त कथन से प्रतीत होता है कि अपनी विफलता छिपाने के उदेश्य से तरह-तरह के बहाना बनाया गया है। क्याेंकि कार्य के पर्यवेक्षण कार्य में संलग्न अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रपत्र 24 भेजने के क्रम में स्थल पर कराये जा रहे कार्यो के अनुरूप ई॰सी॰ बैग में पूरी तरह बालू भरे नहीं होेने के आलोक में उसमें सुधार किया गया है। इनके द्वारा यह भी कहा गया कि उड़नदस्ता द्वारा स्थल पर जाँच किये बिना ही अभ्युक्ति दर्ज की गयी है। यह आरोप अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रपत्र 24 में घटाये गये ई॰सी॰ बैग के आधार पर उड़नदस्ता द्वारा B.A. Wire में उपयोग किये गये बालू भरे बोरों में कम बालू भरने के आधार पर अनियमितता होने का मंतव्य दिया गया है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5 (iii) (f) में कहा गया है कि संवेदक के स्तर पर ई॰सी॰ बैग में पूरी तरह बालू नहीं भरे जाने के कारण अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रपत्र 24 प्रेषण के समय बालू भरे 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग को बालू भरे 80 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के समतुल्य मानते हुए कराये गये कार्य के ढुलाई एवं आपूर्ति में कटौती की गयी है तथा जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4 (v) (क) से स्पष्ट होता है कि स्थलीय जाँच में भी B.A. Wire Crate में बालू भरे ई॰सी॰ बैग की संख्या 100 अद्‌द पायी गयी है परन्तु बोरे में अपेक्षित मात्रा में बालू की कमी परिलक्षित होना बताया गया है एवं कहा गया है कि इसी को ध्यान में रखकर अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रपत्र 24 में E.C. bags की मात्रा में 20 प्रतिशत की कटौती की गयी है। उक्त के आलोक में न्यून विशिष्टि के ई॰सी॰ बैग भराई करने का आरोप प्रमाणित होता है।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 146 आरोप-3 :- जो न्यून विशिष्टि के B.A. Wire की बुनाई कराने के बावजूद प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज करने से संबंधित है। श्री सिंह द्वारा कहा गया है कि क्रेट बुनाई का कार्य इनसे संबंधित नहीं है। क्योंकि यह कार्य याँत्रिक अवर प्रमंडल, मोतिहारी द्वारा कराया गया है स्वीकार योग्य है क्योंकि श्री ठाकुर कार्यपालक अभियंता के बचाव बयान से स्पष्ट है कि क्रेट बुनाई का कार्य मोतिहारी स्थित प्रमंडलीय कैम्पस में याँत्रिक अवर प्रमंडल के पदाधिकारी द्वारा कहा गया है इस बात की पुष्टि तत्कालीन सहायक अभियंता श्री अशोक कुमार के बचाव बयान से भी होती है। ऐसी स्थिति में न्यून विशिष्टि के B.A. Wire Crate बुनाई कराकर प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज करने के लिये श्री सिंह तत्कालीन सहायक अभियंता उत्तरदायी प्रतीत नहीं होते है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री सिंह के विरूद्ध गठित आरोप सं॰ 1 एवं 3 प्रमाणित नहीं होता है परन्तु आरोप सं॰-2 यथा न्यून विशिष्टि के ई॰सी॰ बैग भराई (कम बालू भराई) कराकर B.A. Wire Crating करने का आरोप प्रमाणित होता है। चूँकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के आलोक में संवेदक के विपत्र में आवश्यक सुधार एवं कटौती करते हुए विपत्र बनाया गया है। फलस्वरूप अधिकाई भुगतान का मामला नहीं है। मामले के समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोप के लिए श्री सतीश प्रसाद सिंह (आई0डी0-3929) तत0 सहायक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, कमाण्ड क्षेत्र विकास प्रमंडल, खगौल के विरूद्ध अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा निम्न दण्ड दिये जाने का निर्णय लिया गया है :-

(i) "दो वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"। अनुशासनिक प्राधिकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री सतीश प्रसाद सिंह (आई0डी0-3929) तत0 सहायक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, कमाण्ड क्षेत्र विकास प्रमंडल, खगौल के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।

(i) "दो वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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24 फरवरी 2020

सं0 22/नि0सि0(मुज0)06-11/2017-315--श्री ओम प्रकाश (आई0डी0-जे-7488), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल ढाका के उनके उक्त अवर प्रमंडल में पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 13.08.2017 को बलुआ ग्राम में दायाँ मार्जिनल बाँध तथा सपही में ललबकैया दायाँ बाँध में हुए टूटान में बरती गई अनियमितता, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने एवं बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों के प्रति संवेदनशील नहीं रहने के मामले में मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर द्वारा प्रतिवेदित आरोपों के आलोक में विभागीय पत्रांक-1607, दिनांक 14.09.2017 द्वारा श्री प्रकाश को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय पत्रांक-1689, दिनांक 20. 09.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17 में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई -

दिनांक 13.08.2017 को कि0मी0 3.00 के पास बलुआ ग्राम में दायाँ मार्जिनल बाँध तथा सपही में ललबकैया दायाँ बाँध पानी के ओवरटॉप करने के कारण टूट गया। ललबकैया नदी में पानी के जलस्तर बढने की सूचना आपके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी। साथ ही तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दु की पहचान कर उसकी पूर्व सूचना भी आपके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी। जिसके कारण बाँध क्षतिग्रस्त हुआ एवं जान-माल की व्यापक क्षति हुई। बाढ़ संघर्षात्मक कार्य जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के प्रति आपका यह कृत्य सरकारी कार्यों के प्र्र्र्रति उदासीनता, लापरवाही एवं संवेदनहीनता का परिचायक है। आपका यह कृत्य बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम-3(iii) के प्रतिकूल है। विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान श्री ओम प्रकाश, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा अपना बचाव बयान समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं-

आरोप का प्रथम लांछन यह है कि मेरे द्वारा ललबकैया नदी के जलस्तर में वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। उक्त लांछन के संदर्भ में निवेदन है कि रात्रि 09ः00 बजे से अप्रत्याशित जलश्राव की वृद्धि शुरू हो गयी थी और मेरे कार्यपालक अभियंता, मुख्य अभियंता के सम्पर्क में लगातार 08ः00 बजे रात्रि से थे और मैं कार्यपालक अभियंता के साथ था। ज्ञातव्य है कि मुख्य अभियंता के अधीन कार्यरत बाढ़ नियंत्रण कक्ष में क्षेत्रीय कार्यालयों (जहाँ गेज पठन की व्यवस्था हो) से अनवरत गेज रीडिंग उपलब्ध होते रहता है। इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि बाढ़ नियंत्रण कक्षों से ही क्षेत्रीय पदाधिकारियों को अपस्ट्रीम के जलस्तर की सूचना दी जाती है।

इस प्रकार मेरे विरूद्ध लगाये गये लांछन पूर्णतः आधारहीन एवं साक्ष्यविहीन स्थापित हो जाता है कि ललबकैया नदी में पानी के जलस्तर बढ़ने की सूचना मेरे द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। दिनांक 12.08.17 अपराह्‌न को मैं एवं कनीय अभियंता मो0 हारूण के द्वारा स्थानीय स्थिति की सूचना अपने कार्यपालक अभियंता को दिये जाने के बाद वे बलुआ ग्राम में दायाँ मार्जिनल बाँध पर अविलंब पहुँच गये एवं मुझको एवं कनीय अभियंता को बचाव कार्य के लिए भरपूर प्रोत्साहित एवं उत्प्रेरित करते हुए यथासंभव समुचित तकनीकी मार्गदर्शन दिये। उनके मार्ग दर्शन में ही कुशल/अकुशल श्रमिकों की सहायता से बालू भरे सीमेंट के बोरे से कुआँ बनाकर रिसाव को बंद करने का हर संभव प्रयास किया गया।147 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 लेकिन अप्रत्याशित बाढ़ (जैसा कि परिशिष्टि 1 एवं 2 के रूप में संलग्न समाचार पत्रों में प्रकाशित सूचना से संपुष्ट है) के कारण रिसाव को बंद करने के बावजूद, मार्जिनल बाँध से पानी का बलुआ ग्राम में ओवरटॉपिंग हुआ, जिसके कारण बाँध क्षतिग्रस्त हो गया तथा ग्राम सपही में ललबकैया दायाँ तटबंध क्षतिग्रस्त हुआ। जैसा कि आरोप पत्र के प्रथम वाक्य में ही उल्लेख है। मार्जिनल बाँध के कि0मी0 3.0ग्राम बलुआ में भारत नेपाल सीमा रेखा तटबंध के TOE से गुजरता है। उक्त स्थल पर मोबाईल नेटवर्क निरंतर काम नहीं करता है, साक्ष्य के रूप में प्रेषित मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, मुजफ्फरपुर के पत्रांक-1(सी) कैम्प मोतिहारी दिनांक 13.08.17 में मुख्य अभियंता द्वारा प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग, पटना को सूचित किया गया है कि दिनांक 12.08.17 को लगभग 08ः00 बजे रात्रि से वे लगातार कार्यपालक अभियंता, जल निस्सरण प्रमंडल, मोतिहारी के सम्पर्क में थे। उक्त स्थल पर मोबाईल नेटवर्क निरंतर नहीं रहने के बावजूद मेरे कार्यपालक अभियंता के द्वारा जल वृद्धि की सूचना वरीय पदाधिकारियों को दिया गया। मैं कार्यपालक अभियंता के साथ था और जल स्तर की सापेक्ष वृद्धि से अवगत कराया।

उक्त संदर्भ में ध्यात्वय है कि कॉम्पलेक्स (आक्राम्य बिन्दु) बिन्दु की पहचान पूर्व से ही की हुई होती है। इस संदर्भ में मानक संचालन प्रक्रिया बाढ़ प्रबंधन हेतु जल संसाधन विभाग, बिहार के सुसंगत अंश की कंडिका 4.3. 1 का अंतिम पारा अवलोकनीय है, जिसमें मुख्य अभियंता का दायित्व है कि यदि कार्यपालक अभियंता के द्वारा समर्पित सूची में आवश्यक हो तो नये आक्राम्य स्थल को जोड़ते हुए विभाग को समर्पित करेंगे। मुख्य अभियंता के द्वारा आलोच्य बिन्दु को कॉम्पलेक्स बिन्दु घोषित नहीं किया गया। अतः आलोच्य बिन्दु पूर्व से आक्राम्य बिन्दु नहीं था।

अंकणीय है कि ललबकैया नदी के दायाँ मार्जिनल बाँध का टूटान बिन्दु बलुआ ग्राम में लगभग नदी से 850मीटर से भी अधिक दूरी पर है तथा सपही में दायाँ तटबंध का टूटान बिन्दु लगभग 1.0 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर है। अतः दोनों टूटान स्थल आक्राम्य बिन्दु नहीं था। बाढ़ गश्ती निर्देशिका के आलोक में आलोच्य बिन्दु न तो संवेदनशील स्थल और न तो अति संवेदनशील स्थल की श्रेणी में आता है। निवेदन है कि जिला प्रशासन के साथ संयुक्त निरीक्षण किया गया। आलोच्य स्थल कॉम्लेक्स (आक्राम्य) बिन्दु के रूप में नहीं पाया गया। जबकि मार्जिनल बाँध का 1.5कि0मी0 ग्राम गोआबाडी, आक्रम्य बिन्दु था, जो कि निरीक्षण प्रतिवेदन में भी अंकित है वहाँ टूटान नहीं हुआ। उसी अनुरूप निदेशानुसार उक्त बिन्दु 1.5कि0मी0 पर मुख्य अभियंता के निर्देशानुसार बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का भंडारण करके रखा गया था। इस प्रकार प्रशासन के साथ संयुक्त निरीक्षण में आलोच्य बिन्दु को आक्राम्य बिन्दु नहीं माना गया।

उक्त लांछन के संदर्भ में निवेदन है कि बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के प्रति मेरे द्वारा पूरी सर्तकता एवं तत्परता बरती गयी है। इसका सम्पुष्ट प्रमाण यह है कि मैं दिनांक 12.08.17 को आलोच्य स्थल पर कार्यरत था और रिसाव की सूचना कार्यपालक अभियंता को दिया, रिसाव की सूचना प्राप्त होते ही वे अविलंब पहुँच गये।

यहाँ यह उल्लेख करना अनिवार्य प्रतीत होता है कि मेरे अवर प्रमंडल में मात्र एक कनीय अभियंता के कार्यरत रहने के बिल्कुल प्रतिकूल परिस्थिति यथा भारी वर्षापात रहने के बावजूद मेरे द्वारा बाढ़ संघर्षात्मक कार्य को पूरी तत्परता एवं सर्तकता से सम्पन्न कराया गया। विदित हो कि जल निस्सरण प्रमंडल, मोतिहारी में मेरी प्रतिनियुक्ति माह जून में हुआ और मैं दिनांक 21.06.17 को योगदान किया था।

अप्रत्याशित बाढ के विकराल रूप का आकलन इसी तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि ललबकैया नदी के दायाँ तटबंध में नेपाल भू-भाग में भी 16 स्थलों पर टूटान हुआ है।

अतः मेरे विरूद्ध लगाये गये आरोप से मुझे मुक्त करने की कृपा की जाय। मार्जिनल बाँध के कि0मी0 3.0 ग्राम बलुआ में भारत नेपाल सीमा रेखा तटबंध के टो से गुजरता है। इस कारण मोबाईल नेटवर्क निरंतर काम नहीं करता। अतएव आरोप से मुक्त किया जाय।

श्री ओम प्रकाश, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त बचाव बयान पर संचालन पदाधिकारी द्वारा विभागीय अभिमत की मांग की गई जिसमें विभाग द्वारा कहा गया है कि -

श्री दिनेश कुमार चौधरी, तत्कालीन मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर के पत्रांक-1(सी) दिनांक 13.08.17 से स्पष्ट है कि श्री ओम प्रकाश दिनांक 12.08.17 मुख्य अभियंता के सम्पर्क में थे, परन्तु उनके द्वारा ललबकैया नदी के जलस्तर में लगातार वृद्धि होने की सूचना सम्भवतः मुख्य अभियंता को नहीं दी गई। परन्तु तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा अपना बचाव बयान में श्री ओम प्रकाश द्वारा जल स्तर में वृद्धि की सूचना उन्हें देने की बात स्वीकार की गई है।

श्री ओम प्रकाश के उपर दूसरा आरोप यह है कि तटबंध की कॉम्पलेक्स बिन्दु की पहचान कर इनके द्वारा इसकी पूर्व सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। इस संबंध में स्पष्ट करना है कि इनके द्वारा आक्राम्य स्थल चिन्हित होने की बात अस्वीकार की गई है जबकि मुख्य अभियंता द्वारा बाढ़ गश्ती नियमावली 2017 में ललबकैया नदी के गोआबाड़ी में मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50 कि0मी0 तक के लोकेशन को आक्राम्य स्थल की सूची में रखा गया। दिनांक 13.08. 2017 को हुए टूटान स्थल का लोकेशन भी मार्जिनल बाँध के 3.00 कि0मी0 (ग्राम-बलुआ) के पास ही है। स्पष्ट है कि इनके द्वारा आक्राम्य स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का भंडारण नहीं किया गया एवं स्थल पर आवश्यकतानुसार सामग्री उपलब्ध नहीं होने से बाढ़ संघर्षात्मक कार्य पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा एवं अंततः ओवरटॉपिंग के कारण बाँध टूट गया।148 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उपर वर्णित तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री ओम प्रकाश द्वारा बाढ़ नियंत्रण आदेश एवं बाढ़ गश्ती नियमावली 2017 में दिये गये निदेश का अनुपालन नहीं किया गया जो कि इनके बाढ़ संघर्षात्मक जैसे महत्वपूर्ण कार्य के प्रति उदासीनता, लापरवाही एवं संवेदनहीनता को दर्शाता है। अतः इनका बचाव बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है।

श्री ओम प्रकाश, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त बचाव बयान एवं उनके विरूद्ध प्राप्त विभागीय मंतव्य के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा अपना जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया जिसमें निम्न बातें कही गई हैं :-

श्री ओम प्रकाश श्री ओम प्रकाश के विरूद्ध गठित प्रपत्र 'क' में मुख्य रूप से दो आरोप गठित है :-

(1) ललबकैया नदी में पानी जलस्तर बढने की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं देना। (2) तटबंध के कॉम्पलेक्स बिन्दु के पहचान कर इसके पूर्व सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं देना। आरोपी पदाधिकारी ने अपने बचाव बयान में प्रपत्र 'क' में गठित दोनों आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि ललबकैया नदी में रात्रि 09ः00 बजे से ही अप्रत्याशित जलश्राव की वृद्धि शुरू हो गयी थी। मैं अपने कार्यपालक अभियंता तथा मुख्य अभियंता के सम्पर्क में लगातार 08ः00 बजे रात्रि से था। मुख्य अभियंता के अधीन कार्यरत बाढ़ नियंत्रण कक्ष में क्षेत्रीय कार्यालयों से अनुवरत गेज रिडिंग उपलब्ध होते रहते है। बाढ़ नियंत्रण कक्ष से ही क्षेत्रीय पदाधिकारियों को अपस्ट्रीम की जल स्तर की सूचना दी जाती है। इस प्रकार उनके विरूद्ध यह आरोप भी नदी में निरन्तर हो रहे जल स्तर में वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी गलत है। अप्रत्याशित बाढ़ के कारण रिसाव को बन्द करने के बावजूद मार्जिनल बाँध से बलुआ ग्राम में पानी ओभर टॉपिंग हुआ जिसके कारण बाँध क्षतिग्रस्त हुआ। वे कार्यपालक अभियंता के साथ थे एवं मोबाईल नेटवर्क निरन्तर नहीं रहने के बावजूद भी जल स्तर में हो रही वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारियों को दी गयी।

दूसरे आरोप के संबंध में आरोपी पदाधिकारी का कहना है कि ललबकैया नदी के दायाँ मार्जिनल बाँध के टूटान बिन्दु बलुआ ग्राम में नदी से लगभग 850मी0 से भी अधिक दूरी पर है। सपही में दायें तटबंध का टूटान बिन्दु लगभग 1 कि0मी0 से भी अधिक दूरी पर है। अतः दोनों टूटान स्थल आक्राम्य बिन्दु नहीं था। बाढ़ गश्ती निर्देश्किा में आलोच्य बिन्दु न तो संवेदनशील स्थल और न ही अतिसंवेदनशील स्थल की श्रेणी में आता है।

विभागीय अभिमत में श्री ओम प्रकाश के उपर दूसरा आरोप यह है कि तटबंध की कॉम्पलेक्स बिन्दु की पहचान कर इनके द्वारा इसकी पूर्व सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। इस संबंध में स्पष्ट करना है कि इनके द्वारा आक्राम्य स्थल चिन्हित होने की बात अस्वीकार की गई है जबकि मुख्य अभियंता द्वारा बाढ़ गश्ती नियमावली 2017 में ललबकैया नदी को गोआबाड़ी में मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50 कि0मी0 तक के लोकेशन को आक्राम्य स्थल की सूची में रखा गया है। दिनांक 13.08.17 को हुए टूटान स्थल का लोकेशन भी मार्जिनल बाँध के 3.00 कि0मी0 (ग्राम-बलुआ) के पास ही है। स्पष्ट है कि श्री ओम प्रकाश द्वारा आक्राम्य स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का भंडारण नहीं किया गया एवं स्थल पर आवश्यकतानुसार सामग्रियों उपलब्ध नहीं होने से बाढ़ संघर्षात्मक कार्य एवं इसका प्रतिकूल असर पड़ा एवं अंततः ओवर टॉपिंग के कारण बाँध टूट गया। श्री ओम प्रकाश के बचाव बयान को अस्वीकार योग्य मानते हुए प्रपत्र 'क' में गठित आरोपों के लिए उन्हें उत्तरदायी बताया गया है। प्रपत्र 'क' में गठित आरोप एवं इसके साथ सलंग्न साक्ष्य आरोपी पदाधिकारी का बचाव बयान एवं विभागीय मंतव्य से स्पष्ट है कि ललबकैया नदी में जल स्तर में निरन्तर वृद्धि हो रही थी। किन्तु इसकी सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। इस बात की पुष्टि मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(सी) दिनांक 13.08.2017 में वर्णित तथ्यों से होती है। श्री ओम प्रकाश द्वारा यह कहना कि जल स्तर में होने वाले वृद्धि की सूचना नियंत्रण कक्ष से ही क्षेत्रीय पदाधिकारियों को दी जाती है यह मान्य नहीं है। क्षेत्रीय अभियंता होने के नाते श्री ओम प्रकाश, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी का यह दायित्व था कि नदी में हो रहे जल स्तर की वृद्धि की सूचना द्रुत माध्यम से अपने उच्चाधिकारियों को देते किन्तु उनके द्वारा ऐसा नहीं किया गया। इसलिए श्री ओम प्रकाश के बचाव बयान का यह अंश स्वीकार योग्य नहीं है। श्री ओम प्रकाश का यह कहना कि दोनों टूटान स्थल आक्राम्य बिन्दु नहीं था तथा यह संवेदनशील अथवा अतिसंवेदनशील स्थल के रूप में चिन्हित नहीं किया गया था, यह स्वीकार योग्य नहीं है। क्योंकि आक्राम्य स्थल को चिन्हित करना क्षेत्रीय अभियंताओं की जिम्मेदारी है। सतत निगरानी के दौरान ऐसे आक्राम्य स्थल को चिन्हित किया जाना है। यदि बाँध की सतत निगरानी की जाती एवं आक्राम्य स्थलों को सही ढंग से चिन्हित किया जाता तो पानी को ओवरटॉप होने से बचाया जा सकता था । इसलिए श्री ओम प्रकाश, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी के बचाव बयान का दुसरा अंश भी स्वीकार योग्य नहीं है। अतएव प्रपत्र 'क' में गठित आरोप पूर्णतः प्रमाणित होता है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1033, दिनांक 11.05.2018 द्वारा श्री ओम प्रकाश से द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

उक्त के आलोक में श्री ओम प्रकाश द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 08.06.18 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :-

श्री प्रकाश द्वारा अपने बचाव बयान के कंडिका 2 (क) से (ग) तक में विभागीय कार्यवाही के संचालन प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि तथ्यों की सम्पुष्टि हेतु आवश्यक साक्ष्य/कागजातों की माँग करने पर बताया गया कि वांछित कागजात आरोप से संबंधित नहीं है तथा सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 12196 दिनांक 07.09.16 संलग्न करते हुए कहा गया है कि वांछित कागजात उपलब्ध नहीं कराना उक्त पत्र का उल्लंघन है। कंडिका (ड़) में सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 1893 दिनांक 14.06.11 के अनुसार संचालन पदाधिकारी द्वारा तैयार किये गये आदेशफल पर विधिवत रूप से आरोपी का हस्ताक्षर कराकर एक प्रति उपलब्ध कराना है। परन्तु ऐसा नहीं कर पत्र का अवहेलना किया गया है।149 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 जाँच प्रतिवेदन के संदर्भ में बचाव बयान के कंडिका 1 से 4 तक में आरोप के गठन का आधार, उनके द्वारा दिये गये बचाव बयान (दि॰ 08.11.17 एवं 16.11.17) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि बाँध के दोनों टूटान स्थल को सुरक्षित रखने हेतु हर संभव प्रयास, अपने कार्यपालक अभियंता का निदेश एवं अधीनस्थ एक कनीय अभियंता के सहायता से की गयी। तथा अपेक्षित दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन किया गया था। कंडिका 5 से 9 तक में उनके द्वारा दिनांक 08.11.17 एवं 16.11.17 को दिये गये बचाव बयान का सम्यक रूप से संचालन पदाधिकारी द्वारा संज्ञान नहीं लेने के संदर्भ में उल्लेख करते हुए कहा गया है कि दोनों टूटान स्थलों पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराकर सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया जिसका नियमानुसार NR सभी पदाधिकारियों को दिया गया था। कंडिका-10 में कहा गया है कि संयुक्त निरीक्षण के अनुसार आक्राम्य स्थल कि॰मी॰ 01.5 ग्राम गोआबाडी पर सामग्रियों का भंडारण किया गया था। अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 577 दि॰ 08.06.17 के अनुसार सामग्री गोआबाडी में ही रखना था। उसी स्थल से सामग्री लाकर कि॰मी॰ 3.0 टूटान स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराया गया। कंडिका-11 में कहा गया है कि बाढ़ की स्थिति से निरंतर विभागीय पदाधिकारी को अवगत कराते रहने का प्रयास किया गया। दिनांक 12.08.17 की रात्रि 8.0 से लगातार कार्यपालक अभियंता, मुख्य अभियंता के सम्पर्क में थे। कार्यपालक अभियंता जल वृद्धि की सूचना वरीय पदाधिकारी को दे रहे थे। कार्यपालक अभियंता ने बचाव बयान में आरोपित पदाधिकारी द्वारा जलस्तर में वृद्धि की सूचना उन्हें देने की बात स्वीकार की गयी है। दायाँ मार्जिनल बाँध के कि॰मी॰ 1.5 गोआबाडी में आक्राम्य स्थल के रूप में चिन्हि्‌त कर संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन प्रमंडलीय पत्रांक 214 दिनांक 01.06.17 से अधीक्षण अभियंता को समर्पित है। इसके अनुरूप बाढ़ संघर्षात्मक सामग्री का भंडारण भी किया गया था। आलोच्य स्थल कि॰मी॰ 3.0 बलुआ एवं सपही पूर्व से आक्राम्य स्थल नहीं था। दोनों बिन्दुओं पर नदी बाँध से 865 मी॰ एवं 1000 मी॰ दूर है। दोनों आक्राम्य स्थल की श्रेणी में नहीं आते है। अतः अनुरोध है कि समानुपातिक रूप से विचार करते हुए आरोप से मुक्त करने की कृपा की जाय। श्री ओम प्रकाश, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री ओम प्रकाश, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी के विरूद्ध बागमती अवर प्रमंडल ढाका के अन्तर्गत दिनांक 13.08.17 को ललबकैया नदी के कि॰मी॰ 3.0 के पास बलुआ तथा मार्जिनल बाँध के सपही ग्राम के पास हुए टूटान से संबंधित आरोप का मुख्य अंश निम्न है :-

(i) ललबकैया नदी के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि की सूचना उनके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी।

(ii) तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दु का पहचान कर इसकी पूर्व सूचना उच्चाधिकारी को नहीं दी गयी न ही उस स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का पूर्व में भंडारण ही किया गया।

संचालन पदाधिकारी के द्वारा श्री ओम प्रकाश के विरूद्ध आरोप के विरूद्ध उपरोक्त आरोप के दोनों अंशों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

(i) अंश 'क' के संदर्भ में श्री ओम प्रकाश, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा आरोप से संदर्भित वही तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। जिस पर विभाग द्वारा बाढ़ नियंत्रण, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना के द्वारा गठित मंतव्य से सहमत होते हुए संचालन पदाधिकारी को उपलब्ध कराया गया है। श्री ओम प्रकाश द्वारा कहा गया है कि वे मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर के सम्पर्क में थे एवं नदी के जल स्तर में हो रहे लगातार वृद्धि की सूचना निरंतर रूप से मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर को दिया जा रहा था। को संचालन पदाधिकारी ने निम्न तथ्यों के आलोक में अस्वीकार योग्य माना है। मुख्य अभियंता के पत्रांक 1(C) दिनांक 13.08.17 में कहा गया है कि श्री ओम प्रकाश सम्पर्क में थे परन्तु नदी के जलस्तर में हो रही निरंतर वृद्धि की सूचना नहीं दी गयी। जब बाँध टूट गया तब इसकी सूचना प्राप्त होने पर अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल को स्थल पर पहुँचने का अनुरोध किया गया। कंडिका 3.02 में निहित निदेश कि पूर्व के भाँति तटबंधों को नियमित गश्ती एवं सतत चौकसी बरतना किया जाना है। श्री ओम प्रकाश द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया। जिससे परिलक्षित हो सके कि इनके द्वारा नदी के जल स्तर में हो रही वृद्धि की सूचना ससमय उच्चाधिकारी एवं जिला पदाधिकारी को दी गयी हो तथा मुख्य सचिव के पत्रांक 1934 दिनांक 11.05.17 के कंडिका 8.02 एवं 3.02 का अनुपालन करते हुए प्रतिवेदन दी गयी हो। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप के इस अंश को प्रमाणित माना जाता है।

(ii) दूसरा अंश :- आरोप के इस अंश के संबंध में श्री ओम प्रकाश द्वारा कहा गया है कि जिला पदाधिकारी के संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन के अनुसार तथा अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 577 दि॰ 08.06.17 के आलोक में आक्राम्य स्थल 1.5 कि॰मी॰ गोबावारी पर सामग्री का भंडारण किया गया था। आलोच्य स्थल मार्जिनल बाँध कि॰मी॰ 3.0 ग्राम बलुआ एवं ललबकैया दायाँ बाँध में सपही पूर्व से आक्राम्य स्थल नहीं था। न ही आक्राम्य स्थल के श्रेणी में था, को संचालन पदाधिकारी ने मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के स्तर से निर्गत बाढ़ गश्ति नियमावली 2017 में मार्जिनल बाँध के कि॰मी॰ 2.40 से 3.50 तक के लोकेशन को आक्राम्य स्थल के सूचि में रखा गया था, के आलोक में स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप का इस अंश को150 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। संचिका में रक्षित अभिलेख के आलोक में सहमत हुआ जा सकता है एवं आरोप के इस अंश को प्रमाणित माना जाता है।

समीक्षोपरांत उपर वर्णित तथ्यों के आलोक में उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री ओम प्रकाश, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, ढाका सम्प्रति अवर प्रमंडल पदाधिकारी, उत्तर कोयल नहर अवर प्रमंडल-4, मदनपुर, शिविर औरंगाबाद (उत्तर कोयल नहर प्रमंडल, मदनपुर शिविर- औरंगाबाद) को विभागीय अधिसूचना संख्या-2145, दिनांक 25.09.18 द्वारा निलंबन से मुक्त किया गया एवं बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्शोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1541, दिनांक 19.07.19 द्वारा निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया गया।

"कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री ओम प्रकाश, तत0 सहायक अभियंता ने अपने पत्रांक-शून्य दिनांक 26.08.2019 से संसूचित दण्ड के विरूद्ध पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी है - श्री ओम प्रकाश, सहायक अभियंता के पुनर्विलोकन अर्जी के कंडिका 1 से 9 तक में इनके विरूद्ध की गयी कार्रवाई से लेकर विभागीय कार्यवाही का संचालन एवं दण्ड अधिरोपण तक का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

आरोप का प्रथम अंश-श्री प्रकाश, सहायक अभियंता द्वारा आरोप के प्रथम अंश यथा ललबकैया नदी के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि की सूचना उनके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं देने के संदर्भ में कहा गया कि संचालन पदाधिकारी का अंतिम जाँच प्रतिवेदन में उल्लेखित भवदीय का समीक्षा खण्ड प्रथम एवं द्वितीय अनुच्छेद का अवलोकन प्रासंगिक होगा जिससे निम्नलिखित तथ्यों का पता चलता है-

मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(c) दिनांक 13.08.17 में उद्धित अभिकथन के साथ-साथ उनके बचाव बयान में उद्धित तथ्यों को अंकित किया गया है एवं उनके बचाव बयान को अस्वीकार कर दिया गया। मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(c) दिनांक 13.08.17 में उद्धृत अभिकथन एवं उनके बचाव बयान में उद्धित तथ्यों की सत्यता की कोई जाँच नहीं की गयी जो सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा समय-समय पर दिये मार्गनिदेश का प्रतिकूल है। परिणाम स्वरूप विभागीय कार्यवाही की सम्पूर्ण प्रक्रिया एकपक्षीय हो गयी है।

उनके द्वारा अधीक्षण अभियंता महोदय को भी जल स्तर में वृद्धि की सूचना दी जाती रही थी। यही कारण है कि उनके द्वारा इनके विरूद्ध किसी प्रकार का कोई स्पष्टीकरण/प्रतिवेदन निर्गत नहीं किया गया। इस संदर्भ में बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढ़ी के गेज पंजी 2017 का अवलोकन करना चाहेंगे। जिसे स्पष्ट है कि दिनांक 12.08.17 से दिनांक 13.08.17 तक हो रही जल स्तर में वृद्धि की सूचना अधीक्षण अभियंता को भी दी गयी थी। अंचलीय कार्यालय के वितंतु संचालक द्वारा वायरलेस के माध्यम से ततसंबंधित गेज पठन की सूचना मुख्य अभियंता कार्यालय, मुजफ्फरपुर के बाढ़ नियंत्रण कक्ष को सम्प्रेषित की गयी थी। न्यायहित में इसकी पुष्टि मुख्य अभियंता कार्यालय में रक्षित गेज पंजी 2017 से भी की जा सकती है। दिनांक 12.08.17 से 13.08.17 तक नदी का जलस्तर अप्रत्याशित रूप से तेजी से बढते हुए अपने पूर्व के अधिकतम जलस्तर 72.84 से 1.0मी0 बढ़कर 73.80 तक पहुँच गया। नदी का पानी ओवर टॉप करने के कारण बाँध क्षतिग्रस्त हो गया। आरोप का दूसरा अंश- जो तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दु का पहचान कर इसकी पूर्व सूचना उच्चाधिकारी को नहीं दी गयी, न ही उस स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का पूर्व में भंडारण ही किया गया।

मुख्य अभियंता द्वारा निम्न तथ्य प्रतिवेदित किया गया है कि दिनांक 12.08.17 को रात्रि में मैं लगातार कार्यपालक अभियंता, जल निस्सरण प्रमंडल, मोतिहारी के सम्पर्क में था तथा उनके द्वारा सूचना दी जा रही थी कि ललबकैया दायाँ मार्जिनल बाँध में सीपेज एव पाईपिंग को कंट्रोल करने के लिये बेल बना रहे है। उक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि (क) बाढ़ का पानी से टूटान के पूर्व इस कमजोर बिन्दु ललबकैया दायाँ मार्जिनल बाँध में बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराया जा रहा था।

(ख) बाढ़ के पानी से टूटान के पूर्व मुख्य अभियंता निरन्तर इनके सम्पर्क में थे। (ग) बाढ़ के पानी से टूटान के पूर्व मुख्य अभियंता को निरन्तर इस कमजोर बिन्दु अर्थात कम्पलेक्स बिन्दु पर चल रहे बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की सूचना उचित माध्यम से दी जा रही थी। मुख्य अभियंता के स्तर से निर्गत बाढ़ गस्ती नियमावली 2017 में मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50 तक के लोकेशन को अक्राम्य स्थल की सूची में रखा गया था जबकि टूटान बिन्दु मार्जिनल बाँध के कि0मी0 3.0 पर अवस्थित है। अर्थात बाढ़ के पानी के पूर्व मुख्य अभियंता को इस कम्पलेक्स बिन्दु की जानकारी थी।

स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का पूर्व में भंडारण नहीं किये जाने के संदर्भ में कहा गया है कि इनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में समावेश नहीं है। अर्थात उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में इस तरह का कोई आरोप नहीं लगाया गया था। उनके विरूद्ध गठित आरोप के साथ संलग्न एक मात्र साक्ष्य जो कि मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(c) दिनांक 13.08.17 है जो आरोप के दूसरे अंश को सम्पुष्ट नहीं करता है।

इनके बचाव बयान के कंडिका 11(ंa) से (12) तक में इनके द्वारा टूटान की घटना को प्राकृतिक आपदा बताया गया है। किन्तु समीक्षा के क्रम में इस पर विचार नहीं किया गया।

दिनांक 14.08.17 को बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर अन्तर्गत हुए टूटान के उपरांत दिनांक 30.08.17 को प्रधान सचिव द्वारा MJC No. 2270/2016 में दायर Supplimentary show cause में उल्लेख किया गया है कि इस बाढ़ अवधि में बागमती नदी 2014 के पूर्ववर्ती रिकार्ड उच्चतम जलस्तर को पार कर 26 से0मी0 उपर बह रही थी। इनका कार्यक्षेत्र बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर के U/S भाग में अवस्थित है एवं स्वभाविक रूप से इनके कार्यक्षेत्र का पानी बागमती नदी में जाती है। ऐसी स्थिति में प्रधान सचिव द्वारा उल्लेखित तथ्यों के आलोक में इनके कार्यक्षेत्राधीन हुई टूटान को प्राकृतिक151 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आपदा का मामला बनता है। इसके अतिरिक्त बिहार सरकारी सेवक (वर्गीक्रण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 27(2) (ख), 27(2)(ग) एवं 25 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इनके विरूद्ध लगाये गये आरोप का कोई अंश/लांक्षण किसी भी रूप से प्रमाणित नहीं होता है। अतः तथ्यपरक पुनर्विलोकन अर्जी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए दण्ड निर्गत की तिथि से निरस्त करना नियमानुकूल एवं न्यायोचित है।

श्री ओम प्रकाश, सहायक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये -

आरोप का प्रथम अंश- जो ललबकैया नदी के जलस्तर में लगातार हो रहे वृद्धि की सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं देने से संबंधित है।

श्री ओम प्रकाश द्वारा आरोप के इस अंश के संदर्भ में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया था। जिसकी समीक्षा पूर्व में की जा चुकी है एवं आरोप प्रमाणित पाया गया है। इसके अतिरिक्त कहा गया है कि नदी के जलस्तर में हो रहे वृद्धि की सूचना मुख्य अभियंता के साथ-साथ अधीक्षण अभियंता को भी दी जा रही थी। यही कारण है कि अधीक्षण अभियंता द्वारा कोई प्रतिवेदन/स्पष्टीकरण निर्गत नहीं किया गया। जलस्तर में वृद्धि की सूचना अंचलीय कार्यालय के बेतार चालक द्वारा वायरलेस के माध्यम से तत्संबंधित गेज पठन की सूचना मुख्य अभियंता के स्तर पर गठित बाढ़ नियंत्रण कक्ष को संप्रेषित की गयी थी, जिसकी पुष्टि मुख्य अभियंता कार्यालय से करायी जा सकती है। मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(c) दिनांक 13.08.17 में कहा गया है कि आरोपित पदाधिकारी सम्पर्क में थे परन्तु नदी के जलस्तर में निरंतर हो रही वृद्धि की सूचना नहीं दी गयी। जब बाँध टूट गया तब इसकी सूचना प्राप्त होने पर अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल को स्थल पर पहुँचने का अनुरोध किया गया।

इससे स्पष्ट है कि मुख्य सचिव के पत्रांक-1934, दिनांक 11.05.17 से निर्गत बाढ़ नियंत्रण आदेश 2017 के कंडिका 8.02 में स्पष्ट उल्लेख है कि जब किसी तटबंध पर गंभीर खतरा हो जाय तो तुरन्त मुख्य अभियंता तथा अधीक्षण अभियंता, कार्यपालक अभियंता तक के पदाधिकारी को सूचना देते हुए जिला पदाधिकारी को देंगे। साथ ही केन्द्रीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष पटना को अवगत करायेंगे। साथ ही कंडिका 3.02 में निहित निदेश कि पूर्व के भाँति तटबंध को नियमित गश्ती एवं सतत चौकसी बरती जानी है। आरोपी द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है जिससे परिलक्षित हो सके कि इन दोनों पदाधिकारी द्वारा नदी के जलस्तर में हो रहे वृद्धि की सूचना अपने उच्च पदाधिकारी यथा अधीक्षण अभियंता/मुख्य अभियंता एवं जिला पदाधिकारी को दी गयी है न ही मुख्य अभियंता के पत्रांक-1934, दिनांक 11.05.17 का अनुपालन करते हुए प्रतिवेदन ही दिया गया।

उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त श्री ओम प्रकाश द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17,27(2)(ख), 27(2)(ग), 24(2) एवं 25 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उक्त नियम के अनुरूप उनके पूर्व के बचाव बयान पर न्यायसंगत निर्णय नहीं लिया गया है स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोप का प्रथम अंश यथा नदी के जलस्तर में हो रहे लगातार वृद्धि की सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं देने का आरोप प्रमाणित होता है।

आरोप का द्वितीय अंश- यथा तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दु का पहचान कर इसकी पूर्व सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं दी गयी एवं न ही उस स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्री का पूर्व में भंडारण ही किया गया।

इस आरोप के संदर्भ में श्री ओम प्रकाश द्वारा वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी एवं आरोप प्रमाणित पाया गया है कि जिला पदाधिकारी के संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन के अनुसार तथा अधीक्षण अभियंता के पत्रांक-577, दिनांक 08.06.17 के आलोक में आक्राम्य स्थल 1.50 कि0मी0 गोबावारी पर सामग्री का भंडारण किया गया था आलोच्य टूटान स्थल मार्जिनल बाँध के कि0मी0 3.0 बलुआ एवं ललबकैया दायाँ बाँध में सपही पूर्व से आक्राम्य स्थल नहीं था न ही आक्राम्य स्थल की श्रेणी में था को संचालन पदाधिकारी ने मुख्य अभियंता के स्तर पर निर्गत बाढ़ गठित नियमावली 2017 के मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50 तक के लोकेशन को आक्राम्य स्थल के सूची में रखा गया था के आलोक में स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। उपरोक्त से स्पष्ट है कि टूटान बिन्दु 3.0 कि0मी0 पर पूर्व से सामग्रीे का भंडारण इनके द्वारा नहीं कराया गया एवं बाँध दिनांक 13.08.17 को क्षतिग्रस्त हो गया। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में इनका पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है।

समीक्षोपरांत वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री ओम प्रकाश, सहायक अभियंता का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीेकार योग्य नहीं है एवं इनके विरूद्ध गठित आरेाप के दोनों अंश यथा नदी में लगातार जलस्तर में हो रही वृद्धि की सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं देने एवं तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दुओं को पहचान कर इसकी पूर्व में सूचना नहीं देने एवं उक्त स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का पूर्व में भंडारण नहीं करने का आरोप प्रमाणित होता है।

अतएव सरकार द्वारा श्री ओम प्रकाश, तत0 अवर प्रमंडल पदाधिकारी, बागमती अवर प्रमंडल, ढाका सम्प्रति उत्तर कोयल नहर अवर प्रमंडल-4, मदनपुर, शिविर औरंगाबाद (उत्तर कोयल नहर प्रमंडल, मदनपुर शिविर- औरंगाबाद) से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना-1541, दिनांक 19.07.2019 से निर्गत दण्डादेश यथा "कालमान वेतनमान में छः वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 152

24 फरवरी 2020

सं0 22/नि0सि0(मुज0)06-11/2017-314--मो0 नेहाल अहमद (आई0डी0-3718), तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, जल निस्सरण प्रमंडल, मोतिहारी को उनके उक्त प्रमंडल मेें पदस्थापन अवधि के दौरान दिनांक 13.08.2017 को बलुआ ग्राम में दायाँ मार्जिनल बाँध तथा सपही में ललबकैया दायाँ बाँध में हुए टूटान में बरती गई अनियमितता, कर्त्तव्य के प्रति घोर लापरवाही, पदीय दायित्वों का निर्वहन नहीं करने एवं बाढ़ संघर्षात्मक कार्यों के प्रति संवेदनशील नहीं रहने के मामले में मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर द्वारा प्रतिवेदित आरोपों के आलोक में विभागीय पत्रांक-1606, दिनांक 14.09.2017 द्वारा मो0 अहमद को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय पत्रांक-1690, दिनांक 20.09.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17(2) में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई -

दिनांक 13.08.2017 को कि0मी0 3.00 के पास बलुआ ग्राम में दायाँ मार्जिनल बाँध तथा सपही में ललबकैया दायाँ बाँध पानी के ओवरटॉप करने के कारण टूट गया। ललबकैया नदी में पानी के जलस्तर बढने की सूचना आपके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी। साथ ही तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दु की पहचान कर उसकी पूर्व सूचना भी आपके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी। जिसके कारण बाँध क्षतिग्रस्त हुआ एवं जान-माल की व्यापक क्षति हुई। बाढ़ संघर्षात्मक कार्य जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के प्रति आपका यह कृत्य सरकारी कार्यों के प्र्र्र्रति उदासीनता, लापरवाही एवं संवेदनहीनता का परिचायक है। आपका यह कृत्य बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम-3(iii) के प्रतिकूल है। विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान मो0 नेहाल अहमद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा अपना बचाव बयान समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं-

(1) उनके विरूद्ध प्रपत्र-'क' के गठन में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-17(3)(i) (ii) क एवं ख के प्रावधानों की अनदेखी की गई है।

(2) आरोप का प्रथम लांछन यह है कि मेरे द्वारा ललबकैया नदी के जलस्तर में वृद्धि की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। उक्त लांछन के संबंध में निवेदन है कि मैंने अपने निजी मोबाईल संख्या-9934617549 एवं सरकारी मोबाईल संख्या-7463889659 पर वार्ता के क्रम में उच्चाधिकारियों को नदी में जल स्तर की वृद्धि की सूचना दी है। इस बात की पुष्टि का प्रमाण यह है कि मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर स्वयं यह स्वीकार कर रहे हैं कि दिनांक 12.08.2017 की रात्रि 08ः00 बजे से लेकर दिनांक 13.08.2017 के पूर्वाह्‌न 02ः50 बजे तक वे लगातार सम्पर्क में थे। तटबंध पर अपने सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता के साथ सीपेज एवं पाईपिंग का बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराकर नियंत्रित करने के दौरान मुख्य अभियंता से भी लगातार सम्पर्क में रहना इस बात की पुष्टि करता है कि उन्हें जलस्तर में वृद्धि की जानकारी दी गई है, वरना वे मेरे द्वारा कराये जा रहे सीपेज एवं पाईपिंग के कार्य को अपने पत्र में अंकित नहीं करते।

(3) प्रेषित साक्ष्य में मुख्य अभियंता द्वारा उद्धृत कॉम्पलेक्स बिन्दु की परिकल्पना का आधार क्या है यह परिभाषित नहीं है। मानक संचालन प्रक्रिया बाढ़ प्रबंधन एवं तटबंध गश्ती नियमावली में कॉम्पलेक्स बिन्दु का वर्णन नहीं है आक्राम्य स्थल को परिभाषित किया गया है। ऐसी स्थिति में कॉम्पलेक्स बिन्दु का अर्थ आक्राम्य स्थल लिया जा रहा है। आलोच्य बिन्दु पूर्व से आक्राम्य घोषित नहीं था। यदि यह पूर्व से आक्राम्य स्थल घोषित होता तो श्री दिनेश कुमार चौधरी, तत्कालीन मुख्य अभियंता अपने लंबे कार्यकाल (वर्ष 2009 से वर्ष 2017) में आलोच्य बिन्दु को मानक संचालन प्रक्रिया बाढ़ प्रबंधन, जल संसाधन विभाग के कंडिका 4.3.1 के अंतिम पारा के आलोक में कभी न कभी आक्राम्य घोषित किये होते। (सुलभ प्रसंग हेतु कंडिका 4.3.1 परिशिष्टि-4 के रूप में संलग्न है)

आलोच्य बिन्दु नया आक्राम्य स्थल भी नहीं था क्योंकि बाढ़ गश्ती नियमावली के अनुसार नदी तटबंध के टो या स्लोप या फिर तटबंध के बहुत निकट आ जाय, तब तटबंध को आक्राम्य घोषित किया जाता है। ज्ञातव्य हो कि ललबकैया दायाँ मार्जिनल बाँध (ग्राम-बलुआ) की नदी से न्यूनतम दूरी 850 मीटर से भी अधिक है। ललबकैया दायाँ तटबंध (ग्राम-सपही) की नदी से न्यूनतम दूरी 1कि0मी0 से भी अधिक है। ऐसी परिस्थिति में आलोच्य बिन्दु कदापि आक्राम्य नहीं हो सका।

जिला प्रशासन के साथ दो बार संयुक्त निरीक्षण किया गया। आलोच्य स्थल आक्राम्य बिन्दु के रूप में नहीं पाया। जबकि मार्जिनल बाँध का 1.5कि0मी0 पर बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का भंडारण करके रखा गया था। इस प्रकार प्रशासन के साथ संयुक्त निरीक्षण में भी आलोच्य बिन्दु को आक्राम्य बिन्दु नहीं माना गया।

मो0 नेहाल अहमद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से प्राप्त बचाव बयान पर विभागीय मंतव्य की मांग की गई, जिसमें विभाग द्वारा कहा गया है कि श्री दिनेश कुमार चौधरी, तत्कालीन मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर के पत्रांक-01(सी) दिनांक-13.08.2017 से स्पष्ट है कि मो0 नेहाल अहमद दिनांक-12.08.2017 को लगभग 08ः00 बजे रात्रि से सम्पर्क में थे परन्तु उनके द्वारा ललबकैया नदी के जल स्तर के लगातार वृद्धि होने की सूचना संभवतः मुख्य अभियंता को नहीं दी गयी।

मो0 नेहाल अहमद के उपर दूसरा आरोप यह है कि तटबंध के कॉम्पलेक्स बिन्दु की पहचान कर इनके द्वारा इसकी पूर्व सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी। इस संबंध में स्पष्ट किया गया है कि उनके द्वारा आक्राम्य स्थल चिन्हि्‌त होने की बात अस्वीकार की गयी है। जबकि मुख्य अभियंता द्वारा बाढ़ गश्ती निमयावली 2017 में ललबकैया नदी के गोआबाड़ी में मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50कि0मी0 तक लोकेशन को आक्रम्य स्थल की सूची में रखा गया है। दिनांक 13.08.17 को हुए टूटान स्थल का लोकेशन भी मार्जिनल बाँध के 3.00कि0मी0 (ग्राम-बलुआ) के पास ही है। स्पष्ट है कि उनके द्वारा आक्राम्य स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों को भंडारण नहीं किया गया एवं स्थल पर आवश्यकतानुसार सामग्रियाँ उपलब्ध नहीं होने से बाढ़ संघर्षात्मक कार्य पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा एवं अंततः ओवरटॉपिंग के कारण बाँध153 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 टूट गया। अतएव मो0 नेहाल अहमद का यह आचरण बाढ़ संघर्षात्मक जैसे महत्वपूर्ण कार्य के प्रति उदासीनता, लापरवाही एवं संवेदनहीनता को दर्शाता है। अतः इनका बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं है।

मो0 नेहाल अहमद से प्राप्त बचाव बयान एवं उनके विरूद्ध प्राप्त विभागीय मंतव्य के आलोक में संचालन पदाधिकारी द्वारा अपना जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। जिसमें निम्न बातें कहीं गई हैंः-

दिनांक 13.08.2017 को कि0मी0 3.00 के पास बलुआ ग्राम में दायाँ मार्जिनल बाँध तथा सपही के ललबकैया दायाँ बाँध पानी के ओवरटॉप करने के कारण टूट गया। मुख्य अभियंता के पत्रांक-01(सी) दिनांक 13.08.2017 जो प्रपत्र-'क' गठन का आधार है में वर्णित है कि कार्यपालक अभियंता मो0 अहमद द्वारा दिनांक 13.08.2017 को 02ः50बजे सूचना दी गई कि पानी के ओवरटॉप करने के कारण कि0मी0 3.00के पास ललबकैया नदी का दायाँ मार्जिनल बाँध टूट गया है। यद्यपि कार्यपालक अभियंता उनके सम्पर्क में थे किन्तु नदी के निरंतर बढते जल स्तर की सूचना उन्हें नहीं दी गई। फलस्वरूप पानी के ओवरटॉप करने के कारण तटबंध टूट गया। आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि उन्होंने सम्पूर्ण तथ्यों की जानकारी दूरभाष से उच्चाधिकरियों को लगातार देते रहे। जल स्तर में वृद्धि की जानकारी होने एवं उससे उत्पन्न होने वाले खतरे को समझते हुए ही मुख्य अभियंता ने अपने मोबाईल संख्या अध्यक्ष, बाढ़ संघर्षात्मक बल एवं तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, श्री योगेश्वर प्रसाद, बाढ़ प्रमंडल, सिकरहना को दिनांक 12.08.17 की रात्रि में मार्जिनल बाँध ग्राम-बलुआ के लिए प्रस्थान करने का निर्देश दिया।

मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(सी) दिनांक 13.08.17 से स्पष्ट है कि आरोपित पदाधिकारी दिनांक 12.08.17 की रात्रि 08ः00 बजे से मुख्य अभियंता के सम्पर्क में थे किन्तु नदी के जलस्तर में हो रही निरन्तर वृद्धि की सूचना नहीं दी गई। जब बाँध टूट गया तब इसकी सूचना प्रातः 02ः50 बजे दी गई। बाँध टूटने की सूचना प्राप्त होने पर मुख्य अभियंता द्वारा अध्यक्ष, बाढ़ संघर्षात्मक बल को कटाव स्थल पर पहुँचने का निर्देश दिया गया। इस प्रकार आरोपित पदाधिकारी का यह कहना कि जल स्तर में वृद्धि होने की सूचना प्राप्त होने पर मुख्य अभियंता द्वारा अध्यक्ष, बाढ़ संघर्षात्मक बल को भेजा गया, स्वीकार योग्य नहीें है।

आरोप का दूसरा भाग यह है कि तटबंध के कॉम्पलेक्स बिन्दु की पहचान कर उसकी पूर्व सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। इस संबंध में आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि जिला प्रशासन के साथ दो बार संयुक्त निरीक्षण किया गया। आलोच्य स्थल आक्राम्य बिन्दु के रूप में नहीं पाया गया जबकि संयुक्त निरीक्षण में चिन्हि्‌त अन्य आक्राम्य स्थलों पर सामग्री का भंडारण करके रखा गया। विभागीय अभिमत के कहा गया है कि मुख्य अभियंता द्वारा बाढ़ गश्ती नियमावली 2017 में ललबकैया नदी के गोआबाड़ी में मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50कि0मी0 तक के लोकेशन को आक्राम्य की सूची में रखा गया है। दिनांक 13.08.17 के हुए टूटान स्थल का लोकेशन भी मार्जिनल बाँध के कि0मी0 3.00 पर है। स्पष्ट है कि इनके द्वारा आक्राम्य स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का भंडारण नहीं किया गया एवं स्थल पर आवश्यकतानुसार सामग्रियों का भंडारण नहीं होने से बाढ़ संघर्षात्मक कार्य पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा। अंततः ओवरटॉपिग के कारण बाँध टूट गया।

(क) बिहार लोक निर्माण संहिता Vol- I में Duties of officers of the Public work department के तहत कंडिका 30, 33 एवं 143 का अभिकथन निम्न है :-

कंडिका- 30ः-The Executive unit of Department is the division, in charge of an Executive Engineer (Divisional Officer), who is responsible to the superintending Engineer for execution and management of all works in his division.

कंडिका- 33ः- Every Executive Engineer is required to report immediately to the superintending Engineer any important accident or unusual occurrence connected with his division and to state how he has acted is condequence (See also paragraph 143)

कंडिका- 143 :- Serious accidents should be reported to the Superintendent Engineer (See paragraph 33) and also at the discretion of the Executive engineer to the state govt. direct Executive engineers and other officers or subordinates in charge of works should furnish immediate information to the proper civil authorities on the occasion of very serious accident and incase of death on the spot, they should not allow the body to be removed till on enquiry has been held (see also Rule 33 of Bihar Financial Rule vol-I)

(ख) सरकार के मुख्य सचिव, बिहार पटना के पत्रांक-1934, दिनांक 11.05.2017 से निर्गत बाढ नियंत्रण आदेश 2017 के कंडिका 8.02 का अभिकथन "जब किसी तटबंध की सुरक्षा पर गंभीर खतरा हो जाय तो मुख्य अभियंता तथा उनके अधीनस्थ कार्यपालक अभियंता स्तर तक के पदाधिकारी स्थिति की सूचना तुरंत संबंधित जिला पदाधिकारी को देंगे तथा इस स्थिति से केन्द्रीय बाढ़ नियंत्रण कोषांग, पटना को भी अवगत करायेंगे जिसमें इस आशय का भी जिक्र होगा कि संभावित टूटान से कितने गाँव प्रभावित होंगे।

कंडिका 3.02 का अभिकथन-जल संसाधन विभाग के क्षेत्रीय अभियंता/कर्मी पूर्व की भाँति तटबंधों, संरचनाओं इत्यादि पर नियमित गश्ती करेंगे एवं सतत चौकसी बरतेंगे।154 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 जब गश्ती नियमावली 2017 में मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50 तक के लोकेशन को आक्राम्य सूची में रखा गया था तो आरोपित पदाधिकारी का यह कहना कि संयुक्त निरीक्षण में आलोच्य स्थल को टूटान बिन्दु के रूप में नहीं पाया गया, स्वीकार योग्य नहीं है। अतएव प्रपत्र-'क' में गठित आरोप प्रमाणित होता है।

संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा विभागीय स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1032, दिनांक 11.05.2018 द्वारा मो0 नेहाल अहमद से द्वितीय कारण पृच्छा की गई।

उक्त के आलोक में मो0 नेहाल अहमद द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 08.06.18 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई हैं :-

(i) श्री अहमद द्वारा बचाव बयान के कंडिका (1) (a) से (d) तक में विभागीय कार्यवाही के संचालन, अभिलेखों की माँग के संदर्भ में सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 12196 दिनांक 07.09.16 को उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उन्हें वांछित अभिलेख उपलब्ध नहीं कराया गया। कंडिका (e), (f), (g) एवं (h) में सामान्य प्रशासन विभाग के पत्रांक 1893 दि॰ 14.06.11 की प्रति संलग्न करते हुए कहा गया है कि संचालन पदाधिकारी समीक्षा के क्रम में प्रस्तुत बचाव बयान में प्रत्येक बिन्दु पर बिना विचार किये मंतव्य अभिलेखित करते हुए जाँच प्रतिवेदन दिया गया। (ii) कंडिका-2 (क) में कहा गया है कि सिमित सहायक अभियंता/कनीय अभियंता की सहायता से दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए बाँधों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया तथा बाढ़ की स्थिति से निरंतर उच्चाधिकारियों को भी अवगत कराते रहने का प्रयास किया गया। मार्जिनल बाँध के कि॰मी॰ 3.0 ग्राम बलुआ में भारत नेपाल सीमा रेखा पर मोबाईल नेटवर्क निरन्तर काम नहीं करता था। जल वृद्धि की सूचना मुख्य अभियंता एवं अन्य पदाधिकारी को दिनांक 12.08. 17 एवं 13.08.17 को मध्य रात्रि तक निजि मो॰ 9934617549 एवं सरकारी मो॰ 7463889659 पर हुई वार्ता की क्रम में दी गयी थी। संचालन पदाधिकारी द्वारा मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। अन्यथा श्री योगेश्वर प्रसाद सिंह, अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल के मोबाईल का CDR देख कर पता लगाते। आक्राम्य स्थल पर बाढ़ संघर्षात्मक सामग्री के भंडारण नहीं करने संदर्भ में कहा गया है कि दायाँ मार्जिनल बाँध के कि॰मी॰ 1.5 का आक्राम्य स्थल के रूप में पहचान कर निरीक्षण प्रतिवेदन समर्पित किया गया था। अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 577 दिनांक 08.06.17 के आलोक में सामग्री का भंडारण गोआबाडी में की गयी थी। उक्त भंडारित सामग्री से प्रश्नगत बिन्दु मार्जिनल बाँध के 3.0 कि॰मी॰ पर बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराया गया है। विभागीय मंतव्य के संबंध में कहा गया है कि ललबकैया बाँध के 3.0 कि॰मी॰ पर लगातार बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराते हुए बचाने का प्रयास किया गया। परन्तु जल स्तर बढ़ते रहने के कारण Over Top करने लगा। ओभर टॉपिंग बाँध के लम्बे भाग में होने के कारण कि॰मी॰ 3.0 पर दिनांक 13.08.17 के पूर्वाह्‌न 2.30 बजे बाँध टूट गया। किसी की लापरवाही से बाँध नहीं टूटा है। उनके विरूद्ध न तो अधीक्षण अभियंता न ही जिला पदाधिकारी द्वारा ही कोई प्रतिकूल टिप्पणी अंकित की गयी है। इस स्थल पर दिनांक 12.08.17 एवं 13.08.17 को कि॰मी॰ 3.0 पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य का NR विभाग एवं उच्च पदाधिकारी को भेजा गया है। साथ ही प्रपत्र 24 भी विभाग को समर्पित है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में उद्धित बिहार लोक निर्माण संहिता के कंडिका 30, 33 तथा 143 के संदर्भ में कहा गया है कि उक्त कंडिकाओं का पूर्ण अनुपालन करते हुए अधीक्षण अभियंता को सारी सूचनाएँ दी गयी है। मुख्य सचिव के पत्रांक 1934 दि॰ 11.05.17 से निर्गत बाढ़ नियंत्रण आदेश 2017 की कंडिका 8.02 के अनुपालन के संदर्भ में दिनांक 08.11.17 को दिये गये बयान के कंडिका-9 में साक्ष्य के साथ विचार पूर्वक निवेदन किया गया है कि वांछित सूचनाएँ विभाग एवं उच्च पदाधिकारी को ससमय दी गयी है। संचालन पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.02 के संदर्भ में कहा गया है कि क्षेत्रीय अभियंता, कर्मी पूर्व की भाँति तटबंधाें के संरचनाओं की नियमित गश्ती एवं चौकसी रहने के आदेश का पालन दृढता से किया गया है। जिसका विवरण विस्तार पूर्वक पूर्व के बचाव बयान में किया गया है। अतएव आरोप से मुक्त किया जाय।

मो0 नेहाल अहमद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

मो0 नेहाल अहमद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध जल निस्सरण प्रमंडल, मोतिहारी के अन्तर्गत दिनांक 13.08.17 को ललबकैया नदी के कि॰मी॰ 3.0 के पास बलुआ तथा मार्जिनल बाँध के सपही ग्राम के पास हुए टूटान से संबंधित आरोप का मुख्य अंश निम्न है :-

(i) ललबकैया नदी के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि की सूचना उनके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गयी।

(ii) तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दु का पहचान कर इसकी पूर्व सूचना उच्चाधिकारी को नहीं दी गयी न ही उस स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का पूर्व में भंडारण ही किया गया।

संचालन पदाधिकारी के द्वारा मो0 नेहाल अहमद के विरूद्ध आरोप के विरूद्ध उपरोक्त आरोप के दोनों अंशों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है।

(i) अंश 'क' के संदर्भ में मो0 नेहाल अहमद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता द्वारा आरोप से संदर्भित वही तथ्य दिया गया है जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। जिस पर विभाग द्वारा बाढ़ नियंत्रण, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना के द्वारा गठित मंतव्य से सहमत होते हुए संचालन पदाधिकारी को उपलब्ध कराया गया है। मो0 नेहाल अहमद द्वारा कहा गया है कि वे मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण,155 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 मुजफ्फरपुर के सम्पर्क में थे एवं नदी के जल स्तर में हो रहे लगातार वृद्धि की सूचना निरंतर रूप से मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, मुजफ्फरपुर को दिया जा रहा था। को संचालन पदाधिकारी ने निम्न तथ्यों के आलोक में अस्वीकार योग्य माना है। मुख्य अभियंता के पत्रांक 1(C) दिनांक 13.08.17 में कहा गया है कि आरोपित पदाधिकारी सम्पर्क में थे परन्तु नदी के जलस्तर में हो रही निरंतर वृद्धि की सूचना नहीं दी गयी। जब बाँध टूट गया तब इसकी सूचना प्राप्त होने पर अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल को स्थल पर पहुँचने का अनुरोध किया गया। साथ ही मुख्य सचिव के पत्रांक 1934 दिनांक 11. 05.17 से निर्गत बाढ़ नियंत्रण आदेश 2017 के कंडिका 8.02 में स्पष्ट उल्लेख है कि जब किसी तटबंध पर गंभीर खतरा हो जाय तो मुख्य अभियंता तथा अधीनस्थ कार्यपालक अभियंता तक के पदाधिकारी को स्थिति की सूचना संबंधित जिला पदाधिकारी को देंगे तथा केन्द्रीय बाढ़ नियंत्रण कोषांग, पटना को भी अवगत करायेंगे। जिसमें अभिलिखित हो कि टूटान के कारण कितने गाँव प्रभावित होगा। साथ ही कंडिका 3.02 में निहित निदेश कि पूर्व के भाँति तटबंधों को नियमित गश्ती एवं सतत चौकसी बरतना किया जाना है। मो0 अहमद द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया। जिससे परिलक्षित हो सके कि इनके द्वारा नदी के जल स्तर में हो रही वृद्धि की सूचना ससमय उच्चाधिकारी एवं जिला पदाधिकारी को दी गयी हो तथा मुख्य सचिव के पत्रांक 1934 दिनांक 11.05.17 के कंडिका 8.02 एवं 3.02 का अनुपालन करते हुए प्रतिवेदन दी गयी हो। अतएव संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप के इस अंश को प्रमाणित माना जाता है।

(ii) दूसरा अंश ः- आरोप के इस अंश के संबंध में मो0 नेहाल अहमद द्वारा कहा गया है कि जिला पदाधिकारी के संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन के अनुसार तथा अधीक्षण अभियंता के पत्रांक 577 दि॰ 08.06.17 के आलोक में आक्राम्य स्थल 1.5 कि॰मी॰ गोबावारी पर सामग्री का भंडारण किया गया था। आलोच्य स्थल मार्जिनल बाँध कि॰मी॰ 3.0 ग्राम बलुआ एवं ललबकैया दायाँ बाँध में सपही पूर्व से आक्राम्य स्थल नहीं था। न ही आक्राम्य स्थल के श्रेणी में था, को संचालन पदाधिकारी ने मुख्य अभियंता, मुजफ्फरपुर के स्तर से निर्गत बाढ़ गश्ति नियमावली 2017 में मार्जिनल बाँध के कि॰मी॰ 2.40 से 3.50 तक के लोकेशन को आक्राम्य स्थल के सूचि में रखा गया था, के आलोक में स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप का इस अंश को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। संचिका में रक्षित अभिलेख के आलोक में सहमत हुआ जा सकता है एवं आरोप के इस अंश को प्रमाणित माना जाता है।

समीक्षोपरांत उपर वर्णित तथ्यों के आलोक में उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए मो0 नेहाल अहमद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, जल निस्सरण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज को विभागीय अधिसूचना संख्या-2140, दिनांक 25.09.2018 द्वारा निलंबन से मुक्त किया गया एवं बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्शोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1540, दिनांक 19.07.2019 द्वारा निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए संसूचित किया गया - "कालमान वेतनमान में चार वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी।" उक्त दण्ड के विरूद्ध मो0 नेहाल अहमद, कार्यपालक अभियंता ने अपने पत्रांक-शून्य दिनांक 26.08.2019 से संसूचित दण्ड के विरूद्ध पुनर्विलोकन अर्जी विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी है - मो0 नेहाल अहमद, कार्यपालक अभियंता के पुनर्विलोकन अर्जी के कंडिका 1 से 9 तक में इनके विरूद्ध की गयी कार्रवाई से लेकर विभागीय कार्यवाही का संचालन एवं दण्ड अधिरोपण तक का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

आरोप का प्रथम अंश-मो0 अहमद, कार्यपालक अभियंता द्वारा आरोप के प्रथम अंश यथा ललबकैया नदी के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि की सूचना उनके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं देने के संदर्भ में कहा गया कि संचालन पदाधिकारी का अंतिम जाँच प्रतिवेदन में उल्लेखित भवदीय का समीक्षा खण्ड प्रथम एवं द्वितीय अनुच्छेद का अवलोकन प्रासंगिक होगा जिससे निम्नलिखित तथ्यों का पता चलता है-

मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(c) दिनांक 13.08.17 में उद्धित अभिकथन के साथ-साथ उनके बचाव बयान में उद्धित तथ्यों को अंकित किया गया है एवं उनके बचाव बयान को अस्वीकार कर दिया गया। मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(c) दिनांक 13.08.17 में उद्धृत अभिकथन एवं उनके बचाव बयान में उद्धित तथ्यों की सत्यता की कोई जाँच नहीं की गयी जो सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा समय-समय पर दिये मार्गनिदेश का प्रतिकूल है। परिणाम स्वरूप विभागीय कार्यवाही की सम्पूर्ण प्रक्रिया एकपक्षीय हो गयी है।

उनके द्वारा अधीक्षण अभियंता महोदय को भी जल स्तर में वृद्धि की सूचना दी जाती रही थी। यही कारण है कि उनके द्वारा इनके विरूद्ध किसी प्रकार का कोई स्पष्टीकरण/प्रतिवेदन निर्गत नहीं किया गया। इस संदर्भ में बाढ़ नियंत्रण अंचल, सीतामढ़ी के गेज पंजी 2017 का अवलोकन करना चाहेंगे। जिसे स्पष्ट है कि दिनांक 12.08.17 से दिनांक 13.08.17 तक हो रही जल स्तर में वृद्धि की सूचना अधीक्षण अभियंता को भी दी गयी थी। अंचलीय कार्यालय के वितंतु संचालक द्वारा वायरलेस के माध्यम से ततसंबंधित गेज पठन की सूचना मुख्य अभियंता कार्यालय, मुजफ्फरपुर के बाढ़ नियंत्रण कक्ष को सम्प्रेषित की गयी थी। न्यायहित में इसकी पुष्टि मुख्य अभियंता कार्यालय में रक्षित गेज पंजी 2017 से भी की जा सकती है। दिनांक 12.08.17 से 13.08.17 तक नदी का जलस्तर अप्रत्याशित रूप से तेजी से बढते हुए अपने पूर्व के अधिकतम जलस्तर 72.84 से 1.0मी0 बढ़कर 73.80 तक पहुँच गया। नदी का पानी ओवर टॉप करने के कारण बाँध क्षतिग्रस्त हो गया। आरोप का दूसरा अंश- जो तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दु का पहचान कर इसकी पूर्व सूचना उच्चाधिकारी को नहीं दी गयी, न ही उस स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का पूर्व में भंडारण ही किया गया।

मुख्य अभियंता द्वारा निम्न तथ्य प्रतिवेदित किया गया है कि दिनांक 12.08.17 को रात्रि में मैं लगातार कार्यपालक अभियंता, जल निस्सरण प्रमंडल, मोतिहारी के सम्पर्क में था तथा उनके द्वारा सूचना दी जा रही थी कि ललबकैया दायाँ मार्जिनल बाँध में सीपेज एव पाईपिंग को कंट्रोल करने के लिये बेल बना रहे है। उक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि156 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (क) बाढ़ का पानी से टूटान के पूर्व इस कमजोर बिन्दु ललबकैया दायाँ मार्जिनल बाँध में बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराया जा रहा था।

(ख) बाढ़ के पानी से टूटान के पूर्व मुख्य अभियंता निरन्तर इनके सम्पर्क में थे। (ग) बाढ़ को पानी से टूटान के पूर्व मुख्य अभियंता को निरन्तर इस कमजोर बिन्दु अर्थात कम्पलेक्स बिन्दु पर चल रहे बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की सूचना उचित माध्यम से दी जा रही थी। मुख्य अभियंता के स्तर से निर्गत बाढ़ गस्ती नियमावली 2017 में मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50 तक के लोकेशन को अक्राम्य स्थल की सूची में रखा गया था जबकि टूटान बिन्दु मार्जिनल बाँध के कि0मी0 3.0 पर अवस्थित है। अर्थात बाढ़ के पानी के पूर्व मुख्य अभियंता को इस कम्पलेक्स बिन्दु की जानकारी थी।

स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का पूर्व में भंडारण नहीं किये जाने के संदर्भ में कहा गया है कि इनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में समावेश नहीं है। अर्थात उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र में इस तरह का कोई आरोप नहीं लगाया गया था। उनके विरूद्ध गठित आरोप के साथ संलग्न एक मात्र साक्ष्य जो कि मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(c) दिनांक 13.08.17 है जो आरोप के दूसरे अंश को सम्पुष्ट नहीं करता है।

इनके बचाव बयान के कंडिका 11(ंa) से (12) तक में इनके द्वारा टूटान की घटना को प्राकृतिक आपदा बताया गया है। किन्तु समीक्षा के क्रम में इस पर विचार नहीं किया गया।

दिनांक 14.08.17 को बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर अन्तर्गत हुए टूटान के उपरांत दिनांक 30.08.17 को प्रधान सचिव द्वारा MJC No. 2270/2016 में दायर Supplimentary show cause में उल्लेख किया गया है कि इस बाढ़ अवधि में बागमती नदी 2014 के पूर्ववर्ती रिकार्ड उच्चतम जलस्तर को पार कर 26से0मी0 उपर बह रही थी। इनका कार्यक्षेत्र बागमती प्रमंडल, रून्नीसैदपुर के U/S भाग में अवस्थित है एवं स्वभाविक रूप से इनके कार्यक्षेत्र का पानी बागमती नदी में जाती है। ऐसी स्थिति में प्रधान सचिव द्वारा उल्लेखित तथ्यों के आलोक में इनके कार्यक्षेत्राधीन हुई टूटान को प्राकृतिक आपदा का मामला बनता है। इसके अतिरिक्त बिहार सरकारी सेवक (वर्गीक्रण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 27(2) (ख), 27(2)(ग) एवं 25 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इनके विरूद्ध लगाये गये आरोप का कोई अंश/लांक्षण किसी भी रूप से प्रमाणित नहीं होता है। अतः तथ्य पूरक पुनर्विलोकन अर्जी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए दण्ड निर्गत की तिथि से निरस्त करना नियमानुकूल एवं न्यायोचित है।

मो0 नेहाल अहमद, कार्यपालक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये -

आरोप का प्रथम अंश- जो ललबकैया नदी के जलस्तर में लगातार हो रहे वृद्धि की सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं देने से संबंधित है।

मो0 नेहाल अहमद द्वारा आरोप के इस अंश के संदर्भ में लगभग वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वारा अपने द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया था। जिसकी समीक्षा पूर्व में की जा चुकी है एवं आरोप प्रमाणित पाया गया है। इसके अतिरिक्त कहा गया है कि नदी के जलस्तर में हो रहे वृद्धि की सूचना मुख्य अभियंता के साथ-साथ अधीक्षण अभियंता को भी दी जा रही थी। यही कारण है कि अधीक्षण अभियंता द्वारा कोई प्रतिवेदन/स्पष्टीकरण निर्गत नहीं किया गया। जलस्तर में वृद्धि की सूचना अंचलीय कार्यालय के बेतार चालक द्वारा वायरलेस के माध्यम से तत्संबंधित गेज पठन की सूचना मुख्य अभियंता के स्तर पर गठित बाढ़ नियंत्रण कक्ष को संप्रेषित की गयी थी, जिसकी पुष्टि मुख्य अभियंता कार्यालय से करायी जा सकती है। मुख्य अभियंता के पत्रांक-1(c) दिनांक 13.08.17 में कहा गया है कि आरोपित पदाधिकारी सम्पर्क में थे परन्तु नदी के जलस्तर में निरंतर हो रही वृद्धि की सूचना नहीं दी गयी। जब बाँध टूट गया तब इसकी सूचना प्राप्त होने पर अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल को स्थल पर पहुँचने का अनुरोध किया गया।

इससे स्पष्ट है कि मुख्य सचिव के पत्रांक-1934, दिनांक 11.05.17 से निर्गत बाढ़ नियंत्रण आदेश 2017 के कंडिका 8.02 में स्पष्ट उल्लेख है कि जब किसी तटबंध पर गंभीर खतरा हो जाय तो तुरन्त मुख्य अभियंता तथा अधीक्षण अभियंता, कार्यपालक अभियंता तक के पदाधिकारी को सूचना देते हुए जिला पदाधिकारी को देंगे। साथ ही केन्द्रीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष पटना को अवगत करायेंगे। साथ ही कंडिका 3.02 में निहित निदेश कि पूर्व के भाँति तटबंध को नियमित गश्ती एवं सतत चौकसी बरती जानी है। आरोपी द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है जिससे परिलक्षित हो सके कि इन दोनों पदाधिकारी द्वारा नदी के जलस्तर में हो रहे वृद्धि की सूचना अपने उच्च पदाधिकारी यथा अधीक्षण अभियंता/मुख्य अभियंता एवं जिला पदाधिकारी को दी गयी है न ही मुख्य अभियंता के पत्रांक-1934, दिनांक 11.05.17 का अनुपालन करते हुए प्रतिवेदन ही दिया गया।

उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त मो0 अहमद द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम 17,27(2)(ख), 27(2)(ग), 24(2) एवं 25 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उक्त नियम के अनुरूप उनके पूर्व के बचाव बयान पर न्यायसंगत निर्णय नहीं लिया गया है स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोप का प्रथम अंश यथा नदी के जलस्तर में हो रहे लगातार वृद्धि की सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं देने का आरोप प्रमाणित है। आरोप का द्वितीय अंश- यथा तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दु का पहचान कर इसकी पूर्व सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं दी गयी एवं न ही उस स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्री का पूर्व में भंडारण ही किया गया।

इस आरोप के संदर्भ में मो0 नेहाल अहमद द्वारा वही तथ्य दिया गया है जो इनके द्वितीय कारण पृच्छा में दिया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में की गयी एवं आरोप प्रमाणित पाया गया है कि जिला पदाधिकारी के संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन के अनुसार तथा अधीक्षण अभियंता के पत्रांक-577, दिनांक 08.06.17 के आलोक में आक्राम्य स्थल 1.50 कि0मी0 गोबावारी पर157 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 सामग्री का भंडारण किया गया था आलोच्य टूटान स्थल मार्जिनल बाँध के कि0मी0 3.0 बलुआ एवं ललबकैया दायाँ बाँध में सपही पूर्व से आक्राम्य स्थल नहीं था न ही आक्राम्य स्थल की श्रेणी में था को संचालन पदाधिकारी ने मुख्य अभियंता के स्तर पर निर्गत बाढ़ गठित नियमावली 2017 के मार्जिनल बाँध के कि0मी0 2.40 से 3.50 तक के लोकेशन को आक्राम्य स्थल के सूची में रखा गया था के आलोक में स्वीकार योग्य नहीं मानते हुए आरोप प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। उपरोक्त से स्पष्ट है कि टूटान बिन्दु 3.0 कि0मी0 पर पूर्व से सामग्रीे का भंडारण इनके द्वारा नहीं कराया गया एवं बाँध दिनांक 13.08.17 को क्षतिग्रस्त हो गया। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में इनका पुनर्विलोकन अर्जी स्वीकार योग्य नहीं है।

समीक्षोपरांत वर्णित तथ्यों के आलोक में मो0 नेहाल अहमद, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता का पुनर्विलोकन अर्जी स्वीेकार योग्य नहीं है एवं इनके विरूद्ध गठित आरेाप के दोनों अंश यथा नदी में लगातार जलस्तर में हो रही वृद्धि की सूचना उच्च पदाधिकारी को नहीं देने एवं तटबंध के कम्पलेक्स बिन्दुओं को पहचान कर इसकी पूर्व में सूचना नहीं देने एवं उक्त स्थल पर आवश्यक बाढ़ संघर्षात्मक सामग्रियों का पूर्व में भंडारण नहीं करने का आरोप प्रमाणित होता है।

अतएव सरकार द्वारा मो0 नेहाल अहमद, तत0 कार्यपालक अभियंता, जल निस्सरण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकार करते हुए पूर्व में विभागीय अधिसूचना-1540, दिनांक 19.07.2019 से निर्गत दण्डादेश यथा "कालमान वेतनमान में चार वेतन प्रक्रम पर स्थायी रूप से अवनति। भावी वेतनवृद्धि देय नहीं होगी" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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18 फरवरी 2020

सं0 22/नि॰सि॰(पू॰)-01-14/2009-269--श्री मदन मोहन द्विवेदी (आई0डी0-3608), तत्का0 सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध जल निस्सरण प्रमंडल, राघोपुर अन्तर्गत मधेपुरा जिला के कुमारखण्ड प्रखण्डान्तर्गत ड्रेनेज श्रीनगर पोखरिया के नजदीक पुरौनी कुंजर टोली के समीप निर्मित पुलों के गुणवत्ता में कमी, क्षतिग्रस्त होने एवं सरकारी राशि का गबन के आरोप से संबंधित परिवाद की समीक्षोपरांत लगाये गये आरोप की जाँच विभागीय उड़नदस्ता से कराने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय पत्रांक-836, दिनांक 27.05.2010 अधीक्षण अभियंता, उड़नदस्ता अंचल को प्रेषित किया गया, उड़नदस्ता दल में आप भी सदस्य थे। उड़नदस्ता दल द्वारा जाँचोपरांत पत्रांक-31, दिनांक 05. 09.2011 द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। इस तरह जाँच प्रतिवेदन समर्पित करने में लगभग 16 माह का समय लगा। विलंब से जाँच प्रतिवेदन समर्पित करने के कारण कुछ अभियंताओं का मामला कालबाधित हो गया।

अतएव विलंब से जाँच प्रतिवेदन समर्पित करने के आरोप के लिए श्री मदन मोहन द्विवेदी कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, लालगंज सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-185, दिनांक 24.01.2018 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

विभागीय कार्यवाही के संचालनोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया, जिसमें आरोप को अप्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत जाँच प्रतिवेदन समर्पित करने में विलंब के लिए श्री द्विवेदी, तत्का0 कार्यपालक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत को "चेतावनी" का दण्ड जिसकी प्रविष्टि सेवापुस्त में दर्ज की जाएगी देने का निर्णय लिया गया।

सक्षम प्राधिकार द्वारा लिए गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री मदन मोहन द्विवेदी, तत्का0 सहायक अभियंता, उड़नदस्ता अंचल-01, सम्प्रति सेवानिवृत को "चेतावनी का दण्ड जिसकी प्रविष्टि सेवापुस्त में दर्ज की जाएगी" अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 14 फरवरी 2020 सं0 22/नि॰सि॰(सम॰)-02-03/2018-262--श्री सुरेश्वर बैठा (आई0डी0-जे 8968), तत्कालीन सहायक अभियंता स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल, खगड़िया के विरूद्ध जिलास्तरीय बैठको में बिना पूर्व सूचना के अनुपस्थित रहने, मुख्यमंत्री सात (07) निश्चय योजना से संबंधित गली-नाली निर्माण योजनाओं के प्राक्कलन निर्माण, निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण में कोताही बरतने, मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के अन्तर्गत खगड़िया के विधानसभा क्षेत्र से संबंधित वर्ष 2015-16 की योजनाओं को लंबित रखने, प्रशासनिक स्वीकृति के बावजूद भी कई योजनाओं में कार्य प्रारंभ नहीं करने संबंंधित जिलाधिकारी, खगड़िया द्वारा प्रतिवेदित आरोप को समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई एवं प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोप के लिए विभागीय अधिसूचना सं०-337, दिनांक 21.02.2019 द्वारा श्री बैठा को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय पत्रांक-480, दिनांक 05.03.2019 द्वारा श्री बैठा से आरोप पत्र के साथ स्पष्टीकरण किया गया। तदालोक में श्री बैठा द्वारा अपना जवाब विभाग में समर्पित किया गया। श्री बैठा के जवाब की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत श्री बैठा के विरूद्ध आरोप प्रमाणित नहीं पाया गया एवं इस प्रकार श्री बैठा के स्पष्टीकरण को स्वीकार योग्य पाया गया। जिसके आलोक में श्री बैठा को निलंबन मुक्त करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया।158 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 उक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री सुरेश्वर बैठा, तत्का0 सहायक अभियंता (आई0डी0-जे 8968) स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल, खगड़िया को तत्काल प्रभाव से निलंबन मुक्त करने का निर्णय संसूचित किया जाता है। बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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13 फरवरी 2020

सं0 22/नि0सि0(विविध)वीर-21-24/2017-258--श्री शिवनाथ रूद्र, लेखालिपिक, पूर्वी तटबंध प्रमंडल, वीरपुर को एक अल्पसंख्यक महिला कर्मी के साथ अभद्र व्यवहार करने के आरोप में अगस्त 2016 में वीरपुर से मोहनियाँ स्थानांतरित किया गया था। श्री रूद्र द्वारा उक्त स्थानांतरण के विरूद्ध माननीय उच्च न्यायालय में याचिका दायर किया गया, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके विरूद्ध दायर एल0पी0ए0 में माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा स्थानांतरण आदेश को इस आधार पर रद्‌द कर दिया गया कि इनका स्थानांतरण आरोप के साथ किया गया है। विभाग चाहे तो कार्य हित में स्थानांतरण कर सकता है।

श्री रूद्र, लेखा लिपिक का स्थानांतरण नवम्बर 2016 में कार्यहित में वीरपुर से मोहनियाँ करने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया। साथ ही श्री श्रीनिवास प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, पूर्वी तटबंध प्रमंडल, वीरपुर को इन्हें एक सप्ताह के अंदर विरमित करने का निदेश दिया गया किन्तु श्री श्रीनिवास प्रसाद, कार्यपालक अभियंता द्वारा इन्हें विरमित नहीं किया गया।

दूरभाष पर श्री श्रीनिवास प्रसाद, कार्यपालक अभियंता से पूछने पर जवाब दिया गया कि मार्च 2017 के बाद उन्हें विरमित किया जायेगा। इस निमित्त श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता से स्पष्टीकरण पूछा गया। किन्तु श्री प्रसाद द्वारा जवाब नहीं दिया गया। फलतः श्री प्रसाद, कार्यपालक अभियंता को विभागीय आदेश की अवहेलना करने के प्रमाणित आरोप के लिए सरकार के स्तर से निम्न दण्ड दिया गया (विभागीय अधिसूचना संख्या-547, दिनांक 19.04.17 द्वारा) ।

(i) निंदन वर्ष 2016-17 (ii) एक वेतन वृद्धि असंचयात्मक प्रभाव से अवरूद्ध। उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री श्रीनिवास प्रसाद द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन विभाग में समर्पित किया गया। पुनर्विलोकन अभ्यावेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। जिसमें पाया गया कि श्री प्रसाद द्वारा सरकारी आदेश का अनुपालन नहीं करके अनुशासनहीनता बरती गयी है। उक्त के आलोक में इनके द्वारा दिये गये पुनर्विलोकन अभ्यावेदन को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया।

अतः उक्त निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-1996, दिनांक 13.11.17 द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन को अस्वीकृत कर दिया गया।

उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री श्रीनिवास प्रसाद द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में सी0डब्लू0जे0सी0 सं०-11922/17 दायर किया गया। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 22.07.19 को न्याय निर्णय पारित किया गया। जिसके आलोक में श्री प्रसाद के स्पष्टीकरण को स्वीकार करते हुए विभागीय अधिसूचना संख्या-547, दिनांक 10.04.17 द्वारा निर्गत दण्डादेश एवं विभागीय अधिसूचना संख्या-1996 दिनांक 13.11.17 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी को निरस्त किये जाने संबंधी अधिसूचना को निरस्त करने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया गया।

अतः उक्त निर्णय के आलोक में श्री श्रीनिवास प्रसाद, तत्का0 कार्यपालक अभियंता, पूर्वी तटबंध प्रमंडल-2, वीरपुर के विरूद्ध निर्गत विभागीय अधिसूचना सं०-547, दिनांक 10.04.17 द्वारा निर्गत दण्डादेश एवं विभागीय अधिसूचना सं०-1996, दिनांक 13.11.17 द्वारा पुनर्विलोकन अर्जी को निरस्त किये जाने संबंधी अधिसूचना को निरस्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 12 फरवरी 2020 सं0 22/नि॰सि॰(ल॰सिं0)-05-06/2018-250--श्री अरविन्द कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, झाझा, जमुई सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, उत्तर कोयल नहर प्रमंडल, औरंगाबाद के विरूद्ध लघु सिंचाई प्रमंडल, झाझा, जमुई के तहत फरवरी 2008 से मार्च, 2010 के बीच राष्ट्रीय सम विकास योजना के तहत 45 करोड़ रूपये में से 10 करोड़ रूपये का बन्दरबाँट किये जाने से संबंधित मामले की जाँच तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा श्री गिरीश सिंह, खैम, सिकन्दरा, जमुई से प्राप्त परिवाद पत्र के आलोक में किया गया। जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा लद्यु सिंचाई विभाग द्वारा करते हुए आरोपी पदाधिकारियों से स्पष्टीकरण प्राप्त की गयी। ततपश्चात आरोपी पदाधिकारियों में से श्री अरविन्द कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता (जिनका संवर्ग जल संसाधन विभाग है) आरोप पत्र गठित करते हुए अग्रेत्तर कारवाई हेतु लद्यु सिंचाई विभाग द्वारा अपने पत्रांक 2918 दि॰ 13.07.17 से जल संसाधन विभाग को उपलब्ध कराया गया। मामले के समीक्षोपरान्त आरोप पत्र गठित करते हुए पुनः स्पष्टीकरण की माँग श्री अरविन्द कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता से की गयी। आरोप ः- एकरारनामा सं॰-31F2/07-08 एवं 32F2/07-08 के तहत विभिन्न स्थलों पर कराये गये इनलेट बेल एवं डगबेल योजनाओं के कार्यान्वयन में बिना कार्य कराये/पूर्ण कराये ही कुल 2,93,652/- रूपये का अधिकाई भुगतान कर सरकारी राशि का दुरूपयोग करना।159 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 बचाव बयान :- एकरारनामा सं॰-31F2/07-08 के मापी पुस्त सं॰ 283 में 1st एवं 2nd A/C bill 707143.00 रूपये का पूर्व के कार्यपालक अभियंता श्री कमलाकान्त प्रसाद द्वारा पारित किया गया है। माप पुस्त 283 के पृ॰ 32 पर उनके द्वारा मात्र 3rd A/C में 14 अदद पम्प हाऊस का 442795/- रूपये पारित विपत्र के विरूद्ध 364394/- रूपये का भुगतान किया गया। निगरानी विभाग जाँच के क्रम में इन 13 अदद्‌ गडबेल योजनाओं के पम्प हाऊस की स्थिति निम्न प्रकार प्रतिवेदित किया गया है। (क) घोष-1, घोष-2, घोष-3 एवं घोष-4 के पम्प हाऊस निर्मित पाये गये है। (ख) गोकुल फतेहपुर-1, 2 एवं 3 के पम्प हाउस में से सिर्फ गोकुल फतेहपुर-1 पम्प हाउस निर्मित पाये गये है। उनके द्वारा माप पुस्त सं॰ 283 में 3rd A/C bill में गोकुल फतेहपुर-1 एवं 2 के पम्प हाउस की मापी दर्ज की गयी है, जिसमें गोकुल फतेहपुर-2 का पम्प हाउस निर्मित है (फोटोग्राफ संलग्न)

(ग) जलदोस्तनी-1 एवं 2 डगबेल में पम्प हाउस निर्मित नहीं पाये गये है। जबकि दोनों पम्प हाउस निर्मित है (साक्ष्य हेतु फोटोग्राफ संलग्न)।

(घ) नवाडीह-1, 2 एवं 3 योजनाये पूरी हुई है जबकि नवाडिह-4 के पम्प हाउस भी निर्मित है। (ड़) कुमार-1 योजना पूर्ण हो चुका है। एकरारनामा सं॰-32F2/07-08 के मापी पुस्त सं॰ 282 में 1st A/C bill 709893.00 रूपये का पूर्व के कार्यपालक अभियंता, श्री कमलाकान्त प्रसाद द्वारा पारित किया गया है। मापी पुस्त के पृ॰ 33 पर उनके द्वारा 3rd A/C bill में कुल 15 अदद्‌ पम्प हाउस का 515359 रूपये का पारित विपत्र के विरूद्ध 40300/- रूपये का भुगतान किया गया है। निगरानी विभाग द्वारा जाँच के क्रम में 11 अदद्‌ डगबेल योजनाओं के पम्प हाउस की स्थिति निम्नवत्‌ प्रकार प्रतिवेदित किया गया है। (क) धनमन्तरी-1, 2 एवं 3 में सिर्फ धनबन्तरी-1 डगबेल योजनाओं का पम्प हाउस निर्मित पाया गया है उनके द्वारा धनमन्तरी-1 एवं 2 डगबेल योजनाओं के पम्प हाउस का मापी दर्ज किया गया है जिसमें धनवन्तरी-2 निर्मित है। (ख) खुटकुट-1, 2 एवं 3 के डगबेल योजनाओं का एक भी पम्प हाउस निर्मित नहीं पाये गये। जबकि उनके द्वारा मापपुस्त में खुटकुट 1 एवं 2 दर्ज है जिसका पम्प हाउस निर्मित है।

(ग) कुमार-1 एवं 2 डगबेल योजनाओं के पम्प हाउस निर्मित पाये गये है। (घ) विधवे-1, 2 एवं 3 डगबेल योजनाओं के एक भी पम्प हाउस निर्मित नहीं पाये गये है, जबकि तीनों योजनाओं के पम्प हाउस निर्मित है।

इनके द्वारा कहा गया है कि एकरानामा सं॰ 31F2/07-08 के तहत 3rd A/C bill में सिर्फ 14 अदद्‌ पम्प हाउस के निर्माण के लिये कुल 346394/- रूपये का भुगतान किया गया है जो स्थल पर निर्मित है। एकरारनामा सं॰ 32F2/07- 08 के 3rd A/C bill के तहत मापी पुस्त सं॰ 282 में 3rd A/C bill में सिर्फ 15 अदद्‌ पम्प हाउस निर्माण के लिये कुल 40300/- रूपये का भुगतान किया गया है जो स्थल पर निर्मित है। तकनीकी परीक्षक कोषांग द्वारा स्थलीय जाँच के क्रम में लघु सिंचाई प्रमंडल झाझा के अभियंता द्वारा योजनाओं के न दिखलाकर निजी किसानों को दिखाया गया है जहाँ पर पम्प हाउस निर्मित नहीं थे। जिसके कारण जाँच प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। एकरारनामा सं॰ 31F2/07-08 के तहत विभिन्न स्थलों पर कराये गये डगबेल एवं इनलेट बेल/पम्प हाउस के कार्यान्वयन के बिना कार्य कराये अथवा कार्य पूर्ण कराये बिना ही कुल 293652/- रूपये का अधिकाई भुगतान करने के लिये दोषी करार दिया गया है। समीक्षा :- आरोप है कि एकरारनामा सं॰ 31F2/07-08 एवं 32F2/07-08 के तहत विभिन्न स्थलों पर कराये गये डगबेल एवं इनलेट बेल/पम्प हाउस निर्माण में बिना कार्य कराये अथवा बिना कार्य पूर्ण कराये ही कुल 2,93,652/- रूपये का अधिकाई भुगतान करने से संबंधित है। आरोपी श्री कुमार द्वारा कहा गया है कि एकरारनामा सं॰ 31F2/07-08 के तहत माप पुस्त सं॰ 283 के पृ॰ 32 से मात्र 3rd A/C bill के माध्यम से 14 अदद्‌ पम्प हाउस का कुल 442795/- रूपये का विपत्र पारित करते हुए संवेदक को कुल 346394 रूपये का भुगतान किया गया है। इनके द्वारा उपलब्ध कराये गये माप पुस्त के अवलोकन से उक्त कथन की पुष्टि होती है। उसी प्रकार एकारारनामा सं॰ 32F2/07-08 के योजनाओं में माप पुस्त सं॰ 282 के पृ॰ 33 के द्वारा इनके द्वारा 3rd A/C bill के माध्यम से कुल 15 अदद्‌ पम्प हाउस का कुल 515359/- रूपये का विपत्र पारित करते हुए कुल 403001 रूपये का भुगतान संवेदक को किया गया है। इनके द्वारा दिये गये माप पुस्त के आलोक में इनका कथन स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। एकरारनामावार जाँचित डगबेल योजना की स्थिति निम्नवत्‌ बनती है। एकरारनामा 31F2/07-08 :- (क) गोकुल फतेहपुर-1, 2 एवं 3 के पम्प हाउस में सिर्फ गोकुल फतेहपुर-1 के पम्प हाउस निर्मित पाया गया। गोकुल फतेहपुर-2 के संदर्भ में कहा गया है कि वह भी निर्मित है जबकि 3rd A/C bill में गोकुल फतेहपुर 2 एवं 3 के160 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 पम्प हाउस के निर्माण के संदर्भ फोटो ग्राफ दिया गया है परन्तु उक्त फोटो ग्राफ के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना संभव नहीं है।

(ख) जलदोस्ती-1 एवं 2 डगबेल के पम्प हाउस निर्मित ही नहीं पाये गये है। इनके द्वारा कहा गया है कि दोनों पम्प हाउस निर्मित है। साक्ष्य के रूप में दिये गये फोटोग्राफ के आधार पर स्थापित किया जाना संभव प्रतीत नहीं होता है।

(ग) नवाडीह 1, 2 , 3 एवं 4 में से 1, 2 एवं 3 निर्मित पाया गया है जबकि नवाडिह-4 निर्मित नहीं पाया गया है इसके संदर्भ में फोटोग्राफ संलग्न करते हुए कहा गया है कि नवाडीह-4 निर्मित है। फोटोग्राफ के आधार पर स्थापित किया जाना संभव प्रतीत नहीं होता है।

एकरारनामा सं॰ 32F2/07-08 :- (क) धनमन्तरी 1, 2 एवं 3 में सिर्फ धनवन्तरी -1 डगबेल के पम्प हाउस निर्मित पाया गया है। इनके द्वारा कहा गया है कि मात्र धनमन्तरी 1 एवं 2 के पम्प हाउस का मापी दर्ज की गयी है एवं धनमन्तरी-2 निर्मित है फोटो के आधार पर स्थापित किया जाना संभव प्रतीत नहीं है।

(ख) खुटकुट 1, 2 एवं डगबेल योजना का एक पम्प हाउस निर्मित नहीं पाये गये है। इनके द्वारा कहा गया है कि माप पुस्त में खुटकुट 1 एवं 2 की मापी दर्ज की गयी है, जो निर्मित है साक्ष्य के रूप में दिये गये फोटोग्राफ से स्थापित किया जाना संभव नहीं है।

(ग) विधवे 1, 2 एवं 3 में से एक पम्प हाउस निर्मित नहीं पाये गये है। इनके द्वारा कहा गया है कि तीन पम्प हाउस निर्मित है एवं साक्ष्य के रूप में दिये गये फोटोग्राफ से स्थापित किया जाना संभव प्रतीत नहीं होता है। तकनीकी परीक्षक कोषांग के प्रतिवेदन कंडिका 4.0.16 में अंकित है कि जो योजनाएँ पूर्ण हो चुकी है वो भी चालू हालत में नहीं है एवं किसी भी योजना से नाम मात्र की भी सिंचाई हो रही है जो अपव्यय को परिलक्षित करता है। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री कुमार का कथन स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है एवं बिना पम्प हाउस एवं डगबेल के निर्माण कराये ही कुल 293652/- रूपये का अधिकाई भुगतान करने का आरोप प्रमाणित प्रतीत होता है। क्योंकि इनके द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है कि स्थल पर पम्प हाउस/डगबेल का निर्माण के पश्चात ही भुगतान की कारवाई की गयी है।

उपरोक्त समीक्षा के आलोक में श्री अरविन्द कुमार तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध बिना पम्प हाउस/डगबेल के निर्माण कराये बिना ही कुल 293652/- का अधिकाई भुगतान करने का आरोप प्रमाणित पाया गया है। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में श्री अरविन्द कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, झाझा, जमुई के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित किए जाने का निर्णय सक्षम प्राधिकार के स्तर पर लिया गया है। (i) रू॰ 2,93,652/- (दो लाख तिरानवें हजार छः सौ बावन) की वसूली। (ii) दो वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। अतः सरकार के स्तर पर लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री अरविन्द कुमार, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, लघु सिंचाई प्रमंडल, झाझा, जमुई सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, उत्तर कोयल नहर प्रमंडल, औरंगाबाद के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित कर उन्हें संसूचित किया जाता है।

(i) रू॰ 2,93,652/- (दो लाख तिरानवें हजार छः सौ बावन) की वसूली। (ii) दो वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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12 फरवरी 2020

सं0 22/नि॰सि॰(पट॰)-03-06/2018-249--श्री अवधेश प्रसाद (आई0डी0-जे 7497) तत्कालीन सहायक अभियंता, कार्य प्रमंडल, दानापुर सम्प्रति स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्यप्रमंडल-1, हाजीपुर के पद पर पदस्थापन काल में इनके विरूद्ध कमलदह जैन मंदिर के विकास एवं संवर्द्धन से संबंधित योजना में आर्थिक अनियमितता का आरोप पत्र गठित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-601, दिनांक 19.03.2019 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

श्री अवधेश प्रसाद दिनांक 31.01.2020 को सेवानिवृत हो गए है। अतएव श्री अवधेश प्रसाद, तत्कालीन सहायक अभियंता के विरूद्ध संचालित उक्त विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत सम्परिवर्तित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, गोरखनाथ, अपर सचिव।

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12 फरवरी 2020

सं0 22/नि॰सि॰(पट॰)-03-01/2017-248--श्री अवधेश प्रसाद (आई0डी0-जे 7497) तत्कालीन सहायक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग, कार्य प्रमंडल-2, पटना के पद पर पदस्थापित थे, तो उनके विरूद्ध नगर विकास योजना161 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 2008-2009 के अन्तर्गत पटना जिला के कंकड़बाग से योगीपुर संप हाउस के दोनों तरफ पी0सी0सी0 पथ निर्माण में अनियमितता का आरोप प्रतिवेदित किया गया।

उक्त आरोप पत्र के आलोक में श्री प्रसाद के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-892, दिनांक 12.06.2017 के द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री प्रसाद दिनांक 31.01.2020 को सेवानिवृत हो चुके हैं।

अतएव श्री अवधेश प्रसाद, तत्कालीन सहायक अभियंता सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध संचालित उक्त विभागीय कार्यवाही को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में सम्परिवर्तित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, गोरखनाथ, अपर सचिव।

------- 11 फरवरी 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(भाग॰)-09-01/2010-238--श्री सच्चिदानंद सिंह (आई॰डी॰-2572), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सिंचाई अवर प्रमंडल, जमालपुर सम्प्रति सेवानिवृा को उनके पदस्थापन अवधि वर्ष-2004-05 से 2008 के दौरान इनके द्वारा सतधरवा जलाशय योजना के पुनस्र्थापन कार्य एवं विविध कार्य हेतु अस्थायी अग्रिम राशि का दुर्विनियोग (असमायोजित रू0 14,62,975.83/-) नहीं लौटाने, उच्चाधिकारियों के आदेश की अवहेलना करने आदि प्रथम दृष्टया प्रमाणित पाए गए आरोपों के लिए सरकार के स्तर पर लिए गए निर्णय के आलोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-1277 दिनांक-31. 08.2010 द्वारा निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1318 दिनांक-07.09.2010 द्वारा सुसंगत नियमों के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। विभागीय कार्यवाही के निष्पादन के पूर्व श्री सच्चिदानंद सिंह, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी के दिनांक-31.12.2011 को सेवानिवृा हो जाने के फलस्वरूप विभागीय अधिसूचना संख्या-132 दिनांक-03.02. 2012 द्वारा श्री सिंह को उनके सेवानिवृाि की तिथि 31.12.2011 के प्रभाव से निलंबन मुक्त किया गया और विभागीय कार्यवाही को 43 (बी) के तहत सम्परिर्वाित किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन में आरोपों को प्रमाणित पाए जाने पर श्री सिंह से द्वितीय कारण-पृच्छा की गई एवं प्राप्त द्वितीय कारण-पृच्छा के सम्यक्‌ समीक्षोपरांत सरकार के स्तर पर लिए गए निर्णय के आलोक में अधिसूचना संख्या-1370 दिनांक-17.06.2015 द्वारा निम्नांकित दंड संसूचित किया गया- (1) अस्थायी अग्रिम के रूप में कुल रू0 14,62,975.83/-(चौदह लाख बासठ हजार नौ सौ पचहार रूपये तेरासी पैसे) जो अबतक असमायोजित है, की वसूली। (2) 12 वर्षों तक 30 प्रतिशत पेंशन की कटौती। उपर्युक्त दंड के विरूद्ध श्री सिंह द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन समर्पित किया गया, जिसे सरकार के स्तर पर सम्यक्‌ समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1077 दिनांक-18.05.2018 द्वारा अस्वी—त करते हुए पूर्व के संसूचित दंड को यथावत्‌ रखा गया। श्री सच्चिदानंद सिंह, सेवानिवृा सहायक अभियंता के पत्रांक-शून्य दिनांक-14.10.2019 द्वारा समर्पित अभ्यावेदन में निलम्बन अवधि 31.08.2010 से 31.12.2011 का विनियमन कर पूर्ण वेतनादि की मांग की गई है। उनके द्वारा पूर्व में समर्पित अभ्यावेदन में उल्लेख किया गया है कि विभागीय कार्यवाही में उनके द्वारा वांछित सहयोग प्रदान किया गया है और जाँच पदाधिकारी द्वारा पृच्छा किए जाने पर वांछित प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया है। श्री सिंह, सेवानिवृा सहायक अभियंता के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही के जाँच प्रतिवेदन में आरोपों को प्रमाणित पाया गया एवं प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिंह, सेवानिवृा सहायक अभियंता से पूछे गए द्वितीय कारण-पृच्छा के विभागीय समीक्षोपरांत सरकार से स्तर पर लिए गए निर्णय के आलोक में ''(प) रू0 14,62,975.83/- की वसूली एवं (पप) 12 वर्षों तक 30 प्रतिशत पेंशन की कटौती'' का दंड संसूचित किया गया एवं दंड को यथावत्‌ रखते हुए पुनर्विचार अभ्यावेदन भी अस्वी—त कर दिया गया। श्री सिंह, सेवानिवृा सहायक अभियंता के द्वितीय कारण-पृच्छा के उार एवं पुनर्विचार अभ्यावेदन के सम्यक्‌ समीक्षोपरांत इन्हें रू0 14,62,975.83/-की असमायोजित राशि एवं अन्य आरोपों का दोषी पाया गया है। अतएव श्री सिंह का निलंबन न्यायोचित्‌ परिलक्षित होता है। अतएव सम्यक समीक्षोपरांत सक्षम प्राधिकार द्वारा श्री सच्चिदानंद सिंह (आई॰डी॰-2572), सेवानिवृा सहायक अभियंता के सेवाकाल में निलंबन अवधि के विनियमन हेतु किए गए अभ्यावेदन को अस्वीकार करते हुए निलंबन अवधि दिनांक-31.08.2010 से 30.12.2011 तक इन्हें जीवन निर्वाह भाा के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होने एवं उक्त अवधि की गणना पेंशन प्रयोजनार्थ करने का निर्णय लिया गया है। उपर्युक्त निर्णय के आलोक में श्री सच्चिदानन्द सिंह (आई0डी0-2572), तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सिंचाई अवर प्रमंडल, जमालपुर सम्प्रति सेवानिवृत के निलंबन अवधि दिनांक-31.08.2010 से 30.12.2011 तक को निम्नरूपेण विनियमित किया जाता है। ''निलंबन अवधि दिनांक 31.08.2010 से 30.12.2011 तक जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होगा एवं उक्त अवधि की गणना पेंशन प्रयोजनार्थ की जायेगी।''

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, गोरखनाथ, अपर सचिव।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 162 10 फरवरी 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(सह॰)-26-02/2017-226--श्री अर्जुन चौधरी (आई0डी0-4666) कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज को सिंचाई प्रमंडल, मुरलीगंज के अन्तर्गत सुखासन वितरणी के वि0दू0 28.00 पर निर्माणाधीन CD संरचना के Structural Safety stability and Utility के कार्य में बरती गयी अनियमितता के लिए विभागीय अधिसूचना सं०-1473, दिनांक 09.07.18 द्वारा निलंबित किया गया। श्री चौधरी दिनांक 31.12.2019 को सेवानिवृत हो गये। उक्त की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी। समीक्षोपरांत श्री चौधरी को निलंबनमुक्त करने का निर्णय लिया गया। अतः उक्त निर्णय के आलोक में श्री अर्जुन चौधरी, तत0 कार्यपालक अभियंता को दिनांक 31.12.19 से निलंबन मुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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6 फरवरी 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मुज0)-06-11/2013-179--श्री भरत पूर्वे (आई0डी0-1894) तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, मुजफ्फरपुर के उनके उक्त अवधि में पदस्थापन अवधि के दौरान आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के मामले में आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 1988 के तहत दर्ज प्राथमिकी के आलोक में विभागीय अधिसूचना सं0-138, दिनांक 27.01.2014 द्वारा श्री पूर्वे को निलंबित किया गया एवं तत्पश्चात विभागीय संकल्प ज्ञापांक सं0-281 दिनांक 07.03.2014 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति से निम्नलिखित आरोपों के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।

आरोप संख्या-1-सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक-946, दिनांक 24.01.11, पत्रांक-220 दिनांक 06.

क्र0 अघोषित अचल सम्पति का विवरण अनुमानित मूल्य
1 पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला दरभंगा डीड नं0-11636 खरीदगी की तिथि 2009 के नाम एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर, थाना-अगमकुँआ, जिला-पटना में खाता सं0-123 सर्वे प्लॉट सं0-802, रकवा-39.13 डिसमिल 2,04,800
2 पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला दरभंगा डीड नं0-11636 खरीदगी की तिथि 2009 के नाम एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर, थाना-अगमकुँआ, जिला-पटना में खाता सं0-126 सर्वे प्लॉट सं0-822, रकवा-1.09 डिसमिल 1,63,500

01.12 एवं पत्रांक-17521 दिनांक 21.12.12 द्वारा राज्य सरकार के सभी पदाधिकारियों एवं कर्मियों से विहित प्रपत्र में चल अचल सम्पत्ति तथा दायित्वों की विवरणी प्राप्त कर उसे सार्वजनिक करने का निर्णय लिया गया। उक्त आलोक में आपके द्वारा वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए विहित प्रपत्र में चल अचल सम्पति एवं दायित्व विवरणी दिनांक 05.2.13 को घोषित की गयी है। उक्त विवरणी दिनांक 05.2.13 में आपने अपने पास मौजूद सम्पति की सही जानकारी नहीं देकर उसे छुपाया है क्योंकि आर्थिक अपराध इकाई, बिहार, पटना द्वारा आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के आरोप में आपके विरूद्ध आर्थिक अपराध थाना कांड सं0-36/ 13 दिनांक 13.08.13 धारा-13(2) सह पठित धारा 13(1) ई भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 1988 दर्ज किया गया है। आर्थिक अपराध ईकाई पटना द्वारा अबतक किये गये अनुसंधान के अनुसार समर्पित प्रतिवेदन एवं आपके द्वारा घोषित चल अचल सम्पति एवं दायित्व विवरणी दिनांक 05.2.13 के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि आपके द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से कई ऐसी चल अचल सम्पति का अर्जन किया गया है जिसकी घोषणा उक्त विवरणी में नहीं की गई है। यह बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 19(6) के आलोक में गंभीर कदाचार है तथा सरकारी सेवक के प्रतिकूल आचरण है। इस कदाचार के लिए आप दोषी है। उक्त अघोषित चल अचल सम्पति की विवरणी निम्नरूपेण है :- अघोषित अचल सम्पति क्र0 अघोषित अचल सम्पति का विवरण 1 पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला दरभंगा डीड नं0-11636 खरीदगी की तिथि 2009 के नाम एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर, थाना-अगमकुँआ, जिला-पटना में खाता सं0-123 सर्वे प्लॉट सं0-802, रकवा-39.13 डिसमिल

आर्थिक अपराध ईकाई के पत्र में उल्लेखित है। आरोप संख्या-2- बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 19(2) के अनुसार कोई सरकारी सेवक सरकार की पूर्व जानकारी के बिना किसी अचल सम्पति का अर्जन या निबटाव अपने नाम से या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम से पट्‌टे बंधक खरीद, बिक्री या प्रतिदान के द्वारा अन्यथा न करेगा।

इसी प्रकार बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम-19(2) के अनुसार प्रत्येक सरकारी सेवक, सभी ऐसा संव्यवहार के संबंध में, जिसका मूल्य सरकारी सेवक के दो माहों के मूल वेतन जोड़ ग्रेड वेतन से अधिक हो, ऐसा संव्यवहार के पूर्ण होने के एक माह के अन्दर सरकार को जानकारी देगा।

परन्तु यह कि यदि ऐसा कोई संव्यवहार किसी ऐसे व्यक्ति के साथ हो जिसका सरकारी के साथ पदीय कारबार चलता हो तो सरकार की पूर्व मंजूरी ली जायेगी।

आपके द्वारा अर्जित उपरोक्त अघोषित चल एवं अचल सम्पति की जानकारी सरकार को पूर्व में नहीं दी गयी है जो गंभीर कदाचार है।163 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोप संख्या-3-आपके विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने संबंधी थाना कांड संख्या-36/13 दिनांक 13.08.2013 में धारा-13(2) पठित धारा-13(1) ई0 भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम 1988 भी दर्ज किया गया है। अनुसंधान में पाये गये तथ्यों के अनुसार अनुमानित बचत कुल रू0-1,68,41,112/- तथा अर्जित आय के अनुसार अनुमानित बचत कुल रू0-67,00,000/- है। आपके द्वारा आय से अधिक सम्पति (रू0 1,68,41,112-67,00,000) रू0-1,01,41,112/- है। जो नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से अर्जित की गयी है। यह सम्पति आपके द्वारा पदीय कर्त्तव्य का दुरूपयोग कर अवैध तरीके से अर्जित की गयी है। जो घोर कदाचार है जिसके लिए आप दोषी है।

विभागीय कार्यवाही के संचालन के क्रम में ही दिनांक 31.03.2015 को श्री पूर्वे के सेवानिवृत हो जाने के कारण श्री पूर्वे को दिनांक 31.03.15 के प्रभाव से निलंबन मुक्त करते हुए इनके विरूद्ध पूर्व से संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय अधिसूचना संख्या-915, दिनांक 17.04.15 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) में सम्परिवर्तित किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालन में श्री पूर्वे द्वारा मुख्य रूप से निम्न बातें कही गई :-

(1) आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 05.08.16 को समर्पित अपने बचाव बयान में मुख्य रूप से यह उल्लिखित किया गया है कि आरोप पत्र के पृष्ठ संख्या-06 में उनके पी0पी0एफ0 लेखा में जमा राशि रू0 5,41,605.73 एवं सूद की राशि केवल रू0 2,58,305.73 दिखाया गया है। उनका यह भी कहना है कि न्यायालय से मिले अभिलेख के पृष्ठ संख्या-154 में उनके पी0पी0एफ0 लेखा में कुल राशि 5,91,883.73 रूपये है, जिसमें सूद की राशि 3,03,583.73 रूपये है। इसी प्रकार SBI NMCH शाखा में उनके द्वारा 1-1 लाख के दो एफ0डी0 के संबंध में भी उल्लेख किया गया है। साथ ही उनके द्वारा कहा गया है कि LIC में जमा की गयी राशि आरोप पत्र में उनके व्यय में दर्शाया गया है, परन्तु LIC से प्राप्त की गयी राशि रू0 1.00 लाख को उनकी आय में नहीं जोड़ा गया है। पुनः उनके द्वारा तकनीकी परीक्षक कोषांग के आधार पर आरोप पत्र में उनके फ्लैट -01/37 एवं 01/40 में साजो-सज्जा के सामानों का खर्च 2,23,215/- रूपये दिखाया गया है तथा फ्लैट-01/37 में फ्लोर टाईल्स का कार्य 1527 वर्गफीट दर्शाया गया है। इसी प्रकार बिहार राज्य आवास बोर्ड द्वारा उक्त फ्लैट का रकवा 1450 वर्गफीट लिखे जाने की बात कही गयी है। ऐसी स्थिति में टाईल्स का कार्य 1527 वर्गफीट दर्शाया गया है। इसी प्रकार बिहार राज्य आवास बोर्ड द्वारा उक्त फ्लैट का रकवा 1450 वर्गफीट लिखे जाने की बात कही गयी है। ऐसी स्थिति में टाइल्स का क्षेत्र अधिक नहीं हो सकने का उल्लेख किया गया है। पुनः आरोप पत्र के पृष्ठ संख्या-13 में कम्प्युटर मॉल, एस0पी0 वर्मा रोड से क्रय किये गये प्रिंटर का मूल्य 19,500 रूपये दिखाया गया है, जबकि इसका मूल्य 1950 रूपये होने की बात कही गयी है। इसी प्रकार घर में मिले सोना-चाँदी के जेवर का वर्तमान दर पर मूल्य 16,08,100/- लाख रूपये एवं घर में मिले सामनों का मूल्य 10.00 लाख रूपये आरोप पत्र के पृष्ठ संख्या-17 के क्रमांक 11 में दिखलाये जाने पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा गया है कि घर में पाये गये सामान पुराना है तथा कई सामान गिफ्ट तथा उनके बेटा, बेटी एवं वधु का है, जो वर्षों से नौकरी कर रहे है और इस तरह इस परिसम्पति को उनके द्वारा अर्जित सम्पति में जोड़ने पर आपत्ति की गयी है। उनका यह भी कथन है कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि हर तरह के व्यक्ति एवं परिवार का केवल खाना मद में आय को एक तिहाई व्यय हो। इसके अलावे आरोपित पदाधिकारी द्वारा उनकी पत्नी द्वारा सभी तरह के निवेश एवं प्राप्त राशि का सही अनुसंधान नहीं किये जाने का भी उल्लेख किया गया है। (2) आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 06.09.16 को अपना अभ्यावेदन प्रधान सचिव, जल संसाधन विभाग को संबोधित कर इसकी प्रति इस स्तर पर समर्पित किया गया। अपने अभ्यावेदन में उनके द्वारा विभागीय आरोप पत्र एवं न्यायालय में समर्पित आरोप पत्र में अचल सम्पति की विवरणी का उल्लेख करते हुए विभागीय आरोप पत्र में मूल्यांकित राशि एवं जाँचोपरांत आरोप पत्र में मूल्यांकित राशि की भिन्नता को दर्शाते हुए मुख्य रूप से कहा गया कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा उनके किसी भी चल अचल सम्पति को अवैध नहीं बतलाया गया है तथा उनके द्वारा यह भी आरोप लगाया गया कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा उनके आय-व्यय में हेराफेरी देखाकर उनके विरूद्ध आरोप पत्र दायर किया गया है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा पुनः दिनांक 13.01.17 को उक्त तथ्यों को ही दोहराते हुए एक अभ्यावेदन सुनवाई के क्रम में पुनः उनके द्वारा समर्पित किया गया।

पुनः दिनांक 01.12.17 को आरोपित पदाधिकारी द्वारा आरोप पत्र एवं आरोप पत्र के साथ संलग्न अन्य दस्तावेज तथा विभागीय पत्रांक-549, दिनांक 01.04.16 द्वारा प्रस्तुत कागजात यथा अंतिम अनुसंधान प्रतिवेदन के आलोक में कंडिकावार एक प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें उनके द्वारा कहा गया कि आरोप में दर्शाये गये दोनों जमीन का मूल्य तथा साक्ष्य में लिखे गये मूल्य में काफी भिन्नता हे। उन्होंने यह भी कहा है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा समर्पित अंतिम प्रतिवेदन में उनके किसी भी सम्पति को अधोतिप या अवैध नहीं बतलाया गया। उन्होने पुनः कहा है कि उनकी पत्नी की सम्पति पर बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 में उपबंधित नियम लागू नहीं होता है। साथ ही यह भी कहा गया कि उनके पास आय से अधिक 1,01,41,112/- रूपये की सम्पति से संबंधित आरोप में विभाग द्वारा इसका कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। मात्र न्यायालय में समर्पित प्रतिवेदन की प्रति उन्हें दी गयी है तथा निष्कर्ष के रूप में उनके द्वारा उल्लिखित किया गया है कि उनके विरूद्ध गठित आरोप पत्र पर किसी प्रकार की प्रारंभिक जाँच नहीं की गयी। साथ ही उनके द्वारा यह भी उल्लिखित किया गया कि आर्थिक अपराध ईकाइ द्वारा दर्ज प्राथमिकी के आधार पर ही विभाग द्वारा आरोप गठित कर दिया गया, जबकि आरोप को साबित करने हेतु विभाग द्वारा कोई साक्ष्य या गवाह नहीं दिया गया और इस आधार पर उनके द्वारा अपने विरूद्ध गठित आरोपों को तथ्यहीन बतलाया गया है।

दिनांक 22.12.17 को आरोपित पदाधिकारी द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा निर्गत परिपत्र संख्या-17696 दिनांक 23.12.14 एवं परिपत्र संख्या-10875 दिनांक 24.08.17 की छायाप्रति संलग्न करते हुए मुख्य रूप से कहा गया कि164 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 अनुशासनिक प्राधिकार/विभाग उन पर लगाये गये आरोप को सिद्ध करने के लिए तैयार नहीं है। फलतः उक्त परिपत्रों को संदर्भित करते हुए आरोपों को निरस्त करने हेतु अनुरोध किया गया है। (3) आरोपित पदाधिकारी द्वारा समर्पित लिखित बहस में मुख्य रूप से यह उल्लिखित किया गया है कि संचालन पदाधिकारी को आरोपों की जाँच हेतु अनुशंसा करने के पूर्व बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में निहित प्रावधानों का अनुपालन विभाग द्वारा नहीं किया गया। उनके द्वारा कहा गया कि बारम्बार मांग करने के बावजूद उन्हें संगत दस्तावेजों एवं साक्ष्यों की सूची उपलब्ध नहीं कराया गया। उन्होनें अपने लिखित बहस में कहा है कि विभागीय मंतव्य में उनके विरूद्ध पहला आरोप असत्य पाया गया, जबकि दूसरा एवं तीसरा आरोप सही बताया गया, जो उनके जवाब की समीक्षा से भिन्न है। उनके द्वारा कहा गया है कि उनकी पत्नी के नाम की सम्पति उनकी पत्नी द्वारा स्वअर्जित है, जिसकी सूचना विभाग को देना आवश्यक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा है कि उनके द्वारा क्रय की गयी फ्लैट की जानकारी विभाग को पहले से ही थी, क्योंकि इसके लिए उनके द्वारा भविष्य निधि से अग्रिम विभागीय अनुशंसा पर ही लिया गया था। उनका यह भी कथन है कि विभागीय कार्यवाही प्रारंभ होने के लगभग 2 वर्षों के उपरांत उन्हें विभागीय पत्रांक-549 दिनांक 01.04.16 द्वारा साक्ष्य के रूप में आर्थिक अपराध ईकाई पटना द्वारा निगरानी न्यायालय में दाखिल आरोप पत्र की छायाप्रति उपलब्ध कराया गया तथा न्यायालय में दाखिल अंतिम प्रतिवेदन एवं विभागीय आरोप में समानता नहीं है। पुनः उनके द्वारा कहा गया है कि विभागीय कार्यवाही एक अर्द्ध न्यायिक प्रक्रिया है, जिसमें साक्ष्य एवं गवाह दोनों के आरोप को सिद्ध करना है, परंतु विभाग के पास न तो साक्ष्य है और न ही गवाह है तथा विभाग द्वारा तैयार किया गया आरोप पत्र बगैर किसी प्रारंभिक जाँच पर आधारित है।

आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिये गये स्पष्टीकरण/बचाव-बयान तथा लिखित बहस एवं विभाग द्वारा गठित आरोप पत्र, आरोप पत्र के साथ संलग्न दस्तावेज एवं कागजात, आरोपित पदाधिकारी के स्पष्टीकरण/बचाव बयान पर प्राप्त विभागीय मंतव्य एवं विभाग द्वारा दिये गये लिखित बहस के समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा अपना जाँच प्रतिवेदन विभाग में समर्पित किया गया जिसमें मुख्य रूप से निम्न बातें कही गयी है :-

प्रशनगत मामला आरोपित पदाधिकारी श्री भरत पूर्वे, तत0 अधीक्षण अभियंता, तिरहुत नहर अंचल, मुजफ्फरपुर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के आरोप में आर्थिक अपराध ईकाई, पटना द्वारा दर्ज आर्थिक अपराध थाना कांड संख्या-36/13, दिनांक 13.08.2013 धारा-13(2) सहपठित धारा-13(1) ई भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम, 1988 के आधार पर जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना के संकल्प ज्ञापांक-281, दिनांक 07.03.2014 द्वारा संस्थित विभागीय कार्यवाही एवं तदालोक में आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध प्रपत्र-'क' में गठित आरोपों तथा आरोपों को सिद्ध करने हेतु विभाग द्वारा संलग्न साक्ष्यों पर निर्णय लेने से संबंधित है।

आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध गठित आरोप पत्र में उल्लिखित आरोप संख्या-01 में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि सरकारी परिपत्र के आलोक में सभी पदाधिकारियों एवं कर्मियों को विहित प्रपत्र में चल/अचल सम्पति तथा दायित्वों की विवरणी देना अनिवार्य है। उक्त पत्र के अनुपालन में आरोपित पदाधिकारी द्वारा वर्ष 2012-13 के लिए दिनांक 05.02.2013 को विहित प्रपत्र में चल/अचल सम्पति एवं दायित्व की विवरणी घोषित की गयी है, जिसमें आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा दर्ज प्राथमिकी से संबंधित प्रतिवेदन में उल्लिखित आरोपित पदाधिकारी द्वारा धारित चल/अचल सम्पति तथा दिनांक 05.02.2013 को आरोपित पदाधिकारी द्वारा स्वघोषित सम्पति विवरणी के तुलनात्मक अध्ययन से विभाग को यह परिलक्षित हुआ कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से कई ऐसी चल/अचल सम्पति अर्जित की गई है, जिसकी घोषणा आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिनांक 05.02.2013 को अपनी घोषणा पत्र में नहीं किया गया है। इस आधार पर आरोपित पदाधिकारी को बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 19(6) के आलोक में गंभीर कदाचार मानकर इसके लिए उन्हें दोषी माना गया है। आरोप पत्र में अधोपित अचल सम्पति की विवरणी के रूप आरोपित पदाधिकारी की पत्नी के नाम पर मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) दरभंगा में दस्तावेज संख्या-11636 वर्ष 2009 द्वारा क्रय एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर थाना, अगमकुँआ, पटना में खाता संख्या-123, खेसरा संख्या-802, रकवा-39.13 डिसमिल एवं क्रमांक-02 में पुनः मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला दरभंगा के अधीन दस्तावेज संख्या-11636 वर्ष 2009 एफ0ए0एच0आई0जी0, बहादुरपुर थाना, अगमकुआँ, पटना में खाता संख्या-126 खेसरा संख्या-822 रकवा, 1.09 डिसमिल अनुमानित मूल्य क्रमशः 2,04,800/- एवं 1,63,500/- प्रदर्शित किया गया है।

पुनः आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध दूसरे आरोप में यह उल्लिखित किया गया है कि बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली 1976 के नियम 19(2) में निहित प्रावधान का उल्लंघन उनके द्वारा करते हुए उपरोक्त चल एवं अचल सम्पति की जानकारी सरकार को नहीं दी गयी है।

तृतीय एवं अंतिम आरोप में आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के आधार पर दर्ज थाना कांड संख्या-36/13 तथा इस मामले में अनुसंधान के उपरांत पाये गये तथ्यों के अनुसार कुल 1,01,41,112 रूपये आरोपित पदाधिकारी द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से अपने पदीय कर्त्तव्यों का दुरूपयोग कर अवैध तरीके से अर्जित करने का आरोप संस्थित किया गया है।

उक्त आरोपों के समर्थन में आर्थिक अपराध ईकाई, पटना के पत्रांक-232 दिनांक 02.09.13 में यह उल्लिखित किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा वर्ष 2012-13 में स्वघोषित उनकी सम्पति विवरणी की प्रति डाउनलोड किया गया, जिसमें आरोपित पदाधिकारी द्वारा उनकी पत्नी के नाम पर अवस्थित मौजा पंटा (देहाती क्षेत्र) जिला-दरभंगा में पत्नी के नाम पर क्रय की गयी जमीन खात संख्या-123, खेसरा संख्या-802, एवं एक अन्य दस्तावेज द्वारा क्रय की गयी जमीन खाता संख्या-126, खेसरा संख्या-822 को नहीं दर्शाया गया है।165 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 इस आरोप के संबंध में आरोपित पदाधिकारी द्वारा दाखिल अपने स्पष्टीकरण में दरभंगा देहाती सर्किल मौजा सोनकी में नया खाता संख्या-227, खेसरा संख्या-1142, रकवा-9 कट्ठा जमीन तथा जिसका पुराना खाता संख्या-126, खेसरा संख्या-822, रकवा-39.13 डिसमिल बतलाया गया है, उनकी पत्नी द्वारा क्रय करने की बात कही गयी है तथा इसी प्रकार 1. 09 डिसमिल जमीन भी उसी जमीन का हिस्सा बतलाकर अपनी पत्नी के नाम से क्रय करने का उल्लेख किया गया है तथा साक्ष्य स्वरूप संबंधित दस्तावेज की छायाप्रति भी संलग्न की गयी है।

संलग्न दस्तावेज संख्या-11,636 के अवलोकन से यह परिलक्षित होता है कि मौजा पंटा के अधीन खाता संख्या-126, खेसरा सं0-802/822 (पुराना) खाता संख्या-125, खेसरा संख्या-262(पुराना) खाता संख्या-227 खेसरा संख्या-1142(नया) आरोपित की पत्नी श्रीमति ममता पूर्वे के नाम पर दिनांक 08.04.2009 को निबंधित किया गया है, जबकि दस्तावेज संख्या-11550 दिनांक 03.08.2009 द्वारा उक्त मौजा का ही खाता संख्या-126 खेसरा संख्या-822(पुराना) तथा खाता संख्या-260 तथा खेसरा संख्या-1145 (नया) रकवा-1.09 डिसमिल अर्थात 5 धूर भी आरोपित की पत्नी श्रीमति ममता पूर्वे के नाम पर निबंधित किया गया है। इस आरोप के संबंध में जल संसाधन विभाग के पत्रांक-1726, दिनांक 19.11.14 से प्राप्त विभागीय मंतव्य में आरोपों की पुष्टि नहीं की गयी है, बल्कि इसे अप्रमाणित प्रतीत होने का उल्लेख करते हुए नक्शा मिलान के बाद ही निश्चयता के साथ माने जाने की बात कही गयी है।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा अपने पत्र में उक्त जमीन के संबंध में दर्ज ब्योरा तथा आरोप पत्र में इस संबंध में तैयार किये गये ब्योरे में असमानता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आरोप पत्र के गठन में आर्थिक अपराध ईकाई से प्राप्त प्रतिवेदन को गंभीरता से नहीं लिया गया है तथा आरोप को लेखबद्ध करने में असावधानी बरती गई है।

इस आरोप की समीक्षा के क्रम में आर्थिक अपराध ईकाई के पत्रांक-651 दिनांक 02.02.16 द्वारा विशेष कार्य पदाधिकारी, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को संबोधित पत्र जिसमें इस मामले में माननीय विशेष न्यायाधीश, निगरानी के न्यायालय में अंतिम प्रतिवेदन दायर किया गया है, जिसके अवलोकन से भी पता चलता है कि दस्तावेज संख्या-11636 दिनांक 04.08.2009 एवं दस्तावेज संख्या-11550 दिनांक 03.08.2009 द्वारा उक्त जमीन आरोपित पदाधिकारी की पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे के नाम पर निबंधित किया गया है तथा अन्य परिसम्पति सहित उक्त दोनों परिसम्पतियों की राशि क्रमशः 2,16,595.00 एवं 16,477.00 रूपये (निबंधन एवं मुद्रांक शूल्क सहित) के संबंध में अनुसंधान में यह का गया है कि अपने पति के अवैध रूप से किये गये कमाई को जायज ठहराने के लिए आरोपित पदाधिकारी की पत्नी श्रीमति ममता पूर्वे द्वारा अपने अन्य कारोबार का सहारा लिया गया है और इसी आधार पर आरोपित पदाधिकारी की पत्नी को भी अप्राथमिकी अभियुक्त के रूप में नामित किया गया है। यह ध्यान देनें की बात है कि प्रश्नगत जमीन का निबंधन आरोपित पदाधिकारी की पत्नी का नाम से वर्ष 2009 में ही हुआ है तो फिर विभाग द्वारा आरोपित पदाधिकारी के स्तर से अपनी चल एवं अचल सम्पति सहित दायित्व की विवरणी वर्ष 2012-13 जिसे उनके द्वारा दिनांक 05.02.2013 को दाखिल किया गया था, को विभाग द्वारा आधार बनाने को औचित्य समझ से परे है। इस मामले में विभाग द्वारा आरोपित पदाधिकारी के चल एवं अचल सम्पतियों की विवरणी का तुलनात्मक अध्ययन काफी पूर्व से ही किया जाना चाहिए था। आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा समर्पित अभियोग पत्र में यह उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी की पत्नी के विभिन्न श्रोतों से प्राप्त आय एवं दाखिल किये गये आयकर विवरणी में विभिन्नता है। प्रतिवेदन में प्रतिवेदित तथ्यों के अनुसार उनकी पत्नी द्वारा कुल श्रोतों से प्राप्त आय 25,04,530/- रूपये होने की बात कही गई है, जबकि आयकर विवरणी के अनुसार उनकी आय 14,68,986/- रूपये ही होने का मामला प्रकाश में लाया गया है। आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा दाखिल प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी के पत्नी का संदर्भित व्यवसाय श्रम विभाग से निबंधित भी नहीं है।

आरोपित पदाधिकारी द्वारा भी अपने स्पष्टीकरण एवं बचाव बयान में उक्त जमीन को अपनी पत्नी द्वारा अपने निजी आय के श्रोत से प्राप्त किये जाने की बात कही गई है, परंतु इस कथन के समर्थन में उनके द्वारा अपनी पत्नी का दाखिल आयकर विवरणी की छायाप्रति तथा वर्ष 2008-09 में अपनी चल अचल सम्पति की घोषणा से संबंधित विवरणी की छायाप्रति नहीं प्रस्तुत किये जाने के कारण आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा अपने अनुसंधान के दौरान पाये गये तथ्यों तथा अनुसंधान के उपरांत न्यायालय में दाखिल अंतिम प्र्रतिवेदन में अंतरनिर्हित तथ्यों से आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध आरोप संख्या-01 में वर्णित आरोप को अप्रमाणित मानने का कोई कारण/आधार नहीं है। अतएव आरोप संख्या-01 प्रमाणित होता है। आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध दूसरा आरोप यह है कि उन्होने अपने द्वारा अर्जित चल एवं अचल सम्पति की जानकारी सरकार को पूर्व में नही दी और इस आधार पर उनके द्वारा बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 19(2) का उल्लंघन किया गया है।

उक्त आरोप के संबंध में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने स्पष्टीकरण एवं बचाव बयान में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना द्वारा निर्गत आदेश के आलोक में वे वर्ष 2010-11 से ही अपने सभी चल एवं अचल सम्पति घोषित करते आ रहे है। उन्होंने यह भी कहा है कि अपने कोई सम्पति अर्जित करने अथवा बेचने के पूर्व इसे छिपाने की उनकी कोई मंशा नहीं रही है। इस संबंध में विभाग का यह अभिमत है कि बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 19(2) में उपबंधित प्रावधान का आरोपित पदाधिकारी द्वारा उल्लंघन किया गया है, क्याेंकि न तो उनके द्वारा किसी चल/अचल सम्पति के अर्जन की सरकार को पूर्व जानकारी दी गई है और न ही ऐसी सम्पतियों के संव्यवहार की सूचना यथा निर्धारित अवधि के अंदर उनके द्वारा सरकार में दी गई है।

इस आरोप के संबंध में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपना प्रतिवाद दाखिल करते हुए यह कहा गया है कि जो सम्पति परिवार के किसी सदस्य द्वारा उनके निजी श्रोत से अर्जित है, उसपर उक्त नियम लागू नहीं होता है। अपने इस166

क्र0 परिसम्पति परिसम्पति की राशि
1. श्रीमति ममता पूवे र् के नाम से मौजा पंटा, दरभंगा मे 09 कट्ठा यानि 39.13 ं डिसमल जमीन खरीदा गया, जिसका दस्तावेज संख्या-11636 दिनांक 04.08.2009 है। रू0 2,16,595/- (निबंधन एवं मुद्रांक शुल्क सहित)
2. श्रीमति ममता पूवे र् के नाम से मौजा पंटा, दरभंगा में 1.09 डिसमल जमीन जिसका दस्तावेज संख्या-11550 दिनांक 03.08.2009 है। रू0 16,477/- (निबंधन एवं मुद्रांक शुल्क सहित)
3. श्रीमति ममता पूर्वे के नाम से बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी, पटना में दिनांक 01.06.2000 का फ्लैट संख्या-03एस0एफ0ए0 1/37 खरीदा गया। रू0 4,09,546/-
4. श्री भरत पूर्वे के नाम से बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी, पटना में दिनांक 01.12.2001 को फ्लैट संख्या-03 एस0एफ0ए0 1/40 खरीदा गया। रू0 5,11,000/-
5. श्री भरत पूर्वे के नाम से पाटलीग्राम कुम्हरार, पटना में दिनांक 29.08. 2010 का फ्लैट संख्या-104(k) की बुकिंग हेतु जमा की गई राशि। रू0 18,40,000/-

बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 कथन के समर्थन में उनके द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना के परिपत्र संख्या-21734 दिनांक 15.11.1976 जो बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 19 का स्पष्टीकरण है को संदर्भित किया गया है तथा उनके द्वारा कहा गया है कि उनकी सम्पति की जानकारी विभाग को पूर्व से ही है, क्योंकि इसका अर्जन उन्होने भविष्य निधि मद से अग्रिम प्राप्त कर किया है तथा ऐसे अग्रिम की स्वीकृति विभाग द्वारा ही दी जाती है। परंतु यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा न्यायालय में समर्पित प्रतिवेदन में आरोपित पदाधिकारी एवं उनकी पत्नी के नाम पर अचल परिसम्पति के रूप में पाई गयी सम्पतियों का ब्यौरा निम्नरूपेण दर्शाया गया है :- क्र0 परिसम्पति 1. श्रीमति ममता पूर्वे के नाम से मौजा पंटा, दरभंगा में 09 कट्ठा यानि 39.13 डिसमल जमीन खरीदा गया, जिसका दस्तावेज संख्या-11636 दिनांक 04.08.2009 है।

यद्यपि आरोपित पदाधिकारी ने अपने अभिकथन में अपने नाम से अर्जित उक्त अचल सम्पतियों के संबंध में इसे अपने भविष्य निधि मद में संचित राशि से अग्रिम प्राप्त कर करने की बात कही है, परंतु उनके द्वारा ली गई अग्रिम राशि का कोई ब्योरा साक्ष्य स्वरूप संलग्न नहीं किया गया है, जबकि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा निगरानी न्यायालय में समर्पित प्रतिवेदन में आरोपित पदाधिकारी द्वारा भविष्य निधि कार्यालय भोजपुर से प्राप्त की गई राशि में पहली बार 3.00 लाख रूपये एवं दूसरी बार 50 हजार रूपये अर्थात कुल तीन 3.50लाख रूपये तथा यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, श्री कृष्णा नगर, पटना से कार हेतु ऋण के रूप में 2,50,000 रूपये तथा पुत्र की पढाई के लिए एस0बी0आई0 शाखा, एन0एम0सी0एच0, पटना से 3. 50लाख रूपये ऋण प्राप्त किये जाने का उल्लेख अपने प्रतिवेदन में किया है। इस प्रकार आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने भविष्य निधि से संचित राशि से प्राप्त अग्रिम एवं बैंक से प्राप्त ऋण का कुल रकम 9,50,000/-रूपये है, जबकि उनके एवं उनकी पत्नी के पास पाई गयी परिसम्पतियों की कुल आकलित राशि 1,31,48,234/- रूपये है। इस प्रकार आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा अपने अनुसंधान के क्रम में पाये गये तथ्यों एवं आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने बचाव-बयान में निहित तथ्यों से मेल नहीं खाता है। यह बात सही है कि बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम-19 का उपनियम-02 एवं 03 तभी प्रवृत होगा जब सरकारी सेवक या तो स्वयं अपने नाम पर या परिवार के किसी अन्य सदस्य के नाम पर सम्पति अर्जित करे। यह भी सही है कि सरकारी सेवक के परिवार के कोई सदस्य यदि निजी श्रोत से या विरासत में (Inheritance) कोई सम्पति अर्जित करता है तो ऐसी अर्जित की गई सम्पति पर उक्त नियम लागू नहीं है परंतु आलोच्य मामले में उल्लिखित तथ्यों से इस बात की पुष्टि होती है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा स्वयं ऐसी परिसम्पतियाँ अवैध तरीके से अपनी पत्नी के नाम पर अर्जित की गई है। अगर ऐसी परिसम्पतियाँ आरोपित पदाधिकारी की पत्नी द्वारा अपना निजी व्यवसाय अथवा निजी आय श्रोत से अर्जित की गई, तो सुनवाई के क्रम में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपनी पत्नी द्वारा प्रति वर्ष दाखिल आयकर विवरणी की छायाप्रतियाँ क्याें नहीं प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार अपुष्ट एवं अपर्याप्त साक्ष्य की स्थिति में आरोपित पदाधिकारी द्वारा अभिकथित तथ्यों को प्रमाणिक मानने का कोई आधार नहीं है।

अतः उक्त परिपेक्ष्य में आरोपित द्वारा इस आरोप के संबंध में दिया गया स्पष्टीकरण एवं बचाव बयान मान्य नहीं है। अतएव आरोप संख्या-02 प्रमाणित होता है।

आरोपित पदाधिकारी श्री पूर्वे के विरूद्ध तीसरे आरोप में यह कहा गया है कि उनके विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने संबंधी थाना कांड संख्या-36/13 दिनांक 13.08.13 धारा-13(2)सहपठित धारा-13(1) ई भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज कराया गया है तथा अनुसंधान में पाये गये तथ्यों के अनुसार उनके द्वारा अर्जित सम्पति कुल 1,68,41,112/- तथा अनुमानित बचत 67,00,000/- रूपये है। इस तरह 1,68,41,112.00-67,00,000.00 =1,01,41,112.00 उनके द्वारा अपने पदीय कर्त्तव्यों का दुरूपयोग कर अवैध एवं भ्रष्ट तरीके से अर्जित किये जाने के लिए उन्हें दोषी पाया गया है।

इस आरोप के विरूद्ध आरोपित पदाधिकारी द्वारा मुख्य रूप से यह कहा गया है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा उनकी सम्पति का सही आकलन नहीं किया गया है। उनका यह भी कथन है कि आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा उनकी चल/अचल सम्पतियों के आकलन में उनकी पत्नी को अपने पिता, पुत्र एवं बहन से चेक, ड्राफ्ट एवं लेखा से हस्तान्तरण राशि को भी शामिल कर लिया गया है। उनका यह भी कहना है कि उनकी एवं उनकी पत्नी की कुल सम्पति अबतक किये गये बचत के अधीन है। पुनः उन्होने कहा है कि इस आरोप के संबंध में विभाग द्वारा दो बार अर्थात दिनांक 19.11.2014 एवं दिनांक 11.06.2015 को दो भिन्न-भिन्न मंतव्य भेजा गया है। दिनांक 19.11.14 के मंतव्य में विभाग द्वारा 81,21,100/- रूपये167 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 तथा दिनांक 01.06.15 के विभागीय मंतव्य में 1,01,41,112/- रूपये आय से अधिक सम्पति बतलाया गया, जबकि विभागीय समीक्षा में ऐसे अंतर का कोई उल्लेख नहीं किया गया। उन्होने यह भी कहा है कि उनके द्वारा स्वयं एवं उनकी पत्नी द्वारा अर्जित कुल सम्पति मात्र 61,71,000/- रूपये ही पाया गया, जो उनके कुल बचत 67,00,000/- रूपये से कम है और इस तरह उनके द्वारा आरोप को अप्रमाणित कहा गया है।

इस संबंध में दिनांक 19.11.2014 को विभागीय अभिमत में कहा गया है कि आरोपित पदाधिकारी का स्वयं 11,45,000/- एवं पत्नी द्वारा निवेशित राशि 75,75,000/- अर्थात कुल 87,20,000/- रूपये है। जबकि आर्थिक अपराध थाना कांड संख्या-36/13 में आरोपित पदाधिकारी की कुल सम्पति 1,68,41,112/- रूपये दर्शाया गया है। इस तरह आरोपी पदाधिकारी के पास पाई गयी कुल सम्पति 1,68,41,112.00-87,20,000.00=81,21,112/- रूपये को आरोपित पदाधिकारी द्वारा नाजायज एवं भ्रष्ट तरीके से अर्जित किये जाने का उल्लेख किया गया है। पुनः दिनांक 01.06.15 को गठित विभागीय मंतव्य में अपने पूर्व अभिमत को शामिल करते हुए यह माना गया है कि आरोपित पदाधिकारी की आय से कुल बचत 67,00,000/- रूपये है तथा पत्नी द्वारा निवेश की गई राशि 75,75,000/- रूपये में 25,49,000/- रूपये की वह राशि भी शामिल है, जो उनकी पत्नी को अपने पिता, पुत्र, भाई, बहन से प्राप्त हुआ था। तदनुसार उक्त 25,49,000/- रूपये को घटाकर निवेशित राशि 61,71,000/- रूपये विभाग द्वारा आकलित की गई है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध यह आरोप उनके विरूद्ध दिनांक 13.08.2013 को आर्थिक अपराध ईकाई थाना कांड संख्या-36/13 पर आधारित है। आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा दर्ज उक्त प्राथमिकी में संलग्न प्रतिवेदन में यह उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी के पास पाई गयी चल एवं अचल सम्पति का कुल अनुमानित मूल्य 1,68,41,112/- रूपये तथा अनुमानित बचत 67,00,000/- रूपये है और तदनुसार 1,68,41,112. 00-67,00,000.00=1,01,41,112.00 की सम्पति आरोपित पदाधिकारी द्वारा अपने पदीय कर्तव्यों का दुरूपयोग कर अवैध तरीके से अर्जित करने का उल्लेख किया गया है।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह मामला आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा दर्ज आर्थिक अपराध थाना कांड संख्या-36/13 से उद्‌भूत है, तथा यह भी प्रासंगिक है कि उक्त दर्ज प्राथमिकी के विरूद्ध आर्थिक अपराध ईकाई द्वारा अभियोग पत्र (Charge Sheet) निगरानी न्यायालय में समर्पित किया जा चुका है तथा एतद संबंधित सूचना पुलिस निरीक्षक-सह-अनुसंधानकर्त्ता आर्थिक अपराध ईकाई, पटना के पत्रांक-651, दिनांक 02.02.16 द्वारा विशेष कार्य पदाधिकारी, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना को दी जा चुकी है तथा उप सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार, पटना के पत्रांक-412, दिनांक 08.03.16 द्वारा आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध निगरानी न्यायालय में दाखिल अभियोग पत्र की छायाप्रति प्रासंगिक विभागीय कार्यवाही के सुनवाई के क्रम में प्रस्तुत भी किया गया है। उक्त अभियोग पत्र में अंतर्विष्ट तथ्यों के अवलोकन से यह पता चलता है कि आरोपित पदाधिकारी के पास कुल 1,31,67,748/- रूपये (जिसमें वेतन मद से 76,90,491/- एवं अन्य मद से 54,74,257/- रूपये) पाई गयी है तथा कुल व्यय के रूप में 63,63063/- रूपये आकलित किया गया है। इस तरह 1,31,64,748.00-63,36,063.00=68,28,685/- रूपये आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध अप्रत्यानुपातिक धनार्जन किये जाने का उल्लेख किया गया है। अनुसंधान के क्रम में यह भी पाये जाने का उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा अप्रत्यानुपातिक धनार्जन में उनकी पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे द्वारा भी सहयोग किया गया है, क्योंकि उनकी विभिन्न श्रोतों से आय 25,04,530/- रूपये बताया गया है, जबकि आयकर विवरणी के अनुसार उनकी आय मात्र 14,68,986/- रूपये ही है। प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी की पत्नी द्वारा अपने पति की अवैध कमाई को जायज ठहराने के लिए विभिन्न कारोबार का सहारा लिया गया है तथा अनुसंधान के उपरांत आरोपित पदाधिकारी के साथ उनकी पत्नी श्रीमती ममता पूर्वे को अप्राथमिकी अभियुक्त ठहरा कर भ्रष्टाचार निरोध अधिनियम-1988 की धारा 13(2) सहपठित धारा-13(1)ई एवं भारतीय दण्ड विधान की धारा-109 के अन्तर्गत सत्य पाकर अभियोग पत्र दाखिल किया जा चुका है।

अतः इस परिपेक्ष्य में आरोपित पदाधिकारी द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण बचाव बयान एवं लिखित बहस में उनके द्वारा उल्लेखित तथ्यों पर पर्याप्त साक्ष्य का सर्वथा अभाव है। तदनुसार इसे मान्य/स्वीकार करने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता है। अतएव आरोप संख्या-03 प्रमाणित होता है।

संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-2495 दिनांक 06.12.18 द्वारा श्री पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की मांग की गई।

उक्त के आलोक में श्री पूर्वे सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता द्वारा अपने पत्रांक-0 दिनांक 08.01.19 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें कही गई है :-

संचालन पदाधिकारी ने मेरे आरोप को सिद्ध करने का आधार आर्थिक अपराध इकाई द्वारा न्यायालय में समर्पित अनुसंधान प्रतिवेदन को बनाया है, आर्थिक अपराध ईकाई मेरे विरूद्ध भ्रष्टाचार का आरोप गठित की है। आरोप को सिद्ध करने के लिए वह न्यायालय में अनुसंधान प्रतिवेदन के साथ 84 गवाह एवं 600 पृष्ठ का दस्तावेज समर्पित किया गया है। उल्लेखनीय है एक ही तरह के साक्ष्य पर आधारित आरोप पर विभागीय कार्यवाही एवं न्यायालय दोनों में सुनवाई चल रही है। जिस विभाग (संस्थान) द्वारा मुझ पर आरोप लगाया गया है, आरोप को सिद्ध करने की जिम्मेदारी उसी की है। संचालन पदाधिकारी पुलिस के अनुसंधान प्रतिवेदन को सही मानते हुए अपना जाँच प्रतिवेदन विभाग में समर्पित किए है, परन्तु उनके द्वारा अनुसंधान प्रतिवेदन के साथ संलग्न 600 पृष्ठ का दस्तावेजों एवं 84 गवाहों में से किसी की भी जाँच नहीं की गई।168 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 मैं सुनवाई के क्रम में अपने पत्रांक शून्य दिनांक 13.01.2017 को संचालन पदाधिकारी से अनुरोध किया था कि आरोप को सिद्ध करने हेतु संबंधित अहम गवाहों की परीक्षण की जाए, परन्तु उनके द्वारा ऐसा नहीं किया गया। इस मामले में अनुसंधान कर्त्ता एक पुलिस निरीक्षक है उनके द्वारा तैयार किए गये प्रतिवेदन को सही मानकर यदि कारवाई हो तो न्यायालय की कोई आवश्यकता ही नहीं रहेगी, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आर्थिक अपराध ईकाई बिहार पुलिस का एक विभाग है वहाँ एक अनुसंधान कर्ता का प्रतिवेदन ही अंतिम होता है उसे कोई भी उपर के पुलिस पदाधिकारी जाँच नहीं करते है अन्यथा इस तरह का विसंगतिपूर्ण प्रतिवेदन तैयार ही नहीं होता।

आर्थिक अपराध इकाई द्वारा न्यायालय में समर्पित अनुसंधान प्रतिवेदन विसंगतियों से भरा है, जिसका उल्लेख मैं अपने जवाब में कर चुका हूँ मेरे तथा मेरी पत्नी से संबंधित कई हाय व्यय का गलत आकलन किया गया है, ऐसे संपति जैसे पत्नी का जेबर घरेलु सामान (जिसका कुल मूल्य लगभग 30 लाख आका गया है) आदि, जो चेक अवधि के पहले का है उसको भी स्वअर्जित दिखाया गया है जबकि इसका दस्तावेजी साक्ष्य आर्थिक अपराध इकाई द्वारा कोर्ट में समर्पित नहीं किया गया है, खाने मद में व्यय 25.75 लाख आका गया है। इसका भी कोई दस्तावेजी साक्ष्य नहीं है यह एक आपराधिक मामला है जिसका कोई भी दस्तावेजी साक्ष्य नहीं है उसकी सत्यता की जाँच गवाही से ही संभव है।

संचालन पदाधिकारी, पुलिस के अनुसंधान प्रतिवेदन में अंकित मेरे आय व्यय एवं संपति का आकलन को सही माना जिसकी जाँच आवश्यक थी, उनके प्रतिवेदन में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि मेरा कोई भी आय या संपति अवैध है। ऐसे मामले जिसकी जाँच केवल दस्तावेजो से नहीं की जा सकती वहाँ बिना गवाही के जाँच संभव ही नहीं है, साथ ही कई ऐसे दस्तावेज है जो अधूरे साक्ष्य पर आधारित है उसकी भी जाँच मौखिक गवाही से ही संभव है।

संचालन पदाधिकारी ने अपने जाँच प्रतिवेदन आर्थिक अपराधिक इकाई द्वारा न्यायालय में समर्पित जाँच प्रतिवेदन में मेरे तथा पत्नी के नाम का अचल संपति तथा उसकी राशि अंकित किया है ये संपति में निवेशित राशि है, ये सभी संपति घोषित है, राशि में अंतर का कारण है, सामान्य प्रशासन विभाग से निर्गत "Declaration of Asset and Liabilities" प्रपत्र के अनुसार संपतिओं का बाजार मूल्य अंकित किया गया है।

बिहार सरकारी (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय समय पर यथासंशोधित) के नियम-17(14) से स्पष्ट है कि आरोप सिद्ध करने के लिए मौखिक साक्ष्य आवश्यक है।

सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार सरकार के पत्रांक-15548 दिनांक 06.12.17 के क्रमांक-5 के अनुसार संचालन पदाधिकारी के लिए अभिलेखों एवं साक्षियों के परीक्षण एवं प्रति परीक्षण को आवश्यक माना गया है परन्तु मेरे अनुरोध करने के बाद भी संचालन पदाधिकारी द्वारा इसकी अनदेखी की गई।

उल्लेखनीय है कि विभागीय कारवाई एक अर्द्धन्यायिक प्रक्रिया है, जाँच पदाधिकारी के लिए अनिवार्य है कि आरोपित को उसके बचाव वास्ते स्वच्छ एवं समुचित अवसर प्रदान की जाए, समुचित अवसर के अन्दर प्रतिपरीक्षण आता है। मैं अपने पत्रांक शून्य दिनांक 13.01.2017 में यह भी उल्लेख किया हूँ कि आर्थिक अपराध इकाई के अनुरोध पर आय कर विभाग द्वारा मेरे एवं मेरी पत्नी के केई वर्षों के आयकर विवरणी एवं संपतियाँ की जाँच की गई तथा सभी संपति वैद्य पाया गया (आय-कर विभाग के द्वारा वर्ष 2012-13 के आकलन आदेश का सत्यप्रति संलग्न) मैं अपने परीक्षण के क्रम में इसे संचालन पदाधिकारी को देता परन्तु यह अवसर मुझे नहीं मिला। मैं लिखित बहस में स्वयं को गवाह के रूप में प्रस्तुत करने का अनुरोध किया था, उसे भी संचालन पदाधिकारी द्वारा नहीं मानकर एकतरफा निर्णय ले लिया गया है। यहाँ यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि किसी भी व्यक्ति के आय व संपति का सही आकलन आयकर विभाग ही कर सकता है एक पुलिस नहीं।

विभाग में मेरे पुरे सेवा काल में मेरे विरूद्ध ऐसा कोई भी कदाचार का मामला नहीं रहा है जिससे मेरे किसी कार्य से सरकारी संपति की कोई क्षति हुई हो। यह एक आपराधिक मामला है इसके सत्यता की जाँच केवल उपलब्ध दस्तावेज से नहीं हो सकती है।

प्रायः ऐसा पाया गया है कि विभागीय कार्यवाही में सरकारी निर्देशों का अनुपालन किए बिना, संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर की गई कार्रवाई न्यायिक रूप से सही नहीं माना जाता है।

अधूरी जाँच पर आधारित प्रतिवेदन पर या किसी धारणा के तहत मेरे विरूद्ध किसी प्रकार की कारवाई नहीं की जानी चाहिए।

श्री पूर्वे सेवानिवृत कार्य0 अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई जिसमें निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री पूर्वे ने अपने अभ्यावेदन में विभागीय कार्यवाही के दौरान उनके पक्ष को नहीं सुने जाने, जाँच पदाधिकारी एवं गवाही का परीक्षण एवं प्रतिपरीक्षण नहीं किये जाने, पुलिस अनुसंधान के आधार पर आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य देने एवं विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं देनेे की बात कही गई है, किन्तु आरोप पत्र में श्री पूर्वे के विरूद्ध रू0 1,01,41,112/- (एक करोड एक लाख एकतालीस हजार एक सौ बारह रूपये) अधिक परिसंपति अर्जित करने का जो आरोप है, उसके संबंध में इनके द्वारा किसी प्रकार का खंडन नहीं किया गया है और न ही कोई ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत किया गया जो प्रपत्र-क में गठित आरोपों को खंडित करते हो। संचालन पदाधिकारी (अपर विभागीय जाँच आयुक्त) द्वारा इन्हें सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया गया। विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान श्री पूर्वे द्वारा समर्पित बचाव बयान की विधिवत समीक्षा संचालन पदाधिकारी द्वारा कंडिकावार की गई है। संचालन पदाधिकारी ने श्री पूर्वे द्वारा दिये गये बचाव बयान एवं इसके साथ संलग्न कागजात तथा प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा समर्पित किये गये कागजात के समीक्षोपरांत प्रपत्र-'क' में गठित तीनों आरोपों को श्री पूर्वे को विरूद्ध प्रमाणित पाया है।169 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपाें के लिए सरकार द्वारा श्री भरत पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता को बिहार लोक सेवा आयोग के परामर्शोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-1919, दिनांक 03.09.2019 से निम्न दण्ड संसूचित किया गया - "शत प्रतिशत पेंशन पर स्थायी रूप से रोक" उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता पत्रांक-0, दिनांक 11.10.2019 से अपना पुनर्विचार अभ्यावेदन विभाग में समर्पित किया गया। जिसमें उनके द्वारा मुख्य रूप से निम्न तथ्यों का उल्लेख किया गया :-

(i) मैं कई बार अपने पत्रों में यह उल्लेख किया हूँ कि मेरे विरूद्ध लगाया गया आरोप एक आपराधिक मामला है, इसका दस्तावेजी साक्ष्य आर्थिक इकाई द्वारा एकत्र किया गया है तथा न्यायालय में समर्पित अंतिम प्रतिवेदन उसी साक्ष्य पर आधारित है।

(ii) विभागीय कार्यवाही एवं न्यायालय में चल रही कार्यवाही दोनों का आरोप एक ही है तथा दोनों ही एक ही तरह के साक्ष्य पर आधारित है।

(iii) उसी साक्ष्य के आधार पर मैं अपना जवाब समर्पित किया हूँ। आर्थिक अपराध इकाई का जाँच प्रतिवेदन उनके द्वारा उपलब्ध किए गए साक्ष्य पर आधारित नहीं है। जिसकी जाँच न्यायालय में चल रही है।

(iv) विभाग को मेरे जवाब की समीक्षा के पूर्व पहले यह साक्ष्य उपलब्ध करना चाहिए था। जो नहीं किया गया। बिना साक्ष्य देखे जाँच प्रतिवेदन सही है या गलत यह कैसे समझा जा सकता है।

(v) प्रासंगिक पत्र में पुलिस के प्रतिवेदन का बार-बार उल्लेख किया गया है। परन्तु यह प्रतिवेदन कैसे तैयार किया गया उस पर एकबार भी नहीं विचार किया गया।

(vi) सरकार द्वारा विभागीय कार्यवाही की पद्धति निर्धारित है। यह एक अर्धन्यायिक प्रक्रिया है, आरोप को साबित करने के लिए गवाह एवं दस्तावेजी साक्ष्य दोनों की जाँच होनी चाहिए था।

(vii) संचालन पदाधिकारी द्वारा न दस्तावेज और न ही गवाह दोनों में से किसी की जाँच की गई। आज भी विभाग के पास वह दस्तावेज नहीं है जो आरोप को साबित करने के लिए मामले के अनुसंधानकर्त्ता द्वारा अनुसंधान के दौरान एकत्र किया गया था।

(viii) दण्ड संसूचन पत्र में केवल पुलिस जाँच प्रतिवेदन तथा मेरे जवाब का उल्लेख है उस दस्तावेज का जिक्र तक नहीं है। जिसके आधार पर यह जाँच प्रतिवेदन तथा मेरा जवाब है।

(ix) Paul Anthony Vs Bharat Gold Mines Ltd. and another माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा दिए गये निर्णय के अनुसार एक ही तरह के साक्ष्य एवं तथ्य पर आधारित विभागीय कार्यवाही स्थगित कर दिया जाना चाहिए।

(x) मेरे आय तथा सम्पति की जाँच आयकर विभाग द्वारा आर्थिक अपराध इकाई के अनुरोध पर किया गया परन्तु आयकर विभाग के निर्णय को अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा देखा तक नहीं गया।

श्री पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता से प्राप्त पुनर्विचार अभ्यावेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :-

श्री पूर्वे ने अपने पुनर्विचार अभ्यावेदन में उल्लेख किया है कि इस मामले में उनके विरूद्ध आर्थिक अपराधिक इकाई द्वारा प्राथमिकी दर्ज की गई है। जिसका विचारण न्यायालय में चल रहा है। चूँकि एक ही मामले में आपराधिक कार्यवाही एवं विभागीय कार्यवाही साथ-साथ नहीं चल सकती है। इसलिए विभाग द्वारा संचालित विभागीय कार्यवाही विधि सम्मत नहीं है एवं न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत है। श्री पूर्वे ने अपने पुनर्विचार अभ्यावेदन में यह भी अंकित किया है कि आरोप पत्र के साथ संलग्न साक्ष्य के आधार पर संचालन पदाधिकारी ने आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया है जो सही नहीं है। श्री पूर्वे के विरूद्ध आय के ज्ञात श्रोत से 1,01,41,112/- की परिसम्पति अर्जित करने के आरोप के लिए आर्थिक आपराधिक इकाई द्वारा प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप पत्र में मूल आरोप यह है कि श्री पूर्वे ने अपने पदीय शक्ति का दुरूपयोग करते हुए अवैध रूप से धर्नाजन किया है। इस मामले में अपर विभागीय जाँच आयुक्त-सह-प्रधान सचिव, खान एवं भूतत्व विभाग, बिहार, पटना संचालन पदाधिकारी नियुक्त थे। संचालन पदाधिकारी ने आरोप पत्र के साथ संलग्न साक्ष्य एवं श्री पूर्वे द्वारा समर्पित बचाव बयान के विस्तृत समीक्षोपरांत यह अभिमत गठित किया है कि श्री पूर्वे के विरूद्ध आरोप पत्र में गठित आरोप संख्या-1, 2 एवं 3 प्रमाणित होते है। भ्रष्ट आचरण ज्ञात श्रोत से कुल 1,01,41,112/- रू0 की परिसम्पति अर्जित करना बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली 1976 के नियम-19 के प्रतिकूल है।

उक्त के आलोक में श्री पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता के पुनर्विचार अभ्यावेदन को निरस्त करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड को यथावत रखने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

अतएव सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री भरत पूर्वे, सेवानिवृत कार्यपालक अभियंता, 3, SFA- 1/37 बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी, पटना-26 के पुनर्विचार अभ्यावेदन को निरस्त करते हुए पूर्व में संसूचित दण्ड यथा "शत प्रतिशत पेंशन पर स्थायी रूप से रोक" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 170

6 फरवरी 2020

सं॰ 22/नि0सि0(सम0)02-08/2017-178--श्री संजय कुमार सुमन (आई0डी0-5089), तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या-02, झंझारपुर के पद पर पदस्थापित थे तब श्री सुमन के विरूद्ध बाढ़ संघर्षात्मक कार्य संबंधी विभागीय आदेशों की अवहेलना करने, अपने कार्यक्षेत्र से अनुपस्थित रहने, संवेदनशील कार्य के प्रति घोर लापरवाही एवं स्वेच्छाचारिता बरतने संबंधी मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, समस्तीपुर के बेतार संदेश के समीक्षोपरांत प्रथम दृष्टया प्रमाणित आरोपों के लिए अधिसूचना संख्या-1614, दिनांक 14.09.17 द्वारा निलंबित कर विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1679, दिनांक 20.09.17 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 में विहित रीति के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी।

विभागीय कार्यवाही के संचालन हेतु नियुक्त संचालन पदाधिकारी द्वारा विभाग में समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री सुमन के विरूद्ध आरोप पत्र में गठित आरोप को तीन भाग (अंश) में विभक्त कर मामले के समीक्षोपरांत प्रथम अंश एवं तृतीय अंश को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी एवं समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए निम्न प्रमाणित आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक-1112, दिनांक 22.05.18 द्वारा जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति संलग्न करते हुए श्री सुमन से द्वितीय कारण पृच्छा की गयी -

आरोप -01- (प्रथम अंश) -कमला बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 73.50 एवं 74.60 पर हुए टूटान के कट इंड को होल्ड करने हेतु दिये गए निदेश को अनदेखी करना, जो आदेश की अवहेलना दर्शाता है एवं कार्य के प्रति उदासीनता दर्शाता है।

आरोप -03- (तृतीय अंश) -बाढ़ संघर्षात्मक कार्य हेतु पर्याप्त मात्रा में सामग्री एवं मानव बल की व्यवस्था नहीं कर बाढ़ संघर्षात्मक जैसे महत्वपूर्ण कार्य में घोर लापरवाही बरते जाने के कारण जान-माल की क्षति पहुँचना।

उक्त के आलेाक में श्री सुमन द्वारा विभाग में समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब में मुख्यतः निम्न बातें कही गयी -

आरोप -01-(प्रथम अंश)-अधीक्षण अभियंता, बाढ़ नियंत्रण योजना एवं मोनिटरिंग अंचल, पटना के बेतार संवाद-348, दिनांक 13.08.17 का उल्लेख करते हुए श्री सुमन द्वारा कहा गया है कि कमला-बलान दायाँ तटबंध के कि0मी0 72.50 का पूर्ण प्रभार कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल संख्या-01, झंझारपुर को सौपा गया था। फलतः कि0मी0 74. 60 के कट इन्ड को होल्ड करने के लिए दिनांक 14.08.17 को 25000ई0सी0 बैग संवेदक श्री पप्पु सिंह को दिया गया, जिसे भरकर रखा गया था। जिस पर संचालन पदाधिकारी द्वारा ध्यान नहीं दिया गया।

आरोप -03-(तृतीय अंश)-श्री सुमन, तत्कालीन सहायक अभियंता द्वारा कहा गया है कि उक्त आरोप को प्रमाणित करने के लिए प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी कोई गवाह एवं साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जबकि 44.0 कि0मी0 से 75.0 कि0मी0 के बीच दिनांक 13.08.17 के मध्य रात्रि से पूरी गति से कार्य कराया गया है जिसमें 108,800 ई0सी0 बैग का उपयोग किया गया है। साथ ही अन्य सामग्री NC का उपयोग किया गया है।

उक्त के आलोक में श्री सुमन से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के जवाब की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गयी जिसमें निम्न तथ्य पाया गया -

श्री सुमन द्वारा आरोप के प्रथम अंश के लिए अपने बचाव बयान में वही तथ्य को दोहराया गया है जो संचालन पदाधिकारी के समक्ष रखा गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा अपने जाँच प्रतिवेदन में उल्लेखित किया गया है कि मुख्य अभियंता के NR-56 दिनांक 14.08.17 में कट इण्ड को होल्ड करने के लिए कार्यपालक अभियंता को स्मारित किया गया एवं उस पत्र में श्री सुमन का भी नाम का उल्लेख है। बेतार संवाद-349, दिनांक 13.08.17 से स्पष्ट होता है कि विभाग द्वारा टूटान स्थल के मरम्मति हेतु मुख्य अभियंता, समस्तीपुर को बाढ़ संघर्षात्मक सामग्री की व्यवस्था का कार्य भार सौंपा गया है। इससे स्पष्ट है कि उक्त स्थल पर आवश्यकतानुसार सामग्री की व्यवस्था होना परिलक्षित नहीं होता है। ऐसी स्थिति में आरोपी का कथन कि कि0मी0 74.60 पर बाढ़ सामग्री उपलब्ध कराया गया था, स्वीकार योग्य नहीं है। उक्त के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप के प्रथम अंश को प्रमाणित माना गया है।

श्री सुमन द्वारा आरोप के तृतीय अंश के संबंध में कहा गया है कि प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा उक्त आरोप को प्रमाणित करने के लिए कोई गवाह या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जबकि 44.0 कि0मी0 से 75.0कि0मी0 के बीच दिनांक 13.08.17 के मध्य रात्रि से पूरी गति से कार्य कराया गया है जिसमें 108,800 ई0सी0 बैग का उपयोग किया गया है। साथ ही अन्य सामग्री NC का उपयोग किया गया है।

उक्त के आलोक में कहना है कि दिनांक 13.08.17 एवं 14.08.17 को कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के प्रगति प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि तटबंध के विभिन्न रीच में बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराया गया है परन्तु उक्त दोनों टूटान बिन्दुओं यथा 73.5 कि0मी0 एवं 74.60 कि0मी0 (यथा Specific टूटान बिन्दु) उक्त तिथि को कार्य कराया जाना परिलक्षित नहीं होता है। ऐसी स्थिति में आरोपी का यह कथन कि दिनांक 13.08.17 के मध्य रात्रि से कार्य कराकर तटबंध को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है, स्वीकार योग्य नहीं है। इस प्रकार संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए आरोप के तृतीय अंश को प्रमाणित माना गया है।

उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री सुमन द्वारा बाढ़ संघर्षात्मक कार्य विभागीय आदेशों की अवहेलना करने, संवेदनशील कार्यों के प्रति घोर लापरवाही एवं स्वेच्छाचारिता बरतने संबंधी आरोपों के संबंध में दिया गया द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब स्वीकार योग्य नहीं है। फलस्वरूप श्री संजय कुमार सुमन, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल171 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 सं0-02, झंझारपुर को निलंबन मुक्त करने एवं प्रमाणित आरोप के लिए "आठ (08) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" का दण्ड देने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया। तदालोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-2168, दिनांक 26.09.18 द्वारा श्री सुमन को निलंबन मुक्त किया गया। विभागीय अधिसूचना संख्या-1460, दिनांक 12.07.19 द्वारा श्री संजय कुमार सुमन, तत्कालीन सहायक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल सं0-02, झंझारपुर को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया गया। " आठ (08) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" उक्त दण्ड के विरूद्ध श्री सुमन, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी का मुख्य अंश निम्नवत्‌ हैः- (i) कंडिका 2 से 6 तक में नियमावली 2005 के कंडिका 25, दिये गये दण्ड, तटबंध टूटान का कारण तथा Force Majeure का उल्लेख किया गया है।

कंडिका 7 में कहा गया है कि अप्रत्याशित बाढ़ के कारण संघर्षात्मक कार्य में संलग्न श्रमिकों भाग जाने, किसानों द्वारा टै्रक्टर उपलब्ध नहीं कराना, तथा भेजे जा रहे बाढ़ सामग्री को बीच रास्ते में उतार लिये जाने का उल्लेख किया गया है। इस संदर्भ में कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 96 दि॰ 19.01.18 में अंकित होना कि दि॰ 13. 08.17 के रात्रि में कमला बलान के बायाँ तटबंध के कि॰मी॰ 67.20 से टै्रक्टर बालू भरा EC bags 300 बैग कमला बलान दायाँ तटबंध के निकट 73.40 भेजा गया। परन्तु तीसरा टै्रक्टर जन विरोध के कारण नहीं जा सका। (ii) कार्यपालक अभियंता के पत्रांक 484 दि॰ 30.05.18 के माध्यम से दि॰ 13.08.17 एवं 14.08.17 में यह उल्लेख किया है कि दिनांक 13.08.17 एवं 14.08.17 को कि॰मी॰ 44.0 से 75.0 के बीच कराये गये विभिन्न बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में NR में मुख्य अभियंता का NR-56 दि॰ 14.08.17 प्रमंडलीय कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। इससे स्थापित होता है कि दिनांक 13.08.17 एवं 14.08.17 को दायाँ कमला बलान तटबंध के कि॰मी॰ 44-75 के बीच विभिन्न बिन्दुओं पर पूरी सजगता एवं तत्परता से बाढ़ संघर्षात्मक कार्य मेरे द्वारा कराया गया। इससे स्वतः स्पष्ट है कि उनके विरूद्ध बाढ़ संघर्षात्मक कार्य संबंधी विभागीय आदेशों की अवहेलना, अपने कार्य से अनुपस्थित रहना, संवेदनशील कार्यो के प्रति घोर लापरवाही एवं स्वेच्छाचारिता का आरोप पूर्णतः निराधार है।

(iii) संचालन पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत अपने बचाव बयान दि॰ 13.10.17 में भी इन्हीं सभी तथ्यों का उल्लेख किया गया है। लगाये गये तीनों आरोपों के संदर्भ में आरोपवार बचाव बयान में उल्लेख किया गया था।

(iv) द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर में GFCC रसियारी पुल के निकट तटबंध के संदर्भ में दी गयी रिर्पोट की प्रति संलग्न की गयी थी। रसियारी के पास कमला बलान दायाँ तटबंध अतिसंवेदनशील है, इसमें आशंका व्यक्त की गयी है कि Breaches in the embankment may be occur in swing mensoon if the suggested guide bundh or suggested training work which not provided on immediate basis .

(v) दिनांक 13.08.17 एवं 14.08.17 को बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में उनके माध्यम से कुल 108880 अदद्‌ ई॰सी॰ बैग का उपयोग भी संवेदक द्वारा किया गया। इसके सत्यापन के बाद अपेक्षित भुगतान भी किया गया। साथ ही अन्य सामग्री NC का भी प्रयोग किया गया था। कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल-2, झंझारपुर द्वारा प्रेषित पृ॰ 2, 3, 4 एवं 5 में ORG 124 (F) के NR 56 दि॰ 14.08.17 के लोकेशन 73 कि॰मी॰ से 75 कि॰मी॰ दायाँ कमला बलान तटबंध जो टूटान स्थल था वहाँ पर कुल 25500 ई॰सी॰ बैग एवं 710 NC दिखलाया गया है। जो प्रमाणित करता है कि टूटान स्थल पर भी पूरी तत्परता से कार्य कराया गया था।

(vi) कंडिका-16 में संसूचित दण्ड को नियम सम्मत एवं न्याय संगत नहीं होना बताया गया है। (vii) कंडिका-17 एवं 18 में नियमावली 2005 के नियम 25 (2) (ख) एवं 27 (2) (ग) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि अनुशासनिक प्राधिकार का निष्कर्ष अभिलेख पर रखे साक्ष्य द्वारा समर्पित नहीं है। अधिरोपित दण्ड को कठोर दण्ड कहा गया है। जबकि उनके द्वारा पूरी तत्परता एवं सुगमता से बाढ़ संघर्षात्मक कार्य किया गया था। (viii) कंडिका 19 में कतिपय सुसंगत माननीय सर्वोच्य न्यायालय के पारित न्यायदेश की छायाप्रति संलग्न करते हुए कहा गया है कि अधिरोपित आठ वेतन वृद्धि संचयात्मक प्रभाव से रोक की शक्ति पर कोई न्यायसंगत औचित्य नहीं है। तथा अधिसूचना सं॰ 1460 दि॰ 12.07.19 को निरस्त करने का अनुरोध किया गया है। समीक्षा :-

इनके विरूद्ध आरोप है कि प्रश्नगत स्थल पर टूटान के पश्चात कट इण्ड को होल्ड करने में दिये गये निदेश को अनदेखी करना जो आदेश की अवहेलना तथा कार्य के प्रति उदासीनता दर्शाता है तथा बाढ़ जैसे महत्वपूर्ण कार्य में घोर लापरवाही बरते जाने के कारण जान-माल की क्षति होने से संबंधित है।

श्री सुमन द्वारा अपने पुनर्विलोकन अर्जी में लगभग वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया है जो उनके द्वारा संचालन पदाधिकारी एवं द्वितीय कारण पृच्छा में उद्धित किया गया है जिसकी समीक्षा पूर्व में किया जा चुका है एवं गठित तीन आरोपों में से आरोप सं॰ 1 एवं 3 प्रमाणित पाया गया है।

इनके द्वारा आरोप-1 के संदर्भ में कहा गया है कि दिनांक 13.08.17 एवं 14.08.17 को दायाँ कमला बलान तटबंध के कि॰मी॰ 44-75 के बीच विभिन्न बिन्दुओं पर पूरी सजगता एवं तत्परता से बाढ़ संघर्षात्मक कार्य उनके द्वारा कराया गया है। साक्ष्य के रूप में दि॰ 14.08.17 एवं 15.08.17 को कार्यपालक अभियंता द्वारा समर्पित प्रगति प्रवितेदन (बेतार संवाद सं॰ 124 'F' दि॰ 14.08.17 एवं 126 'F' दि॰ 15.08.17) की प्रति दिया गया है। उक्त दोनों172 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 प्रतिवेदन के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि कि॰मी॰ 70-75 के बीच कुछ कार्य कराया गया है। परन्तु आरोप का बिन्दु है कि निदेश के बावजूद टूटान स्थल के कट इण्ड के प्रोटेक्शन कार्य ससमय नहीं कराया गया है। उक्त प्रतिवेदन से स्थापित किया जाना संभव नहीं है कि कट इण्ड के प्रोटेक्शन का कार्य कराया गया है अथवा नहीं। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि प्रश्नगत टूटान के कट इण्ड को होल्ड करने का पूर्ण प्रयास किया गया एवं बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के लिये प्रयाप्त मात्रा में सामग्री एवं मानव बल की व्यवस्था की गयी थी। परन्तु उक्त कथन के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। अतएव साक्ष्य विहिन बचाव बयान स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है।

आरोप-(ii) :- यथा बाढ़ संघर्षात्मक कार्य हेतु प्रर्याप्त मात्रा में सामग्री एवं मानव बल का व्यवस्था नहीं कर कार्य में घोर लापरवाही बरतने के संबंध में कहा गया है कि दि॰ 13.08.17 एवं 14.08.17 को उनके द्वारा बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में कुल 108,880 अदद्‌ ई॰सी॰ बैग का प्रयोग एक रात में किया गया। जिसके सत्यापन के बाद अपेक्षित भुगतान भी किया गया है साथ ही अन्य सामग्री NC का भी प्रयोग किया गया था। कि॰मी॰ 73 से 75 दायाँ कमला बलान तटबंध जो टूटान स्थल था वहाँ पर कुल 25500 अदद्‌ ई॰सी॰ बैग एवं 710 NC दिया गया है जो प्रमाणित करता है कि टूटान स्थल पर भी पूरी तत्परता के साथ बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराया गया था। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि मुख्य अभियंता के बेतार संवाद एवं अधीक्षण अभियंता, बाढ़ योजना एवं मोनिटरिंग द्वारा दिये गये मंतव्य में उल्लेख है कि पूर्व से ही प्रचुर मात्रा में बाढ़ संघर्षात्मक सामग्री, मजदूर एवं संवेदक की व्यवस्था नहीं रखने के कारण बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रभावित होता रहा। अनुमंडल पदाधिकारी विरौल के द्वारा दि॰ 17.05.17 को किये गये स्थल निरीक्षण में 68वें कि॰मी॰ के आगे बाँध का विशेष ध्यान रखने की दिये गये सलाह दिया गया है परन्तु ऐसा नहीं किया गया एवं तटबंध क्षतिग्रस्त हो गया जो आरोपी का कार्य में लापरवाही दर्शाता है। दिनांक 13.08.17 एवं 14.08.17 को कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य के प्रगति प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि तटबंध के विभिन्न रीच में कार्य कराया गया है। परन्तु उक्त दोनों टूटान बिन्दु पर उक्त तिथि को कार्य कराया जाना परिलक्षित नहीं होता है। ऐसे में आरोपी का कथन कि दि॰ 13.08.17 की मध्य रात्रि से कार्य कराकर तटबंध को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है। इस प्रकारं श्री सुमन, तत्कालीन सहायक अभियंता से प्राप्त पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है।

अतएव सरकार द्वारा लिए गए उक्त निर्णय के आलोक में श्री संजय कुमार सुमन(आई0डी0-5089), तत0 सहायक अभियंता के पुनर्विलोकन अर्जी को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना सं0-1460, दिनांक 12.07.19 द्वारा संसूचित निम्न दण्ड "आठ (08) वेतन वृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक" को यथावत रखा जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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4 फरवरी 2020

सं॰ 22/नि0सि0(कटि0)25-11/2017-171--श्री रमेश कुमार (आई0डी0-3829) कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, भागलपुर के विरूद्ध बाढ़ 2017 के दौरान चन्दन नदी के बाँयें एवं दाँयें तटबंध के विभिन्न बिन्दुओं पर टूटान होने की गलत सूचना देने के आरोप के लिए स्पष्टीकरण की माँग की गयी। श्री कुमार से प्राप्त स्पष्टीकरण के सम्यक समीक्षोपरांत विभागीय अधिसूचना संख्या-2094, दिनांक 27.09.2019 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया है :-

(i) आरोप वर्ष के लिए निन्दन। (ii) एक वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक। उक्त संसूचित दण्ड के विरूद्ध श्री रमेश कुमार, कार्यपालक अभियंता द्वारा पुनर्विचार अभ्यावेदन समर्पित किया गया जिसकी समीक्षा निम्नरूपेण की गयी :-

चन्दन मेन नदी में सारण के पास तटबंध ब्रीच होने की सूचना अभियंता प्रमुख को दि॰ 02.10.17 को संध्या में अधोहस्ताक्षरी द्वारा दी गयी। दि॰ 03.10.17 को उक्त बिन्दु के टूटान के अलावे चन्दन पुरैनी नदी के सोन्डीहा सोन्हौली निर्मित पुल के D/S में बायाँ तटबंध लगभग 20 मी॰ एवं दायाँ तटबंध में लगभग 15 मी॰ की लम्बाई में तथा इस पुल से लगभग 400 मी॰ D/S में दायाँ तटबंध लगभग 130 मी॰ एवं बायाँ तटबंध लगभग 40 मी॰ में हुए टूटान की सूचना दी गयी। तत्कालीन मुख्य अभियंता द्वारा NR No. 12 दि॰ 03.10.17 से चान्दन मेन नदी में सारथ के पास तटबंध ब्रीच होने की गलत सूचना का प्रेषण बताया गया। इस पर अभियंता प्रमुख तत्कालीन मुख्य अभियंता को स्थल निरीक्षणोपरान्त विस्तृत प्रतिवेदन उपलब्ध कराने का निदेश दिया गया। मुख्य अभियंता द्वारा समर्पित प्रतिवेदन में सारथ मौजा अन्तर्गत दोस्तानी ग्राम के निकट तटबंध में हुए टूटान को सही प्रतिवेदित किया गया। चान्दन पुरैनी नदी में उनके द्वारा प्रतिवेदित चार अदद्‌ टूटान में 130 मी॰ लम्बाई वाले टूटान को सही पाया गया। 40 मी॰ की लम्बाई वाले टूटान को पूर्व से आवागमन के रास्ते के कारण क्षतिग्रस्त, 20 मी॰ वाले टूटान को Cattle Crossing की तरह क्षतिग्रस्त एवं 15 मी॰ वाले लम्बाई वाले टूटान को ट्रैक्टर के आने जाने का रास्ता बताया गया। 20 मी॰ लम्बाई वाले भाग को छोड़कर शेष सभी बिन्दुओं से पानी का बाहर जाना स्वीकार किया गया। पुरैनी नदी में बने रेल ब्रीज के U/S दायें एवं बायें में पानी प्रवाहित होना माना गया तथा प्रतिवेदित किया गया कि उनके द्वारा इसे टूटान प्रतिवेदित किया गया है। संसूचित दण्ड निम्न कारणों से दूषित है।173 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 (i) उपुर्यक्त प्रसंग में वर्णित अधिसूचना के वि॰(1) पर वर्णित स्थल की समीक्षा गलत रूप से की गयी है। इस बिन्दु को मेरे द्वारा आवागमन का रास्ता प्रतिवेदित नहीं किया गया और नही तत्कालीन मुख्य अभियंता द्वारा संयुक्त प्रतिवेदन में इसे आवागमन का रास्ता प्रतिवेदित किया गया है। पुनः इसी बिन्दु को Cattle Crossing की तरह समीक्षा की गयी है। जिसे किसी के द्वारा प्रतिवेदित नहीं किया गया है। वस्तुतः इस बिन्दु पर उनके द्वारा टूटान प्रतिवेदित किया गया है। इस बिन्दु पर हुए टूटान का फोटोग्राफ वर्ष 2017 एवं वर्ष 2018 में बाढ़ पीड़ितों द्वारा काम चलाऊ मरम्मति करने के बाद का लिया गया फोटो संलग्न किया जा रहा है।

(ii) सोन्डीहा-सोन्हौली PMGSY द्वारा निर्मित पुल के D/S में बायाँ तटबंध लगभग 20 मीटर में Cattle crossing की तरह क्षतिग्रस्त माना गया एवं तटबंध से पानी पार नहीं होना माना गया। इस बिन्दु पर हुए टूटान का फोटो वर्ष 2017 एवं वर्ष 2018 में बाढ़ पीड़ितों द्वारा कामचलाऊ मरम्मति करने के बाद का लिया गया फोटो संलग्न किया जा रहा है। इनके निरीक्षण के समय लिये गये फोटो से इस बिन्दु पर टूटान होने एवं तटबंध से पानी पार होने के सबूत देखा जा सकता है।

(iii) सोन्डीहा- सोन्हौली पुल के D/S में दायाँ तटबंध 15 मी॰ की लम्बाई में हुए टूटान को संयुक्त प्रतिवेदन में ट्रैक्टर के आने जाने का रास्ता बताया गया है। इस बिन्दु पर हुए टूटान का फोटो वर्ष 2017 एवं वर्ष 2018 में बाढ़ पीड़ितों द्वारा मरम्मति करने के बाद का लिया गया है। उच्च जलश्राव के समय तटबंध की उपरी भाग का मिट्‌टी काटते हुए पानी पार किया था। इस कारण तटबंध टूटान प्रतिवेदित किया गया था। तटबंध के दाँयें भाग में पानी पार करना एवं बायें भाग में पानी पार नहीं करने का उल्लेख संयुक्त प्रतिवेदन में किया गया है।

(iv) सोन्डीहा-सोन्हौली PMGSY द्वारा निर्मित पुल से लगभग 400 मी॰ D/S में बायाँ तटबंध लगभग 40 मी॰ में अधोहस्ताक्षरी द्वारा प्रतिवेदित किये गये टूटान को संयुक्त प्रतिवेदन में आवागमन रास्ता के चलते क्षतिग्रस्त बताया गया है। इस बिन्दु पर हुए टूटान का फोटो वर्ष 2017 एवं वर्ष 2018 में लिया गया है। परन्तु फोटों में इस जगह पर तटबंध आवागमन के चलते क्षतिग्रस्त नहीं, बल्कि टूटान होने के कारण गैप दिख रहा है। इसके दायाँ तटबंध में लगभग 130 मी॰ पर प्रतिवेदित किये गये टूटान को संयुक्त प्रतिवेदन में भी टूटान माना गया है। इस बिन्दु पर हुए टूटान का फोटो वर्ष 2017 एवं 2018 में लिया गया है।

उपरोक्त पाँचों स्थल पर वर्ष 2017 में तटबंध में गैप का निर्माण हुआ है, जो टूटान की वजह से हुआ है। तत्कालीन मुख्य अभियंता के संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन के अनुसार तीनों बिन्दुओं पर गैप होने की पुष्टि नहीं की गयी है जो स्थल की स्थिति के विपरीत है।

वरीय उप समाहर्त्ता, जिला आपदा प्रबंधन शाखा, भागलपुर के द्वारा उनके पत्रांक 935 दि॰ 09.10.19 से श्री मरजुव, सरपंच, ग्राम कचहरी सन्हौली, प्रखण्ड जगदीशपुर, जिला भागलपुर के आवेदन को संलग्न करते हुए अनुरोध किया गया है कि बाढ़ 2017 में चान्दन पुल के दाँयें एवं बाँयें, सन्हौली ग्राम के पुल के बाँयें एवं दाँयें तथा भडोखर गाँव के दाँयें कुल पाँच बिन्दुओं पर हुए कटाव की मरम्मति कराने का अनुरोध किया गया है। समीक्षा :- अभिलेखों के अवलोकन से स्पष्ट है कि श्री कुमार द्वारा बाढ़ नियंत्रण कक्ष, पटना को चान्दन नदी के निम्नलिखित स्थलों पर टूटान होने की सूचना प्रतिवेदित की गयी है।

(i) चन्दन नदी के दायाँ तटबंध के दोस्तानी ग्राम के निकट 50 मी॰ की लम्बाई में टूटान होना। (ii) चन्दन नदी के सोन्डीहा-सोन्हौली के निकट निर्मित पुल के D/S में बायाँ तटबंध 20 मी॰ की लम्बाई तथा दायाँ तटबंध 25 मी॰ लम्बाई में टूटान होना।

(iii) उक्त पुल के लगभग 400 मी॰ में D/S में चन्दन पुरैनी नदी के दाँयें तटबंध में दो बिन्दुओं पर क्रमशः 130 मी॰ एवं 40 मी॰ की लम्बाई में टूटान होना।

(iv) सारण मौजा के अन्तर्गत चन्दन नदी के दाँयें तटबंध में दो बिन्दुओं पर क्रमशः 50 मी॰ एवं 30 मी॰ की लम्बाई में टूटान होना।

उपरोक्त सूचना का सत्यापन मुख्य अभियंता, कटिहार से करायी गयी मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता, अध्यक्ष बाढ़ संघर्षात्मक बल द्वारा उपलब्ध कराये गये संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में उपरोक्त अंकित सात अदद्‌ टूटान में से मात्र निम्नलिखित दो बिन्दुओं पर टूटान होना परिलक्षित होता है। (i) दोस्ताना ग्राम के समीप दायाँ तटबंध में 170 मी॰ की लम्बाई में टूटान होना पाया गया। (ii) दोस्ताना ग्राम के समीप दायाँ तटबंध 130 मी॰ की लम्बाई में तटबंध टूटा हुआ पाया गया। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि कार्यपालक अभियंता, श्री कुमार द्वारा विभाग को गलत ढंग से शेष पाँच बिन्दुओं पर टूटान होने की सूचना दी गयी जो गैर जिम्मेदार व्यवहार, कर्त्तव्य के प्रति उदासीनता दर्शाता है। श्री कुमार द्वारा कहा गया है कि दोस्तानी ग्राम के पास दायाँ तटबंध 50 मी॰ में हुए टूटान के प्रतिवेदित किया गया है। तथा संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में भी इसे टूटान प्रतिवेदित किया गया है। चूँकि संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में भी दोस्तानी ग्राम के समीप दायाँ तटबंध में 17 मी॰ की लम्बाई में टूटान होना बताया गया है। अतएव इनका कथन स्वीकार योग्य है। सोन्डीहा-सोन्हौली में GSCY द्वारा निर्मित पुल के D/S में बायाँ तटबंध में लगभग 20 मी॰ में प्रतिवेदित टूटान के संदर्भ में कहा गया है कि इस बिन्दु पर हुए टूटान को बाढ़ पीड़ितों द्वारा कामचलाऊ मरम्मति करने के बाद लिया गया फोटो से उक्त स्थल पर टूटान होना स्थापित होता है एवं निरीक्षण के समय पानी पार होते देखा गया है। जबकि संयुक्त निरीक्षणबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 174 प्रतिवेदन में इसे Cattle Crossing की तरह क्षतिग्रस्त प्रतिवेदित किया गया है। इससे पानी पार नहीं किया था। अतएव इनका कथन स्वीकार योग्य नहीं है। सोन्डीहा-सोन्हौली के पास निर्मित पुल के D/S में दायाँ बाँध लगभग 15 मी॰ में हुए टूटान के संबंध में कहा गया है कि इस बिन्दु पर बाढ़ पीड़ितों द्वारा मरम्मति करने के बाद लिया गया फोटो से स्पष्ट है कि इस स्थल पर टूटान हुआ है। जबकि संयुक्त निरीक्षण में ग्रामीणों के आधार पर इसे पूर्व से ही ट्रैक्टर का आने जाने से लगभग 15 मी॰ रास्ता बनाया गया है जो उचित नहीं है अतएव इस स्थल पर टूटान होना परिलक्षित नहीं होता है। सोन्डीहा-सोन्हौली PMGSY द्वारा निर्मित पुल से लगभग 400 मी॰ D/S में बायाँ तटबंध में लगभग 40 मी॰ दायाँ तटबंध में लगभग 130 मी॰ में प्रतिवेदित टूटान के संदर्भ में कहा गया है कि इस बिन्दु पर हुए टूटान को तटबंध में आवागमन के चलते क्षतिग्रस्त नहीं हुआ है बल्कि टूटान होने के कारण गैप दिख रहा है। वर्त्तमान में गैप मौजूद है। जबकि इस बिन्दु पर संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन टूटान होना प्रतिवेदित नहीं किया है। निरीक्षण प्रतिवेदन में कहा गया है कि यहाँ तटबंध Curveture वाले भाग के आम के बगीचा के निकट करीब 17 मी॰ तटबंध टूटा हुआ पाया गया यहाँ नदी का पानी Spill किया है। अन्त में कहा गया है कि उपरोक्त वर्णित पाँच स्थल पर बाढ़ 2017 में तटबंध में गैप का निर्माण हुआ है, जो टूटान की वजह से हुआ है। तत्कालीन मुख्य अभियंता के संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन के अनुसार तीनों बिन्दुओं पर गैप होने की पुष्टि नहीं की गयी जो स्थल के विपरीत है। स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं है क्याेंकि इनके द्वारा संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में उद्धित दो बिन्दुओं पर पाये गये टूटान के अतिरिक्त शेष तीन बिन्दुओं पर हुए टूटान के संदर्भ में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है एवं साक्ष्यविहिन कथन स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री कुमार द्वारा मुख्य अभियंता स्तर से निर्गत संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन में दिये गये तथ्यों को ही गलत बताया गया है। इस प्रकार सम्यक समीक्षोपरांत श्री रमेश कुमार कार्यपालक अभियंता से प्राप्त पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय के आलोक में श्री रमेश कुमार, कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, भागलपुर से प्राप्त पुनर्विचार अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना संख्या-2094, दिनांक 27.09.2019 द्वारा अधिरोपित दण्ड को यथावत रखा जाता है। उक्त निर्णय श्री कुमार को अधिरोपित कर संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 3 फरवरी 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(सिवान)11-21/2012-A-138--श्री पृथ्वीराज सिंह (आई0डी0-जे 5117), तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर अवर प्रमंडल, बसंतपुर संप्रति सेवानिवृत के विरूद्ध श्रीमती गीता देवी, शिक्षिका को गंडक कॉलोनी वसंतपुर में नियम विरूद्ध तरीके से आवासित कर विभाग को आर्थिक क्षति पहुँचाने के आरोप के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2655 दिनांक-26.12.2018 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम-43(बी) के अधीन विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-244 दिनांक- 27.03.2019 द्वारा समर्पित किया गया। जिसमें संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री सिंह के विरूद्ध गठित सभी आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-929 दिनांक-09.05.2019 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की छायाप्रति उपलब्ध कराते हुए श्री सिंह से द्वितीय कारण पृच्छा की माँग की गयी। उक्त के आलोक में श्री सिंह द्वारा समर्पित अभ्यावेदन दिनांक-28.06.2019 में मुख्य रूप से निम्न तथ्यों का उल्लेख किया गया :- श्रीमती गीता देवी, शिक्षिका के द्वारा गंडक शिविर बसंतपुर में अवैध प्रवेश की जाँच क्रमशः अ0 प्र0 पदाधिकारी द्वारा दिनांक-06.01.2006 एवं कार्यपालक अभियंता द्वारा दिनांक 08.02.2016 को की गई है। वे दिनांक-31.01.2015 को सेवानिवृत हो चुके हैं। विभागीय पत्रांक-2435 दिनांक-08.07.1976 की कंडिका 10(क) में विहित प्रावधान के अनुसार प्रत्येक महीनें में शिविर का निरीक्षण कार्यपालक अभियंता को करना है। दिनांक-01.02.2015 से 06.01.2016 के पूर्व 11 बार विधिक तौर पर अ0 प्र0 पदाधिकारी द्वारा निरीक्षण कर प्रतिवेदित करना चाहिए था जो नहीं किया गया। अगर 31.01.2015 तक श्रीमती गीता देवी का प्रवेश हुआ होता तो फरवरी 2015 में ही स्थिति स्पष्ट हो जाती। इस प्रकार उनके सेवानिवृति के लगभग एक साल बाद श्रीमती गीता देवी का बसंतपुर शिविर मे अवैध प्रवेश बताना न तो सही है और न ही विधिक। उनके द्वारा अपने पत्र दिनांक-01.03.2019 द्वारा कार्यपालक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, छपरा से दिनांक-01.02.2015 से 31.12.2015 तक बसंतपुर गंडक शिविर के अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा की गई मासिक निरीक्षण प्रतिवेदन की माँग की गई, जो उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। अगर फरवरी 2015 में अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा गंडक शिविर बसंतपुर के निरीक्षण के क्रम में श्रीमती गीता देवी शिक्षिका सरकारी आवास में पायी जाती तो वे उारदायी होते। इस प्रकार श्रीमती गीता देवी शिक्षिका को सरकारी आवास में अवैध रूप से रखने का आरोप प्रमाणित होने का प्रतिवेदन अप्रमाणित तथा अविधिक है।175 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 मुख्य अभियंता के पत्रांक-1215 दिनांक-27.11.2017 एवं कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-1011 दिनांक-03.10.2017 के अनुसार भेजा गया 13,650/- रूपये की सरकारी राशि का प्रतिवेदन भी सही नहीं है, क्योंकि अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सारण नहर अवर प्रमंडल, बसंतपुर ने अपने पत्रांक-101 दिनांक-20.09.2017 के द्वारा कार्यपालक अभियंता को प्रेषित प्रतिवेदन में यह अंकित नहीं किया है कि कौन-कौन व्यक्ति उक्त अवधि में आवासित थें। यह अवधि दिसम्बर 2010 से अप्रैल 2016 दिखाई गयी है। उनके द्वारा श्रीमती गीता देवी शिक्षिका को दिसम्बर 2010 से अप्रैल 2016 तक अवैध रूप से रखने के समर्थन में कोई प्रमाण विभागीय पदाधिकारी एवं परिवादी द्वारा नहीं दिया गया है। इस प्रकार आरोप प्रमाणित है, कहना सही नहीं है। विभागीय पत्रांक-392 दिनांक-19.02.2018 के आलोक में स्पष्टीकरण विभाग में नहीं समर्पित करने का आरोप प्रमाणित होने का बात संचालन पदाधिकारी द्वारा प्रतिवेदित है। वस्तु स्थिति यह है कि उपर्युक्त विभागीय पत्र उन्हें प्राप्त नहीं हुआ था। विभागीय पत्रांक-2655 दिनांक-26.12.2018 को उन्हें संचालन पदाधिकारी के कार्यालय के पत्रांक-99 दिनांक-09. 02.2019 द्वारा घटना के आठ वर्षों बाद और उनके सेवानिवृत के चार वर्षों के बाद प्राप्त हुआ है, इसलिए कालबाधित है। मंत्रिमंडल (निगरानी) विभाग, पटना के पत्रांक-2608 दिनांक-09 जुलाई 1976 की प्रति संलग्न करते हुए कहा गया कि परिवादी ए0 रहमान एवं अन्य का परिवाद पत्र में हस्ताक्षर एवं पता नहीं है। साथ ही आरोप के समर्थन में श्रीमती गीता देवी, शिक्षिका के उनके सेवा काल में प्रवेश के संबंध में कोई साक्ष्य नहीं दिया है। परिवादी द्वारा बिना साक्ष्य, बिना हस्ताक्षर, बिना पता की सम्पुष्टि के जाँच करने का प्रावधान नहीं है। उनके विरूद्ध संचालन पदाधिकारी द्वारा दिया गया प्रतिवेदन नियम संगत और सही नहीं प्रतीत होता है। आरोपित पदाधिकारी द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा के प्रत्युार, (अभ्यावेदन) गठित आरोप पत्र, संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन एवं उपलब्ध अभिलेख की समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गये :- दिनांक-09.11.2012 को श्री ए0 रहमान से प्राप्त परिवाद पत्र में कहा गया है कि श्री पृथ्वीराज सिंह, सारण नहर अवर प्रमंडल गंडक योजना शिविर बसंतपुर में नाजायज रूप से एक औरत को रखे हुए हैं। परिवाद पत्र पर मुख्य अभियंता, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, सिवान का प्रतिवेदन प्राप्त किया गया। जाँच प्रतिवेदन के साथ संलग्न कार्यपालक अभियंता, सारण नहर प्रमंडल, छपरा के जाँच प्रतिवेदन से इस बात की पुष्टि हुई कि श्री पृथ्वीराज सिंह, अवर प्रमंडल पदाधिकारी, सारण नहर अवर प्रमंडल, बसंतपुर में श्रीमती गीता देवी, शिक्षिका को बसंतपुर कॉलोनी में नियम विरूद्ध तरीके से आवासित किये हुए हैं। प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के आलोक में श्री सिंह के विरूद्ध आरोप पत्र गठित कर विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी। संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में सभी आरोप प्रमाणित पाये गये। उनके द्वारा समर्पित अभ्यावेदन में कहा गया है कि वे दिनांक-31.01.2015 को सेवानिवृत हो चुके हैं। विभागीय निदेशानुसार प्रत्येक महीना में शिविर का निरीक्षण कर आवास आवंटन समिति को प्रतिवेदन समर्पित करना हैं। यदि दिनांक 31.01.15 तक श्रीमती गीता देवी का अवैध प्रवेश हुआ तो फरवरी 2015 को ही स्थिति स्पष्ट हो जाती । इस प्रकार उनके सेवानिवृति के लगभग एक साल के बाद गीता देवी को बसंतपुर शिविर में अवैध प्रवेश बताना सही नहीं है। यदि उनके कार्यकाल के दौरान निरीक्षण के समय श्रीमती गीता देवी गंडक कॉलोनी के आवास में आवासित पायी जाती, तो उसके लिए वे पूर्ण रूप से उत्तरदायी होते परन्तु निरीक्षण के समय श्रीमती गीता देवी को आवासित नहीं पाया गया इस प्रकार उनके विरूध नजायज तरीके से श्रीमती गीता देवी को गंडक कॉलोनी में आवासित करने का आरोप निराधार हैं। श्री सिंह के विरूद्ध लगाये गये आरोप की जॉच मुख्य अभियंता से करायी गयी। मुख्य अभियंता के साथ संलग्न कार्यपालक अभियंता के प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि श्रीमती गीता देवी शिक्षिका को श्री पृथ्वीराज सिंह गलत तरीके से वसंतपुर कॉलीनी में आवासित किये थे। जॉच प्रतिवेदन में कहा गया है कि श्रीमती गीता देवी (शिक्षिका) द्वारा दिनांक-08.02.16 को मोबाईल पर हुई वार्ता के क्रम में स्वीकार किया है कि श्री पृथ्वीराज सिंह, तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा बसंतुपर कॉलोनी में रहने हेतु आवास दिया गया था एवं वे इसी क्रम में रहती आ रही हैं। जॉच प्रतिवेदन में उक्त आरोपों की पुष्टि होने का उल्लेख है। जब स्वंय श्रीमती गीता देवी द्वारा स्वीकार किया गया है कि श्री पृथ्वीराज सिंह ही उन्हें वसंतपुर कॉलोनी में रहने हेतु आवास दिये थे ऐसी परिस्थिति में श्री सिंह का यह कहना कि निरीक्षण के समय यह बात क्यों नहीं प्रकाश में आई कि श्रीमती गीता देवी अनधिकृत रूप से वसंतपुर कॉलोनी में आवासित हैं, स्वीकारयोग्य नहीं है। श्रीमती गीता देवी को आवास खाली करने हेतु नोटिस भी दिया गया था, जो इस बात को परिचायक है कि श्रीमती गीता देवी अनधिकृत रूप से गंडक शिविर कॉलोनी में आवासित थी। अवर प्रमंडल पदाधिकारी सारण नहर अवर प्रमंडल वसंतुपर के प्रतिवेदन से स्पष्ट है कि श्रीमती गीता देवी दिसम्बर 2010 से अप्रेैल 2016 तक वसंतपुर कॉलोनी में अनाधिकृत रूप से आवासित हैं। श्री सिंह दिनांक 31.01.15 को सेवानिवृत हुये हैं। उनकी सेवानिवृति की तिथि तक श्रीमती गीता देवी आवासित रही हैं इस प्रकार आरोप की अवधि दिसम्बर 2010 से दिनांक 31.01.15 तक मानी जा सकती है। श्री सिंह के विरूद्ध विभागीय संकल्प ज्ञापांक-2655 दिनांक-26.12.18 द्वारा विभागीय कार्यवाही चलाये जाने का निर्णय लिया गया है। इस प्रकार घटना की तिथि 31.01.15 के चार वर्ष के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही का संकल्प निर्गत किया गया है। अतएव श्री सिंह का यह कहना है कि यह मामला बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के अंतर्गत कालवाधित है, स्वीकार योग्य नहीं है। श्री सिंह के उक्त कृत्य से सरकार को 13,650/-रूपये की आर्थिक क्षति हुई है। वर्णित तथ्यों के आधार पर मामले की सम्यक समीक्षोपरांत सरकार द्वारा श्री पृथ्वीराज सिंह (आई0डी0-जे0-5117), तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर अवर प्रमंडल, बसंतपुर सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड देने का निर्णय लिया गयाः-बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 176 ''10% (दस प्रतिशत) पेंशन की कटौती एक वर्ष के लिए''। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में प्रस्तावित दण्ड पर बिहार लोक सेवा आयोग से परामर्श की माँग की गयी। तदालोक में बिहार लोक सेवा आयोग के पत्रांक-2599 दिनांक-09.01.2020 द्वारा प्रस्तावित दण्ड पर सहमति संसूचित की गयी है। सरकार द्वारा लिये गये उक्त निर्णय के आलोक में श्री पृथ्वीराज सिंह, (आई0डी0-जे 5117), तत्कालीन सहायक अभियंता, सारण नहर अवर प्रमंडल, बसंतपुर सम्प्रति सेवानिवृत को निम्न दण्ड दिया एवं संसूचित किया जाता है :- ''10% (दस प्रतिशत) पेंशन की कटौती एक वर्ष के लिए''।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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16 जनवरी 2020

सं॰ 22/नि0सि0(वीर0)07-16/2019-51--श्री सुदामा राय (आई0डी0 सं०-3273), कार्यपालक अभियंता, पश्चिमी तटबंध प्रमंडल, निर्मली (सुपौल) को उक्त प्रमंडल में अमर्यादित आचरण, अपने अधीनस्थ कर्मियों के साथ अमानवीय व्यवहार आदि आरोप के मामले में सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है। 2. निलंबन अवधि में श्री सुदामा राय का मुख्यालय अधीक्षण अभियंता, गंडक बराज अंचल, वाल्मीकिनगर निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री राय को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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16 जनवरी 2020

सं॰ 22/नि0सि0(वीर0)07-16/2019-50--श्री राजेश कुमार (आई0डी0 सं०-5295), अवर प्रमंडल पदाधिकारी, पश्चिमी तटबंध अवर प्रमंडल, निर्मली को उक्त प्रमंडल में अमर्यादित आचरण, असंसदीय भाषा का प्रयोग, अपने वरीय पदाधिकारी के साथ गाली-गलौज, मारपीट, जान से मारने की धमकी, निविदा संबंधी महत्वपूर्ण कार्य को बाधित करने एवं सरकारी दस्तावेज फाड़ने आदि आरोप के मामले में सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री कुमार का मुख्यालय अधीक्षण अभियंता, गंडक बराज अंचल, वाल्मीकिनगर निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री कुमार को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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9 जनवरी 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मोति0)-08-08/2014-29--चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी (सम्प्रति परिवर्तित नाम बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी) के अन्तर्गत बाढ़ 2013 के दौरान घोड़हिया स्थल पर कराए गए बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो में बरती गई अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई। उडनदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन एवं उक्त प्रतिवेदन पर अभियंता प्रमुख (बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण) से प्राप्त मंतव्य के समीक्षोपरान्त श्री अंशुमान ठाकुर (आई0डी0-3501), तत0 कार्यपालक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी (सम्प्रति परिवर्तित नाम बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी) के विरूद्ध निम्नांकित आरोपों के लिए आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-1738, दिनांक 13.08.2018 द्वारा स्पष्टीकरण की माँग की गईः- (i) प्रश्नगत कार्य में गलत मंशा एवं दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही एवं कार्य के प्रति उदासीनता बरतते हुए कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में बोल्डर क्रेटिंग कार्य में प्रत्युक्त 368 अद्‌द B.A.Wire Crate में कुल 368x2.16=794.88 घन मी॰ बोल्डर की मापी दर्शायी गयी है। उड़नदस्ता जाँच में Randomly Selected बोल्डर क्रेटिंग की मापी के अनुसार 20% Voids घटाने के पश्चात कुल 564.07 घन मी॰ पाया गया। इस प्रकार कुल 230.81 घन मी॰ बोल्डर की गलत ढंग से अधिक मापी दर्ज कर अनियमितता बरती गयी। जो एक गंभीर वित्तीय अनियमितता है। अगर उड़नदस्ता जाँच नहीं होती तो संभव था कि उक्त बोल्डर की मात्रा का भुगतान हो जाता।

(ii) आलोच्य बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में प्रत्युक्त B.A.Wire Crate में प्रति क्रेट 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के बदले बोरा में कम बालू भराई कराने के कारण 80 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के समतुल्य भुगतान करने का आदेश दिया गया। शेष 20 अद्‌द ई॰सी॰ बैग की कीमत संवदेक से दुगनी दर पर कटौती कर भुगतान का आदेश निर्गत किया गया है। उक्त से स्पष्ट है कि उनके द्वारा गलत मंशा से कार्य के प्रति लापरवाही/उदासीनता बरतने के कारण संवेदक के द्वारा B.A. Wire177 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 Crate में न्यून विशिष्टि के ई॰सी॰ बैग पिचिंग का कार्य कराया गया। जो उनकी कर्त्तव्यहीनता, उदासीनता एवं निदेशो का उल्लंघन होना दर्शाता है।

(iii) प्रश्नगत स्थल पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की जाँच में निर्धारित आकार के B.A. Wire Crate की बुनाई नहीं पाये जाने के संबंध में मुख्य अभियंता द्वारा समानुपातिक कटौती कर विपत्र पारित कर भुगतान का आदेश निर्गत किया गया है। इससे स्पष्ट है कि उनकी लापरवाही/उदासीनता के कारण न ही B.A.Wire Crate की बुनाई प्रावधानित आकार में हो पाया न ही कार्य विशिष्टि के अनुरूप B.A.Wire Crate का उपयोग हो पाया। परन्तु प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज किया गया एवं उसकी जाँच भी की गयी। अतएव न्यून विशिष्टि के B.A.Wire Crate की बुनाई कराकर कार्य में उपयोग होने के बावजूद गलत मंशा से प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज कर अनियमित भुगतान करने का प्रयास किया जाना परिलक्षित होता है।

बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 178

आरोप (i) :- बाढ़ वर्ष 2013 के दौरान घोड़हिया स्थल पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में प्रत्युक्त कुल 368 अदद B.A. Wire Crate में कुल 794.88 घन मी॰ बोल्डर की मापी दर्ज की गयी। उड़नदस्ता जाँच में बोल्डर क्रेटिंग की मापी के अनुसार 20 प्रतिशत Voids घटाने के पश्चात कुल 564.07 घन मी॰ पाया गया। इस प्रकार कुल 230.81 घन मी॰ बोल्डर की गलत ढंग से अधिक मापी दर्ज कर अनियमितता बरतने से संबंधित आरोप के संदर्भ में श्री ठाकुर द्वारा कहा गया है कि प्रश्नगत स्थल पर 3mx1.5mx0.6m साईज का क्रेट का उपयोग किया गया है। जिसके एक क्रेट का आयतन 2.7m3 तथा 20% Voids घटाने पर एक क्रेट में प्रत्युक्त बोल्डर का आयतन 2.7x0.8=2.16M3 आता है। इसी के अनुसार कार्य में प्रत्युक्त 368 अद्‌द क्रेट में 368x2.16=794.88M3 होता है। उड़नदस्ता द्वारा बोल्डर भरे क्रेट की मापी ली गयी है जो त्रुटिपूर्ण तरीका है एवं क्रेट में साईज का सही आकलन करना संभव नहीं है। क्रेट के पूरे बोल्डर को निकाल कर क्रेट का साईज, मेस साईज एवं क्रेट का वजन, बोल्डर का आयतन की जाँच करना चाहिये था एवं Voids की गणना की जानी चाहिये थी। जबकि उड़नदस्ता द्वारा क्रेट पर क्रेट, बोल्डर भरे क्रेट का जहाँ-तहाँ मापी कर पुनः 20 % Voids घटाते हुए बोल्डर की मात्रा यथा 564.07 घन मी॰ बोल्डर को ही कार्य में प्रत्युक्त माना गया। इसके अनुसार Voids की कटौती की मात्रा लगभग 43 प्रतिशत आती है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4 (v) (ख) से स्पष्ट है कि स्थलीय जाँच के क्रम में कराये गये B.A. Wire Crating कार्य के विभिन्नि स्थलों से Randomly select कर कुल 6 अद्‌द B.A. Wire बोल्डर क्रेटिंग कार्य की मापी ली गयी है एवं प्रति क्रेट औसत आयतन 1.91 घन मी॰ पाया गया है तथा कार्य में प्रत्युक्त कुल 368 अदद्‌ कराये गये बी॰ए॰ वायर क्रेटिंग कार्य की मात्रा 564.07 घनमी0 होता है। उड़नदस्ता द्वारा माना गया है कि इस कार्य में कुल 564.07 घन मी॰ बोल्डर का उपयोग किया गया है। जबकि माप पुस्त में 368x2.16=794.88 घन मी॰ दर्ज किया गया है। इस प्रकार 794.88-564.07=230.81 घन मी॰ अधिक बोल्डर की मापी दर्ज किया गया है। चूँकि आरोपी द्वारा उड़नदस्ता के जाँच की प्रक्रिया पर प्रश्न उत्पन्न किया है जबकि उड़नदस्ता द्वारा आरोपी पदाधिकारियों यथा श्री ठाकुर एवं अन्य पदाधिकारी के उपस्थिति में बोल्डर क्रेटिंग कार्य की जाँच किया गया है। ऐसी स्थिति में यदि जाँच की प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण था तो इन्हें उसी समय जाँच की प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करना चाहिये था, न कि स्पष्टीकरण के समय में। आरोपी द्वारा कहा गया है कि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के आधार पर विपत्र तैयार किया गया एवं बचे बोल्डर को निदेशानुसार Site Account में जोड़ लिया गया एवं अभी तक इस मद में कोई भुगतान नहीं होने से अधिकाई भुगतान का मामला नहीं बनता है। उक्त कथन की पुष्टि इस मामले में मोनिटरिंग संगठन द्वारा दिये गये मंतव्य की इसके भुगतान की कारवाई विभागीय दायित्व समिति से अनुशंसा प्राप्त होने के उपरान्त किया जायेगा, से होती है।

आरोप-(ii) :- प्रश्गनत कार्य के तहत प्रत्युक्त B.A. Wire Crate में प्रति क्रेट 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के जगह पर कम बालू भराई करने के कारण 80 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के समतुल्य भुगतान करने का आदेश दिया गया। शेष 20 अदद्‌ ई॰सी॰ बैग की कीमत संवेदक से दुगनी दर पर कटौती कर भुगतान का आदेश निर्गत किया गया। इस प्रकार न्यून विशिष्टि के B.A. Wire Crate में बोरा भराई कर पिचिंग किया जाना परिलक्षित है जो कार्य के प्रति उदासीनता/लापरवाही दर्शाता है से संबंधित आरोप के संदर्भ में श्री ठाकुर द्वारा कहा गया है कि इस स्थल पर तीन पालियों में विभिन्न कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता एवं कनीय अभियंता द्वारा वरीय पदाधिकारियों के निदेशन में कार्य कराया गया है। कराये गये कार्य का विस्तृत विवरणी प्रतिदिन NR के माध्यम से प्रतिदिन प्रभारी बाढ़ नियंत्रण कक्ष पटना/मोतिहारी, मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को भेजा जाता था। जिसमें प्रति B.A. Wire Crate में 100 अद्‌द बालू भरे E.C. bags के इस्तेमाल किये जाने का तथ्य से पूरे बाढ़ अवधि में अवगत कराया गया था। किन्तु न तो विभाग और न ही किसी अन्य वरीय पदाधिकारी द्वारा गलत होने की बात कही गयी। न ही एक B.A Wire Crate में 80 अद्‌द बोरे के इस्तेमाल करने संबंधी निदेश दिया गया मात्र प्रपत्र 24 एवं 17 में 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग को काटकर 80 बैग कर दिया गया। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5 (iii) (f) में कहा गया है कि संवेदक के स्तर पर ई॰सी॰ बैग में पूरी तरह बालू नहीं भरे जाने के कारण अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रपत्र 24 प्रेषण के समय बालू भरे 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग को बालू भरे 80 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के समतुल्य मानते हुए कराये गये कार्य के ढुलाई एवं आपूर्ति में कटौती की गयी है तथा जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4 (v) (क) से स्पष्ट होता है कि स्थलीय जाँच में भी B.A. Wire Crate में बालू भरे ई॰सी॰ बैग की संख्या 100 अद्‌द पायी गयी है परन्तु बोरे में अपेक्षित मात्रा में बालू की कमी परिलक्षित होना बताया गया है एवं कहा गया है कि इसी को ध्यान में रखकर अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रपत्र 24 में E.C . bags की मात्रा में 20 प्रतिशत की कटौती की गयी है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि आरोपी का कथन की कार्य के दौरान B.A. Wire Crate में बोरा में कम बालू भरने के संदर्भ में कोई टिका-टिप्पणी नहीं की गयी है, स्वीकार योग्य प्रतीत होता है। परन्तु किसी भी कार्य को विशिष्टि के अनुरूप कार्य कराने का दायित्व कार्यपालक अभियंता से लेकर कनीय अभियंता तक के पदाधिकारी का विशेष रूप से होती है एवं विशिष्टि के अनुरूप कराये गये कार्यो का ही मापी दर्ज करना है। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि उड़नदस्ता प्रतिवेदन के आलोक में प्रति B.A. Wire Crate में शेष 20 अद्‌द ई॰सी॰ बैग की कीमत दुगने दर से संवेदक के विपत्र से रिकभरी कर ली गयी है तथा 20 अदद्‌ बालू भरने की मजदूरी भी विपत्र से घटा दिया गया है। अतएव किसी प्रकार की सरकारी राशि की क्षति नहीं हुई है। जिसकी पुष्टि मोनिटरिंग के द्वारा179 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 दिये गये मंतव्य की इस कार्य का भुगतान की कारवाई विभागीय दायित्व समिति के अनुशंसा प्राप्त होने के उपरान्त किया जाना है। अर्थात इस कार्य का भुगतान नहीं किया गया। फलतः सरकारी राशि की क्षति होना परिलक्षित नहीं होता है। आरोप-(iii) :- निर्धारित आकार में B.A. Wire Crate की बुनाई नहीं कराने के बावजूद प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज कर से संबंधित आरोप के संदर्भ में आरोपी द्वारा कहा गया है कि उड़नदस्ता द्वारा त्रुटिपूर्ण तरीके से क्रेट की जाँच की गयी है बोल्डर निकालकर क्रेट की लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई तथा इसके मेस साईज की जाँच करनी चाहिये थी तथा एक क्रेट का वजन निकालना चाहिये था तभी सही आकलन हो सकता है। मगर उड़नदस्ता द्वारा उक्त प्रक्रिया नहीं अपनाकर बोल्डर भरे-क्रेट की मापी की गयी, स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है क्योंकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन की कंडिका (4) एवं 4 (v) (ख) से स्पष्ट होता है कि क्रेट की मापी इनके उपस्थिति में की गयी है तथा जाँचित 6 अद्‌द क्रेट में से एक भी क्रेट के प्रावधानित साईज 3m x1.5m x 0.6m नहीं पाया गया है। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि क्रेट बुनाई का कार्य मोतिहारी में याँत्रिक अवर प्रमंडल द्वारा कराया गया है एवं पूरे बाढ़ अवधि में एक बार भी मोतिहारी आने का मौका नहीं मिला, कुछ हद तक स्वीकार योग्य प्रतीत होता है परन्तु उल्लेखनीय है कि इन्हीं के नियंत्रणाधीन याँत्रिक अवर प्रमंडल द्वारा क्रेट की बुनाई कराया गया है। यदि क्रेट विशिष्टि के अनुरूप नहीं था तो उक्त क्रेट को अमान्य करते हुए याँत्रिक अवर प्रमंडल पदाधिकारी को कड़ी निदेश दिया जाना चाहिये था। जो इनके द्वारा नहीं किया गया। इनके द्वारा यह भी कहा गया है कि उड़नदस्ता जाँच के पश्चात निर्धारित आकार के B.A. Wire Crate बुनाई नहीं होने की स्थिति में मुख्य अभियंता द्वारा संवेदकों से समानुपातिक कटौती करने का निदेश दिया गया। जिसके आलोक में संवेदक से रूपये 87209.0 की वसूली कर ली गयी है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के साथ संलग्न Receipt से परिलक्षित होता है कुल 63018.00 रूपये की वसूली तीन संवेदक से किया गया है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री अंशुमान ठाकुर, तत्कालीन कार्यपालक अभियंता के विरूद्ध गठित तीनों आरोप आंशिक रूप से प्रमाणित पाया गया। बोल्डर क्रेटिंग कार्य एवं B.A.Wire Crate में ई॰सी॰ बैग पिचिंग कार्य का भुगतान नहीं हुआ है तथा न्यून विशिष्टि के B.A. Wire Crate बुनाई के लिए कुल 63018.00 रू॰ की क्षति होना परिलक्षित नहीं होता है।

मामले के समीक्षोपरांत उक्त आंशिक प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अंशुमान ठाकुर (आई0डी0-3501) तत0 कार्यपालक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, समग्र योजना अन्वेषण एवं प्रोजेक्ट प्रीपरेशन प्रमंडल, भागलपुर के विरूद्ध अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा निम्न दण्ड दिये जाने का निर्णय लिया गया है :-

(i) निन्दन (आरोप वर्ष 2013-14)। अनुशासनिक प्राधिकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री अंशुमान ठाकुर (आई0डी0-3501), तत0 कार्यपालक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति कार्यपालक अभियंता, समग्र योजना अन्वेषण एवं प्रोजेक्ट प्रीपरेशन प्रमंडल, भागलपुर के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।

(i) निन्दन (आरोप वर्ष 2013-14)।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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9 जनवरी 2020

सं॰ 22/नि0सि0(मोति0)-08-08/2014-28--चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी (सम्प्रति परिवर्तित नाम बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी) के अन्तर्गत बाढ़ 2013 के दौरान घोड़हिया स्थल पर कराए गए बाढ़ संघर्षात्मक कार्यो में बरती गई अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता से कराई गई। उडनदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन एवं उक्त प्रतिवेदन पर अभियंता प्रमुख (बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण) से प्राप्त मंतव्य के समीक्षोपरान्त श्री अशोक कुमार (आई0डी0-5197), तत0 सहायक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी (सम्प्रति परिवर्तित नाम बाढ़ नियंत्रण प्रमंडल, मोतिहारी) के विरूद्ध निम्नांकित आरोपों के लिए आरोप पत्र गठित करते हुए विभागीय पत्रांक-1739, दिनांक 13.08.2018 द्वारा स्पष्टीकरण की माँग की गई ः-

(i) प्रश्नगत कार्य में गलत मंशा एवं दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही एवं कार्य के प्रति उदासीनता बरतते हुए कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में बोल्डर क्रेटिंग कार्य में प्रत्युक्त 368 अद्‌द B.A.Wire Crate में कुल 368x2.16=794.88 घन मी॰ बोल्डर की मापी दर्शायी गयी है। उड़नदस्ता जाँच में Randomly Selected बोल्डर क्रेटिंग की मापी के अनुसार 20% Voids घटाने के पश्चात कुल 564.07 घन मी॰ पाया गया। इस प्रकार कुल 230.81 घन मी॰ बोल्डर की गलत ढंग से अधिक मापी दर्ज कर अनियमितता बरती गयी। जो एक गंभीर वित्तीय अनियमितता है। अगर उड़नदस्ता जाँच नहीं होती तो संभव था कि उक्त बोल्डर की मात्रा का भुगतान हो जाता।

(ii) आलोच्य बाढ़ संघर्षात्मक कार्य में प्रत्युक्त B.A.Wire Crate में प्रति क्रेट 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के बदले बोरा में कम बालू भराई कराने के कारण 80 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के समतुल्य भुगतान करने का आदेश दिया गया। शेष 20 अद्‌द ई॰सी॰ बैग की कीमत संवदेक से दुगनी दर पर कटौती कर भुगतान का आदेश निर्गत किया गया है। उक्त से स्पष्ट है कि उनके द्वारा गलत मंशा से कार्य के प्रति लापरवाही/उदासीनता बरतने के कारण संवेदक के द्वारा B.A. Wireबिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 180 Crate में न्यून विशिष्टि के ई॰सी॰ बैग पिचिंग का कार्य कराया गया। जो उनकी कर्त्तव्यहीनता, उदासीनता एवं निदेशो का उल्लंघन होना दर्शाता है।

(iii) प्रश्नगत स्थल पर कराये गये बाढ़ संघर्षात्मक कार्य की जाँच में निर्धारित आकार के B.A. Wire Crate की बुनाई नहीं पाये जाने के संबंध में मुख्य अभियंता द्वारा समानुपातिक कटौती कर विपत्र पारित कर भुगतान का आदेश निर्गत किया गया है। इससे स्पष्ट है कि उनकी लापरवाही/उदासीनता के कारण न ही B.A.Wire Crate की बुनाई प्रावधानित आकार में हो पाया न ही कार्य विशिष्टि के अनुरूप B.A.Wire Crate का उपयोग हो पाया। परन्तु प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज किया गया एवं उसकी जाँच भी की गयी। अतएव न्यून विशिष्टि के B.A.Wire Crate की बुनाई कराकर कार्य में उपयोग होने के बावजूद गलत मंशा से प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज कर अनियमित भुगतान करने का प्रयास किया जाना परिलक्षित होता है।

उक्त आलोक में उनके द्वारा समर्पित बचाव बयान में कहा गया है कि वे श्री सतीश प्रसाद सिंह, सहायक अभियंता के निलंबन के पश्चात दिनांक 07.08.13 को प्रभार ग्रहण किये। आरोप-(i) ः- घोडहिया स्थल पर 3mx1.5mx0.6मी॰ साईज का B.A. Wire Crating कराया गया था। जिसका आयतन 2.7M3 आता है जिसमें 20 % Voids घटाने पर एक क्रेट का आयतन 2.16 होता है उसी के अनुरूप माप पुस्त में बोल्डर क्रेटिंग कार्य में प्रत्युक्त 368 अदद्‌ बोल्डर क्रेटिंग में 368x2.16=794.88 घन मी॰ बोल्डर दर्शाया गया है। उड़नदस्ता द्वारा बोल्डर से भरे हुए स्थिति में क्रेट की मापी की गयी थी। जिससे क्रेट के सही साईज का आकलन कभी संभव नहीं है। इसके लिये क्रेट में से बोल्डर को पूरा हटाकर क्रेट की लम्बाई, चौड़ाई एवं मोटाई की मापी की जानी चाहिये था। अतएव उड़नदस्ता के क्रेट मापी तरीका त्रुटिपूर्ण है। फिर भी उड़नदस्ता द्वारा दिये गये प्रतिवेदन के आलोक में उड़नदस्ता के निदेशानुसार कुल 368x1.916x0- 80=564.07 घन मी॰ को ही कार्य में प्रत्युक्त माना गया, यह उचित नहीं है। फिर भी विपत्र उड़नदस्ता द्वारा दिये गये प्रतिवेदन के आधार पर बनाया गया एवं बाध्य होकर बोल्डर को साईड A/C में जोड़ लिया गया। अभी तक कोई भुगतान नहीं हुआ है। आरोप निराधार है।

आरोप-(ii) :- घोड़हिया स्थल पर तीन पालियों में अलग-अलग अभियंता द्वारा कार्य कराया गया था। तृतीय पाली में वे कार्यरत थे। यह कार्य सभी वरीय पदाधिकारी के उपस्थिति में कराया गया था। कराये गये कार्यो की विस्तृत विवरणी प्रतिदिन NR तैयार कर बेतार संवाद के माध्यम से प्रतिदिन प्रभारी बाढ़ नियंत्रण कक्ष, पटना/मोतिहारी, मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को भेजा जाता था। जिसमें प्रति B.A. Wire Crate में 100 अद्‌द बालू भरे ई॰सी॰ बैग के अनुरूप दर्ज था। पूरे बाढ़ अवधि में नियमित रूप से प्रतिदिन सभी पदाधिकारी को बेतार संवाद से वस्तुस्थिति से अवगत कराया जाता था। किन्तु कभी न तो विभाग से, न ही किसी वरीय पदाधिकारी द्वारा इस पर कोई आपत्ति की गयी। अतः 100 अद्‌द बोरा/क्रेट के अनुसार सभी पाली में कार्य कराया जाता रहा। किन्तु कोई भी पदाधिकारी द्वारा मात्र 80 अद्‌द बालू भरे ई॰सी॰ बैग, बी॰ए॰ वायर क्रेट में डालने का निदेश नहीं दिया गया। उड़नदस्ता के प्रतिवेदन के अनुसार ई॰सी॰ बैग की कीमत दुगना दर से एवं 20 बैग से भरे बालू ई॰सी॰ बैग की मजदूरी भी विपत्र से घटाकर दिया गया है। स्पष्ट है कि उनके द्वारा संवेदक को भुगतान के पूर्व उड़नदस्ता प्रतिवेदन के आलोक में सभी आवश्यक कटौती कर ली गयी है। किसी भी सरकारी राशि की क्षति नहीं हुई है। आरोप-(iii) :- कार्य में प्रत्युक्त होने वाले B.A. Wire Crate की आपूर्ति प्रमंडलीय स्टोर से की गयी है, स्टोर प्रभारी सहायक अभियंता द्वारा क्रेट बुनाई का कार्य कराया गया है। वर्ष 2013 में स्टोर प्रभारी कनीय अभियंता, मो॰ कासीम थे एवं उन्हीं के द्वारा क्रेट बुनाई किया गया था। अतएव सरकारी B.A. Wire Crate के दुरूपयोग मुझ पर लगाया गया आरोप आधारहीन एवं तथ्य से परे है। क्रेट बुनाई कार्य से इनका कोई संबंध नहीं है।

श्री कुमार द्वारा समर्पित बचाव बयान एवं उपलब्ध विभागीय अभिलेख के समीक्षोपरांत निम्न तथ्य पाये गये :- आरोप-1 :- बोल्डर क्रेटिंग कार्य में कुल 230.81 घन मी॰ बोल्डर को गलत ढंग से अधिक मापी दर्ज करने से संबंधित आरोप के संदर्भ में इनके द्वारा कहा गया है कि उड़नदस्ता द्वारा बोल्डर से भरे क्रेट की मापी की गयी थी जिससे क्रेट की सही साईज का आकलन करना संभव नहीं है इसके लिए क्रेट में से बोल्डर को पूरा हटाकर क्रेट की लम्बाई, चौड़ाई एवं मोटाई की मापी की जानी चाहिये थी। अतः क्रेट की मापी त्रुटिपूर्ण है। उड़नदस्ता द्वारा बोल्डर की कुल मात्रा 564.67 घन मी॰ माना गया है जो कतई संभव नहीं है फिर भी विपत्र उड़नदस्ता द्वारा दिये गये प्रतिवेदन के आधार पर बनाया गया एवं बाध्य होकर बचे बोल्डर को साईड A/C में जोड़ दिया गया। इस प्रकार गलत ढंग से मापी अधिक दर्ज नहीं की गयी है।

उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 4 (v) (ख) से स्पष्ट है कि स्थलीय जाँच के क्रम में कराये गये B.A. Wire Crating कार्य के विभिन्नि स्थलों से Randomly select कर कुल 6 अद्‌द B.A. Wire बोल्डर क्रेटिंग कार्य की मापी ली गयी है एवं प्रति क्रेट औसत आयतन 1.91 घन मी॰ पाया गया है। तथा कार्य में प्रत्युक्त कुल 368 अदद्‌ कराये गये बी॰ए॰ वायर क्रेटिंग कार्य की मात्रा 564.07 घनमी0 होता है। उड़नदस्ता द्वारा माना गया है कि इस कार्य में कुल 564.07 घन मी॰ बोल्डर का उपयोग किया गया है। जबकि माप पुस्त में 368x2.16=794.88 घन मी॰ दर्ज किया गया है। इस प्रकार 794.88-564.07=230.81 घन मी॰ अधिक181 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 बोल्डर की मापी दर्ज किया गया है। चूँकि आरोपी द्वारा उड़नदस्ता के जाँच की प्रक्रिया पर प्रश्न उत्पन्न किया है जबकि उड़नदस्ता द्वारा आरोपी पदाधिकारियों यथा श्री कुमार एवं अन्य पदाधिकारी के उपस्थिति में बोल्डर क्रेटिंग कार्य की जाँच किया गया है। ऐसी स्थिति में यदि जाँच की प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण था तो इन्हें उसी समय जाँच की प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करना चाहिये था न कि स्पष्टीकरण के समय में। आरोपी द्वारा कहा गया है कि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के आधार पर विपत्र तैयार किया गया एवं बचे बोल्डर को निदेशानुसार Site Account में जोड़ लिया गया एवं अभी तक इस मद में कोई भुगतान नहीं होने से अधिकाई भुगतान का मामला नहीं बनता है। उक्त कथन की पुष्टि इस मामले में मोनिटरिंग संगठन द्वारा दिये गये मंतव्य की इसके भुगतान की कारवाई विभागीय दायित्व समिति से अनुशंसा प्राप्त होने के उपरान्त किया जायेगा, से होती है। आरोप-2 :- प्रश्नगत कार्य में न्यून विशिष्टि के B.A. Wire Crate में प्रावधान से कम बालू भरे बोरे का उपयोग कर प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज लापरवाही/उदासीनता बरतने से संबंधित आरोप के संदर्भ में इनके द्वारा B.A. Wire Crate में 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग भरे जाने के संबंध में कहा गया है कि इस स्थल पर अलग-अलग पाली में अभियंता द्वारा कार्य कराया जाता था। वे तृतीय पाली में कार्यरत थे। सभी पाली में एक B.A. Wire Crate में 100 अद्‌द बालू भरे ई॰सी॰ बैग डालकर कार्य उच्च पदाधिकारी के निदेशानुसार कराया गया था। कराये गये कार्यो का प्रतिदिन NR तैयार कर बेतार संवाद के माध्यम से प्रतिदिन प्रभारी बाढ़ नियंत्रण कक्ष पटना/मोतिहारी तथा मुख्य अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता को भेजा जाता था अर्थात सभी लोग कार्य से अवगत थे। किन्तु कभी भी न तो विभाग न ही किसी वरीय पदाधिकारी द्वारा इस पर कोई आपत्ति की गयी। न ही 80 अद्‌द बालू भरे E.C. bags, B.A. Wire Crate में डालने का निदेश ही दिया गया। यह भी कहा गया है कि उड़नदस्ता जाँच के आलोक में 20 अद्‌द E.C. Bags की कीमत दुगनी दर से एवं बालू भरने की मजदूरी विपत्र से घटा दिया गया। अतः किसी भी सरकारी राशि की क्षति नहीं हुई है। उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 5 (iii) (f) में कहा गया है कि संवेदक के स्तर पर ई॰सी॰ बैग में पूरी तरह बालू नहीं भरे जाने के कारण अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रपत्र 24 प्रेषण के समय बालू भरे 100 अद्‌द ई॰सी॰ बैग को बालू भरे 80 अद्‌द ई॰सी॰ बैग के समतुल्य मानते हुए कराये गये कार्य के ढुलाई एवं आपूर्ति में कटौती की गयी है तथा जाँच प्रतिवेदन की कंडिका 4 (v) (क) से स्पष्ट होता है कि स्थलीय जाँच में भी B.A. Wire Crate में बालू भरे ई॰सी॰ बैग की संख्या 100 अद्‌द पायी गयी है परन्तु बोरे में अपेक्षित मात्रा में बालू की कमी परिलक्षित होना बताया गया है एवं कहा गया है कि इसी को ध्यान में रखकर अधीक्षण अभियंता द्वारा प्रपत्र 24 में E.C. bags की मात्रा में 20 प्रतिशत की कटौती की गयी है। किसी भी कार्य को विशिष्टि के अनुरूप कार्य कराने का दायित्व कार्यपालक अभियंता से लेकर कनीय अभियंता तक के पदाधिकारी का विशेष रूप से होती है एवं विशिष्टि के अनुरूप कराये गये कार्यो का ही मापी दर्ज करना है। जिसके लिए श्री कुमार दोषी हैं। उड़नदस्ता प्रतिवेदन के आलोक में प्रति B.A. Wire Crate में शेष 20 अद्‌द ई॰सी॰ बैग की कीमत दुगने दर से संवेदक के विपत्र से रिकभरी कर ली गयी है तथा 20 अदद्‌ बालू भरने की मजदूरी भी विपत्र से घटा दिया गया है। अतएव किसी प्रकार की सरकारी राशि की क्षति नहीं हुई है। जिसकी पुष्टि मोनिटरिंग के द्वारा दिये गये मंतव्य की इस कार्य का भुगतान की कारवाई विभागीय दायित्व समिति के अनुशंसा प्राप्त होने के उपरान्त किया जाना है। अर्थात इस कार्य का भुगतान नहीं किया गया। फलतः सरकारी राशि की क्षति होना परिलक्षित नहीं होता है।

आरोप-3 :- न्यून विशिष्टि के B.A. Wire Crate बुनाई कराकर प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज करने से संबंधित आरोप के संदर्भ में इनके द्वारा कहा गया है कि B.A. Wire Crate की आपूर्ति प्रमंडलीय स्टोर से की गयी है। स्टोर के प्रभारी सहायक अभियंता द्वारा ही क्रेट बुनाई कार्य कराया गया है। वर्ष 2013 में स्टोर प्रभारी कनीय अभियंता मो॰ कासीम थे एवं उन्हीं के द्वारा क्रेट बुनाई किया गया है। अतः क्रेट बुनाई कार्य उनसे संबंधित नहीं है, स्वीकार योग्य प्रतीत होता है क्याेंकि तत्कालीन कार्यपालक अभियंता श्री ठाकुर द्वारा भी अपने बचाव बयान में कहा गया है कि क्रेट बुनाई का कार्य मोतिहारी में याँत्रिक अवर प्रमंडल, मोतिहारी द्वारा कराया गया है। ऐसी स्थिति में न्यून विशिष्टि के B.A. Wire Crate की बुनाई कराने तथा प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज करने के लिए श्री कुमार तत्कालीन सहायक अभियंता दोषी प्रतीत नहीं होते है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में श्री अशोक कुमार, तत0 सहायक अभियंता के विरूद्ध आरोप 1 एवं 2 यथा गलत ढंग से कराये गये कार्य से अधिक बोल्डर की मापी दर्ज करने तथा B.A. Wire Crate में कम बालू भरे बोरों के उपयोग कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराने तथा प्रावधान के अनुरूप मापी दर्ज करने के लिये दोषी हैं। परन्तु आरोप-3 यथा न्यून विशिष्टि के B.A. Wire Crate बुनाई का आरोप प्रमाणित नहीं होता है। चूँकि उड़नदस्ता जाँच प्रतिवेदन के आलोक मंंें संवेदक के विपत्र में आवश्यक सुधार एवं कटौती करते हुए विपत्र बनाया गया है। फलस्वरूप अधिकाई भुगतान का मामला नहीं है। मामले के समीक्षोपरांत उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अशोक कुमार (आई0डी0-5197) तत0 सहायक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति सहायक अभियंता, पूर्वी तटबंध प्रमंडल, वीरपुर के विरूद्ध अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा निम्न दण्ड दिये जाने का निर्णय लिया गया है :-

(i) दो वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।182 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 अनुशासनिक प्राधिकार के उक्त निर्णय के आलोक में श्री अशोक कुमार (आई0डी0-5197), तत0 सहायक अभियंता, चम्पारण प्रमंडल, मोतिहारी सम्प्रति सहायक अभियंता, पूर्वी तटबंध प्रमंडल, वीरपुर के विरूद्ध निम्न दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।

(i) दो वेतन वृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

------- 9 जनवरी 2020 सं॰ 22/नि॰सि॰(मोति॰)-08-03/2013(अंश-1)(खण्ड-क)-27--श्री बीरेन्द्र कुमार सिन्हा (आई0डी0-1760), तत्कालीन अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-02, जल संसाधन विभाग, पटना के विरूद्ध नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना के अन्तर्गत एकरारनामा के विरूद्ध स्थानीय सामग्री उपयोग के बावजूद ढुलाई मद का भुगतान वास्तविक लीड की बजाय एकरारनामा में प्रावधानित मद दर के अनुरूप किये जाने संबंधी निम्नांकित आरोप के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-296 दिनांक-12.03.2014 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली-2005 के नियम 17 के तहत्‌ विभागीय कार्यवाही संचालित की गई :- नेपाल हितकारी योजना 2009 गंडक प्रोजेक्ट के अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अधीन मुख्य पश्चिमी नहर के पुनस्र्थापन कार्य में एकरारनामा के विरूद्ध स्थानीय सामग्री का उपयोग किया गया। तकनीकी परीक्षक कोषांग, निगरानी विभाग के जाँच में पाया गया कि स्थानीय सामग्री के प्रयोग के बावजूद भी सामग्री ढुलाई मद का भुगतान वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा में प्रावधानित मद दर के अनुरूप किया गया है। कार्य के निरीक्षण के दौरान उनके द्वारा स्थानीय सामग्री के उपयोग का उद्‌घोषणा नहीं कर तथ्य को छिपाकर निरीक्षण प्रतिवेदन प्रतिवेदित किया गया। इससे स्पष्ट है कि उक्त अनियमित भुगतान में उनके स्तर से सहयोग करने के आरोप के लिए वे प्रथम दृष्टया दोषी है। दिनांक-31.01.2016 को श्री सिन्हा के सेवानिवृत होने के कारण उनके विरूद्ध संचालित उक्त विभागीय कार्यवाही को विभागीय आदेश सं0-09 सहपठित ज्ञापांक-61 दिनांक-18.01.2017 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43 (बी0) के तहत्‌ सम्परिवर्तित किया गया। विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी द्वारा श्री सिन्हा के विरूद्ध गठित आरोप को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए प्रमाणित आरोप के लिए श्री सिन्हा से विभागीय पत्रांक-503 दिनांक-11.04.2017 द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा (अभ्यावेदन) की माँग की गयी। उक्त आलोक में उनके द्वारा समर्पित द्वितीय कारण पृच्छा उार (अभ्यावेदन) के समीक्षोपरांत प्रमाणित आरोपों के लिए श्री सिन्हा के विरूद्ध विभागीय अधिसूचना संख्या-44, दिनांक 05.01.2018 द्वारा निम्न दण्ड संसूचित किया गया :- "बीस प्रतिशत पेंशन की कटौती पाँच वर्षों के लिए"। उक्त विभागीय दण्डादेश के विरूद्ध श्री सिन्हा द्वारा माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्लू0जे0सी0 संख्या-19322/2018 दायर किया गया। उक्त वाद में दिनांक 08.08.2019 को माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा पारित आदेश में इस तथ्य का उल्लेख किया गया है कि जाँच टीम के सदस्यों का परीक्षण एवं प्रतिपरीक्षण संचालन पदाधिकारी द्वारा नहीं किया गया। इसलिए जाँच प्रतिवेदन को साक्ष्य के रूप में ग्राह्‌य नहीं किया जा सकता। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उक्त पारित आदेश में संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन एवं श्री सिन्हा के विरूद्ध संसूचित दण्ड को निरस्त करते हुए सम्पूर्ण मामले को संचालन पदाधिकारी के स्तर पर Remand Back किया गया है। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उक्त पारित आदेश के विरूद्ध एल0पी0ए0 दायर किये जाने के बिन्दु पर विधि विभाग से मंतव्य प्राप्त किया गया। विधि विभाग द्वारा मंतव्य दिया गया कि उक्त आदेश के विरूद्ध एल0पी0ए0 दायर करने का कोई आधार नहीं है। वर्णित स्थिति में माननीय उच्च न्यायालय, पटना द्वारा उक्त पारित आदेश के आलोक में विभागीय अधिसूचना संख्या-44, दिनांक 05.01.2018 द्वारा श्री बीरेन्द्र कुमार सिन्हा (आई0डी0-1760), तत0 अधीक्षण अभियंता, योजना एवं मोनिटरिंग अंचल-02, जल संसाधन विभाग, पटना सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध संसूचित "बीस प्रतिशत पेंशन की कटौती पाँच वर्षों के लिए" के दण्ड एवं संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन को निरस्त करते हुए विभागीय कार्यवाही के संचालन हेतु सम्पूर्ण मामले को मुख्य जाँच आयुक्त, सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार, पटना के पास Remand Back किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

6 जनवरी 2020

सं॰ 22/नि॰सि॰(वीर॰) 07-02/18-09--श्री सतीश कुमार वर्मा, (आई0डी0-3651) तत्कालीन कार्यपालक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन कार्य प्रमंडल, सुपौल के पद पर पदस्थापित थे तब इनके विरूद्ध योजना एवं विकास विभाग, पटना से प्राप्त आरोप के लिए विभागीय अधिसूचना सं0-2361 दि0-15.11.18 द्वारा इन्हे निलंबित करते हुए विभागीय संकल्प सं0-2364 दि0-15.11.18 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई।183 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत श्री वर्मा के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को विभागीय अधिसूचना सं0-1905 दि0-02.09.19 द्वारा समाप्त कर दिया गया।

निलंबन अवधि के विनियमन के संबंध में श्री वर्मा से प्राप्त अभ्यावेदन की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। समीक्षा में पाया गया कि श्री वर्मा के विरूद्ध आरोप पत्र में गठित आरोप प्रमाणित नही पाये गये तथा उन्हे आरोप मुक्त किया जा चुका है, इसलिए श्री वर्मा के निलंबन अवधि को निम्न रूपेण विनियमित करने का निर्णय लिया गया हैः-

'' निलंबन अवधि (दि0 15.11.18 से दि0 31.07.19 तक) कर्तव्य अवधि मानी जायेगी तथा इस अवधि का पूर्ण वेतन तथा भत्ता (पूर्व में ली गई राशि को घटाकर) का भुगतान किया जायेगा।

अतः उक्त निर्णय के आलोक में श्री सतीश कुमार वर्मा (आई0डी0-3651) के निलंबन अवधि (दि0-15.11.18 से दि0-31.07.19 तक) कर्त्तव्य अवधि माना जाता है। तथा इस अवधि का पूर्ण वेतन तथा भत्ता (पूर्व में ली गई राशि को घटाकर) का भुगतान किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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30 दिसम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-2727--श्री दिलीप कुमार (आई0डी0 सं०-7640), तत0 सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णाेद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में बरती गयी अनियमितता के लिए अधिसूचना सं0-1671, दिनांक 06.08.2019 द्वारा निलंबित किया गया है। श्री कुमार से संबंधित संचिका में इनके अलावा अन्य अभियंताओं के विरूद्ध भी कार्रवाई किये जाने के कारण ससमय आरोप पत्र गठित कर संसूचित नहीं किया जा सका।

उक्त तथ्यों के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(7) में निहित प्रावधानों के तहत निलंबनादेश निर्गत होने की तिथि से तीन माह के पश्चात अगले दो माह के लिए श्री दिलीप कुमार के निलंबन अवधि को विस्तारित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

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30 दिसम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-2726--श्री क्षितिष कुमार (आई0डी0 सं०-5090), तत0 सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णाेद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में बरती गयी अनियमितता के लिए अधिसूचना सं0-1672, दिनांक 06.08.2019 द्वारा निलंबित किया गया है। श्री कुमार से संबंधित संचिका में इनके अलावा अन्य अभियंताओं के विरूद्ध भी कार्रवाई किये जाने के कारण ससमय आरोप पत्र गठित कर संसूचित नहीं किया जा सका।

उक्त तथ्यों के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(7) में निहित प्रावधानों के तहत निलंबनादेश निर्गत होने की तिथि से तीन माह के पश्चात अगले दो माह के लिए श्री क्षितिष कुमार के निलंबन अवधि को विस्तारित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

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30 दिसम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-2725--श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा (आई0डी0 सं०-जे 7916), तत0 सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णाेद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में बरती गयी अनियमितता के लिए अधिसूचना सं0-1670, दिनांक 06.08.2019 द्वारा निलंबित किया गया है। श्री शर्मा से संबंधित संचिका में इनके अलावा अन्य अभियंताओं के विरूद्ध भी कार्रवाई किये जाने के कारण ससमय आरोप पत्र गठित कर संसूचित नहीं किया जा सका।

उक्त तथ्यों के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(7) में निहित प्रावधानों के तहत निलंबनादेश निर्गत होने की तिथि से तीन माह के पश्चात अगले दो माह के लिए श्री उपेन्द्र प्रसाद शर्मा के निलंबन अवधि को विस्तारित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 184

30 दिसम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-2724--श्री रामविनय सिंह (आई0डी0 सं०-जे 7645), तत0 सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णाेद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में बरती गयी अनियमितता के लिए अधिसूचना सं0-1669, दिनांक 06.08.2019 द्वारा निलंबित किया गया है। श्री सिंह से संबंधित संचिका में इनके अलावा अन्य अभियंताओं के विरूद्ध भी कार्रवाई किये जाने के कारण ससमय आरोप पत्र गठित कर संसूचित नहीं किया जा सका।

उक्त तथ्यों के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(7) में निहित प्रावधानों के तहत निलंबनादेश निर्गत होने की तिथि से तीन माह के पश्चात अगले दो माह के लिए श्री रामविनय सिंह के निलंबन अवधि को विस्तारित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

------- 30 दिसम्बर 2019 सं॰ 22/नि॰सि॰(पट0)-03-01/2017-2722--श्री ईश्वर सहाय राम (आई0डी0-4570), तत्का0 कार्यपालक अभियंता, जल विज्ञान प्रमंडल (मध्य), पटना के पद पर पदस्थापित थे, तो उनके विरूद्ध सरकारी आदेशों का अनुपालन नहीं करना, स्वेच्छापूर्वक अनधिकृत अनुपस्थित रहना, विभाग से अनावश्यक पत्राचार करते रहना, प्रभार ग्रहण से लेकर अब तक अनधिकृत रूप से कार्यालय से अनुपस्थित रहने, स्वेच्छाचारिता, हठधर्मिता एवं अनुशासनहीनता का आरोप प्रतिवेदित करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1028, दिनांक 23.06.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। श्री ईश्वर सहाय राम के विरूद्ध एक अन्य मामले में डिहरी परिक्षेत्र में बरती गई अनियमितताओं के लिए विभागीय कार्यवाही संचालित की गई, जिसमें आरोपों को प्रमाणित पाया गया। तदोपरांत विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-1444, दिनांक 10.07.2019 द्वारा आदेश निर्गत की तिथि से अनिवार्य सेवानिवृति का दण्ड अधिरोपित किया गया। जिसके फलस्वरूप श्री ईश्वर सहाय राम दिनांक 10.07.2019 से सेवानिवृत सरकारी सेवक है। अतएव श्री ईश्वर सहाय राम के विरूद्ध संचालित उक्त विभागीय कार्यवाही को दिनांक 10.07.2019 के प्रभाव से बिहार पेंशन नियमावली के नियम-43बी के प्रावधानों के तहत सम्परिवर्तित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

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19 दिसम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मोति0)-08-03/2013(अंश-1)(खण्ड-ख)-2628--श्री अम्बिका प्रसाद (आई0डी0-जे 5509), तत्कालीन सहायक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध तकनीकी परीक्षक कोषांग, निगरानी विभाग से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अधीन मुख्य पश्चिमी नहर के पुनस्र्थापन कार्य में बरती गयी अनियमितता संबंधी निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1986 दिनांक-09.11.2017 द्वारा बिहार पेंशन नियमावली नियम 43(बी) के तहत विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक प्रोजेक्ट के अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अधीन मुख्य पश्चिमी नहर के पुनस्र्थापन कार्य में एकरारनामा के विरूद्ध स्थानीय सामग्री का उपयोग किया गया। तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग के जाँच में पाया गया कि स्थानीय सामग्री यथा स्टोन मेटल, स्टोन चिप्स, बालू के प्रयोग के बावजूद भी सामग्री ढुलाई मद का भुगतान वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा में प्रावधानित मद दर के अनुरूप किया गया है। फलस्वरूप सिर्फ सामग्री ढुलाई मद में 24.65 करोड़ रूपये का अनियमित भुगतान हुआ है। आलोच्य कार्य में की गई अनियमित भुगतान की गणना हेतु एक समिति गठित की गयी। समिति द्वारा कुल 8.9933624 करोड़ रूपये मात्र सामग्री (स्टोन मेटल, स्टोन चिप्स) ढुलाई मद में अनियमित/अधिकाई भुगतान की गणना की गयी है। साथ ही साथ प्रावधान के अनुरूप स्टोन मेटल, स्टोन चिप्स का उपयोग नहीं किये जाने से स्पष्ट स्थापित है कि निम्न विशिष्टि का कार्य कराया गया है। अतएव निम्न विशिष्टि का कार्य कराने एवं अधिकाई भुगतान करने में सहयोग करने के लिए वे दोषी हैं।

मामले की समीक्षा के क्रम में श्री प्रसाद के विरूद्ध निम्नांकित आरोप के लिए पूरक आरोप पत्र गठित किया गया, जिसे विभागीय पत्रांक-552, दिनांक 27.02.2018 द्वारा संचालन पदाधिकारी, प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी एवं श्री प्रसाद को उपलब्ध कराया गया :-

प्रश्नगत कार्य में बरती गई अनियमितता के संदर्भ में उनके पत्रांक-शून्य, दिनांक 19.04.17 से प्राप्त स्पष्टीकरण के साथ उपलब्ध कराये गये मापपुस्त संख्या-1456 के पेज संख्या-58-59 में No lead allowed अंकित किया हुआ है। जबकि इसी मामले में श्री अनिल कुमार सिंह, तत्कालीन कनीय अभियंता से प्राप्त स्पष्टीकरण के साथ संलग्न इसी मापपुस्त185 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 के पृष्ठ 58-59 के किसी भी भाग में No lead allowed अंकित नहीं है। तत्पश्चात इस संदर्भ में उक्त मापपुस्त संख्या-1456 के सभी पृष्ठों की सत्यापित प्रति उपलब्ध कराने के साथ ही इसी संदर्भित उनके पत्रांक-188, दिनांक 23.06.12 को भी सत्यापित करने का निदेश कार्यपालक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर को दिया गया। जिसके अनुपालन में कार्यपालक अभियंता के पत्रांक-308, दिनांक 01.09.17 से उक्त मापपुस्त के पेज संख्या-01-73 तक का सत्यापित प्रति उपलब्ध कराते हुए कहा गया है कि उनका पत्रांक-188, दिनांक 23.06.2012 प्रमंडलीय कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। कार्यपालक अभियंता से प्राप्त मापपुस्त संख्या-1456 के पेज 58 का निचला भाग एवं पेज 59 का उपरी भाग जहाँ उनके द्वारा समर्पित साक्ष्य में No lead allowed अंकित है, फटा हुआ है।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उनके द्वारा उक्त मापपुस्त से छेड़-छाड़ किया गया है। साथ ही विभाग को दिगभ्रमित/गुमराह करने का प्रयास किया जाना परिलक्षित होता है, जो एक गंभीर मामला है। जिसके लिए वे दोषी हैं। उक्त विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-1084 दिनांक-14.12.2018 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री प्रसाद के विरूद्ध गठित आरोपों (मूल आरोप एवं पूरक आरोप) को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-04 दिनांक-02.01.2019 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराते हुए श्री प्रसाद से अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की माँग की गयी। उक्त आलोक में श्री प्रसाद द्वारा समर्पित अभ्यावेदन में आरोपों के संदर्भ में लगभग वही तथ्य एवं साक्ष्य दिया गया है, जो उनके द्वारा विभागीय कार्यवाही के संचालन के दौरान संचालन पदाधिकारी को दिया गया है। जिसकी समीक्षा सम्यक रूप से संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में किया गया है एवं समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी द्वारा दोनों आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया है। नये तथ्य के रूप में मापपुस्त संख्या-1456 के पृष्ठ 58 का निचला हिस्सा एवं पृष्ठ 59 का उपरी भाग को फाड़ने का प्रश्न है, इस संबंध में कहा गया है कि उक्त अवर प्रमंडल का कार्यभार सौंपने की तारीख 15.07.13 तक उपर्युक्त पृष्ठ फटा हुआ नहीं था। क्योंकि इनसे न तो पत्राचार किया गया, न हीं इनके विरूद्ध एफ0आई0आर0 दर्ज की गयी है। मापपुस्त फाड़ने का कार्य उनके प्रभार देने के बाद किया गया है, क्योंकि उनके प्रतिस्थानी को विपत्र बनाने में लाभ मिला होगा, स्वीकार योग्य प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि विभागीय पत्रांक-559, दिनांक 28.02.18 के अनुपालन में कार्यपालक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर द्वारा वास्तविक लीड के बजाय एकरारित लीड से सामग्री ढुलाई का विपत्र की अनुशंसा करने एवं मापपुस्त में बाद की तिथि में छेड़-छाड़ एवं फाड़कर विभाग को गुमराह करने के लिए वाल्मीकिनगर थाना में दिनांक 20.04.2018 को प्राथमिकी दर्ज करने हेतु अनुरोध किया गया है। जिसके आलोक में वाल्मीकिनगर थाना काण्ड संख्या-42/18 दिनांक 10.05.2018 दर्ज किया गया है। उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त इनके द्वारा अन्य कोई नया तथ्य एवं साक्ष्य नहीं दिया गया है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री प्रसाद के विरूद्ध गठित दोनों आरोप यथा प्रश्नगत कार्य में एकरारनामा के विपरीत स्थानीय सामग्री का उपयोग कर न्यून विशिष्टि के कार्य कराने एवं सामग्री ढुलाई हेतु वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा में प्रावधानित लीड से अनियमित भुगतान में सहयोग कर कुल 8. 9933624 (आठ करोड़ निन्यानवें लाख तैंतीस हजार छः सौ चौबीस) रूपये मात्र सरकारी राशि की क्षति पहुँचाने तथा प्रश्नगत कार्य के मापपुस्त से छेड़-छाड़/फाड़कर विभाग को दिग्भ्रमित/गुमराह करने का प्रयास करने के आरोप को प्रमाणित पाया गया।

उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए सरकार द्वारा श्री अम्बिका प्रसाद (आई0डी0-जे 5509), तत्कालीन सहायक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध "शत प्रतिशत पेंशन पर स्थायी रोक" का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय लिया गया।

श्री प्रसाद के विरूद्ध उक्त विनिश्चित दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की मांग की गयी, जिस पर आयोग के पत्रांक-1833, दिनांक 30.10.2019 द्वारा सहमति प्रदान की गयी।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री अम्बिका प्रसाद (आई0डी0-जे 5509), तत्कालीन सहायक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर सम्प्रति सेवानिवृत के विरूद्ध "शत प्रतिशत पेंशन पर स्थायी रोक" का दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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19 दिसम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(मोति0)-08-03/2013(अंश-1)(खण्ड-ख)-2627--श्री अजीत कुमार (आई0डी0-5190), तत्कालीन सहायक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के विरूद्ध तकनीकी परीक्षक कोषांग, निगरानी विभाग से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की समीक्षोपरांत नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक परियोजना अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अधीन मुख्य पश्चिमी नहर के पुनस्र्थापन कार्य में बरती गयी अनियमितता संबंधी निम्नांकित आरोपों के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1985 दिनांक-09.11.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 के तहत विहित रीति से विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी :-

नेपाल हितकारी योजना-2009 गंडक प्रोजेक्ट के अन्तर्गत मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर के अधीन मुख्य पश्चिमी नहर के पुनस्र्थापन कार्य में एकरारनामा के विरूद्ध स्थानीय सामग्री का उपयोग किया गया। तकनीकी परीक्षक कोषांग निगरानी विभाग के जाँच में पाया गया कि स्थानीय सामग्री यथा स्टोन मेटल, स्टोन चिप्स, बालू के प्रयोग के बावजूद186 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 भी सामग्री ढुलाई मद का भुगतान वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा में प्रावधानित मद दर के अनुरूप किया गया है। फलस्वरूप सिर्फ सामग्री ढुलाई मद में 24.65 करोड़ रूपये का अनियमित भुगतान हुआ है। आलोच्य कार्य में की गई अनियमित भुगतान की गणना हेतु एक समिति गठित की गयी। समिति द्वारा कुल 8.9933624 करोड़ रूपये मात्र सामग्री (स्टोन मेटल, स्टोन चिप्स) ढुलाई मद में अनियमित/अधिकाई भुगतान की गणना की गयी है। साथ ही साथ प्रावधान के अनुरूप स्टोन मेटल, स्टोन चिप्स का उपयोग नहीं किये जाने से स्पष्ट स्थापित है कि निम्न विशिष्टि का कार्य कराया गया है। अतएव निम्न विशिष्टि का कार्य कराने एवं अधिकाई भुगतान करने में सहयोग करने के लिए वे दोषी हैं।

उक्त विभागीय कार्यवाही में संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-1084 दिनांक-14.12.2018 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री कुमार के विरूद्ध गठित आरोपों को प्रमाणित होने का मंतव्य दिया गया। समीक्षोपरांत संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए विभागीय पत्रांक-05 दिनांक-02.01.2019 द्वारा संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन की प्रति उपलब्ध कराते हुए श्री कुमार से अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की माँग की गयी। उक्त आलोक में श्री कुमार द्वारा निर्धारित अवधि तक अभ्यावेदन विभाग को समर्पित नहीं किया गया। उनके द्वारा विलंब से समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) में निम्न तथ्यों का उल्लेख किया गया :-

उनके द्वारा कहा गया है कि प्रस्तुतीकरण पदाधिकारी द्वारा अपने मंतव्य में कहा है कि आरोपित पदाधिकारी ने स्थल माप पुस्तिका में सम्पादित कार्यों को दर्ज कर उसे अग्रेतर आवश्यक कार्रवाई हेतु प्रमंडल में भेजा जाना स्वीकार किया है किन्तु उनके द्वारा वास्तविक लीड के संबंध में प्रविष्टि का कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। जिससे स्पष्ट है कि एकरारनामा में प्रावधानित दर पर संवेदक को भुगतान की सहमति दी गयी है। संचालन पदाधिकारी द्वारा भी आरोपों के विवेचना में उसकी मान्यता देते हुए उनके बचाव बयान को संतोषजनक नहीं माना है। इस संबंध में यह कहना आवश्यक है कि मापपुस्तिका में मापी दर्ज उनके स्तर से नहीं किया गया था। मापीदर्ज करने का कार्य कनीय अभियंता का था। कनीय अभियंता द्वारा दर्ज मापी को उनके स्तर पर जाँचोपरांत कार्यपालक अभियंता को अग्रसारित किया जाता था। जहाँ तक वास्तविक लीड का प्रश्न है इस संबंध में कहना आवश्यक है कि प्राक्कलन में प्रावधानित दूरी के आधार पर कनीय अभियंता द्वारा विपत्र तैयार किया गया था एवं निर्माण सामग्री जिस खादान से प्राप्त होता था, उसका M&N फार्म खनन विभाग से प्राप्त कर कार्यपालक अभियंता के समक्ष संवेदक द्वारा प्रस्तुत किया जाता था। जिसमें वास्तविक लीड का आकलन प्रमंडल स्तर पर किया जा सकता था। सहायक अभियंता के स्तर पर सम्पादित कार्यों की मात्रा एवं मापी की प्रविष्टि करते हुए अग्रसारित किया जाना है, जिसका निर्वहन किया गया है। लीड से संबंधित स्पष्टीकरण की गयी थी, जिसके आलोक में उनके द्वारा दिये गये स्पष्टीकरण पर संचालन पदाधिकारी द्वारा विचार नहीं किया गया।

उक्त समर्पित अभ्यावेदन (द्वितीय कारण पृच्छा) की समीक्षा में निम्न तथ्य पाये गयेः- श्री कुमार के विरूद्ध आरोप है कि प्रश्नगत कार्य में एकरारनामा के विपरीत कार्य में स्थानीय सामग्री श्रोत से निर्माण सामग्री यथा स्टोन एग्रीगेट एवं चिप्स प्राप्त कर कार्य में प्रयोग किया गया। इसके बावजूद वास्तविक लीड के बजाय प्रावधानित लीड से सामग्री ढुलाई मद में अनियमित भुगतान करने के कारण सरकार को कुल 8.9933624 करोड की क्षति होना परिलक्षित है। साथ ही प्रावधानित खदान के बदले स्थानीय खदान से प्राप्त सामग्री के उपयोग किये जाने से न्यून विशिष्टि के कार्य होना भी परिलक्षित है।

श्री कुमार द्वारा कहा गया है कि मापीपुस्त पर कार्य की मापी कनीय अभियंता द्वारा दर्ज की गयी है न कि इनके द्वारा दर्ज की गयी है। इनके द्वारा कनीय अभियंता द्वारा दर्ज मापी को जाँचोपरांत कार्यपालक अभियंता को अग्रसारित किया गया है। वास्तविक लीड के संदर्भ में कहा गया है कि प्राक्कलन में प्रावधानित दूरी के आधार पर कनीय अभियंता द्वारा विपत्र तैयार किया गया था। निर्माण सामग्री जिस खदान से प्राप्त होता था, उसका M&N फार्म खनन विभाग से प्राप्त कर कार्य0 अभि0 के समक्ष संवेदक द्वारा प्रस्तुत किया जाता था। जिसमें वास्तविक लीड का आकलन प्रमंडल स्तर पर किया जा सकता था। जिसमें सहायक अभियंता के स्तर पर सम्पादित कार्यों की मात्रा एवं मापी की सम्पुष्टि करते हुए अग्रसारित किया जाना है।

विपत्र के जाँच के दौरान इनका दायित्व था कि सामग्री आपूर्ति के लीड की भी जाँच इनके द्वारा की जाय। क्योंकि PWD के कोड के अनुसार सहायक अभियंता को कम से कम 50% मापी की जाँच करना है। जब कनीय अभियंता द्वारा मापी में लीड का उल्लेख नहीं किया गया था, तो उक्त के आलोक में इन्हें स्वयं सामग्री आपूर्ति के संदर्भ में आश्वस्त होकर ही विपत्र समर्पित करना चाहिए था, जो इनके द्वारा नहीं किया गया। अतएव इनका बचाव बयान स्वीकार योग्य नहीं माना जा सकता है।

विभागीय कार्यवाही के दौरान श्री कुमार द्वारा संचालन पदाधिकारी को दिये गये बचाव-बयान तथा अन्य अभिलेखों की समीक्षा में पाया गया कि संचालन पदाधिकारी द्वारा निम्न तथ्यों के आलोक में आरोप प्रमाणित होने का मंंतव्य दिया गया है :-

आरोपी पदाधिकारी द्वारा स्थानीय सामग्री के उपयोग होने के बाद भी एकरारनामा में प्रावधानित लीड के आधार पर भुगतान की प्रक्रिया अपनायी गयी है। इनके द्वारा न तो स्पष्ट रूप से स्थानीय सामग्री के उपयोग कर सवंदेक द्वारा किये गये कार्यों पर रोक लगायी गयी, न ही चालू विपत्र के मापपुस्त पर वास्तविक लीड का उल्लेख किया गया, जो नियमानुकूल नहीं है। जिसके फलस्वरूप निम्न विशिष्टि का कार्य संपादित कराया जाना परिलक्षित है, क्योंकि तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन में 61.62% स्थानीय स्टोन एग्रीगेट/चिप्स का प्रयोग किया जाना स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। उक्त अनियमित कृत्य के कारण प्रावधानित लीड से भुगतान करने के फलस्वरूप सरकार को कुल 8.9933624 (आठ करोड़ निन्यानवें लाख तैंतीस हजार छः सौ चौबीस) रूपये मात्र सामग्री ढुलाई मद में क्षति हुई है।187 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 तकनीकी परीक्षक कोषांग के जाँच प्रतिवेदन के कंडिका 3.4.1 एवं 3.5.0 के अनुसार निर्माण सामग्री का पारगमन नहीं हुआ है। इस संबंध में सशस्त्र सीमा बल द्वारा संधारित वाहन प्रविष्टि पंजी, जिला खनन विकास पदाधिकारी, शेखपुरा के पत्रांक-1585, दिनांक 28.09.12 एवं संवेदक द्वारा प्रदत खनन चालान के आधार पर ही निष्कर्षित किया गया है कि कम से कम 61.62ः स्थानीय सामग्री का प्रयोग उक्त कार्य में हुआ है।

उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्री कुमार द्वारा प्रश्नगत कार्य के कार्यान्वयन में दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही बरतते हुए निम्न विशिष्टि का कार्य कराया गया है एवं सामग्री ढुलाई मद में रू0 8.9933624 (आठ करोड़ निन्यानवें लाख तैंतीस हजार छः सौ चौबीस) रूपये मात्र का अनियमित भुगतान में सहयोग किया गया है जिसके लिए वे दोषी है।

वर्णित तथ्यों के आलोक में संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होते हुए श्री अजीत कुमार, तत0 सहायक अभियंता के विरूद्ध गठित आरोपों यथा एकरारनामा के विरूद्ध प्रश्नगत कार्य में स्थानीय सामग्री का उपयोग कर निम्न विशिष्टि का कार्य कराने एवं सामग्री ढुलाई मद में वास्तविक लीड के बजाय एकरारनामा में प्रावधानित लीड से अनियमित भुगतान करने में सहयोग देने का आरोप प्रमाणित पाया गया।

2. मामले की सम्यक समीक्षोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री अजीत कुमार (आई0डी0-5190), तत्कालीन सहायक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सहायक अभियंता, सोन उच्च स्तरीय नहर अवर प्रमंडल, तुलसीपुर के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम 14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड दिये जाने का निर्णय लिया गया। 3. श्री कुमार के विरूद्ध उक्त विनिश्चित दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से परामर्श की माँग की गई, जिस पर आयोग के पत्रांक-1576, दिनांक 26.09.19 द्वारा सहमति प्रदान की गई।

4. अनुशासनिक प्राधिकार के निर्णयानुसार श्री अजीत कुमार (आई0डी0-5190), तत्कालीन सहायक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सहायक अभियंता, सोन उच्च स्तरीय नहर अवर प्रमंडल, तुलसीपुर के विरूद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (समय-समय पर यथा संशोधित) के नियम 14(xi) के तहत "सेवा से बर्खास्तगी" का दण्ड अधिरोपित करते हुए उन्हें संसूचित किया जाता है।

5. श्री अजीत कुमार (आई0डी0-5190), तत्कालीन सहायक अभियंता, मुख्य पश्चिमी नहर प्रमंडल, वाल्मीकिनगर संप्रति सहायक अभियंता, सोन उच्च स्तरीय नहर अवर प्रमंडल, तुलसीपुर को सेवा से बर्खास्त करने के दण्ड प्रस्ताव पर मंत्रिपरिषद का अनुमोदन प्राप्त है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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17 दिसम्बर 2019

सं॰ 22नि0सि0(भाग0)-09-03/2017-2618--श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, शेखपुरा के विरूद्ध समायोजन के आधार पर समूह-'घ' में नियुक्त दैनिक वेतनभोगी कर्मियों को नियमों एवं निदेशों का उल्लंघन कर नियमित भुगतान करने के लिए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-1245, दिनांक 27.07.2017 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित किया गया।

विभागीय कार्यवाही के संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-3414, दिनांक 22.12.2017 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन की समीक्षा किए जाने के उपरांत सरकार के स्तर पर लिए गए निर्णय के फलस्वरूप जाँच प्रतिवेदन में प्रमाणित पाए गए आरोपों के लिए संचालन पदाधिकारी के मंतव्य से सहमत होकर श्री प्रसाद से द्वितीय कारण पृच्छा किया गया। श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता से प्राप्त द्वितीय कारण पृच्छा के उत्तर की समीक्षा सरकार के स्तर पर किए जाने के उपरांत निम्नलिखित तथ्य पाए गए :-

आरोपित द्वारा अपने बचाव-बयान के साथ संलग्न किये गये अभिलेखों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि इनके पत्रांक-229, दिनांक 06.05.2015 द्वारा संपुष्टि हेतु मुख्य अभियंता को पत्र लिखा गया था। पुनः पत्रांक-74, दिनांक 02.02. 2016 को स्मारित किया गया साथ ही अनुरोध किया गया कि नियुक्ति पत्र की संपुष्टि की जाय ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके। पुनः पत्रांक-47, दिनांक 30.06.2016 द्वारा मुख्य अभियंता को प्रतिवेदित किया गया कि संपुष्टि के अभाव में वेतनादि का भुगतान लंबित है जिससे इन कर्मियों की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गयी है। उक्त पत्र में सम्पुष्टि करने का अनुरोध किया गया था ताकि कर्मियों को वेतनादि का भुगतान किया जा सके।

मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग द्वारा निर्गत नियुक्ति आदेश के पत्रांक-1385, दिनांक 13.04.2015 के कंडिका-7 में स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया है कि नियुक्ति होने वाले उम्मीदवारों के वेतनादि का भुगतान नियुक्ति पत्र की संपुष्टि के पश्चात ही देय होगा। इसका तात्पर्य यह था कि बिना संपुष्टि के नियुक्त दैनिक वेतन भोगियों को वेतनादि देय नहीं था। आरोप पत्र के साथ संलग्न दस्तावेजों में नव नियुक्त कर्मियों (श्री संजय कुमार, श्री अनिल कुमार सिन्हा एवं श्री विजय यादव) के आवेदन पत्रों पर क्रमशः दिनांक 21.07.2015, 21.08.2015 एवं 21.08.2015 को भुगतान की स्वीकृति प्रदान करने का उल्लेख किया गया है।

आरोपित पदाधिकारी के पत्रांक-261, दिनांक 23.05.2015 द्वारा कोषागार पदाधिकारी, शेखपुरा से Pran No. निर्गत करने का अनुरोध किया गया है ताकि भुगतान किया जा सके वेतन नियमावली के अवलोकन से ज्ञात होता है कि संदर्भित कर्मियों के माह जुलाई 2015 का वेतन विपत्र दिनांक 30.07.2015 को श्री संजय कुमार के माह मई एवं जून 2015 का बकाया वेतन विपत्र दिनांक 30.07.2015 को एवं श्री अनिल कुमार सिन्हा, विजय यादव एवं जमीरी राय का माह मई एवं जून 2015188 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 का वेतन विपत्र दिनांक 29.08.2015 को तथा कर्मियों के माह अप्रैल 15 के अंश भाग का बकाया वेतन विपत्र दिनांक 29.08. 2015 को तैयार किया गया है। चारो कर्मियों को मई 2016 तक वेतन भुगतान किया गया है। इनके द्वारा दिनांक 20.05.2015 को कर्मियों का सेवापुस्त नियमित कर्मी के रूप में खोला गया है। आरोपित के पास बचाव बयान में आरोप के विरूद्ध कोई ठोस प्रत्युत्तर नहीं है। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप संख्या-01 एवं 02 को प्रमाणित पाया गया है।

श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता द्वारा द्वितीय कारण पृच्छा में लिखा गया है कि संबंधित नियुक्ति पत्र के सम्पुष्टि हेतु कार्यालय के पत्रांक-229, दिनांक 06.05.2015, पत्रांक-74, दिनांक 02.02.2016 एवं पत्रांक-47, दिनांक 03.06.2016 से अनुरोध किया गया किन्तु कोई सूचना नहीं दी गई। अतः मानवीय आधार पर बिना सम्पुष्टि के वेतन भुगतान का आदेश कार्यपालक अभियंता द्वारा किया गया।

इस प्रकार उपर्युक्त समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी पदाधिकारी द्वारा नियुक्ति पत्र में दिये निदेश का पालन नहीं किया गया और बिना नियुक्ति पत्र के सम्पुष्टि के भुगतान का आदेश दिया गया जिसमें वैसे भी कर्मी थे जिनका अनुशंसा चयन समिति द्वारा नहीं किया गया था। उक्त भुगतान से माननीय उच्च न्यायालय, पटना में याचिका दायर की गई और विभाग के लिए अकारण समस्या उत्पन्न हो गई है। अतः श्री प्रसाद के विरूद्ध आरोप प्रमाणित है एवं वह दोषी पाए गए हैं।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, शेखपुरा के विरूद्ध अधिसूचना सं०-1032, दिनांक 21.05.19 द्वारा निम्न दण्ड सक्षम प्राधिकार के अनुमोदनोपरांत दिया गया-

(i) संगत वर्ष 2015-16 एवं 2016-17 के लिए निन्दन की सजा। (ii) एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक। (iii) भविष्य में कोई प्रोन्नति देय नहीं होगा। (iv) अनियमित रूप से नियुक्त किए गए कर्मियों के वेतनादि के भुगतान की राशि की रिकवरी। उपर्युक्त संसूचित दण्डादेश के विरूद्ध श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, शेखपुरा द्वारा पुनर्विलोकन अभ्यावेदन समर्पित किया गया। श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, शेखपुरा द्वारा निम्नांकित तथ्यों का उल्लेख किया गया है -

(i) नियुक्ति पत्र की सम्पुष्टि हेतु मुख्य अभियंता से अनुरोध किया गया था, परन्तु कोई सूचना नहीं मिलने पर मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर यह भुगतान की गयी थी।

(ii) संबंधित कर्मियों की नियुक्ति मुख्य अभियंता के पत्रांक-1385 दिनांक 13.04.2015 के आलोक में की गयी थी एवं उनकी सम्पुष्टि हेतु तीन बार पत्राचार करने के बाद भी नहीं होने एवं संबंधित कर्मियों के अनुरोध एवं मानवता के आधार पर यह कार्रवाई की गई थी।

(iii) संबंधित कर्मी मुख्य अभियंता के आदेश से ही कार्यरत थे, जिसकी सम्पुष्टि हेतु भी पत्राचार किया गया था, तो ऐसी स्थिति में जब संबंधित कर्मी कार्य किए थे, तो उपस्थिति पंजी के आधार पर उनके वेतनादि का भुगतान नहीं किया जाना न्यायिक दृष्टिकोण से भी उचित नहीं था। मामले से संबंधित कर्मी अब कार्यरत भी नहीं है।

श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, शेखपुरा द्वारा दिए गए पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में अंकित उपर्युक्त तथ्यों के समीक्षोपरांत पाया गया कि उनके द्वारा उन्हीं तथ्यों को दुहराया गया है, जिसका उन्होंने पूर्व में समर्पित स्पष्टीकरण एवं द्वितीय कारण पृच्छा में उल्लेख किया है। श्री प्रसाद द्वारा दिए गए पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में कोई ऐसा नया तथ्य समाहित नहीं है, जिसकी नए सिरे से समीक्षा कर अधिरोपित दण्ड पर पुनर्विचार किया जा सके।

अतएव उपर्युक्त वर्णित तथ्यों के आलोक में सक्षम प्राधिकार के स्तर पर श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, शेखपुरा के पुनर्विलोकन अभ्यावेदन को अस्वीकृत करते हुए विभागीय अधिसूचना सं०-1032, दिनांक 21.05. 2019 द्वारा संसूचित निम्नांकित दण्ड को यथावत रखे जाने का निर्णय लिया गया है :-

(i) संगत वर्ष 2015-16 एवं 2016-17 के लिए निन्दन की सजा। (ii) एक वेतनवृद्धि पर संचयात्मक प्रभाव से रोक। (iii) भविष्य में कोई प्रोन्नति देय नहीं होगा। (iv) अनियमित रूप से नियुक्त किए गए कर्मियों के वेतनादि के भुगतान की राशि की रिकवरी। उपर्युक्त निर्णय श्री अरविन्द प्रसाद, कार्यपालक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, शेखपुरा को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

------- 13 दिसम्बर 2019 सं॰ 22/नि॰सि॰(औ0)-17-09/2017-2593--श्री सुनील कुमार वैश्य, (आई0डी0-3809) तत्कालीन सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, खगौल द्वारा अपने उक्त पदस्थापन काल में बरती गई अनियमितता की जाँच विभागीय उड़नदस्ता अंचल-02 द्वारा की गई। जिसके सम्यक समीक्षोपरांत निम्न आरोप के संबंध में विभागीय पत्रांक-62, दिनांक 14. 02.17 द्वारा श्री वैश्य से स्पष्टीकरण किया गया।189 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 आरोप सं0-(1)-नगर परिषद, खगौल द्वारा विभागीय भूमि बदलपुरा थाना सं०-52, प्लॉट सं०-413, 414, 415, 416 में अवैध निर्माण की सूचना आपके द्वारा उच्चाधिकारियों को नहीं दी गई। उक्त अवैध निर्माण की सूचना खगौल की जनता द्वारा माननीय विभागीय मंत्री को दिनांक 08.01.2013 को परिवाद के द्वारा मिली। आरोप सं0-(2)-कार्यपालक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, खगौल, पटना द्वारा पत्रांक-795, दिनांक 26.04.12 में दिये गये आदेश के आलोक में आपके द्वारा अवैध निर्माण रोकने हेतु ससमय कार्रवाई नहीं की गई। आरोप सं0-(3)-कार्यपालक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, खगौल के पत्रांक-446, दिनांक 16.03.13 में दिये गए निदेश के आलोक में आपके द्वारा अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। श्री वैश्य द्वारा अपना स्पष्टीकरण समर्पित किया गया। अपने स्पष्टीकरण में श्री वैश्य द्वारा कहा गया कि अवर प्रमंडल पदाधिकारी, नौबतपुर का पदभार ग्रहण करने के पूर्व ही तत्कालीन अवर प्रमंडल पदाधिकारी द्वारा स्थानीय थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी एवं पत्रांक-694, दिनांक 03.04.12 द्वारा मामले की सूचना कार्यपालक अभियंता द्वारा उच्चाधिकारियों को दी गई। श्री वैश्य द्वारा कहा गया कि अनुमंडल पदाधिकारी, दानापुर के आवासीय कार्यालय में मुलाकात कर अवैध निर्माण कार्य बन्द कराने का अनुरोध किया। परन्तु नक्शा एवं अभिलेख उपलब्ध नहीं रहने के कारण तथा प्रशासनिक एवं पुलिस स्तर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के कारण ही BUDCO क्ै द्वारा जल मीनार का निर्माण कार्य कराया जा सका। उड़नदस्ता द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन श्री वैश्य के विरूद्ध गठित आरोप एवं श्री वैश्य द्वारा समर्पित स्पष्टीकरण की समीक्षा सरकार के स्तर पर की गई। सम्यक समीक्षोपरांत पाया गया कि श्री वैश्य द्वारा स्थानीय अंचलाधिकारी के यहाँ अतिक्रमणवाद दायर किया जाना चाहिए था जो नहीं किया गया। इसके लिए श्री वैश्य उत्तरदायी पाये गये। साथ ही श्री वैश्य द्वारा इतने दिनों तक (दिनांक 16.04.12 से दिनांक 22.08.13 तक) अनुमंडल पदाधिकारी/अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी, दानापुर से सम्पर्क नहीं किया जाना विभागीय जमीन पर किये गये अतिक्रमण को अतिक्रमण मुक्त करने के प्रति उनकी लापरवाही एवं गैर जिम्मेदाराना आचरण को देखते हुए उनके विरूद्ध आरोप को प्रमाणित पाया गया। उक्त प्रमाणित आरोपों के लिए श्री वैश्य के विरूद्ध "निन्दन की सजा एवं दो वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक" का दण्ड अधिरोपित करने का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में श्री सुनील कुमार वैश्य (आई0डी0-3809), तत0 सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, खगौल को निम्न दण्ड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है :- (i) निन्दन की सजा (आरोप वर्ष 2013-2014)। (ii) दो (02) वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

------- 13 दिसम्बर 2019 सं॰ 22/नि॰सि॰(कटि0)-25-10/2017-2576--श्री रामइकबाल महतो (आई0डी0-3507), कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल के अन्तर्गत शीर्ष 2711 के अधीन वर्ष 2016-17 में प्राप्त आवंटन के विरूद्ध किये गये व्यय की जाँच उड़नदस्ता द्वारा की गयी। उड़नदस्ता से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन के समीक्षोपरांत निम्नांकित आरोप गठित किया गया। (i) विभाग से शीर्ष 2711 के तहत उक्त प्रमंडल को जिस कार्य हेतु आवंटन प्राप्त हुआ, उससे अलग हटकर मनमाने ढंग से कुछ अन्य कार्यों का समावेश करते हुए वार्षिक कार्यक्रम तैयार कर स्वीकृति हेतु उच्च पदाधिकारियों को समर्पित किया गया। मुख्य अभियंता के स्तर से स्वीकृत कार्यक्रम से हटकर बिना स्वीकृत कार्यक्रम एवं श्रमशक्ति का अनुमोदन प्राप्त किये ही कुल 148398/- रूपये का अनियमित भुगतान किया गया, जिसे नियमानुकूल नहीं माना जा सकता है। उपरोक्त गठित आरोप के साथ श्री महतो से स्पष्टीकरण की मांग की गयी, तदोपरांत श्री महतो द्वारा स्पष्टीकरण का उत्तर समर्पित किया गया। श्री महतो ने अपने स्पष्टीकरण में उल्लेख किया है कि उनके द्वारा किसी कार्य मद का विचलन कर वार्षिक कार्यक्रम तैयार नहीं किया गया है। वरीय पदाधिकारी द्वारा प्रमंडल में अवस्थित निरीक्षण भवन को अच्छे ढंग से संपोषित एवं रख-रखाव करने का निदेश दिया जाता रहा है जिसके लिए पूर्व वर्षों की व्यवस्था के अनुरूप ही वर्ष 2016-17 में भी श्रमबल रखा गया। मुख्य अभियंता तथा अन्य वरीय पदाधिकारी द्वारा श्रमबल हटाने का कोई भी निदेश प्राप्त नहीं हुआ, जिसके कारण वे कार्यरत रहे। वित्तीय वर्ष 2016-17 में भी रखे गये श्रमबल का भुगतान हेतु प्राप्त आवंटन के अनुरूप वार्षिक कार्यक्रम तैयार कर अधीक्षण अभियंता को भेजा गया। तत्पश्चात अधीक्षण अभियंता द्वारा अनुशंसित कर इसे स्वीकृति हेतु मुख्य अभियंता को भेजा गया। मुख्य अभियंता द्वारा निरीक्षण भवन में कार्यरत श्रमबल की रािश 214240 रू0 को घटाकर मात्र 64272 रूपये कर दिया गया तथा एक नया मद 191868 सृजित कर कार्यक्रम स्वीकृत कर पत्रांक-224, दिनांक 04.02.2017 द्वारा लौटाया गया, चूँकि श्रमबल पूर्व से कार्यरत थे एवं अंतिम समय में कर्णाकिंत आवंटन रहने के बावजूद भी मुख्य अभियंता द्वारा इसे घटाकर मात्र 62272 की स्वीकृति देना अनुचित है क्योंकि निरीक्षण भवन की रख-रखाव हेतु कार्यरत श्रमबल को इनके द्वारा हटाने का कोई भी निदेश पूर्व में नहीं दिया गया है। स्वीकृति के प्रत्याशा में प्राप्त कर्णाकिंत आवंटन एवं अधीक्षण अभियंता द्वारा स्वीकृत प्राक्कलन एवं अनुशंसित श्रमबल के अनुरूप रखे गये श्रमबल का भुगतान किया गया ताकि प्राप्त आवंटन के बावजूद भी दायित्व का सृजन नहीं हो तथा श्रम अधिनियिम के तहत रखे गये मजदूरों का भुगतान नहीं होने पर न्यायालय का मामला न बन सके।190 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 श्री महतो से प्राप्त स्पष्टीकरण की विस्तृत समीक्षा की गयी, सम्यक समीक्षोपरांत आरोप का प्रथम अंश "शीर्ष 2711 में प्रमंडल को जिस कार्य के लिए आवंटन उपलब्ध कराया गया, उससे अलग हटकर मनमाने ढंग से कुछ अन्य कार्यों का समावेश करते हुए कार्यक्रम स्वीकृति हेतु उच्च पदाधिकारी को समर्पित करना" को प्रमाणित नहीं पाया गया। आरोप के द्वितीय अंश "मुख्य अभियंता के स्तर से स्वीकृत कार्यक्रम से हटकर बिना कार्यक्रम एवं श्रमशक्ति की स्वीकृति प्राप्त किये ही कुल 148398/- रूपये का भुगतान करना" के संबंध में अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि निरीक्षण भवन में कार्यरत दैनिक वेतन भोगी कर्मियों के भुगतान हेतु कुल 21.06 लाख के प्राप्त आवंटन में 214240/- रूपये का जाँचित प्राक्कलन के आधार पर आवंटन प्राप्त हुआ है। जिसके अनुरूप वार्षिक कार्यक्रम में प्रावधान किया गया था, वस्तुतः यह मामला कार्यपालक अभियंता द्वारा दिये गये वार्षिक कार्यक्रम मेें इस कार्य हेतु प्रावधानित 241240/- रूपये को मुख्य अभियंता स्तर से काटकर कुल 64272 कर देने तथा पुनः पुनरीक्षित कार्यक्रम की स्वीकृति प्रदान नहीं किये जाने के कार्यपालक अभियंता द्वारा परिस्थितिजन्य न्यायिक प्रक्रिया से बचने एवं राशि प्रत्यापन होने की स्थिति में इस कार्य मद में कुल 213210/- रूपये के भुगतान कर देने के कारण कुल 148398/-रूपये के व्यय को उड़नदस्ता द्वारा बिना कार्यक्रम एवं श्रमशक्ति की स्वीकृति के विभागीय प्रक्रिया के विपरीत होना बताया गया है। समीक्षोपरांत आरोप का द्वितीय अंश यथा निरीक्षण भवन में कार्यरत दैनिक वेतन भोगी कर्मियों को विपरीत किया गया भुगतान को नियम के विरूद्ध पाते हुए श्री रामइकबाल महतो, कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, पूर्णियाँ को "एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक" का दण्ड देने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में श्री रामइकबाल महतो, कार्यपालक अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण प्रमंडल, पूर्णियाँ को निम्न दण्ड अधिरोपित कर संसूचित किया जाता हैः-

"एक वेतनवृद्धि पर असंचयात्मक प्रभाव से रोक"।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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9 दिसम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(पू0)01-03/2015-2547--श्री मुकेश कुमार सिंह (आई0डी0 सं०-4499), तत0 सहायक अभियंता, सिंचाई प्रमंडल, अररिया को पूर्वी कोशी नहर पुनस्र्थापन कार्य से संबंधित योजना में बरती गयी अनियमितता के लिए अधिसूचना सं0-1730, दिनांक 09.08.2019 द्वारा निलंबित किया गया है। श्री सिंह से संबंधित संचिका में इनके अलावा अन्य अभियंताओं के विरूद्ध भी कार्रवाई की जा रही है, जिसके कारण इनके विरूद्ध आरोप पत्र का गठन नहीं किया जा सका है। उक्त तथ्यों के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(7) में निहित प्रावधानों के तहत निलंबनादेश निर्गत होने की तिथि से तीन माह के पश्चात अगले दो माह के लिए श्री मुकेश कुमार सिंह के निलंबन को विस्तारित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव।

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3 दिसम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(डि0)14-04/2019-2511--श्री प्रकाश कुमार (आई0डी0 सं०-5498), सहायक अभियंता, सोन नहर प्रमंडल, आरा को सोन नहर अंचल आरा के अन्तर्गत रामनगर आई0बी0 जीर्णोद्धार एवं आई0बी0 के पथों के निर्माण कार्य में कार्य सम्पादन की प्रक्रिया में अनियमितता एवं अन्य कार्यों में बरती गयी गंभीर अनियमितता के लिए सरकार के स्तर पर पूर्ण समीक्षोपरांत लिये गये निर्णय के आलोक में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-9(1) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।

2. निलंबन अवधि में श्री प्रकाश कुमार का मुख्यालय मुख्य अभियंता का कार्यालय, सिंचाई सृजन, जल संसाधन विभाग, गया निर्धारित किया जाता है।

3. निलंबन अवधि में श्री प्रकाश कुमार को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-10 के आलोक में जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा।

4. श्री प्रकाश कुमार के विरूद्ध विहित प्रपत्र में आरोप पत्र गठित कर अग्रेत्तर कार्रवाई की जा रही है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

------- 3 दिसम्बर 2019 सं॰ 22/नि॰सि॰(पट0)-03-04/17-2502--श्री ख्वाजा जमाल नासिर (आई0डी0-4542), तत्का0 सहायक अभियंता, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल-01, पटना के पद पर पदस्थापित थे तो उनके विरूद्ध 14.01.2017 को सबलपुर दियारा पतंग उत्सव के दौरान हुयी नाव र्दुघटना के दिन प्रतिनियुक्ति स्थल से अनधिकृत अनुपस्थिति, कर्त्तव्य में लापरवाही एवं अनुपस्थिति के कारण विधि व्यवस्था के संधारण में हुई कठिनाई का आरोप गठित कर जिलाधिकारी, पटना के पत्रांक-1419, दिनांक 20.03.17 द्वारा आरोप पत्र प्रपत्र-'क' उपलब्ध कराया गया। जिसके लिए श्री ख्वाजा जमाल नासिर, आई0डी0-4542 को प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने के फलस्वरूप सामान्य प्रशासन विभाग का पत्रांक-5789 दिनांक 16.05.17 के आलोक में विभाग के स्तर से लिए गए निर्णय के तहत बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली191 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 2005 के नियम-9(i) के तहत तत्काल प्रभाव से विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-866 दिनांक 07.06.2017 द्वारा निलंबित किया गया। निलंबित अवधि में श्री नासिर को जीवन निर्वाह भत्ता के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं था। उक्त मामले मे श्री नासिर के विरूद्ध गठित आरोप पत्र प्रपत्र-'क' के आलोक में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-867 दिनांक 07.06.17 द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-17 के तहत विभागीय कार्यवाही संचालित की गई। संचालन के क्रम में संचालन पदाधिकारी द्वारा पत्रांक-2909 दिनांक 15.11.17 द्वारा जाँच प्रतिवेदन विभाग को समर्पित किया गया। जिसमें अंकित किया गया है कि आरोपित पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्य के आधार तथा संदर्भित मोबाईल नं0 का स्पष्ट कॉल डिटेल के अभाव में आरोप प्रमाणित नहीं होता है। अतएव आरोपित पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्य एवं संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोप प्रमाणित नहीं होने के निष्कर्ष से सहमत होते हुए श्री नासिर को विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-135, दिनांक 11.01.2019 द्वारा आरोपमुक्त किया गया। उल्लेखनीय है कि श्री ख्वाजा जमाल नासिर द्वारा अपने निलंबन के विरूद्ध माननीय उच्च न्यायालय, पटना में सी0डब्लू0जे0सी0-16934/2017 ख्वाजा जमाल नासिर बनाम बिहार राज्य एवं अन्य वाद दायर किया गया। जिसमें माननीय उच्च न्यायालय, पटना के आदेश के आलोक में विभागीय अधिसूचना ज्ञापांक-1281, दिनांक 12.06.2018 द्वारा आदेश निर्गत की तिथि से निलंबन मुक्त किया गया। श्री ख्वाजा जमाल नासिर द्वारा अपने निलंबन अवधि दिनांक 07.06.2017 से दिनांक 11.06.2018 तक के विनियमन के संबंध में आवेदन समर्पित किया गया। प्राप्त आवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत श्री ख्वाजा जमाल नासिर, तत्कालीन सहायक अभियंता के निलंबन अवधि (07.06.2017 से 11.06.2018 तक) को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली 2005 के नियम-11(3) के तहत विनियमित करते हुए उक्त अवधि को कर्त्तव्य अवधि मानते हुए पूर्व भुगतित (यदि हो) जीवन निर्वाह भत्ता को समायोजित करते हुए उक्त अवधि का पूर्ण वेतन तथा अन्य भत्ता आदि का भुगतान (पूर्व से लिए गए राशि को घटाकर) करने का निर्णय लिया गया है। उक्त निर्णय श्री ख्वाजा जमाल नासिर, तत्कालीन सहायक अभियंता, आई0डी0-4542, स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन, कार्य प्रमंडल-01, पटना सम्प्रति सहायक अभियंता, मुख्य अभियंता का कार्यालय, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, पटना को संसूचित किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, मो0 अनसार अहमद, अपर सचिव।

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28 नवम्बर 2019

सं॰ 22/नि0सि0(वीर0)-07-10/2017-2459--श्री आयुष प्रसाद (आई0डी0-5247) तत0 सहायक अभियंता, (मुख्य अभियंता का कार्यालय) बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, वीरपुर के पद पर पदस्थापित थे तब उनके विरूद्ध पश्चिमी तटबंध प्रमंडल, निर्मली के अधीन विस्तारित सिकरहट्टा मंझारी निम्न बाँध के कि0मी0 6.00 से 11.20 एवं 12.

30 से 13.55 के बीच बाढ़ 2017 के पूर्व कराये जा रहे कटाव निरोधक कार्य (एजेण्डा सं0 WKE/N/01/2017 एवं 02/17) को माननीय मंत्री महोदय, प्रधान सचिव एवं विभागीय वरीय पदाधिकारी के स्थलीय जॉच में त्रुटि पाये जाने के फलस्वरूप मामले की जाँच विभागीय उड़नदस्ता द्वारा की गई। उड़नदस्ता से प्राप्त जॉच प्रतिवेदन की समीक्षा विभाग के स्तर पर की गई। समीक्षोपरांत निम्न आरोप के लिए श्री प्रसाद से विभागीय पत्रांक 1445 दिनांक 25.08.2017 द्वारा प्रपत्र "क" गठित करते हुए स्पटीकरण की मॉग की गई।

(1) "आलोच्य कार्य के अंतर्गत कि0 मी0 9.40 स्टड पर वर्ष 2017 बाढ़ पूर्व कराये गये कटाव निरोधक कार्य के प्राक्कलन में छह मीटर की लंबाई में नोज के D-portion के बाद 12 (बारह) मीटर से घटाते हुए छह मीटर चौड़ाई में D/S 'Shank' का प्रावधान है, जिसकी स्वीकृति मुख्य अभियंता द्वारा दी गई है। कोशी उच्च स्तरीय समिति/योजना समिति द्वारा BIS Code के अनुसार नोज U/S Shank एवं D/s Shank बनाकर 9.40 कि0मी0 स्थित स्टड का Restoration बोल्डर क्रेट से करने की अनुशंसा की गयी है। मुख्य अभियंता, बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, वीरपुर से प्राप्त वीरपुर प्रक्षेत्र में कोशी नदी के लिए पूर्व एवं वर्तमान में स्वीकृत किये जा रहे स्पर के Restoration निर्माण के प्रस्ताव से संबंधित नक्शा में D/S Shank की लंबाई 38मी0 (U/S Shank की लंबाई का 50%) होना परिलक्षित होता है। जबकि आलोच्य कार्य के स्वीकृत प्राक्कलन में U/S Shank की लंबाई 70 मी0 एवं D/S Shank की लंबाई 6मी0 रखी गयी है। अध्यक्ष विशेष जाँच दल ने भी 30-05-17 के स्थलीय निरीक्षण के दौरान स्टड के D/S में मात्र 6मी0 का प्रावधान को कम पाते हुए इसे बढ़ाकर192 बिहार गजट, 7 अक्तूबर 2020 नदी के किनारे तक ले जाकर सुरक्षात्मक कार्य कराये जाने की अनुशंसा की गई है। इस प्रकार 9.40कि0मी0 स्टड के डाउन स्ट्रीम शैंक का पुनस्र्थापन प्रस्ताव/प्राक्कलन में BIS code/रूपांकण/मानक के विपरीत पर्याप्त लंबाई से कम लंबाई का डाउन स्ट्रीम शैंक का प्रावधान, अनुशंसा, जाँच एवं स्वीकृत किये जाने का मामला बनता प्रतीत होता है, जिसके लिए आप प्रथम दृष्टया दोषी प्रतीत होते हैं।"

श्री आयुष प्रसाद द्वारा स्पष्टीकरण का जवाब समर्पित नहीं किया गया। किन्तु समरूप आरोप के लिए कार्य में संलग्न अधीक्षण अभियंता एवं मुख्य अभियंता से स्पष्टीकरण की माँग की गई थी। इन अभियंताओं से प्राप्त स्पष्टीकरण के जवाब की विभागीय समीक्षोपरांत स्पष्टीकरण स्वीकार करने का निर्णय लिया गया है। फलतः समरूप आरोप के लिए श्री प्रसाद को आरोपमुक्त करने का निर्णय विभागीय समीक्षोपरांत लिया गया है।

उक्त निर्णय के आलोक में श्री आयुष प्रसाद (आई0डी0-5247), सहायक अभियंता, (मुख्य अभियंता का कार्यालय) बाढ़ नियंत्रण एवं जल निस्सरण, जल संसाधन विभाग, वीरपुर को आरोप मुक्त किया जाता है।

बिहार-राज्यपाल के आदेश से, जीउत सिंह, अपर सचिव। ————— अधीक्षक, सचिवालय मु(cid:7076)णालय बिहार, पटना द्वारा प्रकाशित एवं मु(िcid:7076)त। बिहार गजट, 23—571+10-डी0टी0पी0। Website: http://egazette.bih.nic.in

Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 07 October 2020. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2020-10-07.35/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2020-10-07.35.