(cid:467)नबंधन सं(cid:201)या पी0ट(cid:547)0-40 ;बपकरू464द्ध
;बपकरू464द्ध ;बपकरू430द्ध ;बपकरू292द्ध
27 ;बपकरू287द्ध 1945 ;0द्ध
(0 325) ए ए 17 ;बपकरू292द्ध 2023
सं0-कारा/05-07(अ॰मू॰)-14/2022/2644
विधि विभाग
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ladYi
10 vizhy 2023
बिहार कारा हस्तक, 2012 के नियम-430 में प्रावधानित है किः-''राज्य सरकार ऐसे बंदियों या बंदियों की ऐसी कोटियों को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के अधीन परिहार अधिनिर्णीत कर सकेगी, जैसे राज्य सरकार विनिश्चय करे। परिहार का मापदण्ड और परिमाण राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर निर्धारित की जा सकेगी। ऐसे परिहार नियम 405 के अधीन विनिर्दिष्ट सीमा के कार्यक्षेत्र के अधीन नहीं आयेगी।'' बिहार कारा हस्तक, 2012 के नियम 405 में यह वर्णित है कि ''जब तक कि राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट रूप से अनुमोदित न हो, बंदी को स्वीकृत कुल परिहार कुल कारावास अवधि की एक तिहाई से अधिक नहीं होगी।''
2. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न वादों में आदेश पारित करते हुए राज्य सरकारों को निदेशित किया है कि काराओं में संसीमित सजावार बंदी जिन्होंने कारा में संसीमन की अवधि में अपना अच्छा आचरण बनाए रखा है और जिनके कारामुक्त होने से समाज में कोई प्रतिकुल प्रभाव नहीं पड़ता हो, तो राज्य सरकार ऐसे बंदियाें को समयपूर्व कारामुक्ति का लाभ देकर कारामुक्त करने पर विचार कर सकती है।
3. साथ ही दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा-432(1) (Cr.P.C-432(1)) में उल्लेखित है किः-''जब किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए दंडादेश दिया जाता है तब समुचित सरकार किसी समय, शर्तों के बिना या ऐसी शर्तों पर जिन्हें दंडादिष्ट व्यक्ति स्वीकार करे उसके दंडादेश के निष्पादन का निलंबन या जो दंडादेश उसे दिया गया है उसका पूरे का या उसके किसी भाग का परिहार कर सकती है।'' 4. माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Suo Moto Writ Petition (Crl.) No. 04/2021 In Re: Policy Strategy For Grant of Bail में दिनांक 14.09.2022 को पारित आदेश में सुनवाई के क्रम में Amicus Curie श्री गौरव अग्रवाल द्वारा सजावार बंदियों के समयपूर्व रिहाई के लिए निम्न सुझाव दिया गया हैः-
"7.1 There are convicts in jails who are undergoing fixed term sentences. In such
cases where the convict has been sentenced up to 10 years' imprisonment and is a first time
offender and has undergone half the sentence, the State Government can consider whether
the remaining sentence can be commuted under Section 432 Cr.P.C. as a onetime measure.
2 ;बपकरू464द्ध ;द्ध 17 ;बपकरू292द्ध 2023The State Government can obviously provide certain exceptions where this benefit would not be available to the convicts (especially heinous crimes rape, dowry death, kidnapping, PC Act, POCSO, NDPS, etc.). The State Government can impose conditions of good conduct upon the convict. In this regard, the provisions of Model Prison Manual, 2016, especially the Chapter XX dealing with "premature release' can be considered by the State Government, which lays down broad parameters for dealing with such cases. 7.3 It was pointed out during meeting with Home Ministry officials that each State Governments can take a decision regarding further benefits which can be conferred on the convicts which may go beyond the above policy so that on the next date i.e. 26.01.2023, larger number of convicts can be benefitted." उपरोक्त सुझावों को समावेशित करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार द्वारा काराओं में संसीमित सजावार बंदियों को विशेष परिहार देने हेतु दिनांक 10.06.2022 को निर्गत परिपत्र के आलोक में काराओं में जनाकीर्णता को कम करने के उद्देश्य से निम्न आदेश दिया है :- "It is pointed to us that in the letter dated 10.6.2022 referred to aforesaid, the benchmark has been fixed as two third of the completed sentence but then we are of the view that 50% completed sentence would sub-serve the purpose and individual States will be taking their own call even qua the category of prisoners to whom the benefit can be given and not necessarily confined to the guidelines annexed to the letter dated 10.6.2022."
5. उपरोक्त न्यायादेश को दृष्टिपथ में रखते हुए बंदियों के समयपूर्व रिहाई के संबंध में बिहार कारा हस्तक, 2012 एवं इसके निमित्त निर्गत किये गये परिपत्रों की समीक्षा माननीय सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली द्वारा दिनांक 14.09.2022 को पारित आदेश के मूल भावनाओं को दृष्टिपथ में रखते हुए किया गया।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Suo Moto Writ Petition (Crl.) No. 04/2021 में दिनांक 14.09.2022 को पारित आदेश की कंडिका-7.1 में वर्णित सुझावों के संबंध में निम्नलिखित आवश्यक निर्णय लिया जाना समीचीन है :-
(I) एक बारगी उपाय के तहत अधिसूचना निर्गत होने की तिथि तक दस वर्ष तक की सजा प्राप्त बंदियों, जो प्रथम बार अपराध कारित किये हों, जिन्होंने कारावास की अवधि के दौरान लगातार अच्छा आचरण बनाए रखा है, प्राप्त सजा अवधि की आधी अवधि (परिहार रहित) व्यतीत कर चुके हाें, कुछ वर्णित मामलों को छोड़कर उन्हें एक बारगी उपाय के रूप में परिहार का लाभ देते हुए राज्य सरकार के द्वारा कारामुक्त किया जा सकता है।
परन्तु निम्नलिखित श्रेणियों के बंदियों को परिहार देय नहीं होगा :- (i) आतंकवादी कार्यों में संलिप्त सिद्धदोष अपराधियों या आतंकवादी और विघटनकारी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1985 (टाडा), आतंकवाद निवारण अधिनियम, 2002 (पोटा), विधि विरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (यू0ए0पी0ए), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1982 (एनएसए), शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923, यानहरण निवारण अधिनियम, 2016 के तहत सिद्धदोष व्यक्ति;
(ii) दहेज हत्या के लिए सिद्धदोष कैदियों के मामले; (iii) जाली मुद्रा नोट (एफआईसीएन) के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 489 (क से ड.) के तहत मामलों में सिद्धदोष कैदियों के मामले;
(iv) बलात्कार, मानव तस्करी और यौन अपराध से बालकों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 (पोक्सो), अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के अपराध के लिए सिद्धदोष कैदियों के मामले;
(v) धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002, विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम, 1999 (फेमा), काला धन (अघोषित विदेशी आय और परिसंपत्ति) और कर अधिनियम, 2015 के तहत सिद्धदोष कैदियों के मामले; स्वापक दवाएं और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (एनडीपीएस) के तहत सिद्धदोष कैदियों के मामले;
(vi) व्यापक नरसंहार के हथियार और इनकी आपूर्ति प्रणाली (विधि विरूद्ध क्रियाकलाप निवारण), अधिनियम, 2005 के तहत सिद्धदोष कैदियों के मामले;
(vii) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत सिद्धदोष कैदियों के मामले;
(viii) राज्य के विरूद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए कैदियों के मामले (आईपीसी का अध्याय-VI);
(ix) अपहरण से संबंधित मामलों के तहत सिद्धदोष कैदियों के मामले, तथा3 ;बपकरू464द्ध ;द्ध 17 ;बपकरू292द्ध 2023 (x) कोई अन्य विधि, जिसे राज्य सरकार इस प्रयोजन के लिए बाहर रखना उचित समझे, के तहत सिद्धदोष कैदी।
(II) (क) वैसे सजावार बंदी जो परिहार हेतु निर्दिष्ट अयोग्यताओं से मुक्त हों, को जिला स्तर पर गठित समिति द्वारा चिन्हित किया जायेगा। इस समिति के निम्न सदस्य होंगेः-
(i) जिला पदाधिकारी - अध्यक्ष (ii) जिला अभियोजन पदाधिकारी - सदस्य (iii) काराधीक्षक - सदस्य सचिव
(जिले में एक से अधिक कारा होने की स्थिति में जिले के वरीयतम काराधीक्षक) जिला स्तरीय समिति सुनिश्चित करेगी कि सार्वजनिक शांति और समाज की भलाई के लिए, ऐसे अपराधी जो कि घोर अपराधी, आदतन अपराधी या जो विशेष छूट के लिए पात्र नहीं हैं, ऐसे अपराधियों के अलावा अपनी सिफारिशें राज्य स्तरीय समिति को प्रेषित करेगी।
(ख) जिला स्तरीय समिति परिहार के योग्य पाये गये बंदियों को चिन्हि्त कर अपना प्रतिवेदन निर्धारित समय सीमा के अन्दर राज्य स्तरीय समिति को भेजेगी। समिति अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से अंकित करेगी कि ''बंदी परिहार हेतु वर्णित अयोग्यता से पूरी तरह मुक्त है।'' (ग) राज्य सरकार जिला स्तरीय समिति द्वारा चिन्हित परिहार के योग्य बंदियों की जाँच के लिए एक राज्य स्तरीय कमिटी का गठन करेगी जिसके निम्न सदस्य होंगे। (i) अपर मुख्य सचिव, गृह विभाग - अध्यक्ष (ii) सचिव, विधि विभाग - सदस्य (iii) महानिरीक्षक, कारा एवं सुधार सेवाएँ - सदस्य सचिव
(घ) राज्य स्तरीय समिति सजावार बंदियों की सजा का परिहार करने हेतु विहित शर्तों की जांच और जिला स्तरीय समिति के प्रतिवेदन पर विचार करते हुए अपनी अनुशंसा राज्य सरकार को देगी। जिला स्तरीय समिति एवं राज्य स्तरीय समिति की अनुशंसा के आलोक में राज्य सरकार उपरोक्त श्रेणी के बंदियों को समुचित परिहार प्रदान कर सकेगी। परन्तु, ऐसे मामलें जिसमें केन्द्र सरकार की सहमति दं0 प्रं0 सं0 की धारा 435 के अंतर्गत आवश्यक हो, बिना केन्द्र सरकार की सहमति के परिहार नहीं दे सकेगी।
6. इसके अतिरिक्त यह भी उल्लेखनीय है कि आजीवन कारावास प्राप्त बंदी कुछ खास मामलों को छोड़कर 14 वर्षों का वास्तविक कारावास एवं परिहार सहित 20 वर्षों का कारावास व्यतीत करने के उपरांत समय पूर्व रिहाई हेतु विचार किये जाने के हकदार होते हैं। वर्ष 2016 में संषोधित बिहार कारा हस्तक, 2012 के नियम-481(i)(a) में प्रावधानित है कि वैसे बंदी जो बलात्कार के साथ हत्या, डकैती के साथ हत्या, ऐसी हत्या जिसमें नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम,1955 के अधीन कोई अपराध सम्मिलित हो, दहेज के लिए हत्या, 14 वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे की हत्या, अनेक हत्या, अभियोजन के पश्चात कारागार में रहते हुए की गई हत्या, पैरोल पर रहने के दरम्यान की गई हत्या, आतंकवादी घटना में हत्या, तस्करी करने में हत्या या काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या जैसे जघन्य मामलों में हत्या हेतु आजीवन कारावास में हों, ऐसे बंदी परिहार सहित 20 वर्षों तक कारावास में रहने के बाद भी समय पूर्व मुक्ति हेतु विचार किये जाने के हकदार नहीं होंगे।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सरकारी सेवक की हत्या में समयपूर्व कारामुक्ति का प्रावधान नहीं है, जबकि अन्य व्यक्ति की हत्या में समयपूर्व कारामुक्ति का प्रावधान है। इस प्रकार हत्या के एक ही अपराध के लिए दिया जाने वाला समयपूर्व कारा मुक्ति का प्रावधान भेद-भाव पूर्ण है, चूँकि दण्ड विधान में हत्या के लिए चाहे वह सरकारी सेवक हो या कोई अन्य, एक ही दण्ड का प्रावधान है।
7. कंडिका-06 के समीक्षा से यह स्पष्ट है कि हत्या के एक ही अपराध के लिए दिया जाने वाला विभिन्न तरह का समय पूर्व कारा मुक्ति का प्रावधान दोषपूर्ण है, चूँकि दण्ड विधान में हत्या के लिए चाहे वह सरकारी सेवक हो या कोई अन्य, एक ही दण्ड का प्रावधान है। अतः बिहार कारा हस्तक, 2012 के नियम-481(i)(a) में वर्णित वाक्यांष- ''या काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या'' को विलोपित किये जाने योग्य है। इस संशोधित प्रावधान के तहत समयपूर्व कारामुक्ति हेतु परिहार का लाभ पूर्व से गठित बिहार राज्य दण्डादेश परिहार पर्षद की अनुशंसा पर ही दिया जायेगा।
8. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने Criminal Appeal No. 566 of 2010, State of Haryana Vs. Jagdish के वाद में समयपूर्व कारामुक्ति हेतु विचारणीय नीति सजा प्राप्ति की तिथि के दिन लागू नीति हो अथवा विचारण के दिन लागू नीति हो, इस संबंध में व्याख्या करते हुए कहा कि :-
"43. The right of the respondent prisoner, therefore, to get his case considered at
par with such of his inmates, who were entitled to the benefit of the said policy, cannot be
taken away by the policy dated 13.08.2008. This is evident from a bare perusal of the
recitals contained in the policies prior to the year 2008, which are referable to Article 161
4 ;बपकरू464द्ध ;द्ध 17 ;बपकरू292द्ध 2023of the Constitution. The High Court, therefore, in our opinion, was absolutely justified in
arriving at the conclusion that the case of the respondent was to be considered on the
strength of the policy that was existing on the date of his conviction.
State authority is under an obligation to at least exercise its discretion in relation to an honest expectation perceived by the convict, at the time of his conviction that his case for pre-mature release would be considered after serving the sentence, prescribed in the short sentencing policy existing on that date. The State has to exercise its power of remission also keeping in view any such benefit to be construed liberally in favour of a convict which may depend upon case to case and for that purpose, in our opinion, it should relate to a policy which, in the instant case, was in favour of the respondent. In case a liberal policy prevails on the date of consideration of the case of a "lifer" for pre-mature release, he should be given benefit thereof." उपरोक्त न्यायादेष को उद्धृत करते हुए माननीय उच्च न्यायालय, पटना में Cr.W.J.C. No. 1245 of 2016 में आदेष पारित करते हुए कहा कि :- '' It has been noticed that the Apex Court in the case of State of Haryana Vs. Jagdish since reported in (2010) 4 Supreme Court cases 2016 has clearly held that it is the law that obtains on the day when conviction order is first passed. That would guide the rights of the party to get remission or suspension of sentence. The judgment was further to hold that any subsequent change to the prejudice of the convict will not affect him but any benefit or relaxation that is given subsequently would insure to his benefit.''
इससे स्पष्ट है कि भले ही उक्त व्यक्ति पर जो नीति दण्ड देने वक्त लागू थी लेकिन अगर उक्त नीति के बाद कोई संषोधित नीति के तहत कोई लाभ उक्त व्यक्ति को प्राप्त हो सकता है तो वह भी उसे प्राप्त होगा। 9. उक्त के आलोक में राज्य सरकार द्वारा निर्णय लिया गया है कि :-
(क) एक बारगी उपाय के तहत अधिसूचना निर्गत होने की तिथि तक दस वर्ष तक की सजा प्राप्त बंदियों, जो प्रथम बार अपराध कारित किये हों, जिन्होंने कारावास की अवधि के दौरान लगातार अच्छा आचरण बनाए रखा है, प्राप्त सजा अवधि की आधी अवधि (परिहार रहित) व्यतीत कर चुके हों, तथा कंडिका-05 (I) के परन्तुक में वर्णित अयोग्यता के अन्तर्गत नहीं आते हाें, उन्हें एक बारगी उपाय के रूप में परिहार का लाभ देते हुए राज्य सरकार द्वारा कारामुक्त किया जा सकता है। उपरोक्त से संबंधित लाभ कंडिका-5 (II) में वर्णित जिला स्तर पर गठित समिति एवं राज्य स्तरीय समिति की अनुशंसा पर राज्य सरकार द्वारा दिया जाएगा।
(ख) बिहार कारा हस्तक, 2012 के नियम-481(i)(a) में वर्णित वाक्यांष-''या काम पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या'' को विलोपित किया जाता है। उपरोक्त से संबंधित लाभ पूर्व से गठित बिहार राज्य दण्डादेष परिहार पर्षद की अनुषंसा पर राज्य सरकार द्वारा दिया जाएगा।