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Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 01 March 2024

Published 01 March 2024

Type
Extra Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2024-03-01.180
Languages
English, Hindi

िनबंधन सं(cid:201)या पी0ट(cid:547)0-40 असाधारण अंक

(cid:464)बहार सरकार (cid:430)ारा (cid:292)कािशत

11 फा(cid:227)गुन 1945 (श0)

(सं0 पटना 180) पटना, शु(cid:272)वार, 01 माच(cid:91) 2024 बिहार विधान सभा सचिवालय ——— अधिसूचना 29 फरवरी, 2024

सं॰ वि॰स॰वि॰-12/2024-1101/वि॰स॰--''बिहार अपराध नियंत्रण विधेयक, 2024'', जो बिहार विधान सभा में दिनांक-29 फरवरी, 2024 को पुरःस्थापित हुआ था, बिहार विधान सभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली के नियम-116 के अन्तर्गत उद्देश्य और हेतु सहित प्रकाशित किया जाता है ।

आदेश से, राज कुमार सचिव।2 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 [[विúसúविú-04/2024] लोक व्यवस्था के संधारण के लिए किसी भी तरीके से हानिकारक कार्य करने वाले असामाजिक तत्वों को नियंत्रित करने एवं उससे जुड़े मामलों के लिए विशेष प्रावधान करने हेतु एक अधिनियम।

भारत गणराज्य के पचहत्तरवें वर्ष में बिहार राज्य विधानमंडल द्वारा इसे निम्नलिखित रूप में अधिनियमित किया जाता है- ः- (1) यह अधिनियम बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2024 कहा जाएगा। (2) इसका विस्तार पूरे बिहार राज्य तक है। (3) बिहार गजट में प्रकाशन के तुरंत बाद से यह प्रवृत होगा।

- इस अधिनियम में, जबतक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो- (क) ''लोक व्यवस्था संधारण पर किसी भी तरीके से हानिकारक कार्य करना'' का अर्थ है कि कोई व्यक्ति असामाजिक तत्व के रूप में किसी भी गतिविधि में संलिप्त है, या शामिल होने की तैयारी कर रहा है, या लोक व्यवस्था के संधारण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है या उसे प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने की संभावना है। स्पष्टीकरण- इस उप-धारा के प्रयोजन के लिए, सार्वजनिक व्यवस्था को प्रतिकूल रूप से प्रभावित माना जाएगा, या प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की संभावना समझी जाएगी, अन्य क्रियाकलापों के साथ, यदि उप-धारा (ख) में निर्दिष्ट व्यक्तियों में से किसी की कोई भी गतिविधि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, आम नागरिक या किसी भी वर्ग के बीच कोई हानि, खतरा या आषंका या असुरक्षा की भावना पैदा कर रहा है या जीवन या सार्वजनिक स्वास्थ्य या पारिस्थितिक प्रणाली के लिए गंभीर या व्यापक खतरा पैदा कर रहा है या समुदाय के जीवन को कुप्रभावित कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप प्रशासन में विश्वास की हानि हुई हो। (ख) असामाजिक तत्त्व से अभिप्रेत है, जो व्यक्ति

(i) भारतीय दंड संहिता के अध्याय XVI या अध्याय XVII के तहत कोई दंडनीय अपराध करता है, या करने का प्रयास करता है या करने के लिए दुष्प्रेरण करता है; या

(ii) अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के अधीन महिलाओं और बच्चों की व्यापार से जुड़ा कोई भी अपराध करता है या करने में दुष्प्रेरण करता है; या (iii) यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के तहत कोई अपराध करता है या करने के लिए दुष्प्रेरण करता है; या

(iv) धर्म, मूलवंश, भाषा, जाति या समुदाय के आधार पर या अन्य किसी भी आधार पर विभिन्न धर्मों, मूलवंशीय या भाषाई दलों या जातियों या समुदायों के बीच शब्दों द्वारा या अन्यथा शत्रुता या घृणा की भावना प्रोत्साहित या प्रोत्साहित करने का प्रयत्न करता हो; या

(v) जो स्त्रियों और लड़कियों पर आदतन अश्लील फब्तियाँ करता हुआ या उन्हें छेड़ता हुआ पाया गया हो; या

(vi) बिहार पुलिस हस्तक, 1978 के प्रावधानों के अधीन ''गुण्डा'' घोषित किया गया हो;

या

(vii) आयुध अधिनियम, 1959 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किसी अग्नायुध या गोला-बारूद के निर्माण या विक्रय या परिवहन या संचरण या अवैध व्यापार या सम्परिवर्तन या मरम्मत या परीक्षण या परिशुद्धि करता है या करने का प्रयास करता है या दुष्प्रेरण करता है या किसी संगठित अपराध सिंडिकेट के सदस्य के रूप में या इसके किसी व्यक्ति की ओर से अग्नायुध या गोला-बारूद का संधारण या वहन करता है।

स्पष्टीकरण-1- इस उप-धारा के प्रयोजन के लिए अवैध व्यापार से तात्पर्य है भारत क्षेत्र में, उससे या उसके भीतर अग्नायुध या गोला-बारूद का अर्जन, विक्रय, परिदान, संचलन या अंतरण है, यदि अग्नायुध या गोला-बारूद आयुध अधिनियम, 1959 के उपबंधों के अनुसार चिन्हित नहीं है या जिनका इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में दुव्र्यापार किया गया है, जिसके अंतर्गत अवैध व्यापार किए गए, विदेषों में बने अग्नायुध या प्रतिबंधित आयुध और गोला-बारूद भी हैं।

स्पष्टीकरण-2- ''संगठित अपराध सिंडिकेट'' से तात्पर्य है दो या अधिक व्यक्तियों का कोई समूह, जो सिंडिकेट या गिरोह के रूप में या तो अकेले या संयुक्त रूप से कार्य करते हुए, संगठित अपराध की गतिविधियों में संलिप्त है।3 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 स्पष्टीकरण-3-'' संगठित अपराध'' से तात्पर्य है, किसी व्यक्ति द्वारा कोई भी ऐसा सतत्‌ रूप से की जाने वाली विधिविरूद्ध गतिविधि, जो या तो किसी संगठित अपराध सिंडिकेट के किसी सदस्य के रूप में या ऐसे सिंडिकेट की ओर से अकेले या संयुक्त रूप से, स्वयं के लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए, धन संबंधी लाभ प्राप्त करने के लिए या अनुचित आर्थिक या अन्य लाभ प्राप्त करने के उद्‌देश्य से, हिंसा या हिंसा की धमकी या अभित्रास या प्रताड़ना या अन्य विधिविरूद्ध साधन के उपयोग द्वारा किया गया हो; या

(viii) खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (1957 का केन्द्रीय अधिनियम की धारा-67) या बिहार खनिज (रियायत, अवैध खनन, परिवहन और भंडारण का निवारण अधिनियम, 2019) और समय-समय पर यथासंशोधित अथवा तथा उस समय प्रभावी अन्य कोई नियम के अन्तर्गत बालू से संबंधित अपराध करता है या किसी प्रकार का अपराध करने का प्रयास करता है या इसके लिए दुष्पे्ररण करता है; या

(ix) समय-समय पर संशोधित बिहार उत्पाद एवं निषेध अधिनियम, 2016 या स्वापक औषधि और मनः प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि एवं इसके अधीन बनाए गए नियम, अधिसूचना तथा आदेश के किन्ही उपबंधों का उल्लंघन करके किसी शराब या मादक या हानिकारक मादक द्रव्य या अन्य मादकों या स्वापकों का आसवन, निर्माण, भंडारण, परिवहन, विक्रय, वितरण करता है, अथवा जो किसी भी व्यक्ति द्वारा या उसके माध्यम से उपरोक्त उल्लिखित चीजों में से किसी को आगे बढ़ाने या समर्थन करने के लिए जानबूझकर कोई धन खर्च या लागू करता है या किसी जानवर, वाहन, जहाज, या अन्य वाहन या किसी भी पात्र या किसी अन्य सामग्री की आपूर्ति करता है या जो किसी अन्य तरीके से ऐसे किसी कार्य को करने के लिए दुष्प्रेरण करता है; या

(x) सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (केन्द्रीय अधिनियम, 2000 का 21) के अध्याय-xi के अधीन कोई दंडनीय अपराध करता है या करने का प्रयास करता है या उसे करने के लिए दुष्पे्ररण करता है; या

(xi) या तो स्वयं या किसी गिरोह के सदस्य या नेतृत्वकर्त्ता के रूप में अवैध और अनधि—त रूप से, बल या धमकी का उपयोग करके या किसी अन्य गैरकानूनी तरीके से, किसी भी भूमि या भवन या किसी अन्य संपत्ति पर कब्जा कर लेता है या कब्जा करने का प्रयास करता है, चाहे वह संपत्ति सरकार, स्थानीय प्राधिकार या किसी अन्य व्यक्ति की हो।

(ग) ''आयुक्त'' से अभिप्रेत है डिवीजन का आयुक्त और इसमें इस अधिनियम के अधीन आयुक्त की सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त कोई अधिकारी भी शामिल है।

(घ) ''निरूद्ध करने का आदेश'' से इस अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत पारित आदेश से अभिप्रेत है।

(ङ) ''जिला दण्डाधिकारी'' में अपर जिला दण्डाधिकारी या इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किसी अन्य पदाधिकारी भी सम्मिलित है।

(च) इस अधिनियम में जहाँ भी किसी असामाजिक तत्व के संबंध में वाक्यांश ''अपराध कारित करता है'' का प्रयोग किया गया है, उसका तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है, जिसके विरूद्ध इस अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई प्रारंभ होने से ठीक पहले के 24 महीनों के दौरान, उप-धारा (ख) में संदर्भित अपराधों के लिए न्यायालय में उसके विरूद्ध कम से कम दो मामलों में पुलिस प्रतिवेदन, जिसमें उसकी संलिप्तता दिखाई गई हो, समर्पित किया गया हो।

(छ) इस अधिनिमय के प्रयोजनार्थ ''दुष्प्रेरण'' शब्द का अर्थ वही होगा जो भारतीय दंड संहिता, 1861 की धारा 107 के तहत परिभाषित है। (1) जहाँ जिला दण्डाधिकारी को यह प्रतीत हो कि- (क) कोई व्यक्ति एक असामाजिक तत्त्व है, और (ख) (i) जिले या उसके किसी भाग अथवा राज्य के किसी भाग में उसकी गतिविधियाँ या कार्यों से व्यक्तियों या सम्पत्ति को भय, खतरा या हानि पहुँच रही है या पहुँच सकती हैं और (ii) यह की उप-खण्ड (i) में उल्लिखित उसकी गतिविधियां उसे निर्दिष्ट स्थान या स्थानों से हटाये जाने के आदेष बिना रोकी नहीं जा सकती हैं।4 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 जिला दण्डाधिकारी, उसके विरूद्ध खण्ड (क) और (ख) सम्बन्धी मुख्य आरोपों की सामान्य प्रकृति का एक लिखित सूचना देगा और उसे उनके सम्बन्ध में स्पष्टीकरण देने के लिए युक्तियुक्त अवसर देगा। (2) जिस व्यक्ति के विरूद्ध इस धारा के अधीन आदेश देने का प्रस्ताव हो, उसे अपनी पसन्द के विधिक परामर्शदाता से परामर्श लेने और बचाव करने का अधिकार होगा और यदि उसकी इच्छा हो तो उसके और किन्हीं अन्य साक्षियों के परीक्षण का भी, जिन्हें वह अपने स्पष्टीकरण के समर्थन में प्रस्तुत करना चाहता हो युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा, जबतक कि अभिलिखित किये जानेवाले कारणों से जिला दण्डाधिकारी को यह राय न हो कि ऐसा अनुरोध तंग करने अथवा विलम्ब करने के प्रयोजन से किया गया है।

(3) जिला दण्डाधिकारी अथवा यह समाधान हो जाने पर कि उपधारा (1) के खण्ड (क) और (ख) में विनिर्दिष्ट स्थिति विद्यमान है, लिखित आदेश द्वारा-

(क) उसे, यथास्थिति, जिले या उसके भाग से अथवा राज्य के किसी भाग से, उस मार्ग द्वारा, यदि कोई हो, और उस समय के भीतर जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, बाहर चले जाने और उस जिले या उसे विनिर्दिष्ट भाग में अथवा राज्य के किसी भाग में, तब तक प्रवेश न करने का आदेश दे सकेगा, जबतक कि छह महीने से अधिक वह कालावधि बीत न जाए जो आदेश में विनिर्दिष्ट हो;

(ख) (i) उस व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह अपनी गतिविधियाँ उस रीति से, उस समय और उस प्राधिकारी या व्यक्ति को सूचित करे या उनके समक्ष उपस्थित हो जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए अथवा दोनों काम करे;

(ii) उसके द्वारा किसी ऐसी वस्तु रखने या उपयोग करने को प्रतिषिद्ध कर या उस

पर रोक लगा सकेगा जो आदेश में विनिर्दिष्ट हो;

(iii) उसे अन्यथा यह निदेश दे सकेगा कि, जबतक कि छह महीने से अनधिक वह कालावधि बीत न जाए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट है वह ऐसी रीति से आचरण करे जो आदेश में विनिर्दिष्ट हो। -जिला दण्डाधिकारी आदेश द्वारा किसी व्यक्ति को, जिसके संबंध में धारा 3 को उपधारा (3) के खण्ड (क) के अधीन आदेश किया गया हो, अस्थायी कालावधि के लिए उस क्षेत्र में, जिससे उसे हटने का आदेश दिया गया हो उन शर्तों के अधीन जिन्हें जिला दण्डाधिकारी विनिर्दिष्ट करें, प्रवेश करने का लौटने की अनुज्ञा दे सकेगा और ऐसी अनुज्ञा किसी समय रद्द कर सकेगा। -जिला दण्डाधिकारी उस स्थिति को छोड़कर जब उसका अभिलिखित किये जानेवाले कारणों से यह समाधान हो चुका हो कि ऐसा करना अध्यावहार्य है, सम्बन्धित व्यक्ति को इस निमित्त अध्यावेदन देने का अवसर देने के बाद, धारा 3 के अधीन के आदेश में विनिर्दिष्ट कालावधि का सामान्य जनता के हित में समय-समय पर विस्तार कर सकेगा किन्तु इस प्रकार विस्तारित कालावधि किसी भी दशा में कुल मिलाकर दो वर्षों से अधिक की नहीं होगी।

- (1) धारा 3, धारा 4 या धारा 5 के अधीन दिये गये आदेश द्वारा व्यथित कोई व्यक्ति उस आदेश की तारीख से पन्द्रह दिनों के भीतर आयुक्त के पास अपील कर सकेगा।

(2) आयुक्त उस आदेश को, उपांतरण के साथ या बिना या तो संपुष्ट कर सकेगा या उस अपास्त कर सकेगा और अपील का निपटारा लंबित रख सकेगा या उस आदेश के प्रवर्त्तन को उन निबंधनों के अधीन रहते हुए स्थगित कर सकेगा जिन्हें वह उचित समझे। (1) जिला दण्डाधिकारी या आयुक्त-

(क) किसी ऐसे व्यक्ति की उपिस्थति सुनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ, जिसके विरूद्ध धारा 3 के अधीन आदेश करने का प्रस्ताव हो या किया जा चुका हो किन्तु उसका प्रवर्त्तन धारा 6 के अधीन स्थगित कर दिया गया हो।

(ख) धारा 3, धारा 4, धारा 5 या धारा 6 के अधीन किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में किये गये आदेश में विनिर्दिष्ट किसी निदेश, अध्यपेक्षा, प्रतिषेध, प्रतिबंध या शर्त के सम्यक्‌ अनुपालन के प्रयोजनार्थ ऐसे व्यक्ति से अपेक्षा कर सकेगा कि वह प्रतिभूओं के साथ या बिना एक बंधपत्र निष्पादित कर, और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के उपबंध उस बंधपत्र के सम्बन्ध में, यथावश्यक परिवर्तन सहित उसी तरह लागू होंगे जैसे वे उक्त संहिता के अधीन निष्पादित या निष्पादित किये जाने के लिए अपेक्षित बंधपत्रों के सम्बन्ध में लागू होते हैं।

(2) विशिष्टतः और पूर्ववर्ती उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना-

(क) जिला दण्डाधिकारी, धारा 3 की उप-धारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को सूचना निर्गत करते समय उसकी गिरफ्तारी का वारंट उस पर उक्त संहिता की धारा 71 के उपबन्धों के निबंधन या एक साथ निदेश पृष्ठांकित कर, निर्गत कर सकेगा और उक्त संहिता की धारा5 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 70 से धारा 89 तक के उपबन्ध, जहाँ तक हो सके, उस वारंट के सम्बन्ध में उसी प्रकार लागू होंगे मानो जिला दण्डाधिकारी एक न्यायालय हो।

(ख) यदि व्यक्ति, जिससे किसी निदेश, अध्यपेक्षा, प्रतिषेध, प्रतिबन्ध या शर्त के अनुपालन के लिए एक बन्धपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा की गयी हो, ऐसा न करे तो उसे कारागार को सुपुर्द कर दिया जाएगा या, यदि वह कारागार में ही हो तो उस कालावधि तक, जबतक वह निदेश, अध्यपेक्षा प्रतिषेध, प्रतिबन्ध या शर्त प्रवर्तन में रहे, अथवा तबतक कि वह यथास्थिति जामिनों के साथ या बिना आदेश के निबंधों के अनुसार बंधपत्र निष्पादित न कर दे कारागार में निरूद्ध रखा जाएगा और उक्त संहिता की धारा 119, 120, 121, 122, 123 और 124 के उपबन्ध, यथावश्यक परिवर्तन सहित, उसी प्रकार लागू होंगे मानो जिला दण्डाधिकारी या आयुक्त एक न्यायालय हों।

(ग) इस धारा के अधीन निष्पादित सभी बंधपत्रों के संबंध में उक्त संहिता की धारा 445, 447 और 448, यथावश्यक परिवर्तन सहित, उसी प्रकार लागू होंगी मानो जिला दण्डाधिकारी या आयुक्त एक न्यायालय हो। जिला दण्डाधिकारी या आयुक्त अपना यह समाधान करने के प्रयोजनार्थ कि धारा 3 या धारा 5 के अधीन आदेश करने या उसकी पुष्टि की आवश्यक स्थिति विद्यमान है या नहीं, ऐसे किसी भी साक्ष्य पर विचार कर सकेगा जिसे वह प्रमाणकारी महत्त्व को समझता हो और उस पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के उपबन्ध लागू नहीं होंगे।

-जिला दण्डाधिकारी या आयुक्त, किसी भी समय धारा 3 के अधीन किये गये आदेश को विखंडित कर सकेगा, चाहे वह आदेश धारा 6 के अधीन अपील में संपुष्ट किया गया हो या नहीं। राज्य सरकार धारा 3, 4, 5 और 6 के अधीन के आदेश को, किसी भी समय प्रतिसंहृत या उपांतरित कर सकेगी, परन्तु ऐसा प्रतिसंहरण या उपांतरण धारा 3 के अधीन उसी व्यक्ति के विरूद्ध किसी ऐसे मामले में जहाँ राज्य सरकार द्वारा आदेश के प्रतिसंहरण या उपांतरण के आदेश के बाद नये तथ्य उठ खड़े हुए हों, एक नया आदेश वर्जित नहीं करेगा। - (1) जहाँ अधिनियम की धारा 3, धारा 4, धारा 5 या 6 के किसी व्यक्तियों के विरूद्ध आदेश किये जाने के बाद, वह व्यक्ति-

(क) आदेश द्वारा निर्देशित रूप में जिले या उसके भाग अथवा राज्य के किसी भाग से नहीं हटे, अथवा

(ख) उस क्षेत्र में पुनः प्रवेश करे जिससे उसे आदेश के प्रवर्तन की कालावधि के दौरान हटने का आदेश दिया गया हो, वहाँ जिला दण्डाधिकारी उसे गिरफ्तार करवाकर पुलिस की अभिरक्षा में ऐसे र्शाों के अधीन जो आवश्यक हो, विनिर्दिष्ट क्षेत्र के बाहर उस स्थान पर हटाकर रख देगा जो स्थान उसके द्वारा निदेशित हो।

(2) कोई भी पुलिस अधिकारी उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी कार्य या लोप के युक्तियुक्त रूप से संदिग्ध किसी व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकेगी और इस प्रकार गिरफ्तार व्यक्ति को निकटतम कार्यपालक दण्डाधिकारी के पास तुरन्त अग्रसारित कर देगा और वह उसे जिला दण्डाधिकारी के पास अग्रसारित करवा देगा, जो उस व्यक्ति को हिरासत में निरूद्ध कर सकता है, जिसकी अवधि तीन महीने से अधिक की नहीं होगी। राज्य सरकार यदि- (1) आशंका के कारणों से संतुष्ट हो कि किसी असामाजिक तत्व को लोक व्यवस्था संधारण के विरूद्ध किसी प्रकार से कार्य करने से, बिना तुरन्त निरूद्ध किये रोका नहीं जा सकता है, तो ऐसे असामाजिक तत्त्व को निरूद्ध करने हेतु आदेश पारित कर सकेगी।

(2) यदि किसी जिला दण्डाधिकारी की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर किसी क्षेत्र में विद्यमान या संभावित परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए, राज्य सरकार का यह समाधान हो जाए कि ऐसा करना आवश्यक है तो वह एक लिखित आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि उस कालावधि के दौरान, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, वह जिला दण्डाधिकारी भी, यदि उपधारा (1) में उपबंधित रूप से उसका समाधान हो जाए तो, उक्त उपधारा द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग कर सकेगा। परन्तु इस उपधारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा किये गये आदेश में विनिर्दिष्ट कालावधि प्रथम बार छः महीने से अधिक की नहीं होगी किन्तु राज्य सरकार यदि उसका यथापूर्वोक्त रूप में यह समाधान हो जाए कि ऐसा करना आवश्यक है तो, ऐसे आदेश में इस प्रकार संशोधन कर सकेगी ताकि ऐसी कालावधि में समय-समय पर एक बार में अधिक-से-अधिक छः महीने तक का विस्तार किया जा सकेगा।6 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 (3) जब जिला दण्डाधिकारी द्वारा कोई आदेश किया जाए तो वह इस बात की रिपोर्ट राज्य सरकार को उन आधारों, जिसपर वह आदेश किया गया हो और उन विशिष्टियों के साथ तुरन्त देगा जो उसको राय में विषय से सम्बन्धित हों, और कोई भी आदेश उसके दिये जाने के बाद बारह दिनों से अधिक तबतक लागू नहीं रहेगा जबतक कि इसी बीच वह राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित न कर दिया जाए, परन्तु जहाँ आदेश देने वाला पदाधिकारी धारा 19 के अधीन निरूद्ध करने के आधारों को, निरूद्ध करने की तारीख से पाँच दिन बाद किन्तु दस दिन बाद नहीं, संसूचित करे वहाँ यह उपधारा इस उपांतरण के अधीन रहते हुए लागू होगी कि बारह दिनों के स्थान में पन्द्रह दिनों शब्द रहेंगे। जहां किसी व्यक्ति को हिरासत के आदेश के अनुसरण में हिरासत में लिया गया है, चाहे वह बिहार अपराध नियंत्रण विधेयक, 2024 की धारा 12 के तहत शुरू होने से पहले या बाद में किया गया हो, जो दो या दो से अधिक आधारों पर किया गया हो, हिरासत का ऐसा आदेश ऐसे प्रत्येक आधार पर अलग से बनाया गया माना जाएगा और तदनुसार -

(क) ऐसे आदेश को केवल इसलिए अमान्य या निष्क्रिय नहीं माना जाएगा क्योंकि इनमें से एक या कुछ आधार निम्नलिखित है या हैं - (i) अस्पष्ट (ii) अस्तित्वहीन (iii) अप्रासंगिक (iv) ऐसे व्यक्ति से जुड़ा नहीं है या निकटतम रूप से जुड़ा नहीं है या (v) किसी भी अन्य कारण से अमान्य। और इसलिए यह मानना संभव नहीं है कि ऐसा आदेश देने वाली सरकार या अधिकारी शेष आधार या आधार के संदर्भ में धारा 12 में दिए गए प्रावधान से संतुष्ट होंगे और हिरासत का आदेश दिया होगा।

(ख) हिरासत का आदेश देने वाली सरकार या अधिकारी को शेष आधार या आधार के संदर्भ में उस धारा में दिए गए प्रावधानों से संतुष्ट होने के बाद उक्त धारा के तहत हिरासत का आदेश दिया गया माना जाएगा। - निरूद्ध करने के आदेश का निष्पादन भारत में किसी स्थान पर दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन गिरफ्तारी के वारंट के लिए उपबंधित रीति से किया जायेगा।

-ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जिसके सम्बन्ध में निरूद्ध करने का आदेश दिया जाए, निम्नलिखित का दायी होगा-

(क) उस स्थान में अनुशासन बनाये रखने और अनुशासन भंग के लिए दंड संबंधी शर्त्तों सहित उन शर्त्तों के अधीन, जो राज्य सरकार सामान्य या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, निरूद्ध किये जाने का और

(ख) राज्य सरकार के आदेश से निरूद्ध किए गए व्यक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटाये जाने का।

-कोई निरूद्ध आदेश केवल निम्नलिखित कारणों से अविधिमान्य या अप्रवर्तनीय नहीं होगा-

(क) उसके अधीन निरूद्ध किया जानेवाला व्यक्ति राज्य सरकार या आदेश करने वाले अधिकारी की क्षेत्रीय अधिकारिता की सीमा के बाहर है, या

(ख) उस व्यक्ति के निरूद्ध करने का स्थान उक्त सीमा के बाहर है। (1) यदि राज्य सरकार या धारा 12 की उपधारा (2) में उल्लिखित जिला दण्डाधिकारी को यह विश्वास करने का कारण हो कि वह व्यक्ति, जिसके सम्बन्ध में निरूद्ध करने का आदेश दिया गया है, फरार हो गया है या छिपा हुआ है, ताकि वह आदेश निष्पादित न किया जा सके तो सरकार या जिला दण्डाधिकारी-

(क) जिस स्थान पर वह व्यक्ति सामान्यतः निवास करता है उस स्थान के मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी या उस स्थान में अधिकारिता रखनेवाले प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्टे्रट को लिखित रूप में तथ्यों की रिपोर्ट कर सकेगा;

(ख) आधिकारिक वेबसाईट पर आदेश अधिसूचित करते हुए उक्त व्यक्ति को ऐसे अधिकारी, ऐसे स्थान पर और ऐसी कालावधि के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किये जाए, उपस्थिति होने का निदेश दे सकेगा।

(2) उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन किसी व्यक्ति के विरूद्ध रिपोर्ट की जाने पर दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 82, 83, 84 और 85 के उपबंध उस व्यक्ति और उसकी7 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 सम्पत्ति, पर लागू होंगे मानो उसके विरूद्ध किया गया वह निरूद्ध करने का आदेश दण्डाधिकारी द्वारा निर्गत किया गया एक वारंट हो।

(3) यदि ऐसा व्यक्ति उप-धारा (1) के खंड (ख) के तहत जारी किए गए आदेश का अनुपालन करने में विफल रहता है, तो वह ऐसे आदेश का पालन करेगा, जब तक कि वह यह साबित नहीं कर देता कि उसके लिए इसका अनुपालन करना संभव नहीं था, और उसने ऐसा किया था। आदेश में निर्दिष्ट अवधि, आदेश में उल्लिखित अधिकारी को उन कारणों के बारे में सूचित करें जिनके कारण उसका अनुपालन असंभव हो गया और उसके ठिकाने के बारे में, या यह साबित कर दे कि आदेश में उल्लिखित अधिकारी को सूचित करना उसके लिए संभव नहीं था, वह दोषी पाए जाने पर, एक वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकेगा।

(4) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (3) के अधीन प्रत्येक अपराध संज्ञेय होगा। (1) राज्य सरकार अथवा जिला दण्डाधिकारी सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, किसी भी पुलिस अधिकारी को, जो पुलिस निरीक्षक से नीचे की पंक्ति का न हो, किसी भी स्थान की तलाशी लेने, किसी जहाज, वाहन या जानवर को रोकने और उसकी तलाशी लेने का अधिकार दे सकती है, और ऐसा पुलिस अधिकारी किसी भी वस्तु को जप्त कर सकता है, यदि उसे यह विश्वास करने का कारण है कि किसी भी गतिविधि के लिए उन वस्तुओं का उपयोग किया गया है, या किया जा रहा है, या किया जाने वाला है, जो किसी भी तरह से लोक व्यवस्था के संधारण के लिए प्रतिकूल हो सकता है।

(2) इस प्रकार शक्तिप्राप्त कोई भी पुलिस अधिकारी, अपने द्वारा की गई प्रत्येक जप्ती से संबंधित प्रतिवेदन तुरंत जिला दण्डाधिकारी को भेजेगा, और उनके आदेश प्राप्त होने तक, इस प्रकार जप्त की गई किसी भी वस्तु को अभिरक्षा में रख सकता है या उसकी सुरक्षित अभिरक्षा के लिए ऐसे अन्य कदम उठा सकता है, जैसा वह उचित समझता है।

(3) जिला दण्डाधिकारी उपधारा (1) के तहत जप्त की गई किसी भी ऐसी संपाि को विनष्ट करने, जप्त करने या ऐसे अन्य तरीके से निपटाव के लिए ऐसा आदेष जारी करेंगे, जैसा वे उचित समझें, और ऐसा आदेष विषय इस अधिनियम के तहत गठित सलाहकार बोर्ड द्वारा पुष्टि के अधीन होगा। (1) जब निरूद्ध करने के आदेश का अनुपालन में कोई व्यक्ति निरूद्ध किया जाए तो आदेश करनेवाला प्राधिकारी, यथाशीघ्र, किन्तु साधारणतः पाँच दिनों के बाद नहीं और आपवादिक परिस्थितियों में और अभिलिखित किये जानेवाले कारणों से निरूद्ध करने की तारीख से दस दिनों बाद नहीं, उन आधारों को उसे संसूचित कर देगा, जिसपर वह आदेश किया गया हो और उस आदेश के विरूद्ध राज्य सरकार के पास अभ्यावेदन देने का सर्वप्रथम अवसर प्रदान करेगा।

(2) उपधारा (1) की किसी बात से प्राधिकारी से उन तथ्यों को प्रकट को अपेक्षा नहीं की जाएगी जिन्हें प्रकट करना वह लोकहित के विरूद्ध समझता हो। (1) राज्य सरकार, जब कभी आवश्यक हो, इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ सलाहकार बोर्ड का गठन करेगी।

(2) बोर्ड में तीन ऐसे व्यक्ति होंगे जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हों या जिन्हें उस रूप में नियुक्त होने की अर्हता प्राप्त हो और वे व्यक्ति राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किये जाएँगे।

(3) राज्य सरकार सलाहकार बोर्ड के सदस्यों में से एक को, जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हों या रह चुके हों, अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेगी। इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित को छोड़कर, ऐसे प्रत्येक मामले में जहाँ इस अधिनियम के अधीन निरूद्ध करने का आदेश किया गया हो, राज्य सरकार, आदेश के अधीन किसी व्यक्ति के निरूद्ध करने की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर, धारा 18 के अधीन अपने द्वारा गठित सलाहकार बोर्ड के समक्ष उन आधारों को, जिनपर आदेश किया गया हो और आदेश से प्रभावित व्यक्ति द्वारा दिये गये अभ्यावेदन, यदि कोई हो, को और धारा 12 की उपधारा (2) में उल्लिखित जिला दण्डाधिकारी द्वारा किये गये आदेश की दशा में, उस धारा की उपधारा (3) के अधीन उस अधिकारी की रिपोर्ट को भी रखेगी। (1) सलाहकार बोर्ड, अपने समक्ष रखी गयी सामग्रियों पर विचार करने के बाद और सरकार से या सरकार द्वारा इस प्रयोजनार्थ बुलाये गये किसी व्यक्ति से या संबंधित व्यक्ति से या संबंधित व्यक्ति से, ऐसी और जानकारी माँगने के बाद, जिसे वह आवश्यक समझे, और यदि किसी विशिष्ट मामले में, यह ऐसा करना आवश्यक समझे या यदि संबंधित व्यक्ति सुने जाने का इच्छुक हो तो उसकी व्यक्तिगत सुनवाई करने के बाद संबंधित व्यक्ति के निरूद्ध करने की तारीख से सात सप्ताह के भीतर राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट दे देगा।8 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 (2) सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट के एक पृथक भाग के सलाहकार बोर्ड की यह राय विनिर्दिष्ट रहेगी कि संबंधित व्यक्ति के निरूद्ध करने का पर्याप्त कारण है या नहीं।

(3) यदि सलाहकार बोर्ड गठित करनेवाले सदस्यों के बीच मतभिन्नता हो वहाँ सदस्यों के बहुमत की राय को ही बोर्ड की राय समझी जाएगी।

(4) इस धारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके विरूद्ध निरूद्ध करने का आदेश किया गया हो सलाहकार बोर्ड को निर्देश से संबंधित किसी विषय में किसी विधि व्यवसायी द्वारा उपस्थित होने का हकदार नहीं बनाएगी और सलाहकार बोर्ड की कार्यवाही और उसकी रिपोर्ट, उसके उस भाग को छोड़कर जिसमें सलाहकार बोर्ड की राय विनिर्दिष्ट हो, गोपनीय होगी। - (1) ऐसे किसी भी मामले में जहाँ सलाहकार बोर्ड ने यह रिपोर्ट दी हो कि उसकी राय में किसी व्यक्ति के निरूद्ध करने का पर्याप्त कारण है, सरकार निरूद्ध करने के आदेश को संपुष्ट कर सकेगी और सम्बन्धित व्यक्ति का निरूद्ध करने का उस कालावधि तक जारी रख सकेगी जिसे वह उचित समझे।

(2) ऐसे किसी भी मामले में जहाँ सलाहकार बोर्ड ने यह रिपोर्ट दी हो कि उसकी राय में किसी व्यक्ति को निरूद्ध करने का पर्याप्त कारण नहीं है, सरकार निरूद्ध करने के आदेश को विखण्डित कर देगी, और सम्बन्धित व्यक्ति को तुरंत मुक्त करायगी। -वह अधिकतम कालावधि, जिसके लिए किसी व्यक्ति को किसी ऐसे निरूद्ध करने के आदेश के अनुसरण में, जो धारा 23 के अधीन संपुष्ट कर दिया गया हो, निरूद्ध किया जा सकता है निरूद्ध करने की तारीख से बारह महीने की होगी, परन्तु इस धारा में अन्तर्विष्ट किसी बात से सरकार की निरूद्ध करने के आदेश को कम समय में प्रतिसंहरण या उपांतरित करने की शक्ति पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। (1) साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का10) की धारा 23 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किसी निरूद्ध करने के आदेश को किसी भी समय इस बात के होते हुए भी प्रतिसंहित या उपांतरित किया जा सकेगा कि आदेश धारा 12 की उपधारा (2) में उल्लिखित पदाधिकारी या राज्य सरकार, द्वारा, जिसका वह पदाधिकारी अधीनस्थ है, किया गया है।

(2) किसी निरूद्ध करने के आदेश का प्रतिसंहरण या समाप्ति धारा 12 के अधीन उसी व्यक्ति के विरूद्ध किसी ऐसे मामले में नया निरूद्ध करने का आदेश वर्जित नहीं करेगी जहाँ प्रतिसंहरण या समाप्ति की तारीख के बाद ऐसे तथ्य उत्पन्न हो गये हैं। जिनके आधार पर, यथास्थिति राज्य सरकार या धारा 12 की उपधारा (2) में उल्लिखित अधिकारी का यह समाधान हो कि ऐसा आदेश किया जाना चाहिए। (1) राज्य सरकार किसी भी समय, यह निदेशित कर सकेगी कि निरूद्ध करने के आदेश के अनुपालन में निरूद्ध किसी व्यक्ति को किसी विनिर्दिष्ट कालावधि के लिए बिना शर्त या निदेश में विनिर्दिष्ट उन शर्त्तों पर जिन्हें वह स्वीकार करे, मुक्त कर दिया जाए और किसी भी समय उसकी मुक्ति को रद्द कर सकेगी।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति की मुक्ति का निदेश देते समय सरकार उससे निदेश में विनिर्दिष्ट शर्त्तों के सम्यक्‌ अनुपालन के लिए प्रतिभुओं के साथ या बिना, एक बंधपत्र की अपेक्षा कर सकेगी।

(3) उपधारा (1) के अधीन छोड़ा गया व्यक्ति अपने को ऐसे समय और स्थान पर, और ऐसे प्राधिकारी के पास प्रस्तुत करेगा, जो यथास्थिति उसको मुक्ति या मुक्ति रद्द करना निर्देशित करनेवाले आदेश में विनिर्दिष्ट हो।

(4) यदि कोई व्यक्ति बिना पर्याप्त कारण के उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट रीति से अपने को प्रस्तुत नहीं करे तो वह दो वर्षों तक के कारावास से या जुर्माना से या दोनों से दण्डनीय होगा।

(5) यदि उपधारा (1) के अधीन मुक्त व्यक्ति उक्त उपधारा के अधीन या उसके द्वारा निष्पादित बंधपत्र में अधिरोपित र्शाों में से किसी की पूर्ति नहीं करे तो वह बंधपत्र समपहृत घोषित कर दिया जाएगा और आबद्ध व्यक्ति उसकी शास्ति के भुगतान का दायी होगा। कोई भी दण्डाधिकारी इस अधिनियम के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान निम्नलिखित के सिवाय नहीं लेगा-

(क) पुलिस उपाधीक्षक से अन्यून पंक्ति के पुलिस अधिकारी द्वारा ऐसा अपराध गठित करनेवाले तथ्यों को रिपोर्ट पर, अथवा

(ख) पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति या किसी राजपत्रित अधिकारी से प्राप्त इस सूचना पर कि ऐसा अपराध किया गया है।

-इस अधिनियम द्वारा या के अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में किये गये किसी आदेश पर किसी न्यायालय में आपत्ति नहीं की जाएगी।9 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 (1) इस अधिनियम या इसके अधीन किये गये किसी आदेश के अनुसरण में सद्‌भावपूर्वक किये गये या किये जाने के लिए आशयित किसी भी कार्य के लिए किसी व्यक्ति के विरूद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी।

(2) इस अधिनियम या इनके अधीन दिये गये किसी आदेश के अनुसरण में सद्‌भावपूर्वक किये गये या किये जाने के लिए आशयित किसी कार्य से हुए या होने के लिए सम्भावित किसी नुकसान के लिए राज्य सरकार या उसके किसी पदाधिकारी के विरूद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी। (1) राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के कार्यान्वयन के लिए इस अधिनियम के उपबन्धों से सुसंगत नियम बना सकेगी।

(2) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाये जाने के बाद यथाशीघ्र राज्य विधान-मंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में ही तीस दिनों की कुल कालावधि के लिए, जो एक ही सत्र में हो या दो क्रमवर्ती सत्रों में, रखा जाएगा और यदि उस मात्र की जिसमें वह इस प्रकार रखा जाए या तुरत बाद वाले सत्र की समाप्ति के पूर्व दोनों सदन नियम में कोई उपरांतरण करने पर सहमत हों, या इस बात पर सहमत हों कि नियम बनाया ही नहीं जाए तो तदुपरांत नियम का, यथास्थिति, केवल उस उपांतरित रूप में प्रभाव होगा अथवा वह निष्प्रभावी हो जाएगा, किन्तु इस प्रकार कि वह उपांतरण या बातिलीकरण उस नियम के अधीन पूर्व में किये गये किसी कार्य की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा। इस अधिनियम के किसी भी प्रावधान की व्याख्या में किसी भी अस्पष्टता के मामले में, अधिनियम का अंग्रेजी संस्करण आधिकारिक पाठ माना जाएगा। (1) बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1981 (बिहार का अधिनियम संख्या, 7, 1981 का अधिनियम सं० 7) इसके द्वारा निरसित किया जाता है।

(2) इस निरसन के होने पर भी, उक्त अधिनियम द्वारा या के अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में किया गया कोई कार्य या की गयी कोई कार्रवाई इस अधिनियम द्वारा या के अधीन प्रदत्त शक्ति के प्रयोग में उसी प्रकार किया गया या की गयी समझी जाएगी मानो वह अधिनियम उस तारीख का, जिस तारीख को वह कार्य किया गया था वह कार्रवाई की गयी थी, लागू था।10 (cid:464)बहार गजट (असाधारण), 1 माच(cid:91), 2024 राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का शहरीकरण, आर्थिक गतिविधियों का व्यापक विस्तार, विज्ञान एवं तकनीकी के साधनों का विकास, साईबर सुविधाओं तथा डिजिटल साधनों पर नागरिकों की निर्भरता में वृद्धि आदि के परिणामस्वरूप अपराधियों द्वारा अपराध करने की शैली एवं अपराधों की प्रकृति में काफी परिवर्तन एवं विस्तार हुआ है, जिसका सीधा प्रभाव लोक व्यवस्था के संधारण पर पड़ता है। अपराध की नित्य बदलती शैली, क्षेत्र एवं प्रकृति के कारण लोक व्यवस्था के संधारण हेतु अपराध में संलिप्त ऐसे असामाजिक तत्वों पर प्रभावी नियंत्रण एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। वर्तमान में परिचालित बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1981 अधिनियम (बिहार अधिनियम, 7, 1981) में असमाजिक तत्वों पर नियंत्रण हेतु वर्तमान परिदृष्य के अनुसार कई विधिक प्रावधानों का वर्णन नहीं है। अतः बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1981 अधिनियम (बिहार अधिनियम, 7, 1981) को निरसित करते हुए बिहार अपराध नियंत्रण विधेयक, 2024 को अधिनियमित करने की आवश्यकता है। यही इस विधेयक का उद्‌देश्य है और इसे अधिनियमित करना ही इस विधेयक का अभीष्ट है।

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अधी(cid:162)क, सिचवालय मु(cid:289)णालय,

(cid:464)बहार, पटना (cid:430)ारा (cid:292)कािशत एवं मु(cid:464)(cid:289)त ।

(cid:464)बहार गजट (असाधारण) 180-571+10-डी0ट(cid:547)0पी0 ।

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Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 01 March 2024. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2024-03-01.180/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2024-03-01.180.