क्रम-सं0-106
रजिस्ट्रेशन नं0-एस0एस0पी0/एल0 डब्लू/एन0पी0-91/2014-16 लाइसेन्स टू पोस्ट ऐट कन्सेशनल रेट
लखनऊ, सोमवार, दिनांक 13 जुलाई, 2020
22 आषाढ़, शक सम्वत् 1942
विधान सभा सचिवालय उत्तर प्रदेश (संसदीय अनुभाग) ---------- संख्या : 534/वि0स0/संसदीय/60(सं)/2019 लखनऊ, दिनांक 13 जुलाई, 2020
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अधिसूचना
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प्रकीर्ण
श्री अजय कुमार 'लल्लू' नेता, कांग्रेस विधान मण्डल दल, उत्तर प्रदेश, लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-7 के अन्तर्गत माननीय अध्यक्ष, विधान सभा के विचारार्थ श्री राकेश सिंह, सदस्य, उत्तर प्रदेश विधान सभा के विरुद्ध दिनांक 31 मई, 2019 को दायर की गई याचिका पर माननीय अध्यक्ष, विधान सभा द्वारा दिनांक 13 जुलाई, 2020 को किया गया विनिश्चय एतद्द्वारा सर्वसाधारण की सूचनार्थ अधिसूचित किया जाता है :-
अध्यक्ष, विधान सभा, उत्तर प्रदेश
श्री अजय कुमार 'लल्लू', सदस्य एवं नेता, उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधान मण्डल दल द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से श्री राकेश सिंह, सदस्य, विधान सभा, 179-हरचन्दपुर विधान2 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 सभा क्षेत्र, के विरुद्ध उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 सपठित संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) एवं अनुच्छेद 191(2) के अन्तर्गत प्रस्तुत की गई याचिका पर
निर्णय
संक्षेप में याचिका के तथ्य इस प्रकार हैं कि विपक्षी श्री राकेश सिंह, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के औपचारिक उम्मीदवार के रूप में विधान सभा क्षेत्र 179-हरचन्दपुर से वर्ष 2017 में निर्वाचित हुए थे। इस संबंध में याची द्वारा याचिका के साथ श्री राकेश सिंह द्वारा दिनांक 06.02.2017 को प्रस्तुत किए गए नामांकन एवं फॉर्म-ए एवं फॉर्म-बी की प्रतियां साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत की गई हैं।
2-याची का यह अभिकथन है कि विपक्षी श्री राकेश सिंह अपने आचरण से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता स्वेच्छा से त्याग कर भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित हुए हैं। इस संबंध में याचिका में यह कहा गया है कि विपक्षी के भाई श्री दिनेश प्रताप सिंह द्वारा भारतीय जनता पार्टी के चुनाव चिह्न पर दिनांक 15.04.2019 को अपना नामांकन 36-रायबरेली लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से दाखिल किया गया था। विपक्षी नामांकन दाखिल करने से पहले एवं उसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित सभाओं में सम्मिलित हुए एवं लोकसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने लगातार भारतीय जनता पार्टी के लिए कार्य किया।
3-याची की ओर से यह भी कहा गया है कि श्री राकेश सिंह द्वारा स्वतंत्र प्रत्याशी के नाम का वाहन परमिट (जिला निर्वाचन अधिकारी रायबरेली से प्राप्त कर) अपने वाहन (फॉच्र्यूनर, यू0पी0 32 जे0वाई0 2877) में प्रयोग किया गया। याची के अनुसार इस वाहन में विधान सभा सचिवालय द्वारा निर्गत स्टीकर 582 (2018) भी लगा हुआ था। याची ने यह कहा है कि विपक्षी ने इस वाहन से लगातार दिनांक 06.05.2019 को भारतीय जनता पार्टी के लिए 36-रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में भ्रमण किया। याची के अनुसार विपक्षी के इस कृत्य से उन्होंने स्वेच्छा से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता को त्याग दिया है एवं वह भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित हो चुके हैं। अतः उनको उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्यता से निरर्ह घोषित किया जाए।
4-याची द्वारा उपरोक्त वर्णित विवरण के मूल कागज़ात आदि को जिला निर्वाचन अधिकारी से प्राप्त किए जाने की अनुशंसा की गई है। याची ने यह भी कहा है कि विपक्षी श्री राकेश सिंह दिनांक 15.04.2019 से लगातार भारतीय जनता पार्टी के लिए कार्य कर रहे हैं, अतः उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्वेच्छा से छोड़ दी है।
5-उपरोक्त वर्णित तथ्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर याची ने इस पर बल दिया है कि चूंकि विपक्षी श्री राकेश सिंह ने स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता त्याग दी है, अतः संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) के अन्तर्गत उनको विधान सभा की सदस्यता से निरर्ह घोषित किया जाए।उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 3 6- याची द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के कतिपय निर्णयों का संदर्भ देते हुए यह कहा गया है कि विपक्षी का मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि व्यवस्थाओं के अनुसार दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत आता है, क्योंकि उन्होंने अपने आचरण से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्याग दिया है।
7-याची ने अंत में यह अनुरोध किया है कि यह याचिका शीघ्रातिशीघ्र निस्तारित की जाए एवं श्री राकेश सिंह, विपक्षी को उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्यता से दिनांक 15.04.2019 से निरर्ह घोषित किया जाए।
8-याचिका के साथ श्री अजय कुमार 'लल्लू', नेता, कांग्रेस विधान मण्डल दल द्वारा एक शपथ-पत्र भी याचिका के तथ्यों को सत्यापित करने हेतु प्रस्तुत किया गया है। याची की ओर से साक्ष्य के रूप में पेन ड्राइव के माध्यम से कतिपय फोटो एवं वीडियो संलग्न किए गए हैं। 9-याची की ओर से दिनांक 28 फरवरी, 2020 को इस आशय का प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया गया कि प्रकरण को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कीशाम मेघचन्द्र सिंह प्रति माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा एवं अन्य में दिनांक 21 जनवरी, 2020 को पारित निर्णय के क्रम में शीघ्र निस्तारित किया जाए। याची द्वारा यह कहा गया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपर्युक्त निर्णय में यह अवधारित किया गया है कि दसवीं अनुसूची के मामले अधिकतम तीन माह में निस्तारित किए जाए।
10-याची द्वारा प्रस्तुत किये गये इस प्रार्थना-पत्र में यह भी कहा गया है कि दिनांक 09 अक्टूबर, 2019 की विज्ञप्ति द्वारा श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना', उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधान मण्डल दल की नेता नियुक्त हो गयी हैं। दिनांक 28 फरवरी, 2020 का प्रार्थना-पत्र श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' की ओर से प्रस्तुत किया गया है। प्रार्थना-पत्र के साथ श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' को कांग्रेस विधान मण्डल दल का नेता नियुक्त किये जाने वाली विज्ञप्ति की प्रति भी प्रस्तुत की गयी है। याची द्वारा इस प्रार्थना-पत्र के साथ माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय दिनांक 21 जनवरी, 2020 की प्रति भी प्रस्तुत की गयी है।
11-दिनांक 25 जून, 2020 को याची श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' की ओर से एक अतिरिक्त शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया। इस शपथ-पत्र में याची की ओर से यह कहा गया है कि विभिन्न तिथियों पर विपक्षी को विधान सभा सचिवालय से अनुस्मारक प्रेषित करने के पश्चात् भी उन्होंने याचिका के सापेक्ष कोई उत्तर प्रस्तुत नहीं किया। अतः याचिका के संबंधित तथ्यों को स्वीकार करते हुए उसका निस्तारण किया जाना चाहिए।
12-याची की ओर से उत्तर प्रदेश विधान सभा नियमावली (दल परिवर्तन अधिनियम-1987), जिसको कि आगे 'दल परिवर्तन नियमावली-1987' कहा जाएगा, के नियम-8 के अन्तर्गत उत्तर देते हुए विपक्षी को कहा गया है कि विपक्षी को सात दिन के अन्दर अपना उत्तर प्रस्तुत करना चाहिए था। याची ने इस पर भी बल दिया है कि कीशाम मेघचन्द्र सिंह प्रति माननीय4 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा एवं अन्य के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकतम तीन माह की अवधि दसवीं अनुसूची के मामलों के निस्तारण हेतु निर्धारित की है।
13-याची की ओर से प्रस्तुत किये गये अतिरिक्त शपथ-पत्र में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विभिन्न विधि व्यवस्थाओं को संदर्भित करते हुए यह भी कहा गया है कि विपक्षी श्री राकेश सिंह ने अपने आचरण से दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1) (क) के अन्तर्गत स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्याग दिया है। इस संबंध में याची ने अतिरिक्त शपथ-पत्र में यह भी कहा है कि विपक्षी श्री राकेश सिंह लगातार भारतीय जनता पार्टी की प्रशंसा कर रहे है एवं अपनी मूल राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आलोचना कर रहे हैं। याची ने दिनांक 23 जून, 2020 के समाचार पत्र की प्रति प्रस्तुत की है, जिसमें की विपक्षी श्री राकेश सिंह के कतिपय अभिकथन प्रकाशित किये गये हैं।
14-अतिरिक्त शपथ-पत्र में याची द्वारा दिनांक 22 जून, 2020 को प्रकाशित जनसत्ता की प्रति भी प्रस्तुत की है, जिसमें विपक्षी के विषय में कतिपय समाचार प्रकाशित किये गये हैं। इसी प्रकार याची की ओर से अतिरिक्त शपथ-पत्र के माध्यम से यह भी कहा गया है कि विपक्षी द्वारा माह अक्टूबर, 2019 में आहूत उत्तर प्रदेश विधान सभा के विशेष सत्र में अपने मूल राजनीतिक दल कांग्रेस की 'व्हिप' के उल्लंघन में भाग लिया गया। इस संबंध में भी साक्ष्य हेतु समाचार पत्र की प्रति प्रस्तुत की गयी है।
15-याची द्वारा दिनांक 23 जून, 2020 के जनसत्ता की प्रति भी प्रस्तुत की है जिसमें कि विपक्षी के नागरिकता कानून के विषय में अभिकथन को प्रकाशित किया गया है। याची द्वारा यह भी कहा गया है कि नागरिकता कानून पर विपक्षी द्वारा अपने मूल राजनीतिक दल की नीतियों के विरुद्ध अभिकथन किया गया है। याची द्वारा यह कहा गया है कि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत परीक्षण किये जाने प्रकरणों के संदर्भ में समाचार पत्रों को साक्ष्य के रूप में माना जा सकता है। इस विषय में याची ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय की कतिपय विधि व्यवस्थाओं को संदर्भित किया है।
16-याची द्वारा अपने अतिरिक्त शपथ-पत्र में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की कतिपय विधि व्यवस्थाओं को संदर्भित करते हुए इस पर भी बल दिया है कि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत निर्मित दल परिवर्तन नियमावली-1987 बाध्यकारी नहीं, बल्कि मार्गदर्शी है, अतः इन नियमों के विषय में तद्नुसार निर्वचन किया जाना चाहिए।
17-विपक्षी श्री राकेश सिंह की ओर से याचिका के सापेक्ष अपना उत्तर/टिप्पणी दिनांक 29.06.2020 को प्रस्तुत किया गया। विपक्षी द्वारा संक्षेप में अपने उत्तर में प्रारम्भिक रूप से यह आपत्ति उठाई गई है कि चूंकि याचिका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अधिकृत व्यक्ति द्वारा योजित नहीं की गई है, अतः पोषणीय नहीं है एवं निरस्त होने योग्य है।
18-विपक्षी ने इस पर बल दिया है कि याची श्री अजय कुमार 'लल्लू' ने माननीय अध्यक्ष को भ्रमित करते हुए याची के रूप में प्रस्तुत याचिका योजित की है।उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 5 19-विपक्षी की ओर ये यह भी कहा गया है कि श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' द्वारा जो अतिरिक्त शपथ-पत्र दिनांक 25-06-2020 को प्रस्तुत किया गया है, वह भी त्रुटिपूर्ण है।
20-विपक्षी के अनुसार उसने कभी भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से नहीं त्यागी है और वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सदस्य है। विपक्षी की ओर से इस पर बल दिया गया है कि उसने ऐसा कोई आचरण नहीं किया है जिससे यह माना जाए कि उसने अपने मूल राजनीतिक दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, की सदस्यता स्वेच्छापूर्वक त्याग दी है। विपक्षी के अनुसार दसवीं अनुसूची के प्रावधान सपठित अनुच्छेद-191(2) प्रस्तुत प्रकरण में आकर्षित नहीं होते हैं, अतः प्रस्तुत याचिका निरस्त होने योग्य है।
21-विपक्षी ने इस पर बल दिया है कि दल परिवर्तन नियमावली, 1987 के नियम-7(5) के अनुसार याचिका के साथ संलग्न संलग्नकों को विहित प्रक्रिया के अनुसार सत्यापित नहीं किया गया है। अतः याचिका इस आधार पर निरस्त होने योग्य है।
22-विपक्षी के अनुसार दिनांक 31.05.2019 को याची की ओर से प्रस्तुत किए गए शपथ-पत्र में भ्रमित करने के उद्देश्य से यह अंकित किया गया है कि श्री अजय कुमार 'लल्लू' इस याचिका के याची हैं, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा उनको इस हेतु अधिकृत नहीं किया गया है। विपक्षी ने याचिका के अन्य तथ्यों का खण्डन करते हुए यह कहा है कि उन्होंने कभी भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता स्वेच्छा से नहीं त्यागी और न ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की है। विपक्षी के अनुसार वह वर्तमान में भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य हैं।
23-विपक्षी द्वारा अपनी टिप्पणी में यह भी कहा गया है कि वह फॉच्र्यूनर वाहन संख्या यू0पी0 32 जेवाई 2877 के स्वामी नहीं हैं। विपक्षी की ओर से इस आरोप का भी खण्डन किया गया है कि दिनांक 06.05.2019 को वह 36-रायबरेली लोकसभा निवार्चन क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी की ओर से गए थे। विपक्षी के अनुसार यह याचिका राजनीतिक द्वेष के कारण प्रस्तुत की गई है। विपक्षी ने इस आरोप का भी खण्डन किया है कि उसने भारतीय जनता पार्टी की ओर से कोई रैली आयोजित की हो अथवा भारतीय जनता पार्टी के किसी भी मंच पर वह उपस्थित हुआ हो। विपक्षी ने यह भी कहा है कि याची की ओर से साक्ष्य के रूप में जो फोटो एवं वीडियो प्रस्तुत किए गए हैं वह विपक्षी से संबंधित नहीं हैं। इन साक्ष्यों को याची ने विधिवत् सत्यापित भी नहीं किया है। याची ने यह भी कहा है कि उनको पेन ड्राइव की जो प्रति दी गई है, वह स्पष्ट नहीं है। 24-विपक्षी की ओर से यह भी कहा गया है कि याची द्वारा जो विधि व्यवस्थाएं संदर्भित की गई हैं वह प्रस्तुत प्रकरण के तथ्यों पर लागू नहीं हैं। विपक्षी की ओर से यह अनुरोध किया गया है कि प्रस्तुत याचिका निरस्त की जाए।
25-याची की ओर से विपक्षी के उत्तर के सापेक्ष एक प्रति उत्तर भी प्रस्तुत किया गया है। याची द्वारा प्रति उत्तर में प्रस्तुत की गई टिप्पणी के अभिवचनों का खण्डन करते हुए यह कहा गया6 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 है कि विपक्षी अपने आचरण से निरर्हता से ग्रस्त हो चुका है क्योंकि उसने अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को स्वेच्छा से त्याग दिया है। इस संबंध में याची द्वारा पुनः दसवीं अनुसूची के सुसंगत प्रावधानों का संदर्भ दिया गया है।
26-अपने प्रति उत्तर में पुनः याची द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित की गई विभिन्न विधि व्यवस्थाओं का संदर्भ देते हुए यह कहा गया है कि सदन का कोई भी सदस्य प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने आचरण से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को स्वेच्छा से त्याग सकता है।
27-याची द्वारा अपने प्रति उत्तर में यह भी कहा गया है कि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत की गई याचिकाओं में ट्रिब्युनल के रूप में अध्यक्ष विधान सभा को मुख्य बिन्दु पर अपना निर्णय प्रदान किया जाना है। दल परिवर्तन नियमावली के प्रावधान मार्गदर्शी हैं एवं बाध्यकारी नहीं हैं। इस संबंध में याची की ओर से माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित की गई विभिन्न विधि व्यवस्थाओं का संदर्भ भी दिया गया है।
28-अपने प्रति उत्तर में याची ने यह भी कहा है कि प्रस्तुत याचिका श्री अजय कुमार 'लल्लू' द्वारा दल परिवर्तन नियमावली, 1987 के नियम-7(2) के अन्तर्गत एक 'व्यक्ति' के रूप में योजित की गई है। यहां पर पुनः याची की ओर से इस पर बल दिया गया है कि दल परिवर्तन नियमावली 1987 के नियमों को संविधान के प्रावधानों से ऊपर नहीं माना जा सकता तथा इन नियमों का निर्वचन तकनीकी रूप से किए जाने से दसवीं अनुसूची के उद्देश्य विफल होंगे। 29-याची ने पुनः यह दोहराया है कि विपक्षी के भाई श्री दिनेश प्रताप सिंह द्वारा भारतीय जनता पार्टी की ओर से दिनांक 15.04.2019 को लोकसभा निर्वाचन हेतु 36-रायबरेली लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से नामांकन दाखिल किया गया था। विपक्षी इसमें उपस्थित था तथा उसने भारतीय जनता पार्टी के बहुत सी रैलियों में भी भाग लिया। इस संबंध में याची द्वारा वाहन संख्या यू0पी0 32 जेवाई 2877 का संदर्भ भी दिया है एवं यह कहा है कि इस वाहन हेतु विधान सभा सचिवालय द्वारा स्टीकर (पास) निर्गत किया गया था। इस वाहन हेतु जिला निर्वाचन अधिकारी से दिनांक 06.05.2019 को निर्वाचन की तिथि हेतु परमिट प्राप्त किया गया था जिस हेतु निर्दलीय प्रत्याशी की ओर से प्रार्थना पत्र दिया गया था।
30-अपने प्रति उत्तर में याची ने यह भी कहा है कि चूंकि विपक्षी की ओर से अपने उत्तर दिनांक 29.06.2020 को अत्यन्त विलम्ब से प्रस्तुत किया गया था, अतः उस तिथि तक विपक्षी के अन्य आचरण एवं कृत्यों को प्रस्तुत याचिका के निस्तारण हेतु संज्ञान में लिया जाना चाहिए। याची ने यहां पर पुनः इस पर बल दिया है कि विपक्षी लगातार अपने मूल राजनीतिक दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, के विरुद्ध अभिकथन दे रहे हैं एवं भारतीय जनता पार्टी की प्रशंसा कर रहे हैं, इस हेतु याची द्वारा जो साक्ष्य दिए गए हैं उस पर भी बल दिया गया।उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 7 31-याची ने यह भी कहा है कि विपक्षी ने दिनांक 02.10.2019 को उत्तर प्रदेश विधान सभा में आहूत विशेष सत्र में भाग लिया था, जैसा कि समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों से स्पष्ट है।
32-याची द्वारा माननीय सभापति, राज्यसभा द्वारा दिनांक 04.12.2017 को श्री राम चन्द्र प्रसाद सिंह के मामले में पारित निर्णय का संदर्भ भी दिया है। इस निर्णय के आधार पर याची द्वारा इस बिन्दु पर बल दिया गया है कि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत की गई याचिकाओं का निस्तारण अति शीघ्र किया जाना चाहिए।
33-याची द्वारा अपने प्रति उत्तर में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम चन्द्र प्रसाद सिंह प्रति शरद यादव, सिविल अपील संख्या-2004/2020 में दिनांक 19.03.2020 को पारित निर्णय का संदर्भ देते हुए इस पर बल दिया है कि माननीय अध्यक्ष के स्तर से प्रस्तुत याचिका में निर्णय होने तक के सभी कृत्य एवं परिस्थितियां तथा विपक्षी के आचरण को संज्ञान में लिया जाना चाहिए। 34-अन्त में याची ने अपने प्रति उत्तर में पुनः यह याचना की है कि विपक्षी को उनके आचरण के आधार पर स्वेच्छा से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्यागने हेतु दसवीं अनुसूची के सुसंगत प्रावधानों के अन्तर्गत निरर्ह घोषित किया जाना चाहिए।
35-याची की ओर से दिनांक 06.07.2020 को एक पत्र के माध्यम से श्री विजय बहादुर सिंह का शपथ-पत्र भी प्रस्तुत किया गया है। शपथ-पत्र में श्री विजय बहादुर सिंह द्वारा यह अभिकथन किया गया है कि वह 36-रायबरेली संसदीय क्षेत्र से लोकसभा निर्वाचन 2019 के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार थे। इस निर्वाचन का मतदान दिनांक 06.05.2019 को हुआ था। श्री विजय बहादुर सिंह द्वारा यह भी कहा गया है कि विपक्षी श्री राकेश सिंह को विधान सभा सचिवालय से वाहन संख्या यू0पी0 32 जे0वाई0 2877 (एण्डेवर) हेतु पास संख्या-582 (2018) निर्गत किया गया था एवं वह इस वाहन से विधान सभा जाते थे। उक्त शपथ-पत्र में यह अभिकथन किया गया है कि इस वाहन हेतु जिला निर्वाचन अधिकारी, रायबरेली की ओर से दिनांक 06.05.2019 को होने वाले मतदान के लिए पास जारी किया गया था। शपथकर्ता के अनुसार विपक्षी श्री राकेश सिंह द्वारा इस वाहन से दिनांक 06.05.2019 को 36-रायबरेली लोकसभा संसदीय क्षेत्र का दौरा किया गया। 36-उक्त के संदर्भ में यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विपक्षी की ओर से श्री महेन्द्र सिंह का एक शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया है, जिसमें शपथकर्ता द्वारा यह कहा गया है कि वाहन संख्या- यू0पी0 32 जे0वाई0 2877 (एण्डेवर) का वह स्वामी है तथा वह इस वाहन का उपयोग करता है। शपथकर्ता ने अपने शपथ-पत्र में यह भी कहा है कि उसने 36-रायबरेली लोकसभा संसदीय क्षेत्र के वर्ष 2019 में निर्वाचन हेतु जिला कांग्रेस कमेटी को अपना वाहन संख्या यू0पी0 32 जे0वाई0 2877 दिया था।
37-पक्षकारों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया गया। पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ताओं को सुना गया। पत्रावली एवं उस पर उपलब्ध अभिलेखों का परिशीलन मेरे स्तर से8 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 किया गया। याचिका के सुसंगत तथ्यों, अभिलेखों एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दल परिवर्तन के आधार पर निर्हरता के संबंध में प्रतिपादित की गई विधि व्यवस्थाओं के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत प्रकरण में निम्नलिखित बिन्दुओं पर विनिश्चय अपेक्षित है :-
(i)-क्या प्रस्तुत याचिका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिकृत व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत नहीं की गयी है, यदि हां तो याचिका की पोषणीयता पर इसका प्रभाव ?
(ii)-क्या याचिका तथा उसके संलग्नकों का विहित प्रक्रिया के अनुसार सत्यापन नहीं किया गया, यदि हां तो इसका प्रभाव ?
(iii)-क्या याचिका प्रस्तुत करने के पश्चात् उत्पन्न हुए कारण, कृत्यों एवं परिस्थितियों को विधिक रूप से याचिका के निस्तारण हेतु संज्ञान में लिया जाना अपेक्षित है ?
(iv)-क्या विपक्षी ने याचिका में आरोपित आचरण द्वारा अपने मूल राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता का स्वेच्छा से त्याग करने के फलस्वरूप वह दसवीं अनुसूची के पैरा-2 (1) (क) के अन्तर्गत निर्हरता से ग्रसित हो गया है ?
बिन्दु संख्या-1
38-प्रस्तुत प्रकरण में विपक्षी की ओर से इस पर अत्यधिक बल दिया गया है कि याची श्री अजय कुमार 'लल्लू', भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संविधान के सुसंगत नियमों के अन्तर्गत याचिका योजित करने हेतु अधिकृत नहीं है। याची द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है कि वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से याचिका योजित करने हेतु अधिकारिता धारित करते हैं। इसके विपरीत याची द्वारा इस संबंध में यह कहा गया है कि श्री अजय कुमार 'लल्लू' उत्तर प्रदेश विधान मण्डल दल के नेता हैं अतः वह प्रस्तुत याचिका योजित करने हेतु सक्षम है। याची की ओर से यह भी कहा गया है कि प्रस्तुत याचिका दल परिवर्तन नियमावली 1987 के नियम-7 (2) के अन्तर्गत प्रस्तुत की गयी है। अतः पोषणीय है एवं विपक्षी द्वारा इस संबंध में उठाई गई आपत्ति बलहीन होने के कारण निरस्त योग्य है।
39-विपक्षी द्वारा उठाई गई उपर्युक्त प्रारम्भिक आपत्ति के संदर्भ में मेरा यह सुनिश्चित मत है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत अध्यक्ष की भूमिका का निर्वहन अत्यंत तकनीकी आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित व्यवस्थाओं में यह अपेक्षित है कि अध्यक्ष प्रकरण से संबंधित समस्त तथ्यों को एकत्र करके अपना समाधान प्रस्तुत करे। इस कार्यवाही में न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता एवं दुरूह व्यवस्थाओं का अनुपालन किये जाने की अनिवार्यता नहीं हो सकती है। संसदीय लोकतंत्र की यह स्थापित परम्परा है कि सदन के अंदर किसी भी राजनीतिक दल के विधान मण्डल दल का नेता उस राजनीतिक दल का मुखौटा होता है। अतः कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता के रूप में श्री अजय कुमार 'लल्लू' सभी प्रकार से अपने राजनीतिक दल की ओर से संसदीय विषयों को प्रस्तुत करने हेतु सक्षम एवं अधिकृत माने जाएगे।उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 9 संसदीय परिवेश में किसी भी राजनीतिक पार्टी का विधान मण्डल दल उस राजनीतिक दल का सूक्ष्म स्वरूप है। विधान मण्डल दल का नेता सदन में अपने दल की नीतियों एवं विचारधारा के अनुसार प्रस्तुतीकरण करता है।
40-दसवीं अनुसूची के मामले यद्यपि सदन के अन्दर का मामला नहीं है, परन्तु विधान मण्डल दल के नेता दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता संबंधी याचिकाओं को प्रस्तुत करने हेतु विधिक एवं संवैधानिक रूप से सर्वथा सक्षम माने जाएंगे। दल परिवर्तन नियमावली-1987 के नियम-8 (3) में विधान मण्डल दल के नेता की अधिकारिता के विषय में प्रावधान किये गये है। वर्णित स्थिति में विपक्षी द्वारा उठाये गई यह आपत्ति की श्री अजय कुमार 'लल्लू' अथवा श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' प्रश्नगत याचिका प्रस्तुत करने हेतु अधिकारिता धारित नहीं करते हैं, मान्य नहीं है।
"… It is to be noted that the Tenth Schedule does not confer any discretion on the Chairman or Speaker of the House. Their role is only in the domain of ascertaining the relevant facts. Once the facts gathered or placed show that a member of the House has done any such act which comes within the purview of sub-paragraph (1), (2) or (3) of Paragraph 2 of the Tenth Schedule, the disqualification will apply and the Chairman or the Speaker of the House will have to make a decision to that effect".
42-उपर्युक्त वर्णित विधि व्यवस्था एवं दसवीं अनुसूची की संपूर्ण योजना के परिशीलन से यह स्पष्ट है कि याचिका प्रस्तुत करने में यदि कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि भी हुई है तो उसके आधार पर याचिका को निरस्त किया जाना दसवीं अनुसूची के उददेश्यों को विफल करेगा। यह अविवादित है कि श्री अजय कुमार 'लल्लू' कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता है, अतः वह प्रस्तुत याचिका को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से प्रस्तुत करने हेतु अधिकृत हैं। इस हेतु कांग्रेस के संविधान के अन्तर्गत उनको कोई प्रमाण-पत्र दिये जाने की आवश्यकता विधिक रूप से प्रतीत नहीं होती। विपक्षी द्वारा इस संबंध में दिया गया तर्क मान्य नहीं है। विपक्षी द्वारा इस विषय में जो विधि व्यवस्था संदर्भित की गई है वह दसवीं अनुसूची की प्रश्नगत याचिका के संदर्भ में लागू नहीं होती। तद्नुसार विपक्षी द्वारा उठाई गई प्रारम्भिक आपत्ति बलहीन होने के कारण निरस्त की जाती है। प्रस्तुत याचिका विधिवत योजित मानी जायेगी।
43-उक्त प्रारम्भिक आपत्ति के विषय में यह उल्लेखनीय है कि याचिका में श्री अजय कुमार 'लल्लू' के कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता के पद से हटने के पश्चात् श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' को कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता के रूप में याची के रूप में प्रस्तुत किया गया है। याची की ओर से दिनांक 28 फरवरी, 2020 को प्रस्तुत किये गये प्रार्थना-पत्र में इस तथ्य का10 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 उल्लेख किया गया है। श्री अजय कुमार 'लल्लू' ने यदि एक ''व्यक्ति'' के रूप में याचिका प्रस्तुत की थी जैसाकि याची के विद्वान अधिवक्ता ने सुनवाई के दौरान कहा है तो इस संबंध में श्रीमती आराधना मिश्रा 'मोना' के विधान मण्डल दल के नेता बनने के पश्चात् भी किसी परिवर्तन अथवा संशोधन की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। श्री अजय कुमार 'लल्लू' कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता से पदच्युत होने के पश्चात् भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त एवं कार्यरत है। श्री अजय कुमार 'लल्लू' उस हैसियत से भी प्रस्तुत याचिका की पैरवी करने हेतु सक्षम एवं अधिकृत हैं। अतः विधिक प्रयोजन हेतु प्रस्तुत याचिका में श्री अजय कुमार 'लल्लू' को ही याची माना जाएगा।
बिन्दु संख्या-2
44-विपक्षी द्वारा प्रस्तुत प्रकरण में इस आपत्ति पर भी अत्यंत बल दिया गया है कि याचिका एवं उसके साथ लगाये गये संलग्नों का विहित प्रक्रिया के अनुसार सत्यापन नहीं किया गया है। दल परिवर्तन नियमावली 1987 के नियम-7 (5) एवं (6) में याचिका एवं उसके उपाबन्धों के सत्यापन की प्रक्रिया विहित की गयी है। सामान्य रूप से याची से यह अपेक्षित है कि वह तदनुसार याचिका एवं उसके उपबन्धों का सत्यापन करें। प्रस्तुत प्रकरण में ऐसा प्रतीत होता है कि याचिका के संलग्नकों का सत्यापन विहित प्रक्रिया के अनुसार नहीं किया गया है। याचिका एवं उसके संलग्नकों के सत्यापनों को अत्यंत तकनीकी रूप से परीक्षित किये जाने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता है। 45-संविधान की दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत सत्यापन की प्रक्रिया का निर्वचन उदारतापूर्वक किया जाना अपेक्षित है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डॉ0 महाचन्द्र प्रसाद सिंह प्रति सभापति, बिहार विधान परिषद् एवं अन्य (2004, 8 SCC, 747) में उद्धोषित निम्नलिखित अवधारणायें इस संबंध में सुसंगत हैं :
16, Sub-rule (1) of Rule 6 says that no reference of any question as to whether a member has become subject to disqualification under the Tenth Schedule shall be made except by a petition in relation to such member made in accordance with the provisions of the said rule and sub-rule (6) of the same rule provides that every petition shall be signed by the petitioner and verified in the manner laid down in the Code of Civil Procedure for the verification of pleadings, The heading of Rule 7 is "Procedure". Sub-rule (1) of this rule says that on receipt of petition under Rule 5, the Chairman shall consider whether the petition complies with the requirement of the said rule and sub-rule (2) says that if the petition does not comply with the requirement of rule 6, the Chairman shall dismiss the petition, These rules have been framed by the Chairman in exercise of power conferred by paragraph 8 of the Tenth Schedule, The purpose and object of the Rules is to facilitate the job of the Chairman in discharging his duties and any dispute as to whether a member of the House has become subject to disqualification under the Tenth Schedule. The Rules being in the domain of procedure, are intended to facilitate the holding of inquiry and not to frustrate orउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 11 obstruct the same by introduction of innumerable technicalities. Being subordinate legislation, the Rules cannot make any provision which may have the effect of curtailing the content and scope of the substantive provision, namely, the Tenth Schedule. There is no provision in the Tenth Schedule to the effect that until a petition which is signed and verified in the manner laid down in CPC for verification of pleadings is made to the Chairman or the Speaker of the House, he will not get the jurisdiction to give a decision as to whether a member of the House has become subject to disqualification under the Schedule. Paragraph 6 of the Schedule does not contemplate moving of a formal petition by any person for assumption of jurisdiction by the Chairman or the Speaker of the House. The purpose of Rules 6 and 7 is only this much disqualified for being a member of the House under Paragraph 2, may be moving to the notice of the Chairman. There is no lis between the person moving the petition and the member of the House who is alleged to have incurred a disqualification. It is not an adversarial kid of litigation where he make no difference as a duty is cast upon the Chairman or the Speaker to carry out the mandate of the constitution provision viz. the Tenth Schedule. The object of Rule 6 which requires that every petition shall be signed by the petitioner and verified in the manner laid down in CPC for the verification of pleadings, is that frivolous petitions making false allegations may not be filed in order to cause harassment. It is not possible to give strict interpretation to Rules 6 and 7 otherwise the very object of the Constitution (Fifty Second Amendment) Act by which the Tenth Schedule was added would be defeated.
46-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित किये गये उपर्युक्त विधिक सिद्धांत के आलोक में यह नहीं कहा जा सकता कि विधिवत सत्यापन न होने के आधार पर याचिका का संज्ञान नहीं लिया जाएगा अथवा यह कि याचिका पोषणीय नहीं है। तद्नुसार विपक्षी द्वारा उठाई गई यह आपत्ति अस्वीकार की जाती है।
बिन्दु संख्या-3
47-याची द्वारा अपने प्रति उत्तर में इस पर बल दिया गया है कि चूंकि विपक्षी की ओर से अत्यन्त विलम्ब से दिनांक 29.06.2020 को अपनी टिप्पणी/उत्तर याचिका के सापेक्ष प्रस्तुत किया गया है, अतः उस तिथि तक विपक्षी के कृत्यों एवं आचरण को संज्ञान में लिया जाना विधिक रूप से अपेक्षित है। याची ने इस पर बल दिया है कि विपक्षी लगातार अपने मूल राजनीतिक दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, की आलोचना कर रहे हैं एवं भारतीय जनता पार्टी की प्रशंसा कर रहे हैं, इस संबंध में याची की ओर से अपने प्रति उत्तर में विपक्षी के अभिकथनों से संबंधित कतिपय समाचार पत्रों की प्रतियां साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत की हैं। यह समस्त प्रतियां याचिका प्रस्तुतीकरण की तिथि के बाद की हैं। प्रस्तुत की गई समाचार पत्र की प्रतियां माह दिसम्बर 2019, माह जुलाई 2020 आदि की हैं। याची ने इस पर बल दिया है कि विलम्ब से विपक्षी द्वारा उत्तर प्रस्तुत करने के कारण याची का यह अधिकार बनता है कि वह याचिका प्रस्तुत करने के पश्चात् भी उत्पन्न हुए कारणों को ट्रिब्युनल12 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 के संज्ञानार्थ प्रस्तुत करे। इस संबंध में याची ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम चन्द्र प्रसाद सिंह प्रति शरद यादव, सिविल अपील संख्या-2004/2020 में दिनांक 19.03.2020 को पारित निर्णय का संदर्भ दिया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त प्रकरण में व्यक्त की गई अवधारणा के सुसंगत अंश निम्नवत् हैं :-
"An event or a conduct of a person even though subsequent to passing of an order of Speaker or Chairman ordinarily may not be relevant for determining the validity of the order of the Speaker or Chairman but in a case where subsequent event or conduct of member is relevant with respect to state of affairs as pertaining to the time when member has incurred disqualification, that subsequent events can be taken into consideration by the High Court in exercise of its jurisdiction under Article 226.
48-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई उपरोक्त अवधारण से यह स्पष्ट है कि यह निर्णय माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत प्रस्तुत रिट याचिका के परीक्षण के संदर्भ में पारित किया गया है। यह निर्णय अध्यक्ष अथवा सभापति के निर्णयों की वैधानिकता के परीक्षण के संदर्भ में माननीय उच्च न्यायालय की अधिकारिता के विषय में पारित किया गया है। उपरोक्त निर्णय अध्यक्ष विधान सभा अथवा सभापति विधान परिषद् द्वारा दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत पारित किए जाने वाले निर्णयों के विषय में उद्घोषित नहीं किया गया है। अतः उपरोक्त निर्णय प्रस्तुत प्रकरण के तथ्यों के विषय में लागू नहीं होता है।
49-इस संबंध में यह भी उल्लेखनीय है कि उपरोक्त निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह भी अभिव्यक्त किया गया है कि सामान्य रूप से अध्यक्ष अथवा सभापति द्वारा दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत पारित किए जाने वाले निर्णय के संदर्भ में याचिका प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् के कृत्य अथवा तथ्य संज्ञान में नहीं लिए जाते हैं। जैसा कि उपरोक्त निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवधारित किया गया है, जो निम्नानुसार हैः-
"The decision taken by the Speaker, thus, has to be on the basis of conduct or actions taken by member, which may amount to voluntarily giving up his membership. The facts and sequence of the events on the basis of which Hon'ble Chairman came to the conclusion that a person has incurred disqualification under paragraph 2(1)(a) of the Tenth Schedule are all facts, which had occurred prior to adjudication by the Hon'ble Chairman. In the facts of the present case, the Chairman of Rajya Sabha has passed the order on 04.12.2019 on the claim of the appellant praying for disqualification as noticed above. The foundation of order of the Chairman is the facts and events, which took place after 26.07.2017. The petition having been filed by the appellant on 02.09.2017, petition has to be treated to be founded on facts and events, which took place on or before 02.09.2017."उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 13 50-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम चन्द्र सिंह के प्रकरण में पारित निर्णय के उपरोक्त अंशों के परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि अध्यक्ष का निर्णय याचिका के प्रस्तुतीकरण की तिथि या उसके पूर्व कारित हुए तथ्यों एवं कृत्यों पर ही आधारित होगा।
51-विधि का यह स्थापित सिद्धांत है कि न्यायिक अथवा अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारी द्वारा याचिका में वर्णित तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में ही निर्णय प्रदान किया जाना अपेक्षित है। याचिका के पश्चात् कारित हुए कृत्यों अथवा तथ्यों को संज्ञान में लिए जाने की कोई विधिक मान्यता नहीं है। दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत भी अध्यक्ष द्वारा याचिका में वर्णित तथ्यों के आधार पर ही निर्णय लिया जाना विधिक रूप से अपेक्षित है। याची का यह कथन सर्वथा विधि के विपरीत है कि याचिका के पश्चात् विपक्षी द्वारा जो कृत्य किए गए हैं उनको प्रस्तुत प्रकरण में संज्ञान में लिया जाना चाहिए। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि याची ने यह कथन अपने प्रति उत्तर में किया है। यह सर्वविदित है कि प्रति उत्तर के सापेक्ष उत्तर दिए जाने की कोई विधिक व्यवस्था नहीं है। अतः प्रति उत्तर (रीज्वाइंडर) के माध्यम से दिए गए नए तथ्यों के संदर्भ में विपक्षी को अपनी आख्या देने का कोई अवसर प्राप्त नहीं होगा। यदि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत इस प्रकार से नए तथ्यों को संज्ञान में लिया जाता रहेगा तो दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत किए गए मामलों का अंतिम निस्तारण किया जाना कठिन हो जाएगा। जैसा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजेंद्र सिंह राणा एवं अन्य प्रति स्वामी प्रसाद मौर्या एवं अन्य (एआईआर 2007 एससी 1305) में अवधारित किया है।
"As we see it, the act of disqualification occurs on a member voluntarily giving up his membership of a political party or at the point of defiance of the whip issued to him. Therefore, the act that constitutes disqualification in terms of paragraph 2 of the Tenth Schedule is the act of giving up or defiance of the whip.
The fact that a decision in that regard may be taken in the case of voluntary giving up by the Speaker at a subsequent point of time cannot and does not postpone the incurring the disqualification by the act of the Legislator. Similarly, the fact that the party could condone the defiance of a whip within 15 days or that the Speaker takes the decision only thereafter in those cases, cannot also pitch the time of disqualification as anything other than the point at which the whip is defied.
Therefore, in the background of the object sought to be achieved by the Fifty Second Amendment of the Constitution and on a true understanding of paragraph 2 of the Tenth Schedule, with reference to the other paragraphs of the Tenth Schedule, the position that emerges is that the Speaker has to decide the question of disqualification with reference to the date on which the member voluntarily gives up his membership or defies the whip. It is realty a decision ex post facto.
The fact that in terms of paragraph 6, a decision on the question has to be taken by the Speaker or the Chairman, cannot lead to a conclusion that the question has to be determined only with reference to the date of the decision of the Speaker. An interpretation of that nature would leave the disqualification to an indeterminate point of time and to the whims of the decision making authority.
14 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई052-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रस्तुत किए गए उपरोक्त सिद्धान्त के परिशीलन से यह स्पष्ट है कि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत याचिका में वर्णित तथ्यों एवं कारणों के सापेक्ष ही निर्णय लिया जाना अपेक्षित है। अतः प्रस्तुत प्रकरण में दिनांक 31.05.2019 को प्रस्तुत की गई याचिका एवं उसमें वर्णित कृत्यों के परिप्रेक्ष्य में ही संवैधानिक रूप से प्रकरण का समाधान किया जाना होगा। याची का यह तर्क मान्य नहीं है कि विलम्ब से उत्तर प्रस्तुत करने के कारण उत्तर प्रस्तुत करने की तिथि तक के सभी तथ्यों एवं परिस्थितियों को संज्ञान में लिया जाना चाहिए।
53-याची ने प्रस्तुत प्रकरण में इस पर भी अत्यन्त बल दिया है कि विपक्षी की ओर से कई अनुस्मारक प्रस्तुत करने के पश्चात् भी समय से अपना उत्तर प्रस्तुत नहीं किया गया है। विपक्षी के अनुसार दल परिवर्तन नियमावली 1987 के नियम-8 के अन्तर्गत सात दिन के भीतर विपक्षी द्वारा उत्तर प्रस्तुत किया जाना अपेक्षित था। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है कि नियम-8(3) के अंतर्गत यद्यपि सात दिनों के अन्दर ही विपक्षी द्वारा उत्तर प्रस्तुत किया जाना अपेक्षित है, परन्तु इस अवधि को पर्याप्त कारणों के आधार पर अध्यक्ष द्वारा विस्तारित किया जा सकता है। यद्यपि मेरा यह सुनिश्चित मत है कि दसवीं अनुसूची के प्रकरणों को एक निश्चित समय की अवधि में ही निस्तारित किया जाना चाहिए, अन्यथा दसवीं अनुसूची के उद्देश्यों का हनन् होगा, परन्तु इस संबंध में यह भी आवश्यक है कि पक्षकारों को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अन्तर्गत पर्याप्त सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जगजीत सिंह प्रति हरियाणा राज्य (2006, 11 एससीसी 1) में व्यक्त की गई निम्नलिखित अवधारणा के सुसंगत अंश निम्नवत् हैंः-
"At the outset, we may mention that while considering the plea of violation of
principles of natural justice, it is necessary to bear in mind that the proceedings under
the Tenth Schedule are not comparable to either a trial in a court of Law or
departmental proceedings for disciplinary action against an employee. But the
proceedings here are against an elected representative of the peopleand the Judge holds
the independent high office of a Speaker. The scope of judicial review in respect of
proceedings before such Tribunal is limited. We may hasten to add that howsoever
limited may be the field of judicial review, the principles of natural justice have to be
complied with and in their absence, the orders would stand vitiated.
54-इसी प्रकार रवि एस0 नायक प्रति यूनियन ऑफ इण्डिया (ए0आई0आर0 1994 एस0सी0, 1558) में भी दसवीं अनुसूची के प्रकरणों में नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुपालन हेतु माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निम्नलिखित अवधारणा व्यक्त की गयी है :
"Principles of natural justice have an important places in modern
Administrative Law. They have been defined to mean "fair play in action". (See :
Smt. Menaka Gandhi v. Union of India, (1978) 2 SCR 621 at p 676 :(AIR 1978 SC
597 at p 625) Bhagwati, J.) . As laid down by this Court "they constitute the basic
element of a fair hearing. having their roots in the innate sense of man for fair
उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 15play and justice which is not the preserve of any particular race or country but is
shared in common by all men"(Union of India v. Tulsi Ram, 1985 Supp (2) SCR
131 at p 225) :(AIR 1985 SC 1416 at p. 1456)). An order of an outhority
exercising judical of quasi-judiciat functions passed in violation of the prineiples
of natural justice is prodedurally ultra vires and therefore, suffers from a
jurisdictional error. That is the reason why in spite of the finality imparted to the
decision of the Ppeakers/Chairmen by paragaraph 6 (1) of the Tenth Schedule
such a decision is subject to judicial review on the ground of non- compliance
with rules of natural justice.
55-माननीय सर्वोच्च न्यायालय की उपरोक्त अवधारणा से यह स्पष्ट है कि दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत ट्रिब्युनल के रूप में कार्य करते हुए अर्द्ध-न्यायिक अधिकरण की भूमिका के रूप में अध्यक्ष द्वारा नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का अनुपालन करना अनिवार्य है। इसी के साथ वर्तमान में असाधारण परिस्थितियों को भी प्रकरण के निस्तारण में कारित हुए विलम्ब के सापेक्ष संज्ञान में लिया जाना उपयुक्त होगा। कोविड-19 के कारण उत्पन्न हुई परिस्थितियों से पूरा विश्व ग्रस्त है। वैश्विक महामारी के इस वातावरण में संविधान की सभी धाराओं के कार्य प्रभावित हुए हैं। लॉकडाउन घोषित होने के पश्चात् सामाजिक गतिविधियों में भी व्यवधान हुआ। अतः प्रस्तुत प्रकरण के निस्तारण में हुए विलम्ब का आकलन करते समय इन परिस्थितियों को भी दृष्टिगत रखा जाना न्यायहित में होगा। 56-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कीशाम मेघचन्द्र सिंह प्रति माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा एवं अन्य (2020 (1) SCALE 299) में पारित निर्णय में भी असाधारण परिस्थितियों को संज्ञान में लिए जाने की अवधारणा व्यक्त की गयी है जो कि उक्त निर्णय के निम्नलिखित अंशों से स्पष्ट है :
"...Indeed, the Speaker, in acting as a Tribunal under the Tenth Schedule is
bound to decide disqualification petitions within a reasonable period. What is
resonable will depend on the facts of each case but absent exceptional circumstances
for which there is good reason. a period of three months from the date on which the
petition is filed is the outer limit within which disqualification petitions filed is the outer
limit within which disqualification petitions filed before the Speaker must be decided if
the constitutional objective of disqualifying persons who have infracted the Tenth
Schedule is to be adhered to."
57-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त मामले में दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत प्रस्तुत किए गए प्रकरणों को अधिकतम तीन माह में निस्तारित करने के निर्देश दिए गए हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अवधारणाएं सम्माननीय हैं। दसवीं अनुसूची के उद्देश्यों को सफल बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इन प्रकरणों का निस्तारण माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित अवधि में कर दिया जाए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो विधि व्यवस्था प्रतिपादित की गई है, भविष्य में उसके समादर में कार्यवाही किया जाना अपेक्षित एवं अपरिहार्य होगा। इससे दसवीं अनुसूची के16 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 उद्देश्यों की पूर्ति होगी एवं संवैधानिक मंतव्यों को मूर्त रूप भी दिया जा सकेगा। ट्रिब्युनल के रूप में कार्य करते हुए सभी विधायिकाओं के अध्यक्षों का यह नैतिक एवं संवैधानिक दायित्व है कि दल बदल के आधार पर निरर्हता के प्रकरणों को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित की गई अवधि में निस्तारित करें। प्रस्तुत प्रकरण में विपक्षी का उत्तर निश्चित रूप से विलम्ब से प्राप्त हुआ है। अध्यक्ष के रूप में मेरे स्तर से प्रकरण में एक पक्षीय कार्यवाही किए जाने के निदेश दे दिए गए थे, परन्तु इसी बीच दिनांक 29.06.2020 को विपक्षी की ओर से उत्तर प्रस्तुत कर दिया गया एवं याची को उस संबंध में अपना प्रति उत्तर प्रस्तुत करने हेतु आवश्यक समय देने के पश्चात् प्रकरण में सुनवाई समाप्त करने के निर्णय को सुरक्षित कर दिया गया।
बिन्दु संख्या-4
58-प्रस्तुत याचिका में मुख्य रूप से इस आधार पर विपक्षी श्री राकेश सिंह, सदस्य, विधान सभा को दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत निरर्ह किए जाने का अनुतोष चाहा गया है कि उन्होंने अपने आचरण से मूल राजनीकि दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता स्वेच्छा से त्याग दी है एवं भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित हो गए हैं। याचिका में इस संबंध में यह कहा गया है कि विपक्षी अपने भाई श्री दिनेश प्रताप सिंह द्वारा भारतीय जनता पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्वाचन हेतु दिनांक 15.04.2019 को 36-रायबरेली लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से नामांकन दाखिल करने के समय उपस्थित थे। नामांकन दाखिल करने से पूर्व एवं उसके पश्चात् विपक्षी श्री राकेश सिंह भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित सभाओं में सम्मिलित हुए एवं लगातार भारतीय जनता पार्टी के लिए कार्य करते रहे। इस संबंध में याची की ओर से एक पेन ड्राइव संलग्नक के रूप में प्रस्तुत की गई है जिसमें विपक्षी श्री राकेश सिंह से संंबंधित फोटोग्राफ एवं वीडियो उपलब्ध हैं।
59-याची ने विशिष्ट रूप से वाहन संख्या यू0पी0 32 जे0वाई0 2877 के विषय में उल्लेख किया है कि विपक्षी ने एक स्वतंत्र प्रत्याशी के नाम पर इस वाहन हेतु जिला निर्वाचन अधिकारी, रायबरेली से मतदान दिवस के लिए परमिट प्राप्त किया एवं 36-रायबरेली लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी के कार्य के लिए भ्रमण किया। इस संबंध में याची ने यह भी कहा है कि उक्त वाहन हेतु विधान सभा सचिवालय से स्टीकर 582 (2018) निर्गत किया गया। इस संबंध में याची द्वारा कतिपय फोटोग्राफ भी प्रस्तुत की गई। याची द्वारा प्रस्तुत की गई फोटोग्राफ में वाहन संख्या यू0पी0 32 जे0वाई0 2877 दर्शाया गया है। इस वाहन के एक फोटोग्राफ में विधान सभा सचिवालय से निर्गत विधायक का पास भी लगा हुआ है तथा वाहन में मतदान हेतु निर्गत किया गया परमिट भी चस्पा है। याची के अनुसार उक्त वाहन की यह तस्वीरें मतदान दिवस की हैं तथा यह कि विपक्षी इसी वाहन से दिनांक 06.05.2019 को मतदान के दिन भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में दौरा कर रहा था।उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 17 60-उक्त के संदर्भ में याची की ओर से एक शपथ पत्र श्री विजय बहादुर सिंह की ओर से प्रस्तुत किया गया है जिसमें शपथकर्ता द्वारा यह कहा गया है कि वह 36-रायबरेली संसदीय क्षेत्र से लोकसभा निर्वाचन 2019 के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार था। शपथकर्ता ने यह भी कहा है कि विधायक राकेश सिंह को विधान सभा सचिवालय से उक्त वाहन हेतु पास जारी किया गया था तथा यह कि विपक्षी द्वारा उक्त वाहन हेतु जिला निर्वाचन अधिकारी से मतदान के संबंध में दिनांक 06.05.2019 हेतु परमिट जारी कराया गया था। शपथकर्ता के अनुसार विपक्षी ने इस वाहन से मतदान के समय लगातार दौरा किया। इसके विपरीत विपक्षी की ओर से इस संदर्भ में श्री महेंद्र सिंह का एक शपथ पत्र प्रस्तुत किया गया है जिसमें शपथकर्ता ने यह कहा है कि वह उक्त वाहन का स्वामी है एवं वह उसका प्रयोग करता है। श्री महेन्द्र सिंह द्वारा अपने शपथ पत्र में यह भी कहा गया है कि उसने विगत लोकसभा निर्वाचन हेतु जिला कांग्रेस कमेटी रायबरेली को अपनी गाड़ी उपयोग हेतु दी थी। 61-उपरोक्त वर्णित अभिकथनों एवं साक्ष्यों से यह प्रकट होता है कि कथित वाहन संख्या यू0पी0 32 जे0वाई0 2877 विपक्षी श्री राकेश सिंह द्वारा प्रयोग की जा रही थी। परन्तु इन परिस्थितियों से एवं तथ्यों से यह सिद्ध नहीं होता कि उपरोक्त वाहन भारतीय जनता पार्टी के प्रचार में विपक्षी द्वारा प्रयोग किया गया अथवा यह कि इस वाहन से विपक्षी द्वारा भारतीय जनता पार्टी के मतदान हेतु प्रचार किया गया। याची द्वारा इस संबंध में जो तस्वीरें प्रस्तुत की गई हैं उनमें वाहन की तस्वीरें हैं तथा वाहन पर विधान सभा सचिवालय का पास एवं जिला निर्वाचन अधिकारी रायबरेली द्वारा निर्गत किया गया परमिट चस्पा है परन्तु मात्र इस तस्वीर से यह सिद्ध नहीं होता है कि यह वाहन भारतीय जनता पार्टी के प्रचार हेतु प्रयोग किया गया हो।
62-विधान सभा सचिवालय द्वारा विधायकों के प्रार्थना-पत्रों पर उनके द्वारा प्रयोग किए जा रहे वाहन पर पास निर्गत किए जाते हैं। इसमें कोई विवाद नहीं है कि इस वाहन के लिए विधान सभा सचिवालय से पास निर्गत किया गया था तथा जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा मतदान दिवस पर दौरे के लिए परमिट निर्गत किया गया था। विपक्षी की ओर से प्रस्तुत किए गए श्री महेंद्र सिंह के शपथ पत्र में यह कहा गया है कि वह उस वाहन के स्वामी है और उसके साथ वाहन का पंजीकरण प्रमाण-पत्र भी लगा हुआ है।
63-श्री महेन्द्र सिंह द्वारा यह कहा गया है कि उन्होंने यह वाहन जिला कांग्रेस कमेटी को प्रयोग हेतु दिया था। याची की ओर से जो शपथ पत्र श्री विजय बहादुर सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया है उसमें यह कहा गया है कि यह वाहन विपक्षी द्वारा प्रयोग किया जाता था तथा दिनांक 06.05.2019 को रायबरेली में लोकसभा निर्वाचन के दौरान विपक्षी ने इस वाहन का प्रयोग किया परन्तु श्री वीर बहादुर सिंह के शपथ पत्र अथवा याची द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों से यह सिद्ध नहीं होता है कि यह वाहन विपक्षी द्वारा भारतीय जनता पार्टी के प्रचार में प्रयोग किया गया हो। वर्णित स्थिति में उक्त वाहन हेतु मतदान दिवस के परमिट अथवा उक्त वाहन के संबंध में याची18 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 द्वारा प्रस्तुत की गई तस्वीरों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के लिए कार्य कर रहे थे।
64-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित की गई विधि व्यवस्थाओं में यह स्पष्ट रूप से अवधारित किया गया है कि कोई भी सदस्य प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता अपने आचरण के आधार पर त्याग सकता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत यह एक प्रतिपादित सिद्धांत है कि कोई भी सदस्य त्यागपत्र के अतिरिक्त भी अपने आचरण एवं कार्य व्यवहार से मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को स्वेच्छा से त्याग सकता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसे मामलों में निर्णय दिए गए हैं जहां पर सदस्यों द्वारा माननीय राज्यपाल से भेंट करके अपने राजनीतिक दल के विरुद्ध वक्तव्य दिया हो अथवा किसी भी राजनीतिक मंच से अपने मूल राजनैतिक दल के विरुद्ध वक्तव्य दिया हो। परन्तु ऐसे आचरण को सिद्ध करने हेतु विशिष्ट साक्ष्य होने चाहिए।
65-प्रस्तुत प्रकरण में याची की ओर से ऐसे कोई विशिष्ट एवं विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं जिससे यह सिद्ध हो कि विपक्षी श्री राकेश सिंह द्वारा यह वाहन भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचन में प्रचार या अन्य कार्य के लिए प्रयोग किया गया हो। विपक्षी एक राजनैतिक कार्यकर्ता है तथा वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के निर्वाचित विधायक भी हैं। अतः लोकसभा निर्वाचन के दौरान उनके द्वारा अपनी पार्टी के प्रचार में अथवा राजनैतिक व्यक्ति होने के कारण मतदान परमिट प्राप्त किया जा सकता है तथा मतदान के दिन दौरा भी किया जा सकता है परन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि वह मतदान के दिन दौरा भारतीय जनता पार्टी के लिए कर रहे थे। याची द्वारा इस संबंध में प्रस्तुत किए गए साक्ष्य अपर्याप्त हैं। उनके आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि विपक्षी राकेश सिंह द्वारा उपरोक्त वाहन से भारतीय जनता पार्टी का प्रचार किया गया हो। वर्णित स्थिति में इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि याची ने अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से त्याग दी हो।
66-उपरोक्त के अतिरिक्त याची की ओर से कतिपय ऐसे फोटोग्राफ भी साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं जिनमें यह दर्शाया गया है कि विपक्षी लोगों को एक बैठक में सम्बोधित कर रहे हैं जिसमें कुछ बच्चे भारतीय जनता पार्टी की टोपी पहने हुए हैं। विपक्षी की ओर से इस संबंध में यह कहा गया है कि यह फोटोग्राफ बैठक में दर्शाए गए मंदिर के समारोह की है तथा यह कि कोई राजनैतिक सभा नहीं थी। कथित फोटोग्राफ के माध्यम से यह प्रकट होता है कि उसमें तीन से चार बच्चे भारतीय जनता पार्टी की टोपी अथवा स्कार्फ पहने हुए हैं। फोटोग्राफ में जिस प्रकार से लोग दर्शाये गए हैं उनकी संख्या बीस से अधिक नहीं होगी। सामान्य रूप से राजनीतिक सभाओं में अलग तरह के परिदृश्य होते हैं। फोटोग्राफ से यह सिद्ध नहीं होता है कि यह भारतीय जनता पार्टी की राजनैतिक सभा है। इस फोटोग्राफ में भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता अथवा कार्यकर्ता भी नहींउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 19 दर्शाया गया। याची द्वारा भी ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है कि विपक्षी के साथ भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता उपस्थित हो। वर्णित स्थिति में इस फोटोग्राफ के आधार पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि विपक्षी इस फोटोग्राफ में भारतीय जनता पार्टी के लिए ही कार्य कर रहे हैं। 67-याची की ओर से साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किये गये पेनड्राइव में इस आशय का वीडियो भी उपलब्ध कराया गया है, जिसमें कि विपक्षी श्री राकेश सिंह की तस्वीर ऐसे स्थल पर है जहाँ पर कि प्रदेश के उप मुख्य मंत्री की सभा आरम्भ होने वाली है। वीडियों में प्रदेश के उप मुख्य मंत्री की तस्वीर मंच पर लगी हुई है तथा विपक्षी श्री राकेश सिंह सभा स्थल में अन्य जनता के साथ खड़े हुए हैं। इस वीडियो में सभा प्रारम्भ नहीं हुई है ओर न ही मंच से काई उद्बोधन हो रहा है। विपक्षी श्री राकेश सिंह द्वारा मंच से कोई उद्बोधन किया जाना भी नहीं दर्शाया गया है। विपक्षी मंच पर उपस्थित नहीं है, बल्कि सभा में खड़े हैं। मात्र इस वीडियो के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि विपक्षी ने भारतीय जनता पार्टी के लिए कार्य किया है अथवा यह की वह भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित हो गया है। यदि विपक्षी मंच पर उपस्थित होते अथवा भारतीय जनता पार्टी की रैली में मंच से उद्बोधन कर रहे होते तो ऐसे आचरण को दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1) (क) के अन्तर्गत माना जा सकता था। मात्र सभास्थल में रैली प्रारम्भ होने से पहले खड़े होना इस बात का द्योतक नहीं माना जा सकता कि वह भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित हो गए हैं अथवा यह कि वह भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रचार कर रहे हैं। वर्णित स्थिति में याची द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि आचरण से विपक्षी ने स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्याग दिया हो।
68-याचिका में उपर्युक्त तथ्यों के अतिरिक्त अन्य कोई आधार दसवीं अनुसूची के पैरा-2 (1)(के) के संदर्भ में प्रस्तुत नहीं किया गया है। अपने प्रति उत्तर में याची ने यह भी कहा है कि दिनांक 02.10.2019 को उत्तर प्रदेश विधान सभा के विशेष सत्र में विपक्षी ने कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता के निदेशों के विपरीत भाग लिया। याची ने यह तथ्य अपनी याचिका में प्रस्तुत नहीं किया था अतः इस तथ्य के विषय में परीक्षण किए जाने का कोई विधिक औचित्य नहीं है। प्रति उत्तर में आधार लिया जाना सर्वथा विधिमान्य नहीं है। याची ने प्रस्तुत याचिका दसवीं अनुसूची के पेरा-2(1)(क) के अन्तर्गत प्रस्तुत की है। किसी व्हिप अथवा निदेश के उल्लंघन में सदन में चर्चा अथवा मतदान में भाग लेना दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) का विषय है। इस कारणवश भी विपक्षी द्वारा विशेष सत्र में भाग लिए जाने वाले आधार को प्रस्तुत याचिका में परीक्षित किए जाने का कोई औचित्य नहीं है। यदि यह मान भी लिया जाए कि विपक्षी ने कथित व्हिप के उल्लंघन में विशेष सत्र में भाग लिया या तो भी इस आधार पर विपक्षी को निरर्ह घोषित किया जाना तब तक संभव नहीं होगा जब तक कि याची यह न दर्शाये कि उस व्हिप में ऐसे निदेश दिए गए थे कि यदि उसके उल्लंघन से सदस्य सदन के सत्र में भाग लेता है तो उसको दल बदल के आधार पर निरर्हित किया जा सकता है। जैसा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किहोटोहोनोहोल के मामले में20 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 13 जुलाई, 2020 ई0 प्रतिपादित विधि व्यवस्था में अवधारित किया है। याची द्वारा ऐसा नहीं दर्शाया गया है कि कथित व्हिप में ऐसी चेतावनी दी गयी थी। अतः याची का यह तर्क मान्य नहीं है।
69-उपर्युक्त वर्णित विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि याची द्वारा जो आधार विपक्षी के विरुद्ध निरर्हता हेतु प्रस्तुत किए गए हैं वह बलहीन हैं। याची द्वारा प्रस्तुत किए गए आरोपों अथवा आधारों के अन्तर्गत यह नहीं कहा जा सकता कि विपक्षी श्री राकेश सिंह ने स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता को त्याग दिया है। अतः विपक्षी श्री राकेश सिंह को संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) के अंतर्गत स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल को त्यागने के आधार पर निरर्ह घोषित किए जाने का कोई औचित्य नहीं है।
आदेश
प्रस्तुत प्रकरण के तथ्यों, संबंधित अभिलेखों एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित की गई विधि व्यवस्थाओं के उपर्युक्त वर्णित विश्लेषण के आलोक में मेरा यह विनिश्चय है कि प्रतिपक्षी श्री राकेश सिंह, सदस्य उत्तर प्रदेश विधान सभा, 179-हरचंदपुर विधान सभा क्षेत्र, के संदर्भ में भारत का संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधान आकर्षित नहीं होते हैं। अतः विपक्षी को दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता। प्रस्तुत याचिका बलहीन होने के कारण निरस्त की जाती है।
दिनांक : 13 जुलाई, 2020 श्री हृदय नारायण दीक्षित,
अध्यक्ष, विधान सभा, उत्तर प्रदेश।
आज्ञा से, प्रदीप कुमार दुबे, प्रमुख सचिव, विधान सभा, उत्तर प्रदेश। पी0एस0यू0पी0-एल0 07 राजपत्र (64)-13-07-2020-585+25 प्रतियां (कम्प्यूटर)।