(cid:467)नबंधन सं(cid:201)या पी0ट(cid:547)0-40 ;बपकरू464द्ध
;बपकरू464द्ध ;बपकरू430द्ध ;बपकरू292द्ध
13 ;बपकरू207द्ध;बपकरू231द्ध 1944 ;0द्ध
;0 330द्ध , ;बपकरू272द्ध, 3 2022 सं॰ 2/नि0था0-11-08/2014-4820/सा0प्र0 सामान्य प्रशासन विभाग ——— संकल्प 29 मार्च 2022
श्री अभिराम त्रिवेदी (बि0प्र0से0), कोटि क्रमांक 964/11, तत्कालीन वरीय उप समार्हाा, वैशाली-सह-अधीक्षक, मंडल कारा, हाजीपुर के विरूद्ध आर्थिक अपराध इकाई, बिहार, पटना के पत्रांक 84/गो0-1 दिनांक 02.05.2014 द्वारा समर्पित प्रतिवेदन के आधार पर विभागीय स्तर पर आरोप-पत्र गठित किया गया।
श्री त्रिवेदी के विरूद्ध आरोप-पत्र में गठित आरोप निम्नलिखित है :-
''आर्थिक अपराध ईकाई-1, बिहार, पटना को गोपनीय स्रोतों से जानकारी मिली थी कि श्री अभिराम
त्रिवेदी, वरीय उप समाहर्त्ता ने अपने सेवाकाल में अवैध कमाई कर आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित की है।
इसी सूचना के आधार पर आर्थिक अपराध इकाई-1 द्वारा श्री अभिराम त्रिवेदी, वरीय उप समाहर्त्ता के विरूद्ध
आर्थिक अपराध थाना कांड सं0 25/2014 दिनांक 29.04.2014, धारा-13(2) सहपठित धारा-13(1)(E)
भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 के तहत् पंजी—त किया गया है। विशेष निगरानी इकाई द्वारा इनके
विरूद्ध आय के ज्ञात स्रोतों से प्राप्त कुल आय रू0 49,65,000/- से रू0 1,03,50,000/- अधिक की
परिसम्पत्तियाँ अर्जित करने की प्राथमिक सूचना प्रतिवेदित है।
निगरानी द्वारा आय से अधिक सम्पति के उद्भेदन के आलोक में श्री त्रिवेदी का आचरण सरकारी
सेवक के आचरण के अनुकूल नहीं है और इनकी सत्यनिष्ठा संदिग्ध है। इनका यह आचरण बिहार सरकारी
सेवक आचरण नियमावली, 1976 के नियम 3(1)(i)(ii)(iii) के प्रतिकूल है।
श्री त्रिवेदी के विरूद्ध गठित आरोप-पत्र प्रपत्र 'क' में अंतर्विष्ट आरोपों के लिए विभागीय पत्रांक 9478 दिनांक 11.07.2014 द्वारा स्पष्टीकरण की गयी। साथ ही विभागीय संकल्प ज्ञापांक 9479 दिनांक 11.07.2014 द्वारा इन्हें निलंबित किया गया। श्री त्रिवेदी का स्पष्टीकरण अप्राप्त रहने की स्थिति में विभागीय संकल्प ज्ञापांक 1865 दिनांक 04.02.2015 द्वारा इनके विरूद्ध विभागीय कार्यवाही संचालित की गयी, जिसमें विभागीय जाँच आयुक्त, बिहार पटना को संचालन पदाधिकारी नियुक्त किया गया।
सचिव, श्रम संसाधन विभाग-सह-अपर विभागीय जाँच आयुक्त के पत्रांक 667 दिनांक 08.02.2016 द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन में श्री त्रिवेदी के विरूद्ध गठित आरोप को अप्रमाणित प्रतिवेदित किया गया। इस बीच आर्थिक अपराध ईकाई, बिहार, पटना के पत्रांक 1201 दिनांक 02.03.2016 द्वारा सूचित किया गया कि श्री त्रिवेदी की पत्नी एवं उनके2 ;बपकरू464द्ध ;द्धए 3 2022 परिजनों के नाम से कई एकड़ सम्पत्ति का क्रय एवं विक्रय किये जाने का मामला अनुसंधान के क्रम में प्राप्त हुआ है। श्री त्रिवेदी द्वारा समर्पित सम्पत्ति विवरणी में कई अचल सम्पत्तियों का उल्लेख नहीं किया गया है।
संचालन पदाधिकारी द्वारा समर्पित जाँच प्रतिवेदन एवं आर्थिक अपराध ईकाई, बिहार, पटना के पत्रांक 1201 की अग्रेतर जाँच संचालन पदाधिकारी से कराने एवं आर्थिक अपराध ईकाई, बिहार, पटना के पत्रांक 1201 दिनांक 02.03. 2016 द्वारा सूचित नये तथ्य के आलोक में आरोप-पत्र गठित करने का निर्णय लिया गया। उक्त निर्णय के आलोक में एक अन्य संचिका में श्री त्रिवेदी के विरूद्ध आरोप-पत्र गठित कर अनुशासनिक प्राधिकार का अनुमोदन प्राप्त करते हुए श्री त्रिवेदी से स्पष्टीकरण प्राप्त किया गया। साथ ही विभागीय पत्रांक 7185 दिनांक 19.05.2016 द्वारा इस विभागीय कार्यवाही से संबंधित मूल अभिलेख एवं जाँच प्रतिवेदन सचिव, श्रम संसाधन विभाग-सह-अपर विभागीय जाँच आयुक्त को अग्रेतर जाँच हेतु वापस किया गया।
सचिव, श्रम संसाधन विभाग-सह-अपर विभागीय जाँच आयुक्त द्वारा अग्रेतर जाँच के उपरान्त समर्पित जाँच प्रतिवेदन में पुनः आरोप को अप्रमाणित प्रतिवेदित किया गया।
श्री त्रिवेदी द्वारा उनके विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही को स्थगित करने एवं निलंबन मुक्त करने हेतु माननीय न्यायालय में सी0डब्ल्यू0जे0सी0 संख्या 7549/2015 दायर किया गया। माननीय न्यायालय द्वारा उक्त रिट याचिका में दिनांक 09.09.2016 को न्यायादेश पारित किया गया।
स्ांचालन पदाधिकारी द्वारा विभागीय कार्यवाही में अग्रेतर जाँचोपरांत समर्पित प्रतिवेदन एवं माननीय न्यायालय द्वारा दिनांक 09.09.2016 को पारित आदेश के समीक्षोपरांत अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा लिये गये निर्णय के आलोक में श्री त्रिवेदी को विभागीय संकल्प ज्ञापांक 15927 दिनांक 29.11.2016 द्वारा आदेश निर्गत होने की तिथि से निलंबन से मुक्त किया गया एवं निलंबन अवधि में वेतनादि के संबंध में विभागीय कार्यवाही के फलाफल के आधार पर निर्णय लिये जाने का आदेश दिया गया। साथ ही विभागीय पत्रांक 15994 दिनांक 30.11.2016 एवं पत्रांक 1229 दिनांक 02.02.2017 द्वारा आर्थिक अपराध इकाई, बिहार, पटना से श्री त्रिवेदी एवं उनके पत्नी के विरूद्ध आय से अधिक अर्जित सम्पत्ति के संबंध में अनुसंधान के फलाफल एवं थाना कांड की अद्यतन स्थिति पर स्पष्ट मंतव्य की मांग की गयी ताकि माननीय न्यायालय के आदेश के आलोक में लंबित कार्यवाही पर निर्णय लिया जा सके।
पुलिस महानिरीक्षक, आर्थिक अपराध इकाई, बिहार, पटना के पत्रांक 564 दिनांक 06.02.2017 द्वारा कांड से संबंधित अद्यतन सूचना उपलब्ध करायी गयी।
अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा इस मामले में समीक्षोपरान्त निर्णय लिया गया कि श्री त्रिवेदी के विरूद्ध संचालित विभागीय कार्यवाही में अन्य संचिका में गठित आरोप-पत्र (चूँकि यह आरोप/मामला भी श्री त्रिवेदी के विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित किये जाने से संबंधित कांड के अनुसंधान के क्रम में पाया गया था) को पूरक आरोप-पत्र के रूप में सम्मिलित करते हुए संचालन पदाधिकारी से अग्रेतर जाँच करायी जाय। अतएव संचालन पदाधिकारी को पुनः वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए विभागीय पत्रांक 7638 दिनांक 06.06.2019 द्वारा अग्रेतर जाँच कर प्रतिवेदन उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया।
उक्त के आलोक में संचालन पदाधिकारी के पत्रांक 354 दिनांक 06.04.2021 द्वारा जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया। संचालन पदाधिकारी द्वारा जाँच प्रतिवेदन में श्री त्रिवेदी के विरूद्ध आरोप अप्रमाणित प्रतिवेदित किया गया। इस बीच आर्थिक एवं साईबर अपराध प्रभाग, बिहार, पटना के पत्रांक 6467 दिनांक 07.09.2021 द्वारा दर्ज थाना कांड संख्या 25/2014 दिनांक 29.04.2014 के फलाफल की सूचना विभाग को उपलब्ध करायी गयी, जिसमें सूचित किया गया कि प्राथमिकी अभियुक्त श्री अभिराम त्रिवेदी के विरूद्ध आय से अधिक कुल 22,64,555/- रूपये अर्जित करने तथा अप्राथमिकी अभियुक्त इनकी पत्नी श्रीमती अमृता राय उर्फ अमृता त्रिवेदी के विरूद्ध उन्हें सहयोग एवं दुष्प्रेरक का कार्य करने का आरोप सत्य पाया गया। तद्नुसार प्राथमिकी अभियुक्त अभिराम त्रिवेदी के विरूद्ध धारा-13(2)-सह-पठित धारा-13(1)(ई) भ्र0नि0अधि0, 1988 एवं अप्राथमिकी अभियुक्त इनकी पत्नी श्रीमती अमृता त्रिवेदी के विरूद्ध धारा-109/120(बी) भा0द0वि0 के अन्तर्गत आरोप पत्र संख्या 03/2017 दिनांक 28.01.2017 माननीय न्यायालय में समर्पित किया गया है। काण्ड में माननीय न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जा चुका है। विशेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अन्तर्गत प्राथमिकी अभियुक्त श्री त्रिवेदी के विरूद्ध माननीय प्राधि—त पदाधिकारी-सह-विशेष न्यायाधीश, मुजफ्फरपुर के समक्ष अधिहरण वाद दाखिल करने हेतु गृह विभाग, बिहार सरकार की घोषण सं0 11220 तथा 11221 दिनांक 31.12.2017 निर्गत है, जिसके आलोक में अग्रतर कार्रवाई प्रक्रियाधीन है।
संचालन पदाधिकारी के पत्रांक 354 दिनांक 06.04.2021 से प्राप्त जाँच प्रतिवेदन पर बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 18 के संगत प्रावधानों के तहत् अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा असहमति का बिन्दु व्यक्त करते हुए विभागीय पत्रांक 12467 दिनांक 22.10.2021 द्वारा श्री त्रिवेदी से बचाव अभ्यावेदन की मांग की गयी। असहमति के बिन्दु निम्नलिखित है :-
3 ;बपकरू464द्ध ;द्धए 3 2022(1) संचालन पदाधिकारी का मंतव्य ः- संचालन पदाधिकारी द्वारा आपके विरूद्ध आय से अधिक सम्पाि अर्जित किये जाने के संबंध में उल्लेख किया गया है कि आर्थिक अपराध इकाई ने आरोपित पदाधिकारी के विरूद्ध वैध आय से अधिक परिसम्पाियों अर्जित करने के आरोप से संबंधित तथ्यों को बार-बार बदलते रहे हैं, अर्थात् आर्थिक अपराध इकाई द्वारा अनुसंधान कर एक मत पर नहीं पहुंच पाये। आर्थिक अपराध इकाई द्वारा कभी एक करोड़ से ज्यादा परिसम्पाियां अर्जित का आरोप लगाती है, तो कभी करीब 19.44.400/-रू0 की अधिक परिसम्पाियां अर्जित करने के लिए अभियोजन की स्वी—ति की मांग करती है। फिर कभी आर्थिक अपराध इकाई ने जाँच की अवधि में परिवर्तन कर 22,64,555/-रू0 अधिक की परिसम्पाियाें अर्जित करने का अंतिम प्रतिवेदन समर्पित करती है। ऐसी परिस्थिति में आर्थिक अपराध इकाई द्वारा की गयी कार्रवाई उचित प्रतीत नहीं होता है।
असहमति का बिन्दु :- आर्थिक अपराध इकाई द्वारा आपके विरूद्ध आय से अधिक सम्पाि अर्जित किये जाने के मामले में माननीय न्यायालय में आरोप-पत्र समर्पित है। माननीय न्यायालय द्वारा कांड में संज्ञान लिया जा चुका है। साथ ही बिहार विषेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अन्तर्गत आपके विरूद्ध माननीय प्राधि—त पदाधिकारी-विषेष न्यायाधिष, मुजफ्फरपुर के समक्ष अधिहरण वाद दाखिल करने हेतु गृह विभाग, बिहार सरकार की घोषणा संख्या 11220 तथा 11221 दिनांक 31.12.2007 के आलोक में कार्रवाई प्रक्रियाधीन है। अनुसंधान में पाया गया है कि आपके द्वारा कई अचल सम्पाि का क्रय एवं विक्रय किया गया है, जिसका उल्लेख आपके द्वारा समर्पित सम्पाि विवरणी में नहीं किया गया है। यह परिसम्पाि कितने की है यह जाँच संस्थान/न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। किन्तु निष्कर्षतः आपके द्वारा आय से अधिक सम्पाि अर्जित किया गया है।
(2) संचालन पदाधिकारी का मंतव्य :- संचालन पदाधिकारी द्वारा आपके द्वारा समर्पित सम्पाि विवरणी में कई अचल सम्पाियों का उल्लेख नहीं किये जाने से संबंधित आरोप को आपके स्पष्टीकरण के आधार पर अप्रमाणित प्रतिवेदित किया गया है। उल्लेखनीय है कि आपके द्वारा अपने सभी परिजन स्वावलंबी एवं आयकर दाता होने, उनके ऊपर आश्रित नहीं होने के आलोक में सम्पाि के लिए विवरणी में दर्ज करना आवष्यक नहीं बताया गया है। साथ ही आपके द्वारा किसी प्रकार के सम्पाि का क्रय एवं विक्रय नहीं किये जाने एवं ना ही परिजनों द्वारा क्रय-विक्रय किये जाने का उल्लेख किया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा आपके बचाव बयान में बहुत सारे न्यायनिर्णय का उल्लेख किये जाने के आलोक में आपके कथन की पुष्टि मान लिया गया है।
असहमति का बिन्दु :- इस संबंध में उल्लेखनीय है कि आर्थिक अपराध इकाई द्वारा आपके विरूद्ध आय से अधिक सम्पाि अर्जित किये जाने से संबंधित कांड के अनुसंधान के क्रम में पाया गया कि आपकी पत्नी एवं परिजनों के नाम से कई अचल सम्पाि का क्रय किया गया है तथा अचल सम्पाि की विक्रय भी किया गया है। आपके द्वारा समर्पित सम्पाि विवरणी में कई अचल सम्पाियों का उल्लेख नहीं किया गया, जबकि अनुसंधान के क्रम में कई अचल सम्पाियों के संबंध में तथ्य उपलब्ध हुये हैं। बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के प्रावधान के तहत सामान्य प्रशासन विभाग के परिपत्र संख्या 946 दिनांक 24.01.2011 के आलोक में सभी पदाधिकारियाें एवं कर्मचारियों को विहित प्रपत्र में चल एवं अचल सम्पाि तथा दायित्वों की विवरणी समर्पित किया जाना है। आपके द्वारा इसका उल्लंघन किया गया है। श्री त्रिवेदी द्वारा उक्त के आलोक में बचाव अभ्यावेदन समर्पित किया गया। श्री त्रिवेदी का अपने बचाव अभ्यावेदन में मूल रूप से कहना है कि :-
''संचालन पदाधिकारी द्वारा दिया गया मंतव्य सम्पूर्ण जाँच पर आधारित है, जिसमें पूर्व के जाँच आयुक्त द्वारा किये गये जाँच एवं अग्रेतर जाँच भी शामिल है, जबकि असहमति से जाँच प्रतिवेदन के एक अंषमात्र पर आधारित है। एक ही तथ्य पर विभिन्न कथन आर्थिक अपराध इकाई द्वारा किया गया है, जो विरोधाभाषी एवं अमान्य है। जाँच प्रतिवेदन के मात्र इस अंष से असहमत होकर सम्पूर्ण प्रतिवेदन पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। वर्णित आंकड़ा अति महत्वपूर्ण है, जिसमें गणना के आधार पर पाया गया है कि आय के साधनों को गणना में शामिल नहीं किया गया है। जबकि चेक अवधि के बाद के सम्पत्ति को गणना में शामिल कर निराधार आरोप लगाया गया है। आय से अधिक सम्पत्ति का मामला गणना आधारित होता है, जिसमें संदेह एंव तर्क का कोई स्थान नहीं है। सम्पूर्ण आय के साधन को छोड़ने एवं चेक अवधि के बाद के सम्पत्ति को अलग करने के बाद मेरिट के आधार पर जाँच आयुक्त द्वारा गणना करने के बाद ही आरोप अप्रमाणित पाया गया है।
असहमति के लिए आपराधिक वाद के संज्ञान एवं अनुसंधान को आधार बनाया गया है, जो पूर्ण रूपेण विधि विरूद्ध है। किए गए अनुसंधान एवं अंतिम प्रतिवेदन के आधार पर लिए गए संज्ञान एवं अन्य कार्यवाही को निराधार एवं असत्य पाते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा T.P.Cr.No. 620/19 दिनांक 06.12.2019 के द्वारा स्थगित कर दिया गया।
असहमति का आधार आरोप-पत्र न्यायालय में समर्पित किया जाना एवं न्यायालय में प्रक्रियागत होना माना गया है। विभागीय कार्यवाही के लिए गठित आरोप-पत्र एवं संलग्न साक्ष्य में न्यायालय में विचाराधीन आरोप-पत्र को संलग्न नहीं किया गया है तथा आरोपी पदाधिकारी को उक्त आरोप-पत्र उपलब्ध नहीं कराया गया है। वर्णित आरोप-पत्र के आधार पर विभागीय कार्यवाही में परीक्षण/प्रतिपरीक्षण के लिए उपस्थापन पदाधिकारी द्वारा उपलब्ध नहीं कराया गया। प्रपत्र 'क' में भी उक्त आरोप-पत्र की चर्चा नहीं है। बिहार विषेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अंतर्गत कार्रवाई का अधिकार विषेष न्यायाधीष को है, जो नैसर्गिक न्याय के तहत आरोपी को मौका देकर तथा सुनवाई के उपरांत कार्रवाई करती है। वर्षों बीतने के बाद भी आर्थिक अपराध इकाई द्वारा विषेष न्यायालय में वाद दायर नहीं किया गया है। गृह विभाग की घोषणा अप्रासंगिक है, चूँकि कार्यान्वयन विषेष न्यायालय में नहीं किया जा सका।4 ;बपकरू464द्ध ;द्धए 3 2022 पुलिस अधीक्षक के पत्रांक 85 दिनांक 24.06.2016 जो प्रधान सचिव, सामान्य प्रषासन विभाग को संबंधित है में स्वी—त एवं वर्णित 93 एफ0डी0 की 37 लाख की राषि किसान विकास पत्र की 13 लाख की राषि एम0आई0एस0 की 2. 76 लाख की राषि, टी0डी0 1.096 लाख किसान विकास पत्र के 09 लाख की राषि एस0बी0आई0 एवं इलाहाबाद बैंक की 15 लाख की राषि उक्त अवधि का —षि आय, श्रीमती राय के 1995 से 2005 के बीच का आय नहीं जोड़ा गया, जो अभिलेखिए साक्ष्य पर आधारित है। इसी प्रकार चेक अवधि के बाद निर्हित मकान के प्रथम एवं द्वितीय तल को भी जोड़ दिया गया, जिसका निर्माण 2006 के बाद हुआ। सभी तथ्य के अभिलेखिए साक्ष्य को जाँच पदाधिकारी के पास उपलब्ध कराया गया, जिसका खण्डन विभाग द्वारा अपने मंतव्य में या उपस्थापन पदाधिकारी द्वारा नहीं किया गया जा सका। विभागीय कार्यवाही में मूल आरोप की जाँच पूर्व में दो बार की जा चुकी है, जिसमें आरोप को अप्रमाणित पाया जा चुका है। प्रथम बार जाँच में पाया गया कि सम्पत्ति से आय ढ़ाई गुण ज्यादा है, जो आँकड़ा आधारित है तथा अभिलेख का भाग है।
असहमति के बिन्दु में विषेष न्यायालय में स्थगित वाद को आधार बनाया गया है। बिना माननीय सर्वोच्च न्यायालय या माननीय उच्च न्यायालय के सहमति से विभाग विषेष वाद को कारवाई का आधार नहीं बना सकती है। विभागीय कार्यवाही एवं आपराधिक कार्रवाई माननीय उच्च न्यायालय एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, जबकि अग्रेतर कार्यवाही पर स्थगन आदेष है। विषेष वाद की मान्यता शून्य है एवं विषेष वाद किसी कार्यवाही का आधार नहीं हो सकती है।
विगत 07 वर्षों में तीन बार विभागीय कार्यवाही चलाई गई एवं आरोप अप्रमाणित पाया गया। मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी के न्यायालय द्वारा विविध वाद सं0-09/17 के जाँच कराई गई जो अंतिम है, जिसका कोई अपील आर्थिक अपराध इकाई द्वारा नहीं किया गया। आरोप असत्य एवं साजिष का परिणाम पाया गया, जिसे वापसी योग्य भी करार दिया गया। विभागीय असहमति से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई जाँच हुआ ही नहीं तथा अनुसंधान एवं आरोप अंतिम है, जबकि न्यायालय में आरोप भी गठित नहीं हो सका है तथा सम्पूर्ण विचारण शेष है। मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचारण योग्य नहीं पाया गया है। विभागीय असहमति में उक्त विषेष वाद को आधार बनाने से स्पष्ट होता है कि विचारण योग्य नहीं पाया गया है। विभागीय असहमति में उक्त विषेष वाद को आधार बनाने से स्पष्ट होता है कि विचारण से पूर्व ही दोषी मान लिया गया है जबकि विचारण के बाद ही दोषी/निर्दोष माना जाता है तब तक आरोपी निर्दोष माना जाता है। विषेष वाद सं0-38/14 के आपराधिक कार्यवाही पर मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाई जा चुकी है। T.P.Cr.No. 620/19 दिनांक 08.04.2020 एवं 06.12.2019 के द्वारा आपराधिक कार्यवाही पर मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेष के बाद उक्त संज्ञान या किसी कार्यवाही के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता है।
असत्य एवं निराधार दुर्भावनापूर्ण अभियोजन की चुनौती मा0 सर्वोच्च न्यायालय में दिया गया, जिसे स्वीकार करते हुए मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कार्यवाही पर रोक लगा दिया गया। T.P.Cr.No. 620/19 मा0 सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है तथा आपराधिक कार्यवाही पर रोक है।
मा0 उच्च न्यायालय के आदेष की अवमानना करते हुए जाँच एवं अग्रेतर जाँच के बाद तीसरी बार अग्रेतर जाँच कराई गई। सी0डब्लू0जे0सी0 सं0 7549/15 में 06 सप्ताह में निष्पादन करने का आदेष था, जिसपर 06 वर्ष बाद भी अंतिम आदेष पारित नहीं किया गया।
असहमति के बिन्दु में भाग-तीसरा जाँच प्रतिवेदन को शामिल किया गया हैं। प्रथम जाँच प्रतिवेदन पर असहमति नहीं जताई गई है। प्रथम जाँच प्रतिवेदन को द्वितीय जाँच प्रतिवेदन द्वारा सम्पुष्ट किया गया है। विभाग द्वारा प्रथम जाँच के बाद बि0स0सं0व0नि एवं अ0 नियमावली, 2005 के नियम-18(1) के आधार पर अग्रेतर जाँच का निर्णय लिया गया, जिसका अर्थ पुनः जाँच नहीं है। जाँच में पाए गए कमी को अग्रेतर जाँच में स्पष्ट करना है। सुस्थापित कानून के तहत तीसरा जाँच का कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन तीसरी बार बि0स0सं0व0नि एवं अ0 नियमावली, 2005 के नियम-18(1) का दुरूपयोग करते हुए जाँच कराई गई। पुनः अग्रेतर तीसरी जाँच में भी आरोप अप्रमाणित पाया गया।
दूसरे आरोप के निष्कर्ष से असहमति का कोई आधार नहीं है। दूसरा एवं पहला आरोप एक दूसरे के पूरक है। विभागीय जाँच में विभागीय मंतव्य द्वारा या उपस्थापन पदाधिकारी द्वारा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया जा सका या परीक्षण नहीं कराया जा सका, जो आरोपी पदाधिकारी का संबंध वर्णित सम्पति से सम्बद्ध कर सके। ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिया गया, जिससे साबित हो सके कि वर्णित संपत्ति आरोपी द्वारा क्रय-विक्रय किया गया है या क्रय-विक्रय में सहयोग किया गया है या सहमति से क्रय-विक्रय किया गया है या संपत्ति में आरोपी का हिस्सा है या जानकारी में है। स्वाबलम्बी परिजनों के द्वारा अर्जित क्रय-विक्रय अंचल सम्पति उनका मौलिक अधिकार है। विभागीय पत्रांक 21734 दिनांक 15.11. 1976 द्वारा स्पष्ट किया जा चुका है कि ऐसी सम्पति की सूचना या पूर्वानुमति आवष्यक नहीं है।
उपरोक्त तथ्यों के द्वारा प्रथम आरोप के असहमति बिन्दु के संदर्भ में स्पष्ट है कि आर्थिक अपराध इकाई द्वारा निराधार एवं असत्य आरोप-पत्र न्यायालय में समर्पित किया गया है, जो तीन बार के विभागीय कार्यवाही प्रतिवेदन मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा न्यायिक जाँच प्रतिवेदन माननीय उच्च न्यायालय में भेजे गए जाँच प्रतिवेदन, गृह विभाग को भेजे गए प्रतिवेदन अभियोजन निदेषालय को भेजे गए प्रतिवेदन, जिला एवं सत्र न्यायाधीष को भेजे गए प्रतिवेदन राज्य मुकदमा निति 2011 के जाँच प्रतिवेदन, जिला अभियोजन पदाधिकारी के प्रतिवेदन, विषेष लोक अभियोजक उ0 वि0 निगरानी न्यायालय के प्रतिवेदन से स्पष्ट है।5 ;बपकरू464द्ध ;द्धए 3 2022 प्रतिवेदन की तिथि को अनुसंधानकर्त्ता को जानकारी ही नहीं थी कि आय या सम्पत्ति कितनी है, जो दूसरे विभागीय जाँच प्रतिवेदन से स्पष्ट है तथा तीसरी बार जाँच का आधार बना है। बार-बार विभागीय जाँच, न्यायिक जाँच एवं प्रषासनिक जाँच से स्पष्ट हो चुका है कि वर्णित सम्पत्ति आय से कही कम है तथा आरोपी पदाधिकारी द्वारा अर्जित नहीं है। जिला अभियोजन पदाधिकारी एवं विषेष अभियोजक उत्तर बिहार निगरानी न्यायालय द्वारा खुद ही प्रतिवेदित किया गया है कि अभियोजन निराधार, असत्य, दुर्भावनापूर्ण एवं वापसी योग्य है। जिसे जिला पदाधिकारी द्वारा भी अनुमोदित किया गया है।
द्वितीय आरोप के संबंध में असहमति के बिन्दु पर स्पष्ट है कि दुर्भावनापूर्ण अनुसंधान के क्रम में जिस तिथि को सम्पत्ति के संबंध में प्रतिवेदन अनुसंधानकर्त्ता द्वारा भेजा गया। अनुसंधानकर्त्ता को खुद ही जानकारी नहीं थी जो विभागीय जाँच के मंतव्य एवं वर्तमान कार्यवाही का आधार बना है साथ ही मा0 उच्च न्यायालय में पृष्ठांकित पुलिस अधीक्षक के अभियोजन स्थगन प्रस्ताव पत्रांक 85 दिनांक 24.06.2016 द्वारा स्पष्ट है। उक्त प्रतिवेदन आधारित कार्यवाही स्वतः दूषित एवं अमान्य है। जब आरोपकर्त्ता को उक्त तिथि को सम्पत्ति की जानकारी नहीं थी तो उनके प्रतिवेदन के आधार पर विभागीय जाँच प्रतिवेदन से असहमति कैसे हो सकती है। असहमति के बिन्दु में कही भी वर्णित नहीं है कि आरोपी पदाधिकारी द्वारा अचल सम्पत्ति का क्रय/विक्रय किया गया है। असहमति के बिन्दु में अंकित है कि पत्नी एवं परिजनों द्वारा क्रय/विक्रय किया गया है। जिसका स्वतंत्र आयकर रिटर्न सभी परिजनों द्वारा दायर किया जाता है तथा उनके आय से काफी कम है। प्रष्नगत अचल सम्पत्ति के क्रय/विक्रय में आरोपी पदाधिकारी की कोई सहभागिता, निवेष या संज्ञान नहीं है। सम्पूर्ण जाँच में प्रमाणित हो चुका है कि प्रष्नगत सम्पत्ति से आरोपित पदाधिकारी का कोई लेना देना नहीं है। विभागीय मंतव्य एवं उपस्थापन पदाधिकारी के मंतव्य एवं अकारण स्पष्टीकरण के परीक्षण या प्रतिपरीक्षण से स्पष्ट है कि जाँच प्रतिवेदन में आरोप अप्रमाणित करना एक मात्र विकल्प जाँच पदाधिकारी के पास था आरोपी पदाधिकारी द्वारा नियमावली का उल्लंघन नहीं किया गया है असहमति पूर्णतः निराधार है।''
श्री त्रिवेदी के विरूद्ध प्रतिवेदित आरोप, संचिका में उपलब्ध अभिलेख एवं लिखित अभ्यावेदन की समीक्षा की गयी। समीक्षा में पाया गया कि श्री त्रिवेदी का यह कहना कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उक्त वाद में दिनांक 06. 12.2019 को पारित आदेष में सी0डब्लू0जे0सी0 सं0 1257/2017 अभिराम त्रिवेदी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य में अगले आदेष तक रोक लगा दिया गया है, के संबंध में स्पष्ट करना है कि इस वाद में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेष में विभागीय कार्यवाही के संबंध में कुछ नहीं कहा गया है। इस प्रकार श्री त्रिवेदी द्वारा गलत तथ्य उपस्थापित किया गया है।
बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के तहत संचालित विभागीय कार्यवाही के क्रम में संचालन पदाधिकारी के समक्ष आरोप-पत्र/प्रतिपरीक्षण इत्यादि बिन्दुओं को इनके द्वारा उठाया जाना चाहिए था। जहाँ एक ओर श्री त्रिवेदी का यह कहना कि संचालन पदाधिकारी द्वारा दिया गया मंतव्य सम्पूर्ण जाँच पर आधारित है, वहीं दूसरी ओर यह कहना कि इन्हें आरोप-पत्र/प्रतिपरीक्षण का मौका नहीं दिया गया है। संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपी को पर्याप्त मौका दिया गया है एवं सभी प्रक्रिया पूर्ण करते हुए जाँच प्रतिवेदन समर्पित किया गया है। विभागीय कार्यवाही का जाँच प्रतिवेदन प्राप्त होने के उपरान्त ऐसी बातों का उल्लेख किया जाना न्यायसंगत नहीं है। श्री त्रिवेदी के विरूद्ध एक ही आरोप पर तीन बार विभागीय कार्यवाही नहीं चलाई गई है। उल्लेखनीय है कि उनके विरूद्ध प्रतिवेदित आरोप पर प्राप्त जाँच प्रतिवेदन से असहमत होते हुए अनुषासनिक प्राधिकार द्वारा बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-18 के संगत प्रावधानों के तहत अग्रेतर जाँच कराये जाने का आदेष दिया गया।
श्री त्रिवेदी के विरूद्ध न्यायिक प्रक्रिया के तहत आर्थिक अपराध इकाई के द्वारा कार्रवाई की जा रही है, किन्तु आय से अधिक सम्पाि अर्जित किये जाने के संबंध में उक्त आधार पर अनुषासनिक कार्रवाई किया जाना पूर्णतया न्यायसंगत है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजस्थान राज्य बनाम बी0के0 मीणा मामले में दिनांक 27.09.1996 को पारित आदेष के आलोक में कार्मिक एवं प्रषासनिक सुधार विभाग (सम्प्रति सामान्य प्रषासन विभाग) के पत्रांक 2324 दिनांक 10.07.2007 के अनुसार आपराधिक कदाचार में लिप्त सरकारी सेवकों के विरूद्ध आपराधिक कार्रवाई के साथ-साथ विभागीय कार्यवाही चलायी जा सकती है।
आर्थिक अपराध इकाई द्वारा उनके विरूद्ध आय से अधिक सम्पाि अर्जित किये जाने के मामले में आरोप-पत्र माननीय विषेष न्यायालय में समर्पित है। कांड पर माननीय न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जा चुका है। साथ ही बिहार विषेष न्यायालय अधिनियम, 2009 के अन्तर्गत श्री त्रिवेदी के विरूद्ध माननीय प्राधि—त पदाधिकारी-विषेष न्यायाधीष, मुजफ्फरपुर के समक्ष अधिहरण वाद दाखिल करने हेतु गृह विभाग, बिहार सरकार की घोषणा संख्या 11220 तथा 11221 दिनांक 31.12.2007 के आलोक में कार्रवाई प्रक्रियाधीन है। अनुसंधान में पाया गया है कि श्री त्रिवेदी द्वारा कई अचल सम्पाि का क्रय एवं विक्रय किया गया है, जिसका उल्लेख उनके द्वारा समर्पित सम्पाि विवरणी में नहीं किया गया है। श्री त्रिवेदी के पास आय से अधिक सम्पाि की राषि एवं इसके गणना के संबंध में आर्थिक अपराध इकाई द्वारा निर्धारित मानक द्वारा तय किया गया है। आर्थिक अपराध इकाई द्वारा अनुसंधानोपरान्त श्री त्रिवेदी के विरूद्ध आय से अधिक सम्पाि अर्जित किये जाने का आरोप प्रमाणित है।
आर्थिक अपराध इकाई द्वारा श्री त्रिवेदी के विरूद्ध आय से अधिक सम्पाि अर्जित किये जाने से संबंधित कांड के अनुसंधान के क्रम में पाया गया कि श्री त्रिवेदी की पत्नी एवं उनके परिजनों के नाम से कई अचल सम्पाि का क्रय किया गया है तथा अचल सम्पाि की विक्रय भी किया गया है। श्री त्रिवेदी द्वारा समर्पित सम्पाि विवरणी में कई अचल सम्पाियों का उल्लेख नहीं किया गया, जबकि अनुसंधान के क्रम में कई अचल सम्पाियों के संबंध में तथ्य उपलब्ध हुये6 ;बपकरू464द्ध ;द्धए 3 2022 हैं। बिहार सरकारी आचार नियमावली, 1976 के प्रावधान के तहत सामान्य प्रषासन विभाग के परिपत्र संख्या 946 दिनांक 24.01.2011 के आलोक में सभी पदाधिकारियाें एवं कर्मचारियों को विहित प्रपत्र में चल एवं अचल सम्पाि तथा दायित्वों की विवरणी समर्पित किया जाना अनिवार्य है।
श्री त्रिवेदी द्वारा बिहार आचार नियमावली, 1976 के नियम-3 के संगत प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है, जो एक सरकारी सेवक के र्काव्यहीनता एवं स्वेच्छाचारित का द्योतक है। समीक्षोपरान्त अनुषासनिक प्राधिकार द्वारा श्री त्रिवेदी के बचाव अभ्यावेदन को अस्वी—त करते हुए बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 14 के संगत प्रावधानों के तहत (i) संचयात्मक प्रभाव से पाँच वेतनवृद्धि पर रोक एवं (ii) देय प्रोन्नति की तिथि से अगले पाँच वर्षो तक के लिए प्रोन्नति पर रोक का दंड विनिश्चित किया गया।
विदित हो कि श्री त्रिवेदी द्वारा माननीय न्यायालय में दायर सी0डब्लू0जे0सी0 संख्या 9999/2020 में दिनांक 15.02.2022 को आदेष पारित किया गया। पारित आदेष में उल्लेखित है कि :-
"In support of the aforesaid relief petitioner has submitted representation dated 25.11.2020 (Annexure-5) and it is pending consideration." आगे कार्यकारी अंष निम्नवत् है :-
"In the light of these facts and circumstances, the competent authority is hereby directed to examine the petitioner's representation and conclude the departmental proceedings within a period of three months from the date of receipt of this order failing which petitioner shall be extended promotional benefits on ad hoc basis in the light of Government Policy/Resolution dated 11.09.2002 and extend service benefits subject to outcome of the pendency of the departmental inquiry and criminal proceedings.
Accordingly, the present petition stands disposed off."
माननीय न्यायालय द्वारा पारित आदेष के संबंध में उल्लेख करना है कि श्री त्रिवेदी का अभ्यावेदन दिनांक 25.
11.2020 प्राप्त हुआ, जिसमें उनके द्वारा अभियोजन वापसी की अनुषंसा करते हुए विधि विभाग को द0प्र0सं0 की धारा-321 के तहत न्यायालय में आवेदन दाखिल करने एवं जिला दंडाधिकारी के आदेष का अनुपालन सुनिष्चित कराने हेतु निदेष देने का अनुरोध किया गया। श्री त्रिवेदी का इसी आषय का अभ्यावेदन दिनांक 08.01.2021 भी प्राप्त हुआ। समीक्षोपरान्त अनुषासनिक प्राधिकार द्वारा लिये गये निर्णय के आलोक में विभागीय पत्रांक 5299 दिनांक 18.05.2021 द्वारा श्री त्रिवेदी के अभ्यावेदन को अस्वी—त किया गया, जिसकी सूचना श्री त्रिवेदी को दी गयी।
अनुषासनिक प्राधिकार द्वारा श्री त्रिवेदी के विरूद्ध उपर्युक्त विनिष्चित दंड प्रस्ताव पर विभागीय पत्रांक 16003 दिनांक 16.12.2021 एवं स्मार पत्रांक 3728 दिनांक 10.03.2022 द्वारा बिहार लोक सेवा आयोग, पटना से सहमति/परामर्ष की मांग की गई। आयोग के पत्रांक 3840 दिनांक 14.03.202 द्वारा अनुषासनिक प्राधिकार द्वारा विनिष्चित दण्ड प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की गयी है।
अतः उपर्युक्त वर्णित स्थिति में अनुशासनिक प्राधिकार द्वारा विनिष्चित दण्ड प्रस्ताव पर बिहार लोक सेवा आयोग से प्राप्त सहमति के आलोक में श्री अभिराम त्रिवेदी (बि0प्र0से0), कोटि क्रमांक 964/11,तत्कालीन वरीय उप समार्हाा, वैषाली-सह-अधीक्षक, मंडल कारा, हाजीपुर सम्प्रति वरीय उप समाहर्त्ता, मधेपुरा को बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-14 के संगत प्रावधानों के तहत निम्नलिखित दंड अधिरोपित एवं संसूचित किया जाता है :-
(i) संचयात्मक प्रभाव से पाँच वेतनवृद्धि पर रोक,
(ii) देय प्रोन्नति की तिथि से अगले पाँच वर्षो तक के लिए प्रोन्नति पर रोक।
आदेष :- आदेष दिया जाता है कि इस संकल्प की प्रति बिहार राजपत्र के अगले असाधारण अंक में
प्रकाषित किया जाय तथा इसकी प्रति सभी संबंधितों को भेज दी जाय।
बिहार-राज्यपाल के आदेष से, शिवमहादेव प्रसाद, सरकार के अवर सचिव।