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Uttar Pradesh Extraordinary Gazette · Government of Uttar Pradesh

Decision by Hon'ble Speaker, Legislative Assembly on the petition filed by Shri Ram Govind Chowdhary in respect of Shri Nitin Agrawal.

Published 07 October 2021

Department
Vidhan Sabha Sachivalaya Uttar Pradesh
Type
Extraordinary
Notification no.
947/वि0स0/संसदीय/139(सं)/2019
Subdepartment
Sansadiya Anubhag
Identifier
in.gazette.uttarpradesh_extraordinary.2021-10-07.c_202301111203005014
Languages
English, Hindi
Published at
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क्रम-सं0-196

रजिस्ट्रेशन नं0-एस0एस0पी0/एल0

डब्लू/एन0पी0-91/2014-16

लाइसेन्स टू पोस्ट ऐट कन्सेशनल रेट

लखनऊ, बृहस्पतिवार, दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 15 आश्विन, शक संवत्‌, 1943

विधान सभा सचिवालय उत्तर प्रदेश (संसदीय अनुभाग) ------ संख्याः 947/वि0स0/संसदीय/139(सं)/2019 दिनांक : 07 अक्टूबर, 2021 ------ अधिसूचना ----- प्रकीर्ण

श्री राम गोविन्द चौधरी, नेता, समाजवादी पार्टी, उत्तर प्रदेश, लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-7 के अन्तर्गत माननीय अध्यक्ष, विधान सभा, उत्तर प्रदेश के विचारार्थ श्री नितिन अग्रवाल, सदस्य, उत्तर प्रदेश विधान सभा के विरुद्ध दिनांक 11 नवम्बर, 2019 को दायर की गई याचिका पर माननीय अध्यक्ष, विधान सभा द्वारा दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 को किया गया विनिश्चय एतद्‌द्वारा सर्वसाधारण की सूचनार्थ अधिसूचित किया जाता है :-

अध्यक्ष, विधान सभा, उत्तर प्रदेश

श्री राम गोविन्द चौधरी, नेता, समाजवादी पार्टी, उत्तर प्रदेश विधान सभा द्वारा समाजवादी पार्टी की ओर से श्री नितिन अग्रवाल, सदस्य, विधान सभा, हरदोई विधान सभा क्षेत्र जनपद हरदोई के विरुद्ध उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के अन्तर्गत प्रस्तुत की गयी याचिका पर

निर्णय

''भारत का संविधान'' की 10वीं अनुसूची, सपठित उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत श्री राम गोविन्द चौधरी, नेता, समाजवादी पार्टी, उत्तर प्रदेश विधान सभा द्वारा समाजवादी पार्टी की ओर से श्री नितिन अग्रवाल, सदस्य, उत्तर प्रदेश विधान सभा के विरुद्ध प्रश्नगत याचिका प्रस्तुत की गयी है।2 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 ई0 2-याचिका में वर्णित तथ्यों एवं अभिकथनों के अनुसार यह याचिका उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य ''दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता'' नियमावली, 1987 के नियम-7, सपठित संविधान की 10वीं अनुसूची के प्रस्तर-2(1)(ए) एवं अनुच्छेद-191(2) के अन्तर्गत श्री नितिन अग्रवाल को विधान सभा के सदस्य के रूप में निरर्ह घोषित किये जाने हेतु प्रस्तुत की गयी है।

3-याचिका में यह अभिकथित किया गया है कि विपक्षी श्री नितिन अग्रवाल, समाजवादी पार्टी के टिकट पर 17वीं विधान सभा के आम चुनाव में निर्वाचन क्षेत्र संख्या-156-हरदोई, जनपद-हरदोई से सदस्य, विधान सभा के रूप में निर्वाचित हुए। इस निर्वाचन के परिणाम की अधिसूचना भारत निर्वाचन आयोग द्वारा दिनांक 14 मार्च, 2017 को निर्गत की गयी थी। याची ने यह भी कहा है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा की दलीय सूची में विपक्षी का नाम समाजवादी पार्टी के सदस्य के रूप में अंकित है।

4-याची के अनुसार ''भारत का संविधान'' की 10वीं अनुसूची के प्रस्तर-2(1)(ख) के अन्तर्गत सदन का कोई सदस्य मूल रूप से जिस राजनैतिक दल के टिकट पर सदस्य निर्वाचित हुआ है एवं यदि उसने ऐसे राजनैतिक दल द्वारा जारी किये गये व्हिप की अवहेलना की है तो वह सदन के सदस्य के रूप में निरर्ह होगा। 5-याची के अनुसार श्री नितिन अग्रवाल द्वारा समाजवादी पार्टी द्वारा जारी किये गये व्हिप के उल्लंघन में दिनांक 2 व 3 अक्टूबर, 2019 को विधान सभा के विशेष सत्र के दौरान अपने मूल राजनैतिक दल के विरुद्ध वक्तव्य दिए थे। इस संबंध में याचिका के साथ विधान सभा की कार्यवाही की प्रति भी संलग्न की गयी है। 6-याचिका में यह भी कहा गया है कि विपक्षी श्री नितिन अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों में सम्मिलित होकर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को जन्मदिन की बधाई देते हुए आम नागरिकों से भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित होने की अपील भी की है। याचिका में सोशल मीडिया के छायाचित्रों की प्रति संलग्न की गयी हैं।

7-याचिका में यह भी अभिकथित किया गया है कि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेकर उसकी नीतियों एवं सिद्धान्तों में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।

8-याची के अनुसार उपर्युक्त वर्णित तथ्यों से यह स्पष्ट है कि विपक्षी श्री नितिन अग्रवाल ने स्वेच्छा से अपने मूल राजनैतिक दल, समाजवादी पार्टी की सदस्यता त्याग दी है। अतः विपक्षी श्री नितिन अग्रवाल दिनांक 3 अक्टूबर, 2019 से ''भारत का संविधान'' की 10वीं अनुसूची के अन्तर्गत विधान सभा की सदस्यता से निरर्हित किये जाने योग्य हैं।

9-अन्त में याची द्वारा यह प्रार्थना की गयी है कि विपक्षी श्री नितिन अग्रवाल, सदस्य, विधान सभा उत्तर प्रदेश को संविधान की 10वीं अनुसूची सपठित अनुच्छेद-191(2) के अन्तर्गत विधान सभा की सदस्यता से दिनांक 03-10-2019 से निरर्ह घोषित किया जाए।

10-याची द्वारा अपनी याचिका के समर्थन में एक शपथ-पत्र भी प्रस्तुत किया गया है।

11-विपक्षी श्री नितिन अग्रवाल द्वारा दिनांक 21-09-2021 को अपना प्रतिवाद प्रस्तुत किया गया। 12-विपक्षी द्वारा याचिका के तथ्यों का खण्डन करते हुए मुख्य रूप से यह कहा गया है कि 10वीं अनुसूची का खण्ड-2(1)(क) मात्र उन्हीं प्रकरणों में आकर्षित होगा, जहां स्वेच्छा से किसी सदस्य ने अपने मूल राजनैतिक दल की सदस्यता को त्याग दिया हो। विपक्षी के अनुसार उसने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कोई आचरण नहीं किया है जिससे यह अभिप्रीत हो कि उसने अपने मूल राजनैतिक दल की सदस्यता को स्वेच्छा से त्याग दिया है।

13-विपक्षी के अनुसार 10वीं अनुसूची का खण्ड-2(1)(ख) मात्र उन्हीं प्रकरणों में आकर्षित होगा, जहां मूल राजनीतिक दल के निर्देश के उल्लंघन में सदन में मतदान करने या न करने का प्रश्न निहित हो। विपक्षी के अनुसार उसके सन्दर्भ में खण्ड-2(1)(ख) लागू नहीं होता है।उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 ई0 3 14-विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है किसी भी व्हिप का उसके द्वारा उल्लंघन नहीं किया गया है और न ही उसके ऊपर कोई व्हिप तालीम की गयी थी।

15-विपक्षी के अनुसार प्रस्तुत याचिका समय-सीमा के पश्चात्‌ नियोजित की गयी एवं इसमें उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-4 के प्राविधान का अनुपालन नहीं किया गया है।

16-विपक्षी के अनुसार प्रस्तुत याचिका उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 नियम-2(एफ) के अनुसार विधान मण्डल के नेता की क्षमता से याची द्वारा योजित नहीं की गयी है, अतः निरस्त होने योग्य है।

17-विपक्षी ने यह भी इंगित किया है कि याचिका के समर्थन में प्रस्तुत किया गया शपथ-पत्र विधिक रूप से सत्यापित नहीं है। अतः उसको संज्ञान में नहीं लिया जा सकता है।

18-विपक्षी द्वारा इस पर बल दिया गया है कि दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 को निर्गत किया गया कथित पत्र व्हिप की श्रेणी में नहीं आता है। चूंकि इस व्हिप में मतदान करने अथवा न करने के विषय में कोई निर्देंश नहीं थे, अतः इसके उल्लंघन में दसवीं अनुसूची के प्राविधान आकर्षित नहीं होंगे।

19-विपक्षी के अनुसार उसने अपने संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन में विधान सभा के विशेष सत्र में भाग लिया था एवं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर अपने विचार प्रस्तुत किये थे।

20-वर्णित स्थिति में विपक्षी के अनुसार, विपक्षी के आचरण में 10वीं अनुसूची के प्राविधान आकर्षित नहीं होते हैं।

21-विपक्षी द्वारा अपने प्रतिवाद पत्र के समर्थन में शपथ-पत्र भी योजित किया गया है।

22-याची द्वारा दिनांक 28-09-2021 को अपना प्रतिउत्तर प्रस्तुत किया गया है जिसमें कि उन्होंने विपक्षी के प्रतिवाद पत्र के अभिकथनों का खण्डन किया है।

23-विपक्षी द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ''किहोटो होलोहॉन'' के मामले में पारित निर्णय का सन्दर्भ भी दिया गया एवं यह कहा गया है कि प्रस्तुत प्रकरण में संविधान की 10वीं अनुसूची का खण्ड-2(1)(क) आकर्षित नहीं होता है।

24-पक्षकारों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर प्रदान किया गया, पक्षकारों के विद्‌वान अधिवक्ताओं को सुना गया। मैंने पत्रावली तथा उस पर उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन एवं परिशीलन किया।

25-विपक्षी द्वारा प्रारम्भिक रूप से यह आपत्ति उठाई गयी है कि याचिकाकर्ता श्री राम गोविन्द चौधरी प्रश्नगत याचिका को प्रस्तुत करने हेतु अधिकृत नहीं हैं क्योंकि उनके द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे यह स्पष्ट हो कि समाजवादी पार्टी की ओर से उन्हें यह याचिका प्रस्तुत करने हेतु अधिकृत किया गया है। विपक्षी के इस तर्क में बल प्रतीत नहीं होता है क्योंकि याची श्री राम गोविन्द चौधरी सदन में समाजवादी पार्टी के नेता हैं एवं वह प्रतिपक्ष के भी सदन में नेता हैं। उत्तर प्रदेश विधान सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1987 के नियम-7(2) के अनुसार दलबदल से संबंधित याचिका किसी भी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की जा सकती है। अतः याचिका प्रस्तुत करने हेतु समाजवादी पार्टी की ओर से किसी विशिष्ट अधिकार-पत्र की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। याची, श्री राम गोविन्द चौधरी स्वयं समाजवादी पार्टी के सदन में नेता हैं एवं नेता प्रतिपक्ष भी हैं, अतः यह याचिका प्रस्तुत करने हेतु उनकी अधिकारिता उनकी प्रास्थिति में निहित है। अतः विपक्षी का यह तर्क मान्य नहीं है।

26-विपक्षी की ओर से इस पर बल दिया गया है कि प्रस्तुत प्रकरण में संविधान की 10वीं अनुसूची का खण्ड-2(1)(ख) के प्राविधान आकर्षित नहीं होते हैं। 10वीं अनुसूची के खण्ड-2(1)(क) एवं (ख) निम्नवत्‌ हैं :-

4 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 ई0

दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता- (1) पैरा-4 और पैरा-5 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सदन का कोई सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल का सदस्य है, सदन का सदस्य होने के लिए उस दशा में निरर्हित होगा जिसमें-

(क) उसने ऐसे राजनीतिक दल की अपनी सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी है ; या

(ख) वह ऐसे राजनीतिक दल द्वारा जिसका वह सदस्य है अथवा उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति या प्राधिकारी द्वारा दिए गए किसी निदेश के विरुद्ध ऐसे राजनीतिक दल, व्यक्ति या प्राधिकारी की पूर्व अनुज्ञा के बिना, ऐसे सदन में मतदान करता है या मतदान करने से विरत रहता है और ऐसे मतदान या मतदान करने से विरत रहने को ऐसे राजनीतिक दल, व्यक्ति या प्राधिकारी ने ऐसे मतदान या मतदान करने से विरत रहने की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर माफ नहीं किया है। उपर्युक्त प्राविधान के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि खण्ड-2(1)(ख) के अन्तर्गत यदि कोई सदस्य मूल राजनीतिक दल द्वारा निर्गत किए गए निर्देशों के विपरीत मतदान करते हैं या मतदान करने से विरत रहते हैं एवं उसको यदि 15 दिन के अन्दर माफ नहीं किया जाता तो वह सदन का सदस्य होने के लिए निरर्हित हो सकता है। याचिकाकर्ता द्वारा यह कहा गया है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा के दिनांक 2 व 3 अक्टूबर, 2019 के विशेष सत्र में विपक्षी द्वारा अपने मूल राजनीतिक दल, समाजवादी पार्टी के व्हिप के उल्लंघन में वक्तव्य दिया था। अतः उनके सापेक्ष खण्ड-2(1)(ख) आकर्षित होगा। इस संबंध में याची की ओर से विशेष सत्र की विधान सभा की कार्यवाही भी संलग्न की गयी है।

27-सदन के अन्दर किसी सदस्य द्वारा चर्चा में भाग लेते हुए किसी प्राविधान के समर्थन में अथवा उसके विरुद्ध मतदान किये जाने के प्रकरण में 10वीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) के प्राविधान आकर्षित होंगे। पैरा-2(1)(ख) की भाषा तथा उसके मन्तव्य स्पष्ट हैं। सदन में अपने मूल राजनीतिक दल के निर्देशों के विरुद्ध मतदान करने अथवा मतदान करने से विरत रहना 10वीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) में विशिष्ट रूप से प्राविधानित आधार है। याची द्वारा यह कहा गया है कि विपक्षी ने समाजवादी पार्टी के निर्देशों के विरुद्ध सदन में वक्तव्य दिया इस प्रकार उनके द्वारा व्हिप का उल्लंघन किया गया है।

28-याची की ओर से समाजवादी पार्टी के मुख्य सचेतक श्री नरेन्द्र सिंह वर्मा द्वारा दिनांक 01 अक्टूबर, 2019 को निर्गत किए गए व्हिप की प्रति प्रस्तुत की है। इस व्हिप में यह निर्देश दिए गए हैं कि विधान सभा के विशेष सत्र दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 में किसी भी सदस्य को भाग नहीं लेना है।

29-भारत के संसदीय परिवेश में 'व्हिप' की महत्ता सर्वविदित है। यद्यपि संविधान में 'व्हिप' का उल्लेख नहीं किया गया है, परन्तु यह संसदीय प्रक्रिया एवं परम्पराओं पर आधारित है। 'व्हिप' किसी राजनीतिक दल का ऐसा निदेश है जो उसके सदस्यों को अनुपालन करने हेतु बाध्य करता है। दसवीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) व्हिप शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है वरन्‌्‌ निदेश शब्द का प्रयोग किया गया है। दसवीं अनुसूची के सन्दर्भ में किस प्रकार के 'व्हिप' अथवा निदेश सुसंगत होंगे इस विषय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किहोटो होलोहॉन (AIR 1993 SCC 111) के प्रकरण में स्पष्ट अवधारणा व्यक्त की गयी है जो निम्नवत्‌्‌ है :-

"49…. While construing Paragraph 2(1)(b) it cannot be ignored that under the Constitution members of Parliament as well as of the State legislature enjoy freedom of speech in the House though this freedom is subject to the provisions of the constitution and the rules and standing orders regulating the Procedure of the House {Art. 105(1) and Article 194(1)}. The disqualification imposed by Paragraph 2(1)(b) must be so construed as not to unduly impinge on the said freedom of speech of a member. This would be possible if Paragraph 2(1)(b) must be so construed as not to unduly impinge on the said freedom of speech of a member. This would be possible if Paragraph 2(1)(b) is confined in its scope by keeping in view the object suderlying the amendments contained in theउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 ई0 5 Tenth Schedule, namely to curb the evil or mischief of political defections motivated by the lure of office of other similar considerations. The said object would be achieved if the disqualifications incurred on the ground of voting or abstaining from voting by a member is confined to cases where a change of Government is likely to be brought about or is prevented as the case may be, as a result of such voting or abstinence or when such voting or abstinence is on a matter which was a major policy and programme on which the political party to which the member belongs went to the polls. For this purpose the direction given by the political party to a member belonging to it, the violation of which may entail disqualification under paragraph 2(1)(b), would have to be limited to a vote on motion of confidence or no confidence in the Government or where the motion under consideration relates to a matter which was an integral policy and programme of the political party on the basis of which it approached the elaborate. The voting or abstinence from voting by a member against the direction by the political party on such a motion would amount to disapproval of the programme of the basis of which he went before the electorate and got himself elected and such voting or abstinence would amount to a breach of the trust reposed in him by electrorate…"

30-उपर्युक्त माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गयी अवधारणाओं से यह परिलक्षित होता है कि निम्न दो प्रकार के 'व्हिप'/निदेशों का उल्लेख ही दसवीं अनुसूची के प्रकरणों में सुसंगत होगा :

(क) सरकार के विश्वासमत के सम्बन्ध में।

(ख) ऐसे प्रस्ताव अथवा संकल्पों के विषय में जो उस राजनीतिक दल की नीति एवं योजनाओं के सन्दर्भ में हैं जिसके आधार पर सदस्य ने निर्वाचन में भाग लिया हो।

31-उपर्युक्त निदेशों के अतिरिक्त अन्य निदेशों के उल्लंघन से दसवीं अनुसूची के पैरा-2 के प्रावधान आकर्षित नहीं होंगे। प्रस्तुत प्रकरण में समाजवादी पार्टी विधान मण्डल दल के सचेतक द्वारा दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 को निर्गत किये गये कथित 'व्हिप' में विशेष सत्र के बहिष्कार करने एवं उसमें उपस्थित न होने का निदेश दिया गया था जो कि किहोटो होलोहॉन के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित व्यवस्था के अन्तर्गत सुसंगत नहीं है। अतः इस निदेश के उल्लंघन के आधार पर विपक्षी को दसवीं अनुसूची के अन्तर्गत दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता।

32-किहोटो होलोहॉन के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह भी अवधारित किया गया है कि यदि किसी निदेश अथवा 'व्हिप' के उल्लंघन पर दसवीं अनुसूची के प्रावधानों को आकर्षित करना है तो उसमें इस तथ्य का विशिष्ट उल्लेख होना चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किहोटो होलोहॉन के प्रकरण में व्यक्त की गई निम्न अवधारणाएं उल्लेखनीय हैं :-

"Keeping in view the consequences of the disqualification i.e., termination of the membership of a House; it would be appropriate that the direction or whip which results in such disqualification under paragraph 2(1)(b) is so worded as to clearly indicate that voting or abstaining from voting contrary to the said direction would result in incurring the disqualification under paragraph 2(1)(b) of the Tenth Schedule so that the member concerned has fare-knowledge of the consequences flowing from his conduct in voting or abstaining from voting contrary to such a direction."

33-समाजवादी पार्टी के सचेतक, श्री नरेन्द्र सिंह वर्मा द्वारा दिनांक 01 अक्टूबर, 2019 को निर्गत पत्र माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त उक्त शर्तों का अनुपालन नहीं करता है, अतः इसके उल्लंघन के आधार पर विपक्षी को निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता।6 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 ई0 34-माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित विधि व्यवस्थाओं एवं प्रकरण के तथ्यों के उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि दिनांक 02-10-2019 को आहूत विशेष सत्र में भाग लेने से विपक्षी निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जाना चाहिए।

35-पत्रावली एवं सुसंगत अभिलेखों के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि दिनांक 02-10-2019 को उत्तर प्रदेश विधान सभा का विशेष सत्र महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आहूत किया गया था। इस विशेष सत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत्‌ विकास के लक्ष्यों पर चर्चा सम्पन्न हुई थी एवं उस ही सन्दर्भ में प्रस्ताव पारित किया गया था। अतः यह स्पष्ट है कि इस सत्र में सरकार के पक्ष या विपक्ष में विश्वास मत अथवा किसी राजनीतिक दल की नीतियों या योजनाओं के विषय में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया था। तद्‌्‌नुसार, कथित व्हिप के उल्लंघन के किहोटो होलोहॉन के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायाल द्वारा व्यक्त की गई अवधारणाओं के अनुसार दसवीं अनुसूची के प्रावधान आकर्षित नहीं होते हैं। दिनांक 02-10-2019 को सदन में पारित किया गया प्रस्ताव निम्नवत्‌ है :-

''यह सदन प्रस्ताव करता है कि राष्ट्रपिता के उच्च आदर्शों का पालन करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत्‌ विकास के लक्ष्यों की पूर्ति हेतु राज्य सरकार द्वारा प्रभावी कदम उठाए जाएं।'' 36-उपरोक्त प्रस्ताव के परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत्‌ विकास के लक्ष्यों की पूर्ति के सन्दर्भ में है। यह प्रस्ताव किसी राजनीतिक दल की नीतियों अथवा योजनाओं के विषय में नहीं है। अतः इस प्रस्ताव के समर्थन में मतदान से दसवीं अनुसूची के प्रावधान आकर्षित नहीं होंगे। 37-विपक्षी श्री नितिन अग्रवाल द्वारा जो वक्तव्य दिनांक 02 अक्टूबर, 2019 को आहूत किए गए विशेष सत्र में दिया है उसमें उन्होंने सरकार की कतिपय नीतियों की प्रशंसा की है। इसके साथ ही उन्होंने संयुक्त राष्ट संघ द्वारा निर्धारित किए गए सतत्‌ विकास के लक्ष्यों के सापेक्ष उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जो कार्य किए गए हैं उनका वर्णन भी किया है। जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि का यह मूल संवैधानिक कर्तव्य है कि वह अपने विधान सभा क्षेत्र एवं प्रदेश के विकास के विषय में सदन में अपनी बात रखें। जनप्रतिनिधियों को सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संसदीय लोकतंत्र की जीवन-रेखा है। जनप्रतिनिधियों द्वारा सदन में स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखना भारत के संविधान का मूल तत्व है। जनप्रतिनिधियों की सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जाना संवैधानिक योजना के अनुरूप नहीं होगा। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी इसी कारणवश 10वीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) में वर्णित प्राविधानों का निर्वचन इस प्रकार से किया गया है जिससे कि मात्र उन्हीं निर्देशों को 10वीं अनुसूची की परिधि में लाया जा सके जो मूल राजनीतिक दल की नीतियों एवं योजनाओं से संबंधित हों अथवा जिनसे सरकार के विश्वास तथा अविश्वास पर निर्णय होता हो। सदन में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत्‌ विकास के लक्ष्यों अथवा सरकार की योजनाओं के विषय में वक्तव्य दिया जाना 10वीं अनुसूची के पैरा-2(1)(ख) के विपरीत नहीं माना जा सकता।

38-उपर्युक्त के अतिरिक्त याचिकाकर्ता द्वारा यह भी कहा गया है कि विपक्षी श्री नितिन अग्रवाल ने 10वीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) के अन्तर्गत अपने आचरण से स्वेच्छापूर्वक अपने मूल राजनीतिक दल, समाजवादी पार्टी की सदस्यता को त्याग दिया है। इस संबंध में याचिकाकर्ता ने यह अभिकथित किया है कि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेता रहा है। यह कि विपक्षी द्वारा भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को जन्मदिन की बधाई दी गयी एवं आम नागरिकों से भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की अपील भी की गयी। याची द्वारा यह आरोप भी लगाया गया है कि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी की नीतियों एवं सिद्धान्तों में आस्था रखता है। याचिकाकर्ता द्वारा इस संबंध में सोशल मीडिया में प्रसारित कतिपय समाचारों की प्रतियां याचिका के साथ संलग्न की हैं जिसमें यह दर्शाया गया है कि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं एवं उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की प्रशंसा भी की है। विपक्षी की ओर से इस संबंध मेंउत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 ई0 7 याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों का खण्डन किया है एवं यह कहा है कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए इन आरोपों के समर्थन में कोई सत्यापित साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है और न ही उनका कोई स्रोत बताया गया है। 39-विपक्षी द्वारा सुनवाई के दौरान यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि सोशल मीडिया के संबंध में जो साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है वह सर्वथा निराधार एवं भ्रामक है। विपक्षी के अनुसार यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि जिस एकाउण्ट की प्रतियां याची द्वारा लगाई गयी हैं वह किस सोशल मीडिया एकाउण्ट की हैं। बिना सत्यापित फेसबुक एकाउण्ट के यह नहीं माना जा सकता है कि यह प्रिन्ट विपक्षी का है क्योंकि विपक्षी के नाम से फेक (फर्जी) फेसबुक एकाउण्ट बनाकर कोई भी विपक्षी को बदनाम करने के लिए ऐसा कर सकता है। अतः विपक्षी द्वारा यह कहा गया है कि सोशल मीडिया की जो प्रतियां याचिका के साथ प्रस्तुत की गयी हैं वह साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं हैं।

40-विपक्षी ने यह भी कहा है कि जिस डिवाइस से याचिका के साथ संलग्न प्रिन्ट लिये गये हैं उनका आई0पी0 ऐड्रेस क्या है यह भी नहीं बताया गया है। विपक्षी के अनुसार याची ने सोशल मीडिया का स्रोत भी स्पष्ट नहीं किया है। अतः इस कारण भी यह साक्ष्य मान्य नहीं होगा। विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है कि उसने ऐसा कोई आचरण नहीं किया है जिससे कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रदर्शित हो कि उसने स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल, समाजवादी पार्टी की सदस्यता त्याग दी है।

41-विपक्षी के अनुसार किसी अन्य राजनीतिक पार्टी के प्रमुख नेताओं को जन्मदिन की बधाई देने से दल-बदल का प्राविधान आकर्षित नहीं होता। विपक्षी के अनुसार यह राजनैतिक शिष्टाचार का एक तरीका है कि अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को भी शुभकामनाएं आदि दी जाएं। अतः इस आधार पर याची यह नहीं कह सकते कि प्रस्तुत प्रकरण में 10वीं अनुसूची के प्राविधान आकर्षित होते हैं।

42-विपक्षी द्वारा प्रस्तुत किया गया यह तर्क मान्य प्रतीत होता है कि सोशल मीडिया जिसके प्रिन्टआउट याची द्वारा याचिका के साथ संलग्न किये गये हैं उनका सत्यापन होना आवश्यक है। जब तक यह सत्यापित रूप से सिद्ध नहीं किया जाता कि यह प्रिन्टआउट विपक्षी के फेसबुक एकाउण्ट ही से निकाले गये हैं तब तक उन्हें प्रमुख साक्ष्य के रूप में मान्यता प्रदान किया जाना विधिक रूप से प्रतीत नहीं होता है। विपक्षी द्वारा दिए गए इस तर्क के विरुद्ध याची की ओर से कोई युक्ति-युक्त उत्तर नहीं दिया गया है। याची की ओर से इस संबंध में कोई अन्य अभिलेख या साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया है। वर्णित स्थिति में मात्र सोशल मीडिया के प्रिन्टआउट के आधार पर मत स्थिर किया जाना विविध रूप से उपयुक्त एवं संगत प्रतीत नहीं होता है।

43-विपक्षी द्वारा दिया गया यह तर्क भी उपयुक्त प्रतीत होता है कि राजनीतिक परिवेश में शिष्टाचार के नाते अन्य राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं के विषय में उनके जन्मदिन आदि पर शुभकामनाएं दिए जाने से 10वीं अनुसूची के प्राविधान आकर्षित नहीं होते हैं। याची की ओर से ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे कि यह सिद्ध हो कि विपक्षी ने भारतीय जनता पार्टी के मंच पर जाकर उनकी नीतियों अथवा उनके प्रत्याशी के लिए प्रचार-प्रसार किया हो। अतः मात्र सोशल मीडिया के प्रिन्टआउट प्रस्तुत किये जाने से यह नहीं कहा जा सकता कि विपक्षी द्वारा ऐसा आचरण किया गया है जिससे कि यह सिद्ध हो कि उसने अप्रत्यक्ष रूप से अपने मूल राजनैतिक दल की सदस्यता को त्याग दिया है।

44-वर्णित स्थिति में प्रस्तुत प्रकरण में 10वीं अनुसूची के पैरा-2(1)(क) अथवा 2(1)(ख) के प्राविधान आकर्षित नहीं होते। याचिका में लगाए गए आरोपों के आधार पर उपर्युक्त वर्णित विश्लेषण के अनुसार विपक्षी को निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मूल राजनैतिक दल की सदस्यता को त्याग किए जाने के संबंध में सदस्य के आचरण की विशिष्ट परिभाषा निर्धारित की गयी है। याची की ओर से ऐसी कोई विधि-व्यवस्था भी प्रस्तुत नहीं की गयी जोकि प्रस्तुत प्रकरण के तथ्यों पर विशिष्ट रूप से लागू हो।8 उत्तर प्रदेश असाधारण गजट दिनांक 07 अक्टूबर, 2021 ई0 आदेश

प्रकरण से संबंधित उपर्युक्त वर्णित तथ्यों, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित की गयी विधि-व्यवस्था एवं प्रकरण से संबंधित अभिलेखों के उपर्युक्त विवेचन एवं विश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में मेरा यह समाधान है कि विपक्षी, श्री नितिन अग्रवाल, सदस्य, उत्तर प्रदेश विधान सभा, हरदोई के सन्दर्भ में ''भारत का संविधान'' की 10वीं अनुसूची के प्राविधान आकर्षित नहीं होते हैं। अतः विपक्षी को दल परिवर्तन के आधार पर विधिक रूप से निरर्हता से ग्रसित नहीं माना जा सकता। तद्‌नुसार, प्रस्तुत याचिका बलहीन होने के कारण निरस्त की जाती है।

दिनांक : 07 अक्टूबर, 2021

श्री हृदय नारायण दीक्षित, अध्यक्ष, विधान सभा, उत्तर प्रदेश।

आज्ञा से, प्रदीप कुमार दुबे, प्रमुख सचिव, विधान सभा, उत्तर प्रदेश। पी0एस0यू0पी0-एल0 30 राजपत्र (118)-07-10-2021-585+25 प्रतियां।

Cite this issue. Uttar Pradesh Extraordinary Gazette, Government of Uttar Pradesh, 07 October 2021. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gazette.uttarpradesh_extraordinary.2021-10-07.c_202301111203005014/. Archive identifier in.gazette.uttarpradesh_extraordinary.2021-10-07.c_202301111203005014.