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सं॰ 27/आरोप-01-26/2019-434/सा0प्र0
सामान्य प्रशासन विभाग
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संकल्प
11 जनवरी 2021
श्री राजेश रंजन, बि0प्र0से0 (कोटि क्रमांक-789/11) के विरूद्ध प्रखंड विकास पदाधिकारी, हसनपुर (समस्तीपुर) के पदस्थापन काल से संबंधित इन्दिरा आवास योजना एवं इन्दिरा आवास उन्नयन योजना की राशि गबन करने का आरोप प्रतिवेदित होने तथा इस संबंध में श्री रंजन के विरूद्ध हसनपुर थाना कांड सं0-83/11, दिनांक-16. 09.11 दर्ज होने एवं वरीय उप समाहर्त्ता, लखीसराय (तत्समय) के पद से दिनांक-05.09.11 से अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने संबंधी जिला पदाधिकारी, लखीसराय के पत्रांक-486 दिनांक-13.06.12 द्वारा सूचना प्राप्त होने के आलोक में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-11016, दिनांक-02.07.2013 द्वारा श्री रंजन को निलंबित किया गया। 2. जिला पदाधिकारी, समस्तीपुर के पत्रांक-12, दिनांक-05.01.15 द्वारा प्राप्त आरोप पत्र प्रपत्र 'क' तथा जिला पदाधिकारी, समस्तीपुर के पत्रांक-125 दिनांक-27.01.16 के आधार पर विभागीय स्तर पर आरोप पत्र गठित एवं अनुमोदित आरोप पत्र के आलोक में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-12394 दिनांक-09.09.16 द्वारा श्री रंजन के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी, जिसमें आयुक्त, दरभंगा प्रमंडल, दरभंगा को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया।
3. उक्त थाना कांड सं0 83/11 दिनांक-16.09.2011 में विधि विभाग के आदेश सं0-01, दिनांक-09.01.15 द्वारा श्री रंजन के विरूद्ध अभियोजन की स्वीकृति प्रदान की गयी, जिसमें आरोप पत्र माननीय न्यायालय में समर्पित किया जा चुका है।
4. आयुक्त, दरभंगा प्रमंडल, दरभंगा-सह-संचालन पदाधिकारी के पत्रांक-812 दिनांक-01.08.17 द्वारा जांच प्रतिवेदन प्राप्त हुआ, जिसमें श्री रंजन के विरूद्ध प्रतिवेदित चारों आरोपों को प्रमाणित पाया गया है। प्राप्त जांच प्रतिवेदन के आलोक में श्री रंजन द्वारा समर्पित अभ्यावेदन (दिनांक-02.11.2017) के समीक्षोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा श्री रंजन को निलंबन मुक्त करते हुए 'निन्दन तथा तीन वेतन वृद्धियों पर संचयात्मक प्रभाव से रोक' का दंड विनिश्चित किया गया। उक्त के आलोक में विभागीय संकल्प ज्ञापांक-4006 दिनांक-23.03.2018 द्वारा श्री रंजन को निलंबन मुक्त किया गया तथा विनिश्चित दंड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग की सहमति के उपरांत विभागीय संकल्प ज्ञापांक-13295 दिनांक-05.10.2018 द्वारा 'निन्दन तथा तीन वेतन वृद्धियों पर संचयात्मक प्रभाव से रोक' का दंड संसूचित किया गया तथा निलंबन अवधि के वेतन भुगतान के संबंध में श्री रंजन द्वारा समर्पित कारण पृच्छा को समीक्षोपरांत अस्वीकृत करते हुए विभागीय संकल्प ज्ञापांक-9071 दिनांक-08.07.2019 द्वारा ''निलंबन अवधि के लिये2 ;बपकरू4द्ध ;बपकरू23द्धख्;बपकरू4द्ध;बपकरू4द्ध;बपकरू25द्ध;बपकरू30द्ध जीवन निर्वाह भाा के अतिरिक्त कुछ भी देय नहीं होने तथा निलंबन अवधि को अन्य सभी प्रयोजन हेतु र्काव्य अवधि के रूप में परिगणित करने'' संबंधी निर्णय का संसूचन किया गया।
5. संसूचित दण्डादेश के विरूद्ध श्री राजेश रंजन द्वारा पुनर्विचार आवेदन समर्पित किया गया, जिसमें उनका कहना है कि प्रमाणित आरोपों के संबंध में जांच प्रतिवेदन पर लिखित अभिकथन दिनांक-02.11.2017 में विस्तार से पक्ष प्रस्तुत किया गया है।
आरोप संख्या-1 के संबंध में उनका कहना है कि पंचायत चुनाव 2006 की अधिसूचना दिनांक-25.06.2006 को प्रकाशित की गयी थी, जिस कारण तत्कालीन जिला पदाधिकारी, समस्तीपुर द्वारा उन्हें प्रखंड विकास पदाधिकारी का प्रभार दिनांक-12.03.2006 को ग्रहण कराया गया। चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद अन्य सभी कार्यो के ऊपर सर्वोच्च प्राथमिकता चुनाव की होती है, जिसे समयबद्ध रूप से सम्पादित करना होता है। इन्हीं विषम परिस्थिति में उनके द्वारा प्रभार लेने के समय तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी के ऊपर विश्वास कर रोकड़ बही का प्रभार लिया गया, जिसके संबंध में उन्होंने संचालन पदाधिकारी के समक्ष पूर्व में प्रस्तुत स्पष्टीकरण में विस्तृत रूप से स्थिति स्पष्ट की गयी है। पंचायत चुनाव जुलाई, 06 तक चला। इसी बीच बिहार पंचायत प्रारंभिक शिक्षक नियोजन नियमावली, जुलाई-06 में ही प्रकाशित हो गयी तथा शिक्षक नियोजन का कार्य प्राथमिकता के आधार पर सम्पादित करने का निर्देश प्राप्त हुआ और यह कार्य फरवरी-07 तक चलता रहा। इन कार्यो के साथ-साथ बी.पी.एल. सर्वेक्षण का कार्य भी चलता रहा। तत्समय प्रखंड विकास पदाधिकारी के रूप में उनकी क्या स्थिति रही होगी तथापि कार्यकाल के अंतिम तीन माह को छोड़कर शेष अवधि में रोकड़-बही का संधारण विधिवत् करवाया था। उनके कार्यकाल के अंतिम तीन माह के रोकड़-बही का संधारण जिला पदाधिकारी, समस्तीपुर द्वारा गठित टीम द्वारा उनके स्थानान्तरण के बाद किया गया, जिसमें कोई गड़बड़ी नहीं पायी गयी। इस संबंध में जान-बूझकर उनके द्वारा लापरवाही नहीं की गयी। जैसे ही नाजिर के गलत कार्यो की जानकारी प्राप्त हुई, तत्काल उनके द्वारा नाजिर के विरूद्ध दिनांक-15.02.2007 को प्राथमिकी दर्ज करायी गयी। यदि वे र्काव्यों के प्रति लापरवाह होते तो तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं कराते। आरोप संख्या-2 के संबंध में उनका कहना है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा मंतव्य दिया गया है कि 'आरोपित पदाधिकारी का कहना है कि गबन की प्रक्रिया उनके प्रभार लेने के पहले से ही लम्बे समय से चली आ रही थी' अर्थात् यह मामला उनके प्रभार लेने के पूर्व का ही था। जहाँ तक निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी के रूप में नियमित रूप से वित्तीय लेखा-जोखा रखने तथा पर्यवेक्षण का प्रश्न है, इस संबंध में उनके द्वारा रोकड़-बही का संधारण अति व्यस्तता के बावजूद किया जाता रहा, जिसका प्रमाण यह है कि उनके कार्यकाल के मात्र अन्तिम तीन माह के लेखा का संधारण जिला पदाधिकारी, समस्तीपुर द्वारा गठित टीम द्वारा उनके स्थानान्तरण के बाद कराया गया, जिसमें कोई अनियमितता नहीं पायी गयी। संचालन पदाधिकारी का यह कहना कि प्राथमिकी बहुत बाद में दिनांक 15. 02.07 को दर्ज की गयी, सही नहीं है। मामला प्रकाश में आने पर सर्वप्रथम उनके द्वारा ही दिनांक 15.02.07 को प्राथमिकी दर्ज करायी गयी। इस संबंध में विस्तृत विवरण पूर्व में ही उन्होंने संचालन पदाधिकारी को समर्पित स्पष्टीकरण में दे दिया है ।
आरोप सं0-3 के संबंध में उनका कहना है कि प्रखंड कार्यालय में कर्मचारियों की काफी कमी थी। सितम्बर-06 के प्रथम सप्ताह तक रोकड़बही का संधारण उनके द्वारा किया जाता रहा तथा इसके बाद जब नाजिर द्वारा इस कार्य में आना-कानी की जाने लगी तो उनके द्वारा मौखिक एवं लिखित रूप से उसे निदेश एवं चेतावनी दी गयी । जिला पदाधिकारी एवं अन्य वरीय पदाधिकारी द्वारा आयोजित बैठक में भी उनके द्वारा इसकी मौखिक सूचना उन्हें दी गयी। जैसे ही यह मामला प्रकाश में आया, उन्होंने कठोर कार्रवाई करते हुए नाजिर के विरुद्ध स्थानीय थाना में दिनांक 15.02.07 को ही प्राथमिकी दर्ज करा दिया । इस प्रकार संचालन पदाधिकारी का यह कहना कि उनके द्वारा रोकड़-बही का संधारण समय पर नहीं किया गया, नाजिर के विरुद्ध कठोर कार्रवाई नहीं की गयी तथा उच्चाधिकारियों को सूचना नहीं दी गयी, सत्य नहीं है। उन्होंने संचालन पदाधिकारी को स्पष्टीकरण द्वारा उपरोक्त स्थिति से विस्तार से अवगत करा दिया है, जिसे देखने से वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जायेगी।
आरोप सं0-4 के संबंध में उनका कहना है कि ऊपर की कंडिका तथा संचालन पदाधिकारी को समर्पित स्पष्टीकरण में स्थिति स्पष्ट की गयी है। संचालन पदाधिकारी के मंतव्य के संबंध में उनका कहना है कि उन्होंने नाजिर को मौखिक एवं लिखित रूप से कई बार निर्देश दिया तथा उसके द्वारा ऐसा नहीं करने पर तुरन्त उसके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कर कठोर कार्रवाई की। तत्काल इससे ज्यादा कठोर कार्रवाई किसी कर्मी के विरुद्ध नहीं की जा सकती थी।
6. उल्लेखनीय है कि संचालन पदाधिकारी द्वारा जॉंच प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि "वित्त (अंकेक्षण) विभाग, बिहार द्वारा किए गए अंकेक्षण से ज्ञात होता है कि उक्त गबनित राशि में से मो0-79,90,166.00 रू0 आरोपित पदाधिकारी के प्रभार ग्रहण के पूर्व का है। आरोपित पदाधिकारी के अनुसार शेष गबनित राशि तत्कालीन नाजीर द्वारा आरोपित पदाधिकारी के कार्यकाल में चेक के माध्यम से उनके फर्जी हस्ताक्षर कर निकासी की गयी है, उक्त चेक में कतिपय चेक वैसे भी है, जो संबंधित खाता के लिए निर्गत ही नहीं हुआ था। स्पष्टतः संबंधित नाजीर द्वारा बैंक की मिली भगत से इतनी बड़ी राशि की निकासी की गई, परन्तु आरोपित पदाधिकारी का प्रभार लेते समय या तुरन्त बाद में तथा हर माह रोकड़ बही में राशि का मिलान बैंक में उपलब्ध राशि से करना था, जो कि नहीं किया गया। ये गंभीर लापरवाही व कार्य के प्रति उदासीनता है। पंचायत चुनाव, 2006 व अन्य कार्य की व्यस्तता बताना एक बहाना है। लगातार प्रत्येक माह reconciliation नहीं कराना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है। यदि ये समय पर किया जाता तो गबन रोका जा सकता था। प्रखण्ड के निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी के रूप में आय-व्यय का3 ;बपकरू4द्ध ;बपकरू23द्धख्;बपकरू4द्ध;बपकरू4द्ध;बपकरू25द्ध;बपकरू30द्ध22 सही-सही लेखा-जोखा रखना एवं सरकारी राशि का दुरूपयोग रोकना तत्कालीन प्रखण्ड विकास पदाधिकारी की प्राथमिक जिम्मेवारी थी।
सरकारी राशि का दुरूपयोग व गबन की प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही होगी। प्रखंड के सभी वित्तीय मामले के प्राधिकार तथा निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी के रूप में यदि इनके द्वारा नियमित रूप से वित्तीय लेखा-जोखा रखा जाता एवं पर्यवेक्षण किया जाता तो इस गबन को पूर्व में ही रोका जा सकता था । FIR आदि बहुत बाद में दिनांक 15.02.07 को किया गया।
दिनांक 12.03.06 को प्रखंड का प्रभार लेते समय व बाद में इतने लंबे समय तक रोकड़ बही का नियमानुसार ससमय संधारण नहीं किया जाना प्रमाणित होता है। कार्य बोझ व व्यस्तता एक बहाना मात्र है। ये इनकी Prime duty थी। यदि नाजीर नहीं कर रहा था तो इन्हें किसी अन्य व्यक्ति को नजारत का प्रभार देना चाहिए था, जिसके लिए ये स्वयं सक्षम थे, परन्तु ऐसा नहीं किया गया। स्पष्टतः वे स्वयं भी आदेश न मानने की स्थिति में नजारत को seal कर सकते थे, जो कि नहीं किया एवं न ही अपने उच्चतर पदाधिकारी को समय-समय पर इसकी सूचना दी या नाजीर पर कार्रवाई की अनुशंसा की।
रोकड़ बही का ससमय सत्यापन करना निकासी एवं व्ययन पदाधिकारी के रूप में प्रखंड विकास पदाधिकारी की अत्यन्त महत्वपूर्ण जिम्मेवारी थी। यदि तत्कालीन नाजिर द्वारा ससमय रोकड़ पंजी का संधारण कर उपस्थापन नहीं भी किया गया तो इसे सुनिश्चित करने हेतु कठोर कार्रवाई अपेक्षित थी। यदि रोकड़ पंजी सही तरीके से ससमय संधारित होती तो यह गबन (पूर्व राशि को छोड़कर) रोका जा सकता था।
श्री रंजन द्वारा पुनर्विचार आवेदन में सारे वही तथ्य रखे गये हैं, जो उन्होंने अपने स्पष्टीकरण/संचालन पदाधिकारी के समक्ष बचाव बयान में रखे गये थे, जिसके समीक्षोपरान्त संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपों को प्रमाणित पाया गया है।
7. संचालन पदाधिकारी से प्राप्त जांच प्रतिवेदन श्री राजेश रंजन द्वारा समर्पित पुनर्विचार आवेदन तथा उपलब्ध अभिलेखों की अनुशासनिक प्राधिकार के स्तर पर समीक्षा की गयी। समीक्षोपरांत श्री राजेश रंजन का पुनर्विचार आवेदन को स्वीकार योग्य नहीं पाया गया है।
कोटि क्रमांक-789/11, तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी, हसनपुर, समस्तीपुर (सम्प्रति वरीय उप समाहर्त्ता, अरवल) के पुनर्विचार आवेदन को अस्वीकृत करते हुए विभागीय संकल्प-13295 दिनांक-05.10.2018 द्वारा अधिरोपित दंड यथा (1) निन्दन (2) तीन वेतनवृद्धियों पर संचयात्मक प्रभाव से रोक को यथावत रखा जाता है।
आदेश :- आदेश दिया जाता है कि इस संकल्प की प्रति बिहार राजपत्र के अगले असाधरण
अंक में प्रकाशित किया जाय तथा इसकी प्रति संबंधित को भेज दी जाय।
बिहार-राज्यपाल के आदेश से,
राम शंकर,
सरकार के संयुक्त सचिव।
———— ख्;बपकरू3द्धँ;बपकरू6द्ध ;बपकरू12द्ध ;बपकरू17द्ध;बपकरू12द्ध;बपकरू6द्ध ;बपकरू12द्ध;बपकरू6द्ध ;बपकरू12द्ध ;बपकरू12द्ध;बपकरू12द्ध ;बपकरू27द्ध;बपकरू12द्ध म;बपकरू31द्ध ;बपकरू17द्धघ् ;बपकरू12द्ध रुख्;बपकरू12द्ध;बपकरू12द्ध ः़ः;बपकरू3द्ध;द्ध;;बपकरू3द्ध;घ् Website: http://egazette.bih.nic.in