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Bihar Gazette · Government of Bihar

Bihar Gazette, 08 February 2024

Published 08 February 2024

Type
Extra Ordinary
Identifier
in.gov.bih.gazette.2024-02-08.107
Languages
English, Hindi

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(cid:467)नबंधन सं(cid:201)या पी0ट(cid:547)0-40 असाधारण अंक (cid:464)बहार सरकार (cid:430)ारा (cid:292)कािशत 19 माघ 1945 (श0)

(सं0 पटना 107) पटना, वृह(cid:232)पितवार, 8 फरवर(cid:547) 2024

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संख्या– वि.प.अ.प्र.-32/2023 -227(1)वि.प.—भारत के संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची के अंतर्गत बिहार विधान परिषद् सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1994 के प्रावधान के आलोक में माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह, तत्कालीन उप मुख्य सचेतक (सत्तारूढ़ दल) की याचिका दिनांक - 02.11.2023 के आलोक में माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह को बिहार विधान परिषद् की सदस्यता से निर(cid:7414)हत किये जाने संबंधी वाद पर न्याय निर्णय

आदेश

डॉ० सुनिल कु मार सिह माननीय सदस्य बिहार विधान परिषद्, तत्कालीन उप मुख्य सचेतक (सत्तारूढ़ दल) द्वारा दिनांक- 02.11.2023 को मेरे समक्ष एक लिखित याचिका राजद सदस्य, प्रो०(डॉ०) रामबली सिह को बिहार विधान परिषद् के सदस्यता से निर(cid:7414)हत करने हेतु दिया है। माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह को पत्रांक - 838 दिनांक - 02.11.2023 द्वारा माननीय (cid:7088)ी तेजस्वी प्रसाद यादव, राष्ट्रीय जनता दल के बिहार विधान मंडल के नेता ने प्रो०(डॉ०) रामबली सिह को निर(cid:7414)हत करने के लिए याचिका/आवेदन देने हेतु अधिकृ त किया है, जो डॉ० सुनिल कु मार सिह की याचिका दिनांक - 02.11.2023 के साथ संलग्न है।

माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह ने याचिका में कहा है कि प्रो० (डॉ०) रामबली सिह बिहार विधान परिषद् के सदस्य के रूप में राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों द्वारा द्विवा(cid:7414)षक चुनाव में दल के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित (cid:7263)ए। राष्ट्रीय जनता दल का सदस्य रहते (cid:7263)ए वह राजद विधान मंडल2 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 दल के नेता पर मनगढंत आरोप लगाए कि ''तेजस्वी प्रसाद यादव भी पीते हैं शराब''। दल के नीति के खिलाफ अतिपिछड़ा समाज को खंडित करने के उद्देश्य से तेली, तमोली (चौरसिया) और दांगी जाति को मूल अतिपिछड़ा (cid:7088)ेणी से अलग करने संबंधी बयान दिए एवं बैनर पोस्टर लगाकर पदयात्रा और सम्मेलन किए। इस कार्य(cid:7059)म में न तो दल का चुनाव चि(cid:7022)न पोस्टर पर लगाए और न ही दल का झंडा लगाए। जाति आधारित गणना के खिलाफ बयान ''नीतीश सरकार ने जाति आधारित गणना में बड़ी चालाकी से घालमेल किया है'' दिये हैं। इस तरह के बयान से भारतीय जनता पार्टी सहित विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए अनर्गल आरोप की पुष्टि होती है। इससे संबंधित कारण बताओ नोटिस प्रदेश अध्यक्षजी के द्वारा पत्रांक- 405/23 दिनांक- 06 जनवरी, 2023, पत्रांक- 289/23 दिनांक- 02 अक्टूबर, 2023 एवं पत्रांक- 324/23 दिनांक- 12 अक्टूबर, 2023 से उन्हें भेजा गया था, परंतु दिनांक 12 अक्टूबर, 2023 के पत्र का जवाब आया है, जो उनके विरू(cid:7373) लगाए किसी आरोपों का खंडन नह(cid:7277) करता है। सम्यकरूपेण विचारोपरांत दल ने इसे अपने नेता एवं दल के विरू(cid:7373) अपमानजनक कृ त्य माना है।

उनके उपरोक्त कृ त्य एवं आचरण से यह स्पष्ट है कि उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल की सदस्यता का स्वे(cid:6994)छया परित्याग कर दिए हैं, अतएव वह भारत के संविधान की धारा 191 सह पठित दसव(cid:7277) अनुसूची के पैरा 2(क) के अंतर्गत बिहार विधान परिषद्, की सदस्यता के लिए निर(cid:7414)हत हो चुके हैं। ऊपर व(cid:7414)णत पत्रों एवं समाचार पत्रों की छाया प्रति संलग्न। उपरोक्त के आलोक में आपसे सादर अनुरोध है कि (cid:7088)ी रामबली सिह को बिहार विधान परिषद् की सदस्यता से निर(cid:7414)हत घोषित करने की कृ पा करेंगे। सादर।

याचिका के साथ डॉ० सुनिल कु मार सिह ने याचिका में उल्लिखित तथ्यों के समर्थन में पत्रों एवं समाचार पत्रों के छाया प्रतियों की सत्यापित प्रतियां संलग्न की है ।

इसके आलोक में मैंने डॉ० सुनिल कु मार सिह से प्राप्त आवेदन पत्र में व(cid:7414)णत तथ्यों के सन्दर्भ में भारत के संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची के प्रावधान एवं तत्संबंधी बिहार विधान परिषद् सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1994 के उपबंधों के अधीन निरर्हता से (cid:7061)सित होने से संबंधित याचिका की प्रति प्रो० (डॉ०) रामबली सिह स.वि.प. को दिनांक- 21.11.2023 को भेजते (cid:7263)ए सात दिनों के अंदर उनसे स्पष्टीकरण (कथन) की मांग की।

इस स्पष्टीकरण के परिप्रे(cid:7023)य में प्रो० (डॉ०) रामबली सिह ने दिनांक- 01.12.2023 को सूचित किया, : ''सविनय निवेदन यह है कि मुझे विधान परिषद् सदस्य के रूप में मनगढंत दलगत नीतियों के विरू(cid:7373) कथित अपराध के लिए मेरी सदस्यता निरर्हन करने के लिए सात दिनों के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है। पत्र में तिथि 21.11.2023 अंकित है परंतु पत्र मेरे आवास पर किसी अपरिचित (cid:7018)यक्ति को 30.11.2023 को शाम में देकर चला गया उस वक्त मैं अपने भगीना की शादी की तैयारी में गांव गया (cid:7263)आ था। इस बात की पुष्टि उस कर्मचारी से की जा सकती है या मेरे आवास पर CCTV के Footage से प्रमाणित किया जा सकता है। अत: (cid:7088)ीमान् से आ(cid:7061)ह होगा कि स्थापित प्रशासनिक परम्परा के अनुसार उचित नह(cid:7277) प्रतीत होता, जबकि अभी मैं भगीना की शादी में (cid:7018)यस्त (cid:7264)ँ, इसलिए स्पष्टीकरण का जबाब हेतु 15 दिनों का समय देने की कृ पा की जाय।''

माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह के इस अनुरोध के आलोक में मैंने बिहार विधान परिषद् सदस्य (दल परिर्वतन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1994 के नियम 7(ख) के अधीन वांछित स्पष्टीकरण (कथन) हेतु अवधि विस्तारित किया।3 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 इस अवधि विस्तार के पश्चात् माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह ने Written statement raising preliminary issue regarding maintainability of complaint dated 15.12.2023 के माध्यम से यह कहा कि:''

1. यह कि इस आवेदन के माध्यम से, अभिसाक्षी भारत के संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची का खंड-2(1) (ए) के तहत बिहार विधान परिषद की सदस्यता से अभिसाक्षी को अयोग्य घोषित करने के लिए बिहार विधान परिषद के सदस्य (cid:7088)ी सुनील सिह द्वारा दायर याचिका की विचारणीयता के संबंध में अपनी प्रारंभिक आपत्ति उठाना चाहता है। 2. शु(cid:7271)आत में, यह कहा गया है कि चू ंकि शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत में लगाए गए आरोप किसी भी तरह से अयोग्यता खंड को आक(cid:7414)षत नह(cid:7277) करते हैं, जैसा कि दसव(cid:7277) अनुसूची के खंड-2(1) (ए) के तहत विचार किया गया है, वतर्मान कार्यवाही विचारणीय नह(cid:7277) है और इसलिए अस्वीकार किये जाने योग्य है।

3. यह आगे कहा गया है कि भारत के संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची के क्लाउज 8 के तहत निहित प्रावधानों के मद्देनजर, संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची के तहत दायर कार्यवाही को रद्द करने के लिए बिहार विधान परिषद् ने बिहार विधान परिषद् सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियमावली, 1994 (इसके बाद अयोग्यता नियम के रूप में संद(cid:7414)भत) के नाम पर अयोग्यता नियम बनाए थे।

4. कि, अयोग्यता नियमों के नियम 6(5) में शिकायत याचिका की साम(cid:7061)ी के बारे में बताया जाएगा और उक्त नियम के नियम 6(6) में यह आवश्यक होगा कि शिकायतकर्ता शिकायत याचिका के प्रत्येक पृष्ठ पर अपने हस्ताक्षर करेगा और यह अभिवचनों के सत्यापन के लिए सिविल प्र(िcid:7059)या संहिता, 1908 के तहत निर्धारित तरीके से सत्यापित किया जाएगा। 5. अयोग्यता नियमों के नियम 6(7) में यह भी प्रावधान है कि शिकायत याचिका के साथ संलग्नक पर शिकायतकर्ता द्वारा हस्ताक्षर भी किए जाएंगे और इसे मुख्य याचिका के सत्यापन के लिए निर्धारित तरीके में सत्यापित भी किया जाएगा।

6. यह कि, अयोग्यता नियमों के नियम-7 के तहत अध्यक्ष पर पहले यह विचार करने का कर्त(cid:7390) होगा कि क्या याचिका नियम-6 की आवश्यकताओं का अनुपालन करती है और अयोग्यता नियमों के नियम-7 के उप-नियम-2 ने इसे अनिवार्य कर दिया है। यदि याचिका अयोग्यता नियम के नियम-6 की आवश्यकता का पालन नह(cid:7277) करती है तो याचिका को अस्वीकार करने और शिकायतकर्ता को सूचित करने का अध्यक्ष का कर्त(cid:7390) है।

7. कि, शिकायतकर्ता द्वारा दायर की गई शिकायत याचिका का के वल अवलोकन, जिसकी एक प्रति दिनांक 21.11.2023 के पत्र के साथ अभिसाक्षी को दी गई है, यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता द्वारा दायर की गई शिकायत में नियम-6 की सभी आवश्यकताओं का अनुपालन नह(cid:7277) होता है, यहां तक कि शिकायत याचिका की दलील और उसके संलग्नकों को सिविल संहिता प्र(िcid:7059)या, 1908 के तहत दलीलों के सत्यापन के लिए निर्धारित तरीके से सत्यापित नह(cid:7277) किया गया है।4 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 8. चू ंकि अयोग्यता नियमों में नियम-6 के तहत निहित प्रावधानों का पालन न करने पर जुर्माना निर्धारित किया गया है और निर्धारित जुर्माना शिकायत की अस्वीकृ ति है, इसलिए शिकायत याचिका इस अदालत द्वारा अयोग्यता नियमों के नियम-7(2) के तहत शक्ति का प्रयोग करके खारिज कर दी जानी चाहिए।

9. यह बताना प्रासंगिक है कि चू ंकि इस न्यायालय के आदेशों के तहत अभिसाक्षी को नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन अयोग्यता नियमों और दायर की गई शिकायत को देखे बिना, जारी किए गए नोटिस के खिलाफ अभिसाक्षी ने माननीय पटना उ(cid:7340) न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। टोकन नंबर CWJC-26280/2023 के माध्यम से रिट याचिका दायर की है जिसमें उक्त रिट याचिका की सुनवाई शी(cid:7062) कराने का प्रयास किया जा रहा है। 10. चू ंकि इस न्यायालय द्वारा जारी किया गया नोटिस पूरी तरह से अवैध है और शिकायतकर्ता द्वारा दायर की गई शिकायत अयोग्यता नियमों के नियम 6 की आवश्यकता का पालन नह(cid:7277) करती है, इसलिए शिकायत याचिका खारिज करने योग्य है।

11. कि, अवसर आने पर अभिसाक्षी के पास शिकायत के गुण-दोष के आधार पर विस्तृत कारण बताओ दायर करने का अधिकार सुरक्षित है।

इसलिए, विन(cid:7083)तापूर्वक प्रार्थना की जाती है कि महामहिम भारत के संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची के तहत शिकायतकर्ता द्वारा बिहार विधान परिषद् के सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित करने के लिए दायर की गई शिकायत याचिका को अस्वीकार करने की कृ पा करें।

और/या

ऐसे अन्य आदेश या आदेश पारित करें जिन्हें आप माननीय मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में उचित और उचित समझें। और

इसके लिए अभिसाक्षी सदैव प्रार्थना करेगा।''

परंतु माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह ने माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह द्वारा दायर याचिका की पोषणीयता (Maintainability) के अलावा याचिका में उल्लिखित तथ्य एवं उनके विरू(cid:7373) लगाये गए आरोप के खंडन हेतु पर्याप्त अवसर के बाद भी कोई तथ्य/कथन प्रस्तुत नह(cid:7277) किया। इस परिप्रे(cid:7023)य में मैंने नैस(cid:7414)गक न्याय के सि(cid:7373)ांतों का अनुपालन सुनि(िcid:7391)त करते (cid:7263)ए राष्ट्रीय जनता दल के माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह एवं याचिकादाता माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह को अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करने का और (cid:7018)यक्तिगत रूप से सुनवाई का समुचित अवसर प्रदान करते (cid:7263)ए दिनांक- 09.01.2024 एवं पक्षकारों को अंतिम अवसर देते (cid:7263)ए दिनांक- 16.01.2024 को अपना पक्ष रखने का मौका दिया।

दिनांक- 09.01.2024 की सुनवाई आरम्भ होते ही माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह के अधिवक्ता (cid:7088)ी वाई०बी०गिरी ने कहा कि ''सर, प्रतिवादी का इस संबंध में कहना है कि जो पेटिशन है वह गलत है। हमने अपने जवाब में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। मैंने अपने जवाब में कहा है कि सिर्फ के स के मेरिट पर सुनवाई की जाय। संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची में स्पष्ट उल्लेख है कि इस संबंध में माननीय अध्यक्ष, बिहार विधान सभा और माननीय सभापति, बिहार विधान परिषद् का निर्णय अंतिम होगा।''5 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 इतने पर माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह ने कहा कि ''सर, हम अनुरोध पत्र दे रहे हैं। हमारे अधिवक्ता नह(cid:7277) आ सके हैं। हमको समय दिया जाय ताकि हम अपने अधिवक्ता के माध्यम से अपना पक्ष रख सकें । हम उस संबंध में पत्र दे रहे हैं।''

पुन: (cid:7088)ी वाई०बी०गिरी अधिवक्ता ने कहा कि समय की मांग तो होती ही रहेगी क्योंकि यह डिले करने का कारण है। ये हाईकोर्ट में भी चले गए हैं। इस संबंध में माननीय सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि इस संबंध में सभापति, विधान परिषद् और अध्यक्ष, विधान सभा का निर्णय अंतिम होगा।

मैंने कहा कि माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह ने समय की मांग की है। इस पर (cid:7088)ी वाई०बी०गिरी ने कहा कि ''मैं तो इसका विरोध करता (cid:7264)ँ। इस तरह के के स में यह डिले करने की प्रवृति होती है। डिले इसलिए किया जाता है कि जितनी देर होगी उतने दिन की सदस्यता मेरी बरकरार रहेगी। इनको जब नोटिस दिया गया तो इन्होंने उसका जवाब नह(cid:7277) दिया और हाईकोर्ट में चले गए। संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची में स्पष्ट उल्लेख है कि हाईकोर्ट में इसका रि(cid:7018)यु नह(cid:7277) हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के संविधान बेंच ने भी कहा है कि ब(cid:7263)त ही स्माल रि(cid:7018)यु कर सकते हैं लेकिन के स के मेरिट पर रि(cid:7018)यु नह(cid:7277) कर सकते हैं। रि(cid:7018)यु वैसे ही के स में हो सकता है जहां पर नेचुरल जस्टिस का हनन (cid:7263)आ है। सुप्रीम कोर्ट के संविधान बेंच का भी इसमें निर्णय है कि सभापति और अध्यक्ष का निर्णय ही मान्य होगा क्योंकि इनको एक तरह से ट्रिब्यूनल का पावर है।

मैंने (cid:7088)ी वाई०बी०गिरी से पूछा कि किस तरह के नेचुरल जस्टिस के कारण में कोर्ट रि(cid:7018)यु कर सकता है। इस पर (cid:7088)ी वाई०बी०गिरी ने कहा कि नेचुरल जस्टिस का मतलब कि उनको नोटिस नह(cid:7277) दिया गया, या नोटिस देने के बाद जवाब देने के लिए उपयुक्त समय नह(cid:7277) दिया गया इसी तरह का है। इन्होंने हाईकोर्ट में जो के स किया है उसमें कहा है कि नियम 6 और 7 को फौलो नह(cid:7277) किया गया है। जो मामले को लंबित करने का उद्देश्य है।

इस पर माननीय सदस्य प्रो०(डॉ०) रामबली सिह ने अपने अधिवक्ता के साथ आने की अनुमति मांगी और समय की मांग की। उन्हें अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दी गयी और सुनवाई के लिए दिनांक- 16.01.2024 की तिथि रखी गयी। उनसे यह कहा गया कि यह अवसर उनके लिए अंतिम होगा, उन्हें अपने पक्ष में जो भी बात रखनी हो या जो भी अभिलेख, सा(cid:7023)य देना होगा, वे अंतिम रूप से स्वयं या अपने अधिवक्ता के माध्यम से अपना पक्ष रख सकते हैं।

दिनांक-16.01.2024 को सुनवाई आरंभ होते ही माननीय सदस्य प्रो०(डॉ०) रामबली सिह के अधिवक्ता (cid:7088)ी एस०बी०के ० मंगलम ने अपनी दलील पेश करते (cid:7263)ए कहा कि बिहार विधान परिषद् सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1994 इसी विधान परिषद् द्वारा पारित है। इसके पृष्ठ-4 की कं डिका संख्या-6 को देखा जाए। प्रस्तुत विषय में इसका पालन नह(cid:7277) किया गया है। इसमें लिखा (cid:7263)आ है:

(6) अभिदेश का याचिका द्वारा किया जाना (1) कोई सदस्य दसव(cid:7277) अनुसूची के अधीन निरर्हता से (cid:7061)स्त हो गया है अथवा नह(cid:7277) इस प्रश्न का अभिदेश उस सदस्य के संबंध में इस नियम के उपबंधों के अनुसार दी गई याचिका के द्वारा ही किया जाएगा अन्यथा नह(cid:7277)।6 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 (2) किसी सदस्य के संबंध में याचिका किसी अन्य सदस्य द्वारा सभापति को लिखित रूप में दी जा सके गी। आगे (5) में है कि प्रत्येक याचिका में-

(क) उन तात्विक तथ्यों का संक्षिप्त विवरण होगा, जिन पर याचिकादाता निर्भर है, और

(ख) याचिका के साथ ऐसे प्रलेखी सा(cid:7023)य (डोकु मेंट्री एभिडेंस) यदि कोई हो, की प्रतियां संल(cid:7336) होगी-जिन पर याचिकादाता निर्भर हैं और जहां याचिकादाता किसी (cid:7390)क्ति द्वारा उसे दी गई किसी जानकारी पर निर्भर है, वहां ऐसे (cid:7390)क्ति/(cid:7390)क्तियों के नाम और पता सहित विवरण और ऐसे प्रत्येक (cid:7390)क्ति द्वारा दी गई ऐसी जानकारी का सारांश संल(cid:7336) होगा।

(6) याचिका के प्रत्येक पृष्ठ पर याचिकादाता का हस्ताक्षर होगा और उसे अभिवचनों के सत्यापन के लिए सिविल प्र(िcid:7059)या संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित रीति से सत्यापित किया जाएगा।

(7) याचिका के प्रत्येक अनुबंध (एनेक्सचर) पर भी याचिकादाता का हस्ताक्षर होगा और उसे मूल याचिका के समान ही सत्यापित किया जाएगा।

7. प्र(िcid:7059)या -

(1) नियम-6 के अधीन प्राप्त याचिका पर सभापति प्रथमतः इस बात पर विचार करेगा कि याचिका नियम-6 की अपेक्षाओं का अनुपालन करती है अथवा नह(cid:7277)।

(2) यदि याचिका नियम-6 की अपेक्षाओं का अनुपालन नह(cid:7277) करती है, तो सभापति याचिका को रद्द कर देगा और तदनुसार याचिकादाता को संसूचित करेगा।

इसमें यह भी व(cid:7414)णत है कि सिविल प्र(िcid:7059)या संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित रीति में सत्यापित किया जाएगा। इस संबंध में माननीय उ(cid:7340) न्यायालय एवं माननीय उ(cid:7340)तम न्यायालय द्वारा कतिपय न्यायादेश भी पारित किए गए हैं। इस संबंध में मैं निवेदन करना चाहता (cid:7264)ं कि यह मामला पोषणीय (Maintainable) नह(cid:7277) है और इस याचिका को निरस्त किया जाना चाहिए। इस हाऊस में पारित नियमों में व(cid:7414)णत प्रावधानों का अनुपालन नह(cid:7277) किया गया है और न ही कोड ऑफ सिविल प्रोसिज्योर, 1908 का अनुपालन ही किया गया है। इस प्रकार धारा-7 में व(cid:7414)णत प्रावधान के अनुसार माननीय सभापति महोदय द्वारा इस वाद को खत्म करने का आदेश दिया जा सकता है। इतना ही नह(cid:7277), इनमें व(cid:7414)णत प्रावधानों के अनुसार याचिकाकर्ता के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही चलाने का भी प्रावधान इसमें है।

इस पर माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह के अधिवक्ता (cid:7088)ी वाई०बी०गिरी ने कहा कि महोदय, हमारे विद्वान मित्र ने जो कु छ कहा है उसके संबंध में कु छ बिन्दुओं का उल्लेख करने की अनुमति चाहता (cid:7264)ं, ''माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह की सदस्यता से निरर्हता के संबंध में माननीय पटना उ(cid:7340) न्यायालय में याचिका संख्या 17852 ऑफ 2023 डाली गई। यह याचिका पूर्ण रूप से मामले को अधिक देर तक लटकाने या लम्बा ख(cid:7277)चने के उद्देश्य से किया गया है। माननीय उ(cid:7340) न्यायालय को (cid:7082)मित करने के उद्देश्य से यह याचिका दायर की गई जिसमें माननीय उ(cid:7340) न्यायालय के समक्ष कहा गया कि7 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 बिहार विधान परिषद् सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1994 के नियम -6(2) के अधीन दी गई नोटिस को न्यायिक नह(cid:7277) माना जा सकता है। इसमें माननीय उ(cid:7340) न्यायालय ने अपने न्यायादेश में स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता को अपनी बात माननीय सभापति महोदय के समक्ष रखनी चाहिए। इसमें यह भी कहा गया कि यदि शो काऊज उनके द्वारा जारी किया गया है तो इसका जवाब भी माननीय सभापति महोदय को दिया जाना चाहिए। इस प्रकार माननीय कोर्ट ने इस मामले पर विचार करने से इनकार कर दिया।'' मेरा कहना है कि संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची में स्पष्ट प्रावधान किया गया है और इस मामले में माननीय उ(cid:7340)तम न्यायालय और माननीय उ(cid:7340) न्यायालय द्वारा पारित विभिन्न न्यायादेशों में स्थिति बिलकु ल स्पष्ट कर दी गई है। इस संबंध में यह कहना है कि विद्वान अधिवक्ता द्वारा सिर्फ इस आधार पर याचिका को निरस्त करने का अनुरोध किया गया है कि इसमें दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता नियम, 1994 का नियम 6 का अनुपालन नह(cid:7277) किया गया है। कई मामलों में हमारे मित्र ने इसी धारा-6 को उ(cid:7006)धृत किया है और हरेक बार इनके तर्क को नह(cid:7277) माना गया है। इनका यह तर्क शगुनिया तर्क है जिसका उपयोग ये हरेक बार करते हैं और हरेक बार कोर्ट द्वारा इसे स्वीकार नह(cid:7277) किया जाता है। रवि एस. नायक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स के मामले में भी (Civil Appeal No. 2904 of 1993 with C.A. No. 3309 of 1993, decided on February 9, 1994) चेयरमैन को यह अधिकार नह(cid:7277) दिया गया है कि एक बार यदि कार्यवाही आरंभ हो जाए, नोटिस इश्यू हो जाए तो वह प्रोसिडिग्स को रोक सकता है अथवा रि(cid:7018)यू कर सकता है,दसव(cid:7277) अनुसूची में यह अधिकार नह(cid:7277) दिया गया है। Kihoto Hollohan मामले में भी माननीय उ(cid:7340)तम न्यायालय ने ऐसा ही न्यायादेश पारित किया है। एक और मामले को कोट करना उचित समझता (cid:7264)ं हालांकि इस के स में मैं हार गया था परन्तु इसमें से निकली कु छ बिन्दुएं यहां संद(cid:7414)भत होनेवाली हैं। यह के स 2009 SCC Online Pat 1399: (2009) 4 PLJR 240:, Jai Narayan Prasad Nishad Vs. The Union of India, through the Secretary, Parliamentary Affairs, New Delhi and Ors. CWJC No. 5914 of 2008 है और इसमे संबंधित जजमेंट डॉक्युमें(cid:6999)स में लगा दी गई है।

(cid:6980)ानेन्(cid:7076) सिह मामले में विद्वान अधिवक्ता एस०बी०के ० मंगलम ने सुनवाई से पूर्व यह अनुरोध किया कि उपरोक्त वादों में सर्वप्रथम इश्यू (cid:7080)े म किया जाना चाहिए और उसके उपरान्त ही अ(cid:7061)तर सुनवाई होनी चाहिए जबकि (cid:7088)ी शाही ने यह कहा कि अध्यक्ष, बिहार विधान सभा द्वारा संविधान की 10व(cid:7277) अनुसूची में जो वाद निर्णयार्थ लाया जाता है उसमें सी.पी.सी. अथवा सा(cid:7023)य अधिनियम अथवा अन्य प्र(िcid:7059)यात्मक अधिनियमों का अक्षरशः अनुपालन की बाध्यता नह(cid:7277) है क्योंकि अध्यक्ष सक्षम दीवानी न्यायालय की प्र(िcid:7059)याओं में बंधे (cid:7263)ए नह(cid:7277) हैं। अध्यक्ष को मात्र यह सुनि(िcid:7391)त करना है कि सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाय, नैस(cid:7414)गक न्याय का अनुपालन एवं पक्षकारों की सभी दलीलों को सुनने के उपरान्त निर्णय किया जाए।

(cid:7088)ी गिरी द्वारा कहा गया कि 2.15 बजे पटना उ(cid:6994)च न्यायालय के स की सुनवाई है। इनके द्वारा आगे कहा गया कि ''मैंने सारे तथ्य आपके सामने रख दिए हैं। इस संबंध में महाचन्(cid:7076) प्रसाद सिह का के स, रवि एस. नायक का के स, किहोटो होलोहन का के स, जय नारायण प्रसाद निषाद का के स एवं अन्य मामले उ(cid:7006)धृत एवं दाखिल हैं। यहां माननीय अध्यक्ष, बिहार विधान सभा द्वारा दिया गया न्याय निर्णय, (cid:6980)ानेन्(cid:7076) कु मार सिह और कलाभारती एडवरटाइजिग एवं अन्य मामले से संबंधित न्याय निर्णय भी अटैच किया गया है। हमारे विद्वान साथी ने बिहार विधान परिषद् सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1994 के कतिपय विन्दुओं के आधार पर जो आपत्ति किया है. यह बिल्कु ल निराधार है। एक और8 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 कारण है कि दसव(cid:7277) अनुसूची से संबंधित यह प्रत्यायुक्त विधान है, मूल अधिनियम में यह नह(cid:7277) है। (cid:7088)ी गिरी द्वारा माननीय सव(cid:7299)(cid:6994)च न्यायालय द्वारा पारित आदेश महाचन्(cid:7076) प्रसाद सिह बनाम सभापति, बिहार विधान परिषद् एवं अन्य (2004) 8 एस०सी०सी० 447 के पैरा(cid:7061)ाफ 13, 16 एवं 18 तथा रवि एस० नायक एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य 1994 Supp(2)SCC 641 का पैरा 18 को उ(cid:7006)धृत किया गया।

Mahachandra Prasad Singh (Dr.) v. Chairman, Bihar Legislative Council, (2004) 8 SCC 747

13. It may be noted that under Paragraph 8, the Chairman or the Speaker of a House is empowered to make rules for giving effect to the provisions of the Tenth Schedule. The rules being delegated legislation are subject to certain fundamental factors. Underlying the concept of delegated legislation is the basic principle that the legislature delegates because it cannot directly exert its will in every detail. All it can in practice do is to lay down the outline. This means that the intention of the legislature, as indicated in the outline (that is the enabling Act), must be the prime guide to the meaning of delegated legislation and the extent of the power to make it. The true extent of the power governs the legal meaning of the delegated legislation. The delegate is not intended to travel wider than the object of the legislature. The delegate's function is to serve and promote that object, while at all times remaining true to it. That is the rule of primary intention. Power delegated by an enactment does not enable the authority by regulations to extend the scope or general operation of the enactment but is strictly ancillary. It will authorise the provision of subsidiary means of carrying into effect what is enacted in the statute itself and will cover what is incidental to the execution of its specific provision. But such a power will not support attempts to widen the purposes of the Act, to add new and different means of carrying them out or to depart from or vary its ends. (See Section 59 in chapter "Delegated Legislation" in Francis Bennion's Statutory Interpretation, 3rd Edn.) The aforesaid principle will apply with greater rigour where rules have been framed in exercise of power conferred by a constitutional provision. No rules can be framed which have the effect of either enlarging or restricting the content and amplitude of the relevant constitutional provisions. Similarly, the rules should be interpreted consistent with the aforesaid principle.

16. Sub-rule (1) of Rule 6 says that no reference of any question as to whether a member has become subject to disqualification under the Tenth Schedule shall be made except by a petition in relation to such member made in accordance with the provisions of the said rule and sub-rule (6) of the same rule provides that every petition shall be signed by the petitioner and verified in the manner laid down in the Code of Civil Procedure for the verification of pleadings. The heading of Rule 7 is "Procedure". Sub-rule (1) of this rule says that on receipt of petition under Rule 6, the Chairman shall consider whether the petition complies with the requirement of the said rule and sub-rule (2) says that if the petition does not comply with the requirement of Rule 6, the Chairman shall dismiss the petition. These Rules have been framed by the Chairman in exercise of power conferred by Paragraph 8 of the Tenth Schedule. The purpose and object of the Rules is to facilitate the job of the Chairman in discharging his duties and responsibilities conferred upon him by Paragraph 6, namely, for resolving any dispute as to whether a member of the House has become subject to disqualification under the Tenth Schedule. The Rules being in the domain of procedure, are intended to facilitate the holding of inquiry and not to frustrate or obstruct the same by introduction of innumerable technicalities. Being subordinate legislation, the Rules cannot make any provision which may have the effect of curtailing the content and scope of the substantive provision, namely, the9 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 Tenth Schedule. There is no provision in the Tenth Schedule to the effect that until a petition which is signed and verified in the manner laid down in CPC for verification of pleadings is made to the Chairman or the Speaker of the House, he will not get the jurisdiction to give a decision as to whether a member of the House has become subject to disqualification under the Schedule. Paragraph 6 of the Schedule does not contemplate moving of a formal petition by any person for assumption of jurisdiction by the Chairman or the Speaker of the House. The purpose of Rules 6 and 7 is only this much that the necessary facts on account of which a member of the House becomes disqualified for being a member of the House under Paragraph 2, may be brought to the notice of the Chairman……

18. ….. For the reasons stated earlier, we are of the opinion that the provisions of Rules 6 and 7 are directory in nature and on account of non-filing of an affidavit as required by sub-rule (4) of Order 6 Rule 15 CPC, the petition would not be rendered invalid nor would the assumption of jurisdiction by the Chairman on its basis be adversely affected or rendered bad in any manner. A similar contention was raised before a Bench presided by Venkatachaliah, C.J. in Ravi S. Naik v. Union of India [1994 Supp (2) SCC 641] but was repelled……

Ravi S. Naik v. Union of India, 1994 Supp (2) SCC 641 18. ………………. It was also submitted that the petitions were also not verified in the manner laid down in the Code of Civil Procedure for the verification of pleadings and thus there was non-compliance of sub-rule (6) of Rule 6 also and that in view of the said infirmities the petitions were liable to be dismissed in view of sub-rule (2) of Rule 7. We are unable to accept the said contention of Shri Sen. The Disqualification Rules have been framed to regulate the procedure that is to be followed by the Speaker for exercising the power conferred on him under sub-paragraph (1) of paragraph 6 of the Tenth Schedule to the Constitution. The Disqualification Rules are, therefore, procedural in nature and any violation of the same would amount to an irregularity in procedure which is immune from judicial scrutiny in view of sub- paragraph (2) of paragraph 6 as construed by this Court in KihotoHollohan case [1992 Supp (2) SCC 651] . Moreover, the field of judicial review in respect of the orders passed by the Speaker under sub-paragraph (1) of paragraph 6 as construed by this Court in KihotoHollohan case [1992 Supp (2) SCC 651] is confined to breaches of the constitutional mandates, mala fides, non-compliance with Rules of Natural Justice and perversity. We are unable to uphold the contention of Shri Sen that the violation of the Disqualification Rules amounts to violation of constitutional mandates. By doing so we would be elevating the rules to the status of the provisions of the Constitution which is impermissible. Since the Disqualification Rules have been framed by the Speaker in exercise of the power conferred under paragraph 8 of the Tenth Schedule they have a status subordinate to the Constitution and cannot be equated with the provisions of the Constitution. They cannot, therefore, be regarded as constitutional mandates and any violation of the Disqualification Rules does not afford a ground for judicial review of the order of the Speaker in view of the finality clause contained in sub-paragraph (1) of paragraph 6 of the Tenth Schedule as construed by this Court in KihotoHollohan case.

10 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024

अपने तर्क के समर्थन में (cid:7088)ी वाई० वी० गिरी वरीय अधिवक्ता द्वारा विभिन्न सदन, माननीय उ(cid:6994)च एवं सव(cid:7299)(cid:6994)च न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णयों को उ(cid:7006)धृत करते (cid:7263)ए उनकी छाया प्रतियां दाखिल किया गया, जो निम्नांकित है :

SI. No. Case Law
1. Dr. Mahachandra Prasad Singh V. Chairman, Bihar Legislative Council & Ors.(2004) 8 SCC 747
2. Ravi S. Naik v. Union of India & Ors.1994 Supp (2) SCC 641
3. Kihoto Hollohan V. Zachillhu & Ors.1992 Supp (2) SCC 651
4 Jai Narayan Prasad Nishad V. The Union of India & Ors 2009 SCC 1399/2009 4 PLJR 240
5 Hon'ble Speaker Bihar Vidhan Sabha, Patna Order dated 01.11.2014
6 Gyanendra Kumar Singh V The State of Bihar & Ors. LPA 83/2015
7 Kalabharti Advertising V Hemant Vimlanath & Ors. 2010 9 SCC 437

इस पर (cid:7088)ी एस०बी०के ० मंगलम, अधिवक्ता ने कहा कि माननीय उ(cid:7340)तम न्यायालय द्वारा रवि.एस. नायक के स में दिए गए जजमेंट का हवाला हमारे मित्र ने दिया है, उन्ह(cid:7277) दोनों मामलों को यहां उद्धृत किया गया है। इसके आधार पर ही कहा गया है कि सी.पी.सी. की प्र(िcid:7059)या का पालन नह(cid:7277) किया गया है और शपथ पत्र पर सम(cid:7414)पत नह(cid:7277) कियागया है। हमने यह नह(cid:7277) कहा है कि इन्होंने सी.पी.सी. का पालन नह(cid:7277) किया है। मैं ध्यान आकृ ष्ट करना चाहता (cid:7264)ं कि याचिकाकत्र्ता की ओर से दाखिल निर्णय (cid:7088)ी (cid:6980)ानेन्(cid:7076) कु मार सिह एवं अन्य के मामले माननीय अध्यक्ष बिहार विधान सभा द्वारा दिनांक – 01.11.2014 के निर्णय में इसमें बारू राम एआईआर 1959 SC 893, उ(cid:7006)धृत है। परंतु इसमे बारू राम नह(cid:7277) देखा गया है और गलत पृष्ठ कोट किया गया है नाम बारू राम है जजमेंट कारू राम का है और जजमेंट में पृष्ठ 893 नह(cid:7277) है, पृष्ठ 93 है। मेरा यही कहना है कि इसमें गलत पृष्ठों का उल्लेख किया गया है।

इस पर माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह के अधिवक्ता (cid:7088)ी वाई०बी०गिरी की सहायक अधिवक्ता सु(cid:7088)ी सृष्टी ने कहा कि इसमें सी.पी.सी. का पालन नह(cid:7277) करना था और दूसरा जो वे पृष्ठ संख्या कह रहे हैं, वह टाईपिग एरर है। के स वही है।

उपरोक्त तथ्यों, तक(cid:7300) एवं अभिलेख के अवलोकन के आधार पर मैं यह पाता (cid:7264)ँ कि Rule– 6 एवं 7 के संबंध में की गयी प्रो०(डॉ०) रामबली सिह की Maintainability संबंधी आपत्ति की वास्तविकता यह है कि माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह द्वारा दी गयी याचिका दिनांक – 02.11.2023 के वल दो पृष्ठ की है जो याचिकाकत्र्ता द्वारा हस्ताक्षरित है एवं सिविल प्र(िcid:7059)या संहिता 1908 के प्रावधान के आलोक में सत्यापित (वेरीफाइड) है तथा बीस पृष्ठ का अनुलग्नक भी याचिकाकत्र्ता द्वारा हस्ताक्षरित है। वैसे भी (cid:7088)ी वाई०वी गिरी विद्वान अधिवक्ता की ओर से दाखिल निर्णयों में निर्धारित है कि Provisions of Rule 6 & 7 are directory in nature and on account of non-compliance with the provision of order11 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024 VI Rule 15(4) of CPC the petition would not be rendered invalid [(2004) 8 SCC 747 Dr.

Mahachandra Prasad Singh V. Chairman, Bihar Legislative Council & Ors. एवं Ravi S Naik & Vs Union of India & Ors., 1994 Supp(2) SCC 641] इसलिए प्रो०(डॉ०) रामबली सिह की ओर से की गई आपत्ति में बल नह(cid:7277) पाता (cid:7264)ं।

माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह ने अपने Written statement raising preliminary issue regarding maintainability of complaint शपथ पत्र से सम(cid:7414)थत दिनांक- 15.12.2023 एवं अपनी सुनवाई के दौरान, कह(cid:7277) भी माननीय सदस्य डॉ० सुनिल कु मार सिह के याचिका एवं जवाब में व(cid:7414)णत अन्य तथ्यों के साथ-साथ यह तथ्य की ''राष्ट्रीय जनता दल का सदस्य रहते (cid:7263)ए वह विधान मंडल दल के नेता पर मनगढंत आरोप लगाए कि ''तेजस्वी प्रसाद यादव भी पीते हैं शराब''। दल के नीति के खिलाफ अतिपिछड़ा समाज को खंडित करने के उद्देश्य से तेली, तमोली (चौरसिया) और दांगी जाति को मूल अतिपिछड़ा (cid:7088)ेणी से अलग करने संबंधी बयान दिए एवं बैनर पोस्टर लगाकर पदयात्रा और सम्मेलन किए। इस कार्य(cid:7059)म में न तो दल का चुनाव चि(cid:7022)न पोस्टर पर लगाए और न ही दल का झंडा लगाए। जाति आधारित गणना के खिलाफ बयान दिये कि,: नीतीश सरकार ने जाति आधारित गणना में बड़ी चालाकी से घालमेल किया है इस तरह के बयान से भारतीय जनता पार्टी सहित विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए अनर्गल आरोप की पुष्टि होती है'' का खंडन नह(cid:7277) किया। इसी प्रकार डॉ० सुनिल कु मार सिह के याचिका के साथ संलग्न पत्रों एवं समाचार पत्रों की छाया प्रति में व(cid:7414)णत तथ्यों का भी खंडन प्रो० ( डॉ०) रामबली सिह के द्वारा उनको समुचित अवसर प्रदान करने के बावजूद भी उनके द्वारा नह(cid:7277) किया गया।

इससे स्पष्ट है कि डॉ० सुनिल कमार सिह के याचिका एवं उसके अनुबंध में प्रो० (डॉ०) रामबली सिह माननीय सदस्य के विरू(cid:7373) लगाये गये आरोप सही हैं। 10व(cid:7277) अनुसची के पैरा(cid:7061)ाफ 2(1) (क) ''स्वे(cid:6994)छा से अपनी सदस्यता छोड़ दी, इस्तीफा का पर्याय नह(cid:7277) है और इसका (cid:7018)यापक अर्थ है । कोई (cid:7018)यक्ति स्वे(cid:6994)छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ सकता है, भले ही उसने उस दल की सदस्यता से अपना इस्तीफा न दिया हो। यहां तक कि सदस्यता से औपचारिकता इस्तीफे के अभाव में भी किसी सदस्य के आचरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसने स्वे(cid:6994)छा से उस राजनीतिक दल की सस्यता छोड़ दी है, जिसका वह सदस्य है ऐसा रवि एस० नायक बनाम भारत संघ में माननीय सव(cid:7299)(cid:6994)च न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया है।''

साथ ही इस मामले में माननीय सव(cid:7299)(cid:6994)च न्यायालय द्वारा Kihoto Hollohan V. Zachillhu & Ors.1992 Supp (2) SCC 651 के के स में पारित न्याय निर्णय को संद(cid:7414)भत करना प्रासंगिक है। उक्त के स का पैरा 44 नीचे उ(cid:7006)धृत है :

"But a political party functions on the strength of shared believes. Its own political stability and social utility depends on such shared beliefs and concerted action of its Members in furtherance of those commonly held principles. Any freedom of its Members to vote as they please independently of the political party's declared policies will not only embarrass its public image and popularity but also undermine public confidence in it which, in the ultimate analysis, is its source of sustenance- nay, indeed, its very survival. (emphasis supplied). Intra-party debates are of course a different thing. But a public image of disparate stands by Members of the same political party is not looked upon, in political tradition, as a desirable state of things.

12 (cid:464)बहार गजट (असाधारण) 8 फरवर(cid:547) 2024

Griffith and Ryle on parliament Functions, Practice and Procedure (1989 Edn., P. 119) say:

'Loyalty to party is the norm, being based on shared beliefs. A divided party is looked on with suspicion by the electorate. It is natural for Members to accept the opinion of their leaders and spokesmen on the wide variety of matters on which those Members have no specialist knowledge. Generally Members will accept majority decisions in the party even when they disagree. It is understandable therefore that a Member who rejects the party whip even on a single occasion will attract attention and more criticism than sympathy. To abstain from voting when required by party to vote is to suggest a degree of unreliability. To vote against party is disloyalty. To join with others in abstention or voting with the other side smacks of conspiracy.' "

वतर्मान मामले में वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर प(cid:7263)ँचा (cid:7264)ँ कि भारत के संविधान के अनु(cid:6994)छेद- 19(1)(क) में नागरिकों को भाषण और अभि(cid:7018)यक्ति का मौलिक अधिकार प्राप्त है, परंतु यदि कोई नागरिक किसी राजनीतिक दल के सदस्य की हैसियत से सदन का सदस्य है तो उसे अपने आचरण एवं (cid:7018)यवहार से दल के अनुशासन, संविधान और नियम के अनुपालन हेतु सदैव तत्पर रहते (cid:7263)ए पुनीत कर्त(cid:7018)य का निर्वहन भी सुनिश्चित करना चाहिए। इसलिए माननीय सदस्य प्रो०(डॉ०) रामबली सिह का उपरोक्त व(cid:7414)णत कृ त्य, आचरण एवं (cid:7018)यवहार से स्पष्ट है कि उन्होंने अपने मूल राजनीतिक दल, राष्ट्रीय जनता दल का स्वे(cid:6994)छया परित्याग कर दिया है।

अत: माननीय सदस्य डा० सुनिल कु मार सिह, तत्कालीन उप मुख्य सचेतक (सत्तारूढ़ दल) की याचिका दिनांक- 02.11.2023 को स्वीकार करते (cid:7263)ए मैं यह घोषणा करता (cid:7264)ँ कि भारत के संविधान के अनु(cid:6994)छेद 191(2) एवं संविधान की दसव(cid:7277) अनुसूची के पैरा- 2(क) तथा बिहार विधान परिषद् सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) नियम, 1994 के प्रावधानों के आलोक में बिहार विधान परिषद् के माननीय सदस्य प्रो० (डॉ०) रामबली सिह इस सदन के सदस्य होने से निर(cid:7414)हत हो गए हैं।

अतएव भारत के संविधान के अनु(cid:6994)छेद 190(3) (क) के प्रावधान के आलोक में बिहार विधान परिषद् में माननीय सदस्य प्रो०(डॉ०) रामबली सिह का स्थान आज, दिनांक-06.02.2024.अपरा(cid:7022)न के प्रभाव से रिक्त हो गया है।

आदेश से,

पटना,

(ह०)-अस्पष्ट

दिनांक- 06.02.2024

सभापति

बिहार विधान परिषद् ।

————

अधी(cid:162)क, सिचवालय मु(cid:289)णालय,

(cid:464)बहार, पटना (cid:430)ारा (cid:292)कािशत एवं मु(cid:464)(cid:289)त।

(cid:464)बहार गजट (असाधारण) 107-571+100-डी0ट(cid:547)0पी0।

Website: http://egazette.bih.nic.in

Cite this issue. Bihar Gazette, Government of Bihar, 08 February 2024. Indian Gazettes, https://egazette.servantsofknowledge.in/details/in.gov.bih.gazette.2024-02-08.107/. Archive identifier in.gov.bih.gazette.2024-02-08.107.