क्रम-सं0-105
रजिस्ट्रेशन नं0-एस0एस0पी0/एल0 डब्लू/एन0पी0-91/2014-16 लाइसेन्स टू पोस्ट ऐट कन्सेशनल रेट
लखनऊ, सोमवार, दिनांक 13 जुलाई, 2020
22 आषाढ़, शक सम्वत् 1942
विधान सभा सचिवालय उत्तर प्रदेश (संसदीय अनुभाग) ------ संख्याः 532/वि0स0/संसदीय/141(सं)/2019 दिनांकः 13 जुलाई, 2020 ------ अधिसूचना ----- प्रकीर्ण
श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' नेता, कांग्रेस विधान मण्डल दल, उत्तर प्रदेश, लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-7 के अन्तर्गत मा0 अध्यक्ष, विधान सभा के विचारार्थ सुश्री अदिति सिंह, सदस्य, उत्तर प्रदेश विधान सभा के विरुद्ध दिनांक 26 नवम्बर, 2019 को दायर की गई याचिका पर मा0 अध्यक्ष, विधान सभा द्वारा दिनांक 13 जुलाई, 2020 को किया गया विनिश्चय एतद्द्वारा सर्वसाधारण की सूचनार्थ अधिसूचित किया जाता है :-
अध्यक्ष, विधान सभा, उत्तर प्रदेश
श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना', नेता, उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधान मण्डल दल द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस की ओर से सुश्री अदिति सिंह, सदस्य, विधान सभा, रायबरेली सदर विधान सभा2 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 क्षेत्र के विरुद्ध उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के अन्तर्गत प्रस्तुत की गई याचिका पर
निर्णय
''भारत का संविधान'' की दसवीं अनुसूची, सपठित उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के सुसंगत प्रावधानों के अन्तर्गत श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना', नेता, उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधान मण्डल दल द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से दिनांक 26 नवम्बर, 2019 को सुश्री अदिति सिंह, सदस्य, उत्तर प्रदेश विधान सभा के विरुद्ध प्रश्नगत याचिका प्रस्तुत की गई है।
2-याचिका में वर्णित तथ्यों एवं अभिकथनों के अनुसार यह याचिका उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-7, सपठित संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रस्तर-2(1)(ए) एवं अनुच्छेद-191(2) के अन्तर्गत सुश्री अदिति सिंह को विधान सभा के सदस्य के रूप में निरर्ह घोषित किए जाने हेतु प्रस्तुत की गई है।
3-यह याचिका श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा हस्ताक्षरित है। उन्होंने याचिका में अपने को याची बताते हुए यह कहा है कि वह उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्य एवं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधान मण्डल दल की नेता हैं। यह कि सुश्री अदिति सिंह को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य के रूप में वर्ष 2017 के उत्तर प्रदेश विधान सभा के निर्वाचन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वैधानिक प्रत्याशी के रूप में घोषित किया गया था। यह कि विपक्षी उक्त निर्वाचन में निर्वाचित हुईं। याचिका के साथ साक्ष्य के रूप में सुश्री अदिति सिंह के नाम-निर्देशन पत्र की छायाप्रति तथा ''फॉर्म-ए'' एवं ''फॉर्म-बी'' की छायाप्रतियां प्रस्तुत की गई हैं। यह अविवादित है कि विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर रायबरेली सदर विधान सभा क्षेत्र से वर्ष 2017 के निर्वाचन में निर्वाचित हुई थीं।
4-याचिका में यह कहा गया है कि कांग्रेस विधान मण्डल दल के तत्कालीन नेता श्री अजय कुमार 'लल्लू' द्वारा दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 को आहूत विशेष सत्र का बहिष्कार करने हेतु 'व्हिप' जारी किया गया था। यह 'व्हिप' इस निर्देश के साथ जारी किया गया था कि विधान मण्डल कांग्रेस दल विशेष सत्र का बहिष्कार करेगा तथा किसी भी प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेगा और किसी के पक्ष में मतदान नहीं करेगा और न ही सत्र की कार्यवाही में भाग लेगा।
5-याचिका में यह भी कहा गया है कि सुश्री अदिति सिंह को मौखिक रूप से भी उपर्युक्त वर्णित 'व्हिप' के विषय में सूचना दे दी गई थी और लिखित रूप में भी बताया गया था। याचिका के अनुसार कांग्रेस विधान मण्डल दल के सभी माननीय सदस्य उक्त सत्र में भाग न लें, इसी आशय से उपर्युक्त वर्णित 'व्हिप' जारी किया गया था, परन्तु विपक्षी सुश्री अदिति सिंह द्वारा कथित 'व्हिप' का उल्लंघन किया गया और वह सदन में उपस्थित हुईं। याचिका के अनुसार सुश्री अदिति सिंह ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा जारी 'व्हिप' के विरुद्ध माननीय संसदीय कार्य मंत्री/सत्तापक्ष द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव का समर्थन किया। अपने वक्तव्य में विपक्षी ने सरकार की नीतियों की प्रशंसा करते हुए माननीय मुख्य मंत्री जी के कार्यों की सराहना भी की और कांग्रेस पार्टी की नीतियों केउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 3 विरुद्ध वक्तव्य दिया। इस संबंध में याचिका में सदन की कार्यवाही के अंश साक्ष्य के रूप में संलग्न किए गए हैं।
6-याचिका में यह विशेष रूप से कहा गया है कि विपक्षी सदन में उपस्थित हुईं तथा उन्होंने सदन में प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव पर चर्चा में भाग लिया तथा प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित भी कराया।
7-याचिका में यह बल देकर कहा गया है कि विपक्षी सुश्री अदिति सिंह ने कांग्रेस पार्टी की नीतियों का उल्लंघन करते हुए सत्तापक्ष द्वारा सदन में प्रस्तुत प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया, जबकि पार्टी द्वारा सत्र का बहिष्कार करने और कांग्रेस के किसी भी सदस्य को सदन में उपस्थित न होने का 'व्हिप' जारी किया गया था।
8-यह कि कांग्रेस विधान मण्डल दल के तत्कालीन नेता श्री अजय कुमार 'लल्लू' द्वारा दिनांक 04 नवम्बर, 2019 को सुश्री अदिति सिंह को नोटिस जारी किया गया, परन्तु नोटिस की उपेक्षा करते हुए उन्होंने अपना कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया। विपक्षी ने उक्त नोटिस के अनुस्मारक दिनांक 11 नवम्बर, 2019 का भी कोई उत्तर नहीं दिया। याचिका के अनुसार विपक्षी लगातार मीडिया व प्रेस के माध्यम से पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहते हुए पार्टी के नियमों और नीतियों की उपेक्षा करती रहीं।
9-उपरोक्त वर्णित तथ्यों एवं परिस्थितियों के दृष्टिगत याचिका में यह अभिकथन किया गया है कि प्र्रस्तुत प्रकरण में भारत का संविधान की दसवीं अनुसूची के उपबन्ध आकर्षित होते हैं, अतः विपक्षी ने स्वेच्छा से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जो कि उनका मूल राजनीतिक दल था, की सदस्यता का त्याग कर दिया है। याचिका के अनुसार विपक्षी दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 से भारत का संविधान की दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्यता से निरर्हित किए जाने योग्य है। याचिका में यह प्रार्थना की गई है कि संविधान की दसवीं अनुसूची सपठित अनुच्छेद-191(2) के अन्तर्गत विधान सभा की सदस्यता से विपक्षी सुश्री अदिति सिंह को दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 से निरर्हित घोषित करते हुए उन्हें उसी तिथि से सदस्य के रूप में अनुमन्य लाभ एवं सुविधाओं से भी निरर्हित घोषित किया जाए।
10-श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा याचिका में वर्णित तथ्यों को सत्यापित करने हेतु एक शपथ-पत्र दाखिल किया गया है।
11-श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना', नेता, कांग्रेस विधान मण्डल दल द्वारा दिनांक 28 फरवरी, 2020 को एक प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया गया। इस प्रार्थना-पत्र में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कीशाम मेघचन्द्र सिंह प्रति माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा एवं अन्य में दिनांक 21-01-2020 को पारित निर्णय का सन्दर्भ देते हुए यह कहा गया है कि उपर्युक्त निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत की गई याचिका को अधिकतम तीन (03) माह के भीतर निर्णीत करने के निर्देश दिए गए हैं। चूंकि प्रश्नगत याचिका को लम्बित रहते हुए तीन (03) माह से अधिक का समय व्यतीत हो चुका है, अतः याचिका के विषय में शीघ्र निर्णय होना चाहिए। इस प्रार्थना-पत्र में यह भी कहा गया है कि चूंकि विपक्षी द्वारा कोई उत्तर4 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 प्रस्तुत नहीं किया गया है, अतः याचिका के सभी तथ्यों को स्वीकार्य मानते हुए याचिका का निस्तारण किया जाना अपेक्षित है।
12-विपक्षी सुश्री अदिति सिंह की ओर से दिनांक 02-06-2020 को अपनी टिप्पणी/उत्तर याचिका के सापेक्ष प्रस्तुत किया गया। विपक्षी द्वारा यह कहा गया है कि चूंकि दिनांक 21-11-2019 को उसका विवाह सम्पन्न हुआ था, अतः वह उस समय व्यस्त रहीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने यह भी कहा है कि अपने विधान सभा क्षेत्र में भी उनको समय देना पड़ता था, जिसके कारण वह प्रस्तुत याचिका के संबंध में उनको प्रेषित किए गए नोटिस दिनांक 01-01-2020 का उत्तर/टिप्पणी समय से प्रेषित नहीं कर सकीं।
13-विपक्षी द्वारा प्रारम्भिक रूप से यह आपत्ति प्रस्तुत की गई है कि यह याचिका संविधान की दसवीं अनुसूची के खण्ड-2 (1) (क) के अन्तर्गत योजित की गई है न कि खण्ड-2 (1) (ख) के अन्तर्गत। विपक्षी के अनुसार खण्ड-2 (1) (क) मात्र उन्हीं प्रकरणों में आकर्षित होगा जहां स्वेच्छा से किसी सदस्य ने अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ दी हो। विपक्षी के अनुसार उसने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कोई आचरण नहीं किया है जिससे यह अभिप्रीत हो कि उसने अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी है। विपक्षी ने इस पर बल दिया है कि चूंकि किसी प्रकरण के विषय में सदन में मतदान करने का मामला संविधान की दसवीं अनुसूची के खण्ड-2 (1) (ख) के अन्तर्गत आता है एवं चूंकि प्रस्तुत याचिका खण्ड-2 (1) (क) के अन्तर्गत प्रस्तुत की गई है, अतः याचिका प्रथम दृष्टया पोषणीय नहीं है एवं निरस्त होने योग्य है।
14-विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-4 के अनुसार याचीकर्ता को याचिका योजित करने से पहले 30 दिन के अन्दर माननीय अध्यक्ष महोदय के समक्ष प्रपत्र-2 प्रस्तुत करना अनिवार्य था, जो कि याची द्वारा नहीं किया गया है। इस आधार पर भी याचिका निरस्त होने योग्य है। 15-विपक्षी की ओर से यह भी अभिकथित किया गया है कि प्रस्तुत याचिका इस आधार पर योजित की गई है कि दिनांक 02-10-2019 का पत्र एक 'व्हिप' है एवं विपक्षी द्वारा इस पत्र के निर्देशों के विपरीत विधान सभा की कार्यवाही में भाग लेना व्हिप का उल्लंघन है। विपक्षी के अनुसार पत्र दिनांक 02-10-2019 व्हिप की श्रेणी में नहीं आता है। यदि यह मान भी लिया जाए कि दिनांक 02-10-2019 को प्रेषित किया गया पत्र व्हिप की श्रेणी में आता है तब भी चूंकि इस पत्र में मतदान करने अथवा न करने के विषय में कोई निर्देश नहीं है, अतः इस पत्र में वर्णित निर्देशों के उल्लंघन से संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधान आकर्षित नहीं होते हैं।
16-विपक्षी के अनुसार चूंकि प्रस्तुत याचिका संविधान की दसवीं अनुसूची के खण्ड-2 (1) (ख) के अन्तर्गत योजित नहीं की गई है, अतः कथित व्हिप के उल्लंघन का मामला प्रथम दृष्टया इस प्रकरण में नहीं बनता है।
17-विपक्षी ने यह भी कहा है कि कथित व्हिप दिनांक 02-10-2019 लिखित अथवा मौखिक रूप से उसको प्राप्त भी नहीं हुआ था, अतः इसके उल्लंघन का कोई प्रश्न नहीं उठता।उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 5 18-विपक्षी ने यह कहा है कि वह एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि है। दिनांक 02-10-2019 को एक विधायक होने के नाते राष्ट्रपिता की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आहूत विशेष सत्र में भाग लेना विपक्षी के लिए भारतीय होने के नाते भी जिम्मेदारी का विषय था। विपक्षी के अनुसार विशेष सत्र की घोषणा के उपरान्त कांग्रेस विधायकों की एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई थी जिसमें सभी विधायकों को इस विशेष सत्र में भाग लेने को कहा गया था। विपक्षी को इस विशेष सत्र में सम्मिलित न होने के विषय में कोई भी पत्र प्राप्त नहीं हुआ था।
19-विपक्षी के अनुसार विधान सभा के विशेष सत्र में भाग लेकर विपक्षी ने अपने नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन किया है। भारत का संविधान के अनुच्छेद-51 ए और बी के अनुसार हर भारतीय की यह जिम्मेदारी है कि वह संविधान और उसके आदर्शाें का पालन करे एवं स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों का अनुपालन करे। अतः जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर प्रमुख रूप से विधान सभा का विशेष सत्र आहूत किया गया तो विपक्षी ने न केवल विधायक के रूप में बल्कि एक भारतीय होने के नाते भी इसमें भाग लिया।
20-विपक्षी ने कहा है कि विशेष सत्र में उन्होंने जो वक्तव्य दिए, वे सम्पूर्णतया पढ़े जाने चाहिए। इसमें संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास के लक्ष्यों पर विपक्षी द्वारा उद्बोधन किया गया था। विपक्षी के वक्तव्य को विशेष सत्र के प्रयोजन को दृष्टिगत रखते हुए ही पढ़ा जाना चाहिए। विपक्षी के वक्तव्य का अन्य कोई राजनीतिक अर्थ निकाला जाना उपयुक्त नहीं है।
21-विपक्षी द्वारा पुनः इस पर बल दिया गया है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत सदन में मतदान के विषय में ही जारी किया गया व्हिप सुसंगत होगा। ऐसा कोई भी निर्देश जो सदन में बहिष्कार करने अथवा सदन में अनुपस्थित रहने के विषय में है, दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत परिकल्पित व्हिप की श्रेणी में नहीं आता है। विपक्षी ने यह भी कहा है कि प्रस्तुत याचिका उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-2 (एफ) के अनुसार विधान मण्डल दल के नेता की क्षमता से योजित नहीं की गई है। अतः याचिका के योजन में प्रक्रियात्मक दोष है। विपक्षी द्वारा याचिका में वर्णित अन्य विभिन्न अभिकथनों का खण्डन करते हुए यह कहा गया है कि उसने किसी भी ऐसे व्हिप का उल्लंघन नहीं किया जिससे दसवीं अनुसूची के प्रावधान आकर्षित होते हों। विपक्षी के अनुसार उसने ऐसा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कोई आचरण भी नहीं किया है जिससे यह प्रदर्शित हो कि उसने अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी हो। विपक्षी ने इस पर बल दिया है कि प्रश्नगत याचिका निरस्त होने योग्य है।
22-याची की ओर से श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा विपक्षी द्वारा दिए गए उत्तर/टिप्पणी के सापेक्ष अपना प्रति उत्तर भी दिनांक 17-06-2020 को एक शपथ-पत्र के माध्यम से प्रस्तुत किया है। याची की ओर से विपक्षी के उत्तर में वर्णित सभी तथ्यों का खण्डन करते हुए पुनः यह कहा गया है कि विपक्षी द्वारा अपना उत्तर/टिप्पणी अत्यन्त विलम्ब से प्रस्तुत किया गया है। याची की ओर से इस पर बल दिया गया है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन6 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के सुसंगत नियमों के अन्तर्गत नोटिस प्राप्त होने के 07 दिन के अन्दर अनिवार्य रूप से अपना उत्तर/टिप्पणी प्रस्तुत करना चाहिए था। विपक्षी को नोटिस दिनांक 01-01-2020 के प्रथम सप्ताह में प्राप्त हो गई परन्तु इसके पश्चात् भी उनकी टिप्पणी दिनांक 02-06-2020 को अत्यन्त विलम्ब से प्रस्तुत की गई। याची ने यह कहा है कि चूंकि टिप्पणी अत्यन्त विलम्ब से प्रस्तुत की गई है, अतः उसका संज्ञान नहीं लिया जाना चाहिए। 23-याची की ओर से अपने प्रति उत्तर में यह भी कहा गया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कीशाम मेघचन्द्र सिंह प्रति माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा में दिनांक 21-01-2020 को पारित निर्णय दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत विहित प्राधिकरण एवं प्रमुख सचिव, उत्तर प्रदेश विधान सभा के संज्ञान में दिनांक 28-02-2020 को ला दिया गया था, परन्तु इसके पश्चात् भी दिनांक 27-05-2020 को पुनः विपक्षी को अपनी टिप्पणी/उत्तर प्राप्त करने हेतु दो सप्ताह का समय प्रदान किया गया जो कि सुसंगत नियमों एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय के मंतव्यों के विपरीत है। याची की ओर से इस पर बल दिया गया कि विपक्षी की टिप्पणी अभिलेखों पर नहीं ली जानी चाहिए।
24-याची की ओर से भारत का संविधान के अनुच्छेद-191 (ई) सपठित खण्ड-2 (1) (ए) दसवीं अनुसूची को उद्धृत किया गया है। याची ने दसवीं अनुसूची के विषय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा के0 होलोहान, रवि एस0 नाईक एवं जी0 विश्वनाथन के प्रकरणों में पारित निर्णयों का उल्लेख करते हुए इस पर बल दिया गया है कि कोई भी सदस्य प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भी अपने आचरण के माध्यम से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ सकता है। 25-अपने प्रति उत्तर में याची की ओर से यह भी कहा गया है कि दिनांक 02-10-2019 को आहूत उत्तर प्रदेश विधान सभा के विशेष सत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्यों को सदन का बहिष्कार करने हेतु व्हिप जारी किया गया था। परन्तु विपक्षी द्वारा उक्त विशेष सत्र में भाग लिया गया एवं भारतीय जनता पार्टी की सरकार की नीतियों की प्रशंसा की गई। याची के अनुसार विपक्षी ने उसको कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता द्वारा प्रेषित किए गए नोटिस दिनांक 11-11-2019 का कोई उत्तर भी प्रेषित नहीं किया। वर्णित स्थिति में याची द्वारा इस पर बल दिया गया कि विपक्षी ने अपने आचरण से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से त्याग दी। 26-याची की ओर से अपने प्रति उत्तर में यह भी कहा गया है कि विपक्षी निरन्तर अपने मूल राजनीतिक दल के विरुद्ध टिप्पणियां कर रही हैं। इस संबंध में याची की ओर से विपक्षी के टि्वटर अकाउण्ट का सन्दर्भ दिया गया, जिस पर विपक्षी द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आलोचना करते हुए भारतीय जनता पार्टी की सरकार की प्रशंसा की गई है। याची ने यह भी कहा है कि विपक्षी ने सोशल मीडिया पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी ग्रुप्स (समूहों) को त्याग दिया है। 27-याची की ओर से अपने प्रति उत्तर में विपक्षी द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आलोचना एवं भारतीय जनता पार्टी की सरकार की प्रशंसा करने के सन्दर्भ में कतिपय प्रकाशित समाचारों का भी सन्दर्भ दिया गया है। याची की ओर से अपने प्रति उत्तर में विपक्षी को दिए गएउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 7 नोटिस, उनके टि्वटर अकाउण्ट आदि की भी छायाप्रतियां प्रस्तुत की गई हैंं। अन्त में याची की ओर से यह पुनः अनुरोध किया गया है कि चूंकि विपक्षी द्वारा विशिष्ट रूप से सदन का बहिष्कार करने के व्हिप के पश्चात् भी विशेष सत्र में भाग लिया एवं अपने मूल राजनीतिक दल की नीतियों के विरुद्ध वक्तव्य दिए गए, अतः उन्होंने अपने आचरण से स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्याग दिया है।
28-उपरोक्त के अतिरिक्त याची की ओर से 27-02-2020 दिनांकित एक प्रार्थना-पत्र इस आशय का भी दिया गया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कीशाम मेघचन्द्र सिंह प्रति माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा एवं अन्य में पारित निर्णय के क्रम में तीन माह की अवधि में प्रस्तुत प्रकरण का निर्णय किया जाना चाहिए। याची द्वारा प्रस्तुत किए गए इस प्रार्थना-पत्र के सापेक्ष विपक्षी की ओर से दिए गए उत्तर दिनांक 29-06-2020 में यह कहा गया है कि विपक्षी की ओर से अपनी टिप्पणी में इस विषय में विस्तारपूर्वक चर्चा की है कि वह क्यों तत्समय अपना जवाब दाखिल नहीं कर सकी थीं। इसके साथ ही विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है कि कीशाम मेघचन्द्र सिंह प्रति माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा एवं अन्य के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो समयावधि निर्धारित की गई है, वह विशिष्ट परिस्थितियों में शिथिल की जा सकती हैं। इस संबंध में विपक्षी ने कोविड-19 द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों एवं लॉकडाउन का भी सन्दर्भ दिया है। अतः असाधारण परिस्थिति के कारण भी विपक्षी की ओर से अपना उत्तर प्रस्तुत करने में विलम्ब हुआ। विपक्षी की ओर से यह भी कहा गया है कि वह प्रकरण के त्वरित निस्तारण हेतु अपना पूरा सहयोग देने के लिए वचनबद्ध है।
29-प्रस्तुत प्रकरण में पक्षकारों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया गया। पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ताओं को सुना गया। मैंने पत्रावली तथा उस पर उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन एवं परिशीलन किया। पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्य, सुसंगत अभिलेख एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित की गई विधि व्यवस्थाओं के आलोक में प्रश्नगत प्रकरण में निम्नलिखित बिन्दुओं पर विनिश्चय अपेक्षित है :-
(i)-क्या याचिका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से योजित होने के आधार पर पोषणीय नहीं है ?
(ii)-क्या उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के सुसंगत नियमों के अन्तर्गत विपक्षी द्वारा उत्तर विलम्ब से प्रस्तुत करने के कारण उसको संज्ञान में लिए बिना ही याचिका का निस्तारण अपेक्षित है ?
(iii)-संवैधानिक रूप से प्रस्तुत प्रकरण के तथ्यों के आलोक में दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) के प्रावधान आकर्षित होते हैं अथवा यह याचिका पैरा-2(1)(ख) के अन्तर्गत पोषणीय है एवं इसका प्रभाव ?
(iv)-क्या विधिक रूप से याचिका प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् उत्पन्न हुए कारण एवं परिस्थितियों को याचिका के निस्तारण हेतु संज्ञान में लिया जाना विधिक रूप से अपेक्षित है ?
8 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0(v)-क्या विपक्षी द्वारा दिनांक 02-10-2019 को उ0प्र0 विधान सभा के विशेष सत्र में भाग लेने के आधार पर अपने मूल राजनीतिक दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता स्वेच्छा से त्याग दी है एवं वह निरर्हता से ग्रसित हो गई हैं ?
बिन्दु संख्या-1
30-विपक्षी द्वारा प्रारम्भिक रूप से यह आपत्ति उठाई गई है कि प्रस्तुत याचिका इस कारणवश पोषणीय नहीं है कि वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा योजित की गई है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक राजनीतिक दल है। उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-7(2) के अन्तर्गत किसी व्यक्ति द्वारा ही दल परिवर्तन के संबंध में याचिका योजित की जा सकती है। विपक्षी ने इस पर बल दिया है कि किसी राजनीतिक दल को व्यक्ति की संज्ञा नहीं दी जा सकती, अतः प्रस्तुत याचिका का संज्ञान नहीं लिया जाना चाहिए। विपक्षी की ओर से यह तर्क भी दिया गया है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके अन्तर्गत किसी राजनीति दल को पृथक विधिक व्यक्ति भी माना जा सके। इस संबंध में कतिपय उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए, जैसे कि कम्पनी अधिनियम अथवा सोसाइटी रजिस्टे्रशन एक्ट। इन अधिनियमों में कम्पनी अथवा सोसाइटी को विधिक व्यक्ति (ज्यूरिस्टिक पर्सन) माना गया है जबकि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इस संबंध में विपक्षी की ओर से माननीय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा इण्डियन नेशनल कांग्रेस प्रति यूनियन ऑफ इण्डिया एवं अन्य (एआईआर 2017 छत्तीसगढ़ 160) में पारित निर्णय का सन्दर्भ दिया गया है। उक्त निर्णय के सुसंगत अंश निम्नवत् हैं :-
"8. Incorporation, in law, is constitution as a body corporate legally authorized to act as a single person. An association that has no legal personality distinct from those of its members is, in law, referred to as incorporated body. The provisions of Section 29-A of the RP Act and the eligibility to avail provisions of Sections 29-B and 29-C of the RP Act do not constitute any character or right in law that could be recognized as providing such cohesiveness to the association of persons who get registered under Part IV-A of the RP Act, to entitle that group to be recognized as one clothed with legal personality to be treated as a juristic person eligible in law to sue. In this view of the matter, the Appellant, merely on account of it having been registered under Section 29A of the RP Act, cannot be treated as a person in eye of law, entitled to institute a writ petition and seek relief under Article 226 of the Constitution of India.
31-उपर्युक्त तर्क एवं विधि व्यवस्था के आधार पर विपक्षी की ओर से इस पर बल दिया गया है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उत्तर प्रदेश विधान मण्डल सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-7 (2) के अन्तर्गत याचिका प्रस्तुत करने हेतु विधिक रूप से सक्षम नहीं है। अतः याचिका इसी आधार पर निरस्त होने योग्य है।
32-इस संबंध में विपक्षी की ओर से यह तर्क भी दिया गया है कि दल परिवर्तन नियमावली, 1987 में ''व्यक्ति'' को परिभाषित नहीं किया गया है परन्तु यथावश्यक ''व्यक्ति'' एवंउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 9 ''राजनीतिक दल'' के विषय में प्रावधान किए गए हैं। यदि नियमों में यह मंतव्य अन्तर्निहित होते कि राजनीति दल को भी नियम-7 (2) के अन्तर्गत व्यक्ति माना जाएगा तो तद्नुसार उस विषय में विशिष्ट व्यवस्था की जाती।
3-वपक्षी की ओर से यह तर्क भी दिया गया है कि यदि यह मान भी लिया जाए कि प्रस्तुत याचिका श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा प्रस्तुत की गई है तो भी यह नहीं माना जा सकता कि उन्होंने यह याचिका कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता के रूप में प्रस्तुत की है। वर्णित स्थिति में चूंकि श्रीमती मिश्रा द्वारा यह याचिका व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत की गई है, अतः दल परिवर्तन नियमावली, 1987 के नियम-8 (3)(ख) का अनुपालन प्रस्तुत प्रकरण में होना चाहिए था जो कि नहीं हुआ है। नियम-8(3)(ख) यह प्रावधानित करता है कि यदि कोई याचिका किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की जाती है तो उसके विषय में संबंधित राजनीतिक दल के नेता की आख्या भी ली जाएगी। विपक्षी ने इस पर बल दिया है कि चूंकि इस प्रावधान का अनुपालन नहीं किया गया है, अतः इस कारण भी याचिका का संज्ञान विधिक रूप से नहीं लिया जाना चाहिए।
34-याची की ओर से इस संबंध में यह तर्क दिया गया है कि यह याचिका श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा प्रस्तुत की गई है, अतः विपक्षी की प्रारम्भिक आपत्ति बलहीन है। याची की ओर से इस संबंध में यह भी कहा गया है कि चूंकि याचिका की पोषणीयता के विषय में समाधान होने के पश्चात् माननीय अध्यक्ष द्वारा दल परिवर्तन नियमावली, 1987 के नियम-8(3) के अन्तर्गत याचिका पर संज्ञान लेते हुए नोटिस निर्गत कर दिया है, अतः इस स्तर पर विपक्षी द्वारा यह आपत्ति उठाया जाना सम्भव नहीं है।
35-विपक्षी द्वारा उठाई गई उक्त प्रारम्भिक आपत्ति के विषय में भारत का संविधान की दसवीं अनुसूची में कोई विशिष्ट प्रावधान अथवा व्यवस्था नहीं है। दसवीं सूची के सुसंगत अंश निम्नवत् हैं :-
"... (1) If any question arises as to whether a member of a House has become subject to disqualification under this Schedule, the question shall be referred for the decision of the Chairman or as the case may be, the Speaker of such House and his decision shall be final."
36-दसवीं अनुसूची के उपरोक्त वर्णित अंश में दल परिवर्तन के प्रकरण को निर्णय हेतु माननीय अध्यक्ष को सन्दर्भित करने की व्यवस्था की गई है, परन्तु इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि ऐसी याचिका योजित करने हेतु विधिक रूप से कौन सक्षम होगा। दल परिवर्तन नियमावली, 1987 के नियम-7(2) में यह व्यवस्था है कि दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता संबंधित याचिका किसी 'व्यक्ति' द्वारा लिखित रूप में प्रस्तुत की जा सकती है। अतः यह स्पष्ट है कि ऐसी याचिकाएं किसी व्यक्ति द्वारा ही प्रस्तुत की जा सकती हैं। व्यक्ति की कोई परिभाषा उक्त नियमों में उल्लिखित नहीं की गई है। इस संबंध में कोई विशिष्ट प्रावधान न होने के कारण किसी राजनीति दल को व्यक्ति की संज्ञा दिया जाना विधिक रूप से सम्भव नहीं है। कदाचित दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत किसी राजनीतिक दल को विधिक व्यक्ति भी माना जाना सम्भव प्रतीत नहीं होता है। विपक्षी द्वारा इस संबंध में प्रस्तुत किए गए तर्क एवं विधि व्यवस्था से यह भी10 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 स्पष्ट होता है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अन्तर्गत भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके अनुसार किसी राजनीतिक दल को विधिक व्यक्ति (ज्यूरिस्टिक पर्सन) माना जा सके। 37-वर्णित स्थिति में विधिक रूप से यह सम्भव प्रतीत नहीं होता है कि दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता संबंधी याचिका किसी राजनीति दल द्वारा प्रस्तुत की जा सकती है। इस सीमा तक विपक्षी की ओर से उठाई गई प्रारम्भिक आपत्ति एवं उस संबंध में प्रस्तुत किए गए तर्क मान्य प्रतीत होते हैं। परन्तु इसके साथ ही यह भी देखा जाना आवश्यक है कि याचिका किसके द्वारा हस्ताक्षरित की गई है तथा किसके द्वारा याचिका के अभिकथनों का सत्यापन किया गया है। याचिका के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि यह याचिका श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा हस्ताक्षरित एवं सत्यापित की गई है। याचिका के समर्थन में प्रस्तुत किए गए शपथ-पत्र में श्रीमती मिश्रा द्वारा अपने व्यक्तिगत विवरण के साथ यह भी अंकित किया गया है कि वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उत्तर प्रदेश विधान मण्डल दल की नेता हैं। अतः प्रस्तुत याचिका को श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता के रूप में योजित माना जा सकता है। दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत अध्यक्ष की भूमिका को माननीय सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न विधि व्यवस्थाओं में प्रतिपादित किया गया है।
38-डा0 महाचन्द्र प्रसाद सिंह प्रति चेयरमैन, बिहार लेजिस्लेटिव काउंसिल एवं अन्य (2004, 8 एससीसी 747) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट रूप से अवधारित किया गया है कि दल परिवर्तन के प्रकरणों में अध्यक्ष की भूमिका प्रकरण से संबंधित तथ्यों को एकत्र करने एवं उनको सुनिश्चित करने की होती है। जैसा कि उक्त निर्णय के निम्नलिखित अंशो से स्पष्ट है :-
"…It is to be noted that the Tenth Schedule does not confer any discretion on the Chairman or Speaker of the House. Their role is only in the domain of ascertaining the relevant facts. Once the facts gathered or placed show that a member of the House has done any such act which comes within the purview of sub-paragraph (1), (2) or (3) of Paragraph 2 of the Tenth Schedule, the disqualification will apply and the Chairman or the Speaker of the House will have to make a decision to that effect."
39-अतः अध्यक्ष द्वारा दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत तथ्यों को एकत्र कर उनके विषय में निर्णय प्रदान किया जाना अपेक्षित है। दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत अध्यक्ष के स्तर पर किए जाने वाले परीक्षण की तुलना माननीय न्यायालयों द्वारा किए जाने वाले परीक्षण से नहीं की जा सकती। अध्यक्ष का कार्य अर्द्ध-न्यायिक प्रकृति का है। अत्यन्त तकनीकी दृष्टिकोण अपनाना दसवीं अनुसूची के उद्देश्यों को विफल कर सकता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दल परिवर्तन के सन्दर्भ में निर्मित किए गए नियमों की प्रासंगिकता के विषय में भी उदार दृष्टिकोण अपनाने की अवधारणाएं व्यक्त की गई हैं जैसा कि डा0 महाचन्द्र प्रसाद सिंह प्रति चेयरमैन, बिहार लेजिस्लेटिव काउन्सिल (2004 8 एससीसी 747) में व्यक्त की गई निम्नलिखित अवधारणाओं से स्पष्ट है :-
"The Purpose and object of the Rules is to facilitate the job of the Chairman in discharging his duties and responsibilities conferred upon him byउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 11 Paragraph 6, namely, for resolving any dispute as to whether a member of the House has become subject to disqualification under the Tenth Schedule. The rules being in the domain of procedure, are intended to facilitate the holding of inquiry and not to frustrate of obstruct the same by introduction of innumerable technicalities. Being subordinate legislation, the Rules cannot make any provision which may have the effect of curtailing the content and scope of the substantive provision, namely, the Tenth Schedule. There is no provision in the Tenth Schedule to the effect that until a petition which is signed and verified in the manner laid down in CPC for verification of pleadings is made to the Chairman or the Speaker of the House, he will not get the jurisdiction to give a decision as to whether a member of the House has become subject to disqualification under the Schedule. Paragraph 6 of the Schedule does not contemplate moving of a formal petition by any person for assumption of jurisdiction by the Chairman or the Speaker of the House. The purpose of Rules 6 and 7 is only this much that the necessary facts on account of which a member of the House becomes disqualified for being a member of the House under Paragraph 2, may be brought to the notice of the Chairman. There is no lis between the person moving the petition and the member of the House who is alleged to have incurred a disqualification. It is not an adversarial kind of litigation where he may be required to lead evidence. 40-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई उपरोक्त अवधारणाओं से यह प्रकट होता है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत की गई याचिकाओं का निस्तारण करने में अध्यक्ष को बहुत तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। अध्यक्ष से यह अपेक्षित नहीं है कि वह 'व्यवहार प्रक्रिया संहिता' अथवा न्यायिक प्रणाली की अन्य दुरूह एवं जटिल प्रक्रियाओं का अक्षरशः पालन करेंगे। अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के रूप में कार्य करते हैं। दल बदल से संबंधित याचिका के निस्तारण में अध्यक्ष की भूमिका संकीर्ण एवं अत्यन्त तकनीकी नहीं हो सकती।
41-उपर्युक्त वर्णित विधिक व्यवस्थाओं के आलोक में विपक्षी द्वारा उठाई गई प्रारम्भिक आपत्ति स्वीकार होने योग्य नहीं है। प्रस्तुत याचिका मात्र इस आधार पर निरस्त नहीं की जा सकती कि उसे किसी व्यक्ति विशेष के स्थान पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि प्रक्रियात्मक रूप से यह श्रेष्ठतर होता कि याचिका राजनीति दल के स्थान पर नेता, विधान मण्डल दल अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की जाती, परन्तु मात्र इस आधार पर याचिका को अपोषणीय नहीं माना जा सकता। याचिका के परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि उसके तथ्यों एवं अभिकथनों को श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा सत्यापित किया गया है। श्रीमती आराधना मिश्रा द्वारा अपने आपको कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। किसी भी राजनीतिक दल का विधान मण्डल का नेता उस राजनीतिक दल की ओर से विभिन्न कार्य करने हेतु सक्षम एवं अधिकृत माना जाएगा। संसदीय परिवेश में विधान मण्डल दल के नेता को संबंधित राजनीति दल का सदन में मुख्य प्रतिनिधि माना जाता है। सदन में सभी नीति विषयक मामलों में वह अपने दल का पक्ष प्रस्तुत कर सकता है। इसी प्रकार दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत जो मामले उसके स्तर से प्रस्तुत किए जाते हैं उनमें संसदीय परम्पराओं के अनुसार यह माना जाएगा कि वह12 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 संबंधित राजनीतिक दल द्वारा अधिकृत एवं सक्षम है। तद्नुसार, प्रस्तुत याचिका कांग्रेस विधान मण्डल दल की नेता श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा प्रस्तुत की गई मानी जाएगी एवं उसी प्रकार से इस याचिका का संज्ञान लिया जाना उपयुक्त होगा। नियमों के संकीर्ण निर्वचन के आधार पर याचिका को अपोषणीय माना जाना दसवीं अनुसूची के नियमों एवं अध्यक्ष की प्रावधानित भूमिका के विपरीत होगा।
बिन्दु संख्या-2
42-याची की ओर से इस तथ्य पर अत्यधिक बल दिया गया है कि विपक्षी ने अत्यन्त विलम्ब से अपना उत्तर/टिप्पणी प्रस्तुत की है, जबकि नियमों में सात दिन के अन्दर उत्तर प्रस्तुत करने की व्यवस्था है। याची की ओर से यह कहा गया कि चूँकि विपक्षी का उत्तर/टिप्पणी अत्यन्त विलम्ब से प्राप्त हुई है अतः उसको अभिलेखों पर नहीं लेना चाहिए और न ही उसका संज्ञान लिया जाना चाहिए। इस संबंध में याची द्वारा दल परिवर्तन नियमावली, 1987 के नियम-8 (3) का सन्दर्भ दिया गया है जो कि निम्नवत् है :-
8-(3) यदि याचिका नियम-7 की अपेक्षाओं का अनुपालन करती है, तो अध्यक्ष याचिका और उसके उपाबन्धों की प्रतियां
(क) उस सदस्य को भिजवायेंगे, जिसके सम्बन्ध में याचिका की गई है : और
(ख) जहां ऐसा सदस्य किसी विधान-दल का है ओर ऐसी याचिका उस दल के नेता ने नहीं दी है वहां ऐसे नेताओं को भी भिजवायेंगे :
और ऐसा सदस्य या नेता, ऐसी प्रतियों की प्राप्ति से सात दिन के भीतर, या ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर, जिसकी अनुज्ञा अध्यक्ष पर्याप्त कारण के आधार पर दें, उस पर अपनी लिखित टिप्पणियां अध्यक्ष को भेजेगा।
43-उपर्युक्त प्रावधान के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि विपक्षी याचिका की प्रति प्राप्त होने से सात दिन के भीतर, या ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर जिसकी अनुमति अध्यक्ष दें, अपना उत्तर/लिखित टिप्पणी प्रस्तुत करेंगे। उपर्युक्त प्रावधान में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि सात दिन के अन्दर ही विपक्षी का उत्तर प्राप्त होना अनिवार्य हो। यद्यपि यह अपेक्षित है कि सामान्य रूप से सात दिन के अन्दर विपक्षी द्वारा उत्तर प्रस्तुत कर दिया जाए, परन्तु उपर्युक्त प्रावधानों के अन्तर्गत अध्यक्ष को यह शक्ति प्रदत्त की गयी है कि वह विशेष परिस्थिति अथवा कारण के आधार पर उत्तर प्रस्तुत करने की अवधि बढ़ा सकते हैं।
44-याची द्वारा उठाई गई इस आपत्ति के विषय में प्रस्तुत याचिका के प्रस्तुत होने के पश्चात् विभिन्न तिथियों पर की गई कार्यवाहियों का विवरण देखा जाना आवश्यक प्रतीत होता है। 45-पत्रावली के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि याचिका दिनांक 26 नवम्बर, 2019 को प्रस्तुत की गयी थी। सुसंगत नियमों के अनुसार सक्षम स्तर से दिनांक 04 दिसम्बर, 2019 को याचिका को बुलेटिन में प्रकाशित करने के आदेश प्रदान किये गये। बुलेटिन में प्रकाशित होने के पश्चात्् याचिका का प्रारम्भिक परीक्षण किया गया। दल-बदल नियमावली, 1987 के नियम-8(1) केउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 13 अन्तर्गत विधिवत परीक्षण करने के पश्चात् दिनांक 30 दिसम्बर, 2019 को उपर्युक्त नियमावली के नियम-8(3) के अन्तर्गत विपक्षी को याचिका की प्रति प्रेषित करते हुए, लिखित टिप्पणी प्रस्तुत करने के आदेश प्राप्त किये गये। दिनांक 1 जनवरी, 2020 को विपक्षी को सात दिनों के अन्दर अपना उत्तर प्रस्तुत करने हेतु पत्र निर्गत किया गया।
46-इसके पश्चात् जनवरी, 2020 के अन्तिम सप्ताह में बजट सत्र आहूत होने के कारण प्रकरण में कार्यवाही स्थगित रही। दिनांक 28 जनवरी, 2020 को बजट सत्र समाप्त होने के पश्चात् विपक्षी को अन्तिम अवसर देते हुए पुनः अपना लिखित उत्तर प्रस्तुत करने हेतु पत्र प्रेषित किया गया। दिनांक 23 मार्च, 2020 से 'कोविड-19' के कारण उत्पन्न परिस्थियों के फलस्वरूप लॉक-डाउन होने के कारण प्रकरण में कार्यवाही बाधित रही। दिनांक 15 मई, 2020 तक लॉक-डाउन के कारण आवागमन अवरुद्ध रहा। दिनांक 27 मई, 2020 को लॉक-डाउन के पश्चात्् पुनः विपक्षी को एक पत्र इस आशय से भेजा गया कि यदि वह निर्धारित अवधि में अपनी टिप्पणी प्रस्तुत नहीं करती हैं तो प्रकरण में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्यवाही कर दी जाएगी। विपक्षी सुश्री अदिति सिंह, सदस्य, विधान सभा द्वारा दिनांक 02 जून, 2020 को अपना पक्ष/उत्तर प्रस्तुत किया गया। विपक्षी का उत्तर प्राप्त होने के तुरन्त पश्चात् प्रकरण में दिनांक 25 जून, 2020 को सुनवाई हेतु नियत कर दिया गया। प्रकरण में दिनांक 25 जून, 2020 एवं 30 जून, 2020 को सुनवाई के पश्चात् निर्णय सुरक्षित कर लिया गया।
47-उपुर्यक्त तथ्यों एवं तिथियों के क्रमवार विवरण से यह स्पष्ट है कि प्रकरण में सक्षम स्तर से अनावश्यक विलम्ब नहीं किया गया है। अध्यक्ष, विधान सभा के रूप में विधान सभा के बजट सत्र का संचालन अपरिहार्य है। उसके पश्चात् 'कोविड-19' द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों के कारण प्रकरण के निस्तारण में जो विलम्ब हुआ है वह अध्यक्ष के नियंत्रण के परे था। यद्यपि विपक्षी को शीघ्रातिशीघ्र प्रस्तुत प्रकरण में अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करनी चाहिए थी, परन्तु उनकी ओर से प्रस्तुत की गयी टिप्पणी में यह कहा गया है कि दिनांक 21 नवम्बर, 2019 को उनका विवाह होने के कारण वह तत्समय अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं कर सकीं। विपक्षी की ओर से यह भी कहा गया है कि उनको वैवाहिक समारोह में व्यस्त होने के कारण प्रकरण में विधिक परामर्श लेने हेतु समय प्राप्त नहीं हुआ। वर्णित स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि विपक्षी का पक्ष विलम्ब से प्राप्त होने के कारण उनके उत्तर को अभिलेख पर न लिया जाए अथवा उसपर संज्ञान न लिया जाए।
48-दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत किये गये प्रकरणों के निस्तारण में अध्यक्ष के स्तर से ट्रब्यूनल के रूप में कार्य करते हुए यह अपेक्षित है कि वह मामले को नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त के अनुसार सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान करें। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जगजीत सिंह प्रति हरियाणा राज्य ( 2006, 11 एससीसी 1) में स्पष्ट रूप से अवधारित किया गया है कि दसवीं अनुसूची के संबंध में नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का पालन किया जाना अनिवार्य है जैसाकि उक्त निर्णय के निम्नलिखित सुसंगत अंशों से प्रकट होता है :-
"At the outset, we may mention that while considering the plea of violation of principles of natural justice, it is necessary to bear in mind that the proceedings under the Tenth Schedule are not comparable to either a trial in a14 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 court of Law or departmental proceeedings for disciplinary action against an employee. But the proceedings here are against an elected representative of the people and the Judge holds the independent high office of a Speaker. The scope of judicial review in respect of proceedings before such Tribunal is limited. We may hasten to add that howsoever limited may be the field of judicial review, the principles of natural justice have to be complied with and in their absence, the orders would stand vitiated.
49-इसी प्रकार रवि एस0 नायक प्रति यूनियन ऑफ इण्डिया (ए0आई0आर0 1994 एस0सी0, 1558) को भी दसवीं अनुसूची के प्रकरणों में नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों के अनुपालन हेतु माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निम्नलिखित अवधारणा व्यक्त की गयी है :-
"Principles of natural justice have an important places in modern Administrative Law. They have been defined to mean "fair play in action". (See :
Smt. Maneka Gandhi v. Union of India, (1978) 2 SCR 621 at p 676 :(AIR 1978 SC 597 at p 625) Bhagwati, J.) . As laid down by this Court "they constitute the basic element of a fair hearing. having their roots in the innate sense of man for fair play and justice which is not the preserve of any particular race or country but is shared in common by all men"(Union of India v. Tulsi Ram, 1985 Supp. (2) SCR 131 at p 225) :(AIR 1985 SC 1416 at p. 1456)). An order of an outhority exercising judical of quasi-judiciat functions passed in violation of the prineiples of natural justice is procedurally ultra vires and therefore, suffers from a jurisdictional error. That is the reason why in spite of the finality imparted to the decision of the Speakers/Chairmen by paragaraph 6 (1) of the Tenth Schedule such a decision is subject to judicial review on the ground of non- compliance with rules of natural justice.
50-माननीय सर्वोच्च न्यायालय की उपर्युक्त अवधारणा से यह स्पष्ट है कि ट्रब्यूनल के रूप में कार्य करते हुए दसवीं अनुसूची के प्रकरणों में अर्धन्यायिक भूमिका के निर्वहन में अध्यक्ष द्वारा नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का अनुपालन करते हुए पक्षकारों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए। अध्यक्ष के रूप में मेरा यह सुनिश्चित मत है कि दसवीं अनुसूची के प्रकरणों को समयबद्ध रूप से निस्तारित किया जाना अपेक्षित है। दसवीं अनुसूची के उददेश्यों के अनुरूप यदि समयबद्ध रूप से इन प्रकरणों का निस्तारण न किया जाए तो दसवीं अनुसूची में निहित मन्तव्यों का हनन होगा। परन्तु इसके साथ ही यदि ऐसी असाधारण परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जो कि अध्यक्ष के नियंत्रणाधीन नहीं हैं तो उनको भी संज्ञान में लिया जाना आवश्यक है। 'कोविड-19' के कारण उत्पन्न हुई परिस्थितियों से पूरा विश्व ग्रस्त है। इस वैश्विक महामारी के कारण कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका सभी के कार्य-संचालन में विघ्न उत्पन्न हुआ है। लॉक-डाउन घोषित होने के पश्चात् सामाजिक गतिविधियों को भी विराम लगा। तद्नुसार उत्पन्न हुई परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रस्तुत प्रकरण के निस्तारण में जानबूझकर बिलम्ब किया गया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कीशाम मेघचन्द्र सिंह प्रति माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा एवं अन्यउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 15 [2020 (1) SCALE 299] में पारित निर्णय में भी असाधारण परिस्थितियों को संज्ञान में लिए जाने की अवधारणा व्यक्त की गयी है जो कि उक्त निर्णय के निम्नलिखित अंशों से स्पष्ट है :
"...Indeed, the Speaker, in acting as a Tribunal under the Tenth Schedule is bound to decide disqualification petitions within a reasonable period. What is reasonable will depend on the facts of each case but absent exceptional circumstances for which there is good reason. a period of three months from the date on which the petition is filed is the outer limit within which disqualification petitions filed is the outer limit within which disqualification petitions filed before the Speaker must be decided if the constitutional objective of disqualifying persons who have infracted the Tenth Schedule is to be adhered to."
51-उपर्युक्त के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दसवीं अनुसूची के निस्तारण हेतु ''असाधारण परिस्थितियों की अनुपस्थिति में'' तीन माह की अवधि निर्धारित की गयी है। अतः कोविड-19 से उत्पन्न असाधारण परिस्थितियों में प्रस्तुत प्रकरण में हुए विलम्ब को संज्ञान में लिया जाना विधिक रूप से अपेक्षित है। दिनांक 26 नवम्बर, 2019 को याचिका के योजित होने के पश्चात् दल परिवर्तन नियमावली, 1987 के नियम-8(2) के अन्तर्गत सम्यक् परीक्षण हेतु समय लेने के पश्चात् विपक्षी को लिखित टिप्पणी प्रस्तुत करने हेतु पत्र निर्गत किया गया। उसके पश्चात् 'बजट सत्र' एवं 'कोविड-19' के कारण प्रकरण के निस्तारण में विलम्ब कारित हुआ। तदोपरान्त विपक्षी द्वारा प्रस्तुत की गई टिप्पणी के तुरन्त पश्चात् अध्यक्ष के स्तर से प्रकरण में सुनवाई हेतु तिथि निर्धारित की गई एवं प्रकरण में सुनवाई की गई। वर्णित स्थिति में याची द्वारा प्रस्तुत किया गया यह तर्क मान्य नहीं है कि विपक्षी के उत्तर को संज्ञान में न लिया जाए। याची द्वारा इस बिन्दु पर अत्यधिक बल दिया गया है, परन्तु माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित की गई उपर्युक्त विधि व्यवस्थाओं एवं असाधारण परिस्थितियों के आलोक में याची की यह आपत्ति मान्य नहीं है, अतः अस्वीकार की जाती है।
बिन्दु संख्या-3
52-प्रस्तुत याचिका संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) के अन्तर्गत प्रस्तुत की गई है। याचिका के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ने के आधार पर दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) सपठित अनुच्छेद-191(2) के अन्तर्गत याचिका को प्रस्तुत करते हुए यह अनुरोध किया गया है कि विपक्षी को निरर्ह घोषित किया जाए। याचिका की सुनवाई के दौरान भी याची की ओर से इस पर बल दिया गया कि यह याचिका दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) के प्रावधानों को आकर्षित करती है।
53-विपक्षी की ओर से इस संबंध में यह कहा गया है कि याचिका के तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) के प्रावधान आकर्षित होते हैं तथा याचिका पैरा-2(1)(क) के अन्तर्गत पोषणीय नहीं है। विपक्षी ने इस तथ्य पर बल दिया है कि प्रस्तुत याचिका स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता त्यागने के विषय में है, जबकि याचिका में इस आधार पर निरर्हता हेतु प्रार्थना की गई है कि विपक्षी सुश्री अदिति सिंह ने पार्टी की नीतियों के विरुद्ध पार्टी द्वारा बहिष्कृत16 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 सत्र में भाषण दिया और सरकार की नीतियों की प्रशंसा करते हुए माननीय मुख्य मंत्री के कार्यों की सराहना की। यह कि विपक्षी ने दिनांक 02-10-2019 को आहूत विशेष सत्र में उपस्थित होकर चर्चा में भाग लिया। याचिका के पैरा-10 में यह स्पष्ट रूप से अंकित किया गया है कि विपक्षी द्वारा मूल राजनीतिक दल के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए सत्तापक्ष द्वारा सदन में प्रस्तुत प्रस्ताव का समर्थन किया तथा प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया। अतः विपक्षी के अनुसार यह याचिका सदन में मतदान किए जाने से संबंधित होने के कारण दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) के अन्तर्गत ही मानी जाएगी।
54-याची एवं विपक्षी द्वारा प्रस्तुत किए गए परस्पर विरोधी तर्कों एवं तथ्यों के समाधान हेतु दसवीं अनुसूची के पैरा-2 के निम्नलिखित अंश सुसंगत हैं :-
"2. Disqualification on ground of defection.–(1) Subject to the provisions of paragraphs 4 and 5, a member of a House belonging to any political party shall be disqualified for being a member of the House–
(a) If he has voluntarily given up his membership of such political party; or (b) If he votes or abstains from voting in such House contrary to any direction issued by the political party to which he belongs or by any person or authority authorized by it in this behalf, without obtaining, in either case, the prior permission of such political party, person or authority and such voting or abstention has not been condoned by such political party, person or authority within fifteen days from the date of such voting or abstention.
Explanation.– ………."
55-उपरोक्त प्रावधान के परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि दल बदल के आधार पर निरर्हता दो परिस्थितियों में आकर्षित होगी। प्रथम, यदि सदन का कोई सदस्य स्वेच्छापूर्वक अपने मूल राजनीति दल की सदस्यता को त्याग दे अथवा यदि वह अपने मूल राजनीति दल के निर्देशों के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान करने से विरत रहता है। प्रस्तुत प्रकरण में मुख्य रूप से याचिका इस आधार पर प्रस्तुत की गई है कि विपक्षी द्वारा दिनांक 02-10-2019 को उत्तर प्रदेश विधान सभा के विशेष सत्र में कांग्रेस विधान मण्डल दल के तत्कालीन नेता श्री अजय कुमार 'लल्लू' द्वारा निर्गत किए गए व्हिप के उल्लंघन में भाग लिया एवं चर्चा में सम्मिलित होते हुए उन्होंने सत्तापक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करके उसे सर्वसम्मति से पारित कराया। तद्नुसार, याचिका में दिनांक 02-10-2019 को सम्पन्न हुए विशेष सत्र में सत्तापक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव के समर्थन में विपक्षी द्वारा किए गए मतदान के आधार पर दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत उनकी निरर्हता हेतु प्रार्थना की गई है।
56-सदन के अन्दर चर्चा में भाग लेते हुए किसी प्रस्ताव के समर्थन में अथवा उसके विरुद्ध मतदान किए जाने के प्रकरण में दसवीं अनूसूची के पैरा-2(1)(ख) के प्रावधान ही आकर्षित होंगे। दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) की भाषा तथा उसके मन्तव्य स्पष्ट हैं। सदन में अपने मूल राजनीति दल के निर्देशों के विरुद्ध मतदान करने अथवा मतदान करने से विरत रहना दसवींउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 17 अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) में विशिष्ट रूप से प्रावधानित किया गया है। यदि सदन में चर्चा करके किसी प्रस्ताव अथवा विषय पर मतदान करने के कृत्य को स्वेच्छापूर्वक मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्यागने के अन्तर्गत ही माना जाता तो पैरा-2(1)(ख) की कोई आवश्यकता नहीं होती। विधायिका का यह मन्तव्य प्रतीत नहीं होता है कि सदन में मतदान करने के मामले को भी स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्यागना ही माना जाए।
57-उपरोक्त वर्णित विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि प्रथम दृष्टया प्रस्तुत याचिका दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) के अन्तर्गत प्रस्तुत की जानी चाहिए थी क्योंकि इसमें विपक्षी द्वारा मूल राजनीतिक दल के निर्देशों के विपरीत सदन की चर्चा में भाग लेते हुए किसी प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किए जाने का प्रश्न निहित है। चूंकि यह परिस्थिति विशेष रूप से दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) के अन्तर्गत परिभाषित एवं प्रावधानित है, अतः प्रस्तुत याचिका को पैरा-2(1)(क) के अन्तर्गत संवैधानिक रूप से माना जाना सम्भव नहीं है। याची द्वारा इस संबंध में प्रस्तुत किए गए तर्क विधिक रूप से मान्य प्रतीत नहीं होते हैं। संवैधानिक प्रावधानों का निर्वचन याचिका में वर्णित तथ्यों के आधार पर ही किया जा सकता है। चूंकि दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) में सदन में मतदान किए जाने के विषय में प्रावधान हैं, अतः इसको स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता त्यागने का आचरण नहीं माना जा सकता।
58-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों के अनुसार कोई सदस्य अपने मूल राजनीति दल की सदस्यता प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से त्याग सकता है। तद्नुसार, प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सदस्यता त्यागने के विषय में निर्धारण ऐसे सदस्य के आचरण के आधार पर किया जाएगा। परन्तु सदन के अन्दर चर्चा में भाग लेते हुए मतदान किए जाने का प्रश्न पैरा-2(1)(क) के अन्तर्गत आचरण माना जाना दसवीं अनुसूची की योजना के विपरीत होगा। याची द्वारा यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी सुश्री अदिति सिंह ने कांग्रेस विधान मण्डल दल के तत्कालीन नेता श्री अजय कुमार 'लल्लू' के निदेशों के उल्लंघन में दिनांक 02-10-2019 को आहूत उत्तर प्रदेश विधान सभा के विशेष सत्र में भाग लिया एवं सत्तापक्ष के प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करके उसको सर्वसम्मति से पारित कराया। अतः वह निरर्हता से ग्रस्त हो गई हैं। चूंकि इन तथ्यों के सापेक्ष दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) के प्रावधान आकर्षित होते हैं, अतः याचिका का परीक्षण तद्नुसार ही किया जाना संवैधानिक रूप से उपयुक्त होगा।
59-विपक्षी का यह तर्क मान्य नहीं है कि मात्र इस आधार पर याचिका को पोषणीय नहीं माना जाए कि उसको पैरा-2(1)(क) के अन्तर्गत प्रस्तुत किया है, जबकि इस प्रकरण में पैरा-2(1)(ख) के प्रावधान आकर्षित होते हैं। चूंकि अध्यक्ष की भूमिका दसवीं अनुसूची के प्रकरणों में तथ्यों को निर्धारित करके समाधान करना है, अतः याचिका तकनीकी रूप से भिन्न प्रावधान में प्रस्तुत करने के आधार पर उसको निरस्त करना उपयुक्त नहीं होगा। ट्रिब्युनल के रूप में कार्य करते हुए अध्यक्ष याचिका के तथ्यों के आधार पर जो भी विधिक प्रावधन आकर्षित होते हैं उनके परिप्रेक्ष्य में परीक्षण करने हेतु स्वतंत्र हैं। तद्नुसार, इस आधार पर याचिका को पोषणीय न माना18 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 जाना उपयुक्त नहीं है, परन्तु याचिका में वर्णित तथ्यों का परीक्षण दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) के अन्तर्गत करते हुए विनिश्चय किया जाना अपेक्षित है।
बिन्दु संख्या-4
60-याची द्वारा दिनांक 17-06-2020 को विपक्षी द्वारा प्रस्तुत की गई लिखित टिप्पणी के सापेक्ष अपना प्रति उत्तर प्रस्तुत किया है। याची ने प्रति उत्तर में याचिका के अतिरिक्त विपक्षी के आचरण के संबंध में विभिन्न नए तथ्य प्रस्तुत किए हैं। याची ने यह कहा है कि याचिका प्रस्तुत करने के पश्चात् भी विपक्षी अपने मूल राजनीतिक दल की नीतियों के विरुद्ध कार्य कर रही हैं। इस संबंध में याची ने विपक्षी द्वारा माह मई, 2020 में किए गए कई ट्वीट्स का सन्दर्भ दिया है। इसके अतिरिक्त याची ने माह मई, 2020 में विपक्षी के समाचार-पत्रों में प्रकाशित साक्षात्कार आदि का भी सन्दर्भ दिया है, जिसमें याची के अनुसार विपक्षी ने अपने मूल राजनीतिक दल की आलोचना की है तथा भारतीय जनता पार्टी की प्रशंसा में अभिकथन किए हैं। याची की ओर से यह कहा गया है कि चूंकि विपक्षी ने याचिका प्रस्तुत करने में लगभग पांच माह के पश्चात् अपना उत्तर प्रस्तुत किया है, अतः प्रति उत्तर में याची द्वारा दर्शाए गए तथ्यों एवं विपक्षी के आचरण को भी संज्ञान में लिया जाना चाहिए। याची ने इस पर बल दिया है कि विपक्षी का उत्तर दिनांक 02-06-2020 को प्रस्तुत किया गया, अतः इसके पूर्व विपक्षी के सभी कृत्यों एवं आचरण को संज्ञान में लिया जाना अपरिहार्य है। इस संबंध में विपक्षी ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम चन्द्र प्रसाद सिंह प्रति शरद यादव, सिविल अपील संख्या 2004/2020 में दिनांक 19-03-2020 को पारित निर्णय का संदर्भ दिया है। इस निर्णय के आधार पर याची द्वारा इस पर बल दिया गया है कि ट्रिब्युनल के रूप में दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत कार्य करते हुए अध्यक्ष को निर्णय करने के पूर्व सभी तथ्यों एवं कृत्यों को संज्ञान में लिया जाना चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त निर्णय में व्यक्त की गई अवधारणाओं के सुसंगत अंश निम्नवत् हैं :-
"An event or a conduct of a person even though subsequent to passing of an order of Speaker or Chairman ordinarily may not be relevant for determining the validity of the order of the Speaker or Chairman but in a case where subsequent event or conduct of member is relevant with respect to state of affairs as pertaining to the time when member has incurred disqualification, that subsequent events can be taken into consideration by the High Court in exercise of its jurisdiction under Article 226.
61-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई उपरोक्त अवधारण से यह स्पष्ट है कि यह निर्णय माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद-226 के अन्तर्गत प्रस्तुत रिट याचिका के परीक्षण के सन्दर्भ में पारित किया गया है। यह निर्णय अध्यक्ष अथवा सभापति के निर्णयों की वैधानिकता के परीक्षण के सन्दर्भ में माननीय उच्च न्यायालय की अधिकारिता के विषय में पारित किया गया है। उपरोक्त निर्णय अध्यक्ष, विधान सभा अथवा सभापति, विधान परिषद् द्वारा दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत पारित किए जाने वाले निर्णयों के विषय में उद्घोषित नहीं किया गया है। अतः उपरोक्त निर्णय प्रस्तुत प्रकरण के तथ्यों के विषय में लागू नहीं होता है। इस संबंध में यह भी उल्लेखनीय है कि उपरोक्त निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह भी अभिव्यक्त किया गया है कि सामान्यउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 19 रूप से अध्यक्ष अथवा सभापति द्वारा दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत पारित किए जाने वाले निर्णय के सन्दर्भ में याचिका प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् के कृत्य अथवा तथ्य संज्ञान में नहीं लिए जाते हैं। जैसा कि राम चन्द्र प्रसाद सिंह के निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवधारित किया गया है, जो निम्नानुसार हैः-
"The decision taken by the Speaker, thus, has to be on the basis of conduct or actions taken by member, which may amount to voluntarily giving up his membership. The facts and sequence of the events on the basis of which Hon'ble Chairman came to the conclusion that a person has incurred disqualification under paragraph 2(1)(a) of the Tenth Schedule are all facts, which had occurred prior to adjudication by the Hon'ble Chairman. In the facts of the present case, the Chairman of Rajya Sabha has passed the order on 04.12.2019 on the claim of the appellant praying for disqualification as noticed above. The foundation of order of the Chairman is the facts and events, which took place after 26.07.2017. The petition having been filed by the appellant on 02.09.2017, petition has to be treated to be founded on facts and events, which took place on or before 02.09.2017."
62-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम चन्द्र प्रसाद सिंह के प्रकरण में पारित निर्णय के उपरोक्त अंशों के परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि अध्यक्ष का निर्णय याचिका के प्रस्तुतीकरण की तिथि या उसके पूर्व कारित हुए तथ्यों एवं कृत्यों पर ही आधारित होगा।
63-विधि का यह स्थापित सिद्धान्त है कि न्यायिक अथवा अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारी द्वारा याचिका में वर्णित तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में ही निर्णय प्रदान किया जाना अपेक्षित है। याचिका के पश्चात् कारित हुए कृत्यों अथवा तथ्यों को संज्ञान में लिए जाने की कोई विधिक मान्यता नहीं है। दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत भी अध्यक्ष द्वारा याचिका में वर्णित तथ्यों के आधार पर ही निर्णय लिया जाना विधिक रूप से अपेक्षित है। याची का यह कथन सर्वथा विधि के विपरीत है कि याचिका के पश्चात् विपक्षी द्वारा जो कृत्य किए गए हैं उनको प्रस्तुत प्रकरण में संज्ञान में लिया जाना चाहिए। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि याची ने यह कथन अपने प्रति उत्तर में किया है। यह सर्वविदित है कि प्रति उत्तर के सापेक्ष उत्तर दिए जाने की कोई विधिक व्यवस्था नहीं है। अतः प्रति उत्तर (रीज्वाइंडर) के माध्यम से दिए गए नए तथ्यों के सन्दर्भ में विपक्षी को अपनी आख्या देने का कोई अवसर प्राप्त नहीं होगा। यदि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत इस प्रकार से नए तथ्यों को संज्ञान में लिया जाता रहेगा तो दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत किए गए मामलों का अन्तिम निस्तारण किया जाना कठिन हो जाएगा। जैसा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजेंद्र सिंह राणा एवं अन्य प्रति स्वामी प्रसाद मौर्या एवं अन्य (एआईआर 2007 एससी 1305) में अवधारित किया है।
"As we see it, the act of disqualification occurs on a member voluntarily giving up his membership of a political party or at the point of defiance of the whip issued to him. Therefore, the act that constitutes disqualification in terms of paragraph 2 of the Tenth Schedule is the act of giving up or defiance of the whip. The fact that a decision in that regard may be taken in the case of voluntary giving up by the Speaker at a subsequent point of time cannot and does not postpone the incurring the disqualification20 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 by the act of the Legislator. Similarly, the fact that the party could condone the defiance of a whip within 15 days or that the Speaker takes the decision only thereafter in those cases, cannot also pitch the time of disqualification as anything other than the point at which the whip is defied. Therefore, in the background of the object sought to be achieved by the Fifty Second Amendment of the Constitution and on a true understanding of paragraph 2 of the Tenth Schedule, with reference to the other paragraphs of the Tenth Schedule, the position that emerges is that the Speaker has to decide the question of disqualification with reference to the date on which the member voluntarily gives up his membership or defies the whip. It is realty a decision ex post facto.
The fact that in terms of paragraph 6, a decision on the question has to be taken by the Speaker or the Chairman, cannot lead to a conclusion that the question has to be determined only with reference to the date of the decision of the Speaker. An interpretation of that nature would leave the disqualification to an indeterminate point of time and to the whims of the decision making authority.
64-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई उपरोक्त अवधारणा में यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत किए गए मामलों में उसी तिथि या समय के सापेक्ष निर्णय किया जाना अपेक्षित है जिस तिथि को याचिका में स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता त्यागना अथवा किसी व्हिप के उल्लंघन को आरोपित किया गया हो। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित किए गए उपरोक्त निर्णय के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत प्रकरण में दिनांक 02-10-2019 को आहूत विशेष सत्र में विपक्षी के सम्मिलित होने के कृत्य के सापेक्ष निर्णय किया जाना ही विधिक रूप से अपेक्षित है।
बिन्दु संख्या-5
65-प्रस्तुत याचिका में मुख्य रूप से इस आधार पर विपक्षी को दल परिवर्तन के आधार पर निरर्ह घोषित करने का अनुरोध किया गया है कि विपक्षी द्वारा दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 को कांग्रेस विधान मण्डल दल के तत्कालीन नेता श्री अजय कुमार 'लल्लू' के स्पष्ट निर्देशों/'व्हिप' के उल्लंघन में भाग लिया गया। इसके साथ ही याचिका में इस पर भी बल दिया गया है कि विपक्षी सुश्री अदिति सिंह द्वारा अपने मूल राजनीतिक दल कांग्रेस के नेता के स्पष्ट निर्देशों के पश्चात् भी विशेष सत्र की चर्चा में भाग लिया एवं सत्ता पक्ष द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करके उसे सर्वसम्मति से पारित कराया। अतः मुख्य रूप से कथित 'व्हिप' के उल्लंघन में सदन में उपस्थिति के आधार पर निरर्ह घोषित करने का अनुतोष चाहा गया है। उपर्युक्त वर्णित विश्लेषण में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि किसी 'व्हिप' अथवा निर्देश के उल्लंघन में मतदान किये जाने का कृत्य दसवीं अनुसूची के पैरा-2 (1) 'ख' के अन्तर्गत परीक्षित किया जाना अपेक्षित नहीं है। 'व्हिप' अथवा निर्देश के उल्लंघन एवं सदन में मतदान किये जाने के कृत्य को पैरा-2 (1) (क) के अन्तर्गत स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्याग किया जाना नहीं माना जा सकता। दसवीं अनुसूची का पैरा-2 (1) 'ख' एक विशिष्ट परिस्थिति को परिभाषित करता है, अतःउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 21 उसको प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आचरण के आधार पर स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ने का कृत्य माना जाना संवैधानिक रूप से उपयुक्त एवं सम्भव नहीं है।
66-प्रस्तुत प्रकरण में इस बिन्दु पर परीक्षण एवं जाँच अपेक्षित है कि विपक्षी द्वारा दिनांक 2 अक्टूबर, 2019 को आहूत किये गये उत्तर प्रदेश विधान सभा के विशेष सत्र में भाग लेने एवं उसमें मतदान करने से क्या वह दसवीं अनुसूची के पैरा-2 (1) (ख) के अन्तर्गत दल परिवर्तन के आधार पर निरर्ह मानी जाएगी। यह मामला पैरा-2 (1) (क) के अन्तर्गत स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता त्यागने का नहीं है।
67-भारत के संसदीय परिवेश में 'व्हिप' की महत्ता सर्वविदित है। यद्यपि संविधान में 'व्हिप' का उल्लेख नहीं किया गया है, परन्तु यह संसदीय प्रक्रिया एवं परम्पराओं पर आधारित है। 'व्हिप' किसी राजनीतिक दल का ऐसा निदेश है जो उसके सदस्यों को अनुपालन करने हेतु बाध्य करता है। दसवीं अनुसूची के पैरा-2 (1) (ख) व्हिप शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है वरन् निदेश शब्द का प्रयोग किया गया है। दसवीं अनुसूची के संदर्भ में किस प्रकार के 'व्हिप' अथवा निदेश सुसंगत होंगे इस विषय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किहोटो होलोहॉन (AIR 1993 SCC 111) के प्रकरण में स्पष्ट अवधारणा व्यक्त की गयी है जो निम्नवत् है :-
"49,...While construing Paragraph 2(1)(b) it cannot be ignored that under the Constitution members of Parliament as well as of the State legislature enjoy freedom of speech in the House though this freedom is subject to the provisions of the constitution and the rules and standing orders regulating the Procedure of the House {Art. 105(1) and Article 194(1)}.The disqualification imposed by Paragraph 2(1)(b) must be so construed as not to unduly impinge on the said freedom of speech of a member. This would be possible if Paragraph 2(1)(b) mustbe so construed as not to unduly impinge on the said freedom of speech of a member. This would be possible if Paragraph 2(1)(b) is confined in its scope by keeping in view the object suderlying the amendments contained in the Tenth Schedule, namely. to curb the evil or mischief of political defections motivated by the lure of office of other similar considerations. The said object would be achieved if the disqualification incurred on the ground of voting or abstaining from voting by a member is confined to cases where a change of Government is likely to be brought about or is prevented as the case may be, as a result of such voting or abstinence or when such voting or abstinence is on a matter which was a major policy and programme on which the political party to which the memberbelongs went to the polls. For this purpose the direction given by the political party to a member belonging to it, the violation of which may entail disqualification under paragraph 2(1)(b), would have to be limited to a vote on motion of confidence or no confidence in the Government or where the motion under consideration relates to a matter which was an integral policy and programme of the political party on the basis of which it approached the elaborate. The voting or abstinenence from voting by a member against the direction by the political party on such a motion would amount to disapproval of the programme of the basis of which he went before the electorate and got himself22 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 elected and such voting or abstinence would amount to a breach of the trust reposed in him by the electrorate..."
68-उपर्युक्त माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गयी अवधारणाओं से यह परिलक्षित होता है कि निम्न दो प्रकार के 'व्हिप'/निदेशों का उल्लेख ही दसवीं अनुसूची के प्रकरणों में सुसंगत होगा :
(क) सरकार के विश्वासमत के सम्बन्ध में।
(ख) ऐसे प्रस्ताव अथवा संकल्पों के विषय में जो उस राजनीतिक दल की नीति एवं योजनाओं के सन्दर्भ में हैं जिसके आधार पर सदस्य ने निर्वाचन में भाग लिया हो। 69-उपर्युक्त निदेशों के अतिरिक्त अन्य निदेशों के उल्लंघन से दसवीं अनुसूची के पैरा-2 के प्रावधान आकर्षित नहीं होंगे। प्रस्तुत प्रकरण में कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता द्वारा दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 को निर्गत किये गये कथित 'व्हिप' में विशेष सत्र के बहिष्कार करने एवं उसमें उपस्थित न होने का निदेश दिया गया था जो कि किहोटो होलोहॉन के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित व्यवस्था के अन्तर्गत सुसंगत नहीं है। अतः इस निदेश के उल्लंघन के आधार पर विपक्षी को दसवीं अनुसूची के अन्र्तगत दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता।
70-कि होटो होलोहॉन के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह भी अवधारित किया गया है कि यदि किसी निदेश अथवा 'व्हिप' के उल्लंघन पर दसवीं अनुसूची के प्रावधानों को आकर्षित करना है तो उसमें इस तथ्य का विशिष्ट उल्लेख होना चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किहोटोहोलाहॉन के प्रकरण में व्यक्त की गई निम्न अवधारणाएं उल्लेखनीय है :-
"Keeping in view the consequences of the disqualification i.e., termination of the membership of a House; it would be appropriate that the direction or whip which results in such disqualification under paragraph 2(1)(b) is so worded as to clearly indicate that voting or abstaining from voting contrary to the said direction would result in incurring the disqualification under Paragraph 2(1)(b) of the Tenth Schedule so that the member concerned has fare-knowledge of the consequences flowing from his conduct in voting or abstaining from voting contrary to such a direction."
71-उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधान मण्डल दल के तत्कालीन नेता श्री अजय कुमार 'लल्लू' द्वारा दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 को निर्गत पत्र माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त उक्त शर्तों का अनुपालन भी नहीं करता है, अतः इसके उल्लंघन के आधार पर विपक्षी को निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता।
72-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित विधि व्यवस्थाओं एवं प्रकरण के तथ्यों के उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि दिनांक 02-10-2019 को आहूत विशेष सत्र में भाग लेने से विपक्षी निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जाना चाहिए। चूंकि सदन में भाग लेकर मतदान करने के विषय में दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) में विशिष्ट प्रावधान है, अतः प्रस्तुत याचिका को पैरा-2(1)(क)उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 23 से संबंधित नहीं माना जा सकता। संवैधानिक रूप से जो कृत्य संविधान के किसी विशेष प्रावधान के अंतर्गत आते हैं उसके विषय में दूसरे प्रावधानों को आकर्षित नहीं किया जा सकता।
73-विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है कि उसको दिनांक 02-10-2019 को तत्कालीन कांगे्रस विधान मण्डल के नेता द्वारा निर्गत किया गया व्हिप प्राप्त नहीं हुआ, अतः उसका कृत्य व्हिप के उल्लंघन में नहीं माना जा सकता। विपक्षी का यह तर्क मान्य प्रतीत नहीं होता। क्योंकि कांग्रेस के अन्य सदस्यों को इसकी सूचना थी और वे सदन में उपस्थित नहीं हुए। याची द्वारा दिनांक 02-10-2019 की कार्यवाही के प्रति याचिका के साथ संलगन की गई है जिसमें विपक्षी के वक्तव्य को भी प्रस्तुत किया गया है, अतः यह अविवादित है कि विपक्षी सुश्री अदिति सिंह दिनांक 02-10-2019 को सम्पन्न हुए सत्र में उपस्थित हुई थीं। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है कि विपक्षी ने अपनी टिप्पणी में यह कहा है कि कांग्रेस विधान मण्डल दल की एक बैठक आहूत की गई थी जिसमें सदस्यों को विशेष सत्र में भाग लेने को कहा गया था। याची ने अपने रीज्वाइंडर में इसका खण्डन नहीं किया है।
74-पत्रावली एवं सुसंगत अभिलेखों के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि दिनांक 02-10-2019 को उत्तर प्रदेश विधान सभा का विशेष सत्र महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आहूत किया गया था। इस विशेष सत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत् विकास के लक्ष्यों पर चर्चा सम्पन्न हुई थी एवं उस ही सन्दर्भ में प्रस्ताव पारित किया गया था। अतः यह स्पष्ट है कि इस सत्र में सरकार के पक्ष या विपक्ष में विश्वास मत अथवा किसी राजनीतिक दल की नीतियों या योजनाओं के विषय में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया था। तद्नुसार, कथित व्हिप के उल्लंघन से किहोटोहोलोहोन के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई अवधारणाओं के अनुसार दसवीं अनुसूची के प्रावधन आकर्षित नहीं होते हैं। दिनांक 02.10.2019 को सदन में पारित किया गया प्रस्ताव निम्नवत् हैंः-
"यह सदन प्रस्ताव करता है कि राष्ट्रपिता के उच्च आदर्शों का पालन करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत् विकास के लक्ष्यों की पूर्ति हेतु राज्य सरकार द्वारा प्रभावी कदम उठाए जाएं।"
75-उपरोक्त प्रस्ताव के परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत् विकास के लक्ष्यों की पूर्ति के संदर्भ में है। यह प्रस्ताव किसी राजनीतिक दल की नीतियों अथवा योजनाओं के विषय में नहीं है। अतः इस प्रस्ताव के समर्थन में मतदान से दसवीं अनुसूची के प्रावधान आकर्षित नहीं होंगे।
76-विपक्षी द्वारा दिनांक 02-10-2019 को आहूत किए गए विशेष सत्र में जो वक्तव्य दिए गए उनके परिशीलन से भी यह स्पष्ट होता है कि विपक्षी सुश्री अदिति सिंह ने महात्मा गांधी की विचारधारा एवं संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत् विकास के लक्ष्यों के विषय में वक्तव्य दिया है। विपक्षी द्वारा जो वक्तव्य सदन में प्रस्तुत किया गया है उसमें उन्होंने अपने मूल राजनीतिक दल कांग्रेस के अथवा कांग्रेस की नीतियों की कोई आलोचना नहीं की है। अतः यह नहीं कहा जा सकता24 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 कि सदन में अपने वक्तव्य से विपक्षी ने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता का त्याग किया हो। जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि का मूल संवैधानिक कर्तव्य है कि वह अपने विधान सभा क्षेत्र एवं अपने प्रदेश के विकास के विषय में सदन में अपनी बात रखे। जन प्रतिनिधियों को सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संसदीय लोकतंत्र की जीवन रेखा है। जन प्रतिनिधियों द्वारा सदन में स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखना भारत के संविधान का मूल तत्व है। जन प्रतिनिधियों की सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जाना संवैधानिक योजना के अनुरूप नहीं है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी इसी कारणवश दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) में वर्णित प्रावधानों का निर्वचन इस प्रकार से किया गया है जिससे मात्र उन्हीं निर्देशों को दसवीं अनुसूची की परिधि में लाया जा सके जो सदस्यों के मूल राजनीतिक दल की नीतियों एवं योजनाओं से संबंधित है अथवा जिनसे सरकार के विश्वास अथवा अविश्वास पर निर्णय होता हो। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत् विकास के लक्ष्यों अथवा महात्मा गांधी की जयंती के संदर्भ में अभिव्यक्त किया जाना कदाचित दसवीं अनुसूची के प्रावधानों को आकर्षित नहीं कर सकती है। किसी भी सदस्य के इस आचरण से उनके द्वारा मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्यागना नहीं माना जा सकता।
77-यदि जनहित के निरपेक्ष विषयों पर जन प्रतिनिधियों की सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित किया जाएगा तो वह संसदीय लोकतंत्र एवं भारत का संविधान के मूल उद्देश्यों के प्रतिकूल होगा। वर्णित स्थिति में प्रस्तुत प्रकरण में विपक्षी द्वारा महात्मा गांधी अथवा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत् विकास के लक्ष्यों के विषय में सदन में वक्तव्य दिए जाने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उनके इस कृत्य से उन्होंने अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्याग दिया हो।
78-वर्णित स्थिति में प्रस्तुत प्रकरण विशिष्ट रूप से दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) में आता है एवं विपक्षी को दिनांक 02-10-2019 को आहूत विधान सभा के विशेष सत्र में वक्तव्य के आधार पर पैरा-2(1)(क) के अन्तर्गत निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों के माध्यम से यह व्यवस्था प्रतिपादित की गई है कि कोई भी सदस्य प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष आचरण से अपने मूल राजनीति दल की सदस्यता का त्याग कर सकता है। इस संबंध में सदस्यों के कतिपय आचरण के विषय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवधारणाएं भी प्रतिपादित की गई हैं परन्तु सदन में किसी सदस्य द्वारा जनहित के निरपेक्ष विषय पर व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) के प्रावधानों को आकर्षित होने के सन्दर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोई व्यवस्था प्रतिपादित नहीं की गई है।
आदेश
प्रस्तुत प्रकरण के तथ्यों, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित की गई विधि व्यवस्थाओं एवं प्रकरण से संबंधित समस्त अभिलेखों के उपरोक्त विवेचन के परिप्रेक्ष्य में मेरा यह समाधान है कि विपक्षी सुश्री अदिति सिंह, सदस्य, उत्तर प्रदेश विधान सभा, रायबरेली सदर के सन्दर्भ में भारतउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 25 का संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधान आकर्षित नहीं होते हैं। अतः विपक्षी को दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता। तद्नुसार, प्रस्तुत याचिका बलहीन होने के कारण निरस्त की जाती है।
दिनांक : 13 जुलाई, 2020 श्री हृदय नारायण दीक्षित,
अध्यक्ष, विधान सभा, उत्तर प्रदेश।
आज्ञा से, प्रदीप कुमार दुबे, प्रमुख सचिव, विधान सभा, उत्तर प्रदेश। पी0एस0यू0पी0-एल0 06 राजपत्र (63)-13-07-2020-585+25 प्रतियां (कम्प्यूटर)।